सोमवार, 6 जुलाई 2020

आईएएस की गिरफ्तारी?

तरकश, 5 जुलाई 2020
संजय के दीक्षित
छत्तीसगढ़ के एक आईएएस के खिलाफ अपराध दर्ज हो गया…सरकार ने बड़ी कार्रवाई भी कर दी। लेकिन, उनकी गिरफ्तारी नहीं होगी। पता चला है, पुलिस जांच के बाद कोर्ट में चालान पेश कर देगी। अब कोर्ट पर निर्भर करेगा कि अफसर को बेल दे या जेल भेज दे। पुलिस के हाथ पीछे करने की एक वजह यह भी है कि मामला आम सहमति का था। व्हाट्सएप पर देर रात तक हुई वार्तालाप और स्माईली का आदान-प्रदान इसकी चुगली कर रहे हैं। दोनों ओर से खतरनाक टाईप की फोटुओं का आदान-प्रदान किया गया है कि जांच में शामिल महिला अधिकारी भी झेंप गईं। बहरहाल, केस अब इस स्थिति में पहुंच गया है कि अफसर का ज्यादा नुकसान नहीं होगा।

पीसीसीएफ की मुसीबत

सूबे के अधिकारियों में पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी का पलड़ा सबसे भारी माना जाता है। दरअसल, वे माटीपुत्र हैं….प्रैक्टिकल भी। रिजल्ट भी देते हैं। लेकिन, लोग चैंके तब, जब उनके सबसे विश्वसनीय रायपुर के सीसीएफ एसएसडी बड़गैया का कांकेर ट्रांसफर हो गया। हालांकि, कांकेर भी वन विभाग का अहम सर्किल है। लेकिन, राजधानी रायपुर की बात अलग है। बड़गैया का कांकेर जाना निश्चित तौर पर पीसीसीएफ को अखड़ा होगा। क्योंकि, अब प्रोटोकाॅल समेत अन्य सारा लोड अब पीसीसीएफ पर आ जाएगा। दरअसल, पीसीसीएफ सहज उपलब्ध होते हैं…और लोग छोटे से काम के लिए उन्हें फोन खड़का डालते हैं।

एडीजी का लकी बंगला

एक एडीजी का जीई रोड से लगा शांति नगर का बंगला बेहद लकी था। इसी बंगले से वे बिलासपुर का आईजी बनकर गए। और, भी कई गुड न्यूज इस बंगले से उन्हें मिले थे। उनके बिलासपुर जाने के बाद समीर विश्नोई और उनके बाद शिखा राजपूत को यह मकान आबंटित हो गया। शिखा पिछले साल बेमेतरा की कलेक्टर बनकर गई तो एडीजी ने फिर भिड़-भाड़कर यह बंगला अपने नाम एलाॅट कराया। मकान खाली कराने के लिए उन्हें कम पापड़ नहीं बेलने पड़े। एक शीर्ष ब्यूरोक्रेट्स ने इसमें उनकी मदद की। एडीजी ने बंगले का कंप्लीट जीर्णोद्धार कराया। 2028 तक उनकी सर्विस है। इस दृष्टि से उनकी पूरी तैयारी थी कि डीजीपी बनते तक इस बंगले में रहना होगा। मगर चैत्र नवरात्रि में वे गृह प्रवेश करने वाले थे कि कोरोना आ गया। और, पिछले हफ्ते एक दूसरा ही कोरोना आ गया। उपर से पैगाम आया, घर लौटा दीजिए….राजधानी के शांति नगर को दिल्ली का कनाॅट प्लेस बनाना है। सिर्फ पुलिस अधिकारी का ही नहीं, उस इलाके में रहने वाले अफसरों को एडीएम का फोन जा रहा, 24 घंटे में घर खाली कर दीजिए। जाहिर है, एडीजी को पीड़ा तो होगी ही, गृह प्रवेश से पहले ही लकी बंगला टूट जाएगा। ध्यान रहे, यह बंगला समीर और शिखा के लिए भी लकी रहा। दोनों, यहां से कलेक्टर बनकर गए थे।

एसपी का मोरल डाउन न हो

कोंडागांव एसपी से पीसीसी अध्यक्ष मोहन मरकाम बेहद नाराज थे। इतने कि सरकार से शिकायत करने की बजाए मीडिया में फूट पड़े। हिन्दुस्तान मेें ऐसा दृष्टांत शायद ही मिलेगा कि रुलिंग पार्टी का प्रेसिडेंट कैमरे पर एसपी के खिलाफ रिश्वत मांगने का आरोप लगाया हो। आमतौर पर अपनी पार्टी की सरकार के अफसरों पर इस तरह के आरोप इसलिए नहीं लगाए जाते क्योंकि कलेक्टर और एसपी सरकार के नुमाइंदे होते हैं। बहरहाल, सरकार ने कोंडागांव एसपी को हटाकर जशपुर भेज दिया है। समझा जाता है कि एसपी का मोरल डाउन न हो, इसलिए एकदम से छुट्टी करने की जगह उन्हें दूसरे जिले में भेज दिया गया।

टाॅप फाइव मंडल

सूबे में राजनीतिक नियुक्तियों वाले बोर्ड और कारपोरेशनों की संख्या भले ही दो दर्जन से अधिक होगी मगर माल-मसाला वाला तो पांच ही मान सकते हैं। सीएसआईडीसी, माईनिंग कारपोरेशन, कर्मकार मंडल, हाउसिंग बोर्ड, पर्यटन मंडल। इनमें खोखा की कल्पना किया जा सकता है। बाकी दर्जन भर निगम-मंडल ऐसे हैं, जिनमें लेवल से नीचे उतरेंगे तो पेटी का इंतजाम हो पाएगा। इनके अलावा बाकी में गाड़ी, आफिस मिल जाए, तो बहुत है। पिछली सरकार में एक बोर्ड के प्रमुख ने गाड़ी खरीदकर किराये में अपने लिए लगवा ली थी। तीन साल में उनकी गाड़ी फ्री हो गई। बस यही, इससे अधिक कुछ नहीं।

एडीजी का लकी बंगला

एक एडीजी का जीई रोड से लगा शांति नगर का बंगला बेहद लकी था। इसी बंगले से वे बिलासपुर का आईजी बनकर गए। और, भी कई गुड न्यूज इस बंगले से उन्हें मिले थे। उनके बिलासपुर जाने के बाद समीर विश्नोई और उनके बाद शिखा राजपूत को यह मकान आबंटित हो गया। शिखा पिछले साल बेमेतरा की कलेक्टर बनकर गई तो एडीजी ने फिर भिड़-भाड़कर यह बंगला अपने नाम एलाॅट कराया। मकान खाली कराने के लिए उन्हें कम पापड़ नहीं बेलने पड़े। एक शीर्ष ब्यूरोक्रेट्स ने इसमें उनकी मदद की। एडीजी ने बंगले का कंप्लीट जीर्णोद्धार कराया। 2028 तक उनकी सर्विस है। इस दृष्टि से उनकी पूरी तैयारी थी कि डीजीपी बनते तक इस बंगले में रहना होगा। मगर चैत्र नवरात्रि में वे गृह प्रवेश करने वाले थे कि कोरोना आ गया। और, पिछले हफ्ते एक दूसरा ही कोरोना आ गया। उपर से पैगाम आया, घर लौटा दीजिए….राजधानी के शांति नगर को दिल्ली का कनाॅट प्लेस बनाना है। सिर्फ पुलिस अधिकारी का ही नहीं, उस इलाके में रहने वाले अफसरों को एडीएम का फोन जा रहा, 24 घंटे में घर खाली कर दीजिए। जाहिर है, एडीजी को पीड़ा तो होगी ही, गृह प्रवेश से पहले ही लकी बंगला टूट जाएगा। ध्यान रहे, यह बंगला समीर और शिखा के लिए भी लकी रहा। दोनों, यहां से कलेक्टर बनकर गए थे।

एसपी का मोरल डाउन न हो

कोंडागांव एसपी से पीसीसी अध्यक्ष मोहन मरकाम बेहद नाराज थे। इतने कि सरकार से शिकायत करने की बजाए मीडिया में फूट पड़े। हिन्दुस्तान मेें ऐसा दृष्टांत शायद ही मिलेगा कि रुलिंग पार्टी का प्रेसिडेंट कैमरे पर एसपी के खिलाफ रिश्वत मांगने का आरोप लगाया हो। आमतौर पर अपनी पार्टी की सरकार के अफसरों पर इस तरह के आरोप इसलिए नहीं लगाए जाते क्योंकि कलेक्टर और एसपी सरकार के नुमाइंदे होते हैं। बहरहाल, सरकार ने कोंडागांव एसपी को हटाकर जशपुर भेज दिया है। समझा जाता है कि एसपी का मोरल डाउन न हो, इसलिए एकदम से छुट्टी करने की जगह उन्हें दूसरे जिले में भेज दिया गया।

टाॅप फाइव मंडल

सूबे में राजनीतिक नियुक्तियों वाले बोर्ड और कारपोरेशनों की संख्या भले ही दो दर्जन से अधिक होगी मगर माल-मसाला वाला तो पांच ही मान सकते हैं। सीएसआईडीसी, माईनिंग कारपोरेशन, कर्मकार मंडल, हाउसिंग बोर्ड, पर्यटन मंडल। इनमें खोखा की कल्पना किया जा सकता है। बाकी दर्जन भर निगम-मंडल ऐसे हैं, जिनमें लेवल से नीचे उतरेंगे तो पेटी का इंतजाम हो पाएगा। इनके अलावा बाकी में गाड़ी, आफिस मिल जाए, तो बहुत है। पिछली सरकार में एक बोर्ड के प्रमुख ने गाड़ी खरीदकर किराये में अपने लिए लगवा ली थी। तीन साल में उनकी गाड़ी फ्री हो गई। बस यही, इससे अधिक कुछ नहीं।

संसदीय सचिव का झुनझुना

विधायकों की तुष्टिकरण के लिए संसदीय सचिव बनाने की चर्चा चल रही है। मगर संसदीय सचिव का फार्मूला झुनझुना से ज्यादा नहीं है। संसदीय सचिवों को एक गाड़ी मिल जाएगी, पीए और बंगला। इसके अलावा और कुछ नहीं। कहने के लिए सरकार मंत्रियों के साथ उन्हें अटैच कर देती है मगर कागजों में कोई अधिकार नहीं। अधिकारी उन्हीं की सुनते हैं, जिनके पास फाइल जाती है। विभागीय कामकाजों में मंत्री संसदीय सचिवों को फटकने नहीं देते। कुल मिलाकर झुनझुना ही है संसदीय सचिव।

सुप्रीम कोर्ट में केस

रमन सरकार द्वारा संसदीय सचिवों की नियुक्ति के खिलाफ वन और आवास, पर्यावरण मंत्री मोहम्मद अकबर ने हाईकोर्ट में रिट दायर की थी। सामाजिक कार्यकर्ता राकेश चैबे ने भी। हिमाचल हाईकोर्ट द्वारा संसदीय सचिवों की नियुक्ति निरस्त करने का हवाला देते हुए राकेश चैबे की एक पिटीशन सुप्रीम कोर्ट में लगी है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस भी जारी किया था। याने संसदीय सचिवों की नियुक्ति अगर होती भी है तो उन पर हमेशा तलवार लटकी रहेगी।

आईपीएस, पपीता और कोरोना

पुराने पुलिस मुख्यालय में नौ लोग कोरोना पाॅजिटिव निकले हैं, उनमें इंटरेस्टिंग यह है कि एसआईबी बिल्डिंग में एक आईपीएस को भृत्य पपीता काटकर खिला रहा था, उसी दौरान एम्स से फोन आया कि फलां बोल रहे हो….भृत्य ने कहा, हां। उधर से जवाब मिला, आपका सेम्पल पाॅजिटिव आया है। भृत्य ने अफसर को कुछ नहीं बताया, धीरे से मोबाइल को जेब में रख लिया। बाहर जाकर उसने अपने साथियों को इस बारे में बताया तो हड़कंप मच गया। एसआईबी बिल्डिंग में तीन सीनियर आईपीएस बैठते हैं। अब इनमें से कितने क्वारंटाईन हुए हैं, इसकी जानकारी नहीं है।

पुनिया से प्रेरणा

कोरोना के बावजूद कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया दिल्ली से रायपुर आए। उनसे कई कांग्रेस नेताओं को प्रेरणा मिली…जब 70 प्लस के पुनिया जी कोरोना में बहादुरी के साथ दौरे कर रहे हैं तो फिर हम क्यों डरें। लाल बत्ती की दौड़ में शामिल नेता कोरोना के चलते मन-मसोसकर दिल्ली नहीं जा पा रहे थे, वे अब दिल्ली की टिकिट कटाने लगे हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. एक ऐसे मंत्रीजी का नाम बताइये, जो सिर्फ कैबिनेट की बैठक में नजर आते हैं, उसके अलावा और कहीं नहीं?
2. किस मंत्री की नाराजगी का खामियाजा एक अहम जिले के एसपी को उठाना पड़ सकता है?

