शनिवार, 6 अगस्त 2022

कमिश्नर की छुट्टी और सवाल

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 7 अगस्त 2022

राज्य सरकार ने सरगुजा कमिश्नर जीआर चुरेंद्र को हटा दिया। उन्हें मंत्रालय में बिना विभाग का ज्वाइंट सिकरेट्री बनाया गया है। सवाल यह नहीं है कि उन्हें कोई विभाग क्यों नहीं दिया गया। रमन सरकार से लेकर भूपेश बघेल सरकार तक कई बार ऐसा हुआ है...किसी अफसर से गर नाराजगी है, तो छुट्टी करने के बाद कुछ दिनों तक उन्हें बे-विभाग रखा गया। इसमें बड़ा प्रश्न यह है कि चुरेंद्र अभी तक ज्वाइंट सिकरेट्री क्यों हैं? जबकि, वे 2003 बैच के आईएएस हैं...छत्तीसगढ़ में 2006 बैच के आईएएस सिकरेट्री बन चुके हैं। वैसे भी, 16 साल की सर्विस के बाद आईएएस अधिकारियों का सचिव पद पर प्रमोशन हो जाता है। चुरेंद्र का 19 साल हो गया। छत्तीसगढ़ में भी चुरेद्र से जूनियर 23 अधिकारी सिकरेट्री बन चुके हैं। बताते हैं, चुरेंद्र का कोई पुराना मामला है...गरियाबंद में पोस्टिंग के दौरान जमीन की व्यापक गड़बड़ियां हुई थीं। उसमें डीई का आदेश हुआ था। इस वजह से प्रमोशन की उनकी फाइल आगे नहीं बढ़ पाई। अब ये अलग बात है कि वक्त जब बलवान होता है तो...। चुरेंद्र सूरजपुर के कलेक्टर के बाद रायपुर, दुर्ग, बस्तर और सरगुजा के कमिश्नर रह लिए। देश में ये भी एक रिकार्ड होगा...ज्वाइंट सिकरेट्री लेवल का प्रमोटी आईएएस चार डिवीजन का कमिश्नर रह लिया।

डबल प्रभार

दुर्ग रेंज के आईजी बद्री नारायण मीणा को पिछले हफ्ते सरकार ने रायपुर रेंज की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी। और इस हफ्ते बिलासपुर डिविजनल कमिश्नर डॉ0 संजय अलंग को सरगुजा संभाग की। यह दूसरा मौका है, जब अलंग को सरगुजा का प्रभार दिया गया है। इससे पहले भी उन्हें एक बार सरगुजा का चार्ज दिया गया था। बता दें, 2020 में जब शिकायतों की वजह से सरकार ने ईमिल लकड़ा को सरगुजा से हटाया था, तब अलंग को वहां की कमान सौंपी गई थी।

झंडा उंचा रहे..., लेकिन

आजादी के अमृत महोत्सव पर अबकी 15 अगस्त को हर घर में झंडा फहराया जाएगा। इसके लिए हर घर तिरंगा अभियान चलाया जा रहा...व्यापक स्तर पर झंडों का वितरण किया जा रहा है। अमृत महोत्सव पर इससे अच्छी बात नहीं हो सकती। मगर शासन, प्रशासन को यह ध्यान रखना होगा कि झंडे का अपमान न हो। कई बार देखा गया है कि 15 अगस्त और 26 जनवरी के अगले दिन सड़कों पर झंडे गिरे होते हैं। इस बार तो हर घर में, हर हाथ में तिरंगा होगा। लिहाजा, प्रशासन को लोगों को अभी से जागरुक करने का प्रयास शुरू कर देना चाहिए कि झंडों का अपमान न हो।

पहली बार

यूपीएससी सलेक्ट हुए छत्तीसगढ़ के अभ्यर्थियों को सर्विस एलॉट कर दिया गया है। इसमें चार को आईएएस और चार को आईपीएस मिला है। यह पहला मौका होगा, जब एक साथ छत्तीसगढ़ के चार-चार युवाओं को आईएएस, आईपीएस बनने का अवसर मिला है। 45 रैंक वाली श्रद्धा शुक्ला, 51 रैंक वाले अक्षय पिल्ले, 102 रैंक वाले प्रखर चंद्राकर व 199 रैंक वाली पूजा साहू को आईएएस अलॉट हुआ है। वहीं 81 रैंक वाली ईशु अग्रवाल, 147 रैंक वाले मयंक दुबे, 156 रैंक वाले प्रतीक अग्रवाल व 216 वी रैंक वाली दिव्यांजली जायसवाल को आईपीएस अलॉट हुआ है। बता दें, पहले छत्तीसगढ़ से एक या दो से ज्यादा कभी आईएएस, आईपीएस में सलेक्शन नहीं होता था। बहरहाल, इन आठ में से देखना है कितनों को होम कैडर याने छत्तीसगढ़ अलॉट होता है।

आईएएस की सायकिल

वैसे तो सायकिल चलाना सेहत के लिए अच्छा माना जाता है। मगर सूबे में एक ऐसे नौकरशाह हैं, जो सायकिल के और भी कई फायदे उठा रहे थे। दरअसलं, एक युवा आईएएस को एक युवती से दिल लग गया। अब वे सरकारी गाड़ी में मिलने तो जा नहीं सकते। सो, गजब का आइडिया निकाला। सायकिल से माशुका के घर। हेलमेट, टीशर्ट, हाफ पैंट...इसमें अफसर को भला कौन पहचान पाएगा। बताते हैं, कुछ दिन उनका ठीक ठाक चलता रहा। मगर पत्नी आखिर पत्नी होती है...भांप गई कि सुबह शाम परफ्यूम लगाकर जनाब कहां जाते हैं। एक दिन पीछे-पीछे गाड़ी लेकर वे भी निकल गई। बाद में जो कुछ हुआ, वो बड़ा भयानक था। प्रेमिका के घर में ही अफसर की लानत-मलानत हो गई।

केदार की ताजपोशी?

