शनिवार, 18 जनवरी 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: सिंहदेव दो, हाथ की लकीरें एक

 तरकश, 19 जनवरी 2024

संजय के. दीक्षित

सिंहदेव दो, हाथ की लकीरें एक

छत्तीसगढ़ की सियासत में सिंहदेवों का बहुत अच्छा नहीं चल रहा है। ज्योतिषियों का कहना है कि उनकी कुंडली के राजयोग वाले घर में राहू का वास हो गया है। जाहिर है, उत्तर छत्तीसगढ़ वाले सिंहदेव मुख्यमंत्री की कुर्सी के निकट पहुंचकर उस पर बैठने से वंचित हो गए। हाईकमान के सामने उनके जिह्वा पर राहू आकर बैठ गया और कुर्सी की डिलिंग के दौरान विनम्रतापूर्वक जी बोल बैठे।

नतीजा यह हुआ कि कुर्सी उनके सामने से खिसक गई। यदि थोड़ा सा टाईट होकर इतना भर बोल गए होते...उम्र मेरी ढलान पर है, पहले मैं ढाई साल...फिर दाउजी। तो वे आज मुख्यमंत्री होते या फिर पूर्व मुख्यमंत्री तो कहलाते ही।

अब बात दक्षिण वाले सिंहदेव की। ये भी नाम के सिंहदेव निकले। वे समझ नहीं पाए और संगठन के कुछ नेताओं ने उन्हें मोहरा बनाते हुए मंत्री के लिए प्रोजेक्ट कर दिया। 15 दिन से उनके घर बधाइयों का तांता लगा रहा...। मगर राहू-केतु की प्रभाव कहें कि सिंहदेव के सामने से मंत्री का सजा थाल निकल गया। वे फिर से प्रदेश अध्यक्ष बना दिए गए...जो उन्हें गवारा नहीं था। दोनों सिंहदेवों को डॉ0 रमन सिंह और विष्णुदेव साय के पंडितों का पता लगाकर कुछ पूजा-पाठ करा लेना चाहिए।

अय्याशी का ट्रांजिट हॉस्टल

ट्रांजिट हॉस्टल इसलिए बनवाया जाता है कि कामकाज के सिलसिले में कोई सरकारी अधिकारी जिला मुख्यालय में आए तो उसे होटल में न रहना पड़े। मगर छत्तीसगढ़ के मुंगेली का ट्रांजिट हॉस्टल अफसरशाही की बदनामी का कारण बनता जा रहा है। वहां के ट्रांजिट हॉस्टल की रातें इतनी रंगीन होने लगी है कि उसकी चर्चाएं अब मुंगेली से चलकर राजधानी रायपुर तक पहुंचने लगी हैं।

दरअसल, मुंगेली छोटी जगह है। वहां अगर बाहर से हनी गर्ल बुलाई जाए या फिर सिस्टम की कोई तलाकशुदा युवती रोज वहां पहुंच जाए, तो ये बात भला कैसे छुपेगी। वैसे भी इस तरह की बातों को पंख लगने में देरी नहीं होती। सिस्टम को इसे नोटिस में लेनी चाहिए। क्योंकि, कोई उंच-नीच हुआ तो बात सरकार पर आएगी।

हेल्थ सिकरेट्री की मेजर सर्जरी

मेडिकल कारपोरेशन बोलें तो छत्तीसगढ़ का इकलौता सरकारी कारपोरेशन...जिसे सिस्टम नहीं, सप्लायर चलाते हैं। रेणु पिल्ले के सिकरेट्री हेल्थ और कार्तिकेय गोयल के सीजीएमससी एमडी रहने के दौरान एक पावरफुल महतारी की वहां से छुट्टी कर दी गई थी। मगर जैसे ही रेणु और कार्तिकेय हेल्थ से हटे, उसके अगले महीने एक बड़े सप्लायर ने महतारी की फिर से सीजीएमससी में पोस्टिंग करा दी। यह 2022 की बात रही होगी।

बहरहाल, सीएम सचिवालय ने नए हेल्थ सिकरेट्री अमित कटारिया को इशारा किया। इसके बाद अमित ने सीजीएमससी की एमआरआई कराई। जांच में एक महतारी की अदम्य साहस और पावर का पता चला। इतना पावर कि बड़ी वाली महतारी छोटी वाली को दीदी बोलती थी, ताकि कुर्सी सुरक्षित रहे। पता चला है, हेल्थ सिकरेट्री ने फायनेंस सिकरेट्री के संज्ञान में यह बात लाई और अगले दिन महतारी का आदेश निकल गया। जाहिर है, अमित की एक सर्जरी से सीजीएमससी की 60 परसेंट बीमारी का निदान हो गया।

पढ़ने-लिखने वाले आईएएस, But

अमित कटारिया को सीजीएमससी में एक और सर्जरी करनी होगी...इसके बाद दावा है कि सीजीएमससी 80 परसेंट भ्रष्टाचार मुक्त हो जाएगा। दरअसल, टेक्निकल विंग सीजीएमससी में भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा जरिया़ है। मेडिकल उपकरणों की खरीदी में टेक्निल अधिकारियों द्वारा टेंडर में ऐसे क्लाज जोड़ दिए जाते हैं, जिससे दूसरा कोई सिर पटक ले, मिलेगा उसे ही जिसे अफसर चाहते हैं। और ये टेक्निल चीजें अधिकांश आईएएस समझ नहीं पाते।

ब्यूरोक्रेट्स के साथ दिक्कत यह है कि हार्ड परिश्रम से यूपीएससी में उनका सलेक्शन तो हो जाता है मगर आईएएस बनने के बाद पढ़ना-लिखना एकदम बंद। पीए या विभाग के खटराल कर्मचारी, अधिकारी जो बता दिया, उसे ही नियम समझ बैठते हैं। सीजीएमससी में यही हुआ। कार्तिकेय गोयल के अलावा कोई भी एमडी सिस्टम में घुस नहीं पाया।

उसका खामियाजा यह हुआ कि अफसरों ने सप्लायरों के साथ गठजोड़ कर पिछले एक दशक में 10 हजार करोड़ से ज्यादा का खेला कर डाला। गनीमत है, सरकार ने अब सीजीएमससी की सर्जरी शुरू कर दी है। लेकिन, इसके साथ सिस्टम पर भी ध्यान देना चाहिए। छत्तीसगढ़ के दो करोड़ गरीबों के लिए दवा और उपकरणों की सप्लाई करने वाले इस विभाग का आलम यह है कि 14 साल में एक भी निगम का अपना कोई अधिकारी, कर्मचारी नहीं है। आउटसोर्सिंग के भरोसे इसे खींचा जा रहा।

ईओडब्लू जांच पर ब्रेक?

सीजीएमससी के संगठित भ्रष्टाचार की खबरें मीडिया में सुर्खिया बनने पर सिस्टम ने ईओडब्लू जांच की बात कही थी। इसके लिए फाइल भी आगे बढ़ गई थी। मगर छह महीने हो गए...कहीं से प्रेशर आया और फाइल ठहर गई। उधर, मंत्रिमंडल की सर्जरी की खबरें वायरल होने के दौरान विधानसभा में सीजीएमससी पर ध्यानाकर्षण आया तो स्वास्थ्य मंत्री को ईओडब्लू जांच की घोषणा करनी पड़ी। मगर अभी भी इसका कोई अता-पता नहीं है।

सवाल उठता है कि 10 हजार करोड़ के करप्शन की जांच को कौन रोक रहा है। लोग भी जानना चाह रहे कि 10 साल पहले 50 लाख का धंधा करने वाले दवा और उपकरण सप्लायर का 500 करोड़ टर्न ओवर कैसे हो गया? कौन से वे भ्रष्ट हाथ हैं, जिन्होंने सप्लायर को आर्थिक मोक्ष प्राप्त करवाते हुए 50 लाख से 500 करोड़ का आसामी बना दिया?

एक मंत्री, एक सचिव बट...

सरकार एक मंत्री, एक सिकरेट्री के नाम पर कुंदन कुमार को डायरेक्टर अरबन एडमिनिस्ट्रेशन से हटाकर हाउसिंग बोर्ड कमिश्नर और आरडीए का सीईओ बना दिया। याने ओपी चौधरी अब उनके मंत्री होंगे। नगरीय निकाय में होने के नाते अभी तक वे दो मंत्रियों में बंटे हुए थे। ओपी चौधरी के साथ अरुण साव के बीच। सरकार के जिम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि दो-तीन महीने में बाकी सचिवों का भी इसी तरह युक्तियुक्तकरण किया जाएगा।

याने एक मंत्री, एक सिकरेट्री। असल में, दो-दो, तीन-तीन मंत्री होने पर अफसरों को समन्वय बिठाने में कई बार दिक्कत होती है। मसलन, एक मंत्री की मीटिंग है और दूसरे ने कहीं बुला लिया तो फिर मामला गड़बड़ाता है। मगर इस खबर में महत्वपूर्ण यह है कि डायरेक्ट आईएएस को हटाकर प्रमोटी आईएएस रिमुजियेस एक्का को डायरेक्टर बनाया गया है।

इस विभाग में पहले निरंजन दास कमाल कर चुके हैं और अब उस अधिकारी को कमान सौंपी गई है, जो 35 परसेंट वाले युग में लंबे समय तक स्पेशल सिकरेट्री अरबन एडमिनिस्ट्रेशन रहे। हम किसी पर आरोप नहीं लगा रहे, जो हुआ, उसकी बात कर रहे...बाकी सरकार समझें।

5 को पीएम अवार्ड

छत्तीसगढ़ के पांच कलेक्टरों को अभी तक पीएम अवार्ड मिल चुका है। सबसे पहला अवार्ड सरगुजा कलेक्टर आर. प्रसन्ना को मिला था। उनके बाद फिर सरगुजा जिले की ही कलेक्टर रीतू सेन को। 2015 में दंतेवाड़ा कलेक्टर ओपी चौधरी को यह अवार्ड मिला। उनके बाद फिर दंतेवाड़ा के ही कलेक्टर सौरव कुमार को...और अब धमतरी कलेक्टर नम्रता गांधी को। पीएम अवार्ड ब्यूरोक्रेसी का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान माना जाता है। प्रधानमंत्री यह पुरस्कार प्रदान करते हैं।

कलेक्टर और भूमाफिया

जिस तरह कहा जाता है कि दरोगा और एसपी अगर चाह ले तो जिला अपराध मुक्त हो सकता है, उसी तरह सच्चाई यह है कि कलेक्टर अगर चाह ले तो भूमाफिया अवैध प्लाटिंग का खेल नहीं कर सकते। दरअसल, कलेक्टर ही रेवेन्यू का मुखिया होता है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपने पहले ही कलेक्टर कांफ्रेंस में कलेक्टरों से भूमाफियाओं के खिलाफ कड़ा से कड़ा एक्शन लेने कहा था। मुख्यमंत्री के निर्देश पर कुछ कलेक्टरों ने जांच-पडताल आगे बढ़ाई। जमीनों की जब्ती की कार्रवाई के साथ ही पुलिस में मुकदमा दर्ज कराया गया।

