शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

सीएस का टोटका

19 फरवरी

संजय दीक्षित
छत्तीसगढ़ में 10-12 साल से ऐसा ट्रेंड चल रहा है कि आईएएस एसोसियेशन के प्रेसिडेंट चीफ सिकरेट्री नहीं बन पा रहे हैं। याद होगा, 2007 में बीके एस रे ने सीएस बनने की कितनी कोशिशें की थीं। लेकिन, नाकामी ही हाथ आई। सरकार ने उन्हें माध्यमिक शिक्षा मंडल में वनवास पर भेज कर शिवराज सिंह की ताजपोशी कर दी थी। इसके बाद नारायण सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। 2012 में सुनिल कुमार का मार्ग प्रशस्त करने के लिए सरकार ने नारायण को मंत्रालय से नारायण कर दिया था। उनके बाद एसोसियेशन की कमान बैजेंद्र कुमार ने संभाली। बैजेंद्र छत्तीसगढ़ के पहले ऐसे अफसर हैं, जिन्हें तीन मुख्यमंत्रियों के साथ काम करने का तर्जुबा है। अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह और अभी डा0 रमन सिंह। लिहाजा, पूरे फार्म में होने के बाद भी सही समय पर उन्होंने सन्यास ले लिया। अब आईएएस एसोसियेशन के नए प्रेसिडेंट हैं अजय सिंह। 83 बैच के अजय सीएस विवेक ढांड के बाद दूसरे नम्बर के सीनियर आईएएस हैं। हालांकि, रे से पहिले सुयोग्य मिश्रा एक अपवाद हैं, जो आईएएस एसोसियेशन के प्रेसिडेंट के साथ ही चीफ सिकरेट्री भी रहें। बहरहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि अजय सिंह आईएएस एसोसियेशन के प्रेसिडेंट के साथ जो अपशकून चला आ रहा है, उसे वे ब्रेक करते हैं। या…..।

गुड न्यूज

नया रायपुर के जंगल सफारी में शेरों का एक जोड़ा है, शिवा और रागिनी। शिवा ने रायपुर दौरे में पीएम नरेंद्र मोदी का वेलकम किया था और उसकी फोटो देश भर के मीडिया में छपी थी। रागिनी जरा शर्मिली है। वो मोदीजी के सामने भी नहीं आई थी। उनके बीच से एक गुड न्यूज निकल कर आ रहा है। नन्हा मेहमान का। लिहाजा, रागिनी को विशेष केयर के लिए जंगल सफारी से हटा लिया गया है। उसके बदले में शिवा का नया जोड़ा चित्रा को जंगल सफारी भेजा गया है। चलिये, पीएस फॉरेस्ट आरपी मंडल को आप बधाई दीजिए। उन्होंने वहां खूब मेहनत की थी। पीएम ने भी इसकी तारीफ की थी।

कांग्रेस के गढ़ में रमन

विधानसभा चुनाव में अभी डेढ़ साल से ज्यादा वक्त बाकी है। लेकिन, सीएम डा0 रमन सिंह ने तूफानी दौरा चालू कर दिया है। पिछले 45 दिन में उन्होंने 30 विधानसभाओं को कवर किया है। और, खास बात यह है कि इनमें से अधिकांश कांगेस विधायकों का इलाका है। रमन के नजदीकी लोग भी मान रहे हैं कि पिछले 13 साल में इतना मेहनत करते कभी नहीं देखा। दिल्ली में दिन भर मीटिंगों के बाद भी वे शाम को लौटने पर मंत्रालय पहुंच जा रहे हैं। 16 फरवरी को बिलासपुर के कोटा के थकाने वाले कार्यक्रम से लौटने के बाद उन्होंने सीएम हाउस में लोक समाधान शिविर का प्रेजेंटेशन देखकर उसे फायनल किया। बहरहाल, कांग्रेस के गढ़ में सरकार का धावा बोलना, कांग्रेस पार्टी के लिए चिंता का सबब हो सकता है।

तीन सदस्यीय कमेटी

लोक सुराज अभियान का सरकार ने नाम और स्वरूप बदल दिया है। अब लोक समाधान शिविर होंगे और मौके पर ही समस्याओं का निबटारा किया जाएगा। इस दौरान न तो कोई लोकार्पण होंगे और न शिलान्यास। सीएम सिर्फ काम की दो टूक बात करेंगे। 3 अप्रैल से 20 मई तक चलने वाले लोक समाधान के लिए सरकार ने तीन सदस्यीय कमेटी बनाई है। सिकरेट्री टू सीएम सुबोध सिंह, ज्वाइंट सिकरेट्री टू सीएम रजत कुमार और डायरेक्टर पीआर राजेश सुकुमार टोप्पो। बताते हैं, बाद में राजेश को कोआर्डिनेटर बनाया इस अभियान को उनके हवाले कर दिया जाएगा।

लिटमस टेस्ट

लोक समाधान शिविर कलेक्टरों के लिए लिटमस टेस्ट होगा। सरकार को पता चल जाएगा कि उनके कलेक्टर्स कितने पानी में हैं। वरना, लोक सुराज में दिन में पारफारमेंस ठीक ना भी रहा तो शाम को रोड शो में तमाशेबाजी कर कलेक्टर अपनी पीठ थपथपवा लेते थे। लेकिन, सरकार अबकी ऐसा कोई मौका देने वाली नहीं। सरकार सिर्फ और सिर्फ आवेदनों का निराकरण देखेगी। उसी आधार पर कलेक्टरों की नई रैंकिंग तय होगी। और पोस्टिंग भी।

ट्रांसफर अब मई एंड में

कलेक्टरों के ट्रांसफर अब 20 मई के बाद ही होंगे। इससे पहिले शीतकालीन सत्र के जस्ट बाद कलेक्टरों के तबादले होने थे। मगर कैशलेस अभियान ने तब ब्रेक लगा दिया था। इसके बाद कलेक्टर कांफ्रेंस के चलते ट्रांसफर टल गए। जाहिर है, कांफ्रेंस में सरकार ने कलेक्टरों को तीन महीने का टास्क दिया था। लिहाजा, अप्रैल फर्स्ट वीक में कलेक्टरों की लिस्ट निकलना तय माना जा रहा था। लेकिन, लोक समाधान शिविर के चलते एक बार फिर मई तक ट्रांसफर टल गए हैं। अलबत्ता, एकाध दागी कलेक्टरों को सरकार बदल दे तो बात अलग है।

बहू भारी पड़ गई

एसीबी ने नौ आफिसरों के यहां छापा मारा, इनमें से एक को तो उनकी बहू ने ही निबटा दिया। पता चला है, अफसर और उसका परिवार लंबे समय से बहू को प्रताड़ित कर रहा था। जब बर्दाश्त की सीमा पार हो गई तो बहू और उसके मायके वालों ने ससुर की काली कमाइयों की शिकायत एसीबी में कर दी। वह भी पूरे दस्तावेजों के साथ। और, जब बहू ही ससुर के भ्रष्टाचार के खिलाफ सामने आ रही है तो एसीबी कहां चूकने वाली थी।

भूपेश का बाउंसर

पीसीसी चीफ आजकल अफसरों पर खतरनाक बाउंसर फेंक रहे हैं। पहला निशाना उन्होंने बस्तर के पूर्व आईजी एसआरपी कल्लूरी को बनाया। दो साल से क्रीज पर डटकर नक्सलियों से लोहा ले रहे कल्लूरी पर भूपेश ने ऐसा बॉल फेंका कि उसमें वे उलझ गए। कल्लूरी ने सीधे भूपेश को चैलेंज कर दिया कि उनके हटने से अगर बस्तर में नक्सलवाद का खातमा हो जाएगा, तो एक घंटे में यहां से चले जाएंगे। गौर कीजिएगा, कल्लूरी की लाइन एन लेंग्थ वहीं से गड़बड़ाई और वे अपना विकेट गवां बैठे। भूपेश ने दूसरा तेज बॉल एसीबी चीफ मुकेश गुप्ता पर फेंका है। उन्होंने मुकेश को ललकारते हुए उनके मर्द होने पर ही सवाल उठा दिया है। अब यह देखना इंटरेस्टिंग होगा कि मुकेश मंजे हुए बैट्समैन की तरह क्रीज पर डटे रहते हैं या कोई गलती तो नहीं कर बैठेंगे।

