शनिवार, 13 जून 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: मंत्रियों का सामूहिक इस्तीफा!

 


तरकश, 14 जून 2026

संजय के. दीक्षित

मंत्रियों का सामूहिक इस्तीफा!

छत्तीसगढ़ में मंत्रिमंडल सर्जरी की अटकलों के बीच एक अपडेट ये आ रहा कि पार्टी पहले सभी 13 मंत्रियों का इस्तीफा लेगी, उसके बाद नए सिरे से मंत्रिमंडल का गठन किया जाएगा। ठीक उसी तरह, जैसा गुजरात में दो बार हुआ। जाहिर है, बीजेपी में मंत्रियों का सामूहिक इस्तीफा तभी लिया जाता है, जब हटाए जाने वाले मंत्रियों की तादात ज्यादा हो। छत्तीसगढ़ में 13 में से से करीब पांच मंत्रियों को बदलना है। अगर दो-तीन मंत्रियों को हटाना होता तो फिर सिर्फ उन्हीं से इस्तीफा लिया जाता। मगर फिगर ज्यादा है, इसलिए बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व सभी मंत्रियों का इस्तीफा लेगा, फिर उसमें नए मंत्रियों को शामिल किया जाएगा। इस्तीफा देने वाले पांच मंत्रियों की जगह कौन लेगा...उनमें पुराने विधायक कितने होंगे और कितने नए...इस बारे में इस समय बता पाना मुमकिन नहीं, क्योंकि, नए जमाने के बीजेपी में कब, क्या होगा...किसी को कुछ पता नहीं होता। सब कुछ काफी कंफिडेंशियल होता है। बताते हैं, खुद नितिन नबीन को आभास नहीं था कि पार्टी ने उन्हें सर्वोच्च पर बिठाने का फैसला किया है। पीएम नरेंद्र मोदी ने जब फोन किया, तो उन्हें लगा कि बिहार बीजेपी का अध्यक्ष बनाने की बात कर रहे हैं। मगर अगले पल जो हुआ, उससे नितिन भी हैरान रह गए। खैर, बात छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल फेरबदल की, तो जून लगभग आधा निकल गया है। हो सकता है, इस महीने के आखिर या जुलाई फर्स्ट वीक तक राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की टीम फायनल हो जाए। इसके बाद जुलाई फर्स्ट या सेकेंड वीक तक छत्तीसगढ़ में मंत्रिमंडल पर काम होगा। तब तक सभी तेरहवों मंत्रियों की सांसे गले में लटकी रहेगी।

ओड़िया आईएएस और ग्रहण

रिटायर आईएएस और साहित्यकार बीकेएस रे नहीं रहे। 79 साल की उम्र में 3 जून को उनका देहावसान हो गया। उसके अगले दिन महादेव घाट में उनका अंतिम संस्कार हुआ। मुक्तिधाम में जैसा कि आमतौर पर गपशप होता है...उस रोज भी तरह-तरह के पुराने किस्से, चर्चाएं निकली। बात इस पर भी हुई कि एसके मिश्रा के सीएस रहने के दौरान आखिर ऐसा क्या हुआ कि ओड़िया आईएएस अधिकारियों का ग्रह-नक्षत्र बिगड़ गया। एसके मिश्रा ओड़िसा के रहने वाले थे। छत्तीसगढ़ के फर्स्ट चीफ सिकेट्री अरुण कुमार के रिटायर होने के बाद अजीत जोगी ने मिश्रा को मुख्य सचिव बनाया था। मगर उनके बाद फिर कोई दूसरा ओड़िया भाषी अफसर सीएस नहीं बन पाया। दिवंगत ओड़िया निवासी बीकेएस रे सीएस की दौड़ में दो बार सुपरसीड हुए। पहली बार उनके जूनियर शिवराज सिंह को सीएस बनाया गया और उसके बाद पी0 जॉय उम्मेन को। रे के बाद डीएस मिश्रा और एमके राउत लाख प्रयास के बाद भी मुख्य सचिव बनने से वंचित हो गए। और अब सुब्रत साहू के साथ यही हुआ। सुब्रत 92 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। मगर उन्हें सुपरसीड कर सरकार ने 94 बैच के आईएएस विकास शील को ब्यूरोक्रेसी की शीर्ष कुर्सी सौंप दी। ऐसा भी नहीं कि ये ओड़िया अधिकारी चीफ सिकेट्री बनने लायक नहीं थे। छत्तीसगढ. में एक से बढ़कर एक ..... मुख्य सचिव हुए हैं, उनसे तो ये अच्छे ही थे। ओड़िया आईएएस अधिकारियों को जगन्नाथ महाप्रभु की नगरी पुरी में ठीकठाक किसी पंडित से अनुष्ठान कराना चाहिए।

78 सीटों का क्या

बस्तर से नक्सलवाद का खात्मा हो गया, छत्तीसगढ़ के लिए इससे बड़ी खुशी की बात हो नहीं सकती। निश्चित तौर पर बस्तर के डेवलपमेंट पर सिस्टम का फोकस होना चाहिए। सरकार ने बस्तर को प्रायरिटी में रखा भी है। उसे देश का सबसे विकसित आदिवासी संभाग बनाने का फैसला किया गया है। यहां तक ठीक है। मगर सिस्टम को खुश करने सारा तंत्र लगे सिर्फ बस्तर का राग अलापने, तो स्टेट और सत्ताधारी पार्टी की सेहत के लिए ये ठीक नहीं है। इस समय स्थिति यह है कि जिसे बस्तर से कोई मतलब नहीं, वो भी बस्तर की बात कर रहा। सिस्टम में बैठे लोगोें को यह ध्यान रखना होगा कि बस्तर में 12 विधानसभा सीटें हैं। बाकी 78 सीटें सरगुजा और मैदानी इलाके में हैं। मैदानी और शहरी इलाके में पानी से लेकर सड़क जैसी कई बुनियादी समस्याएं मुंह बाए खड़ी है, मगर इन विभागों के जिम्मेदार अफसर सिर्फ बस्तर की जाप करेंगे तो यह असंतुलन की स्थिति होगी। सिस्टम में बैठे लोगों को इसे नोटिस में लेनी चाहिए।

रिटर्न गिफ्ट में ब्रेकर

नगरीय निकाय चुनाव में एकतरफा जीत के बाद विष्णुदेव सरकार ने नगरीय क्षेत्रों को रिटर्न गिफ्ट देने एक अच्छा कंसेप्ट शुरू किया था। इसके तहत चुनिंदा शहरों के विकास के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक हाई लेवल की मीटिंग होती थी। इसमें नगरीय निकाय मंत्री के साथ वित्त मंत्री और संबंधित विभागों के सचिवों के साथ संबंधित जिले के कलेक्टर, एसपी तथा विधायकों को बुलाया जाता था। लेकिन, रायपुर और बिलासपुर के बाद कतिपय कारणों से इस बैठक पर ब्रेक लग गया। इसे फिर से चालू करना चाहिए। क्योंकि इस हाई लेवल बैठक में मौके पर ही कई समस्याओं या पेंडिंग कार्य क्लियर हो जा रहे थे। इससे फायदा भाजपा को ही होता, क्योंकि शहरी इलाकों में बीजेपी का प्रभाव ज्यादा है। वैसे भी किसी स्टेट का भौतिक विकास उसके शहरों की चकाचौंध से परखा जाता है। फिर ग्रामीण इलाकों के लोग भी आमोद-प्रमोद के लिए शहर ही आते हैं। मगर शहर ही बेतरतीब, अव्यवस्थित रहेगा तो फिर बाहर के लोग स्टेट की क्या छबि लेकर जाएंगे।

फॉरेस्ट और आईएएस

श्रीनिवास राव और तपेश झा के रिटायरमेंट के बाद सरकार ने अरुण पाण्डेय को हेड ऑफ फॉरेस्ट बनाया। इसके बाद वैक्यूम को दूर करने चार शीर्ष अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार देकर सरकार ने काम चला लिया। मगर फॉरेस्ट में असली दिक्कत आएगी अगले महीने, जब माइनर फॉरेस्ट फेडरेशन से अनिल साहू और फॉरेस्ट डेवलपमेंट कॉरपोरेशन से प्रेम कुमार रिटायर होंगे। ये दोनों पीसीसीएफ लेवल के पोस्ट हैं और प्राब्लम यह है कि वन विभाग के पास इस स्तर के अधिकारी अब बचे नहीं हैं। इनमें फेडरेशन तो बस्तर के आदिवासी इलाके और वोट बैंक की दृष्टि से काफी अहम है। ये अलग बात है कि फेडरेशन के वर्तमान एमडी अनिल साहू संजय शुक्ला और अनिल राय के काम को आगे बढ़ा नहीं पाए। मगर विधानसभा चुनाव में अब दो साल बच गए हैं, लिहाजा सरकार अब किसी ठीकठाक अफसर को ही इस पद पर बिठाना चाहेगी। मगर अफसर है नहीं। ऐसे में, सवाल उठता है...क्या किसी आईएएस को फेडरेशन और कॉरपोरेशन में नहीं बिठाया जा सकता। इन दोनों में काम एडमिनिस्ट्रटिव और कोआर्डिनेशन का है। वैसे, ब्यूरोक्रेसी में इस पर चर्चा भी चल रही कि जब आईएएस के कैडर पद पर अनेक आईएफएस काम कर चुके हैं तो फिर वन विभाग में आईएएस पोस्ट क्यों नहीं हो सकते। बहरहाल, निर्णय सरकार को लेना है।