छत्तीसगढ़ में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बदलने की अटकलें एक बार फिर तेज हो गई है। कल प्रदेश प्रभारी पुरंदेश्वरी को घर में गमी होने के बाद भी दिल्ली बुलाया गया, उसके बाद सूबे में चर्चाओ को और बल मिल गया। पता चला है, पार्टी ने अब प्रदेश के संगठन में बदलाव का रोड मैप तैयार कर लिया है। पार्टी पहले ओबीसी को अध्यक्ष बनाना चाह रही थी। लेकिन, अब आदिवासी नेता को ही फिर से कमान सौंपने पर विचार किया जा रहा है। इसमें बस्तर से केदार कश्यप का नाम सबसे उपर बताया जा रहा है। केदार से फायदा यह है युवा होने के साथ ही वे स्व0 बलीराम कश्यप के बेटे हैं। और, खासतौर से बस्तर के आदिवासियों में स्व0 कश्यप के प्रति बड़ा आदर है। इसका स्वाभाविक लाभ केदार और बीजेपी को मिलेगा, ऐसा बीजेपी के लीडरों का मानना है। हालांकि, अभी कुछ फायनल नहीं हुआ है मगर ये भी सही है कि बहुत जल्द फायनल होने वाला है।

डीजीपी रिटायर

छत्तीसगढ़ कैडर के 91 बैच के आईपीएस अधिकारी लांग कुमेर इस महीने 30 अगस्त को रिटायर हो जाएंगे। बस्तर और सरगुजा के आईजी रह चुके कुमेर इस वक्त डेपुटेशन पर नागालैंड में डीजीपी हैं। नागालैंड कुमेर का गृह राज्य है। पॉलिटिकल बैकग्राउंड होने की वजह से नागालैंड जाने पर वहां की सरकार ने उन्हें नागालैंड जाते ही डीजीपी बना दिया था। कुमार यहां से 2017 में नागालैंड गए थे। करीब-करीब वे चार साल डीजीपी रह लिए। लांग कुमेर वही अफसर हैं, जिनका नाम पिछली सरकार ने निगरानी वाली सूची में रखने के लिए भारत सरकार को भेज दिया था। मगर तकदीर की बात है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. बीजेपी कार्यकर्ता क्षेत्रीय सह संगठन मंत्री अजय जामवाल को बीजेपी का जामवंत क्यों कह रहे?

2. क्या पीसीसी अध्यक्ष मोहन मरकाम की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं?


महिला प्रेमी नेता

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 31 जुलाई 2022

छत्तीसगढ़ के कुछ भाजपा नेताओं का महिला प्रेम छुपा नहीं है... सत्ता गंवाने के बाद भी इस माया-मोह से उनका पीछा छूटा नहीं है। आलम तो यह हो गया कि भाजपा का प्रशिक्षण शिविर भी इस चर्चा से अछूता नहीं रहा। संघ के प्रांत प्रचारक प्रेम सिंह सिदार ने अपने उद्बोधन में ऐसे नेताओं को तल्खी के साथ निशाने पर लिया। स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट के सामने जैनम भवन में चल रहे प्रशिक्षण शिविर में सिदार ने ऐसा कुछ कहा कि महिला प्रेमी बीजेपी नेता बगलें झांकने लगे। बोले...दूसरी पार्टियों का मैं नहीं जानता...भाजपा दीनदयाल उपाध्याय जैसे तपस्वियों की पार्टी है...उनकी पार्टी में ये ठीक नहीं...महिलाओं के कार्यक्रम में पुरुष नेता पहुंच जाएं...उनके साथ फोटो खिंचवाएं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि मैं संघ के बारे में कुछ बताने आया था...मगर कड़वी बात कह दी...लेकिन, मुझे इसकी भी कोई परवाह नहीं। सिदार की खरी-खरी से लंगोट के ढीले नेताओं के चेहरे लटक गए...क्योंकि, सिदार का इशारा किधर था, इसे लोग समझ गए। बता दें, शिविर में पूर्व सीएम रमन सिंह को छोड़ बीजेपी के सारे नेता मौजूद थे। प्रदेश प्रभारी पुरंदेश्वरी भी। रमन सिंह को कोविड हुआ है, इसलिए वे क्वारेंटाइन हैं।

ताकतवर आईपीएस!

सरकार ने आज आईपीएस अधिकारियों की पोस्टिंग की एक छोटी लिस्ट निकाली। इसमें सर्वाधिक चौंकाने वाला नाम दुर्ग आईजी बद्री नारायण मीणा का रहा। बद्री पहले से वीवीआईपी रेंज के आईजी हैं। अब उन्हें राजधानी जैसे रायपुर रेंज आईजी का प्रभार मिल गया है। यानी अब नांदघाट से लेकर महाराष्ट्र बॉर्डर तक बद्री का इलाका रहेगा। हालांकि, इससे पहले रतन लाल डांगी को बिलासपुर रेंज के साथ ही सरगुजा रेंज का प्रभार था। मगर बिलासपुर, सरगुजा और रायपुर, दुर्ग में बड़ा फर्क है। रायपुर, दुर्ग का राजनीतिक महत्व ज्यादा है। फिर, चुनावी साल में बद्री को रायपुर का दायित्व सौंपा गया है तो इसके निहितार्थ समझे जा सकते हैं। ये अलग बात है कि यह पॉवर गेम कई अफसरों को खटका होगा।

दो महीने 10 दिन

2003 बैच के आईपीएस ओपी पाल को मई में रायपुर रेंज का आईजी बनाया गया था। याने करीब तीन महीने पहिले। इन तीन महीने में से 20 दिन छुट्टी में रहे। कुल मिलाकर दो महीने 20 दिन वे आईजी रहे। ठीक तीसरे महीने याने जुलाई खत्म होने से एक दिन पहले ही सरकार ने उन्हें पीएचक्यू भेज दिया। रायपुर आईजी के रूप में उनका सबसे कम समय तक रहने का रिकॉर्ड दर्ज हो गया।

सारांश का कद बढ़ा

बिलासपुर की कलेक्टरी करके रायपुर लौटे सारांश मित्तर को पहले रोड विकास निगम का एमडी बनाया गया और आज आईएएस की फेरबदल में उन्हें सीएसआईडीसी की भी कमान सौंप दी गई। अभी के समय में पीडब्ल्यूडी में कुछ धरा नहीं है। रोड का जो काम दिख रहा, वो विकास निगम से हो रहा। 2000 करोड़ का लोन भी निगम को मिला है। ऊपर से अब सीएसआईडीसी भी। याने उद्योग का जिम्मा भी सारांश के मजबूत कंधे पर आ गया है।

किसी का कद बढ़ा, किसी का...

सुब्रत साहू शायद सीएम सचिवालय के पहले ऐसे अफसर होंगे, जिनका विभाग लगभग हर फेरबदल में बदल जाता है। दो महीने पहले मनोज पिंगुआ का फॉरेस्ट सुब्रत को मिला था और सुब्रत का गृह पिंगुआ को। अब फिर वन पिंगुआ के पास आ गया है। सुब्रत को पंचायत की जिम्मेदारी दी गई है। चुनावी साल में पंचायत विभाग की अपनी अहमियत होती है। सो, सरकार ने उन पर भरोसा किया। हिमशिखर गुप्ता के लिए भी लिस्ट ठीक रही। उन्हें उद्योग का स्वतंत्र प्रभार मिला। धनंजय देवांगन को आवास पर्यावरण, भारतीदासन को पीएचई और अय्याज तंबोली को कृषि का दायित्व सौंपा गया। सालों बाद आवास पर्यावरण विभाग डायरेक्ट आईएएस के बजाय प्रमोटी को मिला है। धनंजय साफ सुथरी छवि के अफसर हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. ओपी पाल को रायपुर रेंज आईजी से तीन महीने के भीतर क्यों हटा दिया गया?

