शनिवार, 8 फ़रवरी 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: पड़ोसी गांवों, दो डीजीपी

तरकश, 9 फरवरी 2024

संजय के. दीक्षित

पड़ोसी गांव, दो डीजीपी

छत्तीसगढ़ राज्य के 24 साल में अब तक 12 डीजीपी बने हैं। इनमें छह यूपी से रहे। प्रथम डीजीपी श्रीमोहन शुक्ला, आरएलएस यादव, अशोक दरबारी, एएन उपध्याय, डीएम अवस्थी और अब अरुणदेव गौतम। वैसे यह जानकर आप चौकेंगे कि डीएम अवस्थी और अरुणदेव गौतम अगल-बगल जिले के ही नहीं बल्कि अगल-बगल गांव से हैं। डीएम कानपुर जिले के महौली गांव के रहने वाले हैं। और अरुणदेव फतेहपुर जिले के बॉर्डर गांव अभयपुर के। अभयपुर फतेहपुर जिले में जरूर आता है। मगर बॉर्डर के गांव होने की वजह से महौली और अभयपुर अगल-बगल में है। डीएम और अरुण आईपीएस बनने से पहले से एक-दूसरे को जानते थे। डीएम छत्तीसगढ़ के 10वें डीजीपी बने और अरुणदेव 12वें।

यूपी जीता, बिहार....

छत्तीसगढ़ के डीजीपी के लिए 92 बैच के दो आईपीएस अधिकारी प्रमुख दावेदार थे। पवनदेव और अरुणदेव गौतम। पवन बिहार से हैं और अरुण यूपी से। पवनदेव बैचवाइज सीनियर थे और अरुण उनके बाद। डीजीपी पद के दोनों प्रमुख दावेदार मुख्य पोलिसिंग से पिछले पांच-सात साल से बाहर थे, इसलिए 94 बैच के हिमांशु गुप्ता भी उम्मीद से थे। मगर गंगा किनारे वाले अरुणदेव की कुंडली में गुरू के घर में बुध बैठा है। मौनी अमावस्या से पहले वे प्रयागराज में अमृत स्नान करके आ गए थे। सो, उन्हें इसका लाभ मिल गया।

नए डीजीपी और चुनौतियां

अरुणदेव गौतम अभी प्रभारी डीजीपी हैं। यूपीएससी से पेनल आने के बाद फिर सरकार पूर्णकालिक डीजीपी अपाइंट करेगी। हालांकि, प्रभारी डीजीपी को ही आमतौर पर कंटीन्यू किया जाता है। सरकार ने अरुणदेव को इस पद के लिए चुना है तो इसमें कोई संशय नहीं कि आगे चलकर अपना मन बदल देगी। मगर इससे अरुणदेव की चुनौतियां कम नहीं हो जाती। नक्सल मोर्चे पर उन्हें बड़ा टास्क मिला है। मैदानी इलाकों की पोलिसिंग खतम हो चुकी है। एसपी से लेकर नीचे तक का अमला मनीराम की गिरफ्त में है।

पवनदेव के रिटायरमेंट में अभी चार साल बचे हैं। तो जीपी सिंह की सुपरसोनिक रफ्तार देखकर लोग हैरान हैं। लोगों ने देखा ही...अशोक जुनेजा 4 फरवरी की शाम रिटायर हुए, उससे चंद घंटे पहले जुनेजा की खाली जगह पर जीपी को डीजी बनाने डीपीसी हो गई। अलबत्ता, अरुणदेव का एक बड़ा प्लस है कि उनकी छबि साथ-सुथरी है। मगर सिर्फ इससे काम नहीं चलेगा। मृतप्राय जैसी हो गई पोलिसिंग में प्राण फूंकने के लिए उन्हें कुछ एक्सट्रा करना होगा।

गुप्त काल से पहले सिंहकाल?

अरुणदेव के डीजीपी बनने पर पुलिस महकमे में लोग खूब मौज काट रहे हैं। आईपीएस के व्हाट्सएप ग्रुपों में मैसेज चल रहा...देव युग के बाद गुप्त काल आएगा या उससे पहले सिंह काल प्रारंभ हो जाएगा। जाहिर है, 94 बैच में हिमांशु गुप्ता और 95 बैच में प्रदीप गुप्ता आगे चलकर डीजीपी के प्रबल दावेदार होंगे। मगर उससे पहले कहीं जीपी सिंह डीजीपी बन गए तो फिर उनका रिटायरमेंट 2030 में है। तब तक कई दावेदार रिटायर हो जाएंगे।

छह साल की एक पोस्टिंग

छत्तीसगढ़ के सबसे सीनियर आईपीएस पवनदेव को पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन में छह साल से ज्यादा वक्त हो गया है। हो सकता है, सरकार ने उनकी वरिष्ठता को ओवरलुक किया है तो उन्हें कोई सम्मानजनक पोस्टिंग दे। डीजी लेवल के प्रदेश में तीन पद हैं। जेल, होमगार्ड और लोक अभियोजक। जेल में इस समय हिमांशु गुप्ता डीजी हैं।

अरुणदेव के पुलिस प्रमुख बनने के बाद होमगार्ड अभी खाली है। वैसे जानकारों का कहना है कि 94 बैच के तीनों आईपीएस अधिकारियों को पीएचक्यू से अलग पोस्टिंग सरकार कर सकती है। क्योंकि, अरुणदेव 92 बैच के हैं, इसलिए पीएचक्यू में दूसरे नंबर के अफसरों तो कम-से-कम तीन-से-चार बैच जूनियर होना चाहिए। वरना, समन्वय गड़बड़ाता है। विश्वरंजन के समय तो आईजी बेस्ड पीएचक्यू हो गया था। सारे एडीजी, डीजी पीएचक्यू से बाहर हो गए थे।

अब मुख्य सचिव

डीजीपी अशोक जुनेजा का युग समाप्त होने के बाद छत्तीसगढ़ में अब नए मुख्य सचिव की चर्चाएं शुरू हो गई है। हालांकि, अमिताभ जैन के रिटायरमेंट में अभी चार महीने से ज्यादा समय बचा है मगर कार्यपालिका के इस सबसे बड़े पद के दावेदारों को लेकर अटकलों का बाजार फिर गर्म हो गया है। अमिताभ जैन के बाद सीनियरिटी में पहले नंबर पर रेणु पिल्ले हैं और उनके बाद सुब्रत साहू। चर्चाओं में आईएएस ऋचा शर्मा और मनोज पिंगुआ का नाम भी है। अब देखना होगा, सरकार किस पर अपना भरोसा व्यक्त करती है। अलबत्ता, लोग तो चुटकी इस पर भी ले रहे कि दिल्ली से कोई पर्ची आ जाए, इससे पहले सरकार को अपना चयन कर लेना चाहिए।

पीसीसीएफ को अभयदान?

डीजीपी के साथ ही पीसीसीएफ श्रीनिवास राव के बदलने की अटकलें भी तेज थी। श्रीनिवास को पिछली सरकार ने सात आईएफएस अफसरों को सुपरशीड कर वन बल प्रमुख बनाया था। इस पर काफी बवाल मचा था। इस पद के दावेदारों की छत्तीसगढ़ में कमी नहीं है...वे हरसंभव प्रयास भी कर रहे हैं। मगर श्रीनिवास राव के औरा के सामने टिक नहीं पा रहे। पता चला है, उन्हें फिर से अभयदान मिल गया है।

बडी सर्जरी

नगरीय निकाय चुनाव के बाद विष्णुदेव साय सरकार सूबे में अहम प्रशासनिक सर्जरी करेगी। धमतरी, दुर्ग समेत आधा दर्जन कलेक्टर बदले जाएंगे। दुर्ग कलेक्टर ऋचा प्रकाश चौधरी डेपुटेशन पर जा रही हैं। सीजीएमएससी की एमडी को भी चेंज किया जाएगा। पता चला है, सरकार अब ठोक बजाकर पोस्टिंग करेगी।

असल में, उपर की सिफारिशों पर सरकार पोस्टिंगे दे देती है मगर गड़बड़झाला की जिम्मेदारी सिफारिश करने वाले नहीं लेते। पूरा ठीकरा सरकार पर फूटता है। याने खाए-पीए कुछ नहीं गिलास फोड़े बारह आना। सरकार की मुसीबत यह रहती है कि नेताओं की सिफारिश न मानें तो कहा जाता है सीएम हाउस सुन नहीं रहा और उनकी बात मान लिया तो सरकार की भद पिटती है। जाहिर है, सीजीएमएससी एमडी की इसमें कोई गलती नहीं। गलती बनवाने वालों की है।

कलेक्टर की दावेदारी

कलेक्टर बनने के लिए आईएएस अफसरों की दावेदारी प्रारंभ हो गई है। धमतरी और दुर्ग दोनों जिला खाली हो रहा है। दोनों ठीकठाक पोस्टिंग मानी जाती है। दोनों जिले राजधानी रायपुर से लगे हुए हैं। कलेक्टर बदलने वाले जिले में खैरागढ़ का नाम भी आ रहा है। पुअर परफार्मेंंस वाले दो-तीन जिलों के कलेक्टर और बदले जाएंगे।

इसके लिए ब्यूरोक्रेसी के गलियारों में जोर-तोड़ शुरू हो गई है। 2011 बैच के चंदन कुमार की कलेक्टर के रूप में इंट्री हो सकती है तो इस बैच के एक आईएएस को कलेक्टरी से वापिस बुलाया जा सकता है। सुबह से कैलकुलेटर लेकर बैठ जाने वाले दो-तीन कलेक्टर सरकार के राडार पर हैं। मनरेगा का काम ठेकेदारी में कराने वाले एक कलेक्टर की कुर्सी भी खिसक सकती है। सीएम सचिवालय कलेक्टरों के कार्यां का बारीकी से मूल्यांकन कर रहा है। काम कम, दिखावा ज्यादा वाले कलेक्टरों की अब नहीं चलेगी।

सीआईसी कौन?

