शनिवार, 26 मई 2012

तरकश, 27 मर्इ


ये दोस्ती.....

नौकरशाही में ऐसी दोस्ती देखने को बड़े कम ही मिलती है। बैचमेंट के लिए शायद ही कोर्इ ब्यूरोके्रटस इतना सोचता होगा। अपने सुनील कुमार सीएस बनें तो बैचमेट एवं मित्र एसवी प्रभात को नहीं भूले। हैदराबाद डेपुटेशन से प्रभात लौटे तो रिटायरमेंट में महीना भर बचा था। इसके बाद भी उनके लिए डीपीसी हुर्इ और वे एसीएस बन गए। और अब, सुनील कुमार ऐसे समय पर छुटटी पर गए हैं, जब प्रभात की नौकरी का आखिरी हफता चल रहा है। सबसे सीनियर अफसर होने की वजह से जाहिर है, प्रभात को ही प्रभारी सीएस बनना था। और ऐसा ही हुआ। प्रभात 31 मर्इ को रिटायर होंगे और सुनील कुमार उसी दिन शाम को रायपुर पहुंचेंगे। नौकरी के इस पड़ाव पर प्रभात को आखिर, कितनी बड़ी चीज मिल गर्इ। 10 दिन सीएस रह लेंगे। बायोडाटा में लिखाएगा, प्रभारी सीएस। प्रभात के बारे में बता दें, राज्य बनने के बाद अधिकांश समय उन्होंने डेपुटेशन में बिताया है। एकाध साल ही छत्तीसगढ़ में रहे होंगे।

झटका

अजर्ुन सिंह और दिगिवजय सिंह के साथ लंबे समय तक काम किए आर्इएएस अफसर बैजेंद्र कुमार अब, भाजपा सरकार में अहम ओहदे पर हैं। मगर लगता नहीं, कांग्रेस के उनके तार कमजोर हुए हंै। राहुल गांधी के दौरे के एक दिन पहले उनके इनर सर्किल के दो लोग तैयारियों के सिलसिले में दिल्ली से रायपुर आए, तो बैजेंद्र से मिलना नहीं भूले। बैजेंद्र के घर वे डिनर पर आए और पूरे तीन घंंटे रहे। राज्य के बारे में फीडबैक लिया। अब बैजेंद्र की सुनिये, संबंधों को राजनीतिक चश्मे से ही नहीं देखना चाहिए.......आखिर, व्यकितगत रिश्ते भी तो होते हैं। चलिए, मान लिया। मगर कांग्रेस के लिए तो परेशानी की बात हो सकती है न। कांग्रेस के कुछ नेता बंदूक की नाल बैजेंद्र की ओर जो किए रहते हैं।

राहत

कलेक्टरों के लिए राहत की बात हो सकती है कि तत्काल कोर्इ लिस्ट नहीं निकलने जा रही। सरकार के निकटवर्ती सूत्रों की मानें तो जिलों में मानसून सत्र के बाद ही चेंजेज हाेंगे। इससे पहले, कलेक्ट्रेट कांफें्रंस में उनके पारफारमेंस देखे जाएंगे। जिनका पारफारमेंस अच्छा होगा और विधानसभा चुनाव के समय चुनाव आयोग के तीन साल के रेंज में नहीं आ रहे हाेंगे, तो उन्हें बरकरार रखा जाएगा। पता चला है, चार-पांच जिलों के कलेक्टरों से सरकार संतुष्ट नहीं है। ऐसे में उनकी छुटटी हो जाए तो आश्चर्य नहीं। इनमें नए जिलों के कलेक्टर भी शामिल हैं। सीनियरिटी के हिसाब से भुवनेश यादव और पी दयानंद को मौका मिलना लगभग तय माना जा रहा है। भुवनेश के जूनियर को पिछले फेरबदल में जिला मिल चुका है।

