शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

ये क्या किए महराज!

10 फरवरी 2019
भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ मोर्चा खोले सरकार से लगता है एक बड़ी चूक हो गई। सरकार ने डा. एसआर आदिले को डायरेक्टर मेडिकल एजुकेशन बना दिया, जो 2006 में इसी पोस्ट पर रहने के दौरान अपनी बेटी और पूर्व सीएम के पीए की भतीजी को एमबीबीएस में गलत ढंग से दाखिला देकर जेल जा चुके हैं….लंबे समय तक वे सस्पेंड रहे। रायपुर के गोलबाजार थाने में उनके खिलाफ केस रजिस्टर्ड है। हाईकोर्ट ने दोनों का एमबीबीएस का दाखिला निरस्त कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने पांच-पांच लाख रुपए जुर्माना कर ह्यूमन ग्राउंड पर इसलिए बख्श दिया था कि दोनों मेडिकल छात्राएं फायनल ईयर में पहुंच गईं थी। एमबीबीएस में भरती का यह मामला 2006 का है। आदिले ने सेंट्रल पुल से अपनी बेटी और एक्स सीएम के पीए की भतीजी का जगदलपुर मेडिकल कालेज में एडमिशन दे दिया था। जबकि, जगदलपुर नया मेडिकल कॉलेज खुला था और वहां सेंट्रल कोटा का प्रावधान ही नहीं था। चूकि, 13 साल पुराना मामला है, इसलिए न सत्ता में बैठे नेताओं को याद रहा और न मीडिया को। कांग्रेस ने तब इस फर्जीवाड़े के खिलाफ काफी हंगामा किया था। साफ-सुथरी छबि के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव को लगता है, गलत फीडबैक मिल गया। क्योंकि, अपने अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज में जिस डीन को ले गए हैं, वो भी सिम्स के डीन रहते पिछले साल खरीदी-बिक्री और भरती के मामले में सस्पेंड हो चुके हैं। महाराज को थोड़ा सतर्क रहना होगा।

भूपेश और बारिश

सूबे में सीएम भूपेश बघेल और बारिश का अद्भूत संयोग चल रहा है। 17 दिसंबर को भूपेश शपथ लिए, उस दिन इतनी बारिश हुई कि वेन्यू बदलना पड़ा। 26 जनवरी को राजधानी के पुलिस ग्राउंड में उन्होंने झंडा फहराया तो भी सावन जैसी झड़ी लग गई। और, 8 फरवरी को उन्होंने बजट पेश किया तो भी झमाझम बारिश हो गई। वैसे, सीएम बनने के बाद भूपेश भी लगातार बरस ही रहे हैं….। शपथ के दिन से मौसम भी उनका साथ दे रहा है।

अपना मंत्रालय

आईपीएस मुकेश गुप्ता और रजनेश सिंह को सरकार ने सस्पेंड कर दिया। भूपेश बघेल के सीएम बनने के बाद सबसे बड़ी ये कार्रवाई होगी। संवेदनशील भी….मुकेश का अपना ओहरा तो है ही, पोस्ट भी डीजी का। इसके बाद भी अवर सचिव ने जो आदेश निकाला, उसमें नान मामले को 2014 की जगह 2004 लिख दिया। बचाव में टंकण त्रुटि….मानवीय भूल कहा जा सकता है। लेकिन, इतने संवेदनशील आदेश में भी ऐसी भूल। दरअसल, मुख्यमंत्री को मंत्रालय के निचले सिस्टम का भी रिव्यू करना चाहिए। आखिर, राज्य में शासन तो यही से चलता है, योजनाओं का क्रियान्वयन यहीं से होता है। अधिकांश विभागों में मैट्रिक पास लोग प्रमोशन पाते-पाते डिप्टी सिकरेट्री, अंडर सिकरेट्री, स्पेशल सिकरेट्री तक पहुंच गए हैं। बाबुओं का बुरा हाल है। पिछले साल एक विभाग को भारत सरकार से 300 करोड़ रुपए मिलने थे। लेकिन, बाबू अलमारी में फाइल रखकर भूल गया। नए सिकरेट्री जब कार्यभार संभाले तो उन्होंने फाइल ढूंढवाई तो पता चला कि डेट निकल गया है। सिकरेट्रीजी को इन्हीं लोगों से काम चलाना है, इसलिए उनकी लाचारगी भी समझी जा सकती है। मगर इससे राज्य का नुकसान होता है।

ब्यूरोक्रेट्स की उम्मीदें

नई सरकार आने के बाद कुछ आईएएस, आईपीएस बेविभाग हुए थे, उनमें एक नाम सौरभ कुमार का भी था। सौरभ को दंतेवाड़ा का कलेक्टर रहने के दौरान इनोवेशन में पालनार बाजार को कैशलेस करने के लिए प्रतिष्ठित प्रधानमंत्री अवार्ड से नवाजा गया था। लेकिन, बाद में कांग्रेस ने उन पर डिस्ट्रिक्ट माईनिंग फंड की बंदरबांट के आरोप लगाए। यही नहीं, साउथ छत्तीसगढ़ में एक दंतेवाड़ा ही रहा, जिसने बीजेपी की लाज बचाई। सरकार बदली तो सौरभ का ट्रांसफर हो गया। डेढ़ महीने से बिना विभाग के मंत्रालय में बैठ रहे सौरभ की पिछले हफ्ते मुख्यमंत्री से मुलाकात हुई। बताते हैं, सीएम ने सौरभ के पक्ष को गंभीरता से सुना। फिर, बोले…देखते हैं। और, 41 आईएएस की लिस्ट निकली, उनमें सौरभ का नाम आ गया। सौरभ को ज्वाइंट सिकरेट्री स्कूल एजुकेशन बनाया गया है। चलिये, अपने अफसर पर सीएम के बड़ा दिल दिखाने से बाकी बेविभाग नौकरशाहों की इससे उम्मीद जवां हुई है।

2012 बैच की ओपनिंग

भूपेश बघेल की सरकार से ब्यूरोक्रेट्स कितना चैन से हैं ये तो पता नहीं, लेकिन आईएएस के 2011 बैच की खुशी का तो पूछिए मत! इस बैच में छह आईएएस हैं। सभी कलेक्टर बन गए। इस बैच में नीलेश श्रीरसागर, सर्वेश भूरे, दीपक सोनी, विलास भास्कर, चंदन कुमार और संजीव झा हैं। इनके बैचमेट दीगर राज्यों में दूसरे और तीसरे जिले की कलेक्टरी कर रहे हैं। और, यहां श्रीगणेश भी नहीं हुआ था। बहरहाल, 2011 बैच तो कंप्लीट हुआ ही, 2012 बैच की भी शुरूआत हो गई है। इस बैच के रजत बंसल को धमतरी का कलेक्टर बनाया गया है। चलिये, रायपुर जैसे नगर निगम में कमिश्नर के रूप में बिना किसी आरोप के पौने तीन साल सक जाने का उन्हें ईनाम मिला है।

कलेक्टरी का रिकार्ड

मुंगेली जैसे छोटे जिले से कलेक्टरी की शुरूआत करने वाली किरण कौशल ने लगातार चौथे जिले का कलेक्टर बनकर महिला आईएएस में रिकार्ड बनाई है। उनसे पहिले अलरमेल मंगई लगातार तीन जिले की कलेक्टर रहीं। किरण ने चार पुरुष आईएएस की बराबरी कर ली हैं, जिन्होंने बिना विकेट गवाएं चार जिले किए। इस बार माटी पुत्री होने का उन्हें लाभ मिला…..कोरबा जैसे जिले की कलेक्टरी मिल गई।

पहली बार

छत्तीसगढ़ में पहली बार किसी आईएएस को पशुपालन विभाग का डायरेक्टर बनाया गया है। इससे पहिले वेटनरी डाक्टर इसके हेड होते थे। लेकिन, पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर के धमतरी में लंबे समय से कलेक्टरी कर रहे सी प्रसन्ना को इस बार इस विभाग में बिठाया गया है। हालांकि, जिन राज्यों में आईएएस अधिक होते हैं, वहां इस विभाग में डायरेक्टर होते हैं। बहरहाल, प्रसन्ना वेटनरी डाक्टर भी हैं। उनकी पत्नी का भी पशुओं से जुड़ा काम है। इसलिए, नरवा, गरूआ में से गरूआ का काम तो ठीक-ठाक हो जाएगा। लगता है, सरकार ने इसी दृष्टि से यह पोस्टिंग की है।

