रविवार, 29 मार्च 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: ब्रांडेड शराब, मुख्य सचिव और खेला



 तरकश, 29 मार्च 2026

संजय के. दीक्षित

ब्रांडेड शराब, मुख्य सचिव और खेला

रमन सरकार 2.0 के दौरान शराब माफियाओं को झटका देते हुए गवर्नमेंट द्वारा शराब बेचने की नीति बनाई गई थी, उसमें शराब खरीदने-बेचने वाली स्टेट मार्केटिंग कंपनी में चीफ सिकरेट्री को पदेन चेयरमैन बनाया गया था। इसलिए, ताकि कोई गड़बड़ी न हो। बावजूद इसके 3200 करोड़ का घोटाला हो गया। हालांकि, मुख्य सचिव बनते के बाद विकास शील ने स्टेट मार्केटिंग कंपनी की पहली बैठक में ही शराब में ’वन टू का फोर’ के खेल को बंद करने की कवायद शुरू कर दी। उससे पहले शराब कंपनियां दुकानों में प्रतिद्वंद्वी कंपनियों की बजाए अपना ब्रांड रखवा देती थी। इससे लोग पसंदीदा ब्रांड के लिए भटकते रहते थे। स्टेट कंपनी के अफसरों से गठजोड़ कर इस खेल को अंजाम दिया जाता था। मगर आश्चर्य यह है कि बीजेपी की सरकार आने के बाद भी पिछले दो साल से ये खेल बदस्तूर जारी था। बहरहाल, सीएस ने अब ’मनपसंद’ ऐप्प चालू करवा दिया है। अब ऐप्प पर जाकर देखा जा सकता है कि किस शॉप में उनके पसंद का ब्रांड उपलब्ध है और कहां नहीं। दूसरा, अब शराब खरीदने के लिए यूपीआई से पेमेंट करना होगा। यानी नो कैश ट्रांजेक्शन। दरअसल, ईडी इसी खेल की जांच कर रही है...कई अफसर सलाखों के पीछे हैं। खेल था...सरकारी शराब के पैरेलेल प्रायवेट तौर पर शराब बेचकर करोड़ों अंदर करना। यूपीआई से पेमेंट होने पर अब गोलमाल संभव नहीं हो पाएगा। अलबत्ता, सीएस के इस एक्शन से कई शराब कारोबारियों को झटका लगा है। कसमसा तो आबकारी विभाग वाले भी रहे हैं और कुछ बीजेपी के नेता भी, क्योंकि उनके पेट पर चोट पहुंच रही।

सरकार संज्ञान ले

बात निकली चीफ सिकरेट्री के अहम संस्थाओं में चेयरमैन बनाने की तो सीजीएमएससी भी उनमें शामिल था। बता दें, स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के दौर में सीजीएमएससी का गठन किया था और उसमें मुख्य सचिव को पदेन चेयरमैन बनाया गया था। ताकि, नीचे के मुलाजिमों में भय बना रहे। मगर पिछली सरकार में इसे उलट सरगुजा से विधायक डॉ0 प्रीतम राम को ढाई करोड़ लोगों की जान की रक्षा करने वाले सीजीएमएससी का चेयरमैन बना दिया गया। चलिये प्रीतम राम तो पेशे से चिकित्सक थे, उन्हें दवा, मशीन के बारे में कुछ तो जानकारियां रही होगी। बीजेपी शासनकाल में दीपक महस्के को इस निगम का अध्यक्ष बनाया गया है। जाहिर है, बीजेपी का आईटी सेल देखने वाले महस्के को मेडिकल लाइन का एबीसीडी का ज्ञान नहीं होगा। और जब डॉक्टर के चेयरमैन होने के बाद सीजीएमएससी में 400 करोड़ का रीएजेंट घोटाला हो गया...आधा दर्जन अफसर और सप्लायर जेल में हैं और आधा दर्जन कभी भी भीतर जा सकते हैं तो फिर इस समय क्या होगा, भगवान ही मालिक है।

वीआईपी एमडी

ऐसा जलवा तो निगम, बोर्डों में पोस्टेड आईएएस एमडी भी नहीं काटते होंगे, जैसा बिजली कंपनी के एक प्रबंध निदेशक काट रहे हैं। उनके काफिले में एक पायलट गाड़ी चलती है। उसमें बिजली कंपनी का खाकी वर्दी वाला सिक्यूरिटी अफसर चलता है। सिक्यूरिटी अफसर को इतना अपटूडेट रखा जाता है कि सड़क पर लोग भ्रम खा जाए कि छत्तीसगढ़ आर्म्स फोर्स का कोई रंगरूट होगा। एमडी इतने शौकीन हैं कि उन्हें कलम भी सरकारी पैसे का चाहिए...वो भी हल्का-फुल्का नहीं...हाल में उन्होंने 5000 का पेन खरीदवाया है। रही बात, पायलेटिंग की तो छत्तीसगढ़ में चीफ सिकरेट्री और डीजीपी की भी पायलेटिंग नहीं होती। सूबे में अब तक किसी डीजीपी की अगर पायलेटिंग हुई है तो वे थे विश्वरंजन। विश्वरंजन का पिछले हफ्ते ही स्वर्गवास हुआ है। दिल्ली आईबी से लौटे विश्वरंजन का रसूख भी ऐसा था कि उनका एक बार चलता था। मगर इंजीनियर से प्रमोट होकर एमडी बने अफसर अगर पायलेटिंग करवा रहा तो समझा जा सकता है छत्तीसगढ़ में क्या हो रहा है।

सीएस, डीजीपी का प्रोटोकॉल

बात चीफ सिकरेट्री और डीजीपी की पायलेटिंग की आई तो ये दोनों कार्यपालिका और सिक्योरिटी के सुप्रीम पद हैं। इनके सिकरेट्री प्रोटोकॉल में भी पायलेटिंग और फॉलोगार्ड आता है। सीएस को वाय और डीजीपी को जेड केटेगरी की सुरक्षा होनी चाहिए। मगर फोकस में आने से बचने के लिए छत्तीसगढ़ में सीएस और डीजीपी इसका इस्तेमाल नहीं करते। मगर कायदे से दोनों को अपने पद के औरा का खयाल रखना चाहिए। ठीक है, सरकारी मुलाजिम लोक सेवक होता है मगर पद के अनुरूप उसका तामझाम और सिक्योरिटी होनी चाहिए। वरना, कलेक्टर और सीएस तथा एसपी और डीजीपी में क्या फर्क रहेगा।

100 अटेंडेंस

छत्तीसगढ़ के मंत्रालय में एक जनवरी से बायोमेट्रिक अटेंडेंस लागू किया गया, उस टाईम एकमात्र अफसर टाईम से आ रहे थे। याने दिसंबर का फिगर सिर्फ एक रहा। इसके बाद जनवरी में 10 बजे तक मंत्रालय पहुंचने वालों की संख्या 18 हुई और फरवरी में 100 । मार्च में लगभग दुगुना होने का अंदेशा हैं। जीएडी का प्रयास है कि इसके बाद इसे पब्लिक के लिए ओपन कर दिया जाए। याने कोई भी सरकार के वेबसाइट पर जाकर देख सकेगा कि कितने अफसर कितने बजे तक ऑफिस आते हैं और शाम को कितने बजे जाते हैं। हालांकि, इसमें अफसरों का नाम नहीं रहेगा, संख्या रहेगी।

ई-ऑफिस के फायदे?

