मंगलवार, 20 अक्तूबर 2020

ग्रह-नक्षत्र के शिकार

 संजय के दीक्षित

तरकश, 18 अक्टूबर 2020
ग्रह-नक्षत्र के चक्कर में राजभवन के सचिव सोनमणि बोरा भले ही पिस गए हों मगर इसमें एक वजह और भी बताई जा रही है। खबर है, स्टेट गवर्नमेंट की अहम योजना मोहल्ला क्लीनिक के लिए सरकार ने बोरा से कहा था कि लेबर विभाग के मद से कुछ पैसे नगरीय प्रशासन विभाग को ट्रांसफर कर दें। बोरा ने नियमों का हवाला देकर ऐसा करने से मना कर दिया। सरकार को यह नागवार गुजरा। सरकार ने पिछले हफ्ते बोरा से लेबर विभाग लेकर अंबलगन पी को सौंप दिया। लेबर विभाग से 55 करोड़ रुपए नगरीय प्रशासन को ट्रांसफर कर दिया। कुल मिलाकर बोरा के लिए हार्ड लक वाला मामला रहा। पिछली सरकार में भी वे हांसिये पर रहे। खासकर तीसरी पारी में उन्हें अच्छी पोस्टिंग नहीं मिल पाई। यहां तक कि हायर स्टडी के लिए यूएस जाने के लिए उन्हें कितने पापड़ बेलने पड़े थे। पिछले साल वहां से लौटकर आए तो पोस्टिंग के लिए महीना भर वेट करना पड़ा। फिर हायर एजुकेशन विभाग मिला भी तो 21 दिन में खिसक गया। इसके बाद ऐन आदिवासी नृत्य महोत्सव के पहले संस्कृति विभाग हाथ से निकल गया। और, अब राजभवन। ग्रह-नक्षत्र का कुछ चक्कर तो है बोरा के साथ, वरना वे कमजोर अफसर तो नहीं हैं।

कलेक्टरों पर भरोसा

एक नवंबर से प्रारंभ होने जा रही सरकार की अब तक की सबसे महत्वपूर्ण योजना-मोहल्ला क्लीनिक-की तैयारी युद्ध स्तर पर शुरू हो गई है। मोहल्ला क्लीनिक सिर्फ सीएम का ड्रीम प्रोजेक्ट ही नहीं है बल्कि दिल्ली की तरह अगले विधानसभा चुनाव में इसका काफी इम्पैक्ट रहेगा। इसलिए, इस योजना को सियासत से दूर रखा जा रहा है। हालांकि, प्रारंभ में हेल्थ विभाग को इसका कंसेप्ट बनाने कहा गया था। लेकिन, हेल्थ वाले कुछ नहीं कर पाए। तो सरकार ने इसका जिम्मा नगरीय प्रशासन को सौंप दिया। बाद में, सरकार के रणनीतिकारों को लगा कि नगरीय प्रशासन विभाग के चक्कर में मामला गड़बड़ा न जाए…महापौर, पार्षद आखिर राजनीति करने से मानेंगे कहां। इस वजह से सरकार ने मोहल्ला क्लीनिक को कलेक्टरों के हवाले कर दिया है। इसके आॅपरेशन के लिए अरबन पब्लिक सर्विस सोसाईटी बनाई गई है। कलेक्टर इसके चेयरमैन और नगर निगम कमिश्नर सिकरेट्री होंगे। अब, कलेक्टर मंत्रियों, महापौरों की सुनते नहीं, इसलिए समझा जाता है मोहल्ला क्लीनिक में बेजा दखलांदाजी कम होगी।

गुरू को नमन!

