रविवार, 20 नवंबर 2022

भानुप्रतापपुर उपचुनाव का मतलब?

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 20 नवंबर 2022

भानुप्रतापपुर उपचुनाव का मतलब?

पहले भी इस स्तंभ में लिखा जा चुका है...भानुप्रतापपुर विधानसभा उपचुनाव सामान्य चुनाव नहीं है। कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों के नेताओं की प्रतिष्ठा इस चुनाव में दांव पर होगी। अगर बीजेपी को फतह मिल गई तो कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ जाएगी। और कांग्रेस जीती तो समझ लीजिए बीजेपी को सत्ता में लौटने के लिए छह साल और वेट करना पड़ेगा। यह उपचुनाव इस लिहाज से भी दोनों पार्टियों के लिए लिटमस टेस्ट होगा कि 2023 के विस चुनाव में बस्तर में उंट किस करवट बैठेगा। जाहिर है, बस्तर का जनादेश कभी बंटता नहीं...जिस पार्टी के पक्ष में जाता है, वो एकतरफा होता है। 2003 से लेकर 2018 तक के बीच हुए चार विस चुनावों में यही हुआ है। बहरहाल, लोकल एजेंसियों और सर्वे की रिपोर्ट में सत्ताधारी पार्टी का पलड़ा भारी बताया जा रहा है। मनोज मंडावी के निधन के महीने भर में चुनाव होना कांग्रेस पार्टी के लिए प्लस रहा। विपक्ष के नेता भी मान रहे हैं कि सहानुभूति भी एक फैक्टर रहेगा। पार्टी ने इसे भुनाने मंडावी की पत्नी को चुनाव मैदान मे उतार ही दिया है। मगर यह भी सही है कि बीजेपी नेता बृजमोहन अग्रवाल ने चुनाव प्रभारी की जिम्मेदारी लेकर उपचुनाव की रोचकता बढ़ा दी है। बृजमोहन सियासत के चतुर खिलाड़ी हैं। बीजेपी के सरकार के समय उपचुनाव में बतौर प्रभारी उनकी जीत का औसत हंड्रेड परसेंट रहा है। मगर अब भूपेश बघेल की सरकार है। बहरहाल, बृजमोहन के पहल करके प्रभारी बनने से सियासी प्रेक्षक भी हैरान हैं। क्योंकि, जिस चुनाव को सरकार आसान मानकर खास गंभीरता नहीं दिखा रही, उसमें बृजमोहन कैसे कूद पड़े?

नए खुफिया चीफ

ठीक ही कहा जाता है...वक्त बलवान होता है। पिछले साल पांच सितंबर को देर रात अजय यादव को रायपुर एसएसपी से हटा दिया गया था। तब पुरानी बस्ती थाने में पादरी की पिटाई के बाद सरकार ने उन्हें हटाना बेहतर समझा। लेकिन, 13 महीने में अब वे पुलिस महकमे में दूसरे नम्बर के ताकतवर आईपीएस बन गए हैं। जाहिर है, पुलिस में पावर और प्रभाव के मामले में डीजी पुलिस के बाद खुफिया चीफ का पद होता है। सारे एसपी से रोज जिले का अपडेट लेना, लॉ एंड आर्डर के सिचुएशन में फोर्स मुहैया कराने से लेकर मुख्यमंत्री को प्रदेश के बारे में रोज ब्रीफ करना खुफिया चीफ की जवाबदेही होती है। अजय 2004 बैच के आईपीएस हैं। छह महीने पहले ओपी पाल आईजी से हटाए गए थे, उस समय भी अजय यादव का नाम चला था। मगर तब बद्री मीणा को रायपुर रेंज का अतिरिक्त प्रभार मिल गया था। चलिए, उपर वाले ने अब दिया तो छप्पड़ फाड़कर। आईजी के साथ इंटेलिजेंस चीफ भी।

आनंद सेफ रेंज में

खुफिया चीफ डॉ. आनंद छाबड़ा वीवीआईपी रेंज दुर्ग के पुलिस महानिरीक्षक बनाए गए हैं। छाबड़ा का जाना अप्रत्याशित नहीं है। उनका खुफिया चीफ के तौर पर तीन साल हो गया था। जाहिर है, विधानसभा चुनाव के दौरान वे इस पद पर रह नही सकते थे। तब तक चार साल हो जाता और आयोग उन्हें हटा देता। पता चला है, लंबा समय हो जाने की वजह से वे खुद भी खुफिया की जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थे। सो, सरकार ने रास्ता निकालते हुए उन्हें दुर्ग शिफ्थ कर दिया।

एसपी की लिस्ट?

आईजी के बाद एसपी की लिस्ट आने की चर्चा बड़ी तेज है। चुनावी दृष्टि से सरकार कुछ जिलों के पुलिस कप्तानों को बदलना चाहती है। मगर समय को लेकर संशय है। एक तो आईजी के तुरंत बाद एसपी के ट्रांसफर होते अपन देखे नहीं हैं। आईजी थोड़े दिन में देख-समझ लेते हैं फिर एसपी बदले जाते हैं। उधर, कांकेर एसपी शलभ सिनहा को किसी बड़े जिले की कमान सौंपे जाने की चर्चा है। लेकिन, भानुप्रतापपुर में उपचुनाव चल रहा है। आठ दिसंबर से पहले उन्हें चेंज नहीं किया जा सकता। सो, प्रतीत होता है, उपचुनाव के बाद एसपी की लिस्ट आए। बाकी सरकार, सरकार होती है, कभी भी लिस्ट निकाल सकती है।

कलेक्टरों के लिए वार्निंग

रायपुर में एक जमीन की तीन रजिस्ट्री मामले में रजिस्ट्री अधिकारियों ने सरकार और इंकम टैक्स को लाखों रुपए की चपत लगाई, उसमें डिप्टी रजिस्ट्रार निबट गए। उन्हें सस्पेंड कर दिया गया है। मगर यह यह घटना कलेक्टरों के लिए वार्निंग होगी। कलेक्टर स्टांप ऑफ ड्यूटी होते हैं। मगर वे देख नहीं पाते कि रजिस्ट्री में किस तरह का गोरखधंधा किया जा रहा है। बता दें, एक प्लाट की तीन रजिस्ट्री की जांच में लीपापोती करते हुए अफसरों को क्लीन चिट देते हुए विक्रेताओं को बड़ी सफाई से जिम्मेदार ठहरा दिया गया। और कलेक्टर को मिसगाइड कर गलत जांच रिपोर्ट सरकार को भिजवा दी गई। दरअसल, जिस अफसर ने काला पीला किया, उसी से जवाब मांगा गया। और उसने जो लिखकर दिया, उसे जांच अधिकारी ने एडिशनल कलेक्टर को भेज दिया और एडिशनल कलेक्टर ने अपने कलेक्टर का दस्तखत करवा कर उसे सरकार को भिजवा दिया। पिछले तरकश में जब यह इस शीर्षक से खबर छपी कि सिस्टम किधर है....तो सरकारी मशीनरी हरकत में आई। और फिर रजिस्ट्री अधिकारी को निलंबित किया गया। जांच अधिकारी को नोटिस जारी किया गया है।