कमाल के अफसर

एनएमएसी ने सूबे के पांच नए मेडिकल कॉलेजों को परमिशन देने से इंकार कर दिया है। अफसरों ने बिना किसी तैयारी के प्रपोजल भेज दिया था। कई जगह अस्पताल नहीं है तो कहीं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को ही अस्पताल दिखा डाला था। अफसरों की नाकामी इसलिए कि पांच में से तीन कवर्धा, जांजगीर और गीदम कॉलेज के लिए भारत सरकार ने पिछली सरकार में बिल्डिंग बनाने के लिए पैसा भेज दिया था। 2022 से यह पैसा डंप पड़ा है। दिसंबर 2023 में सरकार बदलने के बाद सीजीएमएससी ने अफसरों ने टेंडर में खेला करने में दो बरस बर्बाद कर दिया। 500 करोड़ ओवर रेट पर एक ही कंपनी को ठेका देने की साजिश रची गई। मगर इसी स्तंभ के लेखक की लगातार खबरों के बाद घोटाले का टेंडर निरस्त हुआ और सरकारी खजाने का 272 करोड़ बचा। मगर सरकार के पैसे बच गए मगर यहां के बच्चों का जो नुकसान हुआ, उसका क्या? जरा सोचिए, टेंडर में गफलत करने की कोशिश में अगर टाईम खराब नहीं किया गया होता तो अभी तक बिल्डिंग कंप्लीट हो रही होती। और, उस बेस पर शायद एनएमसी कम-से-कम तीन कॉलेजों को अनुमति दे दी होती। स्वास्थ्य विभाग में उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों ने अगर अपने पड़ोसी प्रदेश से ही समझ लिया होता...एमपी में पहले कॉलेज बिल्डिंग और अस्पताल तैयार किया जाता है फिर मान्यता के लिए प्रस्ताव भेजा जाता है। मगर छत्तीसगढ़ के कमाल के अफसरों ने कमाल कर डाला।

सीजीएमएससी की नाकामी

एनएमसी ने पांच मेडिकल कॉलेजों को मान्यता नहीं दिया है मगर वास्तविकता यह है कि पिछली सरकार में तीन कॉलेज खुले हैं, वहां भी अगर एनएमसी एक बार इंस्पेक्शन कर लें तो तीनों की मान्यता निरस्त हो जाएंगी। कोरबा, महासमुंद और कांकेर, तीनों मेडिकल कॉलेजों को कोविड काल का लाभ मिला और उन्हें बिना निरीक्षण के मान्यता मिल गई थी। मगर उन तीनों कॉलेजों का बुरा हाल है। न कॉलेज की बिल्डिंग बनी है और न अस्पताल। और-तो-और, रमन सिंह सरकार के दौरान अंबिकापुर में खुले मेडिकल कॉलेज अस्पताल की पूरी बिल्डिंग अभी नहीं बन पाई है। सरकार ने उसके लिए 100 करोड़ स्वीकृत किया मगर तीन साल बाद भी जस-की-तस स्थिति है। और ये भी, पिछले साल एक जुलाई को मेडिकल कॉलेज में सीएम के कार्यक्रम में हॉस्टल को लेकर बतंगड़ हुआ था। सीएम को वास्तविकता की जानकारी मिली तो उन्होंने हॉस्टल के लिए तुरंत 80 करोड़ स्वीकृत कर दिया था मगर उसके बाद भी काम शुरू नहीं हो पाया।

सजा नहीं, इनाम

असल में दिक्कत यह है कि सिस्टम में किसी काम के फेल्योरनेस के लिए कोई जिम्मेदारी तय नहीं है। छत्तीसगढ़ जैसे गरीब प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग और सीजीएमएससी के लोगों ने मेडिकल कॉलेजों को खोलने में लापरवाही बरती तो उसके लिए उन अफसरों को चिन्हित किया जाना चाहिए...दंड का प्रावधान होना चाहिए। मगर ऐसा होता नहीं। बल्कि, उपर से उन्हें बढ़िया पोस्टिंग मिल जाती है। सीजीएमएससी के अधिकारियों को कलेक्टर बनाकर ईनाम दे दिया जाता है। हेल्थ में बडे़-बड़े घोटाले के बाद भी किसी अफसर का बाल तक बांका नहीं हुआ। तो फिर कोई अफसर अपने दायित्वों के प्रति सजग क्यों रहेगा? वो काला-पीला करेगा ही, क्योंकि उन्हें मालूम है, आईएएस भाई लोग बचा ही लेंगे।

सीजीएमससी फेल क्यों?

हेल्थ डायरेक्ट्रेट में सीबीआई के छापे और डायरेक्टर, ज्वाइंट डायरेक्टर समेत कई डॉक्टरों को जेल जाने के बाद रमन सिंह सरकार ने यह सोचकर सीजीएमएससी को बनाया कि डॉक्टर लोग खरीदी-वरीदी जैसे प्रशासनिक कार्यो में पारंगत नहीं होते, इसलिए कॉरपोरेशन के जरिये खरीदी, सप्लाई किया जाएगा। तब आईएफएस अधिकारी प्रताप सिंह को सीजीएमएससी का फर्स्ट एमडी बनाया गया। उनके रहते तक सीजीएमएससी में अच्छा काम हुआ। मगर उसके बाद आए दूसरे आईएफएस अधिकारी ने तबाही मचा दी। उसके बाद से कॉरपोरेशन की चाल-चलन बिगड़ा, वह पटरी पर नहीं लौट पाया। अलबत्ता, समय के साथ सीजीएमससी के खटराल अधिकारियों ने स्वास्थ्य विभाग से बात कर मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों का सिविल कार्य भी शामिल करवा लिया। जबकि, सीजीएमएससी के पास सिविल का अपना कोई सेटअप नहीं। इसके लिए दूसरे विभागों से उधारी पर इंजीनियर लिए गए। और हजार-हजार करोड़ करोड़ का काम शुरू कर डाले। कोरबा, महासमुंद और कांकेर के बाद पांच नए मेडिकल कॉलेज का काम भी सीजीएमएससी ही कर रहा है। अब बात सीजीएमएससी फेल क्यों, तो बताते हैं एक तो सीजएमएससी के पास सेटअप नहीं, और दूसरा जो सबसे महत्वपूर्ण...काम प्रारंभ करने से पहले ठेकेदार को आठ फीसदी कमीशन बंगले में पहुंचाना पड़ता है और पांच-सात परसेंट खुरचन-पानी सीजीएमएससी में इधर-उधर। अब 200 करोड़ में से 20-25 करोड़ पहले ही बांट देता है मगर काम का भुगतान जल्दी होता नहीं। याने एडवांस जेब से गया है, निर्माण में जो खर्च हुआ, वो भी टाईम से पेमेंट नहीं मिलता। कोरबा, कांकेर और महासमंुद का काम लटकने के पीछे ये भी एक बड़ा कारण है।

वर्जित मास में शादी और बवाल

पिछले हफ्ते बेमेतरा सियासी तौर पर बेहद सुर्खियों में रहा। असल में, जो अकल्पनीय था, वह हो गया। उस घटना के नीर-क्षीर, विवेचन से पता चला, खता अफसरों ने की और उसकी कीमत सिस्टम ने चुकाई। दरअसल, सनातन धर्म में मलमास याने पुरूषोतम मास में शादी-ब्याह पूर्णतः वर्जित है। इस प्रतिबंधित महीने में अफसरों ने सामूहिक विवाह का कार्यक्रम रख दिया। उस पर, आश्चर्य यह कि बीजेपी जैसी धर्म-कर्म में विश्वास रखने वाली पार्टी के किसी नेता ने भी इस पर ध्यान नहीं गया। अलबत्ता, बेमेतरा के विधायक भी दूल्हा बन बैलगाड़ी में बैठ गए, तो उत्साहित होकर डिप्टी सीएम अरुण साव उनके गाड़ीवान बन लगे गाड़ी हांकने। अब मलमास में शादी होगी, तो उसका साइड इफेक्ट आना ही था...वीवीआईपी कार्यक्रम में अराजकता की खबर सोशल मीडिया की सनसनी बन गई। खैर, विधायक समेत सभी नव ब्याहितों को सुखी दांपत्य जीवन के लिए शुभकामनाएं। और, महिला बाल विकास मंत्री को सलाह भी...उन्हें काशी के किसी पंडित से कुछ हवन वगैरह करा लेना चाहिए...मंत्रिमंडल सर्जरी की चर्चाओं के बीच उनके विभाग ने वर्जित मास में शुभ काम करा डाला।

एसपी की पोस्टिंग

छत्तीसगढ़ राज्य के अब तक के सबसे तेज-तर्रार गृह मंत्री होने के बाद भी दो-दो जिलों में एसपी की पोस्टिंग नहीं हो पा रही तो यह आश्चर्यजनक है। बता दें, सारंगढ़ और बलौदा बाजार में काफी दिनों से एसपी की कुर्सी खाली पड़ी है। दोनों जिले काफी संवेदनशील हैं। बलौदा बाजार में दो साल पहले कलेक्ट्रेट और एसपी ऑफिस फूंक देने जैसी हिंसक घटनाएं हो चुकी है। बावजूद इसके, दोनों जिले टेम्पोरेरी व्यवस्था में चल रहे। दोनों में एडिशनल एसपी को बिठाया गया है। बलौदा बाजार की एसपी भावना गुप्ता पर्सनल कारणों से लंबे अवकाश पर हैं तो सारंगढ़ के एसपी आंजनेय वार्ष्णेय सेंट्र्रल डेपुटेशन पर निकल गए हैं। पीएचक्यू और गृह विभाग की ड्यूटी है कि जिन जिलों में कप्तान नहीं है, वहां बात करके पोस्टिंग कराए। मगर पता नहीं तालमेल कहां पर गड़बड़ा रहा है। इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। कोई महिला एसपी अगर लंबी छुट्टी पर जाती थीं या कोई कप्तान डेपुटेशन पर गया तो तुरंत ही गृह विभाग से वहां पोस्टिंग कर दी जाती थी।

मंत्रियों का ऐसा परफार्मेंस

सुशासन तिहार में कई दिलचस्प एपिसोड सामने आए। एक सीनियर मंत्री के विधानसभा क्षेत्र के एक गांव में सीएम का चौपाल लगना था। मुख्यमंत्री ने वहां जाने से पहले मंत्री से पूछ दिया, आप तो फलां गांव को जानते ही होगे, अब मंत्री लगे अगल-बगल झांकने। मंत्रीजी रायपुर से रात में ही भागते-भागते अपने विस क्षेत्र पहंुचे, फिर अगली सुबह सीधे गांव में। मंत्री को डर था कि कहीं कलई खुल न जाए...रमन सिंह के दौर से मंत्री रहने के बाद भी माननीय एक बार भी अपने क्षेत्र के गांव में नहीं आए।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. केंद्रीय मंत्री तोखन साहू और डिप्टी सीएम अरुण साव में से किसका फ्यूचर ज्यादा ब्राइट है?

