शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

वो सात घंटे!

2 सितंबर 2018
इलेक्शन कमीशन ने चुनावी तैयारी के लिए कलेक्टर, एसपी, आईजी, कमिश्नरों की लंबी बैठक ली। सवा दो बजे से रात नौ बजे तक। याने पूरे सात घंटे। एक जगह पर बिना हिले-डुले बैठना…..आप समझ सकते हैं। आयोग के अफसरों ने बैठक प्रारंभ होते ही ऐसा हड़का दिया कि लोगों को कंपा देने वाले कलेक्टर, एसपी भीतर से कांप गए! कहीं राडार पर आ गए तो निबटने में देर नहीं लगेगी। यही वजह है कि जब तक मीटिंग चलती रही, किसी अफसर ने जबर्दस्त जरूरत पड़ने के बाद भी वाशरुम जाने की हिमाकत नहीं की। दरअसल, दिल्ली से आए निर्वाचन आयोग के अफसरों ने मीटिंग प्रारंभ होते ही कलेक्टर, एसपी पर ऐसा खौफ जमा दिया कि पूछिए मत! सबसे पहिले एक कमिश्नर ने यह बोलकर कि यहां बैठे कई सीनियर अफसर उंघ रहे हैं, अधिकारियों की नींद भगा डाली। इसके बाद बारी आई एसपी की। सरगुजा संभाग के एक एसपी उतरे सलामी बल्लेबाजी के लिए। मगर वे पहली बॉल पर आउट हो गए। आयोग ने उनसे पूछा अगस्त में वे कितनी वारंट तामिल कराए। वे लगे साल का बताने। उनके पास मंथली डेटा नहीं था। इससे झल्लाकर इलेक्शन कमिश्नर ने उन्हें यह कहते हुए बाहर भेज दिया कि आप पता करके आईये। सरगुजा संभाग के ही दूसरे एसपी खड़े हुए, वे भी आंकडों मे ंउलझ गए। बताते हैं, अधिकांश एसपी साल का फिगर लेकर आए थे। उनके पास मंथली फिगर नहीं थे। लेकिन, सरगुजा संभाग के दो ओपनर बैट्समैन को देखकर बाकी एसपी सतर्क हो गए। और, लगे मातहतों को व्हाट्सएप भेजने। मोबाइल का कमाल था कि बाकी के पास तुरंत महीने का डेटा आ गया। और, लगा जान बची, लाखों पाए। बहरहाल, वो सात घंटे के बाद अफसर जब बाहर निकले तो उनका चेहरा देखने लायक था।

धोखे में कलेक्टरी?

बलौदा बाजार से कलेक्टरी से हटने के बाद बसव राजू ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वे राजधानी रायपुर के कलेक्टर बन सकते हैं। वे तो कहां इंटर स्टेट डेपुटेशन पर अपने होम स्टेट जाने के लिए लगेज तैयार कर रहे थे। दिल्ली से भी उन्हें एप्रूवल मिल चुका था। बस, आखिरी चरण की कुछ प्रक्रियाएं चल रही थी। याने किसी भी दिन डीओपीटी से उनका आर्डर आ जाता। लेकिन, ओपी चौधरी के इस्तीफे के बाद घटनाक्रम कुछ यूं घूमा कि उनके प्रोफाइल में रायपुर जैसे जिले की कलेक्टरी जुड़ गई। दरअसल, पहली बार जीएडी ने अंकित आनंद का नाम आयोग को भेजा था। लेकिन, आयोग ने कुछ और नाम मांग लिए। दूसरी बार बताते हैं, अंकित के साथ ही दंतेवाड़ा कलेक्टर सौरभ कुमार और बसव राजू का नाम था। जीएडी को लगा कि सौरभ ऑलरेडी कलेक्टर हैं और बसव का डेपुटेशन क्लियर हो गया है, लिहाजा अंकित का हो जाएगा। लेकिन, आयोग ने दोनों का नाम छोड़कर बसव के नाम पर मुहर लगा दी।

सजा अंकित को

जीएडी की चूक की सजा आखिरकार आईएएस अंकित आनंद को भुगतनी पड़ी। जीएडी ने सरकार को बिना इंफार्म कए अंकित का नाम डेपुटेशन के लिए भारत सरकार को भेज दिया। इसी चलते चुनाव आयोग ने उन्हें रायपुर कलेक्टर बनाने पर राजी नहीं हुआ। आयोग का कहना था, जिस अफसर को भारत सरकार ने ले लिया है, उसे कलेक्टर नहीं बनाया जा सकता। अंकित जशपुर और जगदलपुर के कलेक्टर रह चुके थे। रायपुर उनका तीसरा जिला होता। लेकिन, वे कलेक्टर बनते-बनते रह गए।

आयोग सख्त

चीफ इलेक्शन कमिश्नर ओपी रावत सौम्य और शालीन नौकरशाह माने जाते हैं। मध्यप्रदेश कैडर के आईएएस होने के कारण छत्तीसगढ़ से उनका स्वाभाविक जुड़ाव माना जा रहा था। लेकिन, शुरूआती झटके से सूबे के अफसर हतप्रभ हैं। अंकित आनंद को उन्होंने रायपुर कलेक्टर बनाने के लिए तैयार नहीं हुए वहीं, रायपुर आईजी प्रदीप गुप्ता और अंबिकापुपर कलेक्टर किरण कौशल के मामले में उन्होंने कोई राहत नहीं दी। प्रदीप का रायपुर होम डिस्ट्रिक्ट था। सरकार ने कई बार आग्रह किया कि राज्य में आईजी की कमी है। सिर्फ एक आईजी पीएचक्यू में हैं। लेकिन, आयोग टस-से-मस नहीं हुआ। आखिरकार, प्रदीप गुप्ता को बिलासपुर शिफ्थ करना पड़ा।

नो कमेंट्स

जी चुरेंद्र को सरकार ने रायपुर संभाग का कमिश्नर बना दिया है। चुरेंद्र वहीं हैं, जिन्हें पिछले साल लोक सुराज के दौरान सरकार ने गंदे ढंग से हटा दिया था। बीजेपी गवर्नमेंट के 15 साल में पहला मौका था, जब सीएम ने किसी कलेक्टर को हटाने का ऐलान हेलीपैड पर मीडिया के सामने किया होगा। बताते हैं, सरकार चुरेंद्र के पारफारमेंस से खुश नहीं थी। उन्हीं चुरेंद्र को सरकार ने रायपुर का कमिश्नर बना दिया है। खैर, ये भी एक संयोग ही है कि पहली बार पांचों कमिश्नर प्रमोटी आईएएस हैं। उस पर भी, सब एक से बढ़कर एक। अंबिकापुर कमिश्नर के खिलाफ तो डीई चल रही है। चुरेंद्र के खिलाफ भी गंभीर मामले थे। पांचों में बस्तर के धनंजय देवांगन को छोड़ दे ंतो बाकी सभी कमिश्नर प्रातः स्मरणीय हैं।

तलवार की धार

कलेक्टरों और एसपी के लिए चुनाव में काम करना वास्तव में तलवार की धार पर चलने जैसे होता है। इलेक्शन कमिश्नर घुड़की दे गए हैं कि किसी राजनीतिक पार्टी से प्रेरित होकर काम किये तो खैर नहीं। और, ज्यादा नियम-कायदे दिखाए और सरकार कहीं बैक हो गई तो क्या होगा, इसे सोच कर ही अफसर सिहर जा रहे हैं। इनमें भी लंबे समय से जो कलेक्टरी और कप्तानी कर रहे हैं, वे तो पर्याप्त पर्याप्त सुख-सुविधा भोग चुके हैं। नए कलेक्टरों का भला क्या कसूर… बेचारों को चुनाव के दौरान सरकार ने कलेक्टर बना दिया।

