रविवार, 15 सितंबर 2019

मसूरी में CM का प्रोजेक्ट

15 सितंबर 2019
भूपेश सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट नरवा, गरूवा, घुरवा और बाड़ी योजना की चर्चा आईएएस अकादमी मसूरी में हो रही है। खासकर नरवा और बाड़ी की। नए आईएएस को छत्तीसगढ़ का एग्जाम्पल देते हुए बताया जा रहा है कि ये दोनों योजनाएं देश के लिए क्यों और कितना जरूरी है। नरवा से तेजी से फॉल हो रहे वाटरलेवल को ठीक किया जा सकता है। तो बाड़ी से कुपोषण की समस्या दूर होगी। देश में एक बड़ा वर्ग आज भी भयंकर अभावों के बीच जी रहा है। पौष्टिक सब्जियां एवं फलों के रेट ऐसे महंगाई छू रहे हैं कि उसके पहुंच से बाहर है। बाड़ी में सब्जी, भाजी एवं देशी फल लगाने से पौष्टिक आहार का प्राब्लम दूर हो जाएगा। चलिये, छत्तीसगढ़ की किसी योजना की चर्चा अगर मसूरी में हो रही है तो निश्चित तौर पर वह देश के अन्य हिस्सों में भी पहुंचेगी। क्योंकि, ट्रेनिंग के बाद आईएएस अपने काडर वाले राज्यों में पहुंचेंंगे तो इसे क्रियान्वयन करने का प्रयास अवश्य करेंगे।

पोस्ट 41 और आईएएस?

छत्तीसगढ़ के आईएएस के लिए डेपुटेशन के 41 पोस्ट है। मगर गए कितने हैं, संख्या जानकार आप हैरान रह जाएंगे। इस साल सरकार ने दो को दिल्ली जाने की अनुमति दी। रीचा शर्मा पहले गइंर्। अगले हफ्ते तक सुबोध सिंह दिल्ली की फ्लाइट पकड़ लेंगे। इससे पहिले तो निधि छिब्बर को दिल्ली जाने के लिए पसीना बहाना पड़ गया था। राज्य सरकार ने पहले उन्हें एनओसी दे दिया और भारत सरकार ने जब उन्हें पोस्टिंग दे दी तो राज्य सरकार ने रिलीव करने से इंकार कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि निधि को केंद्र ने डेपुटेशन के लिए पांच साल के लिए डिबार कर दिया था। निधि कैट की शरण में गईं। तब उनका डिबार हटा और वे दिल्ली जा पाईं। अभी बैजेंद्र कुमार, वीबीआर सुब्रमणियम, अमित अग्रवाल, रीचा शर्मा, विकास शील, निघि छिब्बर, रोहित यादव, रीतू सेन, अमित कटारिया प्रतिनियुक्ति पर हैं। सुबोध सिंह जाने वाले हैं। टोटल हुए 10। याने 41 की तुलना में 25 परसेंट भी नहीं।

छत्तीसगढ़ से क्यों नहीं

अब सवाल उठते हैं, सेंट्रल डेपुटेशन पर छत्तीसगढ़ के अफसर इतने कम क्यों हैं। दरअसल, छत्तीसगढ़ काडर में दिक्कत यह है कि यहां की माटी इतनी फर्टाइल है…..आईएएस एक बार यहां आ जाते हैं तो फिर बाहर जाकर अपना नुकसान करना नहीं चाहते। सेंट्रल डेपुटेशन का मतलब होता है कैरियर बनाना। हमारे अफसर कैरियर वगैरह के फालतू चीजों में पड़ना नहीं चाहते। और, जो थोड़े-बहुत अधिकारी जाना चाहते हैं, उन्हें अनुमति नहीं मिलती। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व दिल्ली में बेहद निराशाजनक है। न कोई सिकरेट्री है, न एडिशनल सिकरेट्री। बस गिने-चुने पांच ज्वाइंट सिकरेट्री। दूसरे राज्यों के सिकरेट्री के साथ ही डेपुटेशन वाले अफसरों का भारत सरकार में जमावड़ा रहता है। इसलिए, उन राज्यों को केंद्रीय योजनाओं में उसी हिसाब से लाभ भी मिलता है। आखिर, कोई भी अफसर अपने राज्य का खयाल तो रखेगा ही।

बैंक और आईएएस-1

राज्य सरकार आईएएस और बैंकों के बीच क्या रिश्ता है, इसकी पड़ताल करने पर विचार कर रही है। सरकार को पता चला है कि अफसर अपने निहित स्वार्थों के चलते बैंकों पर कुछ ज्यादा ही दरियादिली दिखा रहे हैं। सरकारी योजना में पैसा आया नहीं कि बैंक वाले अपने यहां जमा कराने अफसरों के आगे-पीछे मंडराने लगते हैं। ये राशि 50 करोड़ से लेकर हजार करोड़ तक होती है। जाहिर है, इस एमाउंट से किसी भी बैंक की लाटरी निकल आएगी। लेकिन, ताली एक हाथ से थोड़े ही बजती है। अफसरों के पुराने रायपुर से लेकर नए रायपुर में जितने मकान हैं, सभी में बैंक खुल गए हैं। ऐसे-ऐसे बैंक, जिसका आप नाम भी नहीं सुने होंगे। जहां 25 हजार किराया मिलना चाहिए, वहां बैंक वाले 80 हजार से लेकर एक लाख तक चूका रहे हैं। अब इसे किराया चुकाना माने या अफसरों का एहसान। मगर सरकार की नोटिस में ये बात आ गई है। इसलिए, किसी भी दिन मामला बिगड़ सकता है।

बैंक और आईएएस-2

एक सीनियर आईएएस का अपना यहां कोई मकान नहीं था। फिर बैंकों को किराये के लिए कैसे कहें। इसलिए, उन्होंने रास्ता निकाला था सीधे-सीधे कमीशन का। उनके साथ एक बार दिलचस्प वाकया हुआ। एक बोर्ड के चेयरमैन रहते उन्होंने एक सरकारी बैंक में करीब 70 करोड़ रुपया जमा कराया था। कोई आईएएस इतना मोटा रोकड़ा जमा कराएगा तो जाहिर है, वह अपने बाल-बच्चों के लिए भी सोचेगा ही। उन्होंने बैंक मैनेजर पर प्रेशर बनाकर ज्वाइंट एकाउंट मद में जमा 8 करोड़ रुपए निकाल लिए। और खर्चा बता दिया। वह आडिट वाली राशि नहीं थी। जबकि, कायदे से चेयरमैन और सिकरेट्री के दस्तखत से ही पैसे निकल सकते थे। बाद में केडीपी राव और अनिल राय ने हल्ला मचाया तो दो साल बाद विभागीय जांच शुरू हुई। तब तक वे रिटायर होकर निकल लिए। जांच अभी चल रही है। जैसा की नौकरशाही में होता है। सब भाई-भाई। एक को भी पकड़ाना नहीं चाहिए। और, वैसा ही हुआ।

एसआइटी को बल

नान घोटाले में प्रमुख आरोपी शिवशंकर भट्ट के शपथ पत्र से और कुछ हो या नहीं मगर नान के लिए गठित एसआइटी को ताकत मिल गई है। अब एसआइटी के अफसर दमदारी से कह सकेंगे कि मामला बड़ी राशि का है और हाईप्रोफाइल लोग भी इनवाल्व हैं, इसलिए उसकी जांच आवश्यक है।

पवनदेव की पोस्टिंग

पुलिस महकमे में लंबे समय से हांसिये पर चल रहे एडीजी पवनदेव का लगता है भाग्य योग प्रबल होने वाला है। उन्हें जल्द ही कोई ठीक-ठाक पोस्टिंग मिल सकती है। दंतेवाड़ा बाइ इलेक्शन के बाद पुलिस महकमे में चेंजेस होने वाले हैं। इसमें पवन को कुछ ठीक-ठाक मिलने की अटकलें लगाई जा रही है। नई सरकार ने जब शपथ ली थी, तब उन्हें एसीबी और ईओडब्लू मिलने की चर्चा थी। लोग बोल रहे थे, बस आदेश निकलने ही वाला है। लेकिन, अचानक एसआरपी कल्लूरी का आर्डर हो गया था। फिलहाल, पवनदेव के पास कहने के लिए तीन-तीन पोस्टिंग है। लेकिन, इसमें से ढंग की एक भी नहीं।

राइट च्वाइस

छत्तीसगढ़ बनने के बाद हायर एजुकेशन डिपार्टमेंट कभी किसी के प्रायरिटी में नहीं रहा। यही वजह है कि हर छह महीने, साल भर में सिकरेट्री बदलते रहे। एजेवी प्रसाद, एमके राउत और बीएल अग्रवाल ही ऐसे सचिव हुए, जो डेड़ साल से अधिक समय तक इस विभाग में रह पाए। अब सोनमणि बोरा को नया सिकरेट्री अपाइंट किया गया है। सोनमणि अमेरिका से मैनेजमेंट कोर्स करके लौटे हैं। फिर, गुरू घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर के रजिस्ट्रार भी रह चुके हैं। याने विश्वविद्यालयों के फंक्शनिंग के बारे में उन्हें बखूबी पता होगा। ठीक है, यूनिवर्सिटी आटोनॉमस बॉडी होती है लेकिन, कुलपति और रजिस्ट्रार कम-से-कम उन्हें मिसगाइड तो नही कर पाएंगे। इसे सरकार का राइट च्वाइस कह सकते हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. नगरीय प्रशासन चुनाव के बाद क्या किसी मंत्री को रिप्लेस किया जा सकता है?
2. एसएस बड़गैया बिलासपुर के सीएफ बनते-बनते रायपुर के सीएफ कैसे बन गए?

