रविवार, 17 अक्तूबर 2021

एसपी बड़े या सरकार?

छत्तीसगढ़ पुलिस के पुलिस अधीक्षकों ने अजीब परंपरा शुरू कर दी है। इन दिनों वे अपने हिसाब से सीएसपी को थाने का बंटवारा करने लगे हैं। जबकि, एसपी को ये अधिकार ही नहीं है। सीएसपी की पोस्टिंग मुख्यमंत्री के अनुमोदन से गृह विभाग करता है। पोस्टिंग आदेश में साफ तौर पर लिखा होता है सीएसपी फलां। याने कार्यक्षेत्र का नाम। लेकिन, कुछ दिनों से सरकार के आदेश को ओवरलुक करते हुए एसपी चहेते अफसरों को अपने हिसाब से लगे हैं रेवड़ी बांटने। यही नहीं, एसपी साहबानों की शह पर सीएसपी आजकल मानिटरिंग नहीं, बल्कि थानेदारी करने लगे हैं। अब सीएसपी और डीएसपी खुद ही थानेदारी करने लगे तो वही होगा जो राज्य में हो रहा है। पोलिसिंग का कबाड़ा। कोंडागांव में इसकी झलक दिखी। एसडीओपी की जमकर पिटाई हो गई। ये पुलिस पर उठते विश्वास का प्रतीक है। वरना, पहले कभी ऐसा देखा, सुना नहीं गया कि डीएसपी, सीएसपी की पिटाई होने लगे। मगर ये छत्तीसगढ़ में हो रहा है। और ये हो रहा तो सीधे तौर पर एसपी साहब लोगों की ये कमजोरी से हो रहा। जिले का कप्तान अगर टाईट हो जाए, तो मजाल है कानून-व्यवस्था में सेंध लगाने की कोई सोच लें। सरकार को 22 अक्टूबर को एसपी कांफ्रेंस में इस पर बात करनी चाहिए।  

 ब्यूरोक्रेसी पटरी पर

ढाई-ढाई साल की सियासी झंझावतों के बीच सांस रोककर शुतुरमुर्ग की मुद्रा में दुबकी छत्तीसगढ़ की नौकरशाही अब फिर से एक्टिव होने लगी है। मंत्रालय, इंद्रावती भवन में बैठकों का दौर शुरू हो चला है...तीन महीने से ठहरी फाइलें अब दौड़ने लगी है। जिलों के कार्यालयों में भी अब चहल-पहल दिखाई पड़ने लगी है। कलेक्टर-एसपी भी अब खोल से बाहर निकल आए हैं। वाकई, तीन महीने छत्तीसगढ़ के लिए बड़ा बुरा रहा। तेजी से बदले सियासी घटनाक्रम की वजह से सरकारी कामकाज एकदम से ठहर-सा गया था।     

राहुल का छत्तीसगढ़ दौरा

खबर है, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस महीने के अंत में छत्तीसगढ़ आ सकते हैं। छत्तीसगढ़ दौरे में वे बस्तर और सरगुजा जाएंगे या नहीं, ये अभी क्लियर नहीं हुआ है। मगर आदिवासी महोत्सव में वे शिरकत कर सकते हैं। इस महोत्सव में सभी 28 राज्यों से आदिवासियों का सांस्कृतिक जत्था रायपुर आएगा। तीन दिन का ये महोत्सव 28 अक्टूबर से प्रारंभ होकर 30 अक्टूबर तक चलेगा। इसके बाद एक नवंबर को राज्योत्सव है। पहले सुनने में आया था कि वे राज्योत्सव के चीफ गेस्ट होंगे। लेकिन, राज्य के बने दो दषक से ज्यादा समय हो जाने की वजह से अब सरकार राज्योत्सव को बहुत ग्लेमराइज नहीं करना चाह रही। आदिवासी महोत्सव बड़ा कल्चरल इंवेट हैं। लिहाजा, राहुल इसमें आ सकते हैं।   

