शनिवार, 11 अप्रैल 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: डिप्टी सीएम की वैकेंसी?



तरकश, 12 अप्रैल 2026

संजय के. दीक्षित

डिप्टी सीएम की वैकेंसी?

राजनीतिक गलियारों में जैसी की चर्चाएं हैं, 3 मई के बाद छत्तीसगढ़ में एक डिप्टी सीएम की वैकेंसी हो सकती है। 3 मई को पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की काउंटिंग है। इसके बाद बीजेपी नितिन नबीन की टीम बनाने पर अपना फोकस करेगी। यूपी में अगले साल इलेक्शन है और वहां ब्राम्हण समेत कई जातियां बीजेपी से बहुत खुश नहीं है। इसलिए टीम नितिन में सबको साधने का प्रयास किया जाएगा। बहरहाल, बात छत्तीसगढ़ में डिप्टी सीएम की वैकेंसी की...तो डिप्टी सीएम के करीबी लोग भी तस्दीक कर रहे हैं कि भाई साब को राष्ट्रीय महासचिव बनाया जाएगा। छत्तीसगढ़ में फिलवक्त दो डिप्टी सीएम हैं। एक अगर दिल्ली गए तो फिर सिंगल डिप्टी सीएम बच जाएंगे। सियासी संतुलन के हिसाब से सरकार भी नहीं चाहेगी कि एक उप मुख्यमंत्री रहें। इसलिए, जुलाई में संभावित मंत्रिमंडल की सर्जरी में किसी नए या पुराने में से एक को डिप्टी सीएम बनाया जाएगा। मगर तब, जब भाई साब जनरल सिकेट्री बन जाएं।

जनरल सिकेट्री के मायने

वैसे तो बीजेपी की नेशनल बॉडी में पूर्व मंत्री लता उसेंडी के शामिल होने की संभावना अधिक है। वे 10 साल तक मिनिस्टर रही हैं। जगतप्रकाश नड्डा की टीम में भी रहीं। उनके बनने से दो कोटे की पूर्ति होगी। ट्राईबल और महिला। बहरहाल, डिप्टी सीएम के नितिन नबीन की टीम में शामिल होने की चर्चाएं हैं तो सवाल भी उठते हैं कि उप मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ भाई साब दिल्ली में इतनी उत्सुकता क्यों दिखा रहे? इसका जवाब है कि उनका एज अभी काफी कम है। दिल्ली के क्लोज अगर हो गए तो राज्य में बड़े एक्सपोजर के साथ कभी भी वापसी हो सकती है। राज्य में नहीं भी आए, दिल्ली की सियासत में मामला ठीकठाक जम गया तो वो भी बुरा नहीं...ओजस्वी वक्ता तो हैं ही इंग्लिश भी ठीकठाक झाड़ लेते हैं। इसलिए, डिप्टी सीएम साब भी जनरल सिकेट्री बनने की चर्चाओं को खारिज नहीं कर रहे।

जुलाई में सर्जरी

छत्तीसगढ़ समेत पांच राज्यों में नवंबर 2023 में विधानसभा चुनाव हुए, जुलाई में वहां ढाई साल पूरा हो जाएगा। अब बाकी राज्यों के बारे में गारंटी के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता मगर छत्तीसगढ़ में मंत्रियों के जो हालात है, उससे मेगा सर्जरी अवश्यंभावी है। जुलाई में ही सर्जरी इसलिए कि 3 मई को काउंटिंग के बाद करीब 15 मई तक बीजेपी सरकार बनाने और जश्न सेलिब्रेट करने में व्यस्त रहेगी। 15 मई के बाद टीम नितिन नबीन बनाने पर मंथन प्रारंभ होगा। ऐसी संभावना है कि मई लास्ट या जून फर्स्ट वीक तक राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन कर लिया जाएगा। इसके बाद फिर केंद्र सरकार जिन राज्यों के ढाई साल कंप्लीट हो गए हैं, उस पर अपना ध्यान केंद्रित करेगी। केंद्र को इसमें ज्यादा वक्त नहीं लगेगा क्योंकि उसके पास पूरी रिपोर्ट है। छत्तीसगढ़ की आईबी तो और काफी एक्टिव है। यहां मंत्रियों के कारनामों की छोटी-से-छोटी सूचना भी मुख्यालय को भेजती है। लिहाजा, जुलाई में जो सर्जरी होगी, वो मेजर होगी। दावे तो ये किए जा रहे...आधा दर्जन से अधिक मंत्रियों को शानो-शौकत वाले लग्जरी बंगले से बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ सकता है।

बेलगाम मंत्री, भ्रष्ट विभाग

छत्तीसगढ़ सरकार एक तरफ महिलाओं के उत्थान के लिए महतारी वंदन योजना चला रही है। हर महीने उनके खाते में नियम से हजार रुपए ट्रांसफर किया जाता है। दूसरी तरफ शर्मनाक स्थिति यह है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को साड़ी बांटने में डंडी मारी जा रही। हद है...महिला बाल विकास विभाग ने साढ़े पांच की जगह पांच मीटर की साड़ी सप्लाई कर दी। सरकार को इसमें कड़ा तेवर दिखा जिम्मेदारों को उल्टा लटकाना चाहिए। क्योंकि, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताएं सरकार और सत्ताधारी पार्टी के लिए ओपिनियन मेकर होती हैं। वैसे भी सरकार की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। आश्चर्य की बात कि कई बड़े और ऐतिहासिक सुधार के काम करने के बाद भी सरकार को उसका क्रेडिट नहीं मिल रहा तो उसकी मूल वजह करप्शन है और मंत्रियों का बेलगाम होना। बीजेपी के लोग भी मान रहे कि अगले दो-तीन महीने में अगर मंत्रिमंडल में सर्जरी नहीं हुई तो फिर 2028 के विधानसभा चुनाव में बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। आखिर, मंत्री और नेता अपने हाथों ही पार्टी और सरकार की लंका कर देंगे तो मोदी, अमित शाह और नितिन नबीन कितना क्या कर लेंगे?

डीजीपी और कांटे का टक्कर

लास्ट संडे को छुट्टी का दिन होने के बाद भी गृह विभाग के मुलाजिमों को शाम तक मंत्रालय में बिठाकर रखा गया कि पूर्णकालिक डीजीपी का आदेश निकालना है। मगर टक्कर इतना जोरदार है कि सिस्टम किसी एक नाम पर फैसला नहीं कर पाया। डीजीपी के दावेदारों में एक यूपी के ठाकुर हैं तो दूसरे राजस्थान के वैश्य। जाहिर है, दोनों अपनी तरफ से कोशिशें कम नहीं कर रहे होंगे। मगर सरकार बड़ी दुविधा में है। किसके नाम पर मुहर लगाएं...एक है तो वो कुछ सुनता नहीं...सिस्टम को चिंता यह भी खाये जा रही है। सियासी दृष्टि से भी दोनों कमजोर नहीं। वैसे भी ठाकुर और वैश्य कम्यूनिटी में ये अच्छी बात है कि उनके लिए समाज फर्स्ट होता है, पार्टी सेकेंड्री। सो, मुकाबला टाईट है। हालांकि, एक बात तय है कि दोनों में से डीजीपी वही बनेगा, जिसके माथे पर लिखा होगा। भला अमरनाथ उपध्याय ने कभी कहां सोचा था कि गिरधारी नायक जैसे आईपीएस के होते वे कभी डीजीपी बन जाएंगे। मगर ऐसा हुआ...29 साल की सर्विस में एडीजी होते हुए वे डीजीपी बन गए थे। उनके लिए तत्कालीन मुख्य सचिव सुनिल कुमार प्रगट हो गए थे। उन्होंने अशोक जुनेजा को हाथोंहाथ लेटर लेकर दिल्ली भेजा और एमएचए सिकेट्री को फोन कर उसी दिन शाम को 29 साल की सर्विस में डीजीपी बनाने का परमिशन ले लिया। तो अतीत में ऐसा भी हुआ है, इसका स्मरण रखना चाहिए।

2001 बैच तक दावेदार

छोटे राज्यों में अफसरों की कमी की वजह से भारत सरकार ने डीजीपी बनाने के लिए आईपीएस की 30 बरस की सर्विस को पांच साल कम कर 25 साल कर दिया है। छत्तीसगढ़ सरकार अगर इसे फॉलो करें तो 2001 बैच तक के आईपीएस अधिकारी डीजीपी के लिए दावेदार हो जाएंगे। याने एसआरपी कल्लूरी से लेकर प्रदीप गुप्ता, विवेकानंद, दीपांशु काबरा, अमित कुमार और डॉ0 आनंद छाबड़ा तक। तब सरकार के पास ढेरो विकल्प होते। मगर सरकार ने डीजीपी के पेनल के लिए 30 साल की सर्विस को मान्य करते हुए तीन अफसरों के नाम ही यूपीएससी को भेजे थे। इनमें से यूपीएससी ने दो के ही पेनल भेजे।

एडीजी के नीचे एडीजी

अफसरों की सरकार से नाराजगी कोई नई बात नहीं। हर टेन्योर में कुछ अफसर सिस्टम के निशाने पर होते हैं। मगर पोस्टिंग प्रोटोकॉल में वह शो नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए दीपांशु काबर और डॉ0 आनंद छाबड़ा की पोस्टिंग को लें। दीपांशु काबरा पीएचक्यू में एडीजी ट्रेनिंग हैं और प्रमोट हुए एडीजी छाबड़ा भी एडीजी ट्रेनिंग। याने एडीजी के नीचे एडीजी। कायदे से ऐसा होना नहीं चाहिए। सिस्टम चाहे तो भले ही पोस्टिंग न दें, मगर सीनियर, जूनियर को एक ही पद पर नहीं बिठाना चाहिए।

गोल्फ प्रेम को झटका 

मंत्रालय समेत सरकारी कार्यालयों में बायोमेट्रिक अटेंडेंस प्रारंभ होने से उन अफसरों को गोल्फ खेलना छूट गया है जिनकी सरकारी गाड़ियां सुबह छह और सात बजे नवा रायपुर की तरफ दौड़ती रहती थी। कुछ सालों से अभिजात्य वर्ग के इस खेल के प्रति छत्तीसगढ़ के अफसरों की रुचि गहरी हुई थी। कुछ अफसर तो यह दिखाने के लिए भी जाते थे कि वे गोल्फ खेलते हैं। हालांकि, उस समय कोई रोक-टोक भी नहीं थी...अफसरशाही में पूरी डेमोक्रेसी थी। गोल्फ खेल-खालकर अफसर 10 बजे तक घर पहुंचते थे...फिर मूड हुआ तो दोपहर बारह-एक बजे तक मंत्रालय। मगर बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम ने स्टे्टस सिंबल बताने का सबका खेल बिगाड़ दिया। जो नवा रायपुर में रहते हैं, उनको दिक्कत नहीं मगर ओल्ड रायपुर वालों को अब साढ़े नौ बजे घर से निकलना पड़ता है। ऐसे में, गोल्फ प्रेम छूटेगा ही।

