शनिवार, 23 मई 2020

ब्यूरोक्रेट्स या गोलकीपर

संजय के. दीक्षित
तरकश, 24 मई 2020
कोई भी सरकार योजना बनाती है, उसके क्रियान्वयन का दायित्व ब्यूरोक्रेसी पर होता है। लेकिन, अगर ब्यूरोक्रेट्स ही डिफेंसिव होकर अपना गोल बचाने लग जाए, तो योजनाओं को धरातल पर उतारने में दिक्कत तो होगी न! छत्तीसगढ़ में दिक्कत यही है कि सीएम तो ट्वेंटी-20 स्टाईल में खेल रहे हैं लेकिन, नौकरशाही में फारवर्ड खेलने वाले अफसर पांच नहीं पुर रहे। जाहिर है, फुटबॉल टीम में पांच फारवर्ड प्लेयर होते हैं…वही आक्रमकता के साथ गोल दागने का काम करते हैं। मंत्रालय में यही चीज नहीं हो रही। पांच क्या…फारवर्ड खेलने वालों में दो-तीन के बाद नाम नहीं सूझेंगे। इसमें एक ब्यूरोक्रेट्स की टिप्पणी गौर करने वाली है…सभी गोलकीपर हो गए हैं। दरअसल, एक तो यहां अफसरों का टोटा है। उपर से कई अफसर पिछले दो-तीन साल में डेपुटेशन पर चले गए हैं। और, जो बचे हैं, उनमें से ज्यादतर गोल बचा रहे हैं।

सिकरेट्री भी बदलेंगे?

गोल बचाने के चक्कर में अपना पारफारमेंस पुअर करने वाले सिकरेट्री भी सरकार की नजर में हैं। सीएम को भी अब डेढ़ साल हो गया है। अफसरों को पहचानने के लिए ये काफी होता है। सीएम के करीबी लोगों का कहना है, साब के पास एक-एक अफसर का रिपोर्ट कार्ड है। उन्हें पता है कि कौन रिजल्ट देने वाला है और कौन पोस्टिंग के लिए बिछने वाला। ऐसे में, कलेक्टरों की लिस्ट के साथ कुछ सिकरेट्री के विभाग भी बदल जाए, तो अचरज नहीं।

मंत्री की भृकुटी!

सूबे के उद्योग और आबकारी मंत्री कवासी लकमा लगते भले ही हैं सहज और सीधे-साधे। मगर उनकी भृकुटी जिस अफसर पर तन जाती है तो उस अफसर की शामत आ जाती है। सुकमा के एसपी जीतेंद्र शुक्ला ने कवासी से पंगा लिया, उनकी वहां से छुट्टी हो गई। इस बार बस्तर का एक तहसीलदार उनके गुस्से का शिकार हो गया। मंत्री को तहसीलदार के खिलाफ कुछ शिकायतें मिली थीं। उन्होंने बस्तर कमिश्नर को हड़काया, अफसर को हटाओ नहीं तो सीएम को फोन कर दूंगा। सीएम के नाम पर कमिश्नर इतना हड़बड़ा गए कि हटाने के साथ तहसीलदार को सस्पेंड भी कर दिया। जाहिर है, कवासी का औरा देखकर रमन सरकार में मंत्री रहे रामविचार नेताम, केदार कश्यप, महेश गागड़ा और रामसेवक पैकरा को ये बात खटक रही होगी कि कांग्रेस सरकार में आदिवासी मंत्री का कितना प्रभाव है।

33 परसेंट पर ठहाके

लॉकडाउन-03 में आफिसों में मैनपावर बुलाने के इश्यू पर चीफ सिकरेट्री ने मंत्रालय में मीटिंग बुलाई थी। इसमें जीएडी सिकरेट्री डॉ0 कमलप्रीत सिंह, डीडी सिंह समेत अन्य अधिकारी मौजूद थे। मीटिंग में भारत सरकार के गाइडलाइन के आधार पर 33 फीसदी अधिकारियों, कर्मचारियों को बुलाने की बात आई तो एक सिकरेट्री ने चुटकी ली….सर, सही में काम तो 33 फीसदी लोग ही करते हैं, बाकी का तो चाय, गुटखा, तंबाकू, और नेतागिरी….। इस पर जमकर ठहाके लगे।

आईएएस बनने में मेहनत

कोरोना में भी चीफ सिकेरट्री आरपी मंडल खूब दौरे कर रहे हैं। इस हफ्ते बस्तर संभाग के अधिकारियों की उन्होंने कांकेर में बैठक बुलाई थी। वहां उन्होंने कलेक्टरों को टास्क दिया कि सभी जिलों में 20-20 आदिवासी आश्रमों को तैयार करें कि वो सुविधाओं के मामलों में किसी गेस्ट हाउस से कम न लगे। कमरे, बाथरुम, आरओ वाटर, जेनरेटर सब हाईक्लास के। वो भी दो महीने के भीतर। इस पर बस्तर के एक कलेक्टर के चेहरे पर शिकन झलकी…सीएस ताड़ गए। बोले…कोई परेशानी। कलेक्टर ने कहा, सर ये तो कठिन काम है…दो महीने में। सीएस इस पर विफर पड़े…मिस्टर कलेक्टर! आईएएस बनने में क्या कठिनाई नहीं होती। सीएम साब ने कहा है…करना है मतलब करना है। इस पर मीटिंग में सन्नाटा छा गया।

चूक गए जनाब…?

