शनिवार, 27 जून 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: निलंबन और पनिशमेंट का महीना!



 तरकश, 28 जून 2026

संजय के. दीक्षित

निलंबन और पनिशमेंट का महीना!

विधानसभा के मानसून सत्र और मंत्रिमंडल की सर्जरी की दृष्टि से जुलाई महीना छत्तीसगढ़ के लिए खासा महत्वपूर्ण रहेगा, तो कर्मचारियों, अधिकारियों के लिए काफी संवेदनशील भी। संवेदनशील मतलब खतरा भरा। दरअसल, जुलाई में सीएम हेल्पलाइन का रिव्यू किया जाना है। हेल्पलाइन का अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। लोग लगातार अपनी बातें फोन कॉल के जरिये रख रहे हैं। शिकायतों के संबंध में आवेदकों को प्रॉपर रिप्लाई कर उनसे पेपर भी मंगाए जा रहे हैं। याने कंप्लेन को सिर्फ दर्ज कर छोड़ नहीं दिया जा रहा, बल्कि संपर्क कर साक्ष्य जुटाए जा रहे। सीएम सचिवालय खुद इसकी मॉनिटरिंग कर रहा। यह एक्सरसाइज इसलिए किया जा रहा कि सीएम हेल्पलाइन की वाजिब शिकायतों पर सरकार ने बड़ी कार्रवाई करने की मनःस्थिति बना ली है। खासकर, करप्शन और लापरवाही के मामलों में। जाहिर है, जुलाई महीना कर्मचारियों, अधिकारियों के लिए निलंबन और पनिशमेंट वाला रहेगा। सरकार चाहती है कि लोगों में सीएम हेल्पलाइन का भय हो। सही भी है...एमपी, बिहार, यूपी, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों ने काफी पहले हेल्पलाइन बना लिया था और उन्हें इसका फायदा मिला।

मंत्रियों का दिल्ली प्रवास

विधानसभा के मानसून सत्र से पहले मंत्रिमंडल का फेरबदल मुमकिन प्रतीत नहीं हो रहा। वैसे भी पहले मोदी कैबिनेट में बदलाव होना है। उसके बाद ही राज्यों का नंबर आएगा। हालांकि, सर्जरी के लिए एक्सरसाइज प्रारंभ हो चुका है। मंत्री, विधायकों का दिल्ली जाना जारी है। डिप्टी सीएम विजय शर्मा और हेल्थ मिनिस्टर श्यामबिहारी जायसवाल इस हफ््ते दिल्ली गए तो उसके अगले दिन पूर्व मंत्री लता उसेंडी दिल्ली में थी। 29 जून को स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव दिल्ली जा रहे हैं। बताते हैं, संघ कार्यालय से उन्हें बुलावा है। जाहिर है, लता उसेंडी का नाम मंत्री बनने वालों की चर्चाओं में सबसे उपर है, तो यूपी चुनाव को देखते गजेंद्र यादव का भी कद बढ़ाया जा सकता है। गजेंद्र को एकाध और विभाग मिल सकता है। वैसे इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं कि किसी डिप्टी सीएम का विकेट अगर गिरा तो फिर गजेंद्र का प्रमोशन भी हो जाए...आखिर राजनीति मुकद्दर का खेल तो है।

माननीयों के स्टाफ और नया ठीहा

वैसे विष्णुदेव कैबिनेट में पांच मंत्रियों के बदले जाने की चर्चाएं चल रही हैं। मगर बीजेपी का कोई भरोसा नहीं, संख्या इससे उपर भी जा सकती है। बहरहाल, जिन पांच मंत्रियों की विदाई की अटकलें तेज हैं, उनके घरों और आसपास के लोगों में माहौल भारी हो गया है। असल में, पांच मंत्रियों के खिलाफ परसेप्शन इतना गहरा है कि सोशल मीडिया में लोग खुलेआम ऐलान कर रहे हैं, फलां-फलां मंत्री...। और लोग उस पर ऐतबार भी कर ले रहे, क्योंकि रिपोर्ट कार्ड ही उनका ऐसा है...ढाई साल उन्होंने सिर्फ अपने लिए काम किया। खैर, इन मंत्रियों के पीए, स्टॉफ, कारोबारी और समर्थक अपने अगले ठीहे की संभावनाएं तलाशने में लग गए हैं।

जुगाड़ का डिप्टी कमिश्नर

जुगाड़ की माया देखिए...कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड में राजस्थान का एक व्यक्ति पर्यटन अधिकारी बना। इसमें अधिकारी जरूर जुड़ा है, मगर वास्तव में यह क्लास थ्री का पद होता है। खैर, कुछ दिनों बाद उन्होंने जोर-जुगाड़ लगाकर रायपुर से दिल्ली के सूचना केंद्र में पोस्टिंग करा ली। और, उसके बाद अब प्रतिनियुक्ति पर रेजिडेंट कमिश्नर ऑफिस में डिप्टी कमिश्नर बन बैठे। दरअसल, रेजिडेंट कमिश्नर श्रुति सिंह ने इस बात को आधार बनाकर नोटशीट भेजा कि फलां पर्यटन अधिकारी का वेतन डिप्टी कमिश्नर के समतुल्य हो गया है और जीएडी से उस पर मुहर लग गई। जबकि, रायपुर में उनके सारे बैचमेट 18 साल बाद भी पर्यटन अधिकारी से उपर नहीं पाए हैं। जाहिर है, बाबू के सीनियर हो जाने पर उसकी भी तनख्वाह असिस्टेंट कलेक्टर के बराबर हो जाती है तो क्या उसे असिस्टेंट कलेक्टर बना दिया जाएगा। बहरहाल, इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि दिल्ली का रेजिडेंट कमिश्नर ऑफिस बाकी राज्यों की तरह स्ट्रांग होना चाहिए, न कि बाबू कैडर के लोगों को वहां बिठा दिया जाए।

कमरा नंबर 109 का रहस्य

2016 में दिल्ली में जब छत्तीसगढ़ सदन बना, तब नियम बना था कि उसमें मुख्यमंत्री और मंत्रियों के अलावा और किसी को कमरा नहीं मिलेगा। विधायकों, सांसदों को भी नहीं। मगर छत्तीसगढ़ के एक मंत्री के कथित पीए ने करीब साल भर से सदन में कमरा नंबर 109 हथिया रखे हैं। अब आप पूछेंगे, कथित पीए क्यों? कथित इसलिए कि किसी मंत्री को दिल्ली में काम करने के लिए पीए नहीं मिलता। वास्तव में पीए होते तो वे मंत्री के साथ छत्तीसगढ़ में रहते। किसी और मंत्री का पीए तो दिल्ली में नहीं रहता। यहां तक कि किसी मुख्यमंत्री के पीए की भी पोस्टिंग दिल्ली में नहीं होती। फिर कमरा नंबर 109 का रहस्य क्या है? स्टेट के इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट को इसे नोटिस में लेना चाहिए...पता यह भी लगाना चाहिए कि रेजिडंेंट कमिश्नर ऑफिस के किस मुलाजिम का मोदी विरोधी नेता से सीधा कनेक्शन हैं।

10 पेटी

राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के तबादले में चल रही तीन-पांच की चर्चाओं को देखते सरकार ने ट्रांसफर लिस्ट रोक दी थी। मगर इसके भीतर की जो बातें निकल कर कर आ रहीं, वो हैरान करने वाली हैं। किसी ने बताया कि एक राप्रसे अधिकारी ने सिर्फ जिले में जाने के लिए एक बड़े बिचौलिये को 10 पेटी दे डाला। हालांकि, इस पर सहसा यकीं नहीं होगा...आखिर वो 10 पेटी निकालेगा कैसे? जवाब मिला, वो डेढ़-दो महीने में निकाल लेगा। वो वैसा ही करेगा, जैसा आजकल जिलों में हो रहा। बहरहाल, कई लोगों का पैसा डूबता लग रहा है। जिन बिचौलियों ने पैसा लिया है, वे पिछले तीन महीने से दिलासा दे रहे हैं, बस लिस्ट निकलने ही वाली है। मगर सरकार टस-से-मस नहीं हो रही।

पोस्टिंग और किस्मत

बस्तर आईजी के लिए 2004 बैच के दो आईपीएस अफसरों के नामों की बड़ी चर्चा थी। मगर आखिरकार पोस्टिंग मिल बद्री नारायण मीणा को। बद्री वैसे शुरू से पोस्टिंग को लेकर काफी किस्मती रहे हैं। छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक नौ जिलों के पुलिस अधीक्षक रहने का रिकार्ड उन्हीं के नाम है, तो एक साथ दो पुलिस रेंज के आईजी रहने वाले वे सूबे के पहले आईपीएस अधिकारी हैं। बद्री छत्तीसगढ़ के चुनिंदा आईएएस, आईपीएस अधिकारियों में शामिल हैं, जिन्हें सरकार बदलने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। रमन सरकार में वे सात जिलों के एसपी रहे तो भूपेश सरकार में दो जिलों के एसपी और तीन रेंज के आईजी बनने का उन्हें मौका मिला। वे दुर्ग में एसपी रहे और वहीं प्रमोट होकर आईजी बन गए। फिर बिलासपुर के आईजी बने और वहां से फिर दुर्ग आए और दुर्ग के साथ-साथ रायपुर के भी आईजी। ऐसा पोर्टफोलियो पूर्व डीजीपी अशोक जुनेजा का भी नहीं रहा। जुनेजा पुलिस महकमे के सबसे किस्मती पुलिस अधिकारी माने जाते थे। सरकार किसी की भी रही, वे कभी लूप लाईन की पोस्टिंग नहीं की। रमन सरकार के दौरान इंटेलिजेंस चीफ होने के बाद भी वे भूपेश बघेल सरकार में डीजीपी बने और विष्णुदेव साय सरकार में तमाम विरोधों के बाद भी न केवल उन्होंने कंटिन्यू किया, बल्कि छह महीने का एक्सटेंशन भी मिल गया।

आईएफएस की छुट्टी

आईएएस ऋचा शर्मा के एसीएस फॉरेस्ट रहने के दौरान वन मंत्री केदार कश्यप ने आईएफएस अधिकारियों की छुट्टी समेत कुछ फाइलें अपने अधिकार में ले लिए थे। दरअसल, ऋचा के फॉरेस्ट में रहने के समय आईएफएस अधिकारियों को छुट्टी लेना आसान नहीं था। सख्त आईएएस अफसर माने जाने वाली ऋचा शर्मा काफी किंतु-परंतु, क्वेरी के बाद अवकाश स्वीकृत करती थी। लिहाजा, वन मंत्री ने अफसरों की छुट्टी का अधिकार अपने पास रख लिया था। अब ऋर्चा शर्मा फॉरेस्ट से हट गई हैं तो वन मंत्री ने नए एसीएस फॉरेस्ट मनोज पिंगुआ को आईएफएस अधिकारियों के छुट्टियों के अधिकार दे दिए हैं।