2. आईएएस, आईपीएस के बाद क्या अब मंत्रिमंडल सर्जरी की बारी है?


मंत्रिमंडल में सर्जरी!

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 24 जुलाई 2022

छत्तीसगढ़ में ताजा सियासी विवाद अब मंत्रिमंडल की सर्जरी तरफ बढ़ता दिख रहा है। हालांकि, सरकार ने सिंहदेव का पंचायत विभाग मुख्यमंत्री ने मंत्री रविंद्र चौबे को सौंप दिया है। मगर सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की भी है कि मंत्रिमंडल में फेरबदल के जरिये विवाद का रास्ता निकालने की कोशिश की जा सकती है। दरअसल, इसकी दो वजहें मानी जा रहीं। पहला, अभी तक भूपेश मंत्रिमंडल में एक बार भी फेरबदल नहीं हुआ है। अमरजीत भगत जब मंत्री बने थे, तब 13 में से एक जगह खाली थी। सो, अमरजीत भूपेश कैबिनेट के तेरहवें मंत्री बने थे। पिछले साल सत्ता के गलियारों में कुछेक बार मंत्रिमंडल में परिवर्तन करने की चर्चा अवश्य चली मगर बात अंजाम तक नहीं पहुंची। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी एकाधिक बार यह कहते हुए फेरबदल की चर्चाओं की तस्दीक कि जो भी होगा हाईकमान की अनुमति के बाद किया जाएगा। मंत्रिमंडल में फेरबदल की दूसरी वजह सिंहदेव हो सकते हैं। उन्होंने चार पन्नों में आरोप लगाते हुए पंचायत विभाग छोड़ने के लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है। इस पत्र को लेकर छत्तीसगढ़ की सियासत में खलबली मची। वैसे, कांग्रेस हाईकमान को भी कोई दिक्कत नहीं होगी कि विधानसभा चुनाव के पहिले भूपेश बघेल अपनी टीम की कसवाट कर लें।

बेचारे मंत्री परेशान

मंत्रिमंडल की सर्जरी की खबर से भूपेश मंत्रिमंडल के दो मंत्री सबसे अधिक परेशान हैं। वो हैं खाद्य मंत्री अमरजीत भगत और महिला बाल विकास मंत्री अनिला भेड़िया। हालांकि, खतरा पीएचई मिनिस्टर रुद्र गुरू पर भी मंडरा रहा है मगर अमरजीत और अनिला भेड़िया पर ज्यादा है। उसकी वजह यह है कि सरगुजा से तीन-तीन मंत्री हो गए हैं। टीएस सिंहदेव, डॉ0 प्रेमसाय सिंह और अमरजीत भगत। इसके उलट बस्तर का प्रतिनिधित्व कम है। बस्तर से सिर्फ कवासी लखमा हैं। अनिल भेड़िया आदिवासी मंत्री जरूर हैं, मगर बालोद बस्तर में नहीं आता। राज्य बनने के बाद हमेशा बस्तर से दो मंत्री रहे हैं। पहली बार कांग्रेस सरकार में बस्तर से सिर्फ एक को मंत्री बनने का मौका मिला। अनिला भेड़िया की जगह बस्तर टाईगर कहे जाने वाले स्व0 महेंद्र कर्मा की पत्नी देवती कर्मा को मंत्री बनाकर सरकार बड़ा मैसेज देना चाहेगी। हालाकि, अमरजीत के साथ दोनों बातें हैं...या तो आउट हो जाएंगे या फिर और ताकतवर। सियासत को समझने वाले इस बात को बेहतर समझ रहे हैं।

अधिकारियों के मजे

विधानसभा शुरू होने पर खासकर बड़े अधिकारियों के लिए मौज लेने का मौका होता है। मंत्री को ब्रिफिंग के अलावा और कुछ काम होते नहीं। ऑफिस का काम ठप्प....किसी काम के लिए गए तो जवाब मिलेगा...मालूम नहीं, विधानसभा चल रहा है। स्टाफ का भी रटा-रटाया जवाब...साब विधानसभा गए हैं। मगर साब न विधानसभा में होते और न आफिस में। वे घर में बेव सीरीज देखते रहते हैं।

शराब दुकान में झंडा

मनसून सत्र के दूसरे दिन का प्रश्नकाल बड़ा गुदगुदाने वाला रहा। सूबे में मिलावटी शराब की बिक्री को लेकर दोनों पक्षों के विधायकों द्वारा खूब चुटकी ली गई...तो इशारे-इशारे में तंज भी कसे गए। एक विधायक ने यह पूछकर स्पीकर और मंत्री को उलझन में डाल दिया कि सरकार शराब बेच रही तो क्या शराब दुकानें सरकारी संपत्ति हुई और सरकारी संपत्ति है तो 15 अगस्त को वहां झंडा फहराया जाएगा। जाहिर है, इस सवाल का कोई जवाब दे नहीं सकता। सदन में इस पर जमकर ठहाके लगे। हालांकि, स्पीकर भी पूरे मूड में थे। उन्होंने सवाल पूछने वाले नारायण चंदेल से पूछ डाला मिलावटी शराब की बातें सुनी-सुनाई है या आपका व्यक्तिगत अनुभव है? तो धर्मजीत सिंह ने भी चुटकी ली, मंत्रियों द्वारा कॉकटेल जवाब क्यों दिया जा रहा है। दरअसल, कवासी लखमा सवालों में उलझने लगे तो बगल में बैठे मोहम्मद अकबर ने मोर्चा संभाला। इसी पर धर्मजीत ने चुटकी ली।

ट्रांसफर पर मुश्किलें

ट्रांसफर पर बैन के बावजूद हजारों की संख्या में किए गए ट्रांसफर की वजह से छत्तीसगढ़ के मंत्रियों और सचिवों की मुश्किलें बढ़ सकती है। इसको लेकर आम आदमी पार्टी हाईकोर्ट में रिट दायर करने डिटेल जुटा रही है। जाहिर है, इससे मंत्रियों और सचिवों की परेशानी तो बढ़ेगी। दरअसल, मंत्रियों के निर्देश पर करीब आधा दर्जन विभागों ने बिना समन्वय के अनुमोदन के ट्रांसफर का बड़ा खेल कर डाला। ताज्जुब इस बात का है कि आखिर किस मजबूरियों के चलते सचिवों ने आंख मूद लिया, जबकि उन्हें पता है कि बिना समन्वय ट्रांसफर नहीं किया जा सकता। सरकार को इनकी मजबूरियों की जांच करनी चाहिए।

ऐसे हुआ खेल!