सीधे सुप्रीम कोर्ट

2003 के विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग ने पहले फेज में जांजगीर के कलेक्टर एमआर सारथी और जशपुर कलेक्टर अनंत की छुट्टी कर दी थी। आयोग के फैसले के खिलाफ दोनों हाईकोर्ट से स्टे ले आए थे। लेकिन, इलेक्शन कमीशन पीछे नहीं हटा। अगले दिन सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया और उसी दिन शाम को हाईकोर्ट के स्टे पर स्टे ले आया था। इसके बाद तो फिर किसी नौकरशाह ने आयोग के फैसले के खिलाफ कोर्ट जाने की हिमाकत नहीं की। अनंत और सारथी के बाद आयोग ने पिछले तीनों चुनाव में आधा दर्जन कलेक्टर्स और एसपी को हटाया लेकिन, किसी ने भी उसे चैलेंज नहीं किया।

कहा सो किया

कांग्रेस इस महीने की 15 तारीख तक कुछ टिकिटों का ऐलान कर सकती है। खासकर, जिन सीटों पर सिंगल नाम हैं। मसलन, रायपुर ग्रामीण, दुर्ग शहर, कवर्धा, अंबिकापुर, अभनपुर, साजा, राजिम, आरंग, कोंटा। हालांकि, पीसीसी से तो अनेक सीटों पर सिंगल नाम तय कर दिए हैं। लेकिन, आलाकमान से अभी उस पर मुहर नही लगा है। जाहिर है, जिन सीटों के दावेदारों का नाम दिल्ली से ओके नहीं हुआ है, उसमें अभी टाईम लगेगा। बाकी, दस से बारह सीटों पर दावेदारों के नाम की घोषणा 15 सितंबर तक कर दी जाएगी। इससे कांग्रेस नेताओं को ये कहने के लिए हो जाएगा कि जो कहा, सो किया। जाहिर है, कांग्रेस ने अगस्त तक प्रत्याशियों के नाम फाइनल करने का दावा किया था।

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस पार्टी के दावेदार ने 20 करोड़ में अपना टिकिट पक्का किया है?
2. ओपी चौधरी की तोड़ निकालने के लिए कांग्रेस ने आरपीएस त्यागी को पार्टी में लाया है, इसमें वो कितना सफल होगी?

ओपी आखिरी नहीं

26 अगस्त
बीजेपी ज्वाईन कर विधानसभा चुनाव लड़ने वाले ओपी चौधरी अकेले आईएएस नहीं होंगे। कम-से-कम दो और आईएएस सरकार के रणनीतिकारों के संपर्क में हैं। बस्तर संभाग के एक कलेक्टर की बात तो फाईनल राउंड में पहुंच गई है। यदि बात बन गई तो बीजेपी उन्हें बस्तर के किसी सीट पर उतार सकती है। यही नहीं, एक एडिशनल एसपी को जांजगीर की सीट से चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है। तानाखार से पूर्व आईजी भारत सिंह भी खम ठोंक रहे हैं। इनके अलावा भी टिकिट की दौड़ में कई और रिटायर आईएएस, आईपीएस बताए जा रहे हैं। रिटायर डीजी राजीव श्रीवास्तव भी संघ में सक्रिय हैं। टिकिट के लिए वे भी बीजेपी के संपर्क में हैं। दरअसल, 15 साल से सत्ता में जमी बीजेपी एंटी इंकाम्बेंसी का असर कम करने फ्रेश चेहरों को ढूंढ रही है। इस कड़ी में कुछ और लोगों को पार्टी में शामिल किया जा सकता है।

कलपेगी आत्मा

रमन कैबिनेट ने अटलजी के नाम पर नया रायपुर के साथ ही कई संस्थानों का नामकरण कर दिया। इसमें बाकी तो ठीक है, पर माड़वा ताप बिजली घर का नामकरण लोगों को खटक रहा है। दरअसल, कोरबा में बना माड़वा बिजली प्लांट के माथे पर देश का सबसे महंगा पावर प्लांट का दाग लगा है। 3000 करोड़ इसके बनने में फूंक गया। एक मेगावॉट पर 9.2 करोड़ रुपए लागत आई है। यह सब हुआ प्लांट निर्माण में लेट लतीफी पर। ऐसे प्लांट का नाम अगर अटलजी के नाम पर रखा जाएगा तो जाहिर है, उनकी आत्मा कलपेगी ही।

फिल्डिंग में कमजोर

अंबिकापुर जैसे बड़े जिले का कलेक्टर रह चुकीं किरण कौशल को सरकार ने बालोद जैसे छोटे जिले की कमान सौंप दी, तो लोगों का चौंकना स्वाभाविक था। दरअसल, मुंगेली के बाद अंबिकापुर भेजी गई किरण का नाम किसी बड़े जिले के लिए चल रहा था। लेकिन, बताते हैं आखिरी मौके पर जिस जिले में उन्हें भेजना था, वहां के कलेक्टर ने कुछ ज्यादा जोर लगा दिया। लिहाजा, सरकार के पास और कोई चारा नहीं बचा था। पता चला है, चुनाव आयोग भी किरण को एक बड़े जिले के लिए तैयार हो गया था। दिल्ली से पूछने पर यहां के अफसरों ने फीडबैक दिया था कि किरण के खिलाफ चुनाव आयोग के क्रायटेरिया के अलावा और कोई एडवर्स नहीं है। लेकिन, ऐन पोस्टिंग के वक्त मामला गड़बड़ा गया।

ये तो हद है!

इलेक्शन हमेशा अर्जेंट होता है। लेकिन, छत्तीसगढ़ में आलम यह है कि कलेक्टर निर्वाचन कार्यालय का ही नहीं बल्कि मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी का फोन रिसीव नहीं कर रहे। सीईओ सुब्रत साहू ने कलेक्टरों को कड़ा पत्र भेजकर चेताया है कि वे आयोग को हल्के में न लें। उन्होंने लिखा है कि मेरा फोन हो या उनके दफ्तर का, हर हाल में वे पिक करें। यदि व्यस्त हों तो कॉल बैक करें। ये तो वाकई पराकाष्ठा है। सीईओ को लेटर लिखना पड़ रहा है। दरअसल, अधिकांश कलेक्टर नए जमाने के हैं। जरूरत है चीफ सिकरेट्री मंत्रालय में एक रिफ्रेशर कोर्स आयोजित कर सभी का ज्ञानवर्द्धन करवाएं। वरना, आचार संहिता लगने पर कई कलेक्टर हिट विकेट होंगे।

दस का दम

सामान्य प्रशासन विभाग ने सेंट्रल डेपुटेशन के लिए नाम भेजकर आईएएस अंकित आनंद को भले ही उलझन में डाल दिया। लेकिन, राज्य सरकार ने दम दिखाया। सरकार ने भारत सरकार से न केवल आर्डर चेंज करने के लिए लिखा है बल्कि रायपुर कलेक्टर बनाने के लिए चुनाव आयोग के पास अंकित आनंद का नाम प्रपोज कर दिया है। अंकित अगर रायपुर कलेक्टर बन गए तो फिर जनगणना में जाने का सवाल ही नहीं उठता।

नॉन आईएएस की ताजपोशी?

