तरकश, 24 मई 2026
संजय के. दीक्षित
सिंगल पावर सेंटर!
अगले महीने दिल्ली में छत्तीसगढ़ समेत उन पांच राज्य सरकारों की समीक्षा शुरू होनी है, जहां नवंबर 2023 में विधानसभा चुनाव हुए थे। रिव्यू के बाद ही मंत्रिमंडल में सर्जरी का खाका तैयार किया जाएगा। वैसे खबर ये आ रही कि पार्टी नेतृत्व अब राज्यों में दो डिप्टी सीएम का कंसेप्ट खतम करने पर विचार कर रहा है। शीर्ष नेताओं के संज्ञान में ये बात है कि जिन राज्यों में दो-दो डिप्टी सीएम हैं, वहां पावर सेंटर तीन हिस्सों में बंट गया है। और शायद यही वजह है कि असम और पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने डिप्टी सीएम नहीं बनाया। उससे पहले बिहार में इसलिए दो उप मुख्यमंत्री बनाए गए, क्योंकि वहां गठबंधन की सरकार है। वैसे सियासी पंडितों का मानना है, जिन राज्यों में डिप्टी सीएम हैं, वहां मुख्यमंत्री का औरा प्रभावित हुआ है। कुछ महीने पहले की बात है...यूपी में योगी आदित्यनाथ जैसे हाई प्रोफाइल मुख्यमंत्री होने के बाद भी वहां डिप्टी सीएम मौर्य ने सरकार के कामकाज पर सार्वजनिक तौर पर बयानबाजी शुरू कर दी थी। कुल मिलाकर राज्यों के मुख्यमंत्री भी चाहेंगे कि कोई डिप्टी सीएम न रहे। ताकि सिंगल पावर सेंटर रहे। अब देखना है, छत्तीसगढ़ के संदर्भ में बीजेपी क्या फैसला लेती है...डिप्टी सीएम का कंसेप्ट यहां भी लागू है।
हमाम में...हर-हर गंगे
छत्तीसगढ़ में एक महिला का मामला सामने आया है, उसके बाद नेताओं से लेकर नौकरशाहों तक की हालत खराब है। उधर फोटो देखकर लोग खूब आनंद प्राप्त कर रहे हैं...फेसबुक पर फोटो को जूम कर देखा जा रहा...कौन कितना करीब था। असल में, महिला को एनजीओ संचालिका से हाई प्रोफाइल बनाने में बड़े लोगों की बड़ी भूमिका रही। उसके एनजीओ को कॉरपोरेट से फंड दिलाने में कुछ आईएएस अधिकारियों ने लिमिट से बाहर जाकर मदद की। मांसल देह के भूखे नौकरशाहों और नेताओं ने ये भी देखने की कोशिश नहीं की...उसका बैकग्राउंड क्या है। अब बड़े लोगों को खौफ खाए जा रहा...अगर पर्दा उठ गया तो क्या होगा! जाहिर है, पिछले एक दशक में छत्तीसगढ़ में विषकन्याओं का प्रकोप तेजी से बढ़ा है। कोविड के बाद तो और ज्यादा। एनजीओ या बड़ी आईटी कंपनियों की रिप्रेजेंटेटिव की आड़ में ये विषकन्याएं अफसरों और नेताओं को अपने जाल में फंसा करोड़ों में खेल रही हैं। कलेक्टर, एसपी समेत कुछ अधिकारियों के बारे में इंटेलिजेंस एजेंसियों के पास पुख्ता सूचना है। कुछ कलेक्टरों ने तो गर्दा उड़ा दिया है। मध्यप्रदेश जैसे हनीट्रेप कांड छत्तीसगढ़ में हो जाए, इससे पहले सिस्टम को अलर्ट हो जाना चाहिए।
सीएम के पास होम?
उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा के बारे में चर्चाएं बड़ी गर्म हैं कि संगठन में उन्हें बड़ा ब्रेक मिलने वाला है। उनके करीबी नेता भी तस्दीक कर रहे कि नितिन नबीन की टीम में भाई साब का कुछ अच्छा हो सकता है। हालांकि, लोगों के बीच स्वाभाविक सवाल ये भी है कि डिप्टी सीएम का पद छोड़ विजय शर्मा दिल्ली क्यों जाएंगे? तो इसका जवाब इस रुप में दिया जा रहा कि छत्तीसगढ़ में रहकर वे मंत्री से उपर नहीं जा पाएंगे मगर दिल्ली से कभी भी वे बड़े पद पर आ सकते हैं। उनके पास उम्र भी काफी हैं। बहरहाल, विजय शर्मा अगर दिल्ली गए तो फिर गृह विभाग लगता है मुख्यमंत्री के पास आ जाएगा। दरअसल, देश के अधिकांश राज्यों में मुख्यमंत्रियों ने गृह विभाग को अपने पास रखा है। यूपी, बिहार में तो पहले से रहा, अब मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल भी इस सूची में शामिल हो गया है। सीएम के पास होम आने से होगा ये कि जीएडी और गृह दोनों मुख्यमंत्री के पास हो जाएंगे। वैसे पुलिस में राजपत्रित अधिकारी से लेकर ऑल इंडिया सर्विस याने आईपीएस के मैटर मुख्यमंत्री के अधीन होते हैं मगर उसमें गृह मंत्री का अनुमोदन अवश्य लगता है। गृह मंत्री की चीड़िया बिठाने के बाद ही नोटशीट मुख्यमंत्री के पास जाती है। यद्यपि, रमन सिंह और भूपेश बघेल के दौर में कई बार सरकार फैसला ले लेती थी, उसके बाद गृह मंत्री से अनुमोदन लिया जाता था। कई बार तो पोस्टिंग आदेश निकलने के बाद गृह मंत्रियों को अफसरों के ट्रांसफर का पता चलता था। लेकिन, विजय शर्मा काफी तेज-तर्रार गृह मंत्री हैं। हालांकि, तेज तो बीजेपी सरकार के फर्स्ट होम मिनिस्टर बृजमोहन अग्रवाल भी थे। मगर डेढ़ साल के भीतर उनकी गृह से विदाई हो गई थी। खैर, विजय शर्मा इतने मजबूत हो गए हैं कि कम-से-कम इस टर्म में उनका विभाग बदलना संभव नहीं। उनका विभाग उसी केस में चेंज होगा, अगर वे दिल्ली जाएं।
नए पीसीसीएफ
छत्तीसगढ़ में नए हेड ऑफ फॉरेस्ट की नियुक्ति का काउंट डाउन प्रारंभ हो गया है। श्रीनिवास राव 31 मई को वन विभाग के शीर्ष पद से रिटायर होंगे। उनकी जगह कौन लेगा, इसको लेकर लोगों में काफी जिज्ञासा है। विदित है पीसीसीएफ अरुण पाण्डेय हेड ऑफ फॉरेस्ट के प्रबल दावेदार हैं। अरुण के बाद ओपी यादव भी हैं। मगर श्रीनिवास राव के एक्सटेंशन की अटकलों को भी लोग हल्के में नहीं ले रहे। जाहिर है, श्रीनिवास राव की क्षमता और पहुंच पर प्रश्नचिन्ह खड़ा नहीं किया जा सकता। उधर, अरुण पाण्डेय भी कमजोर नहीं हैं। अरुण इस समय पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ के साथ-साथ बजट और पईसा-कौड़ी वाला विभाग डेवलपमेंट संभाल रहे हैं। देश के किसी भी राज्य में अब तक किसी पीसीसीएफ को इतना बड़ा पोर्टफोलियो नहीं मिला है। इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि सरकार में अरुण पाण्डेय का कैसा प्रभाव है। बहरहाल, 30 और 31 मई को सरकारी अवकाश है। लिहाजा, जो भी होना होगा 29 मई को दोपहर तक सरकार को ऐलान करना होगा। सरकार अगर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची तो हो सकता है वन विभाग में प्रभारी मुखिया की नियुक्ति हो जाए...जिसकी संभावना काफी क्षीण है।
दो और पुलिस कमिश्नर?
