शनिवार, 7 मार्च 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: राजपरिवारों को झटका

 


तरकश, 8 मार्च 2026

संजय के. दीक्षित

राजपरिवारों को झटका

राज्यसभा में पहुंचने के लिए बीजेपी, कांग्रेस दोनों पार्टियों से जुड़े राजपरिवारों की प्रबल दावेदारी थी। बीजेपी से जशपुर राजपरिवार के रणविजय सिंह पहले राज्यसभा में रह चुके हैं। फिर भी उम्मीदें उन्हें कम नहीं थी। पिछले विधानसभा चुनाव में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रणविजय को कई रोड शो, रैलियों में अपने साथ घुमाया था। मगर सरकार बनने के बाद उन्हें कुछ मिला नहीं। लाल बत्ती की रेवड़ी अब बची नहीं, रही-सही राज्यसभा की आशा भी चली गई। उधर, जगदलपुर पैलेस के कोमल भंजदेव भी इस बार पूरा जोर लगा डाले थे। रमन सिंह के दौर में युवा आयोग के चेयरमैन रह चुके भंजदेव को राज्यसभा की दावेदारी इसलिए जोर पकड़ रही थी, क्योंकि बस्तर लाल आतंक से मुक्त हो रहा तो शायद पार्टी उनके नाम पर मुहर लगा दे। लेकिन, किस्मत से ज्यादा कुछ मिलता नहीं। बीजेपी ने लक्ष्मी वर्मा को राज्यसभा में भेजने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। उधर, कांग्रेस के सौम्य लीडर टीएस सिंहदेव को पार्टी ने वादे के विपरीत मुख्यमंत्री बनाया नहीं, विधानसभा चुनाव हारने से वे अभी किसी पद पर भी नहीं हैं। सो, आस उन्हें भी थी। कई मौकों पर टीएस ने बेबाकी से कहा भी था...पार्टी अगर चाहेगी तो राज्यसभा जरूर जाउंगा। मगर पार्टी ने फूलोदेवी नेताम को राज्यसभा में रिपीट कर दिया।

CM फेस और अलार्म

नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत और पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव जैसे दिग्गज नेताओं की दावेदारी को नजरअंदाज कर कांग्रेस पार्टी ने फूलोदेवी नेताम को राज्यसभा में भेजने का फैसला किया है, तो उसके अपने निहितार्थ हैं। दअरसल, फूलोदेवी पीसीसी की पसंद तो कतई नहीं थी। पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज खुद दावेदार थे। मगर फूलोदेवी के नाम को पार्टी सुप्रीमो सोनिया गांधी से हरी झंडी मिल गई। उसके बाद कांग्रेस में किन्तु-परन्तु का कोई स्पेस नहीं बच जाता। जाहिर है, छत्तीसगढ़ से लगातार तीन बाहरी नेताओं को राज्यसभा में भेजने का खामियाजा भुगत चुकी कांग्रेस ने इस बार स्थानीय को प्राथमिकता दी। मगर ये भी सही है...फूलोदेवी के चयन ने सूबे के बड़े नेताओं का चैन उड़ा डाला है। दरअसल, फूलोदेवी की गांधी परिवार के इनर सर्किल में इंट्री हो गई है। फिर महिला और आदिवासी भी हैं। जाहिर है, 2028 के विधानसभा चुनाव में सीएम की रेस में फूलोदेवी मजबूत दावेदार होंगी। ऐसे में नेताओं की नींद उड़ेगी ही।

जातिगत समीकरण

लक्ष्मी वर्मा को राज्यसभा सदस्य बना बीजेपी ने जातिगत समीकरण साधने का प्रयास किया है। सरकार के रणनीतिकारों को भले ही लगता है कि कुर्मी समाज का वोट उनके प्रतिद्वंद्वी को ज्यादा मिला। मगर भविष्य को भी देखना जरूरी है। जाहिर तौर पर सरकार में कुर्मी समुदाय का प्रतिनिधित्व कम है। साहू समाज से अरुण साव डिप्टी सीएम हैं और तोखन साहू केंद्रीय राज्य मंत्री। मगर कुर्मी समाज से मंत्रिमंडल में सिर्फ टंकराम वर्मा। विभागों की हिस्सेदारी में भी उनका नंबर उपर से दसवां होगा। लक्ष्मी वर्मा को राज्यसभा में भेज बीजेपी ने नारी शक्ति को साधने के साथ ही जातिगत संतुलन बनाने का प्रयास किया है।

सबसे पावरफुल चेयरमैन!

यदि आपसे पूछा जाए कि छत्तीसगढ़ के निगम-मंडलों में सबसे जलवेदार चेयरमैन कौन होगा? तो मुंह बिचका जवाब मिलेगा, जलवा तो एमडी काटते हैं। चेयरमैन रबड़ स्टैम्प होते हैं। हां...माईनिंग, ब्रेवरेज जैसे कुछ चेयरमैन होते हैं, जिन्हें हिसाब-किताब के लिए कैलकुलेटर की जरूरत पड़ती है। बाकी तो गाड़ी, पेट्रोल और खर्चे का बिल पास कराने में ही उनका कार्यकाल निकल जाता है। मगर ऐसा नहीं है। एक चेयरमैन हैं, जिनका जलवा सबसे अधिक होगा। वो हैं नागरिक आपूर्ति निगम के चेयरमैन संजय श्रीवास्तव। दरअसल, किसी भी चेयरमैन के पास ट्रांसफर के अधिकार नहीं होते। मगर पिछली सरकार में नॉन के चेयरमैन रामगोपाल अग्रवाल की सरकार में तूती बोलती थी। उन्होंने सरकार से अधिकारियों, कर्मचारियों के तबादले का पावर चेयरमैन के नाम करवा लिया था। दिसंबर 2023 में सरकार बदली। इसके बाद संजय श्रीवास्तव नॉन के चेयरमैन बनें और ट्रांसफर का अधिकार उन्हें मिल गया। संजय पढ़े-लिखे नेता हैं, पर्सनाल्टी भी ऐसी कि नगर निगम में सभापति बने या फिर आरडीए का चेयरमैन, छोटे पदों पर भी उन्हें अपना सिक्का जमाने आता है। नॉन मे ंतो उन्हें ट्रांसफर का अधिकार मिल गया है, फिर समझ सकते हैं, उनका पावर कितना बढ़ गया होगा।

एक DGP, तीन चार्ज

राज्य सरकार ने अरुणदेव गौतम को डीजीपी बनाया मगर पुलिस प्रमुख बनने से पहले जो चार्ज थे, उससे उन्हें मुक्त नहीं किया गया। गौतम के पास अभी भी होमगार्ड, फायर और अभियोजन की जिम्मेदारी है। होमगार्ड और अभियोजन में पूर्व में कई डीजी लेवल के अफसर पोस्ट रह चुके हैं। इसलिए, उसे छोटा नहीं आंकना चाहिए। रही बात डीजीपी की, तो राज्य में चीफ सिकरेट्री के बाद दूसरे सबसे बड़े पद पर बैठे अफसर को अतिरिक्त दायित्व नहीं सौंपना चाहिए। ये तो ऐसा ही हुआ कि किसी आईएएस अधिकारी को चीफ सिकरेट्री बनाकर दो-एक विभाग की जिम्मेदारी दे दो। इससे पहले रमन सिंह की तीसरी पारी में एएन उपध्याय जब 29 साल की आईपीएस की सर्विस में डीजीपी बन गए थे, तब उनके पास प्रशासन का चार्ज था। मगर दसेक दिन के भीतर सरकार ने प्रशासन से उन्हें मुक्त कर दिया था। दरअसल, डीजीपी पद की अपनी गरिमा होती है। एकाध-महीना चलता है। प्रभारी डीजीपी बने, उन्हें 13 महीने हो गए मगर अभी भी तिहरा चार्ज से छुटकारा नहीं पा मिला।

DGP को बोनस

छत्तीसगढ़ बनने के 25 सालों में प्रभारी डीजीपी दो ही आईपीएस बने हैं। पहले अशोक जुनेजा और अब अरुणदेव गौतम। अशोक जुनेजा 11 महीने प्रभारी रहे मगर उसके बाद उनका पूर्णकालिक का आदेश आ गया था। नियमानुसार जिस दिन से मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर पूर्णकालिक डीजीपी बनाने का आदेश देता है, उस दिन से दो साल कार्यकाल मिलता है। जुनेजा को इसीलिए रिटायमेंट के बाद 11 महीने की सर्विस एक्स्ट्रा मिली। अरुण गौतम ने 13 महीने प्रभारी डीजीपी रहकर जुनेजा का रिकार्ड तोड़ दिया है। तुर्रा यह....गौतम घाटे में नहीं हैं, 13 महीने ये उनका बोनस है। जिस दिन वे पूर्णकालिक डीजीपी बनेंगे, उस दिन से उनका दो साल का मीटर घूमना शुरू होगा। मसलन, इस महीने मार्च में यदि वे पूर्णकालिक डीजीपी बन जाते हैं तो फिर वे अगले साल जुलाई 2027 में रिटायर नहीं होंगे। मार्च 2028 तक उनका कार्यकाल रहेगा। याने अरुणदेव नुकसान में नहीं हैं।

सत्र बाद बड़ी सर्जरी

विधानसभा के बजट सत्र के बाद कलेक्टरों की एक लिस्ट निकलेगी ही, एसपी लेवल पर बड़ी सर्जरी होगी। इसमें करीब आधे दर्जन से अधिक पुलिस अधीक्षकों का ट्रांसफर होगा। सात एसपी के डेढ़ से दो साल पूरे हो गए हैं। उन्हें इधर-से-उधर किया जाएगा। बलौदा बाजार की एसपी भावना गुप्ता प्रायवेट कारणों से लंबी छुट्टी पर जाने वाली है, वहां भी नया एसपी पोस्ट करना होगा। जिन पुलिस कप्तानों के ट्रांसफर की संभावनाएं हैं, उनमें रजनेश सिंह, भोजराज पटेल प्रशांत ठाकुर, शलभ सिनहा, सिद्धार्थ तिवारी, गौरव राय जैसे नाम हैं। सरकार को हालांकि, इस पर मशक्कत करनी होगी कि इन अधिकारियों को किस जिले में ट्रांसफर करें। इनमें कुछ नाम अच्छे हैं मगर उनकी सीनियरिटी के लायक जिला इस समय खाली नहीं है। सरकार को उसी में से कुछ गुंजाइश बनानी होगी।

