शनिवार, 11 मई 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: 15% निकम्मे आईएएस!

 तरकश, 12 मई 2024

संजय के. दीक्षित

15 परसेंट निकम्मे आईएएस!

मंत्रालय में हाजिरी लगाने के लिए जब से बायोमेट्रिक सिस्टम लगाने की कोशिशें शुरू हुई हैं, आईएएस अफसरों के हाथ-पांव फुल गए हैं। अफसरों की एक लॉबी प्रेशर बना रही कि किसी भी सूरत में बायोमेट्रिक वाला मामला पेंडिंग में चला जाए। इसीलिए, भांति-भांति के कुतर्क दिए जा रहे हैं...कोई आरटीआई में उनका अटेंडेंस निकाल लेगा तो हमारी फजीहत हो जाएगी...हमारे पास दो-दो, तीन-तीन प्रभार होते हैं...कभी इस आफिस में, कभी उस ऑफिस में जाना होता है तो हमारी हाजिरी कैसे लगेगी? उधर, चीफ सिकरेट्री ने रिव्यू कर जीएडी और सुशासन विभाग को गो कर दिया है। जाहिर है, चीफ सिकरेट्री जीएडी के हेड होते हैं। अफसरों को यही तकलीफ है कि सुनील कुमार जैसे तेज-तर्रार सीएस ने ऐसा कुछ नहीं किया तो अमिताभ जैन हमलोगों को क्यों फंसा रहे हैं। अलबत्ता, पूरे सिस्टम में 15 परसेंट ही ऐसे आईएएस हैं, जिनके न मंत्रालय आने का टाईम है और न जाने का। इनमें से कई 12 बजे के बाद ही मंत्रालय या इंद्रावती भवन पहुंचते हैं और तीन बजे के पहले घर पहुंचकर खाना खाकर सो जाते हैं। जिस दिन सीएस की कोई मीटिंग या फिर दिल्ली की कोई वीसी हुई तभी वे मंत्रालय में दिखेंगे वरना...। ये वे अफसर हैं, जो विधानसभा सत्र के दौरान न मंत्रालय में होते हैं और न विधानसभा में। पीए का रटारटाया जवाब मिलेगा, साब विधानसभा गए हैं। कोई काम बताइये तो टका-सा जवाब...मालूम नहीं, विधानसभा चल रहा है। जीएडी के एक अफसर ने बताया...इन 15 परसेंट शाही मिजाज वाले ब्यूरोक्रेट्स की देखादेखी 35 परसेंट अफसर और बिगड़ गए। बाकी करीब 50 परसेंट अफसर आज भी टाईम पर ऑफिस आते हैं और ईमानदारी से ड्यूटी निभाते हैं। बायोमेट्रिक उन 15 परसेंट निकम्मे अफसरों के लिए लगाया जा रहा है। वे ठीक हो जाएंगे, तो पूरा सिस्टम दुरूस्त हो जाएगा।

अफसरों से ज्यादती?

ब्यूरोक्रेसी में ही यह मानने वालों की कमी नहीं कि छत्तीसगढ़ के आईएएस सेंट्रल डेपुटेशन पर नहीं जाना चाहते क्योंकि, दिल्ली में काम करना पड़ता है। आप उंगलियों पर गिन कर देख लीजिए, पुराने समयों में पांच आईएएस भी डेपुटेशन पर नहीं होते थे। दरअसल, दिल्ली में सिकरेट्री भी बायोमेट्रिक में अपना थंब लगाते हैं। जबकि, वे राज्यों के चीफ सिकरेट्री के समकक्ष़्ा होते हैं। वहां नौ बजे दफ्तर पहुंचने का टाईम है, लौटने का नहीं। जो अफसर अभी दिल्ली से लौटकर आए हैं, उनसे आप पूछ लीजिए वहां किस तरह काम होता है। कलेक्टर लेवल के अफसरों को गाड़ी शेयर करके ऑफिस आना पड़ता है। ज्वाइंट सिकरेट्री को एक गाड़ी मिलती है। मेम साहबों और बच्चों के लिए कोई व्हीकल नहीं। जबकि, छत्तीसगढ़ में किसी भी आईएएस के पास तीन से कम गाड़ी नहीं होती। अब सुनने में आ रहा कि बायोमेट्रिक सिस्टम लगाने के बाद जीएडी गाड़ियों की पड़ताल कराने वाली है...किसके पास कितनी गाड़ियां हैं। खजाने की स्थिति को लेकर वित्त महकमा भी चिंतित है। असल में, विभागीय पुल से अफसरों को एक ही गाड़ी मिलती है, उनके विभाग में बोर्ड और निगम होते हैं, उनसे 50 हजार से लेकर 75 हजार तक किराये पर वे गाड़ियां मंगवा लेते हैं। इसका बोझ आखिर जनता पर ही पड़ता है। मगर ये जीएडी की ज्यादती होगी...दिल्ली की बात अलग है। दो इंच जमीन से उपर रहने वाले नौकरशाहों से एक तो हाजिरी लगवाई जाएगी, और उपर से गाड़ियों की निगरानी, तो फिर क्या मतलब उनके आईएएस बनने का? आखिर कुछ ही लोग तो जनसेवा या कुछ कर गुजरने के लिए आईएएस बनते हैं, बाकी को आप देख ही रहे हैं...।

मंत्री होने का मतलब?

नेताजी लोग मंत्री आजकल जनसेवा के लिए लोग नहीं बनते। शपथ लेते ही एकमात्र ध्येय बन जाता है लूट-खसोट। 24 घंटे इसी गुनतारे में...कहां से कितना निकाल लें। अब देखिए न, पिछली सरकार के एक मंत्रीजी विभाग में लूटपाट मचाए ही जिस जिले का भी उन्हें प्रभारी मंत्री बनाया गया, उनके बेटे ने वहां डीएमएफ के सप्लाई का पूरा काम ले लिया था। इससे भी मन नहीं भरा तो मंत्रीजी ने अपने जिले में बंगलादेशी रिफ्यूजियों को सरकार से मिली जमीन को भी छल-कपट करके हड़प लिया। दरअसल, 1971 में सरकार ने जब जमीन दिया था, तब वह इलाका निर्जन था। मगर 50 साल में अब वो शहर के प्राइम लोकेशन पर आ गया है। कई बड़े बिल्डरों की नजरें उन जमीनों पर थी। मगर ऐसे काम की जगह पर पहला अधिकार मंत्रीजी का बनता था। सो, उन्होंने...। जबकि, बंगलादेश से आए लोगों को जीवन यापन के लिए इस शर्त पर जमीन दी गई थी कि सिर्फ गंभीर बीमारी के इलाज के केस में ही जमीन बेच सकते हैं। मगर मंत्रीजी के पास पावर था...उनके लोगों ने जोर-जबर्दस्ती कर डॉक्टरों से गंभीर बीमारी का पर्चा बनवाया। फिर आनन-फानन में कलेक्टरों से अनुमति दिलवा अपने रिश्तेदारों के नाम पर रजिस्ट्री करवा ली। चूकि बड़ा लैंड स्कैम था, इसलिए ईडी को शिकायत की गई। ईडी ने पिछले दिनों पूर्व मंत्री के यहां छापा मारा। छापे में काफी कुछ मिल भी गया है। यही वजह है कि कांग्रेस पार्टी ने पूर्व मंत्री को लोकसभा का टिकिट नहीं दिया। और बीजेपी इसी इंतजार में थी कि टिकिट दे कि जमीन घोटाला ओपन कर दिया जाए।

बीजेपी की वाशिंग मशीन

उपर में जिस पूर्व मंत्री के लैंड स्कैम का जिक्र किया गया है, वे जोगीजी के प्रिय रहे ही, पिछली सरकार में भी काफी प्रभावशाली रहे। मगर अब घपले-घोटाले में इस कदर घिर गए हैं कि उन्हें जेल जाने से बचने का एक ही रास्ता दिख रहा है बीजेपी प्रवेश। इसके लिए उनके करीबी लोगों ने कोशिशें भी शुरू कर दी है। बीजेपी के पास भी उस इलाके में कोई ढंग का नेता नहीं है। एक हैं तो उन्हें कोई पसंद नहीं करता। ऐसे में, बीजेपी को भी उस क्षेत्र में एक नेता की जरूरत है, जो जमीन पर रहे...महत्वाकांक्षी न हो। मगर दिक्कत यह है कि पूर्व मंत्री का बीजेपी प्रवेश हुआ तो छत्तीसगढ़ में भी वाशिंग मशीन से दाग धोने वाला आरोप मुखर हो जाएगा।

आईएएस की जांच

आचार संहिता के दौरान ट्रांसफर-पोस्टिंग के फेर में पड़े एक आईएएस की मुश्किलें बढ़ सकती है। सरकार के निर्देश पर स्पेशल सिकरेट्री चंदन कुमार ने जांच शुरू कर दी है। प्रारंभिक विवेचना में कई गंभीर तथ्य उजागर हुए हैं। ट्रांसफर में नियम-कायदों की धज्जियां उड़ा दी गई। देखना है, जांच रिपोर्ट मिलने के बाद सरकार इस मामले में क्या कदम उठाती है।

निर्वाचन आयोग में पोस्टिंग-1

फर्स्ट वीक में आचार संहिता समाप्त होने के बाद सरकार को पहली पोस्टिंग राज्य निर्वाचन आयुक्त की करनी होगी। यह पद पिछले सात महीने से खाली है। कायदे से संवैधानिक पदों को खाली नहीं रखा जा सकता। उपर से तब, जब छत्तीसगढ़ में चार महीने बाद नगरीय निकायों के चुनाव होने हैं। रिटायर आईएएस ठाकुर राम सिंह आखिरी राज्य निर्वाचन आयुक्त थे। वे कार्यकाल का रिकार्ड बनाकर पिछले साल नवंबर में विदा हुए। उन्हें रमन सिंह की सरकार ने इस आयोग में ताजपोशी की थी। मगर आश्चर्यजनक तौर पर भूपेश बघेल सरकार ने छह साल का टेन्योर पूरा होने के बाद छह-छह महीने का तीन एक्सटेंशन दिया। चूकि नवबंर में विधानसभा चुनाव के आचार संहिता के दौरान उनका तीसरा छह महीने का एक्सटेंशन पूरा हुआ, इसलिए सरकार उनका कार्यकाल बढ़ा नहीं सकी। और तब से यह पद खाली है। इस साल नवंबर में सूबे में नगरीय सरकार का चुनाव है। सितंबर से चुनावी प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इससे पहले मतदाता सूची तैयार किया जाएगा। लोकल चुनाव में सबसे बड़ा टास्क मतदाता सूची को फायनल करना होता है। सबसे अधिक इसी में खेला होता है, सारे नेता चाहते हैं अपने वार्डों में बाहरी लोगों का नाम जुड़वा दें, जिससे उनकी जीत सुनिश्चित हो जाए। चीफ सिकरेट्री अमिताभ जैन को इसके लिए कुछ करना चाहिए, ताकि शीघ्र इस पद पर नियुक्ति हो जाए। वरना, जितनी देरी होगी, मुश्किलें उतनी बढ़ेंगी।