शनिवार, 7 सितंबर 2019

जीएडी का यूनिक रुल?

8 सितंबर 2019
डेपुटेशन या स्टडी टूर से लौटने वाले नौकरशाहों के लिए लगता है, सामान्य प्रशासन विभाग ने नियम बना दिया है कि शुरू में एकाध महीने लटकाया जाएगा। बीजेपी गवनर्मेंट में भी ऐसा ही होता था। अमित अग्रवाल, अमिताभ जैन को महीना भर से अधिक बिना विभाग का रखा गया। सीके खेतान को भी कई दिन बाद पोस्टिंग मिली थी, वह भी प्रशासन अकादमी में। पीएस टू सीएम गौरव द्विवेदी भी इस पीड़ादायक दौर से गुजर चुके हैं। आज भले ही वे अहम विभाग संभाल रहे हों, मगर दिल्ली से लौटने पर उन्हें भी एक महीने तक आईएएस मेस में पोस्टिंग के लिए बाट जोहना पड़ा था। मुकेश बंसल जरूर इसमें अपवाद रहे। वरना, सोनमणि बोरा को भी पोस्टिंग के लिए पूरे एक महीने वेट करना पड़ा। सोनमणि 8 अगस्त को मंत्रालय में ज्वाईनिंग दी थी और सात सितंबर को उनका आदेश निकला। ग्रेट….।

अमरजीत का कद

भूपेश सरकार के सबसे जूनियर मंत्री अमरजीत भगत धीरे-धीरे बेहद ताकतवर होते जा रहे हैं। सरगुजा इलाके में उनका प्रभाव तो बढ़ ही रहा है, सरकार के भीतर भी उनकी हाइट बढ़ रही है। आलम यह है कि अमरजीत के फोन पर अब दीगर विभागों के अधिकारी सस्पेंड हो जा रहे। 6 सितंबर को चक्रधर समारोह में हिस्सा लेने सरगुजा से रायगढ़ जा रहे मंत्रीजी को सड़क खराब होने से काफी हिचखोले खाने पड़ गए। नाराज होकर मंत्री ने कार में बैठे-बैठे पीडब्लूडी सिकरेट्री को फोन लगा दिया। और, चंद मिनटों में कार्यपालन अभियंता सस्पेंड हो गए। आमतौर पर ऐसा होता नहीं। कोई मंत्री अगर दूसरे विभाग के किसी अफसर के खिलाफ कार्रवाई के लिए रिकमंड करता है तो नोटशीट घूमने में एक-दो दिन का वक्त लग ही जाता है। लेकिन, मामला अमरजीत का था। सो, अफसरों ने वक्त जाया नहीं किया।

भूपेश का रिकार्ड

अमरजीत भगत ने तो फोन करके दूसरे विभाग के ईई को सस्पेंड कराया। छत्तीसगढ़ बनने के बाद एक बार ऐसा हुआ है कि एक मंत्री ने दीगर विभाग के एक साथ 13 इंजीनियरों को खुद सस्पेंड कर दिया था। वे मंत्री थे, आज के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल। अजीत जोगी सरकार में भूपेश रेवन्यू मिनिस्टर थे। 2002 में विधानसभा में सूखा राहत में घपले को लेकर बड़ा बवाल हुआ था। सिंचाई विभाग के अफसरों ने तब राहत कार्यों में घोटालों के कई नए कीर्तिमान गढ़ डाले थे। राजस्व मंत्री भूपेश बघेल ने इस पर दम दिखाते हुए सदन में ही सिंचाई विभाग के 13 इंजीनियरों को सस्पेंड करने का ऐलान कर दिया था।

कलेक्टरों में निरंकुशता?

छत्तीसगढ़ में कलेक्टरों को पहले जिस तरह योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर ताकीद किया जाता था, उस टाईप का इन दिनों कुछ हो नहीं रहा। सरकार से जुड़े लोग भी मान रहे हैं कि कलेक्टर्स फुल मजे में हैं। न कोई बोलने वाला है, न कोई टोकने वाला। कुछ को छोड़े दें तो ज्यादातर कलेक्टर सिर्फ गोठानों पर काम कर रहे हैं। बाकी कुछ नहीं। सीएम की अपनी सीमा है। कलेक्टरों का डेली मानिटरिंग करना सरकार के मुखिया का काम भी नहीं है। जाहिर है, कलेक्टर जिले में सरकार के प्रतिनिधि होते हैं। वे ही अगर निष्क्रिय हो जाएंगे तो निश्चित तौर पर सरकार के परफारमेंस पर असर पड़ेगा।

अफसर छत्तीसगढ़िया मगर…

छत्तीसगढ़ में पता नहीं ऐसा क्या हुआ है कि माटी पुत्र ही एक-दूसरे को निबटा रहे हैं। इसमें एक नया नाम जुड़ गया है ज्वाइंट कलेक्टर संतोष देवांगन का। बलौदा बाजार के अपर कलेक्टर रहने के दौरान जमीन के एक मामले में एसीबी ने उन्हें गिरफ्तार किया था। बाद में सरकार ने उन्हें बर्खास्त कर दिया। बिलासपुर हाईकोर्ट ने संतोष को बाईज्जत बरी कर दिया है। संतोष ने हाईकोर्ट के फैसले की कॉपी लगाते हुए जीएडी से आग्रह किया कि उन्हें बहाल किया जाए। लेकिन, जीएडी सिकरेट्री ने पांच दिन तक उनके आवेदन को अपने पास रखने के बाद इस नोट के साथ एसीबी को भेज दिया कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद अपील की जा सकती है कि नहीं, वे परीक्षण कर बताएं। एसीबी ने 25 दिन तक आवेदन को अपने पास रखने के बाद महाधिवक्ता को लीगल सलाह के लिए भेजा। महाधिवक्ता कार्यालय ने 20 दिन बाद एसीबी को रिप्लाई किया कि इसमें अपील की संभावना न्यूनतम है। वो भी सुप्रीम कोर्ट में होगी। एसीबी में 15 दिन से यह फाइल पड़ी है। याने 65 दिन यूं ही निकल गए। जबकि, जीएडी सिकरेट्री रीता शांडिल्य छत्तीसगढ़ियां हैं…संभवतः बेमेतरा की। संतोष भी चांपा के बाशिंदा हैं। उनके साथ ही माईनिंग अधिकारी बीएल बंजारे को भी हाईकोर्ट ने बरी किया था। बंजारे को बहाल हुए डेढ़ महीने हो चुके हैं। जीएडी सिकरेट्री अगर चाहतीं तो हाईकार्ट के आदेश के बेस पर संतोष की ज्वाईनिंग करा सकती थीं। लेकिन, उन्होंने एसीबी को भेज दिया। बस, वही माटी पुत्र एक-दूसरे को…..।

