शनिवार, 15 जनवरी 2022

रंगदारी टैक्स?

 जय के. दीक्षित

तरकश, 16 जनवरी

ऐसा बिहार, यूपी में सुनने को मिलता था...मगर अब इस तरह की चीजें अब इधर भी दिखने लगी हैं। पता चला है, सूबे के एक मंत्रीजी ने बायोडीजल वाली गाड़ियों से रंगदारी टैक्स वसूलने महाराष्ट्र के सरदह पर लठैत तैनात कर दिए हैं। बताते हैं, एक व्यापारी से मंत्रीजी का पैच हुआ....व्यापारी ने मंत्रीजी को सुझाया कि बाहर से आने वाले बायोडीजल के टैंकरों को रोक दिया जाए तो इस धंधे में पूरा वर्चस्व हमलोगों का हो जाएगा। मंत्रीजी को बात जंच गई। बॉर्डर पर अब छत्तीसगढ़ आने वाली बायोडीजल गाड़ियों को रोक कर उन्हें इस कदर धमकाया जा रहा कि दोबारा फिर वे छत्तीसगढ़ न आने पाएं। तीन दिन पहले की बात है....कांडला से आने वाले दो दर्जन से अधिक टैंकरों को तीन दिन बॉर्डर पर खड़ा कर दिया गया। लठैतों के चलते कोई ट्रांसपोर्ट्स अब छत्तीसगढ़ का बायोडीजल बुक नहीं कर रहा। यही नहीं, मंत्री के लठैतों ने छत्तीसगढ़ होकर बंगाल जाने वाली बायोडीजल गाड़ियों से 10 रुपए प्रति लीटर के हिसाब से वसूली षुरू कर दी है। मंत्री और व्यापारी के खेल में जाहिर है, नाम छत्तीसगढ़ का खराब हो रहा।     

जेब में मंत्री

आदिवासी समुदाय के लिए ये एक विडंबना होगी कि उनके वोटों से जीतकर जो नेता मंत्री-मिनिस्टर बनते हैं, रायपुर आते ही कुछ खास तरह के ठेकेदारों और सप्लायारों के इशारों पर कत्थक करने लगते हैं। रामविचार नेताम थोड़ा ज्यादा ही तेज-तर्रार थे...एक एसडीएम को थप्पड़ तक जड़ दिया। बाकी की कमोवेश एक सरीखा स्थिति रही है। मंत्री पद की शपथ लेते ही या तो कोई गोयल, अग्रवाल या फिर अ-सरदार उन्हें लपक लेता है। उसके बाद वे जैसा चलाते हैं, मंत्री लोग वैसा ही चलते हैं। आपने देखा ही होगा...आदिवासी मंत्रियों की राजधानी में बड़े-बड़े होर्डिग्स लगते हैं, उसमें किन लोगों की फोटुएं रहती हैं। ये लोग हर फन में माहिर होते हैं। रमन सरकार के एक आदिवासी मंत्री को एक सप्लायर ने हैदराबाद और मुंबई का ऐसा चस्का लगवा दिया कि अभी भी उधरे ज्यादा पाए जाते हैं। इन सरल-सहज मंत्रियों को व्यापारियों के चंगुल से आजाद कराने सरकार को कुछ करना चाहिए।   

जब सीएम हुए भावुक

भिलाई में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के घर के पास में ही चरौंदा नगर निगम का दफ्तर है। भूपेश जब राजस्व मंत्री थे, तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से आग्रह करके उन्होंने सन् 2000 में चरौंदा को नगरपालिक बनवाया था। लेकिन, हुआ कुछ ऐसा कि कांग्रेस एक बार भी वहां जीत नहीं पाई। नपा का पहला चुनाव परिवार से बगावत कर विजय बघेल निर्दलीय जीत गए। इससे भूपेश इतने आहत हुए कि 21 साल तक ननि दफ्तर में कदम नहीं रखा। समय के साथ 2015 में चरौंदा पालिका से निगम बन गया। 22 वे साल में पहली बार अबकी कांग्रेस का मेयर बना तो पदभार ग्रहण में मुख्यमंत्री भी पहुंचे। इस मौके पर वे भावुक हो गए। बोले...मेरा सपना था कि चरौंदा में कांग्रेस पार्टी का मेयर बने...ये एक संयोग है कि 22 बरस बाद पार्टी का महापौर बना और मैं मुख्यमंत्री के रूप में यहां मौजूद हूं। 

चार सिकरेट्री

एस भारतीदासन के सचिव प्रमोट होने के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सचिवालय में अब चार सिकरेट्री हो गए हैं। वहां पहले से एसीएस सुब्रत साहू, सिद्धार्थ कोमल परदेशी और डीडी सिंह सिकरेट्री थे। अब भारतीदासन। पिछली सरकार में भी लगभग यही स्थिति रही। एन बैजेंद्र कुमार एसीएस रहे। उनके बाद अमन सिंह, सुबोध सिंह और एमके त्यागी। हालांकि, विधानसभा चुनाव से साल भर पहले बैजेंद्र डेपुटेशन पर एनएमडीसी चले गए। उसके बाद तीन ही सिकरेट्री रहे। अमन, सुबोध और त्यागी। हालांकि, तब संविदा में दो सिकरेट्री थे। अमन और त्यागी। इस समय संविदा वाले सिर्फ डीडी सिंह हैं।   

सूरज उगेगा 

पिछले तरकश में एक सवाल था, सत्ताधारी पार्टी के एक सीनियर नेता का नाम बताइये, जो अपने बेटे को अगले विधानसभा चुनाव में लांच करने के लिए चुनावी राजनीति से अलग होने वाले हैं। इसके जवाब में कई लोगों के फोन आए, मैसेज भी। लोगों का उत्तर था...चरणदास महंत, सत्यनारायण शर्मा, ताम्रध्वज साहू और रविंद्र चौबे। इनमें से तीन के बारे में अभी कुछ पुख्ता नहीं है। विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत ने अवश्य राज्यसभा में जाने की इच्छा जताई है। खबर है, अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो महंत का सूरज सक्ती में उगेगा। पिछले चुनाव में महंतजी ने लोगों को भरोसा दिया था कि वे सक्ती को जिला बनवाएंगे। चूकि सक्ती जिला बन गया है, सो अपने इकलौते बेटे सूरज की लांचिंग का इससे बढ़ियां कोई मौका नहीं हो सकता।

डबल कमिश्नर

ठीक ही कहा जाता है, वक्त बलवान होता है। अब आप देखिए, कभी मुकेश गुप्ता के बाद दूसरे नम्बर के पावरफुल आईपीएस माने जाने वाले जीपी सिंह सलाखों के पीछे हैं। और नई सरकार में पीएचक्यू में एक साल तक बिना विभाग के कठिन दौर देखने वाले दिपांशु काबरा आज दो-दो अहम विभागों के कमिश्नर। दोनों आईएएस वाले पदों पर। कमिश्नर पीआर और कमिष्नर ट्रांसपोर्ट। इन पदों पर पहले कभी कोई आईपीएस नहीं रहा। जाहिर है, जनसंपर्क आयुक्त बनने के बाद बेहतर पारफारमेंस से दिपांशु ने सरकार का विश्वास और गहरा किया है। 

राडार पर आईएएस

आय से अधिक संपत्ति के मामले में एसीबी ने सीनियर आईपीएस जीपी सिंह को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है। ऐसे में अब एसीबी पर आईएएस के खिलाफ भी कार्रवाई कर बैलेंस करने का प्रेशर बढ़ रहा है। इससे पहले मुकेश गुप्ता ने जब आईएएस को ट्रेप किया था तब ब्यूरोक्रेसी से आईपीएस को लेकर उंगलिया उठ रही थी। लेकिन, एसीबी चीफ आरिफ शेख ने हौसला दिखाते हुए एडीजी जैसे सीनियर अफसर को गिरफ्तार कर लिया। जीपी के खिलाफ मीडिया में संपत्तियों का ब्यौरा आ रहा है, वो काफी हो सकता है। मगर सवाल ये भी तो है कि क्या किसी आईएएस के यहां रेड पड़ेगा तो क्या इससे कम निकलेगा? 