मगर मुश्किल से दो-तीन जिले में ही...बाकी जिलों के हाल नहीं बदले। सीधी सी बात है कि कलेक्टर जब तक हिम्मत नहीं दिखाएंगे, तब तक भूमाफियाओं पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता। गूगल में सर्च करने पर पता चला कि सिर्फ जांजगीर में एक बार कलेक्टर तारनप्रकाश सिनहा ने सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाले पांच भूमाफियाओं को एसपी विजय अग्रवाल से गिरफ्तारी करा जेल भेज दिया था।

दरअसल, अधिकांश कलेक्टरों के साथ दिक्कत यह है कि उनमें सबसे प्रतिष्ठित सर्विस के साथ ईमानदारी से न्याय करने का अब माद्दा नहीं बचा। वे गुडी-गुडी बन चाहते हैं कि दो-चार जिले की कलेक्टरी कर लें। इसलिए, अबके कलेक्टर जोखिम वाले कामों में हाथ नहीं डालना चाहते। पोस्टिंग उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है। जाहिर तौर पर भूमाफियाओं को ठिकाने लगाने का काम वही कलेक्टर कर सकता है, जो ट्रांसफर आदेश जेब में लेकर घूमता हो।

हालांकि, इसका दूसरा पहलू यह भी है कि छोटे राज्य में पॉलीटिकल हस्तक्षेप काफी बढ़ गया है। दमदारी से काम करने वाले कलेक्टरों को प्रोटेक्शन नहीं मिल रहा। 70 परसेंट कलेक्टर सिर्फ नौकरी कर रहे हैं...30 फीसदी जो अच्छे वाले हैं, वे भी ज्यादा उत्साह नहीं दिखाना चाहते। वजह...? यह कि छोटी-मोटी चूक में अब कोई बचाने वाला नहीं।

बेमेतरा की आईएएस एसडीएम की पिछले सरकार में इसलिए छुट्टी कर दी गई थी कि उन्होंने भूमाफियाओं के खिलाफ वहां मुहिम छेड़ दी थी। तो इस सरकार में भी सूरजपुर के एसडीएम लक्ष्मण तिवारी को रेत माफियाओं के खिलाफ कड़ाई से पेश आने की कीमत यह चुकानी पड़ी कि एक मंत्री ने उन्हें सूरजपुर से 700 किलोमीटर दूर सुकमा भिजवा दिया। लक्ष्मण छत्तीसगढ़ कैडर छोड़कर बिहार चले गए। छत्तीसगढ़ में जरूरत है कि एक अच्छे प्रशासनिक वातावरण तैयार करने की। क्योंकि, सरकार की नीतियों का क्रियान्वयन अफसर करते हैं और वही अगर भ्रष्ट सिस्टम के पार्ट बन जाएंगे या फिर असुरक्षित महसूस करेंगे, तो यह छत्तीसगढ़ के हित में नहीं है।

रोमांचक मुकाबला

छत्तीसगढ़ में मुख्य सूचना आयुक्त के एक पद के लिए इस बार भारत-पाकिस्तान जैसे मुकाबले की स्थिति निर्मित हो सकती है। इस पद के लिए 58 आवेदन आए हैं, उनमें वर्तमान मुख्य सचिव अमिताभ जैन, वर्तमान डीजीपी अशोक जुनेजा, पूर्व मुख्य सचिव आरपी मंडल और पूर्व डीजीपी डीएम अवस्थी जैसे प्रतिभागी हैं। अलबत्ता, रिसेंट सीएस के नाते अमिताभ जैन का पलड़ा इनमें भारी रहेगा। मगर सवाल यह है कि अशोक जुनेजा, आरपी मंडल और डीएम अवस्थी को कम कैसे आंका जा सकता है।

मंडल क्रिकेट के बड़े शौकीन हैं। उन्हें मालूम है कि किस बॉल को कैसे प्लेस करने पर बाउंड्री पार हो जाती है। वे जोगी सरकार में प्रभावशाली रहे। रमन सरकार में सिकरेट्री होने के बाद भी उन्हें रायपुर का कलेक्टर बनाया गया था। और भूपेश सरकार में मुख्य सचिव। फिर जुनेजा का तो आउटस्टैंडिंग पोस्टिंग का रिकार्ड रहा है। वे जो चाहते हैं, उनके हाथों में वैसी लकीरें बन जाती हैं।

डीएम अवस्थी महाकाल के पक्के भक्त हैं। दिसंबर 2018 में बीजेपी की सरकार पलटने पर गिरधारी नायक को भूपेश बघेल डीजी बनाना चाहते थे मगर महाकाल की ऐसी चकरी चली कि डीएम अवस्थी को डीजीपी बनाना पड़ा बल्कि ना-ना करके उन्हें पौने तीन साल तक इस पद पर रखना पड़ा। अब ऐसे-ऐसे हाई प्रोफाइल प्लेयरों ने इस पद के लिए दावेदारी की है तो फिर मुकाबला दिलचस्प रहेगा ही। लोगों की निगाहें अब सीएम विष्णुदेव साय पर टिकी है कि वे इन चारों हरफनमौला खिलाड़ियों से किसे चैंपियन घोषित करते हैं।

तड़फड़ रिलीविंग

ट्रांसफर के बाद अब उसे रुकवाने की धंधेबाजी नहीं चलेगी। जीएडी इसको लेकर सख्त हो चुका है। 17 जनवरी की देर शाम सरकार ने 60 राप्रसे अधिकारियों के ट्रांसफर किए और अगले दिन शाम तक सभी को रिलीव कर दिया गया। जीएडी अपने यहां के लोगों को रिलीव किया ही, कलेक्टरों को रात में ही जीएडी सिकरेट्री ने मैसेज कर दिया था...एनी हाउ कल तक रिलीव कर देना है। 18 शनिवार अवकाश का दिन होने के बाद भी कलेक्टरों ने शाम तक धड़ाधड़ रिलीविंग आर्डर मुख्यमंत्री सचिवालय को भेज दिया था।

अंत में दो सवाल आपसे

1. ऐसा क्यों हो रहा कि अमर अग्रवाल के मंत्री बनाने के नाम से बीजेपी के अंदरखाने का टेम्परेचर बढ़ जा रहा और क्या सिर्फ इसी वजह से मंत्रिमंडल का विस्तार टल जा रहा?

2. 4 फरवरी के दोपहर तक अशोक जुनेजा का अगर एक्सटेंशन नहीं हुआ तो फिर सरकार किस आईपीएस को प्रभारी डीजीपी अपाइंट करेगी?

Chhattisgarh Tarkash 2025: एक झटके में 36 करोड़

 तरकश, 12 जनवरी 2025

संजय के. दीक्षित

एक झटके में 36 करोड़

5 जनवरी के तरकश स्तंभ में पुलिस में किराये की गाड़ियों के खेला को एक्सपोज किया गया था। वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने इस खबर का स्क्रीनशॉट सिकरेट्री फायनेंस को भेजा और उसके बाद सिस्टम हरकत में आ गया। पीएचक्यू के शीर्ष अफसरों ने बकायदा वीसी कर पुलिस अधीक्षकों को आईना दिखाया।

बताते हैं, पुलिस के जिम्मेदार अधिकारी बकायदा लिस्ट लेकर वीसी में पहुंचे थे कि किस जिले में कितनी गाड़ियां मिसयूज हो रही हैं। पीएचक्यू ने सारे एसपी को आदेश दिया है कि अब जिलों में किराये पर चलने वाली गाड़ियों को वे खुद जस्टिफाई करेंगे। पता चला है कि चार-पांच दिन के भीतर 33 जिलों में पुलिस विभाग ने 400 इनोवा और स्कार्पियो का हटा दिया है।

सबसे अधिक बिलासपुर पुलिस ने टाईट किया है। वहां गाड़ियों की संख्या 110 से 53 पर आ गई है। दूसरे जिलों में भी गाड़ियों की संख्या कम की जा रही है। बहरहाल, अगर एक हफ्ते के भीतर 400 इनोवा और स्कार्पियो को हटाया गया है तो महीने का करीब 3 करोड़ रुपए की बचत हुई और साल का 36 करोड़ रुपए।

सिस्टम के एक्शन मोड को देखते माना जा रहा कि जनवरी खतम होते-होते पुलिस विभाग की करीब एक हजार गाड़ियां कम हो जाएंगी। याने छत्तीसगढ़ के खजाने का करीब 200 करोड़ बचेगा। ये राशि पुलिस अधिकारियों की जेब में जा रही थी।

अफसरों की ट्रेवल एजेंसी

नक्सलवाद के नाम पर बस्तर में किराये की गाड़ियों का खेला शुरू हुआ था, वह अब पूरे छत्तीसगढ़ में फैल गया। खासकर, पिछले दशक में यह संगठित भ्रष्टाचार का रुप ले लिया है। जाहिर है, एसपी जिले का सबसे बड़ा पुलिस अफसर होता है और इस खेल को उसी की नजरे इनायत मिल जाए, तो फिर इसको कौन रोेकता।

आलम यह कि छोटे से राजनांदगांव जिले में किराये की 100 गाड़ियां...जरूरत जबकि, पांच-सात की। कवर्धा जैसा छोटा जिला किराये की गाड़ियों में सबसे टॉप पर। एसपी की मीटिंग में कवर्धा की संख्या जानकर डीजीपी अशोक जुनेजा आवाक रह गए।

तरकश में यह खबर छपने के बाद कुछ पुलिस अधीक्षकों ने बताया कि छुटभैया नेताओं से लेकर अधिकारियों तक का काफी प्रेशर रहता है...आरआई सबकी दो-दो, चार-चार गाड़ियां कागजों में चला देता है। याने बिना गाड़ी चले, हर महीने उनके एकाउंट में पैसा पहुंचने की स्थायी व्यवस्था।

कई आरआई अपने परिजनों के नाम पर ट्रेवल एजेंसी खोल डाले हैं। जाहिर है, 100 में से 20 गाड़ी नेताओं और अधिकारियों की होती है...आरआई उपर से 80 गाड़ियों की बिलिंग कर लेते हैं। और, जब मिली जुली कुश्ती है तो फिर बात बाहर कैसे आएगी? आप समझ सकते हैं।

कमरा और अपशकुन!