निर्वाचन आयोग में पोस्टिंग-2

राज्य निर्वाचन आयुक्त का पद वैसे तो मुख्य सचिव रैंक का है। अधिकांश राज्यों में रिटायर चीफ सिकरेट्री को इस पद पर बिठाया जाता है। आईएएस अधिकारियों को स्टेट इलेक्शन कमिश्नर बनाने का मतलब यह होता है कि जिलों में कलेक्टर पोस्टिंग के दौरान उन्हें चुनाव कराने का अनुभव होता है। इसलिए, समझा जाता है कि नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव कराने में उन्हें दिक्कत नहीं जाएगी। बहरहाल, छत्तीसगढ़ में सिर्फ एक बार रिटायर चीफ सिकरेट्री शिवराज सिंह राज्य निर्वाचन आयुक्त रहे हैं। वरना, प्रमुख सचिव और सचिव स्तर से रिटायर आईएएस ही इस पद पर बिठाए गए। सबसे पहले डॉ0 सुशील त्रिवेदी, उनके बाद पीसी दलेई और फिर ठाकुर राम सिंह। इस समय सरकार को दिक्कत जाएगी कि इस समय कोई ब्यूरोक्रेट्स रिटायर नहीं है। हालांकि, पीसी दलेई ने रिटायरमेंट से छह महीने पहले वीआरएस लेकर इस पद पर अपनी पोस्टिंग करा ली थी। अब देखना है कि आगे रिटायर होने वाले कोई अफसर वीआरएस लेता है या फिर पहले रिटायर किसी अफसर को यह जिम्मेदारी मिलती है।

जीत का रिकार्ड

छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों में किसको कितनी सीट मिलेगी, इसको लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। मगर एक दावा दिलचस्प है...वह है छत्तीसगढ़ से जीत का रिकार्ड बनने का। रायपुर लोकसभा से बीजेपी के बृजमोहन अग्रवाल सबसे बड़ी लीड अगर ना भी मिले तो भी टॉप फाइव में रहने की अत्यधिक संभावना है। इस दावे में दम इसलिए प्रतीत हो रहा कि बृजमोहन जीत के लिए चुनाव नहीं लड़े। शुरू से ही उन्होंने लीड पर टारगेट किया। उनके समर्थकों का कहना है कि भैया का जादू कांग्रेसी इलाकों में भी इस बार दिखेगा। क्योंकि, कांग्रेस के भीतर भी मोहन भैया का अच्छा प्रभाव है। फिर टिकिट मिलते ही माउथ पब्लिसिटी चालू हो गई थी, भैया रिकार्ड मतों से जीतेंगे। फिर, सिर्फ रायपुर दक्षिण ही नहीं, पूरे रायपुर में उनका प्रभाव है। जिनको वे मदद किए हैं या शादी-समारोहों, गमी में शरीक हुए हैं, उनके विधानसभा सीट से बाहर भी ऐसे लोगों की तादात काफी है। सो, ऐसे लोग बृजमोहन के लिए कार्यकर्ता से भी बढ़कर काम किए हैं। बृजमोहन के समर्थकों का कहना है, रायपुर संसदीय सीट पर करीब 17 लाख वोटिंग हुई है...मोहन भैया करीब सात लाख लीड से जीतेंगे। चलिए, चार जून को पता चलेगा कि रायपुर से बृजमोहन क्या वाकई जीत का रिकार्ड बनाएंगे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. छत्तीसगढ़ में लोकसभा चुनाव का रिजल्ट 9/2 रहेगा या 11/0?

2. इन चर्चाओं में कितनी सत्यता है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद चार नए मंत्री शपथ लेंगे?


शुक्रवार, 10 मई 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: वोटर चुप, परसेप्शन हॉवी...

 तरकश, 5 मई 2024

संजय के. दीक्षित

वोटर चुप, परसेप्शन भारी

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव 2023 के दौरान जिस तरह परसेप्शन हॉवी रहा, कुछ इसी तरह की स्थिति लोकसभा चुनाव में भी दिखाई पड़ रही है। विधानसभा चुनाव में कोई भी यह कहने की स्थिति में नहीं था कि बीजेपी सरकार बना लेगी। बीजेपी के पैरोकार भी यही कहते रहे...38 से 40 तक पहुंच जाएगी तो बाकी काम अमित भाई साब कर लेंगे। अलबत्ता, बीजेपी 50 क्रॉस कर जाएगी...पार्टी के बड़े नेताओं को ऐसा कभी सपना भी नहीं आया होगा। सबसे बड़ा परसेप्शन किसानों और छत्तीसगढ़ियावाद को लेकर था। तब ये बोलने वालों की भी कमी नहीं थी कि कांग्रेस को 68 नहीं, पर 50 से 53 सीट मिलने में कोई दिक्कत नहीं होगी। मगर जब नतीजे आए तो बड़े-बड़े सियासी पंडितों के पूर्वानुमान फेल हो गए तो परसेप्शन धरे रह गए। लोकसभा चुनाव में भी परसेप्शन हॉवी है। लोग उंगलियों पर बता दे रहे...इन सीटों पर लड़ाई है, ये-ये सीटें टफ हैं। जबकि, वोटर खामोश है। दरअसल, अब के वोटर मुखर नहीं, मगर किसको वोट देना है, वह पहले से मन बना लेता है। 2018 के ऐन विधानसभा चुनाव के समय कांग्रेस पार्टी के भीतर जिस तरह की ऑडियो, वीडियो की घटनाएं हुई थीं, उससे लगा था कि कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ सकती है। मगर रिजल्ट आया तो 15 साल की सरकार वाली बीजेपी 15 सीट पर सिमट गई। कहने का आशय यह है कि मुठ्ठी भर लोग जैसा परसेप्शन बनाते हैं, छत्तीसगढ़ में वह नतीजों में नहीं उतर पाता। लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी को भी यकीन नहीं था कि उसे 11 में नौ सीटें मिल जाएगी। सो, यह मानकर चलिए के नतीजे परसेप्शन से इतर आएंगे।

कार्यकर्ता नहीं, पब्लिक

बीजेपी भले ही पांच साल तक सत्ता से बाहर रही। मगर लोकसभा चुनाव में जो स्थिति दिखाई पड़ रही है, उस पर बीजेपी के एक सीनियर नेता ने दिलचस्प टिप्पणी की। उन्होंने कहा, जनता ही कार्यकर्ता की भूमिका निभा रहे हैं। दरअसल, 15 साल सत्ता में रही बीजेपी के कार्यकर्ता अभी भी जमीन पर नहीं आए हैं। पार्टी में कार्यकर्ताओं की नई पौध आई नहीं, और पुराने इतने मोटा गए हैं कि उन्हें अपने काम-धंधे से फुरसत नहीं। लिहाजा, बड़े नेता चुनाव में जरूर मेहनत कर रहे हैं, मगर कार्यकर्ताओं में वो बात नहीं, जैसा बीजेपी कैडर में होता है।

अफसरों का दम

गुड गवर्नेंस का काम उपर से प्रारंभ होना चाहिए...तभी वह प्रभावशाली ढंग से नीचे लागू हो पाएगा। इस बात का संदर्भ छत्तीसगढ़ के मंत्रालय में अधिकारियों, कर्मचारियों की हाजिरी दर्ज करने बायोमेट्रिक सिस्टम लगाए जाने से है। सरकार की मंशा अच्छी है। छत्तीसगढ़ को बने 24 बरस हो गए। मगर दुर्भाग्य की बात यह कि उपर से लेकर नीचे तक...सूबे में वर्किंग कल्चर नहीं बन पाया। न मंत्रालय में अफसर सही समय पर आते हैं और न जिलों में कलेक्टर, एसपी। जब बड़े जिले होते थे तो कलेक्टर, एसपी सहज रूप से उपलब्ध होते थे मगर अब एक-एक, दो-दो ब्लॉकों के जिले होने के बाद भी कलेक्टर, एसपी को ढूंढते रह जाइयेगा। वे सिर्फ सप्लायरों और ठेकेदारों के लिए सुलभ होते हैं। खैर बात मंत्रालय और बायोमेट्रिक सिस्टम की। मंत्रालय में पहले भी बायोमेट्रिक लगाने का प्रयास हुआ मगर कर्मचारियों के विरोध की वजह से उसका क्रियान्वयन नहीं हो पाया। सुनील कुमार जैसे अब तक के सबसे तेज-तर्रार चीफ सिकरेट्री के समय अफसर अपने आप समय पर आने लगे थे मगर कर्मचारियों का वे भी कुछ नहीं कर पाए। दरअसल, मंत्रालय के कर्मचारियों का तगड़ा यूनियन हैं। कह सकते हैं...अधिकारी भी उनसे घबराते हैं। क्योंकि, वे सबका कच्चा-चिठ्ठा उनके पास हैं। अब सरकार ने बायोमेट्रिक लगाने का फैसला किया है, तो अफसरों को इसके लिए दम दिखाना होगा। क्योंकि, काम और प्रदेश का विकास तो बाद की बात है। पहले मुलाजिम आफिस में टाईम पर आएं तो। और जब प्रदेश के सबसे बड़े पावर सेंटर में बायोमेट्रिक सिस्टम नहीं लग पाएगा तो फिर नीचे के आफिसों के लिए उसे कैसे जायज ठहराया जा सकता है?

मार्कफेड नहीं, मालफेड

मार्कफेड के एक एमडी होते थे टीएस छतवाल। राज्य निर्माण के दौरान पावरफुल पदों पर रहे। पीडब्लूडी सिकरेट्री भी। मगर 2004 में हमने इस शीर्षक से एक खबर लगाई थी...बोरियों के सरदार। छतवाल के खिलाफ जांच हुई। डीई भी। इंक्रीमेंट वगैरह रोकने का भी कुछ हुआ था। इस पुराने दृष्टांत को लिखने का मकसद यह बताना है कि मार्कफेड में घपले-घोटाले आज से नहीं सालों से चल रहे हैं। अतीत में कई आईएएस अधिकारी मार्कफेड के एमडी रहते जांच के शिकार हुए। उन्हें विभागीय जांच का सामना करना पड़ा। ये जरूर है कि एमडी रहे किसी अफसर की गिरफ्तारी पहली बार हुई है। मनोज सोनी की। मार्कफेड के बारे में अधिकांश लोगों को पता नहीं होगा कि छत्तीसगढ़ का यह सबसे बड़ा और बोरियो में नोट बटोरने वाला बोर्ड है। साल में 50 हजार करोड़ से ज्यादा का कारोबार होता है। इस बोर्ड के दो-एक एमडी को छोड़ दें, तो अधिकांश यहां से 25-50 करोड़ बटोर कर ही निकले। सीधा सा फंडा है... प्रमोटी आईएएस गिरे हालत में 25 खोखा और डायरेक्ट वाले 40 से 50। ट्रांसपोर्ट महकमे की तरह मार्कफेड में बोरियों में पैसा आता है। ईडी की रिपोर्ट को मानें तो राईस मिलरों के प्रोत्साहन राशि की आधी किस्तों में ही 175 करोड़ का खेला हो गया तो धान खरीदी, बारदाना यानी बोरियो की खरीदी, ट्रांसपोर्टिंग समेत मार्कफेड में ऐसे कई बड़े होल हैं, जहां से बोरियों में पैसे निकलते हैं। कायदे से मार्कफेड का नाम बदलकर मालफेड कर देना चाहिए। याने मार्केटिंग फेडरेशन नहीं, माल फेडरेशन इसका सही नाम होगा।