ब्यूरोक्रेसी में खौफ

आय से अधिक संपत्ति के मामले में आईपीएस जीपी सिंह की गिरफ्तारी पर लोगों के अनेक मत हो सकते हैं। मगर नौकरशाही में माना जा रहा है कि सरकार ने कौवा मारकर टांग दिया है। खासकर दाएं-बाएं होने वाले अफसरों के लिए। सरकार गलती पाए जाने पर जब एडीजी रैंक के आईपीएस को सलाखों के पीछे भेज सकती है तो फिर किसी को भी लटका सकती है। इस सरकार के साथ अलग बात यह है कि अपना-पराया कुछ नहीं। कोई भी कितने भी बड़े पद पर क्यों नहीं बैठा हो, ये दावा नहीं कर सकता कि मैं फलां हूं....मैं ढिमका हूं। परिवहन विभाग में हल्का सा बर्तन बजने की आवाज आई, सरकार ने एक झटके में व्यवस्था बदल दी। सूबे के एक युवा विधायक की भी अब हैसियत कम करने की खबरें आ रही हैं।

छोटा जिला, बड़े अफसर

गरियाबंद इलाके में नक्सली मूवमेंट जब तेज होने लगा था तो पिछली सरकार ने 2012 में गरियाबंद को नया जिला बनाया था। मगर इस सरकार ने अफसरों की पोस्टिंग के मामले में जिले की रेटिंग बढ़ा दी है। गरियाबंद पहले आईएएस, आईपीएस का पहला जिला होता था। मगर अब ऐसा नहीं रहा। नीलेश क्षीरसागर को जशपुर के बाद गरियाबंद का कलेक्टर बनाया गया। तो नम्रता गांधी का भी ये दूसरा जिला है। इसी तरह 2008 बैच की पारुल माथुर को कप्तान। उनसे पहिले भोजराम पटेल भी कांकेर के बाद गरियाबंद के एसपी बने थे। यही नहीं, डीएफओ भी पहले प्रमोटी होते थे मगर अब डायरेक्ट आईएफ


एस को पोस्ट किया जा रहा।             

अंत में दो सवाल आपसे

1. रायपुर पुलिस ने कालीचरण को फिल्मी अंदाज में पकड़ा तो एसीबी ने जीपी सिंह को, इनमें किसकी कामयाबी सबसे अहम है?

2. एसीबी के राडार पर कौन से तीन आईएएस अधिकारी हैं?

शनिवार, 8 जनवरी 2022

कलेक्टरों को नोटिस

संजय के. दीक्षित

तरकश, 9 जनवरी



धान खरीदी के लिए बनी मंत्रिमंडलीय उप समिति ने बारिश में धान भीगने पर सूबे के छह कलेक्टरों को नोटिस देने का फैसला किया। बैठक के बाद फूड मिनिस्टर अमरजीत भगत ने मीडिया को बाइट भी दे डाली। जाहिर तौर पर यह पहली बार हुआ कि मंत्रिमंडलीय उप समिति ने कलेक्टरों को नोटिस दी हो। यकीनन, कैबिनेट और मंत्रिमंडलीय उपसमिति अधिकारसंपन्न होती हैं। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि वे मुख्यमंत्री के अधिकार क्षेत्र में दखलंदाजी करने लगे। आमतौर पर होता ये है कि मंत्रिमंडलीय उप समितियों को किसी कलेक्टर के खिलाफ कोई प्वाइंट मिला भी तो उसे मुख्यमंत्री की नोटिस में दे देती है। बहरहाल, कलेक्टरों को नोटिस मामले की प्रतिक्रिया तो होनी ही थी। देर रात प्रचार मशीनरी हरकत में आई। अब सुना है कि कलेक्टरों को नोटिस तामील नहीं की जाएगी। 

जोगी ने जब हड़काया 

2001 में भाजपा ने अजीत जोगी सरकार के खिलाफ राजधानी रायपुर में तगड़ा प्रर्दशन किया था। शास्त्री चौक पर प्रदर्शनकारियों को रोकने पुलिस ने लाठी चार्ज किया। इसमें नेता प्रतिपक्ष नंदकुमार साय का पैर टूट गया। लाठीचार्ज के खिलाफ विधानसभा में काफी हंगामा हुआ। घटना की जांच के लिए विधानसभा की जांच कमेटी बनी। विधानसभा की कमेटी ने जांच के बाद रायपुर के तत्कालीन कलेक्टर अमिताभ जैन और एसएसपी मुकेश गुप्ता को कसूरवार बताते हुए उन्हें सदन में तलब करने की सिफारिश की। सिफारिश पर अमल करते हुए विधानसभा ने दोनों को बुलाने की तारीख भी मुकर्रर कर दी। देर रात मरवाही के दौरे से लौटने पर मुख्यमंत्री अजीत जोगी को ये बात पता चली। उन्होंने विधानसभा वालों को जमकर हड़़काया और कलेक्टर, एसएसपी को सदन में बुलाने का फैसला टांय-टांय फुस्स हो गया। कहने का आशय यह है कि कलेक्टर, एसपी सिर्फ अफसर नहीं, जिले में वे मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि होते हैं। ऐसे में, विधानसभा की समिति हो या फिर मंत्रिमंडलीय उप समिति...उसे अधिकार तो है लेकिन, इसका ये मतलब नहीं कि मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि को ही लगे नोटिस देने, प्रताड़ित करने। कलेक्टर्स, एसपी सीधे-सीधे मुख्यमंत्री से नियंत्रित होते हैं और उन्हें नोटिस या सजा देने का अधिकार सिर्फ मुख्यमंत्री को है। मंत्री या मंत्रिमंडलीय उप समिति को नहीं।

एक थे उदय वर्मा

बात काफी पुरानी है। मध्यप्रदेश के समय 86, 87 के आसपास उदय वर्मा बिलासपुर के कलेक्टर थे। मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह का बिलासपुर दौरा था। चकरभाटा हवाई पट्टी पर उदय वर्मा भी थे। गांधीवादी नेता और हायर एजुकेशन मिनिस्टर चित्रकांत जायसवाल ने किसी बात पर उन्हें झिड़क दिया। उदय वर्मा सीएम को रिसीव किए बिना गाड़ी में बैठ लौट गए। अर्जुन सिंह जैसे मुख्यमंत्री कलेक्टर के हवाई पट्टी पर न होने के वाकये को इसलिए नजरअंदाज कर दिए कि उनके कलेक्टर के साथ जो हुआ, वो ठीक नहीं हुआ। उदय वर्मा सफलतम नौकरशाहों में रहे हैं। वे भारत सरकार में कई अच्छे विभागों के सिकरेट्री रहे। बहरहाल, अबके कलेक्टरों में न तो वो ठसन दिखता है, न स्वाभिमान और न काम। कलेक्टरों का एक सुत्रीय एजेंडा है...कुर्सी किसी तरह सुरक्षित रहे। यही वजह है कि उन्हें छूटभैया नेता चमका दे रहे। एक विधायक को हाल ही में कैमरे पर यह कहते सुना गया, कहां है कलेक्टर...। हाल में मुख्यमंत्री के दौरे में एक कांग्रेस नेता को सर्किट हाउस में इंट्री नहीं मिली। उसने कलेक्टर को व्हाट्सपएप ठोक दिया, ठीक है...हमारी सरकार बनने दो, फिर मैं बताता हूं। ऐसे में, अगर रजत कुमार या पी. दयानंद टाईप कलेक्टर होते तो वाकई बवाल हो जाता। 

कमांडेंट क्यों?

2008 बैच के आईपीएस डी. श्रवण को सरकार ने राजनांदगांव एसपी से हटाकर बटालियन का कमांडेंट बनाकर रायगढ़ भेज दिया। श्रवण कुछ दिन पहले ही सलेक्शन ग्रेड प्रमोशन पाकर एसएसपी हुए थे। उन्हें कमांडेंट बनाने की खबर से लोगों का चौंकना इसलिए स्वाभाविक था कि सलेक्शन ग्रेड याने अगले साल जनवरी में डीआईजी बनने वाले आईपीएस कमांडेंट बन जाए...। जबकि, पहले एडिशनल एसपी या फिर नए आईपीएस कमांडेंट बनते थे। मध्यप्रदेश के समय एसपी बनने से पहले आमतौर पर आईपीएस को कमांडेंट बनाया जाता था। ताकि फोर्स को टेकल करने का गुर अफसर सीख जाए। ऐसे में, सवाल उठते हैं कि श्रवण के साथ ऐसा क्यों हुआ? इस बारे में ये जरूर पता चला है कि किसी मामले में खुफिया अधिकारी राजनांदगांव एसपी से जरूर खफा चल रहे थे। 

मिठाई वाले सिकरेट्री

छत्तीसगढ़ में एक माल-मसाले वाले विभाग के सिकरेट्री हैं। उनके पास दो-तीन विभागाध्यक्षों का जिम्मा भी है। सिकरेट्री साब से जो भी मिलने जाता है, उसे कुछ बोलने से पहिले वे मिठाई का डिब्बा बढ़ा देते हैं। बताते हैं, सिकरेट्री को किसी तांत्रिक ने ग्रह-नक्षत्रों का कैलकुलेशन कर सलाह दी कि लोगों को अधिक-से-अधिक मिठाई खिलाना उनके लिए काफी चमत्कारिक होगा। सिकरेट्री साब उसका अक्षरशः पालन कर रहे हैं। घर हो या आफिस...बड़े लेवल का आदमी हो या छोटा मुलाजिम...सबसे पहले मिठाई का डिब्बा। आईएएस के विभाग के लोग बताते हैं, तांत्रिक का नुख्सा साब को सूट किया है...बीजेपी सरकार में भी साब ठीक-ठाक पोस्टिंग पाते रहे और इस सरकार में तो गजब...।