अब इसे ई-ऑफिस में फंसना कहें कि टेक्नालॉजी का फायदा, विभिन्न राज्यों में चुनाव कराने गए कई आईएएस अफसर रायपुर में न रहने के बाद भी ई-ऑफिस पर फाइलें क्लियर कर रहे। यदि ऐसा रहा तो सरकार को लिंक अफसर बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अफसरों के अवकाश में रहने के बाद भी महत्वपूर्ण फाइलों के लिए लिंक अफसर नियुक्त किए जाते हैं। चीफ सिकरेट्री को इसकी रिपोर्ट मांगनी चाहिए कि चुनाव ड्यूटी में रहने के बाद भी कितने अफसरों ने ई-ऑफिस से सरकारी काम भी करते रहे...उन्हें सम्मानित करना चाहिए।

पोस्टिंग में सियासत?

प्रदेश के दूसरे बड़े शहर मंत्रिपरिषद में प्रतिनिधित्व के मामले में दुर्भाग्यशाली तो है ही अफसरों की पोस्टिंग के मामले में इस शहर के साथ दोयम व्यवहार किया जा रहा है। बिलासपुर नगर निगम में अजीत जोगी सरकार के समय से डायरेक्ट आईएएस कमिश्नर रहे। कभी-कभार राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर आयुक्त बने भी तो वे पारफर्मेंस वाले रहे। मगर अभी जो पोस्टिंग हुई है, उसके बाद स्थिति यह है कि एक सड़क को पीडब्लूडी ने ठेका दे दिया और उसी ठेकेदार को नगर निगम ने भी ठेका दे डाला। निगम के अफसरों का खेल ये था कि पीडब्लूडी सड़क बनवाएं और निगम से भी उसका बिल पास कर करोड़ों रुपए अंदर कर लिया जाए। मगर उससे पहले खेल का भंडाफोड़ हो गया। हो सकता है, इसमें दोष निगम कमिश्नर का न हो। काफी लो प्रोफाइल के वे सीधे-साधे अफसर हैं। तभी तो स्मार्ट सिटी के मद से 16 करोड़ में बनवाए गए मल्टीलेवल पार्किंग में एक आटो डील वाले ने कब्जा कर लिया है। पार्किंग के एक फ्लोर पर डीलर ने 500 मोटरसायकिलें लाकर खड़ी कर दी। वो भी निगम मुख्यालय के ठीक सामने स्थित पार्किंग में। इससे समझा जा सकता है, नगर निगम में क्या चल रहा होगा। बहरहाल, बात पोस्टिंग में सियासत की तो जिस एसडीएम को एसीबी छापे के बाद हटा कर बस्तर भेजा गया, आश्चर्यजनक तौर से उसकी पोस्टिंग फिर बिलासपुर कर दी गई। सिस्टम को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा तो कम-से-कम बीजेपी को देखना चाहिए। अभी तो जांजगीर गड्ढा हुआ है, कोई भरोसा नहीं कि 2028 के इलेक्शन में बिलासपुर जिला भी बड़ा गड्ढा बन जाए। कलेक्टर संजय अग्रवाल को टीम अच्छी नहीं मिलेगी तो वे अकेले क्या कर लेंगे। वैसे भी किसी जमाने में अविभाजित बिलासपुर जिले की 19 की 19 सीटें कांग्रेस की झोली में जाती थी।

मूंछ और चोटी वाले अफसर

नाम जरूर हायर है मगर इस विभाग में आमतौर पर हायर प्रोफाइल वाले अफसर कभी रहे नहीं और कोई जाना भी नहीं चाहता। बात हायर एजुकेशन की हो रही है। सरकार ने इस विभाग में अभिनंदन स्टाईल वाले मूंछेले अफसर और चोटी वाले आईएएस को बिठाया है। और इस समय विभाग का हाल ये है कि सालों से अटके सलेक्शन, पोस्टिंग और सस्पेंशन धड़ाधड़ हो रहे हैं। इससे पहले कभी कालेजों के प्रोफेसरों को निलंबित होते नहीं देखा गया। लेकिन पिछले छह महीने में कई प्रिंसिपल और असिस्टेंट प्रोफेसर निलंबित हो गए हैं। ऐसा तो नहीं...मूंछ और चोटी रखने से एक्स्ट्रा एनर्जी मिल जाती है?

कमजोर कलेक्टर-1

छत्तीसगढ़ ने कभी उदय वर्मा, प्रशांत मेहता, शैलेंद्र सिंह, नजीब जंग, सुनिल कुमार, अजय नाथ, देवराज बिरदी, विवेक ढांड, एमके राउत जैसे दमदार कलेक्टरों को देखा है। मगर अब आलम यह है कि 33 में से 25 से अधिक 'पठरू' कलेक्टर हैं। दरअसल, कलेक्टरों में दमदारी दिख नहीं रही। छोटे-मोटे लॉ एंड आर्डर होने पर वे मुख्य सचिव और सीएम सचिवालय की ओर देखने लगते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद के कलेक्टरों की बात करें, तो सुबोध सिंह रायपुर और बिलासपुर में किसी से मिलने से कतराते नहीं थे। दलित समाज के एक बड़े धर्मगुरू अक्सर उनके चेंबर में बैठे पाए जाते थे। इन्हीं संपर्को के जरिये उन्होंने गिरौदपुरी और बिल्हा की कई हिंसक घटनाओं पर काबू पाने में कामयाबी पाई। तो रायपुर में एक व्यापारी समुदाय के युवक की मौत के बाद मामला काफी बिगड़ गया था। भगत सिंह चौक पर लाश लेकर समाज के लोग बैठ गए थे। सुबोध सिंह बिना घबराये मौके पर पहुंच गए थे। अब तो हालत यह है कि कलेक्टर की तो दूर की बात एसपी, आईजी बिना फॉलोगार्ड लेकर मौके पर नहीं पहुंचते। कलेक्टर तो कोई घटना होती है तो बंगले में दुबक जाते हैं। बलौदा बाजार में जैसे ही हिंसा शुरू हुई, कलेक्टर शहर से बाहर चले गए थे।