ढेर जोगिया, मठ के उजाड़

ट्रांसपोर्ट विभाग में पहली बार तीन आईपीएस, दो आईएएस अफसर एसोसियेट हैं। एसआरपी कल्लूरी वहां एडिशनल ट्रांसपोर्ट कमिश्नर हैं। डी रविशंकर ज्वाइंट कमिश्नर। और, अरुणदेव गौतम सिकरेट्री। ये तीनो आईपीएस हैं। मंत्रालय में मनोज पिंगुआ प्रिंसिपल सिकरेट्री और ट्रांसपोर्ट कमिश्नर हैं। विजय धुर्वे ज्वाइंट सिकरेट्री। हालांकि, पहले ऐसा कभी नहीं रहा। राज्य बनने के बाद हमेश एक आईपीएस एडिशनल कमिश्नर होते थे। वो भी जूनियर आईजी लेवल के। और, मंत्रालय में एक आईएएस ट्रांसपोर्ट कमिश्नर। सिकरेट्री होम के पास ही यह चार्ज होता था। लेकिन, जिस तरह ढेर जोगी से मठ उजाड़ हो जाता है, उसी तरह ट्रांसपोर्ट में भी अब मामला गडबड़ा रहा है। सरकार कुछ खुश नहीं है। आने वाले दिनों में कुछ अफसरों के पर कतर दिए जाएं या उन्हें चेंज कर दिया जाए, तो आश्चर्य नहीं।

ऐसे सलाहकार

सीएम के सलाहकार प्रदीप शर्मा के बिलासपुर स्थित घर में चोरों ने धावा बोला। जाहिर है, चोरों को उम्मीद होगी कि सरकार के एडवाइजर हैं तो कुछ अच्छा ही मिलेगा। मगर उनके हाथ कुछ लगा नहीं। चोर निराश होकर लौट गए। सोशल मीडिया में इस पर लोगों ने खूब चुटकी ली। कई लोगों ने लिखा, चोरों ने जल्दीबाजी कर दी। अभी छह, आठ महीने ही तो हुए हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस पुलिस रेंज के आईजी द्वारा तबाही मचा देने से सरकार भी उन्हें पोस्टिंग देकर अफसोस कर रही है?
2. रिटायर आईपीएस गिरधारी नायक की पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग की प्रतीक्षा कब खतम होगी?

रविवार, 1 सितंबर 2019

डिप्रेशन में पूर्व मंत्री

1 सितंबर 2019
डेढ़ दशक तक सत्ता सुख भोग चुके बीजेपी के कुछ मंत्रियों की स्थिति बेहद खराब होती जा रही है। खबर है, एक पूर्व मंत्रीजी डिप्रेशन में चले गए हैं। परिवार के लोग लगातार बिगड़ रही उनकी स्थिति से बेहद परेशान है। इलाज के लिए मुंबई के किसी डाक्टर से टाईम लेने का प्रयास किया जा रहा है। रमन मंत्रिमंडल में 12 मंत्री थे। इनमें से तीन चुनाव जीत पाए। बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर और पुन्नूलाल मोहले। हालांकि, कुछ पूर्व मंत्रियों ने अपने को पढ़ने-लिखने या फिर संगठन के काम में इंगेज कर लिया है। अमर अग्रवाल और अजय चंद्राकर को नगरीय और संगठन चुनाव की अहम जिम्मेदारी मिल गई है। इससे दोनों के घर पर मिलने-जुलने वालों की संख्या बढ़ने लगी है। एक आदिवासी मंत्री हैदराबाद में अपने अ-सरदार मित्रों के साथ कारोबार चालू कर दिए हैं। लिहाजा, हैदराबाद का उनका महीने में तीन-चार चक्कर लग जाता है। लेकिन, बाकी पूर्व मंत्रियों की स्थिति ठीक नहीं है….बेचारों के पास सुविधाओं के नाम पर सब कुछ है लेकिन हाथ जोड़े खड़ी पब्लिक नहीं है, जिसे देखकर वे कभी मुंह फेर लेते थे।

बदलेंगे प्रभारी मंत्री

दंतेवाड़ा के प्रभारी मंत्री जयसिंह का प्रभार जिला बदल सकता है। वे हरेली में दंतेवाड़़ा नहीं जा पाए थे और न ही स्वतंत्रता दिवस पर परेड में शामिल हुए। जय सिंह की अनुपस्थिति में सरकार ने दोनों कार्यक्रमों में मनोज मंडावी को अतिथि बनाया था। अब अमरजीत भगत बारहवें मंत्री के रूप में कामकाज संभाल लिए हैं। लिहाजा, उन्हें भी जिला का प्रभार दिया ही जाएगा। समझा जाता है, प्रभार वाले जिलों का एक बार फिर पुनर्गठन करके अमरजीत को एडजस्ट किया जाएगा। उसी में जय सिंह को किसी जिले का प्रभार दिया जा सकता है।

आईपीएस आगे

बाकी मामलों में भले ही आईएएस आगे रहते होंगे, लेकिन छत्तीसगढ़ में जिला संभालने के मामले में आईपीएस आगे निकल गए हैं। सूबे में 2014 बैच के आईपीएस पुलिस अधीक्षक बन गए हैं। मगर कलेक्टर बनने में अभी आईएएस का 2011 बैच ही कंप्लीट हुआ है। 2012 बैच का कुछ दिनों पहिले ही खाता खुला है। रजत बंसल इस बैच के पहिले आईएएस हैं, जिन्हें कलेक्टर बनने का मौका मिला। वे धमतरी के कलेक्टर हैं। दरअसल, राज्य में आईपीएस कम आ रहे हैं। इसलिए, उन्हें चार साल में जिले की कमान मिल जा रही। आईएएस में ऐसी बात नहीं है। 2005 बैच से हर साल पांच से छह आईएएस छत्तीसगढ़ को मिल रहे हैं। इससे कलेक्टरी में कंपीटिशन टफ होता जा रहा है।

नए जिले में OSD

छत्तीसगढ़ का नया जिला पेंड्रा-गौरेला के लिए जल्द ही नोटिफिकेशन जारी होने वाला है। नोटिफिकेशन के बाद किसी आईएएस को वहां विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी याने ओएसडी नियुक्ति किया जाएगा। ओएसडी नवगठित जिले की तमाम औपचारिकताएं पूरी कराएंगे। इसमें जिले स्तर के कार्यालय, अफसरों के आवास समेत जिले की सीमा का निर्धारण भी शामिल होगा। लगभग छह महीने का यह प्रासेज होता है। इसके बाद फिर विधिवत रूप से नए जिले का आगाज होगा। वैसे, आमतौर पर ओएसडी को ही संबंधित जिले का कलेक्टर अपाइंट कर दिया जाता है। पिछली सरकार ने लास्ट में छह नए जिले बनाई थी, उसमें भी छह महीने का वक्त लग गया था। 15 अगस्त को तत्कालीन सीएम रमन सिंह ने ऐलान किया था। और, अगले जनवरी में नए जिलों में कामकाज प्रारंभ हो पाया था। इस बार सरकार चाहती है राज्योत्सव के दिन याने एक नवंबर को पेंड्रा-गौरेला-मरवाही के लोगों को नए जिले की सौगात मिल जाए। अगर ऐसा है, तो सरकार को ठीक-ठाक आईएएस को ओएसडी अपाइंट करना होगा, जो दो महीने में पूरा काम निबटा दे।

दिक्कत नहीं

नए जिले में पोस्टिंग से अफसर इसलिए घबराते हैं कि वहां बुनियादी सुविधाएं होती नहीं। कनेक्टीविटी का भी प्राब्लम रहता है। लेकिन, पेंड्रा-गौरेला में पोस्ट होने वाले कलेक्टर, एसपी समेत तमाम अफसरों को इसकी दिक्कत नहीं जाएगी। पेंड्रा रेल मार्ग पर है। वहीं, बिलासपुर के एडिशनल कलेक्टर हफ्ते में तीन दिन वहां पहले से बैठते हैं। एडिशनल एसपी का भी आफिस है। लिहाजा, बंगला, गाड़ी की दिक्कत नहींं होगी। गौरेला-पेंड्रा का मार्केट भी सूबे के करीब दस जिला मुख्यालयों से बड़ा होगा। दोनों जगहों पर व्यापारिक वर्ग की बहुतायत है। इसलिए, ओएडी बनने वाले बिना किसी टेंशन के पेंड्रा जाएं।

मंत्री की मुश्किलें

हायर एजुकेशन मिनिस्टर उमेश पटेल की नाराजगी आईएएस हिमशिखर गुप्ता पर भारी पड़ी। सरकार ने उन्हें कमिश्नर हायर एजुकेशन से हटाकर प्रशासन अकादमी भेज दिया। हिमशिखर के बाद शारदा वर्मा को नया कमिश्नर अपाइंट किया गया है। रेणु पिल्ले हायर एजुकेशन में पहिले से प्रिंसिपल सिकरेट्री हैं। दोनों महिला अफसर। रेणु नियम कायदों पर चलने वाली तेज-तर्राट आईएएस….अपनी भी नहीं सुनने वाली। शारदा वर्मा की भी फाइल और नोटशीट की लिखा-पढ़ी में जवाब नहीं है। ऐसे में, क्या होगा युवा मंत्री उमेश पटेल का। सरकार कितने बार, कितनों को हटाएगी।