कहते हैं, ब्यूरोक्रेट्स अगर पोस्ट पर रहते पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग का इंतजाम कर ले तो ठीक वरना, एक बार गाड़ी आगे बढ़ गई तो फिर कोई पूछता नहीं। तब सीएम हाउस में इंट्री पाना भी आसान नहीं रहता। हालांकि, कांग्रेस सरकार में पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग का औसत खराब नहीं है। सीएम भूपेश बघेल के राज्य की कमान संभालने के बाद आईएएस में अजय सिंह, सुनील कुजूर, केडीपी राव, सुरेंद्र जायसवाल, हेमंत पहाड़े, एनके खाखा, आलोक अवस्थी और दिलीप वासनीकर तथा आईपीएस में एएन उपध्याय, गिरधारी नायक और बीके सिंह रिटायर हुए हैं। इनमें अजय सिंह, कुजूर, जायसवाल और पहाड़े को तत्काल पोस्टिंग मिल गई। वहीं, आईपीएस में सिर्फ नायक को। जिन्हें पोस्टिंग नहीं मिल पाई, उनमें केडीपी राव, आलोक अवस्थी, एनके खाखा और दिलीप वासनीकर। तथा आईपीएस में बीके सिंह और एएन उपध्याय। हालांकि, बीके सिंह बोरिया-बिस्तर समेटकर यहां से चले गए। उपध्याय जरूर यहां हैं। इनमें सबसे अधिक उम्मीद केडीपी राव को रही होगी। लेकिन, नगरीय निकाय चुनाव, विधानसभा का बजट सत्र और फिर कोरोना के चलते उनका मामला मामला गड़बड़ा गया।

व्यापम पर नजर

डॉ0 आलोक शुक्ला स्कूल एजुकेशन के प्रिंसिपल सिकरेट्री के साथ माध्यमिक शिक्षा मंडल और व्यापम के चेयरमैन भी हैं। शुक्ला का 31 मई को रिटायरमेंट हैं। इसको देखते ऑल इंडिया सर्विस के कई वर्तमान और रिटायर अफसरों की नजर व्यापम चेयरमैन की पोस्ट पर है। लेकिन, उनके साथ अंगूर खट्टे हैं….वाला ही मामला होगा। क्योंकि, व्यापम खाली नहीं नहीं हो रहा।

फिल्म भी, सियासत भी

दो बार विधायक रहे परेश बागबहरा कुछ महीने पहले जोगी कांग्रेस से भाजपा ज्वाईन किए। और फिर से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में उतरने जा रहे हैं। इससे पहिले वे 93 में सन्नी देओल के साथ गुनाह फिल्म बनाए थे। जिसमें खुद में एक गाने में गाना गाते हुए नजर आए थे। 2002 में उन्होंने छत्तीसगढ़ी में भोला छत्तीसगढ़ियां बनाई। कई फिल्मों के वे फायनेंसर भी रहे। अब वे बड़े बजट के छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाने जा रहे हैं। याने परेश की सियासत भी चलेगी और अब फिल्म भी। वैसे भी, छत्तीसगढ़ में विपक्ष के लिए दो साल कोई काम है नहीं।

प्रमोटी कलेक्टर्स

कलेक्टरों की लिस्ट आने वाली है। इसमें इस बार स्टेट सर्विस से आईएएस बने अफसरों की संख्या कुछ कम हो सकती है। अभी नौ ऐसे कलेक्टर हैं। हालांकि, एक समय तो 13 तक पहुंच गए थे। लेकिन, डायरेक्ट आईएएस दावेदारों की संख्या को देखते संकेत हैं कि प्रमोटी कलेक्टरों की संख्या कुछ और कम की जाएगी। याने कुछ को कलेक्टरी से वापिस बुलाया जाएगा तो कुछ नए भेजे जाएंगे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. बोर्ड, आयोगों में नेताओं की नियुक्ति क्या लंबे समय के लिए आगे बढ़ जाएगी?
2. चीफ सिकरेट्री किस मिशन पर गुप्त रूप से 19 मई को बिलासपुर पहुंचे थे?

