तरकश, 1 मार्च 2026
संजय के. दीक्षित
भक्षक बने अफसर, खेत कौन बचाए?
सक्ती शहर का यह मामला सोचने पर विवश करेगा कि आदिवासी राज्य में आदिवासियों की जमीनों के साथ एडमिनिस्ट्रेशन में बैठे अधिकारियों द्वारा कैसा खेला किया जा रहा है। बात सक्ती कलेक्ट्रेट के ठीक सामने प्राइम लोकेशन की जमीन की है। 70 के दशक में एक आदिवासी को जीवन यापन के लिए डेढ़ एकड़ का जमीन मिली थी। 50 साल पहले उस जमीन की कोई मोल नहीं थी मगर समय के साथ वह सोने से भी कीमती हो गई। कुछ भूमाफियाओं की इस जमीन पर नजर लगी और 15 करोड़ की जमीन 15 लाख में खरीद ली। जमीन की रजिस्ट्री के बाद नामंतरण के लिए तहसीलदार के पास केस गया तो उसने आदिवासी जमीन का नामंतरण करने से इंकार कर दिया। इसके बाद एसडीएम के पास अपील हुई। और एसडीएम ने गुपचुप ढंग से धनाढ्यों के नाम पर आदिवासी जमीन को सौंप दिया। दरअसल, गांधीजी की फोटो में बड़ी ताकत होती है। एसडीएम ने हास्यपद तरीके से उसे गैर-आदिवासी लिख अनुमति की आवश्यकता को गैर जरूरी बता दिया। आदिवासी संगठनों ने जब हंगामा किया तो कलेक्टर की नाक के नीचे बैठे एसडीएम ने केस को पुनर्विलोकन में लेकर रजिस्ट्री केंसिल कर उसे मूल पट्टेदार याने आदिवासी के नामे कर दिया। कायदे से इतनी बेशकीमती जमीन को पट्टेदार को सौंपने की बजाए उसे राजस्व विभाग के सुपूर्द करना चाहिए था। मगर ये काम भी खास रणनीति के तहत किया गया। ताकि, भूमाफियाओं के पक्ष़्ा में न्यायिक स्टे की गुंजाइश बनी रहे। जाहिर है, आदिवासियों को स्वाभिमान के साथ जीने के लिए सरकारी जमीनें दी जाती हैं। अगर वो बेच रहा...वो भी बिना कलेक्टर की अनुमति के तो उसे राजसात करना चाहिए। मगर पता चला है, 15 करोड़ की जमीन 15 लाख में खरीदने के लिए एडमिनिस्ट्रेशन के एक अधिकारी को 50 और दूसरे को 10 पेटी दिया गया। ऐसे में, सवाल उठता है...बाड़ ही जब खेत खाने लगे तो उसकी रखवाली कौन करेगा?
कलेक्टर की भूमिका कटघरे में
सक्ती कलेक्टर का एक कारनामा इसी तरकश में पिछले साल प्रकाशित हुआ था। कलेक्टर ने आदिवासी जमीन के केस में रजिस्ट्रार को लिखित में दे दिया था, इसमें अनुमति की आवश्यकता नहीं है। इसी आधार पर रजिस्ट्रार ने आदिवासी जमीन की रजिस्ट्री कारोबारियों के नाम कर दी। मगर जब हड़कंप मचा तो उन्होंने उल्टे रजिस्ट्री अधिकारी को दोषी बताते हुए कमिश्नर को लिखित अनुशंसा कर सस्पेंड करा दिया। इस केस को तरकश में प्रमुखत से एक्सपोज किया गया। उसके बाद रजिस्ट्रार संघ ने हड़ताल पर जाने की धमकी दी तो बिलासपुर कमिश्नर ने आनन-फानन में सक्ती के रजिस्ट्री अधिकारी का निलंबन समाप्त किया। इसके बाद जाकर आदिवासी जमीन हलाल होने से बची।
खिलाड़ी कलेक्टर
आदिवासी जमीन के मामले में छत्तीसगढ़ में अजब-गजब खेल हो रहे। हाल ही में अंबिकापुर में सौ से अधिक राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले पंडो आदिवासियों की जमीन पर खास समुदाय के लोगों द्वारा कब्जा कर घर बनाने का मामला सामने आया है। यही नहीं, बस्तर समेत कई जिलों में आदिवासियों की जमीनों को हड़पा जा रहा। इस खेल का ट्विस्ट यह है कि अब तरीका बदल गया है। कलेक्टर से अनुमति के चक्कर में पड़ने की बजाए आदिवासियों की जमीनों को लीज पर लेकर पेट्रोल पंच, होटल समेत व्यवसायिक संस्थानों का निर्माण किया जा रहा है। वैसे, सरकार अगर पिछले पांच साल की आदिवासी जमीनों की जांच करवा दें तो दर्जन भर से अधिक कलेक्टर-पूर्व कलेक्टर सलाखों के पीछे जाएंगे। हालांकि, इतने अधिकारियों को जेल तो भेजा नहीं जा सकता। मगर सिस्टम को कम-से-कम जांच तो करा ही लेना चाहिए...पता चल सके कौन कलेक्टर, कितना बड़ा खिलाड़ी निकला।
सौम्य सीएम, बदले तेवर
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बेहद विनम्र और सौम्य राजनेता माने जाते हैं। दो साल के टेन्योर में कभी उन्हें गुस्से या तमतमाते हुए नहीं देखा गया। मगर विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए सीएम के भाषण में जो तल्खी दिखी, उससे पक्ष-विपक्ष के विधायक आवाक थे। मुख्यमंत्री ने पिछली कांग्रेस सरकार पर हमला बोलते हुए 'भ्रष्टाचार स्पेशलिस्ट सरकार' करार दिया। जाहिर है, हर पीएम, सीएम के भाषण का स्क्रिप्ट कोई-न-कोई तैयार करता है। क्योंकि, मुख्यमंत्रियों के पास इतना टाईम नहीं होता। हालांकि, सीएम सचिवालय के अधिकारी सीएम से स्क्रिप्ट अनुमोदित कराके ही फायनल करते हैं। बहरहाल, विधानसभा की स्पीच के बाद उसकी चर्चा काफी है, क्योंकि था वह काफी पिन प्वाइंटेड।
विजय-भावना, दूरियां-नजदीकियां
विधानसभा में कई बार दिलचस्प प्रसंग, हास-परिहास देखने को मिलते हैं, तो तंज और तीर भी चलते हैं। ऐसा ही कुछ पिछले हफ्ते प्रश्नकाल में हुआ, जब विधायक भावना बोहरा ने पंचायत मंत्री विजय शर्मा से अपने विधानसभा पंडरिया इलाके की सड़कों के बारे में पूछा। इस पर एक्स सीएम भूपेश बघेल ने मुस्कुराते हुए तंज कस दिया...क्या बात है? अगल-बगल के आपलोग विधायक और मंत्री। फिर सदन में सवाल करना पड़ रहा है। क्या दुरियां काफी बढ़ गई है? इस पर मंत्री विजय शर्मा और भावना, दोनों ने अपनी तरफ से सफाई दी। मगर दोनों के बीच सियासी अदावत किसी से छिपी भी नहीं है। इसलिए सदन में इस पर जमकर ठहाके लगे।
गरीबों की कौन सुने?
पिछले कई विधानसभा सत्रों के प्रश्नकाल में यह सवाल आता है कि रायपुर के सरकारी आंबेडकर अस्पताल में पैट स्कैन मशीन को डिब्बे से बाहर क्यों नहीं निकाला जा रहा और मंत्री का रटा-सा जवाब आता है...खरीदी में कुछ झोल थी, उसकी जांच चल रही है। सवाल है क्या पेट स्कैन मशीन का उपयोग और खरीदी की जांच एक साथ नहीं की जा सकती? और फिर प्रश्न यह भी कि जांच कितने साल तक चलेगी? पेट स्कैन मशीन 20 करोड़ से उपर की आती है। और इसी जांच के बाद कैंसर की पुष्टि होती है। प्रायवेट अस्पताल वाले इस जांच का 20 से 25 हजार रुपए चार्ज करते हैं। जानना यह भी जरूरी है कि कैंसर अब साधन संपन्न वर्ग की बीमारी नहीं रही। रायपुर के कैंसर अस्पतालों में जाकर देखा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में कैसे-कैसे लोग इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। राजधानी रायपुर में सिर्फ कैंसर के तीन अस्पताल खुल गए हैं। इसके अलावे चार-पांच बड़े अस्पतालों में भी कैंसर यूनिट है। छत्तीसगढ़ के हेल्थ सिकेट्री को देश का सबसे अमीर आईएएस कहा जाता है। उन्हें मानवीय आधार पर आंबेडकर अस्पताल के पेट स्कैन मशीन को बक्से से बाहर निकाल उसका उपयोग शुरू कराना चाहिए। वरना, छत्तीसगढ़ के गरीबों की जेबें कटती रहेंगी।
हाई प्रोफाइल सेक्स स्कैंडल!
खैरागढ़ के पूर्व विधायक के खिलाफ उन्हीं की पार्टी की नेत्री की दुष्कर्म की शिकायत के बाद पुलिस ने मुकदमा कायम कर लिया है। चूकि मामला काफी हाई प्रोफाइल है, इसलिए राजनांदगांव के आईजी ने स्कैंडल की जांच के लिए पुलिस अधिकारियों की पांच सदस्यीय कमेटी गठित कर दी है। महिला नेत्री की शिकायत की अगर दूध-का-दूध और पानी-की-पानी की तरह जांच हो जाए तो एक राजनीतिक पार्टी को काफी दिक्कतें हो जाएंगी। 2028 के विधानसभा चुनाव में उतारने के लिए कोई प्रत्याशी नहीं मिलेगा। क्योंकि, खैरागढ़ के जितने भी टॉप के नेता हैं, सबने बहती गंगा में डूबकी लगाई है। यद्यपि, मामला राजी-खुशी, सहमति जैसा रहा मगर मालूम ही है, सहमति के बाद जब असहमति के स्वर उभरते हैं, तो फिर कयामत आ जाती है...वैसा ही कुछ इन दिनों खैरागढ़ में आया हुआ है।
ऐसे पावरफुल अफसर
छत्तीसगढ़ में शुक्रवार को एक डिप्टी कलेक्टर का गजबे ट्रांसफर हुआ। आमतौर पर सिंगल आर्डर निकलता नहीं। मगर न केवल सिंगल ट्रांसफर हुआ, बल्कि आदेश में लिखा गया...आदेश की डेट 27 फरवरी को अपरान्ह से बीजापुर से एकपक्षीय कार्यमुक्त किया जाता है। याने ट्रांसफर के साथ रिलिविंग। छत्तीसगढ़ में इससे पहले शायद ही ऐसा हुआ होगा, तबादले के साथ कार्यमुक्ति भी। ऐसा इसलिए किया गया कि बस्तर में नियम है कि बिना किसी नए अधिकारी के आए रिलिविंग नहीं होती। अब अधिकारी की ताकत का अंदाजा लगा सकते हैं, जो जीएडी से सिंगल आर्डर ही नहीं...रिलिविंग भी लिखवा लिया। कमाल तो ये कि डिप्टी कलेक्टर का बिलासपुर ट्रांसफर किया गया है, उसी बिलासपुर में उन्होंने कहर ढा डाला था। उनके कार्यकाल में जमीनों के ऐसे-ऐसे नायाब खेल हुए कि वहां हाहाकार मच गया था। गंभीर शिकायतों के बाद एसीबी का उनके यहां छापा पड़ा। और रिपोर्ट के अनुसार उनके यहां बेहिसाब अनुपातहीन संपत्तियां मिली। मगर बलिहारी गुरू उस पॉलिटिशियन की...जिन्होंने ऐसे हरफनमौला अफसर की फिर से बिलासपुर पोस्टिंग के लिए रिकमंड किया। कायदे से बिलासपुर के लोगों को उस नेताजी का शाल-श्रीफल से सम्मान करना चाहिए।
ब्यूरोक्रेसी के लिए अच्छी खबर
आईएएस के 94 बैच में निधि छिब्बर सीनियर थीं। मगर सरकार ने उनके पति को मनीला से बुलाकर राज्य की ब्यूरोक्रेसी की कमान सौंपी। मगर प्रभाव के मामले में अब निधि छिब्बर पति विकास शील से आगे निकल गई हैं। भारत सरकार ने निधि को नीति आयोग का सीईओ का चार्ज दिया है। पावर की दृष्टि से निश्चित तौर से मुख्य सचिव का ओहदा बड़ा होता है। अगर दोनों में से किसी को चुनने कहा जाए तो निश्चित तौर पर सीएस का पद ही चुनेगा। मगर जब तक निधि इस कुर्सी पर हैं...नेशनल लेवल पर एक्सपोजर और प्रोटोकॉल में उपर रहेंगी। हालांकि, इन सबसे अलग छत्तीसगढ़ ब्यूरोक्रेसी के लिए महत्वपूर्ण यह कि लगातार यह दूसरा मौका होगा, जब छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस अधिकारी को नीति आयोग की जिम्मेदारी मिली है। इससे पहले बीवीआर सुब्रमणियम नीति आयोग के सीईओ रहे और अब निधि छिब्बर।
कलेक्टरों की वैकेंसी?
ये पहला मौका होगा, जब कलेक्टरों के लिए बड़े जिलों में कोई वैकेंसी नहीं है। बिलासपुर, कोरबा, रायगढ़, दुर्ग, राजनांदगांव, दंतेवाड़ा, जगदलपुर, अंबिकापुर... इन सभी जिलों में नए कलेक्टर हैं...मुश्किल से ये दो महीने से लेकर 10 महीने वाले हैं। अब इतनी जल्दी कलेक्टर बदलते नहीं। अंदेशा है, मई में कुछ बड़ा हो। दीपक सोनी के सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने की वजह से सरकार ने बलौदा बाजार में नए कलेक्टर की पोस्टिंग करने आईएएस अधिकारियों की एक लिस्ट निकाली है। मगर बड़ी लिस्ट सुशासन तिहार के बाद मई एंड तक आएगी। तब तक कुछ कलेक्टरों का कार्यकाल साल-डेढ़ साल क्रॉस कर जाएगा।
आईएएस को रिवार्ड?
बलौदा बाजार जिले का ग्रह-नक्षत्र कुछ ऐसा खराब चल रहा था कि जिले में सुनील जैन के बाद कोई कलेक्टर साल पूरा नहीं कर पाया। 10 जून की हिंसा के बाद चार महीने में ही कलेक्टर केएल चौहान सस्पेंड होकर पेवेलियन लौट गए थे। कलेक्ट्रेट में आगजनी और हिंसा में जिले का नाम खराब हुआ सो अलग। कलेक्टर चौहान को निलंबित करने के बाद राज्य सरकार ने विपरीत परिस्थितियों में रायपुर से आईएएस दीपक सोनी को बलौदा बाजार संभालने के लिए भेजा और वे सरकार की उम्मीदों पर खरे ही नहीं उतरे बल्कि पौने दो साल पूरा कर भी किया। हालांकि, उन्हें इस बात का मलाल रहेगा कि बलौदा बाजार की स्थिति को संभालने का उन्हें रिवार्ड नहीं मिला। दीपक सूरजपुर, दंतेवाड़ा, कोंडागांव के बाद बलौदा बाजार में रहे। याने उन्हें कोई बड़ा मैदानी जिला करने का मौका नहीं मिला। जबकि, बलौदा बाजार के नाम से घबराने वाले कई आईएएस अधिकारियों को बड़े जिले मिल गए।
विधायक को खुशखबरी
बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला के लिए छत्तीसगढ़ का 25वां बजट हमेशा के लिए यादगार बन गया। 24 फरवरी को ओपी चौधरी विधानसभा में बजट पेश कर रहे थे और उधर सुशांत को बिलासपुर से खबर आई...घर में नया मेहमान आया है। बजट खतम होते बिलासपुर भागे। याने ओपी का बजट सुशांत के लिए सुखद रहा। उनके सियासी वारिस का आगमन हुआ।
होली खराब?
छत्तीसगढ़ की सियासत के लिए अगला हफ्ता काफी महत्वपूर्ण रहने वाला है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियों से राज्यसभा के लिए एक-एक नेता का चुनाव करना है। उधर, होली में अब तीन दिन बच गए हैं, दोनों पार्टियों ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। हालांकि, दो और तीन मार्च को भी नामंकन के लिए विधानसभा खुला रहेगा। मगर पुराने दृष्टांतो से लगता नहीं कि लास्ट डेट से पहले नामंकन जमा हो पाएगा। खासकर, कांग्रेस में लास्ट मोमेंट में ही तय होता है। ऐसे में, विधायकों को डर सता रहा कि अगर 5 मार्च को नामंकन दाखिल हुआ तो उन्हें होली छोड़ रायपुर आना पड़ेगा।
रायपुर, साहित्य और पहचान
बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने कहा कि रायपुर साहित्या उत्सव की सफलता को देखते सरकार ने तय किया है कि अब हर साल साहित्य उत्सव आयोजित किए जाएंगे। जाहिर है, पिछले महीने नवा रायपुर में आयोजित साहित्य उत्सव बेहद सफल रहा था। आयोजन इतना कसा हुआ था कि लोग तीन दिनों तक वहां डटे रहे। अब हर साल इस आयोजन से साहित्य के मामले में जयपुर जैसी पहचान रायपुर की भी बनेगी।
अंत में दो सवाल आपसे?
1. छत्तीसगढ़ के एक ऐसे राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी का नाम बताइये, जिनके रुतबे से उनके हाई प्रोफाइल सिकेट्री भी घबराते हैं?
2. ग्लैमरस ड्रग पैडलर नव्या मलिक में आखिर ऐसा क्या है, जिससे पक्ष-विपक्ष दोनों असहज महसूस कर रहा है?