सीएस की SOM मीटिंग

विकास शील के चीफ सिकरेट्री बनने के बाद दो-से-तीन हफ्ते के बीच एक सीनियर ऑफिसर्स मीटिंग (SOM) होती है, जिसे अफसरों के बीच SOM मीटिंग कहा जाता है। इसमें सभी विभागों के सिकेट्री शामिल होते हैं। इस मीटिंग को लेकर सचिवों में काफी तनाव रहता है...सीएस न जाने क्या पूछ दें, कब टोक दें। छत्तीसगढ़ बनने के बाद इस तरह की मीटिंग पहली बार हो रही। इसमें लोक सेवा गारंटी से लेकर ई-ऑफिस जैसे तमाम प्वाइंट होते हैं, सीएस जिसका फॉलोअप लेते हैं। एक तरह से कहा जाए तो ये जस्ट रिमाइंडर जैसी बैठक होती है, जिसमें सीएस जो टास्क दिए रहते हैं, उसका रिव्यू करते हैं। सोम मीटिंग के फेर में सिकेट्री लोगों को थोड़ा अलर्ट रहना पड़ता। इससे मंत्रालय की वर्किंग स्मूथ हुई है। फिर चीफ सिकेट्री का भय तो है ही, वे बोलने और टोकने में गुरेज नहीं करते।

चतुर मंत्री और आईडिया

सुनिल कुमार जब चीफ सिकरेट्री थे, तब समन्वय से ट्रांसफर या अफसरों का डेपुटेशन कराना काफी कठिन था। मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह या उनके सचिवालय से कोई मैसेज आ जाए तो बात अलग है वरना, वे नोटशीट पर इतना तगड़ा नोट लिख देते थे कि फिर फाइल को डंप करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता था। उस समय होशियार मंत्री या अफसर कई बार सीधे मुख्यमंत्री से नोटशीट पर लिखवा लेते थे। अब मुख्यमंत्री ने अगर ओके कर दिया तो फिर चीफ सिकेट्री को उसे अनुमोदन देना ही पड़ेगा। फिर सुनिल कुमार भी कुछ नहीं कर पाते थे। वर्तमान चीफ सिकेट्री विकास शील के दौर में भी अब चीजें उतनी आसान नहीं। विभिन्न विभागों से आए उंच-नीच वाले प्रस्तावों पर वे ब्रेक लगाने का प्रयास करते हैं। बताते हैं, स्कूल शिक्षा विभाग के जंबो ट्रांसफर के प्रपोजल पर भी उन्होंने ब्रेक लगाया।

CM, मंत्री सर्वोच्च

वन मंत्री केदार कश्यप ने आईएफएस अधिकारियों के अवकाश का अधिकार अपने पास रख लिया था, इस प्रसंग से सवाल उठता है, क्या कोई मंत्री ऐसा कर सकता है। बता दें, संविधान में मुख्यमंत्री को सरकार माना गया है...मंत्रियों के सारे अधिकार मुख्यमंत्री में निहित होते हैं। मुख्यमंत्री सरकार के कामकाज में सुविधा के लिए मंत्री बनाते हैं मगर वे चाहे तो किसी भी मंत्री के आदेश को पलट सकते हैं। उसी तरह सचिवों के सारे अधिकार मंत्री में समाहित होते हैं। मंत्री चाहे तो कोई भी फाइल मंगा सकता है, सचिव के नोट को बदल सकता है। ये अलग बात है कि यदि कोई गलत चीज होगी तो उसके लिए मंत्री ही जिम्मेदार होंगे। मगर सत्ता मंत्रियों की ही सर्वोच्च होती है। अब वो अलग बात है कि कई बार घुड़सवार कमजोर होता है, तो घोड़ा लगता है नचाने, वही स्थिति मंत्री और अफसर की होती है।

कलेक्टर, एसपी पर कसावट?

मुख्य सचिव विकास शील ने मंत्रालय और डायरेक्ट्रेट के अफसरों को काफी कस दिया है। मंत्रालय में 90 परसेंट अफसर अब 10 बजे पहुंच जाते हैं, तो मीटिंग, रिव्यू से सिस्टम टाईट हुआ है। मगर जिलों का हाल अभी भी डिरेल्ड है। न कलेक्टर टाईम को फॉलो कर रहे और न एसपी। अधिकांश जिलों में अराजकता जैसी स्थिति है। खासकर, उन जिलों की स्थिति काफी खराब है, जहां नए प्रमोटी कलेक्टर गए हैं। इनमें से कई ने तो जाते ही गर्दा उड़ा दिया है। दरअसल, नए प्रमोटी कलेक्टरों को कहीं से भनक मिल गई कि उन्हें खानापूर्ति के लिए कलेक्टर बनाया गया है, इसके बाद कभी भी उन्हें विदा कर दिया जाएगा। इसके बाद कामधाम छोड़ वे रोज सुबह कैलकुलेटर लेकर बैठ जा रहे। खैर, कलेक्टर, एसपी अगर टाईट होते तो कोरिया में ट्रिपल मर्डर थोड़े हो जाता। सोनहत का जघन्य हत्याकांड पुलिस और प्रशासन की घोर लापरवाही का नमूना है। रेत जैसी चीजों के लिए अगर तीन-तीन हत्याएं हो जाए तो सबसे पहले कलेक्टर, एसपी को लटकाना चाहिए। मुख्य सचिव को भी जिलों की अराजकता को लेकर स्ट्रांग होना पड़ेगा। जो अफसर इधर-उधर कर रहा, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की वे सिफारिश तो कर ही सकते हैं।

विधायकों की मजबूरी-1

छत्तीसगढ़ में रुलिंग पार्टी के विधायक हो या फिर आपोजिशन के, सभी एक सूत्रीय अभियान में जुटे हुए हैं, तो उनकी भी अपनी मजबूरी है। दरअसल, चुनाव इतने कॉस्टली होते जा रहे कि ग्रामीण सीटों पर भी अब 10 से 15 खोखा निकल जा रहा। शहरों तो 25 से उपर मानिये। ऐसे में, वो सब होंगे, जो कभी कल्पना से बाहर थे। जाहिर है, अब रेत और मुरूम ठेके तक पर एकाधिकार की कोशिशें हो रही। जांजगीर जिले की एक महिला विधायक का रेत माफिया से अपना हिस्सा मांगते वीडियो वायरल हुआ ही था तो कोरिया में दो बीेजीेपी विधायकों के रेत पर वर्चस्व में कितना बड़ा कांड हो गया, इसे सबने देखा। जघन्य वारदात हो गई। और जब विधायकजी लोग ही रेत से तेल निकालने लगेंगे तो सिस्टम क्या कर लेगा। कलेक्टर लोग कुर्सी बचाने मौन रहना ही श्रेष्ठ समझ रहे। क्योंकि, एक तो वो दमदार वाले कलेक्टर अब बचे नहीं, दूसरा जरा सा भी टोक दिए तो फिर अगले दिन से कलेक्टर की शिकायतें शुरू। यही वो वजह है कि अच्छे खासे मार्जिन से जीतकर आए विधायकों के खिलाफ एंटी इंकाम्बेंसी तेज होता जा रहा।

विधायकों की मजबूरी-2

विधायकजी लोग मजबूरी में दोनों हाथ से किस तरह काम कर रहे, इसका नमूना है जिला शिक्षा अधिकारियों की पोस्टिंग। सरकार ने 16 जिलों के डीईओ बदले, उनमें से छह जिलों का मामला हाई कोर्ट पहुंच गया है। कोर्ट ने इस पर नाराजगी भी व्यक्त किया है। दरअसल, छहों विधायकों ने जिद करके अपने जिले में नियम विरुद्ध व्याख्याताओं को डीईओ बनवा लिया। हालांकि, गजेंद्र यादव मजबूत बैकग्राउंड के हैं, इसलिए उन्हें नहीं झुकना था मगर मंत्रिमंडल में सर्जरी और प्रमोशन का समय है, वे भी विधायकों के प्रेशर में आ गए। बीजेपी संगठन को इसे देखना चाहिए। क्योंकि, इससे सरकार की छबि प्रभावित हो रही।

अध्यक्ष पर मंथन

इस समय सत्ताधारी पार्टी और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस दोनों के प्रदेश अध्यक्ष बस्तर से हैं। और यह कड़वी सच्चाई यह है कि दोनों की प्रदेश में वैसी पकड़ नहीं बन पाई है, जैसी कि पार्टी के मुखिया की होनी चाहिए। बीेजेपी अध्यक्ष किरण सिंहदेव ने तो अध्यक्ष की जगह मंत्री बनने की इच्छा जताई थी, हालांकि पार्टी ने उन्हें अध्यक्ष पद पर कंटिन्यू कर दिया। उधर, पीसीसी चीफ दीपक बैज भी ढाई साल में अपनी कोई पहचान नहीं छोड़ पाए हैं। वास्तविकता यह है कि आज भी पूर्व सीएम भूपेश बघेल ही पूरे प्रदेश में एकतरफा माहौल बनाए हुए हैं। हफ्ते भर के भीतर वे दो बार सरगुजा पहुंच गए। उनके बाद विधायक देवेंद्र यादव की सक्रियता है। बहरहाल, बीजेपी और कांग्रेस के सियान नेताओं को इस पर मंथन करना चाहिए बस्तर से जुड़े पार्टी नेताओं की पूरे प्रदेश में स्वीकार्यता क्यों नहीं बन पाती? और क्या अध्यक्ष रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग जैसे प्रदेश के बीच के हिस्से से बनाना चाहिए?

एसपी की लिस्ट

मुख्यमंत्री के व्यस्त होने की वजह से एसपी की लिस्ट नहीं निकल पाई। मगर अब आजकल में कभी भी आदेश जारी हो सकता है। इसमें करीब 10-12 जिलों के एसपी बदले जाएंगे तो रायपुर पुलिस कमिश्नरेट के चारों चारों डीसीपी एसपी बनकर जिलों में जा सकते हैं। दरअसल, चारों 2020 बैच के आईपीएस हैं। इस बैच के एक आईपीएस नारायणपुर में काफी पहले एसपी बन चुका है। सो, इन चारों में इस बात को लेकर क्षोभ रहता है। खैर, इन चारों का नंबर इस बार लग सकता है। 

अंत में दो सवाल आपसे?

1. किस मंत्री ने सूटकेस की शक्ति के जरिये मान लिया था कि उसका कोई विकल्प नहीं है मगर अब कुर्सी डगमगा रही है?

2. सरकार को सिस्टम में शुचिता लाने मंत्रियांें के साथ विधायकों के उपर भी अंकुश लगाने की जरूरत नहीं है?