सोमवार, 18 मई 2020

पुत्रों से मंत्री परेशान

संजय के. दीक्षित
तरकश, 17 मई 2020
छत्तीसगढ़ सरकार के एक मंत्री अपने बेटों से आजिज आ गए हैं। बार-बार समझाने के बाद भी ट्रांसफर-पोस्टिंग की एडवांस पेशगी लेने से वे बाज नहीं आ रहे। स्थिति यह है कि एडवांस के बाद भी छह-छह महीने से लोग चक्कर काट रहे हैं। ये सब बात आखिर मार्केट में तो फैलती ही है। इससे मंत्रीजी बेहद दुखी है। पता चला है कि कोरोना पीरियड में उन्होंने बेटों को एक साथ बिठाकर समझाया है…अच्छा खासा कैरियर है, तुमलोगों की वजह से सब खतम हो जाएगा…तुमलोग धैर्य रखो…मैं इकठ्ठे इतना इंतजाम कर दूंगा कि ये सब करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। चलिये, ठीक है। बेटों के भविष्य का इंतजाम पिता नहीं करेगा तो कौन करेगा। लेकिन, बेटों को भी तो समझना चाहिए।

शिव का वजन

सरकार ने मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना के संचालन का जिम्मा नगरीय प्रशासन विभाग को सौंपा है। इसका काम कितना फास्ट चल रहा है, इस बात से समझा जा सकता है कि नगर निगमों द्वारा टेंडर का प्रॉसेज प्रारंभ कर दिया गया है। सीएम सचिवालय सीधे इसकी मानिटरिंग कर रहा है। अगर कोई व्यवधान नहीं आया तो 15 अगस्त को इस योजना का लोकार्पण भी हो जाएगा। दिल्ली सरकार के मोहल्ला क्लीनिक की तर्ज पर सरकार की यह अब तक की सबसे अहम योजना होगी। और, इसकी जिम्मेदारी हेल्थ विभाग की बजाए अगर नगरीय प्रशासन को मिली है तो जाहिर है नगरीय प्रशासन मंत्री शिव डहरिया का इससे वजन बढ़ेगा ही। क्योकि, उन्हें शहरी स्वास्थ्य का एक बड़ा सेटअप उनके अंदर आ जाएगा।

सीएस को नया टास्क

सरकार ने चीफ सिकरेट्री आरपी मंडल को तीन नया टास्क दिया है। खारुन फ्रंट रिवर और अरपा फ्रंट रिवर के निर्माण के साथ ही राजधानी के सबसे प्राचीन बूढ़ापारा तालाब को मरीन ड्राईव जैसा बनाने का। सरकार के निर्देश पर सीएस दो दिन पहले अचानक बिलासपुर पहुंचे और तीन घंटे तक अफसरों के साथ भरी दोपहरी में मौके का मुआयना किया। बूढापारा तालाब की सफाई का काम प्रारंभ हो गया है। और, दो दिन बाद खारुन फ्रंट रिवर का ब्लूप्रिंट बनाने मंडल वहां जाने वाले हैं। खबर है, मुख्यमंत्री ने मंडल से कहा है कि अरपा नदी में पानी लबालब दिखना चाहिए। इसके बाद मंडल एक्शन मोड में हैं।

कोरोना में रिटायरमेंट

लॉकडाउन में रिटायर होना भी बड़ा शॉकिंग है…न बुके, न बिदाई। न मीडिया में कोई खबर। कई अधिकारी, कर्मचारी बेचारे घर बैठे गुमनामी में ही सर्विस को बॉय-बॉय कह दिया। बड़े अफसरों की बात करें तो लॉकडाउन-2 में 30 अप्रैल को डीआईजी आरएस नायक रिटायर हुए। और, अब लॉकडाउन-4 में डीआईजी जीएस दर्रो का नम्बर है। वे 31 मई को सेवानिवृत्त हो जाएंगे।

आलोक का नहीं

छत्तीसगढ़ के सबसे सीनियर आईएएस डॉ0 आलोक शुक्ला का भी इसी महीने रिटायरमेंट है। लेकिन, सरकार के लिए वे इतने उपयोगी हैं कि उनके पोजिशन में कोई बदलाव नहीं आएगा। दरअसल, स्कूल शिक्षा में उन्होंने थोड़े ही दिनों में अप्रत्याशित काम किए हैं। एक झटके में 40 अंग्रेजी स्कूल। कोरोना आया नहीं कि उन्होंने ऑनलाइन एजुकेशन पोर्टल बना दिया। इस पोर्टल की दूसरे राज्य डिमांड कर रहे। वैसे भी आलोक को कंप्यूटर का काफी नॉलेज है। पुराने मंत्रालय में 2002-03 में जब दो-तीन आईएएस लेपटॉप पर काम करते थे, उनमें वे भी शामिल थे। कोरोना में डोर-टू-डोर सब्जी पहुंचाने के लिए सीजी हॉट पोर्टल बनाया गया, इसके पीछे उन्हीं का ब्रेन था। और, अब सुनते हैं हेल्थ विभाग की टेलीमेडीसिन को वे मूर्तरूप दे रहे हैं। सीएम उन्हें पसंद भी करते हैं। ऐसे में, अब कोई सवाल उठते नहीं।

ये चार कलेक्टर!

