तरकश, 21 जून 2026
संजय के. दीक्षित
मंत्री और बीपी का एक्स्ट्रा डोज
18 जून की शाम मंत्रियों के लिए ही नहीं, बल्कि मीडिया के सियासी बीट कवर करने वाले पत्रकारों के लिए बड़ा तनाव भरा रहा। दरअसल, मंत्रियों की इमरजेंसी बैठक बुलाई गई थी मगर इससे अधिक अपडेट देने कोई तैयार नहीं था। जिनसे पूछो, वे खुद ही जिज्ञासु बने बैठे थे। उधर, सूचना मिलते ही मंत्री रायपुर के लिए भागे तो मीडियाकर्मियों का भी आधी रात के बाद तक सीएम हाउस के सामने जमावड़ा लगा रहा। बताते हैं, अंबिकापुर के एक मंत्रीजी को रास्ते में डॉक्टर से बात करनी पड़ गई। डॉक्टर के कहने पर उन्होंने बीपी का एक एडिशनल डोज लिया, तब जाकर सीएम हाउस पहुंच पाए। मंत्रियों की बैठक को सनसनीखेज बनाने में हेलिकाप्टर और स्टेट प्लेन का भी बड़ा हाथ रहा। कोई यह यकीन करने के लिए तैयार नहीं था कि बिना किसी गंभीर इश्यू के इस तरह मंत्रियों को बुलाया नहीं जाता। डिप्टी सीएम विजय शर्मा राज्यसभा चुनाव के सिलसिले में रांची में थे, वे स्टेट प्लेन से रायपुर पहुंचे। खैर, मंत्रियों को क्यों बुलाया गया? इसके पीछे के निहितार्थ क्या थे? इस पर अलग-अलग ढंग से बातें की जा रही हैं। मगर बीजेपी के हीे लीडरों का मानना है कि सिर्फ मीटिंग बुलाने से ही चीजें नहीं बदलने वाली। बल्कि एक साथ कई मोर्चों पर काम करना होगा। मंत्री रिजल्ट नहीं दे पा रहे और अफसर सुन क्यों नहीं रहे, इसकी जड़ में जाना होगा। मंत्रिमंडल के कुछ बड़े विकेट चटखाने होंगे...छोटी-मोटी बलि लेने से सिस्टम के प्रति परसेप्शन नहीं बदलेगा।
सांप भी मर जाए और...
बेशक, दुनिया की कोई भी राजनीतिक पार्टी बिना पैसे के नहीं चलती। खासतौर पर जब पार्टी सरकार में होती है...चंदे के लिए उसकी अपनी व्यवस्था होती है। खैर...सियासी चंदे की बात आई, तो बीजेपी के पिछली सरकार के दौर का एक वाकया स्मरण हो आया। एक बार सरकार के साथ कुछ चुनिंदा मंत्रियों की बैठक हो रही थी। बैठक में क्षेत्रीय संगठन मंत्री सौदान सिंह भी थे। बातचीत के दौरान एक मंत्री का संदर्भ आया। किसी ने कहा...पार्टी के लिए योगदान देने फलां मंत्री को भी जिम्मेदारी देनी चाहिए। मगर सौदान सिंह ने एकदम से मना कर दिया। बोले...पार्टी के लिए चंदा देने के लिए अथॉराइज्ड करने का मतलब होगा, उन्हें दोनों हाथ से बटोरने के लिए फ्री कर देना। इसके बाद उस मंत्री का पत्ता कट गया। फंडा यह है कि पार्टी के योगदान के लिए उन्हीं मंत्रियों की सेवाएं लेनी चाहिए, जिसका काम और अंदाज गरिमामय हो। इससे सांप भी मार जाता है और लाठी भी नहीं टूटती।
एक एफआईआर और तीन जान
सिस्टम के एक जिम्मेदार अफसर से एफआईआर के संदर्भ में बात हो रही थी। मजमूं था...पुलिस को एफआईआर करने में देरी नहीं करनी चाहिए, भले ही अपराधो के आंकड़े बढ़ जाएं, मगर उसके दूरगामी फायदे होंगे। अफसर भी इससे पूर्णतः सहमत थे। अब इसे एक इतेफाक कहें कि जिस शाम एफआईआर पर इस स्तंभ के लेखक की शीर्ष अफसर से बात हो रही थी, उसी दौरान कोरिया में एक भयावह हमले में बीजेपी नेता समेत तीन लोगों की हत्या हो गई। और एफआईआर ही उसका कारण बना। रेत के माफियागिरी में जब एक पक्ष के खिलाफ सोनहत थाने में मुकदमा दर्ज हो गया तो दूसरा पक्ष भी थाना पहुंचा। मगर थाने का दरोगा ने इसे हल्के में लेते हुए एफआईआर दर्ज करने की बजाए यह कहकर लौटा दिया कि चिंता मत कीजिए, बात कर सब ठीक करा दूंगा। जाहिर है, अगर सेकेंड पार्टी की भी सुनवाई करते हुए अपराध दर्ज कर लिया गया होता तो