कमजोर कलेक्टर-2

सरकार और जीएडी सिकेट्री रजत कुमार को कलेक्टरों की कमजोरी का कोई सौल्यूशन निकालना चाहिए। रजत खुद भी दमदार रहे हैं...कोरबा के लोगों ने देखा भी है। दरअसल, दिक्कत वहां से शुरू हुई, जब राज्य बनने के बाद आईएएस अधिकारियों को बिना एडीएम बनाए कलेक्टर बनाया जाने लगा। एक तो इस समय छत्तीसगढ़ में सबसे कम समय सिर्फ छह साल में कलेक्टरी मिल जा रही। उसमें एसडीएम की एक पोस्टिंग, उसके बाद जिला पंचायत सीईओ या निगम कमिश्नर और उसके बाद फिर सीधे जिले में डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट। इससे प्रशासन की बारीकियों से वे अनभिज्ञ रह जा रहे। चीफ सिकेट्री को पता होगा, मध्यप्रदेश के दौर में कलेक्टर बनने से पहले एडीएम बनना अनिवार्य था, फिर उस समय डीआरडीए का सीईओ, तब जाकर कलेक्टरी मिलती थी। एडीएम कलेक्टर और एसडीएम के बीच की कड़ी होते थे। हर धरना, प्रदर्शनों पर एडीएम को भेजा जाता था तो ज्ञापन भी एडीएम लेते थे। उससे कलेक्टरों को जिले के लिए प्लानिंग करने का टाईम मिलता था और एडीएम को एडमिनिस्ट्रेशन का अनुभव। एडीएम बनने का मतलब था कि पक्ष-विपक्ष दोनों ही दलों के नेताओं से बढ़ियां कनेक्शन बन जाना। कलेक्टर या उसके उपर की पोस्टिंगों में ये चीजें बडे काम आती थी। मगर अब तो ये हाल है कि अधिकांश कलेक्टरों को नेताओं या आम आदमी से कोई वास्ता नहीं रह गया है। सरकारें बदलती है, जनदर्शन लगाने का आदेश जारी करती हैं और फिर वह कूडे़दान में चला जाता है।

कलेक्टर-एसपी भाई-भाई

सिकरेट्री टू सीएम बनने के बाद तत्कालीन जीएडी सिकेट्री मुकेश बंसल ने फर्स्ट व्हाट्सएप कलेक्टर-एसपी के पारफर्मेंस और ट्यूनिंग को लेकर किया था। मगर वो बेमतलब निकला। अधिकांश जिलों के कलेक्टर-एसपी एक सूत्रीय एजेंडा में डटे हुए हैं। रही बात जनदर्शन की तो ऐसे जिले उंगलियों पर गिने जाने वाले होंगे। वैसे, वर्तमान दौर में जनदर्शन का कोई औचित्य नहीं भी नहीं रह गया है। इससे पब्लिक में नाराजगी और बढ़ती है। रमन सिंह के दौर तक अफसरशाही पटरी पर थी। मगर अब सब डिरेल्ड है। आखिर, पटवारी, आरआई और तहसीलदार, एसडीएम से जब न्याय नहीं मिलता तो आम आदमी कलेक्टर के पास पहुंचता है और कलेक्टर साब लोग समस्या ठीक से सुने बिना....नीचे रीडर को मार्क कर देते हैं। रीडर आवेदन को फिर उन्हीं खटराल तहसीलदार, एसडीएम के पास भेज देते हैं जांच के लिए, जहां से आदमी पहले ही आजिज आ चुका होता है। यही हाल कप्तान साब लोगों का है। एसपी से थाना या सीएसपी की शिकायत लेकर जाओ तो कलेक्टर जैसे ही नीचे मार्क कर देते हैं। ऐसे में आम आदमी को टाईम और पैसा खर्च होने के अलावा कुछ हासिल होता नहीं। फिर चुनाव आता है तो लोग सबक सिखाते हैं। जैसे कांग्रेस गवर्नमेंट में हुआ। उस समय विडबंना ये थी कि मुख्यमंत्री तेज-तर्रार थे मगर किन्हीं कारणों से प्रशासनिक सिस्टम निरंकुश हो गया था। उसकी कीमत कांग्रेस सरकार को चुकानी पड़ी।

सीएस का तीर?

कैबिनेट की बैठकों में अफसरों की बढ़ती भीड़ पर सख्ती दिखाते हुए चीफ सिकरेट्री ने इस पर अंकुश लगाने सचिवों को कड़ा पत्र लिखा है। भीड़ बढ़ने की एक बड़ी वजह सचिवों का सब्जेक्ट की स्टडी न होना भी है। अधिकांश सिकेट्री विभागों के कामकाज पर पकड़ नहीं रखते। इसलिए अपने डायरेक्टर, एमडी को तो बुलाते ही हैं, विभाग के सौ ताले की एक चाबी या श्रमजीवी मुलाजिम को कैबिनेट की बैठकों में बुला लेते हैं, ताकि चर्चा के दौरान कहीं गाडी अटकी तो तुरंत उनसे पूछ जवाब दे सकें। बहरहाल, सीएस के लेटर रुपी तीर ने कई और लोगों को जख्मी किया है, जो बिना काम कैबिनेट में घूस आते थे।

गॉड गिफ्टेड

विधानसभा अध्यक्ष डॉ0 रमन सिंह कोयंबटूर में इलाज कर रायपुर लौट आए हैं, और अब बिल्कुल स्वस्थ हैं। इसमें खबर ये है कि उनके आए लगभग पखवाड़ा गुजर चुका है, बावजूद उनसे मिल कुशल क्षेम पूछने वालों का तांता लगा है। कह सकते हैं...मुख्यमंत्री पद से हटे सात साल गुजर जाने के बाद भी उनकी लोकप्रियता का ग्राफ कम नहीं हुआ तो इसमें कुछ उपर वाले का भी हाथ है। 2018 में विधानसभा चुनाव बुरी कदर हारने के बाद लोगों ने अफसरशाही पर ठीकरा फोड़ा...मंत्रियों की अहंकार को कोसा...मगर रमन को एक शब्द नहीं। इसका निहितार्थ यह कि सूबे की राजनीति में रमन का रुतबा कायम है। ऐसा सम्मान छत्तीसगढ़ के किसी और नेता को नहीं मिला।

अंत में दो सवाल आपसे

1. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की पत्नियां आजकल बिलासपुर की पोस्टिंग से क्यों घबरा रही हैं?

2. खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ के 33 में से किन पांच कलेक्टरों को लंगोट का ढीला बताया गया है?