बिजली विनियामक आयोग के चेयरमैन के लिए चार रिटायर नौकरशाहों ने भी आवेदन किया है। राधाकृष्णन, डीएस मिश्रा, एनके असवाल और आरएस विश्वकर्मा। लेकिन, नॉन आईएएस एसके शुक्ला के नाम को लेकर खुसुर-फुसुर कुछ ज्यादा हो रही है। शुक्ला यहां क्र्रेडा में लंबे समय तक पोस्टेड रहे हैं। पिछले साल यहां उनका समीकरण गड़बड़ाया तो सौर उर्जा अभिकरण का चेयरमैन बनकर हरियाणा चले गए। हरियाणा सरकार ने उन्हें राज्य मंत्री का दर्जा दिया है। राज्य मंत्री का ओहदा छोड़ अगर वे यहां चेयरमैन के लिए अप्लाई किए हैं, तो इसके अपने मायने होंगे। जाहिर है, नारायण सिंह के रिटायर होने के बाद विनियामक आयोग चेयरमैन का पोस्ट महीने भर से खाली है। नारायण भी रिटायर आईएएस थे। शुक्ला अगर चेयरमैन बनते हैं तो वे दूसरे नॉन आईएएस चेयरमैन होंगे। इसके पहिले बिजली बोर्ड के सचिव मनोज डे को सरकार ने एक मौका दिया था।

करप्शन पर लगाम?

किसानों के बिजली बिल का 100 रुपए लिमिट तय करने बिजली कंपनियों के कर्मचारियों को सरकार ने बड़ा झटका दिया है। क्योंकि, मीटर रीडिंग नियमित होती नहीं। एवरेज बिल के नाम पर हजारों रुपए का बिल किसानों को थमा दिया जाता था। फिर शुरू होता था उसे कम करने का खेल। जाहिर है, बिना नगद नारायण के बिल कम होता नहीं। अब लिमिट तय होने के बाद चलिये किसानों को राहत मिलेगी। और, चुनाव के समय किसान खुश हैं तो नेता भी। तभी तो कैबिनेट में जब यह प्रस्ताव आया तो सारे मंत्रियों ने एक सूर में कहा, इससे बढ़ियां बात और क्या हो सकती है।

हफ्ते का व्हाट्सएप

वो ईद पर भी खुश होते हैं, वो नानक जयंती पर भी खुश होता है, वो दीवाली पर भी खुश होता है, वो क्रिसमस पर भी खुश होता है, सरकारी कर्मचारियों का कोई मजहब नही होता, साहब वो हर छुट्टी पर खुश होता है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. नेताओं के जोगी कांग्रेस छोड़कर जाने के पीछे असली वजह क्या है?
2. किस जिले के एसपी चुनावी माहौल में भी थाईलैंड, पटाया का सैर कर आए?

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

तरकश के दस बरस

19 अगस्त
तरकश कॉलम के इस हफ्ते ठीक दस बरस हो गए। 2008 अगस्त के तीसरे हफ्ते से हरिभूमि में यह स्तंभ प्रकाशित होना प्रारंभ हुआ था। हालांकि, कुछ अखबारों में तरकश के तीर नाम से यह स्तंभ जरूर छपता था। लेकिन, संस्थान बदलने के क्रम में इसमें ब्रेक आ गया था। उन्हीं दिनों….तारीख तो याद नहीं है….पुराने मंत्रालय में एक सीनियर सिकरेट्री के कमरे में हरिभूमि के प्रधान संपादक हिमांशुजी से मुलाकात हो गई। मुलाकात पुरानी थी मगर उस रोज बरबस बात तरकश की निकली। और, उदार दृष्टि के हिमांशुजी ने तरकश शुरू करने के लिए न केवल हामी भरी बल्कि इसके लिए रविवार का दिन भी तय कर दिया। अब, मेरे समक्ष संकट यह था कि मैं दिल्ली के एक नेशनल डेली से जुड़ा था। इसलिए नाम से कॉलम लिखने पर खतरा था। लिहाजा, प्रारंभ में एस दीक्षित के नाम से यह स्तंभ शुरू हुआ। इसके बाद विषम परिस्थितियों में ही तरकश ब्रेक हुआ। अब तो किसी रविवार को तरकश न आने पर जिस तरह से पाठकों के फोन आते हैं, उसे देखते कॉलम को ब्रेक करने से पहले सोचना पड़ता है। हालांकि, दस बरस की अवधि बहुत लंबी नहीं होती, पर इसे एकदम छोटी भी नहीं कही जा सकती। वो भी अनवरत। यह अवसर मुहैया कराने के लिए हिमांशुजी को आभार। लाखों पाठकों को भी शुक्रिया, जिनके हौसला अफजाई से तरकश ने एक दशक पूरा किया। कुछ सालों से तरकश हरिभूमि के साथ ही अब प्रदेश के सबसे विश्वसनीय न्यूज वेबसाइट न्यूपावरगेमडॉटकॉम पर भी उपलब्ध है। वेबसाइट पर भी इसे उम्मीद से कहीं ज्यादा प्रतिसाद मिल रहा है।

रमन के पीछे अटल!

अटलजी अब नहीं रहे। मगर छत्तीसगढ़ से जुड़े कई वाकये लोगों के अब भी जेहन में हैं। डा0 रमन सिंह को मुख्यमंत्री बनाने में भी उनका अहम रोल रहा। याद होगा, पार्टी को बहुमत मिलने के बाद वेंकैया नायडू को संसदीय बोर्ड ने सीएम चुनाव का पर्यवेक्षक बनाया था। वेंकैया को हाईकमान से दो नाम मिले थे। एक रमन सिंह और दूसरा रमेश बैस का। सांसद और मंत्री के रूप में सीनियर होने के नाते बैस का दिल्ली की राजनीति में पैठ ज्यादा थी। इसलिए, रमन के लीडरशिप में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भी बैस का नाम सामने आ गया। जबकि, रमन सिंह को केंद्रीय मंत्री से इस्तीफा दिलाकर छत्तीसगढ़ भेजा गया था। लोग कहते यह भी हैं कि प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए पहले बैस को ऑफर दिया गया था। लेकिन, वे केंद्रीय मंत्री का पद छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए। लेकिन, पार्टी के जीतते ही सीएम के दावेदार के रूप में बैस का नाम उछाल दिया गया। दरअसल, केंद्र का एक ताकतवर धड़ा बैस को सीएम बनाने के पक्ष में था। लेकिन, वेंकैया की रिपोर्ट के बाद तत्कालीन पीएम वाजपेयी ने रमन सिंह के नाम पर मुहर लगाने में देर नहीं लगाई।

तीन मंत्री

अटलजी छत्तीसगढ़ को बहुत वेटेज देते थे। कह सकते हैं, मध्यप्रदेश से भी अधिक। उनके प्रधानमंत्री रहने के दौरान केंद्र में छत्तीसगढ़ से तीन मंत्री रहे। डा0 रमन सिंह, दिलीप सिंह जूदेव और रमेश बैस। इससे पहिले कभी भी एक साथ तीन मंत्री नहीं रहे। राज्य निर्माण के पहिले श्रीमती इंदिरा गांधी, चंद्रशेखर और पीवी नरसिम्हाराव सरकार में विद्याचरण शुक्ल छत्तीसगढ़ की नुमाइंदगी करते रहे। जनता पार्टी सरकार में भी पुरुषोतम कौशिक मंत्री रहे। वीपी सिंह, इंद्रकुमार गुजराल और एचडी देवेगौड़ा ने तो किसी को भी मंत्री नहीं बनाया। मनमोहन िंसंह की दूसरी पारी में भी कुछ समय के लिए कांग्रेस के चरणदास महंत को राज्य मंत्री बनाया गया। अलबत्ता, मोदी सरकार में भी छत्तीसगढ़ से सिर्फ विष्णुदेव साय को केंद्रीय मंत्री बनने का अवसर मिला है।