रविवार, 28 जून 2020

मंत्री के अच्छे दिन

तरकश, 28 जून 2020
संजय के दीक्षित
भूपेश कैबिनेट के जिन चार मंत्रियों की छंटनी की खबर अक्सर वायरल होती रहती है, उनमेें राजस्व मंत्री जय सिंह अग्रवाल का नाम भी लिया जाता है। जय सिंह समर्थकों की परेशानियां भी कुछ दिनों से काफी बढ़ गई थीं। लेफ्ट-राइट कहे जाने वाले उनके कुछ लोगों ने कानून की खौफ से कोरबा छोड़ दिया है। लेकिन, अब पता चला है कि जय सिंह का उपर में सब कुछ ठीक-ठाक हो गया है। सारे गिले-शिकवे दूर हो गए हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जय सिंह भरोसा जताते हुए उन्हें मरवाही उपचुनाव के लिए प्रभारी अपाइंट किया है। लगातार दो विधानसभा उपचुनाव में जीत दर्ज करने वाली कांग्रेस पार्टी के लिए मरवाही उपचुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न होगा। ऐसे चुनाव की कमान अगर जय सिंह को सौंपा गया है तो जाहिर तौर पर जय सिंह की अहमियत सरकार ने बढ़ाई है। कह सकते हैं, जय सिंह के अच्छे दिन आ गए हैं। 

ब्यूरोक्रेट्स और शराब


शराब पावर बढ़ाने का काम करती है…ऐसी कि भिखारी भी अपने को सेठ भिखमचंद समझने लगता है। ऐसी शक्तिशाली औषधि को अगर ब्यूरोक्रेट्स जैसे पावरफुल लोग ग्रहण करें तो आप समझ सकते हैं, क्या होता होगा। आईएएस तो नार्मल सिचुएशन में देश चलाते हैं। दो पैग जाने के बाद तो सीएम, पीएम उसे बौने लगने लगते हैं….अरे ये तो पांच साल के लिए हैं, हम 30 साल वाले। दरअसल, उनसे चूक भी यहीं होती है। हालांकि, होशियार अफसर शुरू होते ही मोबाइल बंद कर देते हैं। क्योंकि, मोबाइल हाथ में पकड़े तो गड़बड़ होगा ही….लगेंगे फोटो मांगने और भेजने। एमपी के हनी ट्र्रैप कांड में भी यही हुआ। व्हाट्सएप चेटिंग ने पूरा खेल बिगाड़ा। और, छत्तीसगढ़ में भी। यहां तो पूरा मामला सेट हो गया था। लेनदेन के बाद रफा-दफा भी। लेकिन, अंगूर की बेटी ने आईएएस का कैरियर तबाह कर दिया। आईएएस के साथ दिक्कत यह है कि शराब के शौकीन हैं लेकिन, थोड़े से ही में नियंत्रण खो देते हैं। उन्होंने रात में अपने इलाके के एक छत्रप के बारे में अनाप-शनाप बक दिया। उसके दो दिन बाद वकील लगाकर हो गई शिकायत। आईएएस निबट गए। अफसरों को इस घटना से सबक लेना चाहिए…चुपचाप डूबकी लगा लेने वाले मंत्रालय के अपने सीनियर अफसरों से सीख भी।

मंत्रियों, अफसरों पर संकट

राजधानी के प्राइम और पावरफुल इलाका शंकर नगर, शांति नगर का स्वरूप अब बदल जाएगा। कई महीनों से अटके इस प्रोेजेक्ट के लिए सरकार ने काम जल्द शुरू करने का आदेश जारी कर दिया है। 19.8 एकड़ में पसरे इस इलाके में मंत्रियों और बड़े अधिकारियों के बंगले हैं। इन्हें तोड़कर शाॅपिंग और रेसिडेंसियल काम्पलेक्स बनाए जाएंगे। उसके बीच में 16 एकड़ का सिटी पार्क भी बनेगा। दावा है, दिल्ली के कनाॅट प्लेस जैसा। 80 फीसदी एरिया ग्रीनरी होगा। हाउसिंग बोर्ड को यह जिम्मा दिया गया है। मगर इस खबर से इस इलाके में बरसों से रह रहे सरकारी अधिकारियों की धड़कनें बढ़ जाएगी। 117 से अधिक मंत्री, आईएएस, आईपीएस से लेकर छोटे लेवल के अधिकारियों के वहां आवास हैं। गरीबों की झुग्गी-झोपडियों की तरह पहली बार पावरफुल लोगों को बेदखल होना पड़ेगा। हालांकि, अभी तक तो उन्हें यह हवा-हवाई लगता था। लेकिन अब सरकार ने आदेश कर दिया है तो किसी भी टाईम उन्हें नोटिस मिल सकती है…घर खाली कीजिए। अब उनके पास दो ही रास्ते होंगे….या तो 30 किलोमीटर दूर नया रायपुर जाएं या फिर अपने निजी आवासों में शिफ्थ हो जाएं। इनमें 99 फीसदी से अधिक अफसर ऐसे होंगे, जिनके पास राजधानी में दो से अधिक खुद के मकान होंगे। लेकिन, शंकर नगर के सरकारी बंगलों के अपने मजे हैं। इसलिए, उनके लिए यह संकट की स्थिति है।

पुलिस कमिश्नर सिस्टम

देश में कांग्रेस सरकारों ने पुलिस कमिश्नर सिस्टम चालू किया था। अब तो इस साल उत्तर प्रदेश सरकार सरकार ने कई जिलों में पुलिस कमिश्नर बिठा दिया। हिन्दी प्रदेशों में सिर्फ राजस्थान, एमपी, बिहार और छत्तीसगढ़ बचा है। साउथ और नार्थ ईस्ट में पहले ही हो चुका है। रमन सरकार के समय भी रायपुर में पुलिस कमिश्नर पोस्ट करने की कई बार चर्चाएं चली लेकिन, ब्यूरोक्रेसी तैयार नहीं हुई। सो, बात आई, गई चली गई। अब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है। ब्यूरोक्रेसी भी इस स्थिति में नहीं है कि अगर-मगर कर सकें। ऐसे में, इन चर्चाओं में दम हो सकता है कि कम-से-कम रायपुर में कमिश्नर सिस्टम प्रारंभ किया जा सकता है। रायपुर जिले की आबादी 17 लाख के करीब हो चुकी है। राजधानी होने के कारण क्राईम भी है। ये जरूर है कि कमिश्नर प्रणाली से कलेक्टर के पावर कम हो जाएंगे। दंडाधिकारी से लेकर लायसेंस प्रदान करने तक के अधिकारी कमिश्नर को मिल जाएंगे।

संविदा में भी खतरा

नौकरशाहों को अगर संविदा पोस्टिंग मिलती है, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं कि 70 बरस एक्सटेंशन मिलता रहेगा। जैसा पिछली सरकार में होता रहा। आईएएस सुरेंद्र जायसवाल को सरकार ने पिछले साल रिटायरमेंट की शाम को ही संसदीय विभाग का सचिव के साथ ही राजभवन का सचिव की संविदा पोस्टिंग दी गई थी, तो लोग चैंक गए थे। तीन महीने बाद उन्हें राजभवन और मंत्रालय से हटाकर पंचायत विभाग के ट्रेनिंग संस्थान निमोरा का डायरेक्टर बनाया गया। एक बरस की संविदा नियुक्ति 31 मई को समाप्त हो गई। सरकार ने उन्हें एक्सटेंशन नहीं दिया।

अंत में दो सवाल आपसे

1. छत्तीसगढ़ के एक मंत्री का नाम बताएं, जो रात नौ बजे होशियार आईएएस की तरह अपना मोबाइल बंद कर देते हैं?
2. आपकी दृष्टि में सरकार में किस आईएएस की सबसे ज्यादा चल रही होगी?

रविवार, 21 जून 2020

हाफ पैंट वाले मंत्रीजी

तरकश, 21जून 2020
संजय के. दीक्षित
भूपेश सरकार के एक होनहार मंत्री के वर्किंग सिस्टम से विभाग के अधिकारी काफी असहज महसूस कर रहे हैं। एक तो दिन चढ़ने के बाद मंत्रीजी की सुबह होती है। उस पर वे झटपट तैयार नहीं होते। चाय से पहिले गुटखा चाहिए। इसके बाद टीवी चालू। अफसर बेचारे फाइल धरे बैठे हैं, तो बैठे रहे। कई बार तो हाफ पैंट पहिने मीटिंग हो जाती है। ऐसी ही एक मीटिंग के बाद मंत्रालय की एक महिला आईएएस खफा हो गईं….मंत्रीजी ने महिला होने का भी लिहाज नहीं किया, हाफ पैंट में सोफे में बैठे मीटिंग शुरू कर दी। वैसे भी, मंत्रीजी के विभाग के लोगों का कहना है, विभाग मंत्री नहीं उनका पीए चला रहा है। मंत्री तो फाइल पढ़ने की जहमत भी नहीं उठाना चाहते…पीए जैसा उन्हें असिस्ट करता है, मंत्रीजी नोटशीट में लिख देते हैं। वैसे, उटपटांग दिनचर्या के मामले में पूर्ववर्ती सरकार के दो सीनियर मंत्रियों के नाम भी आते हैं, लेकिन, काम और विभाग पर पकड़ के मामले में उनका कोई जोर नहीं था।

सिकरेट्री और 40 एसी

आपको याद होगा….भाजपा सरकार के दौरान बड़े पद पर बैठे एक नेता के सरकारी बंगले में 24 एसी लगने पर सूबे में बड़ा बवाल हुआ था। नेशनल मीडिया में ये खबर सुर्खिया बटोरी थी। ऐसा ही मामला एक सिकरेट्री के यहां 40 एसी का आया है। अब इतनी संख्या में एसी कहां लगवाया गया, ये तो जांच का विषय है। मगर यह सही है कि 40 एसी के लिए पैसे का बंदोबस्त किया गया है। एक विभाग के पास राज्य के विभिन्न जगहों पर 75 से अधिक आफिसेज हैं। मगर उनमें से 40 ऐसे हैं, जहां से कलेक्शन बढ़ियां आता है। विभाग के सिकरेट्री के पीए ने उन 40 आफिसों के प्रमुखों को एक-एक कर रायपुर बुलाया और बताया कि सिकरेट्री साब के बंगले में एसी लगाना है, उसके लिए कुछ चाहिए…एक काम करो, 50 हजार छोड़ जाओ। इस तरह एक झटके में 20 लाख। जाहिर सी बात है कि अफसर के बंगले में 40 एसी तो लगेंगे नहीं। बताते हैं, कोरोना लाॅकडाउन में जो नुकसान हुआ है, उसे कंपनसेट करने के लिए सूबे के कई अधिकारियों ने इस तरह का नायाब आइडिया निकाला है।

अफसर क्या करें?