2. छत्तीसगढ़ आर्म्स फोर्स की 22 बटालियन में से अधिकांश में कमांडेंट डबल चार्ज में है, तो इसका मतलब ये निकाला जाना चाहिए कि पुलिस सिस्टम के प्रायरिटी में नहीं है?

गुरुवार, 11 जून 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: मंत्रिमंडल, सोशल मीडिया और सरगुजा

 


तरकश, 7 जून 2026

संजय के. दीक्षित

मंत्रिमंडल: परफॉर्मेंस और परसेप्शन

विष्णुदेव साय मंत्रिमंडल में फेरबदल इस महीने होगा या जुलाई फर्स्ट वीक तक, इस पर अभी कुछ क्लियरिटी नहीं है। मगर सोशल मीडिया में अटकलों का बाजार गर्म है। हालांकि, बीेजेपी की सियासत में इस समय एक कान को पता नहीं होता...कि दूसरे कान में..., तो फिर मंत्री कौन बनेगा, कौन होगा आउट, इसकी भविष्यवाणी करना मुमकिन नहीं। बहरहाल, परफॉर्मेंस और परसेप्शन के आधार पर ये जरूर कहा, सुना और माना जा रहा कि मंत्रिमंडल की सर्जरी में सबसे अधिक खतरा सरगुजा संभाग को रहेगा। मुख्यमंत्री को छोड़ दें, तब भी बस्तर की तुलना में सरगुजा में चार गुना मंत्री हैं। जाहिर है, फेरबदल में इस असंतुलन को दूर किया जाएगा।

खतरे में ये मंत्री

सरगुजा के चार में से तीन की रिपोर्ट्स अच्छी नहीं आ रही है। इसकी बड़ी वजह खराब परफार्मेंस के साथ रिकार्डतोड़ करप्शन है। सरगुजा के कई मंत्रियों को लग रहा...शायद यह मौका फिर मिले न दोबारा...सो, आईपीएल अंदाज़ में बैटिंग चल रही। खुफिया एजेंसियां भी इसकी तस्दीक कर रही हैं...अपडेट्स भी लगातार दिल्ली जा रहे हैं। खैर, परफॉर्मेंस और परसेप्शन की बात करें तो 12 में से पांच मंत्रियों की विदाई निश्चित लग रही है। बीजेपी के शीर्ष लीडर भी मानते हैं... तभी 2028 के सियासी रण में बीजेपी दमदारी से उतर पाएगी।

आईपीएस डेपुटेशन पर!

छत्तीसगढ़ के नक्सल चीफ और एडीजी आर्म्स फोर्स विवेकानंद प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली जा सकते हैं। पता चला है, उन्होंने सेंट्रल डेपुटेशन के लिए अप्लाई किया था। उसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ सरकार से एनओसी मांगा है। 96 बैच के आईपीएस अधिकारी विवेकानंद इससे पहले एसपीजी में प्रतिनियुक्ति पर रह चुके हैं। बहरहाल, प्रश्न यह है कि राज्य सरकार ने डीजीपी अरुणदेव गौतम की पोस्टिंग में चकरी चलाते हुए आठ महीने में समेट दिया है। अगले साल 4 फरवरी को गौतम का दो बरस का टेन्योर खतम हो जाएगा। इसके बाद डीजीपी के प्रबल दावेदारों में विवेकानंद भी होंगे। विवेकानंद पिछले सात साल से नक्सल देख रहे हैं। उनके कार्यकाल में छत्तीसगढ़ से नक्सलियों का खात्मा हुआ है। उन्हें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर्सनली जानते हैं। फिर ऐसे गोल्डन टाईम में क्या उन्हें डेपुटेशन पर जाना चाहिए? एक संभावना यह भी है कि उन्होंने डीजीपी के आदेश निकलने से पहले डेपुटेशन के लिए अप्लाई कर दिया होगा। मगर अब वे क्या सोच रहे, कुछ नहीं कहा जा सकता। उधर, बस्तर आईजी सुंदरराज के लिए भी केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एनओसी मांगा है। बस्तर में 15 जून के बाद बारिश शुरू हो जाएगी। बारिश में नक्सलियों का मूवमेंट कम हो जाता है। इसके बाद सुंदरराज कभी भी दिल्ली रवाना हो जाएंगे।

कॉकरोच पार्टी, युवा नेताओं की मौज

सुप्रीम कोर्ट के कई बड़े असहज करने वाले फैसलों से बीजेपी और उसकी सरकारों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा मगर शीर्ष अदालत से अनजाने में निकले एक शब्द ने भाजपा को बैकफुट पर ला खड़ा किया है। कॉकरोच पार्टी के ऑनलाइन गठन से बीजेपी इसलिए डिफेंसिव है कि केंद्र समेत डेढ़ दर्जन राज्यों में उसकी सरकारें हैं। बाकी कांग्रेस की, तो उसके पास कोई खास बचाने के लिए है नहीं। खैर, इस ऑनलाइन पार्टी का भविष्य क्या होगा, ये वक्त बताएगा। अलबत्ता, बीजेपी और उसके पैरोकारों ने अभिजीत दीपके के आम आदमी पार्टी का सदस्य होने और मुस्लिम प्रधानमंत्री की वकालत वाले उसके ट्वीट पर घेरना शुरू कर दिया है। पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया के साथ सीजेपी के संस्थापक की फोटो सोशल मीडिया में वायरल हो रही है। अब, पते की बात यह है कि बीजेपी संगठन और सरकारों में अब युवाओं की पूछपरख बढ़ जाएगी। वैसे, भी बीजेपी एक कदम आगे चलते हुए 44 साल के नितिन नबीन को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया था। अब केंद्र में मंत्रिमंडल के विस्तार में इसका असर दिखेगा, तो छत्तीसगढ़ समेत दीगर राज्यों के कैबिनेट के फेरबदल में युवा विधायकों के लिए संभावनाएं बढ़ेंगी। सिर्फ बीजेपी ही नहीं, बल्कि दीगर सियासी पार्टियों में युवाओं की अहमियत बढ़ेगी।

ईमानदारी...और एफिशियेंट भी

छत्तीसगढ़ में इस समय कलेक्टरों के साथ सचिवों की पोस्टिंगे ठीकठाक हुई हैं। कलेक्टरों में देखा जाए तो दर्जन भर कलेक्टर अच्छी और साफ-सुथरी छबि वाले हैं। मगर सवाल उठता है सिर्फ ईमानदारी ही काफी है? नहीं। रिजल्ट देने के लिए दक्षता, कार्यकुशलता भी जरूरी है। पब्लिक से संवाद और जनता की समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता भी चाहिए। छत्तीसगढ़ ने अतीत में कई ऐसे नौकरशाहों को देखा है, सरकार जिन्हें एक बार इशारा कर दें, रिजल्ट की गांरटी होती थी। मगर उसके लिए सिस्टम पर पकड़ जरूरी होता है। नए जमाने के अफसरों में दिक्कत यह है कि एक बड़ा तबका आईएएस बनने के बाद खुद को जमीन से दो इंच उपर समझ बैठता है। और, कहीं उनके साथ ईमानदारी का तगगा लग गया, तब तो करेला और नीम चढ़ा। कलेक्टरों की अपनी पहचान नहीं बन पाने के पीछे ये एक बड़ी वजह है। बहरहाल, ये सिंड्रोम सिर्फ कलेक्टरों में नहीं, मंत्रालय के सचिवों में भी यही स्थिति है। कई ईमानदारी आईएएस कई अहम विभाग लेकर बैठे हैं, मगर उनका परफार्मेंस आज तलक किसी को कुछ दिखा नहीं, और न ही बरसों की सर्विस में वे अपना एक काम बता सकते। ब्यूरोक्रेसी और उसके जिम्मेदार अफसरों को मंथन करना चाहिए कि ब्यूरोक्रेसी के इस वायरस का आखिर निदान क्या है।

सुशासन और कलेक्टर

सवाल फिर कलेक्टरों से...राजा जैसी सुविधाओं का उपभोग करने के बाद कलेक्टर अपने दायित्वों में कितना खरे उतर रहे हैं? इस समय स्थिति यह है कि मुट्ठी भर उत्साही कलेक्टरों को छोड़ दें तो ठीकठाक छबि वाले कलेक्टर भी कुर्सी पर चिपके सिर्फ टाईम काट रहे हैं। कोरबा में अजीत बसंत और बेमेतरा में प्रतिष्ठा ममगई की घटना के बाद ये भ्रांति भी दूर हो गई है कि कलेक्टरों को कोई प्रोटेक्शन नहीं है। इस सरकार में अच्छे अफसरों को संरक्षण दिया जा रहा। इसके बाद भी हालत में कोई सुधार नहीं। मिलियन डॉलर का सवाल कि कलेक्टर अगर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहे होते तो सरकार को 45 डिग्री की गर्मी में समाधान शिविर लगाने की आवश्यकता पड़ती क्या? एक तरह से कहें तो समस्या निवारण शिविर कलेक्टरों की अक्षमता को प्रतीक है। जाहिर है, कलेक्टर अगर अपनी नाक के नीचे बैठे एसडीएम, तहसीलदार को महीने में एक बार बुलाकर रिव्यू कर लेते तो पब्लिक कलेक्टर से लेकर सरकार तक को वाह-वाह कर उठती।