कलेक्टरों की जंबो लिस्ट निकलने वाली है। इसमें उन चार कलेक्टरों का हटना लगभग निश्चित है, जिनकी पिछली सरकार में पोस्टिंग हुई थी और नई सरकार ने उन पर भरोसा करते हुए कंटीन्यू किया। इनमें अवनीश शरण कवर्धा, सारांश मित्तर सरगुजा, श्याम धावड़े गरियाबंद और नीलकंठ टेकाम कोंडागांव। इन चारों का टाईम भी दो साल से अधिक हो गया है। इनमें से कुछ बड़े जिलों में जाएंगे और कुछ राजधानी लौटेंगे। अवनीश शरण को कवर्धा में नेट दो साल हो गया है। इससे पहले कवर्धा में कोई भी कलेक्टर इतना लंबा नहीं रहा। सोनमणि बोरा, सिद्धार्थ परदेशी, मुकेश बंसल, दयानंद पाण्डेय एक, सवा साल काम करने के बाद बड़े जिलों में चले गए थे। ऐसे में, अवनीश की स्थिति समझी जा सकती है।

कोरोना इम्पैक्ट

कई महीने से लिस्ट निकलने की आस लगाए कलेक्टरों को कोरोना ने इस कदर परेशान कर रखा है कि पूछिए मत! एक तो जिले में कोरोना को रोकने का टेंशन। जिनके जिले में कोरोना का केस आ रहा, उनसे एक बार आप बात कीजिए। आपको समझ में आ जाएगा। वो भी उस समय जब ट्रांसफर लिस्ट लगभग तैयार है। भले ही सरकार कोरोना को मापदंड बनाए या न बनाए मगर कलेक्टरों को भय तो खाए जा रहा। उधर, कोरोना भी पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। जैसे ही नार्मल होने की स्थिति आने पर लिस्ट निकलने की सुगबुगाहट प्रारंभ होती है एक-दो केस टपक जाता है। हालांकि, इससे नुकसान राज्य का हो रहा है। विधानसभा सत्र के बाद से कलेक्टरों की नजर लिस्ट पर है। कोरोना के पहले से अधिकांश कलेक्टरों ने नए कामों में रुचि लेना बंद कर दिया था। दरअसल, वे जानते हैं कि चलाचली की बेला में नए काम का कोई मतलब नहीं। दूसरा कोई कलेक्टर आएगा तो वो उसमें इंटरेस्ट लेगा नहीं।

हेड ऑफ फॉरेस्ट

सूबे के सबसे सीनियर आईएफएस मुदित कुमार के वन विभाग छोड़कर डीजी सीजी कॉस्ट बनने से पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी का हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स बनने का रास्ता साफ हो गया है। राकेश साल भर पहिले पीसीसीएफ तो बन गए थे लेकिन, सबसे वरिष्ठ होने के नाते मुदित कुमार के पास हेड ऑफ फॉरेस्ट का पद बरकरार था। राकेश को अब वन बल प्रमुख बनाने के लिए प्रॉसेज चालू हो गया है। डीपीसी के बाद उन्हें 80 हजार का स्केल मिल जाएगा। राज्य में तीन पोस्ट 80 हजार के होते हैं। चीफ सिकरेट्री, डीजीपी और पीसीसीएफ। मुदित कुमार के कारण एडिशनल पीसीसीएफ पीसी पाण्डेय को भी लाभ मिलता दिख रहा है। पद रिक्त होने के कारण पाण्डेय अब पीसीसीएफ प्रमोट हो जाएंगे। फिलहाल, वे राज्य वन अनुसंधान संस्थान के डायरेक्टर हैं।

बजाज की वापसी

राज्य सरकार ने सीनियर आईएफएस एसएस बजाज का निलंबन बहाल कर दिया है। उनकी पोस्टिंग की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। नोटशीट वन मंत्री मोहम्मद अकबर के यहां पहुंच गई है। उनकी टीप के बाद फाइल सीएम भूपेश बघेल के पास जाएगी और फिर उनके एप्रूवल के बाद आदेश निकल जाएगा। बजाज के साथ 10 और आईएफएस अधिकारियों का आदेश निकलेगा। इनमें हाल ही में संस्कृति संचालनालय से वन विभाग में लौटे एडिशनल पीसीसीएफ अनिल साहू शामिल हैं। उनके अलावा 9 अवार्डेट आईएफएस अधिकारियों को भी सरकार नई पोस्टिंग देगी।

अंत में दो सवाल आपसे

1. प्रमोटी कलेक्टरों की संख्या 13 से घटकर 9 पर आ गई है। ये संख्या बढ़ेगी या 9 के आसपास ही रहेगी?
2. राजधानी की कलेक्टरी करने से अधिकांश आईएएस क्यों बचते हैं?