डायरेक्ट IPS, कोपभवन

कप्तानी में कभी डायरेक्ट आईपीएस अधिकारियों का दबदबा रहता था। पिछली सरकार तक दुर्ग से लेकर रायपुर, बिलासपुर, जांजगीर, रायगढ़ तक डायरेक्ट आईपीएस कप्तान रहे। मगर अब सिचुएशन 360 डिग्री में घूम गया है। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, जांजगीर, रायगढ़, जशपुर जैसे बड़े जिलों में प्रमोटी आईपीएस एसपी हैं। यहां तक कि रायपुर पुलिस कमिश्नर की पोस्टिंग से उन्हें काफी उम्मीदें थी। लेकिन, वे हाथ मलते रह गए। इसके बाद असंतोष और गहरा गया है। आरआर याने डायरेक्ट आईपीएस अधिकारियों की इन दिनों बस एक ही गुहार...हमारी उपेक्षा हो रही। रायपुर पुलिस कमिश्नरेट में चार डायरेक्ट वाले डीसीपी बने हैं, वे भी खुश नहीं। उन्हें लगता है सीएसपी हो गए हैं। जिलों में कप्तान का जो जलवा होता है, वो रायपुर पुलिस कमिश्नरेट में कहां मिलेगा? उपर में संजीव शुक्ला और अमित कांबले जैसे अफसर उपर बैठ गए हैं। फिर कमिश्नरेट वाली ठसन भी नहीं है। छत्तीसगढ़ पुलिस ऐसी डिरेल्ड हुई है कि पहले जैसी ठसन आ भी नहीं सकती। पुलिस में जान फूंकने वाला कोई क्रांतिकारी आईपीएस अवतार लेगा, उसके बाद ही पुलिस का पुराना वैभव लौट पाएगा...मगर वो भी तब जब छत्तीसगढ़ के पॉलिटिशियन चाहेंगे। बहरहाल, इन परिस्थितियों में हो सकता है कि खाली होने वाले दो-एक जिलों में इस बार डायरेक्ट आईपीएस अफसरों को मौका मिल जाए।

नासमझ अफसर!

शराब से 1200 करोड़ का टारगेट पूरा करने का ये मतलब नहीं की कुछ भी कर दें। होली में शराब दुकान खोलने का मामला लगभग ऐसा ही रहा। जनवरी तक 867 करोड़ का ही रेवेन्यू आया है। दो महीने में 1200 करोड़ पहुंचाना था, बल्कि इससे क्रॉस होता तब वाहवाही मिलती। लिहाजा, होली के दिन दुकान ओपन रखने का आदेश जारी कर दिया। नासमझी की ये चरम स्थिति थी...सालों की सर्विस के बाद अफसरों को ये समझ नहीं आया कि होली और शराब का क्या रिश्ता है। महाराष्ट्र और साउथ के राज्यों में होली नहीं मनती। इसलिए वहां शराब दुकानें खुली रहती हैं। छत्तीसगढ़ में शराब दुकान बंद होने के बाद पुलिस वालों को लॉ एंड आर्डर में पसीना निकल जाता है। हालांकि, भारी विरोध के बाद बैकफुट पर आते हुए अफसरों ने फैसला बदला। मगर दुकानें खुली रहती तो इस होली को खून-खराबे के नाम पर याद किया जाता। क्योंकि, दुकानें बंद होने और पुलिस की तगड़ी चौकसी के बाद रायपुर जिले में शराब के नशे में 4 हत्याएं हो गई। जाहिर है, अफसरों को सिर्फ टारगेट के पीछे नहीं भागना चाहिए। आदेश वापिस लेने से सिस्टम पर भी सवाल खड़े हुए, जो कि सिर्फ अफसरों की वजह से हुआ।

सफलता का क्रेडिट

बस्तर में लाल आतंक के खात्मे का 90 फीसदी क्रेडिट केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को जाता है। उन्होंने जो कहा, उसे करके दिखाया। मगर बचे 10 परसेंट क्रेडिट सूबे में किसे मिलना चाहिए, इस पर असमंजस की स्थिति है। सिस्टम में बैठे अफसर और पुलिस मुख्यालय का यह दायित्व है कि क्रेडिट किसे दिलाया जाए। इसके लिए अहम पदों पर बैठे सरकार के रणनीतिकारों को फ्रंट पर आकर खेलना होगा। सरकार के दो साल पूरे होने के बाद भी अफसर अगर डिफेंसिव रहेंगे तो फिर औरा कायम नहीं हो पाएगा।

गुस्से में CM, और पब्लिक!

मीडिया में खबर है...छत्तीसगढ़ में सड़कों की दुर्दशा पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय पीडब्ल्यूडी के अफसरों पर बरस पड़े। अब बंद कमरे में क्या-क्या हुआ, इस बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं। मगर ये बात सही है कि सूबे की सड़कों की जर्जर स्थिति से पब्लिक भी खुश नहीं। भर्राशाही का आलम ये है कि सीएम के गृह जिलों की सड़कों पर पीडब्ल्यूडी का कोई ध्यान नहीं। मीटिंग में अफसरों की वर्किंग से सीएम काफी दुखी हुए। पीडब्ल्यूडी की मंथर गति के कई उदाहरण राजधानी रायपुर में भी है। कचना रेल ओवर ब्रिज का घिसट-घिसट कर चल रहे काम से दो लाख से ऊपर लोग तीन साल से त्रस्त हैं। मगर अफसरों की संवेदनशीलता हिलने-डुलने का नाम नहीं ले रही। सवाल उठता है बबूल के पौधे लगाने पर आम कैसे मिलेंगे। पिछली सरकार में जिस अफसर को लोगों का आक्रोश बढ़ने पर सस्पेंड किया गया, इस सरकार ने लाल जाजम बिछा न उसका स्वागत किया बल्कि विभाग का प्रमुख भी बना दिया। पता नहीं, उस अफसर में कौन सी वो खासियत कि पिछली सरकार के भी वे प्रिय रहे और अब इस सरकार के भी। जाहिर है, पिछली सरकार ने चुनाव से कुछ समय पहले दिखावे के लिए सस्पेंड किया था। कांग्रेस सरकार का काम न दिखने का एक बड़ा कारण सड़कों का खास्ता हाल भी रहा। लोगों ने सरकार को विदा कर दिया। बहरहाल, अगले चुनाव में सड़क और लॉ एंड आर्डर बड़ा मुद्दा बनने वाला है। लोगों ने बीजेपी को इसलिए वोट दिया कि इस सरकार में कम-से-कम सड़कों की दशा सुधर जाएगी। मगर आधा कार्यकाल खत्म होने वाला है, मुख्यमंत्री और पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर के जिले में आप जाएंगे तो माथा पकड़ लेंगे। ऐसे में, मुख्यमंत्री को भला गुस्सा क्यों नहीं आएगा। अब बात पब्लिक की...तो वह पांच साल में एक बार गुस्सा दिखाती है।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. एक मिनिस्टर का नाम बताइये...बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पेनल में नाम आने के बाद उनका कांफिडेंस काफी बढ़ गया है?

2. लक्ष्मी वर्मा के राज्यसभा सदस्य बनने से राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा खुश होंगे दुखी?

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

hhattisgarh Tarkash 2026: ऐसे अफसर, खेत कौन बचाए?



 तरकश, 1 मार्च 2026

संजय के. दीक्षित

भक्षक बने अफसर, खेत कौन बचाए?

सक्ती शहर का यह मामला सोचने पर विवश करेगा कि आदिवासी राज्य में आदिवासियों की जमीनों के साथ एडमिनिस्ट्रेशन में बैठे अधिकारियों द्वारा कैसा खेला किया जा रहा है। बात सक्ती कलेक्ट्रेट के ठीक सामने प्राइम लोकेशन की जमीन की है। 70 के दशक में एक आदिवासी को जीवन यापन के लिए डेढ़ एकड़ का जमीन मिली थी। 50 साल पहले उस जमीन की कोई मोल नहीं थी मगर समय के साथ वह सोने से भी कीमती हो गई। कुछ भूमाफियाओं की इस जमीन पर नजर लगी और 15 करोड़ की जमीन 15 लाख में खरीद ली। जमीन की रजिस्ट्री के बाद नामंतरण के लिए तहसीलदार के पास केस गया तो उसने आदिवासी जमीन का नामंतरण करने से इंकार कर दिया। इसके बाद एसडीएम के पास अपील हुई। और एसडीएम ने गुपचुप ढंग से धनाढ्यों के नाम पर आदिवासी जमीन को सौंप दिया। दरअसल, गांधीजी की फोटो में बड़ी ताकत होती है। एसडीएम ने हास्यपद तरीके से उसे गैर-आदिवासी लिख अनुमति की आवश्यकता को गैर जरूरी बता दिया। आदिवासी संगठनों ने जब हंगामा किया तो कलेक्टर की नाक के नीचे बैठे एसडीएम ने केस को पुनर्विलोकन में लेकर रजिस्ट्री केंसिल कर उसे मूल पट्टेदार याने आदिवासी के नामे कर दिया। कायदे से इतनी बेशकीमती जमीन को पट्टेदार को सौंपने की बजाए उसे राजस्व विभाग के सुपूर्द करना चाहिए था। मगर ये काम भी खास रणनीति के तहत किया गया। ताकि, भूमाफियाओं के पक्ष़्ा में न्यायिक स्टे की गुंजाइश बनी रहे। जाहिर है, आदिवासियों को स्वाभिमान के साथ जीने के लिए सरकारी जमीनें दी जाती हैं। अगर वो बेच रहा...वो भी बिना कलेक्टर की अनुमति के तो उसे राजसात करना चाहिए। मगर पता चला है, 15 करोड़ की जमीन 15 लाख में खरीदने के लिए एडमिनिस्ट्रेशन के एक अधिकारी को 50 और दूसरे को 10 पेटी दिया गया। ऐसे में, सवाल उठता है...बाड़ ही जब खेत खाने लगे तो उसकी रखवाली कौन करेगा?

