सोमवार, 13 मई 2019

मंत्री पत्नी पर आपत्ति और…


12 मई 2019
आदिवासी मंत्री प्रेमसाय सिंह ने अपनी पत्नी को पीएस बनाया तो सरकार ने आदेश निरस्त कर दिया। लेकिन, एक मंत्री के बेटे उनके पर्सनल स्टाफ के रूप में लंबे समय से काम कर रहे हैं तो सिस्टम को कोई एतराज नहीं। आखिर ऐसा दोहरा बर्ताव क्यों? कांग्रेस के एक नेता ने जोगी सरकार में मंत्री रहते हुए अपने बेटे को विधानसभा में क्लास थ्री की नौकरी लगवा ली थी। कुछ साल पहले उन्होंने एक चुनाव जीता तो स्पीकर से आग्रह कर बेटे को अपने साथ काम करने के लिए विधानसभा से रिलीव करा लिया। नेताजी अब मंत्री बन गए हैं। बेटा अब पिताजी के साथ अटैच हो गया है।

उच्च सदन का ऊंचा….

विधानसभा बोले तो सूबे का सबसे ऊंचा और गरिमामय स्थान। यह जगह छत्तीसगढ़ के नेताओं के नाते-रिश्तेदारों या फिर उनके स्टाफ को पिछले दरवाजे से घुसाने का उपक्रम बन गया है। पिछले 19 साल में वहां डेढ़ सौ से अधिक भर्तियां हुई और इनमें से अधिकांश नेताओं के अपनो को ही मौका मिल पाया। बिलासपुर हाईकोर्ट ने हाल ही में दस साल नौकरी कर चुके आठ मार्शलों को नौकरी से बर्खास्त कर दिया। उनके खिलाफ भी भरती में अनियमितता के गंभीर आरोप पाए गए। यही नहीं, विधानसभा के अनगिनत लोग सालों से नेताओं के यहां अटैच हैं और विधानसभा से वेतन उठा रहे। भाजपा के एक पूर्व मंत्री के पीए 15 साल से विधानसभा से बाहर है। कायदे से मंत्रियों को पीए मुहैया कराने का काम जीएडी का है। लेकिन, छत्तीसगढ़ में उल्टा हो रहा है। यहां विधानसभा जीएडी का रोल कर रहा है। अभी पिछले दिनों ही एक सीनियर मंत्री के पीए को विधानसभा ने स्वागत अधिकारी की नौकरी दी है। हालांकि, इसकी प्रक्रिया विधानसभा चुनाव के पहिले शुरू हो गई थी। प्लान हुआ था कि एक विधानसभा में उच्च पद पर बैठे एक भाजपा नेता और कांग्रेस के एक नेता के एक-एक व्यक्ति को स्वागत अधिकारी बनाया जाए। लेकिन, प्रक्रिया होते-होते चुनाव आ गया। अब भाजपा की सरकार चली गई। लिहाजा, विधानसभा ने बीजेपी नेता के आदमी को छोड़ कांग्रेस नेता के स्टाफ को स्वागत अधिकारी बनाने का आदेश जारी कर दिया। स्वागत अधिकारी काम करेगा मंत्री के साथ और तनख्वाह उठाएगा विधानसभा से। बहरहाल, अब साफ-सुथरी छबि के नेता चरणदास महंत स्पीकर बन गए हैं। उनसे उम्मीद है कि वे इस पर कुछ जरूर करेंगे।

