शनिवार, 11 अप्रैल 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: डिप्टी सीएम की वैकेंसी?



तरकश, 12 अप्रैल 2026

संजय के. दीक्षित

डिप्टी सीएम की वैकेंसी?

राजनीतिक गलियारों में जैसी की चर्चाएं हैं, 3 मई के बाद छत्तीसगढ़ में एक डिप्टी सीएम की वैकेंसी हो सकती है। 3 मई को पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की काउंटिंग है। इसके बाद बीजेपी नितिन नबीन की टीम बनाने पर अपना फोकस करेगी। यूपी में अगले साल इलेक्शन है और वहां ब्राम्हण समेत कई जातियां बीजेपी से बहुत खुश नहीं है। इसलिए टीम नितिन में सबको साधने का प्रयास किया जाएगा। बहरहाल, बात छत्तीसगढ़ में डिप्टी सीएम की वैकेंसी की...तो डिप्टी सीएम के करीबी लोग भी तस्दीक कर रहे हैं कि भाई साब को राष्ट्रीय महासचिव बनाया जाएगा। छत्तीसगढ़ में फिलवक्त दो डिप्टी सीएम हैं। एक अगर दिल्ली गए तो फिर सिंगल डिप्टी सीएम बच जाएंगे। सियासी संतुलन के हिसाब से सरकार भी नहीं चाहेगी कि एक उप मुख्यमंत्री रहें। इसलिए, जुलाई में संभावित मंत्रिमंडल की सर्जरी में किसी नए या पुराने में से एक को डिप्टी सीएम बनाया जाएगा। मगर तब, जब भाई साब जनरल सिकेट्री बन जाएं।

जनरल सिकेट्री के मायने

वैसे तो बीजेपी की नेशनल बॉडी में पूर्व मंत्री लता उसेंडी के शामिल होने की संभावना अधिक है। वे 10 साल तक मिनिस्टर रही हैं। जगतप्रकाश नड्डा की टीम में भी रहीं। उनके बनने से दो कोटे की पूर्ति होगी। ट्राईबल और महिला। बहरहाल, डिप्टी सीएम के नितिन नबीन की टीम में शामिल होने की चर्चाएं हैं तो सवाल भी उठते हैं कि उप मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ भाई साब दिल्ली में इतनी उत्सुकता क्यों दिखा रहे? इसका जवाब है कि उनका एज अभी काफी कम है। दिल्ली के क्लोज अगर हो गए तो राज्य में बड़े एक्सपोजर के साथ कभी भी वापसी हो सकती है। राज्य में नहीं भी आए, दिल्ली की सियासत में मामला ठीकठाक जम गया तो वो भी बुरा नहीं...ओजस्वी वक्ता तो हैं ही इंग्लिश भी ठीकठाक झाड़ लेते हैं। इसलिए, डिप्टी सीएम साब भी जनरल सिकेट्री बनने की चर्चाओं को खारिज नहीं कर रहे।

जुलाई में सर्जरी

छत्तीसगढ़ समेत पांच राज्यों में नवंबर 2023 में विधानसभा चुनाव हुए, जुलाई में वहां ढाई साल पूरा हो जाएगा। अब बाकी राज्यों के बारे में गारंटी के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता मगर छत्तीसगढ़ में मंत्रियों के जो हालात है, उससे मेगा सर्जरी अवश्यंभावी है। जुलाई में ही सर्जरी इसलिए कि 3 मई को काउंटिंग के बाद करीब 15 मई तक बीजेपी सरकार बनाने और जश्न सेलिब्रेट करने में व्यस्त रहेगी। 15 मई के बाद टीम नितिन नबीन बनाने पर मंथन प्रारंभ होगा। ऐसी संभावना है कि मई लास्ट या जून फर्स्ट वीक तक राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन कर लिया जाएगा। इसके बाद फिर केंद्र सरकार जिन राज्यों के ढाई साल कंप्लीट हो गए हैं, उस पर अपना ध्यान केंद्रित करेगी। केंद्र को इसमें ज्यादा वक्त नहीं लगेगा क्योंकि उसके पास पूरी रिपोर्ट है। छत्तीसगढ़ की आईबी तो और काफी एक्टिव है। यहां मंत्रियों के कारनामों की छोटी-से-छोटी सूचना भी मुख्यालय को भेजती है। लिहाजा, जुलाई में जो सर्जरी होगी, वो मेजर होगी। दावे तो ये किए जा रहे...आधा दर्जन से अधिक मंत्रियों को शानो-शौकत वाले लग्जरी बंगले से बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ सकता है।