जमीनों का खेला

राजधानी रायपुर में जमीनों का ऐसा खेला हो रहा कि दूसरे राज्यों के लोग पइसा लगाने छत्तीसगढ़ आ रहे हैं। एक प्लाट तीन रजिस्ट्री में लखनउ का व्यक्ति रायपुर में जमीन खरीद लिया। फिर उसने मुंबई के व्यक्ति को भेज दिया। दरअसल, रजिस्ट्री विभाग में सबसे बड़ा रुपैया वाला मामला चलता है। बिना दलाल के जरिये अगर आप रजिस्ट्री आफिस गए तो वहा इतनी क्वेरी बता दी जाएगी कि आपके लिए जमीन बेचना या खरीदना नामुमकिन हो जाएगा। मगर कमाल है...लखनउ से आए आदमी का सायकिल स्टैंड में रजिस्ट्री कर दी गई। एक आईएएस अफसर ने अपनी पत्नी के नाम पर पिछले तीन साल में नौ प्लाट खरीदे हैं। उसमें से नौ के नौ एग्रीकल्चर लैंड बता कर रजिस्ट्री की गई है। इनमें राजधानी की एक बड़ी कालोनी में 20 हजार वर्गफुट का प्लाट कृषि भूमि दिखाकर रजिस्ट्री की गई है, उसके जस्ट बगल में लग्जरी क्लब हाउस है। यह धतकरम करने वाले रजिस्ट्री अधिकारी वही हैं, जो इन दिनों चर्चाओं में हैं।

एक और पोस्ट

रिटायर पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी को सरकार ने पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग देते हुए राज्य जैव विविधता बोर्ड का चेयरमैन बनाया है। तीन साल उनका कार्यकाल रहेगा। हालांकि, राकेश ने जिस तरह विभाग में सेवाएं दी है, उससे चर्चा थी कि उन्हें कुछ और ठीक-ठाक मिलेगा। मगर ऐसा हो नहीं सका। बावजूद इसके महत्वपूर्ण यह है कि रिटायर्ड पीसीसीएफ या उसके समकक्ष पदों से रिटायर होने वाले अधिकारियों की पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग के लिए बायोडायवर्सिटी बोर्ड का रास्ता खुल गया। राज्य बनने के बाद अभी तक यह पद हमेशा हेड ऑफ फॉरेस्ट के पास एडिशनल तौर पर रहता आया था। राकेश चतुर्वेदी भी हेड ऑफ फॉरेस्ट के साथ इस बोर्ड के चेयरमैन थे।

हॉफ खाली

राज्य में तीन ही पद 80 हजार स्केल वाले होते हैं। चीफ सिकरेट्री, डीजीपी और हेड ऑफ फॉरेस्ट। मगर इसमें लोचा यह होता है कि सीनियरिटी को अगर ओवरलुक करके इन तीनों में से किसी पद पर बिठाया जाता है तो उसे यह शीर्ष स्केल नहीं मिल पाता। राकेश चतुर्वेदी को वन विभाग का मुखिया अपाइंट होने के बाद भी हेड ऑफ फॉरेस्ट का स्केल तभी मिला, जब मुदित कुमार रिटायर हुए। इस समय अतुल शुक्ला संजय षुक्ला से एक बैच सीनियर है। दोनों का रिटायरमेंट भी एक साथ अगले साल 31 मई को है। लिहाजा, सरकार ने कोई विशेष पहल नहीं की तो फिलहाल यह पद खाली ही रहेगा। वैसे पुलिस महकमे में भी कई बार ऐसा हो चुका है कि डीजी पुलिस को यह स्केल नही मिला, क्योंकि विभाग में उनसे सीनियर अफसर मौजूद रहे। गिरधारी नायक के रिटायर होने के बाद ही डीएम अवस्थी को 80 हजार का स्केल मिला था।

सम्मानजनक विदाई

सूबे के सबसे सीनियर आईपीएस डीएम अवस्थी को सरकार ने ईओडब्लू और एसीबी की चीफ बनाया है। तीन साल तक डीजी पुलिस रहने के बाद उसी जगह पर फिर से उसी एजेंसी में पोस्टिंग, जहां वे 12 साल पहले रह चुके हैं, पर ब्यूरोक्रेसी में टिका-टिप्पणी हो रही है। मगर इसे पोजिटिव ढंग से देखें तो अवस्थी के कैरियर के लिए ये काफी महत्वपूर्ण है। पोलिसिंग को लेकर उन्हें डीजी पुलिस से हटाया गया और उसके साल भर के भीतर उन्हें सरकार ने अहम जिम्मेदारी सौंप दी। डीएम का अगले बरस अप्रैल में रिटायरमेंट है। अब उनकी सम्मानजनक विदाई हो सकेगी। और, इस पांच महीने में डीएम ने ठीक-ठाक ढंग से काम कर दिया तो हो सकता है कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग मिल जाए। पुलिस हाउसिंग बोर्ड भी उनके चेयरमैन से हटने के बाद खाली पड़ा है।

दो आईजी ऑफिस!

रायपुर पुलिस रेंज को दो हिस्सों में विभाजित करने से अब रायपुर आईजी आफिस का पता बदल जाएगा। पुराने पीएचक्यू के खुफिया भवन से ही आईजी अजय यादव आईजी का काम करेंगे। रायपुर छोड़कर चार जिलों के रेंज आईजी आरिफ शेख शंकर नगर वाले पुराने आईजी आफिस में बैठेंगे। उनके पास बलौदा बाजार, धमतरी, महासमुंद और गरियाबंद का दायित्व रहेगा। 2005 बैच के आईपीएस आरिफ का अगले साल जनवरी में आईजी प्रमोशन ड्यू हो जाएगा।

अंत में दो सवाल आपसे

1. पुलिस कप्तान के लिए सबसे अधिक जोर आजमाइश बिलासपुर के लिए क्यों हो रही है और उनमें से किसे कामयाबी मिलेगी?

2. ईडी का ऐसा क्या खौफ हो गया कि मंत्रालय से लेकर जिलों तक में अधिकारी ठंडे पड़ गए हैं?


रविवार, 13 नवंबर 2022

बिना काम के कुलपति

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 13 नवंबर 2022

बिना काम के कुलपति

छत्तीसगढ़ के उद्यानिकी और वानिकी विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति डॉ0 आरएस कुरील के कुलपति बने करीब एक बरस हो गए हैं। मगर उनके पास न दफ्तर है न कोई काम। वे कृषि विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में एक साल से समय काट रहे हैं। दरअसल, सरकार ने पिछले साल इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय का बंटवारा कर उद्यानिकी और वानिकी विवि बनाने का फैसला किया था। इसके लिए कुलपति की नियुक्ति भी हो गई। मगर विवि के बंटवारे का काम अभी नहीं हो पाया है। अभी भी प्रदेश के डेढ़ दर्जन से अधिक हार्टिकल्चर कॉलेज इंदिरा गांधी कृषि विवि से संबद्ध हैं। इनमें 16 सरकारी कॉलेज हैं। इनका सारा कंट्रोल कृषि विवि से हो रहा है...दाखिले से लेकर परीक्षा तक। जबकि, उद्यानिकी और वानिकी विवि को अलग करने के लिए चीफ सिकरेट्री से लेकर एपीसी तक को राजभवन तलब किया जा चुका है।

नौकरशाही की लापरवाही!