आईपीएस के बुरे दिन

इस प्रदेश में आईपीएस के बुरे दिन ही चल रहे हैं। एक ही दिन दो आईपीएस सस्पेंड हो गए। पहले आरोप थे कि आईपीएस, आईएएस को निबटा रहे हैं….अब आईपीएस आपस में ही…। प्रमोशन के मामले में भी उनका हाल जुदा नहीं है। थानेदारों जैसा रोने-गिड़गिड़ाने के बाद प्रमोशन देने का पिछले साल जो ट्रेंड शुरू हुआ, इस बरस भी उसमें कोई सुधार नहीं हुआ। एसपी, डीआईजी, आईजी….सब ताक लगाए बैठे हैं। पिछले साल का आपको याद ही होगा….2004 बैच को डीआईजी बनाने में किस तरह लेटलतीफी हुई थी। बताते हैं, भारत सरकार को प्रमोशन का प्रपोजल ही पुलिस महकमे से काफी विलंब से भेजा गया।

अंत में दो सवाल आपसे

1. राज्य का नया सिकरेट्री फूड क्या कोई 2004 बैच का आईएएस होगा?
2. क्या ये सही है कि सीएम भूपेश बघेल के सस्पेंशन, एफआईआर से राज्य में करप्शन का लेवल एकदम गिर गया है?

शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

सिंह का खौफ

3 फरवरी
87 बैच के आईपीएस बीके सिंह 17 साल बाद चार फरवरी को छत्तीसगढ़ लौट रहे हैं। वे 2002 में सेंट्रल डेपुटेशन पर दिल्ली गए, उसके बाद नहीं लौटे। ये वही बीके हैं, जो पिछले दो साल से एक्स डीजीपी एएन उपध्याय को परेशान करते रहे। आए दिन मीडिया में ये खबर आ जाती थी…बीके लौट रहे हैं…डीजीपी बनेंगे। हालांकि, बीके के पास ज्यादा वक्त नहीं है। रिटायरमेंट में बस 11 महीने बचे हैं। इसके बाद भी लोग उनसे खतरे में नही रहेंगे, एकदम से ऐसा नहीं कहा जा सकता। वह इसलिए क्योंकि, बीके कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह के बेहद क्लोज माने जाते हैं। तब के विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी का जब विंध्य इलाके में जलजला था, तब दिग्विजय ने बीके को रीवा का डीआईजी बनाकर भेजा था। पुराने लोग इसके मायने समझ सकते हैं। छत्तीसगढ़ में भी जब अजीत जोगी की सरकार बनी तो फर्स्ट खुफिया चीफ वे ही बने थे। बाद में जोगी को जब पता चला तो मामला गड़बड़ाया था। दिग्विजय सीएम भूपेश बघेल के राजनीतिक गुरू हैं। ऐसे में, भला छत्तीसगढ़ के सीनियर आईपीएस अफसरों में खौफ कैसे नहीं रहेगा। दिमाग में बार-बार यही कौंध रहा….पहले भी सिंह का खौफ और अब भी…।

विक्रम और अमन

छत्तीसगढ़ में नई सरकार बनने के बाद लोगों के मन में बरबस ये सवाल उठ रहे हैं कि सीएम भूपेश बघेल के विक्रम और अमन कौन होंगे। कुछ लोग उनके ओएसडी प्रवीण शुक्ला को विक्रम मान लिए थे। इसके बाद अमन की तलाश हो रही थी…सीएम के ईर्द-गिर्द रहने वालों में अमन का अक्स ढूंढा जा रहा था। लेकिन, प्रवीण शुक्ला का विकेट महीने भर में ही उड़ गया। अब जब विक्रम ही नहीं रहे तो अमन कहां से आएंगे। रही बात अमन की, तो अमन इतना जल्दी बनते नहीं। याद होगा, अमन को अमन बनने में पांच बरस लग गए थे। रमन सिंह की दूसरी पारी में अमन पावरफुल होकर उभरे थे। अलबत्ता, बहुत कुछ सीएम पर डिपेंड करेगा….वे किसी को अमन बनाना चाहेंगे क्या। वैसे भी, सीएम कई बार कह चुके हैं, वे अफसरों के जरिये सरकार चलाना नहीं चाहेंगे।

न राम मिले, न रहीम

विधानसभा चुनाव में हार से दुखी जोगी कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं ने कांग्रेस ज्वाईन करने की पूरी तैयारी कर ली थी। राहुल गांधी की सभा में उनका कांग्रेस प्रवेश होने वाला था। इसलिए, नए जैकेट भी खरीद लिए थे। इस बीच सूबे के एक बड़े नेता ने वीटो लगा दिया…कुछ दिन पहले कांग्रेस के खिलाफ बात करने वाले नेताओं को अगर पार्टी में शामिल किया गया तो लोकसभा चुनाव में अच्छा मैसेज नहीं जाएगा। इसके बाद कांग्रेस प्रवेश का मामला गड़बड़ा गया। उधर, जोगी कांग्रेस को इसकी भनक लग गई। पार्टी ने उठाकर सभी को निलंबित कर दिया। अब न वे जोगी कांग्रेस के रहे और न कांग्रेस के।

जिसका झंडा, उसके अफसर

अंतागढ़ एसआईटी के प्रभारी के तौर पर ही सही, आईपीएस जीपी सिंह की वापसी हो गई। दुर्ग रेंज आईजी से हटने के बाद उन्हें कोई विभाग नहीं दिया गया था। जीपी की वापसी से उन अफसरों में उम्मीद जगी है, जो नई सरकार के शपथ लेने के बाद बाद हांसिये पर हैं या कम महत्व के विभाग में बिठा दिए गए हैं। वैसे भी, कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो जिनका झंडा, उनके अफसर होते हैं। 2003 में लोगों ने आखिर इसे देखा ही। जिन पर जोगी का लेवल लगा था, उनकी भी छह महीने बाद अच्छी पोस्टिंग मिली और रमन सरकार में भी वे काम करके दिखाए। छत्तीसगढ़ में वैसे भी काम करने वाले अफसरों की बेहद कमी है। लिहाजा, रिजल्ट देने वाले अफसरों की हमेशा पूछ बनी रहेगी।

महिला सिकरेट्री का दर्द

पुरस्कारों को लेकर मंत्रालय की एक महिला सिकरेट्री का दर्द आखिर छलक आया। आईएएस के व्हाट्सएप ग्रुप में उन्होंने लिखा, तीन साल में हमने विभाग के लिए क्या नहीं किया। फिर भी कोई रिवार्ड नहीं। इसके बाद तो ग्रुप में सहानुभूति जताने वालों की तांता लग गई। आईएएस अफसरों ने लिखा है, हमलोग आपके काम को एप्रीसियेट करते हैं।

मनोज के बदले रीचा

आईएएस मनोज पिंगुआ को दिल्ली डेपुटेशन से बुलाने के लिए भूपेश सरकार ने केंद्र को लेटर लिख दिया है। डीओपीटी से किसी भी दिन मनोज को रिलीव करने का आर्डर निकल सकता है। इधर, रीचा शर्मा क पोस्टिंग भी भारत सरकार में हो गई है। पोस्टिंग के बाद अगर वे वहां नहीं गई तो नियमानुसार वे सेंट्रल डेपुटेशन से पांच साल के लिए डिबार हो जाएंगी। निधि छिब्बर एक बार डिबार हो चुकी हैं। राज्य शासन ने एनओसी देने के बाद उन्हें रिलीव नहीं किया था। रीचा को यहां से कब रिलीव किया जाएगा, कोई सुगबुगाहट नहीं है। समझा जाता है, मनोज के आने के बाद ही रीचा को सरकार रिलीव करें। मनोज और रीचा, दोनों प्रमुख सचिव रैंक के आईएएस हैं। रीचा ने फूड में अपना काम भी बखूबी किया। जब उन्हें सिकरेट्री फूड बनाया गया था, विभाग की हालत बडी दयनीय हो गई थी। नान घोटाला भी उसके कुछ समय पहले ही सामने आया था। सरकार में ताकतवर राईस लॉबी से भी उन्हें लोहा लेना था। मार्कफेड में शार्टेज के नाम पर हर साल करोड़ों रुपए अंदर किए जा रहे थे। ऐसे विषम हालात में महिला अफसर ने गजब का हौसला दिखाकर फूड को पटरी पर ले आई।