उलझन में कलेक्टर

पहले कलेक्टर काफ्रेंस रखा गया था 22 अक्टूबर को और एसपी, आईजी काफ्रेंस उससे एक रोज पहले 21 को। मगर 21 अक्टूबर को षहीदी दिवस के चलते सरकार ने डेट एक्सचेंज करके 21 को कलेक्टर और 22 को एसपी, आईजी कांफ्रेंस कर दिया। लेकिन, अब कलेक्टरों के लिए उलझन ये हो गई है कि शहीदी दिवस में वे कैसे जा पाएंगे। राजधानी में मुख्यमंत्री, चीफ सिकरेट्री, डीजीपी समेत सीनियर अधिकारी शहीद जवानों को श्रद्धांजलि देने शिरकत करते हैं तो जिलों में कलेक्टर-एसपी। अब 21 अक्टूबर को कलेक्टर नहीं जा पाएंगे श्रद्धांजलि देने। दरअसल, पहले 5 अक्टूबर को रखा गया था एसपी कांफ्रेंस और 18 को कलेक्टर कांफ्रेंस। लेकिन, 5 को मुख्यमंत्री का लखनऊ जाने का कार्यक्रम आ गया। लिहाजा, एसपी कांफ्रेंस को स्थगित करना पड़ा। और कलेक्टर कांफें्रस इसलिए आगे बढ़ाना पड़ा क्योंकि 19 अक्टूबर तक विभिन्न तीज-त्यौहार हैं। बार-बार डेट इधर-उधर खिसकाने की बजाए सरकार ने अब 21 और 22 अक्टूबर का डेट फायनल कर दिया है। 

छोटी लिस्ट

कलेक्टर, एसपी कांफ्रेंस के बाद एक छोटी लिस्ट निकलने की खबर है। बताते हैं, मुख्यमंत्री भूपेष बघेल की क्लास में जिन कलेक्टर्स, एसपीज के पारफारमेंस ठीक नहीं आएंगे, उनकी कुछ घंटे बाद छुट्टी कर दी जाएगी। पता चला है, मुख्यमंत्री सचिवालय ने कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों का अपने सोर्सेज के आधार पर एक रिपोर्ट कार्ड तैयार करके रखा है। पारफारमेंस और रिपोर्ट कार्ड के आधार पर कुछ कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों के भविष्य तय होंगे। हालांकि, कलेक्टर, एसपी काफ्रेंस ट्रांसफर का कोई मापदंड नहीं है। मगर पहले कई मौकों पर ऐसा हो चुका है। अब चूकि सरकार के पास समय नहीं है। डेढ़ साल बचा है विधानसभा चुनाव में। लिहाजा, हो सकता है सरकार कोई मरौव्वत न करें। 

गजब सर्जरी

उद्योग विभाग में इस हफ्ते हुई सबसे बड़ी सर्जरी में अपर संचालक से लेकर सीजीएम, जीएम, मैनेजर, लिपिक समेत 48 लोगों के ट्रांसफर हो गए। राज्य बनने के बाद उद्योग विभाग में पहली बार इतना व्यापक तबादला हुआ होगा। उद्योग विभाग में पूरे राज्य में अधिकारी, कर्मचारी मिलाकर करीब 600 को अमला है। इसमें से 48 को इधर-से-उधर कर दिया गया। यानि करीब 10 परसेंट एकमुश्त। इनमें से 80 फीसदी से ऐसे अधिकारी, कर्मचारी ऐसे थे, जो फील्ड में थे, तो कई साल से फील्ड में और जो हेड क्वार्टर में थे वो हेड क्वार्टर में। मुख्यालय वालों का राजधानी में कंफर्ट लेवल इतना बढ़ गया था फील्ड की कमाईदार पोस्टिंग भी उन्हें रास नहीं आ रही थी। लेकिन, सरकार ने अब कंफर्ट लेवल खतम कर दिया है।

ऐसे भी मंत्री-1

चूकि, चर्चा उद्योग विभाग की हो रही, इसलिए अपने उद्योग और आबकारी मंत्री कवासी लखमा का स्मरण हो आया। कवासी भले ही पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन रुटीन के मामले में उनका अंदाज जुदा है। चार बजे उनकी सुबह हो जाती है। अगर वे रायपुर में हैं तो सुबह पांच बजे वे सड़क पर वॉॅक करते दिख जाएंगे। इसके बाद छह बजे तक तैयार होकर लोगों से मिलना षुरू। उन्हें जानने वालों को पता है कि मंत्रीजी से इस टाईम मिलना बेहद आसान है। तब उनके साथ कोई सरकारी अमले की रोक-टोक जैसी बंदिशें नहीं होती। तभी सुबह छह बजे से उनके बंगले में लोगों का जुटना शुरू हो जाता है। 