जय श्रीराम

सौगंध राम की खाने के बाद भी बीजेपी अयोध्या में राम मंदिर नहीं बनवा पाई। मगर बीजेपी के शासन वाले छत्तीसगढ़ में बिना किसी हो-हल्ला के राम मंदिर का निर्माण हो गया। रायपुर के वीआईपी रोड पर विश्व हिन्दू परिषद ने भव्य राम मंदिर बनाया है। चलिये, अयोध्या में राम मंदिर नहीं बना, रायपुर में तो बन गया। बीजेपी यहां गर्व से जय श्रीराम तो बोल सकती है।

हफ्ते का व्हाट्सएप

अब कहीं, शराब बेचने की ड्यूटी न लग जाए….? सहमे हुए हैं मास्टर…..।

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस जिले के कलेक्टर की सीएम सचिवालय में ज्वाइंट सिकरेट्री की पोस्टिंग हो सकती है?
2. स्पेशल डीजी नक्सल डीएम अवस्थी ने अपनी एक्टिविटी क्यों तेज कर दी है?

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

कहां हैं सिकरेट्री होम?

 12 फरवरी

संजय दीक्षित
भारत सरकार के गृह सचिव हो या प्रदेश के, दोनों का अपना ओहरा होता है। गृह सचिव के इशारे के बिना पुलिस में पत्ता नहीं हिलता। लेकिन, बस्तर आईजी एसआरपी कल्लूरी एपीसोड में लगा ही नहीं कि राज्य में कोई सिकरेट्री होम भी है। सरकार ने जबकि बीबीआर सुब्रमण्यिम को इसी भरोसे से गृह विभाग की कमान सौंपी थी कि पीएमओ में लंबे समय तक रहे हैं, पुलिस के साथ नक्सल मूवमेंट को आसानी से हैंडिल कर लेंगे। लेकिन, पुलिस के आला अधिकारी भी मानते हैं, पीएस होम ने बस्तर के घटनाक्रम को इंटरेस्ट लेकर हैंडिल किया होता तो ये सिचुएशन सरकार को फेस नहीं करने पड़ते। हो सकता था कि कल्लूरी को वहां से हटाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। जाहिर है, बस्तर के संवेदनशीलता को देखते गृह विभाग लगातार रिव्यू किया होता तो ये परिस्थितियां निर्मित नहीं होती। वैसे, गृह मंत्री रामसेवक पैकरा भी अंत तक कहते रहे, कल्लूरी काबिल आफिसर हैं, वे बस्तर के आईजी बनें रहेंगे। याने उन्हें पता ही नहीं था कि वहां क्या रहा है। खैर, उनका दूध-भात। हालांकि, इस प्रकरण में ग्राफ पुलिस महकमे का भी गिरा है। क्योंकि, जिस विभाग में विवाद जितना कम होता है, सरकार उससे उतना ही प्रसन्न रहती है। कल्लूरी प्रकरण में सरकार की जमकर किरकिरी हुई। ऐसे में उसके गुस्से का आप अंदाजा लगा सकते हैं।

जय हो!

कल्लूरी एपीसोड में सबसे ज्यादा कोई नफे में रहा तो वे हैं 86 बैच के आईपीएस डीएम अवस्थी। पिछले साल स्पेशल डीजी नक्सल बनने के बाद से अवस्थी डिफेंसिव खेल रहे थे। कल्लूरी के रहते उनके फास्ट खेलने का मौका भी नहीं था। बस्तर में उनका ऐसा ओहरा बन गया था कि डीएम को वहां कौन पूछता। लेकिन, कल्लूरी के हटने एवं सुंदरराज पी के बस्तर के प्रभारी आईजी बनने के बाद एक तरह से कहें तो नक्सल मूवमेंट की कमान डीएम के हाथों में आ गई है।

किस्मत का खेल

आईपीएस अफसरों के लिए 2017 की ग्रह दशा ठीक नहीं है। साल की शुरूआत ही खराब हो गई….सेकेंड वीक ऑफ जनवरी आईजी राजकुमार देवांगन को सरकार ने जय राम जी कर दिया। इसके बाद जशपुर एसपी गिरिजाशंकर की किस तरह सरकार ने छुट्टी की, बताने की जरूरत नहीं। नक्सलियों को बैकफुट पर जाने के लिए विवश करने वाले एसआरपी कल्लूरी की स्थिति लाइन अटैच जैसी हो गई है। उस कल्लूरी की, जिसके काम के बल पर दिल्ली की मीटिंगों में सरकार अपनी पीठ थपथपाती थी। सूबे के सबसे डेसिंग वाले आईपीएस मुकेश गुप्ता को बेहद मामूली मैटर में हाईकोर्ट का चक्कर लगाना पड़ गया। ज्योतिषियों की मानें तो पुलिस के गुरू में मंगल बैठा है। इसलिए, कम-से-कम जून तक ये चलता रहेगा। इसके बाद ही आईपीएस के दिन फिरेंगे।

सूचना आयोग में दलित कार्ड?

सरकार ने मिड जनवरी में रेवन्यू सिकरेट्री केएम पिस्दा को पीएससी को चेयरमैन बनाकर बड़ा दांव चला था। इसका न केवल आदिवासियों में अच्छा मैसेज गया बल्कि, आदिवासी एक्सप्रेस चलाने की धमकी देने वाले आदिवासी नेताओं के हथियार की धार भी कम कर दिया। पीएससी के बाद अब राज्य में कोई बड़ा संवैधानिक पद बचा है तो वह है, सूचना आयोग। आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी पिछले 11 महीने से खाली पड़ी है। और, ऐसा माना जाता है कि किसी खास अफसर के लिए कुर्सी पर रुमाल रखा गया है। लेकिन, ध्यान दीजिएगा…..राजनीति में समय-काल महत्वपूर्ण होता है। सरकार का चौथा साल याने सेमीफायनल शुरू हो गया है। इस दौरान जो भी नियुक्तियां होंगी, निश्चित रूप से उसके राजनीतिक मायने होंगे। ऐसे में, सूचना आयोग के दावेदारों में इस बात की बेचैनी बढ़ना लाजिमी है कि सरकार कहीं दलित कार्ड चलते हुए किसी अजा वर्ग के आईएएस को सीआईसी न बना दें। एसीएस ट्राईबल एनके असवाल दो महीने बाद रिटायर होने वाले हैं। सरकार जिस मोड में बैटिंग कर रही है, भरोसा भी नहीं है। आखिर, महीने भर पहिले कल्लूरी नक्सल मोर्चे पर वापिस आएंगे….कल्लूरी आईजी बनें रहेंगे, बयान देने वाली सरकार ने किस तरह उनसे पल्ला झाड़ लिया। संकेत मिल रहे हैं, बजट सत्र के बाद कोई अफसर अब नहीं खेलना है, बोलकर खुद ही पेवेलियन लौट जाए। ताकि, सीआईसी की कुर्सी उसके हाथ न चली जाए। जाहिर है, अप्रैल, मई महीना ब्यूरोक्रेसी के लिए काफी चौंकाने वाला रहेगा। तब तक उत्सुकता तो बनी रहेगी कि सूचना आयोग में सरकार दलित कार्ड चलती है या जिसके नाम का रुमाल रखा है, उसकी ताजपोशी करेगी।

