शनिवार, 24 सितंबर 2022

20-20 का समय

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 25 सितंबर 2022

2018 में 6 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव का ऐलान हुआ था। इस बार भी लगभग यही टाईम रहेगा। याने विस चुनाव में अब मुश्किल से एक साल का वक्त बच गया है। इसी में नवरात्रि, दशहरा, नया साल, होली और अगला बरसात भी है। सही मायनों में कहा जाए तो जमीन पर काम दिखाने के लिए नौ महीने का समय बचा है। मतलब ट्वेंटी-20 मैच जैसी स्थिति। अब अधिकारियों को अंशुमन गायकवाड़ और रवि शास्त्री जैसे पिच पर ठुक-ठुककर खेलने का नहीं, श्रीकांत और सहवाग जैसे ठोकने का समय है। वैसे भी चार साल का समय गुजर गया है। अब कौन किससे जुड़ा है यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है कि हर बॉल को बाउंड्री तक पहुंचाने वाले बैट्समैन हो। सरकार में भी इसी पर विचार किया जा रहा। हो सकता है, जल्द ही फील्ड में और तेज गति से रिजल्ट देने वाले अधिकारियों को उतारा जाए।

एसपी का ट्रासंफर

छत्तीसगढ़ में आईजी के ट्रांसफर की चर्चा हो रही थी। मगर अब खबर है सरकार एसपी लेवल पर भी एक लिस्ट निकाल सकती है। इसमें दो-तीन बड़े जिले भी प्रभावित हो सकते हैं। दरअसल, सरकार के पास कुछ पुलिस अधीक्षकों के बारे में फीडबैक सही नहीं हैं। बताते हैं, उन कप्तानों से जिला संभल नहीं रहा...कानून-व्यवस्था की स्थिति लड़खड़ा रही है। सो, जिन जिलों में एसपी के परफारमेंस सही नहीं है, उन्हें बदलने पर विचार किया जा रहा है। छोटे जिलों में कुछ एसपी अच्छे रिजल्ट दे रहे हैं, उन्हें बड़े जिलों में शिफ्थ किया जा सकता है।

सड़क, बिजली और...

किसी भी सरकार के रिपीट होने के लिए तीन काम महत्वपूर्ण होते हैं। सड़क, बिजली और लॉ एंड आर्डर। ये काम लोगों को दिखते भी हैं और पब्लिक को प्रभावित भी करते हैं। याद होगा, मध्यप्रदेश में सिर्फ और सिर्फ खराब सड़क और बिजली की आंखमिचौली के कारण दिग्विजय सिंह चुनाव हार गए थे। वरना, इन दो चीजों को छोड़ दें तो दिग्गी राजा का 10 साल का टेन्योर उतना खराब नहीं था। इसके बाद कानून-व्यवस्था का नंबर आता है। कानून-व्यवस्था के नाम पर चुनाव जीतने का ताजा उदाहरण है उत्तर प्रदेश। पोलिसिंग को टाईट करके यूपी में योगी आदित्य नाथ दूसरी बार सरकार बनाने में कामयाब हुए। अब छत्तीसगढ़ की बात करें। छत्तीसगढ़़ में बिजली की स्थिति बाकी राज्यों जैसी नहीं है। सड़कों को लेकर सरकार ने अधिकारियों को टाईट करना शुरू किया है। ईएनसी की छुट्टी के बाद सीएम के करीबी अफसर अब खुद पीडब्लूडी के कामकाज को वॉच कर रहे हैं। कानून-व्यवस्था को लेकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने डीजीपी को कई निर्देश जारी किए हैं। डीजीपी अशोक जुनेजा भी हेलिकाप्टर लेकर सूबे के दौरे पर निकल गए हैं। दो दिन पहले उनका चौपर सरगुजा में उतरा। फिर भी लॉ एंड आर्डर को सरकार को और संजीदगी से लेना होगा। इसके लिए एसपी को दो टूक फरमान जारी करना होगा, चार साल बहुत हुआ, मगर अब खैर नहीं!

पोलिसिंग मजबूरी नहीं

यह विमर्श का विषय हो सकता है कि राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ में पोलिसिंग टाइप्ड होते गई। जितना धक्का दो, उतनी ही चलेगी। सरकार बोलेगी हुक्का बार पर अंकुश लगाओ तो चार दिन पुलिस इसी एक सूत्रीय अभियान में जुट जाएगी। वाहनों की चेकिंग...तो सारे एसपी सड़क पर उतर जाएंगे। सही मायनो में कहा जाए तो पुलिस का अपना इकबाल होना चाहिए। पुलिस का काम बाकी विभागों से अलग होता है। इसमें इकबाल सबसे उपर होता है और उसके बाद अनुशासन। ये थोड़ी है कि कोई आंदोलन होने वाला है, तो सिपाहियों से लाठी रखवा लो। अफसरों को अपने पर इतना भरोसा तो होना ही चाहिए कि एक लाईन का मैसेज दिया जाए, लाठी चार्ज नहीं करना है तो नहीं होगा। सूबे में चार दिन हुक्का बारों पर ताबड़तोड़ कार्रवाई चली और फिर...। छत्तीसगढ़ के एक बीयर बार में आधी रात को छत्तीसगढ़ी फिल्म एक्ट्रेस पर हमला हो जाता है। रात को 11 बजे के बाद बार एलाउ नहीं है। मगर किसी जिले में ऐसा नही होगा कि बारह बजे से पहले बंद होता होगा। कुछ महीने पहले की बात है... उड़ीसा से लौटते समय सराईपाली जैसे क्रॉस हुए, लेफ्ट साइड का एक ढाबा ओपन बार बना हुआ था। ढाबे वाले को कोई डर नहीं। क्योंकि, थाने में हर महीने लिफाफे में गांधीजी की फोटो पहुंच जाती है। कहने का मतलब ये है कि पुलिसिंग मजबूरी नहीं...आदत में होनी चाहिए।

थानेदारों से महीना

एसपी पहले थानेदारों से छोटे मोटे बेगारी करा लेते थे। ट्रेन या फ्लाइट का टिकिट हुआ या फिर बाजार से कोई मोबाइल जैसे चीजें मंगवा ली। अब ये एक्स्ट्रा हो गया है। अब तो ये सिस्टम बन गया है... हर महीने कप्तान साब को नजराना पहुंचाना पड़ेगा। एसपी थानेदारों से महीना लेने लगें तो उस राज्य की पुलिसिंग का फिर तो भगवान मालिक हैं। सीधी सी बात है, एसपी एक थाने से पचास लेगा, तो थानेदार उसकी आड़ में पांच लाख वसूलेगा। इसके लिए इलाके में अवैध शराब बिकवाएगा, बिना लाइसेंस होटलों में शराब परोसवाएगा। मसाज पार्लरों में देह व्यापार हो रहा, थानों का बकायदा रेट बंधा हुआ है। हालांकि, इसके लिए रमन सरकार भी जिम्मेदार है। पिछली सरकार ने परिवहन बैरियर समाप्त कर दिया और शराब का ठेका भी। पुलिस को अच्छी खासी रकम इन दोनों जगहों से मिल जाती थी। ऐसे में, कप्तान साहब लोग क्या करें। थानेदारों से महीना वाला सिस्टम उसी समय से चालू हुआ।

नया सीआईसी कौन?

मुख्य सूचना आयुक्त एमके राउत नवंबर में रिटायर हो जाएंगे। नवंबर में ही सूचना आयुक्त अशोक अग्रवाल की भी विदाई होगी। इन पदों पर नई नियुक्तियों के लिए विज्ञापन निकल गया है। आवेदन भी आने शुरू हो गए हैं। खबर है, अगले महीने से नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। लोगों में सबसे अधिक उत्सुकता मुख्य सूचना आयुक्त को लेकर है। वो इसलिए कि कोई सीनियर आईएएस फिलहाल रिटायर नहीं हो रहा। गोवा को छोड़कर सभी राज्यों में सीनियर लेवल से रिटायर हुए आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों को बिठाया गया है। कुछ राज्यों में हाईकोर्ट के रिटायर जस्टिस भी पोस्ट किए गए हैं। देश में गोवा एकमात्र राज्य है, जिसमें सत्ताधारी पार्टी के विधायक को सीआईसी बनाया गया है। ऐसे में, सवाल घूम-फिरकर वहीं पर आ रहा...राउत के बाद नया सीआईसी कौन? दरअसल, सीआईसी क लिए कोई निश्चित मापदंड नहीं है...सिर्फ सोशल सेक्टर में काम होना चाहिए। यही वजह है नामों को लेकर कई तरह की अटकलें चल रही हैं। कोई किसी पत्रकार को सीआईसी बनाने की बात कर रहा तो कोई किसी दूसरे राज्य के रिटायर नौकरषाह की। देखना है, अब सरकार किसको इस पद पर बिठाती है।

जय-बीरु

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव और नेता प्रतिपक्ष नारायण चंदेल एक साथ दौरे में निकल रहे हैं। दोनों फिलहाल बस्तर में हैं। भाजपा में इन्हें जय-बीरु की जोड़ी कही जा रही है। हालांकि, पिछले विधानसभा चुनाव में भी तब के पीसीसी चीफ भूपेश बघेल और नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव एक साथ खूब दौरे किए। दोनों को भी जय-बीरु का नाम दिया गया था। अब सवाल उठता है...नए जय-बीरु की जोड़ी क्या भूपेश और सिंहदेव जैसा प्रभावशाली बन पाएगी...क्या उनमें वो दमखम है। पुराने जय-बीरु ने भाजपा की पारी को 15 रन पर समेट दिया था।

आ बैल मुझे मार...

तिमाही परीक्षा के पर्चा लीक कांड ने विभाग की बिना पुख्ता तैयारी के योजना लाने की पोल तो खोलकर रख ही दी। साथ ही साथ प्रमुख सचिव के बयान से यह भी तय हो गया की विभाग में आपसी तालमेल का अभाव है। केंद्रीकृत तिमाही परीक्षा के लिए आपसी सहमति भी नहीं थी। डीपीआई, माशिमं सचिव और प्रमुख सचिव के अलग अलग बयान इसकी तस्दीक करते है की विभाग प्रयोगशाला बनते जा रहा है। आलोक शुक्ला के बयान से स्पष्ट है कि वे तिमाही परीक्षा के केंद्रीकृत सिस्टम से सहमत नहीं थे। मगर नीचे के अधिकारियों ने आ बैल मुझे मार करने बोर्ड से पेपर तैयार करवा दिया। और वही हुआ, स्कूल शिक्षा विभाग की फजीहत हो गई।

अंत में दो सवाल आपसे

1. सीएम हाउस का घेराव और अमित शाह के कार्यक्रम से नदारत रहने वाले बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विश्णुदेव साय जगतप्रकाश नड्डा के कार्यक्रम में हाजिर हुए, तो क्या मान लेना चाहिए कि उनकी नाराजगी दूर हो गई है?