शनिवार, 20 जून 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: मंत्री और बीपी का एक्स्ट्रा डोज



तरकश, 21 जून 2026

संजय के. दीक्षित

मंत्री और बीपी का एक्स्ट्रा डोज

18 जून की शाम मंत्रियों के लिए ही नहीं, बल्कि मीडिया के सियासी बीट कवर करने वाले पत्रकारों के लिए बड़ा तनाव भरा रहा। दरअसल, मंत्रियों की इमरजेंसी बैठक बुलाई गई थी मगर इससे अधिक अपडेट देने कोई तैयार नहीं था। जिनसे पूछो, वे खुद ही जिज्ञासु बने बैठे थे। उधर, सूचना मिलते ही मंत्री रायपुर के लिए भागे तो मीडियाकर्मियों का भी आधी रात के बाद तक सीएम हाउस के सामने जमावड़ा लगा रहा। बताते हैं, अंबिकापुर के एक मंत्रीजी को रास्ते में डॉक्टर से बात करनी पड़ गई। डॉक्टर के कहने पर उन्होंने बीपी का एक एडिशनल डोज लिया, तब जाकर सीएम हाउस पहुंच पाए। मंत्रियों की बैठक को सनसनीखेज बनाने में हेलिकाप्टर और स्टेट प्लेन का भी बड़ा हाथ रहा। कोई यह यकीन करने के लिए तैयार नहीं था कि बिना किसी गंभीर इश्यू के इस तरह मंत्रियों को बुलाया नहीं जाता। डिप्टी सीएम विजय शर्मा राज्यसभा चुनाव के सिलसिले में रांची में थे, वे स्टेट प्लेन से रायपुर पहुंचे। खैर, मंत्रियों को क्यों बुलाया गया? इसके पीछे के निहितार्थ क्या थे? इस पर अलग-अलग ढंग से बातें की जा रही हैं। मगर बीजेपी के हीे लीडरों का मानना है कि सिर्फ मीटिंग बुलाने से ही चीजें नहीं बदलने वाली। बल्कि एक साथ कई मोर्चों पर काम करना होगा। मंत्री रिजल्ट नहीं दे पा रहे और अफसर सुन क्यों नहीं रहे, इसकी जड़ में जाना होगा। मंत्रिमंडल के कुछ बड़े विकेट चटखाने होंगे...छोटी-मोटी बलि लेने से सिस्टम के प्रति परसेप्शन नहीं बदलेगा।

सांप भी मर जाए और...

बेशक, दुनिया की कोई भी राजनीतिक पार्टी बिना पैसे के नहीं चलती। खासतौर पर जब पार्टी सरकार में होती है...चंदे के लिए उसकी अपनी व्यवस्था होती है। खैर...सियासी चंदे की बात आई, तो बीजेपी के पिछली सरकार के दौर का एक वाकया स्मरण हो आया। एक बार सरकार के साथ कुछ चुनिंदा मंत्रियों की बैठक हो रही थी। बैठक में क्षेत्रीय संगठन मंत्री सौदान सिंह भी थे। बातचीत के दौरान एक मंत्री का संदर्भ आया। किसी ने कहा...पार्टी के लिए योगदान देने फलां मंत्री को भी जिम्मेदारी देनी चाहिए। मगर सौदान सिंह ने एकदम से मना कर दिया। बोले...पार्टी के लिए चंदा देने के लिए अथॉराइज्ड करने का मतलब होगा, उन्हें दोनों हाथ से बटोरने के लिए फ्री कर देना। इसके बाद उस मंत्री का पत्ता कट गया। फंडा यह है कि पार्टी के योगदान के लिए उन्हीं मंत्रियों की सेवाएं लेनी चाहिए, जिसका काम और अंदाज गरिमामय हो। इससे सांप भी मार जाता है और लाठी भी नहीं टूटती।

एक एफआईआर और तीन जान

सिस्टम के एक जिम्मेदार अफसर से एफआईआर के संदर्भ में बात हो रही थी। मजमूं था...पुलिस को एफआईआर करने में देरी नहीं करनी चाहिए, भले ही अपराधो के आंकड़े बढ़ जाएं, मगर उसके दूरगामी फायदे होंगे। अफसर भी इससे पूर्णतः सहमत थे। अब इसे एक इतेफाक कहें कि जिस शाम एफआईआर पर इस स्तंभ के लेखक की शीर्ष अफसर से बात हो रही थी, उसी दौरान कोरिया में एक भयावह हमले में बीजेपी नेता समेत तीन लोगों की हत्या हो गई। और एफआईआर ही उसका कारण बना। रेत के माफियागिरी में जब एक पक्ष के खिलाफ सोनहत थाने में मुकदमा दर्ज हो गया तो दूसरा पक्ष भी थाना पहुंचा। मगर थाने का दरोगा ने इसे हल्के में लेते हुए एफआईआर दर्ज करने की बजाए यह कहकर लौटा दिया कि चिंता मत कीजिए, बात कर सब ठीक करा दूंगा। जाहिर है, अगर सेकेंड पार्टी की भी सुनवाई करते हुए अपराध दर्ज कर लिया गया होता तो काफी कुछ भड़ास निकल गया होता। मगर थाने से बैरंग वापसी ने पूर्व जनपद पंचायत अध्यक्ष के लोगों के गुस्से को और भड़का दिया। और आव देखा, न ताव, चार गाड़ियों में शाम के समय निकल गए, हिसाब चुकता करने। उधर, विरोधी पार्टी के गांव में पूरी तैयारी थी। जैसे ही गाड़ियां गांव में रुकी, चौतरफा हमले शुरू हो गए। बाकी गाड़ियों में बैठे लोग वक्त को भांपते हुए भाग निकले। मगर पूर्व जनपद पंचायत अध्यक्ष की गाड़ी फंस गई। उसके बाद जो हुआ, घटनास्थल को देख लोगों के रोंगटे खड़े हो गए। बताते हैं, लाठी-डंडे से पीटकर अधमरा करने के बाद गाड़ी में डाल आग लगा दी गई। इस जघन्य कांड की जड़ एक अदद एफआईआर रहा। बता दें, पुलिस द्वारा कार्रवाई की बजाए समझौता कराने के चलते सूबे में कई बड़ी घटनाएं हो चुकी है। फिर उसके बाद वही होता है...दो-चार पुलिस वालों का निलंबन, दिखावटी जांच और फिर वहीं ढर्रा। जिम्मेदार लोगों को इस बारे में सोचना चाहिए कि जब सक्षम लोगों की थाने में एफआईआर दर्ज नहीं की जा रही तो आम आदमी के साथ क्या सलूक होता होगा? वही भड़ास फिर चुनाव में निकलता है।

गंगा नहान

छत्तीसगढ़ में जमीन, जायदाद या ठगी, घोखाधड़ी तो दूर की बात गंुडे-मवालियों के खिलाफ आप थाने जाएं और तुरंत अपराध दर्ज हो गया तो समझिए गंगा नहा लिए। दो-चार जिले या थाने अपवाद हो सकते हैं। बाकी पूरे छत्तीसगढ़ में कमोवेश यही स्थिति है। बिना उपर के अफसरों से सिफारिश कराए थाने में मुकदमा दर्ज नहीं करा सकते आप। छत्तीसगढ़ के पुलिस सिस्टम को यूपी से प्रेरणा लेनी चाहिए। यूपी में जब से योगी आदित्यनाथ की सरकार आई है, थानों को निर्देश है...भले ही जांच के बाद खात्मा डाल दें, मगर एफआईआर करना होगा। कोरिया में भी अदद एक एफआईआर दर्ज कर लिया गया होता तो तीन लोगों की जान बच गई होती, बल्कि सूबे का नाम भी खराब नहीं होता कि यहां इस तरह की घटनाएं भी होती हैं।

कलेक्टर से रिटायर

कलेक्टर से रिटायर होने वाले अधिकारियों की बात करें तो अभी तक सिर्फ एक ही नाम है। छतर सिंह देहरे। पिछली कांग्रेस सरकार में वे गरियाबंद जिले से रिटायर हुए थे। रमन सिंह के दौर में रायपुर कलेक्टर ठाकुर राम सिंह चूकि सिकेट्री प्रमोट हो गए थे, लिहाजा रिटायरमेंट से महीना भर पहले उन्हें कमिश्नर बनाया गया था। बहरहाल, बात कलेक्टर से रिटायरमेंट की, तो इस समय गरियाबंद जिले में भगवान सिंह उइके कलेक्टर हैं। नवंबर में उनका रिटायरमेंट है। जाहिर है, वे हिट विकेट नहीं हुए तो भगवान सिंह उइके छतर सिंह के रिकार्ड की बराबरी कर लेंगे।

आईपीएस, पोस्टिंग और रिकार्ड

आईपीएस सुुंदरराज एनआईए में आईजी बनकर जा रहे हैं। बस्तर में उनकी पोस्टिंग बेमिसाल रही। सिर्फ इस मायने में नहीं कि देश के इस सर्वाधित हिंसाग्रस्त इलाके से माओवादियों के पैर उखड़ गए, बल्कि रिकार्ड लंबी पोस्टिंग के लिहाज से भी। जाहिर है, बस्तर की पोस्टिंग के नाम पर आईपीएस अधिकारियों की सांसें उखड़ने लगती थी, उस पुलिस रेंज में सुंदरराज पूरे 14 साल पोस्टेड रहे। याने 23 साल की आईपीएस की सर्विस में आधे से अधिक वक्त उनका बस्तर में गुजरा। एएसपी से लेकर एसपी, डीआईजी और आईजी तक रहे। उन्होंने लांग कुमेर के बस्तर पोस्टिंग का रिकार्ड तोड़ा नहीं, बल्कि उनसे काफी आगे निकल गए। सुुंदरराज ने कभी किसी नेता या अफसर से सिफारिश नहीं की, न गिडगिड़ाए, उन्हें वहां से हटाया जाए। जबकि, बस्तर से कई एसपी और आईजी जोर-जुगाड़ लगा साल भर से कम समय में ही भाग निकले।

तोते की जान...

बात आईपीएस सुंदरराज की बस्तर में 14 साल पोस्टिंग की हो रही तो यह भी जानना जरूरी है कि आईएएस, आईपीस की जान कहां अटकी रहती है। तोते की तरह आईएएस, आईपीएस की जान पोस्टिंग में अटकी रहती है। देश के लिए ये एक विडंबना है कि सबसे कठिन एग्जाम क्लियर कर सर्वाेच्च सर्विस में आने वाले ये अफसर देवपूत से कम नहीं होते। मगर अदद पोस्टिंग के लिए पॉलिटिशियन के आगे अपनी जमीर से समझौता कर डालते हैं। छत्तीसगढ़ में ईडी द्वारा सीज किए गए व्हाट्सएप चौट को कोई देख लेगा तो उसे विश्वास नहीं होगा कि इतने टॉप के अफसर ऐसा भी कर सकते हैं। जबकि, आईएएस, आईपीएस सिर्फ पोस्टिंग का मोह त्याग दे तो मजाल नहीं कि सिस्टम में बैठे लोग उनसे कोई गलत काम करा लें। मगर अफसरों को पोस्टिंग और पईसा का ऐसा चार्म...लगातार अफसर जेल जा रहे, तब भी स्थितियां नहीं बदल रही।

2004 बैच के आईजी

बस्तर आईजी सुंदरराज के सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने के बाद जिन आईपीएस अधिकारियों को नया आईजी बनाए जाने की चर्चाएं चल रही हैं, उनमें 2004 बैच के आईपीएस अजय यादव और बद्री नारायण मीणा का नाम सबसे प्रमुख है। दोनों के पास पर्याप्त तजुर्बा है। अजय सात जिलों के एसपी और तीन रेंज के आईजी रह चुके हैं, तो बद्री नौ जिले के एसपी और तीन रेंज के आईजी रह चुके हैं। हालांकि, बस्तर आईजी की पोस्टिंग अभी भी चुनौतीपूर्ण है। नक्सलियों का खात्मा हो गया है मगर बड़ी तादात में फोर्स अब भी वहां तैनात है। बस्तर के डेवलपमेंट पर भी सरकार का भरपूर फोकस है। जाहिर है, डेवलपमेंट के साथ सिविल क्राइम में भी इजाफा होता है। लिहाजा, सरकार ठोक बजाकर ही आईजी का फैसला करेगी।