जांच के पीछे

नान घोटाले की एसआइटी और ईडी की जांच के पीछे क्या है, इस संवेदनशील मामले में अभी कुछ कहना जल्दीबाजी होगी। लेकिन, यह तो साफ है कि अगर दोनों ने ढंग से जांच कर दी तो बड़े-बड़ों को आफत आ जाएगी। कुछ आईएएस समेत मंत्रालय के कई लोग भी इसके लपेटे में आएंगे। एक आईएफएस तक भी जांच की लपटें पहुंच सकती है। क्योंकि, एसआइटी 2014 की बजाए 2011 से जांच शुरू कर दी है। आईएफएस को नान घोटाले का मास्टरमाइंड माना जाता है।

कलेक्टरों का नम्बर

नई सरकार बनने के बाद पहली सूची में छह कलेक्टरों को बदला गया था। उस लिस्ट में मंत्रालय एवं एचओडी लेवल में बड़े फेरबदल किए गए थे। अभी कलेक्टरों की जो लिस्ट निकलने वाली है, उसमें भी बड़ी उलटफेर के संकेत मिल रहे हैं। भूपेश सरकार वैसे भी कलेक्टरों के पारफारमेंस से बहुत खुश नहीं है। सरकार की नोटिस में ये बात है कि बीजेपी को 15 सीटें मिली, उसमें कलेक्टरों की भी भूमिका थी। कलेक्टर अगर बढ़ियां काम किए होते तो ये नौबत नहीं आती। अधिकांश कलेक्टर आंकड़ों की बाजीगरी दिखाकर सरकार से अपना नम्बर बढ़वा लेते थे। इसीलिए, कलेक्टरों की लिस्ट बनाने में इसका ध्यान रखा जा रहा है। सीएम दो दिन राज्य से बाहर हैं। समझा जाता है, उनके लौटने के बाद सोमवार या उसके एक-दो दिन में कलेक्टरों की लिस्ट निकल जाए।

अंत में दो सवाल आपसे

1. नान घोटाले के एसआइटी जांच के बाद ईडी से जांच के क्या मायने हैं?
2. अंतागढ़ टेप कांड के एसआइटी प्रभारी से रायपुर आईजी आनंद छाबड़ा को एकाएक क्यों हटा दिया गया?

रविवार, 20 जनवरी 2019

रहिमन चुप हवे बैठिए….

20 जनवरी 2019
25 साल तक ब्यूरोक्रेसी की खूब चली। दिग्विजय सिंह के समय मध्यप्रदेश में और 2000 के बाद छत्तीसगढ़ में। दिग्गी राजा ने भी नौकरशाही का कम उपयोग थोड़े किया। छत्तीसगढ़ में शुक्ल बंधुओं को टाईट रखने के लिए चुन-चुनकर कलेक्टर भेजे। आखिरी-आखिरी में बिलासपुर के कई मंत्री जब बाउंड्री को लांघने लगे तो शैलेंद्र सिंह को कलेक्टर बनाकर भेज दिया था। शैलेंद्र सिंह ने सारे नेताओं की दुकान बंद करवा दी थी। जोगी शासन काल में भी नौकरशाहों का जलवा कम नहीं रहा। और, अब रमन सरकार पर नौकरशाही हॉवी होने के आरोप बीजेपी के लीडर ही लगा रहे हैं। अलबत्ता, स्थितियां अब बदल गई हैं। आधी रात को चीफ सिकरेट्री और डीजीपी की कुर्सी खिसक गई। आईएएस, आईपीएस के ऐसे ट्रांसफर हुए कि कोई इधर गिरा, कोई उधर….। मुकेश गुप्ता, नान, जीरम, चिप्स, संवाद के खिलाफ जांच बैठ गई। ऐसे में, अफसरशाही रहीम के इस दोहा को याद कर चुपचाप बैठने में अपनी भलाई समझ रही होगी…. रहिमन चुप हवे बैठिए, देखी दिनन के फेर, जब नीके समय आईहे, बनत न लगीहे देर। चलिये, लोकसभा चुनाव के बाद शायद ये, नीके समय… आ जाए। आखिर उम्मीद पर पूरी दुनिया टिकी है।

अध्यक्ष का टोटका

विधानसभा चुनाव में शर्मनाक पराजय के बाद बीजेपी एक बार फिर आदिवासी नेता विष्णुदेव साय को प्रदेश की कमान सौंपने जा रही है। बताते हैं, उनके नाम पर सहमति बन गई है….किसी भी दिन इसका ऐलान हो जाएगा। बता दें, छत्तीसगढ़ में भाजपा ने लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीते और तीनों में आदिवासी नेताओं की भूमिका अहम रही। पहली बार 2003 में डा0 रमन सिंह जरूर पार्टी के अध्यक्ष रहे लेकिन, सदन में पार्टी की बागडोर नंदकुमार साय के हाथ में रही। इसके बाद दोनों विस चुनावों में पार्टी की कमान आदिवासी लीडर के हाथ में रही। 2008 के विधानसभा चुनाव में रामसेवक पैकरा और 2013 में विष्णुदेव साय पार्टी के अध्यक्ष रहे। और, दोनों में भाजपा को फतह मिली। पिछले साल भी विष्णुदेव साय को अध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी में चर्चा हुई थी। इसके पीछे आदिवासी वर्ग को साधने के साथ ही पार्टी का वह टोटका भी था कि आदिवासी अध्यक्ष रहते चुनाव में बीजेपी को जीत मिलती है। लेकिन, राज्य सभा की टिकिट के लिए सरोज पाण्डेय से शिकस्त मिलने के बाद धरमलाल कौशिक को अध्यक्ष के रूप में कंटिन्यू कर दिया गया। अब देखना दिलचस्प होगा, विष्णुदेव साय को अध्यक्ष बनाने से लोकसभा चुनाव में भाजपा का यह टोटका कितना काम आ पाता है।

गुरू गुड़ और चेला….

जूनियर अफसरों से काम कराने का जो ट्रेंड रमन सरकार में शुरू हुआ, भूपेश सरकार भी उससे बच नहीं पा रही। एसपी की पोस्टिंग में यह साफ तौर पर परिलक्षित हुई। रायपुर, बिलासपुर के बाद बड़े जिलों में रायगढ़ की गिनती होती है। किसी भी आईपीएस का वह दूसरा या तीसरा जिला होता था। एसपी के तौर पर दीपक झा का भी रायगढ़ तीसरा जिला था। उन्हें हटाकर सरकार ने राजेश अग्रवाल को एसपी बनाया है। राजेश को अचार संहिता लगने के दिन आईपीएस अवार्ड हुआ। उन्हें अभी बैच भी नहीं मिला है। बावजूद इसके, पहली बार में उन्हें रायगढ़ की कप्तानी सौंप दी गई। जबकि, 2006 बैच के आरएन दास जांजगीर और प्रशांत अग्रवाल बलौदाबाजार के एसपी है। हिट तो यह भी है कि प्रशांत पिछले साल जब राजनांदगांव के एसपी थे तो राजेश उनके एडिशनल एसपी। लेकिन, गुरू गुड़ रह गया और चेला शक्कर। सबसे बड़ी दिक्कत विजय अग्रवाल को होने वाली। राजेश के साथ ही आईपीएस बनें विजय बिलासपुर में अभी एडिशनल एसपी हैं। आईजी कभी कप्तानों की मीटिंग बुलाएंगे तो राजेश ठसके से आईजी के सामने बैठेंगे और विजय उनके लिए चाय-पानी का इंतजाम करते नजर आएंगे। वाह भाई! गजब की पोस्टिंग है।