2. एक एसपी का नाम बताइये, जो खुद कुछ नहीं लेते...दो मोबाइल दुकान वालों को एजेंट बनाए हैं?



शनिवार, 17 सितंबर 2022

अफसर की दूसरी शादी!

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 18 सितंबर 2022

वालीवुड की तरह अब अधिकारी बिरादरी में भी लाइफ पार्टनर के लिए शादी-शुदा पुरूषों को प्राथमिकता दी जा रही हैं। छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक गलियारों में ऐसी ही एक शादी की बेहद चर्चा है। बताते हैं, होने वाले वर-वधु राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं। एडिशनल कलेक्टर और डिप्टी कलेक्टर। दोनों का लंबे समय से प्रेम प्रसंग चल रहा था। एडिशनल कलेक्टर की पत्नी न्यायिक सेवा क्षेत्र से हैं और हाल ही में उनका तलाक हुआ। आपको याद होगा...दो साल पहले राजधानी के वीआईपी रोड स्थित एक कालोनी में ये प्रेमी जोडा पर्सनल टाईम स्पेंड कर रहा था, तभी एडिशनल कलेक्टर की पत्नी वहां धमक गई थीं, फिर बड़ा तमाशा हुआ...। यह खबर मीडिया मे सुर्खिया बनी थी...क्योंकि, जिस बंगले में प्रेमी जोड़ा रंगे हाथ धरा गया था, वो भारत सरकार के एक उपक्रम का गेस्ट हाउस था। बहरहाल, अब पत्नी से तालाक हो गया है। लिहाजा, एडिशनल कलेक्टर के लिए अब प्रेम के इस रिश्ते को आगे बढ़ाने में कोई बाधा नहीं है। खबर है, अक्टूबर में अधिकारी जोड़ा सात फेरे लेगा।

ऐसे बने डीजीपी

पोस्टिंग के 11 महीने बाद आईपीएस अशोक जुनेजा छत्तीसगढ़ के पूर्णकालिक डीजीपी बन गए हैं। अब सवाल उठता है, प्रभारी डीजी बनने के बाद पूर्णकालिक बनने में इतना वक्त क्यों लगा तो उसकी वजह है सीनियरिटी में वे पांचवे नम्बर पर थे। उनसे उपर न केवल डीएम अवस्थी थे बल्कि स्वागत दास, रवि सिनहा, संजय पिल्ले और मुकेश गुप्ता थे। इनमें स्वागत दास का नवंबर 2024 और रवि सिनहा का जनवरी 2024 में रिटायरमेंट है। ऐसे में जुनेजा की राह मुश्किल थी। सरकार ने उन्हें पुलिस विभाग का मुखिया तो बना दिया था मगर यूपीएस से पेनल को मंजूरी न मिलने के कारण उनकी रेगुलर पोस्टिंग अटकी रही। वैसे, 88 बैच के आईपीएस स्वागत दास और 89 बैच के रवि सिनहा सेंट्रल डेपुटेशन पर हैं। पता चला है, दोनों ने यूपीएससी को लिखकर दिया कि वे छत्तीसगढ़ नहीं लौटना चाहते। इसके बाद चार नाम बचे। डीएम अवस्थी, मुकेश गुप्ता, संजय पिल्ले और अशोक जुनेजा। इनमें से मुकेश गुप्ता चूकि सस्पेंड थे, इसलिए उनका नाम हट गया। इसके बाद तीन नाम बचे। यूपीएससी के नियमानुसार डीजीपी के लिए तीन नामों का पेनल होना चाहिए। सो, यूपीएससी ने हरी झंडी देते हुए तीन नामों का पैनल छत्तीसगढ़ सरकार को भेज दिया और सरकार ने अशोक जुनेजा के नाम पर टिक लगाते हुए पूर्णकालिक डीजीपी का आदेश जारी कर दिया। सबसे अहम यह है कि उन्हें आदेश निकलने के डेट से दो साल का कार्यकाल मिल गया। याने अगस्त 2024 तक वे डीजीपी रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइंस के मुताबिक डीजीपी का कार्यकाल दो साल रहेगा। जुनेजा के आदेश में भी लिखा है, आदेश निकलने की तिथि से दो साल। याने जो होता है, अच्छे के लिए होता है। अगर पिछले साल अक्टूबर में ही वे फुलटाईम डीजीपी बन गए होते तो अगले साल अक्टूबर में उन्हें रिटायर होना पड़ता। बहरहाल, फुलटाईम डीजीपी बनते ही जुनेजा एक्शन में आ गए हैं। दो दिन पहले उन्होंने दुर्ग जाकर दुर्ग रेंज के आईजी, एसपी की बैठक ली। इस बैठक में कानून-व्यवस्था को लेकर उन्होंने कड़े तेवर दिखाए। सुना है, दुर्ग के बाद वे एक-एक कर सभी रेंज मुख्यालयों में जाने वाले हैं। कह सकते हैं, पद और पोस्टिंग का फर्क तो पड़ता है।

कलेक्टर-कारोबारी, भाई-भाई

राज्य की सत्ता संभालने के बाद भूपेश बघेल सरकार ने डीएमएफ की बंदरबांट पर लगाम लगाने कई अहम फैसले लिए थे। इसमें बिल्डिंगों के निर्माण पर रोक लगा दी गई थी। पैसे का सही सदुपयोग करने के लिए सरकार ने कई नए नियम बनाए, जिसमें आम आदमी से ताल्लुकात रखने वाले विभागों में डीएमएफ को खर्च करना शामिल था। मसलन, स्कूल, स्वास्थ्य, आदिवासी हॉस्टल। मगर कलेक्टरों और कारोबारियों के नापाक गठजोड़ ने सरकार के नए नियमों में भी छेद कर डाले। आलम यह है कि छात्रावासों की बिल्डिंगें जर्जर है मगर उसमें नए कूलर, फ्रीज, पंखे, फर्नीचर जंग खा रहे हैं। इन गैर जरूरी चीजों की सप्लाई के पीछे मकसद सिर्फ और सिर्फ डीएमएफ का बजट किसी तरह खर्च करना है। कोविड के नाम पर कलेक्टरों द्वारा अभी भी अनाप-शनाप खरीदी की जा रही है। स्कूलों का भी यही हाल है। खासकर, आत्मानंद स्कूलों की अगर जांच कर ली जाए तो कई कलेक्टर और डीईओ निबट जाएंगे। असल में, डीएमएफ में सप्लाई करने से बांटने के बाद भी सप्लायरों को 30 से 40 फीसदी बच जाता है। उपर से सरकारी पेमेंट की तरह नोटशीट घूमने का लफड़ा भी नहीं। कलेक्टर चूकि डीएमएफ के हेड होते हैं और पहले से सब सेट होता है लिहाजा, समान सप्लाई होते ही चेक मिल जाता है। जाहिर है, सप्लयार को भुगतान होगा तभी तो वो उसी गति से हिस्सा पहुंचाएगा। यही वजह है कि सराफा व्यापारी से लेकर राईस मिलरों तक इस सप्लाई के काम में कूद पड़े हैं। दरअसल, इसमें बिना किसी मेहनत का पैसा है। बस, दो-से-तीन कलेक्टरों को ग्रीप में लेना है, उसके बाद बिना बोले आर्डर मिलते जाएगा।

दलालों का अड्डा

छत्तीसगढ़ में सरकार किसी भी पार्टी की हो, डीएमएफ को कलेक्टर ही चला रहे हैं। कलेक्टरों के विजिटर रुम में आप चले जाइये, आम आदमी से ज्यादा वहां सप्लायर दिखेंंगे आपको। दिल्ली, चेन्नई, बंगलोर, कोलकाता तक से सप्लायर छत्तीसगढ़ पहुंच रहे हैं। सरकार को डीएमएफ के मामले में कलेक्टरों को कसने की जरूरत है वरना, नुकसान होगा। क्योंकि अगले साल ही विधानसभा चुनाव है। और अधिकांश कलेक्टर कामधाम छोड़ डीएमएफ के खेल में लगे हुए हैं। खेल इस लेवल पर पहुंच गया है कि डीएमएफ को डिस्ट्रिक्ट माईनिंग फंड की जगह अब डीएम फंड कहा जाने लगा है।

बेचारे कलेक्टर!

छत्तीसगढ़ में पांच नए जिले तो बन गए मगर उन जिलों के कई कलेक्टर खुश नहीं हैं। एक तो ओएसडी के रूप में छह महीने उन्हें कलेक्टर इन वेटिंग रहना पड़ा। दूसरा, जिला बना तो उन्हें लगा कि अब डीएमएफ के हिस्सों का बंटवारा हो जाएगा। मगर पुराने जिलों के कलेक्टर इसके लिए तैयार नहीं हैं...अभी तक उन्हें एक पैसा नहीं मिला है। पुराने जिलों के कलेक्टरों का कहना है, उपर से कोई निर्देश नहीं है। नए जिलों के कलेक्टर इसलिए चिंतित हैं कि अगले साल अक्टूबर में कोड आफ कंडक्ट प्रभावशील हो जाएगा। याने मुश्किल से साल भर बचा है। डीएमएफ का फैसला होने में जितना टाईम लगेगा, बेचारे कलेक्टरों को उतना ही नुकसान होगा।

कमाल के आईएएस

आईएएस की सर्विस के दौरान कामों से ज्यादा अपने कारनामों को लेकर चर्चित रहने वाले एक रिटायर आईएएस ने अपनी जमीन तीन लोगों को बेच दी। हाउसिंग बोर्ड ने ऑल इंडिया सर्विस के अधिकारियों को वहां सस्ती दर से जमीन मुहैया कराई थी। आईएएस ने भी 4200 वर्गफुट का प्लाट लिया। इसके लिए उन्होंने बकायदा बैंक से लोन लिया। हैरत की बात यह है कि लोन के बाद भी उन्होंने एक के बाद एक तीन लोगों की जमीन बेच डाली।

कार्रवाई क्यों नहीं?

कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान एक जनपद सीईओ ने मंच से राजनेताओं के खिलाफ लक्ष्मण रेखा लांघते हुए अमर्यादित बातें कही थी। इसको लेकर कांकेर कलेक्टर ने तुरंत तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित की। कमेटी की रिपोर्ट बस्तर कमिश्नर तक पहुंच गई है। रिपोर्ट में साफ तौर पर लिखा गया है कि जनपद सीईओ ने सेवा संहिता का घोर उल्लंघन किया है। इसके बाद भी कार्रवाई कुछ नहीं। तो क्या इसे ये समझा जाए...जातीय समीकरणों कार्रवाई में आडे़ आ गया है।

अहम पोस्टिंग

छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस बीवीआर सुब्रमणियम को रिटायरमेंट से 15 दिन पहले ही पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग मिल गई। भारत सरकार ने उन्हें सीएमडी इंडियन ट्र्रेड प्रमोशन आरगेनाइजेशन बनाया है। हालांकि, यह दो साल के लिए कंट्रेक्चुअल पोस्टिंग है। मगर रिटायरमेंट से पहले पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग...वो भी सीमडी की। सुब्रमणियम का भारत सरकार में प्रभाव तो है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस युवा आईएएस अधिकारी को रिटायर आईएएस राधाकृष्णन का संस्करण कहा जा रहा है?

2. क्या रेंज आईजी लेवल पर कोई पोस्टिंग आदेश निकलने वाला है?


सोमवार, 12 सितंबर 2022

माथुर का पीएमओ कनेक्शन...

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 11 सितंबर 2022

माथुर का पीएमओ कनेक्शन

भाजपा ने राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के दौरे के दौरान छत्तीसगढ़ की प्रदेश प्रभारी डी. पुरंदेश्वरी को हटाकर ओम माथुर को बिठा दिया। ओम माथुर का नाम देश के लिए जाना माना है। वे संघ के प्रचारक रहे हैं। राजस्थान के संगठन मंत्री के रूप में वे भाजपा में उनकी इंट्री हुई और बाद में वहां के प्रदेश अध्यक्ष बनें। फिर गुजरात, यूपी और महाराष्ट्र के प्रभारी का दायित्व भी बखूबी निभाया। ओम माथुर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे कनेक्टेड माना जाता है। पीएमओ को भी पता है कि ओम माथुर कौन हैं। इसका मतलब यह समझा जाए कि छत्तीसगढ़ भाजपा में अब सिर्फ और सिर्फ ओम माथुर की चलेगी...दुजा कोई नहीं। असल में, पुरंदेश्वरी जूनियर पड़ जाती थीं। वैसे भी, लगातार 15 साल तक मंत्री रहकर मजबूत हो गए नेताओं पर उनका चाबुक चलाना संभव नहीं था। मगर अब...वही होगा, जिसमें ओम माथुर की सहमति होगी।

पुरंदेश्वरी की ट्रेनिंग?

छत्तीसगढ़ की प्रदेश प्रभारी पुरंदेश्वरी को हटाने को लेकर तरह-तरह की बातें निकलकर आ रही हैं। मगर अंदरखाने की खबर यही है कि उन्हें तेलांगना का सीएम प्रोजेक्ट करने के लिए उनका कार्य क्षेत्र बदला गया है। बताते हैं, आंध्र के पूर्व और लोकप्रिय मुख्यमंत्री रहे एनटी रामाराव की बेटी पुरंदेश्वरी को दो साल पहले ही भाजपा ने तेलांगना में मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करने का फैसला ले लिया था। उन्हें रणनीति के तहत पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाया गया। एक चीज और समझने की बात है कि पुरंदेश्वरी कई बार बस्तर गई...वहां पार्टी की चिंतन बैठक भी कीं। बस्तर दौरा इसलिए कि वह तेलांगना से लगा हुआ है। बस्तर के अलावा दूसरे संभागों में पुरंदेश्वरी कभी नहीं गईं। तब तो सीएम भूपेश बघेल ठीक कह रहे हैं....कल जेपी नड्डा के दौरे पर उन्होंने तंज कसते हुए कहा था छत्तीसगढ़ लोग सिखने के लिए आते हैं।

आईएएस राडार पर!

छत्तीसगढ़ में इंकम टैक्स के छापे लगातार चल रहे हैं। कुछ नौकरशाहों को भी नोटिस देने की खबरें कई दिनों से पब्लिक डोमेन में है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी आशंका जता चुके हैं कि छत्तीसगढ़ में आईटी के बाद ईडी भी आएगी। सूबे में जिस तरह की चर्चाएं चल रही हैं, वह मुख्यमंत्री के आरोपों की तस्दीक कर रही हैं। आईटी और ईडी की नोटिसों के बीच एक आईएएस अधिकारी समेत कुछ अफसरों के राडार पर होने के संकेत मिल रहे हैं। केंद्रीय जांच एजेंसियां पुख्ता साक्ष्य जुटाने के बाद किसी आईएएस को गिरफ्त में ले लें, तो अचरज नहीं।

कार्यकारी अध्यक्ष

भाजपा ने साहू वोटरों पर डोरे डालने आदिवासी नेता विष्णुदेव साय को हटाकर अरुण साव को अध्यक्ष बना दिया। लेकिन, कांग्रेस पीसीसी अध्यक्ष पद आदिवासी नेता के लिए रिजर्व रखेगी। वैसे भी, सीएम ओबीसी समाज से हैं तो पीसीसी इसी समाज से होना सियासी दृष्टि से मुफीद नहीं होगा। बहरहाल, पीसीसी अध्यक्ष मोहन मरकाम आदिवासी हैं और अंदरखाने की खबर यह है कि अगला अध्यक्ष भी इसी समाज से चुना जाएगा। इसके लिए बस्तर के सांसद दीपक बैज का नाम सबसे उपर चल रहा। उधर, कांग्रेस पार्टी जातीय संतुलन बनाने दो कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति पर भी विचार कर रही है। हालांकि, यह पहली बार नहीं होगा। इसके पहले भी कांग्रेस पार्टी दो बार कार्यकारी अध्यक्ष का प्रयोग कर चुकी है। तत्कालीन पीसीसी चीफ भूपेश बघेल के साथ भी शिव डहरिया और रामदयाल उईके को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था। इस बार भाजपा के साहू अध्यक्ष के जवाब में कांग्रेस कार्यकारी अध्यक्ष का पद साहू नेता को दे सकती है। इसके लिए बिलासपुर संभाग से एक साहू नेता का नाम चल रहा, तो दलित कोटे से रायपुर संभाग के किसी नेता को लिया जाएगा। कुल मिलाकर अगले साल होने वाला विधानसभा चुनाव जातीय रंग से सराबोर रहेगा।

वक्त का खेल

पीसीसीएफ से रिटायर होने के बाद भूपेश सरकार ने आईएफएस अधिकारी एसएस बजाज को पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग दे दी है। रिटायरमेंट से पहले वे लघु वनोपज संघ में एडिशनल एमडी थे और वहीं पर उन्हें फिर से पोस्ट किया गया है। हालांकि, बजाज के रिटायरमेंट से पहले इसी तरकश कॉलम में हमने बताया था कि बजाज को पोस्ट रिटायरमेंट देने की तैयारी है और सरकार ने इस पर मुहर लगा दिया। बहरहाल, इसे ही कहा जाता है, वक्त बलवान होता है...। ग्रह-नक्षत्र का शिकार होकर बजाज जब सस्पेंड हो गए थे तो आईएफएस लॉबी सन्न रह गई थी...क्योंकि, बजाज इधर-उधर वाले स्वभाव के अफसर नहीं माने जाते। मगर यही सरकार ने उन्हें पीसीसीएफ बनाने कैबिनेट से विशेष पद सृजित किया और फिर पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग भी। याने दर्द भी और दवा भी। सही है...हम भ्रम में होते हैं, सारा खेल वक्त का होता है।

भूल सुधार-1

अनुशासित पार्टी कही जाने वाली भाजपा 2018 के विधानसभा चुनाव में बगावत कर पार्टी प्रत्याशियों को निबटाने वाले नेताओं को फिर से पार्टी में प्रवेश कराने की तैयारी की गई थी। राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के छत्तीसगढ़ दौरे में सराईपाली के संपत अग्रवाल और रायगढ़ के विजय अग्रवाल को पार्टी में शामिल करने पूरा खाका बन गया था। मगर मीडिया में खबर आ जाने के बाद पार्टी ने फिलहाल इसे टाल दिया। बहरहाल, संपत के चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर खड़ा हो जाने से भाजपा तीसरे नम्बर पर आ गई थी तो विजय अग्रवाल की बगावत से रायगढ़ में भी ऐसा ही हुआ। तो क्या ऐसा माना जाए कि भाजपा 2018 की अपनी भूल सुधार की कवायद में है।

भूल सुधार-2

मनेंद्रगढ़ को जिला बनाकर पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की एक भूल सीएम भूपेश बघेल ने भी सुधारी है। जाहिर है, कोरिया पैलेस के प्रेशर में मध्यप्रदेश के समय दिग्विजय सरकार ने मनेंद्रगढ, चिरमिरी की बजाए कोरिया को जिला और बैकुंठपुर को जिला मुख्यालय बना दिया था। जबकि, हाट-बाजार, कारोबार और सुविधाओं की दृष्टि से आज से दो दशक पहले भी मनेंद्रगढ़ और चिरमिरी आज के नए जिलों से कम नहीं था। आधा किलोमीटर के एरिया में एक सड़क पर बसे बैकुंठपुर को देखकर लगता था कांग्रेस सरकार ने हद से ज्यादा मेहरबानी दिखा दी।

अगले साल 36 जिले!