जाहिर है, कोई नया विश्वविद्यालय खुलता है तो उसके पहले कुलपति की नियुक्ति राज्य सरकार करती है। इसके बाद के कुलपति के चयन के लिए फिर राजभवन से प्रॉसेज होता है। राजभवन की मानिटरिंग में सलेक्शन कमेटी बनती है और फिर राज्यपाल द्वारा पेनल में से किसी एक नाम पर टिक लगाकर कुलपति अपाइंट किया जाता है। मगर छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक लापरवाही की वजह से विकट स्थिति उत्पन्न हो गई। दरअसल, नए विवि का एक्ट बनाने के लिए इंदिरा गांधी कृषि विवि को जिम्मा दिया गया था। बताते हैं, जिन्हें एक्ट बनाना था, उनकी नजर उद्यानिकी और वानिकी विवि के कुलपति पद पर नजर थी। सो, उन्होंने प्लानिंग के तहत एक्ट में सरकार की जगह राजभवन को कुलपति नियुक्ति का अधिकार प्रस्तावित कर दिया। इस पर न एग्रीकल्चर सिकरेट्री ने ध्यान दिया और न ही विभाग के किसी और अधिकारी ने। बताते हैं, विवि के एक प्रोफेसर ने मंत्री की नोटिस में यह बात लाई थी लेकिन, मंत्रीजी ने हल्के में ले लिया। यहां तक कि पिछले साल विधानसभा के मानसून सत्र में एक्ट पेश हुआ और पारित भी हो गया। सरकार के अफसर निश्चिंत थे कि जल्दी क्या है। मगर राजभवन से जब डॉ0 आरएस कुरील की कुलपति बनाने का आदेश जारी हुआ तो अफसरशाही में हड़कंप मच गया। प्रथम कुलपति की नियुक्ति सरकार करती है तो फिर राजभवन से कैसे हो गई? जब विधानसभा में पारित एक्ट को खंगाला गया तो अफसरों के पैरों के नीचे से जमीन खिसकती नजर आई। एक्ट में साफ तौर से राजभवन का उल्लेख था। अब अधिकार था तो राजभवन ने कुलपति नियुक्त कर दिया। मगर इसमें क्लास यह भी हुआ...कृषि विश्वविद्यालय के जिस बड़े प्रोफेसर ने अपनी पोस्टिंग के लिए यह गेम किया, बाजी मार ले गए आगरा के डॉ0 कुरील। हालांकि, आपसे गुजारिश है...कुलपति डॉ0 कुरील के बारे में गुगल पर सर्च मत कीजिएगा...उनके बारे में पढ़कर आपके विश्वास को धक्का लगेगा...गूगल पर पहली खबर 47 करोड़ से शुरू होती है। बहरहाल, अब आप समझ जाइये कुलपति बिना काम के...विवि का कार्यविभाजन....मजरा क्या है।

पॉश कालोनी और कृषि भूमि

ईडी ने रजिस्ट्री विभाग से कुछ आईएएस अधिकारियों की जमीनों की रजिस्ट्री का ब्यौरा मांगा है, उसमें नित नए खुलासे हो रहे हैं। पता चला है कि एक आईएएस ने रायपुर शहर के पॉश इलाकों में प्लाट खरीदे मगर उसकी रजिस्ट्री एग्रीकल्चर लैंड दिखा कर कराई गई। याने करोड़ों की जमीन की रजिस्ट्री हजारों के रेट से। इससे सरकार के खजाने का चूना लगा।

ये खेल समझिए

रजिस्ट्री विभाग का ये खेल सालों साल से चला आ रहा है...बिना सरकार के फैसले के विरुद्ध गाइडलाइन रेट कम और जो भेंट चढा दें दे उसके लिए सारे नियम कायदे खतम। इसका एक नमूना हम आपको बताते हैं। राजधानी के भाटागांव के पास रिंग रोड पर नीलम अग्रवाल ने 16 फरवरी 2018 को 7000 हजार वर्गफुट का प्लाट लखनउ के साइन सिटी ड्रीम रियेल्टर को बेचा था। उसके लिए 4.26 करोड़ जमीन का गाइडलाइन रेट तय कर रजिस्ट्री फीस ली गई। यही जमीन 20 मार्च 2021 को साइन सिटी कंपनी ने मुंबई के मनमोहन सिंह गाबा को बेच दिया। तब रजिस्ट्री रेट घटाकर 3.64 करोड़ कर दी गई। रजिस्ट्री अधिकारी थे एसके देहारी। साइन सिटी ने मनमोहन सिंह गाबा को बेची गई जमीन फर्जीवाड़ा करते हुए फिर 18 मई 2021 को रुपेश चौबे को बेच दिया। तब रजिस्ट्री अधिकारी देहारी ने उसका गाइडलाइन रेट घटाकर 2.74 करोड़ कर दिया। याने 4.26 करोड़ से 2.74 करोड़ पर आ गया। यानी सरकारी खजाने को लगभग 15 लाख का चूना। रुपेश चौबे ने यह प्लॉट 26 जुलाई 2021 को अशोका बिरयानी को बेच दिया। इसकी रजिस्ट्री भी एसके देहारी ने की। याने एक ही जमीन चार सौ बीसी कर बार-बार बेची जाती रही और रजिस्ट्री अधिकारी आंख मूंदकर रजिस्ट्री करते रहे। अब क्लास देखिए मनमोहन गाबा ने नामंतरण कराने के लिए रायपुर के नायब तहसीलदार के यहां आवेदन लगाया तो कहा गया साइन सिटी के बाकी डायरेक्टरों के दस्तखत रजिस्ट्री में नहीं है, इसलिए नामंतरण नहीं किया जा सकता। और रुपेश चौबे के नाम पर करने में उसे कोई दिक्कत नहीं हुई। ये तो एक बानगी है...राजस्व और रजिस्ट्री विभाग के ऐसे-ऐसे खेल हैं कि आप जानकर हैरान रह जाएंगे।

सिस्टम किधर है...

राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ का सिस्टम कैसा काम कर रहा है इसे आप इस तरह समझिए। उपर की खबर में जिस मनमोहन सिंह गाबा का जिक्र किया गया है, उन्होंने विभागीय मंत्री जय सिंह से मिलकर लिखित शिकायत की कि उनकी खरीदी गई जमीन की रजिस्ट्री अफसरों ने बिना देखे-परखे दूसरे लोगों के नाम कर दी। चूकि जिले के रजिस्ट्री के हेड कलेक्टर होते हैं, लिहाजा मंत्री ने इसे रायपुर कलेक्टर को मार्क किया। रायपुर कलेक्टर ने शिकायात को जांच के लिए रायपुर के रजिस्ट्री अधिकारी को भेज दिया। और रजिस्ट्री अधिकारी ने इसकी जांच के लिए उसी रजिस्ट्री अधिकारी को दे दिया, जिसने पूरा खेल किया था। पता चला है, लीपापोती करके जांच की फाइल डिस्पोज कर दी गई कि कुछ गलत नहीं हुआ है। रजिस्ट्री अधिकारी आज भी अपनी कुर्सी पर जमे हुए हैं। रजिस्ट्री विभाग की अगर जांच हो जाए तो करोड़ों का खेल निकलेगा, जिसे सरकारी खजाने में जाना था, वह अफसरों की जेब में चला गया। इसी स्तंभ में हमने लिखा था...जांजगीर में सीमेंट प्लांट की माईनिंग लीज की रजिस्ट्री कौड़ियों के भाव करके महिला रजिस्ट्री अधिकारी ने सरकार को लाखों रुपए का चूना लगाया था। विभाग ने उस अधिकारी को प्रमोशन देकर और उपर की कुर्सी पर बिठा दिया। समझ सकते हैं...सिस्टम किधर है।

नया जिला

भानुप्रतापपुर विधानसभा उपचुनाव में अब बीसेक दिन बच गए हैं। वहां 5 दिसंबर को वोट पड़ेंगे और 8 को उसके नतीजे आएंगे। हालांकि, भानुप्रतापपुर मे आदिवासी आरक्षण मामले के बाद भी बीजेपी से कोई खास चुनौती मिलती नहीं दिख रही। दिवंगत विधायक मनोज मंडावी की पत्नी को टिकिट देने से जाहिर है, सहानुभूति वोट भी मिलेंगे। फिर खैरागढ़ विधानसभा उपचुनाव के ऐन मौके पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने काउंटिंग के अगले दिन खैरागढ़ को नया जिला बनाने का ऐलान कर दिया था, उसको देखते भानुप्रतापपुर के लोगों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। सियासी पंडितों का मानना है कि भानुप्रतापपुर अगर जिला बना तो हो सकता है, उसके साथ अंतागढ़ भी जुड़ जाए। दोनों में 30 किमी का डिस्टेंस है। बलौदाबाजार और भाटापारा में भी लगभग इतना ही डिस्टेंस होगा। मगर जिले का नाम बलौदाबाजार-भाटापारा हैं। वैसे, संसाधनों में भानुप्रतापपुर अंतागढ़ से आगे है। अंतागढ़ के एडिशनल कलेक्टर भानुप्रतापपुर में रहते हैं। बता दें, अंतागढ़ और भानुप्रतापपुर की जिले की पुरानी दावेदारी है। ब्रिटिश काल में जब रायपुर जिला था, तब बस्तर और अंतागढ़ उसके दो तहसील थे। इस समय बस्तर में सात जिले बन गए हैं और अंतागढ़ वहीं का वही रह गया। उसी तरह भानुप्रतापपुर से बेहद छोटे सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर जैसे ब्लॉक जिला मुख्यालय बन गए। मगर भानुप्रतापपुर की जिले की मांग पूरी नहीं हो पाई।

हमारी बीजेपी किधर है?

बीजेपी में राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री से लेकर प्रदेश अध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष तक बदल गए। नए चेहरे के साथ रायपुर में भाजयुमो का और बिलासपुर मे महिला मोर्चे का जंगी प्रदर्शन भी हो गया। बावजूद इसके पार्टी में वो बात नहीं दिख रही, जो चुनाव के साल भर पहले होनी चाहिए। 2002 में भाजपा गजब की एकजुट हो गई थी। सौदान सिंह पूरे फार्म में थे। हालांकि, राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री अजय जामवाल अभी नए हैं...वे चीजों को समझने के लिए लगातार नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिल रहे, उनके यहां भोजन करने जा रहे। प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष का भी वो जोर नहीं दिख रहा, जिसकी उनकी नियुक्ति के समय चर्चा थी। भानुप्रतापपुर उपचुनाव के लिए 20 दिन का समय बच गया है। पार्टी का वहां अभी तक कोई कार्यक्रम नहीं हुआ है और न ही कोई बड़े नेता वहां पहुंचे हैं। तुर्रा यह कि जो जिम्मेदार पदों पर बिठाए गए हैं, वे भी अपने अधिकारों को लेकर कांफिडेंस में नहीं दिख रहे हैं। बीजेपी का हर दूसरा बड़ा नेता असंतुष्ट दिख रहा है। इसका असर भानुप्रतापपुर उपचुनाव पर पड़ेगा ही...ये हम नहीं कह रहे। पार्टी के कार्यकर्ता ही पूछ रहे...हमारी बीजपी किधर है।

कलेक्टरों की लिस्ट

ब्यूरोक्रेसी में कलेक्टरों की एक लिस्ट निकलने की चर्चा तेज है। कहा जा रहा है कि छोटी लिस्ट निकल सकती है। इनमें दो-तीन जिलों के कलेक्टरों को बदला जा सकता है। धमतरी कलेक्टर पीएस एल्मा को भी लंबा समय हो गया है। यूं कह सकते हैं कि सबसे अधिक समय से गर कोई कलेक्टरी की पिच पर जमा है तो वह एल्मा हैं। कुछ सीनियर कलेक्टरों को छोटे जिलों में रखा गया है। उन्हें भी सरकार उनके कद और जरूरत के हिसाब से बड़ा जिला दे सकती है। मगर पहले लिस्ट निकले....।

अंत में दो सवाल आपसे

1. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव को फुल पावर मिला है या उसमें डंडी मारी जा रही है?

2. इस बात में कितनी सच्चाई है कि बस्तर के कई सीपीआई नेता कांग्रेस ज्वाईन करने का मन बना रहे हैं?



अतिथि हंगामाई भव...!

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 6 नवंबर 2022

अतिथि हंगामाई भव...!