महानदी भवन के पांचवे सबसे ताकतवर फ्लोर पर मुख्यमंत्री और उनका सचिवालय है। इसमें एक बड़ा कमरा मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह के लिए बनवाया गया था। मगर वास्तुविदों की सलाह पर अग्नेय कोण के कमरे को छोड़कर दूसरे नंबर के बड़े कमरे को उन्होंने अपना चेम्बर बनाया। और मुख्यमंत्री के लिए निर्धारित कमरे में बैजेंद्र कुमार बैठे।

इसके छह साल बाद दिसंबर 2018 में सरकार बदली तो काफी अरसा तक बैजेंद्र वाला कमरा खाली रहा। भूपेश बघेल के सचिव गौरव द्विवेदी और सुब्रत साहू ने अमन सिंह वाले कमरे को तवज्जो दिया। मगर बाद में सिकरेट्री टू सीएम बने टामन सिंह सोनवानी ने सीएम वाले कमरे को चुना।

अब सिकरेट्री टू सीएम राहुल भगत उसमें बैठ रहे हैं। उस कमरे के बारे में धारणा बना दी गई है कि जो भी उसमें बैठा, उसका अच्छा नहीं हुआ। बैजेंद्र कुमार चीफ सिकरेट्री नहीं बन पाए। और टामन सिंह सोनवानी इस समय जेल में हैं। अलबत्ता, राहुल भगत आईपीएस हैं। वर्दी वाले का वास्तु भला क्या बिगाड़ लेगा। वैसे भी, बैजेंद्र कुमार जैसे न वे खरी-खरी बात करते और न ही टामन सिंह वाला कोई गुण उनमें है।

बहरहाल, इस समय अमन सिंह वाले चेम्बर में पीएस टू सीएम सुबोध सिंह बैठ रहे हैं और सुबोध सिंह के रमन सिंह के टाईम वाले कमरे में दयानंद। मुकेश बंसल मिनिस्ट्रियल ब्लॉक में फर्स्ट फ्लोर पर और बसव राजू शुरू से सीएम सचिवालय की बजाए सेक्रेटेरियेट ब्लॉक में बैठते हैं।

सीएम सचिवालय भी छोटा

12 साल पहले बने मंत्रालय और सचिवालय का हाल यह है कि सचिवों के बैठने के लिए कमरे नहीं हैं तो मुख्यमंत्री सचिवालय भी इस संकट से जुदा नहीं। सीएम के पांच सिकरेट्री हैं। इनमें से तीन ही सचिवालय में बैठ पा रहे हैं। बाकी दो अलग-अलग। मंत्रालय का जब तक एक्सटेंशन नहीं होगा, सीएम का कोई दूसरा सचिव अब वहां नहीं बैठ सकता। कायदे से सीएम के सचिवों का सीएम सचिवालय में चेंबर होना चाहिए।

नया प्रशासनिक निजाम?

मुख्य सचिव अमिताभ जैन के अवकाश पर जाने के बाद दूसरे नंबर के सीनियर आईएएस अधिकारी रेणु जी0 पिल्ले को सरकार ने प्रभार सौंपा है। रेणु पिल्ले का आदेश निकलते ही ब्यूरोक्रेसी में सीएस बदलने की अटकलें तेज हो गईं। लोग इसे पी0 जॉय उम्मेन की छुट्टी से लगे जोड़कर देखने।

2012 में उम्मेन जब अपने गृह राज्य केरल गए थे तो रमन सरकार ने उनका विकेट उड़ाकर सुनिल कुमार को सीएस की कुर्सी पर बिठा दिया था। शुरू में सुनिल कुमार को भी प्रभारी मुख्य सचिव बनाया गया था। पर वो केस दूसरा था। सवा तीन साल सीएस रह चुके उम्मेन से सरकार नाखुश थी।

मगर अमिताभ के साथ ऐसा कुछ नहीं है। वे पिछली सरकार में भी सीएस रहे और अभी भी कंटिन्यू कर रहे हैं। मगर मिलियन डॉलर का सवाल है कि रेणु पिल्ले को सरकार ने अचानक बुलाकर कुछ दिनों के लिए ही सही, सबसे बड़ी कुर्सी क्यों सौंप दी? जबकि, प्रभारी सीएस बनाने की चर्चा दूसरे अफसरों की थी।

विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि सरकार के अंदरखाने में बड़ा फैसला हो चुका है। तभी प्रशासन अकादमी से बुलाकर उन्हें अमिताभ का प्रभारी बनाया गया। बात को समझिएगा...अमिताभ का टेन्योर चार साल क्रॉस कर चुका है। उन्होंने मुख्य सूचना आयुक्त के लिए अप्लाई भी कर दिया है।

ऐसे समय में चीफ सिकरेट्री जैसे जिम्मेदार अफसर अगर छुट्टी पर जाता है तो चार्ज उसको दिया जाता है, जिसे आगे बिठाना हो। और रेणु के साथ यही हुआ है। दस दिन में उनका ट्रॉयल भी हो जाएगा। इसके बाद सरकार बड़ा डिसिजन ले सकती है। संभव है कि रेणु पिल्ले छत्तीसगढ़ की नई प्रशासनिक निजाम बन जाएं।

प्रशासनिक भर्राशाही

रेणु पिल्ले के चीफ सिकरेट्री बनने से नेताओं की दिक्कतें बढ़ेगी...नियम-कायदों को ओवरलुक करने वाले कामों को भूलना पड़ेगा। मगर छत्तीसगढ़ के हित में सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि प्रशासनिक अराजकता दूर हो जाएगी। मंत्रालय के अफसर 10 बजे की बजाए पांच मिनट पहले ऑफिस पहुंचने लगेंगे।

आईएएस की एक पी़ढ़ी तो पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है, नई पीढ़ी कम-से-कम दुरूस्त हो जाएगी। मोदी सरकार भी चाहेगी कि ठीकठाक ही मुख्य सचिव बनाया जाए। हालांकि, रेणु पिल्ले जैसी सीएस लंबा नहीं चलती। मगर ऐसे मौके पर मुझे पूर्व डीजीपी अमरनाथ उपध्याय की बेबाकी से कही गई बात याद आ गई...उन्होंने एक बार शेयर किया था कि सरकार को मुझसे पहले गिरधारी नायक को डीजीपी बना देना चाहिए था...नायक साब मुझसे पहले अगर डीजीपी बन गए होते तो पुलिस की भर्राशाही को मुझे नहीं झेलना पड़ता।

माथे पर लिक्खा...

मुख्यमंत्री, चीफ सिकरेट्री और डीजीपी सबको बनने का मौका नहीं मिलता। टीएस सिंहदेव प्रेशर बिल्डअप करने इस्तीफा दिया, इसके बाद भी भूपेश बघेल ने पांच साल कंटिन्यू किया। जबकि, लिखा-पढ़ी ढाई साल की थी। इस सरकार में भी नाम कइयों के चले मगर कुर्सी हासिल हुई विष्णुदेव साय को।

इसी तरह सीएस और डीजीपी में भी हुआ। अशोक विजयवर्गीय और सुनील कुजूर को चीफ सिकरेट्री बनने का मौका मिल गया तो सीधे-साधे भोले-भंडारी मिजाज के अमरनाथ उपध्याय ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वे कभी डीजीपी बनेंगे...मगर वे पूरे चार साल पुलिस महकमे के मुखिया रहे।

डीजीपी को एक्सटेंशन?

डीजीपी अशोक जुनेजा का छह महीने का एक्सटेंशन समाप्त होने में अब 23 दिन बच गए हैं। राज्य सरकार ने नए डीजीपी के लिए यूपीएससी को तीन आईपीएस अधिकारियों के नामों का पेनल भेज दिया है। इनमें पवनदेव, अरुण देव गौतम और हिमांशु गुप्ता शामिल हैं।

मगर जुनेजा को दूसरे एक्सटेंशन देने की चर्चाएं भी बड़ी तेज है। बीजापुर नक्सली हमले में आठ जवानों के शहीद होने के बाद तो अब नहीं लगता कि नक्सलियों से आरपार के युद्ध की इस स्थिति में डीजीपी बदलना चाहेगी। अब किसी के माथे पर 4 फरवरी को डीजीपी बनना लिखा होगा तो फिर बात अलग है।

तीसरा मंत्री कौन?

बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने मंत्रियों की सूची में कोई अचानक कोई बदलाव नहीं किया तो दो नाम तय हैं। एक पूर्व मंत्री हैं तो दूसरा नया। अब सवाल है तीसरा मंत्री कौन होगा? पता चला है, किरण सिंहदेव के मसले पर अभी उहापोह की स्थिति है।

बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष पर पेंच उलझा हुआ है। पार्टी में ये भी साफ नहीं है कि हरियाणा की तरह क्या छत्तीसगढ़ में भी 13 मंत्री होंगे? ये अवश्य तय है कि 17 या 18 जनवरी को नगरीय और पंचायत चुनाव का ऐलान होगा, इससे पहले मंत्रिमंडल का विस्तार हो जाएगा। तब तक खड़मास भी खतम हो जाएगा।

अजय चंद्राकर का क्या?

विधानसभा में बीजेपी के स्टार प्लेयर अजय चंद्राकर को विधानसभा का उपाध्यक्ष बनाए जाने की चर्चाएं हैं। और ये भी कि इसके लिए वे तैयार नहीं हैं। जाहिर सी बात है कि विधानसभा उपाध्यक्ष का पद झुनझुना से ज्यादा कुछ होता नहीं। और इसके लिए भला वे कैसे तैयार हो जाएंगे।

बीजेपी उलझन में है कि अगर अजय चंद्राकर को कुछ नहीं मिला तो चार साल तक विधानसभा में मंत्रियों का क्या होगा? कुछ दिन पहले खतम हुए शीतकालीन सत्र में चंद्राकर ने वरिष्ठ मंत्रियों को पानी-पानी कर दिया था। जाहिर है, सदन में 90 परसेंट मोर्चा वे अकेले संभालते हैं। संसदीय ज्ञान तो उनके पास है ही, विषय-वस्तुओं का इतना गहन अध्ययन कर सदन में पहुंचते हैं कि जिस दिन अजय चंद्राकर का सवाल या ध्यानाकर्षण रहता है, मानकर चला जाता है, उस मंत्री की खैर नहीं।

कांग्रेस के मंत्रियों को वे अकेले छकाते रहे और इस समय भी वे हर सत्र में कुछ-न-कुछ बड़ा निकालकर मंत्रियों को बैकफुट पर जाने विवश कर देते हैं। देखना होगा, अजय चंद्राकर जैसे नेता के लिए बीजेपी क्या रास्ता निकालती है।

मंत्रालय पटरी पर, मगर जिले...?

प्रशासनिक क्षेत्र में सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी कि मंत्रालय के अफसर 24 साल में पहली बार टाईम पर पहुंचने लगे हैं। दोपहर तक जिन सचिवों के गलियारे विरान रहते थे, वहां अब रौनक आ गई है। अफसर दस बजे पहुंच जा रहे, लिहाजा उनका स्टाफ उससे पहले हाजिर रहता है। अफसरों की उपस्थिति को सीएम सचिवालय से मॉनिटरिंग की जा रही है।

सरकार को इसे एक संदेश की तरह जिलों में पहुंचाना चाहिए। जिलों में इसकी आवश्यकता ज्यादा है। कलेक्ट्रेट से लेकर एसडीएम, तहसील समेत अन्य आफिसों में आम आदमी का काम पड़ता है। मगर कौन कब मिलेगा, इसका भरोसा नहीं। गुरूजी लोग पढ़ाना-लिखाना छोड़ मोटा-पतला होने की दवाइयां बेच रहे हैं।

डीईओ, बीईओ को कमीशन के अलावा किसी चीज से मतलब नहीं। स्कूलों में अगर मंत्रालय सिस्टम लागू हो जाएगा कि गुरूजी दीगर धंधे छोड़ अपना मूल काम शुरू कर देंगे। सो, सरकार को जल्द ही इसके लिए कलेक्टरों को टाईट करना होगा। बिना टाईट किए संभव नहीं क्योंकि कलेक्टरों के पास डीएमएफ के धंधे से फुरसत नहीं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. बीजापुर के किस पुलिस अधीक्षक ने पत्रकार मुकेश हत्याकांड के मास्टरमाइंड सुरेश चंद्रकार को अपने बावर्ची से 500 करोड़ का ठेकेदार बना दिया?