ऐसे भी मंत्री-2

कवासी लखमा से उलट भूपेश बघेल कैबिनेट में एक ऐसे मंत्री भी हैं, जिनकी लेटलतीफी से अधिकारियों का समय काफी जाया होता है। उनके बारे में तरह-तरह के किस्से हैं। एक तो 11 बजे से पहले उनकी सुबह होती नहीं। दूसरा, कई बार मंत्रीजी दोपहर में अधिकारियों की मीटिंग रख लेते हैं। पर बंगले पहुंचने पर पता चलता है साब अभी तैयार नहीं हुए हैं। हालांकि, देर से उठने वाले मंत्री रमन सरकार में थे, लेकिन वे देर रात तक लोगों से मिलते-जुलते भी थे। ये वाले रात को जल्दी भीतर चले जाते हैं और सुबह बाहर आते भी हैं अपने टाईम से।     

डीजीपी और काली मंदिर

डीजीपी डीएम अवस्थी आफिस रवाना होने से पहिले आकाशवाणी चौक स्थित काली मंदिर में माथा टेकना नहीं भूलते। उनके ड्राईवर को पता है...बंगले के गेट से गाड़ी निकालते ही वह काली मंदिर की ओर मोड़ देता है। ये सिलसिला आज से नहीं...लंबे अरसे से बना हुआ है। काली मंदिर के पुजारी याद करते हैं, साब जब आईजी रायपुर थे, उसके पहले से माई के दर्शन करने आ रहे हैं। फर्क यह है कि पहले कोई तामझाम नहीं होता था। और, अब चूकि डीजीपी हैं, इसलिए दो-चार जवान आसपास खडे हो जाते हैं। डीएम ने बंगला भी ऐसा अलॉट कराया है, जिसकी मंदिर से दूरी बमुश्किल 300 मीटर होगी। याने सीधे काली माई से शक्ति मिलती रहे। अध्यात्मिक मिजाज के डीजीपी वैसे महाकाल के भी परम भक्त हैं। वाकई उन पर महाकाल और काली माई की कृपा परिलक्षित भी हो रही है। आपको याद होगा...2018 में सरकार बदलने पर गिरधारी नायक इसलिए डीजीपी नहीं बन पाए कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के मुताबिक उनके रिटायरमेंट में छह महीने से कम समय बचा था। डीएम बन भी गए तो उसी दिन से भविष्यवाणियां चालू हो गई थी, बस साल भर। फिर हुआ सुप्रीम कोर्ट का दो साल की सर्विस की क्रायटेरिया पूरा होते ही। मगर कृपा देखिए, डीएम और पिच पर जमे हुए हैं। और, फिलहाल कोई खतरा भी नहीं दिख रहा। दिसंबर में उनका तीन साल हो जाएगा। ठीक ही कहा गया है, सब माथे पर लिखा होता है। खासकर, पीएम, सीएम, सीएस, डीजीपी, पीसीसीएफ तो बिल्कुल ही।  

अंत में दो सवाल आपसे

1. एक मंत्रीजी का नाम बताएं, जो पूरे परिवार के साथ आत्मग्लानि व्यक्त करने दरबार में पहुंच गए?

2. एक ऐसे विधायक का नाम बताएं, जो अगला चुनाव बीजेपी के नाम पर लड़ने की मानसिकता में हैं?

तेरे घर के सामने-1

 एनआरडीए ने घर के सामने रेलवे स्टेशन बनने का हवाला देकर  नया रायपुर में सेक्टर-15 के लगभग सारे प्लाट सेल कर डाले। प्लॉट लेने वालों में ढाई दर्जन से ज्यादा छत्तीसगढ़ के आईएएस, आईपीएस और आईएफएस हैं। कई दूरदर्शी अफसरों ने दो-दो प्लॉट परचेज कर डाले कि आज नहीं तो 20 साल बाद सही, नाती-पोतों के लिए हैंडसम एसेट खड़ा हो जाएगा। लेकिन, उन्हें झटका तब लगा, जब रोकड़ा के अभाव में एनआरडीए ने स्टेशन का प्रोजेक्ट बाइंडअप करने का फैसला ले लिया। जाहिर है, इससे ब्यूरोक्रेट्स नाराज होंगे ही....घर के सामने स्टेशन बनेगा, यह सोचकर ही तो पैसा फंसाए थे। अब सुनने में आ रहा...अफसरों की नाराजगी को भांपते हुए एनआरडीए के अधिकारियों ने रास्ता निकाला है। अब चार स्टेशनों के पुराने टेण्डर को निरस्त कर सिर्फ सेक्टर-15 के सामने एक स्टेशन बनाने के लिए नया टेंडर निकाला जाएगा। याने अब चार की जगह सिर्फ एक स्टेशन बनेगा....अधिकारियों के घर के सामने।