अकबर ने छोड़ा पद

आवास पर्यावरण मंत्री मोहम्मद अकबर ने पौल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के चेयरमैन का पद छोड़ दिया है। टेक्नीकल योग्यता वाले इस पद पर इससे पहिले कभी भी कोई राजनीतिज्ञ नहीं रहा। कांग्रेस की नई सरकार ने निगम, आयोगों में नए चेयरमैन अपाइंट करने की बजाए तत्कालिक तौर पर विभागीय मंत्रियों को चेयरमैन का दायित्व सौंपा था। मोहम्मद अकबर को पौल्यूशन बोर्ड के चेयरमैन की जिम्मेदारी दी थी। लेकिन, नियमों का पता चला तो उन्होंने चेयरमैन का पद छोड़ने में देर नहीं लगाई। आवास पर्यावरण विभाग की सिकरेट्री संगीता पी को अब चेयरमैन की जवाबदेही दी गई है। असल में, पौल्यूशन बोर्ड के चेयरमैन के लिए बीई या साइंस में पोस्ट ग्रेजुएट होना चाहिए। हालांकि, ये दोनों ही अर्हताएं संगीता भी पूरी नहीं करती। वे आर्ट से ग्रेजेएट हैं। अब लोकसभा चुनाव के बाद देखना होगा कि सरकार उन्हें इस पद पर बनाए रखती है या कोई फैसला लेती है।

किस्मत हो तो….

आईएएस निरंजन दास को सरकार ने एक्साइज कमिश्नर के साथ एक्साइज सिकरेट्री का जिम्मा सौंपा है। एक्साइज का मतलब आप समझ रहे होंगे, जहां काम कुछ नहीं, महीने में चंद फाइलें। मगर बाकी का तो पूछिए मत….! सब कुछ होता है। निरंजन के पास एक्साइज के अलावे नागरिक आपूर्ति निगम याने नान के प्रबंध निदेशक का पद भी बना रहेगा। नान भी कम नहीं है। वही कथित 35 हजार करोड़ के घपले वाला। निरंजन पर पिछली सरकार ने भी नजरे इनायत में कमी नहीं की। स्पेशल सिकरेट्री होने के बाद भी उन्हें नगरीय प्रशासन विभाग के सिकरेट्री का चार्ज दे दिया था। इस पोस्ट पर कभी विवेक ढांड, एमके राउत, सीके खेतान और आरपी मंडल जैसे अफसर रहे हैं। कांग्रेस सरकार आई तो उन्हें नान का एमडी बना दिया। और, अब एक्साइज। याने किस्मत हो तो….। खैर….किस्मत तो ठीक है, उनकी पोस्टिंग से सीनियर अफसर घबराने लगे हैं। पहले वे नगरीय प्रशासन सचिव डा0 रोहित यादव को रिप्लेस किए थे और अब रोहित के ही 2002 बैच के डॉ0 कमलप्रीत की जगह पर आबकारी में पोस्टिंग पाए हैं। निरंजन आबकारी में ही कमलप्रीत के नीचे स्पेशल सिकरेट्री एक्साइज थे। और, इससे पहिले रोहित के विभाग में डायरेक्टर रहे। जाहिर है, अफसर तो घबराएंगे ही, पता नहीं निरंजन से कब खो हो जाएं।

23 मई पर नजर

23 मई को लोकसभा के नतीजे आएंगे। उसी दिन देश का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा, यह भी तय हो जाएगा। लिहाजा, पूरे देश को 23 मई का इंतजार है तो छत्तीसगढ़ के लोगों की नजर भी इसी डेट पर है। क्योंकि, 23 के बाद ही न केवल राज्य में सरकारी काम प्रारंभ हो पाएंगे। बल्कि, सरकार की सही सोच सामने आएगी कि वह राज्य को विकास की किस दिशा में ले जाना चाहेगी। दरअसल, विधानसभा चुनाव के बाद सरकार को काम करने का मौका मिला नहीं। चुनावी घोषणाओं पर अमल करने के कुछ फैसले हुए कि लोकसभा चुनाव का बिगुल बज गया। छत्तीसगढ़ जैसे देश के पांच राज्यों के लिए दिक्कत यह है कि विधानसभा चुनाव के तीन महीने बाद लोकसभा चुनाव आ जाता है। ऐसे में, आठ महीने तक पूरा सिस्टम बैठ जाता है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. भूपेश सरकार का बारहवां मंत्री क्या बस्तर से बनेगा?
2. डीजी नक्सल गिरधारी नायक को पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग मिलेगी?

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