मामा से गुहार

छत्तीसगढ़ के 12 हजार मनरेगा कर्मचारियों को पिछले तीन महीने से पगार नहीं मिला है। मनरेगा के अफसरों को अब काम लेना मुश्किल होता जा रहा। दरअसल, केंद्रीय पंचायत मंत्री शिवराज सिंह ने कई बार आश्वासन दिया मगर अभी तक पैसे रिलीज नहीं किए हैं। सूबे के पंचायत मिनिस्टर विजय शर्मा को मामा से बात करनी चाहिए वरना डबल इंजन सरकार के खिलाफ कर्मचारियों का परसेप्शन बिगड़ेगा।

मंत्रालय का कॉफी हाउस

2012 में नवा रायपुर में मंत्रालय शिफ्ट हुआ था, तब से वहां की केटरिंग कॉफी हाउस के हाथ में रहा। कॉफी हाउस वे अधिकारियों, कर्मचारियों को जायकेदार व्यंजन वाजिब रेट पर तो मिलते ही थे, उसकी सर्विस भी कमाल की थी। सचिवालय के अफसरों का फरमान होता नहीं था कि गरमागरम चाय-कॉफी, स्नेक्स पहुंच जाता था। मगर पता नहीं क्या हुआ, कॉफी हाउस को वहां से चलता कर किसी प्रायवेट पार्टी को केटरिंग का काम सौंप दिया गया और अब हालत यह है कि सिकेट्री साब लोग दुखी हैं। कई बार तो ऐसा हुआ कि गेस्ट के जाने के बाद कॉफी या सूप पहंुचता है। कई अफसर अब अपने फ्रीज में छांछ, लस्सी और कोकोनॉट वॉटर रखने लगे हैं। ताकि, कुछ तो आवभगत कर सकें।

कलेक्टर का डेपुटेशन

बस्तर और बलौदा बाजार कलेक्टर के डेपुटेशन के बाद कांकेेर कलेक्टर नीलेश श्रीरसागर ने सेंट्रल डेपुटेशन के लिए अर्जी लगाई थी। सरकार ने उन्हें एनओसी भी दे दिया था। मगर अभी तक उन्हें क्लियरेंस मिला नहीं। पहले वे मसूरी एकेडमी जाना चाहते थे। मगर अब सुना है, अब वे दिल्ली के लिए ट्रॉय कर रहे हैं। अब देखते हैं, भारत सरकार से उनकी पोस्टिंग कब आती है, तब तक कांकेर कलेक्टर बनने की बाट जोह रहे दावेदारों को वेट करना होगा। और यदि, नीलेश का कहीं डेपुटेशन नहीं हुआ तो फिर उनके किसी और बड़े जिले में कलेक्टर बनने की दावेदारी प्रबल रहेगी। कांकेर में वैसे भी उनका दो साल कंप्लीट हो गया है। लोकसभा चुनाव 2024 के जस्ट बाद वे कांकेर कलेक्टर बन गए थे। जाहिर है, वे प्रतिभाशाली आईएएस तो हैं।

मंत्री की चार धाम यात्रा

मंत्री राजेश अग्रवाल का पिछले हफ्ते जन्मदिन था। उन्होंने परिवार के साथ चार धाम यात्रा कर अपना जन्मदिन मनाया। इस दौरान बाबा केदारनाथ और बद्री विशाल के समक्ष मत्था टेका। यद्यपि, मंत्रिमंडल की सर्जरी में राजेश अग्रवाल के उपर कोई खतरा तो नहीं दिखता। मंत्री बने उन्हें साल भर भी नहीं हुआ है। हो सकता है, बाबा केदारनाथ के दरबार में कमजोर विभागों को लेकर उन्होंने गुहार लगाई हो। पता ही है, राजेश मंत्री तो बन गए लेकिन, उन्हें पर्यटन में निबटा दिया गया। सरकार और संगठन ने ये भी ध्यान नहीं रखा...टीएस सिंहदेव को हराने में उनका कितना पेटी, खोखा निकल गया। लखनपुर की फर्नीचर दुकान तक खाली हो गई। वोटर्स बिना पैसा दिए, कुर्सी, टेबल, सोफा उठाकर ले गए। चलिये, बाबा केदारनाथ की कृपा रही, तो ब्याजमय सब वापिस हो जाएगा।

एसपी की बड़ी लिस्ट

छिटपुट तबादलों को छोड़ दें तो आईपीएस में जनवरी 2024 के बाद कोई बड़ी लिस्ट नहीं निकली है। जबकि, आईएएस और कलेक्टरों में हर साल दो-एक बड़ी लिस्ट निकल जाती है। 6 मई को ही सात कलेक्टरों समेत 42 आईएएस अधिकारियों का तबादला किया गया। बहरहाल, इस समय स्थिति यह है कि कई पुलिस अधीक्षक छोटे-छोटे जिलों में प्रमोट होकर डीआईजी हो गए हैं। पहले डीआईजी को संभागीय मुख्यालयों जैसे बड़े जिलों में ही पोस्ट किया जाता था। मगर पिछले पांच-सात सालों से अब तो दो-तीन ब्लॉक वाले जिलों में भी डीआईजी हैं। खैर, ढाई साल बाद आईपीएस की एक बड़ी लिस्ट निकलने वाली है। इसमें बस्तर में नए आईजी की पोस्टिंग होगी। जिले की बात करें तो 10 से 12 जिलों के एसपी चेंज होंगे। अधिकांश बड़े जिलों में नए एसपी पोस्ट होंगे। जाहिर है, एसपी की पोस्टिंग अगले विधानसभा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए की जाएगी...नए एसपी 2028 में चुनाव कराएंगे।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. सीएम हाउस में मंत्रियों की बैठक हुई, उसमें प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव क्यों नहीं पहुंच पाए?

2. मंत्रियों और विधायकों की इमेज खराब करने में उनके स्टॉफ और चंगु-मंगू की कितनी भूमिका होगी?

शनिवार, 13 जून 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: मंत्रियों का सामूहिक इस्तीफा!

 


तरकश, 14 जून 2026

संजय के. दीक्षित

मंत्रियों का सामूहिक इस्तीफा!

छत्तीसगढ़ में मंत्रिमंडल सर्जरी की अटकलों के बीच एक अपडेट ये आ रहा कि पार्टी पहले सभी 13 मंत्रियों का इस्तीफा लेगी, उसके बाद नए सिरे से मंत्रिमंडल का गठन किया जाएगा। ठीक उसी तरह, जैसा गुजरात में दो बार हुआ। जाहिर है, बीजेपी में मंत्रियों का सामूहिक इस्तीफा तभी लिया जाता है, जब हटाए जाने वाले मंत्रियों की तादात ज्यादा हो। छत्तीसगढ़ में 13 में से से करीब पांच मंत्रियों को बदलना है। अगर दो-तीन मंत्रियों को हटाना होता तो फिर सिर्फ उन्हीं से इस्तीफा लिया जाता। मगर फिगर ज्यादा है, इसलिए बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व सभी मंत्रियों का इस्तीफा लेगा, फिर उसमें नए मंत्रियों को शामिल किया जाएगा। इस्तीफा देने वाले पांच मंत्रियों की जगह कौन लेगा...उनमें पुराने विधायक कितने होंगे और कितने नए...इस बारे में इस समय बता पाना मुमकिन नहीं, क्योंकि, नए जमाने के बीजेपी में कब, क्या होगा...किसी को कुछ पता नहीं होता। सब कुछ काफी कंफिडेंशियल होता है। बताते हैं, खुद नितिन नबीन को आभास नहीं था कि पार्टी ने उन्हें सर्वोच्च पर बिठाने का फैसला किया है। पीएम नरेंद्र मोदी ने जब फोन किया, तो उन्हें लगा कि बिहार बीजेपी का अध्यक्ष बनाने की बात कर रहे हैं। मगर अगले पल जो हुआ, उससे नितिन भी हैरान रह गए। खैर, बात छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल फेरबदल की, तो जून लगभग आधा निकल गया है। हो सकता है, इस महीने के आखिर या जुलाई फर्स्ट वीक तक राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की टीम फायनल हो जाए। इसके बाद जुलाई फर्स्ट या सेकेंड वीक तक छत्तीसगढ़ में मंत्रिमंडल पर काम होगा। तब तक सभी तेरहवों मंत्रियों की सांसे गले में लटकी रहेगी।

ओड़िया आईएएस और ग्रहण

रिटायर आईएएस और साहित्यकार बीकेएस रे नहीं रहे। 79 साल की उम्र में 3 जून को उनका देहावसान हो गया। उसके अगले दिन महादेव घाट में उनका अंतिम संस्कार हुआ। मुक्तिधाम में जैसा कि आमतौर पर गपशप होता है...उस रोज भी तरह-तरह के पुराने किस्से, चर्चाएं निकली। बात इस पर भी हुई कि एसके मिश्रा के सीएस रहने के दौरान आखिर ऐसा क्या हुआ कि ओड़िया आईएएस अधिकारियों का ग्रह-नक्षत्र बिगड़ गया। एसके मिश्रा ओड़िसा के रहने वाले थे। छत्तीसगढ़ के फर्स्ट चीफ सिकेट्री अरुण कुमार के रिटायर होने के बाद अजीत जोगी ने मिश्रा को मुख्य सचिव बनाया था। मगर उनके बाद फिर कोई दूसरा ओड़िया भाषी अफसर सीएस नहीं बन पाया। दिवंगत ओड़िया निवासी बीकेएस रे सीएस की दौड़ में दो बार सुपरसीड हुए। पहली बार उनके जूनियर शिवराज सिंह को सीएस बनाया गया और उसके बाद पी0 जॉय उम्मेन को। रे के बाद डीएस मिश्रा और एमके राउत लाख प्रयास के बाद भी मुख्य सचिव बनने से वंचित हो गए। और अब सुब्रत साहू के साथ यही हुआ। सुब्रत 92 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। मगर उन्हें सुपरसीड कर सरकार ने 94 बैच के आईएएस विकास शील को ब्यूरोक्रेसी की शीर्ष कुर्सी सौंप दी। ऐसा भी नहीं कि ये ओड़िया अधिकारी चीफ सिकेट्री बनने लायक नहीं थे। छत्तीसगढ. में एक से बढ़कर एक ..... मुख्य सचिव हुए हैं, उनसे तो ये अच्छे ही थे। ओड़िया आईएएस अधिकारियों को जगन्नाथ महाप्रभु की नगरी पुरी में ठीकठाक किसी पंडित से अनुष्ठान कराना चाहिए।

78 सीटों का क्या

बस्तर से नक्सलवाद का खात्मा हो गया, छत्तीसगढ़ के लिए इससे बड़ी खुशी की बात हो नहीं सकती। निश्चित तौर पर बस्तर के डेवलपमेंट पर सिस्टम का फोकस होना चाहिए। सरकार ने बस्तर को प्रायरिटी में रखा भी है। उसे देश का सबसे विकसित आदिवासी संभाग बनाने का फैसला किया गया है। यहां तक ठीक है। मगर सिस्टम को खुश करने सारा तंत्र लगे सिर्फ बस्तर का राग अलापने, तो स्टेट और सत्ताधारी पार्टी की सेहत के लिए ये ठीक नहीं है। इस समय स्थिति यह है कि जिसे बस्तर से कोई मतलब नहीं, वो भी बस्तर की बात कर रहा। सिस्टम में बैठे लोगोें को यह ध्यान रखना होगा कि बस्तर में 12 विधानसभा सीटें हैं। बाकी 78 सीटें सरगुजा और मैदानी इलाके में हैं। मैदानी और शहरी इलाके में पानी से लेकर सड़क जैसी कई बुनियादी समस्याएं मुंह बाए खड़ी है, मगर इन विभागों के जिम्मेदार अफसर सिर्फ बस्तर की जाप करेंगे तो यह असंतुलन की स्थिति होगी। सिस्टम में बैठे लोगों को इसे नोटिस में लेनी चाहिए।