बेलगाम मंत्री, भ्रष्ट विभाग

छत्तीसगढ़ सरकार एक तरफ महिलाओं के उत्थान के लिए महतारी वंदन योजना चला रही है। हर महीने उनके खाते में नियम से हजार रुपए ट्रांसफर किया जाता है। दूसरी तरफ शर्मनाक स्थिति यह है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को साड़ी बांटने में डंडी मारी जा रही। हद है...महिला बाल विकास विभाग ने साढ़े पांच की जगह पांच मीटर की साड़ी सप्लाई कर दी। सरकार को इसमें कड़ा तेवर दिखा जिम्मेदारों को उल्टा लटकाना चाहिए। क्योंकि, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताएं सरकार और सत्ताधारी पार्टी के लिए ओपिनियन मेकर होती हैं। वैसे भी सरकार की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। आश्चर्य की बात कि कई बड़े और ऐतिहासिक सुधार के काम करने के बाद भी सरकार को उसका क्रेडिट नहीं मिल रहा तो उसकी मूल वजह करप्शन है और मंत्रियों का बेलगाम होना। बीजेपी के लोग भी मान रहे कि अगले दो-तीन महीने में अगर मंत्रिमंडल में सर्जरी नहीं हुई तो फिर 2028 के विधानसभा चुनाव में बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। आखिर, मंत्री और नेता अपने हाथों ही पार्टी और सरकार की लंका कर देंगे तो मोदी, अमित शाह और नितिन नबीन कितना क्या कर लेंगे?

डीजीपी और कांटे का टक्कर

लास्ट संडे को छुट्टी का दिन होने के बाद भी गृह विभाग के मुलाजिमों को शाम तक मंत्रालय में बिठाकर रखा गया कि पूर्णकालिक डीजीपी का आदेश निकालना है। मगर टक्कर इतना जोरदार है कि सिस्टम किसी एक नाम पर फैसला नहीं कर पाया। डीजीपी के दावेदारों में एक यूपी के ठाकुर हैं तो दूसरे राजस्थान के वैश्य। जाहिर है, दोनों अपनी तरफ से कोशिशें कम नहीं कर रहे होंगे। मगर सरकार बड़ी दुविधा में है। किसके नाम पर मुहर लगाएं...एक है तो वो कुछ सुनता नहीं...सिस्टम को चिंता यह भी खाये जा रही है। सियासी दृष्टि से भी दोनों कमजोर नहीं। वैसे भी ठाकुर और वैश्य कम्यूनिटी में ये अच्छी बात है कि उनके लिए समाज फर्स्ट होता है, पार्टी सेकेंड्री। सो, मुकाबला टाईट है। हालांकि, एक बात तय है कि दोनों में से डीजीपी वही बनेगा, जिसके माथे पर लिखा होगा। भला अमरनाथ उपध्याय ने कभी कहां सोचा था कि गिरधारी नायक जैसे आईपीएस के होते वे कभी डीजीपी बन जाएंगे। मगर ऐसा हुआ...29 साल की सर्विस में एडीजी होते हुए वे डीजीपी बन गए थे। उनके लिए तत्कालीन मुख्य सचिव सुनिल कुमार प्रगट हो गए थे। उन्होंने अशोक जुनेजा को हाथोंहाथ लेटर लेकर दिल्ली भेजा और एमएचए सिकेट्री को फोन कर उसी दिन शाम को 29 साल की सर्विस में डीजीपी बनाने का परमिशन ले लिया। तो अतीत में ऐसा भी हुआ है, इसका स्मरण रखना चाहिए।