जिन अफसरों ने सिकरेट्री के बंगले में एसी लगाने पैसा दिया, उसके कुछ रोज बाद विभागीय मंत्री के पीए का फोन आया। एक अफसर पीए से मिलने बंगले पहुंचे तो बताया गया, मंत्री होने के कारण खर्चे काफी हो जाते हैं…कार्यकर्ताओं से लेकर पार्टी और मीडिया तक को हैंडिल करना पड़ता है। मंत्रीजी के समधी के यहां 15 छोड़ देना। अफसर भी तेज। बोले…इतना हो नहीं सकता। बाद में दो में फायनल हुआ। जिस अफसर का जिक्र हो रहा, वह वीवीआईपी डिस्ट्रिक्ट में पोस्टेड है। समझ सकते हैं, मंत्रियों के खटराल पीए वीवीआईपी जिले को भी नहंी छोड़ रहे। दुःसाहस की ये पराकष्ठा होगी।

स्पाॅट पर आदेश

नवा रायपुर की तरह अब रायपुर में नवा मरीन ड्राईव भी बनने जा रहा। और, इसमें अच्छी बात यह हुई कि दो मंत्री चीफ सिकरेट्री के साथ स्पाॅट पर पहुंचे और वहीं इस प्रोजेक्ट पर मुहर लगा दी। दरअसल, मैगनेटो माॅल के आगे कृषि विवि के सामने अवंती विहार तरफ तीन किलोमीटर में फैला बड़ा तालाब है। उसके सामने रोड पर कृषि इंजीनियरिंग का आफिस। तालाब नगरीय प्रशासन मंत्री शिव डहरिया के विभाग में आता है और कृषि इंजीनियरिंग कृषि मंत्री रविंद्र चैबे के विभाग में। सीएम भूपेश बघेल ने सीएस आरपी मंडल से कहा कि दोनों मंत्रियों को लेकर मौके पर जाएं। स्पाॅट का जायजा लेने के बाद दोनों मंत्रियों ने तुरंत इसे ओके कर दिया। कृषि विभाग ने बिल्डिंगों को हटाने का आदेश भी दे दिया है। अब रायपुर और नवा रायपुर के बीच एक नवा मरीन ड्राईव होगा। चूकि एरिया बड़ा है और खुला भी, इसलिए दावा किया जा रहा, वह पुराने मरीन ड्राईव से कई गुना बेहतर होगा। इसे आक्सीजोन की तरह डेवलप किया जाएगा। तेलीबांधा मरीन ड्राईव को नगरीय प्रशासन सिकरेट्री रहते आरपी मंडल ने डेवलप किया था। सरकार के निर्देश पर अब वे नवा मरीन ड्राईव बनाएंगे।

भूमिहीनों को पैसा

सरकार एक अहम योजना पर काम कर रही है। भूमिहीनों को हर महीने उनके खाते में जीवकोपार्जन के लिए निश्चित राशि ट्रांसफर करने का। सीएम भूपेश बघेल ने अफसरों को निर्देश दिया है कि इसका पूरा डिटेल तैयार करें कि इस पर कितना खर्च आएगा। जिले वाइज भूमिहीनों का डेटा तैयार होना प्रारंभ हो गया है। सरकार जल्द ही इसका ऐलान करेगी। इस योजना में उन्हें बड़ी राहत मिलेगी, जिनके पास जमीन नहीं है और ओवरएज के बाद मजदूरी करने से लाचार हो जाते हैं।

पोस्टिंग में बड़ी चूक?

हाथियों की मौत मामले में बलरामपुर के डीएफओ प्रणय मिश्रा को रायबरेली कनेक्शन होने के बाद भी वन विभाग ने हटा दिया। लेकिन, जिन्हें भेजा गया है, उनकी काबिलियत के बारे में सुनकर आप चकरा जाएंगे। लक्ष्मण सिंह एसडीओ स्तर के अधिकारी हैं। भांति-भांति के मामलों में कई बार सस्पेंड हो चुके हैं। एक बार बर्खास्त भी। उनका सीआर इतना स्ट्रांग है कि उन्हें कभी आईएफएस अवार्ड नहीं हो सकता। बलरामपुर सूबे का सबसे बड़ा फाॅरेस्ट डिविजन है। सबसे अधिक बजट वाला भी। पता चला है, लक्ष्मण के लिए किसी विधायक का बड़ा प्रेशर था। लगता है, प्रेशर में वन विभाग से बड़ी चूक हो गई।

राजधानी का कप्तान कौन?

रायपुर के एसपी समेत आईपीएस की एक छोटी लिस्ट निकलनी थी, उसे फायनल होने में वक्त लग रहा है। एसएसपी आरिफ शेख की जगह रायपुर की कप्तानी संभालने वालों में अजय यादव और प्रशांत अग्रवाल के नाम सबसे उपर हैं। अजय दुर्ग के एसएसपी हैं और प्रशांत बिलासपुर के एसपी। रायपुर के लिए दो दिन अजय का नाम चलता है तो दो दिन प्रशांत का नाम उपर हो जा रहा। अब देखना है, इनमें से किसी को मौका मिलेगा या फिर कश्मकश में आरिफ को ही कंटीन्यू कर दिया जाए।

मराठी लाॅबी

आईएएस में कभी उड़ीया लाॅबी बड़ी स्ट्रांग होती थी। तब एसके मिश्रा, बीकेएस रे, डीएस मिश्रा, एमके राउत, सुब्रत साहू समेत उड़ीया अफसरों की संख्या भी काफी थी। इस समय अचानक मराठी आफिसर्स ठाक-ठाक पोजिशन में आ गए हैं। सिद्धार्थ परदेशी सीएम के सिकरेट्री हो गए हैं। जशपुर कलेक्टर से राजधानी लौटे नीलेश क्षीरसागर को डायरेक्टर एग्रीकल्चर। इस पोस्ट पर इतना यंग आईएएस कभी नहीं रहा। संदीपन भोस्कर एमडी रोड विकास निगम। डाॅ0 सर्वेश भूरे कलेक्टर दुर्ग। कैसर हक एमडी बिजली वितरण कंपनी। भीम सिंह के स्टार अचानक चमक गए वरना, अय्याज तंबोली भी कलेक्टर रायगढ़ बन गए होते। आईपीएस में आरिफ शेख पुणे से हैं। वे ईओडब्लू, एसीबी चीफ हो गए हैं। हालांकि, मराठी अफसरों में यूनिटी नहीं है। पड़ोस में रहकर एक-दूसरे से मिलते नहीं। यूनिटी के मामले में तमिलनाडू के अधिकारियों का जवाब नहीं है। उनका सब कुछ अपना पैरेलेल है। व्हाट्सएप ग्रुप भी। लाॅकडाउन में जूम के जरिये अफसर एक-दूसरे के संपर्क में रहे।

गुड न्यूज

जापान के एंबेसी ने 17 जून को वेबिनार के जरिये अपने देश के उद्योगपतियों के साथ भारत के जिन पांच राज्यों के साथ इवेस्टमेंट के लिए वेबिनार का आयोजन किया, उसमें महाराष्ट्र, गुजरात जैसे राज्यों के साथ छत्तीसगढ़ भी शामिल था। प्रमुख सचिव इंडस्ट्री मनोज पिंगुआ को वहां के उद्योगपतियों ने अश्वस्त किया कि जल्द ही वे छत्तीसगढ़ का विजिट करेंगे। पता चला है, बिजली, पानी और औद्योगिक शांति को लेकर जापान के एंबेसडर छत्तीसगढ़ से काफी प्रभावित हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. ऐसा क्यों कहा जाता है कि डीजीपी डीएम अवस्थी पर महाकाल की असीम कृपा है?
2. कांग्रेस के एक लक्ष्मीपुत्र नेता वन विभाग के अधिकारियों से किन बातों को लेकर कुपित हो गए हैं?

रविवार, 14 जून 2020

भूपेश की मीटिंग, जोगी की याद

तरकश, 14 जून 2020
संजय के. दीक्षित
पूर्व सीएम स्व0 अजीत जोगी का अफसरों से काम कराने का अंदाज जुदा था। वरिष्ठ नौकरशाहों को आज भी याद है…जोगी एक बार लेबर सिकरेट्री एमएस मूर्ति को कोई टास्क सौंपे थे। नियत समय पर काम हुआ नहीं। जोगी ने देर शाम मीटिंग बुलाई। मूर्ति ने कहा, सर….फाइल डायरेक्ट्रेट में है। जोगी भड़क गए। बोले, आज रात सोने से पहले फाइल मेरे टेबल पर आ जानी चाहिए। मैं फाइल पर दस्तखत करके सोउंगा। एक बार धान खरीदी के लिए जब बारदाना का शार्टेज हुआ तो दो आईएएस अफसरों को भरी मीटिंग से उठाकर कोलकाता भेज दिया था। 10 जून को सीएम भूपेश बघेल की मीटिंग में भी कुछ ऐसा ही हुआ। सीएम कलेक्टरों की मीटिंग ले रहे थे। आठ महीने से घूम रही एक फाइल के मामले में वे बिगड़ पड़े। बोले…फाइल आज ही होनी चाहिए…मैं बता देता हूं, आज रात डेट बदलने से पहले फाइल हो जानी चाहिए। कलेक्टरों को भी उन्होंने साफ वार्निंग दे दी….काम नहीं करना तो कलेक्टरी छोड़ दो। कलेक्टर कांफें्रस खतम होने के बाद सीनियर ब्यूरोके्रट्स जोगी को याद कर रहे थे…जोगीजी की भी काम कराने की यही शैली थी….टाईम मतलब टाईम।

सेल्फ स्टार्ट आईएएस

कलेक्टर कांफ्रेंस में सीएम भूपेश ने नौकरशाहों को स्पष्ट संदेश दे दिया कि काम नहीं करोगो तो हश्र बुरा होगा….काम नहीं तो वेतन नहीं मिलेगा। इतना सख्त लहजे में अफसरों को कभी नहीं चेताया गया होगा। दरअसल, डेढ़ साल में सीएम समझ गए हैं कि अफसर गोल बचाने की कोशिश में ज्यादा है। धक्कापलट। जितना धक्का देंगे, उतना चलेंगे। बात सही भी है। सुनील कुमार, विवेक ढांड, एमके राउत जैसे सेल्फ स्टार्ट और रिजल्ट देने वाले आईएएस अब बचे नहीं। ठीक-ठाक अफसरों को अगर काउंट किया जाए तो उंगली तीन, चार के बाद आगे नहीं बढ़ेगी। बहरहाल, नौकरशाहों को अब सीएम का संदेश समझ में आ जाना चाहिए। वरना, वही होगा, जो वर्तमान में सरकार ने किया है।