बैन के बावजूद धड़ल्ले से ट्रांसफर करने के लिए पता चला है, अधिकारियों ने फर्जीवाड़े का सहारा लिया। बताते हैं, मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के समन्वय से दो-एक ट्रासफर की स्वीकृति मिली, उसमें विभागीय अधिकारियों ने नीचे में कई और नाम जोड़ डाले। और ये बताते हुए कि समन्वय से अनुमोदन मिल गया है, आदेश निकाल दिया। यदि ऐसा है तो यह चार सौ बीसी है।

नियुक्ति के मायने

भाजपा ने अजय जामवाल को क्षेत्रीय संगठन मंत्री नियुक्त किया है। खास बात यह है कि उनका मुख्यालय रायपुर रहेगा। जाहिर सी बात है, अगले साल विधानसभा चुनाव को देखते बीजेपी ने छत्तीसगढ़ पर ध्यान देना शुरू किया है। वैसे भी संगठन की दृष्टि से देखें तो सूबे में पार्टी की स्थिति अच्छी नहीं है। जो हाल केंद्र में भाजपा और कांग्रेस का है, सेम स्थिति छत्तीसगढ़ में है। कांग्रेस यहां एकतरफा मजबूत है तो भाजपा उतना ही कमजोर। अगले चुनाव की चर्चा होती है तो एक ही जवाब सुनने को मिलता है, भाजपा यहां है ही नहीं तो टक्कर क्या देगी। अलबत्ता, जामवाल की नियुक्ति बड़े नेताओं को रास नहीं आएगी। संगठन महामंत्री पवन साय के ऊपर अब जामवाल बैठ गए हैं। पवन हैं सज्जन व्यक्ति। लेकिन, कुछ खटराल टाइप लोगों से वे घिर गए थे। जामवाल विद्यार्थी परिषद बैकग्राउंड से रहे हैं, इसलिए चीजों को समझते हैं। इससे महत्वपूर्ण यह कि थोड़ा तेज भी हैं। तभी कार्यकर्ताओं में अच्छे की उम्मीद जगी है।

सरकारें बदनाम हुई...

सरकार तीन साल बाद ट्रांसफर पर से बैन खोलने राजी हो गई है। संकेत हैं, एक अगस्त से बैन हट सकता है। लेकिन, सवाल ये भी है कि सरकारें बैन लगाना क्यों शुरू की। उसकी बड़ी वजह बदनामी है। मध्यप्रदेश में सुंदरलाल पटवा सरकार के समय सरकार की बड़ी छीछालेदर हुई थी। उसके बाद दिग्विजय सिंह की सरकार में भी। दिग्गी सरकार में एक मंत्री इतने बदनाम हुए कि उनकी कुर्सी चली गई। इसके बाद ही दिग्गी राजा ने बैन प्रारंभ किया। राज्य सरकार अब बैन खोलने जा रही तो उसे अलर्ट रहना पड़ेगा...पानी सिर के ऊपर न बहे। क्योंकि, मंत्री और कार्यकर्ता तीन साल से खखुवाये बैठे हैं।

सीएम के तेवर

मुख्यमंत्री के निर्देश पर जीएडी ने पिछले साल दिसंबर में मंत्रियों के निजी सहायकों को दोहरे, तिहरे दायित्वों से मुक्त करने पत्र लिखा था। मगर, मंत्रियों ने तब अनसुना कर दिया। इस बार सीएम ने कड़े तेवर दिखाए। जीएडी ने एक दिन का अल्टीमेटम दिया और मंत्री लोग बेचारे निजी सचिवों को दूसरी जिम्मेदारियों से मुक्त करने विवश हो गए। सारे निजी सहायकों के मुंह अब लटके हुए हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. भाजपा के अविश्वाश प्रस्ताव के पीछे क्या कोई कहानी है?

2. छत्तीसगढ़ में कौन-कौन मंत्री भाई और भतीजावाद से ग्रसित हैं?



सिकरेट्री जिम्मेदार क्यों नहीं?

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 17 जुलाई 2022

छत्तीसगढ़ में ट्रांसफर पर बैन के बावजूद तीन साल में हजारों की संख्या में तबादले हो गए। बिना समन्वय की मंजूरी के। जबकि, नियमानुसार मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली समन्वय समिति के अनुमोदन के बाद ही ट्रांसफर होने चाहिए। लेकिन, अगर बाड़ ही खेत खा जाए तो क्या किया जा सकता है। कई विभागों के मंत्रियों और सचिवों ने नियमों को दरकिनार करते हुए बड़ा खेल कर डाला। एक विभाग में हजार से अधिक ट्रांसफर हो गए। ठीक है, समन्वय के बिना अनुमोदन ट्रांफसर हुए तो क्या विभागों के सचिवों को नहीं पता था कि ट्रांसफर पर बैन लगा है। आखिर, आदेश तो सिकरेट्री की हरी झंडी देने पर ही अंडर सिकरेट्री निकालते हैं। ऐसे में, सिकरेट्री की जिम्मेदारी नहीं बनती? सरकार ने अब तीन साल में हुए ट्रांसफर की जानकारी मंगाई है। कुछ विभागों की रिपोर्ट देखकर सरकार के अफसर दंग रह गए। तो क्या ऐसे सचिवों पर कार्रवाई होगी? सवाल तो उठते ही हैं।

खटराल पीए

सरकार पिछले दिसंबर से बोल रही कि मंत्रियों के निजी स्थापना में पोस्टेड अधिकारियों को दीगर दायित्वों से हटाया जाए। आठ महीने में जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो इस हफ्ते जीएडी सिकरेट्री डीडी सिंह ने सचिवों को फिर पत्र लिख 24 घटे के भीतर कार्रवाई कर अवगत कराने कहा। इसके बावजूद कई मंत्री अपने निजी सहायकों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं। एक डिप्टी कलेक्टर मंत्री के पीएस के साथ ही मलाईदार बोर्ड में बैठे हैं। मंत्रीजी ने उन्हें कह दिया है, कोई चिंता नहीं। एक आदिवासी मंत्री के निजी स्थापना में कार्यरत अधिकारी के पास चार-चार विभाग है। वे भी अपने प्रिय पीए को छोड़ने तैयार नहीं। यही स्थिति अमूमन मंत्रियों के साथ हैं।

3.1 फीसदी कमीशन का राज

एक मंत्री अपने डिप्टी कलेक्टर पीएस को इसलिए छोड़ने के लिए तैयार नहीं हो रहे कि उसका मुंह काफी छोटा है। मुंह छोटा का मतलब बेहद कम कमीशन लेना। उसने विभाग में होने वाले निर्माण कार्यो या सप्लायरों से 3.1 प्रतिशत कमीषन तय कर दिया है। तीन परसेंट मंत्रीजी को और प्वाइंट वन परसेंट खुद। मंत्रीजी के पास ईमानदारी से तीन परसेंट पहुंचा दिया जाता है। अब ऐसा पीएस कहां मिलेगा। कई पीएस एक परसेंट तक झटक लेते हैं।

बेचारा कलेक्टर!