छत्तीसगढ़ में पांच नए जिले के साथ ही जिलों की संख्या बढ़कर अब 33 हो गई है। और संकेत हैं कि अगले साल विधानसभा चुनाव के पहले तीन और जिले अस्तित्व में आ जाएंगे। याने तीन नए जिले और बनेंगे। बताते हैं, नए जिलों के लिए सबसे मजबूत दावेदारी पत्थलगांव की है। जैसे मनेंद्रगढ़ और चिरमिरी के साथ अन्याय हुआ, उसी तरह जशपुर राज परिवार के दवाब में पत्थलगांव की भी उपेक्षा की गई। सराईपाली, सीतापुर और अंतागढ़ भी जिले के दौर में शामिल है। अंतागढ़ में तो एडिशनल कलेक्टर की पोस्टिंग भी हो चुकी है। अंतागढ़ में लंबे समय तक जिले के लिए आंदोलन चला है। सियासी दृष्टि से भी कांग्रेस के लिए खासतौर से पत्थलगांव, अंतागढ़ और सीतापुर को जिला बनाना फायदेमंद दिख रहा है। इस बारे में कुछ पुख्ता संकेत तो कुछ नहीं मिल रहा। मगर अंदर की खबरें हैं मुख्यमंत्री अगले साल 26 जनवरी को इन जिलों का ऐलान कर सकते हैं।

जिलों के अंग्रेजी नाम

छत्तीसगढ़ बनने से पहले सिर्फ जांजगीर जिला बनने के दौरान बवाल हुआ था। चांपा में जबर्दस्त तोड़फोड़ और आगजनी हुई थी। तब की सरकार ने लोगों के गुस्से को ठंडा करने के लिए जांजगीर के साथ चांपा का नाम जोड़ दिया था। इसके बाद रमन सरकार के दौरान बलौदाबाजार जिला बनने पर उग्र विरोध को देखते भाटापारा का नाम जोड़ा गया। हालांकि, सरकारी रिकार्ड में चांपा और भाटापारा का नाम जिले के तौर पर भले ही जुड़ गया मगर बोलचाल में कभी भी इन दोनों का जिक्र नहीं किया जाता। लोग जांजगीर और बलौदाबाजार ही बोलते हैं। इसके बाद भूपेश बघेल सरकार में तीन ब्लॉकों को मिलाकर गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिला बनाया गया। मगर इसका नाम इतना लंबा है कि उसे अंग्रेजी के शार्ट नाम से जाना जाने लगा...जीपीएम। और अभी जो पांच नए जिले बने हैं, उनमें सिर्फ सक्ती में सिंगल नाम है। सारंगढ़ में बिलाईगढ़ जुड़ा है। जाहिर है, आम बोलचाल में वो सारंगढ़ के नाम से जाना जाएगा। खैरागढ़-छुईखदान-गंडई, मोहला-मानपुर-अंबागढ़- चौकी तथा मनेंद्रगंढ़-चिरमिरी-भरतपु र में जरूर तीन-तीन नाम हैं। जाहिर हैं, इन्हें केसीजी, एमएमए और एमसीबी शर्ट नेम से जाना जाएगा। याने छत्तीसगढ़ के चार जिलों के नाम अब अंग्रेजी के शर्ट नेम से जाने जाएंगे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या इस बारे में आपने कुछ सुना है कि नया रायपुर स्थित भारत सरकार के किसी प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान में छात्रा के साथ रेप की घटना को प्रबंधन द्वारा दबाया जा रहा है?

2. एमके राउत के रिटायर होने के बाद मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर किसी पत्रकार की ताजपोशी होगी?


शनिवार, 3 सितंबर 2022

छत्तीसगढ़ में विषकन्याएं!

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 4 सितंबर 2022

सरकारी ऑफिसों में विषकन्याएं जिस तरह मंडरा रही हैं, उससे देखकर लगता है रायपुर में इंदौर हनी ट्रेप कांड जैसा कुछ न हो जाए। दरअसल, खबरें कई तरह की चल रहीं हैं। दिल्ली की एक हनी ने एक युवा आईएएस अधिकारी को ट्रेप कर लिया है...अब वो आईएएस को जैसा चाह रही, वैसा नचा रही है। यही नहीं...एक शरीफ छबि के आईएफएस दो विषकन्याओं की चिकनी-चुपड़ी बातों में फंस गए...और, 27 लाख का प्रोजेक्ट सेंक्शन कर दिया। एक आईपीएस घर से दूर घर जैसा फिलिंग के लिए बढियां एक लग्जरी फ्लैट किराये पर ले लिए हैं। तो सूबे के एक युवा कलेक्टर एक हनी के जाल में फंसकर डीएमएफ से सप्लाई का एकतरफा आदेश दे रहे हैं। राजधानी रायपुर पोस्टेड एक युवा आईएएस के जिस तरह के क्रियाकलाप हैं, कभी भी मुश्किलों में फंस सकते हैं। दरअसल, कन्याओं के जरिये ये काम हथियार बेचने या इसी तरह बड़ा काम करने वाली कंपनियां करती थीं। मगर अब लोकल पार्टियां भी इस नुख्से को समझ गई हैं....अफसरों से काम कैसे निकलेगा। वैसे, ये चीज ही ऐसी है, अच्छे भले, संस्कारी अफसर भी खुद को संभाल नहीं पाते...तो लंगोट के ढीले अधिकारियों को क्या कहें। समझा जा सकता है कि सारी सुख-सुविधाओं के बावजूद अफसरों की पत्नियां बेचारी दुखी क्यों रहती हैं। बहरहाल, सरकार के खुफिया तंत्र को इस पर नजर रखनी चाहिए...विषकन्याओं के फेर में आखिर कुछ बुरा हुआ तो नाम प्रदेश का भी खराब होगा।

अजब अफसर, गजब बोल

वीआईपी रोड के बड़े होटल में एक बोर्ड की सफलता को लेकर जश्न का आयोजन किया गया। इसमें बोर्ड से जुड़े ठेकेदारों, सप्लायरों को भी बुलाया गया था....अच्छे काम करने वाले कुछ लोगों को सम्मानित भी किया गया। सेलिब्रेशन का सबसे बड़ा क्लास, एक सीनियर आईएफएस का स्पीच रहा। उन्होंने सफलता की तुलना टॉयलेट से कर दी। बोले, सफलता टॉयलेट की तरह होती है, जो अपने को बुरा नहीं, लेकिन दूसरा करें तो बुरा लगता है। चूकि, शाम हो गई थीं, महफिल भी जवां..., सो लोगों ने भी मजे लेने में कोई कोताही नहीं की। वाह-वाह करते हुए वन्स मोर-वन्स मोर...हुआ। आईएफएस भी पूरे मूड मेकं थे....उन्हांने उसे फिर दोहराने में कोई हिचक नहीं दिखाई। सेलिब्रेशन हॉल में इसको लेकर लोग चटखारे लेते रहे...साहब ने आज कौन सा लिया है।

खफा-खफा से...

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष से हटाने के बाद विष्णुदेव साय पार्टी के कार्यक्रमों में नजर नहीं आ रहे हैं। भाजयुमो के सीएम हाउस घेराव कार्यक्रम में प्रदेश प्रभारी पुरंदेश्वरी से लेकर तमाम नेताओं की मौजूदगी रही, मगर विष्णु देव नहीं थे। यहां तक कि पार्टी के कद्दावर नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह रायपुर आए, उस दौरान भी लोगों की निगाहें विष्णु देव साय को ढूंढती रही। इन दोनों कार्यक्रमों के दौरान वे अपने गृह ग्राम में थे। वैसे तो विष्णु देव साय शांत और सौम्य स्वभाव के नेता माने जाते हैं। 9 अगस्त को उन्हें हटाया गया, तब भी उन्होंने विनम्रता से मीडिया के सवालों का जवाब दिया और इस बदलारव को सहजता से स्वीकार किया। लेकिन, पार्टी के नेता भी मानते हैं नेताजी खफा तो हैं। दावे ये भी किए जा रहे कि आदिवासी नेताओं की बैठकें हो रही हैं। जाहिर है, पार्टी के प्रदेश के सबसे बड़े आदिवासी लीडर नंदकुमार साय अरसे से असंतुष्ट चल रहे हैं। गाहे-बगो असंतुष्टि को झलकने वाले उनके बयान भी आ जाते हैं। वैसे, बीजेपी के बड़े नेताओं को सनद रहे...हाल में हुए बदलाव से बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर, शिवरतन शर्मा जैसे नेता भी बहुत खुश नहीं हैं। विधानसभा में सबसे उम्दा प्रदर्शन करने के बाद भी अजय को मुख्य प्रवक्ता बनाकर सफाई से किनारे कर दिया गया। अब देखना होगा, असंतुष्ट नेताओं को बीजेपी किस तरह साधने की कोशिश करती है।

भीम की गदा

स्वास्थ्य विभाग में प्रसन्ना आर. को सचिव और भीम सिंह को डायरेक्टर बनाया गया है। प्रसन्ना 2004 बैच के आईएएस हैं और भीम 2008 के। प्रसन्ना और भीम में समानता ये है कि दोनों अंबिकापुर के कलेक्टर रह चुके हैं। वैसे, हेल्थ सिकरेट्री के लिए प्रसन्ना का नाम पहले से लगभग फायनल हो गया था, मगर डायरेक्टर के लिए कश्मकश की स्थिति रही। कई नामों की चर्चा चली। लेकिन, आखिरी में भीम सिंह पिक्चर में आए और उनके नाम पर मुहर लग गई। प्रसन्ना ने हेल्थ की कमान संभालते हुए कामकाज प्रारंभ कर दिया है। ज्वाईन करने के अगले दिन उन्होंने सीजीएमसी का विजिट किया तो 6 सितंबर को डीन, एमएस की अहम मीटिंग कॉल किया है। प्रसन्ना चूकि पहले भी हेल्थ में रहे हैं, इसलिए कामकाज को समझते हैं। भीम पहली बार हेल्थ में आए हैं और उनकी डील-डौल भी कुछ ऐसी है कि हेल्थ वालों को भय सताने लगा है, कहीं वे गदा न चलाने लगे।

शुरुआत मंत्री के इलाके से

राजधानी पुलिस की मीटिंग में गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू ने इलाके वार सटोरियों और अपराधियों की लिस्ट अधिकारियों को सौंप दी थी। अब रायपुर में इस पर कार्रवाई शुरू हुई या...पता नहीं। लेकिन, गृह मंत्री के इलाके में जरूर पुलिस एक्शन में आ गई है। गृह मंत्री का विधानसभा दुर्ग के रिसाली थाने में आता है। उनके इलाके में पुलिस ने दर्जन भर सटोरिये और अपराधियों को पकड़कर जेल भेज दिया है। इसका मतलब ये हुआ कि पुलिस अपने गृह मंत्री के इलाके से सफाई कार्य शुरू करना चाहती है। चलिये, उम्मीद रखी जाए बाकी जिलो की पुलिस भी सरकार और जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश करेगी।

कहां गई वो पुलिस...

स्कूल और कॉलेज के दिनों का याद होगा....उस समय रात में कोई बेमतलब घूमता नहीं था और रेलवे स्टेशन गए तो फिर चौक-चौराहों पर पुलिस रोककर तस्दीक करती थी। कई बार ट्रेेन की टिकिट दिखानी पड़ती थी। पुलिस अश्वस्त हो गई...बंदा ठीक है तो छोड़ दिया वरना, कई बार रात भर थाने में बिठा लिया जाता था। अब वो दिन भी नहीं रहा और वो पुलिस भी नहीं रही। पुलिस सिस्टम में सबसे बड़ी ढिलाई ये आई है कि रात की गश्त बंद हो गई है। पहले एसपी तक हफ्ते में दो-से-तीन रात पुलिस प्वांट पर धमक जाते थे। सीएसपी, टीआई और सिपाही सुबह चार बजे से पहले घर नहीं लौटते थे। अब पुलिस बड़ी उदार हो गई है। तीन सवारी जा रहा तो जाने दो, हेलमेट नहीं पहना तो क्यों रोकना। झारखंड जैसे स्टेट में स्कूटर में पीछे बैठने वाला व्यक्ति भी बिना हेलमेट साहस नहीं करता। हालांकि, पूरा दोष पुलिस को नहीं दिया जा सकता। ठीक है, पुलिस की प्राथमिकताएं बदल गई हैं....आईएएस और खासकर कलेक्टरों की डीएमएफ में अर्निंग देखकर उनका दिमाग भी चौंधियाता है....आखिर वे भी इसी समाज के आदमी है। मगर यह भी सौ फीसदी सही है कि पुलिस अगर एक अपराधी को पकड़ती है, तो मिनटों में फोन घनघनाने लगता है। अब पुलिस वाले अपनी नौकरी बचाएं या फिर कानून की रक्षा करें। राजनेताओं ने पुलिस को इतना निरीह कर दिया है कि पुलिस पर हाथ-लाठी चलने लगे। चाहे भाजपा का समय हो या कांग्रेस का, छत्तीसगढ़ पुलिस हमेशा टारगेट में रही। अब जरूरत है, पुलिस को अपना रुतबा दिखाने की।

तीन बिग विकेट

सितंबर महीना छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी के लिए अहम रहेगा। इस महीने तीन बड़े अधिकारी रिटायर होंगे। इनमें छत्तीसगढ़ के सबसे सीनियर आईएएस बीवीआर सुब्रमणियम पहले नम्बर पर हैं। 87 बैच के आईएएस अधिकारी सुब्रमणियम भारत सरकार में सिकरेट्री हैं। वे 30 सितंबर को रिटायर होंगे। हालांकि, सुब्रमणियम दिल्ली की सत्ता में बेहद प्रभावशील माने जाते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सचिवालय में लंबे समय तक काम करने के बाद भी मोदी सरकार ने छत्तीसगढ़ से बुलाकर जम्मू-कश्मीर का चीफ सिकरेट्री अपाइंट कर दिया था। और, उसके बाद वे केंद्र में सिकरेट्री बन गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भी वे कुछ समय तक काम कर चुके हैं। सो, उन्हें एक्सटेंशन मिल जाए या किसी और पद पर ताजपोशी हो जाए, तो अचरज नहीं। उधर, 88 बैच के आईपीएस मुकेश गुप्ता भी इसी महीने रिटायर होंगे। तो पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी तीन साल की पारी खेल कर लौटेंगे। राकेश की पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग की चर्चा है।

ईएल का सवाल

कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन ने तीसरे और चौथे चरण को मिलाकर कुल 17 दिन हड़ताल किया। इसमें बड़ा नुकसान उनकी छुट्टियों का हुआ। अब 17 दिन उनके ईएल में एडजस्ट किया जाएगा। साथ ही बीच में कई लोकल और सावर्जनिक अवकाश भी रहा, वो भी उनकी छुट्टियों में ऐड हो गया। और ये भी...हड़बड़ी में फेडरेशन ने हड़ताल वापिस लिया, उसके पीछे भी तीन छुट्टियों का सवाल था। फेडरेशन ने शुक्रवार को हड़ताल वापसी का ऐलान किया। इसके बाद शनिवार और रविवार अवकाश है। और सोमवार को अगर हड़ताल वापसी होती तो मंगलवार को कर्मचारी काम पर लौटते। इस चक्कर में सोमवार के साथ शनिवार और रविवार भी हड़ताल में ऐड हो जाता। याने फिर 20 दिन का ईएल खराब होता। चलिये, सरकार और कर्मचारियों दोनों के लिए अच्छा हुआ, गतिरोध खतम तो हुआ।

अंत में दो सवाल आपसे

1. रात 10 बजे के बाद डीजे नहीं बजेगा, ये आदेश सिर्फ औपचारिकता है या प्रशासन और पुलिस इस पर कोई कार्रवाई करेगी?

2. क्या ये सही है कि विधानसभा चुनाव लड़ने वाले भाजपा के संभावित दावेदारों की दिल्ली की एक एजेंसी द्वारा कुंडली तैयार की जा रही है?


शनिवार, 27 अगस्त 2022

कलेक्टरों से पंगा नहीं

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 28 अगस्त 2022

कहते हैं, जिनके घर शीशे के होते हैं, उन्हें दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं मारना चाहिए। वरना....। एक मंत्रीजी के साथ ऐसा ही हुआ है। मंत्रीजी ने प्रस्तावित भारत माला प्रोजेक्ट के अंतर्गत फोरलेन के अगल-बगल की कई एकड़ जमीन खरीद ली। किसानों को भी पता होता है कि सामने वाले गरजू है, लिहाजा रेट भी अनाप-शनाप लगाया। मंत्रीजी को भी मालूम था कि कितनी भी महंगी जमीन है, उसे टुकड़े करने पर लागत की तुलना में कई गुना निकल जाएगा। मगर कलेक्टर ने मंत्रीजी का पूरा गुड़ गोबर कर दिया। ट्रांसफर होने से पहले फोर लेन का एरिया बदलने का प्रस्ताव एनएचए को भेजा दिया और वह एप्रूव भी हो गया। अब मंत्रीजी ने जिस जगह पर जमीनें खरीद ली थी, वहा रोड नहीं बन रहा। ऐसे में मंत्रीजी के पास हाथ मलने और कलेक्टर को कोसने के अलावा कोई चारा नहीं है।

सिकरेट्री कौन?

छत्तीसगढ़ में महिला बाल विकास का फिलवक्त सिकरेट्री कौन है, यह यक्ष प्रश्न बन गया है। कोई जवाब देने की स्थिति में नहीं है। दरअसल, रीना बाबा कंगाले के पास यह विभाग था। मगर जब वे लंबी छुट्टी पर गईं तो महिला बाल विकास का प्रभार भुवनेश यादव को दिया गया। आदेश में स्पष्ट तौर पर लिखा था कि रीना बाबा के अवकाश से लौटते तक भुवनेश महिला बाल विकास संभालेंगे। रीना अब छुट्टी से लौट आई हैं। उन्होंने जीएडी में ज्वाइनिंग देकर निर्वाचन का कार्यभार संभाल लिया। मगर महिला बाल विकास का प्रभार ग्रहण नहीं कीं। उधर, रीना के आते ही भुवनेश ने महिला बाल विकास की फाइले करनी बंद कर दी। सही भी है...जीएडी के आदेश में था कि रीना के लौटते तक...। उधर, रीना ने महिला बाल विकास में ज्वाइंनिंग दी नहीं। बताते हैं, महिला बाल विकास में इतना बलंडर हो रहा कि रीना जाकर अपना हाथ जलाना नहीं चाह रहीं। उधर, जीएडी के एक लेटर से मामला और पेचीदा हो गया। जीएडी ने रीना से महिला बाल विकास वापस लेने की अनुमति लेने के लिए भारत निर्वाचन आयोग को पत्र भेज दिया, जो कि व्यवहारिक प्रतीत नहीं होता। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी को अगर राज्य सरकार कोई विभाग देना चाहती है तो उसके लिए निर्वाचन आयोग की अनुमति आवश्यक है। मगर विभाग लेने के लिए इजाजत मांगने का कोई तुक समझ से बाहर है। इस चक्कर मे महिला बाल विकास हफ्ते भर से बिना सिकरेट्री का हो गया है। विभाग में फाइलों का अंबार लगता जा रहा है।

बीजेपी में कश्मकश

प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष के बाद बीजेपी में जिला अध्यक्ष के साथ अन्य पदाधिकारियों को भी बदला जाना है। इसको लेकर पार्टी के नेता कश्मकश में हैं...पद लें या विधायक की टिकिट के लिए दावेदारी करें। असल में, नेताओं को दोहरा डर है। अगर पार्टी कहीं जिला अध्यक्ष बना दी या प्रदेश संगठन में कोई अहम पद दे दिया तो विधायक की टिकिट से पृथक न कर दें। और, संगठन में कोई पद नहीं लिया और विधायक की टिकिट भी नहीं मिली तो न घर के रहे न घाट के। भाजपा नेताओं की उलझन समझी जा सकती है। अभी जो जिला अध्यक्ष हैं, वे विधायकी के मोह में पद छोड़ना तो चाहते हैं मगर ये भी तो नहीं कि उन्हें टिकिट मिल ही जाए।

मंत्री ने पंचायत छोड़ा और...