नारी सशक्तिकरण की आईकाॅन पद्यश्री फूलबासन बाई को छत्तीसगढ़ में भला कौन नहीं जानता। फूलबासन बाई 23 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन के केबीसी शो में हिस्सा लेंगी। इसकी रिकार्डिंग हो चुकी है। फूलबासन बाई ने इस शो में अपनी कामयाबी के लिए राजनांदगांव के तत्कालीन कलेक्टर दिनेश श्रीवास्तव को भी याद किया है। शायद नए लोगों को मालूम नहीं होगा कि छत्तीसगढ़ में सबसे पहले स्व सहायता समूह गठित कर महिलाओं को प्रोत्साहित करने का काम दिनेश श्रीवास्तव ने ही राजनांदगांव में शुरू किया था। 2001 में बकरी चराने वाली पांचवी पास फूलबासन बाई उनके संपर्क में आई। श्रीवास्तव ने फूलबासन की प्रतिभा को देखकर मां बम्लेश्वरी स्व सहायता समूह गठित कराया। फूलबासन इसकी अध्यक्ष हैं। और दिनेश श्रीवास्तव आज भी उसके मुख्य संरक्षक। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इस ग्रुप में लगभग दो लाख से अधिक महिलाएं जुड़ी हुई हैं और 20 करोड़ रुपए से अधिक बैंक बैलेंस है। इसी काम के जरिये फूलबासन देश-दुनिया के लिए जानी-पहिचानी शस्खियत बन गई। तभी तो फूलबासन ने केबीसी में दिनेश श्रीवास्तव को याद किया।

हार के बाद जीत

मरवाही उपचुनाव से छत्तीसगढ़ की सियासत गरमाई हुई है। ऐसे में, कोटा उपचुनाव की याद ताजा हो जा रही। 2007 में हुए कोटा उपचुनाव में सत्ताधारी बीजेपी इस सीट को लेकर इतना संजीदा थी कि सभी 13 मंत्रियों और 30 से अधिक विधायकों को कोटा भेज दिया था। आलम यह था कि कमजोर इलाके में दो-दो, तीन-तीन गांव पर एक मंत्री तैनात कर दिए गए थे। इसके बाद भी भाजपा कोटा सीट कांग्रेस से छीन नहीं पाई। कांग्रेस के दिग्गज नेता राजेंद्र प्रसाद शुक्ल के देहावसान की वजह से यह सीट खाली हुई थी। तब राजेंद्र प्रसाद शुक्ल के परिजनों को इस सीट पर टिकिट क्यों नहीं मिली और रेणु जोगी कैसे पार्टी प्रत्याशी बन गईं…इसकी अलग कहानी है। बहरहाल, कोटा की यही हार भाजपा की 2008 में जीत की वजह बनी। इस हार के बाद सरकार को फीडबैक मिला था कि पीडीएस की खामियां सरकार को भारी पड़ी। वहीं से एक रुपए किलो चावल योजना की नींव पड़ी। यही नहीं, तत्कालीन फूड सिकरेट्री डाॅ0 आलोक शुक्ला को पीडीएस ठीक करने का जिम्मा दिया गया और शुक्ला ने छत्तीसगढ़ के पीडीएस को देश का माॅॅडल बना दिया।

राजभवन का रिवार्ड

राजभवन के नए सिकरेट्री अमृत खलको यह सोचकर जगदलपुर से रायपुर रवाना हुए कि राजभवन में एक पोस्टिंग कर लेने के बाद उसके बाद का मामला ठीक-ठाक हो जाएगा। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। खलको अभी तक ज्वाईन नहीं कर पाए हैं। आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि राजभवन में पोस्टेड अधिकारियों को वहां से हटने पर बढ़ियां पोस्टिंग मिलती है। वो चाहे सिकरेट्री हो या एडीसी। एडीसी में दिपांशु काबरा से लेकर विवेकानंद, राहुल शर्मा, डाॅ0 आनंद छाबड़ा, भोजराम पटेल…सभी को अच्छे जिलों की कप्तानी मिली। इसी तरह शुरू से लेकर अभी तक…राजभवन के फस्र्ट सिकरेट्री सुशील त्रिवेदी भारी-भरकम दो विभाग के सिकरेट्री बनाए गए थे। उनके बाद आईसीपी केसरी पीडब्लूडी के सिकरेट्री बनें। अमिताभ जैन को भी पीडब्लूडी और जनसंपर्क मिला। पीसी दलेई राज्य निर्वाचन आयुक्त बनाए गए। जवाहर श्रीवास्तव और अशोक अग्रवाल सूचना आयुक्त बनें। सुरेंद्र जायसवाल को तो रिटायरमेंट की शाम ही संसदीय सचिव पर संविदा नियुक्ति मिल गई। लेकिन, खलको का पता नहीं अब क्या होगा।