तेरे घर के सामने-2

एनआरडीए के पास जब धन की कमी है तो सवाल उठता है, सेक्टर-15 के सामने रेलवे स्टेशन बनाने के लिए पैसा किधर से आएगा। पता चला है, इसके लिए स्मार्ट सिटी से 45 करोड़ रुपए निकाला जाएगा। हालांकि, ये भी असान नहीं है। क्योंकि, पहले ये एनआरडीए का टेंडर था। अब स्मार्ट सिटी से बनाने के लिए इसके बोर्ड आफ डायरेक्टर से पारित कराना होगा। ठीक है....अफसरों का मामला है तो सब हो जाएगा। ठीक उसी तरह जैसे पिछली सरकार को झांसा देकर नौकरशाहों ने अपनी धरमपुरा कालोनी के सामने से फोर लेन निकाल दिया। तब सरकार को समझाया गया...साहब वीआईपी रोड का चौड़ीकरण करना बेहद कठिन काम है...बड़े-बड़े होटल हैं, उन्हें तोड़ने पर विवाद होगा। लिहाजा, एयरपोर्ट के लिए वैकल्पिक रोड बनाना बेहद जरूरी है। और फिर पीडब्लूडी ने 200 करोड़ का फोर लेन बनाकर अफसरों के 200 रुपए फुट की जमीन को तीन हजार रुपए फुट कर दिया। इसमें क्लास यह हुआ कि धरमपुरा में जैसे ही नया रोड बना, वीआईपी रोड की चौड़ीकरण की बाधाएं दूर हो गई और वहां सिक्स लेन रोड का प्रारुप तैयार कर दिया। व्हाट एन आइडिया....! 

अफसर को घर नहीं!

जिले के कलेक्टर, एसपी को अगर सरकारी आवास न मिले तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजधानी में सरकारी आवासों की क्या स्थिति है। बताते हैं, रायपुर के एसएसपी को महीने भर बाद भी अभी मकान फायनल नहीं हुआ है। तो जांजगीर कलेक्टर से रायपुर आने के बाद आईएएस यशवंत कुमार को लंबे समय तक कृषि विभाग के गेस्ट हाउस में गुजारना पड़ा। उन्हें न तो देवेंद्र नगर के आईएएस कालोनी में आवास मिल सका और न कचना के जीएडी कालोनी में। थक-हार कर उन्होंने एग्रीकल्चर कालोनी में अपना आशियाना बनाया है। वो भी ग्रेड से नीचे का मकान में। लेकिन, यशवंत क्या करें...मजबूरी है। दरअसल, आवासों की दिक्कत इसलिए पैदा हुई है कि कई अफसर ट्रांसफर हो जाने के बाद भी मकान खाली नहीं कर रहे। संपदा विभाग ने उन्हें कई बार नोटिस सर्व कर चुका है। फिर भी कोई सुनवाई नहीं हो रही। दूसरी वजह है...देवेंद्र नगर कालोनी में राजनीतिज्ञों को भी आवास आबंटन किया जाना। हालांकि, पिछली सरकार में इसकी शुरूआत हो गई थी। सबसे पहिले वहां चरणदास महंत और स्व0 नंदकुमार पटेल को आवास दिया गया। अब संख्या और बढ़ गई है। ऐसे में, किल्लत तो होगी ही। 

सैल्यूट या नमस्ते!