नया रायपुर गुलजार-1

नई सरकार आने के बाद नया रायपुर की बसाहट की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। सुना है, मंत्री, मिनिस्टर अगले छह महीने में नया रायपुर शिफ्थ हो जाएंगे। वहीं, कई अफसर भी अब नया रायपुर जा रहे हैं। एसीएस सुब्रत साहू इसी हफ्ते नवा रायपुर जा रहे हैं। नया रायपुर में सबसे पहले मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी रीना बाबा कंगाले गई थीं। उनके बाद आईपीएस सदानंद। फिर आरपी मंडल गए। मंडल तब चीफ सिकरेट्री थे। उन्होंने काफी प्रयास किया मगर बाकी अफसरों को ले जाने में सफल नहीं हो पाए। नवा रायपुर में आर. संगीता, सुनील जैन, चंदन कुमार, पुष्पेंद्र मीणा, नीलम नामदेव एक्का जैसे कई अफसर शिफ्ट हो चुके हैं। जाहिर है, नया रायपुर के गुलजार होने को लेकर अब उम्मीदें बन रही हैं।

नया रायपुर गुलजार-2

छत्तीसगढ़ में बीजेपी की नई सरकार आने के बाद एनआरडीए ने नया रायपुर को आईटी हब बनाने की कोशिशें शुरू कर दी है। अभी पिछले दिनों दो आईटी कंपनियों के साथ सरकार का एमओयू हुआ, उनके लिए सीबीटी बिल्डिंग में फर्निशिंग का काम प्रारंभ हो चुका है। खबर है, एकाध महीने में इन दोनों आईटी कंपनियों में वर्किंग शुरू हो जाएगी। दोनों में करीब एक हजार इम्प्लाई की भर्ती की जा रही है। यकबयक एक हजार लोगों की आमदरफ्त बढ़ने से निश्चित तौर पर नया रायपुर की रौनक बढ़ेगी।

दूसरे आईपीएस अफसर

राज्य सरकार की सर्विस रिव्यू कमेटी की अनुशंसा पर अभी तक दो आईएएस और तीन आईपीएस अधिकारियों को भारत सरकार द्वारा फोर्सली रिटायर किया गया है। आईएएस में बीएल अग्रवाल और अजयपाल सिंह। आईपीएस में केसी अग्रवाल, एएम जूरी और जीपी सिंह। भारत सरकार के फैसले के खिलाफ केसी अग्रवाल और जीपी सिंह ने कैट से फरियाद की और दोनों के पक्ष में फैसला भी आया। राज्य पुलिस सेवा से आईपीएस प्रमोट हुए केसी अग्रवाल ने कैट के जरिये धमाकेदार वापसी करते हुए सरगुजा के आईजी भी बने। अब नंबर जीपी सिंह का है। वे डायरेक्ट आईपीएस हैं। नौकरी भी करीब पांच साल बची है। जाहिर है, बीजेपी गवर्नेमेंट में उनकी पोस्टिंग भी ठीकठाक ही मिलेगी।

अफसरों की तफरीह

छत्तीसगढ़ सरकार अब उच्छृंखलता बरतने वाले आईएएस, आईपीएस अधिकारियों को लेकर गंभीर हो गई है। दरअसल, अभी कुछ दिनों पहले दो जिलों के कलेक्टर, एसपी रायपुर में एक साथ मॉल में तफरीह करते पाए गए। जीएडी और पुलिस महकमे से पता किया गया तो किसी ने भी इसकी सूचना वरिष्ठ अफसरों को नहीं दी थी। याने बिना बताए मुख्यालय छोड़ा था। इसके बाद सरकार हरकत में आई। जीएडी ने आदेश जारी किया कि बिना अवकाश या सूचना दिए मंत्रालय या विभाग प्रमुख रायपुर नहीं छोड़ेगा। कलेक्टर, एसपी को जिला मुख्यालय छोड़ने से पहले सीनियर अफसरों को सूचित करना होगा। अगर अवकाश पर जा रहे तो चीफ सिकेरट्री से अनुमति लेनी होगी। यही सिस्टम भी है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. लोकसभा चुनाव में 3 ही मंत्रियों की उपस्थिति जान पड़ रही, बाकी मंत्री अपने क्षेत्र में ही क्यों सिमट गए हैं?

2. क्या वजह है कि इस बार पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह छत्तीसगढ़ पर खास फोकस किए हैं?


रविवार, 28 अप्रैल 2024

Chhattisgar Tarkash: एसपी-आईजी में टकराव!

 तरकश, 28 अप्रैल 2024

संजय के. दीक्षित

एसपी-आईजी में टकराव!

छत्तीसगढ़ के एक पुलिस रेंज के आईजी और वहां के एसपी में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। दोनों के बीच रिश्ते इतने तल्ख होते जा रहे कि अब बर्तन की टकराने की आवाजें घर से बाहर सुनाई पड़ने लगी हैं। असल में, एसपी बड़े तेज हैं...हेठा नहीं खाते। पिछली सरकार में बड़े लोगों से भिड़कर कुर्सी गंवा दिए मगर झुके नहीं। उधर, आईजी भी गड़बड़ नहीं मगर कभी बड़े जिले में काम किए नहीं, सो सबआर्डिनेट से काम कैसे लिया जाता है...डिसिजन टेकिंग का भी थोड़ा प्राब्लम है। जाहिर है, दोनों के बीच टकराव बढ़ना ही था। लिहाजा, इगो की लड़ाई इस कदर बढ़ गई है कि थर्ड पार्टी से शिकायतें करवाई जा रही हैं। सिपाही, दरोगा का एक ट्रांसफर कर रहा तो दूसरा उसे निरस्त कर दे रहा। डीजीपी अशोक जुनेजा और खुफिया चीफ अमित कुमार को कुछ करना चाहिए...समझा-बूझा ही दें। वरना, पुलिस के घर की बातें बाहर आए, ये ठीक नहीं।

सिकरेट्री की पोस्टिंग

सेंट्रल डेपुटेशन से छत्तीसगढ़ लौटे आईएएस सोनमणि बोरा को सरकार ने पोस्टिंग दे दी है। उन्हें आदिम जाति, अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग का प्रमुख सचिव बनाया गया है। इस विभाग में एमके राउत और आरपी मंडल जैसे अफसर सिकरेट्री रहे हैं। राउत चार साल, सरजियस मिंज तीन साल और डीडी सिंह ने पांच साल इस विभाग को संभाला। मगर सभी के पास अलग से दो-एक विभाग और होते थे। इसलिए, वरना...। आदिम जाति में कुछ है नहीं...क्या खाएं, क्या निचोड़े...ट्राईबल हॉस्टल में पलंग, चादर, बिस्तर खरीदी के अलावा कुछ खास नहीं। जिलों के बजट पर कलेक्टर्स कब्जा जमा लेते हैं। बहरहाल, सोनमणि को सिर्फ आदिम जाति विभाग मिला है इसलिए समझा जाता है कि अगले फेरबदल में कुछ और ऐड होगा। क्योंकि, भारत सरकार में तीन साल काम करके आए अफसर को आदिम जाति में...ये थोड़ा अटपटा लग रहा है। अब सरकार आदिम जाति विभाग में कुछ नया करने के लिए सोनमणि को लाई होगी तो फिर बात अलग है। सोनमणि प्रमख सचिव रैंक के अफसर हैं। इस लेवल पर सिर्फ दो ही अफसर हैं छत्तीसगढ़ में। निहारिका बारिक और खुद सोनमणि।

ऋचा को हेल्थ?

अगले महीने याने मई फर्स्ट वीक में एसीएस ऋचा शर्मा भी डेपुटेशन से छत्तीसगढ़ लौट रही हैं। ऋचा को हेल्थ दिए जाने की संभावना ज्यादा लग रही है। हेल्थ अभी ऋचा के ही बैचमेट मनोज पिंगुआ के पास है। रेणु पिल्ले के हटने के बाद सरकार ने मनोज को हेल्थ की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी है। मगर उनके पास गृह, जेल और वन तथा जलवायु परिवर्तन भी है। वे पहले से ओवर लोडेड थे, उसके बाद हेल्थ भी। जाहिर है, किसी भी सिकरेट्री के लिए ये तीनों बड़े विभाग संभव नहीं। वैसे भी, होम और फॉरेस्ट वाले मनोज को छोड़ना नहीं चाहेंगे। क्योंकि, वे जमीन से दो इंच उपर रहने वाले ब्यूरोक्रेट्स नहीं हैं और न ही खामोख्वाह टांग अड़ाते। सो, सभी उनसे कंफर्ट रहते हैं। बहरहाल, हेल्थ विभाग में पहले भी दो महिला अफसर सिकरेट्री रह चुकी हैं। रेणु पिल्ले, निहारिका बारिक। हेल्थ को पटरी पर लाने के लिए ऋर्चा बेस्ट च्वाइस हो सकती हैं। हेल्थ की स्थिति क्या है, ये बताने की जरूरत नहीं। दसेक साल पहले फूड की भी यही स्थिति थी। फूड को ठीक करने का काम ऋचा ने ही किया था। मार्कफेड हालांकि, सहकारिता में आता है मगर नियंत्रण फूड का रहता है। इसमें धान खरीदी और सूखत के नाम पर करोड़ों का वारा न्यारा होता था। ऋचा ने कड़ाई कर 17 परसेंट तक के सूखा को एक परसेंट पर ला दिया था। इसी तरह राईस माफियाओं पर भी अंकुश लगा दी थी। छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य महकमे को वॉट लगाने वाले अधिकारियों, डॉक्टरों और मेडिकल माफियाओं को ऋचा जैसे तेज-तर्रार अफसर ही दुरूस्त कर सकता है।

करोड़ों का खेला

कोविड के दौरान जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में अतिरिक्त आईसीयू बनाने के लिए भारत सरकार ने करीब एक हजार करोड़ का फंड दिया था। इनमें जिला अस्पतालों में 100 और मेडिकल कालेज अस्पतालों में 150 बेड बनना था। अधिकांश जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों ने आईसीयू बनाया नहीं मगर मोटे कमीशन के चक्कर में लगभग 700 करोड़ का उपकरण खरीद डाला। अब बिल्डिंग बनी नही ंतो करोड़ों के उपकरण का क्या किया जाए...कबाड़ में करोड़ों के उपकरण पड़े हुए हैं। नए मेडिल् कालेजों के लिए सरकार ने पैसे सेंक्शन किए हैं, उसके अभी भवन बने नहीं, मगर स्वास्थ्य विभाग के खटराल अधिकारी उपकरणों की खरीदी शुरू कर दिए हैं। मेडिकल माफियाओं ने छत्तीसगढ़ के हेल्थ सिस्टम को खतम कर दिया है...इसके लिए सरकार को एक्सट्रा एफर्ट करना होगा।

600 करोड़ का टेंडर कांड

एक हाई प्रोफाइल विभाग में एक आईएएस अफसर बड़ा खेला करना चाहते थे...एक ही बार में दो-तीन पुश्तों का इंतजाम हो जाए। उन्होंने इधर-उधर करके 600 करोड़ का टेंडर जारी कर दिया। अपने लोगों को काम दिलाने अपने होम स्टेट से रिश्तेदारों को भी रायपुर बुला लिया। मगर उपर में इसकी भनक लग गई। और, अफसर को टेंडर निरस्त करना पड़ गया। आचार संहिता के बाद अफसर की छुट्टी हो जाए, तो आश्चर्य नहीं।