बिदा हुए बैजेंद्र

सहवाग स्टाईल में बैटिंग कर आईएएस एसोसियेशन के प्रेसिडेंट एन बैजेंद्र कुमार बिदा हुए। राजधानी रायपुर में आज शुरू हुए आईएएस कानक्लेव के जनरल बॉडी मीटिंग में 83 बैच के आईएएस अजय सिंह को एसोसियेशन का नया प्रेसिडेंट चुना गया। अजय सिंह सूबे के दूसरे सबसे सीनियर आईएएस हैं। बैजेंद्र आईएएस के लिए हितों के लिए कभी पीछे नहीं हटे। सुनील कुजूर को एसीएस बनाए बिना स्टेट पुलिस सर्विस के अफसर राजीव श्रीवास्तव को जब स्पेशल डीजी बनाया जा रहा था तो बैजेंद्र अड़ गए। जीएडी के अफसरों को उन्हांने जमकर हड़काया। उनके कड़े विरोध का नतीजा रहा कि सरकार को पहले कुजूर को एसीएस बनाया गया। फिर, राजीव को स्पेशल डीजी। अजय सिंह रवि शास्त्री और अंशुमन गायकवाड़ स्टाईल के बैट्समैन हैं। इसलिए, अब वैसे शार्ट्स देखने नहीं मिलेंगे।

रैंक सुधार

कलेक्टर कांफें्रस में मुख्यमंत्री ने कलेक्टर्स एवं सीईओ को पुअर पारफारमेंस वाले अफसरों को रैंक सुधारने के लिए तीन महीने का समय दिया था। अप्रैल में डाक्टर साब इसका रिव्यू करेंगे। और, उसी आधार पर फिर कलेक्टर्स एवं सीईओज को नई पोस्टिंग मिलेंगी। यही वजह है कि सूबे के समूचे कलेक्टर रैंक सुधार में जुट गए हैं। बस्तर में पार्टियां होनी बंद हो गई है। 10 जनवरी को काफें्रस था और 12 को बस्तर में एक बड़ी पार्टी होनी थी। तत्काल उसे कैंसिल किया गया।

विकल्प-ही-विकल्प

एसआरपी कल्लूरी को जब हटाया गया तो सरकार ने भी नहीं सोचा होगा कि एक आईजी की इतनी टीआरपी होगी। आईजी राजकुमार देवांगन की बर्दी उतर गई तो दो दिन में वे मीडिया से आउट हो गए। कल्लूरी के बारे में लोग रोज अनुमान लगाते हैं, अब मामला खतम है। मगर अगले दिन वे दूसरे रूप में प्रगट होकर चौंका देते हैं। सरकार ने जिस दिन उनकी छुट्टी स्वीकृत किया था और वे सभी मित्रों को राम-राम करते हुए इलाज कराने गए थे, किसने सोचा होगा कि वे लौटकर फिर अचंभित करेंगे। पीएचक्यू में कल उनकी ज्वाइनिंग हुई तो समझा गया, मामले की इतिश्री हो गई। लेकिन, उन्होंने तो कौन है भूपेश…..पूछकर ब्यूरोक्रेसी ही नहीं, सियासी नेताओं को भी हिला दिया। इस लहजे में तो बीजेपी के किसी नेता ने भी भूपेश पर पलटवार नहीं किया होगा। नौकरशाह तो ऐसा दुःसाहस कर ही नहीं सकता। कल्लूरी के बयान को देखते ही राजधानी में आज अफवाह फैली कि वे जोगी कांग्रेस से चुनाव लड़ सकते हैं। इस पर बीजेपी के एक नेता की टिप्पणी दिलचस्प रही…..भूपेश के अंदाज में बात करने वाले आदमी की हमारे पास कमी है…। याने कल्लूरी के लिए विकल्प ही विकल्प है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. निधि छिब्बर के दिल्ली जाने के बाद जीएडी का अगला सिकरेट्री कौन होगा?
2. एसआरपी कल्लूरी को हटाने के बाद सरकार ने किस समीकरण को देखते तमिलियन आईपीएस सुंदरराज पी को बस्तर भेजा?

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

ऐसी बिदाई!


4 फरवरी
संजय दीक्षित
बस्तर आईजी एसआरपी कल्लूरी की बस्तर से बिदाई चौंकाने वाली रही। बाईपास आपरेशन कराने के महीने भर के भीतर उन्होंने बस्तर लौट कर जीवटता का परिचय दिया था…..तब खुद भी नहीं सोचा होगा कि सरकार उन्हें इस तरह रुखसत कर देगी। हालांकि, इत्तेफाक कहें या…..कि कल्लूरी की अधिकांश जगहों से बिदाई कमोवेश एक-सी रही है। 2003 में बीजेपी की सरकार बनने के बाद किस तरह बिलासपुर एसपी से हटाए गए थे, लोग भूले नहीं हैं। सरगुजा में नक्सलियों का सफाया करने के बाद बलरामपुर से सरकार ने उन्हें रातोंरात हटा कर पीएचक्यू बुला लिया था। दंतेवाड़ा में डीआईजी रहने के दौरान स्वामी अग्निवेश के काफिले पर टमाटर और पथराव का ठीकरा कल्लूरी पर फूटा और सरकार ने उन्हें गुमनामी में भेज दिया। फरवरी 2014 में अमरनाथ उपध्याय के डीजीपी बनने के बाद कल्लूरी के दिन फिरे। जून में बस्तर में ताजपोशी हो गई। कल्लूरी के लिए प्लस यह रहा कि दूसरा कोई आईपीएस बस्तर जाना नहीं चाहता था और सरगुजा के आईजी रहने के दौरान उपध्याय ने उन्हें बलरामपुर में काम करते हुए देखा था। इसलिए, उन्होंने बस्तर में रिलांच करवाया। लेकिन, बिदाई ऐसी कि…..।

बिलासपुर का प्रस्ताव

बस्तर आईजी एसआरपी कल्लूरी को बदलने की कवायद सरकार में कई दिनों से चल रही थी। यकबयक हटाने से वे डिमरलाइज न हों, इसलिए कुछ लोगों ने उन्हें बिलासपुर का आईजी बनाने का प्रस्ताव दिया था। फार्मूला था, विवेकांनद को बिलासपुर से बस्तर और कल्लूरी को बिलासपुर। मगर सरकार को यह प्रस्ताव रास नहीं आया। फिर, डीआईजी के लिए रतनलाल डांगी का नाम आया। डांगी बस्तर जाने के लिए तैयार भी थे। मगर किन्हीं कारणों से सरकार ने डांगी का नाम खारिज करते हुए सुंदरराज पी को बस्तर की कमान सौंप दी। हालांकि, सुंदरराज बस्तर जाने के लिए इच्छुक नहीं थे। मगर मामला इतना हाईप्रोफाइल हो गया था कि उनकी सुनता भी कौन।

स्कोर 3-4 पर

2015-16 में आईएएस लॉबी ने अपने तीन विकेट गंवाए थे। नॉन घोटाले में डा0 आलोक शुक्ला और अनिल टूटेजा। और तीसरा, ट्रेप केस में रणबीर शर्मा। इसके मुकाबिले आईपीएस में आईजी राजकुमार देवांगन नौकरी से ही बाहर हो गए। ऐसा पहली बार हुआ कि बिना डीई शुरू हुए पवनदेव का प्रमोशन रुक गया। जशपुर एसपी गिरिजाशंकर और आईजी बस्तर कल्लूरी का विकेट ऐसा उड़ा कि वे खुद भी नहीं समझ पाए कि गेंद किधर से आई और गिल्ली किधर गई। वो तो राजीव श्रीवास्तव की, हार नहीं मानूंगा….को दाद देनी होगी….रिटायरमेंट के एक रोज पहले वे स्पेशल डीजी बन गए। वरना, स्कोर 3-5 हो गया होता। अब, यह देखना दिलचस्प होगा कि आईपीएस लॉबी की फॉलिंग किस स्कोर पर जाकर रुकती है।

अब खैर नहीं

सीएम के जनदर्शन में मिलने वाले आवेदनों को संबंधित विभागों द्वारा सही ढंग से निराकरण न करने की शिकायत सालों पुरानी है। मगर सरकार अब सख्त हुई है। सीएम ने अफसरों से कहा है कि जनदर्शन के मामलों में कोताही बरतने वाले अफसरों पर कारवाई की जाए। लिहाजा, जिन विभागों के परफारमेंस पुअर है, उनका रिव्यू शुरू हो गया है। एसीएस टू सीएम बैजेंद्र कुमार को इसकी कमान सौंपी गई है। बैजेंद्र ने संबंधित विभागों की क्लास लेना चालू कर दिया है। कल होम, इरीगेशन और एजुकेशन विभाग की बारी थी। चलिये, शायद इससे सीएम के जनदर्शन पर अफसर गंभीर हो जाएं।

दिल बचपन का…..