2. बीजापुर सड़क घोटाले में लिप्त पीडब्लूडी के अधिकारियों पर कार्रवाई करने को लेकर सरकार असमंजस में क्यों दिख रही है?

शनिवार, 4 जनवरी 2025

Chhattisgarh Tarkash 2024: डिप्टी सीएम, सड़क और बवाल

 तरकश, 5 जनवरी 2024

संजय के. दीक्षित

डिप्टी सीएम, सड़क और बवाल

छत्तीसगढ़ के विधानसभा में कुछ दिन पहले ही दंतेवाड़ा में आरईएस द्वारा बिना सड़क बनाए पैसे भुगतान पर बवाल मचा था। इस पर पंचायत मिनिस्टर विजय शर्मा ने चार अफसरों को सस्पेंड करने का ऐलान किया। इधर, पत्रकार मुकेश चंद्राकार हत्याकांड में पीडब्लूडी के अफसर निशाने पर हैं। 56 करोड़ की सड़क का 112 करोड़ पेमेंट कर दिया गया।

जब तक ऐसे ठेकेदार और अफसर रहेंगे, अमित शाह लाख कोशिश कर लें, बस्तर नक्सलियों से मुक्त नहीं हो सकता। आखिर, यह शाश्वत सत्य है कि नक्सलियों को टैक्स देने के बाद ही ठेकेदारों को काम करने की हरी झंडी मिलती है। नेताओं से लेकर अफसरों और नक्सलियों को मालूम होता है कि काम कागजों पर होना है।

तभी एक दशक पहले तक एसपीओ की मामूली नौकरी करने वाला सुरेश चंद्राकार 500 करोड़ का ठेकेदार बन जाता है। बहरहाल, संयोग यह है कि दोनो विभाग डिप्टी सीएम का है। अरुण साव के पास पीडब्लूडी है और विजय शर्मा के पास पंचायत और ग्रामीण विकास।

दोनों उप मुख्यमंत्रियों को अपने अधिकारियों को टाईट करना चाहिए। क्योंकि, बिना इसके अमित शाह का ड्रीम प्रोजेक्ट कामयाब नहीं हो सकता। फिर महत्वपूर्ण यह भी है कि दोनों सरकार के वरिष्ठतम मंत्री हैं...वे एक्शन मोड में आएंगे तो देखादेखी नए मंत्री भी उनका अनुसरण करेंगे। सिर्फ ये बोलकर वे जिम्मेदारी से मुक्त नहीं काट सकते कि हमारी चल नहीं रही है।

मोदी बड़े या राहुल?

पुलिस में किराये की गाड़ियों में हो रहे खेला पर डीजीपी अशोक जुनेजा ने सवाल-जवाब किया तो एक दिलचस्प खुलासा हुआ। डीजीपी की मीटिंग से लौटने के बाद एक जिले के पुलिस अधीक्षक ने किराये की गाड़ियों की जांच कराई तो पता चला कि विधानसभा चुनाव-2023 के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी की सुरक्षा के लिए पुलिस ने 85 इनोवा और स्कार्पियो किराये पर लिया था और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के लिए 140। याने पीएम मोदी से अधिक राहुल की सुरक्षा?

200 करोड़ का खेला

सालां से चला आ रहा पुलिस विभाग का किराये की गाड़ियों का खेला पब्लिक डोमेन में नहीं आ पाता अगर डीजीपी अशोक जुनेजा ने भृकुटी टेढ़ी नहीं की होती। पिछले महीने एसपी की मीटिंग में उन्होंने सबको खरी-खरी सुनाई। दरअसल, छत्तीसगढ़ पुलिस जितना पैसा हर साल किराये की गाड़ी में फूंक रही है, उतने में हर साल एक हजार इनोवा गाड़ी खरीदी जा सकती है।

मोटे आंकलन के तौर पर हर जिले में साल में सात-से-दस करोड़ रुपए किराये गाड़ियों पर खर्च किए जाते हैं। इस हिसाब से 33 जिलों में हर साल करीब 250 करोड़ रुपए गाड़ियों के किराये के नाम पर बहाया जा रहा। इस 250 करोड़ में से मुश्किल से पूरे प्रदेश में 50 करोड़ वास्तविक खर्च होता होगा। बाकी 200 करोड़ रुपए आरआई से लेकर पुलिस अफसरों की जेब में।

सबसे अधिक बुरी स्थिति है राजनांदगांव और रायपुर रेंज की। तीन टुकड़ों में बंट गए राजनांदगांव जैसे छोटे जिले में 100 इनोवा और स्कार्पियो किराये की चल रही है...इसे एसपी कांफ्रेंस में सार्वजनिक रूप से बताया गया। असल में, किराये की गाड़ियों के नाम पर बरसों से जिलों में बड़े स्तर पर संगठित भ्रष्टाचार चल रहा है।

वस्तुस्थिति यह है कि गाड़ियां कागजों में चल रही है। क्योंकि, इतनी गाड़ियों की जरूरत नहीं होती। पीएचक्यू में प्रदीप गुप्ता जैसे साफ-सुथरी छबि के एडीजी वित्त और योजना के बैठे होने के बाद भी आश्चर्य है कि उन्होंने इसे संज्ञान कैसे नहीं लिया? अलबत्ता, कड़वी सच्चाई यह भी है कि इनमें से आधी गाड़ियां खुद पुलिस अधिकारियों की है, जो अपने परिजनों और रिश्तेदारों या फिर टैक्सी वालों के जरिये चलवा रहे हैं।

वित्त मंत्री को संज्ञान

वीआईपी के फॉलोगार्ड में चार गाड़ी और तीन जवान...आपको विश्वास नहीं होगा कि ये भला कैसे संभव होगा। तीन जवान चार गाड़ी में कैसे बैठेंगे? डीजीपी की मीटिंग के बाद एक एसपी ने रैंडम जांच की तो पता चला कि हड़बड़ी में बिल बनाने के चक्कर में आरआई ने तीन जवानों को चार गाड़ियों में बिठाने का कारनामा कर डाला। बहरहाल, जीएडी सिकरेट्री मुकेश बंसल ने अक्टूबर में एक आदेश निकाला था कि बिना अनुमति गाड़ियां हायर नहीं की जाएगी। मगर पता नहीं किधर से प्रेशर आया, उन्होंने अपना आदेश खुद ही निरस्त कर दिया।

वित्त मंत्री ओपी चौधरी को इसे संज्ञान लेना चाहिए। पुलिस विभाग भले ही उनका नहीं मगर खजाने का चाबी सरकार ने उन्हें सौंपी है तो साल का 200 करोड़ रुपए पुलिस अधीक्षकों और आरआई लोगों की जेब में क्यों जाए। इस 200 करोड़ से हर साल पुलिस जवानों के लिए सुविधायुक्त आवास बनाए जा सकते हैं...पुलिस को संसाधनों से लैस किया जा सकता है।

सुबोध सिंह और कठिन टास्क

पीएस टू सीएम सुबोध सिंह ने कार्यभार संभालने के बाद प्रशासन में सुधार के काम तेज कर दिए हैं। सीएम के सचिवों को भी अब संभागों का दायित्व सौंप दिया है। याने कलेक्टर, एसपी पावर देखकर मुख्यमंत्री के सचिवों की चापलूसी नहीं करेंगे, उन्हें अपने संभाग के प्रभारी सचिवों से ही बात करनी होगी। यह सुशासन की दिशा में अच्छा कदम है।

मगर सुबोध सिंह के समक्ष चुनौतियां कहीं अधिक है। असल में, छत्तीसगढ़ के लिए सुबोध नए नहीं है, इसलिए सभी की यही उम्मीद है कि सुबोध सिंह कुछ करेंगे। सुबोध सामने सबसे तगड़ा टास्क होगा, प्रशासनिक करप्शन को रोकना। एक तरह से कहें तो प्रशासनिक अराजकता की स्थिति है।

आम आदमी बोल रहे, सरकार बदल गई...मगर अफसर और अफसरों की करतूतें नहीं बदली। हाल यह है कि सरकार के साल भर हो गए मगर किधर से कौन बॉल फेंक रहा...किसी को समझ नहीं आ रहा। खटराल अफसर सरकार और संगठन के कई चौखटों का फायदा उठा रहे, इस पर भी स्वच्छ प्रशासन के लिए अंकुश लगाए जाने की जरूरत है।

अफसरों को इसका अहसास होना चाहिए कि गड़बड़ करने पर अब कोई भाई साब नहीं बचाएंगे, तभी सूबे में प्रशासनिक शुचिता और कसावट आ पाएगी। वरना, अफसर मासूमियत भरी सफाई देकर एनजीओ को करोड़ों का टेंडर देते रहेंगे।

इसी हफ्ते की घटना है...सीजीएमससी के प्रमुख ने कहा कि उन्हें मालूम नहीं कि अस्पतालों के फायर ऑडिट का काम जिसे दिया गया है, वह एनजीओ है। जबकि, टेंडर के आदेश में उन्होंने ही स्पष्ट तौर पर डायरेक्टर को लिखा...फलां समिति को आप लोग काम दें। अब उन्हें प्रायवेट लिमिटेड और समिति का अंतर नहीं मालूम को क्या कहा जा सकता है। यकीनन...सुबोध सिंह के सामने कठिन टास्क है।

अनलिमिटेड आईजी

कभी एक समय था कि आईजी बनाने के लिए अफसर नहीं होते थे। कई साल तक स्थिति यह रही कि पांच रेंज, पांच आईजी स्तर के आईपीएस रहे। विकल्प न होने पर डॉ. रमन सिंह को कई बार किसी आईपीएस को नहीं चाहते हुए भी आईजी बनाना पड़ा। मगर इस समय छत्तीसगढ़ में पूरे 18 आईजी हो गए हैं। पीएचक्यू में ही आधा दर्जन से ज्यादा होंगे।

संख्या बढ़ने से 2007 बैच के आईपीएस अधिकारियों के आईजी प्रमोशन में लोचा आ गया था। इस बैच में तीन आईपीएस हैं रामगोपाल गर्ग, दीपक झा और अभिषेक शांडिल्य। डीपीसी के बाद सरकार को इनके प्रमोशन के लिए इसे आधार बनाकर रास्ता निकालना पड़ा कि तीन अफसर डेपुटेशन पर है। इस चक्कर में बाकी आईपीएस का प्रमोशन का आदेश रुक गया है।

16 को आचार संहिता?

नगरीय और पंचायत चुनाव में आगे-पीछे होने की एक वजह यह भी रही कि सिस्टम दो महीने से काफी व्यस्त रहा। दिवाली, राज्योत्सव, सरकार का एक साल, अमित शाह का 15 दिन में दो बार दौरा, विधानसभा का शीतकालीन सत्र। ऐसे में, महापौर, अध्यक्ष और पार्षद प्रत्याशियों के लेवल पर कोई काम ही नहीं हुआ। राज्य निर्वाचन आयोग ने जब चुनाव ऐलान करने की तैयारी तेज की तो लगा कि कुछ गड़बड़ हो रहा है। फिर आरक्षण आगे बढ़ाया गया। बहरहाल, 15 जनवरी को मतदाता पुनरीक्षण का काम कंप्पलीट हो जाएगा। इसके अगले दिन 16 जनवरी को चुनाव का ऐलान हो जाएगा।

बीजेपी के नए अध्यक्ष OBC से?

बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन मंत्री शिवप्रकाश की मौजूदगी में 3 जनवरी को रायपुर में पार्टी की एक अहम बैठक हुई। पार्टी कार्यालय के बाद सभी छत्रप सीएम हाउस गए। वहां क्या हुआ, ये तो नहीं पता मगर ये जरूर है कि बैठक छत्तीसगढ़ के नए अध्यक्ष के लिए मंथन हुआ। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव को मंत्रिमंडल में शामिल करने पार्टी गंभीर है। रही बात नए प्रदेश अध्यक्ष की तो इसके लिए पार्टी किसी ओबीसी नेता पर दांव लगाने विचार कर रही है। इसमें नारायण चंदेल के लिए जबर्दस्त लॉबिंग चल रही है। हालांकि, ओबीसी से इस समय छह मंत्री हैं। गजेंद्र यादव को कहीं मौका मिल गया तो फिर सात हो जाएंगे। आदिवासी वर्ग से सीएम हैं तो इसमें अब कोई स्कोप नहीं। सामान्य से अमर अग्रवाल, किरण सिंहदेव और ओबीसी से गजेंद्र यादव...मंत्री के लिए ये तीन नाम इस समय सबसे अधिक चर्चाओं में है। अब देखना है पार्टी किस पर मुहर लगाती है। 

उल्टी गंगा

छत्तीसगढ़ में सत्ताधारी पार्टी इस कदर कभी बैकफुट पर नजर नहीं आई। हालत यह है कि बीएड धारी 2855 सहायक शिक्षकों की बर्खास्तगी पर विपक्ष हमलावर है और बिना किसी चूक के बीजेपी बगले झांक रही है। न मंत्री दमदारी से कुछ बोल रहे और न उसके प्रवक्ता। ऐसा ही कुछ पत्रकार मुकेश चंद्राकार हत्याकांड में भी हुआ। कांग्रेस ने राष्ट्रीय पदाधिकारी ने दिल्ली से सरकार को आड़े हाथ लेकर ट्वीट कर दिया और आरोपी का कांग्रेस कनेक्शन की फोटुएं सोशल मीडिया पर भरी होने के बाद भी बीजेपी के न मीडिया सेल से कुछ ट्वीट हुआ और न पार्टी के किसी पदाधिकारी ने बयान दिया। कांग्रेस के ट्वीट के बाद बीजेपी हरकत में आई...फिर उसकी काट के तौर पर आधी रात के बाद ट्वीट हुआ। सरकार बने अब साल भर हो गए हैं...बीजेपी नेताओं को आत्ममुग्धता से बाहर आना होगा। वरना, अगले महीने नगरीय और पंचायत चुनाव में परेशानी आ सकती है। सत्ताधारी पार्टी को कम-से-कम सरकार के पक्ष को दमदारी से रखनी चाहिए। इसके लिए मोदीजी, अमित शाह या मनसुख मांडविया थोड़े आएंगे।

आईएएस की वैकेंसी

छत्तीसगढ़ में एलायड सर्विस कोटे से आईएएस का दो पद खाली हो गया है। पहला अनुराग पाण्डेय के रिटायर होने के बाद अगस्त में खाली हुआ और दूसरा शारदा वर्मा की 31 दिसंबर को विदाई के बाद। छत्तीसगढ़ बनने के बाद अभी तक इस कोटे से चार अफसरों को आईएएस अवार्ड हुआ है। जनसंपर्क, इंडस्ट्री, जीएसटी और ट्राईबल से एक-एक। मगर काम से अपनी पहचान बनाने वालों में आज भी एमपी के समय आईएएस बने आरएस विश्वकर्मा और डॉ0 सुशील त्रिवेदी ही याद आते हैं। सरकार को इस बार ठोक बजाकर काबिल अफसरों को ही मौका देना चाहिए। तभी आईएएस पदनाम के साथ न्याय हो पाएगा। 

अंत में दो सवाल आपसे

1. भाजपा ने मंत्री पद के दावेदारों की धड़कनें क्यों बढ़ाकर रखा है?

2. हजारों करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी बस्तर के आदिवासियों की सूरत नहीं बदली मगर वहां के नेता, ठेकेदार, सप्लायर, अफसर और माओवादी कैसे मालामाल हो गए?

शनिवार, 28 दिसंबर 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: आईएएस अफसरों को प्रमोशन गिफ्ट

 तरकश, 29 दिसंबर 2024

संजय के. दीक्षित

आईएएस अफसरों को प्रमोशन का गिफ्ट

यूपी में 2009 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों के प्रमोशन के बाद छत्तीसगढ़ में भी इस बैच को सिकरेट्री बनाने की अटकलें तेज हो गई है। 2009 बैच के छत्तीसगढ़ में 11 आईएएस हैं। छह आरआर और पांच प्रमोटी।

आरआर के छह में से समीर विश्नोई कोयला घोटाले में जेल में हैं, और तंबोली अय्याज फकीरभाई सेंट्रल डेपुटेशन पर। बची डॉ. प्रियंका शुक्ला, किरण कौशल, अवनीश शरण, सौरव कुमार, सुनील जैन, कुमार चौहान, विपिन मांझी, डोमन सिंह और केडी कुंजाम। ये सभी नए साल में सचिव प्रमोट हो जाएंगे। इनमें चौहान और मांझी छह महीने ही सचिव रह पाएंगे। मई में दोनों एक साथ रिटायर हो जाएंगे।

विभाग नो चेंज!

प्रमोशन के बाद 2009 बैच के आईएएस अधिकारियों का विभाग बदलेगा, ऐसा प्रतीत नहीं हो रहा। क्योंकि, सिकरेट्री में पहले से ही ओवरफ्लो हो रहा है। लिहाजा, प्रियंका शुक्ला हेल्थ में डायरेक्टर से कमिश्नर हो जाएंगी। किरण कौशल कमिश्नर मेडिकल एजुकेशन पहले से हैं। सौरव कुमार एनआरडी और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग में हैं, उनकी भी पोस्टिंग यथावत रहने वाली।

इस बैच के एकमात्र कलेक्टर अवनीश शरण इस समय बिलासपुर में हैं। अवनीश को पिछली सरकार में पूरे पांच साल हांसिये पर रखा गया। इसलिए लगता है वे बिलासपुर में शायद कंटीन्यू कर जाएं।

सचिव बनने के बाद कलेक्टर रहने के छत्तीसगढ़ में कई दृष्टांत रहे हैं। आरपी मंडल सात महीने राजस्व सिकरेट्री रहने के बाद रायपुर के कमिश्नर बनाए गए थे।

बहरहाल, विष्णुदेव सरकार सूबे के 50 से अधिक आईएएस अधिकारियों को प्रमोशन का गिफ्ट देगी, जिनमें 2012 बैच के 11 आईएएस स्पेशल सिकरेट्री और 2016 बैच के 18 आईएएस अफसर ज्वाइंट सिकरेट्री बनेंगे।

95 बैच के दोनों आईएएस डेपुटेशन पर हैं और 2000 बैच जीरो है, इसलिए एसीएस और प्रिंसिपल सिकरेट्री में कोई प्रमोशन नहीं होगा।

छत्तीसगढ़ के 3 जिलों में डीआईजी

छत्तीसगढ़ में 17 आईपीएस अधिकारियों को न्यू ईयर में प्रमोशन का गिफ्ट मिलेगा। इनमें दीपक झा और रामगोपाल गर्ग आईजी बनेंगे। वहीं 2011 बैच के सात आईपीएस संतोष सिंह, इंदिरा कल्याण ऐलेसेला, लाल उमेद सिंह, अजात बहादुर सिंह, जीआर ठाकुर, टीआर कोशिमा, प्रशांत ठाकुर डीआईजी प्रमोट होंगे।

इनके अलावा 2012 बैच के आशुतोष सिंह, विवेक शुक्ला, शशिमोहन सिंह, राजेश कुकरेजा, श्वेता राजमणि, राजेश अग्रवाल, विजय अग्रवाल और रामकृष्ण साहू को सलेक्शन ग्रेड मिलेगा। याने इन सभी का ओहदा बढ़कर एसपी से अब एसएसपी हो जाएगा

आईपीएस प्रमोशन के बाद छत्तीसगढ़ में तीन डीआईजी पुलिस अधीक्षक होंगे तो पांच सलेक्शन ग्रेड वाले। याने अब पांच जिलों में एसएसपी और तीन जिलों में सुपर एसएसपी होंगे।

हालांकि, छत्तीसगढ़ में यह पहली बार नहीं हो रहा...डीआईजी प्रमोट होने के बाद कप्तान रहने वालों की लिस्ट बड़ी लंबी है। बहरहाल, 33 में से आठ जिलों में अब सीनियर एसपी होंगे...ऐसे में लॉ एंड आर्डर की स्थिति सुधरने की उम्मीद की जा सकती है।

प्रशासन का कबाड़ा

अंग्रेजों के समय से सिस्टम बनाया गया था...कलेक्टरों को गाइड करने के लिए संभागों में कमिश्नर बिठाए जाते थे। इससे कलेक्टरों को फायदा यह होता था कि प्रशासन की गाड़ी अटकने पर वे कमिश्नरों से मार्गदर्शन ले लेते थे। मध्यप्रदेश के दौर में छत्तीसगढ़ में एक से बढ़कर एक धाकड कमिश्नर रहे। बीएस बासवान से लेकर हर्षमंदर तक।

मगर छत्तीसगढ़ बनने के बाद यह सिस्टम ध्वस्त हो गया। अजीत जोगी सरकार ने इसे औचित्यहीन मानते हुए कमिश्नर सिस्टम खतम कर दिया था। बीजेपी की सरकार ने 2005 में इसे फिर से चालू किया मगर दो-एक मौकों को छोड़ कभी आरआर वालों को कमिश्नर नहीं बनाया।

अंदर की बात यह है कि अधिकांश कलेक्टर नहीं चाहते कि कोई डायरेक्ट आईएएस उनके उपर कमिश्नर बनकर बैठ जाए। इसलिए, शुरू से कुतर्क देते हुए लाबिंग की गई...डायरेक्ट आईएएस कमिश्नर बनने पर समानांतर दुकान खोल देगा...कलेक्टरों से टकराव होगा।

समझने की बात है कि उपर में जब सरकार बैठी है...चीफ सिकरेट्री हैं...जीएडी सिकरेट्री हैं, तब कमिश्नर अपनी मनमानी कैसे चलाएंगे। और कमिश्नर अगर दुकानदारी किए तो सरकार के पास स्कू कसने के लिए पेंचिस तो है।

मगर कमिश्नर-कलेक्टर में तालमेल बिगड़ने का परसेप्शन फैलाकर अधिकांश संभागों में डमी कमिश्नर बिठा दिया गया। ताकि, कलेक्टर डीएमएफ से लेकर जिसमें मन चाहे अपनी चला सकें।

अभी सरगुजा कमिश्नर की पोस्टिंग होनी है। 31 दिसंबर को जी0 चुरेंद्र रिटायर होने जा रहे हैं। सरगुजा मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का खुद का संभागीय मुख्यालय है। ऐसे में, सरकार को सरगुजा से इसकी शुरूआत करनी चाहिए।