नो कमेंट्स

आईपीएस पारुल माथुर छोटे से जिले मुंगेली की एसपी हैं। उनके पिता राजीव माथुर भी पहले मध्यप्रदेश, बाद में छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस रहे। राजीव रायपुर के आईजी रहे। पुराने लोगों को याद होगा, आईजी रहने के समय वे वेश बदलकर थानों का निरीक्षण करने पहुंच जाते थे। कांग्रेस नेताओं से कथित संबंधों को लेकर पुरानी सरकार में उन्हें वेटेज नहीं मिला। सरकार के रुख को भांप कर ही वे डेपुटेशन पर भारत सरकार चले गए थे। और, वहीं से रिटायर हो गए। जाहिर है, उनकी बेटी पारुल को भी अच्छी पोस्टिंग नहीं मिली। चार साल से उपर तक रेलवे एसपी रहीं। पिछले साल वे उस मुंगेली जिले में भेजी गई, जहां फ्रेश आईपीएस भी नहीं जाना चाहते। कांग्रेस की नई सरकार से उन्हें जरूर उम्मीद रही होगी, लेकिन, इसमें भी वैसा ही हुआ। उन्हीं की 2008 बैच की नीतू कमल जांजगीर के बाद राजधानी की एसपी बन गई और पारुल मुंगेली में ही छुट गईं। इसी तरह दास और प्रशांत से चार बैच जूनियर 2010 बैच के अभिषेक मीणा बिलासपुर जैसे बड़े जिले के एसपी हैं।

बालोद को भूली सरकार

बलोद भले ही छोटा जिला है मगर नक्सली और दल्ली राजहरा माइंस के कारण सेंसेटिव केटेगरी में आता है। लेकिन, 25 दिसंबर से वहां कप्तान की कुर्सी खाली है। आईके ऐलेसेला को हटाकर सरकार ने नारायणपुर भेजा था, उसके बाद वहां कोई पोस्टिंग नहीं हुई है। हालांकि, ऐलेसेला को सरकार ने दस दिन के भीतर ही नारायणपुर से बुलाकर ईओडब्लू में पोस्ट कर दिया। मगर बालोद को लगता है, वह भूल ही गई है। जबकि, सीएम भूपेश बघेल के दुर्ग जिला से बालोद बिल्कुल सटा है। इसके बाद भी पुलिस महकमा संज्ञान नहीं ले रहा तो यह गंभीर बात है।

पिंगुआ को पावर

आईएएस मनोज पिंगुआ डेपुटेशन से लौटने वाले है। हो सकता है, 15 फरवरी तक वे यहां ज्वाईन कर लें। हालांकि, उनका डेपुटेशन एक साल पहले पूरा हो गया था। लेकिन, बच्चों की पढ़ाई के चलते उन्होंने उसे एक साल बढ़वा लिया था। बहरहाल, रायपुर लौटने पर जाहिर है, उन्हें अच्छी पोस्टिंग मिलेगी। वैसे भी कई अफसरों के पास विभागों का ओवरलोड है। 94 बैच के आईएएस पिंगुआ प्रिंसिपल सिकरेट्री लेवल के अफसर हैं। पिछले साल ही उन्हें प्रोफार्मा प्रमोशन मिला था। दिल्ली जाने के पहिले उनके पास ट्राईबल और जीएडी था। ट्राईबल में आदिवासी बच्चों की छात्रवृत्ति हड़पने वाले शिक्षा संस्थानों के खिलाफ मुहिम छेड़ी थी।

ओवरलोडेड सिकरेट्री

मंत्रालय में तीन आईएएस अफसर इतने ओवरलोडेड हो गए हैं कि उनकी घरवाली दुखी हो गई होंगी। खासकर सिकरेट्री टू सीएम गौरव द्विवेदी के पास पुराना स्कूल शिक्षा तो बरकरार है ही, उपर से माईनिंग, पब्लिक रिलेशंस, आईटी जैसे कई और विभाग जुड़ गए हैं। जबकि, सिकरेट्री टू सीएम होना ही एक बड़ा टास्क होता है। सारे विभागों की फाइलें सिकरेट्री से होकर ही सीएम तक जाती है। सिकरेट्री को सुबह-शाम सीएम हाउस भी जाना होता है। हाउस में भी विभिन्न मीटिंगे होती है। सीएस से कोआर्डिनेशन का दायित्व सिकरेट्री टू सीएम के पास होता है। उनके बाद नम्बर आता है 87 बैच के आरपी मंडल और 89 बैच के अमिताभ जैन का। मंडल के पास पंचायत पहले से था, अब गृह, जेल और परिवहन मिल गया है। पंचायत और गृह बड़े विभाग हैं। राज्य बनने के बाद गृह में हमेशा अलग सिकरेट्री रहा है। बड़े राज्यों में तो जेल और परिवहन के भी सिकरेट्री होते हैं। अमिताभ के पास फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण फायनेंस तो है ही। इसके साथ वाणिज्य और उद्योग एवं पीडब्लूडी भी है। हालांकि, वे फायनेंस और पीडब्लूडी में पहले भी रह चुके हैं, इसलिए इनमें उन्हें दिक्कत नहीं जाएगी। वाणिज्य और उद्योग जरूर उनके लिए नया होगा। बहरहाल, पता चला है, इनमें से एक का रोज पत्नी से विवाद हो जा रहा…क्योंकि शाम को वे समय पर घर नहीं लौट पा रहे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. धुर विरोधी कहे जाने वाले रमन सरकार के कुछ मंत्री क्यों हाथ मिला रहे हैं?
2. टीएस सिंहदेव क्यों बोल गए कि अमरजीत भगत मंत्री बन सकते हैं?

पोस्टिंग का वर्ल्ड रिकार्ड

सूबे के सबसे सीनियर आईपीएस गिरधारी नायक ने जेल विभाग में पोस्टिंग का वर्ल्ड रिकार्ड बना डाला है। जेल डीजी बने उन्हें 6 साल सात महीने हो चुके हैं। इतने लंबे समय तक जेल विभाग का प्रमुख भारत में ही नहीं, वर्ल्ड में भी कोई नहीं रहा है। चलिये, नायक डीजीपी नहीं बन पाए अलबत्ता, लंबी पोस्टिंग का रिकार्ड जरूर बनाने में कामयाब हो गए। हालांकि, प्रभारी डीजीपी रहने के दौरान जिस झीरम घाटी की फाइल तलब कर पिछली सरकार की नजरों में चढ़े थे, इसे भी उपर तक नहीं बता पाए। क्योंकि, झीरम इश्यू पर भूपेश सरकार बेहद संजीदा है। एसआईटी भी बन गई है। और, जो आईपीएस झीरम की फाइल के कारण ही बियाबान में धकेला गया, वह जेल में वर्ल्ड रिकार्ड बना रहा है। आखिर इसे दुर्भाग्य ही तो कहा जाएगा।

सीएस का फैसला

नई सरकार में सबसे अप्रत्याशित रहा चीफ सिकरेट्री अजय सिंह की छुट्टी। ऐसे समय में जब यह माना जाने लगा था कि लोकसभा चुनाव के बाद ही अब सीएस पर सरकार विचार करेगी, भूपेश सरकार ने बुधवार की देर रात बस्तर से लौटते ही उन्हें बदलने का आदेश दे दिया। बुधवार को कोंडागांव के रोड शो में सीएम को लेट हो गया। सूर्यास्त होने के कारण हेलिकाप्टर टेकऑफ नहीं कर पाता। इसलिए, वे कार से राजधानी के लिए रवाना हुए। बताते हैं, रास्ते में ही उन्होंने सीएस बदलने का फैसला किया। और, फोन से सीएम सचिवालय के अफसरों को नोटशीट तैयार करने के लिए ब्रीफ किया गया। सीएम रात करीब 11 बजे पहुना पहुंचे। इसके बाद उनके सामने नोटशीट प्रस्तुत की गई और उन्होंने उसे ओके कर दिया।