चुनावी ड्यूटी

यूपी समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का ऐलान हो गया है। चुनाव कराने डेढ़ दर्जन से अधिक आईएएस पांचों राज्यों में जाएंगे। अभी तक सामान्य प्रशासन विभाग इलेक्शन के लिए सिकरेट्री लेवल तक के अधिकारियों का नाम भेजता था। चूकि, इस बार चुनाव आयोग ने ज्यादा अधिकारियों के नाम मंगाए थे। लिहाजा, पहली बार प्रिंसिपल सिकरेट्री के नाम भी निर्वाचन आयोग को भेजे गए हैं। 10 मार्च को पांचों राज्यों का मतगणना है। इसलिए, इसके बाद ही इलेक्शन ड्यूटी वाले अफसर छत्तीसगढ़ लौटेंगे।   

नया जिला

कोरबा से अलग कर कटघोरा को नया जिला बनाने की मांग लंबे अरसे से की जा रही है। हालांकि, इसके पीछे सियासी समीकरण भी है। मगर वाकई अगर कटघोरा नया जिला बन गया तो कोरबा के पास सिर्फ बालको और एनटीपीसी बच जाएगा। याने 70 से 80 फीसदी डीएमएफ कटघोरा में चला जाएगा। पैसा अगर कटघोरा में होगा तो मलाईदार जिला कटघोरा ही होगा न। कटघोरा इलाके के सत्ताधारी पार्टी के नेताओं को 26 जनवरी को मुख्यमंत्री के भाषण से काफी उम्मीदें दिखाई पड़ रही हैं। 

अंत में दो सवाल आपसे

1. चार नए जिलों में ओएसडी अपाइंट होने में देरी क्यों हो रही है?

2. एक बड़े कांग्रेस नेता का नाम बताइये, जो अपने बेटे को अगले विधानसभा चुनाव में लंच करने के लिए खुद चुनावी राजनीति से हट रहे हैं? 

शनिवार, 1 जनवरी 2022

कालीचरण और पुलिस

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 1 जनवरी

रायपुर पुलिस के लिए 2021 बड़ी चुनौतीपूर्ण रही। अजय यादव जैसे ठीक-ठाक कप्तान को असहज स्थिति में हटना पड़ गया। अजय के बाद आए प्रशांत अग्रवाल भी समझ गए होंगे कि रायपुर की पोलिसिंग तलवार की धार पर चलने से कम नहीं है। बहरहाल, साले खतम होते-होते कालीचरण महाराज ने रायपुर पुलिस की साख जरूर ब़ढ़ा दी। मीडिया में जब ये इनपुट्स आई कि कालीचरण को ढूंढने रायपुर पुलिस की टीमें मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र गई हैं तो लगा कि पुलिस खाली लाठी पिट रही है। लेकिन, गुरूवार को सुबह-सुबह खबरें आई कि पेशेेवर अंदाज में पुलिस ने कालीचरण को पकड़ लिया है तो लोग वााकई चौंक पड़े। लोगों ने महाराष्ट्र पुलिस के बारे में ऐसा सुना था या फिर फिल्मो में देखा था। पुलिस मोबाइल लोकेशन के आधार पर खजुराहों से 25 किलोमीटद दूर भक्त बनकर बागेष्वर धाम में उसी जगह पर ठहरी जहां कालीचरण रुके हुए थे। और तड़के गिरफ्तार कर रायपुर के लिए रवाना हो गई। कालीचरण एपीसोड में रायपुर पुलिस का नम्बर निष्चित तौर पर बढ़ा है।     

कप्तान समेत 9 विकेट

2022 में पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी रिटायर होंगे। मगर वे अकेले नहीं जाएंगे, अपने साथ 8 और अफसरों को लेकर बिदा होंगे। जाहिर है, राकेश को मिलाकर वन महकमे में 9 आईएफएस इस साल रिटायर होंगे। इनमें सबसे पहला विकेट युनूस अली का गिरेगा अप्रैल में। अप्रैल में एसएसडी बड़गैया भी रिटायर होंगे। इसके बाद जून में एसएस बजाज, सितंबर में राकेश चतुर्वेदी, अक्टूबर में जय सिंह महस्के और अनुराग श्रीवास्तव, दिसंबर में पीवी नरसिंह राव, पीसी पाण्डेय और श्रीमती बीवी उमादेवी सेवानिवृत्त होंगी। 

अगला पीसीसीएफ?

राकेश चतुर्वेदी के बाद संजय शुक्ला को पीसीसीएफ बनना लगभग तय माना जा रहा है। संजय फिलहाल लघु वनोपज संघ में एमडी हैं। उन्हें रिजल्ट देने वाला अधिकारी माना जाता है। वर्तमान पावर केमेस्ट्री में भी उनकी स्थिति ठीक है। लिहाजा, उनके नाम पर कोई संशय तो नहीं लगता।    

सितंबर में तीन विकेट

प्रशासनिक दृष्टि से 2022 काफी महत्वूपूर्ण रहेगा। ईयर एंड तक किसी सीनियर अफसर के सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने की चर्चा है। इसके अलावा जून में राजस्व बोर्ड के चेयरमैन उमेश अग्रवाल का रिटायरमेंट है। उमेश सिकरेट्री लेवल के आईएएस हैं। अपवाद के तौर पर वे जरूर राजस्व बोर्ड के चेयरमैन का दायित्व संभाल रहे। मगर ये चीफ सिकरेट्री लेवल का कैडर पोस्ट है। बहरहाल, उमेश के बाद सितंबर में तीन आईएस रिटायर होंगे। इनमें बीवीआर सुब्रमणियम भी शामिल हैं। 87 बैच के सुब्रमणियम फिलहाल भारत सरकार में डेपुटेशन पर हैं। सुब्रमणियम के अलावा ए. टोप्पो और इमिल लकड़ा भी इस साल सितंबर में सेवानिवृत्त होंगे। दिलचस्प यह है कि ऐसे मौके कम आते हैं कि पति पहले रिटायर करें और पत्नी बाद में। सूबे की अफसरशाही में जितनी जोड़ियां हैं, सबमें पत्नी पहले, पति बाद में रिटायर हुए और आगे भी होंगे। लेकिन, आईएएस बीवीआर सुब्रमणियम इस साल सितंबर में रिटायर होंगे और उनकी आईएफएस वाइफ उमा देवी दिसंबर में। हालांकि, बीवीआर करिश्माई अफसर हैं...अगर भारत सरकार में एकाध, दो साल का एक्सटेंशन मिल गया तो फिर वो पत्नी के बाद रिटायर होंगे।

थोक में प्रमोशन

वन विभाग में लंबित प्रमोशन को डीपीसी ने क्लियर कर दिया है। फाइल अंतिम हस्ताक्षर के लिए मुख्यमंत्री के पास गई है। इसमें सीसीएफ एसएसडी बड़गैया अब एडिशनल पीसीसीएफ हो जाएंगे। वहीं, सीएफ राजेश चंदेले, मर्सी बेला, अमिताभ बाजपेयी, रामवतार दुबे समेत पांच आईएफएस सीसीएफ बन जाएंगे। वन विभाग में नीचे लेवल पर भी थोक में पदोन्नतियां हुई हैं। 131 डिप्टी रेंजर प्रमोशन पाकर रेंजर बन गए। 22 रेंजर एसडीओ बनें।

अगले साल चुनाव

कैलेंडर में 2021 से 2022 होने का फर्क कितना बडा है कि कल 31 दिसंबर की शाम तक कहा जाता था, छत्तीसगढ़ में 2023 में विधानसभा चुनाव है। और आज....अगले साल चुनाव है। चूकि अगले साल इलेक्शन ईयर है। लिहाजा अब सियासी पार्टियों की हलचल बढ़ेगी। सरकार अपनी रफ्तार और तेज करेगी तो विपक्षी पार्टियां आक्रमक होंगी। कुल मिलाकर  कांग्रेस के भीतर अभी प़क्ष-विपक्ष का रोल अदा किया जा रहा था, अब इसके किरदार बदलेंगे। सोई हुई बीजेपी अब विपक्ष की भूमिका में आ सकती है।    

प्रमोशन और लिस्ट

आईएएस के प्रमोशन लगभग फायनल है। सब कुछ ठीक रहा तो दो-एक दिन में आदेश जारी हो जाएंगे। 97 बैच के तीन आईएएस प्रमुचा सचिव बनेंगे और 2006 बैच के सात आईएएस सिकरेट्री। पता चला है, सिकरेट्री के प्रमोशन के बाद मंत्रालय स्तर पर सचिवों के दायित्वों में फेरबदल किया जाएगा। आधे दर्जन के करीब सिकरेट्री इधर-से-उधर किए जाने की अटकलें हैं। कुछ बोर्ड और निगमों में भी सरकार एचओडी बदलेगी। 

कलेक्टरों की सर्जरी

कलेक्टरों की लिस्ट भी तैयार हो रही है। चर्चाओं के अनुसार सरकार फिलहाल लिस्ट बड़ी नहीं करना चाह रही। संकेत हैं, चेन बहुत बड़ा हुआ तो आधा दर्जन तक। हो सकता है, सरकार मई-जून में बड़ी सर्जरी करें। तब तक जरूरी समझा जाने वाला ही आदेश निकलेगा। जिन जिलों में जनप्रतिनिधियों का विरोध है, उन कलेक्टरों को बदलेगी।       

अंत में दो सवाल आपसे


1. बिलासपुर का अगला कलेक्टर रजत बंसल और संजीव झा में से कोई बनेगा या तीसरे की इंट्री होगी?