ट्रांसफर पर लगाम

चुनाव आयोग ने छह अगस्त तक प्रशासनिक अफसरों को बदलने का मौका दिया था। इसके बाद मतदाता सूची के पुनरीक्षण का काम प्रारंभ हो जाने के कारण आयोग ने अब 27 सितंबर तक चुनाव कार्य से जुड़े किसी भी अफसर को हटाने पर रोक लगा दी है। याने कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर अब 27 सितंबर तक आयोग के नियंत्रण में रहेंगे। इसके करीब हफ्ते भर बाद आचार संहिता प्रभावशील हो जाएगी। याने अब जो भी करना होगा, 27 सितंबर के दो-तीन दिन के भीतर ही। क्योंकि, फिर पूरा सिस्टम चुनाव आायोग के नियंत्रण में आ जाएगा। हालांकि, पता चला है सरकार आयोग की विशेष अनुमति से कुछ कलेक्टरों को बदलना चाहती है।

बड़े जिले प्रभावित

आयोग से अनुमति मिलते ही बड़े जिले के तीन-से-चार कलेक्टर बदले जा सकते हैं। इनमें पहला नाम अंबिकापुर कलेक्टर किरण कौशल का है। सरकार के आग्रह के बाद भी चुनाव आयोग उन्हें रिलीफ देने तैयार नहीं हुआ। किरण पिछले विस चुनाव के दौरान अंबिकापुर में सीईओ थी। और, आयोग के क्रायटेरिया के अनुसार पिछले चुनाव के दौरान पोस्टेड अफसर उसी जिले में इस चुनाव में उस पोस्ट या प्रमोशन के पोस्ट पर नहीं रह सकता। लिहाजा, किरण का बदला जाना तय है। सरकार चूकि किरण को राहत दिलाने आयोग तक में दरख्वास्त की थी….अमित शाह के कार्यक्रम के बाद उनका नम्बर काफी बढ़ा हुआ है। जाहिर है, उन्हें अंबिकापुर से चेंज करने पर सरकार उन्हें छोटा-मोटा जिला तो देगी नहीं। उन्हें एक बड़ा जिला मिलने जा रहा है। किरण के अलावे तीन और बड़े जिलों के कलेक्टरों को बदलने की अटकलें हैं। इनमें से एक को मंत्रालय भेजा जाएगा और दूसरे को अपग्रेड करके बड़े जिले में शिफ्थ किया जाएगा। इनमें कुछ नाम ऐसे होंगे, जो आपको चकित करेंगे।

डीएस का पलड़ा भारी

बिजली विनियामक आयोग के चेयरमैन और मेम्बर के लिए आधा दर्जन आवेदन आएं हैं। लेकिन, इनमें दो का ही पलड़ा सबसे भारी है। रिटायर ब्यूरोक्रेट्स डीएस मिश्रा और जीएस मिश्रा। डीएस एसीएस से रिटायर हुए और जीएस प्रिंसिपल सिकरेट्री से। जीएस माटी पुत्र हैं और सत्ता के गलियारों में उनकी पैठ भी अच्छी है। लेकिन, डीएस के लिए आईएएस लॉबी जुटी है। असल में, आईएएस लॉबी में हमेशा से डायरेक्ट आईएएस का प्रभाव रहा है। वो नहीं चाहती कि राज्य निर्वाचन के बाद बिजली विनियामक आयोग का पोस्ट भी प्रमोटी आईएएस के पास चला जाए। निर्वाचन में ठाकुर राम सिंह कमिश्नर हैं। लिहाजा, दोनों मिश्र बंधुओं में डीएस का पलड़ा अभी तक भारी दिख रहा है। ऐन वक्त पर अगर उपर से कोई नाम आ गया तो फिर बात अलग है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. चुनाव आयोग की परीक्षा में फेल एक कलेक्टर को सरकार ने प्रमोशन कैसे दे दिया?
2. अमित शाह के छत्तीसगढ़ विजिट में किस अफसर के बीजेपी प्रवेश की जबर्दस्त चर्चा है?

रविवार, 12 अगस्त 2018

धोखे में या इरादतन?

12 अगस्त
आईएएस अंकित आनंद के भारत सरकार में डेपुटेशन से ब्यूरोक्रेसी स्तब्ध है। हर कोई जानना चाह रहा है कि सरकार के इस पसंदीदा अफसर का नाम धोखे में भारत सरकार को चला गया या इरादतन। आखिर, अंकित साढ़े तीन साल से बिजली वितरण कंपनी संभाल रहे हैं। सरकार को उनका कोई विकल्प नहीं मिल रहा था। जिन आईएएस को अच्छे कामों की वजह से सरकार ने कलेक्टर नहीं बनाया, उनमें राजेश टोप्पो के अलावा अंकित भी हैं। जाहिर है, सरकार अगर लौटी तो उन्हें कम-से-कम एक बड़े जिले का कलेक्टर बनना तय था। लेकिन, जीएडी ने सब गु़ड़ गोबर कर दिया। बताते हैं, भारत सरकार ने जनगणना डायरेक्टर के लिए भारत सरकार से तीन नाम मांगे थे। जीएडी ने अंकित आनंद, यशवंत कुमार समेत एक महिला आईएएस का नाम प्रपोज कर दिया। आमतौर पर भारत सरकार उपर के दो नामों पर विचार करती है। यशवंत का चूकि विजिलेंस क्लियरेंस नहीं था। इसलिए, उनका नाम कट गया। अंकित आईआईटीयन हैं। कंप्यूटर साइंस में उन्होंने बीटेक किया है। इसलिए, उनका नाम ओके हो गया। राज्य सरकार के पास जब इसका आदेश पहुंचा तो आफिसर्स आवाक रह गए। अब सरकार केंद्र को लेटर भेज रही है कि अंकित को एडिशनल चार्ज के रूप में स्टेट में भी काम करने की छूट दी जाए। भारत सरकार ने अगर यह प्रस्ताव मान भी लिया तो भी अंकित का इसमें नुकसान ही हैं। न तो वे एडिशनल चार्ज में कलेक्टर बन पाएंगे और ना ही राज्य सरकार उन्हें महत्वपूर्ण पोस्टिंग दे पाएगी। बहरहाल, सवाल िंफर वही है कि यह सब घोखे में हुआ या इस बिहारी अफसर को ठिकाने लगाया गया?