सरकार की नाराजगी

छत्तीसगढ़ में सरकारों के अफसरों पर नाराज होने के पहले भी कई मामले हुए हैं। पिछली सरकार ने लैंड के ही एक मामले में एक सीनियर महिला आईएएस को मंत्रालय से हटाकर बिलासपुर रेवन्यू बोर्ड भेज दिया था। केडीपी राव का मामला भी लोग भूले नहीं होंगे। केडीपी प्रिंसिपल सिकरेट्री थे। बीजेपी सरकार ने उन्हें डिमोशन करके बिलासपुर का कमिश्नर बना दिया था। केडीपी ने जब कैट में इसे चैलेंज किया तो सरकार ने कमिश्नर के पद को अपग्रेड करके पीएस लेवल का बना दिया। केडीपी ने आईएएस एसोसियेशन से मदद मांगने का प्रयास किया लेकिन एक अधिकारी उनके साथ नहीं आया। अजीत जोगी भी एक बार पुस्तक प्रकाशन में विलंब होने पर एक सिकरेट्री के उपर एक प्रिंसिपल सिकरेट्री को बिठा दिया था।

गीता का प्रमोशन

हार्वर्ड से मैनेजमेंट कोर्स करके लौटी आईएएस एम गीता को एपीसी मनिंदर कौर द्विवेदी के नीचे कृषि विभाग का सचिव बनाने की तैयारी थी। लेकिन, वक्त का पहिया कुछ ऐसा घूमा कि गीता खुद ही एपीसी के साथ कृषि सचिव बन गई। इसे ही कहते हैं, किस्मत। वरना, गीता से पहले जो अधिकारी बाहर से पढ़ाई करके लौटे या फिर डेपुटेशन से, उन्हें एकाध महीने बाद ही पोस्टिंग मिल पाई।

‘परदेशी’ पर भरोसा

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सिद्धार्थ कोमल परदेशी को अपना सिकरेट्री बनाया है। सीएम सचिवालय में टामन सिंह सोनवानी के पीएससी चेयरमैन बनने के बाद सिकरेट्री की जगह खाली थी। जाहिर है, युवा महोत्सव के आयोजन के बाद परदेशी का ग्राफ तेजी से आगे बढ़ा। सरकार ने एसीएस अमिताभ जैन के साथ उन्हें पीडब्लूडी का सिकरेट्री बनाया था। हाल ही में जैन को पीडब्लूडी से मुक्त कर दिया गया। याने परदेशी पर पूरा भरोसा। और अब सीएम के सिकरेट्री भी। हाई प्रोफाइल परिवार से ताल्लुकात रखने वाले परदेशी लो प्रोफाइल आईएएस हैं। बैलेंस भी। बहरहाल, उनकी नियुक्ति पर चुटकी ली जा रही…सरकार ने ‘परदेशी’ पर भरोसा किया।

दो कृषि सचिव

एम गीता को सरकार ने एपीसी के साथ ही सिकरेट्री एग्रीकल्चर बनाया है। गीता से पहले धनंजय देवांगन भी कृषि सचिव है। गीता की पोस्टिंग के बाद अब एक विभाग में दो सचिव हो गए हैं। पहले मनिंदर कौर द्विवेदी प्रमुख सचिव थीं। इसलिए, चल गया। लेकिन, अब या तो गीता को टाईम से पहले प्रमुख सचिव बनाना होगा। पिछले साल 95 बैच के गौरव द्विवेदी और मनिंदर कौर को सरकार ने प्रमुख सचिव प्रमोट किया था। गीता 97 बैच की हैं। उन्हें या तोे अब प्रमोट करना होगा या फिर धनंजय किसी दूसरे विभाग में शिफ्थ किए जाएंगे। बहरहाल, गीता को यह बड़ा ब्रेके मिला। एपीसी इम्पाॅर्टेंट पोस्ट होता है। सीएस के बाद दूसरे नम्बर का। छत्तीसगढ़ में आईएएस का टोटा है, इसलिए प्रिंसिपल सिकरेट्री को भी कई बार एपीसी बना दिया गया। वरना, एडिशनल चीफ सिकरेट्री रैंक के अफसर ही इस पोस्ट पर नियुक्ति पाते थे। मनिंदर कौर के पहले भी केडीपी राव एसीएस रैंक के ही एपीसी थे।

महिला कलेक्टर

छत्तीसगढ़ के दो बड़े जिले रायपुर और बिलासपुर में अभी तक कोई महिला कलेक्टर नहीं रही हैं। दुर्ग में रीना कंगाले कलेक्टरी कर चुकी हैं। अंबिकापुर में रीतू सेन, रायगढ़ में अलरमेल और शम्मी आबिदी। किरण कौशल फिलहाल कोरबा में हैं। हो सकता है कि रायपुर का यह मिथक टूट जाए। संकेत मिल रहे हैं कि आगे चलकर रायपुर में किसी लेडी कलेक्टर को मौका दिया जा सकता है।

आईएएस अवार्ड पर ग्रहण

छत्तीसगढ़ में आठ अफसरों को आईएएस अवार्ड होना है। इनमें सात पद राज्य प्रशासनिक सेवाओं के लिए है और एक अन्य सेवाओं से। अन्य सेवाओं के लिए एक पद पर तो कोई दिक्कत नहीं है। मगर राप्रसे के जिन सात अफसरों को मेरिट के आधार पर प्रमोशन देना है, उनका मामला सुप्रीम कोर्ट में है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इनकी नियुक्ति में भ्रष्टाचार के आरोपों को सही ठहराते हुए नियुक्ति निरस्त कर दी थी। ईओडब्लू में पीएससी के तत्कालीन चेयरमैन अशोक दरबारी, परीक्षा नियंत्रक बीपी कश्यप समेत सभी चयनित अफसरों के खिलाफ धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार के आधा दर्जन केस पहले से दर्ज हैं। याद होगा, मेरिट में होने के बाद वर्षा डोंगरे का सलेक्शन नहीं किया गया। वर्षा ने अब मुख्यमंत्री को पाती लिखी है कि ऐसे भ्रष्ट अफसरों को आईएएस अवार्ड न किया जाए। वैसे भी, किसी अधिकारी के खिलाफ अगर अपराधिक केस दर्ज है, तो उसे भारत सरकार प्रमोशन नहीं देता। राज्य सरकार ने जरूर इन अधिकारियों को लगातार पदोन्नति देती गई। लेकिन, अब जीएडी के अफसरों का कहना है कि केस होने के कारण राज्य या तो इनका नाम ही नहीं भेजेगी। या फिर भेजेगी तो फिर वहां केस डिसाइड होते तक लिफाफे में नाम बंद कर दिया जाएगा। इसकी भी एक समय सीमा है। अगर उस समय तक केस का फैसला नहीं होगा तो नीचे के अफसरों को आईएएस अवार्ड कर दिया जाएगा।

यंग अफसरों को मौका

आईपीएस में 94 बैच के तीन अधिकारियों को सरकार ने पोस्टिंग दे दी है। अफसरों के विभागों को देखकर कहा जा सकता है कि सीनियर अफसरों की जगह सरकार अब यंग अफसरों को मौका दे रही है। सरकार ने पहले पिछले साल ही आईजी बने आनंद छाबड़ा को खुफिया चीफ बनाया। और इसके बाद डीआईजी आरिफ शेख को ईओडब्लू, एसीबी चीफ। दोनों एडीजी रैंक के पद हैं। राजनीतिक दृष्टि से भी संवेदनशील। पीएचक्यू में सीआईडी के प्रमुख भी डीआईजी हैं। सीआईडी में हमेशा आईजी या एडीजी रहे हैं। पुराने लोगों को याद होगा, डीजीपी विश्वरंजन के दौर में भी एक बार पीएचक्यू में डीआईजी लेवल के अफसरों को अहमियत देकर अधिकांश विभागों का प्रमुख बना दिया गया था। बहरहाल, छाबड़ा और आरिफ अगर ठीक-ठाक परफर्म कर लिए तो कुछ दिन बार छत्तीसगढ़ की प्रभावशाली जोड़ी होगी।

अंत में दो सवाल आपसे

1. ब्यूरोक्रेसी में आजकल किस स्कैंडल की व्हाट्सएप चेटिंग खूब वायरल हो रही है?
2. पुलिस अधीक्षकों की निकलने वाली लिस्ट भी क्या अब लंबी हो सकती है?

शुक्रवार, 12 जून 2020

मंत्री, ब्यूरोक्रेट्स और हनी

तरकश, 7 जून 2020
संजय के. दीक्षित
मध्यप्रदेश के चर्चित हनी ट्रैप कांड की जांच में यह बात सामने आई थी कि छत्तीसगढ़ के कुछ नौकरशाहों और फाॅरेस्ट अफसरों ने भी उन हनियों के एनजीओ को करोड़ों के काम दिए थे। हाल के घटनाक्रम ने इस पर मुहर लगा दिया है कि एनजीओ को काम देने की आड़ में छत्तीसगढ़ में भी घिनौना खेल चल रहा है। मंत्रालय तक अछूता नहीं है। कुछ बड़े अधिकारियों के इन हनियों के इशारे पर नाचने की बात अब मंत्रालय के लिए नई नहीं है। और-तो-और, एक मंत्री के बारे में चर्चा है एनजीओ संचालिका ने उन्हें बुरी तरह अपने प्रभाव में ले लिया है। हालांकि, सरकारी खुफिया एजेंसी को भी इसके लिए कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। मंत्रालय में बेधड़क विचरती विषकन्याओं की खबर उसे क्यों नहीं होती….जब पूरे जांजगीर शहर को पता था कि वहां कलेक्ट्रेट में क्या चल रहा, तब खुफिया विभाग ने सरकार को फीडबैक क्यों नहीं दिया। ऐसे ही कामों के लिए ही तो सरकार ने खुफिया विभाग के लिए नौ करोड़ रुपए का आनआॅडिट बजट दे रखा है। हनियों से अफसरों के बचाव के बारे में सरकार को कुछ सोचना चाहिए।

एंटी चेम्बर बंद?