2.. भाजपा की राजनीति में क्या उथल-पुथल होने वाली है?

यहां चप्पल, वहां...

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 26 दिसंबर 2021

बिहार विधानसभा में पिछले हफ्ते एक अजीब वाकया हुआ। लेबर मिनिस्टर जीवेश मिश्रा की गाड़ी विधानसभा की पोर्च में खड़ी थी...गाड़ी में मंत्रीजी बैठे थे। मगर पुलिस वालों ने एक न सुनी...उनकी गाड़ी साइड करवा दी कि पटना के कलेक्टर, एसपी साहब की गाड़ी आ रही है। विधानसभा सत्र के दौरान मंत्री, एमएलए साब लोग ज्यादा पावरफुल हो जाते हैं। लेकिन, पटना में अफसरों के लिए मंत्री की गाडी किनार लगवा दी गई। मंत्रीजी ने तुरंत सदन के भीतर जाकर मामला उठाया...बोले...जब एक मंत्री के साथ अधिकारी ऐसा व्यवहार करेंगे तो आम आदमी के साथ क्या होता होगा। स्पीकर ने उन्हें यह बोलकर बिठा दिया कि देखते हैं....। जाहिर है, उसमें कुछ होना नहीं था, इसलिए कुछ नहीं हुआ। पटना के कलेक्टर, एसपी सरकार के बेहद क्लोज हैं, ऐसे में मंत्री लोग समझदार थे....समझ गए। एक घटना छत्तीसगढ़ के मुंगेली में भी हुई है। लेकिन पटना से बिल्कुल उलट। यहां जिला पंचायत के आईएएस सीईओ रोहित व्यास को महिला सदस्य ने चप्पल लेकर मारने दौड़ा दी। वाकई! ये छत्तीसगढ़ में पहली बार हुआ। अफसर इसे अलार्मिंग मानें।

सीनियर जिम्मेदार-1

मुंगेली जिपं सीईओ रोहित व्यास के साथ दुर्व्यवहार की घटना हुई, उसके लिए क्या सीनियर अफसर जिम्मेदार नहीं हैं? रोहित नए आईएएस हैं। मुंगेली कैसा जिला है, निष्चित रूप से वे वाकिफ नहीं होंगे। वो भी महिला सदस्य...लैला नानकू भिखारी जैसी तेज। महिला नेत्री को इससे क्या मतलब कि आप प्रमोटी आईएएस हो या आरआर। आडियो में सुना ही जा रहा...रोहित बोल रहे, एसपी साब से बात करता हूं....महिला नेत्री कह रही...एसपी साहब क्या कर लेंगे, बुला लो। फिर मुंगेली के एसपी भी बहुत बड़े वाले। महिला नेत्री प्रतिनिधिमंडल के साथ जातिगत गाली देने की शिकायत लेकर पहुंचती है....वो भी डायरेक्ट आईएएस के खिलाफ। एसपी बोलते हैं...आप सभी का स्वागत है...जांच के बाद कार्रवाई होगी। बहरहाल, सीनियर अफसर अगर रोहित को मुंगेली की हकीकत बता दिए होते तो यकीनन ब्यूरोक्रेसी को हिलाने वाली ये घटना नहीं होती।

सीनियर जिम्मेदार-2

पहले आईएएस अफसरों में बड़ा मेलजोल रहता था। प्रोबेशनर और जूनियर अफसर कलेक्टर, एसपी के बड़े घनिष्ठ हो जाते थे। कई बार परिवार के सदस्य की तरह। कलेक्टर, एसपी जूनियर अफसरों को डांटते भी थे, सीखाते भी थे और साथ में बिठाकर दो-एक पैग पिला भी देते थे। इससे नए अधिकारियों का स्ट्रेस खतम हो जाता था। मगर 2014-15 के बाद सीनियर-जूनियर अफसरों के बीच ये इंटरेक्शन धीरे-धीे खतम होते गए। आज अगर अमृत टोपनो स्ट्रेस में नौकरी से इस्तीफा देने की बात करते हैं तो कोई ऐसा सीनियर नहीं है, जो दो-चार गाली बके, डांटे और फिर पुचकारकर बता दे कि ये सब जीवन का हिस्सा है।

और ताकतवर

नगरीय निकाय चुनाव के इस तरह के नतीजों का दावा तो कांग्रेस के नेता भी नहीं कर पा रहे थे। सियासी पंडितों का भी तर्क था... भिलाई, चरौंदा और रिसाली में प्रबुद्ध वर्ग के वोटर ज्यादा हैं...शहरी मतदाता सरकार की नीतियों से बहुत खुश नहीं हैं। मगर जब रिजल्ट आया तो इन तीनों में कांग्रेस का परचम फहरा गया। स्थानीय चुनावों में रुलिंग पार्टी जीतती है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। बीजेपी के 15 साल के दौरान बिलासपुर, रायपुर, कोरबा, राजनांदगांव, भिलाई जैसे कई निगमों में कांग्रेस का महापौर रहा। जाहिर है, सियासत के इस सेमिफायनल में मिली जीत से सीएम भूपेश और ताकतवर हुए हैं।

आईपीएस की निगरानी

सर्विस रिव्यू कमेटी की अनुशंसा पर सरकार ने चार आईपीएस अफसरों के नाम भारत सरकार को भेजे हैं। इनमें से तीन को फोर्सली रिटायर और एक को निगरानी। निगरानी का मतलब होता है, संदिग्ध गतिविधियों को वॉच करना। याने पुख्ता सबूत नहीं है, मगर शक है। बीजेपी सरकार में लांग कुमेर को भी निगरानी में डाला गया था। ये अलग बात है कि वे डेपुटेशन पर अपने होम स्टेट नागालैंड जाकर डीजीपी बन गए। बहरहाल, जिन तीन आईपीएस को फोर्सली रिटायर करना है, उसमें से एक के बारे में पिछले तरकश में जिक्र किया गया था। सर्विस रिव्यू कमेटी के चेयरमैन चीफ सिकरेट्री अमिताभ जैन थे। मेम्बर में डीजीपी अशोक जुनेजा, एसीएस होम सुब्रत साहू और राजस्थान के डीजी डीएल सोनी। दरअसल, नियमानुसार चीफ सिकरेट्री ने राजस्थान के चीफ सिकरेट्री से एक डीजी लेवल के अफसर का नाम मांगे थे। सीएस ने 88 बैच के आईपीएस सोनी को भेज दिया। 4 दिसंबर को मीटिंग हुई। और, चार नाम तय किए गए। पिछली सरकार में सीएस विवेक ढांड की अध्यक्षता वाली रिव्यू कमेटी ने आईपीएस राजकुमार देवांगन, एएम जुरी और केसी अग्रवाल के नाम फोर्सली रिटायरमेंट के लिए भेजे थे। भारत सरकार ने तीनों को रिटायर कर दिया था। हालांकि, जुरी और अग्रवाल कैट से स्टे ले आए थे। देवांगन का कैरियर जरूर खतम हो गया।

बेचारे मंत्रीजी

एक मंत्रीजी को नगरीय निकाय चुनाव में प्रभारी बनाया गया था। वहां सत्ताधारी पार्टी पिछड़ गई। अब मंत्री की हालत पतली हो रही है। मंत्रिमंडल की सर्जरी में जिन तीन के नाम पब्लिक डोमेन में हैं, उनमें एक नाम उनका भी है। ऐसे में, उनकी चिंता समझी जा सकती है। पता चला है, मंत्रीजी ने अपने लोगों को फ्री हैंड दे दिया है...जो बोले...वो दे दो। मगर किसी भी सूरत में निकाय प्रमुख पार्टी का बनना चाहिए।

न्यू ईयर गिफ्ट

आईएएस अफसरों का प्रमोशन लगभग फायनल स्टेज में है। 97 बैच के सुबोध सिंह, निहारिका बारिक और एम गीता प्रमुख सचिव बनेंगे। और 2006 बैच के अंकित आनंद, श्रुति सिंह, पी0 दयानंद, सीआर प्रसन्ना, अलेक्स पाल मेनन, भुवनेश यादव और एस भारतीदासन सिकरेट्री। सब कुछ ठीक रहा तो जल्द ही इन्हें मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से न्यू ईयर गिफ्ट मिल सकता है।

नीयत पर सवाल

10 अक्टूबर के तरकश में-तेरे घर के सामने शिर्षक से स्तंभकार ने लिखा था कि नौकरशाहों को उपकृत करने एनआरडीए उनके सेक्टर के सामने रेलवे स्टेशन बनवा रहा। और यह बात सही निकली। रेलवे ने चार में से तीन के टेंडर निरस्त कर अब सिर्फ अफसरों की जमीन के पास वाले स्टेशन का टेंडर जारी कर दिया है। 30 दिसंबर को टेंडर भरा जाएगा। दरअसल, एनआरडीए ने सेक्टर 15 के सामने स्टेशन होने का हवाला देकर धड़ाधड़ पूरे प्लाट सेल कर डाले। उसमें कई नौकरशाहों ने दो-दो, तीन-तीन प्लाट खरीद डाले या फिर अपने नाते-रिश्तेदारों को खरीदवा दिए...10 साल बाद नवा रायपुर जब ठीक-ठाक हो जाएगा तो मस्त रहेंगे। बताते हैं, इस सेक्टर के 80 फीसदी प्लाट अफसरों या उनके रिश्तेदारों के नाम पर हैं। लेकिन, मामला तब गड़बड़ा गया जब रोकड़ा के अभाव में स्टेशन का प्रोजेक्ट बाइंडअप होने लगा। ऐसे में, नौकरशाहों की नाराजगी समझी जा सकती है...घर के सामने स्टेशन बनेगा, सोचकर पैसा फंसाए थे। अफसरों के गुस्से को देख एनआरडीए ने सिर्फ एक स्टेशन का रि-टेंडर किया है। वह सेक्टर 15 के बगल वाला। नौकरशाहों को इस तरह उपकृत करने से एनआरडीए की नीयत पर सवाल तो उठेंगे ही।

खड़मास में शपथ!