कप्तानी ब्रेक

राजनांदगांव से हटाए गए एसपी प्रशांत अग्रवाल हफ्ते भर में जबर्दस्त वापसी करते हुए बलौदा बाजार का पुलिस कप्तान बनने में कामयाब रहे। लेकिन, कप्तानी ब्रेक होने से जाहिर तौर पर उन्हें झटका लगा होगा। 2008 बैच के इस आईपीएस का राजनांदगांव तीसरा जिला था। सरकार ने पहली लिस्ट में उन्हें पीएचक्यू में एआईजी बनाया गया। और, चार दिन बाद दूसरी सूची में बलौदा बाजार रवाना कर दिया। वैसे भी वीवीआईपी जिले के अफसरों को कम-से-कम एक पोस्टिंग अच्छी मिलती है। राजनांदगांव सीएम का निर्वाचन जिला है। लिहाजा, प्रशांत को अपेक्षाकृत बड़ा जिला मिलने की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन, उनके साथ उल्टा हो गया। पीएचक्यू अगर उन्हें नहीं भेजा गया होता तो बलौदा बाजार उनका चौथा जिला होता। आखिर, लगातार कप्तानी के अपने मतलब होते हैं। छत्तीसगढ़ में बद्री मीणा लगातार सात जिले के एसपी रहे हैं। जो अब तक का रिकार्ड है। हालांकि, संजीव शुक्ला पांचवा जिला कर रहे हैं। जशपुर, राजनांदगांव, रायगढ़, रायपुर और अब दुर्ग। लेकिन, अब वे डीआईजी बन जाएंगे। इसलिए, दुर्ग उनका आखिरी जिला होगा। प्रशांत के डीआईजी बनने में अभी करीब चार साल बचे है। इसलिए, बद्री के रिकार्ड का उनसे खतरा हो सकता था। लेकिन, अब लगता है बद्री का रिकार्ड टूटना मुश्किल होगा।

कलेक्टर की उलझन

सरकार के आग्रह के बाद भी अंबिकापुर कलेक्टर किरण कौशल के मामले में चुनाव आयोग ने अभी तक कोई फैसला नहीं किया है। आयोग से न ना हो रहा है और न हां ही। जाहिर है, ऐसे में किसी भी अफसर के लिए असमंजस की स्थिति होगी। हालांकि, उपर से किरण को अश्वस्त किया गया है, आयोग को उन्हें कंटीन्यू करने के लिए तैयार कर लिया जाएगा। मगर जब तक वहां से कोई आदेश नहीं आएगा, तब तक तो पेंडूलम जैसी ही उनकी स्थिति रहेगी। स्वाभाविक तौर पर काम पर भी इसका असर पड़ेगा। दरअसल, पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान किरण अंबिकापुर जिपं की सीईओ थीं। चुनाव आयोग के नियमानुसार कोई अफसर अगर पिछले चुनाव के समय वहां पोस्टिंग रहा हो तो अब प्रमोशन पर वहां पोस्ट नहीं हो सकता। सरकार ने अफसरों की कमी का हवाला देते हुए इस क्लॉज से रियायत देने के लिए आयोग को सीईसी क जरिये लेटर लिखा है।

फर्स्ट टाईम-1

मंत्रालय में ज्वाइंट सिकरेट्री यशवंत कुमार को सरकार ने ऐसी पोस्टिंग दी कि लोग बोल रहे हैं….भूतो न भविष्यति। उन्हें वाणिज्य, उद्योग और उर्जा से हटाकर डायरेक्टर लोकल फंड आडिट बनाया गया है। यह पोस्ट या तो एडिशनल तौर पर रहा है या फिर किसी प्रमोटी आईएएस के पास। रेगुलर रिकू्रट्ड आईएएस के पास सिंगल विभाग के रूप में कभी नहीं रहा। 2007 बैच के आईएएस यशवंत की कलेक्टरी की गाड़ी बीजापुर से जो उतरी, अब वे ट्रेक पर आने का नाम नहीं ले रही। एक तो जवानी के तीन साल उन्हें मंत्रालय में बितानी पड़ गई और अब तो उन्हें वहां से भी बाहर का रास्ता दिखा गया है।

फर्स्ट टाईम-2

अरबन एडमिनिस्ट्रेशन में विवेक ढांड, अजय सिंह, एमके राउत, सीके खेतान, आरपी मंडल सरीखे आईएएस सिकरेट्री रहे हैं। उस विभाग को जीएडी ने स्पेशल सिकरेट्री निरंजन दास के हवाले कर दिया है। निरंजन राप्रसे से आईएएस में आए हैं। इससे पहिले इस विभाग में इतना जूनियर अफसर कभी भी पोस्ट नहीं रहा। रोहित यादव स्पेशल सिकरेट्री थे। लेकिन, वे डायरेक्ट आईएएस थे। यद्यपि, विभाग की कमान मिलने के बाद निरंजन ने गजब का उत्साह दिखाया है। हफ्ते भर में बिलासपुर और बस्तर का दौरा कर आए। अब देखना है, सरकार के इस नए प्रयोग में वे कितना खरा उतरते हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. एक अफसर को बेहद सफाई से क्यों किनारे लगा दिया गया?
2. पैराशूट नेताओं को कांग्रेस टिकिट नहीं देगी तो आरसी पटेल, विभोर जैसे अफसरों का क्या होगा?

रविवार, 5 अगस्त 2018

वनवास खतम

5 अगस्त
सरकार ने आईएएस अविनाश चंपावत का वनवास खतम कर दिया है। उन्हें सरगुजा से बुलाकर अब सिंचाई विभाग की कमान सौंप दी है। जाहिर है, उन्हें अच्छी पोस्टिंग मिली है। चंपावत को पिछले साल लेबर विभाग में चल रहे विवादों के बाद सरगुजा भेज दिया था। हालांकि, बाद में उनकी आईपीएस पत्नी नेहा चंपावत के लिए सशस्त्र बल में डीआईजी का नया पोस्ट क्रियेट कर वहां भेज राहत दी थी। अब, चूकि अविनाश रायपुर लौट रहे हैं। इसलिए, नेहा का आर्डर भी समझिए जल्दी ही निकलेगा।

टेंशनलेस लिस्ट!

सरकार ने 21 आईएएस अफसरों प्रभार में फेरबदल किया। इतनी बड़ी संख्या के बाद भी सरकार ने गजब की जादुगरी दिखाते हुए सबको संतुष्ट किया। कोई भी मायूस नहीं हुआ। भुवनेश यादव और यशवंत कुमार को भी कुछ-न-कुछ दिया। भुवनेश को तो एमडी नॉन का चार्ज मिल गया। बस्तर कलेक्टर धनंजय देवांगन को भी सरकार ने हटाया तो वहीं पर प्रमोट करते हुए उन्हें वहां का कमिश्नर बना दिया। बस्तर कमिश्नर दिलीप वासनीकर हटे तो वो भी रायपुर और दुर्ग का कमिश्नर बनकर। प्रसन्ना आर को फिर से कमिश्नर हेल्थ का चार्ज। कांकेर कलेक्टर को भी प्रमोट करके कमिश्नर सरगुजा। डॉ0 कमलप्रीत को जीएडी का अतिरिक्त प्रभार देकर उनका वजन बढ़ा दिया। अलरमेल मंगई डी, संगीता पी, निरंजन दास का दायित्व भी सरकार ने बढ़ाया है। संगीता पी को जीएसटी में आउटस्टैंडिंग काम करने का सरकार ने इनाम दिया।

उम्मीदें टूटी

फोर्सली रिटायर डीआईजी केसी अग्रवाल को हाईकोर्ट से आखिरकार राहत नहीं मिल सकी। कोर्ट ने कैट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें अग्रवाल के रिटायरमेंट के खिलाफ फैसला दिया था। इससे अग्रवाल को झटका लगा ही, कई और नौकरशाहों की उम्मीदें टूट गईं। भारत सरकार ने पिछले साल आईजी राजकुमार देवांगन, डीआईजी केसी अग्रवाल, एएम जुरी, प्रिंसिपल सिकरेट्री अजय पाल सिंह और बीएल अग्रवाल को सेवा से रिटायर कर दिया था। इनमें से केसी अग्रवाल और बीएल अग्रवाल के पक्ष में कैट का निर्णय आया था। इससे बाकी अफसरों की भी नौकरी में लौटने की उम्मीदें बढ़ी थीं। लेकिन, केसी के मामले में भारत सरकार बिलासपुर हाईकोर्ट में अपील करके अफसरों की उम्मीदों को तोड़ दिया।