सुंदरी शौकीन अफसर

मंत्रालय के एक अफसर का सुंदरियों का शौक जा नहीं रहा। दरअसल, मौका का फायदा उठाते हुए उन्होंने अपने महकमे में अधिकांश महिलाओं की पोस्टिंग कर लिया है। उनके विभाग के मुलाजिमों की परेशानी यह है कि जब भी साहब के कमरे में जाओ तो कोई-न-कोई अतिसुंदर लेडी मौजूद रहती है। खैर, साहब का ये पुराना शगल है। मध्यप्रदेश के समय रायपुर के पड़ोसी जिले में पोस्टेड थे। वहां एक बड़े होटल में रंगे हाथ एक महिला मुलाजिम के पति ने उन्हें पकड़ लिया था। गुस्से में उसने अफसर की पिटाई भी कर डाली थी। पत्नी की बेवफाई से पति का गुस्सा आप समझ सकते हैं, अफसर को टॉवेल में भागना पड़ा था...छत्तीसगढ़ के पुराने अधिकारी आपको बता देंगे।

कलेक्टर को फटकार

इसी स्तंभ में कुछ साल पहले एक मंत्री और कलेक्टर के बीच विवाद का जिक्र किया गया था। मामला था मध्यप्रदेश के दौर में बिलासपुर जिले का। बिलासपुर के कलेक्टर होते थे उदय वर्मा, जो बाद में भारत सरकार में कई विभागों के सिकरेट्री रहे। उस समय स्व0 अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री थे और बिलासपुर से चित्रकांत जायसवाल मंत्री। तारीख और साल याद नहीं, मगर अर्जुन सिंह का बिलासपुर दौरा था। उन्हें रिसीव करने चकरभाटा हवाई पट्टी पर कई मंत्री पहुंचे थे, उनमें चित्रकांत जायसवाल भी थे। और सीएम आएंगे तो कलेक्टर रहेंगे ही। सीएम का प्लेन लैंड करने से पहले किसी बात पर मंत्री जायसवाल कलेक्टर पर भड़क गए। कलेक्टर को यह गवारा नहीं हुआ। उन्होंने कुछ बोला तो नहीं, मगर गाड़ी में बैठ बिना सीएम की अगुवानी किए बिना लौट गए। अर्जुन सिंह मंत्री और कलेक्टर, दोनों की वर्किंग के बारे में जानते थे, इसलिए इस मामले को अनसूना कर दिया। सालों पुरानी घटना इसलिए मौजूं हो गई कि इस महीने के प्रारंभ में सूबे में बड़ी घटना हुई। इस दौरान एक पूर्व मंत्री कलेक्टर पर बुरी तरह भड़क गए। उन्होंने यहां तक कह डाला कि कार्यसमिति में कलेक्टर के मामले को उठाउंगा। बड़े नेताओं को मालूम होना चाहिए कि कलेक्टर, एसपी सिर्फ अफसर नहीं होते। वे एक संस्थान होते हैं। सो, सार्वजनिक जगहों पर उनके साथ नेताओं के इस तरह के आचरण को वाजिब नहीं ठहराया जा सकता।

अंत में दो सवाल आपसे

1. कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल होने वाले नेता अब स्थायी तौर पर इसी पार्टी में अपना ठिकाना बना लेंगे या उपयुक्त समय देखकर फिर अपने घर लौट जाएंगे?

2. छत्तीसगढ़ में वोटर खामोश है, इसका मतलब क्या है?


शनिवार, 20 अप्रैल 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: ज्वाईनिंग से पहले पोस्टिंग!

 Chhattisgarh Tarkash: तरकश, 21 अप्रैल 2024

संजय के. दीक्षित

ज्वाईनिंग से पहले पोस्टिंग!

आईएएस सोनमणि बोरा सेंट्रल डेपुटेशन से छत्तीसगढ़ लौट आए हैं। ऋचा शर्मा भी अगले महीने आ रही हैं। सामान्य प्रशासन विभाग जल्द ही सचिव स्तर पर नई पोस्टिंग आदेश जारी करेगा। इसमें इन दोनों वरिष्ठ अधिकारियों को पोस्टिंग दी जाएगी। वैसे, ऋचा को छत्तीसगढ़ में ज्वाईनिंग से पहले भी सरकार चाहे तो पोस्टिंग दे सकती है। इससे पहले भी ऐसा हो चुका है। रमन सिंह सरकार की तीसरी पारी यानी 2015 में डॉ0 आलोक शुक्ला को छत्तीसगढ़ लौटने से पहले हेल्थ और फूड जैसे बड़े विभाग का प्रिंसिपल सिकरेट्री अपाइंट कर दिया गया था। तब हमने इसी तरकश में लिखा था कि सरकार ने आलोक का लाल जाजम बिछा कर स्वागत किया। हालांकि, विधानसभा चुनाव 2008 और लोकसभा चुनाव 2009 के दौरान आलोक के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी रहते अफसरों के इतने विकेट उड़े थे कि सरकार काफी नाराज हो गई थी। गनीमत रहा आलोक शुक्ला लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद डेपुटेशन पर दिल्ली चले गए। मगर बाद में सरकार से उनके रिश्ते सुधर गए। दिल्ली में अमन सिंह से उनकी मुलाकात हुई और सारे गिले-शिकवे दूर हो गए थे। ये अलग बात है कि मधुरता ज्यादा दिन चली नहीं। कुछ महीने में ही...नॉन घोटाले के बाद सरकार और आलोक के बीच संबंध बिगड़ गए।

DGP की छुट्टी?

छत्तीसगढ़ में लगातार यह दूसरा लोकसभा चुनाव होगा, जब चुनाव आयोग ने किसी बड़े अफसर पर कार्रवाई नहीं की है। जबकि, विधानसभा चुनाव 2023 में आयोग ने दो कलेक्टर और तीन एसपी के साथ कई अफसरों की छुट्टी कर दी थी। बहरहाल, उपर में आलोक शुक्ला का जिक्र हुआ तो लोकसभा चुनाव 2009 का एपिसोड बरबस याद आ गया। उसा दौरान डॉ0 आलोक मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी थे। तब चुनाव का ऐलान होते ही बिलासपुर कलेक्टर हटा दिए गए तो उसके बाद डीजीपी विश्वरंजन को चुनाव आयोग ने खो कर अनिल नवानी को उनकी जगह बिठा दिया था। दरअसल, 2009 में विश्वरंजन का जलवा चरम पर था। डीजीपी ओपी राठौर की असामयिक मौत के बाद विश्वरंजन को आईबी से बुलाकर लाया गया था। उस समय वे छत्तीसगढ़ के सबसे सीनियर अफसर थे। चीफ सिकरेट्री पी जाय उम्मेन उनसे पांच बैच जूनियर रहे। पुराने लोगों को याद होगा, विश्वरंजन मंत्रालय पहुंचते थे, तो बड़े-बड़े आईएएस कुर्सी से खड़े हो जाते थे। उनके काफिले में पायलट और फॉलो गाड़ी चलती थी। खैर, बात लोकसभा चुनाव 2009 की। जैसा कि कुछ याद है, निर्वाचन से संबंधित चुनावी मीटिंग में विश्वरंजन ने निर्वाचन के अफसरों को किसी बात पर हड़का दिया था। इसके बाद विश्वरंजन को हटा दिया गया। हालांकि, विश्वरंजन ने एक अंग्रेजी दैनिक अखबार में आर्टिकल लिखा था, जिसमें आईएएस अधिकारियों पर कुछ कमेंट किए थे। अब ये स्मरण नहीं हो रहा कि चुनाव आयोग द्वारा हटाए जाने के बाद उन्होंने ये आर्टिकल लिखा था या हटाने से पहले। मगर कुल जमा सार यह है कि विश्वरंजन को हटा दिया गया। अलबत्ता, आचार संहिता समाप्त होते ही फिर से रमन सरकार ने उन्हें डीजीपी नियुक्त कर दिया था।

पूत, सपूत कैसे?

आईएएस रेणु पिल्ले और पूर्व आईपीएस संजय पिल्ले की बेटी आईपीएस सलेक्ट हुई है। इससे दो साल पहले उनका बेटा अक्षय आईएएस बना था। अक्षय को उड़ीसा कैडर मिला है। छत्तीसगढ़ का यह फर्स्ट अफसर कॅपल होगा, जिनके दोनों बच्चे देश की शीर्षस्थ सर्विस में सलेक्ट हुए हैं। वैसे ऐसे मामले कम ही होते हैं। हालांकि, इसी तरह का एक सुखद संयोग मध्यप्रदेश के 1989 बैच के आईपीएस मुकेश जैन के साथ भी हुआ है। एक बेटा उनका 2021 में आईएएस बना और दूसरा इस बार। नौकरशाही में इसे बड़ा सम्मान के साथ देखा जाता है। क्योंकि, ज्यादतर बड़े अफसरों के बच्चे उनके उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते। इसकी वजह यह है कि आईएएस, आईपीएस बनने के बाद माता-पिता जमीन से दो इंच उपर हो जाते हैं तो उनकी संतानें चार इंच। पढ़ाई एक तपस्या है...महंगे, लग्जरी और नावाबी रहन-सहन में ये कतई संभव नहीं। पिताजी लोग दिन-रात डीएमएफ, कमीशन, जमीन, प्लॉट और इंवेस्टमेंट में दो नंबर का पैसा खपाने में लगे रहेंगे तो फिर पूत सपूत कैसे निकलेगा।

मंत्री ने दिया ठेके में विभाग

अभी तक आपने सड़क, बांध जैसे निर्माण कार्यों को ठेके पर दिए जाने की बातें सुनी होगी। मगर छत्तीसगढ़ के एक मंत्री ने अनोखा आईडिया निकालते हुए पूरे विभाग को एक लक्ष्मीपुत्र के हवाले कर दिया है। मंत्रीजी ने सभी तरफ मैसेज करा दिया है...फलां आदमी पूरा काम देखेगा। हालांकि, विभाग का काम जून के बाद ही चालू होगा, मगर वीआईपी चौराहे पर स्थित एक लग्जरी कालोनी में पूरे ऐश्वर्य के साथ रहने वाले लक्ष्मीपुत्र ने सारे सप्लायरों को बुलाकर बताना शुरू कर दिया है...20 परसेंट मंत्रीजी को, 10 परसेंट मेरा...बाकी तुमलोग जानो। उन्होंने एडवांस लेकर अभी से जिले भी अलॉट करना शुरू कर दिए हैं...फलां जिले में सप्लाई ये करेगा तो फलां में वो। जिलों के मुलाजिम परेशान हैं कि सप्लायार जब 30 परसेंट उपर दे देगा तो हमलोगों का क्या होगा? जाहिर है, कुछ-न-कुछ जिलों में भी बंटेगा। फिर बीच में कुछ सरकारी एजेंसियां हैं, वहां के अफसरों को भी चाहिए। याने 100 रुपए के काम में 50 पैसा उपर लेनदेन में बंट जाएगा। अब काम क्या होगा, इसे आप समझ सकते हैं।

तीन सीटों पर फोकस

लोकसभा चुनाव के संदर्भ में छत्तीसगढ़ के सियासी पंडित जो भी आंकलन करें, बीजेपी और संघ ने तीन लोकसभा सीटों पर पूरी ताकत लगा दी है। सबसे टॉप पर जिन तीन सीटों को रखा गया है, उनमें कांकेर, राजनांदगांव और जांजगीर शामिल हैं। इन सीटों पर विशेष तौर से फोकस और प्लानिंग के साथ काम किया जा रहा है। जाहिर है, बीजेपी बाकी आठ सीटों को खतरे से बाहर मानकर चल रही है। बीजेपी के रणनीतिकारों की कोशिश है कि इन तीन में से वोटिंग का डेट आते-आते कम-से-कम दो और क्लियर होने की स्थिति बन जाए। जाहिर है, बीजेपी की टॉप प्रायरिटी वाली तीन सीटों से कांकेर और राजनांदगांव में 26 अप्रैल और जांजगीर में सात मई को वोटिंग होगी।