2001 बैच तक दावेदार

छोटे राज्यों में अफसरों की कमी की वजह से भारत सरकार ने डीजीपी बनाने के लिए आईपीएस की 30 बरस की सर्विस को पांच साल कम कर 25 साल कर दिया है। छत्तीसगढ़ सरकार अगर इसे फॉलो करें तो 2001 बैच तक के आईपीएस अधिकारी डीजीपी के लिए दावेदार हो जाएंगे। याने एसआरपी कल्लूरी से लेकर प्रदीप गुप्ता, विवेकानंद, दीपांशु काबरा, अमित कुमार और डॉ0 आनंद छाबड़ा तक। तब सरकार के पास ढेरो विकल्प होते। मगर सरकार ने डीजीपी के पेनल के लिए 30 साल की सर्विस को मान्य करते हुए तीन अफसरों के नाम ही यूपीएससी को भेजे थे। इनमें से यूपीएससी ने दो के ही पेनल भेजे।

एडीजी के नीचे एडीजी

अफसरों की सरकार से नाराजगी कोई नई बात नहीं। हर टेन्योर में कुछ अफसर सिस्टम के निशाने पर होते हैं। मगर पोस्टिंग प्रोटोकॉल में वह शो नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए दीपांशु काबर और डॉ0 आनंद छाबड़ा की पोस्टिंग को लें। दीपांशु काबरा पीएचक्यू में एडीजी ट्रेनिंग हैं और प्रमोट हुए एडीजी छाबड़ा भी एडीजी ट्रेनिंग। याने एडीजी के नीचे एडीजी। कायदे से ऐसा होना नहीं चाहिए। सिस्टम चाहे तो भले ही पोस्टिंग न दें, मगर सीनियर, जूनियर को एक ही पद पर नहीं बिठाना चाहिए।

गोल्फ प्रेम को झटका 

मंत्रालय समेत सरकारी कार्यालयों में बायोमेट्रिक अटेंडेंस प्रारंभ होने से उन अफसरों को गोल्फ खेलना छूट गया है जिनकी सरकारी गाड़ियां सुबह छह और सात बजे नवा रायपुर की तरफ दौड़ती रहती थी। कुछ सालों से अभिजात्य वर्ग के इस खेल के प्रति छत्तीसगढ़ के अफसरों की रुचि गहरी हुई थी। कुछ अफसर तो यह दिखाने के लिए भी जाते थे कि वे गोल्फ खेलते हैं। हालांकि, उस समय कोई रोक-टोक भी नहीं थी...अफसरशाही में पूरी डेमोक्रेसी थी। गोल्फ खेल-खालकर अफसर 10 बजे तक घर पहुंचते थे...फिर मूड हुआ तो दोपहर बारह-एक बजे तक मंत्रालय। मगर बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम ने स्टे्टस सिंबल बताने का सबका खेल बिगाड़ दिया। जो नवा रायपुर में रहते हैं, उनको दिक्कत नहीं मगर ओल्ड रायपुर वालों को अब साढ़े नौ बजे घर से निकलना पड़ता है। ऐसे में, गोल्फ प्रेम छूटेगा ही।