काफी कुछ भड़ास निकल गया होता। मगर थाने से बैरंग वापसी ने पूर्व जनपद पंचायत अध्यक्ष के लोगों के गुस्से को और भड़का दिया। और आव देखा, न ताव, चार गाड़ियों में शाम के समय निकल गए, हिसाब चुकता करने। उधर, विरोधी पार्टी के गांव में पूरी तैयारी थी। जैसे ही गाड़ियां गांव में रुकी, चौतरफा हमले शुरू हो गए। बाकी गाड़ियों में बैठे लोग वक्त को भांपते हुए भाग निकले। मगर पूर्व जनपद पंचायत अध्यक्ष की गाड़ी फंस गई। उसके बाद जो हुआ, घटनास्थल को देख लोगों के रोंगटे खड़े हो गए। बताते हैं, लाठी-डंडे से पीटकर अधमरा करने के बाद गाड़ी में डाल आग लगा दी गई। इस जघन्य कांड की जड़ एक अदद एफआईआर रहा। बता दें, पुलिस द्वारा कार्रवाई की बजाए समझौता कराने के चलते सूबे में कई बड़ी घटनाएं हो चुकी है। फिर उसके बाद वही होता है...दो-चार पुलिस वालों का निलंबन, दिखावटी जांच और फिर वहीं ढर्रा। जिम्मेदार लोगों को इस बारे में सोचना चाहिए कि जब सक्षम लोगों की थाने में एफआईआर दर्ज नहीं की जा रही तो आम आदमी के साथ क्या सलूक होता होगा? वही भड़ास फिर चुनाव में निकलता है।
गंगा नहान
छत्तीसगढ़ में जमीन, जायदाद या ठगी, घोखाधड़ी तो दूर की बात गंुडे-मवालियों के खिलाफ आप थाने जाएं और तुरंत अपराध दर्ज हो गया तो समझिए गंगा नहा लिए। दो-चार जिले या थाने अपवाद हो सकते हैं। बाकी पूरे छत्तीसगढ़ में कमोवेश यही स्थिति है। बिना उपर के अफसरों से सिफारिश कराए थाने में मुकदमा दर्ज नहीं करा सकते आप। छत्तीसगढ़ के पुलिस सिस्टम को यूपी से प्रेरणा लेनी चाहिए। यूपी में जब से योगी आदित्यनाथ की सरकार आई है, थानों को निर्देश है...भले ही जांच के बाद खात्मा डाल दें, मगर एफआईआर करना होगा। कोरिया में भी अदद एक एफआईआर दर्ज कर लिया गया होता तो तीन लोगों की जान बच गई होती, बल्कि सूबे का नाम भी खराब नहीं होता कि यहां इस तरह की घटनाएं भी होती हैं।
कलेक्टर से रिटायर
कलेक्टर से रिटायर होने वाले अधिकारियों की बात करें तो अभी तक सिर्फ एक ही नाम है। छतर सिंह देहरे। पिछली कांग्रेस सरकार में वे गरियाबंद जिले से रिटायर हुए थे। रमन सिंह के दौर में रायपुर कलेक्टर ठाकुर राम सिंह चूकि सिकेट्री प्रमोट हो गए थे, लिहाजा रिटायरमेंट से महीना भर पहले उन्हें कमिश्नर बनाया गया था। बहरहाल, बात कलेक्टर से रिटायरमेंट की, तो इस समय गरियाबंद जिले में भगवान सिंह उइके कलेक्टर हैं। नवंबर में उनका रिटायरमेंट है। जाहिर है, वे हिट विकेट नहीं हुए तो भगवान सिंह उइके छतर सिंह के रिकार्ड की बराबरी कर लेंगे।
आईपीएस, पोस्टिंग और रिकार्ड
आईपीएस सुुंदरराज एनआईए में आईजी बनकर जा रहे हैं। बस्तर में उनकी पोस्टिंग बेमिसाल रही। सिर्फ इस मायने में नहीं कि देश के इस सर्वाधित हिंसाग्रस्त इलाके से माओवादियों के पैर उखड़ गए, बल्कि रिकार्ड लंबी पोस्टिंग के लिहाज से भी। जाहिर है, बस्तर की पोस्टिंग के नाम पर आईपीएस अधिकारियों की सांसें उखड़ने लगती थी, उस पुलिस रेंज में सुंदरराज पूरे 14 साल पोस्टेड रहे। याने 23 साल की आईपीएस की सर्विस में आधे से अधिक वक्त उनका बस्तर में गुजरा। एएसपी से लेकर एसपी, डीआईजी और आईजी तक रहे। उन्होंने लांग कुमेर के बस्तर पोस्टिंग का रिकार्ड तोड़ा नहीं, बल्कि उनसे काफी आगे निकल गए। सुुंदरराज ने कभी किसी नेता या अफसर से सिफारिश नहीं की, न गिडगिड़ाए, उन्हें वहां से हटाया जाए। जबकि, बस्तर से कई एसपी और आईजी जोर-जुगाड़ लगा साल भर से कम समय में ही भाग निकले।
तोते की जान...