तीन नाम

एडिशनल इलेक्शन आफिसर अपाइंट करने के लिए सामान्य प्रशासन विभाग ने तीन आईएएस अफसरों के नामों का पेनल भारत निर्वाचन आयोग को भेजा था। इनमें एस भारतीदासन, यशवंत कुमार और शिखा राजपूत शामिल थी। निर्वाचन आयोग ने इनमें से 2006 बैच के आईएएस भारतीदासन के नाम को हरी झंडी दे दी। पता चला है, चीफ इलेक्शन आफिसर सुब्रत साहू भी भारतीदासन को चाह रहे थे। वैसे भी, निर्वाचन आयोग सीईओ की सलाह से ही आयोग में नियुक्तियां करता है ताकि कामकाज में समन्वय बना रहे। लिहाजा, जीएडी ने ऐसा पेनल बनाया कि भारतीदासन को अपाइंट करने में कोई दिक्कत नहीं हुई।

ऐसा भी होता है

निर्वाचन आयोग ने कलेक्टरों का चुनावी ज्ञान परखने के लिए परीक्षा ली। इसके लिए तीन सेंटर बनाए गए थे। रायपुर, बिलासपुर और बस्तर। परीक्षा सुचारु रुप से हो, इसके लिए दिल्ली से दो पर्यवेक्षक आए थे। लेकिन, उन्हें बिलासपुर और बस्तर भेज दिया गया। रायपुर सेंटर पर बिना पर्यवेक्षक का इंतजाम हुआ। लोकल अफसर एग्जाम कंडक्ट कराए। और, सबसे बढ़ियां रिजल्ट रायपुर सेंटर का रहा। सबसे अधिक कलेक्टर और एआरओ बिलासपुर और बस्तर केंद्र से फेल हुए। बताते हैं, रायपुर केंद्र में परीक्षार्थियों में समन्वय का अद्भूत नजारा दिख रहा था। सभी ने मिलजुल कर परीक्षा दी। जाहिर है, रिजल्ट तो बढ़ियां आएगा ही।

शराब और युवा कल्याण

नए फेरबदल में आबकारी आयुक्त एवं सचिव डीडी सिंह को शराब के साथ-साथ खेल एवं युवा कल्याण विभाग सिकरेट्री का अतिरिक्त प्रभार देकर इस सीधे-साधे अफसर को सरकार ने उलझन में डाल दिया है। डीडी अब सरकारी दुकानों में शराब बिकवाएंगे और दूसरी ओर खेल और युवाओं के कल्याण पर काम करेंगे। ये तो उलटबांसी हो गई। बहरहाल, उनकी परेशानी इस बात को लेकर है कि युवाआें के बीच वे नशाबंदी की बात कैसे करेंगे। कोई उल्टे सवाल दाग दिया तो?

पति-पत्नी कलेक्टर

सरकार ने 2010 बैच की आईएएस रानू साहू को कांकेर कलेक्टर बनाया है। वे पिछले साल से कलेक्टर की वेटिंग में थीं। इस बैच में चार आईएएस हैं। इनमें से तीन कलेक्टर बन चुके हैं। उनके हसबैंड जेपी मौर्य भी इसी बैच के हैं और वे सुकमा कलेक्टर हैं। कलेक्टर बनने से छूटी थीं सिर्फ रानू। ऐसे में, उनके मन की पीड़ा समझी जा सकती थी। लेकिन, सरकार ने कांकेर जैसे जिले का कलेक्टर बनाकर इसकी भरपाई कर दी। आमतौर पर किसी आईएएस का कांकेर दूसरा जिला होता है। लेकिन, रानू को पहली बार में कांकेर मिल गया। उन्हें कलेक्टर बनाकर सरकार ने 2010 बैच को भी क्लोज कर दिया है। चलिये, अब 2011 बैच की उम्मीदें बढ़ेगी।

तीसरे कलेक्टर दंपति

राज्य बनने के बाद जेपी मौर्या और रानू साहू तीसरे कलेक्टर दंपति होंगे। इससे पहिले विकास शील बिलासपुर और निधि छिब्बर जांजगीर में एक समय में कलेक्टर थे। इसके बाद अंबलगन पी और अलरमेल मंगई डी भी कलेक्टर रहे। और अब जेपी मौर्य और रानू साहू को ये मौका मिला है। मौर्य दंपति पर एक पुराने अफसर इतने मेहरबान थे कि जेपी को सुकमा और रानू को सरगुजा भेज दिया गया था। लेकिन, वक्त बदला। सरकार ने अब दोनों को न केवल कलेक्टर बना दिया बल्कि नजदीक भी।

अंत में दो सवाल आपसे

1. फेरबदल में वे कौन से दो कलेक्टर बच गए, जिनका विकास यात्रा फेज-2 के बाद ट्रांसफर किया जाएगा?
2. क्या विभागीय जांच की वजह से सरकार ने कांकेर कलेक्टर को हटाकर सरगुजा भेज दिया?

रविवार, 22 जुलाई 2018

एक और एसीएस!

22 जुलाई
भारत सरकार ने छत्तीसगढ़ के आईएएस अमिताभ जैन को एडिशनल सिकरेट्री इम्पेनल कर दिया है। याने राज्य सरकार के बाद केंद्र सरकार ने भी उनका रुतबा बढ़ा दिया है। राज्य में वे वैसे ही वित्त, वाणिज्यिक कर, गृह, जेल और परिवहन जैसे बेहद अहम विभाग संभाल रहे है। 89 बैच के आईएएस अमिताभ फिलहाल प्रिंसिपल सिकरेट्री हैं। और, उनका एडिशनल चीफ सिकरेट्री का प्रमोशन अगले साल जनवरी में ड्यू होगा। मगर बीवीआर सुब्रमण्यिम के जम्मू-कश्मीर के चीफ सिकरेट्री बनने के बाद एसीएस का एक पद खाली हुआ है। फिर, फायनेंस की वजह से सरकार के नजदीक हैं ही। लिहाजा, उन्हें एसीएस प्रमोट करने की चर्चा पहले से चल रही थी। लेकिन, अब जबकि भारत सरकार ने भी उन्हें एडिशनल सिकरेट्री में इम्पेनल कर दिया है। अमिताभ का पलड़ा अब और भारी हो गया है। सो, अब किसी भी दिन उन्हें एसीएस बनाने के लिए मंत्रालय में डीपीसी हो जाए, तो चौंकिएगा मत। एसीएस का राज्य में तीन कैडर और तीन एक्स कैडर पोस्ट है। याने छह। और अफसर हैं पांच हीं। अजय सिंह, सुनील कुजूर, सीके खेतान, आरपी मंडल और केडीपी राव। जैन का नम्बर छठ होगा।