मंगलवार, 12 मई 2020

मंत्रियों के ग्रह-नक्षत्र

संजय के. दीक्षित
तरकश, 10 मई 2020
पंचायत और स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के राजधानी स्थित सरकारी बंगले में शार्ट सर्किट से आग लग गई। घटना के दौरान मंत्री घर पर ही थे। गनीमत है कि दिन का समय था, लिहाजा बंगले का स्टाफ तुरंत हरकत में आ गया। और, कल नगरीय प्रशासन एवं श्रम मंत्री शिवकुमार डहरिया के सरकारी आवास पर बिजली गिर गई। 8 मई को शाम बारिश, आंधी के बीच जिस जगह पर बिजली गिरी, उससे 50 कदम पर मंत्री डहरिया अपने आफिस में बैठे थे। बिजली का प्रभाव इतना ज्यादा था कि मंत्री के घर का एसी, टीवी जैसे इलेक्ट्रानिक सामान खराब हो गए। बहरहाल, हफ्ते भर में दो-दो मंत्रियों के यहां इस तरह की घटनाएं…। लगता है, ग्रह-नक्षत्र की शांति के लिए इन्हें यज्ञ आदि कुछ करना चाहिए।

भूपेश की वर्किंग टीम

फरवरी में सीएम के विदेश जाने के पहिले से कलेक्टरों के ट्रांसफर की अटकलें चल रही हैं। मगर किसी-न-किसी वजह से लिस्ट रुक जा रही थी। अब खबर है, बाहर से आने वाले मजदूरों के सेटलमेंट के बाद कलेक्टरों के ट्रांसफर पर सरकार मुहर लगा देगी। क्योंकि, कोरोना अब लंबा चलने वाला है, इसे लगभग सभी ने मान लिया है। बहरहाल, अबकी जो कलेक्टरों की लिस्ट निकलेगी, वही सीएम की असली वर्किंग टीम होगी। अब योजनाओं के क्रियान्वयन का समय आ गया है। पिछली बार सरकार ने शपथ लेने के तुरंत बाद 21 कलेक्टरों को बदला था। लेकिन, तब पिछली सरकार के कई दुखी, पीड़ित अफसर रो-गाकर कलेक्टर बनने में कामयाब हो गए थे। लेकिन, इस बार ऐसा नहीं होगा। सुना है, सरकार इस बार ठोक-बजाकर फैसला लेगी। कुछ नाम तो तय भी किए जा चुके हैं।

2008 बैच तक क्लोज?

छत्तीसगढ़ में 2012 बैच के चार आईएएस अभी तक कलेक्टर नहीं बन पाए हैं। जबकि, दूसरे कई राज्यों में 2012 बैच के अफसर दो-दो जिला कर चुके हैं। उधर, 2011, 2012 बैच के पदोन्नत आईएएस में से भी कुछ को कलेक्टर बनाना होगा। लिहाजा, सरकार कलेक्टर के लिए 2008 बैच तक क्लोज करने पर विचार कर रही है। हालांकि, इसमें अड़चन यह है कि बड़े जिलों के लिए अनुभवी अधिकारी चाहिए। कम-से-कम रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग के लिए। अभी 2004 बैच के संजय अलंग बिलासपुर के कलेक्टर हैं। वे सिकरेट्री रैंक में आ चुके हैं। इसके बाद 2006 बैच के भारतीदासन और अंकित आनंद रायपुर तथा दुर्ग, 2007 बैच के यशवंत कुमार रायगढ़ और 2008 बैच की शिखा राजपूत गौरेला, पेंड्रा की कलेक्टर हैं। इनमें से कुछ कलेक्टरों का पारफारमेंस भी बढ़ियां हैं। लेकिन, सरकार ने अगर 2008 बैच तक क्लोज करने का निर्णय ले लिया तो इन पांचों अफसरों को राजधानी लौटना पड़ेगा। यही नहीं, 2007, 2008 बैचों के और दावेदारों को भी इससे धक्का लगेगा।

सिकरेट्री लेवल पर चेंजेस

कलेक्टरों के साथ सिकरेट्री की भी एक छोटी लिस्ट निकलेगी। संजय अलंग जैसे सीनियर कलेक्टर मंत्रालय लौटेंगे, तो उन्हें कोई-न-कोई विभाग मिलेगा ही। हालांकि, निहारिका बारिक सिंह को छोड़कर सारे सिकरेट्री के विभाग एक-एक, दो-दो बार बदल चुके हैं। निहारिका पहली सिकरेट्री होंगी, जो रमन सरकार में भी हेल्थ सिकरेट्री रहीं और इस सरकार में भी। मगर कोरोना के दौरान उनका विभाग बदलेगा, ऐसा प्रतीत नहीं होता।

