मंगलवार, 28 मई 2019

शक्ति संघर्ष?

26 मई 2019
लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद सूबे में कांग्रेस की राजनीति में क्या शक्ति संघर्ष बढ़ेगा….यह सवाल अमूमन हर जुबां पर है। कांग्रेस सरकार में नम्बर दो की हैसियत रखने वाले टीएस सिंहदेव चुनाव के पहिले ही कई बार दुहरा चुके थे, सात से कम सीटें मिलने पर पार्टी की हार मानी जाएगी। टीएस के इस सियासी बोल का मतलब कोई भी समझ सकता है। इधर, जनता ने बीजेपी को एकतरफा मेंडेट दे देकर सत्ता कैंप की मुश्किलें बढ़ा दी है। सत्ता पक्ष इसलिए सकते में है कि विधानसभा चुनाव के बाद घोषणाओं को पूरा करने के लिए क्या नहीं किया। शपथ लेने के घंटे भर में किसानों की कर्ज माफी का ऐलान हो गया। धान का समर्थन मूल्य भी बढ़ा दिया। इसके बाद भी ऐसा सिला….छह-छह मंत्रियों वाले दुर्ग में पार्टी प्रत्याशी को करीब चार लाख वोटों से पटखनी मिल गई। जाहिर है, छत्तीसगढ़ में सीएम के लिए भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव, ताम्रध्वज साहू दावेदार रहे। वरिष्ठता की वजह से चरणदास महंत का नाम भी चर्चाओं में रहा। लेकिन, मौका मिला भूपेश को। सो, इन नेताओं के मन में कसक तो होगी ही। लेकिन, पूरे देश में जब कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया हो….राष्ट्रीय अध्यक्ष अपनी सीट नहीं बचा पाए….छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेताओं के राजनीतिक गुरू भोपाल में दो लाख वोट से निबट गए तो फिर छत्तीसगढ़ में पार्टी की हार पर तकरार होने की गुंजाइश भला बचती है क्या। फिलहाल तो नहीं। हां, फर्क यह आएगा कि सरकार और सजग हो जाएगी।

महंत का कद

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को भले ही करारी हार का सामना करना पड़ा हो मगर सूबे के वरिष्ठ नेता और विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत का कद बढ़ गया। विपरीत परिस्थितियों में भी उनकी पत्नी ज्योत्सना महंत 26 हजार वोट से जीतने में कामयाब रही। हालांकि, कोरबा लोकसभा इलाके में जैसा महंत का प्रभाव है, खासे मार्जिन से ज्योत्सना जीती होतीं। लेकिन, महंत के एक समर्थक से उत्तर भारतीयों से झगड़ा ने मतों का अंतर कम कर दिया। कोरबा संसदीय क्षेत्र में यूपी, बिहार के वोटरों की संख्या करीब दो लाख है। खासकर कोरबा और कोरिया में अधिक हैं। कोरबा विधानसभा में ज्योत्सना 35 हजार और कोरिया इलाके में करीब 40 हजार से पिछड़ गई। महंत 88 में श्यामाचरण शुक्ल मंत्रिमंडल में मंत्री बन गए थे। इसके बाद 90 के दशक में दिग्विजय सिंह सरकार में इतने पावरफुल हो गए थे कि उनकी नम्बर दो की हैसियत हो गई थी। कहा तो ये भी जाता है महंत के बढ़ते रसूख को देखकर तब के सीएम दिग्विजय ने उन्हें 1996 के लोकसभा चुनाव में जांजगीर से लड़ा कर पार्लियामेंट में भेज दिया था। महंत को गर लोकसभा चुनाव लड़ाकर किनारे नही किया गया होता तो मध्यप्रदेश के नहीं तो 2000 में छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अवश्य बन गए होते।

प्रशासनिक सर्जरी

लोकसभा चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस सरकार को हिला दिया है….तीन महीने में आखिर जनता का मूड कैसे बदल गया। सरकार अब पूरे सिस्टम में आमूलचूल बदलाव करने के मूड में है। 28 मई को आचार संहिता खतम होने के बाद सरकार मंत्रालय से लेकर जिलों के कलेक्टर, एसपी में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रही है। कलेक्टर, एसपी के ट्रांसफर 3 जून को कलेक्टर, एसपी कांफें्रस में जिलों का पारफारमेंस देखने के बाद किया जाएगा। मंत्रालय में भी कुछ विभागों के सिकरेट्री बदले जाएंगे। हो सकता है, मंत्रालय में सरकार बड़ी सर्जरी कर दें। क्योंकि, अब सरकार समझ गई है रिजल्ट देने की बजाए खाली कुर्सी पर शोभायमान होने वाले अफसर उसकी नैया डूबो देंगे। असल में, सरकार बदलने पर कुछ ऐसे अफसर भी पिछली सरकार को कोस कर कुर्सी पाने में कामयाब हो गए, जो पूरी सर्विस में कभी काम के लिए नहीं जाने गए।

जिसका झंडा, उसके….