हेडिंग पर आपत्ति हो सकती है...कलेक्टर बेचारा कैसे? मगर मुंगेली जैसे जिले के लिए ये शब्द एप्रोपियेट लगता है। एक तो छोटा-सा जिला...हंड्रेड परसेंट सूखा, न्यूसेंस उतने ही ज्यादा। डीएमएफ भी मात्र पांच करोड़। अब पांच करोड़ में कलेक्टर क्या खाएगा, क्या निचोड़ेगा। जिले के एक हिस्से में अचानकमार का टाईगर रिजर्व। तो एक बडा़ इलाका बेहद संवेदनशील। वहां कभी भी, कुछ भी हो सकता है। देखा ही आपने...जिला पंचायत के आईएएस सीईओ के साथ क्या हुआ। उपर से जिले के तीन विधायक...तीनों विपक्ष के और अनुभवी तथा सीनियर। एक तो नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक। दूसरे चार बार के सांसद और चार बार से अधिक के विधायक पूर्व मंत्री पुन्नूराम मोहिले। तीसरे तो और बड़े वाले...धाकड़ नेता धरमजीत सिंह। इनके उपर कलेक्टरी नहीं झाड़ी जा सकती। अब आपही बताइये, ऐसे जिले के कलेक्टर को और क्या कहा जाएगा?

पंगा नहीं

बात मुंगेली कलेक्टर राहुल देव की निकली है तो ये बताना लाजिमी होगा कि ब्यूरोक्रेसी में अगर पति-पत्नी दोनों आईएएस, आईपीएस हैं तो लोग पंगा लेने से बचते हैं। क्योंकि, एक नाराज हुआ तो फिर जाहिर है, उसके पति या पत्नी से दुष्मनी मोल लेनी पड़ेगी। ब्यूरोक्रेसी में ऐसे कपल काफी ताकतवर माने जाते हैं। मुंगेली कलेक्टर राहुल देव की पत्नी आईपीएस हैं। अंबिकापुर जैसे ब़ड़े जिले की एसपी। इसके बाद भी सूरजपुर के कांग्रेसियों ने गलत शिकायत करके जिला पंचायत पद से राहुल को निबटवा दिया। ठीक है...वक्त सबका आता है।

डीएमएफ से रैकिंग

छत्तीसगढ़ में डीएमएफ की मीनिंग बदल गई है। डीएमएफ मतलब डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड नहीं डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट फंड हो गया है। और इसी फंड से आजकल जिले की रैंकिंग तय की जा रही है। जिस जिले में डीएमएफ ज्यादा, वह सबसे बड़ा जिला। छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक कोरबा में डीएमएफ है, उसके बाद दंतेवाड़ा। और फिर रायगढ़। पहले बताया जाता था इतने ब्लाक का जिला है। अब पूछा जाता है, डीएमएफ कितना है। कलेक्टर भी यह बोलकर गर्वान्वित होते हैं कि हमारे जिले में इतना डीएमएफ है।

ब्यूरोक्रेसी का हफ्ता

पिछला हफ्ता छत्तीसगढ़ की नौकरशाही के लिए अच्छा रहा। डीजीपी अशोक जुनेजा केंद्र में डीजी इम्पेनल किए गए। विश्वरंजन के बाद डीजी इम्पेनल होने वाले वे छत्तीसगढ़ के दूसरे आईपीएस होंगे। उधर, आईएएस में एडिशनल चीफ सिकेरट्री रेणु पिल्ले भारत सरकार में सिकरेट्री इम्पेनल हुईं। वहीं, 2005 बैच के दो आईएएस ज्वाइंट सिकरेट्री इम्पेनल किए गए। इस बैच की संगीता आर और एस प्रकाश पहले ही ज्वाइंट सिकरेट्री इम्पेनल हो चुके हैं। हालांकि, 2005 बैच में कुछ प्रमोटी आईएएस भी हैं लेकिन, उनका नम्बर नहीं लगा। वैसे भी प्रमोटी आईएएस में केंद्र में ज्वाइंट सिकरेट्री इम्पेनल होने वालो में दो ही अफसर रहे हैं। एक दिनेश श्रीवास्तव और दूसरे डीडी सिंह।

राज्यपाल सहमत नहीं

राज्य सरकार ने रोजगार मिशन और मितान क्लब के संचालन के लिए स्टाम्प ड्यूटी पर एक फीसदी उपकर लगाने के लिए अध्यादेश लाया था। इसे कैबिनेट से मंजूरी मिल गई थी। लेकिन, राज्यपाल अनसुईया उइके इस पर सहमत नहीं हुई। उन्होंने अध्यादेश को लौटा दिया। हो सकता है सरकार अब इसे विधानसभा के मानसून सत्र में पेश करें। विधानसभा में सरकार के पास बहुमत भी है, पास कराने में कोई दिक्कत नहीं होगी।

मंत्री की मीटिंग

एक मंत्री अपने जिले में अधिकारियों की मीटिंग लेनी चाही। इसके लिए उनका स्टाफ जिला प्रशासन से संपर्क किया। मीटिंग का टाईम तय हो गया और आदेश भी निकल गया। इसके कुछ देर बार अपर कलेक्टर ने दूसरा आदेश निकालकर मीटिंग केंसिल कर दी। इससे ये सवाल पैदा नहीं होता कि जिला प्रशासन मंत्री को खामोख्वाह सहानुभूति अर्जित करने का मौका नहीं दे रहा है। मंत्री भी कम चतुर थोड़े ही हैं, अभी से जनता के बीच माहौल बनाना शुरू कर दिए हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. मंत्री टीएस सिंहदेव ने पंचायत विभाग का त्याग करते हुए मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है, सरकार ने अगर इसे स्वीकार नहीं किया तो संवैधानिक प्रक्रिया क्या होगी?