शास्त्रों में अतिथि देवो भव...कहा गया है याने अतिथि देवतुल्य होते हैं। मगर अतिथि अपने आचरण से समारोह के रंग में भंग घोलने लगे तो फिर उसे क्या कहना चाहिए। हम बात कर रहे हैं...राज्योत्सव की। सरकार ने इस आखिरी राज्योत्सव को प्रभावी ढंग से मनाने का निर्देश जारी किए थे। मगर कई जिलों में सत्ताधारी पार्टी के नेताओं ने हंगामा खड़ा कर सरकार के मंसूबों पर पानी फेर दिया। हम ये नहीं मानते कि जिला प्रशासन से प्रोटोकॉल में चूक नहीं हो सकती। मगर ऐसा भी नहीं है कि एक साथ कई जिलों में इस तरह की घटनाएं हो जाए। सत्ता पार्टी के नेताओं को मालूम होना चाहिए कि कलेक्टर जिलों में मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि होते हैं। अगर उनसे कोई गिला-शिकवा है तो सीधे मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाना चाहिए, न कि राज्योत्सव जैसे आयोजन को पलीता लगा दिया जाए। बहरहाल, इसके संदेश अच्छे नहीं गए...आम आदमी आवाक था...विपक्ष का काम रुलिंग पार्टी के नेता कर रहे हैं। वहीं नेता जो बीजेपी सरकार में 15 साल तक बढिया अपना धंधा-पानी चलाते रहे।

सबसे बड़ा रुप्पैया

बिलासपुर पुलिस ने सत्ताधारी पार्टी के नेत्री के बेटे को गिरफ्तार कर लिया। वो भी बंद पड़े अस्पताल की फर्जी मेडिकल रिपोर्ट लगाकर। बताते हैं, 9 महीने पहिले दो पक्षों में सामान्य मारपीट हुई थी। पुलिस ने अचानक जानलेवा हमले की फर्जी रिपोर्ट लगाकर कांग्रेस नेत्री के बेटे को 307 में जेल भेज दिया। इससे पहले बिलासपुर के ही कांग्रेस के पूर्व ब्लॉक अध्यक्ष ने सुसाइड कर लिया था। उनके परिजनों ने खुलकर कुछ लोगों पर आरोप लगाए...मगर ढाक के तीन पात। ठीक ही कहा गया है....सबसे बड़ा रुप्पैया। याने रुप्पैया दिख जाए तो पुलिस कुछ भी कर देगी।

चार साल में 5 उपचुनाव

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सरकार की कमान संभालने के बाद छत्तीसगढ़ में विधानसभा के चार उपचुनाव हो चुके हैं और भानुप्रतापपुर उपचुनाव भी आठ दिसंबर को कप्लीट हो जाएगा। जाहिर है, इससे पहिले हुए चारों उपचुनावों के नतीजे कांग्रेस के खाते में गए थे। 2018 में कांग्रेस पार्टी ने जब सरकार बनाई, उसके पास 68 विधायक थे। अब ये संख्या बढ़कर 72 पहुंच गई है। बता दें, पहला उपचुनाव दंतेवाड़ा विधानसभा का हुआ था, जब लोकसभा चुनाव के कैम्पेनिंग के दौरान नक्सलियों द्वारा लगाए गए बारुदी सुरंग विस्फोट में विधायक भीमा मंडावी जान गंवा दिए थे। इसके बाद विधायक दीपक बैज के लोकसभा चुनाव जीतने की वजह से चित्रकोट में बाई-इलेक्शन हुआ। फिर अजीत जोगी और देवव्रत सिंह के निधन के बाद मरवाही और खैरागढ़ में। याने अभी तक चार उपचुनाव हो चुके हैं। इसमें दुखद यह है कि पांच में से चार विधानसभा उपचुनाव विधायकों के निधन की वजह से कराना पड़ा। पिछले महीने भानुप्रतापपुर विधायक और डिप्टी स्पीकर मनोज मंडावी को दिल का दौरा पड़ने से देहावसान हो गया।

जोड़ी कसौटी पर

2018 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद बीजेपी इस कदर हिल गई थी कि चार उपचुनावों में से खैरागढ़ को छोड़कर कहीं लगा नहीं कि 15 साल सत्ता में रही पार्टी चुनाव लड़ रही है। खैरागढ़ में भी सत्ताधारी पार्टी डांवाडोल हुई क्योंकि देवव्रत सिंह के जोगी कांग्रेस ज्वाईन करने के बाद वहां कांग्रेस का कुछ बचा नहीं था। और न ही कांग्रेस पार्टी ने वहां संगठन खड़ा करने की कोशिश की। हवा का रुख भांपकर सीएम भूपेश बघेल ने जिले बनाने का मास्टर स्ट्रोक खेला और बीजेपी को पीछे हटने विवश कर दिया। अब जब भानुप्रतापपुर उपचुनाव होने जा रहा है...सूबे में बीजेपी के चेहरे बदल चुके हैं। अब अरुण साव प्रदेश अध्यक्ष हैं और नारायण चंदेल नेता प्रतिपक्ष। ये दोनों नेता लगातार क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं। सरगुजा के बाद अरुण-चंदेल की जोड़ी बस्तर का दौरा कर चुकी है। भानुप्रतापपुर में इन दोनों नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर होगी। अब ये भी नहीं कहा जा सकता कि उपचुनाव के नतीजे सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में आता है। सरकार के अब चार साल पूरे होने जा रहे हैं। सियासी प्रेक्षकों का मानना है, भानुप्रतापपुर चुनाव 2023 के चुनाव का सेमीफाइनल होगा। भानुप्रतापुर जो पार्टी फतह करेगी, उसकी फायनल जीतने की दावेदारी बढ़ जाएगी। सियासी पंडितों को भी उत्सुकता रहेगी कि अरुण-चंदेल की जोड़ी इस चुनाव में कोई कमाल दिखा पाएगी या भानुप्रतापपुर सीट भी कांग्रेस की झोली में चली जाएगी।

ईडी का भूत

ईडी का भूत रजिस्ट्री विभाग में भी पहुंच गया है। वहां के अफसरों की रात की नींद उड़ गई है। दरअसल, आईएएस समीर विश्नोई के यहां छापे में कई जमीनों की रजिस्ट्री के पेपर मिले हैं। उन जमीनों की रजिस्ट्री में रजिस्ट्री अधिकारियों ने भारी घालमेल किया है। एक तो आईडी सही नहीं है। समीर की पत्नी के नाम हुए विभिन्न प्लाटों की रजिस्ट्री में सरनेम पिता का है और पति की जगह नाम भी पिता का...सुंदरसिंह गोदारा। ईडी ने सबसे अधिक नोटिस लिया है, वह है महंगी जमीनों को रजिस्ट्री अधिकारियों ने गाइडलाइन रेट कम करके सरकार के खजाने को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। ईडी ने रजिस्ट्री अधिकारियों इस संबंध में जवाब मांगा है।

आईएएस सबसे होशियार?

