शनिवार, 29 नवंबर 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: प्रमोटी आईएएस और भरोसा

 तरकश, 30 नवंबर 2025

संजय के. दीक्षित

प्रमोटी आईएएस और भरोसा

27 नवंबर की आईएएस की लिस्ट से ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने यह जतलाने का प्रयास किया है कि उसके पास विकल्प की कोई कमी नहीं है। जाहिर है, दो दिन पहले जिन 13 आईएएस अधिकारियों के ट्रांसफर किए गए, उनमें सात प्रमोटी आईएएस हैं। उसमें भी ऐन धान खरीदी के सीजन में जीतेंद्र शुक्ला को मार्कफेड एमडी का चुनौतीपूर्ण दायित्व सौंपा गया। उनके पास जलजीवन मिशन भी रहेगा। इसके अलावा पीएस एल्मा को शराब खरीदी करने वाली स्टेट मार्केटिंग कंपनी के साथ ब्रेवरेज कारपोरेशन का एमडी का बनाया गया है। इफ़्फ़त आरा स्पेशल सिकरेट्री रेवेन्यू के साथ नागरिक आपूर्ति निगम की एमडी होंगी। संतनदेवी जांगड़े संचालक आयुष, रेणुका श्रीवास्तव को डायरेक्टर महिला बाल विकास, रीता यादव प्रबंध संचालक खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड तथा लोकेश कुमार को डायरेक्टर हार्टिकल्चर की जिम्मेदारी दी गई है। कह सकते हैं, इस लिस्ट में प्रमोटी अफसरों का दबदबा रहा।


नारी शक्ति कमजोर?

छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक हलको में एक समय नारी शक्ति बहुत मजबूत हो गई थी। मगर वक्त के पहिये के साथ पराभाव होता चला गया। जूनियर अफसर के चीफ सिकरेट्री बनने की वजह से रेणु पिल्ले मंत्रालय से बाहर हो गईं। ऋचा शर्मा को चीफ सिकरेट्री बनने का मौका नहीं मिला, उपर से खाद्य विभाग भी हाथ से निकल गया। उधर, 27 नवंबर को 13 आईएएस अधिकारियों की लिस्ट निकली, उसमें भी माताजी लोगों को बड़ा झटका लगा...कोई इधर गिरा, कोई...। आर शंगीता का शराब से जुड़ी कंपनी और बोर्ड के एमडी का प्रभार भी पीएस एल्मा के पास चला गया। कुल मिलाकर लग रहा...ब्यूरोक्रेसी की नारी शक्ति जरा कमजोर हुई हैं।

बीजेपी-कांग्रेस भाई-भाई

जमीनों के गाइडलाइन रेट में वृद्धि को लेकर छत्तीसगढ़ में तूफान मचा है, उसमें बीजेपी और कांग्रेस नेताओं का भाईचारा भी परिलक्षित हो रहा है। बात ऐसी है कि जोर का झटका दोनों को लगा है। गाइडलाइन रेट बढ़ने से भूमाफियाओं और बिल्डरों को नुकसान होगा तो नेताओं का भी जमीन में इंवेस्टमेंट का धंधा मार खाएगा। ब्यूरोक्रेट्स की अपनी अलग बेचैनी है...काली कमाई को अब कहां खपाएंगे? यही वजह है कि चौतरफा प्रेशर बनाए जा रहे। सेल्फ गोल का खेल भी चल रहा। बीजेपी नेताओं के घेराव में किसका हाथ है, इंटेलिजेंस वालों से ये छिपा नहीं है। भ्रम ऐसा फैला दिया गया है कि गाइडलाइन रेट बढ़ने से सूबे का रियल इस्टेट बैठ जाएगा। जबकि, सच्चाई यह है कि जब हर साल 10 परसेंट बढ़ता था, तब रियल इस्टेट ज्यादा ग्रो किया। बता दें, गाइडलाइन रेट बढ़ने से आम आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। आखिर 2017 तक हर साल 10 परसेंट रेट बढ़ता ही था। बाकी राज्यों में भी ऐसा ही होता है। 2018 के बाद रेट बढ़ना बंद हो गया। इसमें जमीनों का धंधा खूब फला-फूला। अब आप इससे समझ सकते हैं कि कचना, विधानसभा रोड पर बिल्डरों का रेट है छह हजार से सात हजार रुपए फुट और सरकारी दर था हजार-बारह सौ। इसका सिर्फ युक्तियुक्तकरण किया गया है। आम आदमी को इसलिए भी इससे फर्क नहीं पड़ने वाला कि बाजार दर से पेमेंट पहले भी करना पड़ता था और अभी भी वैसा ही होगा। जिनके पास दो नंबर का पैसा था उन्हें उस व्यवस्था में काफी लाभ था। मगर मीडिल और लोवर क्लास के पास काली कमाई होती नहीं, सो गाइडलाइन रेट बढ़ने से खरीदी जाने वाली जमीन या मकान का रेट बढ़ेगा, तो उस हिसाब से उन्हें बैंकों से लोन मिल जाएगा। बहरहाल, बात बीजेपी-कांग्रेस भाई-भाई से तो यह बात छिपी नहीं कि छत्तीसगढ़ में इन दोनों पार्टियों के नेताओं का छत्तीसगढ़ की माटी से कितना प्रेम है। बल्कि, अब यह प्रेम भूख में बदल गया है।