बड़ा जिला, सीनियर कलेक्टर-एसपी

एक दशक पहले तक प्रशासन का थंब रुल था कि बड़े जिलों में सबसे सीनियर अफसरों को कलेक्टर, एसपी बनाया जाता था। मध्यप्रदेश के समय में इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर और रायपुर के कलेक्टर-एसपी छांट के बनाए जाते थे। इन पांचों के कलेक्टर और कप्तान बनना गर्व की बात होती थी।

छत्तीसगढ़ बनने के बाद एक दशक तक ये परंपरा चलती रही। मगर उसके बाद ऐसे-ऐसे पठरु लोगों को कलेक्टर-एसपी बना दिया जा रहा है कि लोगों को उनका नाम तक पता नहीं होता। जाहिर है, पहले के कलेक्टर, एसपी का नाम लोगों  की जुबां पर होता था।

पिंक महल, DMF और प्रशासन का शीर्षासन

छत्तीसगढ़ में भी कम-से-कम संभागीय मुख्यालयों में तो सीनियर अफसरों को बिठाना चाहिए। प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी इसका फायदा होता है। आसपास के जिलों के कलेक्टर भी उसके अच्छे कामों को फॉलो करते हैं। रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग के डिवीजनल कमिश्नर और पुलिस रेंज के आईजी की पोस्टिंग में भी सरकार को ऐसा सोचना चाहिए। तब जाकर रिजल्ट दिखाई देगा।

लक्ष्मीजी के बल पर या जोर-जुगाड़ लगाकर कलेक्टर, एसपी, कमिश्नर, आईजी अपनी पोस्टिंग करा लेते हैं, उसका परिणाम छत्तीसगढ़ में दिख ही रहा है। सिस्टम रहा नहीं। न प्रशासन बचा है और न पुलिस। विकास हुआ है तो सिफ कलेक्टर और एसपी के बंगले का। डीएमएफ के पैसे से छत्तीसगढ़ के कलेक्टर, एसपी के बंगले पिंक महल बन गए हैं। ये हम नहीं कह रहे सरकार के पास रिपोर्ट आई है कि कलेक्टरों ने सरकारी बंगलों पर कैसे डीएमएफ का करोड़ों रुपए फूंक दिया।

हालांकि, राहत की बात यह है कि पुलिस अधीक्षकों ने बंगलों और गार्डन को सजाने में सरकारी खजाने का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने कोयला, कबाड़ी और जुआरियो-सटोरियो का इस्तेमाल किया। पुलिस अधीक्षकों को उतना कसूर नहीं।

कलेक्टरों से कंपीटिशन में एसपी डिरेल्ड हुए और कलेक्टरों की वर्किंग डिरेल्ड हुई करोड़ों रुपए के डीएमएफ से। रिजल्ट ये निकला कि छत्तीसग़ढ़ में प्रशासन से लेकर कानून-व्यवस्था सिर के बल है। और आम आदमी? इसका जवाब है...छत्तीसगढ़ियां, सबले बढ़ियां।

ऐसे भी अफसर

ऐसा भी नहीं कि छत्तीसगढ़ के सारे अफसर डिरेल्ड हो गए हैं। कुछ पहले भी ट्रेक पर थे और आज भी रास्ता नहीं बदले हैं। डेपुटेशन से रायपुर लौटे एक सीनियर आईपीएस अफसर सोफा लेने फर्नीचर दुकान पहुंचे।

अफसर के कद के हिसाब से दुकान वाला रेट बताना शुरू किया...। 12 लाख से लेकर जब वह डेढ़ लाख पर आया तो आईपीएस ने कोने में रखे सोफे का रेट पूछा। दुकान वाला बोला...23 हजार। अफसर बोले, इसी को दे दो।

दुकानदार हैरान...छोटे-मोटे डीएसपी, एडिशनल एसपी इतने लो लेवल पर नहीं आते और इतने बड़े साब....? कलेक्टरों में कुछ इतना बढ़ियां काम कर रहे हैं कि आप जानकर हैरान रह जाएंगे। लेकिन, दुकान में सरेआम रेट लिस्ट लगाने वालों की तुलना में अच्छे कलेक्टरों की संख्या मामूली है। इसलिए उनकी कोई चर्चा नहीं।

डेट ऑफ बर्थ का लोचा

पंजीयन सचिव शारदा वर्मा 31 दिसंबर को आईएएस से रिटायर हो जाएंगी। हालांकि, उनका डेट ऑफ बर्थ 1 जनवरी है। मगर रिटायमेंट का नियम है कि दो तारीख तक अगर कोई पैदा हुआ है तो उसका रिटायरमेंट लास्ट मंथ के लास्ट डेट को होगा। और दो के बाद...तो फिर वह पूरा महीना कंप्लीट करेगा।

मसलन, शारदा वर्मा की जन्मतिथि अगर 3 जनवरी होती तो फिर वह 31 जनवरी को रिटायर होतीं। ऐसे में, जो लोग बच्चों को स्कूल में दाखिले के टाईम जन्मतिथि एक लिखवा देते हैं, उन्हें इस बात को सनद रखना चाहिए।

अफसरों के लिए सबक

सरगुजा के डिवीजनल कमिश्नर जी0 चुरेंद्र आज से तीन दिन बाद 31 दिसम्बर को रिटायर हो जाएंगे। आईएएस के कैरियर में उन्होंने कमिश्नर पोस्टिंग का रिकार्ड बनाया है। बिलासपुर को छोड़ वे सभी संभागों में आयुक्त रह लिए। सबसे बड़े रायपुर संभाग में भी।

मगर उन्हें ताउम्र यह मलाल रहेगा कि स्पेशल सिकरेट्री से रिटायर होना पड़ा। चुरेंद्र के खिलाफ एसडीएम रहने के दौरान राजस्व के कुछ केस बने थे और उसमें उन्हें क्लीन चिट नहीं मिल पाई। इससे उनका सिकरेट्री प्रमोशन नहीं हो पाया। ब्यूरोक्रेसी के लिए यह सबक है।

ठीक है...पूर्व जन्मां के कुछ अच्छे कर्मों की वजह से सभी पकड़े नहीं जाते। मगर छत्तीसगढ़ में दो आईएएस, दो आईटीएस अफसर, दो एसडीएम समेत कई ज्वाइंट डायरेक्टर, एसई, ईडी जैसे अफसर जेल में हैं। तीर्थराज अग्रवाल और आरती वासनिक आईएएस अवार्ड से वंचित हो गए। ये घटनाएं आंखें खोलने के लिए होती हैं। मगर खुले तब तो।

मनमोहन की विनम्रता

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह कितने विनम्र थे, छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी से जुड़ी इस छोटे से वाकये से आप समझ जाइयेगा। बात 14-15 साल पुरानी होगी। यही कोई 2009-10 के आसपास की। तब छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस बीवीआर सुब्रमणियम प्रधानमंत्री कार्यालय में पोस्टेड थे। डेपुटेशन की निर्धारित अवधि सात वर्ष से दो बरस क्रॉस कर चुकी थी।

चूकि उस दौरान छत्तीसगढ़ में अफसरों की भारी कमी थी, लिहाजा सरकार चाह रही थी केंद्र उन्हें वापिस भेज दे। इस संदर्भ में छत्तीसगढ़ सरकार से जब बार-बार रिमाइंडर जाने लगा तो डीओपीटी सिकरेट्री ने मनमोहन सिंह से बात की। बताते हैं, उन्होंने विनम्रता से कहा, क्या प्रधानमंत्री अपने कार्यालय में अपनी पसंद का एक आईएएस नहीं रख सकता?

प्रधानमंत्री की भावना का सम्मान करते हुए सीजी सरकार ने फिर इस चेप्टर को क्लोज कर दिया। यद्यपि, सुब्रमणियम छत्तीसगढ़ लौटे, जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बन गई।

अंत में दो सवाल आपसे

1. सरकार के एक मंत्री का नाम बताइये, जिन्होंने अपने विभाग के वसूली का काम जिलेवार प्रायवेट लोगों को सौंप दिया है?

2. छत्तीसगढ़ में एमपी कैडर के लास्ट और छत्तीसगढ़ कैडर के फर्स्ट आईएएस, आईपीएस कौन-कौन हैं?


शनिवार, 14 दिसंबर 2024

Chhattisgarh Tarkash: अज्ञानी कलेक्टर, दुःसाहसिक कार्य

 तरकश, 15 दिसंबर 2024

संजय के. दीक्षित

अज्ञानी कलेक्टर-1

सक्ती जिले में ट्राईबल लैंड केस में जो हुआ, वह तो एक बानगी है। छत्तीसगढ़ के अधिकांश कलेक्टर सालों से ये चूक कर रहे हैं। फर्क इतना ही है कि कोई पैसा लेकर आंखें मूंद ले रहा तो कुछ को रीडर घूमा दे रहे हैं। जबकि, भू-राजस्व संहिता 165 में यह क्लियर है कि आदिवासी की कोई भी जमीन कलेक्टर की अनुमति के बगैर नहीं बेची जा सकती। मगर छत्तीसगढ़ में डायवर्टेड आदिवासी जमीन को कलेक्टर लिख कर दे दे रहे हैं...इसमें कलेक्टर की अनुमति की जरूरत नहीं है। सक्ती कलेक्टर ने भी ऐसा ही किया। दरअसल, सिस्टम की विडंबना यह है कि सम्मानजनक चढ़ावा न चढ़ाने पर कलेक्टर की अनुमति पाने चप्पल घिस जाएंगे। और पैसे दे दिए तो...।

अज्ञानी कलेक्टर-2

जाहिर है, आदिवासी जमीन को बेचने की अनुमति का प्रोसेस, महीनो की पेशी, बयान, साक्ष्य के बाद पूरा होता है। इसलिए इसमें डायवर्टेड लैंड का रास्ता निकाला गया। असल में, कलेक्टरों को आजकल नियम-कायदों की स्टडी होती नहीं। उनका रीडर जो बताता है, उसे वे ओके कर देते हैं। वही कलेक्टर एक जिले में पोस्टिंग के दौरान डायवर्टेड लैंड के मामले में कलेक्टर की अनुमति की जरूरत नहीं लिखकर देते हैं और दूसरे जिले में जाते हैं तो अनुमति अनिवार्य बताते हैं।

दरअसल, 2008 में जब राधाकृष्णन राजस्व बोर्ड के चेयरमैन थे, तब भूमाफियाओं ने उनसे आर्डर करा लिया था कि डायवर्टेड लैंड में कलेक्टर की अनुमति की जरूरत नहीं। हालांकि, डीएस मिश्रा ने चेयरमैन बनते ही उसे समाप्त का दिया था। मगर कलेक्टरों के कई खटराल रीडर राधाकृष्णन के उसी फैसले के आधार पर भूमाफियाओं को उपकृत कर रहे हैं। बहती गंगा में हाथ धोने में रजिस्ट्री अधिकारी भी पीछे नहीं। कई मामले तो रजिस्ट्री अधिकारी सलटा दे रहे...पुराने केस का हवाला देकर वे कलेक्टर के पास केस जाने ही नहीं देते। आदिवासी स्टेट, आदिवासी मुख्यमंत्री के बाद भी अगर ऐसा हो रहा तो ये कलेक्टरों की दुःसाहस कही जाएगी।

पूत सपूत तो का धन संचय

छत्तीसगढ़ की हाल की दो घटनाएं हिला देने वाली है। पहली घटना राजधानी रायपुर की है...एक रिटायर इंजीनियर इन चीफ अपनी संपत्ति बेटे के नाम कर पछता रहे हैं। वे रजिस्ट्री अधिकारियों से संपर्क में हैं कि क्या बेटे के नाम की गई रजिस्ट्री शून्य हो सकती है। दरअसल, सूबे में जब ईडी के छापे पड़ने शुरू हुए तो ईएनसी डरकर अपनी कई संपत्तियों को परिजनों के नाम कर दिया था।

मगर अब रिटायर होने के बाद बेटे-बहू यह कहते हुए उन्हें आंख दिखाना शुरू कर दिया है कि कौन सा आप मेहनत करके कमाए हो। बहू तंज कसती है...ईडी नहीं आती तो प्रॉपर्टी मेरे नाम करते क्या?