राज्य सरकार ने सूबे में नया प्रयोग करते हुए सीनियर आईपीएस दिपांशु काबरा को जनसंपर्क आयुक्त की कमान सौंपी है। चूकि सूबे में यह पहली बार हुआ है लिहाजा लोगों का चौंकना स्वाभाविक था। और शायद इसीलिए दिपांशु की पोस्टिंग पर खूब चुटकी ली जा रही। जनसंपर्क अधिकारियों से लोग पूछ रहे आपलोग नए साब को नमस्ते ठोकते हो या सैल्यूट। मजाक भी चल रहा...अब बंदूक के साये में कलम...। हालांकि, छत्तीसगढ़ में पहली बार हुआ है। दीगर राज्यों के लिए यह नया नहीं है। पड़ोसी या यों कहें कि अपने पुराने राज्य मध्यप्रदेश में आशुतोष प्रताप सिंह दूसरी बार डीपीआर हैं। 2010 बैच के आशुतोष को सीएम शिवराज सिंह ने मुख्यमंत्री की अपनी तीसरी पारी में डीपीआर बनाया था। बाद में कमलनाथ ने उन्हें हटा दिया। मगर शिवराज फिर सत्ता में आए तो आशुतोष को दूसरी बार जनसंपर्क की कमान सौंप दी। दिपांशु काबरा के बैचमेट बृजेश सिंह महाराष्ट्र में पूरे चार साल जनसंपर्क प्रमुख रहे। दिपांशु को सरकार की छबि चमकाने वाले विभाग की जिम्मेदारी सौंपने के पीछे समझा जाता है मीडिया से उनके फेंडली टर्म एक वजह होगी।  

आईपीएस की पोस्टिंग

अविभाजित मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह ने आईपीएस अधिकारियों को दीगर विभागों में पोस्ट करना शुरू किया था। याद होगा, तब कई आईपीएस जिला पंचायतों में सीईओ बनाए गए थे तो विभागों के प्रमुख भी। लेकिन, छत्तीसगढ़ बनने के बाद आईएफएस अधिकारियों ने पोस्टिंग में आईपीएस अफसरों को किनारे कर दिया। दिपांशु अगर जनसंपर्क में कामयाब रहे तो आईपीएस अधिकारियों के पुलिस के इतर दूसरे विभागों में भी पोस्टिंग के विकल्प खुलेंगे। जाहिर है, इससे पुलिस वाले प्रसन्न होंगे।  

ये कैसी कार्रवाई?

बिलासपुर में पुलिस अधिकारियों के बियर-बार में हंगामा और मारपीट मामले में मुख्यमंत्री की नाराजगी के बाद दो महिला डीएसपी की रवानगी डाल दी गई। मगर आश्चर्यजनक तौर पर एक महिला सीएसपी को न केवल बख्श दिया गया। बल्कि, कप्तान ने ईनाम देते हुए सीएसपी को चार और थाने की जिम्मेदारी सौंप दी। सवाल उठता है, आखिर न्याय में ये दोहरा मापदंड क्यों? अगर मंत्री पुत्रों को जात-भाई का संबंध निभाना था तो फिर बाकी दोनों के खिलाफ कार्रवाई क्यों?

कांग्रेस के कमलप्रीत

पिछले हफ्ते कांग्रेस के जनरल सिकरेट्री वेणुगोपाल ने एक के बाद एक कई आदेश निकाले। एक रोज तो तीन-तीन। ठीक उसी तरह जैसे बैक-टू-बैक आदेश जीएडी सिकरेट्री डॉ0 कमलप्रीत सिंह निकालते हैं। वेणुगोपाल का आदेश देख कांग्रेसी चुटकी लेने से नहीं चूके....कांग्रेस के कमलप्रीत सिंह बन गए हैं वेणुगोपाल।

इत्तेफाक ऐसा भी

भले ही ये इत्तेफाक हो सकता है....मगर इस पर लोग खूब मजे ले रहे हैं। दरअसल, झारखंड के बॉडर स्टेट जशपुर में कलेक्टर भी अग्रवाल और एसपी भी अग्रवाल हो गए हैं। सरकार ने पहले विजय अग्रवाल को एसपी बनाकर भेजा फिर रितेश अग्रवाल को कलेक्टर। हालांकि, टेम्परामेंट के मामले में दोनों एक दूसरे से विपरीत हैं। मगर काम और ऑनेस्टी में मिलता-जुलता माना जा सकता है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. वो कौन आईपीएस अधिकारी हैं, जिन्हें सर्विस से बर्खास्त किया जा सकता है?

2. समाज कल्याण विभाग के कथित घोटाले में अफसरों को राहत मिली है या उलझनें बढ़ी है?