यह तय हो चुका है कि चारों नगर निगमों में सत्ताधारी पार्टी का महापौर बनेगा। अब सवाल है, परिषद का गठन कब होगा? नियम यह है कि राजपत्र में नोटिफिकेशन प्रकाशित होने के बाद 15 दिन के भीतर परिषद गठित होगा। राज्य निर्वाचन आयोग ने 24 दिसंबर को राजपत्र में प्रकाशित किया है। लिहाजा, 8 जनवरी तक महापौर एवं नगरपालिका, नगर पंचायत प्रमुखों को शपथ लेना होगा। इस समय खड़मास चल रहा होगा। लेकिन, किया कुछ नहीं जा सकता...नियम मतलब नियम।


अंत में दो सवाल आपसे

1. सर्विस रिव्यू कमेटी ने आईपीएस अफसर का नाम निगरानी सूची में रखने की सिफारिश की है?

2. मंत्रिमंडल की सर्जरी की चर्चा शुरू होने के बाद किस मंत्री को रात में नींद की गोली लेनी पड़ रही है?

शनिवार, 18 दिसंबर 2021

आईपीएस की छुट्टी!

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 19 दिसंबर 2021

2006 बैच के आईपीएस माइनथुंगो तुंगोए 2013 में डेपुटेशन पर गृह राज्य नागालैंड गए थे। 2018 में डेपुटेशन खतम हो गया। मगर इसके बाद उनकी कोई खबर नहीं है। गृह विभाग उनको दो नोटिस भेज चुका है। अभी तक कोई रिप्लाई नहीं...आखिर वे हैं कहां...कोई बता पाने की स्थिति में नहीं है। सुना है, अब उनको नौकरी से कंपलसरी रिटायर करने भारत सरकार को अनुशंसा करने पर विचार किया जा रहा है। माइनथुंगो अगर रिटायर  हुए तो गायब रहने के आधार पर नौकरी गंवाने वाले वे पहले आईपीएस होंगे।

एक थे पंकज द्विवेदी

अजीत जोगी सरकार के दौरान आंध्रप्रदेश कैडर के आईएएस पंकज द्विवेदी छत्तीसगढ़ आए थे। रमन सिंह की सरकार आने के बाद भी द्विवेदी को अच्छी पोस्टिंग मिलती रही। जीएडी से लेकर एपीसी तक रहे। बिलासपुर के कोटा में पंकज का ससुराल है। वे कांग्रेस के दिग्गत नेता मथुरा प्रसाद दुबे के दामाद हैं। कोटा विधानसभा सीट से उस जमाने में लगातार पांच चुनाव जीतने की वजह से उन्हें विधानपुरूष कहा जाता था। उनकी बेटी नीरजा पंकज से ब्याही थीं। बहरहाल, डेपुटेशन पूरा होने के तीन बाद भी पंकज जब आंध्र लौटने के लिए तैयार नहीं हुए तो आंध्र सरकार ने आईएएस लिस्ट में उन्हें एबसेंट कर दिया। बदनामी को देखते पंकज आठ साल बाद मन मारकर आंध्र लौटे।     

तेज घोड़ों पर दांव

सरकार का तीन साल पूरा हो गया है। बचा डेढ़ साल। डेढ़ साल इसलिए, क्योंकि आखिरी के छह महीना कोई काम होता नहीं। सो, सरकार का जो लक्ष्य है, उसके लिए वक्त अब कम रह गया है। लिहाजा, जिलों में अब और तेज दौड़ने वाले घोड़ों पर दांव लगाने की तैयारी की जा रही है। सरकार को कई बड़े जिलों से शिकायतें मिल रही हैं....कलेक्टर काफी स्लो हैं। पता चला है, सरकार परफारमेंस के आधार पर ऐसे कलेक्टरों की लिस्टिंग करा रही है, जिनके जिलों में योजनाओं की रफ्तार ढिली है। सुनने में आ रहा...लूज कलेक्टरों के साथ अबकी कोई मरौव्वत नहीं...बिना किसी किन्तु-परंतु के साथ उन्हें बदला जाएगा। बड़े जिलों में दुर्ग, बिलासपुर, रायगढ़, अंबिकापुर, जगदलपुर जैसे बड़े जिलों को लेकर अटकलें गर्म है....इनमें से कुछ को हटाए जाने की तो कुछ को और अहम जिलों में अपग्रेड करने की खबर है। इसके साथ छोटे जिलों के आधा दर्जन से अधिक कलेक्टर्स भी नप सकते हैं।  

एसपी का पट्टा

कलेक्टरों के साथ-साथ कुछ पुलिस अधीक्षक भी बदले जाएंगे। हालांकि, एसपी की लिस्ट उतनी लंबी नहीं होगी। नारायणपुर और बलौदा बाजार के एसपी पिछले दो महीने में बदले गए हैं। उससे पहिले भी आधा दर्जन से अधिक एसपी इधर-से-उधर हुए थे। बहरहाल, जब भी एसपी की लिस्ट निकलती है, आईपीएस के व्हाट्सएप ग्रुप में डॉ0 अभिषेक पल्लव को लेकर चुटकी षुरू हो जाती है। बैचमेंट बोलते हैं, अभिषेक तू दंतेवाड़ा का ही अब मूल निवासी बन जा...पट्टा लिखवा ले...और भी बहुत कुछ...। जाहिर है, अभिषेक के नाम किसी एक जिले में सबसे लंबे समय तक एसपी रहने का रिकार्ड दर्ज हो गया है। वे पहले एसपी हैं, जिनकी पोस्टिंग भाजपा सरकार में हुई और अभी तक क्रीज पर डटे हुए हैं। याने करीब चार साल से। बताते हैं, दंतेवाड़ा में अभिषेक का कोई विकल्प नहीं मिल रहा। उन्होंने दंतेवाड़ा में नक्सलियों के खिलाफ पुलिस का मजबूत नेटवर्क बना दिया है। इसलिए, अभिषेक को जब भी चेंज करने की बात आती है तो सीनियर पुलिस अधिकारी आगे-पीछे होने लगते हैं।    

कलेक्टरों को श्रेय या...

धान उठाव और मिलिंग...अबकी बड़ा स्मूथली चल रहा है...कहीं कोई विवाद नहीं। संकट पैदा करने वाले राईस मिलर आगे बढ़कर काम कर रहे हैं। तो क्या इसका क्रेडिट कलेक्टरों को दिया जाए...जो कलेक्टर वाहवाही लूटने की कोशिश कर रहे...उन्हें भी पता है कि इसमें पूरी भूमिका मुख्यमंत्री की है। सीएम ने इस बार ऐसा कुछ किया कि राईस मिलर गदगद हो गए। दो बार हाउस में ससम्मान बुलाकर राईस मिलरों को चाय-नाश्ता कराया, उपर से मिलिंग चार्ज 40 रुपए से बढ़ाकर 120। याने तीन गुना। मिलिंग चार्ज 93 में 40 रुपए तय हुआ था, 28 सालों तक यथावत रहा। अब यकबयक 140 रुपए हो जाने से राईस मिलरों की खुशी समझी जा सकती है। फिर मार्कफेड से मिलिंग के लिए धान उठाने मिलरों को प्रति बोरा 2200 रुपए डिपाजिट करना होता था। इसे अब 1500 कर दिया गया। बोरे का रेट भी 18 से 25। इसके बाद तो राईस मिलर बम-बम हैं...। सीएम के अभिनंदन समारोह में राईस मिलरों ने कहा, व्यापारियों की पार्टी मानी जाने वाली भाजपा ने जो नहीं किया, वह कांग्रेस सरकार ने कर दिया। जाहिर है, राईस मिलरों पर राहतों की झड़ी लगाकर सीएम ने व्यापारी समुदाय को बड़ा मैसेज दिया है।  