कलेक्टर की भूमिका कटघरे में

सक्ती कलेक्टर का एक कारनामा इसी तरकश में पिछले साल प्रकाशित हुआ था। कलेक्टर ने आदिवासी जमीन के केस में रजिस्ट्रार को लिखित में दे दिया था, इसमें अनुमति की आवश्यकता नहीं है। इसी आधार पर रजिस्ट्रार ने आदिवासी जमीन की रजिस्ट्री कारोबारियों के नाम कर दी। मगर जब हड़कंप मचा तो उन्होंने उल्टे रजिस्ट्री अधिकारी को दोषी बताते हुए कमिश्नर को लिखित अनुशंसा कर सस्पेंड करा दिया। इस केस को तरकश में प्रमुखत से एक्सपोज किया गया। उसके बाद रजिस्ट्रार संघ ने हड़ताल पर जाने की धमकी दी तो बिलासपुर कमिश्नर ने आनन-फानन में सक्ती के रजिस्ट्री अधिकारी का निलंबन समाप्त किया। इसके बाद जाकर आदिवासी जमीन हलाल होने से बची।

खिलाड़ी कलेक्टर

आदिवासी जमीन के मामले में छत्तीसगढ़ में अजब-गजब खेल हो रहे। हाल ही में अंबिकापुर में सौ से अधिक राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले पंडो आदिवासियों की जमीन पर खास समुदाय के लोगों द्वारा कब्जा कर घर बनाने का मामला सामने आया है। यही नहीं, बस्तर समेत कई जिलों में आदिवासियों की जमीनों को हड़पा जा रहा। इस खेल का ट्विस्ट यह है कि अब तरीका बदल गया है। कलेक्टर से अनुमति के चक्कर में पड़ने की बजाए आदिवासियों की जमीनों को लीज पर लेकर पेट्रोल पंच, होटल समेत व्यवसायिक संस्थानों का निर्माण किया जा रहा है। वैसे, सरकार अगर पिछले पांच साल की आदिवासी जमीनों की जांच करवा दें तो दर्जन भर से अधिक कलेक्टर-पूर्व कलेक्टर सलाखों के पीछे जाएंगे। हालांकि, इतने अधिकारियों को जेल तो भेजा नहीं जा सकता। मगर सिस्टम को कम-से-कम जांच तो करा ही लेना चाहिए...पता चल सके कौन कलेक्टर, कितना बड़ा खिलाड़ी निकला।

सौम्य सीएम, बदले तेवर

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बेहद विनम्र और सौम्य राजनेता माने जाते हैं। दो साल के टेन्योर में कभी उन्हें गुस्से या तमतमाते हुए नहीं देखा गया। मगर विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए सीएम के भाषण में जो तल्खी दिखी, उससे पक्ष-विपक्ष के विधायक आवाक थे। मुख्यमंत्री ने पिछली कांग्रेस सरकार पर हमला बोलते हुए 'भ्रष्टाचार स्पेशलिस्ट सरकार' करार दिया। जाहिर है, हर पीएम, सीएम के भाषण का स्क्रिप्ट कोई-न-कोई तैयार करता है। क्योंकि, मुख्यमंत्रियों के पास इतना टाईम नहीं होता। हालांकि, सीएम सचिवालय के अधिकारी सीएम से स्क्रिप्ट अनुमोदित कराके ही फायनल करते हैं। बहरहाल, विधानसभा की स्पीच के बाद उसकी चर्चा काफी है, क्योंकि था वह काफी पिन प्वाइंटेड।

विजय-भावना, दूरियां-नजदीकियां

विधानसभा में कई बार दिलचस्प प्रसंग, हास-परिहास देखने को मिलते हैं, तो तंज और तीर भी चलते हैं। ऐसा ही कुछ पिछले हफ्ते प्रश्नकाल में हुआ, जब विधायक भावना बोहरा ने पंचायत मंत्री विजय शर्मा से अपने विधानसभा पंडरिया इलाके की सड़कों के बारे में पूछा। इस पर एक्स सीएम भूपेश बघेल ने मुस्कुराते हुए तंज कस दिया...क्या बात है? अगल-बगल के आपलोग विधायक और मंत्री। फिर सदन में सवाल करना पड़ रहा है। क्या दुरियां काफी बढ़ गई है? इस पर मंत्री विजय शर्मा और भावना, दोनों ने अपनी तरफ से सफाई दी। मगर दोनों के बीच सियासी अदावत किसी से छिपी भी नहीं है। इसलिए सदन में इस पर जमकर ठहाके लगे।

गरीबों की कौन सुने?

पिछले कई विधानसभा सत्रों के प्रश्नकाल में यह सवाल आता है कि रायपुर के सरकारी आंबेडकर अस्पताल में पैट स्कैन मशीन को डिब्बे से बाहर क्यों नहीं निकाला जा रहा और मंत्री का रटा-सा जवाब आता है...खरीदी में कुछ झोल थी, उसकी जांच चल रही है। सवाल है क्या पेट स्कैन मशीन का उपयोग और खरीदी की जांच एक साथ नहीं की जा सकती? और फिर प्रश्न यह भी कि जांच कितने साल तक चलेगी? पेट स्कैन मशीन 20 करोड़ से उपर की आती है। और इसी जांच के बाद कैंसर की पुष्टि होती है। प्रायवेट अस्पताल वाले इस जांच का 20 से 25 हजार रुपए चार्ज करते हैं। जानना यह भी जरूरी है कि कैंसर अब साधन संपन्न वर्ग की बीमारी नहीं रही। रायपुर के कैंसर अस्पतालों में जाकर देखा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में कैसे-कैसे लोग इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। राजधानी रायपुर में सिर्फ कैंसर के तीन अस्पताल खुल गए हैं। इसके अलावे चार-पांच बड़े अस्पतालों में भी कैंसर यूनिट है। छत्तीसगढ़ के हेल्थ सिकेट्री को देश का सबसे अमीर आईएएस कहा जाता है। उन्हें मानवीय आधार पर आंबेडकर अस्पताल के पेट स्कैन मशीन को बक्से से बाहर निकाल उसका उपयोग शुरू कराना चाहिए। वरना, छत्तीसगढ़ के गरीबों की जेबें कटती रहेंगी।

हाई प्रोफाइल सेक्स स्कैंडल!

खैरागढ़ के पूर्व विधायक के खिलाफ उन्हीं की पार्टी की नेत्री की दुष्कर्म की शिकायत के बाद पुलिस ने मुकदमा कायम कर लिया है। चूकि मामला काफी हाई प्रोफाइल है, इसलिए राजनांदगांव के आईजी ने स्कैंडल की जांच के लिए पुलिस अधिकारियों की पांच सदस्यीय कमेटी गठित कर दी है। महिला नेत्री की शिकायत की अगर दूध-का-दूध और पानी-की-पानी की तरह जांच हो जाए तो एक राजनीतिक पार्टी को काफी दिक्कतें हो जाएंगी। 2028 के विधानसभा चुनाव में उतारने के लिए कोई प्रत्याशी नहीं मिलेगा। क्योंकि, खैरागढ़ के जितने भी टॉप के नेता हैं, सबने बहती गंगा में डूबकी लगाई है। यद्यपि, मामला राजी-खुशी, सहमति जैसा रहा मगर मालूम ही है, सहमति के बाद जब असहमति के स्वर उभरते हैं, तो फिर कयामत आ जाती है...वैसा ही कुछ इन दिनों खैरागढ़ में आया हुआ है।

ऐसे पावरफुल अफसर

छत्तीसगढ़ में शुक्रवार को एक डिप्टी कलेक्टर का गजबे ट्रांसफर हुआ। आमतौर पर सिंगल आर्डर निकलता नहीं। मगर न केवल सिंगल ट्रांसफर हुआ, बल्कि आदेश में लिखा गया...आदेश की डेट 27 फरवरी को अपरान्ह से बीजापुर से एकपक्षीय कार्यमुक्त किया जाता है। याने ट्रांसफर के साथ रिलिविंग। छत्तीसगढ़ में इससे पहले शायद ही ऐसा हुआ होगा, तबादले के साथ कार्यमुक्ति भी। ऐसा इसलिए किया गया कि बस्तर में नियम है कि बिना किसी नए अधिकारी के आए रिलिविंग नहीं होती। अब अधिकारी की ताकत का अंदाजा लगा सकते हैं, जो जीएडी से सिंगल आर्डर ही नहीं...रिलिविंग भी लिखवा लिया। कमाल तो ये कि डिप्टी कलेक्टर का बिलासपुर ट्रांसफर किया गया है, उसी बिलासपुर में उन्होंने कहर ढा डाला था। उनके कार्यकाल में जमीनों के ऐसे-ऐसे नायाब खेल हुए कि वहां हाहाकार मच गया था। गंभीर शिकायतों के बाद एसीबी का उनके यहां छापा पड़ा। और रिपोर्ट के अनुसार उनके यहां बेहिसाब अनुपातहीन संपत्तियां मिली। मगर बलिहारी गुरू उस पॉलिटिशियन की...जिन्होंने ऐसे हरफनमौला अफसर की फिर से बिलासपुर पोस्टिंग के लिए रिकमंड किया। कायदे से बिलासपुर के लोगों को उस नेताजी का शाल-श्रीफल से सम्मान करना चाहिए।

ब्यूरोक्रेसी के लिए अच्छी खबर

आईएएस के 94 बैच में निधि छिब्बर सीनियर थीं। मगर सरकार ने उनके पति को मनीला से बुलाकर राज्य की ब्यूरोक्रेसी की कमान सौंपी। मगर प्रभाव के मामले में अब निधि छिब्बर पति विकास शील से आगे निकल गई हैं। भारत सरकार ने निधि को नीति आयोग का सीईओ का चार्ज दिया है। पावर की दृष्टि से निश्चित तौर से मुख्य सचिव का ओहदा बड़ा होता है। अगर दोनों में से किसी को चुनने कहा जाए तो निश्चित तौर पर सीएस का पद ही चुनेगा। मगर जब तक निधि इस कुर्सी पर हैं...नेशनल लेवल पर एक्सपोजर और प्रोटोकॉल में उपर रहेंगी। हालांकि, इन सबसे अलग छत्तीसगढ़ ब्यूरोक्रेसी के लिए महत्वपूर्ण यह कि लगातार यह दूसरा मौका होगा, जब छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस अधिकारी को नीति आयोग की जिम्मेदारी मिली है। इससे पहले बीवीआर सुब्रमणियम नीति आयोग के सीईओ रहे और अब निधि छिब्बर।

कलेक्टरों की वैकेंसी?