अच्छी खबर

छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस एन बैजेंद्र कुमार एनएमडीसी के सीएमडी हैं। और, अब छत्तीसगढ़ में असिस्टेंट कलेक्टर, सीईओ और कलेक्टर रहे आईएएस प्रमोद अग्रवाल कोल इंडिया के चेयरमैन सलेक्ट हो गए हैं। राज्य के बंटवारे से पहले प्रमोद महासमुंद के कलेक्टर रहे। इसके बाद उनका कैडर मघ्यप्रदेश हो गया। छत्तीसगढ़ के लिए इससे अच्छी बात क्या होगी। देश की दो मिनी रत्न कंपनियों में अब छत्तीसगढ़ का दबदबा होगा। इससे निश्चित तौर पर सूबे को लाभ होगा। आखिर, बैजेंद्र कुमार यहां से जुड़े थे, इसीलिए तो नगरनार स्टील प्लांट का मुख्यालय जगदलपुर और एनएमडीसी में क्लास थ्री और फोर्थ क्लास की भरती परीक्षा दंतेवाड़ा में आयोजित करने करने का फैसला करने में देर नही लगाई। इसी तरह प्रमोद अग्रवाल से भी लोगों की उम्मीदें रहेगी ही। कोल इंडिया की सबसे बड़ी कंपनी साउथ ईस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड की 80 फीसदी से अधिक कोयला खदाने छत्तीसगढ़ में ही है। मुख्यालय भी बिलासपुर में है। एसईसीएल में रोजगार के अवसर बढ़ाने पर के लिए भी राज्य सरकार उनसे बात कर सकती है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले का मुख्यालय इन तीनों में से कहां बनेगा?
2. भूपेश बघेल सरकार के एक सीनियर मंत्री को आजकल स्वभाव के विपरीत गुस्सा क्यों आ रहा है?

रविवार, 25 अगस्त 2019

रहने को घर नहीं

25 अगस्त 2019
डीजीपी के रूप में पौने पांच साल की पारी खेलने वाले अमरनाथ उपध्याय नाम के अनुरुप पूरे भोले बाबा ही निकले। इस महीने 31 को वे रिटायर हो जाएंगे। आपको यह जानकार हैरानी होगी कि इस युग में उपध्याय जैसे अफसर भी हैं, जिन्होंने 33 बरस की आईपीएस जैसी नौकरी में अपने लिए एक छत का इंतजाम नहीं कर पाया। रिटायरमेंट के बाद सरकारी मकान में दो महीने रहने की पात्रता रहती है। दो महीने अतिरिक्त टाईम देने के लिए उन्होंने एसीएस होम सीके खेतान के यहां अर्जी लगाई है। उनके करीबी बताते हैं, हाउसिंग बोर्ड जब नौकरशाहों के लिए राजधानी के धर्मपुरा में लाखों का प्लाट कौड़ियों में दे रहा था तो उनका एंटिना काम नहीं किया। हाउसिंग बोर्ड ने कंडिशन रख दिया था कि तीन बरस में मकान बनाना होगा। तीन साल में वे मकान नहीं बनवा पाएंगे, इस डर से प्लॉट नहीं लिया। नया रायपुर में उन्होंने 2015 में एक प्लाट बुक किया था। उसमें भी एनआरडीए ने दगा दे दिया….एनआरडीए का कहना है, ब्याज समेत अपना बुकिंग एमाउंट ले लीजिए। तनखा पर गुजारा करने वाले उपध्याय तीनों बच्चों की पढ़ाई में लगे रहे। साल भर से उनके पिताजी बीमार रहे। 22 लाख प्रायवेट अस्पताल वाले ने ले लिया। दूसरा कोई आईपीएस होता तो एक तो अस्पताल वाला इतना बिल नहीं देता और देता तो वो पेमेंट करने के लिए किसी और को टिका देता। उपध्याय मध्यप्रदेश के समय तीन जिलों के एसपी रहे हैं। नक्सल प्रभावित बस्तर और सरगुजा के आईजी भी। पौने पांच साल डीजीपी रहने के दौरान प्रति वर्ष नौ करोड़ रुपए उनके पास सिक्रेट सर्विस मनी रहा, जिसका कोई आडिट नहीं होता। डीजी जिसको चाहे, बांट दें या अंदर कर ले। कई डीजीपी ने दिल्ली से लेकर चंडीगढ़ तक एसएस मनी से आलीशाल मकान खरीद डाले, लेकिन, अमरनाथ तो अमरनाथ ठहरे।

डीएम बनेंगे चेयरमैन

अमरनाथ उपध्याय के रिटायर होने के बाद 31 अगस्त की शाम से डीजीपी डीएम अवस्थी सूबे के सबसे सीनियर आईपीएस बन जाएंगे। डीएम पिछले साल दिसंबर में पुलिस के मुखिया अवश्य बन गए थे लेकिन उनकी रैंकिंग तीसरी थी। गिरधारी नायक और उपध्याय के बाद। नायक जून में रिटायर हो गए और अब उपध्याय विदा हो रहे हैं। उपध्याय अभी पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन के चेयरमैन कम मैनेजिंग डायरेक्टर थे। हालांकि, नार्म के अनुसार डीजीपी कारपोरेशन का पदेन चेयरमैन होता है। लेकिन, उपध्याय चूकि डीएम से सीनियर थे। इसलिए, चेयरमैन और एमडी दोनों थे। विश्वरंजन के समय भी हालांकि ऐसा ही हुआ था। विश्वरंजन भी डीजीपी अनिल नवानी से सीनियर थे। बहरहाल, डीएम को चेयरमैन का हक मिल जाएगा। वे अब जब तक डीजीपी रहेंगे, कारपोरेशन के चेयरमैन बने रहेंगे। एमडी के रूप में सरकार किसी एडीजी या डीजी को एडिशनल चार्ज दे सकती है। एडिशनल इसलिए कि इस रैंक में अफसरों का टोटा है।

सुब्रमणियम को बुलावा

चीफ सिकरेट्री सुनील कुजूर के रिटायर होने से पहिले राज्य सरकार जम्मू-कश्मीर के चीफ सिकरेट्री बीवीआर सुब्रमणियम को बुलाने के लिए भारत सरकार को लेटर लिख सकती है। सुब्रमणियम 87 बैच के छत्तीसगढ़ सरकार के आईएएस हैं। सामान्य प्रशासन विभाग के अफसर मानते हैं, प्रमुख सचिव, अपर मुख्य सचिव स्तर पर अफसरों की काफी कमी है। सुब्रमणियम को बुलाने में अफसरों की कमी का ही हवाला दिया जाएगा। भारत सरकार अगर सुब्रमणियम को कश्मीर के इस हालात में लौटाने के लिए राजी नहीं हुई तो सीएस सुनील कुजूर को छह महीने का एक्सटेंशन तो दे ही सकती है। बस हो गया काम। कुजूर के एक्सटेंशन के लिए सरकार ने केंद्र को पत्र भेजा हुआ है। इस पर अलग-अलग राय सामने आ रही है। ज्यादतर लोग मानते हैं कि एक्सटेंशन बेहद कठिन होगा। लेकिन, सुब्रमणियम को बुलाने पर केंद्र शायद कुजूर के एक्सटेंशन पर अगर-मगर न कर पाए।

सुबोध को हरी झंडी?