कांग्रेस 2 से आगे नहीं

छत्तीसगढ़ कांग्रेस का गढ़ रहा है। मगर आप आंकड़ों को देखेंगे तो पता चलेगा सिर्फ विधानसभा चुनाव के मामले में। लोकसभा चुनाव में बीजेपी को हमेशा ठीकठाक सीटें मिलती रही हैं। पिछले 10 चुनावों की बात करें तो सिर्फ एक बार 1991 के लोकसभा चुनाव में, जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की आत्मघाती हमले में मौत हो गई थी, कांग्रेस को 11 की 11 लोकसभा सीटें मिली थी। इसके अलावा सभी लोकसभा चुनावों में बीजेपी को छह, सात, आठ सीटें मिलती रही। यहां तक कि 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का सूपड़ा साफ हो गया था। 15 साल सत्ता में रहने वाली सरकार 15 सीटों पर सिमट आई थी। तब राजनीतिक समीक्षक भाजपा को पांच से अधिक सीटें नहीं दे रहे थे। मगर नतीजे आए तो बीजेपी की झोली में नौ सीटें थी।

ये भी फैक्ट

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी ने 1999 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान रायपुर में वादा किया था कि आपलोग बीजेपी को जीताएं हम छत्तीसगढ़ अलग राज्य बनाकर देंगे। तब शायद लोगों को उनके कहे पर उस तरह का एतबार नहीं हुआ। 98 में बीजेपी को सात सीटें मिली थी, इस घोषणा के बाद 99 में सिर्फ एक सीट बढ़ी। यानी 11 में आठ सीट। लेकिन, नवंबर 2000 में अटलजी ने छत्तीसगढ़ राज्य का गठन कर दिया तो लोग इतने प्रसन्न हुए कि 2004 से लेकर 2014 तक 11 में 10 सीटें बीजेपी को मिलती रहीं। 2019 में भी इसमें से सिर्फ एक सीट कम हुई है। अब देखना है कि अटलजी ने बीजेपी के पक्ष में छत्तीसगढ़ में हवा का रुख बदला था, वह इस बार बरकरार रहेगा?

अंत में दो सवाल आपसे

1. सतनामी समाज के गुरू को पार्टी में शामिल करने और उनके बेटे को विधानसभा का टिकिट देने के बाद भी बीजेपी दलित वोटों को क्यों नहीं साध पा रही?

2. देश के एक प्रभावशाली औद्योगिक समूह के अफसरों को बुलाकर निर्देश देने वाले बीजेपी के किस बड़े नेता का पर कतर दिया गया?


शनिवार, 13 अप्रैल 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: आईएएस अब बीमार नहीं

 तरकश, 14 अप्रैल 2024

संजय के. दीक्षित

आईएएस अब बीमार नहीं

चुनाव ड्यूटी के नाम से सरकारी मुलाजिमों को ही नहीं, आईएएस अधिकारियों को भी पसीना आने लगता है। गिनती के अफसर होंगे, जिन्हें चुनाव आयोग के आब्जर्बर बनाए जाने से तकलीफ नहीं होती। वरना, बजरंगबली याद आने लगते हैं। वो तब, जब चुनाव आयोग इसके लिए अलग से हैंडसम पारिश्रमिक देता है। उपर से जिस जिले में चुनाव कराने जाएं, वहां जलजला होता है....कलेक्टर, एसपी आगे-पीछे करते रहते हैं। फिर भी चुनाव से बचने सौ बहाने। हालांकि, 2003 के विधानसभा चुनाव के बाद अफसर अब बीमारी का बहाना नहीं बना रहे। दरअसल, उस समय दो आईएएस अधिकारियों ने गंभीर बीमारी का हवाला देते हुए चुनाव आयोग से नाम काटने आग्रह किया था। इस पर आयोग ने उन्हें दिल्ली आकर एम्स के मेडिकल बोर्ड के सामने पेश होने का आदेश दिया था...ताकि पता चला सके कि अफसर को कितनी गंभीर बीमारी है। आयोग का लेटर मिलते ही दोनों आईएएस अधिकारियों की बीमारी काफूर हो गई और तुरंत इलेक्शन ड्यूटी की सहमति दे दी। इनमें से एक बेचारे नौकरी से बाहर हो गए और दूसरे अभी काफी सीनियर हो चुके हैं।

रिकार्ड इलेक्शन ड्यूटी

छत्तीसगढ़ के आईएएस अफसर इलेक्शन ड्यूटी को भले ही बिदकते हैं मगर इसी सूबे में दो ऐसे आईएएस अफसर रहे हैं, जिन्होंने इलेक्शन ड्यूटी का रिकार्ड बनाया है। इनमें पूर्व मुख्य सचिव सुनील कुजूर और वर्तमान सिकरेट्री भुवनेश यादव का नाम शामिल हैं। दोनों ने नौ से अधिक विधानसभा और लोकसभा चुनाव कराएं हैं। कुजूर बाद में छत्तीसगढ़ के सीईओ भी रहे। अबकी पहली बार छत्तीसगढ़ की दो महिला आईएएस की भी चुनाव में ड्यूटी लगाई गई है। पहले इफ्फत आरा को चुनाव आयोग ने आब्जर्बर बनाया। और अब, तंबोली फकीरभाई अय्याज के सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने से उनकी जगह किरण कौशल की ड्यूटी लगाई गई है।

ब्लैकलिस्टेड नहीं

चुनाव आयोग किसी कलेक्टर, एसपी पर अगर कार्रवाई करता है तो उसका नाम काली सूची में डाल देता है। उसे फिर किसी चुनाव में कोई जिम्मेदारी नहीं दी जाती। याद होगा, 2008 के विधानसभा चुनाव में आयोग ने एक कलेक्टर को हटाया था। सरकार ने रिजल्ट आने के बाद उसे फिर से दूसरे जिले का कलेक्टर बना दिया पर आयोग ने 2009 के लोकसभा चुनाव के समय फिर हटा दिया था। बहरहाल, पिछले विधानसभा चुनाव में दो कलेक्टर और तीन एसपी हटाए गए थे, आयोग उनका नाम ब्लैकलिस्टेड से हटा दिया है। जाहिर है, दुर्ग एसपी शलभ सिनहा बस्तर में एसपी हैं और वे चुनाव करवा रहे हैं। हटाए गए दोनों कलेक्टर संजीव झा और तारन प्रकाश सिनहा को आयोग ने आब्जर्बर बनाया है। बताते हैं, इन पांच में से एक अफसर ने कार्रवाई के बाद चुनाव आयोग में प्रेजेंटेशन दिया था। उन्होंने बताया था कि चुनाव की तैयारियों के लिए क्या-क्या काम किए उन्होंने। आयोग इससे संतुष्ट होकर सभी को आरोपों से बरी कर दिया।

50 लाख की कंपनी, अरबों में

किसी एक विभाग में सप्लाई करके कोई कंपनी अगर पांच साल में एक हजार गुना अपनी पूंजी बढ़ा लेती है, तो यह चमत्कार छत्तीसगढ़ में ही संभव है। पहले हम बताते हैं, 2007 में मलेरिया और उपकरण खरीदी घोटाला हुआ था, उसमें डायरेक्टर, ज्वाइंट डायरेक्टर समेत कई बड़े अफसर जेल गए थे। बाद में इसकी सीबीआई जांच भी हुई। बहरहाल, छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने इस कांड के बाद स्वास्थ्य विभाग के खटराल अधिकारियों से खरीदी का काम ले कर सीजीएमएस बना दिया। याने छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कारपोरेशन। इसका गठन इस मकसद से किया गया कि सरकारी अस्पतालों को टाईम पर, क्वालिटीयुक्त दवाइयां उपलब्ध होंगी...एक्सपर्ट लोग कंपनियो से बारेगेनिंग कर वाजिब मूल्य पर दवाइयां खरीदेंगे। इसके अलावा सरकार का ये भी मानना था कि डॉक्टर लोग खरीदी वगैरह ठीक से नहीं कर पाते...प्रोफेशन लोग यह काम बेहतर ढंग से कर पाएंगे मगर सीजीएमसी के अफसरों ने ऐसा गुल खिलाया कि छत्तीसगढ़ की कंपनियां मालामाल हो गई। अभी 290 करोड़ की सप्लाई करने वाली कंपनी चर्चा में है, पांच साल पहले उसका टर्न ओवर 50 लाख था, वह अब बढ़कर करीब 500 खोखा हो गया है। जब ढाई रुपए के सौल्यूशन को तीन हजार रुपए में सप्लाई किया जाएगा तो कंपनियां फलेंगे-फूलेंगी ही। सीजीएमएससी पिछले पांच बरसों से बड़े दलालों और माफियाओं का अड्डा बन गया है। उसके अफसरों को आम आदमी के स्वास्थ्य से क्या वास्ता! उसका मकसद कंपनियों को मोक्ष प्राप्त करवाना है।

डिमोशन

संघ के एक सीनियर पदाधिकारी का डिमोशन हो गया। बताते हैं, सरकार में किसी नियुक्ति के लिए उन्होंने संघ के भीतर बात नहीं रखी। अलबत्ता, किसी को पता नहीं चला। जब नियुक्ति की खबर मीडिया में आई तो संघ के कान खड़े हुए। बात उपर तक पहुंची और भाई साहब को किनारे कर दिया गया। असल में, संघ की ऐसी व्यवस्था है कि सीधे सरकार से नियुक्ति नहीं करा सकते। पहले संघ में प्रस्ताव रखा जाता है। फिर चर्चा होती है। उसके बाद नाम संगठन मंत्री को भेजे जाते हैं। और वहां से फिर सरकार के पास जाता है। भाजपा शासित सभी राज्यों में लगभग यही सिस्टम है।

पांच सीटों पर चुनाव

छत्तीसगढ़ में लोकसभा की 11 सीटें हैं। इनमें कुछ बरसों से ऐसा ट्रेंड चल रहा कि लोकसभा की सीटें जिस पार्टी को मिलती है, लगभग एकतरफा जैसी स्थिति होती है। लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे भी ऐसे ही रहे। बीजेपी को नौ और कांग्रेस को दो। जबकि, सियासी पंडितों द्वारा बीजेपी को पिछले बार चार-से-पांच सीटें दी जा रही थी। इसकी वजह भी थी। 15 साल सरकार चलाई पार्टी 15 सीटों सिमट गई थी। नेताओं में नैराश्य आ गया था। कोई उत्साह नहीं। भगवान भरोसे चुनाव लड़ा गया। पर मोदी मैजिक की वजह से 11 में से 9 सीटें बीजेपी की झोली में आ गई तो राजनीतिक प्रेक्षक भी हतप्रभ रह गए। खैर बात...अब इस लोकसभा चुनाव 2024 की। चार महीने तक सत्तानशीं रही कांग्रेस पार्टी छह सीटों पर कहीं दिखाई नहीं पड़ रही। ये सीटें हैं...रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, जांजगीर, रायगढ़, सरगुजा। रायपुर में बृजमोहन अग्रवाल जीत के लिए नहीं लड़ रहे। वे रिकार्ड बनाने की कोशिश में हैं। ताकि, दिल्ली की सियासत में सम्मानजनक हैसियत बन जाए। जिन पांच सीटों पर मुकाबला प्रतीत हो रहा, भले ही वह परसेप्शन के आधार पर हो...उनमें बस्तर, कांकेर, राजनांदगांव, महासमुंद और कोरबा शामिल हैं। वैसे, बीजेपी के रणनीतिकारों को चार महीने पहले विधानसभा चुनाव में 35 सीटें जीतने वाली कांग्रेस को हल्के में नहीं लेनी चाहिए। छत्तीसगढ़ कांग्रेस का गढ़ रहा है। बीजेपी को ध्यान रखना चाहिए....विधानसभा चुनाव 2023 में उसे दलितों के वोट नहीं मिले। उपर से मुस्लिम और ईसाई समाज के वोट कांग्रेस को एकतरफा मिलते ही हैं। उदाहरण के तौर पर बिलासपुर लोकसभा सीट को ले सकते हैं। बिलासपुर में कांग्रेस बेहद कमजोर स्थिति में है। मगर वहां मुस्लिम, क्रिश्चियन, दलित और यादव वोटों का समीकरण ऐसा है कि बीजेपी जीतेगी जरूर मगर बाहरी प्रत्याशी होने के बाद भी लीड पिछले बार से कम हो सकती है। क्योंकि, देवेंद्र यादव को मुस्लिम, क्रिश्चियन और दलित वोटों के साथ अब यादव के वोट भी जुड़ जाएंगे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. एक महिला पुलिस अधीक्षक को एक से बढ़कर एक कलेक्टर क्यों मिल जा रहे?