गोल्ड में इंवेस्ट

छत्तीसगढ़ में अभी तक काली कमाई खपाने के दो ही प्रमुख माध्यम थे। जमीन और सोना। सोना चूकि एक लिमिट से अधिक नहीं खरीदा जा सकता। उसे सुरक्षित रखने का लफड़ा होता है, इसलिए इंवेस्टरों को जमीन में निवेश आकर्षित करता था। सरकारी रेट कौड़ियों के मोल होने से जमीन में 60 से 70 परसेंट रकम कैश में देना होता है और 30 से 40 परसेंट एक नंबर में। इससे इंकम टैक्स की भी काफी बचत होती थी। एक करोड़ रुपए की कोई जमीन खरीदी गई तो कागज में वो 30 से 40 लाख शो होता था। याने 60 से 70 लाख रुपए ब्लैक से व्हाइट हो गया। मगर गाइडलाइन रेट बढ़ने से अब जमीनों में काली कमाई का इंवेस्टमेंट नहीं होगा। जमीनों का सरकारी रेट बढ़ने के बाद छत्तीसगढ़ में मनी लॉड्रिंग पर अंकुश लगेगा मगर गोल्ड में निवेश बढ़ेगा। इससे सराफा व्यापारियों के चेहरे खिल गए हैं।

ब्यूरोक्रेसी को फ्री हैंड

पिछले दो महीनों में गुजरात, तेलांगना, बिहार और यूपी जाने का मौका लगा। वहां तेज गति से चल रहे डेवलपमेंट वर्क देखकर हैरानी हुई। खासकर यूपी, बिहार...जहां विकास की बातें बेमानी थी, अपराधों के नाम से इन दोनों प्रदेशों को जाना जाता था, ऐसे राज्य अब विकास के कार्यों में होड़ कर रहे हैं। इसका लाभ भी वहां के नेतृत्व को मिल रहा। इस सवाल पर कि 20 साल के शासन के बाद नीतीश कुमार लोकप्रिय क्यों? इसका जवाब आश्चर्यजनक आया। लोगों ने कहा...नीतीश कुमार ने नेताओं के लिए लक्ष्मण रेखा खींच दिया है। प्रशासन और पुलिस में नेताओं का हस्तक्षेप नहीं के बराबर रह गया है। जिस बिहार में कलेक्टर्स, एसपी के साथ बदसलूकी आम बात थी, वहां की अफसरशाही अब फ्री होकर डेवलपमेंट को अंजाम दे रही है।