डेपुटेशन पर भारत सरकार जाने के लिए प्रयासरत आईएएस सुबोध सिंह का रास्ता जल्द ही क्लियर हो सकता है। सरकार के करीबी अफसरों ने इसके संकेत दिए हैं। सुबोध भारत सरकार में पिछले साल ही ज्वाइंट सिकरेट्री इम्पेनल हो गए थे। लेकिन, पिछली सरकार ने उन्हें नहीं जाने दिया। और इस सरकार ने भी पहली बार में मना कर दिया था। उनके आवेदन पर भी सरकार ने कोई सुनवाई नहीं की। लेकिन, अब सुनते हैं, सरकार पसीजी है। अटकलें हैं, सुबोध पीयूष गोयल के रेल मंत्रालय में जाएं। रेल कारिडोर की मीटिंग के दौरान सुबोध के पारफारमेंस से पीयूष काफी प्रभावित हुए थे। ठीक भी है, सुबोध अगर रेलवे में गए तो छत्तीसगढ़ को निश्चित रूप से इसका लाभ ही मिलेगा। मगर महत्वपूर्ण यह है कि पहले पोस्टिंग का आर्डर तो निकले।

अमर का नुकसान

अरुण जेटली से देहावसान से छत्तीसगढ़ के पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल का बड़ा नुकसान हुआ। सूबे के भाजपा नेताओं में अमर जेटली के बेहद करीब हो गए थे। वित्त मंत्री होने के नाते जेटली जीएसटी कौंसिल के चेयरमैन थे और अमर उसके मेम्बर। जीएसटी के मामले में अमर के नॉलेज से जेटली काफी प्रभावित थे। धीरे-धीरे उनके पारिवारिक रिश्ते बन गए। वे तब के सीएम डा0 रमन सिंह को कई दफा कह चुके थे, आपके अमर में गजब की काबिलियत है। रमन ने कई मौकों पर यहां इसका जिक्र भी किया था। जेटली जब एम्स में भरती हुए तो अमर पिछले हफ्ते उनके परिवार के लोगों से मिलने भी गए थे।

प्रमोटी का दबदबा

राज्य बनने के बाद पहली बार सूबे में प्रमोटी आईपीएस का दबदबा बढ़ता दिख रहा है। अभी 27 में से 14 जिले के एसपी प्रमोटी हो गए हैं। सिर्फ 13 जिले में ही रेगुलर रिक्रूट्ड पुलिस अधीक्षक हैं। दुर्ग रेंज में तो सारे प्रमोटी एसपी हैं तो सरगुजा रेंज में भी सिर्फ सरगुजा में आरआर हैं। बाकी जिलो में प्रमोटी। आरआर वाले सबसे अधिक बस्तर में हैं। बस्तर रेंज के सात में से पांच जिलों में आरआर हैं। सिर्फ कांकेर और कोंडागांव में प्रमोटी एसपी हैं। हालांकि, सरकार ने ये जरूर किया है कि दुर्ग को छोड़कर रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, कोरबा जैसे बड़े जिले में आरआर बिठा रखा है। दुर्ग के प्रखर पाण्डेय का भी इंवेस्टिगेशन के मामले में अपना नाम है। रायपुर के स्टेट बैंक आफ इंदौर में दिनदहाड़ हुई 60 लाख की बैंक डकैती के आरोपियों को प्रखर ही पटना से पकड़कर लाए थे। बहरहाल, संख्या बल में तो प्रमोटी आरआर को पीछे छोड़ ही दिए हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. एक्स सीएम डा0 रमन सिंह को अपने किस पूर्व मंत्री से परेशानियों का सामना करना पड़ रहा होगा? 
2. सीएम भूपेश बघेल के दिल्ली अधिवेशन में राहुल गांधी के बगल में बैठने से छत्तीसगढ़ के किन-किन मंत्रियों को उस दिन रात में नींद नहींं आई होगी?

शनिवार, 17 अगस्त 2019

संकट में Ex सीएस?

18 अगस्त 2019
छत्तीसगढ़ में तीन साल तक चीफ सिकरेट्री रहे पी जॉय उम्मेन पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। वे जब प्रिंसिपल सिकरेट्री पीडब्लूडी थे, तब आईएलएफएस कांड हुआ था। उन्होंने 25 सौ किमी सड़क बनाने के लिए आईएलएफएस कंपनी से 9600 करोड़ में एग्रीमेंट किया। बाद में निगोशियेशन में उसे बढ़ाकर 14 हजार करोड़ कर दिया गया। वो भी बिना प्रशासकीय स्वीकृति के। इसको लेकर 2007 में जमकर बवाल मचा था। कांग्रेस नेता राजेश बिस्सा ने इस मामले का खुलासा किया था। और इसके बाद विधानसभा में कांग्रेस ने इतना हंगामा किया कि दो दिनों तक सदन की कार्रवाई ठप रही। मोहम्मद अकबर ने इस पर आधे घंटे का ऐसा प्रभावी भाषण दिया था कि लोग आज भी भूले नहीं हैं। कड़े विरोध के कारण ही रमन सरकार ने आईएलएफएस के एग्रीमेंट को केंसिल कर दिया था। लेकिन, तब तक इसके डीपीआर से लेकर तमाम कामों पर पीडब्लूडी ने लगभग 10 करोड़ रुपए खर्च कर डाले थे। मंत्रालय में इसकी फाइल अब ढूढ़ी जा रही है। कांग्रेस प्रवक्ता बिस्सा कहते हैं, हमारे पास दस्तावेजी प्रमाण हैं….इसकी फिर से जांच होनी चाहिए….क्योंकि पिछली सरकार ने इस पर लीपापोती कर दी थी। ऐसा अगर कुछ हुआ तो जाहिर है, उम्मेन की मुश्किलें बढ़ सकती है।

आईएएस की बारी?

आठ महीने के कार्यकाल में राज्य सरकार ने आईपीएस से मुकेश गुप्ता और रजनीश को सस्पेंड कर चुकी है। इस हफ्ते आईएफएस से एसएस बजाज का नम्बर लग गया। नया रायपुर में सोनिया गांधी द्वारा किए गए शिलान्यास वाली जगह को आईआईएम को अलॉट करने के मामले में उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। दीगर मामले में सरकार एक और सीनियर आईएफएस पर कार्रवाई कर सकती है। हो सकता है, इसके बाद किसी आईएएस का नम्बर आ जाए। हालांकि, आईएएस के खिलाफ कार्रवाई करना जरा कठिन होता है। आईपीएस, आईएफएस के आगे-पीछे कोई होता नहीं….वे खुद ही एक-दूसरे को निबटाते रहते हैं। किन्तु आईएएस का एसोसियेशन नेशनल लेवल पर बड़ा स्ट्रांग है। तभी तो राज्य बनने के बाद सिर्फ तीन आईएएस अभी तक निलंबित हुए हैं। अजयपाल सिंह, राधाकृष्णन और बीएल अग्रवाल। तीनों को रमन सिंह ने निलंबित किया था। अब तो भूपेश बघेल जैसे दमदार नेतृत्व वाली सरकार है, उसमें कुछ भी संभव है।

पनिशमेंट पोस्टिंग

आईएएस हिमशिखर गुप्ता को जिस तरह कमिश्नर हायर एजुकेशन से हटाया गया, ब्यूरोक्रेसी में वह चर्चा का विषय है। हिमशिखर को उस प्रशासन अकादमी में डायरेक्टर बनाकर भेजा गया है, जहां आमतौर से किसी ब्यूरोक्रे्टस को शंट करने के लिए भेजा जाता है। नई सरकार ने राजेश राणा और आलोक अवस्थी को वहां डायरेक्टर बनाया था, तब भी एक एडिशनल चार्ज उनके पास और था। हिमशिखर के पास सिर्फ प्रशासन अकादमी का चार्ज रहेगा। वैसे, पिछली सरकार में भी नौकरशाहों को निबटाने के लिए प्रशासन अकादमी भेजा जाता था। लेकिन, अंतर यह था कि सीनियर लेवल के वे अफसर होते थे। डीएस मिश्रा, सीके खेतान, गौरव द्विवेदी सभी इस दौर से गुजर चुके हैं। लेकिन, हिमशिखर तो यंग अफसर हैं। उन्होंने आखिर कौन-सी खता कर दी है….इस सवाल का जवाब जानने ब्यूरोक्रेसी में बड़ी बेचैनी है।

नो टेंशन

गणेश शंकर मिश्रा को सहकारी निर्वाचन आयुक्त से हटाने के बाद एसीएस केडीपी राव की पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग का टेंशन दूर हो गया होगा। क्योंकि, अब पीएस, एसीएस रैंक का एक पद खाली हो गया है। हालांकि, इस साल कई नौकरशाह रिटायर हुए हैं या होने वाले हैं। लेकिन, जिन्हें रिटायरमेंट के बाद पोस्टिंग मिल सकती है, उनमेें सीएस सुनील कुजूर को अलग कर दें तो केडीपी राव ही सबसे वजनी दिखाई पड़ रहे हैं। लंबे समय तक हांसिये पर रहे केडीपी कांग्रेस सरकार में प्रतिष्ठापूर्ण विभाग पाए, लेकिन तब तक चला-चली की बेला आ गई। 31 अक्टूबर को वे रिटायर हो जाएंगे। ब्यूरोक्रेसी में यह मानने वालों की कमी नहीं है कि सहकारी निर्वाचन आयुक्त की खाली कुर्सी पर केडीपी विराजमान होंगे।

बेचारे नायक!