वायरल रील्स और उठते सवाल

छत्तीसगढ़ की पुलिस बिरादरी में एक रील्स बड़ी वायरल है। उसमें इंटरव्यू बोर्ड पुलिस की नौकरी के लिए अप्लाई किए अभ्यर्थी से पूछा...पुलिस के लिए 150 रुपए पौष्टिक भत्ता मिलता है, आप पुलिस में हैं तो इसे कैसे मैनेज करेंगे? जवाब बड़ा इंटरेस्टिंग और सिस्टम पर करारा प्रहार करने वाला है। अप्लीकेंट बोला, सर...150 रुपए के हिसाब से एक दिन का पांच रुपए हुआ। पांच रुपए का एक नींबू आता है, रोज उसमें नमक लगाकर चाट लेंगे। इससे विटामिन सी की पूर्ति हो जाएगी फिर आयोडिन मिलेगा, इससे पुलिस वालों को घेंघा रोग नहीं होगा। हालांकि, रील्स बनाने वाले ने त्रुटिवश इसमें 50 रुपए बढ़ा दिया है। वास्तव में हमारे जवानों को पौष्टिक भत्ते के रूप में मिलता 100 रुपए है। मध्यप्रदेश के दौर में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने 1982 में पुलिस वालों के लिए 100 रुपए पौष्टिक भत्ता शुरू किया था। और 44 साल बाद भी यह 100 से बढ़ा नहीं। जबकि, यूपी में 5000 और पंजाब में 6000 पौष्टिक भत्ता मिलता है। जाहिर है, पुलिस की नौकरी सबसे टफ है। बरसात हो या चिलचिलाती धूप, या हाड़ कंपाने वाली ठंड...पुलिस को मुस्तैद रहना होता है। मंत्री, मिनिस्टर या बड़े लोगों का वीवीआईपीनेस भी वर्दीधारियों की संख्या के चलते ही प्रगट होता है फिर भी ये हाल? छत्तीसगढ़ में अभी तक 11 डीजीपी रह चुके। मगर किसी ने भी कोई जवानों के लिए एफर्ट नहीं दिखाया। दरअसल, आईपीएस और स्टेट पुलिस सर्विस वालों को काजू-बादाम जैसे पोष्टिक चीजें खरीदनी नहीं पड़ती, इसलिए वे पौष्टिक पदार्थो के रेट से वाकिफ नही होते। इसलिए, उन्हें जवानों की चिंता भी नहीं होती। अर्जुन सिंह राजा होकर भी संवेदनशील थे, ये अलग बात है। बहरहाल, प्रभारी डीजीपी अरुणदेव गौतम को पौष्टिक भत्ता बढ़ाने के लिए अब तक के सबसे तेज-तर्रार गृह मंत्री विजय शर्मा से बात करनी चाहिए। क्योंकि, बाकी डीजीपी के समय विजय शर्मा जैसा कोई ताकतवर गृह मंत्री नहीं रहा।

हफ्ते का कोट

"तुलना के खेल में मत उलझो, इस खेल का कोई अंत नहीं...जहां तुलना की शुरूआत होती है, वहीं से आनंद और अपनापन खत्म होता है।" और फिर..."नहीं खाई ठोकरे राह में तो, मंजिल की अहमियत क्या जानोगे, नहीं मिले गलत लोग राह में तो, सही की कदर कैसे पहचानोगे।"

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या 2010 बैच का कोई आईएएस अफसर भी डेपुटेशन पर दिल्ली जा रहा है?

2. छत्तीसगढ़ के एक मिनिस्टर का नाम बताइये, जिन्हें कुछ समझ में नहीं आता, उनके विभाग सिकेट्री चला रहे हैं?


Chhattisgarh Tarkash 2026: एमडी टू मिनिस्टर



तरकश, 5 अप्रैल 2026

संजय के. दीक्षित

एमडी टू मिनिस्टर

तरकश के पिछले स्तंभ में बिजली कंपनी के एक एमडी के नवाबी ठसन का किस्सा बयां किया था...कैसे वे मंत्रियों की तरह अपने काफिले की पायलेटिंग कराते हैं। अब पता चला है कि एमडी अगला विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। उन्हें किसी ने कह दिया है कि अगर चुनाव जीत गए तो मंत्री पक्का बनोगे...जब ऐसे-वैसे लोग मंत्री बन सकते हैं तो तुम तो पढ़े-लिखे...बड़े इंजीनियर से एमडी पद पर पहुंचे हो। इसके बाद से एमडी के लटके-झटके अभी से मंत्रियों जैसे हो गए हैं। चुनाव लड़ने के लिए उनके मैडम भी खूब निभा रही हैं। जिस इलाके में चुनाव लड़ने की तैयारी है वहां धड़ाधड़ समाधान शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। शिविरों में गरीबों के बिजली बिल का बकाया बिल मैडम भुगतान कर देती हैं। पीछे बैठे जेई, एई जेब से मैडम को पैसे निकाल कर देते हैं, और मैडम उसे जमा करा देती हैं। फिर होता है...जय-जयकार। व्हाट एन आईडिया। अफसर रहते नेताओं जैसा जय-जयकार।

अफसर को एक्सटेंशन!