एमके राउत के रिटायर होने के बाद पिछले तीन साल से खाली पडे़ मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्ति की प्रक्रिया तेज हो गई है। इस पद के लिए मुख्य सचिव अमिताभ जैन, निवर्तमान डीजीपी अशोक जुनेजा, पूर्व मुख्य सचिव आरपी मंडल और पूर्व डीजीपी डीएम अवस्थी समेत 58 आवदेन आए हैं।

सरकार ने जीएडी से आवदेनों की फाइलिंग करने कहा था। मगर स्कूटनी का एक लोचा आ गया है। पिछले महीने अंजलि वर्मा वर्सेज भारत सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट ने सीआईसी के लिए कमेटी बनाकर स्कूटनी करने कहा था और यह भी कि अब बताना होगा कि किस आधार पर नियुक्ति की जा रही है।

हालांकि, ये बहुत बड़ा इश्यू नहीं है। जीएडी स्कूटनी कमेटी बनाने की तैयारी कर रहा है। कह सकते हैं...सीआईसी की नियुक्ति जल्दी होगी। अब देखना दिलचस्प होगा कि अमिताभ, जुनेजा, मंडल और डीएम में से किसे सीआईसी की कुर्सी मिलती है। वैसे सीटिंग चीफ सिकरेट्री का पौव्वा ज्यादा होता है मगर निवर्तमान डीजीपी को भी हल्के में नहीं लिया जा सकता।

यद्यपि, जुनेजा को गृह विभाग का सलाहाकार बनाए जाने की भी खबरे तैर रही हैं। जुनेजा से पहले आरएलएस यादव, आरएल वर्मा और आरपी मोदी सलाहकार रह चुके हैं। यादव और वर्मा अजीत जोगी के शासनकाल में और मोदी रमन सिंह के समय एडवाइजर रहे। बहरहाल, बजट सत्र के दौरान सीआईसी के लिए सलेक्शन कमेटी की बैठक हो सकती है।

ईवीएम पर ठीकरा

छत्तीसगढ़ के नगरीय निकाय चुनाव में कांग्रेस के लोग अगर अभी से ईवीएम को निशाने पर लेने लगे हैं, तो इसका मतलब 15 फरवरी को कुछ अलग होने वाला है। दरअसल, कांग्रेस इस चक्कर में धोखा खा गई कि चुनाव मई से पहले नहीं होगा। सो, तैयारी रही नहीं उपर से आपसी गुटबाजी को रोकने के लिए पार्टी ने कोई कदम नहीं उठाया। छत्तीसगढ़ में सरकार होने के बाद भी प्रदेश प्रभारी नीतीन नबीन कई राउंड के दौरे कर गए मगर कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट का पूरे चुनाव में कोई पता नहीं चला।

उधर, रही-सही कसर नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने महाराज के नेतृत्व में अगला चुनाव कराने का राग अलाप कर पूरा कर दिया। जंग में जब आमने-सामने सेना खड़ी हो, उस दौरान नए कमांडर की चर्चा छेड़ दिया जाए तो जाहिर है कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर पड़ेगा ही। बहरहाल, ऐसा प्रतीत होता है कि सीएम विष्णुदेव साय के हाथ की लकीरें पूर्व मुख्यमंत्रियों से भी ज्यादा सूर्ख हो गई है। सियासी पंडितों का कहना है कि इस बार ऐसे नतीजे आएंगे, जो कभी नहीं आए। जाहिर है, राज्य के मुखिया के खाते में ही ये क्रेडिट जाएगा।

अंत में दो सवाल आपसे

1. छत्तीसगढ़ के 10 नगर निगमों में बीजेपी और कांग्रेस के कितने महापौर चुने जाएंगे?

2. कौन ऐसी अदृश्य शक्ति है, जो सरकार के निर्देशों पर बनी जांच रिर्पोटों को दबवा दे रही है?

शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: पार्टनरशिप, धोखा और मौत

 तरकश, 2 फरवरी 2024

संजय के. दीक्षित

पार्टनरशिप, घोखा और मौत

सीजीएमएससी के अरबपति सप्लायर के करिश्माई प्रोग्रेस को जानकार आप हैरान रह जाएंगे। एक दशक पहले तक वह बस्तर में लकड़ी ढुलाई का काम करता था। उस दौरान वहां पोस्टेड एक आईएफएस अधिकारी के संपर्क में आया और वह उसके लिए टनिंग प्वाइंट साबित हुआ।

अफसर के संरक्षण में पहले उसने बांस का खेला शुरू किया। जंगल विभाग के अच्छे बांसों को रिजेक्टेड बांस के रूप में खरीदता और उसे चार गुना रेट में बाजार में बेच देता। कुछ दिन बाद आईएफएस ने उपर सेटिंग करके रायपुर स्थित कारपोरेशन में अपनी पोस्टिंग करा ली। चूकि दोनों में ट्यूनिंग बैठ गई थी, इसलिए अफसर ने सीजीएमएससी में आरोपी सप्लायर का रजिस्ट्रेशन करा दिया।

इसके बाद संगठित लूट का सिलसिला चालू हो गया। पता चला है, सप्लायर ने दो-तीन कंपनियों में अफसर को पार्टनर बना लिया और उनका कमीशन उसमें लगा देता था। 2018 के एंड में कुछ आरटीआई वालों को इस घपले की भनक लग गई, वे जानकारियां निकालने लगे। इससे अफसर बेहद परेशान हो उठे...कुछ महीने बाद ब्रेन हैम्ब्रेज से उनकी मौत हो गई।

उनके जाने के साथ ही अफसर का करीब 70-75 खोखा डूब गया, जिसे उन्होंने आरोपी सप्लायर की कंपनी में लगाया था। सप्लायर ने सिर्फ इतनी हमदर्दी दिखाई कि अफसर के एक बेहद निकट परिजन की शादी का खर्चा उठाया और एक करीबी परिजन को फ्लैट खरीदकर दे दिया। चूकि अफसर अब इस दुनिया में नहीं, इसलिए इससे अधिक कुछ लिखना मुनासिब नहीं होगा।

आईएएस का साला बेईमान

पीएससी के एक बड़े पोस्ट पर काम कर चुके रिटायर अफसर सरगुजा में पोस्टिंग के दौरान बड़े स्तर पर जमीनों की खरीदी की थी। चूकि सरकारी अधिकारी थे, सो अपने नाम पर खरीदते तो फंस जाते, इसलिए साले के नाम पर जमीनों की रजिस्ट्री कराई।

अफसर जब आईएएस से रिटायर हुए तो उन्होंने साले से कहा कि जमीनों को मेरे नाम पर रजिस्ट्री कर दें। मगर साले के मन में खोट आ गया था, उसने जमीनें देने से साफ इंकार कर दिया। अफसर ने सरगुजा के कलेक्टर, आईजी लेवल के अफसरों से बड़ी चिरौरी की, साले को चमकाकर जमीन वापिस करा दें मगर बात बनी नहीं। अब जीजा और साला दोनों सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं।

साले ने जीजा से बेईमानी की, उपर से उनकी आड़ में बेरोजगारों को नौकरी दिलाने कई करोड़ वसूल लिया। बहरहाल, ये तो एक बानगी है...भ्रष्टाचार से अर्जित 50 परसेंट से अधिक संपत्तियों का यही हश्र होता है। धन के भूख में अफसर और नेता नौकर-चाकर, ड्राईवर, नाते-रिश्तेदारों के नाम पर संपत्तियों का पिरामिड खड़ा करते रहते हैं, मगर बाद में उन्हीं के लोग अंगूठा दिखा देते हैं। ऐसी अर्जित संपत्तियों को लास्ट में कोई भोगने वाला नहीं होता या फिर घर-परिवार वालों के बीच झगड़ा-फसाद का जड़ बनता है।

हमनाम का चक्कर

राज्य सरकार ने यशवंत कुमार की जगह आईएएस सीआर प्रसन्ना को राजभवन का नया सचिव अपाइंट किया है। बताते हैं, सरकार ने राजभवन से पेनल भेजा था, उसमें प्रसन्ना का नाम शामिल था। वहां किसी ने प्रसन्ना के बारे में पूछा तो एक व्यक्ति ने तपाक से कह दिया...ठीक है।

प्रसन्ना हायर एजुकेशन सिकरेट्री हैं, इस लिहाज से भी उनका राजभवन में रहना अच्छा होगा...आखिर, राज्यपाल विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी होते हैं। प्रसन्ना के नाम को हरी झंडी का मैसेज उपर चला गया और शाम तक राजभवन के नए सिकरेट्री की पोस्टिंग भी हो गई। मगर जब पोस्टिंग आदेश निकला तो लोग चौंक गए...लोगों के मुंह से बरबस निकल पड़ा...ये क्या हुआ।

दरअसल, छत्तीसगढ़ में प्रसन्ना नाम के दो आईएएस हैं। एक सीनियर प्रसन्ना और दूसरा जूनियर प्रसन्ना। सीनियर का नाम आर प्रसन्ना है, वे 2004 बैच के आईएएस हैं। और जूनियर का नाम सीआर प्रसन्ना है। ये 2006 बैच के आईएएस हैं। आर प्रसन्ना सिकरेट्री हायर एजुकेशन हैं। इसे कहते हैं हमनाम का चक्कर। राजभवन जाना किसी को था और चला कोई गया। हालांकि, ये नाम के धोखे में हुआ या कोई बात होगी, जीएडी बेहतर बता पाएगा।

नाम टेंट-कुर्सी, खेल 100 करोड़ का

फायनेंस के अफसर पाई-पाई जोड़कर राज्य का खर्चा चला रहे हैं, ऐसे में टेंट, कुर्सी के नाम पर पीडब्लूडी के अफसर साल में 100 करोड़ का चूना लगा दें, तो इसे आप क्या कहेंगे। सरकारी कार्यक्रमों, मंत्रियों के दौरे के नाम पर टेंट, कुर्सी का यह खेला पिछले कई बरसों से बदस्तूर चल रहा है।

ओवर बिलिंग के इस खेल में 80 परसेंट हिस्सा उपर के अधिकारियों को जाता है। टेंट वालों को मिलता है सिर्फ 20 परसेंट। इस 20 परसेंट में भी कई टेंट वाले करोड़ों में खेल रहे तो इससे आप समझ सकते हैं कि ओवर बिलिंग का लेवल कितना हाई होगा। दरअसल, छत्तीसगढ़ के रग-रग में भ्रष्टाचार समा गया है।

आखिर सीजीएमएससी को छह महीने पहले तक कौन जानता था, कि वहां के सप्लायर पांच-सात साल में 50 लाख से एक हजार करोड़ का आसामी बन गया। पीडब्लूडी के टेंट-कुर्सी का खेला भी इसी तरह से दबा हुआ था। 80 परसेंट कमीशन मिलता है, इसलिए अफसर भी चाहते हैं कि जितना अधिक बिल बनेगा, उनका हिस्सा उतना बढ़ेगा।

फायनेंस अधिकारियों को एक बार इस टेंट, कुर्सी के खेला की तरफ भी देखना चाहिए। क्योंकि, इसमें खजाने को बड़ा बट्टा लगाया जा रहा है। पीडब्ल्ूडी के बड़े अफसरों से लेकर जिले के कलेक्टरों तक को इसका हिस्सा जाता है। सरकारी और वीआईपी कार्यक्रमों के लिए आखिर खर्च की कोई लिमिट तो तय होनी चाहिए न। फिर वाजिब खर्च में किसी को कोई एतराज नहीं होगा। यदि अफसरों को 80 परसेंट हिस्सा पहुंचाने के लिए बिलिंग की जा रही तो ये गलत है।