कलेक्टरों की चार केटेगरी

छत्तीसगढ़ में इस समय चार तरह के कलेक्टर हैं। एक ऑनेस्ट, डेसिंग और रिजल्ट देने वाले। यद्यपि, कलेक्टरों का ये नस्ल इस समय विलुप्ति की ओर अग्रसर है। मुश्किल से होंगे चार-पांच। दूसरा केटेगरी...ईमानदार मगर काम से देहचोरी करने वाले। इस दूसरे केटेगरी वाले का पूरा ध्यान अपनी छबि और कुर्सी बचाने पर टिका होता है। बीच-बीच में डीएमएफ का हिस्सा आ जाए तो रख लो। बाकी फुल डिफेंसिव। तीसरे केटेगरी की तादात ज्यादा है। उसकी नजर काम पर कम, डीएमएफ पर ज्यादा रहती है। आईएएस बनने के बाद ये जीवन में बड़ा आसामी बनने का लक्ष्य लेकर चले थे, वे सही ट्रेक पर, वंदे भारत एक्सप्रेस की गति से दौड़ रहे हैं। अब चौथा केटेगरी...यह मजबूरी का नाम महात्मा गांधी वाला है। क्योंकि, आईएएस हैं, तो कम-से-कम एक जिला तो उन्हें देना ही पड़ेगा। इनमें वे कलेक्टर भी शामिल हैं, जिन्हें आमतौर पर जाति-वर्ग के तराजू पर तौलकर जिलों में भेजा जाता है...ये कितने दिन जिले में रहेंगे, किसी को नहीं पता।

घटना पुरानी मगर मौजूं

बात 2011 के किसी महीने की होगी। बिलासपुर के जूदेव समर्थक युवा नेता का थाने में पुलिस वालों से विवाद हो गया था। उस समय एक तेज-तर्रार आईपीएस बिलासपुर के कप्तान थे। वे घटना से बहुत नाराज हुए...उन्होंने युवा नेता के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दिया। बीजेपी के दिग्गत नेता दिलीप सिंह जूदेव को जब यह पता चला तो दिल्ली से बिलासपुर पहुंच गए। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने सिस्टम के खिलाफ फायर खोल दिया। बोले...बिलासपुर में प्रशासनिक आतंकवाद चल रहा है। जूदेव के पास उस समय कोई पद बड़ा नहीं था। सिर्फ सांसद थे। मगर सियासी कद बड़ा था। उनके प्रशासनिक आतंकवाद के शाब्दिक प्रहार से रमन सरकार हिल गई थी। जूदेव की नाराजगी दूर करने उच्च स्तर पर मंत्रणा हुई। उस समय के क्षेत्रीय संगठन मंत्री सौदान सिंह से विमर्श किया गया। फिर सरकार ने सिंगल आर्डर निकाल पुलिस कप्तान को बदल दिया था।

कैडर पर कैंची

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद यह पहली दफा हुआ कि इस बार स्टेट को एक भी आईपीएस नहीं मिला, आईएएस में भी कटौती हो गई है। इस साल सिर्फ दो ही मिलने वाले हैं। जबकि, 2003 के बाद से आईएएस, आईपीएस की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी। जाहिर है, 2002 तक इक्का-दुक्का अफसर मिलते थे, मगर उसके बाद हर बैच में पांच-छह होते ही थे। मगर बताते हैं, अब छत्तीसगढ़ का कोटा फुल हो गया है। यही हाल बाकी राज्यों का भी है। तभी आईएएस की वैकेंसी अब 250 से कम होकर 200 पर आ गई है। आईपीएस में नक्सल स्टेट होने का फायदा मिला। मगर अब नक्सलिज्म भी समाप्त हो गया है। इसलिए, रिक्वायरमेंट का ये आधार पर भी अब खतम हो गया। कुल मिलाकर भारत सरकार आईएएस, आईपीएस की संख्या पर अब लगाम लगाना चाह रहा है।

हफ्ते का कोट

"गुण और गुनाह दोनों की कीमत होती है, अंतर सिर्फ इतना...गुण की कीमत मिलती है और गुनाह की कीमत चुकानी पड़ती है" और "हैसियत आसमान जैसी होनी चाहिए, क्योंकि जमीन कितनी भी महंगी क्यों न हो, लोग उसे खरीद ही लेते हैं।"

अंत में दो सवाल आपसे?

  • 1. इन चर्चाओं में कितनी सच्चाई है...बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव मंत्री और उनकी जगह तोखन साहू प्रदेश अध्यक्ष बनेंगे?
  • 2. बस्तर आईजी बनने के लिए आईपीएस अफसरों की उत्सुकता क्यों बढ़ गई है?

रविवार, 24 मई 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: सिंगल पावर सेंटर!



 तरकश, 24 मई 2026

संजय के. दीक्षित

सिंगल पावर सेंटर!

अगले महीने दिल्ली में छत्तीसगढ़ समेत उन पांच राज्य सरकारों की समीक्षा शुरू होनी है, जहां नवंबर 2023 में विधानसभा चुनाव हुए थे। रिव्यू के बाद ही मंत्रिमंडल में सर्जरी का खाका तैयार किया जाएगा। वैसे खबर ये आ रही कि पार्टी नेतृत्व अब राज्यों में दो डिप्टी सीएम का कंसेप्ट खतम करने पर विचार कर रहा है। शीर्ष नेताओं के संज्ञान में ये बात है कि जिन राज्यों में दो-दो डिप्टी सीएम हैं, वहां पावर सेंटर तीन हिस्सों में बंट गया है। और शायद यही वजह है कि असम और पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने डिप्टी सीएम नहीं बनाया। उससे पहले बिहार में इसलिए दो उप मुख्यमंत्री बनाए गए, क्योंकि वहां गठबंधन की सरकार है। वैसे सियासी पंडितों का मानना है, जिन राज्यों में डिप्टी सीएम हैं, वहां मुख्यमंत्री का औरा प्रभावित हुआ है। कुछ महीने पहले की बात है...यूपी में योगी आदित्यनाथ जैसे हाई प्रोफाइल मुख्यमंत्री होने के बाद भी वहां डिप्टी सीएम मौर्य ने सरकार के कामकाज पर सार्वजनिक तौर पर बयानबाजी शुरू कर दी थी। कुल मिलाकर राज्यों के मुख्यमंत्री भी चाहेंगे कि कोई डिप्टी सीएम न रहे। ताकि सिंगल पावर सेंटर रहे। अब देखना है, छत्तीसगढ़ के संदर्भ में बीजेपी क्या फैसला लेती है...डिप्टी सीएम का कंसेप्ट यहां भी लागू है।

हमाम में...हर-हर गंगे

छत्तीसगढ़ में एक महिला का मामला सामने आया है, उसके बाद नेताओं से लेकर नौकरशाहों तक की हालत खराब है। उधर फोटो देखकर लोग खूब आनंद प्राप्त कर रहे हैं...फेसबुक पर फोटो को जूम कर देखा जा रहा...कौन कितना करीब था। असल में, महिला को एनजीओ संचालिका से हाई प्रोफाइल बनाने में बड़े लोगों की बड़ी भूमिका रही। उसके एनजीओ को कॉरपोरेट से फंड दिलाने में कुछ आईएएस अधिकारियों ने लिमिट से बाहर जाकर मदद की। मांसल देह के भूखे नौकरशाहों और नेताओं ने ये भी देखने की कोशिश नहीं की...उसका बैकग्राउंड क्या है। अब बड़े लोगों को खौफ खाए जा रहा...अगर पर्दा उठ गया तो क्या होगा! जाहिर है, पिछले एक दशक में छत्तीसगढ़ में विषकन्याओं का प्रकोप तेजी से बढ़ा है। कोविड के बाद तो और ज्यादा। एनजीओ या बड़ी आईटी कंपनियों की रिप्रेजेंटेटिव की आड़ में ये विषकन्याएं अफसरों और नेताओं को अपने जाल में फंसा करोड़ों में खेल रही हैं। कलेक्टर, एसपी समेत कुछ अधिकारियों के बारे में इंटेलिजेंस एजेंसियों के पास पुख्ता सूचना है। कुछ कलेक्टरों ने तो गर्दा उड़ा दिया है। मध्यप्रदेश जैसे हनीट्रेप कांड छत्तीसगढ़ में हो जाए, इससे पहले सिस्टम को अलर्ट हो जाना चाहिए।

सीएम के पास होम?

उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा के बारे में चर्चाएं बड़ी गर्म हैं कि संगठन में उन्हें बड़ा ब्रेक मिलने वाला है। उनके करीबी नेता भी तस्दीक कर रहे कि नितिन नबीन की टीम में भाई साब का कुछ अच्छा हो सकता है। हालांकि, लोगों के बीच स्वाभाविक सवाल ये भी है कि डिप्टी सीएम का पद छोड़ विजय शर्मा दिल्ली क्यों जाएंगे? तो इसका जवाब इस रुप में दिया जा रहा कि छत्तीसगढ़ में रहकर वे मंत्री से उपर नहीं जा पाएंगे मगर दिल्ली से कभी भी वे बड़े पद पर आ सकते हैं। उनके पास उम्र भी काफी हैं। बहरहाल, विजय शर्मा अगर दिल्ली गए तो फिर गृह विभाग लगता है मुख्यमंत्री के पास आ जाएगा। दरअसल, देश के अधिकांश राज्यों में मुख्यमंत्रियों ने गृह विभाग को अपने पास रखा है। यूपी, बिहार में तो पहले से रहा, अब मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल भी इस सूची में शामिल हो गया है। सीएम के पास होम आने से होगा ये कि जीएडी और गृह दोनों मुख्यमंत्री के पास हो जाएंगे। वैसे पुलिस में राजपत्रित अधिकारी से लेकर ऑल इंडिया सर्विस याने आईपीएस के मैटर मुख्यमंत्री के अधीन होते हैं मगर उसमें गृह मंत्री का अनुमोदन अवश्य लगता है। गृह मंत्री की चीड़िया बिठाने के बाद ही नोटशीट मुख्यमंत्री के पास जाती है। यद्यपि, रमन सिंह और भूपेश बघेल के दौर में कई बार सरकार फैसला ले लेती थी, उसके बाद गृह मंत्री से अनुमोदन लिया जाता था। कई बार तो पोस्टिंग आदेश निकलने के बाद गृह मंत्रियों को अफसरों के ट्रांसफर का पता चलता था। लेकिन, विजय शर्मा काफी तेज-तर्रार गृह मंत्री हैं। हालांकि, तेज तो बीजेपी सरकार के फर्स्ट होम मिनिस्टर बृजमोहन अग्रवाल भी थे। मगर डेढ़ साल के भीतर उनकी गृह से विदाई हो गई थी। खैर, विजय शर्मा इतने मजबूत हो गए हैं कि कम-से-कम इस टर्म में उनका विभाग बदलना संभव नहीं। उनका विभाग उसी केस में चेंज होगा, अगर वे दिल्ली जाएं।