आईपीएस प्रमोशन

डीजी के प्रमोशन में तकनीकी पेंच लग गया है, उससे लगता है अभी उनकी डीपीसी नहीं होगी। लेकिन, खबर है बाकी एसपी, डीआईजी, आईजी के प्रमोशन की तैयारी गृह विभाग ने कर ली है। किसी भी दिन मंत्रालय में इन पदों के लिए डीपीसी हो सकती है। इसमें आईजी प्रदीप गुप्ता आईजी से एडीजी, डीआईजी टीआर पैकरा डीआईजी से आईजी, बीएस ध्रुव, आरएन दास, मयंक श्रीवास्तव और टी एक्का डीआईजी प्रमोट होंगे।

सीएम जब मुस्कराए

सीएम हाउस में वन विभाग की समीक्षा बैठक चल रही थी। सीएम भूपेश बघेल ने पीसीसीएफ से पूछा, इस बार कितने पौधे लगाओगे। पीसीसीएफ ने कहा, सात करोड़। सीएम ने फिर पूछा, पिछले साल कितने लगाए गए थे, जवाब मिला…सात करोड। और, उसके पिछले साल…? सात करोड़। सात करोड़ की जादुई संख्या सुनकर सीएम मुस्करा दिए। बोले…इतने में तो छत्तीसगढ़ की एक इंच जमीन भी नहीं बची होती। इसके बाद वे गंभीर हुए। और फिर फॉरेस्ट अफसरों को बड़ा टास्क दिया। बोले, इस तरह पौधारोपण किया जाए कि मैं भी देख सकूं…लोग भी देख सकें कि वन विभाग प्लांटेशन किया है। छत्तीसगढ़ में जितने हाईवे हैं, अबकी बरसात में उसके दोनों ओर तीन-तीन लाईन में पौधे लगाए जाएं। सीएम ने बैठक में मौजूद चीफ सिकरेट्री आरपी मंडल से कहा कि वे इसे कोआर्डिनेट करें। रिव्यू में यह भी तय हुआ कि इसमें जरा सी भी ढिलाई हुई तो संबंधित इलाके के डीएफओ और सीसीएफ जिम्मेदार होंगे। याने लघु वनोपज में बढ़ियां रिजल्ट देने वाले पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी को अब प्लांटेशन की चुनौती मिल गई है।

बोरा से वैर या चूक?

सरकार ने बाहर फंसे लोगों को छत्तीसगढ़ लाने के लिए तीन आईएएस अधिकारियों को नोडल अधिकारी बनाया है। लेबर सिकरेट्री सोनमणि बोरा, पीडब्लूडी सिकरेट्री सिद्धार्थ परदेशी और ईरीगेशन सिकरेट्री अविनाश चंपावत को। इसमें दिलचस्प यह हुआ कि मंत्रालय से परदेशी और चंपावत के जो मोबाइल नम्बर जारी हुए, वो उनके स्टाफ अफिसर के थे, मगर बोरा का पर्सनल नम्बर रिलीज हो गया। जैसे ही ये नम्बर मूव हुए कि बोरा को दे दनादन फोन, व्हाट्सएप कॉल, व्हाट्सएप मैसेज…। पहले से ही लेबर इश्यू हैंडिल कर रहे बोरा का व्हाट्सएप नम्बर इसके कारण डेढ़ दिन तक हैंग रहा। बोरा को पता लगाना चाहिए कि उनका पर्सनल नम्बर चूकवश जारी हुआ या किसी ने उनसे वैर भंजा ली।

अंत में दो सवाल आपसे

1. लॉकडाउन में एक जिले के एसपी…महिला पुलिस अधिकारी…गेस्ट हाउस और शराब की खबर आ रही है। इसमें कितनी सच्चाई है?
2. पेंड्रा, गौरेला मरवाही अलग हो जाने के बाद भी कलेक्टरी के लिए सबसे अधिक डिमांड बिलासपुर की क्यों है?

रविवार, 3 मई 2020

कलेक्टर, एसपी जिम्मेदार नहीं?