रायपुर के बाद बिलासपुर और दुर्ग में भी पुलिस कमिश्नरेट बनेगा। गृह मंत्री विजय शर्मा ने इसका ऐलान किया है। यद्यपि इस तरह के नीतिगत फैसले सरकार लेती है और घोषणा भी उसी स्तर पर होती हैं। मगर हो सकता है, गृह मंत्री जी की उपर में बात हो गई होगी। अलबत्ता, प्रश्न यह है कि क्या रायपुर कंप्लीट कमिश्नरेट बन पाया? गृह मंत्री के पुराने बंगले में कमिश्नर बैठ रहे। कमिश्नरेट को एक पैसे का फंड नहीं मिला। आसपास के जिलों से उधार में फोर्स आई है। बिलासपुर और दुर्ग में पुलिस कमिश्नरेट बन जाए, इससे अच्छी बात कुछ हो नहीं सकती...ये वक्त की जरूरत भी है। मगर इससे पहले सेटअप और इंफ्रास्ट्रक्चर जुटाने का प्रयास करना चाहिए। वरना, कहीं से ईंट, कहीं का रोड़ा वाला पुलिस कमिश्नरेट बनाने से वो रिजल्ट नहीं मिलेगा, जो दीगर राज्यों में दिखता है। सिस्टम को पहले तय करना होगा कि पुलिस और सुरक्षा उसकी प्राथमिकता में किस स्थान पर है।
चेयरमैन के फैसले, जी का जंजाल
राजस्व बोर्ड के चेयरमैन रहे राधाकृष्णन द्वारा अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर लिए गए फैसले बोर्ड को अब भारी पड़ रहा है। उनके करीब तीन दर्जन आदेशों को बिलासपुर हाई कोर्ट ने फिर से रिव्यू कि लिए रेवेन्यू बोर्ड को भेज दिया है। बता दें, आईएएस राधाकृष्णन ने चेयरमैन रहते निरंकुश होकर ऐसे आदेश पारित करने लगे थे कि जिलों के कलेक्टरों में हाहाकार मच गया था। सीएम रमन सिंह तक जब शिकायत पहुंची तो उन्होंने राधाकृष्णन को हटाकर वहां डीएस मिश्रा को बिठाया। राधाकृष्णन ने जमीनों और जमीनों की रजिस्ट्री के मामलों में बड़े औद्योगिक समूहों को उपकृत करते हुए सरकार को करोड़ों का नुकसान पहुंचाया।
क्योंकि, वे आईएएस थे
चर्चा चूकि पूर्व आईएएस राधाकृष्णन की तो फिर पुराना प्रसंग स्मरण हो आया। राधाकृष्णन जब माध्यमिक शिक्षा मंडल के चेयरमैन थे, तो उन्होंने बोर्ड के एकाउंट में रखे साढ़े आठ करोड़ रुपए अपने पर्सनल एकाउंट में ट्रांसफर करा लिया था। कायदे से किसी भी वित्तीय लेन देन पर चेयरमैन और सिकेट्री दोनों के हस्ताक्षर होने चाहिए। मगर उस समय के सिकेट्री आईएफएस अनिल राय अवकाश पर थे, उस दौरान राधाकृष्णन ने बैंक मैनेजर पर दबाव डाल बच्चों की फीस का पैसा डकार गए। बाद में इसकी जांच भी हुई। बाद में आए चेयरमैन केडीपी राव ने कार्रवाई करने जीएडी को लेटर लिखा। इस पर विभागीय जांच हुई। मगर जांच के बाद फाइल दबा दी गई। क्यों? इसलिए कि वे आईएएस अफसर थे। करीब 15 साल पहले का ये वाकया है। उस समय का साढ़े आठ करोड़ आज 25 करोड़ के बराबर हो गया होगा। फिर ब्याज की बात करें तो रकम और भी ज्यादा। मगर वाह रे सिस्टम...किसी ऑफिस का के कर्मचारी से अगर घोखे में कोई फायनेंसियल चूक हो जाए तो ब्याज समेत उसकी रिकवरी निकाल दी जाती है, पेंशन रुक जाती है। मगर राधाकृष्णन सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए की डकैती कर चले गए...और पेंशन वगैरह सब ले रहे हैं...कोई कार्रवाई नहीं हुई। क्योंकि, वे आईएएस अफसर थे। और कार्रवाई करने वाले भी आईएएस। फिर भाई के खिलाफ भाई एक्शन कैसे लेगा। इसलिए पी. जॉय उम्मेन, सुनिल कुमार, विवेक ढांड, अजय सिंह, आरपी मंडल और अमिताभ जैन जैसे मुख्य सचिवों ने आंखें बंद कर ली।
एसपी ट्रांसफर जून में?
पुलिस अधीक्षकों के ट्रांसफर अब शायद 10 जून के बाद ही होंगे। वो इसलिए कि मई और जून का प्रथम सप्ताह नक्सल दृष्टि से काफी संवेदनशील माना जाता है। बस्तर से भले ही नक्सलियों का खात्मा हो गया मगर फोर्स अभी भी चौकस है। सतर्क इसलिए कि सरकार के दावे पर सवाल खड़े करने कभी भी कोई घटना को अंजाम दिया जा सकता है। इसलिए, जून फर्स्ट वीक के बाद ही एसपी के तबादले होंगे। अब प्रश्न उठेगा एसपी के तबादले से बस्तर से क्या संबंध? असल में, बस्तर के कई एसपी लंबे समय से वहां पोस्टेड हैं। उनमें से अधिकांश को मैदानी एरिया में लाकर उन्हें अच्छे जिले का इनाम दिया जाएगा। सिर्फ एसपी ही नहीं, एसडीओपी, सीएसपी और एडिशनल एसपी भी लंबे समय से वहां पोस्टिंग काट रहे हैं। सरकार उन्हें भी अब वहां से शिफ्ट करेगी। लिहाजा, पुलिस में बड़े स्तर पर तबादले अगले महीने होंगे।
तीन झंडी, चार नेता और...