छत्तीसगढ़ और अफसरशाही

अब बात छत्तीसगढ़ की करें, तो राज्य बनने के बाद सबसे खराब दौर में यहां की ब्यूरोक्रेसी गुजर रही है। बीजेपी के कई नेताओं को भी ये बात अच्छी नहीं लगेगी कि रमन सिंह सरकार अगर 15 साल चली तो उसके पीछे ब्यूरोक्रेसी और उसकी कर्मठ टीम की बड़ी भूमिका रही। कांग्रेस की सरकार पांच साल में विदा हो गई तो इसके पीछे एक बड़ा कारण सशक्त टीम का अभाव रहा। मध्यप्रदेश के समय डीपी मिश्रा, पीसी सेठी, अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह के दौर मे ंहमेशा इस हाईट के अफसर उनके पास रहे, जो गलत तो गलत कहने की हिम्मत रखते थे। इससे उन नेताओं को बड़ा फायदा मिला। बहरहाल बात छत्तीसगढ़ की तो...पहली बात, नए राज्य में पैसों के आए फ्लो ने अफसरशाही का बड़ा नुकसान किया। छत्तीसगढ़ अच्छा काम करने वाला कैडर नहीं रहा बल्कि देश की ब्यूरोक्रेसी में मलाईदार कैडर में केटेराइज्ड हो गया। कई आईएएस, आईपीएस ने इतना पैसा बना लिया कि बिल्डरों और कारोबारियों के साथ मिलकर व्यापार शुरू कर दिया। दूसरा कारण है राजनीतिक हस्तक्षेप। रिजल्ट देने वाले अच्छे अफसर भी आगे बढ़़कर काम करना नहीं चाहते। नौकरशाही की स्थिति इस समय ये हो गई है कि कोई भी बुरा भला बोल के चल दे रहा। यूपी में अपराधी द्वारा सोशल मीडिया में जिले के एसपी को गाली देने पर एनकाउंटर करके अरेस्ट कर लिया गया। मगर छत्तीसगढ़ के एक बड़े जिले के पुलिस कप्तान को फेसबुक पर एक छंटे बदमाश द्वारा क्या-क्या लांछन नहीं लगाया गया, मगर पुलिस दोनों हाथ बांधे बैठी रही। और जब एसपी साहब लोगों का ये स्थिति है तो एएसपी, डीएसपी और टीआई बेचारे क्या करेंगे? जाहिर है, इन सब चीजों से राज्य का बड़ा नुकसान हो रहा।

रिफार्म की ऐसी चोट

छत्तीसगढ़ में ये गजबे हो रहा है। रिफार्म हो रहा किसी और विभाग में और उसका इफेक्ट दिख रहा दूसरे विभाग में। हम बात कर रहे पंजीयन और राजस्व महकमे की। पंजीयन विभाग ने सबसे पहले रजिस्ट्री के साथ ऑटोमेटिक नामंतरण प्रारंभ किया। फिर पंजीयन में ऋण पुस्तिका की अनिवार्यता खतम की और अब रजिस्ट्री के 70 बिंदु वाले नियमों का सरलीकरण कर 15 कर दिया। पंजीयन विभाग में किए गए इन ऐतिहासिक सुधारों ने राजस्व विभाग के मुलाजिमों का बड़ा नुकसान कर डाला। तहसीलदारों से लेकर पटवारियों का इन्हीं तीनों कामों के लिए लोगों को चक्कर लगाना पड़ता था। मगर सरकार ने सुधार करके बड़ा गड़बड़ कर डाला। इस विभाग के लोगों की 70 परसेंट आमदनी इन्हीं तीनों चीजों से होती थी। रोड की जमीन को पटवारी कागजों में भीतर बता देते थे तो ऋण पुस्तिका बनवा लेना आसान काम नहीं था। मगर अब आलम यह हो गया कि छत्तीसगढ़ में नायब तहसीलदार और पटवारी की नौकरी का जादुई आकर्षण खतम हो जाएगा।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. फर्जी ईडी अफसर ने छत्तीसगढ़ के किन-किन आईएएस अधिकारियों से लाखों रुपए वसूल डाला?

2. क्या ये सही है कि डीजीपी कांफ्रेंस की कल समाप्ति के बाद कलेक्टर, एसपी की एक लिस्ट निकलेगी?

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