तरकश, 26 अप्रैल 2026
संजय के. दीक्षित
सचिवों की मेजर सर्जरी
मंत्रालय में सचिव स्तर पर एक बड़ी उठापटक जल्द हो सकती है। इसमें उन आधा दर्जन से अधिक सचिवों का विभाग बदल सकता है, जिनका कार्यकाल सवा दो साल से अधिक हो गया है। जाहिर है, दिसंबर 2023 में सरकार बदलने के बाद जनवरी 2024 में सचिवों की बड़ी लिस्ट निकली थी, उसके बाद कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। वैसे, एसीएस मनोज पिंगुआ का गृह विभाग में साढ़े तीन साल से ज्यादा हो गया है। पिछली सरकार के समय से उनके पास गृह विभाग का दायित्व है। इसी तरह निहारिका बारिक पंचायत एवं ग्रामीण विकास, शहला निगार कृषि, कमलप्रीत सिंह पीडब्लूडी, सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी स्कूल शिक्षा, भुवनेश यादव समाज कल्याण, एस भारतीदासन हायर एजुकेशन, बसव राजू नगरीय प्रशासन, शम्मी आबिदी महिला बाल विकास विभाग को सवा दो साल से अधिक हो गया है। लिहाजा, इन अधिकारियों के विभाग बदलने की अटकलें बड़ी तेज हैं। अलबत्ता, अमित कटारिया हेल्थ में जम नहीं पा रहे, इसलिए उनका पोर्टफोलियो चेंज हुआ तो कोई आश्चर्य नहीं। सेंट्रल डेपुटेशन से अमित लौटे थे, उस समय उनका इंटरेस्ट नगरीय प्रशासन में था मगर बसव राजू को वे हिला नहीं सकें। अमित का नाम पीडब्लूडी को लेकर भी चर्चाओं में है। वैसे तो पीडब्लूडी के लिए मुकेश बंसल को भी राइट च्वाइस बताया जा रहा, मगर उनके पास वर्कलोड ज्यादा है, मंत्री ओपी चौधरी उन्हें छोड़ेंगे भी नहीं, इसलिए मुकेश की संभावना कम प्रतीत हो रही।
गृह विभाग का निजाम कौन?
बैचमेट को चीफ सिकरेट्री बन जाने के बाद एसीएस होम मनोज पिंगुआ ने सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने के लिए अर्जी लगाई थी मगर उन्हें अब तक पोस्टिंग नहीं मिली है। हालांकि, उन्होंने अभी तक अपना आवेदन वापिस भी नहीं लिया है। मगर खबरें आ रही कि दिल्ली जाने का उनका इरादा अब डगमगा रहा है। हो सकता है कि सीएस विकास शील से उनकी कोई बात हुई हो...आखिर हैं तो पुराने बैचमेट ही। बहरहाल, मनोज अगर दिल्ली नहीं गए तो सरकार उनकी वरिष्ठता की दृष्टि से कौन सा विभाग देगी, इस पर भी धर्मसंकट रहेगा। उनके पास पहले हेल्थ और फॉरेस्ट रह चुका हैं। विष्णुदेव साय के सीएम बनने के बाद मनोज को उनके सचिवालय में जाने की चर्चाएं भी हुई थी। उसके बाद 30 जून 2025 को कैबिनेट की मीटिंग के बाद उनका सीएस का आर्डर निकलते-निकलते रह गया था। दिल्ली से अमिताभ जैन को एक्सटेंशन देने का संदेशा आ गया। और उसके बाद मनीला से विकास शील आ गए। बहरहाल, सवाल यह है कि सोनमणि बोरा, कमलप्रीत सिंह या किसी अन्य को सिकेट्री होम बनाया जाएगा तो फिर मनोज पिंगुआ को क्या मिलेगा? इसका जवाब सीएम या उनके पीएस के पास ही होगा।
ट्रांसफर का महीना?