आईएएस, आईपीएस कांक्लेव

न्यू ईयर में तीन दिन का आईएएस कांक्लेव होने जा रहा तो दो दिन का आईपीएस कांक्लेव होगा। इसमें हिस्सा लेने पूरे प्रदेश से आईएएस, आईपीएस परिवार के साथ राजधानी रायपुऱ पहंुचेंगे। अभी तक की खबर के अनुसार 7 से 9 जनवरी तक आईएएस और 15 और 16 को आईपीएस कांक्लेव होगा। आईएएस, आईपीएस एसोसियेशन द्वारा इसकी तैयारी षुरू हो गई है। काफी सालों से शांत आईपीएस एसोसियेशन भी अब एक्टिव हो गया है। आईएएस और आईएफएस का सीएम के साथ दिवाली मिलन के बाद आईपीएस में निराशा थी। मगर अब आईपीएस एसोसियेशन भी आगे बढ़ा है। 

एक-एक विकेट

इस महीने पुलिस में एक बड़े अफसर रिटायर होंगे तो एक आईएएस से भी। 88 बैच के आईपीएस आरके विज इस महीने 31 को रिटायर हो जाएंगे। 89 बैच के आईपीएस अशोक जुनेजा को डीजीपी बनाने की वजह से सरकार ने हाल ही में विज को पीएचक्यू से हटाकर संचालक लोक अभियोजन बनाया है। बस्तर आईजी से रायपुर लौटने के बाद बतौर आईजी, एडीजी और स्पेशल डीजी उन्होंने पीएचक्यू में विभिन्न जिम्मेदारियां संभाली। पुलिस महकमे के वे एक मजबूत स्तंभ माने जाते थे। डीजी बनना उनके माथे पर नहीं लिखा था, सो नहीं हुआ। अब उन्हें लोक अभियोजन से ही गुमनामी में विदा होना पड़ेगा। आईएएस में सरगुजा कमिश्नर जे. किंडो इसी महीने रिटायर होने जा रही हैं। सरकार को उनकी जगह कमिश्नर पोस्ट करना होगा। सरकार के पास सिकरेट्री बहुत हो गए हैं, इसलिए कमिश्नर के च्वाइस में अब कोई दिक्कत नहीं। कमिश्नर में बाकी कुछ हो या न हो, गाड़ी-घोड़ा, बंगला मिल जाता है। बाकी हाथ-पैर चलाने वाला हो तब तो कुछ भी संभव है। 

अजब सिस्टम, गजब अफसर

राजस्व देने वाले सरकार के अहम रजिस्ट्री विभाग में कुछ भी हो रहा है। एक प्रदेश में दो-दो मापदंड। इसका एक मजमूं है यह वाकया....जांजगीर की महिला डिप्टी रजिस्ट्रार ने लाफार्ज सीमेंट के माईनिंग लीज को सिर्फ एक हजार शुल्क लेकर नुवोको के हवाले कर दिया तो विभाग के शीर्ष अफसर उसे सुधारनामा मान कर आंख मूंद लिए। और अब देखिए....बलौदा बाजार के रजिस्ट्री अधिकारी ने एक हजार के स्टांप में लाफार्ज सीमेंट कंपनी की माईनिंग लीज को नुवोको को ट्रांसफर करने से इंकार कर दिया। अफसर का कहना था, ये सुधारनामा नहीं, सेल है इसकी रजिस्ट्री होनी चाहिए। कंपनी इसके खिलाफ राजस्व बोर्ड गई। राजस्व बोर्ड ने इसे सुधारनामा करार दिया। तो इसके खिलाफ विभाग के अधिकारी हाईकोर्ट जा रहे हैं। याने एक जगह सुधारनामा और दूसरी जगह हाईकोर्ट में चैलेंज। पंजीयन विभाग के अफसरों की महिमा अपरंपार है। दरअसल, राजस्व बोर्ड भी सुधारनामा नहीं मानता। विभाग की ओर से न तो पूरा पेपर पेश हुआ और न ही कोई अफसर। बहरहाल, खेल बड़ा है। इसकी शुरूआत हुई जांजगीर से। माईनिंग लीज की अगर विधिवत रजिस्ट्री हुई होती तो सरकार के खजाने में 10 करोड़ से अधिक राशि आती। लेकिन, मात्र एक हजार लेकर कपंनी को उपकृत कर दिया गया। अब कंपनी पर ये उपकार ऐसे तो नहीं किया गया होगा। 

मंत्रिमंडल में सर्जरी

तीन साल पूरा होने पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इशारे में संकेत दिया कि मंत्रिमंडल का पुनर्गठन किया जा सकता है। बशर्ते उन्हें हाईकमान से अनुमति मिले। अब सवाल उठता है हाईकमान से अगर हरी झंडी मिले तो कितने मंत्रियों की छुट्टी होगी? बिलासपुर, सरगुजा और दुर्ग संभाग से एक-एक मंत्री की मुश्किलें बढ़ सकती है। बस्तर में महेंद्र कर्मा के नाम का फायदा उठाने पार्टी देवती कर्मा के नाम पर भी विचार कर रही है। उधर, पीसीसी चीफ मोहन मरकाम भी मंत्री बनने के लिए उत्सुक बताए जाते हैं। कुल मिलाकर मामला पेचीदा होगा। 

अंत में दो सवाल आपसे

1. सरकार के निर्देश के बाद भी कलेक्टरों की टीएल बैठकों में पुलिस अधीक्षक क्यों नहीं जा रहे?

2. स्पीकर चरणदास महंत ने चुनावी राजनीति से सन्यास लेकर राज्यसभा में जाने की इच्छा व्यक्त की है, ऐसा क्यों?

शनिवार, 11 दिसंबर 2021

आईएएस का इस्तीफा?

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 12 दिसंबर 2021

2014 बैच के आईएएस अमृत टोपनो ने नौकरी से इस्तीफा तो भेजा है मगर दिक्कत यह है कि मजमूं क्लियर नहीं हो पा रहा। चीफ सिकरेट्री, एसीएस टू होम और जीएडी सिकरेट्री को व्हाट्सएप पर आए मैसेज में उपर इस्तीफा लिखा तो है मगर नीचे में उसका कोई उल्लेख नहीं। टोपनो के व्हाट्सएप से मंत्रालय के अधिकारी भी उलझन में पड़ गए हैं....यंग आईएएस का किया क्या जाए। अलबत्ता, जीएडी ने टोपनो को हार्ड पेपर में लेटर भेजने कहा है, मगर अभी तक उनका कोई रिप्लाई नहीं आया है। टोपनो को प्रॉब्लम क्या है, इस बारे में उनके बैच वाले भी कुछ बता नहीं पा रहे। सिर्फ इतना ही पता है कि वे झारखंड लौट चुके हैं।

शैलेष की याद

आईएएस अमृत टोपनो ने इस्तीफा दे दिया है। उनके इस्तीफे से शैलेष पाठक का इस्तीफा जेहन में आ गया। अजीत जोगी सरकार में काफी पावरफुल अधिकारी रहे शैलेष पाठक 2005 में इस्तीफा देकर प्रायवेट सेक्टर में चले गए थे। लेकिन, ढाई-तीन साल बाद उनका वहां जमा नहीं, मन भी बदला। चूकि दिल्ली में अच्छा कंटेक्ट था, सो वहां उन्होंने जमा लिया। मगर पेंच यह था कि राज्य सरकार अनुमोदन करें। डीओपीटी ने शैलेष को भरोसा दिया था कि आप राज्य सरकार से लेटर ओके करा लाओ, बाकी यहां कोई दिक्कत नहीं। मगर यहां सीएम सचिवालय ने उन्हें दो टूक इंकार कर दिया। सीएम सचिवालय के एक सीनियर और दबंग आईएएस ने मुख्यमत्री रमन सिंह से दो टूक कह दिया...सर, इससे गलत परिपाटी बन जाएगी...नौकरी से त्यागपत्र देकर प्रायवेट में चले जाओ और फिर घूम फिरकर लौट आओ। इस तरह पाठक की वापसी का एपीसोड खतम हो गया। 

सीएम की मारुति

नया रायपुर में इंस्टीट्यूट ऑफ ड्राईविंग एंड रिसर्च के लोकापर्ण समारोह में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भाषण दे रहे थे...उन्होंने बताया मेरे पास पहले मोटर सायकिल थी। 93 में जब पहली बार विधायक बना तो नया मोटर सायकिल लेने गया। बाइक एजेंसी वाले ने सलाह दी...भैया अब आप विधायक बन गए हो, मोटरसायकिल में मजा नहीं आएगा...अब तो कार होना चाहिए। बाइक एजेंसी वाले की मारुति की एजेंसी भी थी। उसने मुझे मारुति 800 खरीदवा दी। सीएम ने बताया, मारुति ने उनका काफी साथ दिया। चूकि इंस्टीट्यूट को मारुति के साथ पीपीपी मोड में चालू किया जा रहा। सो, समारोह में मारुति के जेपेनिज एमडी और सीओओ भी मौजूद थे। राज्य के मुखिया द्वारा मारुति की तारीफ मिलने से वे बेहद खुश हुए। 