मुकेश गुप्ता के खिलाफ जांच करके रिटायर डीजी गिरधारी नायक एक तरह से कहें तो कुछ दिनों के लिए अपनी पोस्टिंग का रास्ता ब्लॉक कर लिए हैं। 30 जून को रिटायर होने के बाद उन्हें आपदा प्रबंधन की कमान सौंपी जाने की पूरी संभावना थी। पांच साल की यह पोस्टिंग है। मगर अब मुकेश गुप्ता की जांच रिपोर्ट सौंपने के बाद डीजीपी डीएम अवस्थी ने उस पर तुरंत आईजी की जांच बिठा दी है। अब अगर सरकार नायक को पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग देगी तो नायक की जांच का असर कम हो जाएगा। कानूनी तौर पर मुकेश का पलड़ा भारी हो जाएगा। ऐसे में, नायक कितनी भी उम्मीद पाल लें, सरकार कोई चूक नहीं करने वाली। वैसे भी, नायक और मुकेश के संबंध कैसे रहे हैं, यह पब्लिक डोमेन में है और सरकारी दस्तावेजों में भी। दोनों में दो मौकों पर एक-दूसरे के खिलाफ लिखा-पढ़ी की ऐसी जंग छिड़ी थी कि पूछिए मत! एक बार तो तत्कालीन चीफ सिकरेट्री सुनील कुमार को हस्तक्षेप करना पड़ा था। लिहाजा, नायक को पोस्टिंग के लिए कुछ दिन वेट करना होगा।

पहली महिला एमडी

2007 बैच की आईएएस शम्मी आबिदी को सरकार ने हाउसिंग बोर्ड कमिश्नर से शिफ्थ करके मार्केटिंग फेडरेशन यानी मार्कफेड का एमडी बनाया है। मार्कफेड की एमडी बनने वाली शम्मी पहली महिला आईएएस होंगी। मार्कफेड में सीके खेतान, सुबोध सिंह एमडी रह चुके हैं। अनडिवाइडेड एमपी के समय सुनील कुमार भी एडिशनल एमडी का दायित्व संभाल चुके हैं। छत्तीसगढ़ में जितने निगम, बोर्ड या आयोग हैं, उनमें मार्कफेड का नम्बर सबसे उपर आता है। लगभग 15 हजार करोड़ का सलाना कारोबार करता है मार्कफेड। धान खरीदी के साथ ही किसानों को फर्टिलाइजर मुहैया कराने की जवाबदेही भी मार्कफेड की होती है। जाहिर है, भूपेश सरकार ने शम्मी को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है।

जीरो एसपी

सूरजपुर एसपी गिरिजाशंकर जायसवाल की किस्मत एक बार फिर दगा दे गई। पिछली सरकार में वे जशपुर एसपी रहने के दौरान सस्ते में अपना विकेट गंवा बैठे थे। इस बार फिर उनके साथ वैसा ही हुआ। पुलिस अधीक्षकों के पिछले फेरबदल में गिरिजाशंकर का बिलासपुर का एसपी बनना लगभग फायनल हो गया था। मगर ऐन वक्त पर प्रशांत अग्रवाल ने इंट्री कर ली। और, गिरिजाशंकर बिलासपुर जैसे सूबे के दूसरे सबसे बड़े जिले के एसपी बनते-बनते कोरबा के उस बांगो बटालियन पहुंच गए, जिसमें कभी डायरेक्ट आईपीएस कमांडेंट नहीं रहा। गिरिजाशंकर के हटते ही 2010 बैच अब जीरो एसपी बैच हो गया है। पहिले अभिषेक मीणा और सदानंद एसपी से ऑफट्रेक हुए और अब गिरिजा का भी विकेट गिर गयज्ञं

और, ये गुड न्यूज

राजधानी पुलिस का हर हेड….हेलमेट….कैम्पेन कल रविवार को गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में रजिस्टर होने जा रहा है। इसके लिए गोल्डन बुक की टीम रायपुर पहुंच चुकी है। पुलिस अब तक 16 हजार से अधिक लोगों को मु्फ्त में हेलमेट बांट चुकी है। इनमें से अगर पांच हजार लोगों ने भी हेलमेट पहन ली तो कम-से-कम इतनी जान तो सुरक्षित हो गई। कम्यूनिटी पोलिसिंग में इससे बढ़ियां काम और हो नहीं सकता। रायपुर के एसएसपी शेख आरिफ के लिए भी ये एक नायाब कीर्तिमान होगा। सोशल पोलिसिंग के लिए उनका नाम लिम्का बुक, गिनीज बुक में दर्ज हो चुका हैं। अब, हर हेड, हेलमेट से गोल्डन बुक में भी। याने तीनों वर्ल्ड रिकार्ड। ग्रेट।

अंत में दो सवाल आपसे

1. बीजेपी के किस राजा का दिल अमेरिका में अटका हुआ है?
2. लोकसभा चुनाव के नाम पर चंदा बटोरकर किस मंत्री ने पार्टी और अपने इलाके के प्रत्याशी के साथ दगा कर दिया?

ब्यूरोक्रेसी रिचार्ज नहीं!

11 अगस्त 2019

किसी भी सरकार की कामयाबी के पीछे फिफ्टी परसेंट राजनीतिक इच्छाशक्ति होती है और फिफ्टी परसेंट रोल ब्यूरोक्रेसी का होता है। सरकार फैसला लेती है और ब्यूरोक्रेसी योजनाओं को अमलीजामा पहनाने का काम करती है। लेकिन, छत्तीसगढ़ में ऐसा हो नहीं रहा। विधानसभा, लोकसभा चुनाव के आचार संहिता के बाद ब्यूरोक्रेसी में ऐसी जड़ता आ गई है कि पूछिए मत! रिचार्ज ही नहीं हो पा रही। सरकार जो धरातल पर कुछ करती दिख रही है, वह सिर्फ और सिर्फ सीएम भूपेश बघेल के चलते…. सीएम अकेले 80 परसेंट काम कर दे रहे तो ब्यूरोक्रेसी 20 परसेंट से उपर नहीं जा पा रही। मंत्रालय से लेकर जिलों में कलेक्टरों तक यही हाल है। कलेक्टर्स गोठानों को तड़क-भड़क बनाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दिए हैं, उसके अलावा कुछ और नहीं। तो मंत्रालय के सिकरेट्रीज शतरंज के घोड़े की तरह ढाई घर ही चल रहे…इससे ज्यादा नहीं। मंत्रालय का आलम यह है कि मंत्रियों का अभी तक सचिवों से तालमेल नहीं बैठ पाया है। लब्बोलुआब यह है कि ब्यूरोक्रेट्स आगे बढ़कर बाॅल को मारने की कोशिश नहीं कर रहे हंै। सीएम बीच-बीच में चैका, छक्का जड़कर सरकार का रन रेट जरूर ठीक कर देते हैं। वरना, स्थिति विकट हो जाती। ऐसे में ये सवाल मौजूं है, ब्यूराके्रसी की शिथिलता आखिर कब तक बनी रहेगी….आगे बढ़कर खेलने से वे हिचक क्यों रहे हैं….सरकार को इसके निदान ढंूढने चाहिए। क्योंकि, इसका नुकसान सरकार को भी तो होगा। सरकार जनता से जुड़े नित बड़े फैसले ले रही है मगर उसका प्रोजेक्शन नहीं हो पा रहा।

सरकार की भी उलझनें

ब्यूरोक्रेसी को लेकर सरकार की भी अपनी दिक्कतें हैं। 15 साल भाजपा का शासन रहा है। सूबे में जो चंद अच्छे अफसर हैं, वे या तो रमन इफेक्ट वाले हैं या फिर उनके दामन साफ नहीं है। तीसरे केटेगरी के अफसरों पर सरकार दांव लगाएगी, तो उनसे रिजल्ट की उम्मीद नहीं की जा सकती। और, रमन टैग वालों को आगे लाने कंशस एलाउ नहीं करेगा….हल्ला भी मचेगा। जैसे मुकेश गुप्ता को रायपुर का आईजी बनाने पर भाजपा के समय कोहराम मचा था। ऐसे में सरकार करें तो क्या करें।