वायरल रील्स और उठते सवाल

छत्तीसगढ़ की पुलिस बिरादरी में एक रील्स बड़ी वायरल है। उसमें इंटरव्यू बोर्ड पुलिस की नौकरी के लिए अप्लाई किए अभ्यर्थी से पूछा...पुलिस के लिए 150 रुपए पौष्टिक भत्ता मिलता है, आप पुलिस में हैं तो इसे कैसे मैनेज करेंगे? जवाब बड़ा इंटरेस्टिंग और सिस्टम पर करारा प्रहार करने वाला है। अप्लीकेंट बोला, सर...150 रुपए के हिसाब से एक दिन का पांच रुपए हुआ। पांच रुपए का एक नींबू आता है, रोज उसमें नमक लगाकर चाट लेंगे। इससे विटामिन सी की पूर्ति हो जाएगी फिर आयोडिन मिलेगा, इससे पुलिस वालों को घेंघा रोग नहीं होगा। हालांकि, रील्स बनाने वाले ने त्रुटिवश इसमें 50 रुपए बढ़ा दिया है। वास्तव में हमारे जवानों को पौष्टिक भत्ते के रूप में मिलता 100 रुपए है। मध्यप्रदेश के दौर में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने 1982 में पुलिस वालों के लिए 100 रुपए पौष्टिक भत्ता शुरू किया था। और 44 साल बाद भी यह 100 से बढ़ा नहीं। जबकि, यूपी में 5000 और पंजाब में 6000 पौष्टिक भत्ता मिलता है। जाहिर है, पुलिस की नौकरी सबसे टफ है। बरसात हो या चिलचिलाती धूप, या हाड़ कंपाने वाली ठंड...पुलिस को मुस्तैद रहना होता है। मंत्री, मिनिस्टर या बड़े लोगों का वीवीआईपीनेस भी वर्दीधारियों की संख्या के चलते ही प्रगट होता है फिर भी ये हाल? छत्तीसगढ़ में अभी तक 11 डीजीपी रह चुके। मगर किसी ने भी कोई जवानों के लिए एफर्ट नहीं दिखाया। दरअसल, आईपीएस और स्टेट पुलिस सर्विस वालों को काजू-बादाम जैसे पोष्टिक चीजें खरीदनी नहीं पड़ती, इसलिए वे पौष्टिक पदार्थो के रेट से वाकिफ नही होते। इसलिए, उन्हें जवानों की चिंता भी नहीं होती। अर्जुन सिंह राजा होकर भी संवेदनशील थे, ये अलग बात है। बहरहाल, प्रभारी डीजीपी अरुणदेव गौतम को पौष्टिक भत्ता बढ़ाने के लिए अब तक के सबसे तेज-तर्रार गृह मंत्री विजय शर्मा से बात करनी चाहिए। क्योंकि, बाकी डीजीपी के समय विजय शर्मा जैसा कोई ताकतवर गृह मंत्री नहीं रहा।

हफ्ते का कोट

"तुलना के खेल में मत उलझो, इस खेल का कोई अंत नहीं...जहां तुलना की शुरूआत होती है, वहीं से आनंद और अपनापन खत्म होता है।" और फिर..."नहीं खाई ठोकरे राह में तो, मंजिल की अहमियत क्या जानोगे, नहीं मिले गलत लोग राह में तो, सही की कदर कैसे पहचानोगे।"

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या 2010 बैच का कोई आईएएस अफसर भी डेपुटेशन पर दिल्ली जा रहा है?

2. छत्तीसगढ़ के एक मिनिस्टर का नाम बताइये, जिन्हें कुछ समझ में नहीं आता, उनके विभाग सिकेट्री चला रहे हैं?


Chhattisgarh Tarkash 2026: एमडी टू मिनिस्टर



तरकश, 5 अप्रैल 2026

संजय के. दीक्षित

एमडी टू मिनिस्टर

तरकश के पिछले स्तंभ में बिजली कंपनी के एक एमडी के नवाबी ठसन का किस्सा बयां किया था...कैसे वे मंत्रियों की तरह अपने काफिले की पायलेटिंग कराते हैं। अब पता चला है कि एमडी अगला विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। उन्हें किसी ने कह दिया है कि अगर चुनाव जीत गए तो मंत्री पक्का बनोगे...जब ऐसे-वैसे लोग मंत्री बन सकते हैं तो तुम तो पढ़े-लिखे...बड़े इंजीनियर से एमडी पद पर पहुंचे हो। इसके बाद से एमडी के लटके-झटके अभी से मंत्रियों जैसे हो गए हैं। चुनाव लड़ने के लिए उनके मैडम भी खूब निभा रही हैं। जिस इलाके में चुनाव लड़ने की तैयारी है वहां धड़ाधड़ समाधान शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। शिविरों में गरीबों के बिजली बिल का बकाया बिल मैडम भुगतान कर देती हैं। पीछे बैठे जेई, एई जेब से मैडम को पैसे निकाल कर देते हैं, और मैडम उसे जमा करा देती हैं। फिर होता है...जय-जयकार। व्हाट एन आईडिया। अफसर रहते नेताओं जैसा जय-जयकार।

अफसर को एक्सटेंशन!

पीसीसीएफ और हेड ऑफ फॉरेस्ट श्रीनिवास राव का रिटायरमेंट का समय नजदीक आ गया है। अगले महीने 31 मई को उनकी सेवानिवृत्ति है। मगर इसी के साथ उन्हें एक्सटेंशन मिलने की अटकलें भी तेज हो गई है। जाहिर है, श्रीनिवास राव भूपेश बघेल सरकार में सात सीनियर अफसरों को सुपरसीड कर हेड ऑफ फॉरेस्ट बने थे। जब वे फॉरेस्ट के हेड बने थे, तब आश्चर्यजनक तौर से वे पीसीसीएफ भी प्रमोट नहीं हुए थे। और दिसंबर 2023 में विष्णुदेव साय की सरकार आने के बाद भी ढाई साल से पिच पर बने हुए हैं, तो उनमें कुछ तो बात होगी। वैसे उनके एक्सटेंशन की अटकलों के पीछे मजबूत पॉलिटिकल बैकिंग बताई जा रही है। श्रीनिवास राव के निकटतम परिजन आंध्रप्रदेश में ऐसे कद्दावर नेता है, जिनके खेमे में दो दर्जन विधायक हैं। उसी गुट के सपोर्ट पर चंद्राबाबू नायडू की सरकार चल रही है और चंद्राबाबू के सपोर्ट पर केंद्र सरकार। तो फिर उनके एक्सटेंशन की खबरों को एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता।

माटी पुत्र

श्रीनिवास राव के बाद सीनियरिटी में पहले नंबर पर अरुण पाण्डेय हैं। 94 बैच के आईएफएस अरुण हेड ऑफ फॉरेस्ट के प्रबल दावेदार हैं। मगर श्रीनिवास राव को एक्सटेंशन मिला तो फिर अरुण पाण्डेय को हेड ऑफ फॉरेस्ट बनने की संभावनाएं क्षीण हो जाएंगी। अलबत्ता, श्रीनिवास को अगर एक्सटेंशन न मिला तो फिर हॉफ के लिए मुख्य मुकाबला दो अंबिकापुरिया में होगा। अरुण पाण्डेय और ओपी यादव दोनों अंबिकापुर के रहने वाले हैं। याने दोनों में से कोई भी बने, कोई माटी पुत्र ही हेड ऑफ फॉरेस्ट होगा। बशतें एक्सटेंशन की चकरी न चले।

नो ट्रांसफर

छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक ट्रांसफर पर कुछ दिनों के लिए ब्रेक लग गया है। अब मई के फर्स्ट वीक तक जाकर ही कुछ हो पाएगा। बता दें, सूबे में कलेक्टर, एसपी, डीएफओ, जिला पंचायत सीईओ समेत डिप्टी कलेक्टरों के ट्रांसफर काफी दिनों से अवेटेड है। मगर सरकार ने फैसला किया है कि फिलहाल कोई चेंज नहीं किया जाए। जो होगा अब मई फर्स्ट वीक तक...या हो सकता है 15 मई तक चला जाए। इसकी एक बड़ी वजह पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं। इसमें छत्तीसगढ़ से बड़ी संख्या में अफसरों की ड्यूटी लगी है। वेस्ट बंगाल में अप्रैल के अंत में वोटिंग है। सीएम सचिवालय के सूत्रों का कहना है, अफसरों के इलेक्शन से लौटने के बाद ही ट्रांसफर होंगे। याने मई ट्रांसफर का महीना रहेगा। जाहिर है, कई जिलों के कलेक्टर, एसपी, डीएफओ बोरिया-बिस्तर बांध कर प्रतीक्षा कर रहे हैं। मगर उन्हें अभी महीना-डेढ़ महीना और इंतजार करना पड़ेगा।

कमिश्नर रिटायर

रायपुर के डिविजनल कमिश्नर महादेव कावड़े अगले महीने सेवानिवृत्त हो जाएंगे। 31 मई उनका लास्ट डेट रहेगा। इसलिए, रायपुर में नया कमिश्नर भी अपाइंट करना होगा। मई में होने वाली प्रशासनिक सर्जरी में नए रायपुर कमिश्नर भी शामिल होंगे। वैसे, सरकार ने प्रमोटी आईएएस को कमिश्नर बनाने का स्टैंडर्ड सेट कर दिया है। लिहाजा, अत्यधिक संभावना है कोई प्रमोटी आईएएस रायपुर का नया कमिश्नर बनेगा। भले ही वह मंत्रालय के सचिव स्तर का कोई अधिकारी क्यों न हो।

सिंगल ऑफिसर और हनी ट्रेप

बिलासपुर में आईजी लेवल के दो अफसरों को ट्रेप किया गया। ये दोनों सिंगल थे और जाहिर तौर से सिंगल वाले को फंसना-फंसाना ज्यादा आसान होता है। इसलिए, बिलासपुर के नए आईजी ज्वाईनिंग के साथ ही परिवार लेकर बिलासपुर चले गए। ऐसा करना भी चाहिए। बिलासपुर के कप्तान को भी सतर्क रहना चाहिए। बदमाशों, अपराधियों को वे लगातार जेल भेज रहे हैं। वैसे, हनी ट्रेप के शिकार ज्यादा सिंगल अफसर ही होते हैं। सिंगल वाले पर डोरे डालना आसान होता है। बिलासपुर संभाग के एक पूर्व कलेक्टर सिंगल रहने के चलते बाल-बाल बचे। हालांकि, बदनामी तो पूरी हो गई। बस्तर संभाग के एक कलेक्टर भी कब हनी ट्रेप के शिकार होकर मीडिया की सनसनी बन जाएं, कुछ कहा नहीं जा सकता। खतरा मंत्रालय में भी कम नहीं है। कई अफसर परिस्थितियोंवश सिंगल हैं। वहां कई सप्लाई कंपनियों और मेट्रो सिटीज के एनजीओ की कुड़ियां शिकार की तलाश में घूमती रहती हैं। कुल मिलाकर पावर और पैसा जहां है, वहां मधुमक्खियां मंडराएंगी ही। ऐसे अफसरों की पत्नियों को विशेष अलर्ट रहने की जरूरत है। वरना, बाद में पछताने के अलावा कोई चारा नहीं बचता।

नाइंसाफी?