2. किस विभाग में मंत्री के भाई को पूरा काम मिल रहा है?


शनिवार, 16 जुलाई 2022

आईपीएस के डोमन सिंह

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 10 जुलाई 2022

मंत्रियों की मुश्किलें

राज्य सरकार ने सभी विभाग प्रमुखों को लेटर भेज तीन साल में हुए ट्रांसफर की जानकारी मांगी है। इस पत्र से हड़कंप मच गया है। दरअसल, ट्रांसफर पर बैन लगा हुआ है। सिर्फ सीएम की अध्यक्षता वाली समन्वय समिति की अनुशंसा से ट्रांसफर हो सकते हैं। मगर कई मंत्रियों ने मनमानी चलाते हुए विभाग प्रमुखों के जरिये बड़ी संख्या में तबादले कर डाले। एक विभाग के बारे में जानकारी आ रही....एक हजार से अधिक ट्रांसफर बिना समन्वय के अनुमोदन के कर डाला। जीएडी के इस पत्र के बाद ऐसे मंत्रियों की बेचैनी बढ़ गई है। क्योंकि, सरकार भले कुछ न करें मगर कोई अगर कोर्ट चल दिया तो क्या होगा।

एसपी की छुट्टी क्यों?

सरकार ने जशपुर एसपी राजेश अग्रवाल को दो महीने में ही हटा दिया। राजेश के हटने का बड़ा कारण उन्हीं के बैचमेट और दोस्त विजय अग्रवाल को माना जा रहा है। दरअसल, जशपुर में विजय ने इतनी बड़ी लकीर खींच दी थी कि राजेश के लिए उससे पार पाना मुमकिन नहीं था। गांजा तस्करों द्वारा साधुओं को कुचलने की बर्बर घटना के अलावा वहां जितने भी न्यूसेंस हुए, विजय ने कुशलतापूर्वक हैंडिल किया। इसका ईनाम भी उन्हें जांजगीर एसपी की पोस्टिंग के रूप में मिला। अब राजेश से भी जशपुर के लोग वही उम्मीद कर बैठे। नहीं पूरा हुआ तो तीनों विधायकों ने चढ़ाई कर दी। वैसे, बता दें राजेश अग्रवाल का पहला जिला रायगढ़ था और वहां भी वे पौने चार महीने में ही खो हो गए थे। ऐसे में, गृह विभाग पर सवाल तो उठते ही हैं। रायगढ़ जैसा जिला डायरेक्ट आईपीएस को भी पहली बार में आज तक नहीं मिला...उसे प्रमोटी को दे दिया। और जब वहां वे अपना विकेट नहीं बचा पाए, तो फिर जषपुर जैसे संवेदनशील जिला उनके सुपूर्द क्यों कर दिया गया?

संतोष का जंप

ब्यूरोक्रेसी में छोटा या बड़ा जिला मैटर नहीं करता, ट्रेक पर बने रहना महत्वपूर्ण माना जाता है। सूबे में कई ऐसे कलेक्टर, एसपी हुए, जो बड़े जिले से छोटे जिले में गए और फिर वहां से जोरदार जंप लगाए। हाल में एसपी के फेरबदल में संतोष सिंह के साथ ऐसा ही हुआ। रायगढ़ जैसे जिले के बाद उन्हें कोरिया भेजा गया तो जाहिर है, उन्हें तकलीफ हुई होगी। मगर उन्हें सब्र का फल मिला। संतोष कोरिया से राजनांदगांव भेजे गए और फिलहाल छत्तीसगढ़ के टॉप के जिला कोरबा की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उनसे पहिले जीतेंद्र मीणा कोरबा के बाद बालोद गए और वहां से बड़ा जंप लगाते हुए जगदलपुर के एसएसपी। भोजराम पटेल कांकेर के बाद गरियाबंद और उसके बाद हवाई जहाज के टेकआफ की तरह कोरबा पहुंच गए। लिहाजा, जगदलपुर, रायगढ़, बिलासपुर जैसे जिले की कप्तानी करने के बाद बलौदा बाजार भेजे गए एसएसपी दीपक झा को मायूस नहीं होना चाहिए। बहरहाल, बात संतोष सेषुरू हुई थी तो बता दें वे भी बद्री नारायण मीणा के रिकार्ड की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। बद्री 9 जिले के एसपी रहे हैं। आखिरी जिला उनका दुर्ग था, जिसे आईजी बनने के पहले उन्होंने कंप्लीट किया। पुलिस अधीक्षक के रूप में संतोष का कोरबा सातवां जिला है। नारायणपुर, कोंडागांव, महासमुंद, रायगढ़, कोरिया, राजनांदगांव और अब कोरबा।

एक और आईएएस!

2008 बैच के आईएएस नीरज बंसोड़ डेपुटेशन पर जा रहे हैं। राज्य सरकार से उन्होंने एनओसी के लिए आग्रह किया था। सरकार ने ओके कर दिया है। एनओसी के बाद भारत सरकार में पोस्टिंग की प्रक्रिया प्रारंभ होगी। बंसोड़ को सीनियरिटी के हिसाब से डायरेक्टर की पोस्टिंग मिलेगी। हालांकि, डायरेक्टर लेवल में अफसर केंद्र में जाना नहीं चाहते। इसकी वजह यह है कि डायरेक्टर रैंक में दिल्ली में सुविधाएं काफी कम है। छत्तीसगढ़ जैसे मलाई भी नहीं। डायरेक्टर लेवल में अमित कटारिया भी दिल्ली गए थे। नीरज फिलवक्त डायरेक्टर हेल्थ हैं। वे करीब दो साल से ये जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। कोविड के दौरान भी नीरज के पास हेल्थ था। नीरज बैलेंस और लो प्रोफाइल में रहने वाले आईएएस अफसर माने जाते हैं। यही वजह है कि उन पर कभी उंगलिया नहीं उठी।

डबल डोमन सिंह

राज्य सरकार ने छह जिलों का एसपी बदल दिया। इसमें प्रफुल्ल ठाकुर का नाम लोगों को चौंकाया। प्रफुल्ल को अभी आईपीएस अवार्ड नहीं हुआ है। और चौथे जिले की कप्तानी मिल गई। वो भी राजनांदगांव जैसे जिले की। लोग इस पर चुटकी ले रहे हैं...उन्हें आईपीएस का डोमन सिंह कहा जा रहा है। आईएएस के डोमन सिंह सांतवे जिले का कलेक्टर बन देश में रिकार्ड बनाया है। डोमन प्रमोटी आईएएस हैं। और देश में किसी प्रमोटी ने चार जिले से अधिक कलेक्टरी नहीं की। डोमन सातवां कर रहे हैं। दिलचस्प यह है कि आईएएस और आईपीएस दोनों के डोमन सिंह राजनांदगांव में।