रिटर्न गिफ्ट में ब्रेकर

नगरीय निकाय चुनाव में एकतरफा जीत के बाद विष्णुदेव सरकार ने नगरीय क्षेत्रों को रिटर्न गिफ्ट देने एक अच्छा कंसेप्ट शुरू किया था। इसके तहत चुनिंदा शहरों के विकास के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक हाई लेवल की मीटिंग होती थी। इसमें नगरीय निकाय मंत्री के साथ वित्त मंत्री और संबंधित विभागों के सचिवों के साथ संबंधित जिले के कलेक्टर, एसपी तथा विधायकों को बुलाया जाता था। लेकिन, रायपुर और बिलासपुर के बाद कतिपय कारणों से इस बैठक पर ब्रेक लग गया। इसे फिर से चालू करना चाहिए। क्योंकि इस हाई लेवल बैठक में मौके पर ही कई समस्याओं या पेंडिंग कार्य क्लियर हो जा रहे थे। इससे फायदा भाजपा को ही होता, क्योंकि शहरी इलाकों में बीजेपी का प्रभाव ज्यादा है। वैसे भी किसी स्टेट का भौतिक विकास उसके शहरों की चकाचौंध से परखा जाता है। फिर ग्रामीण इलाकों के लोग भी आमोद-प्रमोद के लिए शहर ही आते हैं। मगर शहर ही बेतरतीब, अव्यवस्थित रहेगा तो फिर बाहर के लोग स्टेट की क्या छबि लेकर जाएंगे।

फॉरेस्ट और आईएएस

श्रीनिवास राव और तपेश झा के रिटायरमेंट के बाद सरकार ने अरुण पाण्डेय को हेड ऑफ फॉरेस्ट बनाया। इसके बाद वैक्यूम को दूर करने चार शीर्ष अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार देकर सरकार ने काम चला लिया। मगर फॉरेस्ट में असली दिक्कत आएगी अगले महीने, जब माइनर फॉरेस्ट फेडरेशन से अनिल साहू और फॉरेस्ट डेवलपमेंट कॉरपोरेशन से प्रेम कुमार रिटायर होंगे। ये दोनों पीसीसीएफ लेवल के पोस्ट हैं और प्राब्लम यह है कि वन विभाग के पास इस स्तर के अधिकारी अब बचे नहीं हैं। इनमें फेडरेशन तो बस्तर के आदिवासी इलाके और वोट बैंक की दृष्टि से काफी अहम है। ये अलग बात है कि फेडरेशन के वर्तमान एमडी अनिल साहू संजय शुक्ला और अनिल राय के काम को आगे बढ़ा नहीं पाए। मगर विधानसभा चुनाव में अब दो साल बच गए हैं, लिहाजा सरकार अब किसी ठीकठाक अफसर को ही इस पद पर बिठाना चाहेगी। मगर अफसर है नहीं। ऐसे में, सवाल उठता है...क्या किसी आईएएस को फेडरेशन और कॉरपोरेशन में नहीं बिठाया जा सकता। इन दोनों में काम एडमिनिस्ट्रटिव और कोआर्डिनेशन का है। वैसे, ब्यूरोक्रेसी में इस पर चर्चा भी चल रही कि जब आईएएस के कैडर पद पर अनेक आईएफएस काम कर चुके हैं तो फिर वन विभाग में आईएएस पोस्ट क्यों नहीं हो सकते। बहरहाल, निर्णय सरकार को लेना है।

कमाल के अफसर

एनएमएसी ने सूबे के पांच नए मेडिकल कॉलेजों को परमिशन देने से इंकार कर दिया है। अफसरों ने बिना किसी तैयारी के प्रपोजल भेज दिया था। कई जगह अस्पताल नहीं है तो कहीं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को ही अस्पताल दिखा डाला था। अफसरों की नाकामी इसलिए कि पांच में से तीन कवर्धा, जांजगीर और गीदम कॉलेज के लिए भारत सरकार ने पिछली सरकार में बिल्डिंग बनाने के लिए पैसा भेज दिया था। 2022 से यह पैसा डंप पड़ा है। दिसंबर 2023 में सरकार बदलने के बाद सीजीएमएससी ने अफसरों ने टेंडर में खेला करने में दो बरस बर्बाद कर दिया। 500 करोड़ ओवर रेट पर एक ही कंपनी को ठेका देने की साजिश रची गई। मगर इसी स्तंभ के लेखक की लगातार खबरों के बाद घोटाले का टेंडर निरस्त हुआ और सरकारी खजाने का 272 करोड़ बचा। मगर सरकार के पैसे बच गए मगर यहां के बच्चों का जो नुकसान हुआ, उसका क्या? जरा सोचिए, टेंडर में गफलत करने की कोशिश में अगर टाईम खराब नहीं किया गया होता तो अभी तक बिल्डिंग कंप्लीट हो रही होती। और, उस बेस पर शायद एनएमसी कम-से-कम तीन कॉलेजों को अनुमति दे दी होती। स्वास्थ्य विभाग में उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों ने अगर अपने पड़ोसी प्रदेश से ही समझ लिया होता...एमपी में पहले कॉलेज बिल्डिंग और अस्पताल तैयार किया जाता है फिर मान्यता के लिए प्रस्ताव भेजा जाता है। मगर छत्तीसगढ़ के कमाल के अफसरों ने कमाल कर डाला।

सीजीएमएससी की नाकामी

एनएमसी ने पांच मेडिकल कॉलेजों को मान्यता नहीं दिया है मगर वास्तविकता यह है कि पिछली सरकार में तीन कॉलेज खुले हैं, वहां भी अगर एनएमसी एक बार इंस्पेक्शन कर लें तो तीनों की मान्यता निरस्त हो जाएंगी। कोरबा, महासमुंद और कांकेर, तीनों मेडिकल कॉलेजों को कोविड काल का लाभ मिला और उन्हें बिना निरीक्षण के मान्यता मिल गई थी। मगर उन तीनों कॉलेजों का बुरा हाल है। न कॉलेज की बिल्डिंग बनी है और न अस्पताल। और-तो-और, रमन सिंह सरकार के दौरान अंबिकापुर में खुले मेडिकल कॉलेज अस्पताल की पूरी बिल्डिंग अभी नहीं बन पाई है। सरकार ने उसके लिए 100 करोड़ स्वीकृत किया मगर तीन साल बाद भी जस-की-तस स्थिति है। और ये भी, पिछले साल एक जुलाई को मेडिकल कॉलेज में सीएम के कार्यक्रम में हॉस्टल को लेकर बतंगड़ हुआ था। सीएम को वास्तविकता की जानकारी मिली तो उन्होंने हॉस्टल के लिए तुरंत 80 करोड़ स्वीकृत कर दिया था मगर उसके बाद भी काम शुरू नहीं हो पाया।

सजा नहीं, इनाम

असल में दिक्कत यह है कि सिस्टम में किसी काम के फेल्योरनेस के लिए कोई जिम्मेदारी तय नहीं है। छत्तीसगढ़ जैसे गरीब प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग और सीजीएमएससी के लोगों ने मेडिकल कॉलेजों को खोलने में लापरवाही बरती तो उसके लिए उन अफसरों को चिन्हित किया जाना चाहिए...दंड का प्रावधान होना चाहिए। मगर ऐसा होता नहीं। बल्कि, उपर से उन्हें बढ़िया पोस्टिंग मिल जाती है। सीजीएमएससी के अधिकारियों को कलेक्टर बनाकर ईनाम दे दिया जाता है। हेल्थ में बडे़-बड़े घोटाले के बाद भी किसी अफसर का बाल तक बांका नहीं हुआ। तो फिर कोई अफसर अपने दायित्वों के प्रति सजग क्यों रहेगा? वो काला-पीला करेगा ही, क्योंकि उन्हें मालूम है, आईएएस भाई लोग बचा ही लेंगे।

सीजीएमससी फेल क्यों?

हेल्थ डायरेक्ट्रेट में सीबीआई के छापे और डायरेक्टर, ज्वाइंट डायरेक्टर समेत कई डॉक्टरों को जेल जाने के बाद रमन सिंह सरकार ने यह सोचकर सीजीएमएससी को बनाया कि डॉक्टर लोग खरीदी-वरीदी जैसे प्रशासनिक कार्यो में पारंगत नहीं होते, इसलिए कॉरपोरेशन के जरिये खरीदी, सप्लाई किया जाएगा। तब आईएफएस अधिकारी प्रताप सिंह को सीजीएमएससी का फर्स्ट एमडी बनाया गया। उनके रहते तक सीजीएमएससी में अच्छा काम हुआ। मगर उसके बाद आए दूसरे आईएफएस अधिकारी ने तबाही मचा दी। उसके बाद से कॉरपोरेशन की चाल-चलन बिगड़ा, वह पटरी पर नहीं लौट पाया। अलबत्ता, समय के साथ सीजीएमससी के खटराल अधिकारियों ने स्वास्थ्य विभाग से बात कर मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों का सिविल कार्य भी शामिल करवा लिया। जबकि, सीजीएमएससी के पास सिविल का अपना कोई सेटअप नहीं। इसके लिए दूसरे विभागों से उधारी पर इंजीनियर लिए गए। और हजार-हजार करोड़ करोड़ का काम शुरू कर डाले। कोरबा, महासमुंद और कांकेर के बाद पांच नए मेडिकल कॉलेज का काम भी सीजीएमएससी ही कर रहा है। अब बात सीजीएमएससी फेल क्यों, तो बताते हैं एक तो सीजएमएससी के पास सेटअप नहीं, और दूसरा जो सबसे महत्वपूर्ण...काम प्रारंभ करने से पहले ठेकेदार को आठ फीसदी कमीशन बंगले में पहुंचाना पड़ता है और पांच-सात परसेंट खुरचन-पानी सीजीएमएससी में इधर-उधर। अब 200 करोड़ में से 20-25 करोड़ पहले ही बांट देता है मगर काम का भुगतान जल्दी होता नहीं। याने एडवांस जेब से गया है, निर्माण में जो खर्च हुआ, वो भी टाईम से पेमेंट नहीं मिलता। कोरबा, कांकेर और महासमंुद का काम लटकने के पीछे ये भी एक बड़ा कारण है।