संजय कुमार दीक्षित
तरकश, 3 मई 2020
चीफ सिकरेट्री आरपी मंडल अफसरों को समन्वय का संदेश देने के लिए डीजीपी और पीसीसीएफ को बराबर मौका देते हैं। मीटिंगों में भी और दौरों में भी। लेकिन, वाड्रफनगर की एसडीएम और एसडीओपी के बीच जो हुआ और पेंड्रा में जो चल रहा, उसे प्रशासन के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता। क्या वाड्रफनगर की घटना के लिए बलरामपुर के कलेक्टर, एसपी की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। सवाल ये भी उठते हैं कि कलेक्टर, एसपी अगर स्ट्रांग हो तो एसडीएम, एसडीओपी आपस में भिड़ सकते हैं? राज्य बनने के बाद ऐसा कभी नहीं हुआ, जो वाड्रफनगर में हुआ। और, जो पेंड्रा में हो रहा है, उसके लिए बिलासपुर रेंज के कमिश्नर, आईजी भला जिम्मेदारी से कैसे बच सकते हैं। ऐसा ही एक वाकया राज्य बनने के पहिले 1997 में हुआ था, जिसका जिक्र इस कॉलम में एक बार किया जा चुका है। जशपुर के कलेक्टर विनोद कुमार और एसपी एसआरपी कल्लूरी में किसी सीएमओ आफिस में दबिश को लेकर टकराव के हालात बन गए थे। उस समय मदनमोहन उपध्याय बिलासपुर के कमिश्नर थे और एसएस बड़बड़े आईजी। दोनों ने अपने स्तर पर इस केस को हैंडिल कर लिया था। मामला तब के सीएम दिग्विजय सिंह तक पहुंच ही नहीं पाया। आखिर, छत्तीसगढ़ के कलेक्टर, एसपी, कमिश्नर, आईजी ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे? इसके लिए वीसी में सीएस को टोकना पड़ रहा है।

स्मार्ट अफसर?

बिलासपुर के सीएसपी अभिनव उपध्याय ने पेट्रोल पंप कर्मी को जमकर धुना और बाद में कोरोना में गाना गाकर देश में सुर्खिया बटोर ली। उसी तरह का वाकया जांजगीर में हुआ। महिला एसडीएम की मौजूदगी में पुलिस ने एक व्यापारी को इस कदर पिट डाला कि उसे बिलासपुर के अपोलो अस्पताल शिफ्थ करना पड़ा। अभी भी वह आईसीयू में है। उसका कसूर सिर्फ यह था कि रोजी-रोटी के लिए वह दुकान खोल दिया था। एसडीएम कार्रवाई करने पहुंची तो वह वीडियो बनाने लगा। महिला एसडीएम ने इसके बाद कैम्प में रुकाए गए मजदूरों के लिए खाना बनाते हुए वीडियो डाला और सोशल मीडिया में लोग उन्हें सैल्यूट कर रहे हैं। आप भी मान गए न!

सदन में दो आईएएस

नेताओं और नौकरशाहों से गुलजार रहने वाला दिल्ली का छत्तीसगढ़ सदन में आज की तारीख में सिर्फ दो आईएएस हैं। सुबोध सिंह और मुकेश बंसल। दोनों भिलाई, रायपुर में परिवार के साथ होली मनाकर 12 मार्च को बच्चों से यह बोलकर दिल्ली निकले थे कि एक संडे गैप देकर उसके बाद वाले वीक ऑफ में जरूर आएंगे। तब तक 24 मार्च को लॉकडाउन का ऐलान हो गया। सुबोध और मुकेश 50 दिनों से सदन में फंसे हुए हैं। पत्नी, बच्चों से संपर्क करने के लिए वीडियाकॉल का ही सहारा है। दोनों आईएएस एक्स सीएम रमन सिंह के सचिवालय में एक साथ काम कर चुके हैं। याने सुख में भी साथ और अब संकट में भी।

छत्तीसगढ़ की बेटी

छत्तीसगढ़ की बेटी कोरोना में देश के लिए बड़ा काम कर रही हैं। हम बात कर रहे हैं, पंजाब कैडर की आईएएस आनंदिता मित्रा की। आनंदिता बिलासपुर की रहने वाली हैं। आईएएस में उन्हें पंजाब कैडर मिला। फिलहाल वे डायरेक्टर जनसंपर्क के अलावा डायरेक्टर फूड एंड सिविल सप्लाई के पद पर हैं। कोरोना के संकट के दौरान केंद्र ने उन पर अन्य राज्यों के साथ कोआर्डिनेशन करके फूड ग्रेन सप्लाई करने का अहम जिम्मेदारी सौंपी है। और, इस दायित्व को बखूबी संभालते हुए अब तक 1085 रैक खाद्यान्न दूसरे राज्यों में भिजवा चुकी हैं। एफसीआई की अधिकारिक जानकारी के अनुसार 44 फीसदी फूड ग्रेन अकेले पंजाब ने दूसरे राज्यों में भेजा है। सोशल डिस्टेंसिंग और सेनेटाइजेशन को फॉलो करते हुए। वो भी तब जब पंजाब की स्थिति अच्छी नहीं है। पूरे राज्य में कर्फ्यू के हालात हैं। बावजूद इसके आनंदिता कोरोना के फ्रंट पर डटी हुई हैं। आनंदिता 2006 बैच की आईएएस हैं। उन्हें ऑल इंडिया में आठवां रैंक मिला था।