शनिवार, 21 मार्च 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: बजट 9500...खर्च 3000 करोड़



 तरकश, 22 मार्च 2026

संजय के. दीक्षित

बजट 9500...खर्च 3000 करोड़

छत्तीसगढ़ का सिस्टम कितना फास्ट वर्क कर रहा है, इसका जीता-जागता नमूना है पीडब्लूडी। ढाई साल गुजर जाने के बाद भी यह विभाग जहां से चला था, वहीं पर खड़ा है। जाहिर है, किसी भी सूबे में पीडब्लूडी सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण विभाग इसलिए माना जाता है कि गरीब हो या अमीर, सड़कों से सबको वास्ता पड़ता है। अगर किसी विभाग का काम धरातल पर बिना चश्मा लगाए दिखता है तो वह पीडब्लूडी ही है। इसीलिए, इस विभाग का बजट सबसे अधिक रखा जाता है। छत्तीसगढ़ में इस विभाग को 2025-26 में सबसे अधिक 9500 करोड़ का बजट मिला था। लेकिन, इसमें से खर्च कितना हुआ? जवाब सुन आप अपना माथा पकड़ लेंगे। मात्र 3000 करोड़। जबकि, मार्च क्लोजिंग में अब सिर्फ सात रोज बच गए हैं। ये भी 3000 करोड़ खर्च तब हुआ, जब वित्त विभाग सभी विभागों को पत्र लिख बजट खर्च करने तगादा किया और मुख्य सचिव विकास शील लगातार डंडा चला रहे थे। छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े बजट वाले इस विभाग की हालत ये है कि मुख्यमंत्री को पीडब्लूडी के रिव्यू में बड़ी तल्खी के साथ कहना पड़ा...पीडब्लूडी का काम कहीं दिखता नही ंतो वहां बैठे सारे लोग सकपका गए थे।

सड़क और दिग्विजय सिंह की हार

2003 के विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह सरकार की करारी हार हुई, उसमें खराब सड़कों की बड़ी भूमिका रही। अजीत जोगी के दौर में छत्तीसगढ़ में इतनी अच्छी सड़कें बन गई थी कि बार्डर पर के रोडों को देख समझ में आ जाता था कि कहां से मध्यप्रदेश की सीमा चालू हो रही है। छत्तीसगढ़ में भी कमोवेश अभी वही हाल है। पीडब्लूडी के अफसरों को कायदे से उल्टा लटका देना चाहिए। इसलिए कि अपने विभागीय मंत्री और सूबे के मुखिया के इलाके की भी उन्हें परवाह नहीं। पीडब्लूडी मिनिस्टर के गृह जिले मुंगेली आपको जाना है तो नांदघाट से जाने पर भगवान राम याद आ जाएंगे। लोगों को 40 किलोमीटर का एक्स्ट्रा चक्कर लगा सरगांव के आगे से पथरिया होकर मुंगेली जाना पड़ रहा है। यही हाल अंबिकापुर से जशपुर जाते समय बतौली से चरईडांड के बीच है। कई जगह पर सड़कों के नाम पर गड्डे पाएंगे आप। कायदे से अब समय भी नहीं बच गया है। अभी टेंडर का प्रॉसेज प्रारंभ भी हुआ तो फायनल होते-होते बरसात आ जाएगा। फिर अक्टूबर के बाद चुनाव में सिर्फ डेढ़ साल बच जाएगा। तब तक सिस्टम के खिलाफ इतना नैरेटिव बन जाएगा कि मोदीजी, अमित शाह और नितिन नबीन के लिए भी मामला पेचिदा हो जाएगा।

अमित शाह का भी खौफ नहीं

बस्तर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का पूरा फोकस है तो राज्य सरकार भी कोई कसर नहीं रख रही। खुद मुख्यमंत्री अभी तक बस्तर के 100 दौरे कर चुके हैं। इसके बाद भी सरकारी एजेंसी की रिपोर्ट है कि बस्तर के तीन जिलों के कलेक्टर, एसपी और डीएफओ कार्टेल बनाकर सड़कों में डंके की चोट पर कमीशन खा रहे हैं। दिल्ली का ठेकेदार परेशान है, क्योंकि, इन तीनों के अलावा एक मंत्रीजी को भी पैसा चाहिए। समझ में नहीं आता कि आईबी और इंटेलिजेंस का इतना बड़ा अमला यहां क्या कर रहा है। बहरहाल, एक कलेक्टर तो जाते ही शुरू...उनका परिवार फूड डिपार्टमेंट के खेल में फंसते-फंसते बचा है...या यों कहें कि बचाया गया है वरना कलेक्टर बिरादरी की बदनामी हो जाती। बहरहाल, सवाल यह भी कि सड़क ठेकेदार इतना पैसा बांट देगा तो फिर क्वालिटी कैसे मेंटेन करेगा? छत्तीसगढ़ का दुर्भाग्य ही कहें कि इतने सारे अफसरों के जेल जाने के बाद भी उन्हें सद्बुद्धि नहीं आ रही। वो भी तब हो रहा, जब सूबे के चीफ सिकरेट्री से लेकर पीएस टू सीएम, डीजीपी, खुफिया चीफ चारों की छबि पर कोई सवाल नहीं उठा सकता।

आईएएस अफसरों का दिल्ली कूच

छत्तीसगढ़ के साथ विडंबना है कि पिछली सरकार में भी अच्छे अफसर दिल्ली भागने लगे थे और इस सरकार में भी आईएएस अधिकारियों को दिल्ली जाने का सिलसिला रुका नहीं है। अभी तक अंबलगन पी, अलरमेल मंगई, प्रियंका शुक्ला, सौरव कुमार, फकीर भाई अय्याज तंबोली, दीपक सोनी, सर्वेश भूरे, नम्रता गांधी, ऋचा प्रकाश चौधरी, हरीश जैसे कई अफसर दिल्ली जा चुके हैं। अमित अग्रवाल, गौरव द्विवेदी, मनिंदर कौर द्विवेदी, अलेक्स पाल मेनन, संगीता पी, नीरज बंसोड़ पहले से प्रतिनियुक्ति पर हैं। 2005 बैच के मुकेश बंसल ने भी सरकार को पत्र लिख एनओसी मांगा है। मुकेश रिजल्ट देने वाले अफसर हैं, उनका फिर दिल्ली जाना सरकार के लिए झटका माना जाएगा। उधर पिछले कई साल से राज्य से बाहर रह रहीं श्रृति सिंह इस समय दिल्ली में रेजिडेंस कमिश्नर हैं, वे भी फिर से डेपुटेशन के लिए एनओसी मांग रही हैं। कांकेर कलेक्टर नीलेश क्षीरसागर ने भी आवेदन लगाया हैं।

सरकार की सख्ती

छत्तीसगढ़ में आईएएस अधिकारियों की संख्या जरूर बढ़ गई है, मगर काम वाले मुठ्ठी भर ही हैं। अभी सीपीआर समेत कई विभागों में सिकेट्री बदलना है, मगर ढंग के आदमी दिख नहीं रहे। सरकार को बाहर गए अफसरों के मामले में सख्ती दिखानी चाहिए। क्योंकि, कई अफसर दिल्ली जाने के बाद लौटना नहीं चाह रहे। रमन सिंह के दौर में बीवीआर सुब्रमणियम को पीएमओ से वापिस बुलाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह तक ने पत्र लिखा था। जबकि, उस समय विरोधी पार्टी की सरकार थी। बार-बार तगादे के बाद मनमोहन सिंह को फिर कहना पड़ा था कि क्या प्रधानमंत्री को इतना भी अधिकार नहीं कि अपने पसंद के किसी अफसर को अपने सचिवालय में रख सकें। तब जाकर सरकार शांत हुई थी। मगर 2014 में जैसे ही केंद्र में बीजेपी की सरकार आई, सुब्रमणियम को बुला लिया गया। जाहिर है, सारे अफसर दिल्ली चले जाएंगे तो फिर छत्तीसगढ़ में काम कौन करेगा। श्रुति सिंह कई साल यूपी में रहीं। फिर वहीं से सीधे छत्तीसगढ़ भवन में पोस्टिंग कराई और अब फिर से डेपुटेशन पर जाना चाह रहीं। ऐसे में, सवाल यह कि अंकित आनंद ने क्या गुनाह किया कि उन्हें रोक लिया गया।