छत्तीसगढ़ भी पीछे नहीं

मीडिया में आईएएस टॉपर टीना डाबी की कलेक्टर पोस्टिंग की खबरें जमकर वायरल हो रही है। राजस्थान सरकार ने उन्हें जैसलमेर का कलेक्टर बनाया है। टीना 2016 बैच की आईएएस हैं। बता दें, कलेक्टरों की पोस्टिंग की दृष्टि से देखा जाए तो छत्तीसगढ़ भी पीछे नहीं है। टीना के बैच के राहुल देव को मुंगेली का कलेक्टर बनाया गया है। निहितार्थ यह है कि कलेक्टरी में छत्तीसगढ़ भी पीछे नहीं।

राजधानी के बाद न्यायधानी

सौरभ कुमार छत्तीसगढ़ के तीसरे कलेक्टर होंगे, जिन्हें राजधानी के बाद न्यायधानी की कमान मिली है। उनसे पहिले सुबोध सिंह औरसोनमणि बोरा रायपुर के बाद बिलासपुर गए थे। सुबोध सिंह तो रायपुर से बिलासपुर गए और फिर दूसरी बार रायपुर के कलेक्टर बनाए गए। रायपुर में दो बार कलेक्टरी करने का रिकार्ड सुबोध के पास है। हालांकि, सुबोध को रायपुर कलेक्टर बनाने के कुछ महीने बाद सीएम सचिवालय बुला लिया गया था। सुबोध इसके बाद जब तक सरकार रही, रमन सिंह के सचिवालय में एक मजबूत स्तंभ के तौर पर रहे। वैसे, इस बात में आश्चर्य नहीं कि सौरभ कुछ हद तक सुबोध सिंह के ट्रेक को रिपीट करें। जाहिर है, आईटी के जानकार होने की वजह से पिछली सरकार ने उन्हें बिलासपुर कमिश्नर से चिप्स का सीईओ बनाकर रायपुर बुला लिया था। रायपुर कलेक्टर रहने के दौरान उनके सीएम सचिवालय जाने की अटकलें रही।

तीसरे कलेक्टर

सौरभ कुमार के साथ एक और रिकार्ड दर्ज हुआ है...छत्तीसगढ़़ के दूसरे ऐसे आईएएस होंगे, जो रायपुर, बिलासपुर नगर निगम के कमिश्नर रहे और फिर दोनों जिलों के कलेक्टर भी। उनसे पहले सोनमणि बोरा बिलासपुर और रायपुर के ननि कमिश्नर रहे और फिर कलेक्टर भी। हालांकि, ओपी चौधरी रायपुर ननि के कमिश्नर रहे और कलेक्टर भी। लेकिन, बिलासपुर में उन्होंने कोई पोस्टिंग नहीं की। बहरहाल, सोनमणि, ओपी और सौरभ से पहिले रायपुर का कोई निगम कमिश्नर रायपुर का कलेक्टर नहीं बन पाया। इसके बावजूद कि रायपुर का ननि कमिश्नर कई जिलों के कलेक्टरों से ज्यादा रुतबा रखता है। राजधानी में पोस्टिंग की वजह से सरकार से प्रगाढ़ता भी अच्छी हो जाती है।

पोस्टिंग या मजाक!

इस तरह के कारनामें एनआरडीए में ही संभव है...रिटायर हुआ छोटे पोस्ट से और संविदा में उससे बड़ी कुर्सी मिल जाए। दरअसल, एक सुपरिटेंडेंट इंजीरियर कुछ दिन पहले रिटायर हुए। एनआरडीए ने उन्हें संविदा पोस्टिंग दे दी। इसके साथ ही चीफ इंजीनियर का चार्ज भी। अब सीनियरिटी में जो एसई उनसे उपर थे, उन्हें अब अपने जूनियर को सलाम ठोकना पड़ रहा है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. विधायकों की शिकायत के बाद किस कलेक्टर का विकेट निकट भविष्य में गिर सकता है

2. ऐसी क्या बात है कि कुछ आईएएस, आईपीएस इन दिनों बेहद घबराए हुए हैं?


सिकरेट्री जिम्मेदार क्यों नहीं?

संजय के. दीक्षित

तरकश, 17 जुलाई 2022

छत्तीसगढ़ में ट्रांसफर पर बैन के बावजूद तीन साल में हजारों की संख्या में तबादले हो गए। बिना समन्वय की मंजूरी के। जबकि, नियमानुसार मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली समन्वय समिति के अनुमोदन के बाद ही ट्रांसफर होने चाहिए। लेकिन, अगर बाड़ ही खेत खा जाए तो क्या किया जा सकता है। कई विभागों के मंत्रियों और सचिवों ने नियमों को दरकिनार करते हुए बड़ा खेल कर डाला। एक विभाग में हजार से अधिक ट्रांसफर हो गए। ठीक है, समन्वय के बिना अनुमोदन ट्रांफसर हुए तो क्या विभागों के सचिवों को नहीं पता था कि ट्रांसफर पर बैन लगा है। आखिर, आदेश तो सिकरेट्री की हरी झंडी देने पर ही अंडर सिकरेट्री निकालते हैं। ऐसे में, सिकरेट्री की जिम्मेदारी नहीं बनती? सरकार ने अब तीन साल में हुए ट्रांसफर की जानकारी मंगाई है। कुछ विभागों की रिपोर्ट देखकर सरकार के अफसर दंग रह गए। तो क्या ऐसे सचिवों पर कार्रवाई होगी? सवाल तो उठते ही हैं।

खटराल पीए

सरकार पिछले दिसंबर से बोल रही कि मंत्रियों के निजी स्थापना में पोस्टेड अधिकारियों को दीगर दायित्वों से हटाया जाए। आठ महीने में जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो इस हफ्ते जीएडी सिकरेट्री डीडी सिंह ने सचिवों को फिर पत्र लिख 24 घटे के भीतर कार्रवाई कर अवगत कराने कहा। इसके बावजूद कई मंत्री अपने निजी सहायकों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं। एक डिप्टी कलेक्टर मंत्री के पीएस के साथ ही मलाईदार बोर्ड में बैठे हैं। मंत्रीजी ने उन्हें कह दिया है, कोई चिंता नहीं। एक आदिवासी मंत्री के निजी स्थापना में कार्यरत अधिकारी के पास चार-चार विभाग है। वे भी अपने प्रिय पीए को छोड़ने तैयार नहीं। यही स्थिति अमूमन मंत्रियों के साथ हैं।

3.1 फीसदी कमीशन का राज

एक मंत्री अपने डिप्टी कलेक्टर पीएस को इसलिए छोड़ने के लिए तैयार नहीं हो रहे कि उसका मुंह काफी छोटा है। मुंह छोटा का मतलब बेहद कम कमीशन लेना। उसने विभाग में होने वाले निर्माण कार्यो या सप्लायरों से 3.1 प्रतिशत कमीषन तय कर दिया है। तीन परसेंट मंत्रीजी को और प्वाइंट वन परसेंट खुद। मंत्रीजी के पास ईमानदारी से तीन परसेंट पहुंचा दिया जाता है। अब ऐसा पीएस कहां मिलेगा। कई पीएस एक परसेंट तक झटक लेते हैं।

बेचारा कलेक्टर!