सबसे कठिन इम्तिहान पास करके देष की सबसे प्रतिष्ठित सर्विस हासिल करने वाले आईएएस अधिकारी सबसे अधिक तेज और होशियार माने जाते हैं। मगर छत्तीसगढ़ में कुछ उल्टा-पुल्टा हो जा रहा है। अब घर में किलो में सोना क्यों रखना भाई! इसी तरह की अक्लमंदी सिकरेट्री लेवल के एक और आईएएस ने दिखाई है। बात 2016 की है। एसीबी ने एक अधिकारी के घर छापा मारा। अधिकारी के पत्नी का बैंक डिटेल चेक किया गया तो पता चला कि 65 लाख रुपए पुणे के एक कालेज को ट्रांसफर किया गया है। कड़ाई से पूछताछ में अधिकारी ने बताया कि सिकरेट्री साब का बच्चा वहां पढ़ाई करता है...वे अपने एकाउंट से पैसा भेज नहीं सकते थे। इसलिए, मेरी पत्नी के एकाउंट में पैसा ट्रांसफर कराया। चूकि ये मनी लॉंड्रिंग का मामला था, इसलिए एसीबी ने उसे ईडी को भेज दिया था। ईडी ने इसमें क्या किया, ये तो पता नहीं। मगर ये जरूर समझ में आता है कि आईएएस कितने होशियार होते हैं।

अजयपाल से शुरू

ईडी की गिरफ्तारी के बाद राज्य सरकार ने आईएएस समीर विश्नोई को सस्पेंड कर दिया है। 2009 बैच के आईएएस समीर के जेल जाने के बाद जीएडी ने यह कार्रवाई की। बता दें, छत्तीसगढ़ बनने के बाद निलंबित होने वाले समीर भारतीय प्रशासनिक सेवा के चौथे अधिकारी होंगे। सबसे पहले रमन सरकार की पहली पारी में अजयपाल सिंह को सस्पेंड किया गया था। अजयपाल ने पर्यटन बोर्ड के एमडी रहते अपने विभागीय मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ मंत्रालय में पत्रकार वार्ता ले लिए थे। अजयपाल 86 बैच के आईएएस अधिकारी थे। उनके बाद सीनियर आईएएस अफसर राधाकृष्णन पर्यटन बोर्ड के घोटाले में निलंबित किए गए। राधाकृष्णन 78 बैच के आईएएस थे। उनके बाद बीएल अग्रवाल निलंबित हुए। और अब समीर विश्नोई। महत्पूर्ण यह है कि रमन सिंह की तीनों पारी में एक-एक आईएएस सस्पेंड हुए थे। इसके बाद भूपेश बघेल सरकार में एक। सिर्फ अजीत जोगी सरकार में कोई आईएएस सस्पेंड नहीं हुआ।

58 दिनों की कलेक्टरी

छत्तीसगढ़ बनने के बाद सबसे कम दिनों की कलेक्टरी गौरव सिंह के नाम दर्ज था। गौरव सूरजपुर में जरूर एक साल रहे मगर इसके बाद मुंगेली कलेक्टर से दो महीने में हटाकर बालोद भेज दिया गया था। लेकिन, सारंगढ़ के निवर्तमान कलेक्टर राहुल वेंकट ने गौरव को पीछे छोड़ दिया है। जिले का नोटिफिकेशन के बाद राहुल 2 सितंबर को कलेक्टर बनाए गए और 31 अक्टूबर को सरकार ने उन्हें हटा दिया। याने कुल 58 दिन में राहुल का विकेट उड़ गया। हालांकि, कम दिनों की कलेक्टरी की लिस्ट में भोस्कर विलास संदीपन और अभिजीत सिंह का नाम भी शामिल है। संदीपन चार महीने कलेक्टर रहे तो अभिजीत नारायणपुर में छह महीने।

और गिरेंगे विकेट

नए जिलों में ओएसडी प्रशासन की नियुक्ति के बाद इसी तरकश कॉलम में हमने एकाधिक बार लिखा था कि पांच नए जिले बनाए गए हैं, उनमें से कुछ कलेक्टर शायद ही क्रीज पर टिक पाए। और सारंगढ़ से इसकी शुरूआत हो गई। पता चला है, नए कलेक्टरों में से दो-एक का विकेट और गिर सकता है। राजनीति दृष्टि से संवेदनशील एक जिले के कलेक्टर अब-तब की स्थिति में हैं। दरअसल, उनकी बदजुबानी तो चर्चा में थी ही, लक्ष्मी-नारायण में उनकी आस्था बढ़ती जा रही है।

महिला कलेक्टर

फरिहा आलम को सारंगढ़ का कलेक्टर बनाए जाने के बाद सूबे में महिला कलेक्टरों की संख्या बढ़कर आधा दर्जन पहुंच गई है। याने 33 में छह। करीब 20 फीसदी। जाहिर है, राज्य निर्माण के बाद यह सबसे बड़ी संख्या होगी। इससे पहिले एक समय में तीन से अधिक महिला कलेक्टर कभी रही नहीं। फिलवक्त, प्रियंका शुक्ला कांकेर, रानू साहू रायगढ़, नुपूर राशि पन्ना सक्ती, इफ्फत आरा सूरजपुर, ऋचा प्रकाश चौधरी जीपीएम और फरिहा आलम सारंगढ़ की कलेक्टर हैं। इनमें से हो सकता है, दो माइनस हो जाए। बहरहाल अभी तो छह हैं हीं।

वर-वधु को बधाई!

राज्य प्रशासनिक सेवा के दो अधिकारी ब्याह रचाने जा रहे हैं। 25 नवंबर को बिलासपुर में दोनों विधिवत सात फेरे लेंगे। इसकी तैयारियां शुरू हो गईं हैं... कार्ड बंटने लगे हैं। वैसे, एडिशनल कलेक्टर और डिप्टी कलेक्टर की शादी की चर्चा काफी दिनों से थी। मगर कुछ कानूनी अड़चनों की वजह से फायनल नहीं हो पा रहा था। बहरहाल, वर-वधु को बधाई।

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस जिले के पुरूष कलेक्टर ने ईडी की खौफ से एक मातहत का आईफोन अपने सामने तोड़वा दिया?

2. देवव्रत सिंह की पिछले साल 4 नवंबर को मृत्यु हुई थी और अप्रैल में उपचुनाव हुआ। फिर भानुप्रतापपुर उपचुनाव का ऐलान विधायक के निधन के 15 दिन में क्यों?


मंगलवार, 1 नवंबर 2022

डीएमई के खटराल अधिकारियों पर छत्तीसगढ़ के हेल्थ सिकरेट्री का नकैल, नीट पीजी का मेरिट लिस्ट किया निरस्त...तरकश का असर

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 30 अक्टूबर 2022

खटराल अफसरों पर नकैल

पिछले हफ्ते तरकश में अंधेर नगरी, खटराल अफसर शीर्षक से मेडिकल एजुकेशन की अंधेरगर्दी को प्रमुखता से उठाया गया था। हमने बताया था कि डीएमई के बदनाम अफसरों ने किस तरह नीट पीजी में जिस अभ्यर्थी को मेरिट में हंड्रेड से नीचे होना था, उसे टॉपर बना दिया। नए हेल्थ सिकरेट्री प्रसन्ना आर. ने इस खबर को संज्ञान लेकर दिवाली के दूसरे दिन ही डीएमई आफिस के अफसरों को तलब किया। अधिकारियों की उन्होंने तगड़ी क्लास ली...फौरन मेरिट लिस्ट रिजेक्ट कर फिर से बनाने का आदेश दिया। बता दें, छत्तीसगढ़ का डीएमई देश में बदनाम है। पीएमटी के समय न जाने कितने मेधावी विद्यार्थियों का वाजिब हक छीनकर अपने नाते-रिश्तेदारों को सीट आबंटित कर दी या फिर पैसे में बेच डाली। खुद डीएमई की बेटी को गलत दाखिला दे दिया गया। सुप्रीम कोर्ट में मामला गया। चूकि, तब तक डीएमई की बेटी फायनल ईयर में पहुंच गई थीं। लिहाजा, सुप्रीम कोर्ट ने मानवीयता के आधार पर पांच लाख जुर्माना करके बख्श दिया। अब पांच लाख में एमबीबीएस हो गया और क्या चाहिए। एक्स सीएम के पीए की भतीजी ने भी बहती गंगा में डूबकी लगा ली। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री की 12वीं फेल बेटी को खटराल अधिकारियों ने एमबीबीएस करवा दिया। एक आईएएस की बेटी को भी पिछले दरवाजे से दाखिला दे दिया। प्रसन्ना ने अब कसना प्रारंभ किया है तो उम्ममीद है इस बार ऐसा कुछ न हो।

सिंह के बाद सिंह!