प्रवासी सिकेट्री

छत्तीसगढ़ के कई आईएएस प्रवासी हो गए हैं। उनमें एक नाम वर्तमान सिकेट्री का भी जुड़ गया है। सरकार ने उनके साथ उदारता बरतते हुए दिल्ली में एडिशनल पोस्टिंग दे दी, ताकि उसकी आड़ में उन्हें दिल्ली में मकान मिल जाए। मगर सरकार की यह उदारता उल्टी पड़ गई। सिकेट्री साब को जब से दिल्ली में आवास मिला है, रायपुर में टिक ही नहीं पा रहे। हर तीसरे दिन पता चलता है साब दिल्ली में हैं। यहां विभाग को वॉट लगा हुआ है। छह महीना और यही हाल रहा तो लोगों में त्राहि माम मच जाएगा। क्योंकि, सवाल सेहत से जुड़ा हुआ है।

2005 बैच बदनाम!

दिसंबर 2023 में सरकार बदलने के बाद पोस्टिंग के मामले में आईएएस का 2005 बैच काफी चर्चाओं में रहा। मगर मुकेश बंसल को अगर सरकार ने प्रतिनियुक्ति के लिए हरी झंडी दे दी तो फिर सिचुएशन 180 डिग्री की दिशा में घूम जाएगा। सरकार को नया वित्त और जीएसटी सचिव की तलाश करनी होगी। वैसे भी जीएसटी में सचिव से अधिक कमिश्नर का रोल रहता है और वित्त में पूछपरख के अलावा चवन्नी नहीं मिलता। ऐसा कह सकते हैं...मुकेश जवानी के दिनों में पैसा कमाने की जगह अपने मित्र के लिए वित्त विभाग में हमाली कर रहे हैं। हालांकि, सुबोध सिंह के दिल्ली से आने के बाद अब यह नहीं कहा जा सकता कि पोस्टिंग में असंतुलन हैं। उन्होंने सबको कुछ-न-कुछ दिया है। शहला निगार जूनियर होने के बाद भी एपीसी जैसे पद संभाल रही, जो दीगर राज्यों में एसीएस या पीएस लेवल के अफसर के नीचे किसी को मिलता नहीं। बड़े विभागों की बात करें तो पीडब्लूडी कमलप्रीत सिंह देख रहे तो उर्जा रोहित यादव के पास है। हालांकि, रोहित इस समय ओवरलोडेड हैं। बिजली कंपनियों के चेयरमैन के साथ उनके पास उर्जा, जनसंपर्क और टूरिज्म भी है। रीना बाबा कंगाले फूड जैसे अहम विभाग संभाल रही हैं। अंकित आनंद पौल्यूशन बोर्ड के चेयरमैन के साथ सिकेट्री आवास पर्यावरण और एमडी स्टेट कैपिटल रीजन हैं। कहने का मतलब यह कि मुकेश अगर दिल्ली गए तो 2005 बैच में रजत के पास उद्योग, शंगीता आर के पास आबकारी और एस प्रकाश के पास ट्रांसपोर्ट बच जाएगा। इनमें उद्योग ही एक काम का विभाग है। बाकी ट्रांसपोर्ट और आबकारी में कोई डेवलपमेंट वर्क नहीं होता। सिवाय पेटी और खोखा का हिसाब कर इधर-उधर पहुंचवाने के।

मंत्रालय में बड़ी उठापटक

विधानसभा का बजट सत्र समाप्त हो गया है। इस बार सुशासन तिहार नहीं होगा। ऐसे में अगले हफ्ते प्रशासनिक हलको में बड़ी उठापटक होने के संकेत मिल रहे हैं। मंत्रालय में कई विभागों के सिकेट्री बदलेंगे। स्पेशल सिकेट्री टू सीएम डॉ0 रवि मित्तल के दिल्ली जाने के बाद एक या दो आईएएस अफसर को सीएम सचिवालय में पोस्ट किया जाएगा। जिन सचिवों के दो साल से अधिक हो गए हैं, उनके विभाग बदले जाएंगे। एसीएस मनोज पिंगुआ को गृह विभाग में साढ़े तीन साल हो गया है। सुनने में आ रहा कि वे अब डेपुटेशन पर दिल्ली न जाने पर सोच रहे हैं। अगर वे नहीं गए तो गृह विभाग में भी बदलाव होगा। सरकार चेंज होने के बाद पहली लिस्ट में जिन्हें पोस्टिंग मिली थी, उनमें निहारिका बारिक, कमलप्रीत सिंह, सिद्धार्थ परदेशी, अब्दुल कैसर हक और शम्मी आबिदी शामिल हैं। कमलप्रीत के पास पीडब्लूडी, परदेशी के पास स्कूल शिक्षा, कैसर हक के पीएचई और शम्मी आबिदी महिला और बाल विकास है। हो यह भी सकता है, प्रमुख सचिव बन गए सोनमणि बोरा को फेरबदल में कोई और अहम विभाग दिया जाए। या फिर किसी विभाग का अतिरिक्त प्रभार। पीडब्लूडी में वीरेंद्र सहवाग टाईप किसी फास्ट बैट्समैन को उतारा जा सकता है।

कलेक्टर, एसपी, डीएफओ भी

सरकार का ढाई साल यानी इंटरवल है। अभी जो अफसर पोस्ट होंगे, वे अगले विधानसभा चुनाव तक कार्य करेंगे। इसलिए सरकार इस बार ठोक बजाकर रिजल्ट देने वाले अफसरों को मैदान में उतारेगी। सबसे पहले जनसंपर्क आयुक्त बनाने की चुनौती है। चुनौती इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया के दौर में सरकार की छबि बनाना कठिन टास्क है और फिर अभी जो सीपीआर बनेगा, जाहिर तौर पर वही अगले विधानसभा चुनाव तक रहेगा। इसके लिए आरआर में अवनीश शरण, रजत बंसल,  प्रभात मलिक का नाम चर्चा में हैं। प्रमोटी में जीतेंद्र शुक्ला और संजय अग्रवाल के नाम पर भी विचार किया जा सकता है। इसके साथ कई जिलों के कलेक्टर, एसपी, डीएफओ और जिला पंचायत सीईओ भी चेंज होंगे।