ये पहला मौका होगा, जब कलेक्टरों के लिए बड़े जिलों में कोई वैकेंसी नहीं है। बिलासपुर, कोरबा, रायगढ़, दुर्ग, राजनांदगांव, दंतेवाड़ा, जगदलपुर, अंबिकापुर... इन सभी जिलों में नए कलेक्टर हैं...मुश्किल से ये दो महीने से लेकर 10 महीने वाले हैं। अब इतनी जल्दी कलेक्टर बदलते नहीं। अंदेशा है, मई में कुछ बड़ा हो। दीपक सोनी के सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने की वजह से सरकार ने बलौदा बाजार में नए कलेक्टर की पोस्टिंग करने आईएएस अधिकारियों की एक लिस्ट निकाली है। मगर बड़ी लिस्ट सुशासन तिहार के बाद मई एंड तक आएगी। तब तक कुछ कलेक्टरों का कार्यकाल साल-डेढ़ साल क्रॉस कर जाएगा।

आईएएस को रिवार्ड?

बलौदा बाजार जिले का ग्रह-नक्षत्र कुछ ऐसा खराब चल रहा था कि जिले में सुनील जैन के बाद कोई कलेक्टर साल पूरा नहीं कर पाया। 10 जून की हिंसा के बाद चार महीने में ही कलेक्टर केएल चौहान सस्पेंड होकर पेवेलियन लौट गए थे। कलेक्ट्रेट में आगजनी और हिंसा में जिले का नाम खराब हुआ सो अलग। कलेक्टर चौहान को निलंबित करने के बाद राज्य सरकार ने विपरीत परिस्थितियों में रायपुर से आईएएस दीपक सोनी को बलौदा बाजार संभालने के लिए भेजा और वे सरकार की उम्मीदों पर खरे ही नहीं उतरे बल्कि पौने दो साल पूरा कर भी किया। हालांकि, उन्हें इस बात का मलाल रहेगा कि बलौदा बाजार की स्थिति को संभालने का उन्हें रिवार्ड नहीं मिला। दीपक सूरजपुर, दंतेवाड़ा, कोंडागांव के बाद बलौदा बाजार में रहे। याने उन्हें कोई बड़ा मैदानी जिला करने का मौका नहीं मिला। जबकि, बलौदा बाजार के नाम से घबराने वाले कई आईएएस अधिकारियों को बड़े जिले मिल गए।

विधायक को खुशखबरी

बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला के लिए छत्तीसगढ़ का 25वां बजट हमेशा के लिए यादगार बन गया। 24 फरवरी को ओपी चौधरी विधानसभा में बजट पेश कर रहे थे और उधर सुशांत को बिलासपुर से खबर आई...घर में नया मेहमान आया है। बजट खतम होते बिलासपुर भागे। याने ओपी का बजट सुशांत के लिए सुखद रहा। उनके सियासी वारिस का आगमन हुआ।

होली खराब?

छत्तीसगढ़ की सियासत के लिए अगला हफ्ता काफी महत्वपूर्ण रहने वाला है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियों से राज्यसभा के लिए एक-एक नेता का चुनाव करना है। उधर, होली में अब तीन दिन बच गए हैं, दोनों पार्टियों ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। हालांकि, दो और तीन मार्च को भी नामंकन के लिए विधानसभा खुला रहेगा। मगर पुराने दृष्टांतो से लगता नहीं कि लास्ट डेट से पहले नामंकन जमा हो पाएगा। खासकर, कांग्रेस में लास्ट मोमेंट में ही तय होता है। ऐसे में, विधायकों को डर सता रहा कि अगर 5 मार्च को नामंकन दाखिल हुआ तो उन्हें होली छोड़ रायपुर आना पड़ेगा।

रायपुर, साहित्य और पहचान

बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने कहा कि रायपुर साहित्या उत्सव की सफलता को देखते सरकार ने तय किया है कि अब हर साल साहित्य उत्सव आयोजित किए जाएंगे। जाहिर है, पिछले महीने नवा रायपुर में आयोजित साहित्य उत्सव बेहद सफल रहा था। आयोजन इतना कसा हुआ था कि लोग तीन दिनों तक वहां डटे रहे। अब हर साल इस आयोजन से साहित्य के मामले में जयपुर जैसी पहचान रायपुर की भी बनेगी।       

अंत में दो सवाल आपसे?

1. छत्तीसगढ़ के एक ऐसे राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी का नाम बताइये, जिनके रुतबे से उनके हाई प्रोफाइल सिकेट्री भी घबराते हैं?

2. ग्लैमरस ड्रग पैडलर नव्या मलिक में आखिर ऐसा क्या है, जिससे पक्ष-विपक्ष दोनों असहज महसूस कर रहा है?

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

Chhattisgarh Tarkash 2025: छत्तीसगढ़ में उपचुनाव

 

तरकश, 15 फरवरी 2026

संजय के. दीक्षित

छत्तीसगढ़ में उपचुनाव-1

चुनाव आयोग ने राज्यसभा की 37 सीटों के लिए चुनाव का ऐलान किया है, उनमें छत्तीसगढ़ की दो सीटें भी शामिल हैं। छत्तीसगढ़ के कांग्रेस कोटे से राज्यसभा में गए केटीएस तुलसी और फूलोदेवी नेताम की सीटें अप्रैल में खाली हो रही हैं। चूकि विधानसभा में बीजेपी के अब 54 विधायक हैं, इसलिए इस बार पार्टी को एक सीट मिलना निश्चित है। बची एक सीट कांग्रेस की झोली में जाएगी। कांग्रेस से अबकी नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत की दावेदारी की बड़ी चर्चा है। महंत विधानसभा से लेकर लोकसभा के लिए कई-कई बार चुने जा चुके हैं। कई मौकों पर उन्होंने राज्यसभा में जाने की इच्छा प्रगट भी की है। वैसे भी महंत जी किस्मत के बड़े धनी हैं...पद उनके पास खुद से चलकर आते हैं। इसलिए, इसमें कोई अचरज की बात नहीं कि पाटीं कहीं उनकी अधूरी इच्छा इस बार पूरी न कर दें। महंतजी अभी 73 के हैं, राज्यसभा में जाने के बाद लगभग 80 साल तक दिल्ली में रहने का सम्मानजनक इंतजाम हो जाएगा। वैसे हर बड़े राजनीतिज्ञों की तरह महंतजी का भी अपना एक सपना है...उनके ठीकठाक रहते सियासत में उनके सूरज का उदय हो जाए। और इसके लिए राज्यसभा चुनाव से बढ़ियां मौका क्या हो सकता है...जांजगीर, सक्ती में इस समय सारे विधायक कांग्रेस के हैं...फिर बात बेटे की, तो महंतजी की पकड़ सभी पार्टियों में है...बेटे की नैया पार करा ही लेंगे। अगर ऐसा हुआ तो आजादी के बाद देश की सियासत में एक नया रिकार्ड बनेगा। एक परिवार के पति राज्यसभा, पत्नी लोकसभा और बेटा विधानसभा में।

छत्तीसगढ़ में उपचुनाव-2

राज्यसभा के लिए टीएस सिंहदेव भी कांग्रेस से स्वाभाविक दावेदार होंगे। गांधी परिवार से नजदीकियों के बाद भी उनकी किस्मत बार-बार दगा दे जा रही। न वे मुख्यमंत्री बन पाए और न ही उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनने दिया जा रहा। दूसरा, अगर पीसीसी चीफ बदलना होगा तो राज्यसभा के लिए दीपक बैज की दावेदारी प्रबल हो जाएगी। तीसरा नाम भूपेश बघेल का है। वैसे, भूपेश का चांस कम प्रतीत होता है। भूपेश जननेता हैं...कांग्रेस पंजाब से लेकर असम तक उनका उपयोग कर रही है। मगर राजनीत में कब, क्या हो जाए कौन जानता है। भूपेश अगर राज्यसभा गए तो फिर पाटन से उनके बेटे चैतन्य की विधायकी तय हो जाएगी। याने पाटन में उपचुनाव होगा।

बीजेपी और सरप्राइज

राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस से चरणदास महंत की दावेदारी हो या फिर फूलोदेवी नेताम को रिपीट करने की...कम-से-कम अटकलें तो लगाने की गुजाइश है। सत्ताधारी पार्टी की बात जुदा है। बीजेपी में आजकल इस कदर चौंकाने वाले फैसले हो रहे कि बड़े-से-बड़े लीडरों को कुछ पता नहीं होता। पिछली बार का राज्यसभा का वाकया याद ही होगा। बीजेपी के लोगों को नहीं पता था कि देवेंद्र प्रताप सिंह हैं कौन? उनका नाम इतना अनजान था कि सोशल मीडिया में यूपी के देवेंद्रप्रताप की फोटो लगाकर लोग भाजपा का लगे टारगेट करने...कांग्रेस की तरह बीजेपी ने भी आयातित नेता को राज्यसभा भेज दिया। बीजेपी की लिस्ट आने के करीब आधे घंटे बाद जाकर क्लियर हो पाया कि देवेंद्र प्रताप सिंह रायगढ़ के रहने वाले हैं। इस बार भी राज्यसभा चुनाव में कुछ वैसा ही होगा। हां, इतना जरूर है कि प्रदेश की सियासत में ओबीसी और आदिवासी का कोटा फुल है। आदिवासी मुख्यमंत्री हैं, तो ओबीसी से डिप्टी सीएम समेत सात मिनिस्टर। लिहाजा, अनुसूचित जाति या सामान्य वर्ग से गुंजाइश बन सकती है।

बाहरी प्रत्याशी

छत्तीसगढ़ बनने के बाद अप्रैल 2002 में राज्यसभा की दो सीटों के लिए पहला चुनाव हुआ था। उसमें कांग्रेस से मोतीलाल वोरा और रामाधार कश्यप चुने गए थे। उसके बाद अभी तक 22 राज्यसभा सदस्यों के चुनाव हुए हैं। इसमें बीजेपी ने हमेशा लोकल को मौका दिया, कांग्रेस ने पांच बार बाहरी प्रत्याशियों को राज्यसभा में भेजा। सबसे पहले जून 2004 में मोहसिना किदवई छत्तीसगढ़ से निर्वाचित हुई। जून 2020 में उन्हें फिर रिपीट किया गया। उसके बाद 2018 से 2023 के बीच सबसे अधिक तीन बाहरी उम्मीदवारों को कांग्रेस ने राज्यसभा में भेजा। केटीएस तुलसी, राजीव शुक्ला और रंजीता रंजन। मोतीलाल वोरा चूकि कद्दावर नेता रहे इसलिए वे 18 साल तक एक कोटा अपने पास रखा। वरना, और दो-एक बाहरी प्रत्याशी कांग्रेस से राज्यसभा में पहुंच गए होते। हालांकि, लोकल बॉडी की अनिच्छा के बाद भी एक सरकार में तीन-तीन बाहरी लोगों को राज्यसभा में भेजकर कांग्रेस अंजाम भुगत चुकी है, इसलिए इस बार कांग्रेस के लोगां को डरने की जरूरत नहीं है।

नेता प्रतिपक्ष चेंज?