2. इस बात में कितनी सत्यता है कि आबकारी घोटाले में एक बड़ी गिरफ्तारी होने वाली है?


शनिवार, 6 अप्रैल 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: नो कैबिनेट मिनिस्टर

 तरकश, 7 अप्रैल 2024

संजय के. दीक्षित

नो कैबिनेट मिनिस्टर 

जब छत्तीसगढ़ नहीं बना था, तब केंद्र की राजनीति में छत्तीसगढ़ का दबदबा होता था। विद्याचरण शुक्ल 23 साल के उम्र में केंद्र में कैबिनेट मंत्री बन गए थे। हालांकि, उनसे अलावे पुरूषोतम कौशिक और बृजलाल वर्मा भी थोड़े दिनों के लिए केंद्र में कैबिनेट मंत्री रहे। मगर नाम कमाया विद्या भैया ने। ये कहने में कोई हर्ज नहीं कि विद्या भैया के नाम से छत्तीसगढ़ और रायपुर की देश में पहचान बनी। विद्या भैया ने छत्तीसगढ़ को दिया भी बहुत कुछ...कोलकाता से पहले रायपुर में दूरदर्शन केंद्र खुल गया था। रायपुर को काफी पहले हवाई नक्शे से जोड़ने का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है। 1994 तक नरसिम्हा राव मंत्रिमंडल में विद्याचरण पावरफुल मंत्री रहे। लेकिन, नरसिम्हा राव सरकार के पतन के बाद छत्तीसगढ़ का केंद्रीय मंत्री का कोटा ही खतम हो गया। वो ऐसे कि नरसिम्हा राव सरकार के बाद कांग्रेस सत्ता से 10 साल बाहर रही। एचडी देवेगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल की सरकार में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधितव जीरो रहा। 1998 से 2004 तक अटलजी की सरकार में अलग-अलग समय में छत्तीसगढ़ से तीन राज्य मंत्री बनाए गए। रमन सिंह, दिलीप सिंह जूदेव और रमेश बैस। मनमोहन सिंह की दूसरी पारी के आखिरी दिनों में चरणदास महंत को केंद्रीय राज्य मंत्री बनने का मौका मिल पाया। 10 साल बाद 2004 में लौटी बीजेपी की सरकार ने विष्णुदेव साय और उनके बाद रेणुका सिंह को राज्य मंत्री बनाया। मगर केंद्र में राज्य मंत्री सिर्फ सहयोगी के तौर पर होते हैं। कह सकते हैं संख्या बल के लिए। जिम्मेदारी और जलवा पूरा कैबिनेट मंत्रियों का रहता है।

सरोज पाण्डेय को मौका?

अब तीन दशक बाद इस बार छत्तीसगढ़ से केंद्रीय मंत्री बनने का योग दिख रहा है। कोरबा से अगर सरोज पाण्डेय जीत गई तो केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनने की पूरी संभावना है। क्योंकि, सियासत में महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़ रही है। बीजेपी में राष्ट्रीय स्तर पर निर्मला सीतारमण वित्त मंत्री हैं मगर वे मास लीडर नहीं हैं। सुषमा स्वराज के जाने के बाद दिल्ली में सिर्फ स्मृति ईरानी बच गई हैं। ऐसे में, सरोज पाण्डेय का चांस बन सकता है। सरोज चूकि सांसद रह चुकी हैं, विधायक और मेयर भी। महाराष्ट्र की पार्टी प्रभारी समेत राष्ट्रीय स्तर पर कई अहम दायित्व संभाल चुकी हैं। जाहिर है, उन्हें राज्य मंत्री तो नहीं ही बनाया जाएगा।

खतरे में नेताजी का विकेट

छत्तीसगढ़ बनने के बाद एक बड़े नेता दिल्ली में जरूर ट्रेप हो गए थे मगर छत्तीसगढ़ में ऐसा कभी नहीं हुआ। मगर एक नेताजी ऐसे घनचक्कर में फंस गए हैं कि उनकी रात की नींद उड़ गई है। खबर ये है कि 250 करोड़ की सप्लाई में गड़बड़झाला को जिन लोगों ने लीक किया, वे ही लोग नेताजी को भी ट्रेप कर लिए। दरअसल, सप्लाई करने वाला नेताजी को सेट करने गया था कि भाई साब, देख लीजिए...हल्ला न हो और पेमेंट भी जारी हो जाए। मगर जिस बड़े सप्लायर ने इस स्कैम को लीक कराया, उसी ने नेताजी को फंसवा भी डाला...होटल के कमरे में उसी के लोगों ने पहले से कैमरे लगा दिए थे। अब सब कुछ ऑन कैमरा है, तो फिर क्या होगा? यह सवाल उसी तरह का है कि शेर सामने आ जाए तो...? जो करेगा शेर करेगा...अब देखना है लोकसभा चुनाव के बाद क्या होता है।

यादवों का बड़ा नेता

कांग्रेस पार्टी ने भिलाई के विधायक देवेंद्र यादव को बिलासपुर लोकसभा सीट से प्रत्याशी बनाया है। बताते हैं, देवेंद्र यादव को बिहार के नेता चंदन यादव का साथ मिला और राहुल गांधी के साथ पदयात्रा में साथ देने का ईनाम। मगर पैराशूट प्रत्याशी होने का नुकसान उन्हें यह हो रहा कि बिलासपुर में कांग्रेस नेताओं का साथ नहीं मिल रहा है। बिलासपुर के कांग्रेसी इसलिए खफा हैं कि कांग्रेस का गढ़ रहा बिलासपुर में पार्टी को लोकसभा चुनाव लड़ाने के लिए अदद एक प्रत्याशी नहीं दिखा। चलिये रिजल्ट क्या होगा यह देवेंद्र यादव को भी पता है और कांग्रेस के लोगों को भी। फायदा देवेंद्र को यह होगा कि वे छत्तीसगढ़ में यादवों के अब स्थापित नेता हो जाएंगे। और जांच एजेंसियांं के निशाने पर आने से दो-एक महीने की उन्हें मोहलत मिल गई है।

5 निर्दलीय उम्मीदवार

ये बहुत कम लोगों का मालूम होगा कि बस्तर देश की पहली संसदीय सीट है, जहां के वोटरों ने पांच बार निर्दलीय को चुनाव जीता कर दिल्ली भेजा है। यहीं नहीं, 1952 के प्रथम लोकसभा चुनाव में मुचकी कोसा ने देश के सर्वाधिक मतों के अंतर से जीत दर्ज किया था। मुचकी ने एक लाख 41 हजार मतों से कांग्रेस उम्मीवार को पराजित किया था।

ऐसे भी कलेक्टर

लोकसभा चुनाव के आचार संहिता के दौरान कुछ कलेक्टरों ने तहसीलदारों का ट्रांसफर कर दिया। इसको लेकर सीईओ रीना बाबा कंगाले बेहद नाराज हुई। उन्होंने न केवल नोटिस थमाई बल्कि दो-एक कलेक्टरों को फोन पर फटकारा भी। बताते हैं, एक कलेक्टर का मासूमियत भरा जवाब सुन आयोग के अफसर भी सन्न रह गए। कलेक्टर ने कहा, मैं देखता हूं आचार संहिता में तहसीलदारों का ट्रांसफर कैसे हुआ और किसने किया? किसी कलेक्टर के लिए वाकई ये बड़ा शर्मनाक है कि उसे पता नहीं कि नाक के नीचे तहसीलदारों को बदल दिया गया और उसे पता ही नहीं चला। ऐसे कलेक्टरों के जिले में क्या हो रहा होगा, भगवान मालिक हैं।

शिकायत कलेक्टरों की

ये भी कुछ अटपटा सा लग रहा कि बीजेपी की सरकार में बीजेपी नेता कलेक्टरों के खिलाफ शिकायत कर रहे हैं। निर्वाचन आयोग में रायपुर के आसपास के चार-पांच जिलों के साथ ही एक माईनिंग डिस्ट्रिक्ट के कलेक्टर की गंभीर शिकायतें बीजेपी नेताओं ने की है। एक जिले में कांग्रेस के पोस्टर, बैनर हटाने को लेकर इतना रायता फैला कि चुनाव आयोग के अफसरों को देर रात तक जागकर उसे हैंडिल करना पड़ा। बीजेपी नेताओं नें इसकी शिकायत उच्च स्तर पर कर दी, इससे खलबली मच गई। बताते हैं, आचार संहिता नहीं होता तो कलेक्टर की छुट्टी हो गई होती। अब अगर अच्छे मार्जिन से बीजेपी प्रत्याशी की जीत वहां नहीं मिली तो लोकसभा चुनाव के बाद पहले आदेश में कलेक्टर का विकेट उड़ना तय है।

चुनावी ड्यूटी और आईएएस

आईएएस अफसर सबसे अधिक इलेक्शन आब्जर्बर बनने से घबराते हैं। अधिकांश अफसरों की कोशिश होती है कि किसी तरह बच निकला जाए। यही वजह है कि हर बार दो-चार, पांच के नाम कट जाते हैं। मगर इस बार अभी तक दो ही अफसरों के नाम कटे हैं। एक तंबोली अय्यजा फकीरभाई और दूसरा सुधाकर खलको। तंबोली सेंट्रल डेपुटेशन पर दिल्ली चले गए हैं और सुधाकर खलको का एंजिया प्लास्टि हुआ है। इसलिए, सुधाकर के संबंध में चुनाव आयोग ने रिस्क लेना मुनासिब नहीं समझा। बाकी इस बार सिकरेट्री रैंक के अफसर अविनाश चंपावत भी चुनावी ड्यूटी में फंस गए। दरअसल, उनका नाम केंद्र सरकार से गया था। फरवरी तक वे दिल्ली में पोस्टेड थे। यहां ज्वाईन करने के बाद जीएडी ने लिस्ट से नाम हटाने आयोग को पत्र भेजा मगर उस पर सुनवाई नहीं हुई। हालांकि, पहली बार डायरेक्टर एग्रीकल्चर की भी चुनाव में ड्यूटी लग गई है। एग्रीकल्चर डायरेक्टर की पोस्टिंग के चलते जीएडी ने सारांश मित्तर का नाम हटाने आयोग को लेटर भेजा था, मगर आयोग राजी नहीं हुआ।