पीसीसीएफ और हेड ऑफ फॉरेस्ट श्रीनिवास राव का रिटायरमेंट का समय नजदीक आ गया है। अगले महीने 31 मई को उनकी सेवानिवृत्ति है। मगर इसी के साथ उन्हें एक्सटेंशन मिलने की अटकलें भी तेज हो गई है। जाहिर है, श्रीनिवास राव भूपेश बघेल सरकार में सात सीनियर अफसरों को सुपरसीड कर हेड ऑफ फॉरेस्ट बने थे। जब वे फॉरेस्ट के हेड बने थे, तब आश्चर्यजनक तौर से वे पीसीसीएफ भी प्रमोट नहीं हुए थे। और दिसंबर 2023 में विष्णुदेव साय की सरकार आने के बाद भी ढाई साल से पिच पर बने हुए हैं, तो उनमें कुछ तो बात होगी। वैसे उनके एक्सटेंशन की अटकलों के पीछे मजबूत पॉलिटिकल बैकिंग बताई जा रही है। श्रीनिवास राव के निकटतम परिजन आंध्रप्रदेश में ऐसे कद्दावर नेता है, जिनके खेमे में दो दर्जन विधायक हैं। उसी गुट के सपोर्ट पर चंद्राबाबू नायडू की सरकार चल रही है और चंद्राबाबू के सपोर्ट पर केंद्र सरकार। तो फिर उनके एक्सटेंशन की खबरों को एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता।

माटी पुत्र

श्रीनिवास राव के बाद सीनियरिटी में पहले नंबर पर अरुण पाण्डेय हैं। 94 बैच के आईएफएस अरुण हेड ऑफ फॉरेस्ट के प्रबल दावेदार हैं। मगर श्रीनिवास राव को एक्सटेंशन मिला तो फिर अरुण पाण्डेय को हेड ऑफ फॉरेस्ट बनने की संभावनाएं क्षीण हो जाएंगी। अलबत्ता, श्रीनिवास को अगर एक्सटेंशन न मिला तो फिर हॉफ के लिए मुख्य मुकाबला दो अंबिकापुरिया में होगा। अरुण पाण्डेय और ओपी यादव दोनों अंबिकापुर के रहने वाले हैं। याने दोनों में से कोई भी बने, कोई माटी पुत्र ही हेड ऑफ फॉरेस्ट होगा। बशतें एक्सटेंशन की चकरी न चले।

नो ट्रांसफर

छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक ट्रांसफर पर कुछ दिनों के लिए ब्रेक लग गया है। अब मई के फर्स्ट वीक तक जाकर ही कुछ हो पाएगा। बता दें, सूबे में कलेक्टर, एसपी, डीएफओ, जिला पंचायत सीईओ समेत डिप्टी कलेक्टरों के ट्रांसफर काफी दिनों से अवेटेड है। मगर सरकार ने फैसला किया है कि फिलहाल कोई चेंज नहीं किया जाए। जो होगा अब मई फर्स्ट वीक तक...या हो सकता है 15 मई तक चला जाए। इसकी एक बड़ी वजह पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं। इसमें छत्तीसगढ़ से बड़ी संख्या में अफसरों की ड्यूटी लगी है। वेस्ट बंगाल में अप्रैल के अंत में वोटिंग है। सीएम सचिवालय के सूत्रों का कहना है, अफसरों के इलेक्शन से लौटने के बाद ही ट्रांसफर होंगे। याने मई ट्रांसफर का महीना रहेगा। जाहिर है, कई जिलों के कलेक्टर, एसपी, डीएफओ बोरिया-बिस्तर बांध कर प्रतीक्षा कर रहे हैं। मगर उन्हें अभी महीना-डेढ़ महीना और इंतजार करना पड़ेगा।

कमिश्नर रिटायर

रायपुर के डिविजनल कमिश्नर महादेव कावड़े अगले महीने सेवानिवृत्त हो जाएंगे। 31 मई उनका लास्ट डेट रहेगा। इसलिए, रायपुर में नया कमिश्नर भी अपाइंट करना होगा। मई में होने वाली प्रशासनिक सर्जरी में नए रायपुर कमिश्नर भी शामिल होंगे। वैसे, सरकार ने प्रमोटी आईएएस को कमिश्नर बनाने का स्टैंडर्ड सेट कर दिया है। लिहाजा, अत्यधिक संभावना है कोई प्रमोटी आईएएस रायपुर का नया कमिश्नर बनेगा। भले ही वह मंत्रालय के सचिव स्तर का कोई अधिकारी क्यों न हो।