करप्शन का ट्रैक्टर

आमतौर पर पीडब्लूडी, इरीगेशन, आबकारी और फॉरेस्ट को कमाई वाला विभाग माना जाता है मगर छत्तीसगढ़ में लेबर वेलफेयर से लेकर एग्रीकल्चर में भी अफसर मालामाला हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ में हाथकरघा विभाग में भी हाथ साफ करने के उदाहरण रहे हैं।

असल में, अफसर इतने हुनरमंद हैं, कि उन्हें आप खराब-से-खराब विभाग में भेज दीजिए, वे गागर में सागर पैदा कर देंगे। बहरहाल, अभी बात किसानों के ट्रैक्टर की सब्सिडी की। भारत सरकार ट्रैक्टर खरीदने पर किसानों को फिफ्टी परसेंट सब्सिडी देती है। इसके लिए एग्रीकल्चर के चेम्स पोर्टल में ऑनलाइन अप्लाई करना पड़ता है।

हमारे एक करीबी रायपुर के एक डीलर के पास टै्रक्टर खरीदने पहुंचे। डीलर ने रेट बताया आठ लाख। आठ लाख का उसने कोटेशन भी दे दिया। उन्होंने जैसे ही यह कहा कि वे चेम्स पोर्टल से खरीदना चाहते हैं, डीलर ने दो लाख रेट बढ़ाकर 10 कर दिया। क्योंकि, चेम्स में मैनुफैक्चरर सप्लाई रेट 10 लाख है।

अब आप भी हैरान होंगे कि सेम कंपनी का मैनुफैक्चरर रेट 10 लाख और उसी कंपनी का सेम मॉडल 8 लाख में कैसे? तो इसका जवाब यह है कि छत्तीसगढ़ में हर साल चेम्स पोर्टल से 400 के करीब किसानों द्वारा ट्रैक्टर खरीदी जाती है। उपर का दो लाख रुपए चेम्स के अफसरों के पास पहुंच जाता है।

यानी साल का आठ करोड़। ये तो सिर्फ एक ट्रैक्टर का मद है। कृषि में मशीनों से लेकर बीज, कीटनाशक और फर्टिलाइजर का करोड़ों का बजट होता है। सरकारें किसानों की हितैषी होने का ढिढोरा पिटती रहती हैं, उधर अफसर उनकी जेब काटते रहते हैं।

ट्रैक्टर अगर बाजार रेट से आठ लाख में मिलता तो किसानों को चार लाख ही जेब से लगता। बाकी का चार लाख सब्सिडी हो जाती। बता दें, दिसंबर 2024 में शपथ लेने के बाद मंत्री रामविचार नेताम से अफसरों ने सबसे पहली फाइल चेम्स पोर्टल से खरीदी की कराई थी।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या ये सही है...जिस तरह पुलिस में ट्रांसपोर्ट की पोस्टिंग के लिए बोली लगती है, उसी तरह सीजीएमएसी में इंजीनियरों के डेपुटेशन के लिए बड़ी बोली लगती है?

2. कांग्रेस शासन काल में लंबे समय तक पीडब्लूडी के ईएनसी रहे अफसर को फिर से ईएनसी के लिए दांव क्यों लगाया गया है?


Chhattisgarh Tarkash 2025: इनोवा वाले साब, 180 करोड़ की बचत

 तरकश, 26 जनवरी 2024

संजय के. दीक्षित

इनोवा वाले साब, 180 करोड़ की बचत

निलंबन बहाली से पहले ही इनोवा गाड़ी की डिमांड करने वाले आईएएस अफसर को जीएडी ने न केवल बहाल कर दिया बल्कि दो-दो पोस्टिंग से नवाज दिया। कोई नहीं...सिस्टम की अपनी मजबूरियां होती हैं। आखिर, इसी सिस्टम ने जिलों में पुलिस की किराये पर चलने वाली इनोवा गाड़ियों पर अपनी भृकुटी चढ़ाई और अब आलम यह है कि जिले के पुलिस अधीक्षकों को दो तिहाई से अधिक किराये की इनोवा को हटाना पड़ गया। सबसे अधिक गोलमाल कवर्धा और राजनांदगांव में था। कवर्धा में रोज आठ-से-दस इनोवा हायर की जाती थी। बिलिंग प्रति गाड़ी 80 हजार से लेकर एक लाख रुपए तक। मगर अब दो-से-तीन गाड़ियां किराये की ली जा रही हैं। इसी तरह अन्य जिलों में भी आधे से अधिक किराये की गाड़ियों को वापिस कर दिया गया है। एसपी और आरआई ने साफ कह दिया है...अब संभव नहीं। बहती गंगा में हाथ धोने कई पुलिस वाले ही ट्रेवल्स कंपनी खोल लिए थे, इससे उन्हें भारी फटका लगा है। बहरहाल, तरकश की खबर और वित्त महकमा एवं पीएचक्यू की सख्ती से छत्तीसगढ़ के खजाने को हर महीने करीब 15 करोड़ की बचत होगी। याने साल का 180 करोड़। कुछ ईमानदार टाईप एसपी मानते हैं कि थोड़ा सा सिस्टम टाईट हो जाए, तो 50 करोड़ रुपए और बच सकता है। इसमें अभी और अंकुश लगाई जा सकती है। मसलन, जिन नेताओं को जरूरत नहीं, एसपी साब लोग उन्हें खुश रखने फॉलोगार्ड मुहैया करा देते हैं।

कौवा मारकर टांगना

सिस्टम की कसावट के लिए टाईमिंग को मेंटेन करना अच्छा कदम है। मगर सिस्टम की गड़बड़ियों को ठीक करने सरकार को अभी कई और कदम उठाने होंगे। छत्तीसगढ़ में अभी कई चीजें ऐसी हो रही हैं, जिनमें कोई संज्ञान नहीं लिया जा रहा। आदिवासी मुख्यमंत्री, आदिवासी संगठन मंत्री होने के बाद भी आदिवासियों की जमीनें हड़पी जा रही हैं, मगर इस पर रोक लगाने अफसरों का ध्यान नहीं है। विदित है, एक कलेक्टर ने आदिवासी जमीन के मामले में लिख कर दे दिया कि इसमें कलेक्टर की अनुमति की जरूरत नहीं। बाद में बवाल मचा तो रजिस्ट्री अधिकारी को सस्पेंड करा दिया। फिर चोरी पकड़ी गई तो रजिस्ट्री अधिकारी को बहाल किया गया। इस मसले में अभी तक किसी को नोटिस तक इश्यू नहीं हुई। आईपीएस लोग रिसोर्ट में शराब पार्टी करें...हंगामा हो, इसमें भी अभी तक कुछ नहीं हुआ। ऐसे ढेरों मामले हैं, जिसमें लोगों की टिप्पणियां सुनने में आ रही कि कुछ बदला नहीं। आखिर सीजीएमससी की ईओडब्लू जांच में ब्रेकर क्यों लगाया जा रहा है...सवाल तो है। जवाब है, सरकार को कौवा मारकर लटकाना पड़ेगा। अमरेश मिश्रा को फ्री हैंड देदीजिए...देखिए फिर करप्शन काबू में कैसे नहीं आता है।

करप्शन कारपोरेशन

छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों के लिए दवाइयां और उपकरण खरीदने वाले सीजीएमससी को सरकार ने अब टाईट करना शुरू कर दिया है। हेल्थ सिकरेट्री और डायरेक्टर हेल्थ अब खुद सीजीएमएससी की निगरानी कर रहे हैं। बल्कि पता तो ये भी चला है कि 50 लाख की पूंजी से दस साल में 500 करोड़ के आसामी बने पिता-पुत्र की भी अब शामत आने वाली है। अफसरों ने उनकी कंपनियों के टॉप के एग्जीक्यूटिव को रायपुर बुलाकर हड़काया है...काम करना है तो डिस्ट्रीब्यूटर्स बदल लो। बताते हैं, दवा कारपोरेशन को करप्शन कारपोरेशन बनाने में छत्तीसगढ़ के पिता-पुत्र की भूमिका सबसे अहम रही। एकाध को छोड़ दें तो अधिकांश एमडी और जीएम फायनेंस तथा जीएम टेक्नीकल पिता-पुत्र ही अपाइंट कराते थे। एमडी कार्तिकेय गोयल ने जब नियम-कायदों का शिकंजा कसा तो हाई कोर्ट में दो दर्जन से अधिक केस लगवा दिया। अगर इसकी सक्षम एजेंसी से जांच हो जाए, तो छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा घोटाला निकलेगा।

IFS अफसर का करनामा

सीजीएमससी के फाउंडर एमडी आईएफएस प्रताप सिंह रहे। उत्तराखंड से ताल्लुकात रखने वाले प्रताप ने सरकार के भरोसे पर खरा उतरते हुए ईमानदारीपूर्वक सीजीएमएससी की नींव रखी। इसके बाद 2014 तक सब ठीकठाक चलता रहा। 2014 में सरकार ने अविनाश चंपावत को हटाकर एक दक्षिण भाषी आईएफएस अफसर को एमडी बना दिया। यही से सीजीएमससी करप्शन कारपोरेशन में ट्रांसफर्म होना प्रारंभ हुआ। आईएफएस ने बस्तर में पोस्टिंग के दौरान ट्रांसपोर्ट का काम करने वाले ठेकेदार को सीजीएमससी में रजिस्टर्ड कराया और फिर ऐसा खेला किया कि खुद भी करोड़ों की मिल्कियत बनाई और सप्लायर की हैसियत आज ऐसी हो गई है कि किसी नेता या अफसर से मिलने जाता है तो दो खोखा छोड़कर आ जाता है। याने लक्ष्मीजी के जरिये विश्वास जीतने का नायाब नमूना। सरकार के एक जिम्मेदार पद पर बैठे नेता इसी चक्कर में बड़ी बदनामी मोल ले बैठे।

मंत्रिमंडल का विस्तार

विष्णुदेव साय कैबिनेट का विस्तार अब लंबे समय के लिए टल गया है। नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव जैसे ही समाप्त होगा, 27 फरवरी से विधानसभा का बजट सत्र प्रारंभ हो जाएगा। इसके बाद होली आ जाएगी। होली के हफ्ता भर बाद तक सत्र चलेगा। यानी करीब 25 मार्च तक। इसके बाद अप्रैल आ जाएगा। बीजेपी के बड़े लीडर भी मानते हैं कि अप्रैल से पहले अब कैबिनेट का विस्तार मुमकिन नहीं। अप्रैल में भी तभी...जब केंद्रीय नेतृत्व इसे सीरियसली ले। वरना, नए मंत्रियों के नाम पर शह-मात का ऐसा खेल चल रहा कि उसे क्लियर नहीं किया गया तो मंत्रियों का शपथ मुमकिन नहीं।