दूसरे आईपीएस

धार्मिक हिंसा के बाद कवर्धा एसपी मोहित गर्ग आखिरकार हटा दिए गए। उनकी जगह पर लाल उमेद सिंह ने वापसी की है। उमेद पहले भी करीब ढाई साल वहां एसपी रह चुके थे। कवर्धा में ये उनकी दूसरी पारी होगी। आईपीएस मेें उनसे पहले सिर्फ रतनलाल डांगी को एक ही जिला में दो बार कप्तान रहने का मौका मिला है। वे कोरबा में दो बार एसपी रहे। वहीं, कलेक्टरों में जिला रिपीट केवल सुबोध सिंह ने किया। वे रायपुर से बिलासपुर गए थे और वहां से लौटकर फिर बिलासपुर।

बेचारे सिकरेट्री

सब कुछ ठीक रहा तो जनवरी के पहले हफ्ते में आईएएस का प्रमोशन हो सकता है। इस बार 2006 बैच के आईएएस सिकरेट्री बनेंगे और 97 बैच वाले प्रिंसिपल सिकरेट्री। 97 बैच में छत्तीसगढ़ कैडर में तीन आईएएस हैं। सुबोध सिंह, एम गीता और निहारिका बारिक। सुबोध सेंट्रल डेपुटेशन पर हैं। निहारिका बारिक डेढ़ साल की छुट्टी पर। और गीता भी लगभग डेपुटेशन पर ही। लगभग का मतलब ये कि वे छत्तीसगढ़ भवन ही सही, हैं तो दिल्ली में। और यह भी सही है कि किसी भी दिन भारत सरकार से उनका डेपुटेशन का आर्डर आ सकता है। 2006 बैच में अंकित आनंद, श्रुति सिंह, दयानंद, सीआर प्रसन्ना, अलेक्स पाल मेनन, भूवनेश यादव और भारतीदासन हैं। ये सभी सिकरेट्री बन जाएंगे। हालांकि, 2005 बैच को सिकरेट्री बनने में काफी पापड़ बेलने पड़े थे लेकिन इस बैच में नहीं लगता कि कोई दिक्कत होगी। याने एक साथ सात सिकरेट्री मिलेंगे सरकार को। 26 तो पहले से हैं, ये सात और। याने अब 33 सिकरेट्री। पता नहीं...इतने थोक में सिकरेट्री उपलब्ध होने पर बेचारों को क्या विभाग मिलेंगे।  

नए कलेक्टर, एसपी

तीन नए जिलों का नोटिफिकेशन तो हो गया मगर अभी तक ओएसडी की तैनाती नहीं हुई है। अगर 26 जनवरी के आसपास भी अगर नए जिलों का इनॉग्रेशन करना हो, तब भी अब ओएसडी की नियुक्ति का अब समय आ गया है। जाहिर है, नए जिलों में कलेक्टर, एसपी बनने वाले आईएएस, आईपीएस सरकार के आदेश पर टकटकी लगाए बैठे हैं। 

मखाना और मैडम 

बैठकों में सीएम भूपेश बघेल सिर्फ भृकुटी ही नहीं चढ़ाते...अगर किसी अधिकारी का दिन खराब हो तो बात अलग है....वरना, चुटकी, हंसी-ठिठोली भी हो जाती है। इसी हफ्ते सीएम हाउस में आयोजित गोधन न्याय योजना के भुगतान की बैठक में आरंग के एक किसान वीवीआईपी के लिए मखाना लेकर आए थे। लेकिन, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को देने के बाद अधिकारियों का नम्बर आया तो मखाना खतम हो गया। मुख्यमंत्री इसको समझ गए। जैसे ही बैठक खतम हुई उन्होंने अपना मखाना दो सीनियर आईएएस को यह कहते हुए दे दिया कि ले जाओ, आपलोगों की मैडम खुश हो जाएंगी। इस पर जमकर ठहाके लगे। 

अफसरों का भगवा ड्रेस

पिछले हफ्ते राजधानी में मैराथन दौड़ हुआ। इसमें हिस्सा लेने एक एक्स चीफ सिकरेट्री समेत कई बड़े अधिकारी पहुंचे। मैराथन को हरी झंडी दिखाने के ठीक पहले आयोजकों ने प्रतिभागियों को चटख भगवा रंग का टीषर्ट पहना दिया। अब अधिकारियों को टीशर्ट निकालते बने, न पहनते। कार्यक्रम में मीडिया वाले भी थे, सो टीशर्ट उतार भी नहीं सकते थे। लिहाजा, कई अफसर बीच में ही मैराथन छोड़ टीशर्ट उतार दिया तो कुछ लोग जैसे ही दौड़ खतम हुई, सबसे पहले ड्रेस बदला। डर था, कहीं कोई देख लिया तो....।    

तीन उमेश

सरकार की छबि चमकाने वा


ले जनसंपर्क विभाग में पहले दो उमेश थे। दोनों उमेश मिश्रा। इनको आईडेंटीफाई करने के लिए कहा जाता था दिल्ली वाले उमेश और दूसरे को संवाद वाले उमेश। एक को दिल्ली वाले इसलिए क्योंकि वे लंबे समय तक दिल्ली में पोस्टेड रहे। जनसंपर्क में अब एक और उमेश की इंट्री हो गई है। याने तीसरा उमेश। ये उमेश पटेल डिप्टी कलेक्टर हैं। पोस्ट है संवाद महाप्रबंधक। इन्हें अब क्या कहा जाए...ये दुविधा दूर की...सीपीआर ने। उन्होंने व्यवस्था दी है, इन्हें फुल नेम उमेश पटेल से आईडेंटिफाई किया जाए।    

रायपुर की पोलिसिंग

6 दिसंबर की रात राजधानी के टिकरापारा इलाके में तनाव की स्थिति निर्मित हुई। स्थिति बिगड़े मत, एसएसपी प्रशांत अग्रवाल सुबह पांच बजे तक टिकरापारा थाने में मोर्चा संभाले रहे। कहने का आशय यह कि अगर सीनियर और संजीदा अफसर होते तो एसएसपी की वहां जरूरत ही नहीं पड़ती। दरअसल, राज्य तो अलग बन गया मगर 21 साल गुजर गए...राजधानी की पोलिसिंग पर कभी ध्यान नहीं दिया गया। रायपुर जैसे 12 लाख से अधिक आबादी वाले शहर को कंट्रोल करने के लिए सिर्फ एसएसपी से हमाली नहीं कराई जा सकती। जब भोपाल और इंदौर में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू हो गया, उसके उलट रायपुर के कप्तान के पास अदद एक सिटी एसपी तक नहीं है। 13 साल पहले स्व0 विनोद चौबे जरूर अषोक जुनेजा के एसएसपी रहने के दौरान सिटी एसपी रहे। लेकिन, उनके ट्रांसफर के बाद यह पद खतम हो गया। रायपुर जैसे शहर को संभालने के लिए अब जरूरी हो गया है, कप्तान को मजबूत हैंड दिया जाए। कम-से-कम दो एसपी याने एक सिटी और एक एसपी ग्रामीण की पोस्टिंग हो। दोनों आईपीएस हो। उसके बाद फिर चार जोन में शहर को बांटकर चार एडिशनल एसपी। 18 लाख की आबादी वाले भोपाल में एडीजी रैंक का पुलिस कमिश्नर। फिर डीआईजी रैंक के चार एडिशनल कमिश्नर। एसपी रैंक के 12 डिप्टी कमिश्नर और एडिशनल एसपी लेवल के 30 एएसपी। और 12 लाख वाले रायपुर की सुरक्षा....? एक एसएसपी और दो एडिशनल एसपी के भरोसे। वक्त आ गया है, सरकार को राजधानी की पोलिसिंग सेटअप को दुरूस्त करने पर विचार करना चाहिए। 

अंत में दो सवाल आपसे

1. डेपुटेशन से लौट रहे राजेश मिश्रा को क्या कोई महत्वपूर्ण पोस्टिंग मिलेगी?

2. क्या ये सही है कि एनआरडीए ने नया रायपुर में नौकरशाहों की जमीनों का रेट बढ़ाने उनके सेक्टर के सामने रेलवे स्टेशन बनाने का टेंडर कर दिया है?

शनिवार, 4 दिसंबर 2021

बेचारे बैचलर आईएएस

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 5 दिसंबर 2021

एक युवा आईएएस को सरकार ने हाल ही में हटा दिया। पता चला, वे दो महीने से दफ्तर नहीं आ रहे थे। आईएएस जैसी देश की सबसे प्रतिष्ठित सर्विस में सलेक्ट होने के बाद भी इस कदर...चिकित्साविज्ञानी मानते हैं, एक उम्र के बाद बैचलर नहीं रहना चाहिए। बैचलर रहने के कारण छत्तीसगढ़ के कुछ और नौकरशाहों की वर्किंग प्रभावित हो रही है। एक आईएएस कलेक्टर बनने से चूक गए। सूबे में कई अफसर दो-दो, तीन-तीन घरों का सुख ले रहे हैं और ये बैचलर बेचारे एक घर नहीं बसा रहे। चीफ सिकरेट्री अमिताभ जैन को बैचलर अफसरों के लिए कुछ करना चाहिए...काउंसलिंग का बंदोबस्त ही सही, ताकि टाईम पर वे घर-गृहस्थी बचा लें। 

बेचारे तीन कलेक्टर!