पहली बार दो आईएएस

राज्य बनने के बाद कभी ऐसा नहीं हुआ कि राजभवन में दो आईएएस पोस्ट किए गए हों। एक आईएएस सिकरेट्री रहता है। और, राप्रसे का अफसर डिप्टी या ज्वाइंट सिकरेट्री। इस बार राजभवन को इम्पाॅर्टेंस देते हुए सरकार ने अमृत खलको को सचिव और केडी कुंजाम को ज्वाइंट सिकरेट्री गनाया है। ये अलग बात है कि दोनों अभी ज्वाईन करने में कामयाब नहीं हो पाए हैं।

तरकश की खबर

तरकश स्तंभ के पिछले एपीसोड में अमित के नाम पर संशय और डाॅक्टर के खिलाफ डाॅक्टर…दो खबरें थीं और दोनों सही निकली है। हमने बता दिया था कि मरवाही में अमित का चुनाव लड़ना मुश्किल है। उस समय कांग्रेस और बीजेपी के कंडिडेट घोषित नहीं हुए थे। बावजूद इसके…हुआ वहीं। डाॅक्टर के खिलाफ डाॅक्टर।

फिफ्टी-फिफ्टी

मरवाही बाइ इलेक्शन में कांग्रेस को सत्ता होने का स्वाभाविक लाभ तो मिलेगा ही, कुछ और बातें हैं जो उसके पक्ष में जा रहे हैं। पहला, कांग्रेस कंडिडेट डाॅ केके ध्रुव का मरवाही में अच्छी पकड़ है। पेंड्रा और गौरेला कांग्रेस के लिए जरूर बड़ा गड्ढा रहा है। पिछले चुनाव में इन दोनों इलाकों में जोगी के पक्ष में एकतरफा वोट पड़े थे। इस बार जोगी का कोई कंडिडेट है नहीं। और, उनके 90 परसेंट करीबी लोग पार्टी छोड़ कांग्रेस ज्वाईन कर लिए हैं। कांग्रेस के लिए यह उत्साह की वजह है। किन्तु, सवाल यह है कि अब जोगी के वोट किस पार्टी को मिलेंगे। पिछले चुनाव में अजीत जोगी को 74 हजार वोट मिले थे। सियासी पंडितों का कहना है कि जोगी के फिफ्टी-फिफ्टी वोट कांग्रेस-भाजपा में बंट जाएंगे। लेकिन, कांग्रेस जी तोड़ कोशिश में है कि जोगी के प्रभाव वाले वोट किसी भी सूरत में बीजेपी की ओर टर्न न करें।

अंत में दो सवाल आपसे

1. इस शिगूफे में कितनी सच्चाई है कि मरवाही उपचुनाव कानूनी दांव-पेंच में फंसकर अधर में लटक सकता है?
2. किस जिले के एसपी आईपीएस की मान-मर्यादा को ताक पर रख एक सूत्रीय वसूली अभियान मे जुटे हुए हैं?

 

रविवार, 11 अक्तूबर 2020

छत्तीसगढ़ लौटेंगे सुब्रमणियम?