कांग्रेस पार्टी ने चरणदास महंत के राजनीतिक कद और संसदीय अनुभवों को देखते भले ही नेता प्रतिपक्ष बना दिया मगर उनका स्वभाव नेता प्रतिपक्ष वाला नहीं है। यही वजह है कि पार्टी सदन में जैसी आक्रमकता चाहती है, वैसा कुछ हो नहीं रहा। अलबत्ता, एकाधिक बार नेता प्रतिपक्ष सरकार की भी सराहना कर चुके हैं। महंतजी राज्यसभा में जाएं या नहीं, कांग्रेस पार्टी नेता प्रतिपक्ष को लेकर संवेदनशील है। अगर नया नेता चुनने का अवसर आया तो जाहिर तौर पर दो नाम केंद्र में होंगे। उमेश पटेल और देवेंद्र यादव। भूपेश बघेल का नाम बड़ा जरूर है मगर पार्टी उनका उपयोग दूसरों प्रदेशों में कर रही है। देवेंद्र तेज-तर्रार विधायक होने के साथ सतनामी समुदाय के मसले पर जेल जाकर अपना कद बढ़ा चुके हैं तो उमेश पटेल के साथ नंदकुमार पटेल का नाम जुड़ा है। विधानसभा में इस समय उमेश बढ़ियां परफार्म कर रहे हैं। भविष्य में अगर नेता प्रतिपक्ष चुनने का समय आया तो बहुत संभावना है कि उसके लिए ये दो नेता ही तगड़े दावेदार होंगे।

पूत के पांव पालने में

छत्तीसगढ़ का दुर्भाग्य कहें या एसडीएम का? शायद ही किसी स्टेट में ऐसा हुआ होगा, जब कोई सब डिवीजन मजिस्ट्रेट दो बार जेल गया हो। मगर छत्तीसगढ़ में ऐसा हुआ, जब सात साल की सर्विस में अफसर को दो बार जेल जाना पड़ा और दो बार सस्पेंड। राप्रसे अधिकारी करुण डहरिया को गरियाबंद में 20 हजार रिश्वत लेते एसीबी ने ट्रेप किया था। वे तीन महीने जेल में रहकर छूटे और फिर जैसा कि देश के सिस्टम में होता है, निलंबन से बहाल होकर फिर से एसडीएम बन गए। पूत के पांव जब पालने में दिख गया था, तब तो बलरामपुर कलेक्टर रिमजिएस एक्का को उन्हें एसडीएम नहीं बनाना था। मगर पिछले दो साल से वे कुसमी सब डिवीजन के प्रमुख बने बैठे थे। और ग्रामीणों से मारपीट और मौत केस में उन्हें जेल जाना पड़ गया।

कमाऊ पूत

कलेक्टर पहले काबिल डिप्टी कलेक्टरों को एसडीएम बनाते थे। मगर अब एसडीएम बनाने के पैरामीटर बदल गए हैं। मैदानी इलाकों में 25 परसेंट तक काबिलियत चल जाता है, बस्तर, सरगुजा में हंड्रेड परसेंट कमाऊ पूत चाहिए। जो एसडीएम ज्यादा पैसा लाकर देगा, कलेक्टर के वे उतने ही करीबी और चेहेते होते हैं। कलेक्टरों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह डिप्टी कलेक्टर किन-किन धतकरमों में लिप्त है या लिप्त रहा है। कलेक्टर हों या नेता-मंत्री सभी को आखिर कमाऊ पूत ही तो चाहिए।

बड़ा सवाल

बलरामपुर के एसडीएम कांड से सवाल उठता है, क्या रिश्वत लेते पकड़े गए अधिकारियों, कर्मचारियों को फिर से महत्वपूर्ण पोस्टिंग दी जानी चाहिए? छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में सरकारी मुलाजिम ऐसे हैं, जो रिश्वत लेते जेल की हवा खाकर लौटने के बाद फिर से मलाईदार कुर्सी पर बैठे हैं। जीरो टॉलरेंस पर काम कर रही सरकार को ऐसे मुलाजिमों की एक लिस्ट बनानी चाहिए, ताकि उन्हें अहम पदस्थापनाओं से अलग रखा जा सकें। क्योंकि, ऐसे अफसरों के साथ इन बिल्ट प्राब्लम रहता है...आगे चलकर फिर सरकार की साख को डेंट करते हैं।

बस्तर हनीमून डेस्टिनेशन

80 की दशक में जैसा बस्तर था...अफसरों के लिए वैसा ही...हनीमून डेस्टिनेशन जैसा बनता जा रहा है। माओवादियों के चलते पहले तो जान सांसत में पड़ी होती थी, न जाने किस पल क्या हो जाएगा? अधिकारी बस्तर से मीटिंग में रायपुर आने से डरते थे। बहुत आवश्यक हुआ तो देर रात प्रायवेट गाड़ी में बिना गनमैन के, हनुमान चालीसा पढ़ते हुए निकलते थे। कोशिश रहती थी, सुबह के पहले-पहले कम-से-कम कांकेर क्रॉस कर जाएं। मगर अमित शाह ने बस्तर की रौनक फिर से लौटा दी है। सरकार भी युवा अधिकारियों पर इनायत बरत रही है। न्यू कपल को अगल-बगल के जिलों में पोस्टिंग दी जा रही। इससे हो ये रहा कि वीकेंड में कई-कई जिला मुख्यालय खाली हो जा रहे। न्यू कपल हैं तो दोनों करना चाहिए। काम भी खूब और इंजॉय भी।

चना-मूर्रा जैसे आईएएस

एक तो दिग्विजय सिंह ने छंटे हुए अफसरों को छत्तीसगढ़ भेज दिया। उपर से रही-सही कसर पीएससी ने पूरी कर दी। हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने पीएससी परीक्षा निरस्त कर दी थी मगर सरकार ने उदारता बरतने में कोई कमी नहीं की...सबके सब आईएएस बन गए। पिछले साल भी दर्जन भर अधिकारियों में से एकाध ही आईएएस बनने लायक रहे होंगे, और इस बार सात में भी कमोवेश वही हाल रहा। छत्तीसगढ़ में अब हालात ऐसे बनते जा रहे कि लोग दिग्विजय सिंह को कोसना बंद कर देंगे। इस समय मुआवजा घोटालों से लेकर अनेक कर्मकांडों में डिप्टी कलेक्टर दागदार हो रहे...जेल जा रहे, देखिएगा कुछ सालों बाद ये सबके सब भारतीय प्रशासनिक सेवा का तमगा लगाकर घूमेंगे। क्योंकि, 50 खोखा कमा लिया तो उसमें से पांच-सात खोखा फेंकने में उनके घर से क्या जाएगा? फंडा यह है कि जमकर कमाओ, जमकर खर्च करो और फिर आईएएस बन जाओ। बाकी आम पब्लिक छत्तीसगढ़ियां, सबले बढ़ियां...पर ताली बजाता रहे।

संगठन मंत्री का प्रमोशन!

छत्तीसगढ़ के संगठन मंत्री पवन साय के प्रमोशन की इन दिनों बड़ी चर्चा है। वैसे भी पिछले तीन महीने से छत्तीसगढ़ से लगभग वे बाहर ही हैं। बीजेपी ने उन्हें पश्चिम बंगाल के मोर्चे पर लगा रखा है। जाहिर है, पवन साय ने छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान काफी काम किया था। पार्टी अब उन्हें इसका ईनाम देना चाहती है। पवन साय को क्षेत्रीय संगठन मंत्री बनाया जा सकता है। क्षेत्रीय संगठन मंत्री बनने का मतलब होगा, वे एकाधिक राज्यों के प्रभारी होंगे। पवन साय के प्रमोशन से उनके समर्थक क्या सोच रहे हैं, ये तो नहीं मालूम। मगर ये जरूर पता है कि पार्टी में जल्द कुछ अहम बदलाव होंगे। जाहिर है, प्रमोशन होने पर पवन की जगह कोई नया आदमी संगठन प्रभारी बनकर आएगा। फिर नितिन नबीन की जगह प्रदेश प्रभारी की भी नियुक्ति होगी।

ओपी के पिटारे से क्या?