बात आईपीएस सुंदरराज की बस्तर में 14 साल पोस्टिंग की हो रही तो यह भी जानना जरूरी है कि आईएएस, आईपीस की जान कहां अटकी रहती है। तोते की तरह आईएएस, आईपीएस की जान पोस्टिंग में अटकी रहती है। देश के लिए ये एक विडंबना है कि सबसे कठिन एग्जाम क्लियर कर सर्वाेच्च सर्विस में आने वाले ये अफसर देवपूत से कम नहीं होते। मगर अदद पोस्टिंग के लिए पॉलिटिशियन के आगे अपनी जमीर से समझौता कर डालते हैं। छत्तीसगढ़ में ईडी द्वारा सीज किए गए व्हाट्सएप चौट को कोई देख लेगा तो उसे विश्वास नहीं होगा कि इतने टॉप के अफसर ऐसा भी कर सकते हैं। जबकि, आईएएस, आईपीएस सिर्फ पोस्टिंग का मोह त्याग दे तो मजाल नहीं कि सिस्टम में बैठे लोग उनसे कोई गलत काम करा लें। मगर अफसरों को पोस्टिंग और पईसा का ऐसा चार्म...लगातार अफसर जेल जा रहे, तब भी स्थितियां नहीं बदल रही।
2004 बैच के आईजी
बस्तर आईजी सुंदरराज के सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने के बाद जिन आईपीएस अधिकारियों को नया आईजी बनाए जाने की चर्चाएं चल रही हैं, उनमें 2004 बैच के आईपीएस अजय यादव और बद्री नारायण मीणा का नाम सबसे प्रमुख है। दोनों के पास पर्याप्त तजुर्बा है। अजय सात जिलों के एसपी और तीन रेंज के आईजी रह चुके हैं, तो बद्री नौ जिले के एसपी और तीन रेंज के आईजी रह चुके हैं। हालांकि, बस्तर आईजी की पोस्टिंग अभी भी चुनौतीपूर्ण है। नक्सलियों का खात्मा हो गया है मगर बड़ी तादात में फोर्स अब भी वहां तैनात है। बस्तर के डेवलपमेंट पर भी सरकार का भरपूर फोकस है। जाहिर है, डेवलपमेंट के साथ सिविल क्राइम में भी इजाफा होता है। लिहाजा, सरकार ठोक बजाकर ही आईजी का फैसला करेगी।
मामा से गुहार
छत्तीसगढ़ के 12 हजार मनरेगा कर्मचारियों को पिछले तीन महीने से पगार नहीं मिला है। मनरेगा के अफसरों को अब काम लेना मुश्किल होता जा रहा। दरअसल, केंद्रीय पंचायत मंत्री शिवराज सिंह ने कई बार आश्वासन दिया मगर अभी तक पैसे रिलीज नहीं किए हैं। सूबे के पंचायत मिनिस्टर विजय शर्मा को मामा से बात करनी चाहिए वरना डबल इंजन सरकार के खिलाफ कर्मचारियों का परसेप्शन बिगड़ेगा।
मंत्रालय का कॉफी हाउस
2012 में नवा रायपुर में मंत्रालय शिफ्ट हुआ था, तब से वहां की केटरिंग कॉफी हाउस के हाथ में रहा। कॉफी हाउस वे अधिकारियों, कर्मचारियों को जायकेदार व्यंजन वाजिब रेट पर तो मिलते ही थे, उसकी सर्विस भी कमाल की थी। सचिवालय के अफसरों का फरमान होता नहीं था कि गरमागरम चाय-कॉफी, स्नेक्स पहुंच जाता था। मगर पता नहीं क्या हुआ, कॉफी हाउस को वहां से चलता कर किसी प्रायवेट पार्टी को केटरिंग का काम सौंप दिया गया और अब हालत यह है कि सिकेट्री साब लोग दुखी हैं। कई बार तो ऐसा हुआ कि गेस्ट के जाने के बाद कॉफी या सूप पहंुचता है। कई अफसर अब अपने फ्रीज में छांछ, लस्सी और कोकोनॉट वॉटर रखने लगे हैं। ताकि, कुछ तो आवभगत कर सकें।
कलेक्टर का डेपुटेशन
