शनिवार, 13 अप्रैल 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: आईएएस अब बीमार नहीं

 तरकश, 14 अप्रैल 2024

संजय के. दीक्षित

आईएएस अब बीमार नहीं

चुनाव ड्यूटी के नाम से सरकारी मुलाजिमों को ही नहीं, आईएएस अधिकारियों को भी पसीना आने लगता है। गिनती के अफसर होंगे, जिन्हें चुनाव आयोग के आब्जर्बर बनाए जाने से तकलीफ नहीं होती। वरना, बजरंगबली याद आने लगते हैं। वो तब, जब चुनाव आयोग इसके लिए अलग से हैंडसम पारिश्रमिक देता है। उपर से जिस जिले में चुनाव कराने जाएं, वहां जलजला होता है....कलेक्टर, एसपी आगे-पीछे करते रहते हैं। फिर भी चुनाव से बचने सौ बहाने। हालांकि, 2003 के विधानसभा चुनाव के बाद अफसर अब बीमारी का बहाना नहीं बना रहे। दरअसल, उस समय दो आईएएस अधिकारियों ने गंभीर बीमारी का हवाला देते हुए चुनाव आयोग से नाम काटने आग्रह किया था। इस पर आयोग ने उन्हें दिल्ली आकर एम्स के मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने का आदेश दिया था...ताकि पता चला सके कि अफसर को कितनी गंभीर बीमारी है। आयोग का लेटर मिलते ही दोनों आईएएस अधिकारियों की बीमारी काफूर हो गई और तुरंत इलेक्शन ड्यूटी की सहमति दे दी। इनमें से एक बेचारे नौकरी से बाहर हो गए और दूसरे अभी काफी सीनियर हो चुके हैं।

रिकार्ड इलेक्शन ड्यूटी

छत्तीसगढ़ के आईएएस अफसर इलेक्शन ड्यूटी को भले ही बिदकते हैं मगर इसी सूबे में दो ऐसे आईएएस अफसर रहे हैं, जिन्होंने इलेक्शन ड्यूटी का रिकार्ड बनाया है। इनमें पूर्व मुख्य सचिव सुनील कुजूर और वर्तमान सिकरेट्री भुवनेश यादव का नाम शामिल हैं। दोनों ने नौ से अधिक विधानसभा और लोकसभा चुनाव कराएं हैं। कुजूर बाद में छत्तीसगढ़ के सीईओ भी रहे। अबकी पहली बार छत्तीसगढ़ की दो महिला आईएएस की भी चुनाव में ड्यूटी लगाई गई है। पहले इफ्फत आरा को चुनाव आयोग ने आब्जर्बर बनाया। और अब, तंबोली फकीरभाई अय्याज के सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने से उनकी जगह किरण कौशल की ड्यूटी लगाई गई है।

ब्लैकलिस्टेड नहीं

चुनाव आयोग किसी कलेक्टर, एसपी पर अगर कार्रवाई करता है तो उसका नाम काली सूची में डाल देता है। उसे फिर किसी चुनाव में कोई जिम्मेदारी नहीं दी जाती। याद होगा, 2008 के विधानसभा चुनाव में आयोग ने एक कलेक्टर को हटाया था। सरकार ने रिजल्ट आने के बाद उसे फिर से दूसरे जिले का कलेक्टर बना दिया पर आयोग ने 2009 के लोकसभा चुनाव के समय फिर हटा दिया था। बहरहाल, पिछले विधानसभा चुनाव में दो कलेक्टर और तीन एसपी हटाए गए थे, आयोग उनका नाम ब्लैकलिस्टेड से हटा दिया है। जाहिर है, दुर्ग एसपी शलभ सिनहा बस्तर में एसपी हैं और वे चुनाव करवा रहे हैं। हटाए गए दोनों कलेक्टर संजीव झा और तारन प्रकाश सिनहा को आयोग ने आब्जर्बर बनाया है। बताते हैं, इन पांच में से एक अफसर ने कार्रवाई के बाद चुनाव आयोग में प्रेजेंटेशन दिया था। उन्होंने बताया था कि चुनाव की तैयारियों के लिए क्या-क्या काम किए उन्होंने। आयोग इससे संतुष्ट होकर सभी को आरोपों से बरी कर दिया।