दूसरी घटना छत्तीसगढ़ की न्यायधानी से है। बिलासपुर के एक नामी सर्जन ने अकूत संपत्ति अर्जित की। देखते-देखते उन्होंने बिलासपुर शहर के मध्य 200 बेड का अस्पताल खड़ा कर दिया। रायपुर के वीआईपी क्लब के पास एकड़ में प्लाट। दोनों बेटों को तगड़ा डोनेशन दे, डॉक्टर बनाया। मगर उन्होंने एक काम नहीं किया...बेटों को संस्कारित करना। वैसे, दीन-दुखियों की जेब से पैसा निकालना फलता भी नहीं। नतीजा यह हुआ कि उनके स्वर्गवास होते ही करोड़ों की संपत्ति के लिए बेटे सरेआम जुतमपैजार कर रहे हैं।

अलबत्ता, सर्जन दो-ढाई दशक पुराने युग के थे, इसलिए कुछ तो नेक काम किए ही होंगे। कोविड युग के डॉक्टरों और अस्पताल मालिकों को सोचना चाहिए...कोविड में बिना इलाज किए...सिर्फ बीमारी की खौफ में इतनी दौलत अर्जित कर लिए कि सिरदर्द हो गया है...बोरियों में रखे कैश को 'अब' किधर लगाएं। रायपुर, बिलासपुर शहर के आसपास की जमीनें डॉक्टरों से बची नहीं। बिल्डरों के पास पैसा लगाने पहले से ही राजनेताओं और नौकरशाहों की लाइन लगी है।

कहने का आशय यह है कि पुरानी कहावतें गलत नहीं होती...पूत सपूत तो का...। पैसे कमाइये...सारे शौक पूरे कीजिए...दुनिया की सैर कीजिए। बट एक सेल्फ लिमिट तय कीजिए। इसके तीन फायदे होंगे। गरीब लुटने से बच जाएगा। भ्रष्ट लोग जेल जाने से बच जाएंगे। और तीसरा संपत्ति विवाद में सड़क पर इज्जत की नीलामी नहीं होगी। बहरहाल, उपर की दोनों घटनाएं आंखें आंखें खोलने के लिए काफी है। तय करना आपका काम है।

सिस्टम जिम्मेदार

करप्शन के लिए राजनीतिक सिस्टम भी कम जिम्मेदार नहीं है। 50 करोड़ के मनरेगा घोटाले में अगर आईएएस टामन सिंह सोनवानी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई होती तो उसे पीएससी में बच्चों का भविष्य खराब करने की हिम्मत नहीं पड़ती। उसी तरह 2005 पीएससी में अगर सिस्टम कड़ा स्टैंड लिया होता तो आरती वासनिक को न आईएएस अवार्ड से मरहूम होना पड़ता और न वो जेल जाती।

ठीक है, जब तक किसी केस में फैसला नहीं हो जाता, प्रमोशन नहीं रोका जाता। मगर ये नियम बनाया कौन है? अफसरशाही ने अपनी सुविधा के लिए बनाई है। अलबत्ता, सरकार को अधिकार है कि जिनकी नीयत और निष्ठा सही नहीं है, उसे प्रमोशन से वंचित कर दें।

हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने पीएससी 2005 की भर्ती को निरस्त कर दिया था। इससे गंभीर केस क्या हो सकता है। इसके बाद भी सरकारें उन्हेंं धड़ाधड़ प्रमोशन ही नहीं दी बल्कि महत्वपूर्ण पोस्टिंग भी देती रही। इंतेहा तो तब हो गई जब, राज्य सरकार ने 2005 के सभी राप्रसे अधिकारियों को डीओपीटी से आईएएस अवार्ड करवा डाला।

सिस्टम जब तक कौवा मारकर नहीं टांगेगा, तब तक भ्रष्ट तंत्र इसी तरह पुष्पित-पल्लवित होता रहेगा। राज्य सरकार ने इस बार दो अफसरों का आईएएस अवार्ड रोका है...यह अच्छा संकेत है।

मगर यह भी सही है कि 2005 बैच वाले चार-पांच अधिकारियों को सरकार ने कलेक्टर बना डाला है, इसके संदेश अच्छे नहीं जाते...शुचिता कायम करने सिस्टम को इस पर विचार किया जाना चाहिए।

एसपी का आदेश

रायपुर के एसएसपी संतोष सिंह को हटने-हटाने को लेकर लंबे समय से चर्चाएं चल रही थी। मगर जब यह परसेप्शन बन गया कि अब नगरीय निकाय चुनाव तक कोई ट्रांसफर नहीं होंगे। सरकार ने बुधवार को देर संतोष सिंह को हटाकर पीएचक्यू भेज दिया। कोरिया के एसपी का हटना अपेक्षित था। पिछले तरकश में यह सवाल भी पूछा गया था कि सरगुजा पुलिस रेंज के किस एसपी को सरकार हटाने वाली है।

इसलिए, कोरिया के एसपी हटने पर कोई हैरानी नहीं हुई। मगर ट्रांसफर लिस्ट में संतोष सिंह का नाम देखकर लोग चौंक गए। पता नहीं, ऐसा क्या हुआ कि सीएम विष्णुदेव साय ने अफसरों से कहा कि दोनों एसपी के आदेश आज ही जारी किए जाएं।

संतोष का अनूठा रिकार्ड

रायपुर एसएसपी संतोष सिंह को भले ही रातोरात बदल दिया गया। मगर उन्हें यह संतोष होगा कि कप्तानी का उनका बनाया हुआ रिकार्ड निकट भविष्य में कोई तोड़ नहीं पाएगा। एसपी के तौर पर संतोष ने बिना ब्रेक लगातार नौ जिला किया। कोंडागांव से शुरू हुई उनकी कप्तानी का सफर नारायणपुर, महासमुंद, रायगढ़, कोरिया, राजनांदगांव, कोरबा, बिलासपुर होते हुए रायपुर में खतम हुआ।

हालांकि, छत्तीसगढ़ के आईपीएस बद्री नारायण मीणा ने भी एसपी के तौर पर नौ जिला किया है। मगर दो अलग-अलग दौर में। आईबी में डेपुटेशन पर जाने से पहले उनका सात जिला हुआ था और फिर लौटकर जांजगीर और दुर्ग जिला किया। बहरहाल, संतोष के नौ जिले में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि लगातार तीन सरकारों में बिना ब्रेक वे एसपी रहे। सरकारें बदलती रहीं मगर उनकी कुर्सी पर कोई आंच नहीं आया।

रमन सरकार में कोंडागांव और नारायणपुर के एसपी रहे। भूपेश सरकार में महासमुंद, रायगढ़, कोरिया, कोरबा और बिलासपुर। इसके बाद दिसंबर 2023 में बीजेपी की सरकार बनी तो उन्हें बिलासपुर में कंटिन्यू किया गया। इसके बाद फिर रायपुर के एसएसपी बनें। याने विष्णुदेव सरकार में दो जिला उन्होंने किया। बेशक, तीन-तीन सरकारों में बिना ब्रेक एसपी रहने का देश में एक नया रिकार्ड होगा।

डीजीपी के दावेदार

सुप्रीम कोर्ट के तेवर के बाद भारत सरकार ने जीपी सिंह को आईपीएस की सर्विस बहाल कर दिया है। इसके बाद छत्तीसगढ़ सरकार उन्हें पोस्टिंग देगी। हालांकि, जीपी की मशक्कतें अभी भी जारी रहेगी। उनके सामने अब विभागीय जांच खतम करा डीजी प्रमोशन कराना बड़ा टास्क रहेगा। चूकि कैट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगा दिया है इसलिए अब विभागीय जांच में भी कुछ होना नहीं है।

सिर्फ बाइंडिंग की औपचारिकता बची है। उसके बाद फिर डीजी प्रमोशन के लिए डीपीसी होगी। जीपी के पास अगर एकाध महीने का भी वक्त होता तो वे डीपीसी कराने के बाद डीजीपी के पेनल में नाम जुड़वाने के लिए यूपीएससी को प्रेजेंटेशन दे सकते थे। तब डीजीपी के चार दावेदार हो जाते। मगर अब उन्हें वेट करना होगा।

अंत में दो सवाल आपसे

1. निलंबन में पैसा मिलेगा, मगर काम नहीं...अंग्रेजों के समय की इस व्यवस्था को टाईट क्यों नहीं की जा रही, ताकि गलत कार्य करने से लोग बचे?

2. छत्तीसगढ़ में कौन-कौन मंत्रियों ने प्रायवेट वसूली एजेंट नियुक्त कर डाला हैं?

शनिवार, 7 दिसंबर 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: छत्तीसगढ़ का भाग्यदोष

 तरकश, 8 दिसंबर 2024

संजय के. दीक्षित

छत्तीसगढ़ का भाग्यदोष

मध्यप्रदेश के बंटवारे के दौरान वहां के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कैडर आबंटन में ऐसी चकरी चलाई कि अधिकांश छंटे हुए आईएएस छत्तीसगढ़ आ गए। उसके बाद रही-सही कसर छत्तीसगढ़ पीएससी ने पूरी कर दी। डिप्टी कलेक्टर प्रशासन के रीढ़ माने जाते हैं। मगर पीएससी ने भर्ती में ऐसा खेला किया कि छत्तीसगढ़ में प्रशासन की रीढ़ ही टूट गई। जो नायब तहसीलदार बनने लायक नहीं थे, वे दरबारी और टामन युग में डिप्टी कलेक्टर बन गए उसके बाद आईएएस भी। ऐसे अफसरों से क्या उम्मीद की जा सकती है।

अभी राज्य प्रशासनिक सेवा के 14 अधिकारियों को आईएएस अवार्ड हुआ है, उनमें दो-तीन को छोड़ दें तो बाकी कर्मकांडियों के आईएएस बनने पर भगवान भी हैरान होंगे। इनमें से दो अफसरों ने रायपुर और दुर्ग में पोस्टिंग के दौरान अवैध प्लाटिंग की धूम मचा दी थी। पहले अवैध प्लाटिंग के लिए नोटिस दो और लिफाफा मिलने पर केस क्लियर। ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों से छत्तीसगढ़ को क्या उम्मीद होगी। दिल को तसल्ली देने के लिए यही कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ का भाग्य ही खराब है।

जीरो टॉलरेंस का मैसेज

सरकार ने आईएएस अवार्ड में अपनी तरफ से जीरो टॉलरेंस की भरपूर कोशिश की। जीएडी को इंस्ट्रक्शन था कि किसी दागी को आईएएस अवार्ड नहीं करना है। पीएससी की परीक्षा नियंत्रक रही आरती वासनिक के खिलाफ सीबीआई ने इंटरव्यू के दो दिन पहले ही एफआईआर की रिपोर्ट भेजी थी। वरना, आरती वासनिक को ड्रॉप करने का कोई आधार नहीं था।

बाकी लोग सीनियरिटी में आ गए तो डीपीसी के मेम्बर रेणु पिल्ले और मुकेश बंसल भी कुछ नहीं कर सकते थे। आरती वासनिक का नाम कट गया इसलिए नायब तहसीलदार से भर्ती हुए वीरेंद्र बहादुर पंच भाई तक की किस्मत का पिटारा खुल गया। वे भी आईएएस अफसर बन गए। कह सकते हैं, छत्तीसगढ़ में चना-मुर्रा वाला हाल हो गया है आईएएस का।

नए चीफ सिकरेट्री कौन?