बस्तर और बलौदा बाजार कलेक्टर के डेपुटेशन के बाद कांकेेर कलेक्टर नीलेश श्रीरसागर ने सेंट्रल डेपुटेशन के लिए अर्जी लगाई थी। सरकार ने उन्हें एनओसी भी दे दिया था। मगर अभी तक उन्हें क्लियरेंस मिला नहीं। पहले वे मसूरी एकेडमी जाना चाहते थे। मगर अब सुना है, अब वे दिल्ली के लिए ट्रॉय कर रहे हैं। अब देखते हैं, भारत सरकार से उनकी पोस्टिंग कब आती है, तब तक कांकेर कलेक्टर बनने की बाट जोह रहे दावेदारों को वेट करना होगा। और यदि, नीलेश का कहीं डेपुटेशन नहीं हुआ तो फिर उनके किसी और बड़े जिले में कलेक्टर बनने की दावेदारी प्रबल रहेगी। कांकेर में वैसे भी उनका दो साल कंप्लीट हो गया है। लोकसभा चुनाव 2024 के जस्ट बाद वे कांकेर कलेक्टर बन गए थे। जाहिर है, वे प्रतिभाशाली आईएएस तो हैं।
मंत्री की चार धाम यात्रा
मंत्री राजेश अग्रवाल का पिछले हफ्ते जन्मदिन था। उन्होंने परिवार के साथ चार धाम यात्रा कर अपना जन्मदिन मनाया। इस दौरान बाबा केदारनाथ और बद्री विशाल के समक्ष मत्था टेका। यद्यपि, मंत्रिमंडल की सर्जरी में राजेश अग्रवाल के उपर कोई खतरा तो नहीं दिखता। मंत्री बने उन्हें साल भर भी नहीं हुआ है। हो सकता है, बाबा केदारनाथ के दरबार में कमजोर विभागों को लेकर उन्होंने गुहार लगाई हो। पता ही है, राजेश मंत्री तो बन गए लेकिन, उन्हें पर्यटन में निबटा दिया गया। सरकार और संगठन ने ये भी ध्यान नहीं रखा...टीएस सिंहदेव को हराने में उनका कितना पेटी, खोखा निकल गया। लखनपुर की फर्नीचर दुकान तक खाली हो गई। वोटर्स बिना पैसा दिए, कुर्सी, टेबल, सोफा उठाकर ले गए। चलिये, बाबा केदारनाथ की कृपा रही, तो ब्याजमय सब वापिस हो जाएगा।
एसपी की बड़ी लिस्ट
छिटपुट तबादलों को छोड़ दें तो आईपीएस में जनवरी 2024 के बाद कोई बड़ी लिस्ट नहीं निकली है। जबकि, आईएएस और कलेक्टरों में हर साल दो-एक बड़ी लिस्ट निकल जाती है। 6 मई को ही सात कलेक्टरों समेत 42 आईएएस अधिकारियों का तबादला किया गया। बहरहाल, इस समय स्थिति यह है कि कई पुलिस अधीक्षक छोटे-छोटे जिलों में प्रमोट होकर डीआईजी हो गए हैं। पहले डीआईजी को संभागीय मुख्यालयों जैसे बड़े जिलों में ही पोस्ट किया जाता था। मगर पिछले पांच-सात सालों से अब तो दो-तीन ब्लॉक वाले जिलों में भी डीआईजी हैं। खैर, ढाई साल बाद आईपीएस की एक बड़ी लिस्ट निकलने वाली है। इसमें बस्तर में नए आईजी की पोस्टिंग होगी। जिले की बात करें तो 10 से 12 जिलों के एसपी चेंज होंगे। अधिकांश बड़े जिलों में नए एसपी पोस्ट होंगे। जाहिर है, एसपी की पोस्टिंग अगले विधानसभा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए की जाएगी...नए एसपी 2028 में चुनाव कराएंगे।
अंत में दो सवाल आपसे?
1. सीएम हाउस में मंत्रियों की बैठक हुई, उसमें प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव क्यों नहीं पहुंच पाए?
2. मंत्रियों और विधायकों की इमेज खराब करने में उनके स्टॉफ और चंगु-मंगू की कितनी भूमिका होगी?
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