एनआरडीए सीईओ एसएस बजाज ने मंत्रालय में सिकरेट्री के कमरे के पीछे इस उद्देश्य से एंटी चेम्बर बनवाए थे कि व्यस्त कामकाज के बीच अधिकारी कुछ पल वहां आराम कर सकेंगे। लेकिन, जांजगीर कलेक्टर के एंटी चेम्बर में जो कुछ हुआ, उसके बाद मंत्रालय के एंटी चेम्बरों को बंद करने पर विमर्श शुरू हो गया है। हालांकि, ये जानकारी पुष्ट नहीं है मगर सुनने में आ रहा उपर लेवल पर इस पर चर्चा शुरू हो गई है। दरअसल, लंगोट के ढिले कुछ आईएएस अफसरों से सरकार को बदनामी का बड़ा खतरा है। याद होगा, पुराने मंत्रालय में एक महिला दूसरे मंजिल से कूदकर सुसाइड कर ली थी। सोशल मीडिया का वो युग नहंी था, इसलिए रफा-दफा करने में दिक्कत नहीं आई। नया मंत्रालय तो बना भी है बियाबान में। शाम पांच बजे के बाद कर्मचारी भी निकल लेते हैं। जांजगीर जैसी घटना की पुनरावृत्ति से बचने मंत्रालय के सिकरेट्री के एंटी चेम्बर अगर बंद कर दिया जाए, तो आश्चर्य नहीं।

दूसरे डीआईजी

राज्य सरकार ने एडीजी जीपी सिंह को ईओडब्लू, एसीबी चीफ को बदल दिया। उनकी जगह पर रायपुर के एसएसपी आरिफ शेख को इन जांच एजेंसियों का एडिशनल चार्ज दिया गया है। खबर है, वे अब ईओडब्लू और एसीबी में ही कंटीन्यू करेंगे। डीआईजी रहते दोनों जांच एजेंसियों की कमान संभालने वाले आरिफ दूसरे डीआईजी होंगे। राज्य बनने के बाद ईओडब्लू, एसीबी में पहली पोस्टिंग डीआईजी सुभाष अत्रे की हुई थी। वे प्रमोटी आईपीएस थे। अत्रे के बाद हमेशा आईजी या उससे उपर रैंक के अफसरों को ही दोनों जांच एजेंसियों का प्रमुख बनाया गया। डीएम अवस्थी, संजय पिल्ले और मुकेश गुप्ता आईजी में पोस्ट हुए थे और वहीं पर प्रमोट होकर एडीजी बनें। मुकेश गुप्ता तो डीजी भी। मुकेश के बाद ईओडब्लू चीफ बीके सिंह भी डीजी रहे। इस तरह देखें तो आरिफ को बहुत कम समय में बड़ी जांच एजेंसी की कमान मिल गई। आरिफ धमतरी, जांजगीर, बालोद, बलौदा बाजार, बस्तर, बिलासपुर और रायपुर के एसपी रह चुके हैं। याने सात जिलों की कप्तानी।

एसपी के ट्रांसफर

ईओडब्लू और एसीबी में काम ज्यादा होने के कारण आरिफ शेख के लिए अब रायपुर जिले का कप्तान बने रहना संभव नहीं हो पाएगा। लिहाजा, रायपुर में नए कप्तान की पोस्टिंग की जाएगी। रायपुुर के लिए तीन आईपीएस के नाम चल रहे हैं। दुर्ग के एसएसपी अजय यादव, बिलासपुर एसपी प्रशांत अग्रवाल और तीसरा जगदलपुर एसपी दीपक झा। तीनों में अजय यादव का पलड़ा भारी लग रहा है। वे सबसे सीनियर हैं। 2004 बैच के। डीआईजी भी हैं। भाजपा के फायर ब्रांड नेता स्व0 दिलीप सिंह जूदेव ने अजय को टारगेट करते हुए प्रशासनिक आतंकवाद चलाने का जो तीर छोड़ा था, रमन सरकार उसे झेल नहीं पाई। और, आनन-फानन में बिलासपुर एसपी से हटा दिया था। अजय यादव अब फिर से मेन ट्रेक पर हैं। बहरहाल, इन तीनों में से जिन्हें रायपुर लाया जाएगा, वहां दूसरा एसपी भेजना पड़ेगा। कुल मिलाकर एसपी ट्रांसफर का एक छोटा चेन बनेगा। इनमें तीन-चार और जिले का नम्बर लग सकते हैं।

अभिशप्त बैच?

आईपीएस के 94 बैच में तीन अफसर हैं। जीपी सिंह, एसआरपी कल्लूरी और हिमांशु गुप्ता। इस बैच का ग्रह-नक्षत्र ऐसा खराब चल रहा है कि बीजेपी सरकार ने लाख प्रयास के बाद भी टाईम से पहिले प्रमोशन नहीं दिया। कांग्रेस सरकार ने तीनों को प्रमोट करके न केवल एडीजी बनाया बल्कि अहम जिम्मेदारी भी सौंपी। लेकिन, तीनों सस्ते में विकेट गवांकर पेवेलियन लौट गए। कल्लूरी को जब सरकार ने ईओडब्लू का हेड बनाया तो राज्य के लोग आवाक रह गए थे। कुछ दिनों बाद कल्लूरी एडिशनल ट्रांसपोर्ट कमिश्नर बन गए। लेकिन, उसके बाद ग्रह-नक्षत्र ऐसा बिगड़ा कि वे पीएचक्यू में बिना विभाग के बैठे हैं। हिमांशु गुप्ता को सरकार ने एडीजी होने के बाद भी रेंज आईजी की पोस्टिंग दी थी। इसके बाद खुफिया चीफ। डीजीपी के बाद यह सबसे इम्पाॅर्टेंट पोस्टिंग मानी जाती है। लेकिन, बाउंड्री मारने के चक्कर में वे आसान कैच हो गए। 94 बैच के तीसरे बैट्समैन थे जीपी सिंह। जीपी बाॅल को समझ नहीं पाए। और, स्पिन होती बाॅल ने उनका विकेट उडा दिया। अब तीनों आईपीएस बिना विभाग के हो गए हैं। सुना है, तीनों को एक साथ विभाग देने पर सरकार विचार कर रही है। हो सकता है कि एसपी की पोस्टिंग के साथ ही तीनों एडीजी को भी जिम्मेदारी मिल जाए।

पांचवे आईएएस

जांजगीर के पूर्व कलेक्टर रेप के आरोप में सस्पेंड हो गए। उनको मिलाकर राज्य में सस्पेंड होने वाले आईएएस अफसरों की संख्या पांच पहुंच गई है। छत्तीसगढ़ बनने के बाद सस्पेंड होने वाले पहले आईएएस थे अजयपाल सिंह। तत्कालीन पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के खिलाफ 2005 में प्रेस कांफ्रेंस करने के आरोप में उन्हें निलंबित किया गया था। अजयपाल के बाद पी राघवन सस्पेंड हुए। राघवन के बाद एसीएस राधाकृष्णन करप्शन के आरोप में नपे। फिर बीएल अग्रवाल। और, अब जनकराम पाठक। पांच में से चार रेगुलर रिक्रूट्ड आईएएस हैं और एक पदोन्नत आईएएस।

लंबी लिस्ट

राज्य प्रशासनिक सेवाओं की पोस्टिंग लिस्ट किसी भी समय निकल सकती है। खबर है, सूची लगभग तैयार हो चुकी है। इनमें बड़ी संख्या में डिप्टी कलेक्टर, ज्वाइंट कलेक्टर और एडिशनल कलेक्टर शामिल हैं। ये संख्या करीब सौ से उपर जा सकती है। इनमें तीन केटेगरी बनाए गए हैं। पहला जो लंबे समय से जमे हैं, दूसरा जिनका पारफारमेंस ठीक नहीं और तीसरा जनप्रतिनिधियों के कंप्लेन।

मीडिया और मर्यादा

करिश्माई नेता अजीत जोगी के अंत्येष्टि के कुछ घंटे बाद ही सोशल मीडिया में जोगी कांग्रेस का कांग्रेस में विलय की खबरें वायरल होने लगी थी। यह वाकई विस्मयकारी था। आखिर, जोगी कांग्रेस के लीडर धर्मजीत सिंह को कहना पड़ा, यह दुख का समय है…प्लीज। सोशल मीडिया को अपनी मर्यादा की लकीर खुद तय करनी चाहिए। पार्टी का विलय या किसी नेता का पार्टी में प्रवेश जश्न का विषय होता है, दुख में ये कार्य कतई नहीं होते। सोशल मीडिया को उतावलेपन से बचना चाहिए।

अंत में दो सवाल आपसे

1. एजुकेशन लीव से लौटीं एम गीता को टामन सिंह सोनवानी के डायरेक्टर एग्रीकल्चर, शक्कर आयुक्त, एवियेशन का चार्ज दिया जाएगा या कोई और विभाग?
2. किसी विभाग के अधिकारियों को मंत्री के समधी और समधी के बेटे से मिलने के लिए कहा जा रहा है?

शनिवार, 30 मई 2020

मंत्रिमंडल में सर्जरी?



संजय के. दीक्षित
तरकश, 31 मई 2020
छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक सर्जरी होने के बाद अब मंत्रिमंडल में भी सर्जरी की अटकलें तेज हो गई है। दिसंबर 2018 में सरकार बनने के बाद भूपेश मंत्रिमंडल का एक बार विस्तार हुआ है। मंत्रिमंडल में एक खाली जगह पर अमरजीत भगत को मंत्री बनाया गया था। खबरों के अनुसार, भूपेश कैबिनेट के तीन मंत्रियों को ड्रॉप किया जा सकता है। इसमें क्षेत्रवार मंत्रियों की संख्या को बैलेंस किया जाएगा। सरगुजा संभाग में फिलवक्त तीन मंत्री हैं। टीएस सिंहदेव, प्रेमसाय सिंह और अमरजीत भगत। वहीं, बस्तर संभाग से सिर्फ कवासी लकमा। याने सिर्फ एक मंत्री। बताते है, मंत्रिमंडल के फेरबदल में ब्राम्हणों का प्रतिनिधित्व बढ़ाकर दो किए जाने की भी चर्चा है। अभी इस वर्ग से रविंद्र चौबे मंत्री हैं। कांग्रेस सरकार में सत्यनारायण शर्मा, रविंद्र चौबे, विधान मिश्रा, अमितेष शुक्ल मंत्री और पं0 राजेंद्र प्रसाद शुक्ला विधानसभा अध्यक्ष थे। इस समय ब्राम्हणों में सत्यनारायण शर्मा, अमितेष शुक्ल और अरूण वोरा मंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं। सत्यनारायण शर्मा अविभाजित मध्यप्रदेश में बड़े विभाग संभाल चुके हैं। अंदरखाने से जैसी खबरें आ रही हैं…फेरबदल अगर हुआ तो ट्राईबल और सामान्य वर्ग से नए चेहरे लिए जा सकते हैं।

पीएससी चेयरमैन कौन?