जीएडी का कमाल

छत्तीसगढ़ का सामान्य प्रशासन विभाग किस ढर्रे पर चल रहा है, आप इससे अनुमान लगा सकते हैं। एग्रीकल्चर प्रोडक्शन कमिश्नर याने एपीसी किसी भी राज्य का बेहद महत्वपूर्ण पद होता है। उसके बिना कृषि विभाग में पत्ता नहीं खड़कता। लेकिन, अपने छत्तीसगढ़ में राज्य बनने के बाद 18 साल में किसी को सुध ही नहीं आया कि एपीसी का पोस्ट क्रियेट किया जाए। जबकि, भारत सरकार ने उसे कैडर पोस्ट घोषित किया है। बताते हैं, राज्य में चूकि एक ही एपीसी होता है। इस दृष्टि से मध्यप्रदेश में भी पोस्ट एक ही था। राज्य निर्माण के दौरान अब एक का बंटवारा भला कैसे होता। और, छत्तीसगढ़ पोस्ट सृजित करना भूल गया। पर, कागजों में जीएडी जरूर एपीसी की पोस्टिंग कर देता है। दिलचस्प यह है कि अजय सिंह अभी चीफ सिकरेट्री हैं। इसके पहिले वे ही एपीसी थे। उनके पहिले भी और कई दिग्गज नौकरशाह एपीसी रहे हैं। अभी सुनील कुजूर यह पद संभाल रहे हैं। हालांकि, एपीसी ही नहीं, कमिश्नर एग्रीकल्चर का भी पोस्ट राज्य में नहीं है। इसका खुलासा तब हुआ, जब सरकार ने आलोक अवस्थी को कमिश्नर अपाइंट कर डाला। बाद में उनका आर्डर केंसिल किया गया। अब आप समझ सकते हैं…जीएडी के बारे में अब ज्यादा बताने की जरूरत नहीं है।

ऐसे भी सिकरेट्री

राज्य सरकार के स्पष्ट निर्देश के बाद भी गई प्रभारी सचिव अपने प्रभार वाले जिलों के विकास कार्यां में न रुचि लेते और न ही वहां रात गुजारते। ऐसे नौकरशाहों को केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय के सिकरेट्री दुर्गा शंकर मिश्रा से सीखना चाहिए कि उपर वाले ने अवसर दिया है तो काम कैसे करना चाहिए। मिश्रा कल रायपुर पहुंचे। दिन भर की थकाउं बैठकों के बाद भी वे आज सुबह स्मार्ट सिटी के हेरिटेज वॉक में पैदल घूमे। आज वे राजनांदगांव में रुकेंगे। राज्य बनने के बाद 18 साल में कोई पहला केंद्रीय सचिव होगा, जो छत्तीसगढ़ में दो दिन रुका होगा। और, वह भी पांव-पांव चलकर ग्राउंड वर्क को देखा। नगरीय प्रशासन सचिव रोहित यादव और रायपुर निगम कमिश्नर रजत बंसल को भी पता चल गया कि ऐसे भी ब्यूरोक्रेट्स होते हैं। मीटिंगों और देर रात डिनर के बाद भी मिश्रा ने दोनों को सुबह छह बजे विजिट के लिए बुला लिया था।

राष्ट्रपति के दौरे के बाद

राज्य सरकार अब राष्ट्रपति के बस्तर प्रवास की तैयारियों में जुट गई है। लिहाजा, कलेक्टर, एसपी, आईजी के ट्रांसफर अब कम-से-कम 26 जुलाई तक तो नहीं ही होंगे। इसकी वजह यह है कि बस्तर संभाग के भी कुछ आईएएस, आईपीएस ट्रांसफर में प्रभावित होंगे। दंतेवाड़ा एसपी का बदलना तो तय ही है। इससे पहिले 14 अप्रैल के पीएम विजिट के कारण ही बस्तर के कलेक्टरों का ट्रांसफर रुका था। बस्तर को छोड़ सरकार ने पांच जिलों के कलेक्टरों को बदल दिया था।

उद्घाटन का रिटेक

फिल्मों के सीन का रिटेक तो आपने सुना होगा लेकिन, किसी उद्घाटन का रिटेक नहीं सुने होंगे। लेकिन, नया रायपुर में ऐसा हुआ। दरअसल, नया रायपुर के कनवेंशन सेंटर के इनाग्रेशन से पहले सीएसआईडीसी चेयरमैन छगन मुंदड़ा उद्योगपतियों को स्टॉल का भ्रमण करा रहे थे। इस बीच सीएम मंच पर पहुंच गए। मुंदड़ा को पता चला तो भागते हुए मंच पर गए तब तक सीएम बटन दबा चुके थे। बाद में, आवास पर्यावरण मंत्री राजेश मूणत ने सीएम से आग्रह किया कि उद्घाटन में चेयरमैन की फोटो नहीं आई है, भाई साब…..। सीएम इशारा समझ गए….मुस्कराए। फिर, मुंंदरा का मान रखने के लिए उन्होंने फिर बटन दबाया। इस बार फ्रेम में मंत्री, चेयरमैन समेत सभी आ थे।

बृजमोहन छाता

विधानसभा चुनाव की रणभेड़ी बजने का समय जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है, नेताओं की प्रचार सामग्रियां तैयार होकर गोडाउन में जमा होती जा रही हैं। अलबत्ता, सरकार के सबसे वरिष्ठ मंत्री बृजमोहन अग्रवाल चुनाव प्रचार में सबसे आगे निकल गए हैं। रायपुर में बृजमोहन छाप रंग-बिरंगे छाता बंटने लगे हैं। इसमें मंत्री और कमल की तीन-तीन फोटो लगी हुई हैं। हालांकि, छाता चाइनिज है। लेकिन, बरसात में लोगों के लिए काफी उपयोगी है। इसे फोल्ड करके बैग में रखा जा सकता है। बताते हैं, बृजमोहन इस बार 50 हजार की लीड का टारगेट रखकर तैयारी कर रहे हैं। लेकिन, यह तभी संभव हो पाएगा, जब विपक्ष का प्रत्याशी उनके मापदंड पर खरा उतरे।

एक अनार, सौ बीमार

पीसीसीएफ के दो पदो ंके लिए डीपीसी होने के ढाई महीने बाद भी आदेश नहीं निकल पाया। खबर है, वन विभाग ने पोस्टिंग के लिए नोटशीट उपर भेज दी थी। लेकिन, सीएम ने मंत्री से चर्चा लिख दिया। मंत्री ने इस पर सीएम से चर्चा भी कर ली है। लेकिन, बताते हैं, पसंद, नापसंद के चक्कर में मामला आगे नहीं बढ़ पा रहा। किसी एक नाम पर पीसीसीएफ आरके सिंह को दिक्कत है तो दूसरे पर सरकार को। कश्मकश की वजह है वाईल्डलाइफ। वाइल्डलाइफ एक अनार सौ बीमार जैसे हो गया है। छत्तीसगढ़ के बाहर से भी इस पोस्ट के लिए एप्रोच लगाए जा रहे हैं। अब देखना है, यह कश्मकश कब खतम होता है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. राज्य निर्वाचन कार्यालय में एडिशनल सीईओ की नियुक्ति से 2004 से लेकर 2008 बैच के आईएएस क्यों घबराए हुए हैं?
2. दो ऐसे मंत्री का नाम बताइये, जो अपने विधानसभा इलाके में सबसे ज्यादा काम किया हो और दूसरा सबसे कम?