सिंगल ऑफिसर और हनी ट्रेप

बिलासपुर में आईजी लेवल के दो अफसरों को ट्रेप किया गया। ये दोनों सिंगल थे और जाहिर तौर से सिंगल वाले को फंसना-फंसाना ज्यादा आसान होता है। इसलिए, बिलासपुर के नए आईजी ज्वाईनिंग के साथ ही परिवार लेकर बिलासपुर चले गए। ऐसा करना भी चाहिए। बिलासपुर के कप्तान को भी सतर्क रहना चाहिए। बदमाशों, अपराधियों को वे लगातार जेल भेज रहे हैं। वैसे, हनी ट्रेप के शिकार ज्यादा सिंगल अफसर ही होते हैं। सिंगल वाले पर डोरे डालना आसान होता है। बिलासपुर संभाग के एक पूर्व कलेक्टर सिंगल रहने के चलते बाल-बाल बचे। हालांकि, बदनामी तो पूरी हो गई। बस्तर संभाग के एक कलेक्टर भी कब हनी ट्रेप के शिकार होकर मीडिया की सनसनी बन जाएं, कुछ कहा नहीं जा सकता। खतरा मंत्रालय में भी कम नहीं है। कई अफसर परिस्थितियोंवश सिंगल हैं। वहां कई सप्लाई कंपनियों और मेट्रो सिटीज के एनजीओ की कुड़ियां शिकार की तलाश में घूमती रहती हैं। कुल मिलाकर पावर और पैसा जहां है, वहां मधुमक्खियां मंडराएंगी ही। ऐसे अफसरों की पत्नियों को विशेष अलर्ट रहने की जरूरत है। वरना, बाद में पछताने के अलावा कोई चारा नहीं बचता।

नाइंसाफी?

सरगुजा से नक्सलियों का सफाया करने वाले आईपीएस अधिकारी एसआरपी कल्लूरी ऐसे घनचक्कर में फंस गए हैं कि सीनियर होने के बाद उन्हें डीजी बनने में लंबा वेट करना होगा। दरअसल, परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि 94 बैच में सीनियर होने के बाद भी जीपी सिंह और एसआरपी कल्लूरी डीजी प्रमोशन से चूक गए। जीपी तो लड़-भिड़कर अपना प्रमोशन करा लिए मगर अत्यधिक तेज-तरार्र आईपीएस माने जाने वाले कल्लूरी पता नहीं क्यों ठंडे पड़ गए। और अब आगे उनके लिए कोई स्कोप भी नजर नहीं आता। डीजी के चार ही पद है। दो कैडर, दो एक्स कैडर। इन चार पदों पर इस समय अरुण देव गौतम, पवनदेव, जीपी सिंह और हिमांशु गुप्ता बैठे हैं। गौतम का अगले साल रिटायरमेंट है मगर कहीं पूर्णकालिक डीजीपी बन गए तो फिर उनका कार्यकाल दो साल का हो जाएगा। याने फिर 2028 में रिटायर होंगे। उसके बाद ही कल्लूरी का रास्ता साफ हो पाएगा। तिरूपति वाले बालाजी की कहीं विशेष चकरी चल गई तो फिर बात अलग है....सरकार चाहे तो उन्हें केंद्र से बात कर स्पेशल डीजी बना सकती है।

चंदे से शादी

अभी तक गांवों में अनाथ या गरीबों की बेटियों की शादी लोग जरूर चंदा देकर करा देते थे। मगर प्रभावशाली लोग ऐसा करने लगे तो ये ठीक नहीं। इससे सूबे में एक नई परिपाटी शुरू हो जाएगी। कुछ दिनों पहले एक मंत्री के साथ साये की तरह रहने वाले की शादी हुई, उसमें भी अधिकारियों, सप्लायरों से बड़ा चंदा हुआ। और इस समय फिर ऐसी ही वसूली हो रही है। रायपुर में अफसरों से कहा जा रहा...भले ही परचेजिंग तेज कर दो, मगर इतना चाहिए तो चाहिए। अब इसमें से उपर कितना पहुंचेगा और कितना चेले-चपाटी भाई साहब के नाम पर अंदर कर लेंगे, ये भी बड़ा प्रश्न है। सार यह है कि बड़े लोगों को इन सबको लेकर सजग रहना चाहिए।