बेमेतरा, कवर्धा और मुंगेली, इन तीन जिलों के अधिकारी डायरेक्ट कॉन्फ्रेंस हो या वीडियोकांफ्रेंसिंग, पारफारमेंस को लेकर घिर जाते हैं। सीएस अमिताभ जैन ने हाल ही में वीसी लिए, उसमें भी इन जिलों के कलेक्टरों को खासतौर पर निर्देश दिया गया। दरअसल, इन तीनों जिलों में डीएमएफ है नहीं, लिहाजा इन कलेक्टरों के हाथ बंधे होते हैं। अब मुंगेली कलेक्टर के पास रिसोर्सेज के नाम पर है क्या? जिन जिलों में डीएमएफ हैं, वहां संसाधनों की कोई कमी नहीं होती। वैसे, इस बार कोरिया कलेक्टर श्याम धावड़े की वीसी में तारीफ हो गई। सीएस बोले, तुम काम अच्छा करते हो मगर बोलते कम हो, इस बार तुम धड़धड़ाकर बोले। इस बार की वीसी की खास बात यह रही कि सभी कलेक्टरों को बोलने का मौका मिला।

महिला एसपी का रिकार्ड

छत्तीसगढ़ की 2008 बैच की आईपीएस पारुल माथुर बिलासपुर की एसएसपी बनते ही देश में सबसे अधिक जिलों की कप्तान रहने वाली महिला आईपीएस बन गई हैं। देश में अभी तक पांच जिलों की कप्तानी का रिकार्ड है। पारुल छठवीं बार एसपी बनीं हैं। पांच बार जिले की और एक बार लंबे समय तक रेलवे एसपी रही। बीजेपी सरकार में उनके बारे में कहा जाने लगा था कि सरकार ने रेलवे एसपी बनाकर लगता है, भूल गई। बाद में सरकार बदली तो पारुल की किस्मत भी पलटी। वे मुंगेली, जांजगीर, गरियाबंद होते हुए बिलासपुर जैसे सूबे के दूसरे बड़े जिले की कप्तान बन गईं। बीजेपी के पीरियड में उनका सबसे पहला जिला बेमेतरा रहा। लेकिन, पारिवारिक वजहों से वे लंबी छुट्टी पर चली गईं थी। फिलहाल, गौर करने वाली बात यह है कि ये चार जिले उन्होंने बिना ब्रेक किया है। इसलिए, कोई आश्चर्य नहीं कि वे एकाध और बड़ा जिला कर लें। पारुल के पिता राजीव माथुर भी आईपीएस अफसर रहे हैं। रायपुर के चर्चित आईजी भी रहे। लेकिन, काबिल होने के बाद भी पीएचक्यू में उन्हें मौका नहीं मिला तो सेंट्रल डेपुटेशन पर चले गए। बहरहाल, पारुल का जांजगीर का कार्यकाल वैसा नहीं रहा...। बिलासपुर के रूप में उन्हें सरकार ने बड़ा अवसर दिया है....उन्हें दबंग महिला एसपी के तौर पर छबि निर्मित करने के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहिए। 

ग्रह-नक्षत्र का फेर

छत्तीसगढ़ में आईपीएस के दिन बदल नहीं रहे। कांस्टेबल और ड्राईवर एसपी लोगों को निबटा दे रहे हैं। बलौदा बाजार के एसपी आईके एलेसेला ने अमर्यादित बातें की....ये कोई नया नहीं था....एसपी अपने सिपाही, दरोगा से किस अंदाज में बात करते हैं...ये पुराने समय से चला आ रहा है। हम एसपी की असंसदीय भाषा से इतेफाक नहीं रखते, न रखना चाहिए, वाकई उनका बर्ताव आपत्तिजनक था। लेकिन कांस्टेबल मोबाइल से अपने साहबों को ट्रेप करने लगें तो समझ जाइये फिर पुलिसिंग का क्या होगा? रिकार्डिंग सुन आप समझ जाएंगे कि किस तरह कांस्टेबल एसपी को ट्रेप करने के लिए बहस को न केवल लंबा खींचने की कोशिश कर रहा बल्कि जुबान लड़ाकर फंसा रहा है....भला कांस्टेबल कभी एसपी को माई-बाप बोलता है। ये पुलिस के ग्रह-नक्षत्र का फेर है....नए डीजीपी अशोक जुनेजा को कुछ पूजा-पाठ करानी चाहिए।  

'बी' का फेर     

छत्तीसगढ़ में बी नाम से छह जिले हैं...बालोद, बेमेतरा, बलौदा बाजार, बस्तर, बिलासपुर और बलरामपुर। इन एक जिले में किसी एसपी की पोस्टिंग होती है तो फिर उसका 'बी' का एकाध सर्कल लगता ही है....। मसलन, आरिफ शेख। आरिफ सबसे पहले बालोद गए। वहां से बलौदा बाजार, बस्तर और फिर बिलासपुर। याने फोर 'बी'। हालांकि, वे बिलासपुर से रायपुर का एसएसपी बन 'बी' के चक्रव्यूह से निकल गए। जीतेंद्र मीणा भी बालोद से बस्तर पहुंच गए। जीतेंद्र का भी 'बी' का चक्कर नहीं छूटा....अपग्रेडेशन जरूर हुआ। सदानंद बलरामपुर और बालोद। इसी तरह पारुल माथुर का पहला जिला बेमेतरा रहा और अब बिलासपुर। दीपक झा आखिरी-आखिरी में अवश्य बी के चक्रव्यूह में फंस गए। बलौदा बाजार के बाद बस्तर, फिर बिलासपुर और अब बलौदा बाजार। बलौदा बाजार मतलब कुछ दिन में उसका आधा हिस्सा सारंगढ़ में चला जाएगा। 

सबसे बड़ा सवाल

बलौदा बाजार एसपी क्यों नपें, बताने की जरूरत नहीं। कवर्धा की धार्मिक हिंसा में मोहित गर्ग को जाना ही था।लेकिन, ब्यूरोक्रेसी में सबसे बड़ा सवाल है...बिलासपुर एसपी दीपक झा का क्या हुआ...वे तो ठीक से अभी पिच पर जम भी नहीं पाए थे। इसकी असली वजह आदेश निकालने वाले गृह विभाग के लोग बता पाएंगे। मगर छन-छनकर जो खबरे आ रही हैं, पिछले दिनों बिलासपुर के कोतवाली थाने में घेराव और नारेबाजी को ढंग से हैंडिल नहीं किया गया...थाने में सरकार के खिलाफ नारे लगते रहे...इसे अच्छे वे में नहीं लिया गया। 

अब नक्सल नहीं!

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री जब भी कभी दिल्ली मीडिया से मुख़ातिब होते थे तो फोकस हमेशा नक्सल समस्या पर ही होता था। लेकिन इस बार ऐसा नहीं था। मुख्यमंत्री मीडिया से जुड़े तीन कार्यक्रमों में गये और उनसे नक्सल समस्या को लेकर कोई प्रश्न नहीं पूछा गया। अलबत्ता, राष्ट्रीय मंच पर छत्तीसगढ़ मॉडल की चर्चा हुई, किसानों के ऋण माफ़ी की मांग हुई और गोबर ख़रीदने की गोधन योजना का विस्तार से ज़िक्र हुआ। जिस तरह से मुख्यमंत्री ने ममता बैनर्जी के ताजा कांग्रेस विरोधी रुख़ पर प्रश्न उठाये...प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद ममता के बदले सूर पर अटैक किया....अखिलेश यादव की कांग्रेस पर की गयी टिप्पणी का जिस बेबाकी से प्रतिकार किया, वह उनका सियासी कांफिडेंस बताता है। 

नेताओं को झटका 

बीजेपी के कोर ग्रुप समेत संगठन के पदों पर ठीक-ठाक दायित्व न मिलने से भाजपा के कई नेता खफा बताए जा रहे हैं। एक पूर्व मंत्री सूची जारी होने के बाद दिल्ली में हैं। हालांकि, झटका तो अमर अग्रवाल और अजय चंद्राकर को भी लगा होगा। लेकिन, उन्हें कम-से-कम नगरीय और पंचायतों में कोआर्डिनेशन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। अमर पार्षदों के बीच जाकर समन्वय के साथ आंदोलनों की रूप-रेखा तैयार करवाएंगे तो अजय पंचायत प्रतिनिधियों को कोआर्डिनेट करेंगे। किन्तु कुछ नेताओं को तो कुछ भी नहीं मिला। ऐसे में, उनका दुखी होना लाजिमी है। 


अंत में दो सवाल आपसे

1. किस जिले में पुलिस को बदनाम करने फर्जी गोली कांड हुआ और विवशता में पुलिस उसे जाहिर भी नहीं कर पाई?

2. पारुल माथुर को छोटे जिला से बड़ा जम्प मिला तो क्या अब कोरिया एसपी संतोष सिंह को भी उम्मीद रखनी चाहिए?