ऑल इंडिया सर्विसेज के दो सीनियर अफसरों ने हाल ही में शादी रचाई है। इनमें से एक का इस साल रिटायरमेंट है और दूसरे का दो साल बाद। इस साल रिटायर होने वाले अफसर की नई पत्नी 32 बरस की है। याने साब 60 के और बीवी…..। अफसर का सरकारी मकान का तर्जुबा कड़वा रहा है। गृहस्थी तो चौपट हुई ही, कैरियर भी खतम हो गया। लिहाजा, पहले उन्होंने घर बनवाया। फिर, सरकारी बंगला छोड़ वे नए मकान में शिफ्थ हुए हैं। अब, बात दूसरे वाले की। तो उनका गिनना पड़ेगा ये वाली कौन सी नम्बर वाली है।

विस में भी जोगी कांग्रेस

संख्या बल न होने के कारण बजट सत्र में जोगी कांग्रेस सत्ताधारी पार्टी को घेरने में कामयाब हो या ना हो मगर विधानसभा में अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराने के लिए जरूर इंतजाम कर लिए हैं। पार्टी से जुड़े तीनों विधायक 80-80 सवाल लगाएंगे। विधानसभा में एक एमएलए अधिकतम 80 सवाल लगा सकता है। लेकिन, ऐसा होता नहीं। आमतौर पर सवाल 40 से नीचे ही लगते हैं। कुछ विधायक तो दस-पांच में ही सिमट जाते हैं। जोगी कांग्रेस की रणनीति यह है कि प्रत्येक दिन प्रश्नकाल में तीन-से-चार सवाल उनके रहे। इससे उनकी मौजूदगी झलकेगी ही, मीडिया में कवरेज भी मिलेगा।

याद आ रहे जूदेव

उत्तराखंड और झारखंड जैसे छोटे राज्यों में दो-दो पीएफ आफिस हो गए। मगर छत्तीसगढ़ में अभी रायपुर में ही सिमटा हुआ है। लिहाजा, कोरबा, अंबिकापुर, रायगढ़ तरफ के लोगों को छोटे-छोटे काम के लिए रायपुर का चक्कर लगाना पड़ता है। ऐसे में, प्रायवेट सेक्टर के लोगों को दिलीप सिंह जूदेव याद आ रहे हैं। जूदेव बिलासपुर में पीएफ आफिस खुलवाने के लिए प्रयास कर रहे थे। बल्कि, निधन से पहले लोकसभा में उनका आखिरी सवाल बिलासुपर में पीएफ आफिस का ही था।

गुड न्यूज

नया रायपुर भी मार्च में स्मार्ट सिटी की लिस्ट में शुमार हो जाएगा। हालांकि, नाम कई और हैं। कांपिटिशन भी टॉफ है। मगर नया रायपुर को देखकर माना जा रहा है कि लिस्ट में वह सबसे उपर आ जाए, तो अचरज नहीं। इस तरह रायपुर देश का पहला शहर हो जाएगा, जहां दो-दो स्मार्ट सिटी होगी।

अंत में दो सवाल आपसे

1. एक नौकरशाह का नाम बताइये, जो सुप्रीम कोर्ट या मानवाधिकार आयोग में पेशी से पहले ईएल ले लेते हैं?
2. यह अफवाह कौन फैला रहा है कि अजीत जोगी की कांग्रेस में वापसी का फार्मूला तैयार किया जा रहा है….उन्हें पीसीसी अध्यक्ष बनाया जाएगा और भूपेश बघेल को नेता प्रतिपक्ष?

शनिवार, 28 जनवरी 2017

सरकार का यार्कर


29 जनवरी
संजय दीक्षित
इस महीने की 10 तारीख को कलेक्टर, एसपी कांफ्रेंस में सीएम ने इशारे-ही-इशारों में कड़ी नसीहतें दी थी। कहा था, पुलिस वालों की बर्दी की चमक और बूटों की खनक लोगों को महसूस करना चाहिए। डाक्टर साब सीधे-सीधे तो कुछ बोलते नहीं। मगर संकेत साफ थे…..अब, खैर नहीं। लेकिन, जशपुर एसपी गिरिजाशंकर जायसवाल इस संकेत को समझने में चूक गए। जबकि, उन्हें पता था कि मोदी के मेक इन इंडिया के दौर में पत्थलगांव में किसानों ने बाजार में न बिक पाने के कारण गुस्से में टमाटर को रोड पर डंप कर दिया था। यह नेशनल न्यूज बना। अलबत्ता, सरकार के पास सूचना पहुंची कि मामले को हैंडिल करने के लिए कलेक्टर पत्थलगांव पहुंच गई मगर एसपी नहीं गए। दूसरा, कल सीएम की जशपुर विजिट में पुलिस की लापरवाही एक्सपोज हो गई। सीएम को जिस रास्ते से गुजरना था, वहां वाहन की चपेट में आकर एक बच्ची की मौत हो गई। वीवीआईपी विजिट में पुलिस ने सड़क पर स्टॉपर तक नहीं लगाए थे। सीएम जब मंच पर पहुंचे तो वहां जशपुर के नेताओं ने शिकायतों की झड़ी लगा दी। जाहिर है, इससे गुस्सा तो आएगा ही। लिहाजा, सरकार ने आज सनसनाते हुए एक तेज यार्कर फेंका और गिरिजाशंकर समझ नहीं पाए और क्लीन बोल्ड हो गए। वे ऐसे समय में बोल्ड हुए, जब दो साल पूरा करके वे बड़े जिले में अपग्रेड करने की बाट जोह रहे थे। मगर किधर से बॉल आकर अंदर घुस गई, उन्हें पता ही नहीं चला। वैसे भी, यार्कर खेलने में आईपीएस जरा कमजोर पड़ते हैं। इसके गुर उन्हें आईएएस से सीखने चाहिए। कई अक्षम्य लापरवाहियों के बाद भी आखिर कुछ कलेक्टर कैसे क्रीज पर टिके हुए हैं?

रिकार्ड पारी की ओर

81 बैच के आईएएस विवेक ढांड सुनिल कुमार के रिटायर होने पर 28 फरवरी 2014 की शाम चीफ सिकरेट्री बनाए गए थे। अगले महीना उनका तीन साल पूरा हो जाएगा। इस तरह वे मुख्य सचिव की लंबी पारी खेलने वाले पी जॉय उम्मेन के रिकार्ड के करीब पहुंच गए हैं। उम्मेन तीन साल चार महीने सीएस रहे। बजट सत्र के बाद होने वाले उथल-पुथल में ढांड अगर अप्रभावित रहे तो जुलाई में वे उम्मेन का रिकार्ड तोड़ छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक समय तक सीएस के रूप में अपना नाम दर्ज करा लेंगे। सो, ढांड साब के लिए दुआ कीजिए।

उपध्याय भी पीछे नहीं

कप्तानी पारी खेलने में डीजीपी अमरनाथ उपध्याय भी पीछे नहीं हैं। बल्कि, चीफ सिकरेट्री से आगे चल रहे हैं। दो दिन बाद एक फरवरी को उनका तीन साल कंप्लीट हो जाएगा। इसी दिन सरकार ने रामनिवास के रिटायर होने पर उन्हें इंचार्ज डीजी बनाया था। और, 28 फरवरी को सुनिल कुमार ने अपने रिटायरमेंट के दिन डीपीसी कर उपध्याय को फुलफ्लैश डीजी बना दिया था। बहरहाल, डीजीपी के विकेट को फिलहाल कोई खतरा नहीं दिख रहा है। क्योंकि, उनसे एक बैच नीचे 86 बैच के स्पेशल डीजी डीएम अवस्थी डिफेंसिव खेल रहे हैं। 87 बैच के वीके सिंह डीजीपी के लिए चुनौती बन सकते हैं। मगर दिल्ली से लौटे तब। वे आईबी में डेपुटेशन पर हैं।