 संजय के दीक्षित

तरकश, 11 अक्टूबर 2020
आईएएस बीवीआर सुब्रमणियम के जम्मू-कश्मीर से लौटने की अटकलें तेज होती जा रही है। ब्यूरोक्रेसी में कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि वे छत्तीसगढ़ के अगले चीफ सिकरेट्री बनेंगे। सुब्रमणियम जेके के चीफ सिकेरट्री हैं। भारत सरकार ने 2018 में उन्हें डेपुटेशन पर श्रीनगर भेजा था। सुब्रमणियम लंबे समय तक पीएमओ में रहे जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। 2018 में जब छत्तीसगढ में सरकार बदली तो उस दौरान भी मुख्य सचिव के लिए उनका नाम चर्चा में रहा। लेकिन, इस समय जब सुब्रमणियम छत्तीसगढ़ लौटेंगे, इसमेें संशय है। जम्मू-कश्मीर के सीएस से हटे भी तो छत्तीसगढ़ आने की बजाए उनकी प्रायरिटी होगी कि भारत सरकार में कोई अच्छा पोर्टफोलियो मिल जाए। फिर, आरपी मंडल के एक्सटेंशन के लिए राज्य सरकार ने केंद्र को प्रपोजल भेजा है। ऐसे में, सुब्रमणियम के लौटने की अटकलें जरूर लगाई जा रही है लेकिन, सुब्रमणियम अब शायद ही छत्तीसगढ़ लौटें। उनको अगर लौटना ही होता तो अपनी आईएफएस पत्नी का छत्तीसगढ़ से दिल्ली डेपुटेशन नहीं कराया होता।

डेपुटेशन की तैयारी

आईएएस सोनमणि बोरा से सरकार ने वर्क लोड कम करना शुरू कर दिया है। पिछले हफ्ते हुए फेरबदल में उनसे श्रम विभाग लेकर अंबलगन पी को सौंप दिया। बोरा की अब मूल पोस्टिंग अब सिकरेट्री संसदीय कार्य है। साथ में राजभवन सिकरेट्री का अतिरिक्त प्रभार। जाहिर है, बोरा सेंट्रल डेपुटेशन पर दिल्ली जा रहे हैं। राज्य सरकार ने उन्हें एनओसी दे दिया है। भारत सरकार से पोस्टिंग आर्डर निकलने के बाद बोरा दिल्ली की फ्लाइट पकड़ लेंगे। इसको देखते सरकार ने बोरा के विभागों को हल्का करना शुरू कर दिया है। उनके रिलीव होने पर सरकार किसी आईएएस को संसदीय कार्य के साथ राजभवन सिकरेट्री का चार्ज सौंप देगी। बोरा की जगह राजभवन का सिकरेट्री कौन होगा, इस पर अटकलों का दौर जारी है। आमतौर पर राजभवन सिकरेट्री के लिए राज्यपाल की पसंद को वेटेज दिया जाता है। अब देखना है, सरकार किसे राजभवन भेजती है।

अमित पर संशय!

छजपा सुप्रीमो अमित जोगी ने मरवाही विधानसभा उपचुनाव में जोर-शोर से कैम्पेनिंग प्रारंभ कर दिया है। कांग्रेस और सरकार पर हमला करने का वे कोई मौका नहीं छोड रहे। मगर लाख टके का सवाल है क्या वे चुनाव लड़ पाएंगे? दरअसल, सियासी पंडितों को उनके चुनाव लड़ने पर संशय दिखाई पड़ रहा है। ऐसा मानना है कि जाति मामला अमित के लिए भारी पड़ सकता है। हो सकता है कि ऐन चुनाव के समय उन्हें चुनाव प्रक्रिया से अलग होना पड़ जाए।

डाॅक्टर के खिलाफ डाॅक्टर

मरवाही से कांग्रेस के डाॅ0 केके ध्रुव को उम्मीदवार बनाया जाना लगभग पक्का हो गया है। बीजेपी से डाॅ0 गंभीर को टिकिट मिल सकती है। बीजेपी से अभी दो नाम है। गंभीर और समीरा पैकरा। लेकिन, गंभीर की संभावना अधिक है। अगर अमित जोगी किन्ही परिस्थितियों में चुनाव से हट गए तो जाहिर है चुनाव ट्रेंगुलर की बजाए कांग्रेस-भाजपा के बीच बदल जाएगा। याने डाॅक्टर के खिलाफ डाॅक्टर।