शनिवार, 2 अक्तूबर 2021

माथे पर लिखा…सीएम

 

संजय के दीक्षित
तरकश, 3 अक्टूबर 2021

पंजाब के घटनाक्रम से फिर ये बात स्थापित हो गई है कि लाख मशक्कत कर लें, सीएम जैसा पद मुकद्दर में है तभी मिलेगा। सिद्धू के साथ आखिर क्या हुआ…वो साल भर से ताली ठोक रहे थे मगर जब मुख्यमंत्री बनने की बारी आई तो चरणजीत सिंह चन्नी यकबयक प्रगट होकर कुर्सी पर बैठ गए। छत्तीसगढ़ में 2003 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी सबने देखा…दिलीप सिंह जूदेव सीएम के रेस में सबसे आगे थे और जाहिर है वे सीएम बनते भी। मगर तकदीर देखिए, चुनाव से ऐन पहिले ट्रेप में फंस गए। रमेश बैस भी अगर चुनाव से पहले केंद्रीय राज्य मंत्री का पद छोड़कर छत्तीसगढ़ आने के लिए तैयार हो गए होते तो रमन सिंह 15 साल सीएम रहने का रिकार्ड नहीं बना पाते। सो, माथे पर लिखा होना जरूरी है।

नाम या बदनाम…?

कांग्रेस नेता एवं पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने कांग्रेस शासित राज्यों में चल रही सियासी तनातनी पर एक डिबेट में थे। उन्होंने पंजाब, राजस्थान का नाम लेने के बाद माथे के नसों को सिकोड़ते हुए बोले, झारखंड के बगल में वो कौन सा राज्य है…एंकर बोली, छत्तीसगढ़। नटवर बोले…हां, वहीं। ठीक है नटवर की उमर हो गई है…ऐसे में याददश्त क्षीण हो जाती है। लेकिन, इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा कि छत्तीसगढ़ के बारे में बाहर में उतना नहीं पता, जितना 21 साल में होना था। दरअसल, विद्याचरण शुक्ल के कद जैसा छत्तीसगढ़ में कोई दुजा शख्सियत हुआ नहीं, जिसके कारण छत्तीसगढ़ को जाना जाए। अभी सियासी टकराव और सुप्रीम कोर्ट के नौकरशाहों तथा पुलिस अधिकारियों पर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी से छत्तीसगढ़ जरूर कुछ चर्चा में है। नेशनल लेवल पर ढाई-ढाई साल के फार्मूले को लेकर पंजाब, राजस्थान के साथ छत्तीसगढ़ की भी चर्चा सरगर्म है। तो उधर, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस वी रमन्ना ने छत्तीसगढ़ के एक आईपीएस के प्रकरण में सरकारों और नौकरशाहों के गठजोड़ पर तल्ख टिप्पणी की है। जाहिर है, इस खबर को सुर्खियां मिलनी ही थी। अब इसको नाम बोलें या….।

महिला आईपीएस ज्यादा काबिल

छत्तीसगढ़ के 28 जिलों में सिर्फ दो महिला एसपी हैं। पारुल माथुर और भावना गुप्ता। जांजगीर जैसा बड़ा जिला करने के बाद फिलवक्त गरियाबंद जिले की कप्तान हैं। इससे पहले भी कमोवेश यही स्थिति रही है। दो-एक या जीरो…। कम ही मौका रहा, जब एक साथ सूबे में दो महिला एसपी रहीं। पारुल और नीतू कमल। नीतू फटाफट चार जिलों की कप्तानी करके डेपुटेशन पर सीबीआई चली गईं। दूसरा अभी सूरजपुर एसपी हैं भावना गुप्ता। महिला एसपी का प्रतिनिधित्व कम होने की प्रमुख वजह यह है कि छत्तीसगढ़ के आईपीएस कैडर में महिलाओं को बेहद टोटा है। सीनियर लेवल में सिर्फ नेहा चंपावत। वो भी डीआईजी रैंक की। आईजी, एडीजी में कोई नहीं। पारुल माथुर पिच पर डटी हुई हैं। पहले बेमेतरा एसपी रहीं। उसके बाद रेलवे एसपी फिर मुंगेली, जांजगीर होते हुए गरियाबंद। भावना का सूरजपुर पहला जिला है। जबकि, दिल्ली के पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना ने हाल ही में दिल्ली में अपराधों का विवेचना कराया था, तो उन्हें पता चला कि जिन दो जिलों में महिला कप्तान हैं, वहां अपेक्षाकृत क्राइम पर कंट्रोल हुआ है। इसको देखते हुए उन्होंने तीन और जिलों को महिला आईपीएस के हवाले कर दी है। यानी डीसीपी अपाइंट किया है। याने दिल्ली के 13 में से पांच जिलों में अब महिला डीसीपी हो गई हैं।