वर्जित मास में शादी और बवाल

पिछले हफ्ते बेमेतरा सियासी तौर पर बेहद सुर्खियों में रहा। असल में, जो अकल्पनीय था, वह हो गया। उस घटना के नीर-क्षीर, विवेचन से पता चला, खता अफसरों ने की और उसकी कीमत सिस्टम ने चुकाई। दरअसल, सनातन धर्म में मलमास याने पुरूषोतम मास में शादी-ब्याह पूर्णतः वर्जित है। इस प्रतिबंधित महीने में अफसरों ने सामूहिक विवाह का कार्यक्रम रख दिया। उस पर, आश्चर्य यह कि बीजेपी जैसी धर्म-कर्म में विश्वास रखने वाली पार्टी के किसी नेता ने भी इस पर ध्यान नहीं गया। अलबत्ता, बेमेतरा के विधायक भी दूल्हा बन बैलगाड़ी में बैठ गए, तो उत्साहित होकर डिप्टी सीएम अरुण साव उनके गाड़ीवान बन लगे गाड़ी हांकने। अब मलमास में शादी होगी, तो उसका साइड इफेक्ट आना ही था...वीवीआईपी कार्यक्रम में अराजकता की खबर सोशल मीडिया की सनसनी बन गई। खैर, विधायक समेत सभी नव ब्याहितों को सुखी दांपत्य जीवन के लिए शुभकामनाएं। और, महिला बाल विकास मंत्री को सलाह भी...उन्हें काशी के किसी पंडित से कुछ हवन वगैरह करा लेना चाहिए...मंत्रिमंडल सर्जरी की चर्चाओं के बीच उनके विभाग ने वर्जित मास में शुभ काम करा डाला।

एसपी की पोस्टिंग

छत्तीसगढ़ राज्य के अब तक के सबसे तेज-तर्रार गृह मंत्री होने के बाद भी दो-दो जिलों में एसपी की पोस्टिंग नहीं हो पा रही तो यह आश्चर्यजनक है। बता दें, सारंगढ़ और बलौदा बाजार में काफी दिनों से एसपी की कुर्सी खाली पड़ी है। दोनों जिले काफी संवेदनशील हैं। बलौदा बाजार में दो साल पहले कलेक्ट्रेट और एसपी ऑफिस फूंक देने जैसी हिंसक घटनाएं हो चुकी है। बावजूद इसके, दोनों जिले टेम्पोरेरी व्यवस्था में चल रहे। दोनों में एडिशनल एसपी को बिठाया गया है। बलौदा बाजार की एसपी भावना गुप्ता पर्सनल कारणों से लंबे अवकाश पर हैं तो सारंगढ़ के एसपी आंजनेय वार्ष्णेय सेंट्र्रल डेपुटेशन पर निकल गए हैं। पीएचक्यू और गृह विभाग की ड्यूटी है कि जिन जिलों में कप्तान नहीं है, वहां बात करके पोस्टिंग कराए। मगर पता नहीं तालमेल कहां पर गड़बड़ा रहा है। इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। कोई महिला एसपी अगर लंबी छुट्टी पर जाती थीं या कोई कप्तान डेपुटेशन पर गया तो तुरंत ही गृह विभाग से वहां पोस्टिंग कर दी जाती थी।

मंत्रियों का ऐसा परफार्मेंस

सुशासन तिहार में कई दिलचस्प एपिसोड सामने आए। एक सीनियर मंत्री के विधानसभा क्षेत्र के एक गांव में सीएम का चौपाल लगना था। मुख्यमंत्री ने वहां जाने से पहले मंत्री से पूछ दिया, आप तो फलां गांव को जानते ही होगे, अब मंत्री लगे अगल-बगल झांकने। मंत्रीजी रायपुर से रात में ही भागते-भागते अपने विस क्षेत्र पहंुचे, फिर अगली सुबह सीधे गांव में। मंत्री को डर था कि कहीं कलई खुल न जाए...रमन सिंह के दौर से मंत्री रहने के बाद भी माननीय एक बार भी अपने क्षेत्र के गांव में नहीं आए।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. केंद्रीय मंत्री तोखन साहू और डिप्टी सीएम अरुण साव में से किसका फ्यूचर ज्यादा ब्राइट है?

2. छत्तीसगढ़ आर्म्स फोर्स की 22 बटालियन में से अधिकांश में कमांडेंट डबल चार्ज में है, तो इसका मतलब ये निकाला जाना चाहिए कि पुलिस सिस्टम के प्रायरिटी में नहीं है?

गुरुवार, 11 जून 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: मंत्रिमंडल, सोशल मीडिया और सरगुजा

 


तरकश, 7 जून 2026

संजय के. दीक्षित

मंत्रिमंडल: परफॉर्मेंस और परसेप्शन

विष्णुदेव साय मंत्रिमंडल में फेरबदल इस महीने होगा या जुलाई फर्स्ट वीक तक, इस पर अभी कुछ क्लियरिटी नहीं है। मगर सोशल मीडिया में अटकलों का बाजार गर्म है। हालांकि, बीेजेपी की सियासत में इस समय एक कान को पता नहीं होता...कि दूसरे कान में..., तो फिर मंत्री कौन बनेगा, कौन होगा आउट, इसकी भविष्यवाणी करना मुमकिन नहीं। बहरहाल, परफॉर्मेंस और परसेप्शन के आधार पर ये जरूर कहा, सुना और माना जा रहा कि मंत्रिमंडल की सर्जरी में सबसे अधिक खतरा सरगुजा संभाग को रहेगा। मुख्यमंत्री को छोड़ दें, तब भी बस्तर की तुलना में सरगुजा में चार गुना मंत्री हैं। जाहिर है, फेरबदल में इस असंतुलन को दूर किया जाएगा।

खतरे में ये मंत्री

सरगुजा के चार में से तीन की रिपोर्ट्स अच्छी नहीं आ रही है। इसकी बड़ी वजह खराब परफार्मेंस के साथ रिकार्डतोड़ करप्शन है। सरगुजा के कई मंत्रियों को लग रहा...शायद यह मौका फिर मिले न दोबारा...सो, आईपीएल अंदाज़ में बैटिंग चल रही। खुफिया एजेंसियां भी इसकी तस्दीक कर रही हैं...अपडेट्स भी लगातार दिल्ली जा रहे हैं। खैर, परफॉर्मेंस और परसेप्शन की बात करें तो 12 में से पांच मंत्रियों की विदाई निश्चित लग रही है। बीजेपी के शीर्ष लीडर भी मानते हैं... तभी 2028 के सियासी रण में बीजेपी दमदारी से उतर पाएगी।

आईपीएस डेपुटेशन पर!

छत्तीसगढ़ के नक्सल चीफ और एडीजी आर्म्स फोर्स विवेकानंद प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली जा सकते हैं। पता चला है, उन्होंने सेंट्रल डेपुटेशन के लिए अप्लाई किया था। उसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ सरकार से एनओसी मांगा है। 96 बैच के आईपीएस अधिकारी विवेकानंद इससे पहले एसपीजी में प्रतिनियुक्ति पर रह चुके हैं। बहरहाल, प्रश्न यह है कि राज्य सरकार ने डीजीपी अरुणदेव गौतम की पोस्टिंग में चकरी चलाते हुए आठ महीने में समेट दिया है। अगले साल 4 फरवरी को गौतम का दो बरस का टेन्योर खतम हो जाएगा। इसके बाद डीजीपी के प्रबल दावेदारों में विवेकानंद भी होंगे। विवेकानंद पिछले सात साल से नक्सल देख रहे हैं। उनके कार्यकाल में छत्तीसगढ़ से नक्सलियों का खात्मा हुआ है। उन्हें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर्सनली जानते हैं। फिर ऐसे गोल्डन टाईम में क्या उन्हें डेपुटेशन पर जाना चाहिए? एक संभावना यह भी है कि उन्होंने डीजीपी के आदेश निकलने से पहले डेपुटेशन के लिए अप्लाई कर दिया होगा। मगर अब वे क्या सोच रहे, कुछ नहीं कहा जा सकता। उधर, बस्तर आईजी सुंदरराज के लिए भी केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एनओसी मांगा है। बस्तर में 15 जून के बाद बारिश शुरू हो जाएगी। बारिश में नक्सलियों का मूवमेंट कम हो जाता है। इसके बाद सुंदरराज कभी भी दिल्ली रवाना हो जाएंगे।

कॉकरोच पार्टी, युवा नेताओं की मौज

सुप्रीम कोर्ट के कई बड़े असहज करने वाले फैसलों से बीजेपी और उसकी सरकारों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा मगर शीर्ष अदालत से अनजाने में निकले एक शब्द ने भाजपा को बैकफुट पर ला खड़ा किया है। कॉकरोच पार्टी के ऑनलाइन गठन से बीजेपी इसलिए डिफेंसिव है कि केंद्र समेत डेढ़ दर्जन राज्यों में उसकी सरकारें हैं। बाकी कांग्रेस की, तो उसके पास कोई खास बचाने के लिए है नहीं। खैर, इस ऑनलाइन पार्टी का भविष्य क्या होगा, ये वक्त बताएगा। अलबत्ता, बीजेपी और उसके पैरोकारों ने अभिजीत दीपके के आम आदमी पार्टी का सदस्य होने और मुस्लिम प्रधानमंत्री की वकालत वाले उसके ट्वीट पर घेरना शुरू कर दिया है। पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया के साथ सीजेपी के संस्थापक की फोटो सोशल मीडिया में वायरल हो रही है। अब, पते की बात यह है कि बीजेपी संगठन और सरकारों में अब युवाओं की पूछपरख बढ़ जाएगी। वैसे, भी बीजेपी एक कदम आगे चलते हुए 44 साल के नितिन नबीन को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया था। अब केंद्र में मंत्रिमंडल के विस्तार में इसका असर दिखेगा, तो छत्तीसगढ़ समेत दीगर राज्यों के कैबिनेट के फेरबदल में युवा विधायकों के लिए संभावनाएं बढ़ेंगी। सिर्फ बीजेपी ही नहीं, बल्कि दीगर सियासी पार्टियों में युवाओं की अहमियत बढ़ेगी।

ईमानदारी...और एफिशियेंट भी

छत्तीसगढ़ में इस समय कलेक्टरों के साथ सचिवों की पोस्टिंगे ठीकठाक हुई हैं। कलेक्टरों में देखा जाए तो दर्जन भर कलेक्टर अच्छी और साफ-सुथरी छबि वाले हैं। मगर सवाल उठता है सिर्फ ईमानदारी ही काफी है? नहीं। रिजल्ट देने के लिए दक्षता, कार्यकुशलता भी जरूरी है। पब्लिक से संवाद और जनता की समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता भी चाहिए। छत्तीसगढ़ ने अतीत में कई ऐसे नौकरशाहों को देखा है, सरकार जिन्हें एक बार इशारा कर दें, रिजल्ट की गांरटी होती थी। मगर उसके लिए सिस्टम पर पकड़ जरूरी होता है। नए जमाने के अफसरों में दिक्कत यह है कि एक बड़ा तबका आईएएस बनने के बाद खुद को जमीन से दो इंच उपर समझ बैठता है। और, कहीं उनके साथ ईमानदारी का तगगा लग गया, तब तो करेला और नीम चढ़ा। कलेक्टरों की अपनी पहचान नहीं बन पाने के पीछे ये एक बड़ी वजह है। बहरहाल, ये सिंड्रोम सिर्फ कलेक्टरों में नहीं, मंत्रालय के सचिवों में भी यही स्थिति है। कई ईमानदारी आईएएस कई अहम विभाग लेकर बैठे हैं, मगर उनका परफार्मेंस आज तलक किसी को कुछ दिखा नहीं, और न ही बरसों की सर्विस में वे अपना एक काम बता सकते। ब्यूरोक्रेसी और उसके जिम्मेदार अफसरों को मंथन करना चाहिए कि ब्यूरोक्रेसी के इस वायरस का आखिर निदान क्या है।