इस बार होने वाली प्रशासनिक सर्जरी में पिछली सरकार में अहम पदों पर काम किए अफसरों का इम्पॉटेंस बढ़ने की अटकलें लगाई जा रही है। दरअसल, अफसर किसी के नही होते। जिसका झंडा, उसके अफसर। याद होगा, अजीत जोगी के करीबी अफसर रमन सरकार में कुछ दिन तक जरूर शंट रहे, लेकिन बाद में वे ही मुख्य भूमिका में आ गए। आखिर, काम करने वाले लोगों की ही हर जगह पूछ होती है। सुबोध सिंह जोगी सरकार के दौरान रायगढ़ में साढे़ तीन साल कलेक्टर रहे और बाद में अपने काम की बदौलत रमन सिंह के सचिवालय के मजबूत स्तंभ बन गए। सुनिल कुमार, विवेक ढांड और एमके राउत….तीनों कांग्रेस सरकार में भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे और बीजेपी में भी। रायपुर में चकाचक चौड़ी सड़कें बनाने वाले आरपी मंडल भी जोगी के बेहद करीबी रहे और रमन सरकार में जब रायपुर के कलेक्टर बनें तो पहली बार लोगों ने डेवलपमेंट देखा। मंडल ने पूरे रायपुर को बदल दिया…मरीन ड्राईव, केनाल रोड, इंटरस्टेट बस अड्डा, एयरपोर्ट रोड का सिक्स लेन। कहने का मतलब यह कि ब्यूरोक्रेट्स की कोई अपनी कोई जात और निष्ठा नहीं होती। मसूरी में उन्हें यही सिखाया भी जाता है। इसीलिए सरकार बदलने पर बड़ी कुशलता से वे पाला बदल लेते हैं। लब्बोलुआब यह है कि काम करने वाले अफसर जहां भी रहे, काम करते हैं, रिजल्ट देते हैं। और, ना करने वाले,,,,,?

तीन आईएफएस रिटायर

इस महीने भारतीय वन सेवा के तीन अफसर रिटायर हो जाएंगे। पीसीसीएफ लेवल के आईएफएस केसी यादव, कौशलेंद्र सिंह और एके द्विवेदी 30 मई को सरकारी सेवा की अपनी पारी पूरी कर लेंगे। कौशलेंद्र सिंह नान मामले में ईओडब्लू के राडार पर हैं, इसलिए वे तो नहीं मगर केसी यादव और एके द्विवेदी जरूर कोशिश में होंगे कि उन्हें कोई पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग मिल जाए।

छत्तीसगढ़़ से मंत्री

छत्तीसगढ़ से केंद्रीय मंत्री के लिए राज्य सभा सदस्य सरोज पाण्डेय का नाम चर्चा में है। मगर उन्हें मौका तभी मिल पाएगा जब मोदी मंत्रिमंडल की पहिली लिस्ट में छत्तीसगढ़ को नुमाइंदगी मिले। क्योंकि, इस बार तेलांगना, असम जैसे कई राज्यों में बीजेपी को सीटें मिल गई हैं। पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में आश्चर्यजनक रूप से सीटों की संख्या बढ़ गई है। बिहार से जेडीयू के भी इस बार मंत्री बनेंगे। अगले साल कुछ राज्यों में चुनाव होंगे। शिव सेना भी इस बार ज्यादा मंत्री मांग रही है। तो नीतिश कुमार 17 में से 17 सीटें जीत कर दिए हैं तो उनकी भी उम्मीदें हैं। ममता बनर्जी को शांति से रखने के लिए स्वाभाविक रूप से वहां ज्यादा मंत्र बनाए जाएंगे। अभी सिर्फ बाबुल सुप्रियो मंत्री हैं। कम-से-कम दो और वहां से मंत्री बनेंगे। ऐसे में, छत्तीसगढ़ से बहुत हुआ तो फर्स्ट लिस्ट में एक राज्य मंत्री का नम्बर लग जाए। हालांकि, पिछली सरकार में विष्णुदेव साय पहली लिस्ट में ही मंत्री बन गए थे। 26 मई 2014 को वे प्रधानमंत्र समेत सभी मंत्रियों के साथ शपथ लिए थे। देखना होगा, अबकी 30 मई को राष्ट्रपति भवन में छत्तीसगढ़ से कोई चेहरा नजर आता है या नहीं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. भाजपा, कांग्रेस में से किस पार्टी में लंगोट के ढिले नेताओं की संख्या ज्यादा है?
2. लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशियों को जिताने के लिए सरकार के सभी मंत्रियों एवं नेताओं ने क्या ईमानदारी से काम किया?

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