दावेदारों की जेबकटी

विष्णुदेव साय कैबिनेट में मंत्री दो ही बनेंगे मगर नए-पुराने मिलाकर दावेदारों में चार-से-पांच विधायक तो हैं ही। मंत्रिमंडल विस्तार जैसे-जसे आगे खिंचता जा रहा है...इन बेचारों की हालत खराब है...नया जैकेट सिलवाकर बैठे-बैठे आंखें पथरा गई है। जब भी शपथ का शुभ योग बनता दिखता है, राहू-केतु बीच में आ जाते हैं। उपर से चंदा मांगने वाले प्राण खा रहे...गणेश और दुर्गापूजा में कई लाख निकल गए। नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव में अब जेब कटने वाली है। मेयर और अध्यक्ष को कौन पूछे, पार्षद की टिकिट मिलने से पहले कार्यकर्ता पहुंचने लगे हैं...भाई साब कुछ करा देते। अपने इलाके में बेहतर पारफर्मेंस का तनाव है सो अलग। आखिर, मेयर कंडिडेट का रिजल्ट गड़बड़ाया तो उसका ठीकरा बड़े नेताओं पर फूटेगा। इतना खर्चा के बाद भी मंत्री पद मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। क्योंकि, बीजेपी में कब क्या हो जाए, बड़े-बड़े नेताओं को भी मालूम नहीं रहता।

भाभियों को फ्री का पगार

अफसरों की पत्नियां नौकरी करती हैं तो इसमें कोई दिक्कत नहीं। काम करने का सबको अधिकार है। मगर वर्किंग कल्चर बनाने के तहत विष्णुदेव सरकार ने टाईमिंग पर सिस्टम को कसना प्रारंभ किया है तो ये बात भी उठने लगी है कि अफसरों की पत्नियों को भी टाईम को फॉलो करते हुए रोज आफिस जाना चाहिए। सरकार की नोटिस में ये बात आई है कि कई अफसरों की डॉक्टर या असिस्टेंट प्रोफेसर पत्नियां बिना आफिस आए हर महीने पगार उठा रही हैं। खासकर, जिलों में तो और बुरा हाल है। सैयां भए कोतवाल तो फिर किसकी हिम्मत है कि वो टोक दें। न कालेजों के प्रिंसिपल बोल पाते और न ही अस्पतालों के मेडिकल सुपरिटेंडेंट। आलम यह है कि बस्तर में पोस्टेड रहे अधिकारियों की पत्नियां कागजों में अभी भी वहां के अस्पतालों में काम कर वेतन उठा रही हैं। सरकार से पद स्वीकृत कराने का लफड़ा भी नहीं रहता। कलेक्टर साब लोग डीएमएफ में भाभियों के लिए पद का सृजन कर देते हैं और बिना काम की तनख्वाह भी एकाउंट में चला आता है। मगर वक्त अब दूसरा है। जैसे ही महीना बीतने को आता है, राज्य के फाइनेंस सिकरेट्री की रात की नींद उड़ने लगती है। छत्तीसगढ़ के चार लाख कर्मचारियों, अधिकारियों के लिए 2500 करोड़ सेलरी का इंतजाम। उपर से महतारी वंदन के लिए 700 करोड़। याने दो-तीन तारीख तक 3200 करोड़ चाहिए ही चाहिए। ऐसे में, कोई फोकट में वेतन लेगा तो जाहिर है, मेहनत करने वाले को अखरेगा ही। बहरहाल, अफसरों की पत्नियों की जमीर जागनी चाहिए। फ्री का पैसा आखिर क्यों? हूनर है तो उसका उपयोग करें...मेहनत के पैसे में बरकत भी होता है।

खेल में खेला

छत्तीसगढ़ के खेल विभाग के हरफ़ानमौला खिलाडी दूसरे के पैसे से भी करतब दिखा दे रहे हैं. बस्तर ओलम्पिक क़े लिए गृह विभाग ने पैसा दिया था. बस्तर क़े कलेक्टर ने इसके लिए एक करोड़ तीन करोड़ का टेंडर किया था. मगर खेल विभाग क़े अफसरों को यह रास नहीं आया. आख़िरकार, कलेक्टर को टेंडर निरस्त करना पड़ा. उसी सामग्री को खेल अधिकारियों ने तीगुने रेट पर दो करोड़ 95 लाख में ख़रीदा. याने खेल में खेला हो गया.

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या रिटायरमेंट के साल में अफसरों को गोलमाल करने वाली पोस्टिंग देनी चाहिए?

2. सुबह से कैलकुलेटर लेकर बैठ जाने वाले किस कलेक्टर को सरकार चुनाव बाद खो करने सोच रही हैं?

शनिवार, 18 जनवरी 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: सिंहदेव दो, हाथ की लकीरें एक

 तरकश, 19 जनवरी 2024

संजय के. दीक्षित

सिंहदेव दो, हाथ की लकीरें एक

छत्तीसगढ़ की सियासत में सिंहदेवों का बहुत अच्छा नहीं चल रहा है। ज्योतिषियों का कहना है कि उनकी कुंडली के राजयोग वाले घर में राहू का वास हो गया है। जाहिर है, उत्तर छत्तीसगढ़ वाले सिंहदेव मुख्यमंत्री की कुर्सी के निकट पहुंचकर उस पर बैठने से वंचित हो गए। हाईकमान के सामने उनके जिह्वा पर राहू आकर बैठ गया और कुर्सी की डिलिंग के दौरान विनम्रतापूर्वक जी बोल बैठे।

नतीजा यह हुआ कि कुर्सी उनके सामने से खिसक गई। यदि थोड़ा सा टाईट होकर इतना भर बोल गए होते...उम्र मेरी ढलान पर है, पहले मैं ढाई साल...फिर दाउजी। तो वे आज मुख्यमंत्री होते या फिर पूर्व मुख्यमंत्री तो कहलाते ही।

अब बात दक्षिण वाले सिंहदेव की। ये भी नाम के सिंहदेव निकले। वे समझ नहीं पाए और संगठन के कुछ नेताओं ने उन्हें मोहरा बनाते हुए मंत्री के लिए प्रोजेक्ट कर दिया। 15 दिन से उनके घर बधाइयों का तांता लगा रहा...। मगर राहू-केतु की प्रभाव कहें कि सिंहदेव के सामने से मंत्री का सजा थाल निकल गया। वे फिर से प्रदेश अध्यक्ष बना दिए गए...जो उन्हें गवारा नहीं था। दोनों सिंहदेवों को डॉ0 रमन सिंह और विष्णुदेव साय के पंडितों का पता लगाकर कुछ पूजा-पाठ करा लेना चाहिए।

अय्याशी का ट्रांजिट हॉस्टल

ट्रांजिट हॉस्टल इसलिए बनवाया जाता है कि कामकाज के सिलसिले में कोई सरकारी अधिकारी जिला मुख्यालय में आए तो उसे होटल में न रहना पड़े। मगर छत्तीसगढ़ के मुंगेली का ट्रांजिट हॉस्टल अफसरशाही की बदनामी का कारण बनता जा रहा है। वहां के ट्रांजिट हॉस्टल की रातें इतनी रंगीन होने लगी है कि उसकी चर्चाएं अब मुंगेली से चलकर राजधानी रायपुर तक पहुंचने लगी हैं।

दरअसल, मुंगेली छोटी जगह है। वहां अगर बाहर से हनी गर्ल बुलाई जाए या फिर सिस्टम की कोई तलाकशुदा युवती रोज वहां पहुंच जाए, तो ये बात भला कैसे छुपेगी। वैसे भी इस तरह की बातों को पंख लगने में देरी नहीं होती। सिस्टम को इसे नोटिस में लेनी चाहिए। क्योंकि, कोई उंच-नीच हुआ तो बात सरकार पर आएगी।

हेल्थ सिकरेट्री की मेजर सर्जरी

मेडिकल कारपोरेशन बोलें तो छत्तीसगढ़ का इकलौता सरकारी कारपोरेशन...जिसे सिस्टम नहीं, सप्लायर चलाते हैं। रेणु पिल्ले के सिकरेट्री हेल्थ और कार्तिकेय गोयल के सीजीएमससी एमडी रहने के दौरान एक पावरफुल महतारी की वहां से छुट्टी कर दी गई थी। मगर जैसे ही रेणु और कार्तिकेय हेल्थ से हटे, उसके अगले महीने एक बड़े सप्लायर ने महतारी की फिर से सीजीएमससी में पोस्टिंग करा दी। यह 2022 की बात रही होगी।

बहरहाल, सीएम सचिवालय ने नए हेल्थ सिकरेट्री अमित कटारिया को इशारा किया। इसके बाद अमित ने सीजीएमससी की एमआरआई कराई। जांच में एक महतारी की अदम्य साहस और पावर का पता चला। इतना पावर कि बड़ी वाली महतारी छोटी वाली को दीदी बोलती थी, ताकि कुर्सी सुरक्षित रहे। पता चला है, हेल्थ सिकरेट्री ने फायनेंस सिकरेट्री के संज्ञान में यह बात लाई और अगले दिन महतारी का आदेश निकल गया। जाहिर है, अमित की एक सर्जरी से सीजीएमससी की 60 परसेंट बीमारी का निदान हो गया।

पढ़ने-लिखने वाले आईएएस, But

अमित कटारिया को सीजीएमससी में एक और सर्जरी करनी होगी...इसके बाद दावा है कि सीजीएमससी 80 परसेंट भ्रष्टाचार मुक्त हो जाएगा। दरअसल, टेक्निकल विंग सीजीएमससी में भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा जरिया़ है। मेडिकल उपकरणों की खरीदी में टेक्निल अधिकारियों द्वारा टेंडर में ऐसे क्लाज जोड़ दिए जाते हैं, जिससे दूसरा कोई सिर पटक ले, मिलेगा उसे ही जिसे अफसर चाहते हैं। और ये टेक्निल चीजें अधिकांश आईएएस समझ नहीं पाते।

ब्यूरोक्रेट्स के साथ दिक्कत यह है कि हार्ड परिश्रम से यूपीएससी में उनका सलेक्शन तो हो जाता है मगर आईएएस बनने के बाद पढ़ना-लिखना एकदम बंद। पीए या विभाग के खटराल कर्मचारी, अधिकारी जो बता दिया, उसे ही नियम समझ बैठते हैं। सीजीएमससी में यही हुआ। कार्तिकेय गोयल के अलावा कोई भी एमडी सिस्टम में घुस नहीं पाया।

उसका खामियाजा यह हुआ कि अफसरों ने सप्लायरों के साथ गठजोड़ कर पिछले एक दशक में 10 हजार करोड़ से ज्यादा का खेला कर डाला। गनीमत है, सरकार ने अब सीजीएमससी की सर्जरी शुरू कर दी है। लेकिन, इसके साथ सिस्टम पर भी ध्यान देना चाहिए। छत्तीसगढ़ के दो करोड़ गरीबों के लिए दवा और उपकरणों की सप्लाई करने वाले इस विभाग का आलम यह है कि 14 साल में एक भी निगम का अपना कोई अधिकारी, कर्मचारी नहीं है। आउटसोर्सिंग के भरोसे इसे खींचा जा रहा।

ईओडब्लू जांच पर ब्रेक?