भर्ती बोर्ड में सीनियर आईएएस

कर्मचारी चयन मंडल बनने के बाद व्यापम का अस्तित्व अब समाप्त हो जाएगा। भर्ती बोर्ड के एक्ट के अनुसार व्यापम मंडल में मर्ज हो जाएगा और जो भर्तिया व्यापम में प्रक्रियागत थी, उसे अब कर्मचारी चयन मंडल करेगा। इसमें भी शीघ्र ही नियुक्तियां होंगी। मंडल का चेयरमैन प्रमुख सचिव या उसके उपर का होगा। वो वर्तमान भी हो सकता है या रिटायर्ड भी। इसके अलावे तीन मेंबर होंगे। इसमें ज्वाइंट सिकरेट्री स्केल वाले लोग नियुक्त होंगे। इसमें रिटायर अफसर से लेकर प्रोफेसर या अन्य सर्विसों से रिटायर लोग भी मेंबर बन सकते हैं।

चार बड़े बिल

विधानसभा का बजट सत्र नए कानून बनाने के मामले में बड़ा महत्वपूर्ण रहा। वैसे तो इस बार कई विधेयक पेश्ज्ञ किए गए मगर चार विधेयक छत्तीसगढ़ के लिए मिल का पत्थर साबित होंगे। पहला मुख्यमंत्री के विभाग जीएडी का कर्मचारी चयन बोर्ड और नकल प्रकरण विधेयक। व्यापम को भंग कर कर्मचारी चयन मंडल बनाना सरकार का बड़ा फैसला है। अभी लोग इसे समझ नहीं पा रहे मगर नौकरी में फास्ट भर्तियों के लिए इसे याद किया जाएगा। इसका ड्राफ्ट खुद पीएस टू सीएम सुबोध सिंह ने तैयार किया है। फार्म भरने से लेकर परीक्षा और रिजल्ट के लिए अब युवाओं को भागीरथी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। सब कुछ बेहद फास्ट होगा। वहीं व्यापम से लेकर पीएससी तक घालमेल को लेकर शुरू से बदनाम रहा है। इसी व्यापम में पीएमटी का पर्चा लीक होने की वजह से दो बार परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी। नकल विधेयक कानून के बाद अब परीक्षाओं में गड़बड़ियों पर अंकुश लगेगा। तीसरा विधेयक रहा मंत्री ओपी चौधरी के हाउसिंग बोर्ड को पीडब्लूडी और आरईएस के समकक्ष बनाने का। सरकार ने अब पीडब्लूडी की लेटलतीफी को देखते हाउसिंग बोर्ड को विकल्प के तौर पर पेश कर दिया है। इस विधयेक को लेकर ओपी इतना गंभीर थे कि विधानसभा में पारित होने के 24 घंटे के भीतर नोटिफिकेशन जारी हो गया। और चौथा गृह मंत्री विजय शर्मा का धर्मान्तरण विधेयक। धर्मांतरण को लेकर अब कड़े कानून बनाए गए हैं। निश्चित तौर पर इस बिल के पास होने से धर्मांतरण पर कंट्रोल होगा।

बीजेपी का अनुशासन

भारतीय जनता पार्टी अनुशासन के नाम से जानी जाती है मगर छत्तीसगढ़ में उल्टा हो रहा है। विधानसभा में मंत्रियों को बार-बार आगाह किए जाने के बाद सदन में जाकर हथियार डालने का सिलसिला थमा नहीं। रमन सिंह के दौर में 15 बरस मंत्री रहे मंत्री अगर जवाब देने के लिए पन्ना पलटते रह जाएं तो फिर बीजेपी को सोचने पर मजबूर करेगा। उपर से पार्टी का विधायकों पर भी कंट्रोल नहीं रह गया है। सदन में परफर्मेंस को लेकर विधायकों की बैठक बुलाई गई, उसमें पता चला है, छह-सात विधायक गायब रहे। हो सकता है, दो-एक को कोई अपरिहार्य काम आ गया हो मगर छह-छह, सात-सात एमएलए नदारत हो जाए तो ये पार्टी के अनुशासन पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है।

एसपी हो तो ऐसा

छत्तीसगढ़ के सारे पुलिस अधीक्षक भ्रष्ट और रीढ़विहीन नहीं हैं। एक जिले के कप्तान की पोलिसिंग इतनी तगड़ी है कि खुद पुलिस वाले परेशान हैं। नेताओं को उनसे उल्टे सीधे काम की सिफारिश करने में घबराहट होती हैं। उनका एक वाकया आजकल बड़ी चर्चा में है। रुलिंग पार्टी के एक विधायक जी एसपी से उनके ऑफिस में मिलने गए। उन्होंने जिला बदर वाले क्रिमिनल की वकालत करते हुए कहा, चुनाव में वह 600 से 700 वोट दिलवाता है...उसके यहां पारिवारिक फंक्शन है...वो आएगा तो जरा देख लीजिएगा। एसपी ने उन्हें दो टूक कह दिया...वो यहां आया तो एनकाउंटर हो जाएगा। विधायक जी अब अपनी पीड़ा लोगों को बता रहे हैं। हालांकि, वो यह नहीं समझते कि शातिर क्रिमिनल को पनाह देकर 600 वोट की जगह अपना हजारों वोट खराब कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के वोटर ऐसे जनप्रतिनिधियों को कभी पसंद नहीं करते जो अपराधियों को संरक्षण देते हैं।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. वित्त मंत्री ओपी चौधरी के साथ काम करने के लिए अफसर तत्पर क्यों रहते हैं?

2. कर्मचारी भर्ती बोर्ड का प्रथम चेयरमैन किस आईएएस को बनाया जाएगा?

Chhattisgarh Tarkash 2026: शराब, अफीम और जिस्म का कारोबार

 


तरकश, 15 मार्च 2026

संजय के. दीक्षित

शराब, अफीम और जिस्म का कारोबार

हालांकि, दुर्ग के फार्म हाउस में अफीम कांड के बाद सरकार के निर्देश पर कलेक्टरों ने अपने जिलों के फार्म हाउसों की जांच-पड़ताल शुरू करा दी है। मगर यह भी सही है कि सूबे के फार्म हाउस तमाम धतकरमों के अड्डे बन गए हैं। छत्तीसगढ़ में करीब एक हजार से अधिक फार्म हाउस होंगे। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि अधिकांश फार्म हाउस कृषि के नाम पर सरकार को लगान दे रहे और शराब, ड्रग और जिस्म के धंधे से लाखों, करोड़ों रुपए पीट रहे हैं। नियमानुसार फार्म हाउस के कुल रकबा के 10 परसेंट से अधिक निर्माण नहीं किया जा सकता। मगर शहर से लगे अधिकांश फार्म हाउसों में बड़ी संख्या में कमरे, हॉल, लॉन, स्वीमिंग पुल बना डाले हैं। शादियों की सीजन में शादी बाकी समय जमकर ऐय्याशी होती है। इन अड्डों पर जाने की न पुलिस हिमाकत कर पाती और न कोई सरकारी मुलाजिम। या तो उनका महीना बांध दिया जाता है या फिर किसी पॉलिटिशियन के नाम पर चमका दिया जाता है। जाहिर है, किसी नेता का नाम आ गया तो फिर छत्तीसगढ़ पुलिस की इतनी हिम्मत कहां? बहरहाल, सरकार का इससे राजस्व का बड़ा नुकसान हो रहा। कृषि जमीन के नाम पर लगान दे रहे कौड़ियों में और कमा रहे करोड़ों में।

अफसरों की हालत खराब

दुर्ग और बलरामपुर में अफीम की खेती पकड़े जाने के बाद छत्तीसगढ़ के आईएएस, आईपीएस के हालत खराब हुए जा रहे हैं। खासकर, रायपुर, दुर्ग, बेमेतरा, धमतरी, बिलासपुर, जांजगीर तक आईएएस अधिकारियों के फार्म हाउस हैं। एक कथित तौर पर साफ-सुथरी छबि वाले आईएएस अधिकारी जांजगीर कलेक्टर रहते शिवरीनारायण के पास 40 एकड़ जमीन खरीद डाली। उसे किसी किसान को अधिया में दिया है। अब वो किसान उसमें क्या उपजा रहा...अफसर को चिंता होगी ही। ऐसे न जाने कितने फार्म हाउस नौकरशाहों के हैं। अफीम कांड के बाद अफसर खुद ही जाकर अब अपने फार्म हाउस का मुआयना कर रहे हैं।

धान 20 रुपए, अफीम 50 हजार रुपए किलो?

अफीम का रेट जानकार आप चौंक जाएंगे। पहले ये आपको बता दें कि अफीम के तीन पार्ट होते हैं और तीनों बेशकीमती। अफीम के फल के छिलके से डोडा बनता है, वह 20 हजार रुपए किलो बिकता है। आमतौर पर ट्रक ड्राईवर इसे खाते हैं, इसमें ऐसा नशा होता है, जिसमें खुमारी तो होती है मगर नींद नहीं आती। दूसरा, अफीम के फल को सूखाकर खसखस बनाया जाता है, इसका रेट करीब 2000 रुपए किलो होता है। तीसरा, अफीम के फल में चीरा लगाकर उसका बूंद-बूंद टपकते दूध को एकत्र किया जाता है। इसे सूखाकर अफीम बनाया जाता है। इसकी कीमत करीब 50 हजार रुपए किलो है। और इस अफीम को प्यूरीफाई कर हेरोईन बनता है, जो बाजार में दो करोड़ रुपए किलो बिकता है। बहरहाल, आप अब समझ गए होंगे कि छत्तीसगढ़ को उड़ता पंजाब बनाने की कोशिश क्यों की जा रही है।

बीजेपी नेता पर पहली कार्रवाई

अफीम कांड में सरकार ने पहली बार कड़ा स्टैंड लिया। मुख्यमंत्री और गृह मंत्री दोनों ने दुर्ग पुलिस को फ्री हैंड दिया और बीजेपी नेता को सींखचों के पीछ्रे पहुंचा दिया गया। हालांकि, पुलिस पर प्रेशर कम नहीं था। संगठन से लेकर संघ से पुलिस के पास दनादन फोन आ रहे थे। मगर पुलिस एक न सुनी। अफीम के मसले पर विपक्ष भले ही सरकार को आड़े हाथ ले रहा, मगर बीजेपी नेता की गिरफ्तारी से सरकार ने कैडर को एक बड़ा संदेश दिया है। भाजपा की सेहत के लिए यह इसलिए भी जरूरी था कि कांग्रेस के पांच साल के शासन के बाद देखादेखी बीजेपी का कैडर भी निरंकुश हो गया है। सरकार बनने के बाद प्रदेश में ऐसे अनेक मामले आए, जिसमें बीजेपी के नेताओं ने कार्रवाई नहीं होने दी। हमारी सरकार...बोल पुलिस के हाथ कस दिए जाते हैं। कुछ विधायकों को भी आईना दिखाने की जरूरत है। उनके आचरण इतना बिगड़ गया है कि बीजेपी जैसी संस्कारित पार्टी से मेल नहीं खाता। भूमाफिया की तरह जमीन कब्जाने और गुंडे पालने जैसे काम भी हो रहे हैं। चलिये सरकार ने दमदारी दिखाई है, इससे निश्चित तौर पर बेलगाम कार्यकर्ताओं को विधायकों पर असर पड़ेगा।

कलेक्टरों की आंखों पर पट्टी?

दुर्ग और बलरामपुर जिले में अफीम की खेती का भंडाफोड़ हुआ है, वह राजस्व सिस्टम का फेल्योरनेस है। इन जिलों के पटवारी अगर गिरदावरी रिपोर्ट से पहले अगर मौके पर पहुंच का खेतों का जायजा लिया होता तो सरकार को बगले झांकना नहीं पड़ता। दरअसल, पटवारियों की ये समस्या सिर्फ दुर्ग और बलरामपुर का नहीं, अमूमन सभी जिलों का कमोवेश यही हाल है। पटवारी खुद से वेतन देकर दो-दो, तीन-तीन एजेंट रख लेते हैं और एजेंट जो बोलते हैं, पटवारी सील-ठप्पा लगाकर उसे कलेक्टर को सौंप देते हैं। कायदे से कलेक्टरों को पटवारियों को टाईट करना चाहिए क्योंकि पटवारियों के नियोक्ता कलेक्टर होते हैं। मगर कलेक्टर आंखों पर पट्टी बांध लेंगे तो फिर वही होगा, जो इस समय हो रहा है। चीफ सिकरेट्री और पीएस टू सीएम ने वर्किंग कल्चर के लिए बायोमेट्रिक अटेंडेंस और ई-ऑफिस चालू कर दिया मगर पटवारी राज के खात्मे के लिए भी कोई आईडिया निकालना चाहिए।

कलेक्टरेट और बीजेपी का गड्ढा

अविभाजित जांजगीर जिला यानी जांजगीर और सक्ती छत्तीसगढ़ बीजेपी का सबसे बड़ा गड्ढा है। वहां पार्टी को एक अदद सीट नसीब नहीं हुई। इन जिलों के रेवेन्यू अफसर पार्टी की और खटिया खड़ी करने में लगे हैं। सक्ती में आदिवासियों की जमीन भूमाफियाओं को दो-दो मामला होने के बाद भी बड़े प्रशासनिक अफसरों पर कार्रवाई नहीं होने पर उससे जांजगीर जिले के अफसरों का भी हौसला बढ़ गया। नैला स्टेशन की साइडिंग के ठीक सामने एक कोयला कारोबारी को एसडीएम ने कोटवारी जमीन का डायवर्सन कर दिया। पटवारी ने अपने रिपोर्ट में ये भी नहीं बताया कि कोयला कारोबारी की जमीन तक पहुंचने के लिए कोई रास्ता नहीं है। मौके के पास ढाई एकड़ का तालाब है और पास में बस्ती भी। मगर जांजगीर कलेक्ट्रेट के अफसरों के लिए सबसे बड़ा रुपैया है। आसपास के लोगों और सरपंचों की शिकायत और नाराजगी को अनसूनी करते हुए कोल कारोबारी को कोटवारी भूमि का नामंतरण कर दिया गया। दरअसल, खटराल अफसरों का हौसला इसलिए बढ़ रहा कि कार्रवाइयों के मामलों में सिस्टम ज्यादा संवेदनशील हो जाता है। जब मालूम है कि जांजगीर इलाका सत्ताधारी पार्टी के लिए मुफीद नहीं तो ऐसे में अफसरों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। मगर एप्रोच कोटे में गए जिला प्रशासन के अफसरों का क्या? मालूम है, कलेक्ट्रेट में आखिरी पोस्टिंग है, इसलिए सरकार और सत्ताधारी पार्टी की सेहत से उन्हें क्या वास्ता?