सचिवों के विभाग बदले जाने की चर्चाओं के बीच बता दें कि कलेक्टर, एसपी, जिला पंचायत सीईओ और डीएफओ के ट्रांसफर लंबे समय से प्रतीक्षित है। एक मई से सुशासन तिहार भी प्रारंभ होने जा रहा है। हालांकि, सुनने में आ रहा कि सुशासन तिहार के साथ-साथ अफसरों की लिस्ट भी जारी होते रहेगी। सरकार में बैठे लोग इस बात को स्वीकार कर रहे कि दो साल से अधिक जिन अधिकारियों का हो गया है, वहां ट्रांसफर की प्रत्याशा में कोई काम नहीं हो रहा है...उन जिलों के अफसरों को बदलना ही श्रेयस्कर होगा। अलबत्ता, कलेक्टर, एसपी के ट्रांसफर होंगे या नहीं, आने वाला दो-तीन दिन काफी महत्वपूर्ण होंगे। यदि बदलना होगा तो सरकार इसी दौरान कोई निर्णय लेगी। पीएस टू सीएम सुबोध सिंह भी ट्रेनिंग से लौट आएं हैं।
25 साल में जीरो
न्वंबर 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ बनने के दौरान छत्तीसगढ़ में सड़कों की जो स्थिति थी, कमोवेश वही हालत अभी भी है। नेशनल हाईवे को छोड़ दें, तो पीडब्लूडी मिनिस्टर और सीएम के विधानसभा इलाकों की हालत बेहद दयनीय है। तभी रिव्यू मीटिंग में सीएम बड़े नाराज हुए थे। वे यहां तक बोल गए थे...पीडब्लूडी का कहीं कोई काम दिख नहीं रहा है। दरअसल, सड़कें कनेक्टिविटी की सुविधा के साथ-साथ किसी भी राज्य की शान होती है। पड़ोसी राज्यों में तेलांगना और महाराष्ट्र की बात तो छोड़िये, कालाहांडी की भूखमरी के नाम से बदनाम ओड़िसा की सड़कें विकसित प्रदेशों टाईप अहसास दिला रही है। बगल में, विशाखापट्टनम या नागपुर चले जाइये, सड़कें देखकर आप हतप्रभ रह जाएंगे। असल में, छत्तीसगढ़ में इस सेक्टर में काम ही नहीं हुआ। और न ही सरकार ने इसे प्राथमिकता में रखा। राजधानी रायपुर की बात करें तो 25 साल में एक एक्सप्रेसवे बन पाया। ऐसा नहीं कि पीडब्लूडी में हाई प्रोफाइल अफसर नहीं आए। पी. जाय उम्मेन, एमके राउत, आरपी मंडल और अमिताभ जैन जैसे पीडब्लूडी सिकेट्री हुए। बावजूद इसके आलम यह है कि धर्मजयगढ़ और पत्थलगांव को जोड़ने वाली सड़क पिछले 15 साल से निर्माणाधीन है। पीडब्लूडी किस रफ्तार में चल रहा, इसका अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि पिछले साल 9500 करोड़ का बजट मिला मगर मार्च क्लोजिंग तक इसमें से मात्र 3000 करोड़ खर्च हो पाया।
10 साल में आरओबी
93 बैच के आईएएस अफसर अमित अग्रवाल 2015-16 के दौरान वित्त सचिव थे। कचना के जीएडी कालोनी से शहर तरफ आने-जाने मे फाटक पर वे हमेशा लोगों के जाम का शिकार होते देखते थे। लिहाजा, उन्होंने खुद ही पहल कर पीडब्लूडी वालों से प्रस्ताव मंगा बजट में शामिल किया। उसके बाद 10 साल निकल गया। अभी तक कचना ओवर ब्रिज पूरा नहीं हुआ है। 2016 के बजट में आने के बाद इसका 2021 में इसका काम प्रारंभ हुआ। मार्च 2025 की डेडलाइन थी और अप्रैल 2026 समाप्त होने वाला है। इससे पीडब्लूडी की मंथर गति को समझा जा सकता है।
तीन महीने का एक्सटेंशन
तरकश में पीसीसीएफ और हेड ऑफ फॉरेस्ट श्रीनिवास राव के एक्सटेंशन का जिक्र किया गया था। तरकश की खबर सही निकली। छह महीने की सेवा विस्तार की चकरी भारत सरकार में घूमी, मगर बात कुछ जम नहीं पाई। कहीं से एडवाइस आया है कि छह महीने ज्यादा है, तीन महीने की फाइल मूव किया जाए। श्रीनिवास राव को एक्सटेंशन मिल पाएगा या इंकार हो जाएगा, 10 मई से पहले इस पर क्लियरिटी आ जाएगी। हालांकि, एक्सटेंशन की फाइल पीएम तक जाती है, इसलिए सब कुछ इतना आसान नहीं है। श्रीनिवास राव को अगर एक्सटेंशन नहीं मिला तो फिर अरुण पाण्डेय की दावेदारी पक्की हो जाएगी। क्योंकि, ओपी यादव हेड ऑफ फॉरेस्ट बनने इच्छुक नहीं बताए जा रहे। वैसे अरुण और ओपी दोनों सरगुजिहा तो हैं ही पड़ोस में रहते हैं और रोज साथ बैठने वाले मित्र भी हैं। इसलिए, अरुण के पक्ष में ओपी शायद अपना इंटरेस्ट ना दिखाएं। अब अगर उनके माथे पर कुछ लिखा है तो बात अलग है...उसी तरह जैसे आईपीएस एएन उपध्याय के पास डीजीपी का पद चलकर आ गया था। वरना अरुण पाण्डेय के नाम पर मुहर लगेगी। वैसे भी मंत्रालय और फॉरेस्ट विभाग की पसंद अरुण पाण्डेय ही हैं मगर बीच में श्रीनिवास राव के विधायक भाई के सक्रिय होने से मामला पेचीदा हो गया है।