सीजीएमससी के संगठित भ्रष्टाचार की खबरें मीडिया में सुर्खिया बनने पर सिस्टम ने ईओडब्लू जांच की बात कही थी। इसके लिए फाइल भी आगे बढ़ गई थी। मगर छह महीने हो गए...कहीं से प्रेशर आया और फाइल ठहर गई। उधर, मंत्रिमंडल की सर्जरी की खबरें वायरल होने के दौरान विधानसभा में सीजीएमससी पर ध्यानाकर्षण आया तो स्वास्थ्य मंत्री को ईओडब्लू जांच की घोषणा करनी पड़ी। मगर अभी भी इसका कोई अता-पता नहीं है।

सवाल उठता है कि 10 हजार करोड़ के करप्शन की जांच को कौन रोक रहा है। लोग भी जानना चाह रहे कि 10 साल पहले 50 लाख का धंधा करने वाले दवा और उपकरण सप्लायर का 500 करोड़ टर्न ओवर कैसे हो गया? कौन से वे भ्रष्ट हाथ हैं, जिन्होंने सप्लायर को आर्थिक मोक्ष प्राप्त करवाते हुए 50 लाख से 500 करोड़ का आसामी बना दिया?

एक मंत्री, एक सचिव बट...

सरकार एक मंत्री, एक सिकरेट्री के नाम पर कुंदन कुमार को डायरेक्टर अरबन एडमिनिस्ट्रेशन से हटाकर हाउसिंग बोर्ड कमिश्नर और आरडीए का सीईओ बना दिया। याने ओपी चौधरी अब उनके मंत्री होंगे। नगरीय निकाय में होने के नाते अभी तक वे दो मंत्रियों में बंटे हुए थे। ओपी चौधरी के साथ अरुण साव के बीच। सरकार के जिम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि दो-तीन महीने में बाकी सचिवों का भी इसी तरह युक्तियुक्तकरण किया जाएगा।

याने एक मंत्री, एक सिकरेट्री। असल में, दो-दो, तीन-तीन मंत्री होने पर अफसरों को समन्वय बिठाने में कई बार दिक्कत होती है। मसलन, एक मंत्री की मीटिंग है और दूसरे ने कहीं बुला लिया तो फिर मामला गड़बड़ाता है। मगर इस खबर में महत्वपूर्ण यह है कि डायरेक्ट आईएएस को हटाकर प्रमोटी आईएएस रिमुजियेस एक्का को डायरेक्टर बनाया गया है।

इस विभाग में पहले निरंजन दास कमाल कर चुके हैं और अब उस अधिकारी को कमान सौंपी गई है, जो 35 परसेंट वाले युग में लंबे समय तक स्पेशल सिकरेट्री अरबन एडमिनिस्ट्रेशन रहे। हम किसी पर आरोप नहीं लगा रहे, जो हुआ, उसकी बात कर रहे...बाकी सरकार समझें।

5 को पीएम अवार्ड

छत्तीसगढ़ के पांच कलेक्टरों को अभी तक पीएम अवार्ड मिल चुका है। सबसे पहला अवार्ड सरगुजा कलेक्टर आर. प्रसन्ना को मिला था। उनके बाद फिर सरगुजा जिले की ही कलेक्टर रीतू सेन को। 2015 में दंतेवाड़ा कलेक्टर ओपी चौधरी को यह अवार्ड मिला। उनके बाद फिर दंतेवाड़ा के ही कलेक्टर सौरव कुमार को...और अब धमतरी कलेक्टर नम्रता गांधी को। पीएम अवार्ड ब्यूरोक्रेसी का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान माना जाता है। प्रधानमंत्री यह पुरस्कार प्रदान करते हैं।

कलेक्टर और भूमाफिया

जिस तरह कहा जाता है कि दरोगा और एसपी अगर चाह ले तो जिला अपराध मुक्त हो सकता है, उसी तरह सच्चाई यह है कि कलेक्टर अगर चाह ले तो भूमाफिया अवैध प्लाटिंग का खेल नहीं कर सकते। दरअसल, कलेक्टर ही रेवेन्यू का मुखिया होता है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपने पहले ही कलेक्टर कांफ्रेंस में कलेक्टरों से भूमाफियाओं के खिलाफ कड़ा से कड़ा एक्शन लेने कहा था। मुख्यमंत्री के निर्देश पर कुछ कलेक्टरों ने जांच-पडताल आगे बढ़ाई। जमीनों की जब्ती की कार्रवाई के साथ ही पुलिस में मुकदमा दर्ज कराया गया।

मगर मुश्किल से दो-तीन जिले में ही...बाकी जिलों के हाल नहीं बदले। सीधी सी बात है कि कलेक्टर जब तक हिम्मत नहीं दिखाएंगे, तब तक भूमाफियाओं पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता। गूगल में सर्च करने पर पता चला कि सिर्फ जांजगीर में एक बार कलेक्टर तारनप्रकाश सिनहा ने सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाले पांच भूमाफियाओं को एसपी विजय अग्रवाल से गिरफ्तारी करा जेल भेज दिया था।

दरअसल, अधिकांश कलेक्टरों के साथ दिक्कत यह है कि उनमें सबसे प्रतिष्ठित सर्विस के साथ ईमानदारी से न्याय करने का अब माद्दा नहीं बचा। वे गुडी-गुडी बन चाहते हैं कि दो-चार जिले की कलेक्टरी कर लें। इसलिए, अबके कलेक्टर जोखिम वाले कामों में हाथ नहीं डालना चाहते। पोस्टिंग उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है। जाहिर तौर पर भूमाफियाओं को ठिकाने लगाने का काम वही कलेक्टर कर सकता है, जो ट्रांसफर आदेश जेब में लेकर घूमता हो।

हालांकि, इसका दूसरा पहलू यह भी है कि छोटे राज्य में पॉलीटिकल हस्तक्षेप काफी बढ़ गया है। दमदारी से काम करने वाले कलेक्टरों को प्रोटेक्शन नहीं मिल रहा। 70 परसेंट कलेक्टर सिर्फ नौकरी कर रहे हैं...30 फीसदी जो अच्छे वाले हैं, वे भी ज्यादा उत्साह नहीं दिखाना चाहते। वजह...? यह कि छोटी-मोटी चूक में अब कोई बचाने वाला नहीं।

बेमेतरा की आईएएस एसडीएम की पिछले सरकार में इसलिए छुट्टी कर दी गई थी कि उन्होंने भूमाफियाओं के खिलाफ वहां मुहिम छेड़ दी थी। तो इस सरकार में भी सूरजपुर के एसडीएम लक्ष्मण तिवारी को रेत माफियाओं के खिलाफ कड़ाई से पेश आने की कीमत यह चुकानी पड़ी कि एक मंत्री ने उन्हें सूरजपुर से 700 किलोमीटर दूर सुकमा भिजवा दिया। लक्ष्मण छत्तीसगढ़ कैडर छोड़कर बिहार चले गए। छत्तीसगढ़ में जरूरत है कि एक अच्छे प्रशासनिक वातावरण तैयार करने की। क्योंकि, सरकार की नीतियों का क्रियान्वयन अफसर करते हैं और वही अगर भ्रष्ट सिस्टम के पार्ट बन जाएंगे या फिर असुरक्षित महसूस करेंगे, तो यह छत्तीसगढ़ के हित में नहीं है।

रोमांचक मुकाबला

छत्तीसगढ़ में मुख्य सूचना आयुक्त के एक पद के लिए इस बार भारत-पाकिस्तान जैसे मुकाबले की स्थिति निर्मित हो सकती है। इस पद के लिए 58 आवेदन आए हैं, उनमें वर्तमान मुख्य सचिव अमिताभ जैन, वर्तमान डीजीपी अशोक जुनेजा, पूर्व मुख्य सचिव आरपी मंडल और पूर्व डीजीपी डीएम अवस्थी जैसे प्रतिभागी हैं। अलबत्ता, रिसेंट सीएस के नाते अमिताभ जैन का पलड़ा इनमें भारी रहेगा। मगर सवाल यह है कि अशोक जुनेजा, आरपी मंडल और डीएम अवस्थी को कम कैसे आंका जा सकता है।

मंडल क्रिकेट के बड़े शौकीन हैं। उन्हें मालूम है कि किस बॉल को कैसे प्लेस करने पर बाउंड्री पार हो जाती है। वे जोगी सरकार में प्रभावशाली रहे। रमन सरकार में सिकरेट्री होने के बाद भी उन्हें रायपुर का कलेक्टर बनाया गया था। और भूपेश सरकार में मुख्य सचिव। फिर जुनेजा का तो आउटस्टैंडिंग पोस्टिंग का रिकार्ड रहा है। वे जो चाहते हैं, उनके हाथों में वैसी लकीरें बन जाती हैं।

डीएम अवस्थी महाकाल के पक्के भक्त हैं। दिसंबर 2018 में बीजेपी की सरकार पलटने पर गिरधारी नायक को भूपेश बघेल डीजी बनाना चाहते थे मगर महाकाल की ऐसी चकरी चली कि डीएम अवस्थी को डीजीपी बनाना पड़ा बल्कि ना-ना करके उन्हें पौने तीन साल तक इस पद पर रखना पड़ा। अब ऐसे-ऐसे हाई प्रोफाइल प्लेयरों ने इस पद के लिए दावेदारी की है तो फिर मुकाबला दिलचस्प रहेगा ही। लोगों की निगाहें अब सीएम विष्णुदेव साय पर टिकी है कि वे इन चारों हरफनमौला खिलाड़ियों से किसे चैंपियन घोषित करते हैं।

तड़फड़ रिलीविंग

ट्रांसफर के बाद अब उसे रुकवाने की धंधेबाजी नहीं चलेगी। जीएडी इसको लेकर सख्त हो चुका है। 17 जनवरी की देर शाम सरकार ने 60 राप्रसे अधिकारियों के ट्रांसफर किए और अगले दिन शाम तक सभी को रिलीव कर दिया गया। जीएडी अपने यहां के लोगों को रिलीव किया ही, कलेक्टरों को रात में ही जीएडी सिकरेट्री ने मैसेज कर दिया था...एनी हाउ कल तक रिलीव कर देना है। 18 शनिवार अवकाश का दिन होने के बाद भी कलेक्टरों ने शाम तक धड़ाधड़ रिलीविंग आर्डर मुख्यमंत्री सचिवालय को भेज दिया था।

अंत में दो सवाल आपसे

1. ऐसा क्यों हो रहा कि अमर अग्रवाल के मंत्री बनाने के नाम से बीजेपी के अंदरखाने का टेम्परेचर बढ़ जा रहा और क्या सिर्फ इसी वजह से मंत्रिमंडल का विस्तार टल जा रहा?