दो महापौर, एक जन्मदिन

एक मई को सूबे के दो सबसे बड़े नगर निगमों के महापौरों का जन्मदिन आता है। रायपुर के एजाज ढेबर और बिलासपुर के रामशरण यादव का। दोनों में एक समानता और है कि दोनों एक-दूसरे के चलते महापौर बन पाए। एजाज के चलते रामशरण मेयर बन गए और रामशरण के चलते एजाज। समझने वाले इस सियासी गणित को समझ जाएंगे।

लिस्ट अभी नहीं

लॉकडाउन बढ़ने के साथ ही अब कलेक्टरों की बहुप्रतीक्षित लिस्ट एक बार फिर आगे बढ़ गई है। अभी तक खबर थी 3 मई के बाद लॉकडाउन खुलने के बाद कलेक्टरों की लिस्ट निकलेगी। लेकिन, छत्तीसगढ़ के लिए आने वाले 15 दिन बेहद महत्वपूर्ण रहेंगे। दूसरे राज्यों में फंसे डेढ़ लाख से अधिक मजदूर प्रदेश लौटेंगे। तब छत्तीसगढ़ के अफसरों की असली परीक्षा होगी। ऐसे में, सरकार कभी नहीं चाहेगी कि कलेक्टरों को बदला जाए। जाहिर है, कलेक्टरों के ट्रांसफर अरसे से किसी-न-किसी वजह से टलते जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में दर्जन भर से अधिक कलेक्टरों को बदला जाना है।
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वीसी में ताली

कटघोरा में जब कोरोना पॉजिटिव मरीजों की संख्या बढ़ी थी तो पिछली वीडियोकांफ्रेंसिंग में चीफ सिकरेट्री आरपी मंडल ने कोरबा कलेक्टर किरण कौशल की जमकर क्लास ले ली थी। लेकिन, किरण ने जब फास्ट ढंग से कोरोना को कंट्रोल किया, 1 मई की वीसी में चीफ सिकरेट्री आरपी मंडल ने किरण के लिए ताली बजवाई। वीसी में मौजूद डीजीपी, पीसीसीएफ, सिकरेट्रीज समेत सभी कलेक्टरों ने किरण को ताली बजाकर ओवेशन दिया। सीएस ने कोरोना में अच्छे काम करने वाले कुछ और विभागों के लिए भी ताली बजवाई।

पड़ोसियों से खतरा

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार ने कोरोना को कंट्रोल करके रखा है। मगर उसकी सीमा से लगे पांच राज्यों की स्थिति विकट होती जा रही है। और, असली खतरा यही है। छत्तीसगढ़ में 15 अप्रैल को 33 मरीज थे और एक मई को यह ब़ढ़कर 43। लेकिन, इसी अवधि में झारखंड 27 से 104, मध्यप्रदेश 987 से 2660, महाराष्ट्र 2687 से 9915, तेलांगना 695 से 1312 और उड़ीसा में 60 से बढ़कर 128 पॉजिटिव मरीज हो गए। याने पड़ोसी राज्यों में तीन गुना मरीज बढ़े और छत्तीसगढ़ में मात्र 10। छत्तीसगढ़ के शासन, प्रशासन के लिए यह बड़ी चुनौती है कि इस स्थिति को कायम रखें।

कलेक्टरों की क्लास

कोरोना में सूबे के अधिकांश कलेक्टर खुद निर्णय लेने की बजाए फाइल शासन को भेजकर भार टालने का काम कर रहे हैं। चीफ सिकरेट्री आरपी मंडल की वीसी में इसको लेकर कलेक्टरों की खिंचाई हुई। मंडल ने इस पर नाराजगी जताई कि कलेक्टरों को जिन चीजों के लिए स्पष्ट तौर पर इंस्ट्रक्शन दे दिए गए हैं, उसे भी मंजूरी के लिए सरकार को भेज दे रहे। इससे काम अटक रहा। एसीएस टू सीएम सुब्रत साहू ने भी कहा कि जो अनुमति कलेक्टर खुद दे सकते हैं, उसे सरकार को भेजने का कोई तुक नहीं। वीसी में कुछ कलेक्टरों को बार्डर पर ढिलाई बरतने के लिए मंडल ने कलेक्टरों की क्लास ली। बस्तर के सातों कलेक्टरों को उन्होंने आगाह किया कि कोई केस नहीं मिलने का ये मतलब नहीं कि घर में बैठ जाओ।

अंत में दो सवाल आपसे

1. देश की शीर्ष सेवा माने जाने वाले आईएएस अफसर कोरोना के खिलाफ जंग में एक दिन का वेतन दें, इससे आप कितना सहमत हैं?
2. क्या किसी जिले के एसपी को ट्रांसपोर्ट में भेजने पर विचार किया जा रहा है?