पारफारमेंस से दुखी

सीएस अजय सिंह ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए हालांकि कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। काउंटिंग के दिन कांग्रेस के पक्ष़्ा में रूझान मिलते ही उन्होंने कांग्रेस के घोषणा पत्र में शामिल किसानों के कर्जमाफी का प्रासेज शुरू करा दिया था। तब सुनील कूजूर एसीएस कृषि थे। अजय सिंह ने जब उन्हें कर्जमाफी का ब्यौरा जुटाने का निर्देश दिया था तो कुजूर का माथा भी घूम गया था….काउंटिंग अभी कंप्लीट भी नहीं हुई है और सीएस साब हरकत में आ गए हैं। लेकिन, इसके बाद अच्छा नहीं हुआ। अंदर की खबर यह है कि भूपेश उनके पारफारमेंस से संतुष्ट नहीं थे। इस स्तंभकार से बातचीत में सीएम ने सीएस के पारफारमेंस पर कुछ नहीं कहा, लेकिन यह जरूर बोले कि सीएस ने अपने से होकर किसी नई योजना पर कोई सुझाव दिया और न ही कोई अपडेट। जाहिर है, इससे सीएम खुश नहीं रहे होंगे।

गौरव का प्रमोशन

सिकरेट्री टू सीएम बनने के बाद आईएएस गौरव द्विवेदी को अब प्रमोशन के रूप में सरकार से न्यू ईयर गिफ््ट मिल सकता है। गौरव 95 बैच के आईएएस हैं। 94 बैच के आईएएस पिछले साल प्रिंसिपल सिकरेट्री बन चुके हैं। इस चलते जनवरी में 95 बैच का प्रमोशन ड्यू हो गया है। गणेश शंकर मिश्रा के पिछले साल रिटायर होने के कारण पीएस का पद भी खाली है। और फिर इस पोस्ट के लिए और कोई दावेदारी भी नहीं है। गौरव 95 बैच के छत्तीसगढ़ में अकेले आईएएस हैं। सीआर भी आउटस्टैंडिंग है। प्रिंसिपल सिकरेट्री बनाने के लिए डीपीसी में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया से भी कोई अफसर नहीं आता। यहां से सिर्फ अनुमति के लिए लेटर जाता है। वहां से ओके होते ही चीफ सिकरेट्री और एक सीनियर एसीएस की मौजूदगी में किसी भी दिन उनके प्रमोशन पर मुहर लगा दिया जाएगा।

आधी रात का सच!

भूपेश से मीडिया परेशान है। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद अधिकांश ट्रांसफर आधी रात के बाद हुए हैं। और, मीडिया का वर्किंग कल्चर आजकल बदल गया है। इलेक्ट्रानिक चैनल में रात दस के बुलेटिन के बाद काम लगभग खतम हो जाता है। इसके बाद वैसे खबरों की टीआरपी भी नहीं होती। और प्रिंट और वेब में भी रात 11 बजे तक काम समेटा जाता है। भूपेश जब से सीएम बनें हैं, सिर्फ रिपोर्टरों को ही नहीं बल्कि संपादकों को भी रतजगी करनी पड़ रही है, पता नहीं कौन सी लिस्ट आ जाए। हालांकि, एक शोक मिलन में पहुंचे सीएम से कुछ लोगों ने इस आधी रात की सच के बारे में पूछ ही लिया। भूपेश बोले, सरकार दिन भर काम में व्यस्त रहती है। लिहाजा, सेटअप और ट्रांसफर के लिए दिन में सोचने का वक्त नहीं बचता। सो रात में….। अलबत्ता, उन्होंने खुद भी चुटकी ली, कई पत्रकार रात में सोने से पहिले फोन करते हैं….कोई लिस्ट तो नहीं आ रही।

छप्पड़ फाड़कर

ठीक ही कहा गया है, उपर वाला देता है तो छप्पड़ फाड़कर। आईएएस सुनील कुजूर से बढ़ियां इसे कौन समझ सकता है। कहां दो साल पहले तक वे एसीएस बनने के लिए धक्के खा रहे थे। मगर डीपीसी नहीं हो पा रही थी। वो तो थैंक्स कहें आईपीएस राजीव श्रीवास्तव को, जिनके डीजी बनने के बाद आईएएस एसोसियेशन के चेयरमैन बैजेंद्र कुमार ने कुजूर के लिए हल्ला किया। तब जाकर कुजूर को प्रमोशन मिल सका। इसी साल अक्टूबर में उनका रिटायरमेंट है। इसलिए, वे मान कर चल रहे थे कि एसीएस से ही उन्हें रिटायर हो जाना है। वैसे भी, वे कोई महत्वकांक्षी अफसर नहीं है। बिल्कुल पूर्व डीजीपी एएन उपध्याय की तरह। वे भी कभी नहीं सोचे थे कि डीजीपी बनेंगे। क्योंकि, तीन-तिकड़म उपध्याय का स्वभाव नहीं है। लेकिन, उपर वाले ने ऐसा छप्प़ड़ फाड़कर दिया कि पौने पांच साल पुलिस प्रमुख रहकर देश के दूसरे लंबे कार्यकाल वाले डीजी बन गए। हालांकि, कुजूर के पास समय बहुत कम है। फिर भी, चीफ सिकरेट्री कितने आईएएस बन पाते हैं।

रमन की जीत

डा0 रमन सिंह भले ही पार्टी को चौथी बार सत्ता में लाने में कामयाब नहीं हो सकें लेकिन, धरमलाल कौशिक को नेता प्रतिपक्ष बनवाकर यह संदेश देने में कामयाब रहे हैं कि दिल्ली में उनकी पकड़ बरकरार है। वरना, तो नेता प्रतिपक्ष के लिए पांच-पांच विधायकों ने दावेदारी करके उनकी नींद ही उड़ा दी होगी। जाहिर है, उनके पसंद का कोई विधायक इस पद पर नहीं बैठता तो आगे चलकर उन्हें सियासी नुकसान होता। इसलिए, वे पहले से ही धरमलाल के नाम को आगे कर दिए थे। और, तमाम विरोधों के बाद भी दिल्ली से एक लाइन का मैसेज आ गया, धरम को ओके किया जाए।

सेम बैच

छत्तीसगढ़ बनने के बाद यह पहला मौका होगा, जब चीफ सिकरेट्री और डीजीपी सेम बैच के होंगे। सीएस सुनील कुजूर 86 बैच के आईएएस और डीजीपी डीएम अवस्थी 86 बैच के आईपीएस हैं। इससे पहले एक बार को छोड़कर सीएस हमेशा बैच में डीजीपी से सीनियर रहता था। सिर्फ विश्वरंजन के समय ऐसा हुआ था कि चीफ सिकरेट्री से डीजीपी बैच में सीनियर हो गया है। विश्वरंजन जब डीजीपी थे, तब सीएस पी जाय उम्मेन उनसे पांच बैच जूनियर थे।

पोस्टिंग के मायने

आईपीएस की लिस्ट में सरकार ने तीन रेंज के आईजी समेत पांच आईपीएस अफसरों को बदल दिया। इनमें एडीजी अरुणदेव गौतम दूसरी बार सिकरेट्री होम बनाकर पीएचक्यू से मंत्रालय भेज दिए गए। रमन सरकार में भी वे एक बार सिकरेट्री होम रह चुके हैं। पिछले साल ही वे मंत्रालय से पीएचक्यू लौटे थे। आईपीएस की लिस्ट की सबसे अहम रहा, आईजी एसआरपी कल्लूरी को मेन स्ट्रीम में लाकर आईजी एसीबी-ईओडब्लू बनाना। वैसे, समझदार लोग इस पोस्टिंग के निहितार्थ समझ गए हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. मंत्री कवासी लकमा को आबकारी, वाणिज्य और उद्योग जैसे विभाग देने के क्या मायने हैं?
2. नए डीजीपी डीएम अवस्थी अगर क्रीज पर जम गए तो कितने अफसरों की उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा?

कांग्रेस के गढ़ में कमल!