2. 4 फरवरी के दोपहर तक अशोक जुनेजा का अगर एक्सटेंशन नहीं हुआ तो फिर सरकार किस आईपीएस को प्रभारी डीजीपी अपाइंट करेगी?

Chhattisgarh Tarkash 2025: एक झटके में 36 करोड़

 तरकश, 12 जनवरी 2025

संजय के. दीक्षित

एक झटके में 36 करोड़

5 जनवरी के तरकश स्तंभ में पुलिस में किराये की गाड़ियों के खेला को एक्सपोज किया गया था। वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने इस खबर का स्क्रीनशॉट सिकरेट्री फायनेंस को भेजा और उसके बाद सिस्टम हरकत में आ गया। पीएचक्यू के शीर्ष अफसरों ने बकायदा वीसी कर पुलिस अधीक्षकों को आईना दिखाया।

बताते हैं, पुलिस के जिम्मेदार अधिकारी बकायदा लिस्ट लेकर वीसी में पहुंचे थे कि किस जिले में कितनी गाड़ियां मिसयूज हो रही हैं। पीएचक्यू ने सारे एसपी को आदेश दिया है कि अब जिलों में किराये पर चलने वाली गाड़ियों को वे खुद जस्टिफाई करेंगे। पता चला है कि चार-पांच दिन के भीतर 33 जिलों में पुलिस विभाग ने 400 इनोवा और स्कार्पियो का हटा दिया है।

सबसे अधिक बिलासपुर पुलिस ने टाईट किया है। वहां गाड़ियों की संख्या 110 से 53 पर आ गई है। दूसरे जिलों में भी गाड़ियों की संख्या कम की जा रही है। बहरहाल, अगर एक हफ्ते के भीतर 400 इनोवा और स्कार्पियो को हटाया गया है तो महीने का करीब 3 करोड़ रुपए की बचत हुई और साल का 36 करोड़ रुपए।

सिस्टम के एक्शन मोड को देखते माना जा रहा कि जनवरी खतम होते-होते पुलिस विभाग की करीब एक हजार गाड़ियां कम हो जाएंगी। याने छत्तीसगढ़ के खजाने का करीब 200 करोड़ बचेगा। ये राशि पुलिस अधिकारियों की जेब में जा रही थी।

अफसरों की ट्रेवल एजेंसी

नक्सलवाद के नाम पर बस्तर में किराये की गाड़ियों का खेला शुरू हुआ था, वह अब पूरे छत्तीसगढ़ में फैल गया। खासकर, पिछले दशक में यह संगठित भ्रष्टाचार का रुप ले लिया है। जाहिर है, एसपी जिले का सबसे बड़ा पुलिस अफसर होता है और इस खेल को उसी की नजरे इनायत मिल जाए, तो फिर इसको कौन रोेकता।

आलम यह कि छोटे से राजनांदगांव जिले में किराये की 100 गाड़ियां...जरूरत जबकि, पांच-सात की। कवर्धा जैसा छोटा जिला किराये की गाड़ियों में सबसे टॉप पर। एसपी की मीटिंग में कवर्धा की संख्या जानकर डीजीपी अशोक जुनेजा आवाक रह गए।

तरकश में यह खबर छपने के बाद कुछ पुलिस अधीक्षकों ने बताया कि छुटभैया नेताओं से लेकर अधिकारियों तक का काफी प्रेशर रहता है...आरआई सबकी दो-दो, चार-चार गाड़ियां कागजों में चला देता है। याने बिना गाड़ी चले, हर महीने उनके एकाउंट में पैसा पहुंचने की स्थायी व्यवस्था।

कई आरआई अपने परिजनों के नाम पर ट्रेवल एजेंसी खोल डाले हैं। जाहिर है, 100 में से 20 गाड़ी नेताओं और अधिकारियों की होती है...आरआई उपर से 80 गाड़ियों की बिलिंग कर लेते हैं। और, जब मिली जुली कुश्ती है तो फिर बात बाहर कैसे आएगी? आप समझ सकते हैं।

कमरा और अपशकुन!

महानदी भवन के पांचवे सबसे ताकतवर फ्लोर पर मुख्यमंत्री और उनका सचिवालय है। इसमें एक बड़ा कमरा मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह के लिए बनवाया गया था। मगर वास्तुविदों की सलाह पर अग्नेय कोण के कमरे को छोड़कर दूसरे नंबर के बड़े कमरे को उन्होंने अपना चेम्बर बनाया। और मुख्यमंत्री के लिए निर्धारित कमरे में बैजेंद्र कुमार बैठे।

इसके छह साल बाद दिसंबर 2018 में सरकार बदली तो काफी अरसा तक बैजेंद्र वाला कमरा खाली रहा। भूपेश बघेल के सचिव गौरव द्विवेदी और सुब्रत साहू ने अमन सिंह वाले कमरे को तवज्जो दिया। मगर बाद में सिकरेट्री टू सीएम बने टामन सिंह सोनवानी ने सीएम वाले कमरे को चुना।

अब सिकरेट्री टू सीएम राहुल भगत उसमें बैठ रहे हैं। उस कमरे के बारे में धारणा बना दी गई है कि जो भी उसमें बैठा, उसका अच्छा नहीं हुआ। बैजेंद्र कुमार चीफ सिकरेट्री नहीं बन पाए। और टामन सिंह सोनवानी इस समय जेल में हैं। अलबत्ता, राहुल भगत आईपीएस हैं। वर्दी वाले का वास्तु भला क्या बिगाड़ लेगा। वैसे भी, बैजेंद्र कुमार जैसे न वे खरी-खरी बात करते और न ही टामन सिंह वाला कोई गुण उनमें है।

बहरहाल, इस समय अमन सिंह वाले चेम्बर में पीएस टू सीएम सुबोध सिंह बैठ रहे हैं और सुबोध सिंह के रमन सिंह के टाईम वाले कमरे में दयानंद। मुकेश बंसल मिनिस्ट्रियल ब्लॉक में फर्स्ट फ्लोर पर और बसव राजू शुरू से सीएम सचिवालय की बजाए सेक्रेटेरियेट ब्लॉक में बैठते हैं।

सीएम सचिवालय भी छोटा

12 साल पहले बने मंत्रालय और सचिवालय का हाल यह है कि सचिवों के बैठने के लिए कमरे नहीं हैं तो मुख्यमंत्री सचिवालय भी इस संकट से जुदा नहीं। सीएम के पांच सिकरेट्री हैं। इनमें से तीन ही सचिवालय में बैठ पा रहे हैं। बाकी दो अलग-अलग। मंत्रालय का जब तक एक्सटेंशन नहीं होगा, सीएम का कोई दूसरा सचिव अब वहां नहीं बैठ सकता। कायदे से सीएम के सचिवों का सीएम सचिवालय में चेंबर होना चाहिए।

नया प्रशासनिक निजाम?

मुख्य सचिव अमिताभ जैन के अवकाश पर जाने के बाद दूसरे नंबर के सीनियर आईएएस अधिकारी रेणु जी0 पिल्ले को सरकार ने प्रभार सौंपा है। रेणु पिल्ले का आदेश निकलते ही ब्यूरोक्रेसी में सीएस बदलने की अटकलें तेज हो गईं। लोग इसे पी0 जॉय उम्मेन की छुट्टी से लगे जोड़कर देखने।

2012 में उम्मेन जब अपने गृह राज्य केरल गए थे तो रमन सरकार ने उनका विकेट उड़ाकर सुनिल कुमार को सीएस की कुर्सी पर बिठा दिया था। शुरू में सुनिल कुमार को भी प्रभारी मुख्य सचिव बनाया गया था। पर वो केस दूसरा था। सवा तीन साल सीएस रह चुके उम्मेन से सरकार नाखुश थी।

मगर अमिताभ के साथ ऐसा कुछ नहीं है। वे पिछली सरकार में भी सीएस रहे और अभी भी कंटिन्यू कर रहे हैं। मगर मिलियन डॉलर का सवाल है कि रेणु पिल्ले को सरकार ने अचानक बुलाकर कुछ दिनों के लिए ही सही, सबसे बड़ी कुर्सी क्यों सौंप दी? जबकि, प्रभारी सीएस बनाने की चर्चा दूसरे अफसरों की थी।

विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि सरकार के अंदरखाने में बड़ा फैसला हो चुका है। तभी प्रशासन अकादमी से बुलाकर उन्हें अमिताभ का प्रभारी बनाया गया। बात को समझिएगा...अमिताभ का टेन्योर चार साल क्रॉस कर चुका है। उन्होंने मुख्य सूचना आयुक्त के लिए अप्लाई भी कर दिया है।

ऐसे समय में चीफ सिकरेट्री जैसे जिम्मेदार अफसर अगर छुट्टी पर जाता है तो चार्ज उसको दिया जाता है, जिसे आगे बिठाना हो। और रेणु के साथ यही हुआ है। दस दिन में उनका ट्रॉयल भी हो जाएगा। इसके बाद सरकार बड़ा डिसिजन ले सकती है। संभव है कि रेणु पिल्ले छत्तीसगढ़ की नई प्रशासनिक निजाम बन जाएं।

प्रशासनिक भर्राशाही

रेणु पिल्ले के चीफ सिकरेट्री बनने से नेताओं की दिक्कतें बढ़ेगी...नियम-कायदों को ओवरलुक करने वाले कामों को भूलना पड़ेगा। मगर छत्तीसगढ़ के हित में सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि प्रशासनिक अराजकता दूर हो जाएगी। मंत्रालय के अफसर 10 बजे की बजाए पांच मिनट पहले ऑफिस पहुंचने लगेंगे।

आईएएस की एक पी़ढ़ी तो पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है, नई पीढ़ी कम-से-कम दुरूस्त हो जाएगी। मोदी सरकार भी चाहेगी कि ठीकठाक ही मुख्य सचिव बनाया जाए। हालांकि, रेणु पिल्ले जैसी सीएस लंबा नहीं चलती। मगर ऐसे मौके पर मुझे पूर्व डीजीपी अमरनाथ उपध्याय की बेबाकी से कही गई बात याद आ गई...उन्होंने एक बार शेयर किया था कि सरकार को मुझसे पहले गिरधारी नायक को डीजीपी बना देना चाहिए था...नायक साब मुझसे पहले अगर डीजीपी बन गए होते तो पुलिस की भर्राशाही को मुझे नहीं झेलना पड़ता।

माथे पर लिक्खा...

