मंगलवार, 15 जून 2021

गदगद नौकरशाह

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 13 जून 2021
नवा रायपुर में सरकार ने मितव्ययिता का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री और मंत्रियों के बंगले के निर्माण पर रोक लगा दी है। इस फैसले से एक वर्ग सबसे अधिक प्रसन्न है तो वो हैं राजधानी के नौकरशाह। उनका परिवार भी गदगद है…चलो अब नवा रायपुर जाने का बला टला। दरअसल, नवा रायपुर में अफसरों क लिए हाउसिंग बोर्ड ने 120 लग्जरी बंगले बनाए हैं। लेकिन, वहां जाने के लिए कोई तैयार नहीं। जिनके बच्चे बड़े हो गए वे भी नहीं और जिनके छोटे हैं वे तो बिल्कुल नहीं। चीफ सिकरेट्री रहते आरपी मंडल पिछले साल खुद नवा रायपुर शिफ्थ हुए और बाकी अफसरों को वहां ले जाने के लिए प्रयास किए थे लेकिन, कोई टस-से-मस नहीं हुआ। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से इस पर सवाल हुआ तो उन्होंने दो टूक कहा था…जाएंगे कैसे नहीं, मैं जाउंगा तो अफसरों को भी जाना पड़ेगा। चूकि, इस साल के अंत तक नवा रायपुर में सीएम और मंत्रियों के बंगले कंप्लीट हो जाना था। लिहाजा, ब्यूरोक्रेट्स और उनकी फेमिली मन मारकर तैयार हो गई थी कि अब तो रायपुर से 25 किमी दूर जाना ही होगा…क्योंकि ये मुख्यमंत्री अपने कहे से पीछे नहीं हटते। लेकिन, अब तो लगता है कई अफसर नवा रायपुर से ही रिटायर हो जाएंगे। ऐसे में, अफसरों का खुश होना लाजिमी है।

कलेक्टरों का टेस्ट!

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपने कैबिनेट के साथियों के साथ जिलों के विकास कार्यों का वर्चुअल शिलान्यास और लोकार्पण कर रहे हैं। 8 जून से शुरू हुआ यह कार्यक्रम 21 जून तक चलेगा। सीएम सचिवालय ने हर दिन दो-दो जिलों का प्रोग्राम तय किया है। सिर्फ एक दिन….21 जून को तीन जिलों का होगा। कहा जा रहा है कि इसके जरिये मुख्यमंत्री कलेक्टरों को परख भी रहे हैं…किसमें कितना दम है। इस कार्यक्रम में सीएम हाउस में सीएम के साथ कैबिनेट के कई मंत्री होते हैं और सीएम सचिवालय के अफसर भी। उधर, जिले सांसद, विधायक के साथ कलेक्टर और उनकी टीम होती है। कलेक्टर इस प्रोग्राम का पूरा संचालन करते हैं। कलेक्टरों के प्रेजेंटेशन के जरिये सरकार जानना चाहती है कि जिले के विकास को लेकर उनके पास किस तरह का ब्लूप्रिंट है।

एक लिस्ट और

सरकार ने पिछले हफ्ते नौ जिलों के कलेक्टर्स बदल दिए। लेकिन, इससे बाकी कलेक्टरों की धुकधुकी अभी बंद नहीं हुई है। खबर है, अभी एक लिस्ट और आ सकती है। इस लिस्ट में चार-पांच नाम हो सकते हैं। पिछली सूची में कई ऐसे कलेक्टरों के नाम छूट गए, जिनका बदला जाना तय माना जा रहा था। बस्तर संभाग से पिछली लिस्ट में एक भी नाम नहीं था। जबकि, रायपुर संभाग से रायपुर और धमतरी, दुर्ग डिवीजन से राजनांदगांव और बेमेतरा के कलेक्ट बदले गए। सबसे अधिक बिलासपुर संभाग से तीन कलेक्टर चेंज हुए। मुंगेली, जांजगीर और कोरबा। सरगुजा संभाग से भी दो कलेक्टर बदले…कोरिया और बलरामपुर। नई सूची में सरगुजा संभाग से एकाध विकेट और गिर जाए तो आश्चर्य नहीं।

एसपी भी…

कलेक्टरों के बाद पुलिस अधीक्षकों के ट्रांसफर की अटकलें अब तेज हो गई हंै। एसपी की लिस्ट तो कलेक्टरों के पहिले से प्रतीक्षित है। पिछले महीने एक बार ऐसा हुआ कि सूची बस आज निकलने ही वाली है। एक आईपीएस तो एसपी बनने के एक्साइटमेंट में करीबी लोगों में मिठाई बंटवा डाले। बहरहाल, चर्चा एक बार फिर शुरू हो गई है कि पहली सूची में सात-से-आठ पुलिस अधीक्षकों का ट्रांसफर हो सकता है। बिलासपुर, जांजगीर, कोरबा, रायगढ़, जगदलपुर, दंतेवाड़ा, बालोद, सूरजपुर, जशपुर एसपी का नाम बदलने वालों में चर्चा में है। इनमें से कुछ को प्रमोट कर बड़ा जिला मिलेगा तो कुछ को रायपुर वापिस बुलाया जाएगा।

बड़ी उठापटक?

पुलिस महकमे में आईपीएस के प्रमोशन के साथ ही कुछ बड़ा होने की खबरें आ रही है। प्रमोशन के बाद पीएचक्यू के भी कुछ चेहरे बदले जाएंगे। दुर्ग रेंज आईजी विवेकानंद प्रमोट होकर एडीजी बनेंगे। चूकि आईजी लेवल पर अफसरों का काफी टोटा है। बिलासपुर और बस्तर में अभी पूर्णकालिक आईजी नहीं हैं। दोनों जगहों पर डीआईजी को प्रभारी आईजी बनाया गया है। ऐसे में, दुर्ग में विवेकानंद की जगह किसी डीआईजी को वहां का प्रभारी डीआईजी बनाने पर विचार किया जा रहा है। लेकिन, ये तभी होगा जब सरकार विवेकानंद को पुलिस मुख्यालय में नक्सल प्रभारी बनाएं। क्योंकि, विवेकानंद की पोस्टिंग का तार पुलिस मुख्यालय के फेरबदल से जुड़ा हुआ है।

डीडी को पोस्टिंग?

ट्राईबल, जीएडी और जनसंपर्क सचिव डीडी सिंह इस महीने रिटायर हो जाएंगे। डीडी छत्तीसगढ़ के पहले प्रमोटी आईएएएस हैं, जो भारत सरकार में ज्वाइंट सिकरेट्री इम्पेनल हैं। वे कई विभागों के सिकरेट्री रहने के साथ ही ज्वाइंट सीईओ के तौर पर निर्वाचन में भी काम कर चुके हैं। सरकार के पास जीएडी और जनसंपर्क के लायक अफसरों की कमी भी है। ऐसे में, डीडी सिंह के रिटायरमेंट के बाद पोस्टिंग की चर्चा अस्वभाविक नहीं है। उन्हें मंत्रालय में संविदा नियुक्ति मिलेगी और खुदा न खास्ता ऐसा नहीं हुआ तो पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग तय है।

ओपी का विरोध क्यों?

पूर्व आईएएस ओपी चैधरी की सक्रियता भाजपा के कुछ बड़़े नेताओं को परेशान करने लगी है। यही वजह है कि उनके राह में अब ब्रेकर लगाए जाने लगे हैं। प्रदेश चुनाव समिति में उन्हें सदस्य बनाए जाने पर एक पूर्व मंत्री ने विरोध कर दिया है। पूर्व मंत्री का तर्क है, ओपी अभी नए हैं, अनुभव भी नहीं है। जबकि, प्रदेश प्रभारी डी0 पुरंदेश्वरी चाहती हैं कि ओपी चुनाव समिति में सदस्य बनें। दरअसल, रायपुर कलेक्टर रहते आईएएस से वीआरएस लेने वाले ओपी खरसिया से भले ही अपना पहला चुनाव हार गए लेकिन, इससे हतोत्साहित होकर उनके कदम रुके नहीं। जशपुर से दंतेवाड़ा तक वे लगातार दौरे कर रहे हैं। रायगढ़, जांजगीर, जशपुर जिले मे उन्होंने अच्छी-खासी एक टीम खड़ी कर ली है। ओपी पिछड़े वर्ग से हैं। आईएएस रहे हैं। छत्तीसगढ़ी अस्मिता की बात भी करते हैं। इस वजह से सिर्फ युवा ही नहीं, आम वर्ग भी ओपी के साथ जुड़ रहा है। हो सकता है लोगों को लग रहा होगा, ओपी छत्तीसगढ़ में बीजेपी के भविष्य हैं।

आईएएस कमिश्नर

नगर निगमों में आईएएस कमिश्नर बनाने की शुरूआत अजीत जोगी शासन काल में हुई थी। जोगी ने रायपुर में सोनमणि बोरा और बिलासपुर में डाॅ0 एसके राजू को फस्र्ट आईएएस कमिश्नर बनाया था। बाद में रमन सरकार ने भिलाई में राजेश टोप्पो को आयुक्त बनाया। लेकिन, अब ये संख्या बढ़कर चार हो गई है। भूपेश सरकार ने कोरबा में आईएएस को बिठाया और अब रायगढ़ भी आईएएस कमिश्नर हो गया है। कोरबा आयुक्त जयवर्द्धने को इसी पद पर रायगढ़ भेजा गया है। जयवर्द्धने छत्तीसगढ़ के तीसरे आईएएस होंगे, जो दो नगर निगमों में कमिश्नर होंगे। सबसे पहिले अवनीश शरण बिलासपुर के बाद रायपुर के आयुक्त बनाए गए थे और उसके बाद सौरव कुमार बिलासपुर के बाद रायपुर नगर निगम कमिश्नर रहे।

सोनमणि का क्या?

आईएएस सोनमणि बोरा को भारत सरकार में सिंचाई संसाधन में ज्वाइंट सिकरेट्री की पोस्टिंग मिल गई है। लेकिन, राज्य सरकार से अभी तक उनकी रिलीविंग नहीं हो पाई है। हालांकि, रिलीविंग में ज्यादा टाईम लगता नहीं। कुछ घंटे में कई बार ऐसी फाइल ओके हो चुकी हैं। लेकिन, बोरा का महीना से ज्यादा हो गया। बोरा को कब तक ज्वाइनिंग देनी है, इसकी जानकारी नहीं। लेकिन, टाईम निकलने पर भारत सरकार उन्हें सेंट्रल डेपुटेशन की पोस्टिंग से डिबार कर देगी। केंद्र का नियम है पोस्टिंग आर्डर निकलने के बाद ज्वाईन करना होगा। पिछली सरकार में ऐसा ही आईएएस निधि छिब्बर के साथ हुआ था। सरकार ने सहमति देने के बाद भारत सरकार के लिए रिलीव करने से इंकार कर दिया था। इस पर केंद्र ने निधि को पंाच बरस के लिए डिबार कर दिया था। निधि फिर कैट में याचिका लगाई। कैट ने निधि के पक्ष में फैसला दिया तब जाकर करीब डेढ़ साल बाद वे दिल्ली जा पाईं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस पुलिस अधीक्षक के चलते एसपी की लिस्ट उलझ रही है?
2. एल्डरमैन की नियुक्ति में बोली लगने की बात क्या सही है?

 

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रविवार, 6 जून 2021

नौकरशाहों को नुकसान

 संजय के. दीक्षित 

तरकश, 6 जून 2021

पिछली सरकार में नौकरशाहों का सोशल मीडिया प्रेम सर्वविदित था। कई कलेक्टर्स, एसपी ग्राउंड पर नहीं....फेसबुक और ट्वीटर पर काम करने के लिए जाने जाते थे। आलम यह था कि सरकारी योजनाओं को सोशल मीडिया में संचालित कर वाहवाही बटोर लेते थे। लेकिन, सरकार बदली तो सिस्टम भी बदला। ऐसे अफसर हांसिये पर आ गए, जो सोशल मीडिया में अत्यधिक चर्चित रहते थे। दरअसल, भूपेश बघेल सरकार इस बात से इत्तेफाक नहीं रखती कि अफसरों को खुद का प्रचार करना चाहिए...ये काम राजनीतिज्ञों का है और उन्हें ही ये करना चाहिए। लोग देख भी रहे हैं....सरकार के नजदीकी अधिकारी और सलाहकार भी सोशल मीडिया में उतने ही एक्टिव रहते हैं, जो सरकार के लिए मुफीद हो। यानी जिससे सरकार की ब्रांडिंग होती हो। निजी प्रचार तो बिल्कुल नहीं। इसके बाद भी कुछ अधिकारी अभी भी सोशल मीडिया और फोटो का मोह नहीं छोड़ खुद का नुकसान करा रहे हैं। ऐसे अफसरों को जब भी कलेक्टर बनाने की बात आती है, सोशल मीडिया उसमें आड़े आ जाता है। फेसबुक और ट्वीटर पर सक्रिय रहने वाले नौकरशाहों को...दीवारों पर लिक्खा इश्तेहार समझना चाहिए। क्योंकि, कई अच्छा काम करने वाले अफसरों का नुकसान हो रहा है।  

पोस्ट बड़ा और....

हरित क्रांति को सफल बनाने प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने खुद पहल करके राज्यों में कृषि से संबंधित विभागों को कोआर्डिनेट करने के लिए एग्रीकल्चर प्रोडक्शल कमिश्नर याने एपीसी का पोस्ट क्रियेट कराया था। एपीसी चूकि एक साथ 12 विभागों को कोआर्डिनेट करता है, इसलिए काबिल और वरिष्ठ आईएएस को इस पद पर बिठाया जाता था। मध्यप्रदेश के समय....एपीसी नेक्स्ट टू चीफ सिकरेट्री होता था। पुराने लोगों को याद होगा, 1995 के आसपास एपीसी रहे आईएएस आर परशुराम ने काम करके कितना नाम कमाया था। छत्तीसगढ़ बनने के बाद हालांकि, एपीसी का वजूद कम हुआ फिर भी वे कृषि से संबंधित सिंचाई, उर्जा, फूड, सहकारिता, संस्थागत वित, पशुपालन, डेयरी, हार्टिकल्चर, वेयर हाउस, बीज विकास निगम, फिशरीज जैसे विभागों की मीटिंग लेते थे। साल में कम-से-कम दो बार संभागीय मुख्यालयों में कलेक्टरो और विभाग प्रमुखों की बैठकें हो ही जाती थीं। खरीफ और रबी की। कलेक्टर्स भी इस मीटिंग को वेट करते थे। क्योंकि, एपीसी सारे अधिकारियों के सामने टारगेट निर्धारित कर देते थे, इससे कलेक्टरों का काम आसान हो जाता था। लेकिन, बाद में यह सिस्टम गड़बड़ाता चला गया। अब आलम यह है कि संभाग मुख्यालयों में आखिरी मीटिंग 2019 में हुई थी, जब केडीपी राव एसीएस थे। इसके बाद मीटिंग तो छोड़िये खरीफ और रबी की वीडियोकांफ्रेंसिंग तक नहीं हुई है। किसानों की प्रायरिटी वाली सरकार में अगर ऐसा है तो ये ठीक नहीं है। चीफ सिकरेट्री को इसे देखना चाहिए।    

पावर हाउस के सामने

बात पूर्व आईएएस केडीपी राव की निकली तो इसका जिक्र लाजिमी है कि पुनर्वास का वेट उनका काफी लंबा हो गया। 31 अक्टूबर 2019 को वे एसीएस कृषि और एपीसी से रिटायर हुए थे। जाहिर है, पिछली सरकार में वे हांसिये पर रहे इसलिए उन्हें पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग की उम्मीद कुछ ज्यादा थी। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। अब चांस खतम होता दिख रहा है। बता दें, केडीपी राव का घर शांति नगर में पाटन हाउस के सामने है। पाटन हाउस बोलें तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का विधायक रहने के दौरान का ठिकाना। इस पावर हाउस के सामने रहने के बाद भी पता नहीं केडीपी पावर लेने में नाकाम कैसे हो गए? 

आईएएस का गजब मौन

छत्तीसगढ़ में एक वो भी वक्त था, जब नौकरशाही जो चाहती थी, वह होता था। 15 साल तो स्वर्णिम ही रहा...नौकरशाहों ने सरकार पर प्रेशर बना कई फैसले करवाए। आईएएस सुनील कुजूर के प्रमोशन एपीसोड में तो अफसर सीएम के चेम्बर में घुस गए थे। सरकार झुकी भी। कुजूर का न केवल प्रमोशन हुआ बल्कि पहली बार पोस्टिंग भी अच्छी मिली। लेकिन, अब वो बात रही नहीं। आईएएस का व्हाट्सएप ग्रुप भी वक्त को देखते खामोश हो गया है। सिवाय जन्मदिन की बधाई और शुभकामनाओं के। वो भी एक्स चीफ सिकरेट्री विवके ढांड जन्मदिन की बधाई डालते हैं, उसके बाद सिलसिला शुरू होता है। वर्तमान वालों को हिम्मत नहीं होती कि किसी अफसर के जन्मदिन पर पहले बधाई दे दें। दिवंगत आईएएस चंद्रकांत उइके की पत्नी की अनुकंपा नियुक्ति का प्रकरण जीएडी में पिछले साल से लंबित है। मगर कोई बोल नहीं पा रहा।    

सुब्रमणियम की विदाई!

भारत सरकार ने छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस वीबीआर सुब्रमणियम को जम्मू-कश्मीर के चीफ सिकेरट्री से हटाकर केंद्र में ठीक-ठाक पोस्टिंग दे दी लेकिन, जेके से उनकी विदाई वैसी नहीं रही, जिस तरह की उन्हें उम्मीद रही होगी। उमर अबदुल्लाह समेत कई सियायी नेताओं, सामाजिक संगठनों ने सोशल मीडिया पर उनके क्रियाकलापों को लेकर मुहिम छेड़ दी। कुल मिलाकर सुब्रमणियम की विदाई में कड़वाहट घुल गई।  

व्हाट एन आइडिया 

कंबल ओढकर घी पीने वाले एक आईएफएस ने छत्तीसगढ़ में सर्विस के दौरान गजब के ब्रेन का इस्तेमाल किया। मुसली कांड हो या अदरख कांड या रायगढ़ का फाॅरेस्ट घोटाला, जब भी संकट आया धीरे से डेपुटेशन पर गृह राज्य निकल लिए। फिर वहां सब सेट कर मामला ठंडा हुआ तो फिर छत्तीसगढ़ वापिस। पता चला है, आंध्र में उन्होंने बड़ा नर्सरी खोला है। छत्तीसगढ़ में पौधारोपण कार्यक्रम के लिए करोड़ों की खरीदी उनकी नर्सरी से हो रही। बाकी लो प्रोफाइल के उनके रहन-सहन से नहीं लगेगा कि आईएफएस के पास इतना फर्टाइल दिमाग होगा। 

रिकार्ड पारी

कोरबा कलेक्टर किरण कौशल लगातार चार जिलों की कलेक्टरी कर नया रिकार्ड बनाई है। वे पहली महिला कलेक्टर होंगी, जिन्होंने न केवल सबसे अधिक जिले की कलेक्टरी की बल्कि बिना किसी ब्रेक के। उनसे पहिले अलरमेल मंगई डी लगातार तीन जिलों की कलेक्टर रहीं। लगातार चार जिलों की कलेक्टरी में पुरूषों में सिद्धार्थ परदेसी और दयानंद ने बिना ब्रेक के चार-चार जिला किया है। सिद्धार्थ कवर्धा, राजनांदगांव, बिलासपुर और रायपुर कलेक्टर रहे तो दयानंद सुकमा, कवर्धा, कोरबा और बिलासपुर। हालांकि, प्रमोटी आईएएस में ठाकुर राम सिंह ने भी चार बड़े जिले किए। रायगढ़, दुर्ग, बिलासपुर और रायपुर। किरण मुंगेली से कलेक्टरी की पारी शुरू की फिर अंबिकापुर, बालोद होेते वे कोरबा पहंुची। किरण लगातार पांचवी जिला करतीं मगर कुछ अवरोध आ गए। मगर इस बात से इंकार नहीं कि कुछ दिन बाद किसी और अच्छेे जिले की वे कलेक्टर बन जाए। 

प्रमोटी को प्राथमिकता

कलेक्टरों की लिस्ट में देर आए दुरूस्त आए कि तरह दो प्रमोटी आईएएस को बढ़ियां जिला मिला है। 2011 बैच के आईएएस जीतेंद्र शुक्ला को जांजगीर और 2012 बैच के तारन प्रकाश सिनहा को राजनांदगांव का कलेक्टर बनाया गया है। दोनों बड़े जिलों में शुमार होते हैं। जांजगीर और राजनांदगांव दोनों नौ-नौ ब्लाॅक का जिला है। राजनांदगांव शांतिपूर्ण भी। नक्सल घटनाएं भी अब नही ंके बराबर हो रहीं।    

अंत में दो सवाल आपसे?

1. भाजपा सरकार के एक पूर्व मंत्री का हैदराबाद कनेक्शन का राज क्या है?

2. बड़ी लिस्ट निकालते-निकालते सरकार ने आईएएस की लिस्ट सिकोड़ क्यों दी?


सोमवार, 31 मई 2021

चीफ सिकरेट्री…बिल्कुल नहीं

संजय के दीक्षित

चीफ सिकरेट्री…बिल्कुल नहीं


बीवीआर सुब्रमनियम भारत सरकार में सचिव बनने वाले छत्तीसगढ़ के पहले आईएएस बन गए। उन्हें कामर्स विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। हालांकि, उनसे पहिले बीएस बासवान भी केंद्र में सिकरेट्री रहे और तीन-तीन विभाग संभाले। मगर उन्हें छत्तीसगढ़ कैडर का इसलिए नहीं समझा जाता कि वे मध्यप्रदेश के समय डेपुटेशन पर चले गए थे। नवंबर 2000 में छत्तीसगढ़ कैडर मिलने के बाद बासवान कभी यहां आए नहीं। केंद्र से ही वे रीटायर हो गए। बासवान का छत्तीसगढ़ से इतना ही जुड़ाव रहा कि वे 90 के दशक में बिलासपुर के संभाग आयुक्त रहे। यद्यपि, सुब्रमनियम भी छत्तीसगढ़ में तीन साल ही रहे हैं। ज्यादातर समय वे डेपुटेशन पर रहे। फिर भी यहां होम सिकरेट्री रहने के कारण उन्हें जाना जाता है। बासवान के बारे में बहुत लोगों को मालूम नहीं होगा…मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही अजीत जोगी ने फर्स्ट चीफ सिकरेट्री के लिए बासवान से बात की थी। लेकिन, वे छत्तीसगढ़ आने तैयार नहीं हुए। बेहद ईमानदार आईएएस बासवान के बारे ये भी कहा जाता है, चीफ सिकरेट्री के ऑफर पर उन्होंने कभी मजाक में कहा था…छत्तीसगढ़ के ऐसे अफसरों का लीड करने से अच्छा है, दिल्ली में रहा जाए। तब ये चर्चा आम थी कि दिग्विजय सिंह ने मध्यप्रदेश के 98 फीसदी रिजेक्टेड अफसरों को छत्तीसगढ़ भेज दिया।

सीनियर पर जूनियर

सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार के नाते आईएएस हिमशेखर गुप्ता 20 हजार करोड़ का सालाना बिजनेस करने वाले मार्कफेड के प्राधिकृत अधिकारी हैं। जबकि, उनसे सीनियर आईएएस अंकित आनंद प्रबंध निदेशक। अंकित 2006 बैच के आईएएस हैं और हिमशिखर 2007 के। मार्कफेड के एमडी को प्राधिकृत अधिकारी से अनुमोदन के लिए फ़ाइल हिमशिखर के पास भेजनी पड़ती है। जबकि, पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। मार्कफेड भंग होने की स्थिति में एडिशनल चीफ सिकरेट्री लेवल के अफसर मार्कफेड के प्राधिकृत होते थे। बीकेएस रे, पी राघवन, आरपी बगाई लंबे समय तक प्राधिकृत अधिकारी रहे। एसीएस टू सीएम सुब्रत साहू खुद 2004-05 के दौरान रजिस्ट्रार रहे औऱ प्रदत्त अधिकारों से उन्होंने बगाई और राघवन को प्राधिकृत अधिकारी अपॉइंट किया था। वरिष्ठतम ब्यूरोक्रेट्स को प्राधिकृत अधिकारी बनाने के पीछे मंशा यह होती थी कि प्रदेश की सबसे बड़ी कृषि और सहकारिता से जुड़ी इस संस्था की ठीक-ठाक मॉनिटरिंग हो सके। लेकिन, इस समय एमडी से जूनियर प्राधिकृत अधिकारी हो गए हैं। बता दें, चेयरमैन से भी ज्यादा पावरफुल प्राधिकृत अधिकारी होते हैं। क्योंकि चेयरमैन के साथ बोर्ड होता है। किसी फैसले पर सहमति के लिए पूरे बोर्ड की सहमति जरूरी होती है। लेकिन, बोर्ड जब भंग हो जाता है तो प्राधिकृत अधिकारी वन मैन आर्मी हो जाता है। यही वजह है, पहले प्राधिकृत अधिकारी बनने बड़ी खींचतान होती थी। बीकेएस रे और राघवन का विवाद पुराने लोगों को याद होगा। फिलहाल, अभी के सीनियर अफसरों को लगता है, प्राधिकृत अधिकारी का मतलब मालूम ही नहीं।

कलेक्टरों की लिस्ट व्हाट्सएप में

सूबे में यह पहली मर्तबा हुआ कि व्हाट्सएप में कलेक्टरों की लिस्ट ही वायरल नहीं हुई बल्कि सोशल मीडिया पर भावी कलेक्टरों का स्वागत और बधाइयों का दौर शुरू हो गया। जाहिर है, सरकार को यह नागवार गुजरा। और कुछ समय के लिए लिस्ट पर ब्रेक लगा दिया गया। मगर लाख टके का सवाल यह है कि लिस्ट के कुछ नाम लीक हुए कैसे? और अब लिस्ट कब निकलेगी? पहले सवाल का जवाब जरा कठिन टाइप है और दूसरे का जवाब सिर्फ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल दे सकते हैं। कुछ दिनों के लिए लिस्ट रुकी जरूर है लेकिन, सूबे के मुखिया पर सब निर्भर करेगा…सीएम चाहेंगे तो दो दिन बाद लिस्ट निकल जायेगी और नहीं तो दो हफ्ते भी जा सकता है। ये जरूर है, भावी कलेक्टरों की नेताओं जैसी बधाइयां सरकार को अच्छा नहीं लगा।

प्रशासनिक चक्रवात

अरब सागर में ताउते और बंगाल की खाड़ी में यास के बाद अब छत्तीसगढ़ में एक चक्रवात आने की चर्चा है…वह है प्रशासनिक चक्रवात। अंदेशा है, इस चक्रवात का प्रभाव इतना व्यापक होगा कि मंत्रालय से लेकर जिलों तक में स्थिति काफी बदल जाएगी। बड़ी संख्या में कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ हटेंगे और इधर-से-उधर होंगे….मंत्रालय में भी महत्वपूर्ण उलटफेर होगी। वैसे भी, भूपेश सरकार छोटी सर्जरी की बजाए मेजर सर्जरी में ज्यादा विश्वास करती है। सरकार संभालते ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 20 कलेक्टरों को बदल दिया था। और, पिछले साल 27 मई को 23 कलेक्टर समेत 28 आईएएस। इस बार भी संख्या इसके आसपास ही होगी। मगर इस बार का चेंजेस अहम इसलिए है क्योंकि, अगले महीने सरकार के ढाई बरस पूरे होने जा रहे हैं। अब काम करने के लिए डेढ़ साल बचे हैं। आखिरी साल को काउंट नहीं किया जाता क्योंकि वो इलेक्शन ईयर होता है। इस दृष्टि से भूपेश सरकार की कोशिश होगी कि फील्ड में ऐसे अफसरों की तैनाती की जाए, जो रिजल्ट दें और अगले विधानसभा चुनाव तक क्रीज पर टिक सके। इसमें दोमत नहीं कि इनमें से कुछ कलेक्टर अगला विधानसभा चुनाव कराएं। बहरहाल, कलेक्टरों, जिला पंचायत सीईओ, मंत्रालय, डायरेक्ट्रेट और बोर्ड, निगमों को मिलाकर 35 से 40 आईएएस अधिकारियों की नई पदास्थापनाएं होंगी। भले ही ये दो, तीन फेज में होगा मगर चक्रवात निश्चित तौर पर ब्यूरोक्रेसी को झाँकझोरेगा।

सीनियर को तरजीह

सरकारें किसी भी पार्टी की हो…चुनाव जीतने के बाद और चुनाव के समय राजनीतिक दृष्टि से प्रशासनिक अफसरों को फील्ड में बिठाती है लेकिन, इसके बीच की अवधि में जब सरकार को रिजल्ट देने का समय होता है, उसमें अनुभवी अफसरों को प्राथमिकता दी जाती है। मध्यप्रदेश मे दिग्विजय सिंह ने इसी फार्मूले पर दस साल प्रशासन को चलाया । बहरहाल, यहां बात छत्तीसगढ़ की हो रही है और मौका सरकार के मध्यकाल का है तो लोगों की नजरें उन अफसरों पर हैं, जो राजधानी के ज्यादा फील्ड में रिजल्ट दे पाने की क्षमता रखते हैं। पता चला है, सरकार भी इस आप्सन को बंद नहीं किया है…2007, 08, 09 बैच भी फोकस में है। दरअसल, बड़े और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जिलों में सीनियर अफसरों को कलेक्टर बनाकर बिठाने से लाभ यह होता है कि डेवलपमेंट के साथ ही राजनीतिक चीजें स्मूथली चलती है। इसका एक बड़ा फायदा यह भी होता है, आसपास जिलों के जूनियर कलेक्टर उनका अनुसरण कर अपना पारफारमेंस सुधारते हैं। सरकार को इस बार यह भी ध्यान देना चाहिए कि दाल-भात में नमक चलता है मगर आफिस को दुकान बना दें, ऐसे कलेक्टरों, पुलिस अधीक्षकों को कड़ा मैसेज देना चाहिए। क्योंकि, अब जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का समय है।

मंत्रालय में परिवर्तन

कलेक्टरों के साथ मंत्रालय में भी कुछ सिकरेट्री बदलेंगे। रायपुर कलेक्टर मंत्रालय जाएंगे तो वहां भी उन्हें कोई ठीक-ठाक विभाग मिलेगा। हालांकि, उनका बैच अभी सिकरेट्री नहीं हुआ है। मगर अंकित आनंद की तरह लगता है भारतीदासन को भी स्पेशल सिकरेट्री के तौर पर कोई स्वतंत्र प्रभार मिलेगा। राजनांदागांव कलेक्टर टीपी वर्मा सिकरेट्री हो गए हैं। वे अगर वहां से हटे तो उन्हें भी मंत्रालय में सचिव की पोस्टिंग मिलेगी। टीपी कोंडागांव, दंतेवाड़ा के बाद राजनांदगांव के कलेक्टर हैं। इसलिए, उन्हें विभाग ठीक-ठाक ही मिलेगा। मंत्रालय में कई आईएएस अफसरों के पास दो-दो, तीन-तीन विभाग हैं। इनमें से कई सिकरेट्री के विभाग भी चेंज किए जाएंगे।

नसीब के धनी

टूलकिट विवाद से राष्ट्रीय स्तर पर किसे कितना लाभ हुआ, किसको नुकसान, ये तो नहीं पता मगर छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ0 रमन सिंह को बेशक इसका बड़ा राजनीतिक माइलेज मिला। रमन सिंह को लेकर बीजेपी के भीतर ही कई तरह की बतकही, भविष्वाणियां की जा रही थी। बीजेपी के लोग भी दावा कर रहे थे कि छत्तीसगढ़ के बीजेपी में काफी कुछ चीजें बदल जाएगी। मगर गजब का नसीब…आलम यह हुआ, पूरी पार्टी रमन के नीचे आकर खड़ी हो गई। रमन के खिलाफ एफआईआर पर सारे नेता थाने में धरना पर बैठ गए। पूर्व मंत्रियों को नाक-भौं सिकोड़कर भी मई की गरमी में थाने में प्रदर्शन करना पड़ा। वाकई किस्मत के बेहद धनी हैं रमन। 17 साल पूर्व फ्लैशबैक में जाएं, तो 2004 में कोई भी आदमी मानने के लिए तैयार नहीं था कि रमन सिंह मुख्यमंत्री के रूप में कंटिन्यू करेंगे। सबकी दलील यही थी कि प्रदेश अध्यक्ष थे, इसलिए अटलजी ने उन्हें सीएम बना दिए…छह महीने, साल भर में रमेश बैस उस कुर्सी पर काबिज हो जाएंगे। मगर रमन ने एक के बाद एक करके तीन कार्यकाल निकाल डाले।

अंत में दो सवाल आपसे

1. सरकार को अमित अग्रवाल जैसे आईएएस को अब दिल्ली डेपुटेशन से बुलाकर मंत्रालय में सीनियर लेवल के वैक्यूम को दूर नहीं करना चाहिए?

2.शिवप्रकाश की सख्ती और सक्रियता से भाजपा में क्या बदलाव आएगा?

बुधवार, 26 मई 2021

एसआई, आईपीएस…एक लाईन में

 संजय के दीक्षित

तरकश, 23 मई 2021
छत्तीसगढ़ में पुलिस उपेक्षित नहीं तो बहुत अच्छी स्थिति में भी नहीं कही जा सकती। एसआई, डीएसपी का प्रमोशन लंबे समय से ड्यू है तो सुपर समझने वाले आईपीएस की स्थिति भी उनसे जुदा नहीं है। आलम यह है कि 2008 बैच के आईपीएस को आधा साल बीत गया, अभी तक सलेक्शन ग्रेड नहीं मिल पाया है। जबकि, इसमें कोई डीपीसी की जरूरत भी नहीं। गृह विभाग जब चाहे, तब इनका आदेश निकाल सकता है। इस बैच के पारुल माथुर, प्रशांत अग्रवाल, नीतू कमल, डी श्रवण, मिलना कुर्रे, कमललोचन कश्यप और केएल ध्रुव जनवरी से वेटिंग में हैं। इसी तरह 2008 बैच के डीआईजी की वेंिटंग भी क्लियर नहीं हो पा रही। रामगोपाल गर्ग, जीतेंद्र मीणा, दीपक झा, अभिषेक शांडिल्य, धमेंद्र गर्ग और बालाजी राव सोमावार इस बैच के आईपीएस हैं। रामगोपाल और अभिषेक डेपुटेशन पर सीबीआई में हैं। मगर बाकी तो हैं। वीवीआईपी पुलिस रेंज दुर्ग के आईजी विवेकानंद का भी एडीजी प्रमोशन अटका हुआ है। चलिये, पुलिस विभाग में कम-से-कम आईएएस की तरह भेदभाव नहीं है….इसमें समानता है…सब इंस्पेक्टर से लेकर सीनियर आईपीएस तक, सभी एक लाइन में खड़े हैं।

उल्टा-पुलटा


एक वो भी जमाना था, जब प्रमोटी आईपीएस को ज्यादा फ्लेक्जिबल याने लचीला समझा जाता था…उनसे कुछ भी करा लो। एसपी की पोस्टिंग में सरकारें अपने एजेंडा के तहत प्रमोटी आईपीएस को प्रायरिटी देती थीं। लेकिन, अब जमाना बदल गया है। अब डायरेक्ट आईपीएस खुद को इतना बदल लिए हैं कि बैठने कहा जाए तो लेट जाने जैसी स्थिति हो गई है। छत्तीसगढ़ के 28 में से चार-पांच को छोड़ दे ंतो अमूमन सबका यही हाल है। जाहिर है, भूमिका बदल जाने से प्रमोटी आईपीएस परेशान होंगे ही। फिलवक्त, 9 प्रमोटी अफसर ही एसपी हैं। रायपुर रेंज में दो, दुर्ग में एक, बस्तर और सरगुजा में तीन-तीन। सबसे मलाईदार रेंज बिलासपुर में एक भी नहीं।

कप्तान के दावेदार!

एसपी की बहुप्रतीक्षित लिस्ट में नए नामों को लेकर इन दिनों अटकलें बड़ी तेज हैं। ट्रांसफर में कुछ पुलिस अधीक्षकों को इधर-से-उधर किए जाएंगे। मगर हटाए जाने वाले कप्तानों की जगह कुछ नए नाम भी जुड़ेंगे। इनमें अमित कांबले, गिरिजाशंकर जायसवाल, सुजीत कुमार, लाल उमेद सिंह, सदानंद, जीतेंद्र शुक्ला और उदय किरण जैसे नाम ज्यादा चर्चा में हैं। 2009 बैच के अमित कांबले के पास अब डीआईजी बनने में सिर्फ एक साल बचा है। वे एसपीजी से पिछले साल ही छत्तीसगढ़ वापिस आ गए थे। लेकिन, उनका चांस लगा नहीं। बहरहाल, सबसे अधिक जोर बिलासपुर पर है। बिलासपुर से प्रशांत अग्रवाल को सरकार हटाएगी या नहीं, अभी कुछ तय नहीं मगर अटकलें तेज है…बालाजी सोमावार, दीपक झा, पारुल माथुर और संतोष सिंह का नाम बिलासपुर के लिए चर्चाओं में है।

प्रमोशन के साथ रिटायर

प्रमोशन के मामले में आईएफएस की स्थिति भी अलग नहीं है। एडिशन पीसीसीएफ जेएससी राव अगले महीने 30 जून को रिटायर हो जाएंगे। पोस्ट खाली होने के बाद भी वे पीसीसीएफ नहीं बन पाए। अगर दु्रत गति से भी कार्रवाई की गई तो यही होगा कि वे प्रमोशन के साथ सेवानिवृत हो जाएंगे। राव के अलावा सीसीएफ से एडिशनल पीसीसीएफ के एक पद, सीएफ से सीसीएफ के 3 पद, डीएफओ से सीएफ के छह पद और एसडीओ से आईएफएस बनने के 3 पद जनवरी से खाली है। इन सभी की डीपीसी अभी तक नहीं हो पाई है।

2013 बैच कंप्लीट?

कलेक्टरों की लिस्ट पर सबसे अधिक 2013 बैच की टकटकी लगी है। इस बैच के अभी दो आईएएस ही कलेक्टर बन पाए हैं। विनीत नंदनवार और नम्रता गांधी। पांच अभी भी क्यूं में हैं। जबकि, दीगर राज्यों में 2014 बैच कलेक्टर बन गया है। 2013 वाले तो दो-दो जिला कर लिए हैं। बहरहाल, सरकार के सामने मुश्किल यह होगी कि एक साथ एक बैच के पांच को कैसे एडजस्ट करें। वजह यह कि दूसरे बैच वाले भी तो लाइन में हैं। हो सकता है, 2012 बैच की तरह एक साथ सबको मौका देकर बाद में पारफारमेंस बेस पर कुछ को वापिस बुला ले। क्योंकि, इस बैच को अब और ज्यादा वेट करा नहीं सकती।

प्रमोटी को भी मौका

दिसंबर 2018 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद प्रमोटी कलेक्टरों की संख्या 28 में से 13 हो गई थी। याने लगभग आधा। लेकिन, धीरे-धीरे यह फीगर कम होता गया। कलेक्टरों की आने वाली लिस्ट में प्रमोटी आईएएस की दावेदारी भी अहम रहेगी। आरआर में 2013 बैच अगर पूरा नहीं हुआ है तो प्रमोटी में आलम यह है कि 2008 बैच के एसएन राठौर को पिछले साल ले देकर मौका मिल पाया। 2011, 2012 बैच में बड़ी संख्या में आईएएस हैं, और जिला संभालने के काबिल भी। सरकार को उन्हें भी देखना है।

कोरोना पीड़ित विभाग

वैसे तो करोना से कोई भी विभाग अछूता नहीं रहा है। किंतु जनसम्पर्क विभाग का तो पूछिए मत! फस्र्ट वेव में आयुक्त से लेकर चपरासी तक संक्रमित रहे। तो दूसरी वेव ने कहर बरपा दिया…. जनसम्पर्क अधिकारी छेदीलाल तिवारी और रितेश कांवरे को लाख प्रयास के बाद भी बचाया नहीं जा सका। अनेक अधिकारी, कर्मचारियों ने अपने निकटतम परिजनों को खोया। आयुक्त तारन प्रकाश सिन्हा के ससुर, अपर आयुक्त जे एल दरियों के पिता, संयुक्त संचालक संतोष मौर्य के ससुर, जनसम्पर्क अधिकारी रीनू ठाकुर की मां का निधन हो गया। कोंडागांव के जनसम्पर्क अधिकारी पुजारी ने अपने माता पिता, दोनो को खो दिया। इसके अलावा भी अनेक अधिकारियों ने अपने परिजन खोए।

सिस्टम पर सवाल

ब्लैक फंगस को महामारी घोषित की जा रही है मगर राजधानी रायपुर में क्या हो रहा इसे समझिएगा। बात कर रहे हैं, सूबे के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल आंबेडकर की। इस मेडिकल काॅलेज अस्पताल में ब्लैक फंगस का कौन सा इंजेक्शन खरीदना है, इसे तय करने में वहां के जिम्मेदार डाक्टरों ने इतनी देर कर दी कि प्रायवेट अस्पतालों ने एकतरफा खरीद कर डंप कर लिया। ब्लैक फंगस के लिए एम्फोटेरेसिन बी इंजेक्शन दिया जाता है। चूकि इस बार का ब्लैक फंगस बे्रन में घुस जा रहा, इसमें लायसोसोमल प्रोपर्टी के एम्फोटेरेसिन बी ज्यादा इफेक्टिव है। अब ज्यादा इफेक्टिव है तो रेट ज्यादा होगा ही। महंगा-सस्ता के फेर में आंबेडकर के डाक्टर उलझे रहे और प्रायवेट अस्पताल वालों ने स्टाॅक उठा लिया।

अंत में दो सवाल आपसे

1. कलेक्टरों की आने वाली लिस्ट में महिला कलेक्टरों की संख्या दो से बढ़कर तीन होगी या चार?
2. छत्तीसगढ़ के किस मंत्री के डिप्टी कलेक्टर रैंक के पीएस स्टिंग आपरेशन में धरे गए हैं?

कलेक्टरों की जंबो लिस्ट?

 

तरकश के तीर : कलेक्टरों की जंबो लिस्ट?

संजय के दीक्षित

कोरोना के दौरान ही पिछले साल 27 मई को भूपेश सरकार ने सबसे बड़ी प्रशासनिक सर्जरी करते हुए 28 में से 23 कलेक्टरों को बदल दिया था। अव्वल इस बार विधानसभा के शीतकालीन सत्र के पहले से कलेक्टरों के फेरबदल की अटकलें चल रही है। इस फेर में कई कलेक्टर मनीराम के अलावा दीगर कोई काम हाथ में ले नहीं रहे…न जाने कब बोरिया-बिस्तर बांधना पड़ जाए। कोरोना में वैसे भी लोग देख ही रहे हैं…अधिकांश कलेक्टर शतरंज की गोटी की तरह उतने ही कदम आगे बढ़ा रहे हैं, जिससे उनकी कुर्सी सुरक्षित रहे। बहरहाल, ये मई महीना कलेक्टरों को बेचैन कर रखा है। पिछले मई की तरह सरकार ने कुछ वैसा ही किया तो एक लाइन से कलेक्टर साफ हो जाएंगे। सुनने में आ भी कुछ ऐसा ही रहा है। डेढ़ दर्जन से कम कलेक्टर इस बार भी नहीं बदलेंगे। ये मई अंत तक भी हो सकता है या फिर जून के फर्स्ट वीक तक भी। जब भी हो, होगा तो बड़ा चेन्ज।

एसपी भी!

कलेक्टरों के साथ-साथ एसपी लेवल पर भी जल्द ही बड़ी उठापटक होगी। एसपी की लिस्ट भले ही दो-तीन फेज में निकले, पर संख्या कलेक्टरों के बराबर ही रहेगी। एसपी में कई का लंबा कार्यकाल हो गया है। दंतेवाड़ा एसपी डॉ अभिषेक पल्लव पिछले सरकार के समय से वहां पोस्टेड हैं। नक्सल मोर्चे पर उनका काम ऐसा है कि सरकार चाहकर भी उन्हें मैदानी इलाके में नहीं ला पा रही। उधर, कुछ एसपी प्रमोट होकर डीआईजी बनने वाले हैं। इसमें बालोद जैसे जिले खाली होंगे। जगदलपुर एसपी दीपक झा भी प्रमोशन वाली सूची में हैं। लेकिन, उनके बारे में खबर है, डीआईजी बनने के बाद भी वे वहीं रहेंगे या फिर किसी बड़े जिले में एसएसपी बनकर जा सकते हैं। जांजगीर एसपी पारुल माथुर का भी काफी समय हो गया है। इस तरह कह सकते हैं, एसपी की लिस्ट भी लंबी होगी।

सिर्फ डेढ़ साल

भूपेश सरकार के पांच में से ढाई साल निकल गए हैं। बचे सिर्फ ढाई साल। इसमें से आखिरी साल को काउंट किया नहीं जाता। छत्तीसगढ़ में नवंबर में विधानसभा चुनाव होते हैं, उससे पहिले मई से प्रशासनिक तैयारी प्रारंभ हो जाती है। कहने का आशय यह है कि सरकार के पास मोटे तौर पर डेढ़ साल बचे हैं। जाहिर है, सरकार अबकी मैदान में तेज दौड़ने वाले घोड़ों पर दांव लगाना चाहेगी। कलेक्टर हो या एसपी…का चयन इस बार थोक बजाकर किया जाएगा, ताकि डेढ़ साल में सरकार की योजनाओं में वो पंख लगा सकें। संकेत है, इस बार पोस्टिंग के मापदंड कड़े होंगे।

प्रभावशाली पीएस

प्रमुख सचिव डॉ. आलोक शुक्ला के पास पहले से स्कूल शिक्षा, तकनीकी शिक्षा के साथ व्यापमं और माध्यमिक शिक्षा मंडल के चेयरमैन का दायित्व था। सरकार ने अब कोविड के समय स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा के प्रमुख सचिव की जिम्मेदारी भी उन्हें सौंप दी है। आम आदमी से जुड़े ये दोनों विभाग नौकरशाही की डिक्सनरी में भले ही क्रीम विभाग नहीं माने जाते। लेकिन, बावजूद इसके, है तो अति महत्वपूर्ण। आखिर, अरबिंद केजरीवाल इन्हीं दोनों विभागों पर फोकस कर दूसरी बार सत्ता में आने में कामयाब हो गए। बहरहाल, आलोक पहले भी इन दोनों विभागों को संभाल चुके हैं। 2005 में वे स्कूल शिक्षा में रहे तो उसके बाद दो बार हेल्थ में। फ़ूड में सिकरेट्री रहते उन्होंने हफ्ते भर में पीडीएस का नेटवर्किंग बना दिया था तो इस बार हेल्थ में आते ही टीका पोर्टल। नए अफसरों को आलोक से काम के प्रति कमिटमेंट सीखनी चाहिए। पुराने मंत्रालय में लोगों को अच्छी तरह याद है, पीडीएस बनाते समय अपना चेम्बर छोड़कर एनआईसी के हॉल में कंप्यूटर वालों के बगल में बैठे रहते थे। काम और उसका रिजल्ट आखिर मिलता भी ऐसे ही है।

कलेक्टर मतलब?

कलेक्टर जिले का मुखिया और सरकार का नुमाइंदा होता है। पहले वो जो बोल देता था वो आदेश समझा जाता था। मगर अब ये पुरानी बात हो गई। बिलासपुर का एक वाकया हम आपको बताते हैं। वहां के कलेक्टर डॉ सारांश मित्तर ने सबसे बड़े सरकारी अस्पताल सिम्स की खामियों को दुरुस्त करने आईएएस नूपुर राशि पन्ना को प्रशासक नियुक्त करने का आदेश दिया। मगर 15 दिन बाद भी इसका क्रियान्वयन वे नहीं करा सके। पहले रोड़ा अटकाया गया कि उनका पावर नहीं है। उसके बाद अनुमोदन के लिए फ़ाइल स्वास्थ्य विभाग भेजी गई, और फिर आई, गई बात हो गई । उसी बिलासपुर का एक दृष्टांत और है। आरपी मंडल बिलासपुर के कलेक्टर होते थे। उन्होंने किसी बात पर पीडब्ल्यूडी के एसीई को सस्पेंड कर दिया। चूंकि, कलेक्टर एसीई को निलंबित नहीं कर सकता। सो, उन्होंने मौखिक ऐलान किया और तुरंत मुख्यमंत्री अजीत जोगी से बात कर ओके करा लिया।

रसूख पर सवाल

एक जमाना था जब पार्षद लेवल के नेता कलेक्टर के चेम्बर में जाने का साहस नहीं जुटा पाता था। और अब..? एक सत्य घटना है…कुछ महीने पहले की बात है, सूबे के एक बड़े राजनेता एक जिले के दौरे पर गए। वहां एक नेता को सर्किट हाउस में एंट्री नहीं मिल पाई। उसने कलेक्टर को फोन खड़कया। कलेक्टर वीवीआइपी ड्यूटी में थे, उन्होंने फोन पिक नहीं किया। नेता ने कलेक्टर को व्हाट्सएप दे मारा…कुछ दिन रुक जाओ, फलां महीने की फलां तारीख से आप नहीं हम तय करेंगे कि साहब से सर्किट हाउस में कौन मिलेगा, कौन नहीं। जाहिर सी बात है, छोटे राज्य के अफसरों की स्थिति वैसे भी बहुत अच्छी नहीं होती। पोस्टिंग जैसी चीजें अफसरों को इतना कंपा कर रखती है कि जिस अफसरी की वे सपने यूपीएससी का एग्जाम देते और मसूरी में ट्रेनिंग के दौरान देखते हैं, वे रीयल लाइफ में धराशायी हो जाते हैं। इसके लिए सिर्फ सिस्टम नहीं, बल्कि वे खुद ज्यादा जिम्मेदार होते हैं।

अब डॉक्टर लॉबी?

कोविड जैसी महामारी ऐसे ही आती रही तो खतरा ये है कि एक और लॉबी बेहद ताकतवर हो जाएगी, वो है मेडिकल लॉबी। देश में अभी सबसे सशक्त आईएएस लॉबी मानी जाती है। फिर भी उन पर सरकार का अंकुश इसलिए होता है कि पोस्टिंग को लेकर वे बेहद संजीदा होते हैं। मगर डॉक्टरों के साथ ऐसा है नहीं। प्राइवेट डॉक्टर का कुछ कर नहीं सकते और सरकारी डॉक्टर को कंट्रोल करने पर वो नौकरी छोड़ देंगे। कोविड के समय तो अच्छे-अच्छों की सुनवाई नहीं हो पा रही। राजधानी के एक नेताजी ने जो शेयर किया, उसकी आहट ठीक नहीं है। एक पूर्व मंत्री और एक वर्तमान मंत्री, यानी दो-दो सिफारिश पर वे डॉक्टर से मिलने गए। डॉक्टर के रूखा व्यवहार से वह दंग रह गए। कह सकते हैं, डॉक्टर भी अब मजबूत हो रहे हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. कोविड के इस दौर में आप अनुमान लगा सकते हैं कि नर्सिंग होमों को संरक्षण देने की एवज में सीएमओ प्रतिदिन कितना कमा रहे होंगे?

2. सरकार ने मंत्रालय और इंद्रावती भवन खोल दिया है मगर कितने अफसर रोज ड्यूटी पर जा रहे हैं ?