सरगुजा से नक्सलियों का सफाया करने वाले आईपीएस अधिकारी एसआरपी कल्लूरी ऐसे घनचक्कर में फंस गए हैं कि सीनियर होने के बाद उन्हें डीजी बनने में लंबा वेट करना होगा। दरअसल, परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि 94 बैच में सीनियर होने के बाद भी जीपी सिंह और एसआरपी कल्लूरी डीजी प्रमोशन से चूक गए। जीपी तो लड़-भिड़कर अपना प्रमोशन करा लिए मगर अत्यधिक तेज-तरार्र आईपीएस माने जाने वाले कल्लूरी पता नहीं क्यों ठंडे पड़ गए। और अब आगे उनके लिए कोई स्कोप भी नजर नहीं आता। डीजी के चार ही पद है। दो कैडर, दो एक्स कैडर। इन चार पदों पर इस समय अरुण देव गौतम, पवनदेव, जीपी सिंह और हिमांशु गुप्ता बैठे हैं। गौतम का अगले साल रिटायरमेंट है मगर कहीं पूर्णकालिक डीजीपी बन गए तो फिर उनका कार्यकाल दो साल का हो जाएगा। याने फिर 2028 में रिटायर होंगे। उसके बाद ही कल्लूरी का रास्ता साफ हो पाएगा। तिरूपति वाले बालाजी की कहीं विशेष चकरी चल गई तो फिर बात अलग है....सरकार चाहे तो उन्हें केंद्र से बात कर स्पेशल डीजी बना सकती है।

चंदे से शादी

अभी तक गांवों में अनाथ या गरीबों की बेटियों की शादी लोग जरूर चंदा देकर करा देते थे। मगर प्रभावशाली लोग ऐसा करने लगे तो ये ठीक नहीं। इससे सूबे में एक नई परिपाटी शुरू हो जाएगी। कुछ दिनों पहले एक मंत्री के साथ साये की तरह रहने वाले की शादी हुई, उसमें भी अधिकारियों, सप्लायरों से बड़ा चंदा हुआ। और इस समय फिर ऐसी ही वसूली हो रही है। रायपुर में अफसरों से कहा जा रहा...भले ही परचेजिंग तेज कर दो, मगर इतना चाहिए तो चाहिए। अब इसमें से उपर कितना पहुंचेगा और कितना चेले-चपाटी भाई साहब के नाम पर अंदर कर लेंगे, ये भी बड़ा प्रश्न है। सार यह है कि बड़े लोगों को इन सबको लेकर सजग रहना चाहिए।

बिना एसपी के डीआईजी

छत्तीसगढ़ में राज्य पुलिस सेवा का बड़ा बुरा हाल है। डिप्टी कलेक्टरों में 2013 बैच तक आईएएस अवार्ड हो गया मगर डीएसपी में अभी 2002 बैच में ही मामला अटका हुआ है। नाइंसाफी भी ऐसी कि जो आईपीएस बने, उन्हें एसपी बनने का मौका नहीं मिला। श्वेता राजमणि बिना एसपी बने ही डीआईजी प्रमोट हो गई। हालांकि, सरकार चाहे तो डीआईजी को भी एसपी बना सकती है मगर सिस्टम में समरथ को न दोष गोसाई जैसी स्थिति है। उमेश चौधरी भी आईपीएस बनकर पीएचक्यू में टाईम काट रहे हैं। उधर, मनोज खिलाड़ी कुछ सीनियर आईपीएस अफसरों के जोर लगाने पर जीपीएम जैसे जिले के एसपी बन पाए। जबकि, उनके बाहर से अतिक्रमण करके आए बैचमेट दो-दो, तीन-तीन जिले की कप्तानी कर चुके हैं। कुल मिलाकर रापुसे पर ’दुबर पर दो आसाढ़’ वाली स्थिति है...एक तो आईपीएस अवार्ड में पीछे और उपर से आईपीएस हो गए तो बिना किसी एप्रोच के जिला नहीं मिल पाएगा।

डिप्टी कलेक्टरों के बुरे दिन

डीएसपी की जैसा हाल अब डिप्टी कलेक्टरों का भी होना है। 2013 बैच के 30 में से तीन आईएएस बने हैं। अभी 27 बचे हैं। 2014 बैच में भी 30 डिप्टी कलेक्टर हैं और 2015 बैच में उससे दुगुना। याने 60। हालांकि, आईएएस का कैडर रिवीजन में पद बढ़ गया है फिर भी अब आईएएस अवार्ड होने के लिए काफी पापड़ बेलने पड़ेंगे। हो सकता है कई को एडिशनल कलेक्टर से ही रिटायर होना पड़ जाए। इस समय राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की संख्या बढ़कर 448 पहुंच गई है। इतने छोटे राज्य में कभी इतना ज्यादा अफसर होते नहीं। मगर डिप्टी कलेक्टरों को जनपद सीईओ बनाने के लिए एक बार पद बढ़ाया गया तो फिर बढ़ता चला गया। इसका खामियाजा अब अफसरों को उठाना पड़ेगा।

’उड़ता छत्तीसगढ़’

दुर्ग पुलिस द्वारा हाइड्रोपोनिक गांजा बरामद करने से हड़कंप मच गया है। हाइड्रोपोनिक गांजा बैंकॉक और हांगकांग के समुद्र में उगाया जाता है। यह इतनी कीमती है कि बाजार रेट इसका एक करोड़ रुपए किलो है। इसके बाद भी छत्तीसगढ़ में इसकी सप्लाई हो रही है तो समझा जाता है कि छत्तीसगढ़ में किस लेवल पर गांजे का इस्तेमाल किया जा रहा है। लोकल गांजा लोवर क्लास के लोग इस्तेमाल करते ही हैं, लोगों को नशे की लत ऐसी लगती जा रही कि बड़े-बड़े लोग सिगरेट में भरकर गांजा पी रहे हैं। दुर्भाग्यजनक यह है कि छत्तीसगढ़ के कुछ युवा नौकरशाहों के नाम भी गांजे का सेवन करने में आ रहा है। वाकई, यह चिंताजनक है। आखिर नई पीढ़ी कहां जा रही है?

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस तेज-तर्रार पुलिस अधीक्षक को हटाने के लिए नेताओं और माफियाओं ने नवरात्रि में बकरे की बलि दी है?

2. पूर्णकालिक डीजीपी का फैसला दो-एक दिन में होना है, अरुणदेव गौतम और हिमांशु गुप्ता में से किसके सिर सजेगा पुलिस प्रमुख का ताज?

रविवार, 29 मार्च 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: ब्रांडेड शराब, मुख्य सचिव और खेला



 तरकश, 29 मार्च 2026

संजय के. दीक्षित

ब्रांडेड शराब, मुख्य सचिव और खेला

रमन सरकार 2.0 के दौरान शराब माफियाओं को झटका देते हुए गवर्नमेंट द्वारा शराब बेचने की नीति बनाई गई थी, उसमें शराब खरीदने-बेचने वाली स्टेट मार्केटिंग कंपनी में चीफ सिकरेट्री को पदेन चेयरमैन बनाया गया था। इसलिए, ताकि कोई गड़बड़ी न हो। बावजूद इसके 3200 करोड़ का घोटाला हो गया। हालांकि, मुख्य सचिव बनते के बाद विकास शील ने स्टेट मार्केटिंग कंपनी की पहली बैठक में ही शराब में ’वन टू का फोर’ के खेल को बंद करने की कवायद शुरू कर दी। उससे पहले शराब कंपनियां दुकानों में प्रतिद्वंद्वी कंपनियों की बजाए अपना ब्रांड रखवा देती थी। इससे लोग पसंदीदा ब्रांड के लिए भटकते रहते थे। स्टेट कंपनी के अफसरों से गठजोड़ कर इस खेल को अंजाम दिया जाता था। मगर आश्चर्य यह है कि बीजेपी की सरकार आने के बाद भी पिछले दो साल से ये खेल बदस्तूर जारी था। बहरहाल, सीएस ने अब ’मनपसंद’ ऐप्प चालू करवा दिया है। अब ऐप्प पर जाकर देखा जा सकता है कि किस शॉप में उनके पसंद का ब्रांड उपलब्ध है और कहां नहीं। दूसरा, अब शराब खरीदने के लिए यूपीआई से पेमेंट करना होगा। यानी नो कैश ट्रांजेक्शन। दरअसल, ईडी इसी खेल की जांच कर रही है...कई अफसर सलाखों के पीछे हैं। खेल था...सरकारी शराब के पैरेलेल प्रायवेट तौर पर शराब बेचकर करोड़ों अंदर करना। यूपीआई से पेमेंट होने पर अब गोलमाल संभव नहीं हो पाएगा। अलबत्ता, सीएस के इस एक्शन से कई शराब कारोबारियों को झटका लगा है। कसमसा तो आबकारी विभाग वाले भी रहे हैं और कुछ बीजेपी के नेता भी, क्योंकि उनके पेट पर चोट पहुंच रही।

सरकार संज्ञान ले

बात निकली चीफ सिकरेट्री के अहम संस्थाओं में चेयरमैन बनाने की तो सीजीएमएससी भी उनमें शामिल था। बता दें, स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के दौर में सीजीएमएससी का गठन किया था और उसमें मुख्य सचिव को पदेन चेयरमैन बनाया गया था। ताकि, नीचे के मुलाजिमों में भय बना रहे। मगर पिछली सरकार में इसे उलट सरगुजा से विधायक डॉ0 प्रीतम राम को ढाई करोड़ लोगों की जान की रक्षा करने वाले सीजीएमएससी का चेयरमैन बना दिया गया। चलिये प्रीतम राम तो पेशे से चिकित्सक थे, उन्हें दवा, मशीन के बारे में कुछ तो जानकारियां रही होगी। बीजेपी शासनकाल में दीपक महस्के को इस निगम का अध्यक्ष बनाया गया है। जाहिर है, बीजेपी का आईटी सेल देखने वाले महस्के को मेडिकल लाइन का एबीसीडी का ज्ञान नहीं होगा। और जब डॉक्टर के चेयरमैन होने के बाद सीजीएमएससी में 400 करोड़ का रीएजेंट घोटाला हो गया...आधा दर्जन अफसर और सप्लायर जेल में हैं और आधा दर्जन कभी भी भीतर जा सकते हैं तो फिर इस समय क्या होगा, भगवान ही मालिक है।

वीआईपी एमडी

ऐसा जलवा तो निगम, बोर्डों में पोस्टेड आईएएस एमडी भी नहीं काटते होंगे, जैसा बिजली कंपनी के एक प्रबंध निदेशक काट रहे हैं। उनके काफिले में एक पायलट गाड़ी चलती है। उसमें बिजली कंपनी का खाकी वर्दी वाला सिक्यूरिटी अफसर चलता है। सिक्यूरिटी अफसर को इतना अपटूडेट रखा जाता है कि सड़क पर लोग भ्रम खा जाए कि छत्तीसगढ़ आर्म्स फोर्स का कोई रंगरूट होगा। एमडी इतने शौकीन हैं कि उन्हें कलम भी सरकारी पैसे का चाहिए...वो भी हल्का-फुल्का नहीं...हाल में उन्होंने 5000 का पेन खरीदवाया है। रही बात, पायलेटिंग की तो छत्तीसगढ़ में चीफ सिकरेट्री और डीजीपी की भी पायलेटिंग नहीं होती। सूबे में अब तक किसी डीजीपी की अगर पायलेटिंग हुई है तो वे थे विश्वरंजन। विश्वरंजन का पिछले हफ्ते ही स्वर्गवास हुआ है। दिल्ली आईबी से लौटे विश्वरंजन का रसूख भी ऐसा था कि उनका एक बार चलता था। मगर इंजीनियर से प्रमोट होकर एमडी बने अफसर अगर पायलेटिंग करवा रहा तो समझा जा सकता है छत्तीसगढ़ में क्या हो रहा है।

सीएस, डीजीपी का प्रोटोकॉल

बात चीफ सिकरेट्री और डीजीपी की पायलेटिंग की आई तो ये दोनों कार्यपालिका और सिक्योरिटी के सुप्रीम पद हैं। इनके सिकरेट्री प्रोटोकॉल में भी पायलेटिंग और फॉलोगार्ड आता है। सीएस को वाय और डीजीपी को जेड केटेगरी की सुरक्षा होनी चाहिए। मगर फोकस में आने से बचने के लिए छत्तीसगढ़ में सीएस और डीजीपी इसका इस्तेमाल नहीं करते। मगर कायदे से दोनों को अपने पद के औरा का खयाल रखना चाहिए। ठीक है, सरकारी मुलाजिम लोक सेवक होता है मगर पद के अनुरूप उसका तामझाम और सिक्योरिटी होनी चाहिए। वरना, कलेक्टर और सीएस तथा एसपी और डीजीपी में क्या फर्क रहेगा।

100 अटेंडेंस

छत्तीसगढ़ के मंत्रालय में एक जनवरी से बायोमेट्रिक अटेंडेंस लागू किया गया, उस टाईम एकमात्र अफसर टाईम से आ रहे थे। याने दिसंबर का फिगर सिर्फ एक रहा। इसके बाद जनवरी में 10 बजे तक मंत्रालय पहुंचने वालों की संख्या 18 हुई और फरवरी में 100 । मार्च में लगभग दुगुना होने का अंदेशा हैं। जीएडी का प्रयास है कि इसके बाद इसे पब्लिक के लिए ओपन कर दिया जाए। याने कोई भी सरकार के वेबसाइट पर जाकर देख सकेगा कि कितने अफसर कितने बजे तक ऑफिस आते हैं और शाम को कितने बजे जाते हैं। हालांकि, इसमें अफसरों का नाम नहीं रहेगा, संख्या रहेगी।

ई-ऑफिस के फायदे?

अब इसे ई-ऑफिस में फंसना कहें कि टेक्नालॉजी का फायदा, विभिन्न राज्यों में चुनाव कराने गए कई आईएएस अफसर रायपुर में न रहने के बाद भी ई-ऑफिस पर फाइलें क्लियर कर रहे। यदि ऐसा रहा तो सरकार को लिंक अफसर बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अफसरों के अवकाश में रहने के बाद भी महत्वपूर्ण फाइलों के लिए लिंक अफसर नियुक्त किए जाते हैं। चीफ सिकरेट्री को इसकी रिपोर्ट मांगनी चाहिए कि चुनाव ड्यूटी में रहने के बाद भी कितने अफसरों ने ई-ऑफिस से सरकारी काम भी करते रहे...उन्हें सम्मानित करना चाहिए।

पोस्टिंग में सियासत?

प्रदेश के दूसरे बड़े शहर मंत्रिपरिषद में प्रतिनिधित्व के मामले में दुर्भाग्यशाली तो है ही अफसरों की पोस्टिंग के मामले में इस शहर के साथ दोयम व्यवहार किया जा रहा है। बिलासपुर नगर निगम में अजीत जोगी सरकार के समय से डायरेक्ट आईएएस कमिश्नर रहे। कभी-कभार राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर आयुक्त बने भी तो वे पारफर्मेंस वाले रहे। मगर अभी जो पोस्टिंग हुई है, उसके बाद स्थिति यह है कि एक सड़क को पीडब्लूडी ने ठेका दे दिया और उसी ठेकेदार को नगर निगम ने भी ठेका दे डाला। निगम के अफसरों का खेल ये था कि पीडब्लूडी सड़क बनवाएं और निगम से भी उसका बिल पास कर करोड़ों रुपए अंदर कर लिया जाए। मगर उससे पहले खेल का भंडाफोड़ हो गया। हो सकता है, इसमें दोष निगम कमिश्नर का न हो। काफी लो प्रोफाइल के वे सीधे-साधे अफसर हैं। तभी तो स्मार्ट सिटी के मद से 16 करोड़ में बनवाए गए मल्टीलेवल पार्किंग में एक आटो डील वाले ने कब्जा कर लिया है। पार्किंग के एक फ्लोर पर डीलर ने 500 मोटरसायकिलें लाकर खड़ी कर दी। वो भी निगम मुख्यालय के ठीक सामने स्थित पार्किंग में। इससे समझा जा सकता है, नगर निगम में क्या चल रहा होगा। बहरहाल, बात पोस्टिंग में सियासत की तो जिस एसडीएम को एसीबी छापे के बाद हटा कर बस्तर भेजा गया, आश्चर्यजनक तौर से उसकी पोस्टिंग फिर बिलासपुर कर दी गई। सिस्टम को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा तो कम-से-कम बीजेपी को देखना चाहिए। अभी तो जांजगीर गड्ढा हुआ है, कोई भरोसा नहीं कि 2028 के इलेक्शन में बिलासपुर जिला भी बड़ा गड्ढा बन जाए। कलेक्टर संजय अग्रवाल को टीम अच्छी नहीं मिलेगी तो वे अकेले क्या कर लेंगे। वैसे भी किसी जमाने में अविभाजित बिलासपुर जिले की 19 की 19 सीटें कांग्रेस की झोली में जाती थी।

मूंछ और चोटी वाले अफसर

नाम जरूर हायर है मगर इस विभाग में आमतौर पर हायर प्रोफाइल वाले अफसर कभी रहे नहीं और कोई जाना भी नहीं चाहता। बात हायर एजुकेशन की हो रही है। सरकार ने इस विभाग में अभिनंदन स्टाईल वाले मूंछेले अफसर और चोटी वाले आईएएस को बिठाया है। और इस समय विभाग का हाल ये है कि सालों से अटके सलेक्शन, पोस्टिंग और सस्पेंशन धड़ाधड़ हो रहे हैं। इससे पहले कभी कालेजों के प्रोफेसरों को निलंबित होते नहीं देखा गया। लेकिन पिछले छह महीने में कई प्रिंसिपल और असिस्टेंट प्रोफेसर निलंबित हो गए हैं। ऐसा तो नहीं...मूंछ और चोटी रखने से एक्स्ट्रा एनर्जी मिल जाती है?

कमजोर कलेक्टर-1

छत्तीसगढ़ ने कभी उदय वर्मा, प्रशांत मेहता, शैलेंद्र सिंह, नजीब जंग, सुनिल कुमार, अजय नाथ, देवराज बिरदी, विवेक ढांड, एमके राउत जैसे दमदार कलेक्टरों को देखा है। मगर अब आलम यह है कि 33 में से 25 से अधिक 'पठरू' कलेक्टर हैं। दरअसल, कलेक्टरों में दमदारी दिख नहीं रही। छोटे-मोटे लॉ एंड आर्डर होने पर वे मुख्य सचिव और सीएम सचिवालय की ओर देखने लगते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद के कलेक्टरों की बात करें, तो सुबोध सिंह रायपुर और बिलासपुर में किसी से मिलने से कतराते नहीं थे। दलित समाज के एक बड़े धर्मगुरू अक्सर उनके चेंबर में बैठे पाए जाते थे। इन्हीं संपर्को के जरिये उन्होंने गिरौदपुरी और बिल्हा की कई हिंसक घटनाओं पर काबू पाने में कामयाबी पाई। तो रायपुर में एक व्यापारी समुदाय के युवक की मौत के बाद मामला काफी बिगड़ गया था। भगत सिंह चौक पर लाश लेकर समाज के लोग बैठ गए थे। सुबोध सिंह बिना घबराये मौके पर पहुंच गए थे। अब तो हालत यह है कि कलेक्टर की तो दूर की बात एसपी, आईजी बिना फॉलोगार्ड लेकर मौके पर नहीं पहुंचते। कलेक्टर तो कोई घटना होती है तो बंगले में दुबक जाते हैं। बलौदा बाजार में जैसे ही हिंसा शुरू हुई, कलेक्टर शहर से बाहर चले गए थे।

कमजोर कलेक्टर-2

सरकार और जीएडी सिकेट्री रजत कुमार को कलेक्टरों की कमजोरी का कोई सौल्यूशन निकालना चाहिए। रजत खुद भी दमदार रहे हैं...कोरबा के लोगों ने देखा भी है। दरअसल, दिक्कत वहां से शुरू हुई, जब राज्य बनने के बाद आईएएस अधिकारियों को बिना एडीएम बनाए कलेक्टर बनाया जाने लगा। एक तो इस समय छत्तीसगढ़ में सबसे कम समय सिर्फ छह साल में कलेक्टरी मिल जा रही। उसमें एसडीएम की एक पोस्टिंग, उसके बाद जिला पंचायत सीईओ या निगम कमिश्नर और उसके बाद फिर सीधे जिले में डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट। इससे प्रशासन की बारीकियों से वे अनभिज्ञ रह जा रहे। चीफ सिकेट्री को पता होगा, मध्यप्रदेश के दौर में कलेक्टर बनने से पहले एडीएम बनना अनिवार्य था, फिर उस समय डीआरडीए का सीईओ, तब जाकर कलेक्टरी मिलती थी। एडीएम कलेक्टर और एसडीएम के बीच की कड़ी होते थे। हर धरना, प्रदर्शनों पर एडीएम को भेजा जाता था तो ज्ञापन भी एडीएम लेते थे। उससे कलेक्टरों को जिले के लिए प्लानिंग करने का टाईम मिलता था और एडीएम को एडमिनिस्ट्रेशन का अनुभव। एडीएम बनने का मतलब था कि पक्ष-विपक्ष दोनों ही दलों के नेताओं से बढ़ियां कनेक्शन बन जाना। कलेक्टर या उसके उपर की पोस्टिंगों में ये चीजें बडे काम आती थी। मगर अब तो ये हाल है कि अधिकांश कलेक्टरों को नेताओं या आम आदमी से कोई वास्ता नहीं रह गया है। सरकारें बदलती है, जनदर्शन लगाने का आदेश जारी करती हैं और फिर वह कूडे़दान में चला जाता है।

कलेक्टर-एसपी भाई-भाई

सिकरेट्री टू सीएम बनने के बाद तत्कालीन जीएडी सिकेट्री मुकेश बंसल ने फर्स्ट व्हाट्सएप कलेक्टर-एसपी के पारफर्मेंस और ट्यूनिंग को लेकर किया था। मगर वो बेमतलब निकला। अधिकांश जिलों के कलेक्टर-एसपी एक सूत्रीय एजेंडा में डटे हुए हैं। रही बात जनदर्शन की तो ऐसे जिले उंगलियों पर गिने जाने वाले होंगे। वैसे, वर्तमान दौर में जनदर्शन का कोई औचित्य नहीं भी नहीं रह गया है। इससे पब्लिक में नाराजगी और बढ़ती है। रमन सिंह के दौर तक अफसरशाही पटरी पर थी। मगर अब सब डिरेल्ड है। आखिर, पटवारी, आरआई और तहसीलदार, एसडीएम से जब न्याय नहीं मिलता तो आम आदमी कलेक्टर के पास पहुंचता है और कलेक्टर साब लोग समस्या ठीक से सुने बिना....नीचे रीडर को मार्क कर देते हैं। रीडर आवेदन को फिर उन्हीं खटराल तहसीलदार, एसडीएम के पास भेज देते हैं जांच के लिए, जहां से आदमी पहले ही आजिज आ चुका होता है। यही हाल कप्तान साब लोगों का है। एसपी से थाना या सीएसपी की शिकायत लेकर जाओ तो कलेक्टर जैसे ही नीचे मार्क कर देते हैं। ऐसे में आम आदमी को टाईम और पैसा खर्च होने के अलावा कुछ हासिल होता नहीं। फिर चुनाव आता है तो लोग सबक सिखाते हैं। जैसे कांग्रेस गवर्नमेंट में हुआ। उस समय विडबंना ये थी कि मुख्यमंत्री तेज-तर्रार थे मगर किन्हीं कारणों से प्रशासनिक सिस्टम निरंकुश हो गया था। उसकी कीमत कांग्रेस सरकार को चुकानी पड़ी।

सीएस का तीर?

कैबिनेट की बैठकों में अफसरों की बढ़ती भीड़ पर सख्ती दिखाते हुए चीफ सिकरेट्री ने इस पर अंकुश लगाने सचिवों को कड़ा पत्र लिखा है। भीड़ बढ़ने की एक बड़ी वजह सचिवों का सब्जेक्ट की स्टडी न होना भी है। अधिकांश सिकेट्री विभागों के कामकाज पर पकड़ नहीं रखते। इसलिए अपने डायरेक्टर, एमडी को तो बुलाते ही हैं, विभाग के सौ ताले की एक चाबी या श्रमजीवी मुलाजिम को कैबिनेट की बैठकों में बुला लेते हैं, ताकि चर्चा के दौरान कहीं गाडी अटकी तो तुरंत उनसे पूछ जवाब दे सकें। बहरहाल, सीएस के लेटर रुपी तीर ने कई और लोगों को जख्मी किया है, जो बिना काम कैबिनेट में घूस आते थे।

गॉड गिफ्टेड

विधानसभा अध्यक्ष डॉ0 रमन सिंह कोयंबटूर में इलाज कर रायपुर लौट आए हैं, और अब बिल्कुल स्वस्थ हैं। इसमें खबर ये है कि उनके आए लगभग पखवाड़ा गुजर चुका है, बावजूद उनसे मिल कुशल क्षेम पूछने वालों का तांता लगा है। कह सकते हैं...मुख्यमंत्री पद से हटे सात साल गुजर जाने के बाद भी उनकी लोकप्रियता का ग्राफ कम नहीं हुआ तो इसमें कुछ उपर वाले का भी हाथ है। 2018 में विधानसभा चुनाव बुरी कदर हारने के बाद लोगों ने अफसरशाही पर ठीकरा फोड़ा...मंत्रियों की अहंकार को कोसा...मगर रमन को एक शब्द नहीं। इसका निहितार्थ यह कि सूबे की राजनीति में रमन का रुतबा कायम है। ऐसा सम्मान छत्तीसगढ़ के किसी और नेता को नहीं मिला।

अंत में दो सवाल आपसे

1. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की पत्नियां आजकल बिलासपुर की पोस्टिंग से क्यों घबरा रही हैं?

2. खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ के 33 में से किन पांच कलेक्टरों को लंगोट का ढीला बताया गया है?

शनिवार, 21 मार्च 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: बजट 9500...खर्च 3000 करोड़



 तरकश, 22 मार्च 2026

संजय के. दीक्षित

बजट 9500...खर्च 3000 करोड़

छत्तीसगढ़ का सिस्टम कितना फास्ट वर्क कर रहा है, इसका जीता-जागता नमूना है पीडब्लूडी। ढाई साल गुजर जाने के बाद भी यह विभाग जहां से चला था, वहीं पर खड़ा है। जाहिर है, किसी भी सूबे में पीडब्लूडी सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण विभाग इसलिए माना जाता है कि गरीब हो या अमीर, सड़कों से सबको वास्ता पड़ता है। अगर किसी विभाग का काम धरातल पर बिना चश्मा लगाए दिखता है तो वह पीडब्लूडी ही है। इसीलिए, इस विभाग का बजट सबसे अधिक रखा जाता है। छत्तीसगढ़ में इस विभाग को 2025-26 में सबसे अधिक 9500 करोड़ का बजट मिला था। लेकिन, इसमें से खर्च कितना हुआ? जवाब सुन आप अपना माथा पकड़ लेंगे। मात्र 3000 करोड़। जबकि, मार्च क्लोजिंग में अब सिर्फ सात रोज बच गए हैं। ये भी 3000 करोड़ खर्च तब हुआ, जब वित्त विभाग सभी विभागों को पत्र लिख बजट खर्च करने तगादा किया और मुख्य सचिव विकास शील लगातार डंडा चला रहे थे। छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े बजट वाले इस विभाग की हालत ये है कि मुख्यमंत्री को पीडब्लूडी के रिव्यू में बड़ी तल्खी के साथ कहना पड़ा...पीडब्लूडी का काम कहीं दिखता नही ंतो वहां बैठे सारे लोग सकपका गए थे।

सड़क और दिग्विजय सिंह की हार

2003 के विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह सरकार की करारी हार हुई, उसमें खराब सड़कों की बड़ी भूमिका रही। अजीत जोगी के दौर में छत्तीसगढ़ में इतनी अच्छी सड़कें बन गई थी कि बार्डर पर के रोडों को देख समझ में आ जाता था कि कहां से मध्यप्रदेश की सीमा चालू हो रही है। छत्तीसगढ़ में भी कमोवेश अभी वही हाल है। पीडब्लूडी के अफसरों को कायदे से उल्टा लटका देना चाहिए। इसलिए कि अपने विभागीय मंत्री और सूबे के मुखिया के इलाके की भी उन्हें परवाह नहीं। पीडब्लूडी मिनिस्टर के गृह जिले मुंगेली आपको जाना है तो नांदघाट से जाने पर भगवान राम याद आ जाएंगे। लोगों को 40 किलोमीटर का एक्स्ट्रा चक्कर लगा सरगांव के आगे से पथरिया होकर मुंगेली जाना पड़ रहा है। यही हाल अंबिकापुर से जशपुर जाते समय बतौली से चरईडांड के बीच है। कई जगह पर सड़कों के नाम पर गड्डे पाएंगे आप। कायदे से अब समय भी नहीं बच गया है। अभी टेंडर का प्रॉसेज प्रारंभ भी हुआ तो फायनल होते-होते बरसात आ जाएगा। फिर अक्टूबर के बाद चुनाव में सिर्फ डेढ़ साल बच जाएगा। तब तक सिस्टम के खिलाफ इतना नैरेटिव बन जाएगा कि मोदीजी, अमित शाह और नितिन नबीन के लिए भी मामला पेचिदा हो जाएगा।

अमित शाह का भी खौफ नहीं

बस्तर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का पूरा फोकस है तो राज्य सरकार भी कोई कसर नहीं रख रही। खुद मुख्यमंत्री अभी तक बस्तर के 100 दौरे कर चुके हैं। इसके बाद भी सरकारी एजेंसी की रिपोर्ट है कि बस्तर के तीन जिलों के कलेक्टर, एसपी और डीएफओ कार्टेल बनाकर सड़कों में डंके की चोट पर कमीशन खा रहे हैं। दिल्ली का ठेकेदार परेशान है, क्योंकि, इन तीनों के अलावा एक मंत्रीजी को भी पैसा चाहिए। समझ में नहीं आता कि आईबी और इंटेलिजेंस का इतना बड़ा अमला यहां क्या कर रहा है। बहरहाल, एक कलेक्टर तो जाते ही शुरू...उनका परिवार फूड डिपार्टमेंट के खेल में फंसते-फंसते बचा है...या यों कहें कि बचाया गया है वरना कलेक्टर बिरादरी की बदनामी हो जाती। बहरहाल, सवाल यह भी कि सड़क ठेकेदार इतना पैसा बांट देगा तो फिर क्वालिटी कैसे मेंटेन करेगा? छत्तीसगढ़ का दुर्भाग्य ही कहें कि इतने सारे अफसरों के जेल जाने के बाद भी उन्हें सद्बुद्धि नहीं आ रही। वो भी तब हो रहा, जब सूबे के चीफ सिकरेट्री से लेकर पीएस टू सीएम, डीजीपी, खुफिया चीफ चारों की छबि पर कोई सवाल नहीं उठा सकता।

आईएएस अफसरों का दिल्ली कूच

छत्तीसगढ़ के साथ विडंबना है कि पिछली सरकार में भी अच्छे अफसर दिल्ली भागने लगे थे और इस सरकार में भी आईएएस अधिकारियों को दिल्ली जाने का सिलसिला रुका नहीं है। अभी तक अंबलगन पी, अलरमेल मंगई, प्रियंका शुक्ला, सौरव कुमार, फकीर भाई अय्याज तंबोली, दीपक सोनी, सर्वेश भूरे, नम्रता गांधी, ऋचा प्रकाश चौधरी, हरीश जैसे कई अफसर दिल्ली जा चुके हैं। अमित अग्रवाल, गौरव द्विवेदी, मनिंदर कौर द्विवेदी, अलेक्स पाल मेनन, संगीता पी, नीरज बंसोड़ पहले से प्रतिनियुक्ति पर हैं। 2005 बैच के मुकेश बंसल ने भी सरकार को पत्र लिख एनओसी मांगा है। मुकेश रिजल्ट देने वाले अफसर हैं, उनका फिर दिल्ली जाना सरकार के लिए झटका माना जाएगा। उधर पिछले कई साल से राज्य से बाहर रह रहीं श्रृति सिंह इस समय दिल्ली में रेजिडेंस कमिश्नर हैं, वे भी फिर से डेपुटेशन के लिए एनओसी मांग रही हैं। कांकेर कलेक्टर नीलेश क्षीरसागर ने भी आवेदन लगाया हैं।

सरकार की सख्ती

छत्तीसगढ़ में आईएएस अधिकारियों की संख्या जरूर बढ़ गई है, मगर काम वाले मुठ्ठी भर ही हैं। अभी सीपीआर समेत कई विभागों में सिकेट्री बदलना है, मगर ढंग के आदमी दिख नहीं रहे। सरकार को बाहर गए अफसरों के मामले में सख्ती दिखानी चाहिए। क्योंकि, कई अफसर दिल्ली जाने के बाद लौटना नहीं चाह रहे। रमन सिंह के दौर में बीवीआर सुब्रमणियम को पीएमओ से वापिस बुलाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह तक ने पत्र लिखा था। जबकि, उस समय विरोधी पार्टी की सरकार थी। बार-बार तगादे के बाद मनमोहन सिंह को फिर कहना पड़ा था कि क्या प्रधानमंत्री को इतना भी अधिकार नहीं कि अपने पसंद के किसी अफसर को अपने सचिवालय में रख सकें। तब जाकर सरकार शांत हुई थी। मगर 2014 में जैसे ही केंद्र में बीजेपी की सरकार आई, सुब्रमणियम को बुला लिया गया। जाहिर है, सारे अफसर दिल्ली चले जाएंगे तो फिर छत्तीसगढ़ में काम कौन करेगा। श्रुति सिंह कई साल यूपी में रहीं। फिर वहीं से सीधे छत्तीसगढ़ भवन में पोस्टिंग कराई और अब फिर से डेपुटेशन पर जाना चाह रहीं। ऐसे में, सवाल यह कि अंकित आनंद ने क्या गुनाह किया कि उन्हें रोक लिया गया।

प्रवासी सिकेट्री

छत्तीसगढ़ के कई आईएएस प्रवासी हो गए हैं। उनमें एक नाम वर्तमान सिकेट्री का भी जुड़ गया है। सरकार ने उनके साथ उदारता बरतते हुए दिल्ली में एडिशनल पोस्टिंग दे दी, ताकि उसकी आड़ में उन्हें दिल्ली में मकान मिल जाए। मगर सरकार की यह उदारता उल्टी पड़ गई। सिकेट्री साब को जब से दिल्ली में आवास मिला है, रायपुर में टिक ही नहीं पा रहे। हर तीसरे दिन पता चलता है साब दिल्ली में हैं। यहां विभाग को वॉट लगा हुआ है। छह महीना और यही हाल रहा तो लोगों में त्राहि माम मच जाएगा। क्योंकि, सवाल सेहत से जुड़ा हुआ है।

2005 बैच बदनाम!

दिसंबर 2023 में सरकार बदलने के बाद पोस्टिंग के मामले में आईएएस का 2005 बैच काफी चर्चाओं में रहा। मगर मुकेश बंसल को अगर सरकार ने प्रतिनियुक्ति के लिए हरी झंडी दे दी तो फिर सिचुएशन 180 डिग्री की दिशा में घूम जाएगा। सरकार को नया वित्त और जीएसटी सचिव की तलाश करनी होगी। वैसे भी जीएसटी में सचिव से अधिक कमिश्नर का रोल रहता है और वित्त में पूछपरख के अलावा चवन्नी नहीं मिलता। ऐसा कह सकते हैं...मुकेश जवानी के दिनों में पैसा कमाने की जगह अपने मित्र के लिए वित्त विभाग में हमाली कर रहे हैं। हालांकि, सुबोध सिंह के दिल्ली से आने के बाद अब यह नहीं कहा जा सकता कि पोस्टिंग में असंतुलन हैं। उन्होंने सबको कुछ-न-कुछ दिया है। शहला निगार जूनियर होने के बाद भी एपीसी जैसे पद संभाल रही, जो दीगर राज्यों में एसीएस या पीएस लेवल के अफसर के नीचे किसी को मिलता नहीं। बड़े विभागों की बात करें तो पीडब्लूडी कमलप्रीत सिंह देख रहे तो उर्जा रोहित यादव के पास है। हालांकि, रोहित इस समय ओवरलोडेड हैं। बिजली कंपनियों के चेयरमैन के साथ उनके पास उर्जा, जनसंपर्क और टूरिज्म भी है। रीना बाबा कंगाले फूड जैसे अहम विभाग संभाल रही हैं। अंकित आनंद पौल्यूशन बोर्ड के चेयरमैन के साथ सिकेट्री आवास पर्यावरण और एमडी स्टेट कैपिटल रीजन हैं। कहने का मतलब यह कि मुकेश अगर दिल्ली गए तो 2005 बैच में रजत के पास उद्योग, शंगीता आर के पास आबकारी और एस प्रकाश के पास ट्रांसपोर्ट बच जाएगा। इनमें उद्योग ही एक काम का विभाग है। बाकी ट्रांसपोर्ट और आबकारी में कोई डेवलपमेंट वर्क नहीं होता। सिवाय पेटी और खोखा का हिसाब कर इधर-उधर पहुंचवाने के।

मंत्रालय में बड़ी उठापटक

विधानसभा का बजट सत्र समाप्त हो गया है। इस बार सुशासन तिहार नहीं होगा। ऐसे में अगले हफ्ते प्रशासनिक हलको में बड़ी उठापटक होने के संकेत मिल रहे हैं। मंत्रालय में कई विभागों के सिकेट्री बदलेंगे। स्पेशल सिकेट्री टू सीएम डॉ0 रवि मित्तल के दिल्ली जाने के बाद एक या दो आईएएस अफसर को सीएम सचिवालय में पोस्ट किया जाएगा। जिन सचिवों के दो साल से अधिक हो गए हैं, उनके विभाग बदले जाएंगे। एसीएस मनोज पिंगुआ को गृह विभाग में साढ़े तीन साल हो गया है। सुनने में आ रहा कि वे अब डेपुटेशन पर दिल्ली न जाने पर सोच रहे हैं। अगर वे नहीं गए तो गृह विभाग में भी बदलाव होगा। सरकार चेंज होने के बाद पहली लिस्ट में जिन्हें पोस्टिंग मिली थी, उनमें निहारिका बारिक, कमलप्रीत सिंह, सिद्धार्थ परदेशी, अब्दुल कैसर हक और शम्मी आबिदी शामिल हैं। कमलप्रीत के पास पीडब्लूडी, परदेशी के पास स्कूल शिक्षा, कैसर हक के पीएचई और शम्मी आबिदी महिला और बाल विकास है। हो यह भी सकता है, प्रमुख सचिव बन गए सोनमणि बोरा को फेरबदल में कोई और अहम विभाग दिया जाए। या फिर किसी विभाग का अतिरिक्त प्रभार। पीडब्लूडी में वीरेंद्र सहवाग टाईप किसी फास्ट बैट्समैन को उतारा जा सकता है।

कलेक्टर, एसपी, डीएफओ भी

सरकार का ढाई साल यानी इंटरवल है। अभी जो अफसर पोस्ट होंगे, वे अगले विधानसभा चुनाव तक कार्य करेंगे। इसलिए सरकार इस बार ठोक बजाकर रिजल्ट देने वाले अफसरों को मैदान में उतारेगी। सबसे पहले जनसंपर्क आयुक्त बनाने की चुनौती है। चुनौती इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया के दौर में सरकार की छबि बनाना कठिन टास्क है और फिर अभी जो सीपीआर बनेगा, जाहिर तौर पर वही अगले विधानसभा चुनाव तक रहेगा। इसके लिए आरआर में अवनीश शरण, रजत बंसल,  प्रभात मलिक का नाम चर्चा में हैं। प्रमोटी में जीतेंद्र शुक्ला और संजय अग्रवाल के नाम पर भी विचार किया जा सकता है। इसके साथ कई जिलों के कलेक्टर, एसपी, डीएफओ और जिला पंचायत सीईओ भी चेंज होंगे।

भर्ती बोर्ड में सीनियर आईएएस

कर्मचारी चयन मंडल बनने के बाद व्यापम का अस्तित्व अब समाप्त हो जाएगा। भर्ती बोर्ड के एक्ट के अनुसार व्यापम मंडल में मर्ज हो जाएगा और जो भर्तिया व्यापम में प्रक्रियागत थी, उसे अब कर्मचारी चयन मंडल करेगा। इसमें भी शीघ्र ही नियुक्तियां होंगी। मंडल का चेयरमैन प्रमुख सचिव या उसके उपर का होगा। वो वर्तमान भी हो सकता है या रिटायर्ड भी। इसके अलावे तीन मेंबर होंगे। इसमें ज्वाइंट सिकरेट्री स्केल वाले लोग नियुक्त होंगे। इसमें रिटायर अफसर से लेकर प्रोफेसर या अन्य सर्विसों से रिटायर लोग भी मेंबर बन सकते हैं।

चार बड़े बिल

विधानसभा का बजट सत्र नए कानून बनाने के मामले में बड़ा महत्वपूर्ण रहा। वैसे तो इस बार कई विधेयक पेश्ज्ञ किए गए मगर चार विधेयक छत्तीसगढ़ के लिए मिल का पत्थर साबित होंगे। पहला मुख्यमंत्री के विभाग जीएडी का कर्मचारी चयन बोर्ड और नकल प्रकरण विधेयक। व्यापम को भंग कर कर्मचारी चयन मंडल बनाना सरकार का बड़ा फैसला है। अभी लोग इसे समझ नहीं पा रहे मगर नौकरी में फास्ट भर्तियों के लिए इसे याद किया जाएगा। इसका ड्राफ्ट खुद पीएस टू सीएम सुबोध सिंह ने तैयार किया है। फार्म भरने से लेकर परीक्षा और रिजल्ट के लिए अब युवाओं को भागीरथी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। सब कुछ बेहद फास्ट होगा। वहीं व्यापम से लेकर पीएससी तक घालमेल को लेकर शुरू से बदनाम रहा है। इसी व्यापम में पीएमटी का पर्चा लीक होने की वजह से दो बार परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी। नकल विधेयक कानून के बाद अब परीक्षाओं में गड़बड़ियों पर अंकुश लगेगा। तीसरा विधेयक रहा मंत्री ओपी चौधरी के हाउसिंग बोर्ड को पीडब्लूडी और आरईएस के समकक्ष बनाने का। सरकार ने अब पीडब्लूडी की लेटलतीफी को देखते हाउसिंग बोर्ड को विकल्प के तौर पर पेश कर दिया है। इस विधयेक को लेकर ओपी इतना गंभीर थे कि विधानसभा में पारित होने के 24 घंटे के भीतर नोटिफिकेशन जारी हो गया। और चौथा गृह मंत्री विजय शर्मा का धर्मान्तरण विधेयक। धर्मांतरण को लेकर अब कड़े कानून बनाए गए हैं। निश्चित तौर पर इस बिल के पास होने से धर्मांतरण पर कंट्रोल होगा।

बीजेपी का अनुशासन

भारतीय जनता पार्टी अनुशासन के नाम से जानी जाती है मगर छत्तीसगढ़ में उल्टा हो रहा है। विधानसभा में मंत्रियों को बार-बार आगाह किए जाने के बाद सदन में जाकर हथियार डालने का सिलसिला थमा नहीं। रमन सिंह के दौर में 15 बरस मंत्री रहे मंत्री अगर जवाब देने के लिए पन्ना पलटते रह जाएं तो फिर बीजेपी को सोचने पर मजबूर करेगा। उपर से पार्टी का विधायकों पर भी कंट्रोल नहीं रह गया है। सदन में परफर्मेंस को लेकर विधायकों की बैठक बुलाई गई, उसमें पता चला है, छह-सात विधायक गायब रहे। हो सकता है, दो-एक को कोई अपरिहार्य काम आ गया हो मगर छह-छह, सात-सात एमएलए नदारत हो जाए तो ये पार्टी के अनुशासन पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है।

एसपी हो तो ऐसा

छत्तीसगढ़ के सारे पुलिस अधीक्षक भ्रष्ट और रीढ़विहीन नहीं हैं। एक जिले के कप्तान की पोलिसिंग इतनी तगड़ी है कि खुद पुलिस वाले परेशान हैं। नेताओं को उनसे उल्टे सीधे काम की सिफारिश करने में घबराहट होती हैं। उनका एक वाकया आजकल बड़ी चर्चा में है। रुलिंग पार्टी के एक विधायक जी एसपी से उनके ऑफिस में मिलने गए। उन्होंने जिला बदर वाले क्रिमिनल की वकालत करते हुए कहा, चुनाव में वह 600 से 700 वोट दिलवाता है...उसके यहां पारिवारिक फंक्शन है...वो आएगा तो जरा देख लीजिएगा। एसपी ने उन्हें दो टूक कह दिया...वो यहां आया तो एनकाउंटर हो जाएगा। विधायक जी अब अपनी पीड़ा लोगों को बता रहे हैं। हालांकि, वो यह नहीं समझते कि शातिर क्रिमिनल को पनाह देकर 600 वोट की जगह अपना हजारों वोट खराब कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के वोटर ऐसे जनप्रतिनिधियों को कभी पसंद नहीं करते जो अपराधियों को संरक्षण देते हैं।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. वित्त मंत्री ओपी चौधरी के साथ काम करने के लिए अफसर तत्पर क्यों रहते हैं?

2. कर्मचारी भर्ती बोर्ड का प्रथम चेयरमैन किस आईएएस को बनाया जाएगा?

Chhattisgarh Tarkash 2026: शराब, अफीम और जिस्म का कारोबार

 


तरकश, 15 मार्च 2026

संजय के. दीक्षित

शराब, अफीम और जिस्म का कारोबार

हालांकि, दुर्ग के फार्म हाउस में अफीम कांड के बाद सरकार के निर्देश पर कलेक्टरों ने अपने जिलों के फार्म हाउसों की जांच-पड़ताल शुरू करा दी है। मगर यह भी सही है कि सूबे के फार्म हाउस तमाम धतकरमों के अड्डे बन गए हैं। छत्तीसगढ़ में करीब एक हजार से अधिक फार्म हाउस होंगे। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि अधिकांश फार्म हाउस कृषि के नाम पर सरकार को लगान दे रहे और शराब, ड्रग और जिस्म के धंधे से लाखों, करोड़ों रुपए पीट रहे हैं। नियमानुसार फार्म हाउस के कुल रकबा के 10 परसेंट से अधिक निर्माण नहीं किया जा सकता। मगर शहर से लगे अधिकांश फार्म हाउसों में बड़ी संख्या में कमरे, हॉल, लॉन, स्वीमिंग पुल बना डाले हैं। शादियों की सीजन में शादी बाकी समय जमकर ऐय्याशी होती है। इन अड्डों पर जाने की न पुलिस हिमाकत कर पाती और न कोई सरकारी मुलाजिम। या तो उनका महीना बांध दिया जाता है या फिर किसी पॉलिटिशियन के नाम पर चमका दिया जाता है। जाहिर है, किसी नेता का नाम आ गया तो फिर छत्तीसगढ़ पुलिस की इतनी हिम्मत कहां? बहरहाल, सरकार का इससे राजस्व का बड़ा नुकसान हो रहा। कृषि जमीन के नाम पर लगान दे रहे कौड़ियों में और कमा रहे करोड़ों में।

अफसरों की हालत खराब

दुर्ग और बलरामपुर में अफीम की खेती पकड़े जाने के बाद छत्तीसगढ़ के आईएएस, आईपीएस के हालत खराब हुए जा रहे हैं। खासकर, रायपुर, दुर्ग, बेमेतरा, धमतरी, बिलासपुर, जांजगीर तक आईएएस अधिकारियों के फार्म हाउस हैं। एक कथित तौर पर साफ-सुथरी छबि वाले आईएएस अधिकारी जांजगीर कलेक्टर रहते शिवरीनारायण के पास 40 एकड़ जमीन खरीद डाली। उसे किसी किसान को अधिया में दिया है। अब वो किसान उसमें क्या उपजा रहा...अफसर को चिंता होगी ही। ऐसे न जाने कितने फार्म हाउस नौकरशाहों के हैं। अफीम कांड के बाद अफसर खुद ही जाकर अब अपने फार्म हाउस का मुआयना कर रहे हैं।

धान 20 रुपए, अफीम 50 हजार रुपए किलो?

अफीम का रेट जानकार आप चौंक जाएंगे। पहले ये आपको बता दें कि अफीम के तीन पार्ट होते हैं और तीनों बेशकीमती। अफीम के फल के छिलके से डोडा बनता है, वह 20 हजार रुपए किलो बिकता है। आमतौर पर ट्रक ड्राईवर इसे खाते हैं, इसमें ऐसा नशा होता है, जिसमें खुमारी तो होती है मगर नींद नहीं आती। दूसरा, अफीम के फल को सूखाकर खसखस बनाया जाता है, इसका रेट करीब 2000 रुपए किलो होता है। तीसरा, अफीम के फल में चीरा लगाकर उसका बूंद-बूंद टपकते दूध को एकत्र किया जाता है। इसे सूखाकर अफीम बनाया जाता है। इसकी कीमत करीब 50 हजार रुपए किलो है। और इस अफीम को प्यूरीफाई कर हेरोईन बनता है, जो बाजार में दो करोड़ रुपए किलो बिकता है। बहरहाल, आप अब समझ गए होंगे कि छत्तीसगढ़ को उड़ता पंजाब बनाने की कोशिश क्यों की जा रही है।

बीजेपी नेता पर पहली कार्रवाई

अफीम कांड में सरकार ने पहली बार कड़ा स्टैंड लिया। मुख्यमंत्री और गृह मंत्री दोनों ने दुर्ग पुलिस को फ्री हैंड दिया और बीजेपी नेता को सींखचों के पीछ्रे पहुंचा दिया गया। हालांकि, पुलिस पर प्रेशर कम नहीं था। संगठन से लेकर संघ से पुलिस के पास दनादन फोन आ रहे थे। मगर पुलिस एक न सुनी। अफीम के मसले पर विपक्ष भले ही सरकार को आड़े हाथ ले रहा, मगर बीजेपी नेता की गिरफ्तारी से सरकार ने कैडर को एक बड़ा संदेश दिया है। भाजपा की सेहत के लिए यह इसलिए भी जरूरी था कि कांग्रेस के पांच साल के शासन के बाद देखादेखी बीजेपी का कैडर भी निरंकुश हो गया है। सरकार बनने के बाद प्रदेश में ऐसे अनेक मामले आए, जिसमें बीजेपी के नेताओं ने कार्रवाई नहीं होने दी। हमारी सरकार...बोल पुलिस के हाथ कस दिए जाते हैं। कुछ विधायकों को भी आईना दिखाने की जरूरत है। उनके आचरण इतना बिगड़ गया है कि बीजेपी जैसी संस्कारित पार्टी से मेल नहीं खाता। भूमाफिया की तरह जमीन कब्जाने और गुंडे पालने जैसे काम भी हो रहे हैं। चलिये सरकार ने दमदारी दिखाई है, इससे निश्चित तौर पर बेलगाम कार्यकर्ताओं को विधायकों पर असर पड़ेगा।

कलेक्टरों की आंखों पर पट्टी?

दुर्ग और बलरामपुर जिले में अफीम की खेती का भंडाफोड़ हुआ है, वह राजस्व सिस्टम का फेल्योरनेस है। इन जिलों के पटवारी अगर गिरदावरी रिपोर्ट से पहले अगर मौके पर पहुंच का खेतों का जायजा लिया होता तो सरकार को बगले झांकना नहीं पड़ता। दरअसल, पटवारियों की ये समस्या सिर्फ दुर्ग और बलरामपुर का नहीं, अमूमन सभी जिलों का कमोवेश यही हाल है। पटवारी खुद से वेतन देकर दो-दो, तीन-तीन एजेंट रख लेते हैं और एजेंट जो बोलते हैं, पटवारी सील-ठप्पा लगाकर उसे कलेक्टर को सौंप देते हैं। कायदे से कलेक्टरों को पटवारियों को टाईट करना चाहिए क्योंकि पटवारियों के नियोक्ता कलेक्टर होते हैं। मगर कलेक्टर आंखों पर पट्टी बांध लेंगे तो फिर वही होगा, जो इस समय हो रहा है। चीफ सिकरेट्री और पीएस टू सीएम ने वर्किंग कल्चर के लिए बायोमेट्रिक अटेंडेंस और ई-ऑफिस चालू कर दिया मगर पटवारी राज के खात्मे के लिए भी कोई आईडिया निकालना चाहिए।

कलेक्टरेट और बीजेपी का गड्ढा

अविभाजित जांजगीर जिला यानी जांजगीर और सक्ती छत्तीसगढ़ बीजेपी का सबसे बड़ा गड्ढा है। वहां पार्टी को एक अदद सीट नसीब नहीं हुई। इन जिलों के रेवेन्यू अफसर पार्टी की और खटिया खड़ी करने में लगे हैं। सक्ती में आदिवासियों की जमीन भूमाफियाओं को दो-दो मामला होने के बाद भी बड़े प्रशासनिक अफसरों पर कार्रवाई नहीं होने पर उससे जांजगीर जिले के अफसरों का भी हौसला बढ़ गया। नैला स्टेशन की साइडिंग के ठीक सामने एक कोयला कारोबारी को एसडीएम ने कोटवारी जमीन का डायवर्सन कर दिया। पटवारी ने अपने रिपोर्ट में ये भी नहीं बताया कि कोयला कारोबारी की जमीन तक पहुंचने के लिए कोई रास्ता नहीं है। मौके के पास ढाई एकड़ का तालाब है और पास में बस्ती भी। मगर जांजगीर कलेक्ट्रेट के अफसरों के लिए सबसे बड़ा रुपैया है। आसपास के लोगों और सरपंचों की शिकायत और नाराजगी को अनसूनी करते हुए कोल कारोबारी को कोटवारी भूमि का नामंतरण कर दिया गया। दरअसल, खटराल अफसरों का हौसला इसलिए बढ़ रहा कि कार्रवाइयों के मामलों में सिस्टम ज्यादा संवेदनशील हो जाता है। जब मालूम है कि जांजगीर इलाका सत्ताधारी पार्टी के लिए मुफीद नहीं तो ऐसे में अफसरों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। मगर एप्रोच कोटे में गए जिला प्रशासन के अफसरों का क्या? मालूम है, कलेक्ट्रेट में आखिरी पोस्टिंग है, इसलिए सरकार और सत्ताधारी पार्टी की सेहत से उन्हें क्या वास्ता?