सुशासन और कलेक्टर

सवाल फिर कलेक्टरों से...राजा जैसी सुविधाओं का उपभोग करने के बाद कलेक्टर अपने दायित्वों में कितना खरे उतर रहे हैं? इस समय स्थिति यह है कि मुट्ठी भर उत्साही कलेक्टरों को छोड़ दें तो ठीकठाक छबि वाले कलेक्टर भी कुर्सी पर चिपके सिर्फ टाईम काट रहे हैं। कोरबा में अजीत बसंत और बेमेतरा में प्रतिष्ठा ममगई की घटना के बाद ये भ्रांति भी दूर हो गई है कि कलेक्टरों को कोई प्रोटेक्शन नहीं है। इस सरकार में अच्छे अफसरों को संरक्षण दिया जा रहा। इसके बाद भी हालत में कोई सुधार नहीं। मिलियन डॉलर का सवाल कि कलेक्टर अगर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे होते तो सरकार को 45 डिग्री की गर्मी में समाधान शिविर लगाने की आवश्यकता पड़ती क्या? एक तरह से कहें तो समस्या निवारण शिविर कलेक्टरों की अक्षमता को प्रतीक है। जाहिर है, कलेक्टर अगर अपनी नाक के नीचे बैठे एसडीएम, तहसीलदार को महीने में एक बार बुलाकर रिव्यू कर लेते तो पब्लिक कलेक्टर से लेकर सरकार तक को वाह-वाह कर उठती।

कलेक्टरों की चार केटेगरी

छत्तीसगढ़ में इस समय चार तरह के कलेक्टर हैं। एक ऑनेस्ट, डेसिंग और रिजल्ट देने वाले। यद्यपि, कलेक्टरों का ये नस्ल इस समय विलुप्ति की ओर अग्रसर है। मुश्किल से होंगे चार-पांच। दूसरा केटेगरी...ईमानदार मगर काम से देहचोरी करने वाले। इस दूसरे केटेगरी वाले का पूरा ध्यान अपनी छबि और कुर्सी बचाने पर टिका होता है। बीच-बीच में डीएमएफ का हिस्सा आ जाए तो रख लो। बाकी फुल डिफेंसिव। तीसरे केटेगरी की तादात ज्यादा है। उसकी नजर काम पर कम, डीएमएफ पर ज्यादा रहती है। आईएएस बनने के बाद ये जीवन में बड़ा आसामी बनने का लक्ष्य लेकर चले थे, वे सही ट्रेक पर, वंदे भारत एक्सप्रेस की गति से दौड़ रहे हैं। अब चौथा केटेगरी...यह मजबूरी का नाम महात्मा गांधी वाला है। क्योंकि, आईएएस हैं, तो कम-से-कम एक जिला तो उन्हें देना ही पड़ेगा। इनमें वे कलेक्टर भी शामिल हैं, जिन्हें आमतौर पर जाति-वर्ग के तराजू पर तौलकर जिलों में भेजा जाता है...ये कितने दिन जिले में रहेंगे, किसी को नहीं पता।

घटना पुरानी मगर मौजूं

बात 2011 के किसी महीने की होगी। बिलासपुर के जूदेव समर्थक युवा नेता का थाने में पुलिस वालों से विवाद हो गया था। उस समय एक तेज-तर्रार आईपीएस बिलासपुर के कप्तान थे। वे घटना से बहुत नाराज हुए...उन्होंने युवा नेता के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दिया। बीजेपी के दिग्गत नेता दिलीप सिंह जूदेव को जब यह पता चला तो दिल्ली से बिलासपुर पहुंच गए। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने सिस्टम के खिलाफ फायर खोल दिया। बोले...बिलासपुर में प्रशासनिक आतंकवाद चल रहा है। जूदेव के पास उस समय कोई पद बड़ा नहीं था। सिर्फ सांसद थे। मगर सियासी कद बड़ा था। उनके प्रशासनिक आतंकवाद के शाब्दिक प्रहार से रमन सरकार हिल गई थी। जूदेव की नाराजगी दूर करने उच्च स्तर पर मंत्रणा हुई। उस समय के क्षेत्रीय संगठन मंत्री सौदान सिंह से विमर्श किया गया। फिर सरकार ने सिंगल आर्डर निकाल पुलिस कप्तान को बदल दिया था।

कैडर पर कैंची

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद यह पहली दफा हुआ कि इस बार स्टेट को एक भी आईपीएस नहीं मिला, आईएएस में भी कटौती हो गई है। इस साल सिर्फ दो ही मिलने वाले हैं। जबकि, 2003 के बाद से आईएएस, आईपीएस की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी। जाहिर है, 2002 तक इक्का-दुक्का अफसर मिलते थे, मगर उसके बाद हर बैच में पांच-छह होते ही थे। मगर बताते हैं, अब छत्तीसगढ़ का कोटा फुल हो गया है। यही हाल बाकी राज्यों का भी है। तभी आईएएस की वैकेंसी अब 250 से कम होकर 200 पर आ गई है। आईपीएस में नक्सल स्टेट होने का फायदा मिला। मगर अब नक्सलिज्म भी समाप्त हो गया है। इसलिए, रिक्वायरमेंट का ये आधार पर भी अब खतम हो गया। कुल मिलाकर भारत सरकार आईएएस, आईपीएस की संख्या पर अब लगाम लगाना चाह रहा है।

हफ्ते का कोट

"गुण और गुनाह दोनों की कीमत होती है, अंतर सिर्फ इतना...गुण की कीमत मिलती है और गुनाह की कीमत चुकानी पड़ती है" और "हैसियत आसमान जैसी होनी चाहिए, क्योंकि जमीन कितनी भी महंगी क्यों न हो, लोग उसे खरीद ही लेते हैं।"

अंत में दो सवाल आपसे?

  • 1. इन चर्चाओं में कितनी सच्चाई है...बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव मंत्री और उनकी जगह तोखन साहू प्रदेश अध्यक्ष बनेंगे?
  • 2. बस्तर आईजी बनने के लिए आईपीएस अफसरों की उत्सुकता क्यों बढ़ गई है?

शनिवार, 30 मई 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: छत्तीसगढ़ में रिसोर्ट माफिया



तरकश, 31 मई 2026

संजय के. दीक्षित

छत्तीसगढ़ में रिसोर्ट माफिया

20 मई को राजनांदगांव के डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन ने मनगटा जंगल सफारी के पास 150 एकड़ में बन रहे निर्माणाधीन रिसोर्टों को बुलडोजर चलाकर तोड़ दिया। मगर, इससे भी बड़ा न्यूज ये है कि इस कार्रवाई से भूमाफियाओं, अफसरों और नेताओं का ऐसा नेक्सस उजागर हुआ, जो लंबे समय से रिसोर्टों में अपनी काली कमाई को निवेश कर रहा था। आपको ये जानकार हैरानी होगी कि राजनांदगांव देश का शायद पहला जिला होगा, जहां एक किमी के सराउंडिंग 190 रिसोर्ट हैं और सभी चालू हालत में। इसके अलावा 130 निर्माणाधीन। अधिकांश रिसोटर््स बेजा कब्जा, या फिर रेरा के नियमों को ताक पर रख बना डाले। सफेदपोशों ने वहां ऐसा फुलप्रूफ सिस्टम बना लिया था कि कोई छोटा मुलाजिम उधर देख नहीं सकता था, और बड़ों को मुंहमांगी कीमत मिल जाती थी या फिर जंगल में मंगल मनाने का मौका। उपर से एक रिसोर्ट भी टिका दिया जाता था। टिकाने का मतलब ये कि रिसोर्ट माफिया पहुंच जाते थे...साहेब, आप एक रिसोर्ट ले लीजिए, आपको सस्ते में मिल जाएगा, आप इंवेस्ट कर दो, बाकी रिसोर्ट हम चला लेंगे, आपको किराया मिलता रहेगा और मूल संपत्ति भी बनी रहेगी। तभी 20 मई को जब जिला प्रशासन का डंडा चला तो छत्तीसगढ़ ही नहीं, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र तक हिल गया। जाहिर है, ये दोनों राजनांदगांव से लगे पड़ोसी राज्य हैं। छत्तीसगढ़ के ब्यूरोक्रेट्स, नेताओं और भूमाफियाओं के साथ एमपी और महाराष्ट्र के भी कई अफसरों और नेताओं के वहां रिसोर्ट हैं। सभी जगहों से फोन घनघनाने लगे। सबको एक ही डर सता रहा था, मेरा वाला तो बच जाएगा न। जिला प्रशासन के अफसरों पर कम प्रेशर नहीं आया। बड़े स्तर पर, बड़ी मात्रा में खुशामद करने के प्रयास हुए। मगर सब धान बाइस पसेरी नहीं होते। कलेक्टर जीतेन्द्र यादव झुके नहीं। 

ऐय्याशी का अड्डा

आपके मन में सहसा यह प्रश्न उठेगा कि राजनांदगांव जिले में ऐसा क्या है कि एक जगह पर सैकड़ों रिसोर्ट बन गए। तो पहले उस जगह की थोड़ी ज्योग्राफी बता देते हैं। राजनांदगांव जिला मुख्यालय से सिर्फ 19 किमी दूरी पर मनगटा जंगल सफारी है। और उसी के पास ये रिसोर्ट बने हैं। मनगटा सफारी आम लोगों में बहुत प्रचलित नहीं है। इसलिए आम आदमी कम ही जाता है। इसलिए, रायपुर से लेकर भिलाई, दुर्ग, राजनांदगांव और एमपी, महाराष्ट्रा के सफेदपोशों, अफसरों और नेताओं के लिए मौज-मस्ती और ऐय्याशी का सुरक्षित केंद्र बन गया है। रायपुर तक के अफसर वीकेंड में मनगटा पहुंच जाते हैं। कई जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बारे में ये भी पता चला है कि घर में बोलकर जाते हैं, वे मीटिंग में दिल्ली जा रहे मगर उनकी गाड़ी घूम जाती है...मनगटा के रिसोर्ट की ओर। बड़े लोगों के संरक्षण का ही नतीजा है कि भिलाई-दुर्ग और रायपुर के भूमाफियाओं ने मनगटा के 54 एकड़ सरकारी जमीन पर भी रिसोर्ट का निर्माण प्रारंभ कर दिया था। वो गनीमत रहा कि जिला प्रशासन की नजर में आ गया। और ढांचा धराशायी हो गया।