बिना एसपी के डीआईजी

छत्तीसगढ़ में राज्य पुलिस सेवा का बड़ा बुरा हाल है। डिप्टी कलेक्टरों में 2013 बैच तक आईएएस अवार्ड हो गया मगर डीएसपी में अभी 2002 बैच में ही मामला अटका हुआ है। नाइंसाफी भी ऐसी कि जो आईपीएस बने, उन्हें एसपी बनने का मौका नहीं मिला। श्वेता राजमणि बिना एसपी बने ही डीआईजी प्रमोट हो गई। हालांकि, सरकार चाहे तो डीआईजी को भी एसपी बना सकती है मगर सिस्टम में समरथ को न दोष गोसाई जैसी स्थिति है। उमेश चौधरी भी आईपीएस बनकर पीएचक्यू में टाईम काट रहे हैं। उधर, मनोज खिलाड़ी कुछ सीनियर आईपीएस अफसरों के जोर लगाने पर जीपीएम जैसे जिले के एसपी बन पाए। जबकि, उनके बाहर से अतिक्रमण करके आए बैचमेट दो-दो, तीन-तीन जिले की कप्तानी कर चुके हैं। कुल मिलाकर रापुसे पर ’दुबर पर दो आसाढ़’ वाली स्थिति है...एक तो आईपीएस अवार्ड में पीछे और उपर से आईपीएस हो गए तो बिना किसी एप्रोच के जिला नहीं मिल पाएगा।

डिप्टी कलेक्टरों के बुरे दिन

डीएसपी की जैसा हाल अब डिप्टी कलेक्टरों का भी होना है। 2013 बैच के 30 में से तीन आईएएस बने हैं। अभी 27 बचे हैं। 2014 बैच में भी 30 डिप्टी कलेक्टर हैं और 2015 बैच में उससे दुगुना। याने 60। हालांकि, आईएएस का कैडर रिवीजन में पद बढ़ गया है फिर भी अब आईएएस अवार्ड होने के लिए काफी पापड़ बेलने पड़ेंगे। हो सकता है कई को एडिशनल कलेक्टर से ही रिटायर होना पड़ जाए। इस समय राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की संख्या बढ़कर 448 पहुंच गई है। इतने छोटे राज्य में कभी इतना ज्यादा अफसर होते नहीं। मगर डिप्टी कलेक्टरों को जनपद सीईओ बनाने के लिए एक बार पद बढ़ाया गया तो फिर बढ़ता चला गया। इसका खामियाजा अब अफसरों को उठाना पड़ेगा।

’उड़ता छत्तीसगढ़’

दुर्ग पुलिस द्वारा हाइड्रोपोनिक गांजा बरामद करने से हड़कंप मच गया है। हाइड्रोपोनिक गांजा बैंकॉक और हांगकांग के समुद्र में उगाया जाता है। यह इतनी कीमती है कि बाजार रेट इसका एक करोड़ रुपए किलो है। इसके बाद भी छत्तीसगढ़ में इसकी सप्लाई हो रही है तो समझा जाता है कि छत्तीसगढ़ में किस लेवल पर गांजे का इस्तेमाल किया जा रहा है। लोकल गांजा लोवर क्लास के लोग इस्तेमाल करते ही हैं, लोगों को नशे की लत ऐसी लगती जा रही कि बड़े-बड़े लोग सिगरेट में भरकर गांजा पी रहे हैं। दुर्भाग्यजनक यह है कि छत्तीसगढ़ के कुछ युवा नौकरशाहों के नाम भी गांजे का सेवन करने में आ रहा है। वाकई, यह चिंताजनक है। आखिर नई पीढ़ी कहां जा रही है?

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस तेज-तर्रार पुलिस अधीक्षक को हटाने के लिए नेताओं और माफियाओं ने नवरात्रि में बकरे की बलि दी है?

2. पूर्णकालिक डीजीपी का फैसला दो-एक दिन में होना है, अरुणदेव गौतम और हिमांशु गुप्ता में से किसके सिर सजेगा पुलिस प्रमुख का ताज?