सीएम नाराज क्यों

निगम-मंडलों में लाल बत्ती के दावेदारोें ने सीएम भूपेश बघेल को नाराज कर दिया है। दिल्ली जाने के दौरान एयरपोर्ट पर उन्हें कहना पड़ गया….जो ज्यादा आगे-पीछे होगा उसकी दावेदारी खतम समझो। दरअसल, लोकसभा चुनाव के बाद दावेदारों के डिमांड ने उन्हें परेशान कर दिया है। निगम भी ऐसी मांग रहे कि दिमाग चकरा जाए। पार्षद का इलेक्शन नहीं निकाल सकते और बात बड़े-बड़े बोर्ड की। सीएम हाउस की देहरी पर पहंुचने वाले हर दूसरे नेता को या तो अपने आदमी की ट्रांसफर, पोस्टिंग चाहिए या फिर भूपेश भैया…..मुझे ये बना दीजिए। और, सिर्फ रायपुर के ही नहीं। बलरामपुर से लेकर सुकमा तक के लोग तगादा मारने पहंुच जा रहे। सीएम किसी सरकारी कार्यक्रम में जा रहे तो वही लोग और किसी पारिवारिक कार्यक्रम में जाएं तो वहां भी यही स्थिति। ऐसे में, किसे झल्लाहट नहीं आएगी।

इन्हें मौका नहीं

लाल बत्ती के लिए पहली लिस्ट जल्द निकलने वाली है। पता चला है, पहली सूची में उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी, जिन्हें विधानसभा या लोकसभा चुनाव का टिकिट नहीं मिला था। विधायकों को वैसे भी मौका नहीं मिलने वाला। सरकार पहले ही संकेत दे चुकी है, विधायकों को निगम-मंडल में जिम्मेदारी नहीं जाएगी। पहली सूची में बिलासपुर के अटल श्रीवास्तव जरूर अपवाद हो सकते हैं। उन्हें पहली लिस्ट में एडजस्ट किया जा सकता है। हालांकि, सरकार के ध्यान में ये बात भी है, बीजेपी साल-डेढ़ साल के पहिले नेताओं को पोस्टिंग नहीं देती थी। तीनो बार अरबन चुनाव के बाद ही नेताओं को लाल बत्ती मिली। तीसरी पारी में तो नगरीय चुनाव के तीन महीने बाद नियुक्ति प्रारंभ हो पाई थी। भाजपा की पाॅलिसी थी, लाल बत्ती के लिए ही सही नेता नगरीय चुनाव में ठीक से काम करेंगे। आईडिया तो अच्छा है। अब सरकार पर यह निर्भर करत है….कुछ लोगोें को नियुक्ति दे दे। या फिर, नवंबर में नगरीय चुनाव के बाद एक साथ करें।

नो ब्यूरोक्रेट्स

राज्य सूचना आयोग में एके सिंह के पिछले महीने रिटायर होने से सूचना आयुक्त का एक पद खाली हुआ है। सिंह रिटायर पीसीसीएफ थे। जाहिर है, इस पोस्ट पर रिटायर या रिटायर होने वाले नौकरशाहों की नजरें होंगी। लेकिन, उन्हें यह जानकार निराशा हो सकती है कि उनके लिए सूचना आयोग में चांस बहुत कम है। ज्यादा संभावना है, किसी गैर नौकरशाह की इस पद पोस्टिंग हो जाए। वह एक्टिविस्ट भी हो सकता है।

पहली बार पत्रकार

कुशाभाउ पत्रकारिता यूनिवर्सिटी में जल्द ही नए कुलपति की नियुक्ति हो सकती है। संकेत हैं, पहली बार किसी पत्रकार को इस विवि का कुलपति बनने का अवसर मिलेगा। निधिश त्यागी, सुदीप ठाकुर के नाम चल भी रहे हैं। दोनों छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं। फिलहाल, दिल्ली में है। बहरहाल, निधिश हों, सुदीप हों या कोई और….यह पक्का है, नया वाइस चांसलर कोई जर्नलिस्ट ही होगा। सरकार ने पत्रकारों के अनुकूल सलेक्शन पाॅलिसी में एमेडमेेंट कर भी दिया है।

मंत्रियों के नाते-रिश्तेदार

कांग्रेस के कैडर में दो तरह के लोग हैं। एक राजनांदगांव के नवाज खान के केटेगरी के। उनका वीडियो आपमें से ज्यादतर लोगों ने देखा होगा। ऐसे लोग अपनी परंपरागत भाषा और शैली का इस्तेमाल कर अपना काम करा लेते हैं। दूसरा है, दरी बिछाने वालों का। दरी बिछाने वाले पहले भी हांसिये पर रहे हैं और अब भी कमोवेश उसी स्थिति में हैं। मंत्रियों के यहां इनकी कोई सुनवाई नहीं है। हाल ही की बात है, एक कार्यकर्ता अपने भांजे के ट्रांसफर के लिए मंत्री के बंगले गया था। ट्रांसफर का काम मंत्रीजी के साले देख रहे हैं। साले साब ने कार्यकर्ता को समझाया, जानते हो कितनी मुश्किल में जीजाजी मंत्री बनें हैं, सिस्टम तो फाॅलो करना ही पड़ेगा। अधिकांश मंत्रियों के यहां यही सिचुएशन है। भाई-भतीजे या ससुराल वाले ट्रांसफर की सूची तैयार कर रहे हैं। दरी बिछाने वालों की वहां कोई पूछ नहीं है। जबकि, असली कांग्रेसी वही हैं। व्हाइट काॅलर वाले कांग्र्रेसियों को ठेका, सप्लाई या ट्रांसफर, पोस्टिंग के काम रमन सरकार में भी हो जाते थे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. पुलिस वाले आईएएस सुब्रत साहू को क्यों अपना अगला गृह सचिव मान कर चल रहे हैं?
2.  किस एसपी ने एक बड़े आसामी को एक केस में छोड़ने की एवज में धमतरी के पास 40 एकड़ जमीन अपने नाम करा लिया?

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शनिवार, 3 अगस्त 2019

दमदार अफसर, दमदार पोस्टिंग

4 अगस्त 2019
छत्तीसगढ़ से भले ही कोई आईएएस भारत सरकार में अभी तक सिकरेट्री नहीं बन सका है। लेकिन, सुकून की बात ये है कि इस समय दिल्ली में पोस्टेड छत्तीसगढ़ के अधिकांश अफसर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। प्रभावशाली पोस्टिंग में आईपीएस अमित कुमार का नाम सबसे उपर लिया जा सकता है। सीबीआई में वे ज्वाइंट डायरेक्टर पॉलिसी हैं। राज्यों में डीजीपी के बाद जो रुआब इंटेलिजेंस चीफ का होता है, सीबीआई में वही स्थिति ज्वाइंट डायरेक्टर पॉलिसी की होती है…..उन्हें नेक्स्ट टू डायरेक्टर माना जाता है। जेडी पॉलिसी का पीएमओ में दिन में कम-से-कम एक चक्कर जरूर लगता है। हाईप्रोफाइल मामलों में पीएमओ को ब्रीफ करना हो या वहां से इंस्ट्रक्शन….जेडी पॉलिसी की ये ड्यूटी होती है। अमित का क्लीन ट्रेक रिकार्ड देखकर लोग दावा कर रहे हैं, सीबीआई में वे लंबे रेस के घोड़ा बनेंगे। आईएएस में अमित अग्रवाल ज्वाइंट सिकरेट्री फायनेंसियल सर्विसेज हैं। देश के समूचे बैंक इसी विभाग में आते हैं। विकासशील हेल्थ, निधि छिब्बर डिफेंस, रीचा शर्मा फॉरेस्ट एवं एनवायरमेंट में ज्वाइंट सिकरेट्री हैं। उधर, डा0 रोहित यादव डायरेक्टर स्टील बन गए हैं। उनकी पत्नी रीतू सेन डायरेक्टर अरबन हैं। अमित कटारिया भी डायरेक्टर अरबन की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। आईपीएस स्वागत दास, बद्री मीणा और धु्रव गुप्ता आईबी में हैं। आईपीएस राहुल भगत पिछले हफ्ते डायरेक्टर लेबर एवं रोजगार अपाइंट हुए हैं। इसे भी केंद्र की अच्छी पोस्टिंग मानी जाती है। आईपीएस अंकित आनंद एनआईए में और अमित कांबले एसपीजी में हैं। कुल मिलाकर सीबीआई से लेकर फायनेंस सर्विसेज, हेल्थ, डिफेंस, फॉरेस्ट, स्टील, लेबर, रोजगार, अरबन एडमिनिस्ट्रेशन जैसे विभागों में छत्तीसगढ़ के नौकरशाह बैठ गए हैं। वो भी इस समय, जब भारत सरकार में पोस्टिंग पाना कठिनतम कार्य हो गया है। चलिये, अपने अफसर दिल्ली में अच्छी जगहों पर बैठ गए हैं, तो निश्चित तौर पर सूबे को इसका लाभ ही मिलेगा।