टिकिट पर असंतोष

कांग्रेस डाॅ0 केके ध्र्रुव को मरवाही उपचुनाव में उतारने जा रही है लेकिन, उनको लेकर पार्टी में अभी से असंतोष की स्थिति निर्मित होने लगी है। पार्टी नेताओं का मानना है कि ध्रुव का बाहरी होना नुकसान हो सकता है। वे बलौदा बाजार से हैं। इसके अलावा अजीत जोगी का उन पर संरक्षण रहा है। इसीलिए वे 15 साल से मरवाही बीएमओ पद पर बने हुए हैं। कांग्रेस के रणनीतिकार इसको लेकर भी सतर्क हैं कि डाॅ0 ध्रुव को टिकिट देने पर बीजेपी कहीं समीरा पैकरा को मैदान में न उतार दे। समीरा लोकल हैं। इससे चुनाव लोकल वर्सेज बाहरी में बदल जाएगा। जाहिर है, इससे कांग्रेस को नुकसान होगा।

संदीपन या धमेंद्र?

गरियाबंद के कलेक्टर छतर सिंह डेहरे इस महीने 30 तारीख को रिटायर हो जाएंगे। उनकी जगह पर सरकार किसे कलेक्टर बनाकर भेजेगी इसको लेकर चर्चाएं शुरू हो गई है। सरकार अगर डायरेक्ट आईएएस में से किसी को भेजना चाहेगी तो इनमें एक नाम विलास संदीपन भोस्कर का हो सकता है। वे कोरिया कलेक्टर से डेढ़ महीने में राजधानी वापिस बुला लिए गए थे। और, प्रमोटी की कहीं बात आई तो धर्मेंद्र साहू का पलड़ा भारी रहेगा। धर्मेद्र 96 बैच के राप्रसे अधिकारी हैं। उनके बैच के लगभग सभी कलेक्टर बन गए हैं। रमेश शर्मा, केएल चैहान, सुनील जैन और पी एल्मा सभी धर्मेंद्र के समकक्ष हैं। हालांकि, एक विपीन मांझी भी हैं। लेकिन, गरियाबंद उनका गृह जिला है, इसलिए उनकी संभावना नही ंके बराबर है।

2013 बैच की वेटिंग

कई राज्यों में 2014 बैच के आईएएस कलेक्टर बन गए हैं। उड़ीसा में तो 2015 बैच चालू हो गया है। लेकिन, छत्तीसगढ़ में 2013 बैच वेटिंग में चल रहा है। वैसे, अविभाजित मध्यप्रदेश में भी आईएएस बनने के पांच से छह वर्ष के भीतर कलेक्टरी मिल जाती थी। लेकिन, छत्तीसगढ़ में 2009 बैच से यह ट्रेंड टूट गया। 2010, 2011 और 2012 तीनों ही बैच काफी लेट से कलेक्टर बना। दरअसल, वजह यह है कि कुछ सालों से हर साल छह-छह, सात-सात आईएएस छत्तीसगढ़ आ रहे हैं। लिहाजा, दावेदारों की संख्या बढ़ती जा रही है। फिर, प्रमोटी कलेक्टरों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। पहले सिर्फ चुनाव के समय सरकार 12 से 13 जिलों में प्रमोटी आईएएस को कलेक्टर बनाती थी। बाकी समय इनकी संख्या सात-आठ होती थी। एक समय तो सिर्फ चार रह गए थे। लेकिन, अभी प्रमोटी आईएएस का वेटेज बढ़ा है। इस समय 10 जिलों में प्रमोटी कलेक्टर हैं। इनमें कोरिया, बलरामपुर, जशपुर, मरवाही, बलौदा बाजार, गरियाबंद, राजनांदगांव, कवर्धा, बालोद और कांकेर शामिल हैं। हालांकि, प्रमोटी में भी 2010 से लेकर 2012 तक में अभी कई आईएएस कलेक्टरी के वेटिंग में है। सरकार को उन्हें भी देखना होगा। बहरहाल, 2013 बैच में रेगुलर रिक्रूट्ड सात आईएएस हैं। नम्रता गांधी, गौरव सिंह, अजीत बसंत, विनीत नंदनवार, इंद्रजीत चंद्रवाल, जगदीश सोनकर और राजेंद्र कटारा। ये सरकार की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. राजभवन का अगला सचिव कौन बनेगा?
2. क्या अमित जोगी मरवाही उपचुनाव लड़ पाएंगे और नहीं लड़े तो किस पार्टी को सपोर्ट करेंगे?

रविवार, 4 अक्तूबर 2020

बदलेंगे कलेक्टर

 संजय के दीक्षित

तरकश, 4 अक्टूबर 2020
इस महीने 31 अक्टूबर को गरियाबंद के कलेक्टर छतर सिंह डेहरे रिटायर हो जाएंगे। राज्य प्रशासनिक सेवा से आईएएस बने छतर सिंह का कलेक्टर के रूप में गरियाबंद पहला और आखिरी जिला होगा। इसी साल 27 मई को सरकार ने उन्हें कलेक्टर बनाकर गरियाबंद भेजा था। कुल मिलाकर पांच महीने वे कलेक्टर रहे। फिर भी छतर सिंह किस्मती अफसर रहे, जिन्हें सरकार ने कलेक्टर बनने का अवसर दे दिया। वरना, छत्तीसगढ़ में कई ऐसे प्रमोटी आईएएस रहे हैं, जिन्हें कलेक्टर बनने का मौका नहीं मिल पाया। बहरहाल, जिले से रिटायर करने वाले डेहरे दूसरे आईएएस होंगे। उनसे पहिले बीपीएस नेताम कांकेर कलेक्टर रहते रिटायर हुए थे। रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़ जैसे चार बड़े जिलों की कलेक्टरी किए ठाकुर राम सिंह के समय लगा था कि वे रायपुर कलेक्टर से रिटायर होंगे। लेकिन, सरकार ने आखिरी समय में उन्हें कमिश्नर बना दिया था। वैसे, छतर सिंह डेहरे के रिटायर होने पर गरियाबंद में नए कलेक्टर की पोस्टिंग की जाएगी। खबर है गरियाबंद के साथ ही सरकार दो-तीन और कलेक्टरों को इधर-से-उधर कर सकती है।

सुबोध और सोनमणि

अधिकांश आईएएस रायपुर का कलेक्टर बनना इसलिए पसंद नहीं करते क्योंकि माना जाता है कि रायपुर आखिरी कलेक्टरी होती है…यानि कलेक्टरी की इनिंग समाप्त हो जाती है। लेकिन, ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ में दो ऐसे आईएएस हैं, जिन्हें रायपुर के बाद बिलासपुर का कलेक्टर बनने का मौका मिला। वे हैं सुबोध सिंह और सोनमणि बोरा। सुबोध तो रायपुर से बिलासपुर गए और फिर बिलासपुर से दोबारा रायपुर के कलेक्टर बनें। रायपुर कलेक्टर से फिर वे सीएम सचिवालय गए। सुबोध ने रायपुर में दो बार कलेक्टरी की। इसी तरह सोनमणि कवर्धा से रायपुर आए थे और रायपुर से फिर बिलासपुर कलेक्टर बनें। हालांकि, ये सही है कि अधिकांश कलेक्टरों के लिए रायपुर लास्ट जिला रहा। एमके राउत, सीके खेतान, आरपी मंडल, अमिताभ जैन, रोहित यादव, सिद्धार्थ परदेशी, ठाकुर राम सिंह सभी का रायपुर आखिरी जिला रहा। ओपी चैधरी का भी कलेक्टर के तौर पर रायपुर आखिरी जिला रहा। लेकिन, उन्होेंने खुद से वीआरएस ले लिया। मगर ये सही है कि वीआरएस नहीं भी लिए होते तो सरकार बदलते उन्हें रायपुर से हटना पड़ता। फिलहाल, एस भारतीदासन रायपुर के कलेक्टर हैं। प्रदेश के सबसे सीनियर कलेक्टर भारतीदासन को भी समझा जाता है कि रायपुर उनका आखिरी जिला होगा। फिर भी उम्मीद के लिए सुबोध और सोनमणि…ये दो नाम तो हैं…हो सकता है, जो रायपुर का कलेक्टर बने, उसे आगे चलकर बिलासपुर जिले में अवसर मिल जाए।