राजनांदगांव सिरदर्द

राजनांदगांव संसदीय सीट सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी के लिए चुनौती नहीं है, चुनाव आयोग के लिए भी सिरदर्द हो गया है। नामंकन दाखिल करने के आखिरी दिन 240 नामंकन फार्म लेने की खबर ने रायपुर सीईओ आफिस से लेकर भारत निर्वाचन आयोग तक को बेचैन कर दिया। इतनी बड़ी संख्या में कोई एक आदमी नामंकन दाखिल नही ंकर सकता। इसके पीछे कोई बड़ा हाथ होगा। आयोग के पास यह फीडबैक पहुंचा था कि कोई महिला विधायक सारे नामंकन भरवा रही है। इस पर तय यह हुआ कि विधायक के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया जाए। क्योंकि, कोई लोगों को गोलबंद करके नामंकन नहीं भरवा सकता। मगर शाम होते तक वो हो नहीं पाया जिसकी बड़ी चर्चा थी। राजनांदगांव में नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत के हेट स्पीच को लेकर भी आयोग ने सीईओ आफिस से रिपोर्ट मांगी और फिर कार्रवाई का आदेश दिया। सीईओ आफिस को उसे भी तामिल कराना पड़ा। जाहिर है, राजनांदगांव को लेकर आयोग को काफी मगजमारी करनी पड़ रही है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. ऐसा क्यों कहा जा रहा कि लोकसभा चुनाव के बाद मंत्रिमंडल के पुनर्गठन में तीन विधायकों को मंत्री बनने का अवसर मिलेगा?

2. क्या ये सही है कि आपसी सिर फुटौव्वल के चलते चार महीने पहले तक सरकार में रही कांग्रेस पार्टी की छत्तीसगढ़ में दुर्दशा हो रही है?


शनिवार, 30 मार्च 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: बड़े लोग, बड़ा स्कैम

 तरकश, 31 मार्च 2024

संजय के. दीक्षित

बड़े लोग, बड़ा स्कैम

राज्य सरकार ने जमीनों का गाइडलाइन रेट की छूट को न बढ़ाकर अच्छा काम किया है। इससे किसानों को भी फायदे होंगे। मगर सरकार को ये भी सनद रखना होगा कि भारत माला सड़कों के अगल-बगल की किसानों के अधिकांश जमीनों को नेताओं और नौकरशाहों ने खरीद लिया है। ईडी की विभिन्न जांचों में इस तरफ इशारा भी किया गया है कि कई कलेक्टरों ने जमकर इसमें चांदी काटा है। छत्तीसगढ़ के कई प्रभावशाली नेताओं और कलेक्टरों, अफसरों ने किसानों से सस्ते रेट पर एकड़ में जमीन खरीद लिए और उसे छोटे टुकड़े कर करोड़ों रुपए का मुआवजा ले लिया या मुआवजे के लिए लाइन में हैं। बता दें, भारत सरकार के नई अधिग्रहण नीति के तहत छोटो प्लाटों का मुआवजा चार गुना अधिक मिलता है। कलेक्टरों और नेताओं को चूकि पता होता है कि कहां से सड़क निकलनी है। सो, किसानों को रेट से कहीं अधिक में एकड़ों में जमीन खरीद लेते हैं। और फिर उसे टुकड़ों में बांट अपने नाते-रिश्तेदारों, नौकर, चाकर, पीए, प्यून के नाम पर रजिस्ट्री करवाने का खेला किया जाता है। कायदे से यह सीबीआई जांच का इश्यू हो सकता है। क्योंकि, इसमें अधिकांश बड़े लोगों ने मलाई काटा है और किसान बेचारे ठगे गए हैं। सीबीआई जांच अगर हो गई तो सूबे के कई पूर्व कलेक्टर सलाखों के पीछे होंगे।

बड़े आसामी

छत्तीसगढ़ में पिछले तीन साल साल में अस्पताल और नर्सिंग होम के संचालकों ने भी खूब खेला किया है। पहले जिधर जाओ, पता चलता था कि ये फलां नेताजी की जमीन है तो फलां आईएएस, आईपीएस का फार्महाउस। अब इसमें अस्पताल संचालकों का नाम भी ऐड हो गया है। दरअसल, कोविड में अस्पतालों में क्या हुआ, वह सबको पता है। रोज अटैची में भरकर अस्पतालों से घर पैसे जाते थे। उसे कहीं-न-कहीं इंवेस्ट होना ही था। वे पैसे बिल्डरों के प्रोजेक्ट में लगे या फिर जमीनों में। अभी स्थिति यह है कि रायपुर से 100 किलोमीटर दूर तक रोड पर जमीन नहीं बची है। कोविड के पैसे का ही नतीजा रहा कि बिल्डरों ने महामारी में भी अपना रेट डाउन नहीं किया। क्योंकि, बड़े बिल्डरों के प्रोजेक्ट में पहले मंत्रियों, नौकरशाहों की काली कमाई लगती थी, अब इसमें अस्पतालों की कमाई भी शामिल हो गई है। छत्तीसगढ़ में बिल्डरों को तेजी से फलने-फूलने का रहस्य यही है।

सबसे बड़ी जीत

छत्तीसगढ़ में यह बहुत कम लोगों को पता होगा लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी जीत छत्तीसगढ़ से मिल चुकी है। वो भी निर्दलीय प्रत्याशी की। सीट है बस्तर और चुनाव था 1952 का। तब निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मुचकी कोसा चुनावी मैदान में थे। उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी को 1,41,331 मतों से हराया। उस चुनाव में सबसे छोटी जीत पश्चिम बंगाल में कांग्रेस प्रत्याशी को मिली थी। कोंतई संसदीय सीट से वे 127 मतों से जीते थे। बता दें, आजादी के बाद देश में पहला लोकसभा चुनाव 1952 में हुआ था।

कांग्रेस का बी फार्म

कांग्रेस में टिकिट का ऐलान होने के बाद चेहरे बदल जाने के अनेक दृष्टांत हैं। कई बार तो बी फार्म भी बदल जाते हैं। विधानसभा चुनाव-2023 के दौरान इसी कॉलम में बिलासपुर विधानसभा चुनाव-1998 में नामंकन के आखिरी दिन बी फार्म बदलने का जिक्र किया किया गया था। उसमें नामंकन भरने के आखिरी दिन बी फार्म बदलकर चार्टर प्लेन से नया बी फार्म आया था। 2009 के लोकसभा चुनाव में बिलासपुर संसदीय सीट से कांग्रेस ने आशीष सिंह का नाम की घोषणा कर दी थी। कांग्रेस पार्टी का अधिकृत आदेश मीडिया में प्रकाशित भी हो गया। मगर दो दिन बाद रेणू जोगी को मैदान में उतार दिया गया। इसी तरह का एक पुराना किस्सा नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत का भी है। 1991 में महंत को जांजगीर लोकसभा से चुनाव लड़ने बी फार्म आ गया था। मगर नामंकन भरने के दिन दिल्ली से उनके पास फोन आ गया...अभी फार्म मत भरिये, भवानीलाल वर्मा को टिकिट दिया जा रहा है। और फिर रातोरात सड़क मार्ग से वर्मा के नाम से बी फार्म भेज दिया गया। अब आजादी के बाद कांग्रेस ने 70 बरस राज किया है, तो जाहिर तौर पर किस्से-कहानियां उसे के होंगे न।

मंत्रियों की मुश्किलें

लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ के मंत्रियों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। क्योंकि, तीन महीने हुए विधानसभा चुनाव में जांजगीर और राजनांदगांव को छोड़कर लगभग सभी इलाकों मेंं बीजेपी को ठीकठाक रिस्पांस मिला। अब अगर कुछ गड़बड़ हुआ तो सवाल खड़े होंगे ही। जाहिर है, कुछ संसदीय सीटों के नतीजे मंत्रियों के भविष्य तय करेंगे। मंत्रिमंडल में अभी एक सीट खाली है। और 4 जून को बृजमोहन अग्रवाल के जीतने पर एक सीट और खाली हो जाएगी। अगर किसी और मंत्री के इलाके में लोकसभा चुनाव के परिणाम अच्छे नहीं आए तो फिर पार्टी परफारमेंस का रिव्यू करेगी ही। वैसे भी सियासी गलियारों में अटकलबाजी चल रही कि लोकसभा चुनाव के बाद दो-एक पुअर परफारमेंस वाले मंत्रियों को किनारे किया जा सकता है। हालांकि, इतनी जल्दी मंत्रिमंडल में सर्जरी होती नहीं, फिर भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह के युग में कुछ भी संभव है।

इन तीन सीटों पर नजर

छत्तीसगढ़ की 11 में से नौ लोकसभा सीटें इस समय सत्ताधारी पार्टी के पास है। कांग्रेस के पास सिर्फ दो सीटें कोरबा और बस्तर है। देश और राज्य में जिस तरह का माहौल है और कांग्रेस चुनाव को लेकर जिस तरह डिफेंसिव है, उससे नहीं लगता कि बीजेपी की सीटें कम होंगी। अलबत्ता, बढ़ भी सकती है। फिर भी सूबे की तीन सीटों के नतीजों पर लोगों की निगाहें टिकी रहेंगी। पहला राजनांदगांव, दूसरा कोरबा और तीसरा कांकेर। राजनांदगांव से खुद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल चुनाव मैदान में हैं। तीन महीने पहले तक भूपेश मुख्यमंत्री थे। जमीनी नेता भी हैं। उपर से बीजेपी ने संतोष पाण्डेय को रिपीट किया है। संतोष का भी कुछ-न-कुछ एंटी इंकाबेंसी होगा ही। कोरबा में ज्योत्सना महंत को कांग्रेस ने रिपीट किया है तो बीजेपी ने दुर्ग से सरोज पाण्डेय को कोरबा भेजा है। याने एक का एंटी इंकाबेंसी और दूसरा बाहरी। ऐसे में, मुकाबला दिलचस्प होगा। कांकेर में बीजेपी के भोजराम नाग के खिलाफ कांग्रेस ने बीरेन ठाकुर को उतारा है। बीरेन 2019 के लोकसभा चुनाव में पांचेक हजार के मामूली अंतर से हारे थे। ऐसे में इन तीनों सीटों पर लोगों की नजरें रहेंगी ही, सत्ताधारी पार्टी को भी इन सीटों पर एक्सट्रा वर्क करना होगा।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या ये सही है कि लोकसभा चुनाव के बाद ईओडब्लू बड़ी कार्रवाई करते हुए कुछ रसूखदार लोगों को तलब करने वाली है?

2. लोकसभा चुनाव के बाद परफारमेंस के आधार पर अगर दो-एक मंत्रियों का ड्रॉप किया गया, तो वे कौन होंगे?