नए पीसीसीएफ

छत्तीसगढ़ में नए हेड ऑफ फॉरेस्ट की नियुक्ति का काउंट डाउन प्रारंभ हो गया है। श्रीनिवास राव 31 मई को वन विभाग के शीर्ष पद से रिटायर होंगे। उनकी जगह कौन लेगा, इसको लेकर लोगों में काफी जिज्ञासा है। विदित है पीसीसीएफ अरुण पाण्डेय हेड ऑफ फॉरेस्ट के प्रबल दावेदार हैं। अरुण के बाद ओपी यादव भी हैं। मगर श्रीनिवास राव के एक्सटेंशन की अटकलों को भी लोग हल्के में नहीं ले रहे। जाहिर है, श्रीनिवास राव की क्षमता और पहुंच पर प्रश्नचिन्ह खड़ा नहीं किया जा सकता। उधर, अरुण पाण्डेय भी कमजोर नहीं हैं। अरुण इस समय पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ के साथ-साथ बजट और पईसा-कौड़ी वाला विभाग डेवलपमेंट संभाल रहे हैं। देश के किसी भी राज्य में अब तक किसी पीसीसीएफ को इतना बड़ा पोर्टफोलियो नहीं मिला है। इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि सरकार में अरुण पाण्डेय का कैसा प्रभाव है। बहरहाल, 30 और 31 मई को सरकारी अवकाश है। लिहाजा, जो भी होना होगा 29 मई को दोपहर तक सरकार को ऐलान करना होगा। सरकार अगर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची तो हो सकता है वन विभाग में प्रभारी मुखिया की नियुक्ति हो जाए...जिसकी संभावना काफी क्षीण है।

दो और पुलिस कमिश्नर?

रायपुर के बाद बिलासपुर और दुर्ग में भी पुलिस कमिश्नरेट बनेगा। गृह मंत्री विजय शर्मा ने इसका ऐलान किया है। यद्यपि इस तरह के नीतिगत फैसले सरकार लेती है और घोषणा भी उसी स्तर पर होती हैं। मगर हो सकता है, गृह मंत्री जी की उपर में बात हो गई होगी। अलबत्ता, प्रश्न यह है कि क्या रायपुर कंप्लीट कमिश्नरेट बन पाया? गृह मंत्री के पुराने बंगले में कमिश्नर बैठ रहे। कमिश्नरेट को एक पैसे का फंड नहीं मिला। आसपास के जिलों से उधार में फोर्स आई है। बिलासपुर और दुर्ग में पुलिस कमिश्नरेट बन जाए, इससे अच्छी बात कुछ हो नहीं सकती...ये वक्त की जरूरत भी है। मगर इससे पहले सेटअप और इंफ्रास्ट्रक्चर जुटाने का प्रयास करना चाहिए। वरना, कहीं से ईंट, कहीं का रोड़ा वाला पुलिस कमिश्नरेट बनाने से वो रिजल्ट नहीं मिलेगा, जो दीगर राज्यों में दिखता है। सिस्टम को पहले तय करना होगा कि पुलिस और सुरक्षा उसकी प्राथमिकता में किस स्थान पर है।

चेयरमैन के फैसले, जी का जंजाल

राजस्व बोर्ड के चेयरमैन रहे राधाकृष्णन द्वारा अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर लिए गए फैसले बोर्ड को अब भारी पड़ रहा है। उनके करीब तीन दर्जन आदेशों को बिलासपुर हाई कोर्ट ने फिर से रिव्यू कि लिए रेवेन्यू बोर्ड को भेज दिया है। बता दें, आईएएस राधाकृष्णन ने चेयरमैन रहते निरंकुश होकर ऐसे आदेश पारित करने लगे थे कि जिलों के कलेक्टरों में हाहाकार मच गया था। सीएम रमन सिंह तक जब शिकायत पहुंची तो उन्होंने राधाकृष्णन को हटाकर वहां डीएस मिश्रा को बिठाया। राधाकृष्णन ने जमीनों और जमीनों की रजिस्ट्री के मामलों में बड़े औद्योगिक समूहों को उपकृत करते हुए सरकार को करोड़ों का नुकसान पहुंचाया।

क्योंकि, वे आईएएस थे

चर्चा चूकि पूर्व आईएएस राधाकृष्णन की तो फिर पुराना प्रसंग स्मरण हो आया। राधाकृष्णन जब माध्यमिक शिक्षा मंडल के चेयरमैन थे, तो उन्होंने बोर्ड के एकाउंट में रखे साढ़े आठ करोड़ रुपए अपने पर्सनल एकाउंट में ट्रांसफर करा लिया था। कायदे से किसी भी वित्तीय लेन देन पर चेयरमैन और सिकेट्री दोनों के हस्ताक्षर होने चाहिए। मगर उस समय के सिकेट्री आईएफएस अनिल राय अवकाश पर थे, उस दौरान राधाकृष्णन ने बैंक मैनेजर पर दबाव डाल बच्चों की फीस का पैसा डकार गए। बाद में इसकी जांच भी हुई। बाद में आए चेयरमैन केडीपी राव ने कार्रवाई करने जीएडी को लेटर लिखा। इस पर विभागीय जांच हुई। मगर जांच के बाद फाइल दबा दी गई। क्यों? इसलिए कि वे आईएएस अफसर थे। करीब 15 साल पहले का ये वाकया है। उस समय का साढ़े आठ करोड़ आज 25 करोड़ के बराबर हो गया होगा। फिर ब्याज की बात करें तो रकम और भी ज्यादा। मगर वाह रे सिस्टम...किसी ऑफिस का के कर्मचारी से अगर घोखे में कोई फायनेंसियल चूक हो जाए तो ब्याज समेत उसकी रिकवरी निकाल दी जाती है, पेंशन रुक जाती है। मगर राधाकृष्णन सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए की डकैती कर चले गए...और पेंशन वगैरह सब ले रहे हैं...कोई कार्रवाई नहीं हुई। क्योंकि, वे आईएएस अफसर थे। और कार्रवाई करने वाले भी आईएएस। फिर भाई के खिलाफ भाई एक्शन कैसे लेगा। इसलिए पी. जॉय उम्मेन, सुनिल कुमार, विवेक ढांड, अजय सिंह, आरपी मंडल और अमिताभ जैन जैसे मुख्य सचिवों ने आंखें बंद कर ली।

एसपी ट्रांसफर जून में?

पुलिस अधीक्षकों के ट्रांसफर अब शायद 10 जून के बाद ही होंगे। वो इसलिए कि मई और जून का प्रथम सप्ताह नक्सल दृष्टि से काफी संवेदनशील माना जाता है। बस्तर से भले ही नक्सलियों का खात्मा हो गया मगर फोर्स अभी भी चौकस है। सतर्क इसलिए कि सरकार के दावे पर सवाल खड़े करने कभी भी कोई घटना को अंजाम दिया जा सकता है। इसलिए, जून फर्स्ट वीक के बाद ही एसपी के तबादले होंगे। अब प्रश्न उठेगा एसपी के तबादले से बस्तर से क्या संबंध? असल में, बस्तर के कई एसपी लंबे समय से वहां पोस्टेड हैं। उनमें से अधिकांश को मैदानी एरिया में लाकर उन्हें अच्छे जिले का इनाम दिया जाएगा। सिर्फ एसपी ही नहीं, एसडीओपी, सीएसपी और एडिशनल एसपी भी लंबे समय से वहां पोस्टिंग काट रहे हैं। सरकार उन्हें भी अब वहां से शिफ्ट करेगी। लिहाजा, पुलिस में बड़े स्तर पर तबादले अगले महीने होंगे।

तीन झंडी, चार नेता और...

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस हफ्ते छत्तीसगढ़ दौरे में डॉयल 112 की 400 गाड़ियों को हरी झंडी दिखा जिलों में रवाना किया। 400 गाड़ियां...याने बड़ा इवेंट। गृह या पुलिस विभाग की चूक कि झंडी दिखाने वाले नेता थे चार, मगर झंडी थी तीन। अमित शाह के सामने जब ट्रे में झंडी आई तो उन्होंने एक उठा लिया। सीएम विष्णुदेव साय ने एक झंडी उठाकर अमित शाह के पीछे खड़े गृह मंत्री विजय शर्मा को दे दिया। अब झंडी बची एक और नेता दो। सीएम और विधानसभा अध्यक्ष डॉ0 रमन सिंह। इस सिचएशन से सीएम थोड़ा ठिठके...तब तक अमित शाह विजय शर्मा की तरफ पीछे मुड़े और झंडी रमन सिंह को देने इशारा किया। विजय ने आज्ञाकारी शिष्य की तरह तुरंत झंडी रमन सिंह के हाथ में सौंप दी। पांच से सात सेकेंड के इस पूरे एपिसोड में अमित शाह का गजब का शार्पनेस दिखा। पलक झपकते ही माजरा समझ उन्होंने सिचुएशन को हैंडिल कर लिया। इस पांच सेकेंड के दृश्य में सबसे टचिंग था...अमित शाह द्वारा रमन सिंह को दिया गया सम्मान।