हेडिंग पर आपत्ति हो सकती है...कलेक्टर बेचारा कैसे? मगर मुंगेली जैसे जिले के लिए ये शब्द एप्रोपियेट लगता है। एक तो छोटा-सा जिला...हंड्रेड परसेंट सूखा, न्यूसेंस उतने ही ज्यादा। डीएमएफ भी मात्र पांच करोड़। अब पांच करोड़ में कलेक्टर क्या खाएगा, क्या निचोड़ेगा। जिले के एक हिस्से में अचानकमार का टाईगर रिजर्व। तो एक बडा़ इलाका बेहद संवेदनशील। वहां कभी भी, कुछ भी हो सकता है। देखा ही आपने...जिला पंचायत के आईएएस सीईओ के साथ क्या हुआ। उपर से जिले के तीन विधायक...तीनों विपक्ष के और अनुभवी तथा सीनियर। एक तो नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक। दूसरे चार बार के सांसद और चार बार से अधिक के विधायक पूर्व मंत्री पुन्नूराम मोहिले। तीसरे तो और बड़े वाले...धाकड़ नेता धरमजीत सिंह। इनके उपर कलेक्टरी नहीं झाड़ी जा सकती। अब आपही बताइये, ऐसे जिले के कलेक्टर को और क्या कहा जाएगा?

पंगा नहीं

बात मुंगेली कलेक्टर राहुल देव की निकली है तो ये बताना लाजिमी होगा कि ब्यूरोक्रेसी में अगर पति-पत्नी दोनों आईएएस, आईपीएस हैं तो लोग पंगा लेने से बचते हैं। क्योंकि, एक नाराज हुआ तो फिर जाहिर है, उसके पति या पत्नी से दुष्मनी मोल लेनी पड़ेगी। ब्यूरोक्रेसी में ऐसे कपल काफी ताकतवर माने जाते हैं। मुंगेली कलेक्टर राहुल देव की पत्नी आईपीएस हैं। अंबिकापुर जैसे ब़ड़े जिले की एसपी। इसके बाद भी सूरजपुर के कांग्रेसियों ने गलत शिकायत करके जिला पंचायत पद से राहुल को निबटवा दिया। ठीक है...वक्त सबका आता है।

डीएमएफ से रैकिंग

छत्तीसगढ़ में डीएमएफ की मीनिंग बदल गई है। डीएमएफ मतलब डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड नहीं डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट फंड हो गया है। और इसी फंड से आजकल जिले की रैंकिंग तय की जा रही है। जिस जिले में डीएमएफ ज्यादा, वह सबसे बड़ा जिला। छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक कोरबा में डीएमएफ है, उसके बाद दंतेवाड़ा। और फिर रायगढ़। पहले बताया जाता था इतने ब्लाक का जिला है। अब पूछा जाता है, डीएमएफ कितना है। कलेक्टर भी यह बोलकर गर्वान्वित होते हैं कि हमारे जिले में इतना डीएमएफ है।

ब्यूरोक्रेसी का हफ्ता

पिछला हफ्ता छत्तीसगढ़ की नौकरशाही के लिए अच्छा रहा। डीजीपी अशोक जुनेजा केंद्र में डीजी इम्पेनल किए गए। विश्वरंजन के बाद डीजी इम्पेनल होने वाले वे छत्तीसगढ़ के दूसरे आईपीएस होंगे। उधर, आईएएस में एडिशनल चीफ सिकेरट्री रेणु पिल्ले भारत सरकार में सिकरेट्री इम्पेनल हुईं। वहीं, 2005 बैच के दो आईएएस ज्वाइंट सिकरेट्री इम्पेनल किए गए। इस बैच की संगीता आर और एस प्रकाश पहले ही ज्वाइंट सिकरेट्री इम्पेनल हो चुके हैं। हालांकि, 2005 बैच में कुछ प्रमोटी आईएएस भी हैं लेकिन, उनका नम्बर नहीं लगा। वैसे भी प्रमोटी आईएएस में केंद्र में ज्वाइंट सिकरेट्री इम्पेनल होने वालो में दो ही अफसर रहे हैं। एक दिनेश श्रीवास्तव और दूसरे डीडी सिंह।

राज्यपाल सहमत नहीं

राज्य सरकार ने रोजगार मिशन और मितान क्लब के संचालन के लिए स्टाम्प ड्यूटी पर एक फीसदी उपकर लगाने के लिए अध्यादेश लाया था। इसे कैबिनेट से मंजूरी मिल गई थी। लेकिन, राज्यपाल अनसुईया उइके इस पर सहमत नहीं हुई। उन्होंने अध्यादेश को लौटा दिया। हो सकता है सरकार अब इसे विधानसभा के मानसून सत्र में पेश करें। विधानसभा में सरकार के पास बहुमत भी है, पास कराने में कोई दिक्कत नहीं होगी।

मंत्री की मीटिंग

एक मंत्री अपने जिले में अधिकारियों की मीटिंग लेनी चाही। इसके लिए उनका स्टाफ जिला प्रशासन से संपर्क किया। मीटिंग का टाईम तय हो गया और आदेश भी निकल गया। इसके कुछ देर बार अपर कलेक्टर ने दूसरा आदेश निकालकर मीटिंग केंसिल कर दी। इससे ये सवाल पैदा नहीं होता कि जिला प्रशासन मंत्री को खामोख्वाह सहानुभूति अर्जित करने का मौका नहीं दे रहा है। मंत्री भी कम चतुर थोड़े ही हैं, अभी से जनता क बीच माहौल बनाना शुरू कर दिए हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. मंत्री टीएस सिंहदेव ने पंचायत विभाग का त्याग करते हुए मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है, सरकार ने अगर इसे स्वीकार नहीं किया तो संवैधानिक प्रक्रिया क्या होगी?

2. किस विभाग में मंत्री के भाई को पूरा काम मिल रहा है?