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस हफ्ते छत्तीसगढ़ दौरे में डॉयल 112 की 400 गाड़ियों को हरी झंडी दिखा जिलों में रवाना किया। 400 गाड़ियां...याने बड़ा इवेंट। गृह या पुलिस विभाग की चूक कि झंडी दिखाने वाले नेता थे चार, मगर झंडी थी तीन। अमित शाह के सामने जब ट्रे में झंडी आई तो उन्होंने एक उठा लिया। सीएम विष्णुदेव साय ने एक झंडी उठाकर अमित शाह के पीछे खड़े गृह मंत्री विजय शर्मा को दे दिया। अब झंडी बची एक और नेता दो। सीएम और विधानसभा अध्यक्ष डॉ0 रमन सिंह। इस सिचएशन से सीएम थोड़ा ठिठके...तब तक अमित शाह विजय शर्मा की तरफ पीछे मुड़े और झंडी रमन सिंह को देने इशारा किया। विजय ने आज्ञाकारी शिष्य की तरह तुरंत झंडी रमन सिंह के हाथ में सौंप दी। पांच से सात सेकेंड के इस पूरे एपिसोड में अमित शाह का गजब का शार्पनेस दिखा। पलक झपकते ही माजरा समझ उन्होंने सिचुएशन को हैंडिल कर लिया। इस पांच सेकेंड के दृश्य में सबसे टचिंग था...अमित शाह द्वारा रमन सिंह को दिया गया सम्मान।
सीएम बनने की शुभकामनाएं
पीसीसी अध्यक्ष पद को लेकर छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेताओं में खींचतान कम होने का नाम नहीं ले रही है। हाल की बात है, टीएस सिंहदेव ने अध्यक्ष बनने की इच्छा प्रगट की तो पीसीसी चीफ दीपक बैज का गुबार सामने आ गया। दीपक बोले, बाबा बड़े नेता हैं, तमिलनाडु, त्रिपुरा के प्रभारी रह चुके हैं, इतने बड़े नेता को केंद्र की राजनीति में जाना चाहिए। इसके बाद ठहाके लगाते हुए बाबा का मोबाइल पर किसी से बातचीत करते एक वीडियो वायरल हुआ, उसमें वे कहते सुनाई दे रहे...हमने तो दीपक भाई को खूब आगे बढ़ने, मुख्यमंत्री बनने की शुभकामनाएं दे दी है। अब दीपक बैज को सीएम बनने की शुभकामनाएं भूपेश बघेल को कैसी लगी होगी, ये नहीं पता। मगर ये सही है कि कांग्रेस के सियासत में नए समीकरण बन रहे हैं...शतरंज के बिसात पर नए दांव चले जा रहे हैं। पीसीसी चीफ दीपक बैज और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आज जिला युवक कांग्रेस अध्यक्षों का इंटरव्यू लेने वाले हैं तो चरणदास महंत और टीएस सिंहदेव इससे अलग कोरबा में मछुआरा सम्मेलन मेें शिरकत करेंगे। उधर, अध्यक्ष पद के युवा दावेदार उमेश पटेल और देवेंद्र यादव के खिलाफ पार्टी नेतृत्व को चिठ्ठी-पत्तरी भेजने का काम भी प्रारंभ हो गया है। क्योंकि, देवेंद्र ने सूबे में दौरे तेज कर दिए हैं। जाहिर है, आने वाले समय में कांग्रेस की गुटीय लड़ाई और तेज होगी। वो इसलिए कि इन सभी नेताओं की दिल्ली में गहरी पैठ है और ये सभी चाहेंगे कि सामने वाले को मौका न मिले।
अंत में दो सवाल आपसे?
1. क्या ये सही है कि मुख्यमंत्री को छोड़ सारे मंत्रियों का पहले इस्तीफा लिया जाएगा, उसके बाद मंत्रिमंडल का पुनर्गठन होगा?
2. किस आईएएस अधिकारी के खिलाफ मुख्य सचिव ने 15 करोड़ रुपए के घोटाले में जांच का आदेश दिया है?