सीएम बनने की शुभकामनाएं

पीसीसी अध्यक्ष पद को लेकर छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेताओं में खींचतान कम होने का नाम नहीं ले रही है। हाल की बात है, टीएस सिंहदेव ने अध्यक्ष बनने की इच्छा प्रगट की तो पीसीसी चीफ दीपक बैज का गुबार सामने आ गया। दीपक बोले, बाबा बड़े नेता हैं, तमिलनाडु, त्रिपुरा के प्रभारी रह चुके हैं, इतने बड़े नेता को केंद्र की राजनीति में जाना चाहिए। इसके बाद ठहाके लगाते हुए बाबा का मोबाइल पर किसी से बातचीत करते एक वीडियो वायरल हुआ, उसमें वे कहते सुनाई दे रहे...हमने तो दीपक भाई को खूब आगे बढ़ने, मुख्यमंत्री बनने की शुभकामनाएं दे दी है। अब दीपक बैज को सीएम बनने की शुभकामनाएं भूपेश बघेल को कैसी लगी होगी, ये नहीं पता। मगर ये सही है कि कांग्रेस के सियासत में नए समीकरण बन रहे हैं...शतरंज के बिसात पर नए दांव चले जा रहे हैं। पीसीसी चीफ दीपक बैज और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आज जिला युवक कांग्रेस अध्यक्षों का इंटरव्यू लेने वाले हैं तो चरणदास महंत और टीएस सिंहदेव इससे अलग कोरबा में मछुआरा सम्मेलन मेें शिरकत करेंगे। उधर, अध्यक्ष पद के युवा दावेदार उमेश पटेल और देवेंद्र यादव के खिलाफ पार्टी नेतृत्व को चिठ्ठी-पत्तरी भेजने का काम भी प्रारंभ हो गया है। क्योंकि, देवेंद्र ने सूबे में दौरे तेज कर दिए हैं। जाहिर है, आने वाले समय में कांग्रेस की गुटीय लड़ाई और तेज होगी। वो इसलिए कि इन सभी नेताओं की दिल्ली में गहरी पैठ है और ये सभी चाहेंगे कि सामने वाले को मौका न मिले।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या ये सही है कि मुख्यमंत्री को छोड़ सारे मंत्रियों का पहले इस्तीफा लिया जाएगा, उसके बाद मंत्रिमंडल का पुनर्गठन होगा?

2. किस आईएएस अधिकारी के खिलाफ मुख्य सचिव ने 15 करोड़ रुपए के घोटाले में जांच का आदेश दिया है?

रविवार, 17 मई 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: डीजीपी, डंडी और आइडिया



तरकश, 17 मई 2026

संजय के. दीक्षित

डीजीपी, डंडी और आइडिया

गृह विभाग ने अरुणदेव गौतम के पदनाम से प्रभारी का टेका हटाते हुए उन्हें पूर्णकालिक पुलिस प्रमुख नियुक्त कर दिया। अरुणदेव 14 महीने प्रभारी रहे और अब आठ महीने पूर्णकालिक डीजीपी रहेंगे। दोनों को मिला दें तो 22 महीने का डीजीपी का कार्यकाल कम नहीं होता। मगर ये भी सही है कि प्रभारवाद के दौरान 14 महीने संशय की स्थिति रही, उससे पोलिसिंग किसी-न-किसी रूप में प्रभावित हुई। और अब पूर्णकालिक आदेश में गृह विभाग ने दिमाग दौड़ाते हुए जिस चतुराई से डीजीपी का आदेश निकाला, उससे गौतम समझ नहीं पा रहे होंगे कि वे खुश होएं या...। गौतम की नियुक्ति अगर आज 16 मई की डेट से होती तो दो साल के हिसाब से 15 मई 2028 तक उनका कार्यकाल रहता। मगर 14 महीने बैक डेट याने 5 फरवरी 2025 से आदेश निकाला गया, इससे 4 फरवरी 2027 को उनका पीरियड खतम हो जाएगा। अर्थात सिस्टम ने उनके टेन्योर में 14 महीने की डंडी मार दी। इससे गौतम कितने उत्साह से काम करेंगे? और उससे पुलिस विभाग का क्या नफा-नुकसान होगा, ये अलग बात। मिलियन डॉलर का सवाल है...चाणक्य बृद्धि के किस अफसर ने बैक डेट वाला यह रास्ता निकाला...इस लाइन पर तो किसी ने सोचा ही नहीं था। इससे यूपीएससी और सुप्रीम कोर्ट भी खुश और सरकार भी उलझन मुक्त।

नए डीजीपी की कवायद

आईपीएस अरुणदेव गौतम के आदेश में स्पष्ट तौर पर दो साल के कार्यकाल का उल्लेख नहीं किया गया है। मगर सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइन के अनुसार डीजीपी का मिनिमम कार्यकाल दो बरस होना चाहिए। इस दृष्टि से 4 फरवरी 2027 को उनका दो साल हो जाएगा। इसके बाद डिपेंड करेगा कि सिस्टम और डीजीपी के बीच कितना कंफर्टनेस है। वैसे अरुणदेव गौतम पक्के ठाकुर हैं, उनके लिए लिमिट से ज्यादा लचीलापन मुमकिन नहीं होगा। अगर ऐसा नहीं होता तो फिर लास्ट मई में यूपीएससी से पैनल आने के बाद अभी तक आदेश लटका नहीं रहता। इसलिए ऐसा प्रतीत हो रहा कि इस साल नवंबर से नए डीजीपी चयन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। जाहिर है, यूपीएससी को तीन महीने पहले डीजीपी के पेनल के लिए प्रपोजल भेजना होता है।

अगले डीजीपी!

डीजीपी अरुणदेव गौतम का कार्यकाल 4 फरवरी 2027 को पूरा हो जाएगा। उसके बाद सरकार चाहे तो उन्हें जुलाई 2027 में रिटायरमेंट तक कंटीन्यू कर सकती है, जिसकी संभावनाएं काफी क्षीण हैं। बहरहाल, अरुणदेव के बाद जीपी सिंह ने कहीं करिश्माई ढंग से वापसी कर ली तो ठीक, वरना एडीजी प्रदीप गुप्ता, विवेकानंद और अमित कुमार अगले डीजीपी के प्रबल दावेदार होंगे। हालांकि, इस साल नवंबर में नए डीजीपी के लिए यूपीएससी को पेनल बनाने प्रस्ताव भेजा जाएगा, उसमें हिमांशु गुप्ता का नाम फिर शामिल होगा। हिमांशु के रिटायरमेंट में टाईम भी काफी बचा है। उनके अलावे एसआरपी कल्लूरी भी होंगे। यद्यपि, यूपीएससी जिन तीन नामों की अनुशंसा करेगा, उनमें से ही कोई अगला डीजीपी बनेगा। लेकिन, मजबूत दावेदारी की बात करें तो प्रदीप, विवेकानंद और अमित के नाम सबसे उपर होंगे।

बीजेपी, बस और चेतावनी

रायपुर में अरसा बाद बीजेपी कार्यसमिति की बैठक हुई। बैठक में संगठन महामंत्री शिवप्रकाश ने तल्ख अंदाज में मंत्रियों और नेताओं को चेता दिया। उन्होंने घाटी में चढ़ रहे बस की उस सवारी और ड्राईवर का दिलचस्प किस्सा सुनाया। शिवप्रकाश बोले...बस का बाया हिस्सा जब खाई की तरफ आता था तो सवारी अपनी सीट छोड़ दायी तरफ की सीट पर जा बैठता था और जब दाया हिस्सा खाई की तरफ तो वह बायी तरफ की सीट पर बैठ जाता था। यात्री के इस तरह बार-बार सीट बदलता देख ड्राईवर से रहा नहीं गया। उसने यात्री से कहा, तुम्हारे सीेट बदलने से कोई फायदा नहीं। बस जब खाई में गिरेगी तो तुम अकेले नहीं, बल्कि बस में बैठे सभी यात्री उपर जाएंगे। शिवप्रकाश बोले...इसी तरह जब सरकार को कोई नुकसान होगा, तो चाहे मंत्री हो या नेता, सभी सड़क पर आ जाएंगे। इसलिए आप ये मत समझिए कि पार्टी या सरकार में कुछ इधर-उधर हो रहा तो उसे देख आंख मूद लें या यह सोच निकल लें कि इससे मुझे क्या फर्क पड़ता है...असल में, सबको इसकी कीमत चुकानी होगी। संगठन मंत्री ने ये भी नसीहत दी...संगठन और सरकार एक सायकिल के दो पहिये नहीं बल्कि एक सेतु हैं। इस सेतु से पार्टी के कार्यकर्ताओं और आम जनता को फायदा मिलना चाहिए। कुल मिलाकर कार्यसमिति की बैठक मंत्रियों और नेताओं को आईना दिखाने वाली रही।

सरकार बड़ी या विभाग?

छत्तीसगढ़ के करीब एक लाख आंगनबाड़ी और मिनी आंगनबाड़ी केंद्रों में रेडी टू ईट सप्लाई करने का काम महिला स्व सहायता समूहों द्वारा किया जाता था। मगर 2018 में आई कांग्रेस सरकार ने इसे स्व सहायता समूहों के हाथ से लेकर ठेकेदारों को दे दिया था। महिला बाल विकास विभाग ने इसके लिए बीज विकास निगम को एजेंसी बनाया। अब खेती-किसानी का काम करने वाले बीज विकास निगम को रेडी टू ईट सप्लाई का काम क्यों दिया गया, इस पर फिर कभी। अभी ये इश्यू है कि बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में कहा था कि सरकार बनते ही रेडी टू ईट का काम महिला स्व सहायता समूहों को सुपूर्द कर दिया जाएगा। मगर ढाई साल हो गया, अभी तक सिर्फ एक जिला ने इसे लागू कर पाया। मंत्री ओपी चौधरी ने महिला बाल विकास विभाग से लड़-भिड़कर 10 जुलाई 2025 को अपने रायगढ़ जिले में इसे शुरू करा लिया। इस मौके पर सरकार ने भी कहा था कि जल्द ही पूरे प्रदेश में रेडी टू ईट का काम स्व-सहायता समूहों को दे दिया जाएगा। मगर, इसके बाद दस महीना निकल गया...महिला बाल विकास के लोगों के कान पर जूं नहीं रेंगा। पता चला है, बीजेपी के दिल्ली में बैठे लोगों ने इसे नोटिस किया है। पार्टी के केंद्रीय नेताओं का मानना है, जिस योजना में सरकार के खजाने का कोई पैसा नहीं लगना, उसमें देरी नहीं करनी चाहिए। जाहिर है, छत्तीसगढ़ में 10 लाख से अधिक महिला स्व-सहायता समूह हैं, उसमें 30 लाख से अधिक महिलाएं हैं। रेडी टू ईट सप्लाई का काम मिलने से लाखों महिलाएं स्वालंबी बन रही थीं। मगर ठेकेदारी सिस्टम में महिला बाल विकास विभाग के लोगों की पांचों उंगलियां ऐसा घी में है कि घोषणा पत्र और स्व-सहायता समूह सब गौण हो गए हैं।