यह सर्वविदित है कि छत्तीसगढ़ कांग्र्रेस का गढ़ रहा है। जनता पार्टी की लहर में मध्यप्रदेश के समय सबसे अधिक छत्तीसगढ़ से कांग्रेस को सीटें मिली थी। तो अभी भी देश में कांग्रेस कहीं मजबूत है तो वह है, छत्तीसगढ़। इसके बाद भी बीजेपी पिछले 15 साल से राज कर रही है तो उसे इसका गुमान नहीं होना चाहिए। याद होगा, एक विधायक ने पिछले साल अमित शाह के रायपुर विजिट में जब सरकार की शिकायत की तो शाह ने उस विधायक को लगभग झिड़की देते हुए कहा था कि यह मत भूलिये.....कांग्रेस के गढ़ में यहां तीन बार सरकार बनी है। बीजेपी नेता भी मानते हैं, 2003 में अगर जोगी सरकार की एंटी इंकाम्बेंसी और दूसरा, एनसीपी नहीं होती तो कांग्रेस की सरकार रिपीट हो गई होती। 2008 में सस्ता चावल की वजह से सरकार जरूर बन गई। मगर याद कीजिए....इतनी बड़ी सौगात देने के बाद भी सीटों की संख्या में कोई फर्क नहीं पड़ा। वास्तव में चावल योजना के बाद तो बीजेपी की सीटें 60 से उपर चली जानी चाहिए थी। 2013 में भी बीजेपी ने सतनामी समाज की मदद लेकर सरकार बनाने में कामयाब रही। 10 में से नौ अजा सीटें बीजेपी की झोली में चली गई। जबकि, आरक्षण की वजह से कांग्रेस इस कंफीडेंस में रही कि अजा सीटों पर बीजेपी का सूपड़ा साफ हो जाएगा। 10 में से पांच सीटें भी अगर कांग्रेस लेने में सफल हो गई होती तो प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होती। इस बार भी भाजपा की उम्मीद की वजह सिर्फ थर्ड फ्रंट है।
47 और 52
भाजपा नेताओं को पूर्ण विश्वास है कि वह सरकार बनाने के जादुई आंकड़े जुटा लेगी। उसे लगता है, कम-से-कम 47 सीटें उसे मिल जाएगी। याने बहुमत से एक अधिक। इसमें एकाध कम भी हुआ तो बीजेपी के पास बहुत सारे तवे हैं, उस पर वह रोटी सेंक लेगी। वहीं, कांग्रेस स्पष्ट तौर पर यह मानकर चल रही है कि उसे गिरे हालत में भी 52 सीटें मिल रही है। टीएस सिंहदेव को यकीन है.....हम 52 मानकर चल रहे हैं। उससे अधिक भी आ जाए तो आश्चर्य नहीं। वहीं, भूपेश बघेल को इससे भी अधिक की उम्मीद है। भूपेश की मानें तो बदलाव की हवा में थर्ड फ्रंट की कोई भूमिका नहीं रह जाती।

सडन डेथ


90 में से करीब दस सीटें ऐसी हैं, जहां बीजेपी और कांग्रेस में कांटे का मुकाबला है। इसमें सडन डेथ से फैसला होगा। 2013 के विस चुनाव में भी दो-एक सीटों पर दो सौ से छह सौ मतों से जीत-हार तय हुई थी। सडन डेट वाली सीटों में इस बार दो-एक मंत्रियों का मामला भी हो सकता है। वे भी पांच सौ-हजार वोट से अपनी सीट निकालेंगे या फिर सब कुछ गवांएंगे। सियासी प्रेक्ष़्ाक भी मानते हैं, सडन डेथ वाली सीटें निर्णायक होंगी।   

नो चेंज या बड़ी उठापटक


यह बात स्पष्ट है कि सरकार अगर रिपीट हुई तो प्रशासनिक हल्को में बड़ा बदलाव नहीं होगा। कांग्रेस की सरकार बनने की आस में दो-चार अफसरों ने गुलाटी मारने की कोशिश की है, सिर्फ उन्हें ही बियाबान में भेजा जाएगा। 2011 बैच के आईएएस को कलेक्टर बनाया जाएगा। इसके अलावा बाकी चेंजेस लोकसभा चुनाव के बाद ही होंगे। लेकिन, सरकर कांग्रेस की बनी तो फिर पूछिए मत! पूरा उलटफेर हो जाएगा। 27 में से 15 से अधिक जिलों के कलेक्टर-एसपी बदल दिए जाएंगे। मंत्रालय में भी मेजर सर्जरी होगी। उस पर अगर भूपेश बघेल सीएम बनें तो सीएस, डीजीपी समेत मंत्रालय से लेकर तहसीलों तक के अफसर चेंज हो जाएंगे। टीएस, महंत या ताम्रध्वज को मौका मिलने पर उतना बड़ा चेंज नहीं होगा। हो सकता है, डीजीपी न बदलें। नौकरशाही फिलहाल तेल की धार समझने में लगी है। कुछ आईएएस, आईपीएस दोनों ओर सीटों की फीडबैक दे रहे हैं। याने डबल नावों की सवारी। हालांकि, पहले थर्ड फ्रंट और अब एग्जिट पोल ने ब्यूरोक्रेसी को कंफ्यूज कर दिया है। आखिर वे किधर हाथ बढ़ाएं?

भूपेश का गेटअप


कांग्रेस में सीएम के चार सक्रिय दावेदार हैं। भूपेश बघेल, चरणदास महंत, टीएस सिंहदेेव और ताम्रध्वज साहू। ऐसा कहा जा रहा है कि चारों ने अपने मंत्रिमंडल का प्रारुप तैयार कर लिया है। लेकिन, बॉडी लैग्वेज, कंफीडेंस और गेटअप तो भूपेश का दिख रहा है। जबर्दस्त जोश में दिख रहे हैं। एग्जिट पोल के दौरान टीवी पर उनका गेटअप और आत्मविश्वास कुछ अलग दिखा। तो क्या ऐसा मान लें कि दिल्ली से उन्हें कोई इशारा मिल गया है। हालांकि, ये तो उनके विरोधी भी मानते हैं कि कांग्रेस की जमीन तो भूपेश ने ही तैयार की। लेकिन, बचे तीनों भी कोई कसर नहीं उठा रखेंगे। 

सिकरेट्री टू सीएम


हालांकि, 11 दिसंबर को दोपहर तक ही स्पष्ट हो पाएगा कि सरकार किसकी बन रही है। मगर, सरकार बदलने की स्थिति में नौकरशाहों की सबसे अधिक नजर सिकरेट्री टू सीएम पद पर गड़ी हुई है। सरकार में मुख्यमंत्री के बाद अघोषित तौर पर सबसे कोई ताकतवार पद होता है तो वह है सिकरेट्री टू सीएम। मध्यप्रदेश के समय दिग्विजय सिंह सरकार में भी लोगों ने इसे देखा तो रमन सिंह गवर्नमेंट में पिछले 15 साल से लोग देख ही रहे हैं। रमन सरकार में अमन सिंह ने इसे और क्रेजी बना दिया है। दरअसल, मुख्यमंत्री अपने सबसे भरोसेमंद अफसर को सिकरेट्री अपाइंट करते हैं। सीएम सचिवालय के जरिये ही फाइलें मुख्यमंत्री तक पहुंचती है। इसे ऐसा कह सकते हैं, सीएम का सबसे अधिक राजदार उनका सिकरेट्री होता है। उसका कंपीटटेंट होना सबसे पहली शर्त होती है। सीएम सचिवालय के अफसरों के लिए सीएम हाउस का दरवाजा हमेशा खुला होता है। अभी अमन सिंह के साथ सुबोध सिंह और रजत कुमार सचिवालय में हैं। सरकार अगर बदली तो मानकर चलें, कम-से-कम नए सचिवालय में तीन आईएएस अपाइंट होंगे। और नहीं तो....फिर बदलने का सवाल ही पैदा नहीं होगा। बल्कि, सबका रुतबा और बढ़ जाएगा।

पुनिया  भी मौजूद


11 को काउंटिंग को लेकर कांग्रेस इतना उत्साहित है कि जश्न मनाने की तैयारी भी शुरू हो गई है। प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया भी 11 को सुबह रायपुर पहुंच रहे हैं। पुनिया को कांग्रेस नेताओं ने बुलाया है। मतगणना के दौरान वे राजीव भवन में मौजूद रहेंगे।   

अंत में दो सवाल आपसे


1. ब्यूरोक्रेसी के लिए सबसे उपयुक्त मुख्यमंत्री कौन रहेगा?
2. जोगी कांग्रेस-बसपा को आप कितनी सीटें मिलने की उम्मीद कर रहे हैं?