50 लाख की कंपनी, अरबों में

किसी एक विभाग में सप्लाई करके कोई कंपनी अगर पांच साल में एक हजार गुना अपनी पूंजी बढ़ा लेती है, तो यह चमत्कार छत्तीसगढ़ में ही संभव है। पहले हम बताते हैं, 2007 में मलेरिया और उपकरण खरीदी घोटाला हुआ था, उसमें डायरेक्टर, ज्वाइंट डायरेक्टर समेत कई बड़े अफसर जेल गए थे। बाद में इसकी सीबीआई जांच भी हुई। बहरहाल, छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने इस कांड के बाद स्वास्थ्य विभाग के खटराल अधिकारियों से खरीदी का काम ले कर सीजीएमएस बना दिया। याने छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कारपोरेशन। इसका गठन इस मकसद से किया गया कि सरकारी अस्पतालों को टाईम पर, क्वालिटीयुक्त दवाइयां उपलब्ध होंगी...एक्सपर्ट लोग कंपनियो से बारेगेनिंग कर वाजिब मूल्य पर दवाइयां खरीदेंगे। इसके अलावा सरकार का ये भी मानना था कि डॉक्टर लोग खरीदी वगैरह ठीक से नहीं कर पाते...प्रोफेशन लोग यह काम बेहतर ढंग से कर पाएंगे मगर सीजीएमसी के अफसरों ने ऐसा गुल खिलाया कि छत्तीसगढ़ की कंपनियां मालामाल हो गई। अभी 290 करोड़ की सप्लाई करने वाली कंपनी चर्चा में है, पांच साल पहले उसका टर्न ओवर 50 लाख था, वह अब बढ़कर करीब 500 खोखा हो गया है। जब ढाई रुपए के सौल्यूशन को तीन हजार रुपए में सप्लाई किया जाएगा तो कंपनियां फलेंगे-फूलेंगी ही। सीजीएमएससी पिछले पांच बरसों से बड़े दलालों और माफियाओं का अड्डा बन गया है। उसके अफसरों को आम आदमी के स्वास्थ्य से क्या वास्ता! उसका मकसद कंपनियों को मोक्ष प्राप्त करवाना है।

डिमोशन

संघ के एक सीनियर पदाधिकारी का डिमोशन हो गया। बताते हैं, सरकार में किसी नियुक्ति के लिए उन्होंने संघ के भीतर बात नहीं रखी। अलबत्ता, किसी को पता नहीं चला। जब नियुक्ति की खबर मीडिया में आई तो संघ के कान खड़े हुए। बात उपर तक पहुंची और भाई साहब को किनारे कर दिया गया। असल में, संघ की ऐसी व्यवस्था है कि सीधे सरकार से नियुक्ति नहीं करा सकते। पहले संघ में प्रस्ताव रखा जाता है। फिर चर्चा होती है। उसके बाद नाम संगठन मंत्री को भेजे जाते हैं। और वहां से फिर सरकार के पास जाता है। भाजपा शासित सभी राज्यों में लगभग यही सिस्टम है।

पांच सीटों पर चुनाव

छत्तीसगढ़ में लोकसभा की 11 सीटें हैं। इनमें कुछ बरसों से ऐसा ट्रेंड चल रहा कि लोकसभा की सीटें जिस पार्टी को मिलती है, लगभग एकतरफा जैसी स्थिति होती है। लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे भी ऐसे ही रहे। बीजेपी को नौ और कांग्रेस को दो। जबकि, सियासी पंडितों द्वारा बीजेपी को पिछले बार चार-से-पांच सीटें दी जा रही थी। इसकी वजह भी थी। 15 साल सरकार चलाई पार्टी 15 सीटों सिमट गई थी। नेताओं में नैराश्य आ गया था। कोई उत्साह नहीं। भगवान भरोसे चुनाव लड़ा गया। पर मोदी मैजिक की वजह से 11 में से 9 सीटें बीजेपी की झोली में आ गई तो राजनीतिक प्रेक्षक भी हतप्रभ रह गए। खैर बात...अब इस लोकसभा चुनाव 2024 की। चार महीने तक सत्तानशीं रही कांग्रेस पार्टी छह सीटों पर कहीं दिखाई नहीं पड़ रही। ये सीटें हैं...रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, जांजगीर, रायगढ़, सरगुजा। रायपुर में बृजमोहन अग्रवाल जीत के लिए नहीं लड़ रहे। वे रिकार्ड बनाने की कोशिश में हैं। ताकि, दिल्ली की सियासत में सम्मानजनक हैसियत बन जाए। जिन पांच सीटों पर मुकाबला प्रतीत हो रहा, भले ही वह परसेप्शन के आधार पर हो...उनमें बस्तर, कांकेर, राजनांदगांव, महासमुंद और कोरबा शामिल हैं। वैसे, बीजेपी के रणनीतिकारों को चार महीने पहले विधानसभा चुनाव में 35 सीटें जीतने वाली कांग्रेस को हल्के में नहीं लेनी चाहिए। छत्तीसगढ़ कांग्रेस का गढ़ रहा है। बीजेपी को ध्यान रखना चाहिए....विधानसभा चुनाव 2023 में उसे दलितों के वोट नहीं मिले। उपर से मुस्लिम और ईसाई समाज के वोट कांग्रेस को एकतरफा मिलते ही हैं। उदाहरण के तौर पर बिलासपुर लोकसभा सीट को ले सकते हैं। बिलासपुर में कांग्रेस बेहद कमजोर स्थिति में है। मगर वहां मुस्लिम, क्रिश्चियन, दलित और यादव वोटों का समीकरण ऐसा है कि बीजेपी जीतेगी जरूर मगर बाहरी प्रत्याशी होने के बाद भी लीड पिछले बार से कम हो सकती है। क्योंकि, देवेंद्र यादव को मुस्लिम, क्रिश्चियन और दलित वोटों के साथ अब यादव के वोट भी जुड़ जाएंगे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. एक महिला पुलिस अधीक्षक को एक से बढ़कर एक कलेक्टर क्यों मिल जा रहे?

2. इस बात में कितनी सत्यता है कि आबकारी घोटाले में एक बड़ी गिरफ्तारी होने वाली है?


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें