शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: 5 घंटे कैबिनेट, मास्टर स्ट्रोक और...

 


तरकश, 31 अक्टूबर 2026

संजय के. दीक्षित

5 घंटे कैबिनेट, मास्टर स्ट्रोक और...

दिसंबर 2023 में सरकार बनने के बाद यह पहला कैबिनेट था, जो करीब पांच घंटे चला। ढाई घंटे तो सिर्फ धान खरीदी पर चर्चा हुई। बिचौलियों के खेल को रोकने के लिए कृषि विभाग के अफसरों ने एमएसपी पर धान खरीदी के अलावा प्रति एकड़ 10 हजार रुपए देने का प्रस्ताव रखा तो मंत्रिपरिषद ने उसे सिरे से खारिज कर दिया। क्योंकि, 10 हजार का कैलकुलेशन एक अंदाज पर था। उससे किसानों को करीब 3600 रुपए का नुकसान हो रहा था। बैठक में सीएम समेत सभी मंत्री इस पर एकमत थे कि 3100 रेट और 21 क्विंटल प्रति एकड़ धान खरीदी पर कोई कंप्रोमाइज नहीं होगा। आखिरकार, ऐतिहासिक फैसले पर सहमति बनी...किसान के खेत में प्रति एकड़ चाहे कितना भी धान हो, बोनस 21 क्विंटल के हिसाब से दिया जाएगा। याने अगर प्रति एकड़ 12 क्विंटल धान हुआ तो उसे बोनस मिलेगा 21 क्विंटल का। इससे किसानों को दूसरे प्रांतों या बिचौलिये तथा राईस मिलरों से रिसायकिलिंग के धान अनाप-शनाप दर पर खरीदने के लिए मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। क्योंकि, छत्तीसगढ़ में प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान होता नहीं। जाहिर है, सूबे में वास्तविक तौर पर करीब 100 से 110 लाख क्विंटल धान होता है। जबकि, पिछले साल 141 और उससे पहले 149 लाख क्विंटल धान की खरीदी हुई थी। एक मोटा अनुमान है, 40 लाख मीट्रिक टन धान खरीदी फर्जी यानी कागजों में होती है, जिसका करीब 10 हजार करोड़ रुपए राईस मिलरों और बिचौलियों की जेब में जाता है। हालांकि, पिछले साल सरकार ने सख्ती बरतने की कोशिश की थी...कलेक्टरों ने जैसे ही कड़ाई शुरू की...मंत्री लगे त्राहि माम करने...हुजूर, ऐसे में, हम चुनाव हार जाएंगे। तो फिर सरकार को तेवर नरम करना पड़ा। फिर भी 135 लाख मीट्रिक टन पर खरीदी रुक गई थी, मगर बिचौलियों ने किसानों की नाराजगी की ऐसी नैरेटिव बनाई कि सरकार को धान खरीदी दो दिन और बढ़ाना पड़ा और बड़ा खेल हो गया। दो दिन में छह लाख मीट्रिक टन धान बिचौलियों ने खपा दिया। इसलिए खरीदी 135 से बढ़कर 141 लाख मीट्रिक टन पर पहुंच गई। बहरहाल, कैबिनेट ने जो पैसा बिचौलियों की जेब में जाता था, उसे किसानों को देने के लिए मास्टर स्ट्रोक का निर्णय तो किया मगर उसका आदेश निकालने में अफसर आगे-पीछे हो रहे हैं। इसकी वजह है, सिस्टम में बैठे एक वर्ग का मानना है, एमएसपी साल-दर-साल बढ़ता जा रहा। ऐसे में, बोनस की अंतर राशि कम होने से किसानों में नाराजगी न बढ़े। मगर देर-सबेर यह फैसला करना ही पड़ेगा। क्योंकि, किसानों की जेब में पैसा जाए, तो कोई दिक्कत नहीं, बिचौलिये मालामाल हो, ये ठीक नहीं।

350 करोड़ महीने का ब्याज

छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा बोर्ड मार्केटिंग फेडरेशन कर्ज की बोझ से इस कदर दबता जा रहा कि कुछ साल बाद वह दिवालिया होने की स्थिति में आ जाए, तो अचरज नहीं। दरअसल, धान खरीदी के लिए मार्कफेड हर साल लगभग 35 से 40 हजार करोड़ लोन लेता है। आज की तारीख में मार्कफेड पर 39 हजार करोड़ का कर्ज है और इस साल और 35 हजार करोड़ लेने की तैयारी है। 39 हजार करोड़ कर्ज के एवज में मार्कफेड को हर महीने 350 करोड़ रुपए सिर्फ ब्याज चुकाना पड़ता है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि मार्कफेड का करीब 10 हजार करोड़ रुपए फर्जी धान खरीदी पर जाता है। आपको जानकार हैरानी होगी...3100 में धान खरीदने के बाद उसे चावल बनाने के प्रोसेज पर करीब 1300 रुपए खर्च होता है। याने करीब 4400 रुपए। और करीब 40 लाख मीट्रिक टन फर्जी धान खरीदी होती है। आप इसे 4400 से मल्टीप्लाई कर लीजिए...जो अमाउंट आएगा, उससे देख आप हिल जाएंगे। मगर पता नहीं क्यों सिस्टम नहीं हिलता। इस बार अगर 40 लाख मीट्रिक टन फर्जी धान खरीदी को रोक लिया जाए तो मार्कफेड को 9800 करोड़ रुपए कम लोन लेना पड़ेगा, जिसका ब्याज करोड़ों में जाता जाएगा।

3100 रेट और चमत्कार

बस्तर में आमतौर पर प्रति क्विंटल सात-से-आठ क्विंटल प्रति एकड़ धान होता है। धान का रेट 3100 और प्रति एकड़ 21 क्विंटल की लिमिट तय होने से पहले वहां से हर साल करीब पांच लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी होती थी। मगर पिछले साल यह 13 लाख मीट्रिक टन पहुंच गया। प्रश्न उठता है, दो साल में बस्तर में ऐसा कौन सा जादुई छड़ी चली कि धान की फसल लगभग तीगुनी बढ़ गई। जवाब मिलेगा, वही रिसाइकिलिंग और बिचौलियों का खेला। जाहिर है, सरकार अगर बोनस की अंतर की राशि देने के अंतिम फैसले पर पहुंच जाती है तो बस्तर में धान की खरीदी फिर उसी पांच लाख मीट्रिक टन के फिगर पर आ जाएगी। बस्तर के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उधर धान की पैदावार कम होने की वजह से राईस मिल भी नहीं हैै। मार्कफेड को वहां से धान खरीद कर मीलिंग के लिए ट्रांसपोर्टिंग कर धमतरी, कुरूद, रायपुर तरफ लाना पड़ता है। यही स्थिति सरगुजा और बस्तर तरफ भी है।

राईस माफियाओं का कमाल

जाहिर है, छत्तीसगढ़ में प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान होता नहीं। लिहाजा, एक कंपनी ने मोटा धान का ऐसा बीज निर्मित कर दिया, जो एकड़ में 25 से 27 क्विंटल होता है। इससे फायदा यह होगा कि 21 क्विंटल सरकार को टिकाया जाएगा और जो बचेगा उसे बिचौलियों को, जो रिसाईकिलिंग कर मार्कफेड को चूना लगाएंगे। कृषि विभाग के अफसरों का कहना है, इस सरना धान के एक केटेगरी का सबसे बड़ा ड्रा बैक यह है कि इसमें काफी ब्रोकन निकलता है। अफसर इसके बीज पर रोक लगाते तब तक काफी मात्रा में इस बीज को किसानों ने खरीद लिया था। सो, इस बार इस नए धान की प्रजाति भी अपनी खेल दिखाएगी।

पंजाब न बन जाए छत्तीसगढ़!

पंजाब कभी देश का सबसे उन्न्त राज्य हुआ करता था। जीडीपी में पूरे देश में फर्स्ट। प्रति व्यक्ति आमदनी में भी टॉप में। मगर पंजाब की बदहाली अब ऐसी हो गई है कि अर्थव्यवस्था में देश के 28 राज्यों में यह 16वें नंबर पर लुढ़क गया है और प्रति व्यक्ति आय में 19वें नंबर पर। इसकी प्रमुख वजह यह रही कि वहां की सरकार और किसानों का पूरा फोकस चावल और गेहूं पर केंद्रित रहा। कृषि और बिजली में बेतहाशा सब्सिडी दी। लोक लुभावन योजनाओं की वजह से पंजाब के बजट का एक बड़ा हिस्सा रेवड़ी बांटने में निकलता गया। उसका खामियाजा पंजाब को भुगतना पड़ा। गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्र, तेलांगना उससे काफी आगे निकल गए। छत्तीसगढ़ में भी अगर राजनीतिक पार्टियां धान की सियासी प्रतिस्पर्धा में उलझी रही तो वो दिन दूर नहीं, जब छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था भी चरमरा जाए। वैसे छत्तीसगढ़ अभी भी देश में 17वें नंबर पर है। याने पंजाब से एक पायदान नीचे। अलबत्ता, छत्तीसगढ़ के लिए राहत और सौभाग्य की बात यह है कि यहां प्राकृतिक संपदाओं का भंडार है। स्टील और माईनिंग में स्टेट की काफी अच्छी स्थिति है। मगर ऐसा प्लान नहीं बना कि सहायक उद्योगों की संख्या में इजाफा हो। सहायक उद्योगों के बढ़ने से रोजगार सृजित होता। 2015 के बाद छत्तीसगढ़ का औद्योगिक ग्रोथ एकदम ठहर गया। वरना, स्टील में रायपुर मंडी गोविंदगढ़ को पीछे छोड़ दिया था।

अफसरशाही और कछुआ गति

मार्च में नक्सलियों के खात्मे का ऐलान होने के बाद नेताओं की सुरक्षा में कटौती करने जून में पीएस होम की अध्यक्षता में प्रोटेक्शन रिव्यू ग्रुप की बैठक हुई थी। इसी बैठक में करीब सवा सौ नेताओं और अधिकारियों की सुरक्षा में कटौती करने का फैसला लिया गया था। जून के बाद जुलाई, अगस्त, सितंबर, और अक्टूबर भी निकल गया। स्मृति ईरानी अगर न आती तो शायद गृह विभाग में इस फाइल दबी रह गईं होती। दरअसल, स्मृति ईरानी की खबर यहां वायरल हो गई कि उन्होंने हरियाणा प्रभार वाले राज्य में बीजेपी के जिला अध्यक्षों की सुरक्षा एक झटके में हटवा दी। इस खबर के बाद गृह विभाग हरकत में आया और फाइल रेंगनी शुरू की। अब खबर है किसी भी दिन इसका आदेश निकल जाएगा। गृह विभाग की हालत यह तब है जब प्रदेश में विजय शर्मा जैसे दमदार विभागीय मंत्री हैं...ई-ऑफिस पर लगातार फाइलों की मॉनिटरिंग की जा रही...चीफ सिकेट्री महीने में दो बार खुद सीनियर सिकेट्रीज की मीटिंग लेकर रिव्यू करते हैं। गृह विभाग की स्थिति और क्या बताएं...? सीएस ने आदेश निकाला था...बजट पारित होने के बाद एक अप्रैल तक सारे विभाग प्रशासकीय स्वीकृति दे दें। गृह विभाग ने बजट की प्रशासकीय स्वीकृति अभी तक नहीं दी है।

नए डीजीपी का पेनल

डीजी के तीन नए पदों को लेकर भी गृह विभाग के अफसर कंफ्यूजन की स्थिति में हैं। जबकि, तीनों का प्रमोशन ड्यू हो चुका है। यही स्थिति अगर आईएएस की होती तो तूफान मच गया होता। एक बार प्रमोटी आईपीएस राजीव श्रीवास्तव को डीजी बना दिया तो सीएम सचिवालय के एक सीनियर सिकेट्री अफसरों को लेकर डॉ0 रमन सिंह के पास पहुंच गए थे कि सुनील कुजूर को सचिव से प्रमुख सचिव क्यों नहीं बनाया जा रहा। सरकार को आखिरकार कुजूर को पीएस बनाना पड़ा। जबकि, 2013 के विधानसभा चुनाव में कुछ चीजों को लेकर वह सरकार उनसे काफी खफा थी। बहरहाल, करीब तीन महीने बाद 5 फरवरी को डीजीपी अरुणदेव गौतम का कार्यकाल खतम हो जाएगा। यूपीएससी के नियमानुसार डीजीपी के रिटायर होने से मिनिमम तीन महीने पहले पेनल बनाने की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए। सरकार अगर उनके रिटायरमेंट तक याने जुलाई तक एक्सटेंशन दे दे ंतो बात अलग है। वरना, नए डीजी के लिए पेनल को भेजना होगा। अगर डीजी के नए पद क्रियेट नहीं होंते तो फिर ये कैसे होगा? ऐसे में जीपी सिंह और हिमांशु गुप्ता के अलावा सरकार के पास कोई विकल्प नहीं बचेगा। क्योंकि, एसआरपी कल्लूरी अभी डीजी नहीं बने हैं। सवाल ये भी...फिर प्रदीप गुप्ता और विवेकानंद का क्या होगा?

आईपीएस या बाबू

गृह विभाग कछुआ गति से चल रहा तो पुलिस मुख्यालय का हाल भी जुदा नहीं है। 2021 बैच के यंग आईपीएस अफसरों को फील्ड में डंडा भांजना चाहिए, तो उन्हें पीएचक्यू में बाबू बनाकर बिठा दिया गया है। अमन झा, अजय कुमार, आकाश श्रीश्रीमाल, अक्षय सबद्रा, आकाश शुक्ला और रविंद्र कुमार मीणा बेचारे कई साल से बस्तर में नक्सलियों से लोहा लेकर लौटे थे। नक्सलवाद के खात्मे के बाद सरकार को उन्हें ईनाम देना था तो मुख्यालय में पोस्ट कर दिया। इसी तरह पीएचक्यू ने बस्तर में एसपी रहे अफसरों को छोटे जिले टिका दिया। उधर, रायपुर कमिश्नरेट को एक तो आईएएस लॉबी ने सही शेप नहीं लेने दिया, उपर से पुलिस मुख्यालय ने नित नए प्रयोेग से उसका कबाड़ा जैसी स्थिति कर दी है। आईपीएस को हटाकर एडिशनल एसपी को डीसीपी बना डाला। ऐसे में, ये सवाल तो पूछे ही जाएंगे, जब एएसपी को ही डीसीपी बनाना था तो फिर पुलिस कमिश्नरेट क्यों बनाया। फिर बदला क्या? अगर रायपुर की तरह पुलिस कमिश्नरेट बनाना हो तो बिलासपुर और दुर्ग के नेताओं को हाथ जोड़ लेना चाहिए...रहने दीजिए, जब सोच और संसाधन हो जाए, तब कमिश्नरेट बनाइयेगा।

प्रमोेटी के भरोसे कब तक?

नो दाउट, एसपी में विजय अग्रवाल, रजनेश सिंह, शशिमोहन सिंह जैसे अफसरों का जवाब नहीं है। मगर सवाल उठता है, आखिर इनसे कब तक कप्तानी कराई जाएगी। ये सभी डीआईजी बन गए हैं। पुलिस महकमे को कायदे से नए अफसरों को तैयार करना चाहिए था। वो काम हो नहीं रहा। रायपुर में कमिश्नरेट बनाने के बाद चार यंग आईपीएस को डीसीपी बनाया गया था। कायदे से उन्हें बताकर पोस्ट करना था कि साल-डेढ़ साल के पहले हिलना नहीं है, ताकि वे ट्रासंफर की कोशिश नहीं करते। मगर कहां से चकरी चली, उन्हें एसपी बनाकर जिलों में भेज दिया गया। वे कुछ दिन और रायपुर में रह गए होते तो और बड़े जिले संभालने लायक उनकी ट्र्रेनिंग और अच्छी हो गई होती। इसी तरह 2021 बैच के आईपीएस के साथ मजाक किया जा रहा। उन्हें ही कमिश्नरेट में डीसीपी बना दिया गया होता, तो कुछ अफसर भविष्य के लिए तैयार होते। यूपीएससी के दूसरी सबसे प्रतिष्ठित सर्विस में सलेक्ट होकर आए इन अफसरों की स्थिति यह है कि पीएचक्यू में बैठने के लिए जगह नहीं। उन्हें कमरा शेयर करने कहा जा रहा। उधर, बस्तर से जो एसपी लौटे, उनमें गौरव राय को बलौदा बाजार जिला मिला, बाकी सभी को छोटे जिले टिका दिए गए। इससे आरआर याने डायरेक्ट आईपीएस का मनोबल काफी डाउन हो रहा है।

होर्डिंग्स पर स्मृति के तेवर

छत्तीसगढ़ में पिछले एक-डेढ़ दशक से होर्डिंग्स का धंधा पिक पर था। मगर स्मृति ईरानी के तीखे तेवर के बाद लगता है, होर्डिंग्स में जिना लोगों ने इंवेस्ट किया है, उन्हें अब कारपोरेट पर निर्भर रहना होगा। दरअसल, स्मृति ने होर्डिंग्स, बैनर पर सख्ती खुद से नहीं दिखाया। जेन जी के आंदोलन के बाद पीएम नरेंद्र मोदी बैठक में कई बार ताकीद कर चुके हैं, होर्डिंग्स मेें स्कीम और फोटो की बजाए काम कीजिए। हो सकता है, स्मृति ईरानी का इशारा भांप सूबे के सत्ताधारी पार्टी के नेता अब होर्डिंग्स से ज्यादा वास्तवित काम पर फोकस करेंगे।

हफ्ते का कोट

'हर अच्छे काम करने वाले का विरोध होता है। आज के दौर में अगर आपकी छबि अच्छी है, वो भी दूसरों के लिए ईर्ष्या की वजह बन सकती है। इससे बचने का एक ही तरीका है, हार्ड वर्क से अपनी लकीर लंबी करते जाइये, दुनिया फिर आपका लोहा मानेगी।'

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस बड़े बोर्ड के चेयरमैन स्मृति ईरानी के सामान्य सा प्रश्न का जवाब नहीं दे पाए?

2. ऐसा क्यों कहा जा रहा...स्मृति ईरानी को महीने में कम-से-कम हफ्ते भर रायपुर में कैंप करना चाहिए?

शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: ड्रेस कोडः ब्यूरोक्रेसी भी पीछे नहीं



तरकश, 25 अक्टूबर 2026

संजय के. दीक्षित 

ड्रेस कोडः ब्यूरोक्रेसी भी पीछे नहीं 

वैसे वर्दी के मामले में जो हाल पुलिस अधिकारियों का है, कमोवेश वही स्थिति ब्यूरोक्रेट्स का है। आश्चर्य होता है, मुख्यमंत्री की मीटिंगों में अफसर हाफ शर्ट पहनकर चले जाते हैं। पहले सीएम की मीटिंग का एक डेकोरम होता था...एग्जिक्यूटिव फुल शर्ट में जाते थे। आखिर, सीएम जैसे वीवीआईपी की मीटिंग अचानक तो होती नहीं। एक-दो दिन पहले से उसकी जानकारी होती है। हाफ शर्ट तो छोड़िये, कई सिकेट्री जैकेट के उपर आस्तिन चढ़ा लेते हैं। एक सीएस साहब तो हमेशा आस्तिन चढ़ाकर ही सीएम की मीटिंगों में जाते थे। सिस्टम को देखना चाहिए...वीवीआईपी बैठकों की अपनी एक गरिमा होती है।

आईएएस खतम, कंसलटेंट हॉवी

पहले माना जाता था...मसूरी में आईएएस अफसरों की ग्रूमिंग इस तरह की जाती है कि वह कोई भी विभाग चला सकता है। मगर नए दौर में कंसलटेंट ऐसा हॉवी होते जा रहे कि लगता है, कुछ दिन बाद आईएएस की उपयोगिता पर ही कहीं प्रश्न न खड़ा हो जाए। छत्तीसगढ़ में कुछ ज्यादा ही बुरा हाल है। सिस्टम में कंसलटेंट इतना हॉवी होते जा रहे कि बड़ी-बड़ी मीटिंगों में आजकल सिकेट्री के साथ बैठ रहे। एआई और चैट जीपीटी से प्रेजेंटेशन और रिपोर्ट तैयार किया जा रहा। इससे डेटा की सिक्यूरिटी का संकट खड़ा हो गया है। मंत्रालय के अफसर समझ नहीं पा रहे...एआई, चैट जीपीट अमेरिका की कंपनी है, अपना सारा डेटा बाहर जा रहा। इससे पहले इसी स्तंभ में हम इस पर लिख चुके हैं कि जब दसेक साल पहले जब आईएएस की कमी थी, तब कंसलटेंट की जरूरत नहीं पड़ी और आज थोक की संख्या में आईएएस हो गए हैं, तब कंसलटेंट की आवश्यकता क्यों? सिस्टम को भी इस खेल को समझना चाहिए। कंसलटेंट की आड़ में अलाली तो हो ही रही...खोखा का खेल भी चल रहा। वो भी बिना किसी रिस्क के। कंसलटेंट आज है, कल चला जाएगा। कभी किसी गड़बड़ी पर सवाल खड़ा होगा तो सिकेट्री मासूमियत से कह देंगे, कंसलटेंट का फैसला था। दूसरा, कंसलटेंट कंपनियां 50 हजार के आदमी को पांच लाख रुपए में अपाइंट करती है। सरकार से लेती है पांच लाख और उधर मुलाजिम से कैश में साढ़े चार लाख रुपए वापिस ले लेती है। साल में बिना कलम फंसाए अगर अफसरों को दो-तीन खोखा भी मिल गया तो क्या दिक्कत है। गंभीर यह भी...केंद्र सरकार ने बिग फोर कंपनी पर बैन लगाया है, खबर है उसे भी कई विभागों द्वारा काम सौंपा जा रहा। अगर ये बात सही है तो उसे तत्काल प्रतिबंधित करना चाहिए।

प्रोत्साहन का तरीका

आप कभी मंत्रालय जाएं तो एक नंबर गेट के पास एक स्क्रीन चलता दिखेगा। उस पर कई अधिकारियों और कर्मचारियों को पुरस्कार लेते फोटो फ्लैश होता नजर आता है। दरअसल, टाईम पर ऑफिस आने और ई-ऑफिस में बेहतर कार्य करने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने मुख्य सचिव विकास शील हर महीने उन्हें सम्मानित करते हैं। और पूरे महीने स्क्रीन पर उसके फोटो फ्लैश होते रहता है। मंत्रालय में आते-जाते बरबस स्क्रीन पर लोगों का नजर पड़ता है। जाहिर है, जिनसे काम लेना है, उन्हें प्रोत्साहित करने का ये एक तरीका है।

सिंगल पावर सेंटर

स्मृति ईरानी के प्रदेश प्रभारी बनने से अफसरों के एक वर्ग को भी झटका लगेगा। संगठन मंत्री कर्मवीर सिंह भी नए हैं और स्मृति भी। पहले बीजेपी मुख्यालय असंतुष्ट अफसरों के लिए एक ठीहा था। मगर अब स्मृति के पास किसी को जाने का साहस नहीं। कुल मिलाकर सक्षम प्रशासन का फंडा यह है कि पावर सिंगल विंडो होना चाहिए। भले ही इसमें निरंकुश होने का खतरा बना रहता है। मगर इसके बिना काम भी नहीं होता। सिंगल पावर सेंटर से नेताओं और कार्यकर्ताओं को कतिपय शिकायतें हो सकती हैं मगर प्रशासनिक कसावट, रिजल्ट और अनुशासन की दृष्टि से सिंगल पावर सेंटर की अहमियत को खारिज नहीं किया जा सकता। अमूमन हर राज्य में ऐसा होता है, भले ही मुख्यमंत्रियों को इसके लिए आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। मगर उन्हें भी पता है कि इसके बिना काम भी नहीं होने वाला।

हवा में छत्तीसगढ़ के मिनिस्टर

मध्यप्रदेश के दौर में देश का सबसे बड़ा राज्य होने के बाद भी मंत्री सड़क मार्ग से दौरे करते थे। रास्ते में उनका स्वागत-सत्कार चलता था, कार्यकर्ताओं और लोगों से मुलाकातें भी। इससे फायदा यह होता था कि मंत्रियों को सरकारी कामकाज का फीडबैक भी मिल जाता था। मगर इन दिनों सूबे के मंत्रियों का हेलिकाप्टर और प्लेन का प्रेम ऐसा बढ़ा है कि वे सड़क मार्ग से निकलना ही नहीं चाह रहे। बता दें, रमन सिंह और भूपेश बघेल के टेन्योर में मंत्रियों को साल में दो-चार बार हेलिकाप्टर मिल गया तो बहुत था। मगर इस समय हालत जुदा है...अधिकांश मंत्रियों को हेलिकाप्टर चाहिए या प्लेन। रायपुर से बिलासपुर के लिए भी। कल की ही बात है। मंत्रियों को राष्ट्रपति के कार्यक्रम में शामिल होने जगदलपुर जाना था। मंत्री भी सभी नहीं, पांच-सात ही थे। वे चाहते तो रात के डिनर के बाद जगदलपुर रवाना हो सकते थे। मगर उसके लिए दिल्ली से चार्टर प्लेन मंगाया गया। प्लेन वाले ने 70 लाख से अधिक चार्ज कर दिया। क्योंकि, उसने दिल्ली से रायपर आने, रायपुर से जगदलपुर और फिर जगदलपुर से रायपुर और रायपुर से खाली दिल्ली जाने का किराया जोड़ लिया। नए संगठन मंत्री कर्मवीर सिंह को मंत्रियों को ताकीद करनी चाहिए...मंत्री ज्यादा हवा में न उड़े। सड़क मार्ग से चलेंगे तो फायदा मंत्रियों को होगा और सरकार तथा आम आदमी को भी। तभी तो मंत्रियों को भी पता चलेगा कि उनके रिजीम में सड़कों की क्या स्थिति है।

जख्म था पैर में, हाथ....

पीडब्लूडी मंत्री अगर सड़कों के गड्ढों की वजह से स्कूटी रैली में गिर जाएं तो समझा जा सकता है कि उनका दिल कितना जख्मी हुआ होगा...क्योंकि बाकी जख्म तो इलाज से चला जाता है, मगर...। बहरहाल, डिप्टी सीएम के जख्मी होने की बात चर्चा का विषय नहीं बनता और न पूर्व सीएम भूपेश बघेल को उनसे सहानुभूति जताते तंज कसने का मौका मिलता। असल मेें, हुआ ऐसा कि डिप्टी सीएम को लगा कि चोट हाथ में है और इसके बाद वे डांडिया में नाच दिए। जबकि, मेन जख्म पैर में था। डांस करने से तकलीफ बढ़ी तो एक्सरे हुआ और फिर प्लास्टर चढ़ाना पड़ा।

मंत्री अध्यक्ष?

छत्तीसगढ़ में कुछ दिनों से बीेजेपी के अध्यक्ष बदलने की चर्चा बड़ी तेज है। चर्चा को पंख इसलिए भी लगा कि पार्टी प्रमुख किरण सिंहदेव कुछ दिन पहले हादसे में जख्मी हो गए थे। वैसे पहले से भी इस जिम्मेदारी को लेकर वे बहुत उत्सुक नहीं थे। पिछले साल तो मंत्री बनने को लेकर बयान भी दे दिए थे। वो तो पार्टी का शीर्ष नेतृत्व तैयार नहीं हुआ और उन्हें फिर से पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया गया। बहरहाल, किरण सिंहदेव के बदलने के साथ ही विष्णुदेव साय मंत्रिमंडल के एक सदस्य को अध्यक्ष बनाने की अटकलें जोर पकड़ी हुई है। असल में, किरण सिंहदेव का कोई ऐसा विकल्प नहीं दिखाई पड़ रहा, जिसके नेतृत्व में अगला विधानसभा चुनाव लड़ा जा सकें। वो भी जेन जी के दौर में। जिस मंत्री का नाम प्रेसिडेंट के लिए उछल रहा...फेस बढ़ियां हैं। बृजमोहन अग्रवाल के बाद वे बीजेपी के दूसरे नेता होंगे, जिनका बलरामपुर से लेकर दंतेवाड़ा तक कार्यकर्ताओं का नेटवर्क है। हालांकि, ये बीजेपी है। जब तक फैसला हो नहीं जाता, तब तक कुछ कहा नहीं जा सकता।

स्टेट पॉलिटिक्स में तोखन

छत्तीसगढ़ बीजेपी के अध्यक्ष बनने वालों में एक नाम केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू का भी है। वैसे भी स्टेट की पॉलिटिक्स में उनकी दिलचस्पी बढ़ती जा रही है। बताते हैं, तोखन अगर अध्यक्ष ना भी बनें तो अब लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। उनके लिए तखतपुर विधानसभा सीट तैयार की जा रही। क्योंकि, बिलासपुर से अमर अग्रवाल को खो करना आसान नहीं, और ऐसे में अरुण साव के पास लोरमी के अलावा कोई चारा नहीं। ऐसे में अगर चर्चाओं को मानें तो धर्मजीत सिंह सेफ सीट कोटा शिफ्ट करने की तैयारी में हैं। धर्मजीत ने तोखन की लांचिंग के लिए तखतपुर के परसदा में उनके जन्म दिन पर मेगा शो कराया। कोटा कांग्रेस का गढ़ जरूर है मगर पिछले चुनाव में अटल श्रीवास्तव ने खुद के मैनेजमेंट से यह सीट निकाली वरना 500 किलोमीटर दूर से आए प्रबल प्रताप सिंह जूदेव ने कांग्रेस के गढ़ को हिला ही दिया था। धर्मजीत कांग्रेस में रहे हैं, कांग्रेस के भीतर उनके पराने संपर्क हैं ही, अब बीजेपी के नेकवर्क का लाभ भी मिलेगा। कोटा में बीजेपी के पास वैसे भी हमेशा कंडिडेट का टोटा रहा है। 73 साल के धर्मजीत चुनाव तक 75 के हो जाएंगे। सो, आखिरी चुनाव के नाम पर सहानुभूति लेने का प्रयास भी होगा। बहरहाल, बात तोखन की तो उनके लिए भी तखतपुर आसान नहीं रहेगा। राजू सिंह क्षत्री, हर्षिता पाण्डेय का भी अपना प्रभाव है। धर्मजीत जैसे खांटी पॉलिटिशियन के जब तखतपुर सीट छोड़ने की हवा उड़ रही तो तोखन साहू को भी वहां सब कुछ आसान नहीं रहेगा...बशर्ते वे तखतपुर से चुनाव लड़ें।

मंत्री-विधायकों में अज्ञात भय

छत्तीसगढ़ की सत्ता के शीर्ष गलियारों और राजधानी रायपुर के सत्ताधारी खेमे में इन दिनों एक अजीब माहौल को महसूस किया जा रहा है। सत्ता की चमचमाती गाड़ियों में घूमने वाले मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के चेहरों पर साफ तौर पर एक अनजाना दबाव पढ़ा जा सकता है। कारण? 25 अक्टूबर से भाजपा की नवनियुक्त प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी का दो दिवसीय छत्तीसगढ़ प्रवास शुरू हो रहा है। उनके आगमन की खबर ने नेताओं और अफसरों की नींद उड़ा दी है। प्रशासनिक और संगठनात्मक स्तर पर कसते इस शिकंजे के बीच केवल एक ही सवाल हर मंत्री और विधायक की जुबान पर तैर रहा है, क्या स्मृति राज के आगाज के साथ ही कुछ बड़ा होने वाला है? जाहिर है, स्मृति ईरानी के रायपुर की धरती पर कदम रखने से पहले ही दिल्ली से आए फरमानों ने सत्ता और संगठन के बड़े-बड़े महारथियों के पसीने छुड़ा दिए हैं। इस बार हवाई अड्डे से लेकर राजधानी की सड़कों पर होर्डिंग्स, बैनर, पोस्टर या भव्य कट-आउट्स नहीं लगाए जाएंगे। यही नहीं, स्मृति के यहां से एक अत्यंत गोपनीय और सख्त चिट्ठी भेजी गई है। इसमें राज्य सरकार के मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और प्रदेश पदाधिकारियों का डिजिटल ऑडिट माँगा गया है। इस रिपोर्ट कार्ड की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें नेताओं की व्यक्तिगत ब्रांडिंग, आत्ममुग्धता वाली पोस्टर्स या निजी दौरों के प्रचार को पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। ऐसे में, मंत्री, विधायकों में डर तो फैलेेगा ही।

सरकार, विभाग और बपौती!

छत्तीसगढ़ में गजबे हो रहा...पिछली सरकार में डीपीआई में दो राप्रसे अधिकारियों को पोस्ट किया गया तो वहां के मुलाजिम हाई कोर्ट चले गए और इस बार हेल्थ में प्रशासनिक अधिकारियों को बिठाने पर आयुष्मान योजना के नोडल अफसर हाई कोर्ट की शरण में पहुंच गए। ये तो एक तरह की बपौती सरीखा मामला बनता जा रहा। किसको कहां पोस्ट करना है, कहां काम कराना है, ये तय करना सरकार का काम है कि मुलाजिमों का। ऐसे मे ंतो शिक्षकों से इतना सारा कार्य कराया जाता है, वे भी कोर्ट चले जाएंगे। सर्वविदित है, आईएएस के पोस्ट पर कई बार नॉन आईएएस अफसर की पोस्टिंग कर दी जाती है, तब ताकतवर आईएएस लॉबी तो कोर्ट नहीं जाती। सरकार को इस मामले में कड़ा स्टैंड लेना चाहिए वरना लोग सिस्टम को हल्के में लेने लगेंगे। हालांकि, सरकार ने इस बार जरा दमदारी दिखाने की कोशिश की है। आयुष्मान के नोडल अधिकारी को सस्पेंड कर दिया है।

हफ्ते का कोट

'अपने चेहरे से जो जाहिर है, उसे छुपाएं कैसे? तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आएं कैसे? लाख तलवारें बढ़ी आती हो गर्दन की तरफ, सर झुकाना नहीं आता तो झुकाएं कैसे?'

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या किसी कलेक्टर को तांत्रिक अनुष्ठान के लिए नवरात्रि के लॉ एंड आर्डर के दौरान लंबी छुट्टी देने का कोई प्रावधान हैं?

2. एक ऐसे मंत्रीजी का नाम बताइये, जिन्हें अपने विशेष मेकेनिज्म पर इतना भरोसा है कि उन्हें लगता है कि कोई हिला नहीं पाएगा?

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: डेटा का खेल, CM की खरी-खरी



तरकश, 18 अक्टूबर 2026

संजय के. दीक्षित

डेटा का खेल, CM की खरी-खरी

सीएम विष्णुदेव साय ने शुक्रवार को सीएम हेल्पलाईन का रिव्यू किया। इसमें सभी जिलों के कलेक्टर भी वर्चुअली कनेक्ट थे। कुछ जिलों में काफी अच्छे काम हुए हैं मगर कई जिलों में शिकायतों की पेंडेंसी देख सीएम तल्ख हो गए। खासकर, राजस्व मामलों को लेकर...सीमांकन, बटांकन के मामले कई जिलों में बरसों से लंबित पड़े हैं। लोगों ने सीएम हेल्पलाइन में कांप्लेन दर्ज कराया, इसके बाद भी कलेक्टरों ने सुध नहीं ली। उल्टे, रिव्यू के दौरान कुछ कलेक्टरों ने आंकड़ों के जरिये भरमाने का प्रयास किया। इस पर सीएम बोले...डेटा का खेल मत कीजिए...सीएम हेल्पलाईन का निबटारा टाईम लिमिट में होना चाहिए। उन्होंने कवर्धा जिले के एक तहसीलदार को मीटिंग में ही सस्पेंड कर दिया तो एक जिले के तहसीलदार को शोकाज नोटिस जारी किया गया। बताते हैं, कलेक्टरों को यह अनुमान नहीं था कि सीएम सीधे हेल्पलाइन का रिव्यू करेंगे और वो भी कलेक्टरों को कनेक्ट करके। कलेक्टरों को जैसे ही खबर मिली दिन-रात एक कर डेटा का खेल करने का प्रयास किया मगर फिर भी कई पकड़े गए। इसमें सबसे अहम बात यह है कि सीएम ने कहा कि वे अब हर महीने हेल्पलाईन का रिव्यू करेंगे। उधर, रिव्यू के अगले दिन अवकाश होने के बाद भी सीएम सचिवालय हरकत में आया और 13 अफसरों को इसी मामले में नोटिस जारी करवा दिया। खैर, इस स्तंभ में हमने कई बार लिखा है कि कलेक्टर राजस्व मामलों में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं लेते। न वे कोर्ट में बैठते और न कभी तहसील की तरफ झांकने का कष्ट करते। कलेक्टर अगर चाह लें तो महीने भर के भीतर सारे मामले खतम हो जाएंगे, जिसको लेकर लोग सालों से भटक रहे, या फिर लड़ाई-झगड़ा, फसाद, कोर्ट-कचहरी करना पड़ता है। चलिये, अब हर महीने रिव्यू के बाद राजस्व अमले की मनमानी पर कुछ तो अंकुश लगेगा।

सरकारी अस्पताल में कलेक्टर

रायपुर से जस्ट लगे एक बड़े जिले के कलेक्टर की दो दिन पहले तबियत बिगड़ गई थी। उनके पेट में इंफेक्शन था। उन्होंने बड़े प्रायवेट अस्पताल में जाने की बजाए सरकारी हॉस्पिटल में जाना बेहतर समझा। उपचार के बाद अगले दिन वे डिस्चार्ज हो गए। हालांकि, किसी भी चीज के दो पहलू होते हैं। पहला, कलेक्टर को भला क्या दिक्कत हुई होगी...उनके लिए पूरा सिस्टम बिछ गया होगा। या फिर यह...उन्होंने दिखावे के लिए सरकारी अस्पताल को चुना। मगर दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कलेक्टर के अस्पताल में रहने से कम-से-कम दो दिन वहां की व्यवस्था दुरूस्त हो गई होगी। इसी तरह वीआईपी, वीवीआईपी अगर सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए पहुंचने लगे तो निश्चित तौर पर सरकारी अस्पतालों के सिस्टम में सुधार आएगा। डॉक्टर टाईम पर ओपीडी में बैठने लगेंगे, दवाइयां उपलब्ध हो जाएंगी...इसका लाभ कमजोर वर्ग के लोगों को मिलेगा। सो, कलेक्टर ने जो किया, अच्छा किया। बहुत गंभीर बीमारी न हो तो सक्षम और प्रभावशाली लोगों को सरकारी अस्पतालों का रुख करना चाहिए। उससे सरकारी सिस्टम पर आम आदमी का विश्वास बढ़ेगा।

फॉरेस्ट में पोस्टिंग

फॉरेस्ट में सीतानदी टाईगर रिजव से वरुण जैन को बदले जाने की खबर आ रही है। हालांकि, उन्हें डेपुटेशन पर एनआईए में दिल्ली जाना था। मगर अभी तक वहां से कुछ क्लियरेंस मिला नहीं। सो, अब उन्हें बदले जाने की कवायद प्रारंभ हो गई है। वे वहां करीब चार साल से पोस्टेड थे। वरुण को वन भूमि से अतिक्रमण हटाना महंगा पड़ गया। वरुण हटेंगे तो आईएफएस अधिकारियों का एक छोटा चेन बन ही जाएगा। उधर, रेंजर और रेंजर से प्रमोट हुए एसीएफ की पोस्टिंग भी अगले हफ्ते होने के संकेत मिल रहे हैं।

पीएससी चेयरमैन की नियुक्ति

जेन जी के आंदोलन के दौर में छत्तीसगढ़ में पीएससी चेयरमैन और मेंबर के पद पिछले दो महीने से खाली पड़े हुए हैं, यह सरकार के लिए चिंता का सबब बन गया है। दरअसल, भर्तियों को लेकर दागदार हो चुका पीएससी में सरकार किसी ठीकठाक व्यक्ति को बिठाना चाहती है मगर वो तलाश पूरी नहीं हो पा रही। अपुष्ट खबर है, अगले साल रिटायर होने वाली प्रदेश की सबसे सीनियर आईएएस रेणु पिल्ले से इसके लिए पूछा गया, मगर शायद वह तैयार नहीं हुईं। दूसरा कोई डायरेक्ट आईएएस इस समय रिटायर नहीं होने वाला। वैसे, 62 वर्ष वाले इस पोस्ट पर रिटायरमेंट के बाद कोई ब्यूराक्रेट्स आना नहीं चाहता क्योंकि 60 में रिटायर होने के बाद उसे दो साल ही मिलता है। डीजीपी मोहन शुक्ला, अशोक दरबारी, और आईएएस केएम पिस्दा नौकरी से वीआरएस लेकर चेयरमैन बने थे, इसलिए उन्हें पीएससी में ठीकठाक टाईम मिल गया था। मगर पोस्ट रिटायरमेंट के लिए बाकी अफसर पांच साल वाली पोस्टिंग को प्राथमिकता देते हैं। कुल मिलाकर ताजा अपडेट यह है कि अगले हफ्ते किसी भी दिन नए चेयरमैन और सदस्यों की नियुक्ति हो जाएगी। चेयरमैन की तलाश सरकार ने पूरी कर ली है। खबर है, कोई बढ़ियां पोस्टिंग होने वाली है।

ट्रांसफर में अब मनीराम नहीं?

छत्तीसगढ़ के कई मंत्रियों ने ट्रांसफर का शो-रुम खोल लिया था, उस पर अब ब्रेक लग सकता है। दरअसल, नव नियुक्त प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी से सूबे के एक बीजेपी लीडर सौजन्य भेंट करने गए थे। वहां जाने से पता चला कि प्रदेश प्रभारी को छत्तीसगढ़ आए बिना ही सब कुछ पता चल चुका है...कौन मंत्री क्या कर रहा है। जाहिर है, पिछली सरकार में ये खेल शुरू हुआ था, मगर इस समय एक कदम आगे वाली स्थिति है। पोस्टिंग के बाद अब हर साल रिचार्ज सिस्टम लागू हो गया है। स्थिति इतनी बदतर हो गई है कि पोस्टिंग से पहले बोली लग रही। अच्छे अफसर लूप लाईन में और खटराल अधिकारी मौज काट रहे। इससे सिस्टम की साख पर असर पड़ रहा...सरकार द्वारा किए जा रहे ऐतिहासिक सुधार के कार्य भी दब जा रहे। बहरहाल, ऐसे मंत्रियों की अब शामत आ सकती है...स्मृति किस अंदाज में बात करती है, बताने की जरूरत नहीं।

तीन नए डीजी और रोड़ा

छत्तीसगढ़ में तीन आईपीएस अफसरों को डीजी बनाए जाने की अटकलें बड़ी तेज हैं। यह जरूरत इसलिए पड़ रही कि डीजी बनने की 30 साल की एजिबिलिटी तीन आईपीएस अधिकारियों ने क्रॉस कर लिया हैं। एक तरह से कहा जाए, तो यह उनके साथ अन्याय है। खासतौर से एसआरपी कल्लूरी के साथ। सरगुजा से नक्सलियों का पैर उखाड़ने वाले 94 बैच के आईपीएस कल्लूरी को 2024 में ही डीजी बन जाना चाहिए था। उनके दोनों बैचमेट डीजी बन चुके हैं। मगर वे बेचारे अभी भी मुुंह ताक रहे। उनके अलावे 95 बैच के प्रदीप गुप्ता और 96 बैच के विवेकानंद का भी प्रमोशन ड्यू है। असल में दिक्कत यह है कि छत्तीसगढ़ में डीजी के पद चार ही हैं। दो कैडर और दो एक्स कैडर। इस पर अरुणदेव गौतम, पवनदेव, जीपी सिंह और हिमांशु गुप्ता पोस्टेड हैं। इनमें से गौतम के अगले साल जुलाई में रिटायर होने पर एक पद खाली होगा और दूसरा जुलाई 2028 में पवनदेव के जाने के बाद। बाकी जीपी और हिमांशु का रिटायरमेंट में काफी टाईम है। इसको देखते सरकार ने तय किया कि कल्लूरी, प्रदीप और विवेकानंद को स्पेशल डीजी बना दिया जाए। इसके लिए फाइल भी चली है मगर उसमें लिंगारान करने की कोशिशें शुरू हो गई हैं।

पुलिस का दुर्भाग्य या...?

पद खाली नहीं रहने पर राज्य सरकार को डीजी बनाने का अधिकार है। पंजाब में इस समय ऐसे 12 डीजी हैं। छत्तीसगढ़ में भी रमन सरकार ने 2029 में विधानसभा चुनाव के आचार संहिता के आधा घंटा पूर्व कैबिनेट के जरिये संजय पिल्ले, आरके विज और मुकेश गुप्ता को डीजी बनाया था। उस समय पिल्ले के लिए एक पद वैकेंट था मगर विज और गुप्ता के लिए पद नहीं था। अब सुनने में आ रहा कि नए डीजी के लिए ब्रेकर लगाए जा रहे हैं...भारत सरकार से अनुमति मांगने की बातें हो रही। उसके लिए पिछली सरकार का हवाला दिया जा रहा कि सरकार ने संजय पिल्ले, आरके विज और मुकेश गुप्ता को डिमोट कर दिया था। मुकेश गुप्ता जब कोर्ट गए तो सरकार ने तर्क दिया कि बिना केंद्र की अनुमति के डीजी बना दिए गए थे। मगर सवाल यह भी उठता है कि मुकेश गुप्ता का नाम उसमें अगर शामिल नहीं होता तो पिछली सरकार ऐसा करती क्या। कुल मिलाकर राज्य कैबिनेट चाहे तो दो साल के लिए डीजी बना सकता है। आखिर, इसी सरकार ने पद ना होने के बाद भी आईएफएस एसएस बजाज को पीसीसीएफ बनाया ही था। फिर अभी पिछले साल भी पीसीसीएफ के मामले में राज्य सरकार ने जब केंद्र से पूछा तो वहां से यही लिखकर आया, राज्य सरकार सक्षम है। कुल मिलाकर पुलिस महकमे का ये दुर्भाग्य कहें या नाकारापन कि केंद्र सरकार नक्सलियों के खात्मा करने को लेकर वाहवाही लूट रही, उस राज्य की पुलिस अपने अफसरों के लिए डीजी का पोस्ट क्रियेट नहीं करवा पा रही।

नाइंसाफी की पराकाष्ठा!

जब पुलिस मुख्यालय अपने सीनियर अफसरों के सम्मान का ध्यान नहीं रख रहा तो राज्य पुलिस सेवा और उसके नीचे वालों के बारे में भला कौन सोचने वाला है। राज्य पुलिस सेवा का हाल ये है कि 2005 बैच के सभी अफसर अभी आईपीएस नहीं बने हैं। जबकि, राज्य प्रशासनिक सेवा में 2013 बैच का आईएएस बनना प्रारंभ हो गया है। याने रापुसे अधिकारी राप्रसे से आठ साल पीछे चल रहे हैं। बाकी नीेचे वाले बेचारे टीआई, एसआई और सिपाही-हवलदार को कौन पूछता है। विडंबना तो ये है...ये तब हो रहा, जब छत्तीसगढ़ में अब तक के सबसे काबिल गृह मंत्री हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय में उनका सीधा कनेक्शन है। ऐसा लगता है, पुलिस वाले खुद भी इतनी गुटबाजी में व्यस्त हैं कि गृह मंत्री से समक्ष अपना पक्ष रख भी नहीं पाते होंगे। बहरहाल, पुलिस अफसरों को एक बार चीफ सिकेट्री को भी प्रेजेंटेशन देना चाहिए। सीएस आखिर पूरे राज्य के प्रशासनिक प्रमुख होते हैं। किसी भी विभाग का डीपीसी आरगेनाइज करने से लेकर कैबिनेट के पदेन सिकेट्री भी होते हैं।

पर्यटन और विप्र

पर्यटन विभाग को स्थापित करने का दायित्व सरकार ने ब्राम्हण अफसरों को सौंप दिया है। इस समय बोर्ड के चेयरमैन हैें नीलू शर्मा। एमडी बनाया गया है आईएएस सौमिल रंजन चौबे को। राज्य प्रशासनिक सेवा की अधिकारी पूनम शर्मा और पुष्पेंद्र शर्मा डीजीएम हैं। इनके नीचे भी कई ब्राम्हण अधिकारी अनुराधा दुबे, राकेश मिश्रा...पर्यटन बोर्ड में अहम दायित्व संभाल रहे हैं। पर्यटन बोर्ड में इस पर खूब चुटकी ली जा रही...पर्यटन को उबारने के लिए सरकार ने विप्र जनों को ही क्यों चुना?

ट्रांफसर पर यू टर्न

राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के ट्रांसफर में भले ही लेट हुआ मगर सिस्टम ने अच्छा काम किया। वरना, पहले तो 10 से 25 पेटी की बोली लग रही थी। सीएम सचिवालय ने लिस्ट पर पहले ब्रेक लगाया और फिर 150 अफसरों की लिस्ट जारी की तो उसे काफी एप्रिसियेट किया गया। उतनी बड़ी लिस्ट में आठ-दस ही एप्रोच, सिफारिश वाले होंगे। मगर कल शुक्रवार को जीएडी ने 18 अफसरों का संशोधित लिस्ट जारी किया, उसका मैसेज अच्छा नहीं गया। आखिर, रायपुर में चार साल से जमे कोई राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी को हटाया क्यों नहीं जाना चाहिए? ऐसे कई लोग सिफारिश की बदौलत अपना ट्रांसफर चेंज कराने में सफल हो गए। हो सकता है, इसके पीछे राजनीतिक मजबूरियां हों मगर उसके लिए भी कई तरीके हैं। चार-छह महीने बाद भी उन्हें चेंज किया जा सकता था।

मंत्रिमंडल में असंतुलन

25 अक्टूबर को नई प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी आ रही हैं। उनके दौरे का शेड्यूल आने के साथ ही मंत्रिमंडल में फेरबदल की अटकलें शुरू हो गई है। मंत्रिमंडल की सर्जरी में सबसे बड़ा इश्यू होगा रिजल्ट देने वाले चेहरों के साथ क्षेत्रीय असंतुलन को ठीक करना। अभी स्थिति यह है कि सरगुजा से चार मंत्री हैं, और बस्तर से सिर्फ एक। अगल-बगल की सीट से पार्टी ने दो-दो डिप्टी सीएम बना दिया। जाहिर है, लोरमी और कवर्धा लगभग लगा हुआ ही है। फिर उसी लोरमी से केेंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू भी। यही नहीं, विभागों के बंटवारे में भी यही स्थिति है। अब सर्जरी में बस्तर का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाएगा। हो सकता है, बस्तर से अब तीन मंत्री हो जाएं। सरगुजा में खतरा लक्ष्मी राजवाड़े और राजेश अग्रवाल को ज्यादा दिख रहा। अब स्मृति ईरानी की नजर तिरछी हो जाए तो बात अलग है वरना सरगुजा से श्याम बिहारी खुद को काफी मजबूत पोजिशन में कर लिए हैं। टंकराम वर्मा और दयालदास बघेल को लेकर भी डेंजर जोन का परसेप्शन बना हुआ है। मगर बीजेपी की सियासत में जब तक शपथ लेने वाले मंत्रियों की लिस्ट फायनल न हो जाए, तब तक गारंटी के साथ कुछ कहा नहीं जा सकता।

75 परसेंट विभाग बदलेंगे

जैसे की खबरें आ रहीं...मंत्रिमंडल में सिर्फ सर्जरी ही नहीं होगी, 75 परसेंट विभाग भी बदले जाएंगे। मंत्रियों के चेहरे बदलने के साथ विभाग बदलने का मकसद ये है कि आम आदमी को सिस्टम में बदलाव महसूस हो। और फिर यह भी कि जो मंत्री तीन साल में कुछ नहीं कर पाया अब डेढ़ साल में क्या ही कर लेगा। इससे अच्छा है कि उसका विभाग ही बदल दिया जाए। नया मंत्री कम-से-कम कुछ तो अच्छा करने का प्रयास करेगा।

हफ्ते का कोट                  

'जब आप दूसरों के लिए अच्छा चाहते हैं, तो वही अच्छी चीजें आपके जीवन में वापस आती है। यही प्रकृति का नियम है।' और, 'यदि कोई आपकी गलती आपके मुंह पर कहने की ताकत रखता है, तो उससे अच्छा मित्र और कोई हो नहीं सकता।'

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या विष्णुदेव साय मंत्रिमंडल का कोई सदस्य बन सकता है बीजेपी का नया प्रदेश अध्यक्ष?

2. पीएससी का नया चेयरमैन अफसरशाही से होगा या कोई शिक्षाविद या टेक्नोक्रेट?

रविवार, 11 अक्टूबर 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: अफसर...और घर की मुर्गी

 


तरकश, 11 अक्टूबर 2026

संजय के. दीक्षित

अफसर...और घर की मुर्गी

छत्तीसगढ़ कैडर के एक आईएफएस अधिकारी की मिस यूपी रह चुकी खूबसूरत युवती से बड़ी धूमधाम से शादी हुई थी। उनका एक बड़ा प्यारा बेटा भी हुआ। मगर आठ साल बाद अब स्थिति यह है कि पत्नी अपने पति की लंपटई और प्रताड़ना को लेकर सोशल मीडिया पर गुहार लगा रही है। पत्नी का आरोप है...पति ने मेरा जीवन तबाह कर मुझे मायके में शरण लेने मजबूर कर दिया। आईएफएस अफसर का सूबे की एक चर्चित महिला डीएसपी से लंबे समय से यराना रहा है। राजधानी रायपुर में शायद ही कोई अनभिज्ञ होगा कि महिला डीएसपी का पहले आईएफएस के साथ संबंध रहा। बाद में एक कारोबारी की इंट्री हुई और उसके बाद वे मैदान से आउट हो गए मगर आईएफएस अभी भी पिच पर बने हुए हैं। खैर, फंडा यह है कि कई लोगों के लिए खूबसूरती मैटर नहीं करता। खासकर, आईएएस, आईपीएस और आईएफएस जैसे ऑल इंडिया सर्विस के अफसरों के लिए, जिनके पास 'पावर' और 'पैसा' दोनों होता है। चूकि ये देश की सबसे बड़ी सर्विस में सलेक्ट होते हैं, लिहाजा आमतौर से पत्नियां खूबसूरत ही मिलती हैं। मगर बड़े अफसर बनने के बाद गुलाटी मारना जब 'इनबिल्ट' हो जाए, तो बेचारी पत्नी क्या कर सकती है। बेशक, छत्तीसगढ़ के 80 परसेंट से अधिक आईएएस, आईपीएस और आईएफएस लंगोट के ढीले हैं। मौका मिला नहीं कि हर-हर गंगे। उपर से भारी इनोसेंट दिखने वाले कई अफसरों को लेकर विश्वास नहीं होगा...मगर उनके चटपटे किस्से सुन आप दंग रह जाएंगे। जब से डीएमएफ आया है, अधिकांश कलेक्टरों का भी यही हाल है...कईयों ने चरित्रहीनता की पराकाष्ठा कर दी है। दरअसल, यूपीएससी क्रेक कर आए हैं, चतुर तो वे होते ही हैं...पोस्टिंग मिलते ही पीए को बोलते हैं, सबसे अच्छी वाली गाड़ी मैडम के लिए घर भेजो। पत्नियां सप्लायरों, ठेकेदारों से मिलने वाले महंगे गिफ्ट, ज्वेलरी और लग्जरी सुख-सुविधाओं में उलझ जाती है। उधर पति लोग मीटिंग के बहाने मुंबई, गोवा में बंदरों टाईप गुलाटी मारने निकल जाते हैं। बहरहाल, बात आईएफएस की मिस यूपी बीवी पर तो पत्नी कितनी भी खूबसूरत हो जाए...आखिर, एक देसी कहावत है...घर की मुर्गी दाल बराबर।

कदाचरण...एक्शन क्यों नहीं?

87 बैच के आईएएस अजयपाल सिंह की पत्नी सरकार और मीडिया के दरवाजों पर पति की प्रताड़ना को लेकर गिड़गिड़ाती रही। हालांकि, उनकी पीड़ा लंपटई को लेकर नहीं थी। बावजूद इसके उस समय की बीजेपी सरकार ने कभी उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं सौंपी। बाद में ड्यूटी से महीनों गायब रहना, कामकाज में लापरवाही के मामले में उन्हें फोर्सली रिटायर कर दिया गया। मगर इस समय आईएफएस की पत्नी अपने पति की लंपटई पर गुहार लगाते बिलख रही है। ऐसे अफसर को सिस्टम ने बड़े डिविजन डीएफओ बनाकर रखा है। ये ठीक नहीं। इसे आप पति-पत्नी का पर्सनल विवाद बोल खारिज नहीं सकते। इससे पूरे देश में छत्तीसगढ़ कैडर मजाक बनता है। फिर डीएसपी प्रकरण में जो जांच हुई है, खुफिया विभाग के पास इसके इनपुट्स भी तो होंगे ही। फिर भी ऐसे आंख क्यों मूंदना?

अफसर, पत्नी और अलार्म

करीब 22 साल से छत्तीसगढ़ की अफसरशाही को कवरेज करते बड़े करीब से वाकिफ हूं। जो अफसर पत्नी को लिमिट से ज्यादा वेटेज देते हैं। सार्वजनिक जगहों पर साथ जाएंगे, तारीफ के पुल बांधते मिलेंगे। डीपी, स्टेट्स में भी साथ-साथ। ऐसे अफसर लंगोट के ज्यादा ढीले होते हैं। हो सकता है, इसमें इक्का-दुक्का अफसर अपवाद हों, अलबत्ता, एक इंटरनेशनल रिसर्च में ये बात निकलकर आई है कि विवाहेत्तर संबंध रखने वाले अधिकांश लोग पत्नी को काफी खुश रखने का प्रयास करते हैं। एकदम चापलूस की तरह। इसलिए...ताकि उसे कोई संदेह न हो। खैर, ऐसे ब्रीड वाले अफसरों के लिए अब संभावनाओं के द्वार काफी खुल गए हैं। मंत्रालय से लेकर इंद्रावती भवन और कलेक्ट्रेट तक अब कारपोरेट, कंसलटेंट की आड़ में मेट्रो सिटी की आधे-अधूरे वस्त्र पहनी हनी गर्ल भौंरे की तरह मंडरा रही हैं। कुल मिलाकर घोर कलयुग आ गया है... अफसरों की पत्नियों को अत्यधिक अलर्ट रहने की जरूरत है।

बीजेपी में भी ग्लेमर

कांग्रेस चूकि बरसों सत्ता में रही है, इसलिए उसके बड़े-बड़े नेताओं की अनगिनत कहांनियां रही हैं। मगर अब शुचिता के लिए जानी जाने वाली बीजेपी भी इससे अछूती नहीं। छत्तीसगढ़ में चौथी बार सत्ता में आई बीजेपी भी अब ग्लेमरस महिलाओं से प्रभावित दिखती हैं। बरसों से पार्टी का झंडा, बैनर उठाने वाली महिलाएं किनारे हो गई हैं, और हाल के दिनों में पार्टी में घुसी महिला नेत्रियां अब आगे होती जा रहीं। बिलासपुर की एक घटना को लेें...एक ग्लेमरस युवती ने पार्टी में पद दिलाने का लालच देकर एक बीजेपी कार्यकर्ता से 82 लाख रुपए ठग लिया। अरसा गुजर जाने के बाद जब उसे पार्टी में कोई पद नहीं मिला तो उसने पुलिस की शरण ली। कुछ महीने पहिले बिलासपुर की ही एक ग्लेमरस नेत्री ने थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी...एक ठेकेदार ने उससे कार में दुष्कर्म किया। उधर, ठेकेदार ने कहा, उल्टे काम दिलाने के लिए नेत्री ने उससे एक करोड़ रुपए हड़प लिया। अब असलियत क्या थी, वे दोनों जाने। लेकिन, अब कमाल ये कि नेत्री फिर बिलासपुर से लेकर रायपुर तक, बड़े-बड़े नेताओं के साथ खूब फोटो खिंचवा रही। पता नहीं, छत्तीसगढ़ में पोस्टेड भारी-भरकम अमला वाली केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियां क्या कर रही हैं। आखिर, कुछ ऊँच-नीच हुआ तो नाम तो पूरी पार्टी का खराब होगा न। क्योंकि, बीजेपी नेता भी आखिरकार हैं इंसान ही न!

कलेक्टर, कोर्ट रुम और मॉनिटरिंग

विधानसभा अध्यक्ष के जिले राजनांदगांव से एक अच्छी खबर है। वहां राजस्व मामले के निबटारे में 94 से लेकर 100 परसेंट तक कामयाबी मिली है। छत्तीसगढ़ में ये अपने आप में एक रिकार्ड होगा। जाहिर है, जमीन जायदाद के मामले तहसीलों में सालों तक अटके रहते हैं। पिछले तरकश में राजस्व मामलों का जिक्र होने पर अगले दिन बलरामपुर से लेकर भोपालपटनम तक से कमेंट्स और शिकायतों की बाढ़ आ गई थी। लोग दुखड़ा रो रहे थे, फलां तहसीलदार ने इतने महीने से फाइल दबा कर बैठा है तो किस तरह सरगुजा जिले की एक कलेक्टर ने कमिश्नर से बोल जमीन विवाद पर स्टे लगवा दिया...इसलिए कि एक समाज विशेष के एक आदमी ने जमीन पर कब्जा किया है। इससे लॉ एंड आर्डर की स्थिति उत्पन्न होती, तो उन्हें झेलना पड़ता। सरकार को कम-से-कम रेवेन्यू मामलों को हर महीने समीक्षा करनी चाहिए कि किस जिले मेें कितनी पेंडेंसी है। ई-ऑफिस के बाद भी अगर तहसीलदार, एसडीएम महीनों फाइलें दबाकर बैठे रहें तो ये दुर्भाग्यजनक है। दूसरा, अब तो ऑनलाइन और सीसीटीवी का दौर है। चीफ सिकेट्री खुद भी अधिकारियों के अटेंडेंस पर नजर रख रहे। सीसीटीवी से सीधे पता चल जाएगा कि कौन कलेक्टर महीने में कितने दिन कोर्ट रुम में बैठता है। वास्तविकता यह है कि 80 परसेंट कलेक्टर कोर्ट में बैठते नहीं। एडिशनल कलेक्टर को कोर्ट सौंप देते हैं। राजनांदगांव को मॉडल बनाकर अगर मंत्रालय से कलेक्टरों की मॉनिटरिंग प्रारंभ हो जाए तो चीजें काफी सुधर जाएंगी। क्योंकि, आंकड़े बताते हैं, सबसे अधिक किसी विभाग में भ्रष्टाचार है तो वह राजस्व विभाग में है। और आम आदमी सबसे अधिक त्रस्त भी इसी विभाग से है।

पहले के कलेक्टर और अबके

आज से दो दशक पहले कलेक्टर जमकर दौरे भी करते थे और रेगुलर कोर्ट में बैठकर राजस्व केसों का निबटारा भी करते थे। तब जिले काफी बड़े होते थे। केसों की संख्या भी काफी होती थी। मगर अब दो-दो, तीन-तीन ब्लॉक के जिले हो गए, उसके बाद भी कलेक्टरों के पास राजस्व मामलों का रिव्यू करने टाईम नहीं। ऐसा नहीं कि पहले के कलेक्टर पैसा नहीं कमाते थे। वे पैसा भी कमाते थे और दबाकर काम भी करते थे। अभी विडंबना यह है कि कलेक्टर सुबह से कैलकुलेटर लेकर बैठ जाते हैं, डीएमएफ का पैसा कहां और कैसे खर्च किया जा सकता है, काम-वाम से ज्यादा कोई मतलब नहीं। और, सिस्टम ने जिन्हें ईमानदारी के बेसिस पर कलेक्टर बनाया है, वे मूरत बनकर ऑफिस में बैठे रहते हैं, उन्हें आम आदमी से कोई मतलब नहीं। अलबत्ता, इस स्तंभ में पहले भी कई बार लिखा जा चुका है...छत्तीसगढ़ में कलेक्टरों की वर्किंग खराब करने में सबसे बड़ा रोल डीएमएफ का है। कायदे से अघोषित तौर से इसे सरकार को अपने नियंत्रण में लेना चाहिए। नियंत्रण का मतलब ये कि भारत सरकार ने कलेक्टरों को डीएमएफ का हेड बनाया है, इसलिए उन्हें बदल तो सकते नहीं। मगर सरकार चाहे तो काम कराने से पहले पूछ सकती है... रिव्यू कर सकती है कि वो जो काम करने जा रहे, उसकी जनहित में कितनी उपयोगिता है। कई जिलों में सप्लायर तय करते हैं...डीएमएफ में क्या होना चाहिए। इसका एक बानगी देखिए। एक सप्लायर हाथी प्रभावित कई जिलों के कलेक्टरों को बताया कि हाथी आएगा, तो मोबाइल पर अलर्ट आएगा। इसी में उसने डीएमएफ से करोड़ों रुपए ऐंठ लिया। इससे कलेक्टर भी खुश और सप्लायर भी। मगर जंगलों में रहने वाले आम लोगो का कोई भला नहीं हुआ, क्योंकि वे मोबाइल नहीं देखते। मगर डीएमएफ का पैसा खर्च करना था, वो काम हो गया। अलबत्ता, पिछली सरकार में डीएमएफ पर रायपुर से नियंत्रण करने का प्रयास किया था, भले ही उसकी मंशा और दिशा सही नहीं रही।

कलेक्टरों के इनोवेशन पर ब्रेक

प्रशासनिक कामकाज को पटरी पर लाने के लिए सिस्टम को एक काम अवश्य करना चाहिए। वह है कलेक्टरों के इनोवेशन पर अंकुश लगाना। दरअसल, होता ऐसा है कि वाहवाही लुटने या फिर पीएम अवार्ड के लिए कलेेक्टर एक-न-एक नवाचार का काम ढूंढ लेते हैं और फिर वही उनके लिए टॉप प्रायरिटी बन जाता है। फिर जनता से जुड़े बाकी काम गौण। आलम यह कि पिछले कलेक्टर ने अगर कोई बढ़ियां लोक कल्याणकारी काम प्रारंभ किया है, तो उसके तरफ देखना नहीं। जबकि, होना ऐसा चाहिए कि कोई कलेक्टर अगर अच्छा काम शुरू किया है तो नए वालों की भी जिम्मेदारी बनती है कि उसे आगे बढ़ाए। जाहिर है, छत्तीसगढ़ बनने के बाद सिर्फ कलेक्टर ओपी चौधरी का दंतेवाड़ा का काम दिख रहा, जिसके लिए उन्हें पीएम अवार्ड मिला। बाकी पीएम अवार्ड वाले क्या काम किए, किसी को याद नहीं। मुख्य सचिव के पास अब तो एक स्पेशल सिकेट्री भी आ गई हैं। कलेक्टरों के कामकाज का पूरा हिसाब सीएस ऑफिस में होना चाहिए। और ट्रांसफर के बाद नए वाले को ज्वाईनिंग से पहले बुलाकर बताना चाहिए कि उसे किन कामों को कंटीन्यू करना है, या फोकस बनाकर रखना है। इससे चीजें काफी सुधरेंगी। क्योंकि, कलेक्टरों की खुद की वाहवाही में जनता के पैसे का काफी नुकसान होता है।

बीजेपी के इंफ्लुएंसर

सत्ताधारी पार्टी को एजेंसियों पर इतना कांफिडेंस नहीं पाल लेना चाहिए। क्योंकि, अब चुनाव में ज्यादा समय नहीं बचा है। बात है दिल्ली से बुलाए गए सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर की। बीजेपी को बुलाना ही था तो चार-पांच को ही बुलाते मगर ठीकठाक का चयन करते। कम-से-कम प्रोफाइल तो देख लेते कि जो इंफ्लएंसर आ रहा, उसका खुद का कितने सबस्क्राबर और व्यूज हैं। मगर एजेंसी से ऐसे-ऐसे लोगोें को पकड़ लाई कि पूछिए मत! एक तो थोक की संख्या में आए। दूसरे छत्तीसगढ़ की ब्रांडिंग करने की बजाए यहां के लोगों के साथ फोटो खिंचवा खुद अपना व्यूज बढ़ा रहे हैं। उससे अच्छा छत्तीसगढ़ के कस्बा, जिलों के लोकल इंफ्लुएंसर को इतना मान-सम्मान दे दिए होते तो पार्टी के लिए फायदेमंद होता। जस्ट ये एक सुझाव है, बाकी तो बीजेपी जाने।

हफ्ते का कोट

आपकी शख्सियत अच्छी होगी तभी लोग आपमें बुराइयां खोजेंगे, वरना बुरे की तरफ देखता ही कौन है।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. किस जिले की महिला कप्तान पुलिस मुख्यालय के प्रभावशाली अफसर की भी परवाह नहीं कर रही?

2. क्या ये सही है कि मंत्रिमंडल में अब सर्जरी दिवाली के बाद ही होगी?


रविवार, 4 अक्टूबर 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: 18 बरस का 'तरकश'



संजय के दीक्षित

तरकश, 4 अक्टूबर 2026

18 बरस का 'तरकश'

NPG.NEWS वेबसाइट का सबसे लोकप्रिय साप्ताहिक स्तम्भ 'तरकश' ने अपने सफर के 18 बरस पूरे कर लिया है. 2008 में हरिभूमि समाचार पत्र में इस स्तंभ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था। जाहिर है, किसी भी स्तंभ के लिए सबसे जरूरी होती है उसकी निरंतरता। 'तरकश' ने इस पैरामीटर पर खरा उतरने का पूरा प्रयास किया। इन 18 बरसों में बड़े कम मौके आए...जब विषम परिस्थितियों में तीर नहीं चल पाए। वरना...छत्तीसगढ़ में रहे, या छत्तीसगढ़ से बाहर, कॉलम का क्रम टूटा नहीं। इस डेढ़ दशक के लगातार सफर का क्रेडिट जाता है छत्तीसगढ़ के उन लाखों सुधि पाठकों को, जिनका भरोसा समय के साथ और मजबूत होता चला गया। हर रविवार...पाठकों के घनघनाते फोन और मैसेज ने प्रेरित किया कि कठिन हालातों में भी ’तरकश’ कभी रुकना नहीं चाहिए। और वैसा ही हुआ। 2008 में यह स्तंभ प्रारंभ हुआ, उसके बाद चार विधानसभा चुनाव हुए। सरकारें बदली। सिस्टम बदला। मगर स्तंभ न रुका, न तेवर बदला। यह एक तपस्या की तरह रहा। पर्सनल राग-द्वेष से बिल्कुल दूर। इस चक्कर में कई बार अपने भी आहत हुए...दुखी हुए। मगर फिर जुड़ गए। क्योंकि मंशा साफ थी। बहरहाल, किसी एक अखबार में किसी कॉलम की 18 बरस याने डेढ़ दशक की यात्रा कम नहीं कही जा सकती। जाहिर है, 2008 में जन्मे बच्चे आज वोटर हो गए हैं। जब यह स्तंभ प्रारंभ हुआ, तब संवाद प्रेषण का जरिया सिर्फ एसएमएस था...और थोड़ा बहुत फेसबुक। व्हाट्सएप का अविष्कार नहीं हुआ था। इस अनवरत सफर के लिए हरिभूमि पत्र समूह और उसके प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी को आभार...जिन्होंने 'तरकश' जैसे प्रहारक स्तंभ के लिए अपना प्लेटफार्म उपलब्ध कराया। आभार छत्तीसगढ़ के उन लाखों 'सुधि पाठकों' का भी...जिनकी बदौलत 'तरकश' का सफर अविराम जारी है।

पब्लिक के हक पर डाका!

बात 14 साल बरस पुरानी है। 2012 की। राजधानी रायपुर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए भारत सरकार से 100 बसें मिली थीं। उसी दौरान...यही कोई अक्टूबर का महीना होगा। मंत्रालय और विभागाध्यक्ष कार्यालय रायपुर से नवा रायपुर में शिफ्थ किए जा रहे थे। सिस्टम ने पब्लिक के लिए मिली बसों को नवा रायपुर जाने वाले कर्मचारियों के लिए लगा दिया। तब शायद बेंगलुरू की कंपनी से कंट्रेक्ट यह हुआ था कि कर्मचारियों को नवा रायपुर ले जाने, ले आने के बाद बचे समय में रायपुर शहर में बसों को चलाई जाएगी, ताकि आम आदमी को उसका फायदा मिल सकें। कुछ दिन तक ऐसा हुआ भी, मगर बाद में कंपनी ने शहरों में बसें चलानी बंद कर दी। क्योंकि, कंपनी को जब कर्मचारियों को लाने-ले जाने पर ही भरपूर पैसा मिल जा रहा तो फिर आम आदमी की उसे परवाह क्यों होनी चाहिए। आजकल सारी बसें दिन भर मंत्रालय के आसपास ख़डी रहती हैं. हालांकि, अफसर कागजों में दावा करते हैं कि 20 बसें अभी भी शहर में चल रही मगर वो किधर चलती है, कभी किसी को दिखी नहीं। याने पब्लिक को मिली 100 बसों की सुविधा छीन गई।