सीएम का सीधा संवाद

गांधी जयंती के दिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मंत्रियों के साथ वीडियोकांफें्रसिंग से वन अधिकार पट्टा वितरण किया। सीएम ने पट्टा सौंपने के बाद कुछ हितग्राहियों से सीधे संवाद करना चाहा। इससे कलेक्टर हड़बड़ा गए। क्योंकि, इसकी तैयारी की नहीं थी। आमतौर पर ऐसे वक्त के लिए प्रशासनिक अधिकारी ग्रामीणों को ट्रेंड कर देते हैं। लेकिन, अफसरों को इसका अंदेशा नहीं था कि इतने व्यस्त कार्यक्रम के बाद भी सीएम ग्रामीणों से बात करने की इच्छा व्यक्त कर देंगे।

कप्तानी पारी

कप्तान कितना भी अच्छा हो मगर अगर टीम अनकूल नहीं है, तो कप्तान की सफलता पर हमेशा संशय बना रहता है। ऐसा ही कुछ रायपुर के एसएसपी अजय यादव के साथ हो रहा है। हैं तो काबिल अफसर मगर रायपुर में अभी उनकी अपनी टीम नहीं बन पाई है। दुर्ग से जब वे रायपुर आए थे तो समझा गया था कि वहां से कुछ अफसरों को लेकर रायपुर आएंगे। मगर ऐसा हुआ नहीं। 2004 बैच के आईपीएस अजय प्रदेश के सबसे सीनियर पुलिस कप्तान हैं। उनकी जब रायपुर में पोस्टिंग हो रही थी तो एक वर्ग ऐसा था, जो नहीं चाह रहा था कि उनके जैसे अफसर को रायपुर का एसपी बनाया जाए। लेकिन, सीएम ने उसे अनसूना करते हुए अजय यादव को एसएसपी अपाइंट कर दिया। अजय यादव को राजधानी में कप्तानी पारी खेलनी है तो अपनी टीम बना लेनी चाहिए।

बड़ी बात

राज्य पुलिस सेवा से आईपीएस बने अफसरों के लिए यह बड़ी बात होगी…सरकार ने सुकमा के एसपी शलभ सिनहा को कवर्धा और कवर्धा के एसपी केएल ध्रुव को सुकमा का कप्तान बना दिया है। दरअसल, सुकमा में नक्सलियों का उत्पात बढ़ता जा रहा है। माओवादियों ने वहां तीसरा लड़ाकू दस्ता बना लिया है। नक्सलियों के पास अभी तक दो कंपनी थी। मगर मिरतूर और सुकमा के पास हुए नक्सली वारदातों में जवानों से करीब 35 हथियार नक्सलियों ने इस साल लूट लिए। पुलिस के पास पुख्ता खबर है कि नक्सलियों ने 100 लड़ाकों की नई हथियारबंद कंपनी बनाई है। इसकी खबर मिलने पर आंतरिक सुरक्षा सलाहकार विजय कुमार छत्तीसगढ़ आए थे। वे बस्तर गए। लौटकर सीएम से भी मिले। उसके बाद केएल ध्रुव को सुकमा का एसपी बनाने का आदेश जारी हो गया। बताते हैं, ध्रुव ने बीजापुर के एसपी रहते नक्सलियों के खिलाफ फोर्स की तगड़ी मोर्चेबंदी की थी। धु्रव प्रमोटी आईपीएस हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. आदिवासी इलाके के एक ऐसे कलेक्टर का नाम बताइये, जिन्हें एक लोकल नेता बोलते हैं बैठ, तो बैठ जाते हैं और बोलते हैं खड़ा, तो खड़े हो जाते हैं?
2. किस जिले के एसपी को अगला एडिशनल ट्रांसपोर्ट कमिश्नर बनाने की चर्चा है?