पीएससी के चेयरमैन केआर पिस्दा एक जून को रिटायर हो जाएंगे। उनकी जगह पर सरकार को नया चेयरमैन अपाइंट करना होगा। पिस्दा को रमन सरकार ने पीएससी चेयरमैन अपाइंट किया था, जब उनके रिटायरमेंट में साल भर से अधिक समय बचा था। यही वजह है कि वे तीन साल से अधिक समय तक इस पद पर रहे। वरना, रिटायरमेंट के बाद नियुक्त होने वाले नौकरशाहों को दो साल का ही समय मिल पाता है। क्योंकि, चेयरमैन का एज 62 साल है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हो सकता है….पिस्दा की तरह किसी प्रमोटी आईएएस को ये पद मिल जाए। एक साल के भीतर रिटायर होने वालों में सीएस डेहरे, बीएल बंजारे और टामन सिंह सोनवानी शामिल हैं। इनमें टामन सिंह सीएम सचिवालय में होने की वजह से जाहिर तौर पर सरकार के नजदीक हैं। वे डायरेक्टर एग्रीकल्चर भी हैं। पीएससी चेयरमैन के लिए टामन सिंह वजनी कंडिडेट प्रतीत होते हैं।

सिकरेट्री की लिस्ट

सिकरेट्री लेवल की आईएएस एम गीता हार्वर्ड में मैनेजमेंट का एक साल का कोर्स करके इंडिया आ गई हैं। उन्हें दिल्ली में क्वारेंटाईन किया गया है। अगले कुछ दिनों में वे वापस लौटेंगी तो उन्हें भी कोई विभाग मिलेगा। उधर, पीएससी में जिस अफसर की नियुक्ति होगी, उसका पद भी खाली होगी। अगर टामन सिंह का सलेक्शन हुआ तो विमानन और डायरेक्टर एग्रीकल्चर का पद खाली होगा। जाहिर है, मंत्रालय में एक छोटी ट्रांसफर लिस्ट निकलेगी, जिसमें इसी महीने रिटायर हो रहे डा0 आलोक शुक्ला की भी संविदा पोस्टिंग दी जाएगी।

चार महिला आईएएस

स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के विभाग में महिला आईएएस अधिकारियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही हैं। निहारिका बारिक हेल्थ डिपार्टमेंट की सिकरेट्र्री हैं। डॉ0 प्रियंका शुक्ला एनआरएचएम की एमडी। अब एसीएस रेणु पिल्ले को मेडिकल एजुकेशन का सिकरेट्री बनाया गया है। वहीं, बालोद की कलेक्टर रानू साहू को वाणिज्यिक कर कमिश्नर अपाइंट हुई हैं। याने सिंहदेव के विभाग में चार महिला आईएएस।

मंत्री पर तलवार!

भूपेश सरकार के एक मंत्री के खिलाफ एक महिला ने कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी से शिकायत की है। शिकायत के साथ उसने सीडी भी लगाई है। महिला ने अपने कंप्लेन में मंत्रीजी के खिलाफ गंभीर और संवेदनशील आरोप लगाई हैं। अब सबकी नजर सोनिया गांधी पर टिकी हैं कि वे अपनी सरकार के इस मंत्री के मामले में क्या निर्णय लेती हैं।

उम्मीदों की किरण

कलेक्टरों की नई पोस्टिंग में सरकार ने 2012 बैच के सभी छह आईएएस अफसरों को कलेक्टर बना दिया। जाहिर है, 12 बैच के लिए खुश होने का मौका है। लेकिन, अबकी चर्चा ये भी थी कि सरकार कलेक्टरी के लिए 2008 बैच तक क्लोज कर देगी। 2008 बैच की कलेक्टर शिखा राजपूत को सरकार ने आखिर वापिस बुला ही लिया। लेकिन, 2007 बैच के यशवंत कुमार और 2008 बैच के भीम सिंह की तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने अपने बैच के अफसरों में उम्मीद की किरण कायम रखीं हैं। उन्हें देखकर सात और आठ बैच वाले अभी भी कलेक्टर बनने की उम्मीद तो रख ही सकते हैं।

बिजनेस क्लास पर रोक

सरकार ने नौकरशाहों के प्लेन में बिजनेस क्लास में सफर पर रोक लगा दी है। अभी तक प्रिंसिपल सिकरेट्री और उसके उपर के अफसरों को बिजनेस क्लास में सफर की पात्रता थी। हालांकि, बाकी प्रदेशों में एसीएस को ये छूट मिलती है। छत्तीसगढ़ में भी पहले ऐसा ही था। लेकिन, रमन सरकार में फायनेंस का कीड़ा कहे जाने वाले एक प्रमुख सचिव ने आदेश में संशोधन कराकर एसीएस से डाउन कर प्रमुख सचिव की पात्रता करा लिया था। इकॉनामी क्लास की तुलना में बिजनेस क्लास का किराया करीब चार गुना अधिक होता है। हालांकि, एक बेहद सीनियर आईएएस पात्रता के बाद भी कभी बिजनेस क्लास में सफर नहीं करते। दो-एक बार अवसर ऐसे भी आएं हैं कि दिल्ली से लौटते समय वे पीछे की इकॉनामी सीट पर बैठे पाए गए और उनसे जूनियर अफसर आगे बिजनेस क्लास में। परकाष्ठा तो ये भी है कि मीटिंग की जानकारी पहले से होने के बाद भी अधिकारी प्लेन की टिकिट आखिरी समय में बुक कराते हैं, जिससे बिजनेस क्लास की 25 हजार की टिकिट कई बार 35 से 40 हजार में मिलती है। अब सरकारी खजाने से हवा में उड़ान भरना है तो चिंता काहे की।

पांच महीने का कलेक्टर

सरकार ने लंबे समय से प्रतीक्षारत प्रमोटी आईएएस छतर सिंह डेहरे को कलेक्टरी का तोहफा दिया। वे ऐसे समय पर कलेक्टर बने हैं, जब उन्होेंने उम्मीद छोड़ दी होगी। हालांकि, उनका कार्यकाल सबसे कम समय का होगा। वे इसी साल 31 अक्टूबर को रिटायर हो जाएंगे। याने अक्टूबर में गरियाबंद में नया कलेक्टर अपाइंट करना होगा।

सीएस का गुप्त दौरा

चीफ सिकरेट्री अगर किसी जिले के दौरे पर जाता है, तो उसका प्रोटोकॉल होता है। कमिश्नर, आईजी, कलेक्टर, एसपी की उपस्थिति उसमें जरूरी होती है। लेकिन, 19 मई को सीएस आरपी मंडल बिलासपुर गए तो प्रशासन के किसी अधिकारी को पता ही नहीं चला। दरअसल, वे अरपा फं्रट रिवर के रूपरेखा तैयार करने के सिलसिले में बिलासपुर पहुंचे थे। इसके चार दिन पहले अरपा का ही निरीक्षण करने पहुंचे मंडल को मिलने, जुलने वाले ने इतना घेर लिया कि इस बार किसी को बताया ही नहीं। सिर्फ नगर निगम के दो अफसर उनके साथ थे। लेकिन, मंडल आज मास्क लगाने के बाद भी अपनी पहचान छिपा नहीं पाए। सीएम भूपेश बघेल के खास टास्क पर 15 दिन में चौथी बार आज अरपा प्रोजेक्ट का जायजा लेने के बाद वे एक्स सीएम अजीत जोगी को श्रद्धासुमन अर्पित करने मरवाही सदन पहुंचे तो वहां फिर वही हुआ। बिलासपुर में पढ़े-लिखे और कलेक्टर रहने के कारण इस बार उनकी यात्रा गुप्त नहीं रह सकी।

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस आदिवासी मंत्री की निष्ठा पर सवाल उठने लगे हैं?
2. क्या आईपीएस लेवल पर भी एक लिस्ट निकलने वाली है?

शनिवार, 23 मई 2020

ब्यूरोक्रेट्स या गोलकीपर

संजय के. दीक्षित
तरकश, 24 मई 2020
कोई भी सरकार योजना बनाती है, उसके क्रियान्वयन का दायित्व ब्यूरोक्रेसी पर होता है। लेकिन, अगर ब्यूरोक्रेट्स ही डिफेंसिव होकर अपना गोल बचाने लग जाए, तो योजनाओं को धरातल पर उतारने में दिक्कत तो होगी न! छत्तीसगढ़ में दिक्कत यही है कि सीएम तो ट्वेंटी-20 स्टाईल में खेल रहे हैं लेकिन, नौकरशाही में फारवर्ड खेलने वाले अफसर पांच नहीं पुर रहे। जाहिर है, फुटबॉल टीम में पांच फारवर्ड प्लेयर होते हैं…वही आक्रमकता के साथ गोल दागने का काम करते हैं। मंत्रालय में यही चीज नहीं हो रही। पांच क्या…फारवर्ड खेलने वालों में दो-तीन के बाद नाम नहीं सूझेंगे। इसमें एक ब्यूरोक्रेट्स की टिप्पणी गौर करने वाली है…सभी गोलकीपर हो गए हैं। दरअसल, एक तो यहां अफसरों का टोटा है। उपर से कई अफसर पिछले दो-तीन साल में डेपुटेशन पर चले गए हैं। और, जो बचे हैं, उनमें से ज्यादतर गोल बचा रहे हैं।

सिकरेट्री भी बदलेंगे?

गोल बचाने के चक्कर में अपना पारफारमेंस पुअर करने वाले सिकरेट्री भी सरकार की नजर में हैं। सीएम को भी अब डेढ़ साल हो गया है। अफसरों को पहचानने के लिए ये काफी होता है। सीएम के करीबी लोगों का कहना है, साब के पास एक-एक अफसर का रिपोर्ट कार्ड है। उन्हें पता है कि कौन रिजल्ट देने वाला है और कौन पोस्टिंग के लिए बिछने वाला। ऐसे में, कलेक्टरों की लिस्ट के साथ कुछ सिकरेट्री के विभाग भी बदल जाए, तो अचरज नहीं।

मंत्री की भृकुटी!

सूबे के उद्योग और आबकारी मंत्री कवासी लकमा लगते भले ही हैं सहज और सीधे-साधे। मगर उनकी भृकुटी जिस अफसर पर तन जाती है तो उस अफसर की शामत आ जाती है। सुकमा के एसपी जीतेंद्र शुक्ला ने कवासी से पंगा लिया, उनकी वहां से छुट्टी हो गई। इस बार बस्तर का एक तहसीलदार उनके गुस्से का शिकार हो गया। मंत्री को तहसीलदार के खिलाफ कुछ शिकायतें मिली थीं। उन्होंने बस्तर कमिश्नर को हड़काया, अफसर को हटाओ नहीं तो सीएम को फोन कर दूंगा। सीएम के नाम पर कमिश्नर इतना हड़बड़ा गए कि हटाने के साथ तहसीलदार को सस्पेंड भी कर दिया। जाहिर है, कवासी का औरा देखकर रमन सरकार में मंत्री रहे रामविचार नेताम, केदार कश्यप, महेश गागड़ा और रामसेवक पैकरा को ये बात खटक रही होगी कि कांग्रेस सरकार में आदिवासी मंत्री का कितना प्रभाव है।

33 परसेंट पर ठहाके

लॉकडाउन-03 में आफिसों में मैनपावर बुलाने के इश्यू पर चीफ सिकरेट्री ने मंत्रालय में मीटिंग बुलाई थी। इसमें जीएडी सिकरेट्री डॉ0 कमलप्रीत सिंह, डीडी सिंह समेत अन्य अधिकारी मौजूद थे। मीटिंग में भारत सरकार के गाइडलाइन के आधार पर 33 फीसदी अधिकारियों, कर्मचारियों को बुलाने की बात आई तो एक सिकरेट्री ने चुटकी ली….सर, सही में काम तो 33 फीसदी लोग ही करते हैं, बाकी का तो चाय, गुटखा, तंबाकू, और नेतागिरी….। इस पर जमकर ठहाके लगे।

आईएएस बनने में मेहनत

कोरोना में भी चीफ सिकेरट्री आरपी मंडल खूब दौरे कर रहे हैं। इस हफ्ते बस्तर संभाग के अधिकारियों की उन्होंने कांकेर में बैठक बुलाई थी। वहां उन्होंने कलेक्टरों को टास्क दिया कि सभी जिलों में 20-20 आदिवासी आश्रमों को तैयार करें कि वो सुविधाओं के मामलों में किसी गेस्ट हाउस से कम न लगे। कमरे, बाथरुम, आरओ वाटर, जेनरेटर सब हाईक्लास के। वो भी दो महीने के भीतर। इस पर बस्तर के एक कलेक्टर के चेहरे पर शिकन झलकी…सीएस ताड़ गए। बोले…कोई परेशानी। कलेक्टर ने कहा, सर ये तो कठिन काम है…दो महीने में। सीएस इस पर विफर पड़े…मिस्टर कलेक्टर! आईएएस बनने में क्या कठिनाई नहीं होती। सीएम साब ने कहा है…करना है मतलब करना है। इस पर मीटिंग में सन्नाटा छा गया।

चूक गए जनाब…?