कलेक्टरी की छूटी ट्रेन

सरकार ने राजेंद्र कटारा को बीजापुर का कलेक्टर बनाकर 2013 बैच को क्लोज कर दिया। लेकिन, एमबीबीएस करके आईएएस में आए डॉक्टर जगदीश सोनकर की ट्रेन छूट गई। उनको छोड़कर सरकार ने 2014 बैच चालू कर दिया। हालांकि, एकाध बार पहले भी ऐसा हुआ है। 2013 के विधानसभा चुनाव के दौरान 2008 बैच की शम्मी आबिदी की बजाए सरकार ने 2008 बैच के भीम सिंह को धमतरी का कलेक्टर बना दिया था। लेकिन, वो चुकि चुनाव के पहले नाइट वाचमैन की तरह की नियुक्ति थी, इसलिए उसमें कोई अन्यथा लेने जैसा कुछ नहीं था। लेकिन, जगदीश सोनकर का मामला जुदा है। हालांकि, आरआर याने डायरेक्ट आईएएस को कम-से-कम एक जिले की कलेक्टरी तो मिलती है। अब देखना है कि उन्हें कब मौका मिलता है।

2014 बैच का खाता

पिछले सप्ताह तरकश में एक खबर थी…दीगर राज्यों में 2015 बैच के आईएएस कलेक्टरी में दूसरा जिला कर रहे हैं और छत्तीसगढ़ में 13 बैच की वेटिंग खतम नहीं हो रही…। सरकार ने अगले दिन याने सोमवार शाम आदेश निकालकर 2014 बैच का खाता खोल दिया। 6 आईएएस के बैच में कुंदन सिंह सबसे उपर थे। सीनियरिटी के हिसाब से उन्हें सबसे पहले मौका मिला। कुंदन के ओपनिंग बैट्समैन के रूप में पिच पर उतरने के बाद बाकी पांच की उम्मीदें भी अब बढ़ गई है। आखिर कलेक्टरी करना आईएएस का सबसे बड़ा सपना जो होता है।

हेमूनगर की पुनरावृत्ति?

बिलासपुर शहर के हेमूनगर में 97 में एक बड़ी डकैती की वारदात हुई थी। उसमें डकैतों ने लूटपाट के साथ दो लोगों को मार डाला था। तब मध्यप्रदेश का समय था और बिलासपुर के एसपी थे शैलेंद्र श्रीवास्तव। घटना के चार दिन बाद सीएम दिग्विजय सिंह को बिलासपुर आना था। सो, पुलिस ने सीएम के दौरे से एक दिन पूर्व चार युवकों के चेहरों को काले कपड़े से ढक कर मीडिया के सामने पेश कर दिया…यही हैं आरोपी। ये चारों आरोपी छह महीने के भीतर कोर्ट से बरी हो गए। क्योंकि, उनके खिलाफ पुलिस के पास कोई साक्ष्य था नहीं। इसी तरह की कानाफूसी लैलूंगा डबल मर्डर केस में हो रही है। पुलिस ने नाबालिग लड़कों को पकड़ कर प्रेस कांफ्रेंस कर दिया। लेकिन, परिवार वालों को पुलिस की थ्योरी पर यकीन नहीं है। इस संदर्भ में फेमिली ने सीएम से मुलाकात की है। वाकई इस केस में कई सवाल अनुतरित हैं। अगर 25 लाख की लूट हुई तो बरामद 75 हजार क्यों हुआ? फिर ये 25 लाख तो परिवार वालों का फिगर है। बताने वाले तो और बहुत कुछ बता रहे हैं। असल में, इंकम टैक्स का लोचा भी तो है। परिवार वालों की विवशता समझी जा सकती है। रायगढ़ पुलिस को उनके सवालों का जवाब देना चाहिए। वरना, लोग हेमूनगर जैसी बातें करने लगेंगे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत ऐसा क्यों बोल रहे…ना काहू से दोस्ती, ना काहू से वैर?
2. विधायकों के पांचों उंगली घी में और…ऐसा क्यों कहा जा रहा है?

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