सोमवार, 3 दिसंबर 2018

फोटी-फोटी

2 दिसंबर 2018
बदलाव की चर्चा और कांग्रेस नेताओं के सीटों के दावे भले ही बढ़-चढ़कर किए जा रहे हों। मगर वास्तविकता यह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां इस उधेड़बून में लगी है कि सीटों की संख्या अगर 40 के आसपास आकर ठहर गई तो ऐसे में कौन सा फार्मूला सही रहेगा। बीजेपी के अंदरखाने में सारे विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। तो उधर बताते हैं, दिल्ली में राहुल गांधी ने कांग्रेस नेताओं की मीटिंग में यही टिप्स दिया….गोवा और मणिपुर जैसा नहीं होना चाहिए। वहां कम सीटें पाकर भी बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब हो गई थीं। राहुल ने कहा कि एकदम मुस्तैद रहना है। सरकार बनाने का दावा करने में देर नहीं करना। बैठक में इस पर भी गंभीरता से चर्चा हुई कि अगर सरकार बनाने के जादुई संख्या तक सीटें नहीं मिली तो पार्टी की रणनीति क्या होगी। कांग्रेस में इस पर भी मंथन हो रहा कि अगर बहुमत मिल गई तो दिक्कत नहीं, लेकिन 40 के आसपास रुक गया तो फिर जोगी की बजाए बसपा को साधा जाए। क्योंकि, बसपा के विधायक अगर पाला बदल लें तो एकाध निर्दलीय को मिलाकर गवर्नमेंट फर्म कर लिया जाए। क्योंकि, कांग्रेस अगर जोगी को मिलाकर सरकार बनाएगी तो उसे बहुत बड़ी कीमत अदा करनी पड़ेगी। राजनीति के जादूगर जोगी यूं ही कांग्रेस का साथ नहीं दे देंगे। जाहिर है, सीएम भी लगभग वे ही तय करेंगे। और, पुनिया, भूपेश और टीएस ऐसा कतई नहीं चाहेंगे। लेकिन, ये स्थिति तभी बनेगी, जब जोगी की झोली में कम-से-कम पांच सीटें आ जाएं। फिर, जोगी के लिए कंफर्ट कौन रहेगा….बीजेपी या कांग्रेस, ये सबसे बड़ा सवाल है।

राजभवन की भूमिका

चौथे विधानसभा चुनाव में अगर दोनों ही पार्टियां सरकार बनाने के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पाईं तो राजभवन की भूमिका अहम हो जाएगी। क्योंकि, फिर तोड़-फोड़ समर्थन देने-लेने का दौर चलेगा। ऐसे में, गेंद राज्यपाल आनंदी बेन पटेल के पाले में जाएगा। हाल ही में, जम्मू-कश्मीर का राजभवन चर्चा में रहा, जब महबूबा ने सरकार बनाने का दावा किया तो राजभवन का फैक्स मशीन खराब हो गई थी।

15 निर्णायक सीटें

जोगी के बसपा गठबंधन को कितनी सीटें मिलेगी….सियासी प्रेक्षकों की नजर में इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो गया है कि जोगी का बैल और हाथी किस करवट बैठेगा….किसको डैमेज करेगा। सूबे में करीब 15 सीटों पर जोगी कांग्रेस और बसपा ने मजबूत प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। इनमें 15 हजार से 40 हजार तक वोट खींचने की क्षमता वाले चेहरे भी हैं। अजीत जोगी खुद मरवाही से हैं। खैरागढ़, भाटापारा, चंद्रपुर, अकलतरा, चांपा, मस्तूरी, कोटा, तखतपुर, बेलतरा, बिल्हा, कसडोल जैसे 15 सीटों पर ट्रेंगुलर फाइट हैं। इनमें से कितनों के भाग्य में विधानसभा पहुंचना लिखा है, ये तो 11 दिसंबर को पता चलेगा। मगर भाजपा और कांग्रेस के लिए उम्मीद और आशंका की वजह जरूर बन गए हैं। आप समझ सकते हैं, जब कुछ सौ वोटों में जीत-हार के फैसले होते हों, वहां 15 से 40 हजार वोट पाने वाले प्रत्याशी किसी भी पार्टी को डूबोने या वैतरणी पार कराने में अहम भूमिका तो निभा ही सकते हैं। इन्हीं 15 सीटों से बीजेपी को सबसे अधिक उम्मीद तो कांग्रेस को सबसे अधिक आशंका।

किंग मेकर जोगी

जोगी परिवार को खबरों में रहने की कला में निपुणता हासिल है। अब देखिए, जोगीजी का परिवार चुनावी थकान मिटाने गोवा की सैर पर है। लेकिन, अपने ट्वीट से राजनीतिज्ञों का बीपी ही नहीं बढ़ा रहा बल्कि आउट ऑफ स्टेट होने के बाद भी खबरों के केंद्र में भी बना हुआ है। छोटे जोगी कभी भावी सीएम के साथ गोवा ट्रिप तो कभी मां रेणु और अपनी पत्नी ऋचा को भावी विधायक बताते हुए ट्वीट कर रहे हैं। गोवा के समुद्र तट से फोटो भी ऐसे पोस्ट हो रहे हैं, जिसमें जोगीजी के परिवार का बॉडी लैग्वेज और कांफिडेंस देखकर लग रहा….किंग मेकर बनने से उन्हें कोई रोक नहीं पाएगा।

किस-किसको साधें

बदलाव की चर्चा से सर्वाधिक कोई उलझन में है तो वे हैं सूबे के नौकरशाह। आखिर वे किस-किसको साधे। कांग्रेस में एक-दो नहीं, मुख्यमंत्री के आधा दर्जन दावेदार हैं। भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव, चरणदास महंत, रविंद्र चौबे और ताम्रध्वज साहू। ये पांच नाम तो ओपन हैं। कुछ चेहरे ऐसे हैं, जिन्हें लगता है कहीं बिल्ली के भाग्य से सिकहर टूट जाए तो उन्हें भी मौका मिल सकता है। इनमें कांग्रेस के अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के कुछ नेता बेहद उत्साहित हैं। ऐसे में बेचारे नौकरशाहों की मानसिक यंत्रणा समझी जा सकती है। कहां-कहां हाजिरी लगाएं। ठीक है, वे पाला बदलने में माहिर माने जाते हैं। 2003 के चुनाव के बाद अफसरों के इस कौशल को लोगों ने देखा ही है। लेकिन, इस बार स्थिति जुदा है। पांचों के चौखट पर वे जा नहीं सकते। पहले सबसे अधिक टीएस से उम्मीद थी। लेकिन, राहुल ने ताम्रध्वज को भी मैदान में उतार दिया। अब, शिगूफा चल रहा, जमीन तैयार भूपेश ने की है तो उन्हें राहुल नजरअंदाज नहीं करेंगे। उधर, महंत भी दावेदारी में पीछे नहीं हैं। अफसरों के लिए ये उलझन ही तो हैं।

पहली बार आईएएस

आईएफएस राकेश चतुर्वेदी को लघु वनोपज संघ का प्रमुख बनाने के बाद जीएडी ने आईएएस जीतेन्द्र शुक्ल को प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क का सीईओ अपाइंट कर दिया। रुरल एरिया में सड़क बनाने वाली इस एजेंसी का कभी आईएएस सीईओ नहीं बना। सालों से इस पोस्ट पर आईएफएस का कब्जा रहा। चुतुर्वेदी से पहिले आलोक कटियार, सुधीर अग्रवाल, पीसी पाण्डेय सभी आईएफएस थे। हालांकि, राकेश के प्रमोशन के बाद यह पद खाली था, इसलिए मंत्रालय के गलियारों में इसे टेम्पोरेरी पोस्टिंग मानी जाती है….लोग मान रहे हैं कि 11 दिसंबर के बाद लिस्ट निकलेगी, उसमें फायनल होगा। लेकिन, जानने वाले को पता है कि जब तक आरपी मंडल पंचायत विभाग के एसीएस रहेंगे, जीतेंद्र को कोई हिला नहीं पाएगा। पंचायत विभाग की कमान संभालते ही जीतेंद्र को मंडल डायरेक्टर पंचायत बनाकर लाए थे। अब, सीईओ भी बनवा लिए हैं। दरअसल, मंडल और जीतेंद्र में बड़ी अच्छी केमेस्ट्री है। दोनों सालों से एक साथ काम कर रहे हैं। मंडल पिछले दस साल में जिस भी विभाग में रहे, जीतेंद्र उनके साथ रहे। अरबन, पीडब्लूडी, पंचायत सभी में। जोड़ी तभी ब्रेक होगी, जब जीतेंद्र कलेक्टर बन जाएं।

कांग्रेस के 90 विधायक!