मंत्री टीएस सिंहदेव के पास दो बड़े विभाग थे। पंचायत और स्वास्थ्य। सिंहदेव ने पंचायत से इस्तीफा दे दिया। और अधिकारियों ने स्वास्थ्य विभाग छोड़ दिया। मंत्रालय में इसको लेकर खूब चुटकी ली जा रही है। जाहिर है, स्वास्थ्य विभाग के दोनों जिम्मेदार अधिकारी डेपुटेशन के लिए रिलीव हो गए हैं। प्रमुख सचिव स्वास्थ्य डॉ0 मनिंदर कौर द्विवेदी और डायरेक्टर हेल्थ नीरज बंसोड़ को भारत सरकार में पोस्टिंग मिल गई है। स्वास्थ्य विभाग भी पिछले तीन दिन से खाली है। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ कि आम आदमी के जानमाल से जुड़े विभाग के सिकरेट्री और डायरेक्टर दोनों एक साथ डेपुटेशन पर चले गए। अब दिक्कत यह है कि नए अधिकारियों को लाया जाएगा तो उन्हें हेल्थ के सिस्टम को समझने में टाईम लग जाएगा।

एक और आईएएस!

45 हजार करोड़ के सम्राज्य के मालिक राकेश झुनझुनवाला को इस बात को लेकर बड़ा मलाल था कि उन्होंने अपने हेल्थ में सबसे कम इंवेस्ट किया। और शायद यही कारण रहा कि स्वास्थ्यगत समस्याओं से जूझते हुए उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। ये सिर्फ झुनझुनवाला के साथ नहीं है....अनेक ऐसे दृष्टांत मिल जाएंगे। एक स्टडी में ये बात सामने आई है कि 90 फीसदी लोग स्वास्थ्य के प्रति बेहद लापरवाह होते हैं। खासकर भारत में...जो लोग नियमित जीम और कसरत करते हैं, उनका ओवर कांफिडेंस तो और ज्यादा होता है। बॉडी अलार्म करती है, मगर वही....नजरअंदाज। छत्तीसगढ़ की आईएएस एम गीता बड़े कम समय में चली गईं। सुना है, एक और आईएएस को गंभीर बीमारी हो गई है...ईश्वर से प्रार्थना है, उन्हें शीघ्र स्वस्थ्य करें...लंबी आयु दे।

उम्र 65 का, और...

छत्तीसगढ़ के नौकरशाहों के लिए रिटायर्ड आईएएस दिनेश श्रीवास्तव नजीर बन सकते हैं। दिनेष 65 के होने जा रहे होंगे, मगर लुक पचपन का है। याद होगा, मैराथन दौड़ में युवा अधिकाकारियों को उन्होंने पीछे छोड़ दिया था। पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग के लिए भी दिनेश ने राजनेताओं के आगे-पीछे नहीं किया। चुपचाप एनएमडीसी में एडवाइजर ज्वाईन कर लिए। और, बढ़ियां सम्मान पूर्वक जीवन यापन कर रहे हैं। वरना, आईएएस अधिकारियों को 55 के होते ही गाड़ी, बंगला, रुतबा छिन जाने का भय सताने लगता है। तब तक रीढ़ की उनकी हड्डी बची भी नहीं होती। 33 साल की नौकरी में राजनेताओं के सामने झुकते-झुकते रीढ़ की सभी 33 हड्डी टूट चुकी होती है। रिटायरमेंट के आखिरी साल में आईएएस अधिकारी चाटुकारिता की इतनी पराकाष्ठा कर देते हैं कि सरकारें धर्मसंकट में पड़ जाती हैं...बैठने कहा जाता है तो सो जा रहा...इसे क्या दिया जाए। कहने का आशय यह है कि पोस्टिंग के मायाजाल में फंसकर अफसर जबरिया टेंशन मोल लेते हैं।

पुलक हुए पुलकित

पुलक भटाचार्य रायपुर में एसडीएम रहे हैं। नगर निगम में एडिशनल कमिश्नर। और अभी जीएडी और स्कूल षिक्षा में अंडर सिकरेट्री। पुलक का यहां उल्लेख इसलिए खास है कि भोपाल में आयोजित मध्य क्षेत्रीय परिषद की बैठक में खराब मौसम की वजह से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का प्लेन टेकअप नहीं हो पाया। उनके साथ चीफ सिकरेट्री, पीएस होम समेत कई शीर्ष अधिकारी भी प्लेन से जाने वाले थे, वे भी यहीं फंस गए। ऐसे में, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मीटिंग में छत्तीसगढ़ से कोई मौजूद था तो पुलक थे। वे एक दिन पहले भोपाल चले गए थे। अब इतनी बड़ी मीटिंग में शिरकत करने का अवसर मिल गया, पुलकित होना लाजिमी है।

अच्छा काम

अक्सर देखने में यह आता है कि थानों में बड़ी संख्या में लावारिस गाड़ियां यूं ही पड़े-पड़े कंउम हो जाती हैं, मगर उस पर पुलिस कोई कार्यवाही नहीं करती। जांजगीर पुलिस ने इस दिशा में आज अच्छा काम किया। एसपी विजय अग्रवाल ने लावारिस गाड़ियों की नीलामी की और सरकार के खजाने में एकमुश्त 64 लाख रुपए आ गए। इससे पहले विजय ने जशपुर में किया था। बलौदा बाजार के कप्तान दीपक झा भी गाड़ियों की नीलामी से हैंडसम अमाउंट राजकोष में जमा करा चुके हैं। गृह मंत्री या डीजीपी को बाकी कप्तानों को भी इस बारे में ताकीद करना चाहिए। उससे फायदा यह होगा कि गाड़ियां यूज में आ जाएंगी और सरकार के खजाने में कुछ पैसे भी।

गृह मंत्री का आईना

गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू दिखते हैं शांत और संतुलित। लेकिन बड़ी चतुराई से उन्होंने रायपुर पुलिस को आईना दिखा दिया। एक तो बिना किसी हो-हंगामे के पुलिस कंट्रोल पहुंच गए बैठक लेने। फिर पूरा डिटेल ले गए थे...किस इलाके में कौन सट्टा खिला रहा है...नाम सहित बता दिया। किस इलाके में रहजनी हो रही है और उसकी वजह क्या है। गृह मंत्री ने एक तरह से कहें तो अपना दामन सफाई से बचा लिया। उनके बोलने का हो गया, मैंने तो पुलिस अधिकारियों को पूरा बता दिया...उस पर अमल नहीं करते तो अब क्या किया जाए।

अंत में दो सवाल आपसे

1. डॉ0 रमन सिंह को पार्टी नेताओं से जिस तरह वेटेज मिल रहा, उससे क्या आपको लगता है कि अगले विधानसभा चुनाव में वे सीएम फेस होंगे?

2. केंद्रीय गृह मंत्री अमित षाह के कार्यक्रम के संचालन का दायित्व मिलने से समझा जाए कि पूर्व आईएएस ओपी चौधरी का पार्टी में प्रभाव बढ़ा है?


रविवार, 21 अगस्त 2022

फर्स्ट कलेक्टर, फर्स्ट डीएफओ

संजय के. दीक्षित

तरकश, 19 अगस्त 2022

समें फोटो ही खबर है...चीफ सिकरेट्री अमिताभ जैन और पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी राजधानी में नव निर्मित श्रीकृष्ण कुंज के मुख्य द्वार के सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। दोनों की जोड़ी पुरानी है। राज्य बनने के बाद नवबंर 2000 में अमिताभ को अजीत जोगी सरकार ने रायपुर का कलेक्टर बनाया था और राकेश को डीएफओ। तब दोनों ने वीआईपी रोड पर राजीव स्मृति वन बनवाया था। उस समय रायपुर में कुछ था नहीं...कोई गेस्ट आए तो लोग राजीव स्मृति घूमाने ले जाते थे। संयोग से अमिताभ अब चीफ सिकरेट्री हैं और राकेश पीसीसीएफ। यानी एक सूबे का प्रशासनिक मुखिया तो दूसरा वन विभाग का। ऐसे में, देखना चाहिए कि दोनों षीर्श अधिकारियों की जोड़ी ने श्रीकृष्ण कुंज में क्या कमाल किया है।

गौरव को एनओसी

प्रिंसिपल सिकरेट्री गौरव द्विवेदी को सेंट्रल डेपुटेशन के लिए राज्य सरकार ने एनओसी दे दिया है। गौरव चूकि पहले भी सेंट्रल डेपुटेशन कर चुके हैं इसलिए उन्हें भारत सरकार की पोस्टिंग में दिक्कत नहीं जाएगी। सुनने में आ रहा...किसी भी दिन उनका आदेश आ सकता है। बता दें, गौरव से पहले उनकी पत्नी डॉ. मनिंदर कौर द्विवेदी को भारत सरकार में पोस्टिंग मिल गई है। कृषि विभाग की एक बोर्ड की वे एमडी बनाई गईं हैं। फिलवक्त मनिंदर यहां सिकरेट्री हेल्थ हैं और जल्द ही रिलीव होने वाली हैं।

हार्ड लक!

प्रिंसिपल सिकरेट्री गौरव द्विवेदी और उनकी पत्नी डॉ0 मनिंदर कौर द्विवेदी...95 बैच के अफसर हैं। दोनों केंद्र में एडिशनल सिकरेट्री के लिए इम्पेनल हो चुके हैं। जाहिर है, डेपुटेशन पर जाने पर केंद्र में उन्हें इसी पोस्ट के समकक्ष पोस्टिंग मिलेगी। द्विवेदी दंपति वैसे काम में कमजोर नहीं माने जाते, मगर छत्तीसगढ़ में करीब डेढ़ दशक से उनका ग्रह-योग ठीक नहीं बैठ रहा है। रमन सरकार के दौरान भी उन्हें छत्तीसगढ़ छोड़कर डेपुटेशन पर जाना पड़ा था। हालांकि, तब स्थिति ये थी कि सरकार डेपुटेशन के लिए एनओसी नहीं दे रही थी। काफी जोर-आजमाइश के बाद सरकार से उन्हें दिल्ली जाने की हरी झंडी मिली। इस बार कम-से-कम एनओसी मिल गया है।

10 फीसदी डेपुटेशन

डीओपीटी के नियमों के अनुसार कुल कैडर के 40 फीसदी ब्यूरोक्रेट्स डेपुटेशन पर जा सकते हैं। इस दृष्टि से छत्तीसगढ़ के आईएएस डेपुटेशन में काफी पीछे हैं। छत्तीसगढ़ में आईएएस में 163 का कैडर है। इनमें सिर्फ 18 अफसर केंद्र में हैं। गौरव द्विवेदी, मनिंदर कौर और नीरज बंसोड़ अभी जाने वाले हैं। इन तीनों को मिला दें, तब भी यह फिगर 21 पहुंचता है। याने 13 प्रतिशत। वैसे, पहले तो स्थिति और खराब थी। बहुत हुए तो एक या दो। अभी तो अफसर प्रतिनियुक्ति पर जा रहे हैं और उन्हें पोस्टिंग भी अच्छी मिल रही है। भारत सरकार में छत्तीसगढ़ के आईएएस अफसरों की कमी की एक वजह केंद्र में मंत्रियों का नहीं होना भी है। छत्तीसगढ़ को मुश्किल से एक राज्य मंत्री से ज्यादा कुछ नहीं मिलता। वो भी नुमाइशी वाले और कुछ होते नहीं। समझा जा सकता है...रेणुका सिंह की कितनी चलती होगी...वे यहां से अफसरों को दिल्ली ले जाएंगी। दूसरे राज्यों के केंद्रीय मंत्रियों की संख्या अधिक होती है। उनके साथ उनके राज्य के अफसर भी दिल्ली चले जाते हैं।

प्रसन्ना और कैसर की जोड़ी?

हेल्थ सिकरेट्री मनिंदर कौर द्विवेदी और हेल्थ डायरेक्टर नीरज बंसोड़ डेपुटेशन पर जा रहे हैं। उनकी रिलीविंग की फाइल चल गई है। सवाल है उनकी जगह पर नया स्वास्थ्य सचिव और संचालक कौन होगा? सरकार के पास सीनियर लेवल पर अफसर हैं नहीं। आलोक शुक्ला तीन बार हेल्थ सिकरेट्री रह चुके हैं। ऐसे में, प्रसन्ना आर. मतलब बड़े प्रसन्ना को हेल्थ विभाग की कमान सौंपने की चर्चा है। वहीं मनरेगा आयुक्त अब्दुल कैसर हक का नाम हेल्थ डायरेक्टर के लिए सुना जा रहा है। प्रसन्ना पहले डायरेक्टर हेल्थ रह चुके हैं। कुछ दिनों तक सिकरेट्री भी रहे, जब एसीएस रेणु पिल्ले हेल्थ संभाल रही थीं। प्रसन्ना को हेल्थ की अच्छी समझ है तो कैसर भी काम करने वाले अधिकारी माने जाते हैं। हालांकि, हेल्थ में एक प्रसन्ना और हैं। सी.आर. प्रसन्ना याने छोटे प्रसन्ना। अगर कैसर हक डायरेक्टर हेल्थ बनें तो हो सकता है कि सरकार छोटे प्रसन्ना को मनरेगा कमिश्नर की जिम्मेदारी सौंप दें। हालांकि, अभी अटकलों के लेवल में है यह। सरकार उधेड़बून में है...किसी भी नाम पर मुहर लग सकता है। पता चला है, आजकल में सचिव और डायरेक्टर लेवल पर एक लिस्ट निकलेगी। हो सकता है कि सिकरेट्री पंचायत भी बदल जाएं। बड़े प्रसन्ना की जगह पर षहला निगार को पंचायत की जिम्मेदारी सरकार सौंप दे। यह स्पश्ट कर दें, बड़े प्रसन्ना 2004 बैच के आईएएस हैं और छोटे प्रसन्ना 2006 बैच के।

रमन का कद!

बीजेपी ने छत्तीसगढ़ प्रदेष अध्यक्ष विष्णुदेव साय को हटा दिया तो उसके बाद नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक को। जाहिर है, दोनों पूर्व मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह के समर्थक माने जाते थे और यह भी सही है कि दोनों की नियुक्ति में रमन सिंह की भूमिका रही। चूकि दोनों अब पूर्व हो गए हैं, ऐसे में जाहिर है भाजपा के अंदरखाने में रमन सिंह के कद पर सवाल उठने लगे हैं। नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति के दिन भी बीजेपी मुख्यालय में ये चर्चा तेज रही कि रमन सिंह को राज्यपाल बनाया जा रहा है। ये ठीक है कि रमन सिंह के दोनों समर्थक शीर्ष पद से हटाए जा चुके हैं लेकिन इससे उनका कद कम हो गया...इसमें पूरी सच्चाई नहीं है। सूबे के बड़े भाजपा नेताओं को पता है कि पार्टी नेतृत्व का छत्तीसगढ़ में भरोसेमंद कोई चेहरा है तो वे रमन हैं। इसीलिए, कोई नेता लक्ष्मण रेखा से इधर-उधर होने की कोशिश नहीं कर रहा। आखिर, राजनीति में कोई भी चीज नामुमकिन नहीं होती। क्या पता, प्रबल भाग्यशाली रमन के दिन फिर...फिर जाए।

ओबीसी कार्ड कंप्लीट

आदिवासी वर्ग से द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाने के बाद भाजपा को छत्तीसगढ़ के आदिवासी अध्यक्ष विष्णुदेव साय को हटाने में कोई जोखिम नहीं लगा। उनकी जगह पर अरुण साव को बिठाया गया। और इसके बाद बीजेपी ने नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक को हटाकर कुर्मी समाज के ही नारायण चंदेल को नेता प्रतिपक्ष का दायित्व सौंप दिया। जाहिर है, छत्तीसगढ़ में बीजेपी का ओबीसी कार्ड कंप्लीट हो गया है। अब जो नियुक्तियां होंगी, उसमें जनरल क्लास और दलितों को प्राथमिकता दी जाएगी। प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष के बाद सूबे में ग्लेरमस पद कोई बचा है तो वह है चुनाव अभियान समिति के प्रमुख का। सुना है, किसी सामान्य वर्ग से आने वाले नेता को यह जिम्मेदारी दी जाएगी। बीजेपी में अभी काफी नियुक्तियां होनी है। बीजेपी अध्यक्ष और भाजयुमो अध्यक्ष दोनों साहू हो गए हैं। ऐसे में, भाजयुमो के प्रमुख बदले जाएंगे तो नारायण चंदेल के नेता प्रतिपक्ष बनने से महामंत्री का एक पद भी खाली हुआ है, इन पर जल्द ही नियुक्ति होगी।

स्पीकर और नेता प्रतिपक्ष

छत्तीसगढ़ की सियासत में न केवल बिलासपुर का कद बढ़ा है बल्कि जांजगीर को भी अहमियत मिली है। कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ नेता और स्पीकर चरणदास महंत जांजगीर से आते हैं और उन्हीं के जिले से अब नारायण चंदेल नेता प्रतिपक्ष बन गए हैं। इससे पहले ये कभी नहीं हुआ कि एक ही जिले से स्पीकर और नेता प्रतिपक्ष बना हो। यही नहीं, विधानसभा के सचिव दिनेश शर्मा भी जांजगीर जिले से हैं। उधर, बिलासपुर से अरुण साव को भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। जाहिर है, इससे बिलासपुर का वजन भी बढ़ा है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. नेता प्रतिपक्ष के लिए मजबूत दावेदारी होने के बाद भी अजय चंद्राकर को पार्टी ने ये जवाबदेही क्यों नहीं दी?

2. भूपेश बघेल जैसे सियासी योद्धा के सामने बीजेपी के अरुण साव और नारायण चंदेल की जोड़ी कितनी कारगर होगी?


 

रविवार, 14 अगस्त 2022

मुझको भी लिफ्ट करा दे...

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 14 अगस्त 2022

अदनान सामी का एक बड़ा हिट सांग है...तेरी उंची शान मौला...मेरी अर्जी मान मौला...मैं हूं तेरा मान मौला...मुझको भी लिफ्ट करा दे....कैसे-कैसो को दिया है...ऐसे-वैसो को दिया है...बंगला, मोटर, कार दिला दें...मुझको भी...। छत्तीसगढ़ के जिला पंचायतों के पदाधिकारियों पर अदनान सामी का ये गाना फिट बैठता है। उनका दर्द भी कुछ वैसा ही है...निगमों, मंडलों में मनोनित हुए नेताओं को राज्य और कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिल गया और उनकी...निर्वाचित होने के बाद हैसियत कुछ नहीं। खटारी गाड़ी, महीने में 200 लीटर तेल की लिमिट। कहने के लिए पंचायती राज, मगर सीईओ के इशारे के बिना पत्ता नहीं खड़कता। मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह के समय जिपं अध्यक्षों का जो शानो-शौकत रहा, राज्य बनने के बाद एक-एक कर सब छीनता गया। पहले अजीत जोगी सरकार ने कद कम किया फिर बाद की बीजेपी सरकार ने। हालांकि, इस सरकार ने जिपं पदाधिकारियों को सीईओ का सीआर लिखने के साथ ही वित्तीय अधिकार देने का ऐलान किया था। उनका वेतन तो बढ़ गया मगर पावर नहीं मिला। अगर चेक पर दस्तखत करने का अधिकार मिल जाता तो, खुरचन पानी का बंदोबस्त हो जाता। तभी तो वे लिफ्ट कराने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

प्रमुख सचिव का टोटा

छत्तीसगढ़ में सिकरेट्री तो तीन दर्जन के करीब हो गए हैं मगर प्रमुख सचिव लेवल पर आईएएस अधिकारियों का बड़ा टोटा हो गया है। कुल जमा चार प्रमुख सचिव हैं। डॉ0 आलोक शुक्ला, मनोज पिंगुआ, गौरव द्विवेदी और डॉ0 मनिंदर कौर द्विवेदी। इनमें से मनिंदर सेंट्रल डेपुटेशन पर दिल्ली जा रही हैं। भारत सरकार ने उन्हें पोस्टिंग दे दी है। जाहिर है, उनके पति गौरव द्विवेदी भी देर-सबेर दिल्ली जाएंगे ही। बचेंगे सिर्फ आलोक शुक्ला और मनोज पिंगुआ। दरअसल, राज्य बनने के दौरान जूनियर लेवल पर आईएएस बडे़ कम मिले थे...एक बैच में एक। किसी में वो भी नहीं। मसलन, 88 बैच में सिर्फ केडीपी राव थे। वे रिटायर हो चुके हैं। 89 बैच में भी सिर्फ अमिताभ जैन। वे सीएस हैं। उसके बाद 90 बैच जीरो। 91 में रेणु पिल्ले, 92 में सुब्रत साहू, 93 में अमित अग्रवाल। अमित डेपुटेशन पर हैं। रेणु और सुब्रत एसीएस प्रमोट हो चुके हैं। 94 बैच में जरूर चार आईएएस हैं। मगर मनोज पिंगुआ को छोड़ ऋचा शर्मा, विकासशील और निधि छिब्बर प्र्रतिनियुक्ति पर। 95 बैच के द्विवेदी दंपति यहां से जाने ही वाले हैं। इसके बाद 96 बैच जीरो है। 97 में तीन आईएएस हैं। इनमें से सुबोध और एम गीता डेपुटेशन पर हैं और निहारिका बारिक दो साल से छुट्टी पर। 98 बैच में डॉ0 एसके राजू थे, वे कैडर चेंज करा पंजाब चले गए। 99 बैच में सोनमणि बोरा इसी साल दिल्ली गए हैं। 2000 बैच में शहला निगार हैं। 2002 बैच में रोहित यादव और डॉ0 कमलप्रीत सिंह। इनमें रोहित पीएमओ में पोस्टेड हैं। 2003 से आईएएस अधिकारियों की संख्या जरूर थोड़ी ठीक-ठाक होनी शुरू हुई। इस बैच में चार आईएएस हैं। सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी, ऋतु सेन, रीना बाबा कंगाले और अविनाश चंपावत।