तो याद आए उम्मेन

चीफ सिकरेटी की बात चले तो रिटायर चीफ सिकरेट्री पी जॉय उम्मेन बरबस याद आ जाते हैं। उम्मेन बेहद स्वाभिमानी नौकरशाह थे। याद होगा, नवंबर 2011 में सरकार ने उम्मेन को हटाकर सुनिल कुमार को चीफ सिकरेट्री बनाया था, तब वे छुट्टी पर थे। साफ-सुथरी छबि और भद्रता को देखते सरकार ने उन्हें बिजली कंपनियों की कमान सौंपी थी…..उन्हें चेयरमैन बनाया गया था। मगर उम्मेन को यह गवारा नहीं हुआ। उन्होंने ससम्मान वीआरएस ले लिया। इसमें दो मत नहीं कि उम्मेन अगर इशारा किए होते तो उन्हें रिटायरमेंट के बाद लाल बत्ती मिल गई होती। क्योंकि, लंबा कार्यकाल होने के कारण सरकार ने उन्हें हटाया जरूर था, उनसे रिश्ते खराब नहीं हुए थे। लेकिन, उन्हांने गाड़ी-घोड़ा, नौकर-चाकर से स्वाभिमान को उपर रखा। छत्तीसगढ़ में ऐसे नौकरशाह भी रहे हैं। वरना, लोग रिटायरमेंट से छह महीना पहले से पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग के लिए सरकार की परिक्रमा शुरू कर देते हैं।

पिछड़ गए आईएएस

छत्तीसगढ़ आईएएस के लिए भले ही अब बढ़ियां कैडर हो गया है। मगर कलेक्टरी में यहां के आईएएस काफी पीछे हो गए हैं। यूपी, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में 2011 बैच को जिला मिल गया है। इस बैच के ए डोडे धनबाद के कलेक्टर हैं। और, यह उनका दूसरा जिला है। और अपने छत्तीसगढ़ में….? 2011 बैच को तो भूल जाइये, 2010 बैच का नम्बर कब लगेगा, किसी को पता नहीं। 2010 में चार आईएएस हैं। कार्तिकेय गोयल, सारांश मित्तर, जेपी मौर्य और रानू साहू। इन चारों के बाद ही 2011 बैच का नम्बर आएगा। याने अगले साल। वो भी सबका नम्बर नहीं लग पाएगा क्योंकि चुनावी वर्ष में दो-एक को ही एडजस्टमेंट हो पाएगा। बाकी को 2019 का इंतजार करना होगा।

ऐसी मुंहदेखी क्यों?

सूबे के चर्चित आरा मिल मामले में आर सी रैगर कमेटी ने 11 आईएफएस समेत 14 अफसरों को दोषी ठहराया था। इनमें से एक-एक करके 11 अफसर बरी हो गए। किसी ने यूपी लॉबी का सहारा लिया तो किसी ने साउथ लॉबी का। लास्ट में पांच आईएफएस बच गए थे। जिन्होंने चेक काटा था। इनमें से श्रीनिवास राव को सरकार ने आश्चर्यजनक तौर पर दोषमुक्त कर दिया तो पिछले हफ्ते अमरनाथ प्रसाद भी बाइज्जत बरी हो गए। बच गए राकेश चतुर्वेदी, हेमंत पाण्डेय और एसएस बड़गैया। तीनों छत्तीसगढ़ियां पंडित। राकेश रायपुरियन, पाण्डेय पंडरिया वाले तो बड़गैया सारंगढ़ के। तीनों के खिलाफ जो चार्ज है, सेम चार्ज श्रीनिवास राव और अमरनाथ प्रसाद के खिलाफ भी थे। फिर, ऐसी मुंहदेखी क्यों?

लंच डिप्लोमसी

पीसीसी चीफ भूपेश बघेल राजधानी के मीडियाकर्मियों को 29 जनवरी को लंच दे रहे हैं। कायदे से पत्रकारों को लंच, डिनर की कोई खबर नहीं बनती। क्योंकि, ऐसा अमूमन होता है…..राजनेता पत्रकारों से मेल-जोल बढ़ाने के लिए इस तरह की डिप्लोमेसी का सहारा लेते रहते हैं। कांग्रेस के लिए चिंता की वजह है मीडिया में उनकी खबरें कम होना। वरना, एक समय था, जब मीडिया में भूपेश को सीएम के बराबर स्पेस मिल रहा था। लेकिन, अब न केवल स्पेस सिमट गया है बल्कि कांग्रेस के विवादों की खबरें ज्यादा हाईलाइट हो जा रही। राजेंद्र तिवारी के साथ हाल में जो हुआ, वह सुर्खियां बनीं। इसमें कांग्रेस के मीडिया मैनेजरों की कमजोरी कह सकते हैं कि वो चीजों को पकड़ नहीं पा रहे हैं। शैलेश नीतिन त्रिवेदी कुछ अधिक सीनियर हो जा रहे थे तो अभी वाले एकदम नये। भूपेश के लिए वही पुरानी दिक्कतें हैं। टीम भूपेश को ठीक करना होगा।

मुदित का छक्का

कुछ अफसर किस्मत लिखवा कर लाते हैं। बात हो रही है एडिशनल पीसीसीएफ मुदित कुमार की। पिछले सात साल से वे लैंड मैनेजमेंट देख रहे हैं। लैंड मैनेजमेंट बोले तो पूरे प्रदेश की माइनिंग से लेकर इंडस्ट्रीज तक में सीधे दखल। माइनिंग और उद्योग लॉबी उनकी परिक्रमा करती है। पता चला है, मुदित कुमार अब फॉरेस्ट के देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान इंडियन कौंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन देहरादून के डायरेक्ट जनरल बन सकते हैं। पेनल में उनका नाम आ गया है। और, सबसे दमदार कंडिडेट भी वही हैं। मुदित कुमार मध्यप्रदेश के समय तब के सीएम दिग्विजय सिंह के भी काफी क्लोज थे। और, सात साल से लैंड मैनेजमेंट देख रहे हैं तो कुछ तो बात होगी ही।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या अरबन डेवलपमेंट अथारिटी का फर्स्ट चेयरमैन कोई आईएफएस बनेगा?
2. छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के किस नेता का मन कांग्रेस में लौटने के लिए मचल रहा है?

नौकरशाहों पर लटकी तलवार


22 जनवरी
संजय दीक्षित
दो आईपीएस और एक आईएएस के फोर्सली रिटायरमेंट के बाद खबर है भारत सरकार देश के 14 और दागदार नौकरशाहों को रिटायर करने की तैयारी में है। इनमें दो आईपीएस, पांच आईएएस और सात आईएफएस हैं। आईपीएस के लिए राहत की बात होगी कि इन दो में से छत्तीसगढ़ से कोई नहीं है। लेकिन, आईएएस में तीन हैं। दो तो प्रिंसिपल सिकरेट्री हैं। आईएफएस में भी छत्तीसगढ़ से दो अफसर हैं। इन दो में से एक तो 25 साल से डीएफओ हैं। खराब सर्विस रिकार्ड के चलते उनका प्रमोशन नहीं हो पाया। हायर सूत्रों की मानें तो डीओपीटी और एमएचए ने पीएमओ को 14 अफसरों की सूची सौंपी थी। मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ अफसरों की रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं हुए। लिहाजा, पीएमओ ने डीओपीटी और एमएचए से और डिटेल मांगा है। कुल मिलाकर 2017 नौकरशाहों के लिए डरावना रहेगा।

जारी रहेगी डीई

92 बैच के आईपीएस राजकुमार देवांगन को भारत सरकार ने खराब परफारमेंस के कारण नौकरी से छुट्टी कर दी। मगर इसका ये मतलब नहीं कि उनके खिलाफ चार्ज खतम हो गए। राजकुमार के खिलाफ विभागीय जांच जारी रहेगी। 99 में बाराद्वार डकैती हुई थी। 17 साल से इसकी जांच चल रही है। फिलहाल, डीजी जेल एवं होम गार्ड गिरधारी नायक राजकुमार की डीई कर रहे हैं। नायक ने अगर आरोप साबित कर दिए तो राजकुमार के खिलाफ राज्य सरकार को कार्रवाई करने का पूरा अधिकार होगां। इसमें पेंशन रोकने से लेकर एफआईआर दर्ज कराने तक।