मंत्रिमंडल की सर्जरी

इस खबर में कितनी सत्यता है, ये तो वक्त बताएगा...बीजेपी के अंदरखाने में ये चर्चा बड़ी तेज है कि मई में मंत्रिमंडल की बड़ी सर्जरी हो सकती है। उसमें मुख्यमंत्री को छोड़ सभी 12 मंत्रियों के इस्तीफे ले लिए जाएंगे। फिर नए सिरे से मंत्रिमंडल का गठन किया जाएगा और विभागों का बंटवारा भी। जाहिर सी बात है, और बीजेपी के लोग भी स्वीकार करते हैं कि विष्णुदेव की इस टीम से तो 2028 में पार्टी की नैया पार नहीं लग पाएगी। खबरों की माने तो 12 में से चार-से-पांच मंत्रियों की छुट्टी होगी। इनमें से कुछ ऐसे मंत्री भी शामिल हैं, जो रमन सिंह की टीम में काम कर चुके हैं मगर इस समय मैदान में खेलने की बजाए पेवेलियन में बैठ सिर्फ ताली बजा रहे हैं। कई मंत्रियों के विभाग भी बदलेंगे तो कुछ का लोड भी हल्का किया जाएगा। मई में सर्जरी की चर्चा इसलिए हो रही कि तब तक सरकार का ढाई साल हो जाएगा। यानी इंटरवल। इसके बाद सिस्टम के पास काम करने के लिए सिर्फ डेढ़ साल बचेंगे। क्योंकि, चुनावी साल में कोई काम होता नहीं। 2028 में जनवरी से ही सरकारें इलेक्शन मोड में आ जाती हैं। अगर मई में मंत्रिपरिषद की रिसफल हो गया फिर तो कई मंत्रियों के लिए यह आखिरी विधानसभा का सत्र होगा। क्योंकि, मानसून सत्र अब जुलाई में आहूत होगा। रही बात किस मंत्री की विदाई होगी तो बीजेपी की राजनीति में कोई दावे के साथ कुछ कह नहीं सकता। आखिर भला कौन जानता था कि धमेंद्र प्रधान पछाड़ खा जाएंगे और नितिन नबीन का नाम राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए सामने आ जाएगा। और बात नितिन नबीन की आई तो छत्तीसगढ़ के बारे में उनसे भला क्या छिपा हुआ है। कैडर के साथ उनका कनेक्शन इतना जबर्दस्त है कि पार्षद और उसके नीचे लेवल के बीजेपी कार्यकर्ता भी उनसे सीधे जुड़े हुए हैं। कहने का आशय यह है कि कौन मंत्री किस लेवल पर गुल खिला रहा, नितिन नबीन के पास पूरा अपडेट है। इसलिए जो भी होगा चौंकाने वाला होगा।

होली में गुलजार

होली के अगले दिन किसी भी स्टेट में छुट्टी नहीं रहती। मगर छत्तीसगढ़ में दशकों से यह परंपरा चली आ रही थी कि ऑफिस का दरवाजा तो खुलता था, मगर कोई स्टाफ नहीं पहुंचत था। भृत्यों के नहीं आने पर कई ऑफिसों के ताले भी नहीं खुलते थे। मगर राज्य सरकार ने बायोमेट्रिक अटेंडेंस का ऐसा सिस्टम लगाया कि होली के दूसरो दिन ऑफिस गुलजार रहे। मंत्रालय छोड़ बाकी जगहों पर भले ही कोई खास कामकाज नहीं हुआ होगा मगर उपस्थिति बराबर रही। वर्किंग कल्चर की दिशा में सरकार की यह बड़ी सफलता रही।

सिकेट्री से मिलना कठिन नहीं

आम आदमी के लिए पहले मंत्रालय में बड़े अफसरों से मिलना बड़ा कठिन टास्क होता था। एक तो पूरे हफ्ते अफसर आते नहीं थे और आए भी दोपहर को और अपरान्ह होते ही जाने की तैयारी। जिसकी मीटिंग होती थी, वहीं टाईम पर आता और जाता था। वरना, तो राम-राम। मगर जब से बायोमेट्रिक अटेंडेंस हुआ है, मंत्रालय में साढ़े 10 बजे तक 90 परसेंट अफसर पहुंच जाते हैं। फिर साढ़े पांच बजे से पहले हिलना नहीं है। उपर से अब पुराने विधानसभा का बहाना भी नहीं। बगल में विधानसभा है। नहीं तो विधानसभा सत्रों के दौरान तो अफसरों के मौज होते थे। मगर अब आदमी दिन भर बैठेगा तो कुछ-न-कुछ काम करबे करेगा। अब तो कई अधिकारियों ने अपने पीए को कह दिया है, जिसको भी मिलना हो, भेजते जाओ। अभी की स्थिति यह है कि दो-तीन परसेंट अति अभिमानी अफसरों को छोड़ दें तो लगभग सभी काम में लग गए हैं, लोगों से मिलजुल भी रहे हैं।

पीए, स्टेनो बेरोजगार

एक वो भी जमाना था, जब बड़े अफसरों के पीए, स्टेनो बनने के लिए कर्मचारी लालायित रहते थे। मगर सरकार ने ई-ऑफिस शुरू कर पीए और स्टेनों के पेट पर बड़ी चोट कर डाली। पहले जितने कद्दावर अफसर होते थे, उनके पीए का उतना ही जलवा होता था। फाइलों की जानकारी देना या उसे आगे बढ़ाना...किस फाइल को दबाना है और किस फाइल को वंदे भारत एक्सप्रेस की तरह दौड़ाना, सबकी कीमत तय थी। मगर ई-ऑफिस ने ऐसा बेड़ा गर्क किया कि अब प्रति फाइल के पीछे नजराना मिलना तो छोड़िये होली-दिवाली में गिफ्ट मिलना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि, फाइलें अब सीधे अफसरों के पास पहुंच जा रही। वर्तमान सिस्टम में सिर्फ जो बाबू नोटशीट बढ़ाता है, उसे सिर्फ इतना पता रहता है कि फलां फाइल किस अफसर के पास है, मगर उसमें नोटिंग क्या है, इस बारे में वह कुछ नहीं बता सकता। कुल मिलाकर कहा जाए तो पीए और स्टेनो का काम अब साहब के लिए मीटिंग का फोल्डर बनाना, चाय-नाश्ते का इंतजाम करना और पब्लिक से मिलवाना बच गया है।

नौकरशाहों में खलबली

बीजेपी लीगल सेल के अ-संतुष्ट नेता ने चीफ सेकेट्री विकास शील से 27 पन्नों की ऐसी गंभीर शिकायत की है कि नौकरशाही हिल गई है। कंप्लेन में दो पूर्व मुख्य सचिव समेत कई अफसरों के नाम हैं। असल में, ब्यूरोक्रेसी भी अपनी अड़ी में रहती है, वरना PSC में मेंबर के दो पद खाली हैं, तीसरा खाली होने वाला है। नीति आयोग में भी मेम्बर की एक वैकेंसी है। सरकार को बोल-बालकर नेताजी को एडजस्ट कराना चाहिए। वरना, दिक्कतें बढ़ती जाएंगी।

आईएएस को अभयदान!

पटवारी से आरआई प्रमोशन स्कैम में एसीबी ने कई लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। मगर चालान में इस घोटाले का मास्टरमाइंड तक एसीबी पहुंचने की कोशिश नहीं की। हालांकि, एक एसीबी ने एक आईएएस से पूछताछ के लिए जीएडी से अनुमति मांगी थी। अनुमति मिली कि नहीं, इस पर कोई मुंह खोलने तैयार नहीं। हालांकि, 1300 पेज के चालान में एसीबी ने इस बात का जिक्र अवश्य किया है कि अतिविशिष्ट लोगों के यहां पर्चा सेट हुआ और उत्तरपुस्तिकाएं तैयार की गई। मगर मिलियन डॉलर का सवाल यह है कि एसीबी के हाथ आईएएस तक क्यों नहीं पहुंच पाए।

अजब संयोग

रिटायर आईएएस गणेश शंकर मिश्रा को राज्य सरकार ने नीति आयोग का उपाध्यक्ष अपाइंट किया है। नौकरी से रिटायरमेंट के बाद गणेश शंकर ने जब बीजेपी ज्वाईन किया था, तब विष्णुदेव साय पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे। इस नाते उन्होंने ही गणेश शंकर को पार्टी में प्रवेश कराया था। अब जब पार्टी में प्रवेश कराने वाले ही राज्य सरकार के मुखिया बन गए तो फिर इतना तो बनता ही था कि गणेश शंकर को सम्मानजनक कुर्सी मिल जाए। विष्णुदेव साय ने गणेश शंकर को उस आयोग का उपाध्यक्ष बनाया, जिसके वे खुद अध्यक्ष हैं। यही नहीं, उनकी ताजपोशी के समय खुद मौजूद रहे। चलिये, ये सब वक्त और संयोग की बात है। गणेश शंकर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह के काफी नजदीक रहे। मगर रिटायरमेंट के बाद 2017 में उन्हें अल्पज्ञात सहकारिता निर्वाचन का कमिश्नर बनाया गया था। मगर अब जो कुर्सी मिली है, वह चीफ सिकरेट्री के समकक्ष है। उनसे पहले जितने भी लोग नीति आयोग के उपाध्यक्ष बने हैं, वे या तो चीफ सिकरेट्री रहे हैं या फिर एक्स चीफ सिकरेट्री। हालांकि, गणेश शंकर की नियुक्ति के बाद जिन लोगों ने विष्णुदेव साय के हाथों उनके पार्टी अध्यक्ष रहते बीजेपी ज्वाईन किया होगा, उनकी उम्मीदें बढ़ गई होंगी।

अच्छी खबर

छत्तीसगढ़ के लिए अच्छी खबर है, राज्य बनने के 25 साल बाद रायपुर मेडिकल कॉलेज में DM की पढ़ाई होगी। NMC ने अम्बेडकर हॉस्पिटल के एडवांस कार्डियक इंस्टिट्यूट को 2 सीट की हरी झंडी दे दी है। मध्यप्रदेश के भोपाल और इंदौर मेडिकल कॉलेज में DM की पढ़ाई होती है। मगर छत्तीसगढ़ में चना-मुर्रा की तरह कॉलेज खुलते गए मगर क़्वालिटी एजुकेशन न होने से NMC ने DM कोर्स की मंजूरी नहीं दी। ACI के हेड डॉ. स्मित श्रीवास्तव को इसका क्रेडिट जाना चाहिए, वे दो साल से लगातार इसके लिए प्रयासरत थे। ACI को स्थापित करने में उन्हीं का एफर्ट रहा है।

आखिरी बात हौले से

1835 में जन्मे अमेरिका के महान लेखक और हास्य कलाकार सैम्यूअल लैंघोर्न क्लेमेन्स उर्फ मार्क ट्वेन 150 साल पहले कहा था...राजनीति मात्र ऐसा पेशा है, जहां चोरी कर सकते हैं, झूठ बोल सकते हैं, घोखा दे सकते हैं, फिर भी सम्मानित हो सकते हैं।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव और पाठ्य पुस्तक निगम के अध्यक्ष राजा पांडेय के बीच कितने दिनों से बात नहीं हुई है?

2. छत्तीसगढ़ में किन-किन मंत्रियों की मंत्रिमंडल से विदाई हो सकती है?