रिटायर आईएएस ठाकुर राम सिंह को पिछली सरकार ने राज्य निर्वाचन आयुक्त बनाया था। उनका पांच साल का कार्यकाल मई में कंप्लीट हो चुका है। चूकि सरकार ने कोई नई नियुक्ति नहीं की, लिहाजा निर्वाचन आयोग के बायलॉज के अनुसार नई नियुक्ति होने तक आयुक्त छह महीने तक कंटीन्यू कर सकते हैं। जाहिर है, इस दौरान उनके पास चुनाव कराने से लेकर सारे अधिकार होते हैं...गाड़ी-घोड़ा, बंगला, नौकर, चाकर सभी। बहरहाल, राम सिंह का छह महीने का एडिशनल कार्यकाल पूरा होने जा रहा है। लिहाजा, यह तय है कि जल्द ही नए राज्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति हो जाएगी। क्योंकि, संवैधानिक आयोग होने के कारण इस पद को खाली नहीं रखा जा सकता। इस पद के लिए लंबे समय से रिटायर आईएएस और सिकरेट्री टू सीएम डीडी सिंह का नाम चल रहा है। राम सिंह के रिटायरमेंट के पहले से डीडी सिंह का नाम की अटकलें शुरू हो गई थी। सरकार के पास वैसे विकल्प भी कम है। कोई और आईएएस इस समय न तो रिटायर हुआ है और न होने वाला है। डीडी सिंह आदिवासी हैं। सो सियासी दृष्टि से भी फायदेमंद रहेगा। दिनेश श्रीवास्तव के बाद वे छत्तीसगढ़ के दूसरे प्रमोटी आईएएस होंगे, जो भारत सरकार में ज्वाइंट सिकरेट्री इम्पेनल हुए थे। अब देखना है, सिंह के बाद सिंह की ही इस पद पर ताजपोशी होती है या सरकार कुछ नया करके चौंकाती है।

रिटायर नौकरशाहों का टोटा

आमतौर पर राज्य निर्वाचन आयुक्त चीफ सिकरेट्री से रिटायर आईएएस अधिकारियों को बनाया जाता है। छत्तीसगढ़ में भी शिवराज सिंह सीएस से रिटायर होने के बाद राज्य निर्वाचन आयोग में पोस्ट किए गए थे। मगर अफसरों की कमी के चलते कई बार सिकरेट्री लेवल के अधिकारी भी रिटायरमेंट के बाद नियुक्त हो गए। अब अगले महीने मुख्य सूचना आयुक्त एमके राउत रिटायर होने वाले हैं। सूचना आयुक्त अशोक अग्रवाल भी उनके 15 दिन बाद सेवानिवृत्त हो जाएंगे। अगले साल मार्च में रेरा के चेयरमैन विवेक ढांड का कार्यकाल भी पूरा हो जाएगा। मुख्य सूचना आयुक्त और रेरा चेयरमैन चीफ सिकरेट्री के समकक्ष पद हैं। मगर सरकार के समक्ष दिक्कत यह है कि इस समय कोई रिटायर होने वाला अफसर है नहीं। रेरा में तो किसी आईएफएस अफसर को मौका मिल सकता है। मगर राउत की जगह कौन लेगा...कोई नाम नहीं है। कुछ लोग किसी पत्रकार का नाम ले रहे हैं। अब पत्रकार लोकल लेवल का होगा या बाहर का, ये भी क्लियर नहीं।

राउत आखिरी सीआईसी

बात मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति की चली तो बता दें कि अब इसका वो चार्म नहीं रहा, जो पहले था। मोदी सरकार ने सीआईसी का न केवल कार्यकाल पांच बरस से कम करके तीन साल कर दिया है। बल्कि आजीवन मिलने वाली सुविधाओं में भी कटौती कर दी गई है। अभी जो सीआईसी हैं, उन्हें रिटायरमेंट के बाद आखिरी सांस तक पीए और एक केयर टेकर मिलता है। साथ ही अनलिमिटेड टेलीफोन बिल। इसके अलावा सीआईसी के साथ ही उनकी पत्नी को आजीवन मुफ्त में इलाज की सुविधा। वे देश के किसी भी महंगे अस्पताल में अपना उपचार करा सकते हैं...आयोग इसका भुगतान करेगा। एमके राउत से पहले अशोक विजयवर्गीय और सरजियस मिंज इस सुविधा का लाभ उठा रहे हैं। और अब राउत का नम्बर है। मगर उनके बाद सब बंद हो जाएगा। मगर कुर्सी पर रहने के दौरान ढाई लाख वेतन के साथ गाड़ी, बंगला, मेडिकल सुविधा का लाभ तो रहेगा...ये भी कम थोड़े ही है।

दूसरे आईएएस

ईडी के गिरफ्त में आए 2009 बैच के आईएएस समीर विश्नोई को कोर्ट ने 14 दिनों के लिए जेल भेज दिया है। उन्हें रायपुर के सेंट्रल जेल के उसी सेल में रखा गया है, जिसमें आईपीएस जीपी सिंह रहे। बहरहाल, जेल जाने वाले वे छत्तीसगढ़ के दूसरे आईएएस होंगे। उनसे पहले 88 बैच के आईएएस अधिकारी बीएल अग्रवाल को जेल हुई थी। अग्रवाल तब प्रमुख सचिव थे। आईपीएस में जेल जाने वाले जीपी सिंह पहले अधिकारी हैं। ऑल इंडिया सर्विसेज में आईएफएफ अधिकारी अभी तक सेफ हैं। कई बड़े मामलों में उनके नाम जरूर आए मगर सफाई से अपना दामन बचा लिया।

आईएएस का सस्पेंशन?