जिस राज्य में बजट का 40 परसेंट हिस्सा कर्मचारियों, अधिकारियों के वेतन और 35 परसेंट फ्रीब्रीज में निकल जा रहा हो, वहां के बजट से कोई चमत्कारित उम्मीद कैसे रखी जा सकती है। छत्तीसगढ़ के खजाने की यह स्थिति है कि कोई महीना ऐसा नहीं जाता, जब 15 तारीख क्रॉस करते ही वित्त विभाग के अधिकारियों की पेशानी पर बल नहीं पड़ते हों। हर महीने 2500 करोड़ वेतन और करीब 800 करोड़ महतारी वंदन याने 3200 करोड़ चाहिए-ही-चाहिए। फिर भी, ओपी पढ़े-लिखे मिनिस्टर हैं, किल्लतों के बावजूद कुछ हटके करने का प्रयास करेंगे ही। अंदेशा है कि इस बार बजट में शहरी क्षेत्रों के डेवलपमेंट के लिए ठीकठाक राशि का प्रावधान किया जाएगा। खासकर, बिलासपुर और रायपुर को संवारने पर। युवाओं और रोजगार से जुड़ी कुछ अहम घोषणाओं की भी उम्मीदें हैं।

नेताओं की आंखों में धूल

छत्तीसगढ़ के ह्यूमन रिसोर्स को मजबूत करने सरकार कई मोर्चो पर काम कर रही है। एजुकेशन में नित नए प्रयोग और नवाचार किए जा रहे हैं। मगर यह भी सनद रहे कि रिजल्ट को लेकर अफसरशाही नेताओं की आंखों में धूल झोंकने का भी काम करती है। खासकर, स्कूल शिक्षा में। नकल के नाम पर यूपी-बिहार बदनाम थे। वहां अब स्थिति बदल गई है। और छत्तीसगढ़ में? स्कूल शिक्षा में छत्तीसगढ़ पिछले 25 सालों से देश में नीचे से तीसरे स्थान से उपर नहीं आ पाया। बता दें, कुछ बरसों पहले दो कलेक्टरों के बारे में पुख्ता जानकारी मिली थी कि अपने जिले का नंबर बढ़ाने स्कूल वालों को कुछ भी करने के लिए कह डाला था। जाहिर है, छत्तीसगढ़ के कलेक्टरों में अभी भी श्रेय लेने की होड़ है कि उनके जिले से इतने लोग मेरिट में आए। चिंतन पर इस पर भी होनी चाहिए कि रिमोट एरिया के स्कूलों में रिजल्ट इतने बढ़ियां कैसे आ जाते हैं। और, अगर ऐसा ही रहा तो सवाल उठता है...छत्तीसगढ़ के ह्यूमन रिसोर्स का क्या होगा? इस पर मनन करना चाहिए।

बजट सत्र में ट्रांसफर

ब्यूरोक्रेसी में ऐसा परसेप्शन चला आ रहा, बजट सत्र में ट्रांसफर नहीं होते। मगर छत्तीसगढ़ में ऐसा कई बार हो चुका है। इसी सरकार ने मानसून सत्र के दौरान ट्रांसफर किया था। बहरहाल, 23 फरवरी से बजट सत्र प्रारंभ हो रहा है। और 24-25 फरवरी के आसपास बलौदा बाजार कलेक्टर दीपक सोनी सेंट्रल डेपुटेशन के लिए रिलीव होंगे। 24-25 इसलिए क्योंकि 24 को गिरौदापुरी मेला समाप्त हो जाएगा। इसके बाद सरकार उन्हें कार्यमुक्त कर देगी। सवाल उठता है, बलौदा बाजार का अगला कलेक्टर कौन होगा? कलेक्ट्रेट को जलाने जैसी घटना के बाद तो सरकार कोई रिस्क नहीं लेना चाहेगा। लिहाजा, बतौर कलेक्टर दो-एक जिला करने वाले अनुभवी आईएएस अफसर को ही बलौदा बाजार भेजा जाएगा। हो सकता है, इस चक्कर में एक छोटा चेन बन जाए।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या छत्तीसगढ़ के इस बजट में रायपुर-भिलाई में मेट्रो रेल की घोषणा हो सकती है?

2. एक मंत्री का नाम बताएं, जो कुर्सी की स्थिरता के लिए कामख्या के एक पंडित से यज्ञ करवाएं हैं?

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: अफसर, दुःसाहस और संरक्षण

 


तरकश
, 15 फरवरी 2026

संजय के. दीक्षित

अफसर, दुःसाहस और संरक्षण

जिले के एक पुलिस कप्तान द्वारा मुख्यमंत्री को पत्र लिखने का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि एक डीएफओ ने अपने विभाग के सिकेट्री को फोन पर गरिया दिया। गाली भी छोटी-मोटी नहीं...सरकार को निलंबन आदेश में लिखना पड़ा...डीएफओ ने लैंगिक गालियां दी। आश्चर्य तो यह कि सिकेट्री भी आईएफएस हैं। इसके बाद भी डीएफओ ने कोई कंजूसी नहीं की। सिकेट्री साहब को पहले विश्वास नहीं हुआ...उन्हीं के कैडर का कोई अधिकारी भला ऐसा कैसे कर सकता है...शायद रांग नंबर लग गया होगा। इसलिए उन्होंने लैंडलाइन से दोबारा फोन लगवाया, मगर फिर गालियों की बौछारें। इसके बाद फिर कुछ बचता नहीं था। बात एसीएस फॉरेस्ट ऋचा शर्मा तक पहुंची और जाहिर है, वे किसी की सुनती नहीं...इसलिए दाल गल नहीं पाई। सस्पेंशन आदेश में गालियों तक को कोट किया गया। सवाल यह है कि ऐसे उदंडता को संरक्षण दे कौन रहा है? इससे पहले डीएफओ ने बीजेपी नेताओं को ऑफिस से भगा दिया था। फिर भी पार्टी के मुखिया किरण सिंहदेव को गुस्सा नहीं आया। इसके बाद डीएफओ का हौसला इतना बढ़ गया कि अपने बॉस की ही लानत-मलानत कर दी। अनुशासनहीनता के बढ़ते केसों में कार्रवाई करने में आगे-पीछे होते सिस्टम को समझना चाहिए नेता और मंत्री नहीं, मोदी गारंटी बड़ा है और इसी मोदी गारंटी से बीजेपी सत्ता में लौटी। बहरहाल, ऐसा ही रहा तो एसपी, डीएफओ के बाद अब किसी कलेक्टर की बारी होगी। सिस्टम को कौंवा मारकर लटकाना होगा।

कांग्रेस का मजबूत गढ़!

राजधानी रायपुर से लगे गरियाबंद में शिक्षिकाओं का दामाद बाबू का स्वागत करते रील्स का मामला सामने आया तो कार्रवाई के खिलाफ बीजेपी के लोग ही खड़े हो गए। ऐसे में, स्कूल विभाग के अधिकारी कैसे पीछे रहते। शिक्षिकाओं को बचाने की एवज में 20-20 हजार वसूल डाले। कहने का आशय यह है कि रुलिंग पार्टी के लोग ही जब सिस्टम की राह में रोड़ा बनेंगे तो अफसर और निरंकुश होंगे ही। इससे सिस्टम का नुकसान हो रहा है। सत्ताधारी पार्टी के नेताओं को समझना चाहिए कि मोदी, अमित शाह और नितिन नबीन की ब्यूहरचना के चलते छत्तीसगढ़ में पांच साल में ही कमल खिल गया। वरना, ये मानने में कोई हिचकिचाहट नहीं, छत्तीसगढ़ कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है और आज भी काडर खतम नहीं हुआ है। जाहिर सी बात है कि बीजेपी के लोकल बॉडी में इतना ही दमखम होता तो 2018 में 15 सीटों पर थोड़ी ही सिमटती। कहने का मतलब यह है कि पार्टी को अपने काडर को कंट्रोल में रखने की जरूरत है। बेलगाम हो चुके कैडर से नुकसान राज्य सरकार की छबि का हो रहा। सरकार कोई महत्वपूर्ण सुधार का काम करती है मगर इस तरह की घटनाओं से साख को डेंट लगता है। सरकार ने स्कूल शिक्षा में सुधार के कई ऐतिहासिक कार्य किए थे। पहली बार स्कूलों का युक्तियुक्तकरण हुआ। मगर पीएमश्री स्कूल की शिक्षिकाएं दामाद बाबू का स्वागत करते रील्स बना रही हैं और बीजेपी के लोग उनके सामने दीवार बनकर खड़े हो जा रहे। पुलिस कप्तान को भी पार्टी के लोग बचा रहे तो डीएफओ के पीछे ढाल बनने वाले भी रुलिंग पार्टी के बड़े नेता हैं। सिस्टम को अपना औरा दिखाना चाहिए।

नया हेड ऑफ फॉरेस्ट

हेड ऑफ फॉरेस्ट श्रीनिवास राव करीब तीन महीने बाद मई में रिटायर हो जाएंगे। उनकी जगह वन विभाग का मुखिया कौन होगा, इसको लेकर महकमे में उत्सुकता बढ़ती जा रही है। सीनियरिटी के हिसाब से देखें तो पीसीसीएफ अरुण पाण्डेय श्रीनिवास के बाद दूसरे नंबर पर है। सरकार अगर पोस्टिंग में सीनियरिटी को वेटेज देगी तो अरुण की किस्मत खुल सकती है। मगर ओपी यादव को हल्के में नहीं लिया जा सकता। जाहिर है, अरुण पाण्डेय का नाम पिछले एक साल से हेड ऑफ फॉरेस्ट के लिए चल रहा है। मगर अरुण की ताजपोशी संभव नहीं हो पाई। अरुण इस समय पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ हैं। वन महकमे में हेड ऑफ फारेस्ट के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा पद है। मगर पिछले कुछ सालों से मिथक चल रहा कि वाइल्डलाइफ चीफ हेड ऑफ फॉरेस्ट नहीं बन पा रहे। ओपी यादव को हल्के में न लेने के पीछे अहम बात यह है कि वे इस समय कैम्पा के प्रमुख हैं। श्रीनिवास राव भी जब हेड ऑफ फॉरेस्ट बने, तब कैम्पा के ही हेड थे। उनके बाद अरुण का नाम कैंपा के लिए चला था मगर ऐसा होने नहीं दिया गया। बहरहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि हेड ऑफ फॉरेस्ट की नियुक्ति में सीनियरिटी को वेटेज दिया जाएगा या फिर ओपी को मौका मिलेगा।

कलेक्टरों की हाजिरी

पिछले हफ्ते मुख्य सचिव विकास शील ने कलेक्टरों की वीडियोकांफ्रेंसिंग की। इसमें वे अफसरों की टाईमिंग की चर्चा करते हुए उन 10 कलेक्टरों के नाम गिना दिए, जो सुबह 10 बजे ऑफिस पहुंच जा रहे। बाकी को उन्होंने इशारे में बता दिया...निर्देशों को हल्के में न लें, उनके स्तर पर इसे वॉच किया जा रहा है। पता चला है, मुख्य सचिव ने जिलों के बायोमेट्रिक सिस्टम का एक्सेज अपने पास रखा है। इससे उन्हें मालूम चल जाता है कौन कलेक्टर टाईम पर ऑफिस आए और कौन लेट। बताते हैं, सीएस के वीडियोकांफ्रेंसिंग के बाद अधिकांश कलेक्टरों ने अपनी टाईमिंग अब दुरूस्त कर ली है। इसकी बड़ी वजह यह है कि सीएस सार्वजनिक तौर से टोकने में गुरेज नहीं करते।