कहते हैं, ब्यूरोक्रेट्स अगर पोस्ट पर रहते पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग का इंतजाम कर ले तो ठीक वरना, एक बार गाड़ी आगे बढ़ गई तो फिर कोई पूछता नहीं। तब सीएम हाउस में इंट्री पाना भी आसान नहीं रहता। हालांकि, कांग्रेस सरकार में पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग का औसत खराब नहीं है। सीएम भूपेश बघेल के राज्य की कमान संभालने के बाद आईएएस में अजय सिंह, सुनील कुजूर, केडीपी राव, सुरेंद्र जायसवाल, हेमंत पहाड़े, एनके खाखा, आलोक अवस्थी और दिलीप वासनीकर तथा आईपीएस में एएन उपध्याय, गिरधारी नायक और बीके सिंह रिटायर हुए हैं। इनमें अजय सिंह, कुजूर, जायसवाल और पहाड़े को तत्काल पोस्टिंग मिल गई। वहीं, आईपीएस में सिर्फ नायक को। जिन्हें पोस्टिंग नहीं मिल पाई, उनमें केडीपी राव, आलोक अवस्थी, एनके खाखा और दिलीप वासनीकर। तथा आईपीएस में बीके सिंह और एएन उपध्याय। हालांकि, बीके सिंह बोरिया-बिस्तर समेटकर यहां से चले गए। उपध्याय जरूर यहां हैं। इनमें सबसे अधिक उम्मीद केडीपी राव को रही होगी। लेकिन, नगरीय निकाय चुनाव, विधानसभा का बजट सत्र और फिर कोरोना के चलते उनका मामला मामला गड़बड़ा गया।

व्यापम पर नजर

डॉ0 आलोक शुक्ला स्कूल एजुकेशन के प्रिंसिपल सिकरेट्री के साथ माध्यमिक शिक्षा मंडल और व्यापम के चेयरमैन भी हैं। शुक्ला का 31 मई को रिटायरमेंट हैं। इसको देखते ऑल इंडिया सर्विस के कई वर्तमान और रिटायर अफसरों की नजर व्यापम चेयरमैन की पोस्ट पर है। लेकिन, उनके साथ अंगूर खट्टे हैं….वाला ही मामला होगा। क्योंकि, व्यापम खाली नहीं नहीं हो रहा।

फिल्म भी, सियासत भी

दो बार विधायक रहे परेश बागबहरा कुछ महीने पहले जोगी कांग्रेस से भाजपा ज्वाईन किए। और फिर से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में उतरने जा रहे हैं। इससे पहिले वे 93 में सन्नी देओल के साथ गुनाह फिल्म बनाए थे। जिसमें खुद में एक गाने में गाना गाते हुए नजर आए थे। 2002 में उन्होंने छत्तीसगढ़ी में भोला छत्तीसगढ़ियां बनाई। कई फिल्मों के वे फायनेंसर भी रहे। अब वे बड़े बजट के छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाने जा रहे हैं। याने परेश की सियासत भी चलेगी और अब फिल्म भी। वैसे भी, छत्तीसगढ़ में विपक्ष के लिए दो साल कोई काम है नहीं।

प्रमोटी कलेक्टर्स

कलेक्टरों की लिस्ट आने वाली है। इसमें इस बार स्टेट सर्विस से आईएएस बने अफसरों की संख्या कुछ कम हो सकती है। अभी नौ ऐसे कलेक्टर हैं। हालांकि, एक समय तो 13 तक पहुंच गए थे। लेकिन, डायरेक्ट आईएएस दावेदारों की संख्या को देखते संकेत हैं कि प्रमोटी कलेक्टरों की संख्या कुछ और कम की जाएगी। याने कुछ को कलेक्टरी से वापिस बुलाया जाएगा तो कुछ नए भेजे जाएंगे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. बोर्ड, आयोगों में नेताओं की नियुक्ति क्या लंबे समय के लिए आगे बढ़ जाएगी?
2. चीफ सिकरेट्री किस मिशन पर गुप्त रूप से 19 मई को बिलासपुर पहुंचे थे?

सोमवार, 18 मई 2020

पुत्रों से मंत्री परेशान

संजय के. दीक्षित
तरकश, 17 मई 2020
छत्तीसगढ़ सरकार के एक मंत्री अपने बेटों से आजिज आ गए हैं। बार-बार समझाने के बाद भी ट्रांसफर-पोस्टिंग की एडवांस पेशगी लेने से वे बाज नहीं आ रहे। स्थिति यह है कि एडवांस के बाद भी छह-छह महीने से लोग चक्कर काट रहे हैं। ये सब बात आखिर मार्केट में तो फैलती ही है। इससे मंत्रीजी बेहद दुखी है। पता चला है कि कोरोना पीरियड में उन्होंने बेटों को एक साथ बिठाकर समझाया है…अच्छा खासा कैरियर है, तुमलोगों की वजह से सब खतम हो जाएगा…तुमलोग धैर्य रखो…मैं इकठ्ठे इतना इंतजाम कर दूंगा कि ये सब करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। चलिये, ठीक है। बेटों के भविष्य का इंतजाम पिता नहीं करेगा तो कौन करेगा। लेकिन, बेटों को भी तो समझना चाहिए।

शिव का वजन

सरकार ने मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना के संचालन का जिम्मा नगरीय प्रशासन विभाग को सौंपा है। इसका काम कितना फास्ट चल रहा है, इस बात से समझा जा सकता है कि नगर निगमों द्वारा टेंडर का प्रॉसेज प्रारंभ कर दिया गया है। सीएम सचिवालय सीधे इसकी मानिटरिंग कर रहा है। अगर कोई व्यवधान नहीं आया तो 15 अगस्त को इस योजना का लोकार्पण भी हो जाएगा। दिल्ली सरकार के मोहल्ला क्लीनिक की तर्ज पर सरकार की यह अब तक की सबसे अहम योजना होगी। और, इसकी जिम्मेदारी हेल्थ विभाग की बजाए अगर नगरीय प्रशासन को मिली है तो जाहिर है नगरीय प्रशासन मंत्री शिव डहरिया का इससे वजन बढ़ेगा ही। क्योकि, उन्हें शहरी स्वास्थ्य का एक बड़ा सेटअप उनके अंदर आ जाएगा।

सीएस को नया टास्क

सरकार ने चीफ सिकरेट्री आरपी मंडल को तीन नया टास्क दिया है। खारुन फ्रंट रिवर और अरपा फ्रंट रिवर के निर्माण के साथ ही राजधानी के सबसे प्राचीन बूढ़ापारा तालाब को मरीन ड्राईव जैसा बनाने का। सरकार के निर्देश पर सीएस दो दिन पहले अचानक बिलासपुर पहुंचे और तीन घंटे तक अफसरों के साथ भरी दोपहरी में मौके का मुआयना किया। बूढापारा तालाब की सफाई का काम प्रारंभ हो गया है। और, दो दिन बाद खारुन फ्रंट रिवर का ब्लूप्रिंट बनाने मंडल वहां जाने वाले हैं। खबर है, मुख्यमंत्री ने मंडल से कहा है कि अरपा नदी में पानी लबालब दिखना चाहिए। इसके बाद मंडल एक्शन मोड में हैं।

कोरोना में रिटायरमेंट

लॉकडाउन में रिटायर होना भी बड़ा शॉकिंग है…न बुके, न बिदाई। न मीडिया में कोई खबर। कई अधिकारी, कर्मचारी बेचारे घर बैठे गुमनामी में ही सर्विस को बॉय-बॉय कह दिया। बड़े अफसरों की बात करें तो लॉकडाउन-2 में 30 अप्रैल को डीआईजी आरएस नायक रिटायर हुए। और, अब लॉकडाउन-4 में डीआईजी जीएस दर्रो का नम्बर है। वे 31 मई को सेवानिवृत्त हो जाएंगे।

आलोक का नहीं

छत्तीसगढ़ के सबसे सीनियर आईएएस डॉ0 आलोक शुक्ला का भी इसी महीने रिटायरमेंट है। लेकिन, सरकार के लिए वे इतने उपयोगी हैं कि उनके पोजिशन में कोई बदलाव नहीं आएगा। दरअसल, स्कूल शिक्षा में उन्होंने थोड़े ही दिनों में अप्रत्याशित काम किए हैं। एक झटके में 40 अंग्रेजी स्कूल। कोरोना आया नहीं कि उन्होंने ऑनलाइन एजुकेशन पोर्टल बना दिया। इस पोर्टल की दूसरे राज्य डिमांड कर रहे। वैसे भी आलोक को कंप्यूटर का काफी नॉलेज है। पुराने मंत्रालय में 2002-03 में जब दो-तीन आईएएस लेपटॉप पर काम करते थे, उनमें वे भी शामिल थे। कोरोना में डोर-टू-डोर सब्जी पहुंचाने के लिए सीजी हॉट पोर्टल बनाया गया, इसके पीछे उन्हीं का ब्रेन था। और, अब सुनते हैं हेल्थ विभाग की टेलीमेडीसिन को वे मूर्तरूप दे रहे हैं। सीएम उन्हें पसंद भी करते हैं। ऐसे में, अब कोई सवाल उठते नहीं।

ये चार कलेक्टर!

कलेक्टरों की जंबो लिस्ट निकलने वाली है। इसमें उन चार कलेक्टरों का हटना लगभग निश्चित है, जिनकी पिछली सरकार में पोस्टिंग हुई थी और नई सरकार ने उन पर भरोसा करते हुए कंटीन्यू किया। इनमें अवनीश शरण कवर्धा, सारांश मित्तर सरगुजा, श्याम धावड़े गरियाबंद और नीलकंठ टेकाम कोंडागांव। इन चारों का टाईम भी दो साल से अधिक हो गया है। इनमें से कुछ बड़े जिलों में जाएंगे और कुछ राजधानी लौटेंगे। अवनीश शरण को कवर्धा में नेट दो साल हो गया है। इससे पहले कवर्धा में कोई भी कलेक्टर इतना लंबा नहीं रहा। सोनमणि बोरा, सिद्धार्थ परदेशी, मुकेश बंसल, दयानंद पाण्डेय एक, सवा साल काम करने के बाद बड़े जिलों में चले गए थे। ऐसे में, अवनीश की स्थिति समझी जा सकती है।

कोरोना इम्पैक्ट

कई महीने से लिस्ट निकलने की आस लगाए कलेक्टरों को कोरोना ने इस कदर परेशान कर रखा है कि पूछिए मत! एक तो जिले में कोरोना को रोकने का टेंशन। जिनके जिले में कोरोना का केस आ रहा, उनसे एक बार आप बात कीजिए। आपको समझ में आ जाएगा। वो भी उस समय जब ट्रांसफर लिस्ट लगभग तैयार है। भले ही सरकार कोरोना को मापदंड बनाए या न बनाए मगर कलेक्टरों को भय तो खाए जा रहा। उधर, कोरोना भी पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। जैसे ही नार्मल होने की स्थिति आने पर लिस्ट निकलने की सुगबुगाहट प्रारंभ होती है एक-दो केस टपक जाता है। हालांकि, इससे नुकसान राज्य का हो रहा है। विधानसभा सत्र के बाद से कलेक्टरों की नजर लिस्ट पर है। कोरोना के पहले से अधिकांश कलेक्टरों ने नए कामों में रुचि लेना बंद कर दिया था। दरअसल, वे जानते हैं कि चलाचली की बेला में नए काम का कोई मतलब नहीं। दूसरा कोई कलेक्टर आएगा तो वो उसमें इंटरेस्ट लेगा नहीं।