मुख्यमंत्री, चीफ सिकरेट्री और डीजीपी सबको बनने का मौका नहीं मिलता। टीएस सिंहदेव प्रेशर बिल्डअप करने इस्तीफा दिया, इसके बाद भी भूपेश बघेल ने पांच साल कंटिन्यू किया। जबकि, लिखा-पढ़ी ढाई साल की थी। इस सरकार में भी नाम कइयों के चले मगर कुर्सी हासिल हुई विष्णुदेव साय को।

इसी तरह सीएस और डीजीपी में भी हुआ। अशोक विजयवर्गीय और सुनील कुजूर को चीफ सिकरेट्री बनने का मौका मिल गया तो सीधे-साधे भोले-भंडारी मिजाज के अमरनाथ उपध्याय ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वे कभी डीजीपी बनेंगे...मगर वे पूरे चार साल पुलिस महकमे के मुखिया रहे।

डीजीपी को एक्सटेंशन?

डीजीपी अशोक जुनेजा का छह महीने का एक्सटेंशन समाप्त होने में अब 23 दिन बच गए हैं। राज्य सरकार ने नए डीजीपी के लिए यूपीएससी को तीन आईपीएस अधिकारियों के नामों का पेनल भेज दिया है। इनमें पवनदेव, अरुण देव गौतम और हिमांशु गुप्ता शामिल हैं।

मगर जुनेजा को दूसरे एक्सटेंशन देने की चर्चाएं भी बड़ी तेज है। बीजापुर नक्सली हमले में आठ जवानों के शहीद होने के बाद तो अब नहीं लगता कि नक्सलियों से आरपार के युद्ध की इस स्थिति में डीजीपी बदलना चाहेगी। अब किसी के माथे पर 4 फरवरी को डीजीपी बनना लिखा होगा तो फिर बात अलग है।

तीसरा मंत्री कौन?

बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने मंत्रियों की सूची में कोई अचानक कोई बदलाव नहीं किया तो दो नाम तय हैं। एक पूर्व मंत्री हैं तो दूसरा नया। अब सवाल है तीसरा मंत्री कौन होगा? पता चला है, किरण सिंहदेव के मसले पर अभी उहापोह की स्थिति है।

बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष पर पेंच उलझा हुआ है। पार्टी में ये भी साफ नहीं है कि हरियाणा की तरह क्या छत्तीसगढ़ में भी 13 मंत्री होंगे? ये अवश्य तय है कि 17 या 18 जनवरी को नगरीय और पंचायत चुनाव का ऐलान होगा, इससे पहले मंत्रिमंडल का विस्तार हो जाएगा। तब तक खड़मास भी खतम हो जाएगा।

अजय चंद्राकर का क्या?

विधानसभा में बीजेपी के स्टार प्लेयर अजय चंद्राकर को विधानसभा का उपाध्यक्ष बनाए जाने की चर्चाएं हैं। और ये भी कि इसके लिए वे तैयार नहीं हैं। जाहिर सी बात है कि विधानसभा उपाध्यक्ष का पद झुनझुना से ज्यादा कुछ होता नहीं। और इसके लिए भला वे कैसे तैयार हो जाएंगे।

बीजेपी उलझन में है कि अगर अजय चंद्राकर को कुछ नहीं मिला तो चार साल तक विधानसभा में मंत्रियों का क्या होगा? कुछ दिन पहले खतम हुए शीतकालीन सत्र में चंद्राकर ने वरिष्ठ मंत्रियों को पानी-पानी कर दिया था। जाहिर है, सदन में 90 परसेंट मोर्चा वे अकेले संभालते हैं। संसदीय ज्ञान तो उनके पास है ही, विषय-वस्तुओं का इतना गहन अध्ययन कर सदन में पहुंचते हैं कि जिस दिन अजय चंद्राकर का सवाल या ध्यानाकर्षण रहता है, मानकर चला जाता है, उस मंत्री की खैर नहीं।

कांग्रेस के मंत्रियों को वे अकेले छकाते रहे और इस समय भी वे हर सत्र में कुछ-न-कुछ बड़ा निकालकर मंत्रियों को बैकफुट पर जाने विवश कर देते हैं। देखना होगा, अजय चंद्राकर जैसे नेता के लिए बीजेपी क्या रास्ता निकालती है।

मंत्रालय पटरी पर, मगर जिले...?

प्रशासनिक क्षेत्र में सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी कि मंत्रालय के अफसर 24 साल में पहली बार टाईम पर पहुंचने लगे हैं। दोपहर तक जिन सचिवों के गलियारे विरान रहते थे, वहां अब रौनक आ गई है। अफसर दस बजे पहुंच जा रहे, लिहाजा उनका स्टाफ उससे पहले हाजिर रहता है। अफसरों की उपस्थिति को सीएम सचिवालय से मॉनिटरिंग की जा रही है।

सरकार को इसे एक संदेश की तरह जिलों में पहुंचाना चाहिए। जिलों में इसकी आवश्यकता ज्यादा है। कलेक्ट्रेट से लेकर एसडीएम, तहसील समेत अन्य आफिसों में आम आदमी का काम पड़ता है। मगर कौन कब मिलेगा, इसका भरोसा नहीं। गुरूजी लोग पढ़ाना-लिखाना छोड़ मोटा-पतला होने की दवाइयां बेच रहे हैं।

डीईओ, बीईओ को कमीशन के अलावा किसी चीज से मतलब नहीं। स्कूलों में अगर मंत्रालय सिस्टम लागू हो जाएगा कि गुरूजी दीगर धंधे छोड़ अपना मूल काम शुरू कर देंगे। सो, सरकार को जल्द ही इसके लिए कलेक्टरों को टाईट करना होगा। बिना टाईट किए संभव नहीं क्योंकि कलेक्टरों के पास डीएमएफ के धंधे से फुरसत नहीं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. बीजापुर के किस पुलिस अधीक्षक ने पत्रकार मुकेश हत्याकांड के मास्टरमाइंड सुरेश चंद्रकार को अपने बावर्ची से 500 करोड़ का ठेकेदार बना दिया?

2. बीजापुर सड़क घोटाले में लिप्त पीडब्लूडी के अधिकारियों पर कार्रवाई करने को लेकर सरकार असमंजस में क्यों दिख रही है?

शनिवार, 4 जनवरी 2025

Chhattisgarh Tarkash 2024: डिप्टी सीएम, सड़क और बवाल

 तरकश, 5 जनवरी 2024

संजय के. दीक्षित

डिप्टी सीएम, सड़क और बवाल

छत्तीसगढ़ के विधानसभा में कुछ दिन पहले ही दंतेवाड़ा में आरईएस द्वारा बिना सड़क बनाए पैसे भुगतान पर बवाल मचा था। इस पर पंचायत मिनिस्टर विजय शर्मा ने चार अफसरों को सस्पेंड करने का ऐलान किया। इधर, पत्रकार मुकेश चंद्राकार हत्याकांड में पीडब्लूडी के अफसर निशाने पर हैं। 56 करोड़ की सड़क का 112 करोड़ पेमेंट कर दिया गया।

जब तक ऐसे ठेकेदार और अफसर रहेंगे, अमित शाह लाख कोशिश कर लें, बस्तर नक्सलियों से मुक्त नहीं हो सकता। आखिर, यह शाश्वत सत्य है कि नक्सलियों को टैक्स देने के बाद ही ठेकेदारों को काम करने की हरी झंडी मिलती है। नेताओं से लेकर अफसरों और नक्सलियों को मालूम होता है कि काम कागजों पर होना है।

तभी एक दशक पहले तक एसपीओ की मामूली नौकरी करने वाला सुरेश चंद्राकार 500 करोड़ का ठेकेदार बन जाता है। बहरहाल, संयोग यह है कि दोनो विभाग डिप्टी सीएम का है। अरुण साव के पास पीडब्लूडी है और विजय शर्मा के पास पंचायत और ग्रामीण विकास।

दोनों उप मुख्यमंत्रियों को अपने अधिकारियों को टाईट करना चाहिए। क्योंकि, बिना इसके अमित शाह का ड्रीम प्रोजेक्ट कामयाब नहीं हो सकता। फिर महत्वपूर्ण यह भी है कि दोनों सरकार के वरिष्ठतम मंत्री हैं...वे एक्शन मोड में आएंगे तो देखादेखी नए मंत्री भी उनका अनुसरण करेंगे। सिर्फ ये बोलकर वे जिम्मेदारी से मुक्त नहीं काट सकते कि हमारी चल नहीं रही है।

मोदी बड़े या राहुल?

पुलिस में किराये की गाड़ियों में हो रहे खेला पर डीजीपी अशोक जुनेजा ने सवाल-जवाब किया तो एक दिलचस्प खुलासा हुआ। डीजीपी की मीटिंग से लौटने के बाद एक जिले के पुलिस अधीक्षक ने किराये की गाड़ियों की जांच कराई तो पता चला कि विधानसभा चुनाव-2023 के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी की सुरक्षा के लिए पुलिस ने 85 इनोवा और स्कार्पियो किराये पर लिया था और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के लिए 140। याने पीएम मोदी से अधिक राहुल की सुरक्षा?

200 करोड़ का खेला

सालां से चला आ रहा पुलिस विभाग का किराये की गाड़ियों का खेला पब्लिक डोमेन में नहीं आ पाता अगर डीजीपी अशोक जुनेजा ने भृकुटी टेढ़ी नहीं की होती। पिछले महीने एसपी की मीटिंग में उन्होंने सबको खरी-खरी सुनाई। दरअसल, छत्तीसगढ़ पुलिस जितना पैसा हर साल किराये की गाड़ी में फूंक रही है, उतने में हर साल एक हजार इनोवा गाड़ी खरीदी जा सकती है।

मोटे आंकलन के तौर पर हर जिले में साल में सात-से-दस करोड़ रुपए किराये गाड़ियों पर खर्च किए जाते हैं। इस हिसाब से 33 जिलों में हर साल करीब 250 करोड़ रुपए गाड़ियों के किराये के नाम पर बहाया जा रहा। इस 250 करोड़ में से मुश्किल से पूरे प्रदेश में 50 करोड़ वास्तविक खर्च होता होगा। बाकी 200 करोड़ रुपए आरआई से लेकर पुलिस अफसरों की जेब में।

सबसे अधिक बुरी स्थिति है राजनांदगांव और रायपुर रेंज की। तीन टुकड़ों में बंट गए राजनांदगांव जैसे छोटे जिले में 100 इनोवा और स्कार्पियो किराये की चल रही है...इसे एसपी कांफ्रेंस में सार्वजनिक रूप से बताया गया। असल में, किराये की गाड़ियों के नाम पर बरसों से जिलों में बड़े स्तर पर संगठित भ्रष्टाचार चल रहा है।