ट्राईबल कार्ड

रेवन्यू सिकरेट्री केएम पिस्दा को सरकार ने पीएससी का चेयरमैन बनाकर एक तीर से कई निशाने लगाए हैं। पहला, पिस्दा हल्बा आदिवासी हैं। यह तबका कुछ कारणों से सरकार से संतुष्ट नहीं था। सो, पिस्दा की ताजपोशी कर सरकार ने हल्बा समुदाय को साधने का प्रयास किया है। याद होगा, आदिवासी वर्ग को संतुष्ट करने के लिए ही सरकार ने 2013 के विधानसभा चुनाव से एक साल पहिले 2012 में सरजियस मिंज को मुख्य सूचना आयुक्त बनाया था। सरकार ने फिर आदिवासी कार्ड खेला है। दूसरा, दीगर राज्यों की तुलना में प्रमोटी आईएएस को हांसिये पर रखने से वे भी सरकार से खफा हैं। पहले 27 जिलों में से बारह-तेरह प्रमोटी कलेक्टर होते थे। अभी सिर्फ पांच हैं। प्रमोटी आईएएस की ऐसी दुर्गति देश के किसी और राज्यों में नहीं है। यूपी, पंजाब में तो प्रमोटी का ही दबदबा है। इलाहाबाद, वाराणसी जैसे जिलों के कलेक्टर, एसपी प्रमोटी हैं। पिस्दा के अपाइंटमेंट से प्रमोटी को मरहम लगा है। तीसरा, पीएससी के लिए पिस्दा सूटेबल भी थे। आरएस विश्वकर्मा ने पीएससी की जो साख बनाया, उसे मेंटेन करने के लिए साफ-सुथरी छबि के अफसर की जरूरत थी। याने एक पंथ, कई काज।

दंगल का असर?

खेल विभाग पर अबकी सरकार ने जमकर दरियादिली दिखाई। मंत्री और सिकरेट्री ने जो मांगा, वह तथास्तु हो गया। ढाई करोड़ की लागत से रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, राजनांदगांव, सरगुजा और जगदलपुर में स्पोर्ट्स कांप्लेक्स। रायपुर मे तीन, राजनांदगांव में दो। इसके अलावा छोटे कस्बो एवं ब्लाकों में 31 मिनी स्टेडियम। यह नया कांसेप्ट होगा…..छोटी जगहों में हाईटेक स्टेडियम। ग्रामीण इलाके के टेलेंट को निखारने की दिशा में सरकार की एक बड़ी पहल होगी। एक पर 30 करोड़ रुपए खर्च होंगे। सरकार कुछ दिन पहले आमिर खान की दंगल फिल्म देखने गई थी। कहीं उसका तो असर नहीं है ये।

सिंह इज किंग?

पीसीसीएफ बीएल शरण 10 महीने की पारी खेलकर 31 जनवरी को रिटायर हो जाएंगे। उनके बाद सीनियरटी में आरके टम्टा आते हैं। टम्टा का रिटायरमेंट नवंबर में है। उन्हें अगर वन विभाग की कमान मिलती है तो 10 महीने का उनका कार्यकाल होगा। लेकिन, यह तभी होगा, जब सलेक्शन के लिए सीनियरटी ही मापदंड हो। वरना, पीसीसीएफ आरके सिंह को भी पीसीसीएफ का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। सिंह का रिटायरमेंट अक्टूबर 18 है। उनके लिए यह प्लस है। वे अगर पीसीसीएफ बनते हैं तो पौने दो साल इस पोस्ट पर रहेंगे। एकेडमिक प्रोफाइल भी उनका स्ट्रांग हैं। लंबे समय तक अमेरिका में वर्क किए हैं। भारत सरकार में भी कई अहम प्रोजेक्ट पर काम करने का उन्हें तजुर्बा है। मध्यप्रदेश में वर्ल्ड बैंक के प्रोजेक्ट के लिए उन्हें आज भी जाना जाता है। फॉरेस्ट में होने के बाद भी छबि ईमानदार की है। सरकार ने अगर टेन्योर और पारफारमेंस को मापदंड बनाया तो सिंह इज किंग…..हो सकता है।

कुजूर का रिकार्ड

छत्तीसगढ़ में चुनाव कराने का रिकार्ड अभी तक एडिशनल चीफ सिकरेट्री सुनील कुजूर के नाम है। पिछले आठ साल में उनकी 11 बार चुनाव ड्यूटी लगी। एकाध साल में आलोक अवस्थी उनके रिकार्ड को ध्वस्त कर सकते हैं। भारत निर्वाचन आयोग ने आलोक को अबकी अमृतसर को आब्जर्बर बनाया है। यह उनका नौंवा चुनाव होगा। याने कूजूर से सिर्फ दो पीछे। हालांकि, आलोक का रिकार्ड भी बहुत लंबे समय तक नहीं चलने वाला। भूवनेश यादव तेजी से उनका पीछा कर रहे हैं। पिछले तीन-चार साल में ऐसा कोई भी चुनाव नहीं रहा, जिसमें उनकी ड्यूटी न लगी हो।

अप्रैल में पहली लिस्ट

जोगी कांग्रेस सबसे आगे निकलते हुए इस साल अप्रैल में उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर देगी। 2018 के विधानसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों को पर्याप्त मौका मिल सकें, इसलिए पार्टी यह कदम उठाने जा रही है। पहली सूची में जोगी के साथ कांग्रेस छोड़ने वाले लगभग सभी नेताओं के नाम होंगे। जोगी ने कुछ खास मीडियाकर्मियों से मुलाकात में इसके संकेत दिए।

जोगी का नया शगूफा

मीडिया में बनें रहने का गुर कोई सीखे तो अजीत जोगी से सीखे। हाल में उन्होंने यह बयान देकर सबको चौंका दिया कि उनकी सरकार आई तो राजधानी उठाकर बस्तर ले जाएंगे। जाहिर है, मीडिया में इसको स्पेश मिलना ही था। मगर इसे सियासी शगूफा से ज्यादा कुछ समझना नादानी होगी। क्योंकि, जोगी दूरदर्शी नेता हैं, जिन्होंने सीएम रहने के दौरान बिलासपुर में हाईकोर्ट होने के बाद भी वहां लॉ यूनिवर्सिटी खोलने की तरफदारी नहीं की। जबकि, वो खुद बिलसपुरिया हैं। वजह? रायपुर कैपिटल होने के साथ ही हवाई सुविधाओं से जुड़ा है। बात सही भी है। तो भला बस्तर में राजधानी कैसे संभव हो सकती है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. बजट पूर्व सीएम द्वारा किए विभागों के रिव्यू में एसीएस बैजेंद्र कुमार सभी विभागों की बैठकों में मोर्चा संभाले रहे। सरकार उन्हें किसी खास भूमिका के लिए तैयार तो नहीं कर रही है?
2. पीडब्लूडी में बदलाव के बाद मंत्री राजेश मूणत इंजीनियरों की बैठक में बड़े गुस्से में दिखे। इससे वे क्या मैसेज देना चाहते हैं?

शनिवार, 14 जनवरी 2017

तुक्का में छक्का या….


15 जनवरी
संजय दीक्षित
आखिरी 15 ओवर में चौका मारने की बात करते-करते सरकार ने लांग ऑन पर छक्का जड़ दिया। शॉट भी ऐसा कि बॉल बाउंड्री से बाहर चली गई। एकबारगी तो किसी को यकीं नहीं हुआ…..आईजी की नौकरी इस तरह जा सकती है….। आईपीएस लॉबी हतप्रभ रह गई…..नायक साब डीई कंप्लीट किए नहीं तो कार्रवाई कैसे हो गई। फिर, अफसरों को याद आया…. एक्स सीएस सुनिल कुमार ने दागी अफसरों की लिस्ट तैयार कराई थी। सबने मान लिया कि उनकी रिपोर्ट पर ही एक्शन हुआ है। लिहाजा, घंटे भर सुनिल कुमार चर्चा के केंद्र बिन्दु रहे। बाद में, एमएचए के आर्डर को ध्यान से पढ़ा गया तो नीचे चीफ सिकरेट्री दफ्तर से गए दो लेटर का हवाला था। इसे जानकर ब्यूरोक्रेसी सन्न रह गई! हालांकि, अभी तक ये रहस्य बना हुआ है कि छक्का तुक्का में पड़ गया या निशाने पर वार किया गया। रहस्य यह भी है कि एमएचए में 5 जनवरी को आर्डर हुआ था और सेम डे उसे फैक्स कर दिया था। फिर, 11 जनवरी तक इसे दबाया किसने? फिर, कलेक्टर, एसपी कांफ्रेंस के अगले दिन को क्यों चुना गया इसका खुलासा करने के लिए? लोगों को इस पर से पर्दा उठने का इंतजार है।

माटी पुत्र ही क्यों?