मिडिल आर्डर

क्रिकेट में पारी को संवारने के लिए जो भूमिका मध्य क्रम के बल्लेबाजों की होती है, वहीं रोल मंत्रालय में प्रमुख सचिवों की होती हैं। चूकि 25 साल की सेवा के बाद आईएएस अधिकारी प्रमुख सचिव प्रमोट होते हैं, लिहाजा उनके पास फील्ड के साथ ही मंत्रालय का भी खासा तर्जुबा हो जाता है। बड़े राज्यों में आज भी अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव को ही विभाग का हेड बनाया जाता है। स्पेशल सिकरेट्री को तो कतई नहीं। सचिवों को अगर विभाग दिया भी गया तो पशुपालन टाईप के। याद होगा, आईसीपी केसरी यहां पीडब्लूडी सिकरेट्री थे। मध्यप्रदेश वापिस लौटे तो उन्हें दुग्ध जैसा कोई विभाग मिला था। वैसे, छत्तीसगढ़ में भी पंचायत, हेल्थ, फायनेंस, उर्जा, होम, पीडब्लूडी, फॉरेस्ट जैसे अहम विभागों में प्रमुख सचिव या एसीएस बिठाए जाते थे। सिर्फ एक बार अपवाद को छोड़कर...रमन सिंह की तीसरी पारी के आखिरी समय में जूनियर अफसरों को स्पेशल सिकरेट्री बनाकर स्वतंत्र प्रभार दिया गया था। बहरहाल, अब सीनियर आईएएस के नाम पर एसीएस में रेणु पिल्ले और सुब्रत साहू तथा प्रमुख सचिव में मनोज पिंगुआ बचेंगे। कमोवेश यही स्थिति 2028 तक रहेगी। 28 में 2003 बैच के चार आईएएस प्रमुख सचिव प्रमोट होंगे। उसके बाद फिर दिक्कत नहीं होगी। क्योंकि, फिर सभी बैचों में अधिकारियों की संख्या बढ़ती चली गई हैं।

अच्छी बात...मगर

एक समय था, जब छत्तीसगढ़ के दो-एक से अधिक आईएएस अधिकारी दिल्ली में नहीं होते थे। तब डेपुटेशन की अनुमति मिलनी भी थोड़ी कठिन थी। निधि छिब्बर को एनओसी देने के बाद भारत सरकार ने डिफेंस में पोस्टिंग दे दी। लेकिन, स्टेट का अचानक मन बदल गया...रिलीव करने से नो कर दिया गया। सेंट्रल डेपुटेशन से डिबार होने के खतरे को देखते निधि कैट की शरण ली। कैट के आदेश पर राज्य सरकार ने उन्हें रिलीव किया। मनिंदर कौर जब 2009 में जब पहली बार डेपुटेशन पर गई थीं तो बहुत कम लोगों को पता है कि एनओसी मिलने में उन्हें कितनी कठिनाई हुई थीं। अब स्थिति बदली है। डेपुटेशन के लिए एनओसी मिलने में अब कोई दिक्कत नहीं। कांग्रेस की सरकार आने के बाद पौने चार साल में 12 आईएएस अधिकारियों को केंद्र और इंटर स्टेट डेपुटेशन की अनुमति मिली। इनमें मनिंदर कौर और नीरज बंसोड़ भी शामिल हैं। इन 12 में से सिर्फ तीन आईएएस इंटर स्टेट डेपुटशन पर हैं। अलेक्स पाल मेनन, श्रुति सिंह और संगीता पी0। बाकी इस समय 15 आईएएस केंद्र में हैं और सभी ठीक-ठाक पोजिशन में हैं। मगर ये अवश्य है कि नीरज जैसे काम करने वाले अच्छे अधिकारियों की जरूरत यहां भी है।

राइट टाईम

पहले सेंट्रल डेपुटेशन बड़ा आसान था। ज्वाइंट सिक्रेट्री याने जेएस लेवल तक बिना किसी किंतु परंतु के केंद्र में पोस्टिंग मिल जाती थी। मगर मोदी सरकार ने अब सलेक्शन प्रकिया में काफी कसावट कर दिया है। चौतरफा छानबीन के बाद ही केंद्र में पोस्टिंग मिल रही। ऊपर से नया नियम आ गया है...ज्वाइंट सिक्रेट्री वही इंपेनल हो पाएगा, जो डायरेक्टर के रूप में दो साल केंद्र में सेवा देगा। 2007 बैच से ये नियम प्रभावशील हुआ है। इसे आप ऐसे समझिए...17 साल की सर्विस के बाद आईएएस अफसर केंद्र में जेएस इंपेनल होते हैं। 2005 बैच के मुकेश और रजत पिछले महीने जेएस बने हैं। नए नियम के तहत अब जेएस के पहले दो साल डायरेक्टर के रूप में काम करना होगा। इस दृष्टि से 2007 बैच को अगर 2024 में जेएस इंपेनल होना है, तो ये राइट टाइम है। कह सकते हैं, नीरज ने सही वक्त पर सही डिसिजन लिया।

पहली बार

यह पहला ऐसा मौका होगा, जब सरकार को सिकरेट्र्री हेल्थ और डायरेक्टर हेल्थ एक साथ पोस्ट करना पड़ेगा। सिकरेट्री हेल्थ डॉ0 मनिंदर कौर द्विवेदी और डायरेक्टर नीरज बंसोड़ प्रतिनियुक्ति पर जा रहे हैं। दोनों जिम्मेदार अधिकारियों के एक साथ जाने से हेल्थ के कामकाज में परेशानी तो आएगी। वैसे भी, खब्बू बैट्समैन की तरह नीरज तीन साल से क्रीज पर जमे हुए थे। उनके डायरेक्टर रहते चार सिकरेट्री बदल गए...निहारिका बारिक, आलोक शुक्ला, रेणु पिल्ले। मनिंदर कौर द्विवेदी नीरज की चौथी सिकरेट्री थीं। अब डायरेक्टर भी नए होंगे और सिकरेट्री भी। तो क्या ये समझा जाए कि सरकार अनुभवी अफसर डॉ0 आलोक को हेल्थ की कमान सौंपेगी। आलोक तीन बार हेल्थ की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। दो बार पिछली सरकार में और एक बार इस सरकार में। वो इसलिए कि सरकार के पास विकल्प सीमित हैं। सुब्रत साहू का विभाग अभी हाल में चेंज हुआ है। हालांकि, वे भी एक बार हेल्थ में रह चुके हैं। दूसरी एसीएस ह,ैं रेणु पिल्ले। रेणु के पास कोई बड़ा विभाग नहीं है। रेणु पिल्ले कोविड के दूसरे दौर के दौरान हेल्थ सिकरेट्री रहीं। इसी साल सरकार ने उनके स्थान पर मनिंदर को बिठाया था। मनोज पिंगुआ पहले से ओवर लोडेड हैं। अब देखना है, सरकार आलोक को जिम्मा सौंपती है या किसी और नाम पर टिक लगाती है।

अरुण की चुनौती

बीजेपी ने सांसद अरुण साव को प्रदेश अध्यक्ष अपाइंट किया है। अरुण साफ-सुथरी छबि के...जमीनी नेता हैं। पढ़े-लिखे भी। बीजेपी सरकार में 15 साल तक डिप्टी एजी रहे। मुगेली के रहने वाले अरुण पार्टी के कई नेताओं के कांटे रहे हैं। 2013 के लोस चुनाव में भी उनका नाम टिकिट के लिए चला था। मगर कुछ नेताओं ने खतरे को देखते विरोध कर दिया था। 2019 में बिलासपुर संसदीय सीट से टिकिट मिली भी तो उन्हें हराने की कम कोशिशें नहीं हुई। बहरहाल, उनके अच्छे समय आने की चर्चा तो लंबे समय से चल रही थी। मगर अध्यक्ष नियुक्ति की खबर कई बड़े नेताओं को रास नहीं आई। आज एयरपोर्ट पर अरुण का स्वागत करने जरूर बड़े नेताओं का जमावड़ा लगा। लेकिन, 9 अगस्त को तो नियुक्ति की खबर आते ही सन्नाटे जैसी स्थिति रही। बीजेपी के प्रदेश कार्यालय में कैसा उत्साह था, आप इससे समझ सकते हैं कि अरुण के लिए प्रोफाइल तक जारी नहीं किया गया। कहने का आशय यह है कि अरुण भले ही प्रदेश अध्यक्ष बन गए हैं मगर उनके समक्ष खुद को साबित करने की बड़ी चुनौती होगी। प्रदेश में 15 साल वाले मुख्यमंत्री हैं तो 15 साल वाले दर्जन भर मंत्री भी। इन सबसे बीच उन्हें अपनी जगह बनानी होगी।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या मुख्यमंत्री के 15 अगस्त के भाषण में पत्थलगांव, सराईपाली और कटघोरा में से किसी जिले का ऐलान हो सकता है?

2. इस खबर में कितनी सच्चाई है कि 15 अगस्त के बाद किसी पुलिस अधीक्षक की छुट्टी होगी?