सोनमणि पर निगाहें

सिकरेट्री रैंक के आईएएस सोनमणि बोरा एक साल के स्टडी लीव से छत्तीसगढ़ लौट आए हैं। संकेत हैं, 5 अगस्त को वे मंत्रालय में ज्वाईनिंग देंगे। सोनमणि के यूएस जाने से पहिले उनके पास इरीगेशन का चार्ज था। स्टडी लीव से लौटने पर अब सरकार उन्हें अब कौन सा विभाग देती है, इस पर ब्यूरोक्रेसी में सबकी नजर है। मंत्रालय में लगभग सभी सचिवों के पास दो-से-तीन विभागों के चार्ज हैं। इनमें से किसी से भी एक लेकर सोनमणि को दिया जा सकता है। लेकिन, यक्ष प्रश्न यही है कि मिलेगा क्या। वैसे, मुकेश बंसल भी पिछले महीने स्टडी लीव से लौटे थे। उन्हें पहली लिस्ट में संतोषजनक दायित्व नहीं मिला था। लेकिन, पखवाड़े भर में ही उनका सब ठीक हो गया। वैसे, सोनमणि के लिए परिस्थितियां ज्यादा अनुकूल है। वे करीब दो साल कांग्रेस गवनर्मेंट में काम किए हैं। सो, कांग्रेस सरकार की वर्किंग और टेस्ट से वाकिफ हैं। फिर, पिछली सरकार की दो पारियों में जरूर वे अच्छी स्थिति में रहे। लेकिन, लास्ट इनिंग का पांच साल उनका बहुत बढियां नहीं कहा जा सकता। आखिरी समय में उन्हें इरीगेशन जरूर मिल गया था लेकिन, स्थिति ये थी कि स्टडी लीव की अनुमति के लिए भी उन्हें काफी पापड़ बेलने पड़े थे। बहरहाल, अब देखना है नई सरकार उनके बारे में क्या नजरिया रखती है।

रिटायरमेंट एज 62?

इन दिनों ऑल इंडिया सर्विस की नौकरियों में रिटायरमेंट एज 60 से बढ़ाकर 62 बरस करने की बड़ी चर्चा है। दिल्ली में तो हर तीसरा अफसर आपको इसी बारे में बात करता मिलेगा। दरअसल, भारत सरकार में एक वर्ग चाहता है कि पुराने अफसरों के तजुर्बे के लाभ लेने के लिए रिटायरमेंट एज दो साल बढ़ा देना चाहिए। लेकिन, इसका विरोध करने वालों की भी कमी नहीं है। रिटायरमेंट एज अगर बढ़ गया तो छत्तीसगढ़ में चीफ सिकरेट्री के लिए छिड़ा द्वंद्व दो साल के लिए खतम हो जाएगा। सीएस सुनील कुजूर का अक्टूबर में रिटायरमेंट है। उनके बाद सीके खेतान, आरपी मंडल और बीवीआर सुब्रमण्यिम ब्यूरोक्रेसी के इस शीर्ष पद के दावेदार हैं। लेकिन, दो साल बढ़ने पर कुजूर अक्टूबर 2021 में सेवानिवृत्त होंगे। वहीं, आरपी मंडल नवंबर 2022 और सीके खेतान जुलाई 2023 में। मगर सबसे बड़ा सवाल है कि पहले हो तो जाए। क्योंकि, दो साल पहिले भी एक बार इस पर बात उठ चुकी है। लेकिन, तब पीएम मोदी ने इसे खारिज कर दिया था।

ऑपरेशन गणेश शंकर

सहकारी निवार्चन आयुक्त गणेश शंकर मिश्रा ने हटाए जाने के बाद दोनों सरकारों का शुक्रिया अदा किया। कमिश्नर बनाने वाली बीजेपी सरकार को और हटाने वाली कांग्रेस को भी। नई सरकार का आभार तो उनका बनता भी है। विपरीत ध्रुव के होने के बाद भी सरकार ने उनको सात महीने कुर्सी पर रहने का मौका दिया। वरना, उनके सरकार से जिस तरह के रिश्ते थे, बहुत पहले हट गए होते। बहरहाल, उन्हें हटाने में सरकार को भी काफी मशक्कत करनी पड़ी। पहले पांच साल कार्यकाल को कम करके दो साल किया गया। मगर इस दायरे में भी जीएस नहीं आ रहे थे। अभी तो उनका एक साल भी नहीं हुआ है। फिर, सहकारिता अधिनियम में बदलाव करके लिखा गया सरकार चाहे तब तक इस पोस्ट पर काम करने का अवसर मिलेगा। अफसरों ने बड़ी चतुराई के साथ इस आपरेशन गणेश शंकर को अंजाम तक पहुंचाया। राजपत्र की सिर्फ एक प्रति प्रकाशित कराई गई। सहकारिता विभाग के कई अफसरों को भी नहीं मालूम था कि नियमों में इस तरह संशोधन किया जा रहा है। वरना, मिश्राजी हाईकोर्ट पहुंच जाते तो पूरा खेल खराब हो जाता। बहरहाल, मिश्राजी भी अश्वस्त थे कि पांच साल का कार्यकाल है, किसी तरह निकल ही जाएगा। जब हटाने का आदेश वायरल हुआ तब लोगों को वस्तुस्थिति का पता चला। ये अलग बात है कि मिश्राजी ने नई सरकार को धन्यवाद देकर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ा ली, वरना……।

और भी मिश्राजी

ऑपरेशन गणेश शंकर के बाद पिछली सरकार में पोस्टिंग पाए रिटायर नौकरशाहों की रात की नींद उड़ गई है। रमन सरकार ने आधा दर्जन से अधिक नौकरशाहों को पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग दी थी। सबलोग इसी मंशा से जय-जुगाड़ करके पोस्टिंग ले ली थी कि पांच साल के लिए कुर्सी सुरक्षित हो गई। लेकिन, अब उनकी कुर्सी हिलती प्रतीत हो रही है। हालांकि, खुद को ढ़ाढ़स बंघाने के लिए ये जरूर है कि फलां संवैधानिक पोस्ट है….फलां नियमों के तहत बना है। मगर सरकार, सरकार होती है। कहीं भी पेंच फंसाकर उन्हें नमस्ते किया जा सकता है। सर्विस के दौरान की फाइल खोलकर पुलिस कार्रवाई करने के अधिकार भी सरकार को होते हैं। आखिर, ईओडब्लू ने बिल्डर के यहां छापा तो मारा ही। सो, उनका डरना लाजिमी है।

एक खर्चे मे दो फेयरवेल

आईपीएस एसोसियेशन ने 2 अगस्त की शाम राजधानी के पुलिस आफिसर मेस में रिटायर डीजी गिरधारी नायक को फेयरवेल दिया। नायक 30 जून को रिटायर हुए थे। याने नायक को फेयरवेल के इंतजार में 33 दिन निकल गए। तभी तो आफिसर मेस में लोग चुटकी ले रहे थे, थोड़े दिन और रुक जाते तो एक ही खर्चे में दो फेयरवेल निबट जाता। इस महीने 30 को पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन के प्रमुख एएन उपध्याय भी रिटायर होने वाले हैं। नायक के साथ उपध्याय का भी फेयरवेल हो जाता। बात सही भी है। पुलिस अधिकारियों का टाईम भी बचता। बहरहाल, अब देखना है 26 दिन बाद रिटायर होने वाले एएन उपध्याय की विदाई पुलिस महकमा कितने दिन बाद देता है।

कलेक्टर की छत्तीसगढ़ी

कुछ दिन पहिले एक खबर आई थी, दंतेवाड़ा एसपी अभिषेक पल्लव लोगों के नजदीक जाने के लिए गोंडी सीख रहे हैं। लेकिन, हरेली पर छत्तीसगढ़ में भाषण देकर मुंगेली कलेक्टर डा0 सर्वेश भूरे दो कदम आगे निकल गए। मुंगेली के मुख्य समारोह में जब उन्होंने छत्तीसगढी में बोलना शुरू किया तो लोग हैरान रह गए। याद होगा, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एकाधिक मौके पर कह चुके हैं, अफसरों को लोकल लैंग्वेज सीखना चाहिए। चलिये, सर्वेश का नम्बर बढ़ गया। सर्वेश खांटी मराठी हैं। उन्होंने मुंगेली जाकर छत्तीसगढ़ी सीख ली। हालांकि, सरकार ने उनको मौका भी भरपूर दिया है। काबिल अफसर को दो ब्लॉक वाले जिला में भेज दिया है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. पाटन से अंबिकापुर जिला मुख्यालय की दूरी कितनी होगी?
2. निगम, मंडलों के दावेदारों से सीएम नाराज क्यों हुए?