जीएडी का वेबसाइट 11 अक्टूबर के बाद अपडेट नहीं हुआ है। जबकि, इससे पहले हर दो-तीन दिन में अपडेट होता था। ऐसे में ब्यूरोक्रेसी के भीतर से सवाल उठ रहे हैं...आईएएस समीर विश्नोई को जीएडी ने सस्पेंड तो नहीं कर दिया है। वैसे भी नियमानुसार किसी भी सरकारी मुलाजिम की गिरफ्तारी के बाद अनिवार्य तौर पर उसे सस्पेंड कर दिया जाता है। झारखंड में पूजा सिंघल भी निलंबित हुई थीं। समीर को 17 दिन ईडी के रिमांड पर रहने के बाद जेल भी भेजा जा चुका है। बहरहाल, समीर का निलंबन हुआ है या नहीं, कोई बोलने तैयार नहीं। मगर ब्यूरोक्रेसी में कुछ इस तरह की चर्चाएं तो चल रही हैं।

सरकार बड़ी या अदृश्य शक्ति?

कैबिनेट द्वारा ट्रांसफर पर बैन खोलने के बाद स्कूल शिक्षा विभाग में तीन हजार से अधिक शिक्षकों का ट्रांसफर किया गया। ये अलग बात है कि इस विभाग के ट्रांसफर में 100 खोखा का खेल हुआ, या इससे अधिक का। गंभीर विषय यह है कि आदेश निकलने के महीने भर बाद भी कवर्धा के सौ से अधिक शिक्षकों की रिलीविंग रोक दी गई है। डीईओ का कहना है, नो रिलीविंग। बताते हैं, कोई अदृश्य शक्ति ने डीईओ को रात में चमका दिया....रिलीव करोगे तो तुम भुगतोगे। अब शिक्षक परेशान हैं कि डेढ़ से ढाई पेटी देने के बाद ट्रांसफर हुआ, वो भी लटक गया। उधर, डीईओ भी परेशान...जितने शिक्षक रिलीव होते हैं, उतने ज्वाईन करते हैं। प्रदेश के डीईओ ने इसके लिए रेट तय कर दिया है...रिलीविंग हो या ज्वाइंनिंग 10 हजार का लिफाफा जेब में रखकर आना होगा।  

हर त्यौहार होली

छत्तीसगढ़ में पहले छठी-बरही और होली तक शराब सीमित थी। इसके अलावा शादी-ब्याह। मगर राज्य बनने के बाद सूबे में शराब का चलन ऐसा तेजी से बढ़ा कि अब तो हर तीज-त्यौहार होली हो गया है। अब तो आलम यह हो गया है...कोई त्यौहार आया नहीं कि शराब दुकानों में भीड़ बढ़ जाती है। लोग दिवाली को भी नहीं छोड़ रहे....ड्रिंक करके लक्ष्मी पूजा। दिवाली में अब मिठाई की जगह गिफ्ट में शराब की बोतलें बंट रही हैं। पहले होली में पुलिस को लॉ एंड आर्डर के लिए मशक्कत करनी पड़ती थी, अब गोवर्धन पूजा तक में पुलिस को रात भर चौकसी बरतनी पड़ती है कहीं बलवा या खूनखराबा न हो जाए।

हैप्पी दिवाली

कोरोना के चलते छत्तीसगढ़ की पिछली तीन दिवाली फीकी रही थी। बाजार भी ठंडा रहा। मगर तीन साल बाद अबकी बाजार में दिवाली की रौनक दिखी। इसकी बड़ी वजह किसानों को न्याय योजना का पैसा भी रहा। दिवाली से ठीक पहले सरकार ने किसानों के खाते में 1866 करोड़ रुपए ट्रांसफर कर दिए। अब जेब में पैसा रहते छत्तीसगढ़ के लोग त्यौहारों में कंजूसी नहीं करते। नहीं हो तो उधारी ले लेंगे, लेकिन मन मसोसकर रहना स्वभाव नहीं। इस बार तो किसानों के खुद के खाते में पैसा आ गए थे। सो, सराफा बाजार हो या आटोमोबाइल या फिर कपड़ा मार्केट...पूरा गुलजार रहा।

कप्तान की किस्मत

वीवीआईपी जिला दुर्ग के पुलिस कप्तान डॉ0 अभिषेक पल्लव शरीफ किस्म के आईपीएस माने जाते हैं। इजी गोइंग....तीन-तिकड़म से दूर। मगर दुर्ग में उनकी किस्मत साथ नहीं दे रही है। दुर्ग वे जब से गए हैं, कुछ-न-कुछ हो जा रहा। हाईवे पर नौ घंटे जाम की जिम्मेदारी उन पर डाल दी गई। अभी अमलेश्वर में सराफा व्यापारी की गोली मारकर हत्या हो गई तो एकबारगी लगा कि पल्लव की कुर्सी अब खतरे में है। मगर 24 घंटे के भीतर आरोपियों को सिनेमाई अंदाज में पकड़कर उन्होंने सरकार को सियासी परेशानी से बचा लिया।

कलेक्टर और कप्तान में ट्यूनिंग

हर सरकार चाहती है...कलेक्टर और कप्तान में समन्वय बना रहे। पिछले कलेक्टर-एसपी कांफ्रेंस में सीएम भूपेश बघेल ने भी यही ताकीद की थी। मगर व्यवहार में ऐसा होता नहीं। कलेक्टर और एसपी अपनी-अपनी राह चल रहे। इसका सबसे अधिक प्रभाव लॉ एंड आर्डर पर पड़ रहा। अपन किसी सड़क हादसे की बात करें। एक्सीडेंट होता है तो पुलिस तो मौके पर पहुंच जाती है। मगर तहसीलदार या एसडीएम नहीं पहुंचते। जब भीड़ का गुस्सा शांत हो जाता है तब मुआवजे का ऐलान करने प्रशासनिक अफसर मौके पर पहुंचते हैं। चीफ सिकरेट्री और डीजीपी को इसे देखना चाहिए। क्योंकि, जाम से आम आदमी परेशान होता है।

राज्योत्सव तामझाम से

छत्तीसगढ़ की पांचवी सरकार का यह आखिरी राज्योत्सव और अलंकरण समारोह होगा। जाहिर है, अगले साल एक नवंबर से पहले आचार संहिता लग चुका होगा। तब राज्योत्सव की औपचारिकता भर होगी। अलंकरण समारोह भी नहीं होगा। आचार संहिता के कारण किसी राजनेता को मुख्य अतिथि नहीं बनाया जा सकता। राज्यपाल मुख्य अभ्यागत होते हैं। 2003, 2008, 2013 और 2018 में ऐसा ही हुआ था। कह सकते हैं...चुनावी सालों में राज्योत्सव बेमजा होता है। लिहाजा, रेगुलर राज्योत्सव अब 2024 में होगा। यही वजह है, सरकारी मशीनरी इस राज्योत्सव को सफल बनाने में ताकत झोंक दी है। खुद मुख्यमंत्री राज्योत्सव स्थल का जायजा ले चुके हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. किन जिलों के पुलिस अधीक्षक ईडी के छापे के बाद से रात में बंगले की बजाए अज्ञात स्थान पर सोने के लिए चले जाते हैं?

2.पहली बार अधिकारी अपने पैसे से चेक के जरिये आईफोन-14 खरीद रहे हैं, इसकी क्या वजह है?