लगता है, माटी पुत्रों के दिन ठीक नहीं चल रहे हैं। पहले आईएएस डा0 आलोक शुक्ला एवं अनिल टुटेजा निबटे। और अब राजकुमार देवांगन। तीनों खांटी छत्तीसगढ़ियां। शुक्ला भिलाई के। टुटेजा बिलसपुरिया और देवांगन जांजगीर से। तीनों के ही कैरियर खतम हो गए। और, क्लास यह कि तीनों को निबटाने वाले भी माटी पुत्र ही हैं। कांग्रेस के जो नेता शुक्ला और टुटेजा के खिलाफ सड़क से लेकर विधानसभा में हल्ला बोले, वे भी माटी पुत्र ही थे। याने माटी पुत्र ही एक दूसरे को निबटा रहे हैं।

खुदा नहीं….

राजकुमार देवांगन के खिलाफ कार्रवाई से आईपीएस ही नहीं आईएएस, आईएफएस समेत ऑल इंडिया सर्विसज के अफसरों को तेज झटका लगा है। अभी तक किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि सीएस के एक पत्र पर आईपीएस की नौकरी जा सकती है। लेकिन, देवांगन एपीसोड के बाद नौकरशाहों को भी लगने लगा है, वे अब खुदा नहीं रहे। भारत सरकार चार लाइन का आर्डर निकाल दें तो अदालत से भी राहत नहीं मिलेगी।

कलेक्टर आगे, सिकरेट्री पीछे

कलेक्टर, एसपी कांफ्रेंस में इस बार फिर सीटिंग व्यवस्था में जीएडी ने फिर चूक कर दी। कलेक्टरों को आगे बिठाया और सिकरेट्रीज को पीछे। एसीएस टू सीएम बैजेंद्र कुमार कांफ्रेंस हॉल में पहुंचे तो देखे कि सिकरेट्रीज मुंह लटकाए हुए बैठे हैं और कलेक्टर पसरकर कर आगे की कुर्सी पर। उन्होंने फौरन इसे ठीक कराया। आगे के रो में सिकरेट्रीज भी एडजस्ट किए गए। बैजेंद्र आईएएस एसोसियेशन के प्रेसिडेंट हैं तो अपने अफसरों के स्वाभिमान के लिए इतना तो बनता ही है।

फिर चूके चौहान

चिप्स सीईओ अलेक्स पाल मेनन दूसरी बार सीएम के साथ प्लेन में सफर करने से छूट गए। दरअसल, बंगलोर में इंवेस्टर्स मीट समाप्त होने के बाद सीएम का काफिला जब रायपुर आने के लिए एयरपोर्ट रवाना हुआ, तो सिक्यूरिटी टाईट होने के कारण अलेक्स की गाड़ी सीएम के कारकेट में शामिल नहीं हो पाई। जबकि, एसीएस टू सीएम बैजेंद्र कुमार, एमडी सीएसआईडीसी सुनील मिश्रा सीएम के साथ एयरपोर्ट पहुंच गए। अलेक्स कूदते-फांदते जब एयरपोर्ट पहुंचे, सीएम रायपुर के लिए उड़ चुके थे। अलेक्स को दूसरे प्लेन से रायपुर लौटना पड़ा। इससे पहिले सीएम के अमेरिका विजिट के दौरान ऐन मौके पर अलेक्स का वीजा क्लियर नहीं हुआ। चार दिन दिल्ली में रहकर वीजा बनवाया। फिर वे अकेले यूएस गए।

छोटे जिले, बड़े काम

कलेक्टरों की रैंकिंग में छोटे जिलों ने अपेक्षाकृत उम्दा प्रदर्शन किया। मुंगेली, धमतरी में तो होड़ लगी रही पहले नम्बर पर आने के लिए। गरियाबंद, कवर्धा, जशपुर, महासमुंद…..सबको किसी ने किसी योजना में शाबासी मिली। बड़े जिलों में अंडर फाइव में राजनांदगांव, दुर्ग और रायगढ़ ही आ पाए। हालांकि, तीन योजनाओं में राजनांदगांव अंडर फाइव रहा। तीन ब्लाक का मुुंगेली ओडीएफ में तो आगे था ही धान उठाव में सभी को पीछे छोड़ दिया।

भीम को झटका

कलेक्टर कांफ्रेंस में सबसे अधिक किसी को झटका लगा तो वे हैं सरगुजा कलेक्टर भीम सिंह। सरगुजा गए उन्हें ज्यादा दिन नहीं हुए हैं इसलिए वहां से उन्हेंं बहुत अधिक उम्मीदें थीं भी नहीं। अलबत्ता, धमतरी जिले में वे सबसे ज्यादा काम किए….उन्हें ब्रेन हैम्ब्रेज हुआ। उसकी वाहवाही कोई और लूट ले गया। जाहिर है, तकलीफ तो होगी ही।

चुनावी ड्यूटी में फंस गए

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव ड्यूटी में अविनाश चंपावत, शिखा राजपूत और सारांश मित्तर की भी ड्यूटी लग गई है। प्रमोटी आईएएस पीएस एलमा, रमेश शर्मा और धर्मेंद साहू के ट्रेनिंग में होने के कारण वे चुनावी ड्यूटी से बच गए। चलिये, प्रमोटी आईएएस का दिल ठंडा हुआ होगा। वरना, जीएडी ने हाईप्रोफाइल वाले दो-एक को छोड़कर सबको चुनाव में झोंक दिया था। अब डायरेक्ट वाले पांच हो गए। भुवनेश यादव और यशवंत कुमार के नाम पहले से शामिल है। भुवनेश के साथ जीएडी वैसे भी ज्यादती कर रहा है। किसी भी राज्य में चुनाव हो, भुवनेश का नाम पेटेंट है।

विषकन्याओं से सावधान

2018 के विधानसभा चुनाव में विषकन्याओं के रोल भी अहम होंगे। टिकिट काटवाने से लेकर टिकिट मिलने के बाद एक्सपोज करने के लिए कुछ नेता विषकन्याआेंं को तैयार कर रहे हैं। विषकन्याएं चारा फेंकेंगी, इसमें जो फंस जाएगा, वो खतम हो जाएगा। भाजपा के एक पदाधिकारी इसी चक्कर में फंसे हैं। वे रियासतदारों को टक्कर देने चले थे। चुनाव से डेढ़ साल पहले ही उनकी दावेदारी खतम कर दी गई।

अंत में दो सवाल आपसे

1. राजकुमार देवांगन के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश करने के बाद भी सरकार उसका क्रेडिट लेने में क्यों हिचकिचाई?
2. आलोक शुक्ला और अनिल टुटेजा एपीसोड नहीं होता तो राजकुमार देवांगन जैसे दागी अफसर के खिलाफ कार्रवाई होती?