हालांकि, चीफ सिकरेट्री अमिताभ जैन के रिटायरमेंट में अभी छह महीने से अधिक समय बाकी है। मगर उनकी गद्दी संभालने वाले की चर्चाएं ब्यूरोक्रेसी में अभी से शुरू हो गई हैं। अमिताभ के बाद सीनियरिटी में 91 बैच की रेणु पिल्ले और 92 बैच के सुब्रत साहू हैं। 93 बैच में फिर अमित अग्रवाल हैं।

अमित इस समय भारत सरकार में पोस्टेड हैं और सबसे अधिक संभावनाएं उनकी बताई जा रही है। अमित की संभावनाएं इसलिए कि उनके बाद 94 बैच में मनोज पिंगुआ और ऋचा शर्मा हैं। इनमें से अगर किसी को सीएस बनाया जाएगा तो एक को फिर मंत्रालय से बाहर पोस्टिंग देनी होगी। चूकि दोनों अच्छे अफसर हैं, इसलिए सरकार ऐसा चाहेगी नहीं।

ऐसे में, एक ही रास्ता है कि अमित अग्रवाल छत्तीसगढ़ लौटें। यद्यपि, अमित दिल्ली में अच्छे पोजिशन में हैं, खुद भी छत्तीसगढ़ लौटने के इच्छुक नहीं दिख रहे। मगर जैसे कि कई राज्यों में दिल्ली से चीफ सिकरेट्री भेजा गया है, वैसा कुछ हुआ तो फिर अमित को लौटना पड़ेगा। उच्च स्तर की लोगों की इस संबंध में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बात होने की चर्चाएं भी हैं। बहरहाल, अमित आएं या न आएं, उनके नाम से ही ब्यूरोक्रेसी में धकधकी शुरू हो गई है...अफसरों का आखिर रामराज खतम हो जाएगा।

चेंबर में कैमरा

घर-परिवार से असंतुष्ट या आदत से लाचार छत्तीसगढ़ के कुछ अफसरों के इधर-उधर बहकते कदम की चर्चाएं अब पब्लिक डोमेन में होने लगी हैं। अलबत्ता, ये भी सही है कि ऐसे मामलो को चटपटा बनाने उसमें मिर्च-मसाले भी मिला दिए जाते हैं। फिर भी...बिना आग के धुंआ निकलता नहीं। जीएडी सिकरेट्री को इसके लिए काउंसलिंग करनी चाहिए। आखिर, इससे राज्य का नाम ही खराब होगा। बरसते नोटो की गड्डियां, गोल्ड-डायमंड की ज्वेलरी और महंगे उपहारों की चकाचौंध में घरवालियां व्यस्त हो जाती हैं, और अफसर लगते हैं गुल खिलाने।

कायदे से जितने बड़े अफसर, उनके लंगोट उतने ही टाईट होनी चाहिए। मगर कलयुग ये है। दरअसल, कुछ फर्म और कंपनियां सुनियोजित ढंग से अफसरों को ट्रेप करने के लिए हनी गर्ल याने खूबसूरत लड़कियों को अपाइंट कर लिया है। उनका काम ही है चिकनी-चुपड़े बात कर अफसरों को फंसाना और उसके बाद मनमाफिक फाइलों को ओके कराना। हनी गर्ल के जाल में अफसर ट्रेप होते जा रहे हैं और हिट विकेट भी।

हालांकि, चरित्र को लेकर चौकस कुछ अफसर विषकन्याओं से बचने अपने चेंबर में कैमरा लगाने लगे हैं। पारदर्शिता की दिशा में ये अच्छा कदम है। सरकार को इसे एप्रीसियेट करनी चाहिए।

पसंद अपनी-अपनी

विषकन्याओं की बात आई तो एक पुराना वाकया याद हो आया। पुराने मंत्रालय की बात है। दोपहर का वक्त था...सिकरेट्री होम एएन उपध्याय के पास मैं बैठा था। तभी भृत्य एक विजिटिंग कार्ड लाकर उन्हें दिया। मुझे वहां बैठे करीब घंटा भर हो गया था, फिर किसी आगंतुक का कार्ड भी आ गया था, सो मैं उठने लगा। मगर उपध्यायजी ने मुझे बिठा लिया। बोले...बैठो अभी। दिल्ली की हथियार सप्लाई करने वाली कंपनी की महिला आई है...इन लोगों से मैं डरता हूं...आप थोड़ी देर और बैठ जाओ। उनका आग्रह था, मैं बैठ गया। उन्होंने घंटी बजाई और भृत्य से कहा, भेजो।

दरवाजा खुला तो एक लंबी-चौड़ी कद काया की गौर वर्ण की बेहद आकर्षक युवती भीतर दाखिल हुई। नजाकत और नफासत के साथ वह अपनी कंपनी के गोला-बारूद, रायफल की बारे में बताती रही और उपध्याय जी आदतन हूं...हां करते रहे। उपध्याय जी तरफ से रिस्पांस काफी ठंडा था। इसलिए वह ज्यादा देर बैठ नहीं सकी। करीब 10 मिनट में ही थैंक्स बोलकर खड़ा हो गई।

उसी दिन शाम करीब छह बजे पुलिस मुख्यालय के एक बहुते बड़े अफसर से मेरा अपाइंटमेंट था। मैं नियत समय पर उनके पास पहुंच गया। अभी उनके पास बैठे दो-से-तीन मिनट हुआ होगा कि हथियार सप्लाई कंपनी की वही युवती बेधड़क दरवाजा खोलकर दाखिल हुई। युवती को देखते ही अफसर के चेहरे पर चमक आ गई...उन्होंने बड़ा वार्म वेलकम किया। इतना वार्म कि मुझे दो-चार पल बैठना असहज लगने लगा। चूकि चाय आ गई थी, सो जैसे-तैसे दो-चार चुस्की लेकर निकल गया। कहने का आशय यह है...पसंद अपनी-अपनी। लंगोट के पक्के लोग सुंदरियों को देखकर भी अपना धैर्य नहीं खोते और लंगोट के ढिले लोग जीभ लपलपाने लगते हैं।

सरकार नाराज?

भारत सरकार से सात वर्ष के डेपुटेशन से लौटे अमित कटारिया को अभी तक पोस्टिंग नहीं मिली है। अंदेशा व्यक्त किया जा रहा कि कहीं अमित की लंबी छुट्टी से सरकार खफा तो नहीं है। जाहिर है, भारत सरकार से रिलीव होने के बाद अमित दो महीने की छुट्टी पर चले गए थे। छुट्टी पूरी होने पर वे रायपुर आए और ज्वाईन करने के साथ ही दो महीने की छुट्टी ले ली। फिर छुट्टी खतम होने पर पिछले महीने रायपुर आए मगर ज्वाईनिंग के बाद फिर दिल्ली चले गए।

इससे पहले की बीजेपी सरकार में अघोषित नियम बन गया था दिल्ली से लौटने वाले अफसरों को पोस्टिंग के लिए महीने भर तक वेट करना पड़ता था। अमिताभ जैन, अमित कुमार और गौरव द्विवेदी को भी इस परिस्थिति का सामना करना पड़ा। मगर ये तीनों रायपुर में डटे रहे। अमित और गौरव आफिसर्स क्लब में महीना भर तक पोस्टिंग की बाट जोहते रहे। बहरहाल, सरकार को समझना चाहिए दिल्ली की चकाचौंध में सात साल तक नौकरी करने के बाद रायपुर में रहना मुश्किल तो होगा ही।

संयोग ऐसा भी

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जब केंद्र में इस्पात राज्य मंत्री थे तो विशाखापटनम के सांसद किंजरामू राममोहन नायडू उनसे मिलने आया करते थे। दरअसल, भारत सरकार का स्टील प्लांट विशाखापटनम में है और नायडू वहीं से पहली बार के सांसद थे तो किसी-न-किसी इश्यू को लेकर वे विष्णुदेव से मिलते रहते थे। नायडू अब केंद्र में एवियेशन मिनिस्टर बन गए हैं। वो भी स्वतंत्र प्रभार।

इस बार संयोग ऐसा रहा कि छत्तीसगढ़ की एयर कनेक्टिविटी को लेकर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय स्वयं उनसे मिलने पहुंचे। विष्णुदेव को देख नायडू को खुशी का ठिकाना नहीं रहा। सीएम उन्हें मुद्दे गिनाते गए और वे यस बोलते गए। टूटी-फूटी हिंदी में उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ के लिए जो भी बन पड़ेगा...हम जरूर करेगा। चलिये, अच्छा है। छत्तीसगढ़ में एयरकनेक्टिविटी दुरूरूत होने की संभावनाएं अब काफी प्रबल हो गई हैं।

सीएम सिक्यूरिटी में चूक क्यों?

पिछले दो महीने में तीन से चार बार सीएम सिक्यूरिटी में चूक हुई है। पहली बार दुर्ग में काफिले की गाड़ियां आपस में टकरा गईं। फिर रायगढ़ में ट्रेफिक जाम हुआ। और अब कवर्धा में कुछ पल के अंतराल में दो घटनाएं। पहले में सीएम का काफिला जहां से गुजरना था, वहां एक लावारिस कार खड़ी थी और दूसरा...सीएम को ट्रैफिक जाम की वजह से पीछे लौटना पड़ा।

कवर्धा में मुख्यमंत्री का जनवासय में जाने का कार्यक्रम अचानक बना। मगर वहां के पुलिस अधिकारियों को 10 मिनट टाईम लेकर रोड क्लियरेंस करा लेना था। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। इसमें पुलिस अधिकारियों की लापरवाही उजागर हुई है। गृह विभाग को कम-से-कम अपने विभागीय मंत्री के जिले में ठीकठाक अफसर को पोस्ट करना चाहिए।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या ये सही है कि सरगुजा पुलिस रेंज के किसी एसपी की छुट्टी होने वाली है?

2. मंत्रियों के पीए और अघोषित सलाहकारों की धुंआधार बैटिंग को रोका क्यों नहीं जा रहा है?