जीएडी का यू-टर्न
छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय की सरकार बनने के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने 2024 में एक आदेश निकाल कर्मचारियों, अधिकारियों को संघ के कार्यक्रमों में जाने के लिए फ्री कर दिया था। मगर इस हफ्ते एक ऐसा आदेश निकला कि संघ में बवाल मच गया। आदेश था...सरकारी कर्मचारी, अधिकारी किसी संगठन के सदस्य नहीं हो सकते। पता चला है...जीएडी के अधिकारियों ने बिना ब्रीफ किए हड़बड़ी में उपर से दस्तखत करा लिया। आदेश निकलने के बाद जब कोहराम मचा तो जीएडी के अफसरों को तलब किया गया। इसके बाद भी जीएडी के अफसर इस आदेश को वापिस लेने की बजाए उसमें संशोधन करने पर अड़े रहे। इसके बाद सीएम ने अपना तेवर दिखाया। बताते हैं, सीएम ने दो टूक कहा...कोई संशोधन नहीं, आदेश बदला जाए, फिर जाकर आदेश चेंज हुआ। वैसे, आदेश निकाल फिर बदलने से संदेश अच्छे नहीं जा रहे, सरकार के रणनीतिकारों को इसे संज्ञान लेना चाहिए।
अफसर पौने दो सौ, मेंबर सिर्फ एक
सिविल सर्विस डे पर राजधानी में अफसरों का एक बड़ा आयोजन हुआ। वर्तमान सीएस विकास शील के साथ इस मौके पर दो पूर्व मुख्य सचिव भी मौजूद थे। मंत्रालय के अफसरों के साथ कलेक्टर, कमिश्नर वीडियोकांफ्रेंसिंग पर कनेक्ट थे। इसमें पता चला कि आईआईपीए याने इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में छत्तीसगढ़ से वैसे तो 66 मेंबर हैं मगर सर्विंग आईएएस में से सिर्फ एक। वो हैं एसीएस मनोज पिंगुआ। जबकि, दीगर राज्यों में इसकी संख्या 75 परसेंट से उपर होती है। सिविल सर्विस के अफसरों को जानकारियों से अपडेट रहने के लिए भारत सरकार ने आजादी के तुरंत बाद आईआईपीए नाम से एक ऑटोनॉमस बांडी बनाई थी। उप राष्ट्रपति को इसका चेयरमैन बनाया गया और डीओपीटी मंत्री को व्हाइस चेयरमैन। डीओपीटी सिकेट्री इसके सीईओ होते हैं। इसके बाद छत्तीसगढ़ में ये हाल है। सीएस विकास शील से सभी से इसकी सदस्यता लेने का आग्रह किया है, तो देखना है कि अब कितने अफसर इससे जुड़ते हैं।
बीजेपी नेता, मछली और धर्म भ्रष्ट
पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान मछली खाने पर बीजेपी द्वारा पाबंदी लगाने का ऐसा दांव चला कि जो बीजेपी नेता सार्वजनिक तौर पर मांस-मछली नहीं खाते थे, वे भी कैमरे के सामने थाली से मछली का कांटा निकालते नजर आने लगे। मगर इस चक्कर में छत्तीसगढ़ में कुछ बीजेपी नेताओं के यहां बवाल मच गया। मालूम हुआ, एक नेताजी का परिवार शुद्ध शाकाहारी और धरम-करम वाला है। उनके घर वालों को व्हाट्सएप ग्रुप से मछली खाते फोटो हाथ लग गई। इसके बाद पत्नी ने बात करना बंद कर दिया है, तो पिता ने चमकाया, तूने धर्म भ्रष्ट कर दिया। अब पश्चिम बंगाल की बात अलग है। वहां बिना मछली खाए कोई शुभ काम संपन्न नहीं होते। मगर बाकी प्रदेशों में ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ से गए कुछ बीजेपी नेताओं ने इस स्तंभ के लेखक को बताया कि फोटो और सोहबत के चक्कर में कई नेताओं को अब मछली का स्वाद भाने लगा है।
हफ्ते का कोट...
’संबंध कभी भी बराबरी करने से नहीं पनपते...उन्हें बनाएं रखने के लिए किसी को बड़ा और किसी को छोटा होना पड़ता है’ और ’परिस्थितियां बदलना जब मुमकिन ना हो तो मनःस्थिति बदल लीजिए, सब कुछ अपने आप ही बदल जाएगा।’
अंत में दो सवाल आपसे?
1. छत्तीसगढ़ बिजली नियामक आयोग के चेयरमैन का पद किसके लिए रिक्त रखा गया है?
2. डीजी पवन देव को पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन में करीब सात साल हो गया है, वे वहीं से 2028 में रिटायर होंगे या उनका ट्रांसफर किया जाएगा?