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

राउत ओपनिंग बैट्समैन

8 जनवरी

संजय दीक्षित
9 एवं 10 जनवरी को होने जा रही कलेक्टर कांफ्रेंस अबकी हटके होगी। इसमें सिकरेट्री के बोर करने वाले भाषण नहीं होंगे। बल्कि, स्क्रीन पर आंकड़ों के साथ टू द प्वांट बोलना है। पहली बार सीएम सचिवालय ने कलेक्टरों के परफारमेंस के लिए चार केटेगरी तय किए हैं। बहुत अच्छा…अच्छा….. संतोषजनक…..और सुधार की जरूरत। सचिवों से कहा गया है, हर कलेक्टर को केटेगरी दें। वो भी छह से आठ मिनट में। सिकरेट्री में भी सबकी प्रेजेंटशन नहीं होगा। ओपनिंग करेंगे एमके राउत। इसके बाद रीचा शर्मा, सुबोध सिंह, अंकित आनंद, विकास शील, सुब्रत साहू, संजय शुक्ला और अलेक्स पाल मेनन। सीएम सचिवालय पिछले 10 दिन से कलेक्टर, एसपी कांफ्रेंस की तैयारी में युद्धस्तर पर जुटा हुआ है। रात 10 बजे तक काम चल रहा है। एक-एक विभाग से डेटा एकत्रित किए जा रहे हैं। सीएम सचिवालय इसको लेकर काफी सख्त है कि प्रेजेंंटेशन देने वाले सिकरेट्रीज कलेक्टरों के योजनावार रैंकिंग भी भेजे।

कलेक्टर बेचैन और सिकरेट्री भी

सीएम सचिवालय ने कांफ्रेंस की जो कसौटी तैयार की है, इसके कारण अधिकांश कलेक्टरों की आंखों से नींद उड़ गई है। दरअसल, मीटिंग में सबके सामने स्क्रीन पर कलेक्टरों का योजनावार पारफारमेंस शो किया जाएगा। बताया जाएगा….डीएम साब आप कितने पानी में हो। पता चला है, बहुत अच्छा और अच्छा वाले केटेगरी में कलेक्टरों की तादात 50 फीसदी से कम है। ऐसे में, सार्वजनिक तौर पर फजीहत होने का डर सताएगा ही। यही वजह है, कलेक्टर सचिवों से फोन कर पूछ रहे हैं, सर….मेरा रैंक बता दीजिए ताकि मैं बचाव का इंतजाम कर सकूं। रही बात सिकरेट्रीज की तो वे दो कारणों से हलाकान हैं। एक तो जिन्हें प्रेजेंटेशन देना है, उन्हें होम वर्क करना पड़ रहा है…. कलेक्टरों के रैंक तैयार करने पड़ रहे हैंं…..सीएम सचिवालय उसका परीक्षण कर रहा है। दूसरा, वे सिकरेट्रीज परेशान हैं, जिन्हें प्रेजेंटेशन के लिए चुना नहीं गया है। जाहिर है, वे आहत तो महसूस करेंगे ही।

रिपोर्ट कार्ड

रिपोर्ट कार्ड अभी तक मंत्रियों एवं विधायकों के बनते थे। वो भी चुनाव के समय। लेकिन, इस बार सीएम सचिवालय कलेक्टरों को रिपोर्ट कार्ड देगा। वह भी 9 जनवरी को कांफ्रेंस के तुरंत बाद। हालांकि, कलेक्टरों के पारफारमेंस पर चिप्स में कई महीनों से काम चल रहे थे। कांफ्र्रेंस में सिकरेट्रीज के प्रेजेंटेशन के बाद इस पर मुहर लग जाएगा कि कौन कितनी रुचि लेकर काम किया है। कांफ्रेंस हॉल में ही रिपोर्ट कार्ड देने का मतलब यह होगा कि कोई कलेक्टर यह नहीं कह सकेगा कि हमारे साथ न्याय नहीं हुआ।

डांट फिर डिनर

कलेक्टर कांफ्रेंस के बाद 9 जनवरी की शाम सीएम हाउस में डिनर होगा। इसमें एसपी, आईजी भी मौजूद रहेंगे। हालांकि, कलेक्टर्स के साथ एसपी कांफ्रेंस 10 को है, लेकिन एसपी, आईजी डिनर के लिए एक दिन पहले आ जाएंगे। 9 को सीएम कलेक्टर्स और सीईओ की क्लास लेंगे। जाहिर है, कुछ कलेक्टरों को झिड़़की मिलेगी ही। साथ में पुअर पारफारमेंस का रिपोर्ट कार्ड भी। इसके बाद डाक्टर साब उन्हें लजीज व्यंजनों की दावत देंगे। याने पहिले डांट, फिर डिनर।

प्रमोटी एवं रिजेक्टेड

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए प्रमोटी आईएएस एक बार फिर फंस गए हैं। सरकार ने 35 अफसरों के नाम भारत निर्वाचन आयोग को भेजे हैं, उनमें सिर्फ दो रेगुलर आईएएस हैं। भूवनेश यादव और यशवंत कुमार। वैसे भूवनेश का नाम तो हर लिस्ट में रहता है, उनका साथ देने के लिए अबकी सरकार ने यशवंत का नाम एड कर दिया है। इन दोनों के अलावा बाकी सभी प्रमोटी हैं। ऐसे में, प्रमोटी आईएएस में नाराजगी स्वाभाविक है। मगर इसे जाहिर कहां करें। उनकी न तो कोई लॉबी है, न एसोसियेशन। और ना ही कोई दमदार संरक्षक। उन्हें तो डायरेक्ट आईएएस के रहमोकरम पर ही काम करना है।

कमाल की बात

कामकाजी महिलाओं के लिए सेनेटरी नेपकिन मुहैया कराने की बात तो महिला बाल विकास कब से कर रहा है मगर पचायत विभाग ने इसे जमीन पर उतार दिया। नया रायपुर में चल रहे हमर छत्तीसगढ़ प्रोग्राम में सेनेटरी नेपकिन की दो स्वाचालित मशीनें लगाई गई हैं। इसमें एक रुपए का सिक्का डालने पर एक नेपकिन निकल आता है। बिल्कुल एटीएम की तरह। है ना कमाल का।

कांग्रेस को खटका

नया रायपुर के टूरिज्म भवन में हमर छत्तीसगढ़ प्रोग्राम जिस अंदाज में चल रहा है, कांग्रेस को चिंतित होना लाजिमी है। एक रुपए में सेनेटरी नेपकिन तो छोटी बात है…..गांव-गांव से आने वाले ग्राम पंचायत के नुमाइंदो को जिस तरह के ट्रिटमेंट मिल रहे हैं…..उन्हें सरकार की योजनाओं से जोड़ने का काम किया जा रहा है….मनोरंजक कार्यक्रमों के जरिये समझाया जा रहा कि छत्तीसगढ़ तेजी से डेवलप कर रहा है, वह 2018 के इलेक्शन में सत्ताधारी पार्टी के लिए मिल का पत्थर साबित होगा। अभी तक इस प्रोग्राम में 35 हजार प्रतिनिधि आ चुके हैं। और, अगले सवा साल में डेढ़ लाख के लक्ष्य हैं। याने एक लाख 85 हजार….हर गांव में पांच-सात लोग। आप समझ सकते हैं कि कितना मजबूत नेटवर्क तैयार हो रहा है सत्ताधारी पार्टी के लिए। तभी तो कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि हमर छत्तीसगढ़ का भाजपाइकरण किया जा रहा है।

मंत्री का इतिहास प्रेम

हेल्थ एन पंचायत मिनिस्टर अजय चंद्राकर छत्तीसगढ़ के इतिहास पर एक पुस्तक तैयार करवा रहे हैं। इसके लिए वे काफी दिनों से ठीक-ठाक इतिहासकार की तलाश कर रहे थे। दो-एक मिलें भी मगर सतही नॉलेज के कारण जमे नहीं। अब तलाश पूरी हो गई है। पं0 रविशंकर शुक्ल विवि के रिटायर प्रोफेसर निगम छत्तीसगढ़ के इतिहास को कंपाइल करेंगे। चंद्राकर उन्हें पूरा संसाधन मुहैया कराएंगे। बहुतों को मालूम नहीं होगा, मंत्रीजी इतिहास के स्टूडेंट रहे हैं। रविशंकर विवि से इतिहास के गोल्डमेडलिस्ट भी। इसलिए, इतना तो बनता ही है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. पीडब्लूडी मिनिस्टर राजेश मूणत इन दिनों अपने ही सरकार से कुछ दुखी क्यों हैं?
2. पीएससी का चेयरमैन इस बार कोई आईएफएस बन सकता है क्या?