हेड ऑफ फॉरेस्ट

सूबे के सबसे सीनियर आईएफएस मुदित कुमार के वन विभाग छोड़कर डीजी सीजी कॉस्ट बनने से पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी का हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स बनने का रास्ता साफ हो गया है। राकेश साल भर पहिले पीसीसीएफ तो बन गए थे लेकिन, सबसे वरिष्ठ होने के नाते मुदित कुमार के पास हेड ऑफ फॉरेस्ट का पद बरकरार था। राकेश को अब वन बल प्रमुख बनाने के लिए प्रॉसेज चालू हो गया है। डीपीसी के बाद उन्हें 80 हजार का स्केल मिल जाएगा। राज्य में तीन पोस्ट 80 हजार के होते हैं। चीफ सिकरेट्री, डीजीपी और पीसीसीएफ। मुदित कुमार के कारण एडिशनल पीसीसीएफ पीसी पाण्डेय को भी लाभ मिलता दिख रहा है। पद रिक्त होने के कारण पाण्डेय अब पीसीसीएफ प्रमोट हो जाएंगे। फिलहाल, वे राज्य वन अनुसंधान संस्थान के डायरेक्टर हैं।

बजाज की वापसी

राज्य सरकार ने सीनियर आईएफएस एसएस बजाज का निलंबन बहाल कर दिया है। उनकी पोस्टिंग की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। नोटशीट वन मंत्री मोहम्मद अकबर के यहां पहुंच गई है। उनकी टीप के बाद फाइल सीएम भूपेश बघेल के पास जाएगी और फिर उनके एप्रूवल के बाद आदेश निकल जाएगा। बजाज के साथ 10 और आईएफएस अधिकारियों का आदेश निकलेगा। इनमें हाल ही में संस्कृति संचालनालय से वन विभाग में लौटे एडिशनल पीसीसीएफ अनिल साहू शामिल हैं। उनके अलावा 9 अवार्डेट आईएफएस अधिकारियों को भी सरकार नई पोस्टिंग देगी।

अंत में दो सवाल आपसे

1. प्रमोटी कलेक्टरों की संख्या 13 से घटकर 9 पर आ गई है। ये संख्या बढ़ेगी या 9 के आसपास ही रहेगी?
2. राजधानी की कलेक्टरी करने से अधिकांश आईएएस क्यों बचते हैं?

मंगलवार, 12 मई 2020

मंत्रियों के ग्रह-नक्षत्र

संजय के. दीक्षित
तरकश, 10 मई 2020
पंचायत और स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के राजधानी स्थित सरकारी बंगले में शार्ट सर्किट से आग लग गई। घटना के दौरान मंत्री घर पर ही थे। गनीमत है कि दिन का समय था, लिहाजा बंगले का स्टाफ तुरंत हरकत में आ गया। और, कल नगरीय प्रशासन एवं श्रम मंत्री शिवकुमार डहरिया के सरकारी आवास पर बिजली गिर गई। 8 मई को शाम बारिश, आंधी के बीच जिस जगह पर बिजली गिरी, उससे 50 कदम पर मंत्री डहरिया अपने आफिस में बैठे थे। बिजली का प्रभाव इतना ज्यादा था कि मंत्री के घर का एसी, टीवी जैसे इलेक्ट्रानिक सामान खराब हो गए। बहरहाल, हफ्ते भर में दो-दो मंत्रियों के यहां इस तरह की घटनाएं…। लगता है, ग्रह-नक्षत्र की शांति के लिए इन्हें यज्ञ आदि कुछ करना चाहिए।

भूपेश की वर्किंग टीम

फरवरी में सीएम के विदेश जाने के पहिले से कलेक्टरों के ट्रांसफर की अटकलें चल रही हैं। मगर किसी-न-किसी वजह से लिस्ट रुक जा रही थी। अब खबर है, बाहर से आने वाले मजदूरों के सेटलमेंट के बाद कलेक्टरों के ट्रांसफर पर सरकार मुहर लगा देगी। क्योंकि, कोरोना अब लंबा चलने वाला है, इसे लगभग सभी ने मान लिया है। बहरहाल, अबकी जो कलेक्टरों की लिस्ट निकलेगी, वही सीएम की असली वर्किंग टीम होगी। अब योजनाओं के क्रियान्वयन का समय आ गया है। पिछली बार सरकार ने शपथ लेने के तुरंत बाद 21 कलेक्टरों को बदला था। लेकिन, तब पिछली सरकार के कई दुखी, पीड़ित अफसर रो-गाकर कलेक्टर बनने में कामयाब हो गए थे। लेकिन, इस बार ऐसा नहीं होगा। सुना है, सरकार इस बार ठोक-बजाकर फैसला लेगी। कुछ नाम तो तय भी किए जा चुके हैं।

2008 बैच तक क्लोज?

छत्तीसगढ़ में 2012 बैच के चार आईएएस अभी तक कलेक्टर नहीं बन पाए हैं। जबकि, दूसरे कई राज्यों में 2012 बैच के अफसर दो-दो जिला कर चुके हैं। उधर, 2011, 2012 बैच के पदोन्नत आईएएस में से भी कुछ को कलेक्टर बनाना होगा। लिहाजा, सरकार कलेक्टर के लिए 2008 बैच तक क्लोज करने पर विचार कर रही है। हालांकि, इसमें अड़चन यह है कि बड़े जिलों के लिए अनुभवी अधिकारी चाहिए। कम-से-कम रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग के लिए। अभी 2004 बैच के संजय अलंग बिलासपुर के कलेक्टर हैं। वे सिकरेट्री रैंक में आ चुके हैं। इसके बाद 2006 बैच के भारतीदासन और अंकित आनंद रायपुर तथा दुर्ग, 2007 बैच के यशवंत कुमार रायगढ़ और 2008 बैच की शिखा राजपूत गौरेला, पेंड्रा की कलेक्टर हैं। इनमें से कुछ कलेक्टरों का पारफारमेंस भी बढ़ियां हैं। लेकिन, सरकार ने अगर 2008 बैच तक क्लोज करने का निर्णय ले लिया तो इन पांचों अफसरों को राजधानी लौटना पड़ेगा। यही नहीं, 2007, 2008 बैचों के और दावेदारों को भी इससे धक्का लगेगा।

सिकरेट्री लेवल पर चेंजेस

कलेक्टरों के साथ सिकरेट्री की भी एक छोटी लिस्ट निकलेगी। संजय अलंग जैसे सीनियर कलेक्टर मंत्रालय लौटेंगे, तो उन्हें कोई-न-कोई विभाग मिलेगा ही। हालांकि, निहारिका बारिक सिंह को छोड़कर सारे सिकरेट्री के विभाग एक-एक, दो-दो बार बदल चुके हैं। निहारिका पहली सिकरेट्री होंगी, जो रमन सरकार में भी हेल्थ सिकरेट्री रहीं और इस सरकार में भी। मगर कोरोना के दौरान उनका विभाग बदलेगा, ऐसा प्रतीत नहीं होता।

आईपीएस प्रमोशन

डीजी के प्रमोशन में तकनीकी पेंच लग गया है, उससे लगता है अभी उनकी डीपीसी नहीं होगी। लेकिन, खबर है बाकी एसपी, डीआईजी, आईजी के प्रमोशन की तैयारी गृह विभाग ने कर ली है। किसी भी दिन मंत्रालय में इन पदों के लिए डीपीसी हो सकती है। इसमें आईजी प्रदीप गुप्ता आईजी से एडीजी, डीआईजी टीआर पैकरा डीआईजी से आईजी, बीएस ध्रुव, आरएन दास, मयंक श्रीवास्तव और टी एक्का डीआईजी प्रमोट होंगे।

सीएम जब मुस्कराए

सीएम हाउस में वन विभाग की समीक्षा बैठक चल रही थी। सीएम भूपेश बघेल ने पीसीसीएफ से पूछा, इस बार कितने पौधे लगाओगे। पीसीसीएफ ने कहा, सात करोड़। सीएम ने फिर पूछा, पिछले साल कितने लगाए गए थे, जवाब मिला…सात करोड। और, उसके पिछले साल…? सात करोड़। सात करोड़ की जादुई संख्या सुनकर सीएम मुस्करा दिए। बोले…इतने में तो छत्तीसगढ़ की एक इंच जमीन भी नहीं बची होती। इसके बाद वे गंभीर हुए। और फिर फॉरेस्ट अफसरों को बड़ा टास्क दिया। बोले, इस तरह पौधारोपण किया जाए कि मैं भी देख सकूं…लोग भी देख सकें कि वन विभाग प्लांटेशन किया है। छत्तीसगढ़ में जितने हाईवे हैं, अबकी बरसात में उसके दोनों ओर तीन-तीन लाईन में पौधे लगाए जाएं। सीएम ने बैठक में मौजूद चीफ सिकरेट्री आरपी मंडल से कहा कि वे इसे कोआर्डिनेट करें। रिव्यू में यह भी तय हुआ कि इसमें जरा सी भी ढिलाई हुई तो संबंधित इलाके के डीएफओ और सीसीएफ जिम्मेदार होंगे। याने लघु वनोपज में बढ़ियां रिजल्ट देने वाले पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी को अब प्लांटेशन की चुनौती मिल गई है।

बोरा से वैर या चूक?

सरकार ने बाहर फंसे लोगों को छत्तीसगढ़ लाने के लिए तीन आईएएस अधिकारियों को नोडल अधिकारी बनाया है। लेबर सिकरेट्री सोनमणि बोरा, पीडब्लूडी सिकरेट्री सिद्धार्थ परदेशी और ईरीगेशन सिकरेट्री अविनाश चंपावत को। इसमें दिलचस्प यह हुआ कि मंत्रालय से परदेशी और चंपावत के जो मोबाइल नम्बर जारी हुए, वो उनके स्टाफ अफिसर के थे, मगर बोरा का पर्सनल नम्बर रिलीज हो गया। जैसे ही ये नम्बर मूव हुए कि बोरा को दे दनादन फोन, व्हाट्सएप कॉल, व्हाट्सएप मैसेज…। पहले से ही लेबर इश्यू हैंडिल कर रहे बोरा का व्हाट्सएप नम्बर इसके कारण डेढ़ दिन तक हैंग रहा। बोरा को पता लगाना चाहिए कि उनका पर्सनल नम्बर चूकवश जारी हुआ या किसी ने उनसे वैर भंजा ली।

अंत में दो सवाल आपसे

1. लॉकडाउन में एक जिले के एसपी…महिला पुलिस अधिकारी…गेस्ट हाउस और शराब की खबर आ रही है। इसमें कितनी सच्चाई है?
2. पेंड्रा, गौरेला मरवाही अलग हो जाने के बाद भी कलेक्टरी के लिए सबसे अधिक डिमांड बिलासपुर की क्यों है?