शनिवार, 21 जुलाई 2018

दिल्ली टेस्ट

15 जुलाई
विधानसभा चुनाव में बीजेपी का टिकिट पाने के लिए अबकी दिल्ली टेस्ट पास करना होगा। पहले भाई साब लोग टिकिट फायनल करके औपचारिक मुहर लगाने के लिए लिस्ट आलाकमान को भेज देते थे। मगर इस बार ऐसा नहीं होगा। लिस्ट तो यहां से जाएगी। मगर मुहर उन्हीं के नाम पर लगेगा, जिनका नाम दिल्ली वालों की लिस्ट में भी होगा। बता दें, बीजेपी आलाकमान एक सर्वे करा चुका है और संकेत हैं, दूसरा सितंबर में कराए। इसके बाद रायपुर से जो लिस्ट जाएगी, उसे टैली किया जाएगा। अगर दोनों फीट बैठेंगे तो टिकिट फायनल वरना बाय-बाय कर दिया जाएगा।

जोगी रथ

विधानसभा चुनाव प्रचार में रथ अबकी आकर्षण का केंद्र रहेंगे। विकास यात्रा में मुख्यमंत्री डा0 रमन सिंह का रथ दौड़ ही रहा था। अब, जनता कांग्रेस का जोगी रथ आने वाला है। मुंबई में उनका रथ बन रहा है। इसमें हाइड्रोलिक स्टेज होगा, जिससे उपर आकर जोगी लोगों को संबोधित करेंगे। जोगी के करीबी लोगों की मानें तो 15 अगस्त तक जोगी रथ बनकर रायपुर आ जाएगा। उधर, कांग्रेस का भी परिवर्तन रथ बनने की खबर है। परिवर्तन रथ से कांग्रेस नेता निकलेंगे प्रचार करने।

रोहित की रिलिविंग

सेंट्रल डेपुटेशन पर दिल्ली जा रहे आईएएस रोहित यादव को केंद्रीय कामर्स एवं इंडस्ट्री, तथा नागरिक उड्डयन मंत्री सुरेश प्रभु का प्रायवेट सिकरेट्री बनाया गया है। हालांकि, रोहित 2002 बैच के आईएएस हैं और यहां सिकरेट्री भी हो गए थे। इस लिहाज से केंद्रीय मंत्री के पीएस की पोस्टिंग बहुत अच्छी तो नहीं कही जा सकती। लेकिन, यह भी सच हैं कि पीएस की बजाए अगर डिपार्टमेंट में नियुक्ति हुई होती तो राज्य सरकार चुनाव से पूर्व उन्हें कदापि रिलीव नहीं करती। लेकिन, मंत्री के पीएस का मामला है, इसलिए उन्हें अब रिलीव करना पड़ेगा। रोहित के लिए राहत की बात यह है कि एक तो उनकी फेमिली दिल्ली में है और दूसरा पीएस के रूप में उनकी पोस्टिंग सिविल एवियेशन के लिए हुई है। चलिये, रोहित के दिल्ली जाने से बिलासपुर और सरगुजा एयरपोर्ट का लायसेंस जल्दी मिल जाएगा।

छोटी लिस्ट

इरीगेशन सिकरेट्री डॉ0 रोहित यादव के दिल्ली के लिए रिलीव होने के बाद मंत्रालय में सिकरेट्री लेवल पर एक छोटी लिस्ट निकलनी अब तय हो गई है। क्योंकि, सिकरेट्री इरीगेशन सोनमणि बोरा भी अगस्त फर्स्ट वीक में एक साल के स्टडी लीव पर विदेश जा रहे हैं। लिहाजा, दो बड़े विभाग खाली होंगे। अरबन एडमिनिस्ट्रेशन और इरीगेशन। दोनों महत्वपूर्ण विभाग हैं। इसलिए, दोनों में पोस्टिंग करनी होगी। हालांकि, अफसरों का टोटा तो है। मंत्रालय में सिर्फ प्रसन्ना आर हैं, जिनके पास समाज कल्याण और युवा तथा खेल विभाग है। इरीगेशन और अरबन में से एक उन्हें दिया जा सकता है। संकेत हैं, इरीगेशन उन्हें मिले। अरबन एडमिनिस्ट्रेशन अंबलगन पी या उनकी पत्नी अलरमेल मंगई को मिल सकता है या हो सकता है ऐन मौके पर किसी और की इंट्री हो जाए।

डेपुटेशन में आईपीएस आगे

एडीसी टू गवर्नर अभिषेक शांडिल्य अब सीबीआई में एसपी होंगे। अभिषेक को मिलाकर भारत सरकार में डेपुटेशन पर जाने वाले आईपीएस अफसरों की संख्या ग्यारह पहुंच गई है। इनमें बीके सिंह, स्वागत दास, रवि सिनहा, राजेश मिश्रा, अमित कुमार, बद्री मीणा, राहुल भगत, ध्रुव गुप्ता, रामगोपाल वर्मा, अमित कांबले और अब अभिषेक शांडिल्य का नाम इसमें जुड़ गया है। यद्यपि, टीजे लांग कुमेर भी नागालैंड गए हैं, लेकिन उनका सेंट्रल नहीं इंटर स्टेट डेपुटेशन है। वहीं, आईएएस में डेपुटेशन पर जाने वालों की संख्या आधा दर्जन पहुंच पा रही। भारत सरकार में पोस्टेड आईएएस में मनोज पिंगुआ, निधि छिब्बर, विकास शील, अमित अग्रवाल, अमित कटारिया और रोहित यादव शामिल हैं। याने रोहित को मिलाकर सिर्फ छह। सातवें बीवीआर सुब्रमणियम इंटर स्टेट डेपुटेशन पर हैं। हालांकि, तीन आईएएस इसी साल डेपुटेशन से लौटे हैं। सीके खेतान, गौरव द्विवेदी और मनिंदर कौर द्विवेदी।

हार्ड लक

आईएएस का 2011 बैच आखिरकार कलेक्टर बनने से चूक ही गया। अब विधानसभा के लिए अक्टूबर में आचार संहिता लग जाएगा। फिर नवंबर में चुनाव और दिसंबर में नए सरकार का गठन। याने अब जो भी होगा, दिसंबर के बाद। जबकि, दूसरे कई राज्यों में 2011 बैच के आईएएस दो-दो जिले में कलेक्टरी कर चुके हैं। लेकिन, छत्तीसगढ़ में अभी 2010 बैच ही कंप्लीट नहीं हो पाया है। इस बैच की रानू साहू पिछले एक साल से अपनी बारी आने की प्रतीक्षा कर रही हैं। उनके बैच के तीन अन्य आईएएस को पिछले साल ही कलेक्टर बनने का मौका मिल गया था। हालांकि, रानू की पोस्टिंग अच्छी मिल हुई है। वे डायरेक्टर हेल्थ हैं। यह जिम्मेदारी एक-दो जिले की कलेक्टरी करके आने वाले आईएएस को मिलती थी। फिर भी कलेक्टरी, कलेक्टरी होती है।

प्रमोशन या भिक्षा?

आईएफएस अफसरों का लगता है स्वर्ण युग खतम हो गया है। अब प्रमोशन के आर्डर के लिए अफसरों को गिड़गिड़ना पड़ रहा है। आईएफएस केसी यादव और कौशलेंद्र सिंह को पीसीसीएफ बनाने के लिए डीपीसी हुए डेढ़ महीना होने जा रहा है। लेकिन, आदेश का पता नहीं है….कहां अटक गया। न मंत्रालय से सही जवाब मिल रहा और न ही मंत्री के बंगले से। डीएफओ, सीसीएफ जैसी फील्ड की पोस्टिंग हो तो आदमी दक्षिणा का ऑफर करें। पीसीसीएफ में अभी विभाग क्या मिलेगा, पता नहीं। फिर, खुरचन पानी की बात क्या करें।

अंत में दो सवाल आपसे

1. रायपुर आईजी की पोस्टिंग में ऐसी क्या वजह है कि सरकार को टालना पड़ रहा है?
2. अमूमन हर मामले पर बयान जारी करने वाली कांग्र्रेस पार्टी क्या वजह है कि जगदलपुर फ्लाइट बंद हो जाने के बाद खामोश रह गई?