तीन विभागों का घनचक्कर

कर्मचारियों के लिए बसें चलाने में तीन विभाग इंवाल्व हैं। सामान्य प्रशासन विभाग एनआरडीए को पैसा देता है। एनआरडीए ने बसों का संचालन का जिम्मा रायपुर नगर निगम को दे दिया है। अब आप बसों की शर्तों के बारे में जीएडी से पूछेंगे तो वह एनआरडीए पर डाल देगा और एनआरडीए के पास जाइयेगा तो वह नगर निगम से पूछिए। बताते हैं, जीएडी 2700 रुपए प्रति कर्मचारी के हिसाब से कंपनी को हर महीने इन बसों के लिए 90 लाख रुपए देता है। इस 90 लाख में कंपनी का काम सिर्फ ड्राईवर और फ्यूल का इंतजाम करना है। बाकी बसें तो भारत सरकारी से मिली है। इसमें ये भी एक लोचा है कि बड़ी संख्या में कर्मचारी नवा रायपुर में रहने लगे हैं और काफी संख्या में वे अपने साधन से आते हैं। मगर उन्होंने बस के पास सरेंडर नहीं किए हैं। दूसरा फ्री की बस सेवा सिर्फ सरकारी कर्मचारियों के लिएा थी, मगर प्लेसमेंट के कर्मचारी भी इस सरकारी सुविधा का लाभ उठा रहे। अब मुश्किल यह है कि 12 बरस में बसें कंडम होेती जा रही हैं। दो बार आग लगने की घटना हो चुकी है। सिस्टम उलझन में है कि नई बसें कैसे खरीदी जाए और फिर कर्मचारियों को और कितने साल तक फ्री ट्रांसपोर्ट की सुविधा मुहैया कराई जाए। दरअसल, इस पर सहमति नहीं बन पा रही। अफसरों के एक वर्ग का मानना है कि 14 साल फ्री सर्विस बहुत होता है...फिर अब तो नई राजधानी में आवास भी खाली पड़़े हैं। तो दूसरे वर्ग को लगता है फ्री सेवा बंद करने से कहीं कर्मचारी नाराज न हो जाएं। क्योंकि, सवाल तो उठेगा...करोड़ों का बंगला लेने के बाद भी मंत्री कौन सा नवा रायपुर में आकर रह रहे हैं।

अफसर को संविदा पोस्टिंग

राज्य बनने के 25 साल मेे यह दूसरी बार हुआ कि किसी ऑल इंडिया सर्विस के अफसर ने वीआरएस लिया और फिर से उसे संविदा पोस्टिंग मिल गई। पहली बार अमन सिंह को जब भारत सरकार ने डेपुटेशन को बढ़ाने से इंकार किया था, तो फिर उन्होंने वीआरएस ले लिया था। आईआरएस अफसर शीतल शाश्वत वर्मा के साथ भी ऐसा ही हुआ। सात साल तक डेपुटेशन पर रायपुर मंत्रालय में काम करने के बाद जब एक्टेंशन की गुंजाइश नहीं बची तो उन्होंने वीआरएस ले लिया। तब इसी स्तंभ में इस बात की ओर इशारा किया गया था कि कुछ दिन बाद वे संविदा पोस्टिंग में लौटेंगी और वैसा ही हुआ। शीतल को चीफ सिकेट्री ऑफिस में स्पेशल सिकेट्री का भी प्रभार दिया गया है। ये भी फर्स्ट टाईम हुआ है। डायरेक्टर आईएएस में भी दो ही महिला अफसर सीएस की ज्वाइंट सिकेट्री बनी हैं। पहले ईशिता राय और फिर रेणु पिल्ले। शीतल आईआरएस अफसर रही हैं। उन्हें उन दोनों से उपर स्पेशल सिकेट्री टू सीएस बनाया गया है।

सफेदपोश चोर

भिलाई स्टील प्लांट में लोहा चोरी की जांच के लिए सीबीआई पहुुंच गई है। इससे वहां के सफेदपोश नेताजी लोग हिल गए हैं। दरअसल, बीएसपी में प्रति दिन तीन-से-चार करोड़ की लोहा चोरी हो रही थी। याने महीने में करीब 100 से 120 करोड़ के। ये भी जान लें कि भिलाई में पिछले दो-ढाई दशक में जितने नेता बने हैं, उनमें 98 परसेंट से अधिक लोग लोहा चोरी में संलिप्त रहे। और जब बेशुमार दौलत बना लिए तो सफेद वस्त्र पहन पॉलिटिक्स में आ गए। राजनीति में आने के बाद वे लोहा चोरों को संऱक्षण दे रहे थे। हालांकि, भारत सरकार की इस स्टील कंपनी से रोज करोड़ों का लोहा पार करने मेें कंपनी के अधिकारियों ने भी बहती गंगा में खूब डूबकी लगाई। आखिर, दुर्ग पुलिस ने बीएसपी के जीएम समेत कई को अरेस्ट कर जेल भेजा है। सीआईएसएफ ने भी अपने डीआईजी को हटा कर असम भेज दिया है। सीआईएसएफ पर आरोप है कि जिस गेट से लोहा चोरी कर ले जाया जाता था, सीआईएफएस ने जानबूझकर वहां न तो सीसीटीवी लगवाया था और न वहां किसी जवान को तैनात किया। खैर, ठीक ही कहा गया है, अति का अंत होता है। बहरहाल, सीबीआई के नाम से भिलाई-दुर्ग के नेताओं की रात की नींद उड़ गई है, न जाने कब उनके दरवाजे पर सीबीआई धमक जाए।

गजब दिवाली

टेंट वालों की इस बार गजबे दिवाली मनेंगी। पीडब्लूडी के ईएनसी ऑफिस ने लंबे समय से बकाया 110 करोेड़ रुपए जारी कर दिया है। इसमें एक-एक टेंट वालों को गिरे हालत में चार-से-पांच करोड़ रुपए मिले हैं। दरअसल, विभिन्न जिलों में मंत्री, मिनिस्टरों के लिए पंडाल, मंच बनते हैं, उसका लंबे समय से बिल बकाया था। खैर, बेचारे टेंट वाले काम किए हैं तो पेमेंट तो होना ही चाहिए। मगर ये भी सनद रखना चाहिए...विधायक अटल श्रीवास्तव ने इसी साल मानसून सत्र में प्रश्न लगाया था कि बिलासपुर में मुख्यमंत्री का कार्यक्रम हुआ एक और टेंट वाले ने बिल लगा दिया दो कार्यक्रमों का। और आश्चर्य ये कि वहां के पीडब्लूडी के एसई ने उसे पास भी कर दिया। सदन में पीडब्लूडी मंत्री ने इसकी जांच कराने कहा, मगर आज तक पता नहीं चला कि डबल पेमेंट मामले में किसी अफसर का एक बाल भी बांका हुआ? बहरहाल, टेंट वाले तो ईएनसी की जय जयकार कर रहे हैं।

नवरात्रि में सियासी गहमागहमी

30 सिंतबर को दिल्ली में राज्यों के नियुक्त नए प्रभारियों और संगठन मंत्रियों की बैठक हो गई। पार्टी अध्यक्ष ने सबको टास्क दिया। साथ में ये निर्देश भी...पितृ पक्ष के बाद सभी अपने प्रभार वाले राज्यों में अपनी जिम्मेदारी संभाल लें। बताते हैं, छत्तीसगढ़ की प्रभारी स्मृति ईरानी और संगठन मंत्री कर्मवीर सिंह नवरात्रि में किसी दिन छत्तीसगढ़ आएंगे। संकेत मिल रहे, नवरात्रि शुरू होने के दूसरे या तीसरे दिन ही दोनों रायपुर आ जाएं। राजनीतिक पंडितों का मानना है, दोनों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे यहां कितना टाईम देते हैं। वैसे, संगठन मंत्री के नाते कर्मवीर सिंह को यहां रहना होगा। मगर प्रश्न स्मृति ईरानी का है। हालांकि, छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के जस्ट बाद लोकसभा चुनाव होता है। लिहाजा, स्मृति अपना परफार्मेस दिखाने में कोई कमी तो नहीं ही करेंगी। बता दें, नितिन नबीन जब पिछले विधानसभा चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ के सह प्रभारी थे, पूरे छत्तीसगढ़ का मथ डाला था। सूबे का शायद ही कोई ब्लॉक होगा, जहां वे नहीं पहुंचे। इसलिए, कार्यकर्ताओं से उनके सीधे रिश्ते बन गए थे। वह विधानसभा चुनाव में काम आया। नए प्रभारी और सह प्रभारी से भी बीजेपी कार्यकर्ता ऐसा ही उम्मीद संजोए हुए हैं। स्मृति से तो थोड़ा ज्यादा ही। कार्यकर्ताओं को लग रहा, स्मृति ही कुछ कर पाएंगी।

एक मंत्री, दो विभाग, दो नियम

डिप्टी सीएम अरुण साव के पास पीडब्लूडी है और नगरीय प्रशासन भी। मुकेश बंसल ने पीडब्लूडी सिकेट्री की जिम्मेदारी संभालते ही ठेकेदारों से काम फास्ट करने के लिए डामर का रेट रिवाइज कर दिया। दरअसल, ईरान युद्ध के बाद डामर का रेट बढ़ गया है। इस वजह से जो ठेकेदार पुराने रेट में टेंडर ले लिए थे, वे काम में रुचि नहीं दिखा रहे थे। जाहिर है, कोई नुकसान में काम करेगा नहीं। मगर अब डामर के रेट रिवाइज होने के बाद सड़कों के कामों में आश्चर्यजनक तौर पर तेजी आ गई है। मगर नगरीय प्रशासन विभाग के अफसरों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। लिहाजा, शहरी इलाकों में सड़कों की मरम्मत का काम ठप्प पड़ा हुआ है। जबकि, डेवलमेंट का मैसेज शहरों से ही जाता है। खैर, अब सरकार ने सोनमणि बोरा को अर्बन एडमिनिस्ट्रेशन का सिकेट्री बनाया है, तो हो सकता है वहां भी डामर का रेट रिवाइज हो और काम में तेजी आए।

हफ्ते का कोट

"अगर सब कुछ अच्छा चल रहा है, तो उसका भरपूर आनंद लें। क्योंकि, वो हमेशा रहने वाला नहीं है। और यदि कुछ बुरा चल रहा है तो चिंता न करें, क्योंकि वो भी हमेशा के लिए रहने वाला नहीं है।" 

अंत में दो सवाल आपसे?

1. रायपुर में ऑल इंडिया सर्विस का कौन अधिकारी है, जो कर्मवीर सिंह को छत्तीसगढ़ का संगठन मंत्री बनने पर मुख्यमंत्री से पहले फोन कर बधाई दे डाली?

2. स्मृति ईरानी के प्रदेश प्रभारी बनने के बाद मंत्रियों की सोशल मीडिया टीम इतना एक्टिव क्यों हो गई है?