मंत्रियों की मेजर सर्जरी

बीजेपी अगले महीने राज्य सरकारों के कामकाज का रिव्यू करने जा रही है। इसमें छत्तीसगढ़ समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव नवंबर 2023 में हुए थे, उनका नंबर सबसे उपर है। जाहिर है, सरकार के ढाई बरस पूरे होने पर मंत्रिमंडल का पुनर्गठन भी होना है। कुछ मंत्रियों की छंटनी भी होगी। हालांकि, कैबिनेट में कौन भीतर आएगा और कौन बाहर...इस बारे में कुछ कहना व्यर्थ है। इसलिए कि बीजेपी के इस दौर में एक कान को पता नहीं होता कि दूसरे कान को क्या हो रहा है। इसलिए, पब्लिक डोमेन में जितने नाम चल रहे हैं, वे सिर्फ और सिर्फ अटकलबाजियां हैं। हां ये अवश्य है...इस बार कुछ बड़ा और हटकर होगा। क्योंकि, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन छत्तीसगढ़ के प्र्रभारी रहे हैं। उनके पास सभी मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड है। फिर बीजेपी के लोग भी मान रहे कि 2029 की जंग के लिए मंत्रिमंडल में बिना मेजर सर्जरी किए स्थिति अनुकूल नहीं होगी।

एसपी ट्रांसफर

सात जिलों के कलेक्टरों के बदले जाने के बाद पुलिस अधीक्षकों के ट्रांसफर की चर्चांएं बड़ी तेज है। पब्लिक डोमेन में भविष्यवाणियां की जा रही...फलां यहां तो वो वहां जा रहा। मगर सरकारी सूत्रों से पता चला है अभी हफ्ते भर कुछ नहीं होगा। 17 मई को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तीन दिन के दौरे पर छत्तीसगढ़ आ रहे हैं। उनके दिल्ली लौटने के बाद एसपी ट्रांसफर पर विचार किया जाएगा। कुल मिलाकर जो संकेत मिल रहे, हफ्ता भर से पहले पुलिस अधीक्षकों के तबादले पर कोई हलचल नहीं होना है।

हफ्ते की सबसे बड़ी खबर

इस हफ्ते की सबसे बड़ी खबर बीजेपी कोर ग्रुप में बदलाव रहा। कोर ग्रुप में सालों से जमे ऐसे-ऐसे दिग्गजों को हटाया गया है, जिसका फैसला पार्टी की लोकल बॉडी के लिए नामुमकिन था। निश्चित तौर पर इसमें दिल्ली की भूमिका रही होगी। केंद्रीय शीर्ष नेतृत्व ने इसके जरिये बड़ा संदेश दिया है। 12 मंत्रियों में से सिर्फ तीन को मौका मिला। डिप्टी सीएम अरुण साव एवं विजय शर्मा। और मंत्री ओपी चौधरी। अमर अग्रवाल का नाम इसलिए चौंकाने वाला रहा कि पुराने नेताओं की विदाई हो रही, ऐसे में उन्हें कोर गु्रप में शामिल करने के पीछे यकीनन कोई सियासी निहितार्थ होंगे। कोर ग्रुप के पुनर्गठन से यह साफ हो गया है कि मंत्रिमंडल की सर्जरी भी कुछ इसी अंदाज में किया जाएगा।

हफ्ते का कोट

जिसके पास तुम्हारे लिए वक्त नहीं, उसको कभी परेशान मत करना, क्योंकि वो अपनी दुनिया में व्यस्त है, और उस दुनिया में तुम्हारी कोई जरूरत नहीं। तथा सुख में उस व्यक्ति को निमंत्रण देना, जो दुख में बिना बुलाए आ जाते हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या ये सही है कि जिन मंत्रियों पर छंटनी की आशंका ज्यादा है, उनके विभागों में करप्शन और बढ़ गया है?

2. क्या आईएएस ट्रांसफर की एक और लिस्ट आ सकती है?

रविवार, 10 मई 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: महतारी कलेक्टर



तरकश, 10 मई 2026

संजय के. दीक्षित

महतारी कलेक्टर

प्रशासनिक सर्जरी में सरकार ने ब्यूरोक्रेसी की महतारियों का सम्मान बढ़ाया है। बुधवार को सात जिलों में नए कलेक्टर पोस्ट किया गया, उनमें पांच महिलाएं हैं। इन पांच को मिलाकर छत्तीसगढ़ में अब 10 महतारी कलेक्टर हो गई है। राज्य बनने के बाद यह पहला मौका है, जब कलेक्टरी में महिलाओं की संख्या 10 टच कर गया है। इससे पहले रमन सिंह की तीसरी पारी में एक समय महिला कलेक्टरों की संख्या छह हुई थीं। हालांकि, राज्य निर्माण के 13-14 साल तक महिला आईएएस की संख्या काफी कम थीं, इसलिए इक्का-दुक्का महिला कलेक्टर होती थीं। इस समय ब्यूरोक्रेसी की जो माताएं कलेक्टर हैं, उनमें प्रतिष्ठा ममगई बेमेतरा, नुपूर राशि पन्ना कोंडागांव, नम्रता जैन नारायणपुर, रेना जमीन सूरजपुर, चंदन त्रिपाठी बलरामपुर, दिव्या मिश्रा बालोद, तुलिका प्रजापति मानपुर मोहला, रोक्तिमा यादव कोरिया, संतन देवी जांगड़े एमसीबी और पदमिनी भोई सारंगढ़ शामिल हैं।

लोकल अफसरों को वेटेज

वैसे तो ऑल इंडिया सर्विस का लेवल चिपकने के बाद जाति, धर्म और क्षेत्र गौण हो जाता है। फिर भी यह पहली बार हुआ...राज्य सरकार ने बीते बुधवार को सात जिलों में नया कलेक्टर पोस्ट किया, उनमें से चार लोकल अधिकारियों को अवसर दिया। चारों अफसरों की जड़े छत्तीसगढ़ में है और वे राज्य प्रशासनिक सेवा से प्रमोट होकर आईएएस बने हैं। इसके साथ लोकल याने प्रमोटी आईएएस कलेक्टर की संख्या बढ़कर 12 हो गई है। आरआर वालों को जरूर इससे झटका लगा होगा। मगर स्टेट वाले आईएएस खुश हैं...पिछली सरकार में भी प्रमोटी आईएएस को इतनी संख्या में कलेक्टर नहीं बनाया गया।

एक और लिस्ट

42 आईएएस अधिकारियों की ट्रांसफर लिस्ट देखने से प्रतीत होता है कि उसे बनाने में काफी दिमाग दौड़ाया गया होगा। फेरबदल में प्रशासनिक एंगल के साथ अगले विधानसभा चुनाव को देखते पॉलिटिकिल तड़का भी लगा। खैर, कलेक्टरों की एक छोटी लिस्ट और आएगी। कांकेर कलेक्टर नीलेश श्रीरसागर डेपुटेशन पर दिल्ली जा रहे हैं। राज्य सरकार ने उन्हें एनओसी दे दिया है। सो, इस महीने के अंत या अगले महीने के फर्स्ट वीक तक उन्हें केंद्र में पोस्टिंग मिल जाएगी। लिहाजा, उनकी जगह कांकेर में किसी आईएएस को पोस्ट किया जाएगा। जाहिर है, कांकेर बड़ा जिला है, इसलिए कम-से-कम दो-एक जिले की कलेक्टरी किए हुए आईएएस को ही प्राथमिकता मिलेगी। याने एक छोटी लिस्ट और निकलेगी।

राप्रसे ट्रांसफर पर ब्रेक?

राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों की ट्रांसफर लिस्ट काफी दिनों से प्रतीक्षित है। बताते हैं, मई में एक लिस्ट निकलनी थी। मगर उससे पहले बिचौलियों ने वसूली शुरू कर दी। राप्रसे अधिकारियों को यह कहकर भ्रमित किया गया कि लिस्ट तैयार हो रही है, किसी भी दिन निकल जाएगी। इसकी सूचना सरकार को मिल गई। लिहाजा, सरकार ने फिलहाल इस पर ब्रेक लगा दिया है। वैसे जानकारों का कहना है कि राप्रसे की कोई लिस्ट बनी नहीं है। तोरी करने के लिए भ्रम फैलाया गया। बहरहाल, अब जो ट्रांसफर होंगे, काफी ठोक बजाकर किए जाएंगे। मगर कब होंगे? सरकार ही बता पाएगी।

बेबस मिनिस्टर

सिस्टम में कुछ ऐसे खटराल लोग बैठ गए हैं, जिनसे मई मंत्री भी विवश महसूस कर रहे हैं। बात परिवहन विभाग की है। इसमें हर छह महीने में इंस्पेक्टरों का रोटेशन किया जाता है। एक बार मार्च मेें और दूसरा सितंबर में। ये सालों से चला आ रहा है। इस बार परिवहन मंत्री केदार कश्यप ने करीब 100 इंस्पेक्टरों के रोटेशन को अनुमोदित करके नोटशीट नीचे भेजा। परिवहन सचिव ने भी हर बार की तरह उसे अनुमोदित कर दिया। मगर किन्हीं अज्ञात शक्तियों ने आदेश निकलने से रोक दिया। मई शुरू हो गया है, अभी कोई बताने वाला नहीं है कि रोटेशन आदेश क्यों रोका गया, किसने रोका? और उस रोटेशन का क्या होगा? जो राज्य बनने के समय से एक प्रचलित नियम बन गया था। केदार कश्यप के फॉरेस्ट में भी यही हाल है। प्रोबेशनर एसडीओ ट्रेनिंग के बाद महीने भर से पोस्टिंग की आस में बैठे हैं, मगर उनके आदेश का कोई अता-पता नहीं है।

दो महिला मंत्री?