बायोमेट्रिक का फायदा

छत्तीसगढ़ में अटेंडेंस के लिए बायोमेट्रिक सिस्टम लागू करने से एक बड़ा फायदा यह हुआ कि क्लर्कियल कैडर पटरी पर आ गया। वरना, मंत्रालय का ही लें...कर्मचारी आराम से 11.30 बजे तक आते थे। चाय-वाय पीने के बाद डेढ़ बजे लांच हो जाता था। फिर शाम को तीन बजे गांव की देसी सब्जी खरीदने मंत्रालय के सामने चौपाटी पर हाजिर। सब्जी लेकर आने के बाद फिर चार बजे से घर जाने के लिए सामान समेटना शुरू। आश्चर्य की बात...ये तब हुआ जब आदेश में अवर सचिव से नीचे के मुलाजिमों को शामिल नहीं किया गया है, मगर अफसर टाईम पर पहुंच जा रहे इसलिए कर्मचारियों ने भी बिना कहें टाईम पर आना प्रारंभ कर दिया है। रही बात बड़े अधिकारियों की, तो जो फाइलें महीनों तक लटकी रहती थीं, अब लगभग डेली डिस्पोजल हो जा रहीं। इसलिए, क्योंकि पहले साहबानों के आने और जाने पर कोई बंदिशें नहीं थीं। मन पड़े तो मंत्रालय आए, नहीं तो पीए का रटा-सा जवाब....साब फलां जगह मीटिंग में गए हैं...भले ही साब घर में आराम फरमा रहे हों। लेकिन, अब अफसर सुबह सवा दस बजे तक मंत्रालय पहुंच जा रहे तो फिर बैठकर क्या करेंगे। लिहाजा, फाइलें भी तेज गति से हो रही हैं।

5000 करोड़ की बचत, मगर...

धान खरीदी में सिस्टम को कसने का फायदा यह हुआ कि अबकी 141 लाख मीट्रिक टन पर धान खरीदी रुक गई। वरना, पिछले साल 149 लाख मीट्रिक टन हुआ था और इस बार बढ़कर उसे करीब 160 लाख मीट्रिन टन पहुंचने का अंदेशा था। वैसे सरकार की योजना पहले 120 लाख मीट्रिक टन पर धान खरीदी को रोकने की रही मगर सरकार के भीतर से ही सहयोग नहीं मिला। जिम्मेदार नेता लगे बवाल काटने...ऐसा रहा तो अगला चुनाव हार जाएंगे। यही वजह है कि दो-तीन जिलों में ही राईस मिलरों पर कलेक्टर छापा मार पाए। दरअसल, सूबे के 80 परसेंट से अधिक राईस मिलें राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हैं। और इतने ताकतवर कि कई मंत्री, नेता उनके लिए दुखी हो गए थे। कुछ चूक सिस्टम के एंड से भी हुई। पता नहीं टोकन का साफ्टवेयर कैसा बनाया गया कि किसानों को टोकन के लिए काफी परेशान होना पड़ा और कुछ माहौल राईस मिल माफियाओं ने बना दिया। इस चलते प्रारंभ में कड़े तेवर दिखा रही सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा। फिर भी, कसावट से करीब 5000 करोड़ बच गया। वरना, बिचौलियों की तैयारी राज्य का खजाना साफ करने की थी।

सीएस पर जिम्मेदारी

सीजीएमएससी को ठीक करने सरकार ने दिल्ली रिटर्न आईएएस अमित कटारिया को सिकेट्री हेल्थ बनाया। सीजीएमएससी से प्रमोटी आईएएस को हटाकर डायरेक्ट आईएएस को एमडी की कमान सौंपी गई। इसके बाद भी हाई कोर्ट को मेडिकल इक्विमेंट्स खरीदी में अक्षमता को लेकर तल्ख टिप्पणी करनी पड़ रही है तो फिर समझा जा सकता है कि सीजीएमएससी किस कदर डिरेल्ड हो चुका है। सीजीएमएससी में कई सालों से अराजकता की स्थिति यह है कि पैसा होते हुए भी दवाइयां और मेडिकल इक्विमेंट नहीं खरीद पा रहा। अस्पताल वालों की मजबूरी यह है कि मेडिकल से संबंधित सारी खरीदी का अधिकार सरकार ने सीजीएमएससी को दे रखा है। सीजीएमएससी को दवाइयां और मेडिकल इक्विमेंट से ज्यादा फायदा बिल्डिंग बनाने में नजर आता है। फिर, दवा सप्लायर जेम पोर्टल में ऐसे कंडिशन डलवा देते हैं कि दूसरी कंपनियां टेंडर में हिस्सा ले नहीं सकें। हाई कोर्ट यह खेल समझ गया, तभी चीफ जस्टिस की डबल बेंच ने कहा है कि मुख्य सचिव इसे देखें। कोर्ट अगर सीएस को व्यवस्था देखने को कह रहा, इसका मतलब तो ये ही हुआ कि सीजीएमएससी का सिस्टम फेल हो चुका है। अब चीफ सिकरेट्री कोई रास्ता निकालेंगे कि सीजीएमएससी दवा खरीदने में सक क्यों नहीं पा रहा।

चौपट सिस्टम

छत्तीसगढ़ बनने के बाद स्वास्थ्य विभाग में एक से बढ़कर एक मंत्री बने और सचिव मगर सूबे में एक बढ़ियां सरकारी अस्पताल मयस्सर नहीं हो पाया। भारत सरकार के पैसे से दो सुपर स्पेशिलिटी अस्तपाल जरूर बने मगर वे अपने किस्मत पर रो रहे हैं। जगदलपुर को प्रायवेट पार्टनरशिप में दिया गया, वो अभी तक प्रारंभ नहीं हो पाया और बिलासपुर में सिर्फ ओपीडी चल रहा है। 250 करोड़ खर्च करने के बाद भी अभी मरीजों की भर्ती की सुविधा नहीं शुरू हो पाई है। सवाल उठता है, छत्तीसगढ़ सरकार से जमीन लेकर जब एम्स इतना बढ़ियां बिल्डिंग बनाकर अस्पताल का संचालन कर सकता है तो फिर राज्य के हेल्थ डिपार्टमेंट द्वारा गरीबों के लिए अदद एक ठीकठाक अस्पताल क्यों नहीं शुरू किया जा सकता? मगर इस पर किसी को सोचने का टाईम नहीं। प्रायवेट अस्पतालों में गरीब लूटते रहे, और आयुष्मान के नाम पर सरकारी खजाना लूटता रहे, कोई फर्क नहीं पड़ता। पता नहीं, एम्स को देखकर सिस्टम में बैठे लोगों को कुछ लगता क्यों नहीं? इस माईनिंग स्टेट में अगर डीएमएफ की ठीक से प्लानिंग की गई होती तो एम्स के समकक्ष रायपुर, बिलासपुर और जगदलपुर में तीन अस्पताल खुल गए होते। और नहीं, तो लखनउ जैसा रायपुर में एक पीजीआई तो खुल ही सकता है।

सीएस का वेतन, सबसे बड़ा लोचा

देश के सरकारी अस्पतालों की सेहत खराब होने में मुख्य सचिवों के वेतन का भी लोचा है। दरअसल, राज्यों की ब्यूरोक्रेसी डॉक्टरों का वेतन चीफ सिकरेट्री से अधिक होने नहीं देना चाहती। और नीट में सलेक्ट होने के बाद पांच साल एमबीबीएस, तीन साल पीजी और दो साल सुपरस्पेशिलिटी याने 10 साल दिमाग घिसने के बाद कोई स्पेशलिस्ट दो-ढाई लाख पगार में सरकारी अस्पताल में काम करने आएगा नहीं। अलबत्ता, सीएस के पद को उसकी सेलरी से नहीं तौला जा सकता। सीएस कार्यपालिका का हेड होता है। प्रोटोकॉल में मंत्री जरूर सीएस से उपर होते हैं मगर ओवरऑल पकड़ और प्रभाव में सीएस उनसे आगे होते हैं। बिना उसके दस्तखत के एक फाइल आगे नहीं सरक सकती। मुख्य सचिव कैबिनेट के पदेन सचिव होते हैं। लिहाजा, लखनउ की तर्ज पर अलग एक्ट पारित कर पीजीआई जैसा इंस्टिट्यूट तो खोला ही जा सकता है। अपने मुख्य सचिव विकास शील प्रैक्टिकल सुधार में विश्वास रखते हैं। वे छत्तीसगढ़ में हेल्थ सिकरेट्री रह चुके हैं और भारत सरकार में भी इस विभाग में सेवा दे चुके हैं। उनसे अधिक हेल्थ सिस्टम को भला कौन समझ सकता है। इस गरीब प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने उन्हें कोई रास्ता निकालना चाहिए।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. धुरंधर फिल्म की अपार सफलता क्या विपक्षी पार्टियों को अपनी रीति-नीति पर सोचने के लिए मजबूर करेगी?

2. सिस्टम में घुस चुके एक आत्मविश्वासी मंत्री का नाम बताइये, जिन्हें यकीन है कि उनकी कुर्सी को कोई खतरा नहीं?


शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

Chhattisgarh Tarkash 2025: मंत्रियों का बीपी हाई

 तरकश, 8 फरवरी 2026

संजय के. दीक्षित

मंत्रियों का बीपी हाई

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का जब भी छत्तीसगढ़ दौरा होता है सूबे के मंत्रियों का ब्लडप्रेशन हाई हो जाता है। दरअसल, पहले केंद्रीय गृह मंत्री का छत्तीसगढ़ आना बड़ी घटना होती थी। बस्तर में बड़ी नक्सल हिंसा के बाद केंद्रीय गृह मंत्री शहीद जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित करने घंटे-दो घंटे के लिए आते थे। अमित शाह ऐसे गृह मंत्री हैं कि हर दूसरे महीने छत्तीसगढ़ धमक जाते हैं। वो भी दो-तीन घंटे के लिए नहीं, तीन-तीन दिन के लिए। बहरहाल, मंत्रियों का रक्तचाप इसलिए बढ़ जाता है...पता नहीं, उनके कान में कोई कारगुजारी न पहुंच जाए। अब, कारनामे भी तो एक से बढ़कर एक है। कोई अपने माशुका को तीन करोड़ का मकान गिफ्ट कर रहा तो कोई जिले वार वसूली एजेंट तैनात कर डाला है। आधे से अधिक मंत्री दो साल में सिर्फ एक सूत्रीय एजेंडा पर कार्य कर रहे...वो है खुद का विकास। उपर से, कार्यकर्ताओं का कोई काम आए तो अपनी ही सरकार पर लांछन भी...क्या बताएं हमारा कुछ चल नहीं रहा...कोई सुन नहीं रहा है। हालांकि, मंत्रियों को यह भ्रम है कि अमित शाह को यहां आने पर ही उनके बारे में पता चलेगा। आईबी की टीम बिना किसी पूर्वाग्रह के छोटी-से-छोटी जानकारी केंद्र को भेजते रहती हैं। मोदी सरकार ने 360 डिग्री से वॉच का ऐसा मेकेनिज्म बना रखा है कि कोई उससे बच नहीं सकता। सही समय पर एक्शन हो जाता है। कई राज्यों में पूरे मंत्रिमंडल से इस्तीफा ऐसे थोड़े ही ले लिया गया।

छत्तीसगढ़ पुलिस का दुर्भाग्य

पंजाब से आतंकवादियों के उन्मूलन के बाद पंजाब पुलिस की हैसियत ऐसी बढ़ गई थी प्रदेश में उनका रुतबा आईएएस से अधिक हो गया था। तब के डीजीपी जूलियो रिबेरो और केपीएस गिल को भला कौन नहीं जानता था। मगर छत्तीसगढ़ पुलिस का दुर्भाग्य कहिये कि लाल आतंक के खात्मा के समय महकमे की हालत दयनीय है। पुलिस मुख्यालय कुछ कहने-सुनने की स्थिति में नहीं है। पूरा सिस्टम डिरेल्ड हो चुका है। बस्तर की बात आजकल पीएम नरेंद्र मोदी अपने हर बड़ी भाषणों में कर रहे, मगर छत्तीसगढ़ पुलिस के अफसरान बस्तर का क्रेडिट लेने की बजाए या तो बैकफुट पर हैं या फिर अपनों को ही निबटाने में लगे हैं। ये ऐसा वक्त है...जब छत्तीसगढ़ पुलिस पूरे देश में कालर खड़े कर सकती थी। फोर्स को फायदा दिलवाने के साथ पुलिस का इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़वा सकती थी। बस्तर में 10-10 साल से डंप पड़े अधिकारियों और जवानों को वापिस बुला सकती थी...मगर मिलिनयन डॉलर का प्रश्न...ये कौन करेगा? पुलिस का ये दुर्भाग्य तब है, जब देश के अब तक के सबसे ताकतवर गृह मंत्री हर महीने छत्तीसगढ़ आ रहे और राज्य में अब तक के सबसे तेज-तर्रार गृह मंत्री हैं।

जात न देखो अफसर की

मनुस्मृति के अनुसार दण्ड का महत्व समाज में अनुशासन और न्याय बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। दण्ड का उद्देश्य केवल दंडित करना नहीं है, बल्कि यह समाज में एक चेतावनी रूपी संदेश होता है ताकि सिस्टम में बैठे लोग अपने कार्यों के प्रति जिम्मेदार रहें। मोदी युग में तो दंड का अपना अलग तरीका है। छत्तीसगढ़ सरकार को भी इसका अनुसरण करना चाहिए। वरना, इस जाति का, तो उसका आदमी...अगर देखा जाएगा तो फिर अनुशासनहीनता की घटनाएं और तेज होंगी। आपने देखा ही महिला डीएसपी के खिलाफ अनेक स्थापित साक्ष्य होने के बाद भी सिस्टम ने सस्पेंड करने में महीना भर से ज्यादा लगा दिया। सीएम को पत्र लिखने वाले एसपी के खिलाफ कार्रवाई करने में सिस्टम उलझन में पड़ा है। जबकि, ऐसा होना नहीं चाहिए। अफसर न किसी जाति का होता है और न किसी आदमी और पार्टी का। 2004 की घटना याद होगी, आईएएस अजयपाल सिंह ने मंत्री के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस लिया था तो घंटे भर में सस्पेंड हो गए थे। कहने का आशय यह है कि त्वरित कार्रवाई का अपना एक मैसेज होता है। घटना संज्ञान में आते ही तुरंत कार्रवाई करना दूसरों के लिए सबक होता है।

पैरेंट्स ब्लाइंड या लाचार!

पिछले हफ्ते राजधानी रायपुर में एक शादी थी। लड़का चूकि विदेश में पढ़ाई किया है, इसलिए 20 से अधिक उसके विदेशी फेंड्स भी आए थे। स्वाभाविक तौर से वे पार्टी के केंद्र बिंदु भी रहे। खासकर, विदेशी लड़कियां। विदेशी लड़कियों की शालीन वेशभूषा लोगों के बीच चर्चा का विषय रहा। चिंता का सार यही था कि हम कहां जा रहे हैं...विदेशी लोग कपड़ों के मामले में सभ्य होते जा रहे और हम इतना उदार कि देह की नुमाइश में कंपिटिशिन कर रहे हैं। उस शादी में भी कुछ लोकल लोग ऐसे थे, जिन्हें देख सभ्य लोगों को नजरें नीची करनी पड़ रही थी। बहरहाल, प्रश्न उठता है...क्या पैरेंट्स इतने ब्लाइंड हो गए है कि उनके सामने बच्चे क्या पहनकर घर से निकल रहे या कैसा आचरण कर रहे, उन्हें दिखता नहीं। या फिर जेन जी, जेन जेड युग में इतने लाचार कि बोलने की उनकी हिम्मत नहीं। यह इतना संवेदनशील मसला है कि डर के मारे न कोई पॉलिटिशियन बोल पाएगा या न ही कोई समाज सुधारक। अगर जरा सा भी मुंह खोला तो अगले रोज ही चूड़ी लेकर प्रदर्शन। कुल मिलाकर बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए पैरेंट्स को आंखें खोलकर रखनी होगी। वरना आए दिन समाज में जैसी अधर्मी घटनाएं हो रही हैं, वो कम होने की बजाए और तेजी से बढ़ेंगी।

कलेक्टरों की लिस्ट

कलेक्टरों की एक ट्रांसफर लिस्ट अगले हफ्ते के अंत तक आ सकती है। लिस्ट हालांकि, बहुत बड़ी नहीं होगी। दरअसल, बलौदा बाजार कलेक्टर दीपक सोनी सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने वाले हैं। पोस्टिंग आदेश के बाद थ्री वीक का उनका ज्वाईनिंग पीरियड खतम हो गया है। मगर धान खरीदी और मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्य के चलते रिलीव नहीं किया गया। 14 फरवरी को एसआईआर खतम हो जाएगा। इसके बाद सरकार उन्हें कभी भी कार्यमुक्त कर देगी। दीपक की रिलीविंग के साथ ही कलेक्टरों की एक पोस्टिंग लिस्ट भी निकलेगी। बलौदा बाजार के साथ दो-एक और जिलों के कलेक्टर बदले जा सकते हैं। 2019 बैच के विश्वदीप और रेना जमील कलेक्टर बनने से बच गए हैं। अत्यधिक संभावना है कि इस लिस्ट में 2019 बैच कंप्लीट हो जाए। हालांकि, विश्वदीप की जगह रायपुर नगर निगम का कमिश्नर किसे बनाया जाए, इसकी तलाश अभी पूरी नहीं हुई है। रायपुर जिला पंचायत सीईओ को कमिश्नर बनाने की अटकलें जरूर चल रही है। वैसे दो-एक प्रमोटी आईएएस के भी कलेक्टर बनने की चर्चाएं है, मगर देखना है कि इस लिस्ट में उनका नंबर लगता है या फिर मई में निकलने वाली बड़ी लिस्ट में। कुल मिलाकर 14 या 15 फरवरी को कलेक्टरों की एक लिस्ट आ सकती है।

आईएएस अफसरों का स्टॉपेज

राजधानी रायपुर के प्रॉपर डेवलपमेंट के लिए रमन सरकार ने साल 2004 के लास्ट में रायपुर विकास प्राधिकरण का गठन किया था। कमल विहार के निर्माण याने लगभग 2018 तक इस प्राधिकरण की अहमियत रही, उसके बाद यह आईएएस अफसरों के स्टॉपेज जैसा बन गया है। अफसर आते हैं, और दो-चार महीने में दूसरी पोस्टिंग की रवानगी डाल देते हैं। आरडीए बनने के 21 साल में अभी तक 22 सीईओ पोस्ट हो चुके हैं। खासकर, 2018 से लेकर अभी तक सात साल में 14 सीईओ। कई आईएएस दो-तीन महीने में ही विदा हो गए। बार-बार निजाम बदलने से आरडीए में मौज की स्थिति है। अधिकारी, कर्मचारी मानकर चलते हैं कि नए सीईओ दो-तीन महीने में निकल लेंगे, तो फिर डरना क्यों? हालांकि, आवास और पर्यावरण मंत्री ओपी चौधरी की इच्छा पर सरकार ने इस बार सिकेट्री रैंक के आईएएस अधिकारी अवनीश शरण को आरडीए को ठीक करने की जिम्मेदारी सौंपी है। अब मंत्री ने रुचि ली है...पहली बार किसी बड़े स्तर के आईएएस को इस प्राधिकरण में बिठाया गया है तो देखना है कि इसकी सूरत बदलती है या फिर....?

जोगी डबरी नहीं, विष्णुदेव डबरी

छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने आज से 25 साल पहले छत्तीसगढ़ का वाटरलेवल ठीक रखने डबरी बनाने का फैसला किया था। तब उसे बोलचाल में जोगी डबरी कहा जाता था। जोगी ने अपने कार्यकाल के तीसरे साल में यह सोचकर डबरी की प्लानिंग की थी कि अभी तो उन्हें लंबी पारी खेलनी है। मगर छत्तीसगढ़ की जनता ने उनकी पारी को जल्दी समेट दी। जोगीजी जो काम नहीं कर पाए, अब विष्णुदेव सरकार उसे पूरा करने जा रही है। मनरेगा मद से गांव-गंवई में 12 हजार डबरी बनाने का काम प्रारंभ हो गया है। जाहिर है, छत्तीसगढ़ में जिस तरह पानी का लेवल डाउन हो रहा, उसमें ये डबरी बड़ी कारगर होगी।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. छत्तीसगढ़ पुलिस की हनी गर्ल की अगर जांच हो जाए तो कितने आईपीएस, एसपीएस और नेता उसके जद में आएंगे?

2. नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्ति में बीजेपी विलंब क्यों कर रही है?