वस्तुस्थिति यह है कि गाड़ियां कागजों में चल रही है। क्योंकि, इतनी गाड़ियों की जरूरत नहीं होती। पीएचक्यू में प्रदीप गुप्ता जैसे साफ-सुथरी छबि के एडीजी वित्त और योजना के बैठे होने के बाद भी आश्चर्य है कि उन्होंने इसे संज्ञान कैसे नहीं लिया? अलबत्ता, कड़वी सच्चाई यह भी है कि इनमें से आधी गाड़ियां खुद पुलिस अधिकारियों की है, जो अपने परिजनों और रिश्तेदारों या फिर टैक्सी वालों के जरिये चलवा रहे हैं।

वित्त मंत्री को संज्ञान

वीआईपी के फॉलोगार्ड में चार गाड़ी और तीन जवान...आपको विश्वास नहीं होगा कि ये भला कैसे संभव होगा। तीन जवान चार गाड़ी में कैसे बैठेंगे? डीजीपी की मीटिंग के बाद एक एसपी ने रैंडम जांच की तो पता चला कि हड़बड़ी में बिल बनाने के चक्कर में आरआई ने तीन जवानों को चार गाड़ियों में बिठाने का कारनामा कर डाला। बहरहाल, जीएडी सिकरेट्री मुकेश बंसल ने अक्टूबर में एक आदेश निकाला था कि बिना अनुमति गाड़ियां हायर नहीं की जाएगी। मगर पता नहीं किधर से प्रेशर आया, उन्होंने अपना आदेश खुद ही निरस्त कर दिया।

वित्त मंत्री ओपी चौधरी को इसे संज्ञान लेना चाहिए। पुलिस विभाग भले ही उनका नहीं मगर खजाने का चाबी सरकार ने उन्हें सौंपी है तो साल का 200 करोड़ रुपए पुलिस अधीक्षकों और आरआई लोगों की जेब में क्यों जाए। इस 200 करोड़ से हर साल पुलिस जवानों के लिए सुविधायुक्त आवास बनाए जा सकते हैं...पुलिस को संसाधनों से लैस किया जा सकता है।

सुबोध सिंह और कठिन टास्क

पीएस टू सीएम सुबोध सिंह ने कार्यभार संभालने के बाद प्रशासन में सुधार के काम तेज कर दिए हैं। सीएम के सचिवों को भी अब संभागों का दायित्व सौंप दिया है। याने कलेक्टर, एसपी पावर देखकर मुख्यमंत्री के सचिवों की चापलूसी नहीं करेंगे, उन्हें अपने संभाग के प्रभारी सचिवों से ही बात करनी होगी। यह सुशासन की दिशा में अच्छा कदम है।

मगर सुबोध सिंह के समक्ष चुनौतियां कहीं अधिक है। असल में, छत्तीसगढ़ के लिए सुबोध नए नहीं है, इसलिए सभी की यही उम्मीद है कि सुबोध सिंह कुछ करेंगे। सुबोध सामने सबसे तगड़ा टास्क होगा, प्रशासनिक करप्शन को रोकना। एक तरह से कहें तो प्रशासनिक अराजकता की स्थिति है।

आम आदमी बोल रहे, सरकार बदल गई...मगर अफसर और अफसरों की करतूतें नहीं बदली। हाल यह है कि सरकार के साल भर हो गए मगर किधर से कौन बॉल फेंक रहा...किसी को समझ नहीं आ रहा। खटराल अफसर सरकार और संगठन के कई चौखटों का फायदा उठा रहे, इस पर भी स्वच्छ प्रशासन के लिए अंकुश लगाए जाने की जरूरत है।

अफसरों को इसका अहसास होना चाहिए कि गड़बड़ करने पर अब कोई भाई साब नहीं बचाएंगे, तभी सूबे में प्रशासनिक शुचिता और कसावट आ पाएगी। वरना, अफसर मासूमियत भरी सफाई देकर एनजीओ को करोड़ों का टेंडर देते रहेंगे।

इसी हफ्ते की घटना है...सीजीएमससी के प्रमुख ने कहा कि उन्हें मालूम नहीं कि अस्पतालों के फायर ऑडिट का काम जिसे दिया गया है, वह एनजीओ है। जबकि, टेंडर के आदेश में उन्होंने ही स्पष्ट तौर पर डायरेक्टर को लिखा...फलां समिति को आप लोग काम दें। अब उन्हें प्रायवेट लिमिटेड और समिति का अंतर नहीं मालूम को क्या कहा जा सकता है। यकीनन...सुबोध सिंह के सामने कठिन टास्क है।

अनलिमिटेड आईजी

कभी एक समय था कि आईजी बनाने के लिए अफसर नहीं होते थे। कई साल तक स्थिति यह रही कि पांच रेंज, पांच आईजी स्तर के आईपीएस रहे। विकल्प न होने पर डॉ. रमन सिंह को कई बार किसी आईपीएस को नहीं चाहते हुए भी आईजी बनाना पड़ा। मगर इस समय छत्तीसगढ़ में पूरे 18 आईजी हो गए हैं। पीएचक्यू में ही आधा दर्जन से ज्यादा होंगे।

संख्या बढ़ने से 2007 बैच के आईपीएस अधिकारियों के आईजी प्रमोशन में लोचा आ गया था। इस बैच में तीन आईपीएस हैं रामगोपाल गर्ग, दीपक झा और अभिषेक शांडिल्य। डीपीसी के बाद सरकार को इनके प्रमोशन के लिए इसे आधार बनाकर रास्ता निकालना पड़ा कि तीन अफसर डेपुटेशन पर है। इस चक्कर में बाकी आईपीएस का प्रमोशन का आदेश रुक गया है।

16 को आचार संहिता?

नगरीय और पंचायत चुनाव में आगे-पीछे होने की एक वजह यह भी रही कि सिस्टम दो महीने से काफी व्यस्त रहा। दिवाली, राज्योत्सव, सरकार का एक साल, अमित शाह का 15 दिन में दो बार दौरा, विधानसभा का शीतकालीन सत्र। ऐसे में, महापौर, अध्यक्ष और पार्षद प्रत्याशियों के लेवल पर कोई काम ही नहीं हुआ। राज्य निर्वाचन आयोग ने जब चुनाव ऐलान करने की तैयारी तेज की तो लगा कि कुछ गड़बड़ हो रहा है। फिर आरक्षण आगे बढ़ाया गया। बहरहाल, 15 जनवरी को मतदाता पुनरीक्षण का काम कंप्पलीट हो जाएगा। इसके अगले दिन 16 जनवरी को चुनाव का ऐलान हो जाएगा।

बीजेपी के नए अध्यक्ष OBC से?

बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन मंत्री शिवप्रकाश की मौजूदगी में 3 जनवरी को रायपुर में पार्टी की एक अहम बैठक हुई। पार्टी कार्यालय के बाद सभी छत्रप सीएम हाउस गए। वहां क्या हुआ, ये तो नहीं पता मगर ये जरूर है कि बैठक छत्तीसगढ़ के नए अध्यक्ष के लिए मंथन हुआ। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव को मंत्रिमंडल में शामिल करने पार्टी गंभीर है। रही बात नए प्रदेश अध्यक्ष की तो इसके लिए पार्टी किसी ओबीसी नेता पर दांव लगाने विचार कर रही है। इसमें नारायण चंदेल के लिए जबर्दस्त लॉबिंग चल रही है। हालांकि, ओबीसी से इस समय छह मंत्री हैं। गजेंद्र यादव को कहीं मौका मिल गया तो फिर सात हो जाएंगे। आदिवासी वर्ग से सीएम हैं तो इसमें अब कोई स्कोप नहीं। सामान्य से अमर अग्रवाल, किरण सिंहदेव और ओबीसी से गजेंद्र यादव...मंत्री के लिए ये तीन नाम इस समय सबसे अधिक चर्चाओं में है। अब देखना है पार्टी किस पर मुहर लगाती है। 

उल्टी गंगा

छत्तीसगढ़ में सत्ताधारी पार्टी इस कदर कभी बैकफुट पर नजर नहीं आई। हालत यह है कि बीएड धारी 2855 सहायक शिक्षकों की बर्खास्तगी पर विपक्ष हमलावर है और बिना किसी चूक के बीजेपी बगले झांक रही है। न मंत्री दमदारी से कुछ बोल रहे और न उसके प्रवक्ता। ऐसा ही कुछ पत्रकार मुकेश चंद्राकार हत्याकांड में भी हुआ। कांग्रेस ने राष्ट्रीय पदाधिकारी ने दिल्ली से सरकार को आड़े हाथ लेकर ट्वीट कर दिया और आरोपी का कांग्रेस कनेक्शन की फोटुएं सोशल मीडिया पर भरी होने के बाद भी बीजेपी के न मीडिया सेल से कुछ ट्वीट हुआ और न पार्टी के किसी पदाधिकारी ने बयान दिया। कांग्रेस के ट्वीट के बाद बीजेपी हरकत में आई...फिर उसकी काट के तौर पर आधी रात के बाद ट्वीट हुआ। सरकार बने अब साल भर हो गए हैं...बीजेपी नेताओं को आत्ममुग्धता से बाहर आना होगा। वरना, अगले महीने नगरीय और पंचायत चुनाव में परेशानी आ सकती है। सत्ताधारी पार्टी को कम-से-कम सरकार के पक्ष को दमदारी से रखनी चाहिए। इसके लिए मोदीजी, अमित शाह या मनसुख मांडविया थोड़े आएंगे।

आईएएस की वैकेंसी

छत्तीसगढ़ में एलायड सर्विस कोटे से आईएएस का दो पद खाली हो गया है। पहला अनुराग पाण्डेय के रिटायर होने के बाद अगस्त में खाली हुआ और दूसरा शारदा वर्मा की 31 दिसंबर को विदाई के बाद। छत्तीसगढ़ बनने के बाद अभी तक इस कोटे से चार अफसरों को आईएएस अवार्ड हुआ है। जनसंपर्क, इंडस्ट्री, जीएसटी और ट्राईबल से एक-एक। मगर काम से अपनी पहचान बनाने वालों में आज भी एमपी के समय आईएएस बने आरएस विश्वकर्मा और डॉ0 सुशील त्रिवेदी ही याद आते हैं। सरकार को इस बार ठोक बजाकर काबिल अफसरों को ही मौका देना चाहिए। तभी आईएएस पदनाम के साथ न्याय हो पाएगा। 

अंत में दो सवाल आपसे

1. भाजपा ने मंत्री पद के दावेदारों की धड़कनें क्यों बढ़ाकर रखा है?

2. हजारों करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी बस्तर के आदिवासियों की सूरत नहीं बदली मगर वहां के नेता, ठेकेदार, सप्लायर, अफसर और माओवादी कैसे मालामाल हो गए?