रायपुर के राजीव भवन में कांग्रेस नेताओं ने सभी 90 प्रत्याशियों को बुलाकर पूछा कि कौन-कौन जीत रहा है तो एक-एक कर सभी 90 खड़े हो गए। इस पर जमकर ठहाके लगे। हालांकि, बाद में चरणदास महंत ने चुटकी ली….पहली और आखिरी बार आप सभी 90 भावी विधायकों को एक साथ बुलाया गया है। उनका इशारा इस ओर था कि सभी 90 तो जीत कर आएंगे नहीं। इसलिए पहली और आखिरी बार ही हुआ न।

अंत में दो सवाल आपसे

1. रमन सरकार के कितने मंत्री अपनी सीट बचा पाएंगे?
2. कांग्रेस के सीएम पद के किस दावेदार की सीट फंस गई है?

शनिवार, 10 नवंबर 2018

जातिवादी राजनीति

11 नवंबर
छत्तीसगढ़ में जातिवादी राजनीति के लिए कभी कोई स्पेस नहीं रहा। मध्यप्रदेश के समय भी यहां दो ही पार्टियों का वर्चस्व रहा। कांग्रेस और भाजपा। दोनों पार्टियां अपने मेनिफेस्टो पर वोट मांगती थी। 2003 में कांग्रेस ने जरूर जातिवादी कार्ड को चलने की कोशिश की लेकिन, यहां की जनता ने उसे सिरे से खारिज कर दिया। लेकिन, चौथे विधानसभा चुनाव में कुछ राजनीतिक पार्टियां जातिवाद को उभारकर चुनावी वैतरणी पार करने का प्रयास कर रही हैं, वह छत्तीसगढ के लिए शुभ संकेत नहीं है। आखिर, यूपी, बिहार के पिछड़ने की मूल वजह जातिवादी राजनीति ही रही है। हालांकि, ये अच्छी बात है कि छत्तीसगढ़ के लोग जाति और धर्म का चश्मा पहनकर वोट डालने नहीं जाते। वरना, स्वाभिमान मंच का शटर नहीं गिरता। दरअसल, जब राजनीतिक प्रत्याशियों के पास जब मुद्दों का टोटा हो जाता है, तो फिर इस तरह की बांटने वाली राजनीति शुरू हो जाती है। विस्मय यह कि जातिवाद के तवे पर रोटी सेंकने में कोई भी पार्टी पीछे नहीं रहती।

सीटों का गुणाभाग

चुनाव के समय नौकरशाहों के पास कोई काम नहीं होता। चुनाव में ड्यूटी लगती नहीं। उपर से आफिस में बैठने की मजबूरी। मुख्यालय जो नहीं छोड़ना है। ऐसे में, करें क्या? नोटपैड पर सीटों के गुणाभाग में समय व्यतीत कर रहे हैं। जिन अफसरों की बीजेपी से कंफर्टनेस है, वे इसी सरकार को रिपीट करने के हिसाब से उसे सीट दे रहे हैं और जो अनकंफर्टनेस महसूस करते हैं, वे संख्याबल में कांग्रेस को उपर कर दे रहे हैं। हालांकि, कुछ दिन पहले तक हंड्रेड परसेंट नौकरशाह इसी सरकार को रिपीट होते देखना चाह रहे थे। लेकिन, सीडी कांड के बाद एक कांग्रेस नेता का खौफ अफसरों पर से हट गया है। लिहाजा, स्थितियां कुछ बदली है।

कोरबा और तानाखार

कोरबा और तानाखार ऐसी सीट हैं, जहां जिस पार्टी के विधायक बनते हैं, उस पार्टी की सरकार नहीं बनती। तानाखार में 15 साल से कांग्रेस के विधायक थे और सरकार रही बीजेपी की। उससे पहिले गोंडवाना पार्टी से हीरा सिंह मरकाम एमएलए रहे और सरकार रही कांग्रेस की। कोरबा का मामला भी कुछ इसी तरह का है। 2008 में कटघोरा से अलग होकर कोरबा विधानसभा बना था। तब से कांग्रेस के जय सिंह विधायक हैं। उससे पहिले कटघोरा में बोधराम कंवर विधायक थे तो बीजेपी की सरकार रही। कंवर से पहले बनवारी लाल अग्रवाल कटघोरा से विधायक चुने गए और सरकार बनी कांग्रेस की। हालांकि, कई बार मिथक टूटते भी हैं। मसलन, कोरबा जिले का ही रामपुर सीट के बारे में कहा जाता था कि जो वहां का विधायक बनता है, राज्य में उस पार्टी की सरकार बनती है। हालांकि, पिछले बार इसमें ब्रेक लग गया। ननकीराम कंवर वहां से चुनाव हार गए।

भाईचारा!

निर्वाचन आयोग ने कलेक्टरों का चुनावी ज्ञान परखने के लिए परीक्षा आयोजित की तो उसमें सारे डायरेक्ट आईएएस बनें कलेक्टरों को ऐन-केन-प्रकारेण पास कर दिया गया। फेल हुए सिर्फ तीन प्रमोटी कलेक्टर। इसी तरह कौवा मारकर लटकाने की बारी आई तो चुनाव आयोग ने आबकारी विभाग के सिकरेट्री डीडी सिंह की छुट्टी कर दी। छत्तीसगढ़ बनने के बाद तीन विधानसभा और तीन लोकसभा चुनाव हुए हैं, लेकिन, कभी किसी सचिव पर कार्रवाई नहीं हुई। हर चुनाव में दो-एक कलेक्टर, एसपी नपे। ये पहला मौका है कि आयोग ने सचिव को हटाया। वो भी प्रमोटी। कहीं भाईचारा तो नहीं निभाई जा रही।

गजब की वसूली

कहते हैं, पैसा कमाने वाले समुद्र की लहरें गिनकर भी पैसा कमा लेते हैं। छत्तीसगढ़ के नौकरशाहों का भी इस मामले में जवाब नहीं है। चुनाव आयोग ने तीन साल से जमे अधिकारियों को हटाने का आदेश दिया तो मंत्रालय के अफसरों की लाटरी लग गई। मलाईदार पदों पर तीन साल से अधिक समय से बैठे अफसरों से ट्रांसफर के नाम पर जमकर खेल किया गया। जिनने गुलाबी नोट पहुंचा दिया वे बच गए, बाकी नप गए। कुछ विभागों ने अपनों को बचाने के लिए जीएडी को लिखकर भेज दिया कि हमारे अफसरों की निर्वाचन में ड्यूटी नहीं लगती। जीएडी का तो भगवान ही मालिक है। उसने चेक भी नहीं किया और ओके कर दिया। जीएडी या सीईओ सुब्रत साहू एक बार चेक करवा लें कि पंजीयन विभाग में कितने तीन साल वालों के ट्रांसफर हुए हैं और उसने जीएडी को क्या लिखकर भेजा था। सारा माजरा सामने आ जाएगा।

सरकार में गोल?

भाजपा की सरकार है, और सरकार के ही अफसर। फिर भी सबसे अधिक सामान बीजेपी प्रत्याशियों के ही जब्त किए जा रहे हैं। नेता भी चकित हैं तो प्रत्याशी भी पार्टी आफिस में दुखड़ा रो रहे हैं। दरअसल, चुनाव आयोग के कुछ आब्जर्बर काफी टफ आ गए हैं। एक वीआईपी डिस्ट्रिक्ट के कलेक्टर को तो प्रेक्षक ने भरी मीटिंग में निगेटिव कमेंट कर दिया। हालांकि, कुछ कलेक्टर, एसपी भी चतुराई भरा रोल अदा कर रहे हैं। पता चला है, ऐसे अफसरों को सरकार चुपचाप वॉच कर रही है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. पीएल पुनिया, भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव जगदलपुर से एक ही गाड़ी से रायपुर लौटे, क्या तीनों में सुलह हो गई है क्या?
2. किस मंत्री को निबटाने के लिए बीजेपी की एक महिला नेत्री ने कांग्रेस के एक नेता से हाथ मिला लिया हैं?