दामाद बाबू कामयाब

94 बैच के आईएफएस अरुण पाण्डेय हेड ऑफ फॉरेस्ट बनने में कामयाब हो गए। सरकार ने उन्हें दो सीनियर अफसरों को सुपरसीड कर वन बल प्रमुख बनाया है। जाहिर है, कौशलेंद्र कुमार और अनिल साहू उनसे वरिष्ठ थे। अलबत्ता, इस मुकाम तक पहुंचने में अरुण पाण्डेय की राह आसान नहीं रही। उनके विरोधियों ने चुटिया बांध ली थी। सरकार को गलत सूचना देकर 7 मई को हॉफ की डीपीसी रुकवा दी गई कि ओपी यादव का नाम शामिल नहीं किया गया है। जबकि, ओपी लेवल 15 में हैं, लिहाजा वे एलिजिलबल नहीं थे। मगर सरगुजा वाले पाण्डेयजी कमजोर थोड़े ही हैं। लंबे समय तक जशपुर के डीएफओ रहे हैं। सरकार ने भी बड़ा मैसेज देने के लिए श्रीनिवास राव के रिटायर होने के चार दिन पहले नए हेड ऑफ फॉरेस्ट का आदेश निकाल दिया। छत्तीसगढ़ के इतिहास में सीएस, डीजीपी और हॉफ का आदेश इतना जल्दी नहीं निकला। आमतौर पर एक दिन पहले या रिटायरमेंट के दिन ही आर्डर होते थे। मगर इस बार का मामला जुदा रहा। बहरहाल, अरुण 13 महीने याने जून 2027 तक इस पद पर रहेंगे। बता दें, उनके ससुर वासुदेव दुबे छत्तीसगढ़ में आईपीएस अधिकारी रहे। लंबे समय तक वे डीजी जेल रहे मगर डीजी पुलिस नहीं बन पाए। रमन सिंह सरकार की पहली पारी में उन्हें सुपरसीड कर ओपी राठौर और विश्वरंजन को डीजीपी बनाया गया था। चलिए, ससुर न सही...दामाद बाबू स्टेट के टॉप थ्री पोस्ट में पहुंच गए हैं।

हॉफ के पावर

अबकी पहला दफा हुआ कि हेड ऑफ फॉरेस्ट की नियुक्ति को लेकर मीडिया में खूब खबरें चली। कुछ चली, कुछ चलवाई गई। इस पोस्ट की टीआरपी बढ़ी तो उसके बारे में जानना भी चाहिए। स्टेट में 225000 के सुपरस्केल वाले गिने-चुने पद होते हैं। चीफ सिकरेट्री, एसीएस, डीजीपी और हेड ऑफ फॉरेस्ट याने हॉफ। इनमें सीएस और डीजीपी का जलवा जरूर रहता है। मगर फायनेंसियल पावर में हॉफ का कोई मुकाबला नहीं। फॉरेस्ट एक्ट में सारा बजट वन मुख्यालय को ट्रांसफर हो जाता है। लगभग 23-24 हजार करोड़ के वन विभाग के बजट के कुबेर होते हैं हॉफ। हालांकि, वन मंत्री अगर तेज हैं तो फिर हॉफ का प्रभाव थोड़ा प्रभावित होता है। फिर भी हेड ऑफ फॉरेस्ट का वन विभाग में रुतबा रहता है। किस डिवीजन और सर्किल को कितना बजट मिलना है, ये हॉफ तय करते हैं। ट्रांसफर, पोस्टिंग में भी हॉफ की राय अहमियत रखती है...इसमें वे कम-से-कम 20 फीसदी अपनी चला ही लेते हैं।

आईपीएस पत्नी के सितारे

नवनियुक्त हेड ऑफ फॉरेस्ट अरुण पाण्डेय अगले साल जून में रिटायर हो जाएंगे। इसके बाद इस पद के लिए सबसे मजबूत दावेदार कोई है तो वो हैं संजीता गुप्ता। संजीता 95 बैच की आईएफएस अधिकारी हैं। उन्हें इसलिए वन बल प्रमुख बनना तय माना जा रहा, क्योंकि, तब कोई कंपीटिटर नहीं रहेगा। संजीता का कार्यकाल भी काफी लंबा होगा। 2031 में उनका रिटायरमेंट है। याने लगभग चार साल। संजीता सीनियर आईपीएस हिमांशु गुप्ता की पत्नी हैं। यूपीएससी द्वारा डीजीपी के लिए बनाए गए पेनल में अरुणदेव गौतम के साथ हिमांशु गुप्ता का भी नाम था। मगर ग्रह-नक्षत्र ने उनका साथ नहीं दिया। सरकार ने काफी आगे-पीछे होने के बाद अरुणदेव गौतम के नाम पर मुहर लगा दी। बहरहाल, हिमांशु गुप्ता की पत्नी संजीता के साथ ऐसा नहीं होगा। निश्चित तौर पर छत्तीसगढ़ की वे पहली हेड ऑफ फॉरेस्ट बनेंगी। दरअसल, इस महीने श्रीनिवास राव और तपेश झा और जुलाई में अनिल साहू और प्रेम कुमार के रिटायर होने के बाद पूरा मैदान खाली हो जाएगा। ओपी यादव अगले साल फरवरी में, उसके बाद अमरनाथ भी रिटायर हो जाएंगे। जिस तरह आईएएस में प्रमुख सचिव लेवल पर बड़ा वैक्यूम है, उसी तरह आईएफएस में पीसीसीएफ स्तर पर कई साल तक यही स्थिति रहनी है।

ब्यूरोक्रेसी का दिमाग

उपर में पे-स्केल लेवल 17 का जिक्र हुआ तो फिर ब्यूरोक्रेसी के ब्रेन की चर्चा लाजिमी है। दरअसल, स्टेट में शीर्ष स्केल के पद तीन ही होते थे। मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और हेड ऑफ फॉरेस्ट। तब 80 हजार के स्केल होते थे। मगर दिल्ली में बैठी ब्यूरोक्रेसी ने चकरी चला दी। आईएएस में प्रमुख सचिव के बाद एसीएस प्रमोट होते ही लेवल 17 का वेतनमान फिक्स कर दिया। याने चीफ सिकरेट्री के समकक्ष एडिशनल चीफ सिकरेट्री का वेतन। मगर पुलिस और वन विभाग में डंडी मार दी। पुलिस में एडीजी से डीजीपी एक ग्रेड उपर होते हैं तो वन विभाग में पीसीसीएफ और हेड ऑफ फॉरेस्ट में भी इसी तरह का अंतर। अर्थात पुलिस और वन महकमे में लेवल 17 के एक-एक पद होते हैं लेकिन ब्यूरोक्रेसी में सीएस के साथ सभी एसीएस भी।

पूर्व CS और हमारी चूक

पिछले तरकश स्तंभ में, क्योंकि वे आईएएस थे...एक आयटम था। उसमें पूर्व आईएएस राधाकृष्णन द्वारा माध्यमिक शिक्षा मंडल के चेयरमैन रहते बोर्ड के एकाउंट से साढ़े आठ करोड़ रुपए अपने प्रायवेट खाते में ट्रांसफर करा लेने का जिक्र किया गया था। खबर में यह भी लिखा था कि आईएएस द्वारा डाका डालने के बाद भी पूर्व मुख्य सचिव पी. जॉय उम्मेन, सुनिल कुमार, विवेक ढांड, अजय सिंह, आरपी मंडल और अमिताभ जैन ने आईएएस के खिलाफ कार्रवाई कर रिकवरी निकालने की बजाए आंख मूंद लिया था। इस खबर के पब्लिश होने के बाद पूर्व मुख्य सचिव सुनिल कुमार ने स्तंभकार को व्हाट्सएप मैसेज भेज बताया कि वे फरवरी 2014 में रिटायर हो गए थे। उसके बाद भी राधाकृष्णन माध्यमिक शिक्षा मंडल मे ंचेयरमैन कंटिन्यू कर रहे थे। फिर उस गड़बड़ी के लिए पी. जॉय उम्मेन और सुनिल कुमार दोषी कैसे हुए। वाकई, स्तंभकार से डेट का फैक्ट चेक करने में चूक हुई, इसके लिए खेद है...और, वर्तमान मुख्य सचिव विकास शील से संज्ञान लेने की अपेक्षा भी। विकासशील दिल्ली द्वारा भेजे फर्स्ट सीएस हैं। पिछले स्तंभ में लिखा गया था कि अगर कोई कर्मचारी इस तरह का कृत्य किया होता तो जेल तो जाता ही, रिकवरी भी निकाला जाता। मगर वे आईएएस थे, इसलिए सिस्टम मौन हो गया।

मजबूरी या सम्मान!

इस महीने राज्य सरकार ने 42 आईएएस अधिकारियों को ट्रांसफर किया, उनमें रायपुर संभाग के कमिश्नर महादेव कांवड़े का तबादला लोगों को काफी चौंकाया। वो इसलिए कि कावड़े का इसी महीने रिटायरमेंट है। और उसके 24 दिन पहले उन्हें हटाकर रजिस्ट्रार सहकारिता बना दिया गया। इसके पीछे की वजह यह है कि अगर कावड़े के रिटायरमेंट के लिए 31 मई तक वेट करते तो पूरा ट्रांसफर महीना भर के लिए लटक जाता। वो इसलिए कि, कावड़े की जगह श्याम धावड़े को कमिश्नर बनाना था। और धावड़े के ग्रामोद्योग में किसी और को बिठाना था। हालांकि, पहले योजना यह थी कि कावड़े को महीने भर के लिए बिना विभाग के सचिव बनाकर मंत्रालय में पोस्ट किया जाए। मगर विचार निकलकर आया, रिटायरमेंट से चंद दिनों पहले ऐसा करने से कावड़े अपमानित महसूस करते। लिहाजा, सीआर प्रसन्ना से रजिस्ट्रार सहकारिता का पद महादेव कांवड़े को दिया गया। चूकि 30 और 31 मई को छुट्टी है। इसलिए, कांवड़े 29 मई को रिटायर हो गए। इसके बाद सरकार रजिस्ट्रार की कुर्सी किसी और आईएएस को सौंपेगी। क्योंकि, रजिस्ट्रार कैडर पोस्ट है, इसे खाली नहीं रखा जा सकता। बता दें, महादेव कांवड़े सभी सरकारों में चलने वाले गिने-चुने अफसरों में शामिल थे।

संदेह के घेरे में आईपीएस

इंदौर हनीट्रेप कांड में छत्तीसगढ़ के एक डीआईजी की संलिप्तता की खबर घूम रही है। इस घटना के बाद कई पुलिस उपमहानिरीक्षकों के घरों में कलह शुरू हो गई है। पत्नियां बात-बात पर ताने दे रही। दरअसल, जब तक नाम सामने नहीं आएगा, तब तक सभी डीआईजी लोगों के घरों में यही हालात रहने वाला है। हालांकि, शक के घेरे में आईजी भी हो सकते हैं। क्योंकि, घटना कुछ साल पहले की है, इसलिए हो सकता है हनी ट्रेप के खिलाड़ी प्रमोट होकर आईजी बन गए हों। याने हो कुछ भी सकता है। मगर कब तक? जब तक एमपी पुलिस नाम जाहिर नहीं करती।

हफ्ते का कोट

'जीवन में कुछ बनना है, तो विनम्र रहना सीखें, क्योंकि एक छोटे से बीज को भी जमीन में दबना पड़ता है पेड़ बनने के लिए' और 'जीवन में परवरिश तथा संस्कार भी बहुत मायने रखते हैं, सिर्फ पढ़-लिखकर कोई इंसान नहीं बनता।'

अंत में दो सवाल आपसे?

1. सरकारी अस्पतालों में दवाइयों का संकट होने के बाद भी सीजीएमएससी दवाओं का टेंडर फायनल क्यों नहीं कर पा रहा?

2. क्या ये सही है कि कई मंत्रियों के अनुभवहीन, कमजोर धनलोलुप होने से करप्शन का लेवल बढ़ गया है?