चेंज 

आर्इएएस मेंं न सही, मगर पुलिस महकमे में अगले हफते तक एक छोटी लिस्ट निकलने की खबर है। इनमें कुछ एडिशनल एसपी और दो-तीन एसपी होंगे। इनमें एक बड़े जिले के कप्तान के भी प्रभावित होने की खबर है। इसके बाद एक बड़ा फेरबदल 88 बैच के तीन अफसरों की डीपीसी के बाद होगा। मुकेश गुप्ता, संजय पिल्ले और आरके विज आर्इजी से एडीजी बनेंगे। जाहिर है, इसके बाद रेंज में भी बदलाव होंगे। पुलिस मुख्यालय में भी विभागों की अदला-बदली होगी।

सौ चूहे.....

राज्य के आर्इएफएस अधिकारी इन दिनों प्रींसिपल सिकरेट्री डीएस मिश्रा से बेहद खफा हैं। पिछले हफते कैम्पा की बैठक में मिश्रा आर्इएफएस अफसरों को डोमिनेट करने के लिए टिवटर से कागज डाउनलोड करके लाए थे। सीएस सुनील कुमार की मौजूदगी में कैम्पा की भर्राशाही पर उन्होंने अफसरों की जमकर खिांचार्इ की। मिश्रा का गुस्सा हालांकि गलत नहीं था। कैम्पा के लिए केंद्र से मिले ढार्इ सौ करोड़ में तफरी के अलावा और कुछ नहीं हुआ है। उसी पैसे से जंबो टीम विदेश भी घूम आर्इ। अफसरों ने करोड़ों रुपए का वाट लगा दिया। लेकिन वन अफसरों की बातों में भी दम है। आर्इएफएस कहते हैं, मिश्रा को पहले अपनी ओर देखना चाहिए। दूसरों को 5 लाख तक की गाड़ी की बंदिशें हैं और खुद चलते हैं, 12 लाख की गाड़ी में। कृषि विभाग से हटने के बाद भी लंबे समय तक बीज विकास निगम की टवेटा रखे रहे। सीएम और सीएस से भी बढि़यां चेम्बर है मिश्राजी का। याने सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।

दागी अफसर

यंग्री यंग मैन कहे जाने वाले मिनिस्टर राजेश मूणत के बारे मेंं आम धारणा है, गड़बड़ लोगों को वे प्रश्रय नहीं देते। बलिक उनके हाट-हूट से ऐसे लोग दूर ही रहते हैं। मगर उधोग महकमे में अभी जो चल रहा है, वो चौंकाने वाला हैं। सीएसआर्इडीसी के एक दागी अधिकारी को पिछलें दरवाजे से उधोग विभाग में ओएसडी बनाने के लिए फाइल मूव हो गर्इ है। बताते हैं, अधिकारी के खिलाफ राज्य बनने के पहले लोकायुक्त में मामला दर्ज हुआ था और इसी वजह से बिना प्रमोशन उन्हें रिटायर होना पड़ा। सो, मंत्रालय में चर्चा सरगर्म है, मंत्रीजी ऐसे लोगों को कब से लिफट देने लगे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. राहुल गांधी के दौरे के बाद सूबे के किस बड़े कांग्रेस नेता की सिथति सबसे ज्यादा खराब हुर्इ है?
2. जिस महिला नक्सली शांतिप्रिया और मीना चौधरी को पकड़ने की कीमत राजनांदगांव के एसपी विनोद चौबे को जान देकर चुकानी पड़ी थी, सरकारी वकील द्वारा उनकी जमानत का विरोध न करना क्या जायज है?

1 टिप्पणी:

  1. आपकी लेखनी मंझी हुई है, इसमें कोई शक नहीं. तरकश को ब्लॉग पर नियमित देखकर ख़ुशी हो रही है. आने वाले दिनों में यह एक संग्रहनीय दस्तावेज बन जायेगा. निशाने पर अफसरों के अलावा सत्ता पर बैठे लोग भी हों, तो बढ़िया रहेगा.

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