बुधवार, 27 मार्च 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: लोकसभा चुनाव और 2 नेताओं का भाग्योत्कर्ष

 तरकश, 24 मार्च 2024

संजय के. दीक्षित

लोकसभा चुनाव और 2 नेताओं का भाग्योत्कर्ष

लोकसभा का टिकिट मिलने से मंत्री बृजमोहन अग्रवाल कितने खुश हैं ये तो पता नहीं। मगर छत्तीसगढ़ के तीन शीर्ष नेताओं के भाग्योत्कर्ष में लोकसभा चुनाव की बड़ी भूमिका रही है। छत्तीसगढ़ बनने से पहिले 1998 में अजीत जोगी शहडोल संसदीय सीट से चुनाव लड़े और पराजित हो गए थे। मगर उनकी हार में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री की कुर्सी छिपी हुई थी। जरा सोचिए, जोगी अगर शहडोल से चुनाव जीत गए होते तो उन पर मध्यप्रदेश का लेवल लग जाता। और फिर दूसरे राज्य का एमपी छत्तीसगढ़ का सीएम कैसे बनता? याने जोगीजी के लिए शहडोल इलेक्शन लकी रहा। उसके बाद वे 99 में रायगढ़ संसदीय सीट से चुनाव लड़े और जीते। फिर इसके दो साल बाद राज्य बना तो प्रथम मुख्यमंत्री अपाइंट हुए। इसके बाद डॉ0 रमन सिंह। कवर्धा से चुनाव हारने के बाद वे खाली थे। पार्टी ने 99 के इलेक्शन में उन्हें राजनांदगांव सीट से कांग्रेस के दिग्गज नेता मोतीलाल वोरा के खिलाफ चुनावी रण में उतारा। वोरा मध्यप्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री, यूपी के राज्यपाल और केंद्र में कई विभागों के मंत्री रह चुके थे। ऐसे हाईप्रोफाइल नेता को चुनाव में पटखनी देने का इनाम रमन सिंह को मिला और उन्हें केद्र में राज्य मंत्री बनाया गया। इसके बाद फिर छत्तीसगढ़ में पार्टी प्रेसिडेंट और उसके बाद 2003 में मुख्यमंत्री। कहने का आशय यह है कि अगर रमन सिंह ने लोकसभा चुनाव नहीं जीते होते तो मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त नहीं हुआ होता। जोगी और रमन के अलावे छत्तीसगढ़ में एक दिग्गज नेता ऐसे हुए, जो लोकसभा चुनाव के जरिये देश में अपने साथ रायपुर, महासमुंद और छत्तीसगढ की पहचान स्थापित किए। करीब 45 साल की सियासत में विद्याचरण शुक्ल ने कभी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा। हमेशा लोकसभा चुनाव में किस्मत आजमाए और आठ बार संसद में पहुंचे। उस समय कांग्रेस के पास विधायकों की फौज होती थी, मगर दो बार हारने के बाद भी विद्या भैया ने कभी पिछले दरवाजे याने राज्यसभा में जाने का प्रयास नहीं किया।

मंत्री का रांग नंबर

खटराल पीएस के चक्कर में एक मंत्रीजी बोल्ड होने से बाल-बाल बच गए। दरअसल हुआ ये कि पीएस चाह रहे थे कि सीमेंट कंपनी वाले उनकी खुशामद करें। मगर उसने पीएस को लिफ्ट नहीं दिया। सो, उन्होंने मंत्री के दिमाग में भर दिया कि पहले वाली सरकार में फलां सीमेंट प्लांट वाला बड़ा ध्यान रखता था और अब रिस्पांस नहीं दे रहा है। मंत्रीजी ठहरे सीधे-सादे...बोले, मंत्री को क्या समझ रखा है, बुलाओ उसके अफसरों को। मंत्रीजी के यहां सीमेंट प्लांट के सबसे बड़े अफसर सिर लटकाए पेश हुए। मंत्रीजी बोले...मैं आपसे बात नहीं करूंगा, अपने मालिक से बात कराओ। अब अफसर न मंत्रीजी को ना कर सकता था और ना ही मालिक से सीधे बात। सीमेंट कंपनी के मालिक देश के नामी उद्योगपति हैं, अफसर सीमेंट प्लांट जैसी छोटी यूनिट के हेड। भला इतने बड़े इंड्रलिस्ट से कैसे बात कर सकते थे। यह बात बीजेपी के एक बड़े नेता के कान तक पहुंची। उन्होंने मंत्रीजी को बुलाकर समझाया, ऐसे रांग नंबर डायल करोगे तो निबट जाओगे। असल में, उद्योगपति इतने बड़े लेवल के हैं कि पीएम और गृह मंत्री के नीचे शायद ही किसी से बात करते हो। अब मंत्रीजी उनसे बात कर रौब झाड़ते तो समझना बड़ा आसान है कि उनका फिर क्या होता।

अब ट्रांसफर नहीं

छत्तीसगढ़ में लोकसभा चुनाव का ऐलान होते तक ट्रांसफर की झड़ी लगी रही। एकबारगी लगा जैसे ट्रांसफर पर से बैन समाप्त होने का लास्ट दिन आ गया है। अव्वल तो ये कि कई विभागों के ट्रांसफर आदेश मीडिया में जारी नहीं हुए...ट्रांसफर करके गुपचुप सर्वसंबंधितों को आदेश भेज दिए गए। इसमें अंदर की खबर यह है कि सरकार भी तबादलों से खुश नहीं है। अधिकांश आदेश रोक दिए गए थे। मगर लोकसभा चुनाव की मजबूरी थी। मंत्री से लेकर नेता तक लगे रिरियाने। कार्यकर्ता काम कैसे करेंगे? नेता लगे महिलाओं टाईप मुंह फुलाने। हालांकि, कार्यकर्ताओं की आड़ में कई विभागों में जमकर खेला हुआ। मगर अब सुनने में आ रहा कि ये लास्ट था। अब जब बैन खुलेगा, तभी इस तरह थोक में तबादले होंगे। उससे पहले बिल्कुल नहीं।

पार्टी में घिरे भूपेश

राजनांदगांव संसदीय सीट से कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को उतारकर मुकाबले को हाई प्रोफाइल बना दिया है। मगर भूपेश पर बीजेपी से ज्यादा घर के भीतर से हमले हो रहे हैं। वो भी सार्वजनिक ढंग से। घायल फिल्म का उस डायलॉग की तरह। सन्नी देयोल के घायल में एक मशहूर डायलॉग था...पिंजरे में बंद शेर को बच्चे भी फल्ली फेंक कर मारते हैं। बहरहाल, विडंबना है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को चुनाव लड़ने वाले चेहरों का टोटा है वहीं, जहां पार्टी मुकाबले में है, वहां पुराना हिसाब चूकता करने की सियासत हो रही है। असल में, कांग्रेस नेताओं को डर इस बात का भी है कि राजनांदगांव चुनाव से भूपेश बघेल की सियासी हैसियत कहीं बढ़ न जाए। ऐसे में, भूपेश के लिए डगर कठिन है।

वन ईयर पोस्टिंग

राज्य सरकार ने सूचना आयोग में खाली चार पदों में से दो पर नियुक्ति कर दी। इनमें से दो पद 2022 में खाली हुए थे और दो पद चार दिन बाद 28 मार्च को खाली हो जाएंगे। पिछली सरकार ने मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त का विज्ञापन किया था मगर तब प्रॉसिजर कंप्लीट होने के बाद भी नियुक्ति नहीं कर पाई और आचार संहिता लग गया था। बीजेपी की सरकार ने 28 मार्च को खाली हो रहे दो सूचना आयुक्तों के लिए विज्ञापन किया था। मगर सही कंडीडेट नहीं मिलने की वजह से मुख्य सूचना आयुक्त की पोस्टिंग नहीं की गई। यही नहीं, चार में से सिर्फ दो पदों पर नियुक्ति हुई है। रिटायर आईएएस नरेंद्र शुक्ला को सूचना आयुक्त बनाया गया है। नरेंद्र शुक्ला का कार्यकाल सबसे छोटा सिर्फ एक साल दो महीने का होगा। क्योंकि, अगले साल वे 65 वर्ष के हो जाएंगे। यह पहली बार होगा, जब इतने कम समय के लिए किसी सूचना आयुक्त की नियुक्ति हुई होगी। चलिए, अच्छा है, अगले साल एक वैकेंसी और हो जाएगी। याने दावेदारों की उम्मीदें बनी रहेंगी।

छत्तीसगढ़ के अमिताभ?

आरपी मंडल के रिटायर होने के बाद अमिताभ जैन नवंबर 2020 में छत्तीसगढ़ के चीफ सिकरेट्री अपाइंट किए गए थे। अमिताभ का टेन्योर सवा तीन साल से ज्यादा हो गया है। उनसे पहिले बीजेपी सरकार में ही विवेक ढांड पूरे चार साल सीएस रहे। रमन सिंह के सीएम रहने के दौरान डीएस मिश्रा और एमके राउत लाख प्रयास करते रहे मगर ढांड की कुर्सी को हिला नहीं पाए। लंबा कार्यकाल में दूसरे नंबर पर हैं पी जाय उम्मेन। वे सवा तीन साल सीएस रहे। अमिताभ अब उन्हें क्रॉस कर गए हैं। याने ढांड के बाद दूसरे नंबर पर। अमिताभ का अगले साल मई में रिटायरमेंट है। इससे पहले, इसी साल नवंबर में उनका चार साल हो जाएगा। याने इस साल नवंबर में वे ढांड का रिकार्ड ब्रेक कर देंगे। ढांड की तरह अमिताभ भी माटी पुत्र हैं। दल्लीराजहरा के रहने वाले अमिताभ मध्यप्रदेश हायर सेकेंड्री बोर्ड में मेरिट में टॉप आए थे। दो बार वे सेंट्रल डेपुटेशन कर चुके हैं। भारत सरकार में रहने के दौरान लंदन में भी पोस्टेड रहे।

चुनौतीपूर्ण पोस्टिंग

छत्तीसगढ़ कैडर के एक आईएएस अफसर को एक बड़ी चुनौतीपूर्ण पोस्टिंग मिली है। उनके लिए दुनिया की सीमा कोई मायने नहीं रखेगी। इस विभाग में आमतौर पर आईपीएस ज्यादा जाते हैं। क्योंकि, आईपीएस के नेचर का ये काम है। मगर प्रतिनियुक्ति पर चल रहे आईएएस अधिकारी अपनी इच्छा से इस विभाग में गए हैं। यह पोस्टिंग काफी संवेदनशील मानी जाती है लिहाजा, उसका नाम नहीं लिखा जा सकता।

सचिवों की पोस्टिंग

अप्रैल के फर्स्ट वीक में सेंट्रल डेपुटेशन से दो आईएएस अफसर छत्तीसगढ़ लौटेंगे। इनमें ऋचा शर्मा और सोनमणि बोरा शामिल हैं। ऋचा एसीएस लेवल की हैं तो सोनमणि प्रिंसिपल सिकरेट्री। दो सीनियर सिकरेट्रीज के आने पर उनकी पोस्टिंग के लिए एक और प्रशासनिक सर्जरी की जाएगी। इसके लिए कुछ सचिवों के पास अतिरिक्त प्रभार है, उसे कम किया जाएगा। छत्तीसगढ़ में सचिवों की संख्या जिस तरह बढ़ रही है, उससे आने वाले समय में वे विभागों के लाले पड़ जाएंगे। याने नीचे लेवल पर अब सचिवों को अब एकाध विभागों से संतोष करना पड़ेगा। वरना, पिछले डेढ़ दशक से अधिकांश सचिव दो-दो, तीन-तीन विभाग संभालते रहे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. छत्तीसगढ़ में संघ और संगठन में से इस समय किसका पौव्वा भारी चल रहा है?

2. मुख्यमंत्री की दौड़ में आगे चलने वाले उप मुख्यमंत्री अरुण साव सियासत में पीछे कैसे हो रहे हैं?