अगले महीने के लास्ट तक विष्णुदेव साय मंत्रिमंडल का विस्तार होना लगभग तय समझा जा रहा है। इसमें कई मंत्रियों के विभाग बदलेंगे। चार मंत्रियों की विदाई होगी...सरगुजा संभाग के दो मंत्रियों के पत्ते कटने की भी खबरें हैं। अलबत्ता, बीजेपी की महिला विधायकों की लाटरी लगने वाली है। मंत्रिमंडल में 15 परसेंट की लिमिट तय होने के बाद से सूबे में चाहे किसी की भी सरकार रही हो, हमेशा एक महिला मंत्री रहीं। मगर अब इसकी संख्या बढ़ाकर कम-से-कम दो किया जाएगा। यदि अच्छा फेस मिले तो तीन भी संभव है। पूर्व मंत्रियों को कैबिनेट में शामिल न करने का कंडिशन अगर हटाया जाएगा तो बस्तर से लता उसेंडी भी एक तगड़ा दावेदार हो सकती हैं। उनसे आदिवासी और महिला, दोनों कोटा कंप्लीट होगा। डिप्टी सीएम विजय शर्मा अगर संगठन में गए तो फिर भावना बोथरा के नाम पर विचार हो सकता है। या हो सकता है बीजेपी किसी और को सामने लाकर चौंका दें।

कांग्रेस में उठापटक

भूपेश बघेल खेमे ने चिर परिचित प्रतिद्वंद्वी सिंहदेव गुट को मात देते हुए विधायक संगीता सिनहा को प्रदेश महिला कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त करा लिया। देर-सबेर संगीता अध्यक्ष भी घोषित हो जाए, तो आश्चर्य नहीं। उधर, खबर है कि कांग्रेस में 15 मई के बाद कुछ बड़ा होने वाला है। नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की भी नियुक्ति हो सकती है। चूकि अगले विधानसभा चुनाव में अब दो साल बच गया है। सो, इस समय जो कांग्रेस का अध्यक्ष बनेगा, उसी की अगुआई में चुनाव लड़ा जाएगा। उधर, खबर है कि लगातार हार के बाद कांग्रेस अब जमीनी नेताओं को पार्टी में ज्यादा वेटेज देना चाहती है। भूपेश को हो सकता है, केंद्र में कोई बड़ी जिम्मेदारी मिल जाए। केंद्र में वे अगर ताकतवर होंगे तो जाहिर है छत्तीसगढ़ में भी कोई उनका अपना आदमी ही मजबूत होगा।

अफसरशाही में जातिवाद

जाति का वायरस अब तक सियासत में ही घुसा था, मगर अब छत्तीसगढ़ की अफसरशाही भी अछूती नहीं रही। जिलों में कलेक्टर, एससपी भी एसडीएम, एसडीओपी और थानेदारों की पोस्टिंग में इस सिंड्रोम के शिकार दिख रहे हैं। स्थिति यह हो चली है कि सूबे में कर्मचारियों, अधिकारियों की योग्यता की पैमाना अब कास्ट हो गया है। कोई खास वर्ग का मुलाजिम है तो गंभीर श्रेणी की गल्ती करने पर भी कार्रवाई नहीं होगी। राज्य की प्रगति की दृष्टि से यह सही नहीं है। सरकारी दफ्तर जात-पात और धर्म से मुक्त होना चाहिए। छत्तीसगढ़ के सिस्टम में करप्शन और मनमौजीपन बढ़ने के पीछे इस वायरस की बड़ी भूमिका है।

कौवा कान ले गया

छत्तीसगढ़ के कर्मचारी किसी प्रायवेट समिति, संगठन के सदस्य नहीं हो सकते। छत्तीसगढ़ सरकार के इस आदेश पर पिछले दिनों इतना कोहराम मचा कि जीएडी को अपना आदेश वापिस लेना पड़ा। जबकि, जिस संघ के कंधे पर बंदूक रख सरकार को निशाने पर लेने की कोशिशें हुई, उसमें फैक्ट यह है कि विष्णुदेव साय सरकार के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद जीएडी ने एक आदेश निकालकर सरकारी कर्मचारियों को संघ के कार्यक्रमों में जाने के लिए फ्री कर दिया था। सरकारी सिस्टम को समझने वालों को पता है कि जब तक कोई आदेश लिखित में निरस्त नहीं होता, तब तक वह स्टैंड रहता है। संघ में जाने वाला 2014 का आदेश निरस्त नहीं हुआ, इसलिए वह लागू है। मगर कौवा कान ले गया...सिस्टम पर हमले करने में संघ के मौसमी कार्यकर्ता पिल पड़े। सोशल मीडिया में इस पर लंबे-लंबे पोस्ट लिखे गए। जाहिर है, संघ के ओरिजिनल लोग कभी दिखावा नहीं करते कि वे संघ वाले हैं। एमपी के दिनों में दिग्विजय सिंह सरकार ने भी सिर्फ आदेश निकाला था...कभी सख्ती नहीं बरती। उस दौरान भी कर्मचारी, अधिकारी संघ के कार्यक्रमों में जाते रहे। बहरहाल, अंदरखाने की बात यह है कि सरकारी मुलाजिमों मेें अनुशासन का वातावरण बनाने उपर के अफसरों ने एक सामान्य आदेश निकालने कहा, उसे तिल का ताड़ बना दिया गया। इससे नुकसान सिस्टम का हुआ। आदेश वापस लेने की कड़ी में एक संख्या का इजाफा हो गया। अब आप पूछेंगे, मौसमी कार्यकर्ता? ये वो नस्ल है जो अपनी सुविधा से वामपंथी, कांग्रेसी और संघी बन जाता है। अभी कई कार्यक्रमों में ये मौसमी कार्यकर्ता बिना बुलाए भी पहुंच जा रहे।

ट्रांसफर पर पेंच?

एक विभाग में ट्रांसफर के लिए एक हजार से अधिक की लिस्ट सरकार को अनुमोदन के लिए भेजा गया। असल में, ढाई सौ से अधिक नामों की सिफारिश संगठन के एक बड़े नेता ने की है। इसके अलावा बड़ी संख्या में विधायक, सांसद और दीगर नेताओं के लोग भी हैं। मंत्री ने अपना पल्ला झाड़ते हुए लिस्ट को उपर भेज दिया। ट्रांसफर पर बैन के दौरान इतनी बड़ी लिस्ट देख सरकार में बैठे लोगों का सिर चकरा गया। फिलहाल, उपर से इस पर ब्रेक लग गया है।

मंत्री के चेले का होटल

सरगुजा से ताल्लुकात रखने वाले एक नेताजी पिछली कांग्रेस सरकार में स्कूल शिक्षा मंत्री थे। उनके साथ चेला के तौर पर रहने वाला एक युवक ने इतना कुछ अर्जित कर लिया कि मंदिर रायपुर में बड़ा होटल बनवा रहा है। जब वह पीए, स्टाफ जैसे किसी पद पर नहीं था, तो ये हाल है। नए स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव को अलर्ट रहना चाहिए। स्कूल शिक्षा भले ही चमक-धमक वाला विभाग नहीं माना जाता, मगर मैनपावर सर्वाधिक है। इस विभाग के जेडी, डीईओ तो बड़ा पद है...उनके ऑफिस के बाबू मोटे आसामी बन गए हैं। आखिर कौन ऐसा खेला होगा, जो स्कूल शिक्षा में नहीं होता। डीईओ द्वारा शिक्षकों के निलंबन और बहाली के मिला जुला खेल से खुद स्कूल शिक्षा मंत्री भी चिंतित हैं। जाहिर है, जब तक डीईओ, बीईओ ठीक नहीं होंगे, तब तक स्कूल शिक्षा को बदनामी से नहीं बचाया जा सकेगा।

हॉफ की डीपीसी

गुरूवार को मंत्रालय में हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स की डीसीपी आयोजित थी। मगर पता चला ऐन वक्त पर बैठक टल गई। बताते हैं, डीपीसी में एसीएस फॉरेस्ट ऋचा शर्मा मेंबर थीं। मगर एक दिन पहले ही उनका विभाग बदल गया। उसके बाद उन्होंने डीपीसी में शामिल होने से मना कर दिया। कमेटी में अगर बिना नाम पदेन मेंबर लिखा गया होता तो नए एसीएस फॉरेस्ट मनोज पिंगुआ डीपीसी में बैठ सकते थे। इसलिए मामला गड़बड़ा गया। हालांकि, सीएस, पीसीसीएफ थे, तो डीपीसी की जा सकती थी। बहरहाल, डीपीसी टलने के बाद अब भांति-भांति की अटकलों का दौर शुरू हो गया है...किसी ताकतवर शक्ति की बातें भी।

हफ्ते का कोट

दूघ, दही, छाछ, मक्खन, घी सब एक वंश के, फिर भी सबकी कीमत अलग-अलग...क्योंकि श्रेष्ठता जन्म से नहीं, अपने कर्म, कला और गुणों से प्राप्त होती है और कुछ समस्याएं हमारे पास है, सोचकर सदा दुखी होने से अच्छा है, यह सोचकर खुश होना कि दुनिया में बहुत समस्याएं हैं, जो हमारे पास नहीं है।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. प्रशासनिक मुखिया ने कलेक्टरों के व्हाट्सएप ग्रुप में किस कलेक्टर के बारे में लिखा...बिना इजाजत इधर-उधर घूमते रहते हैं?

2. क्या ये सही है कि ट्रांसफर के लिए अब सिर्फ रोकड़ा काफी नहीं, एप्रोच भी चाहिए...दोनों होंगे तभी कामयाबी मिलेगी?