मंत्रिमंडल की सर्जरी

इस खबर में कितनी सत्यता है, ये तो वक्त बताएगा...बीजेपी के अंदरखाने में ये चर्चा बड़ी तेज है कि मई में मंत्रिमंडल की बड़ी सर्जरी हो सकती है। उसमें मुख्यमंत्री को छोड़ सभी 12 मंत्रियों के इस्तीफे ले लिए जाएंगे। फिर नए सिरे से मंत्रिमंडल का गठन किया जाएगा और विभागों का बंटवारा भी। जाहिर सी बात है, और बीजेपी के लोग भी स्वीकार करते हैं कि विष्णुदेव की इस टीम से तो 2028 में पार्टी की नैया पार नहीं लग पाएगी। खबरों की माने तो 12 में से चार-से-पांच मंत्रियों की छुट्टी होगी। इनमें से कुछ ऐसे मंत्री भी शामिल हैं, जो रमन सिंह की टीम में काम कर चुके हैं मगर इस समय मैदान में खेलने की बजाए पेवेलियन में बैठ सिर्फ ताली बजा रहे हैं। कई मंत्रियों के विभाग भी बदलेंगे तो कुछ का लोड भी हल्का किया जाएगा। मई में सर्जरी की चर्चा इसलिए हो रही कि तब तक सरकार का ढाई साल हो जाएगा। यानी इंटरवल। इसके बाद सिस्टम के पास काम करने के लिए सिर्फ डेढ़ साल बचेंगे। क्योंकि, चुनावी साल में कोई काम होता नहीं। 2028 में जनवरी से ही सरकारें इलेक्शन मोड में आ जाती हैं। अगर मई में मंत्रिपरिषद की रिसफल हो गया फिर तो कई मंत्रियों के लिए यह आखिरी विधानसभा का सत्र होगा। क्योंकि, मानसून सत्र अब जुलाई में आहूत होगा। रही बात किस मंत्री की विदाई होगी तो बीजेपी की राजनीति में कोई दावे के साथ कुछ कह नहीं सकता। आखिर भला कौन जानता था कि धमेंद्र प्रधान पछाड़ खा जाएंगे और नितिन नबीन का नाम राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए सामने आ जाएगा। और बात नितिन नबीन की आई तो छत्तीसगढ़ के बारे में उनसे भला क्या छिपा हुआ है। कैडर के साथ उनका कनेक्शन इतना जबर्दस्त है कि पार्षद और उसके नीचे लेवल के बीजेपी कार्यकर्ता भी उनसे सीधे जुड़े हुए हैं। कहने का आशय यह है कि कौन मंत्री किस लेवल पर गुल खिला रहा, नितिन नबीन के पास पूरा अपडेट है। इसलिए जो भी होगा चौंकाने वाला होगा।

होली में गुलजार

होली के अगले दिन किसी भी स्टेट में छुट्टी नहीं रहती। मगर छत्तीसगढ़ में दशकों से यह परंपरा चली आ रही थी कि ऑफिस का दरवाजा तो खुलता था, मगर कोई स्टाफ नहीं पहुंचत था। भृत्यों के नहीं आने पर कई ऑफिसों के ताले भी नहीं खुलते थे। मगर राज्य सरकार ने बायोमेट्रिक अटेंडेंस का ऐसा सिस्टम लगाया कि होली के दूसरो दिन ऑफिस गुलजार रहे। मंत्रालय छोड़ बाकी जगहों पर भले ही कोई खास कामकाज नहीं हुआ होगा मगर उपस्थिति बराबर रही। वर्किंग कल्चर की दिशा में सरकार की यह बड़ी सफलता रही।

सिकेट्री से मिलना कठिन नहीं

आम आदमी के लिए पहले मंत्रालय में बड़े अफसरों से मिलना बड़ा कठिन टास्क होता था। एक तो पूरे हफ्ते अफसर आते नहीं थे और आए भी दोपहर को और अपरान्ह होते ही जाने की तैयारी। जिसकी मीटिंग होती थी, वहीं टाईम पर आता और जाता था। वरना, तो राम-राम। मगर जब से बायोमेट्रिक अटेंडेंस हुआ है, मंत्रालय में साढ़े 10 बजे तक 90 परसेंट अफसर पहुंच जाते हैं। फिर साढ़े पांच बजे से पहले हिलना नहीं है। उपर से अब पुराने विधानसभा का बहाना भी नहीं। बगल में विधानसभा है। नहीं तो विधानसभा सत्रों के दौरान तो अफसरों के मौज होते थे। मगर अब आदमी दिन भर बैठेगा तो कुछ-न-कुछ काम करबे करेगा। अब तो कई अधिकारियों ने अपने पीए को कह दिया है, जिसको भी मिलना हो, भेजते जाओ। अभी की स्थिति यह है कि दो-तीन परसेंट अति अभिमानी अफसरों को छोड़ दें तो लगभग सभी काम में लग गए हैं, लोगों से मिलजुल भी रहे हैं।

पीए, स्टेनो बेरोजगार

एक वो भी जमाना था, जब बड़े अफसरों के पीए, स्टेनो बनने के लिए कर्मचारी लालायित रहते थे। मगर सरकार ने ई-ऑफिस शुरू कर पीए और स्टेनों के पेट पर बड़ी चोट कर डाली। पहले जितने कद्दावर अफसर होते थे, उनके पीए का उतना ही जलवा होता था। फाइलों की जानकारी देना या उसे आगे बढ़ाना...किस फाइल को दबाना है और किस फाइल को वंदे भारत एक्सप्रेस की तरह दौड़ाना, सबकी कीमत तय थी। मगर ई-ऑफिस ने ऐसा बेड़ा गर्क किया कि अब प्रति फाइल के पीछे नजराना मिलना तो छोड़िये होली-दिवाली में गिफ्ट मिलना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि, फाइलें अब सीधे अफसरों के पास पहुंच जा रही। वर्तमान सिस्टम में सिर्फ जो बाबू नोटशीट बढ़ाता है, उसे सिर्फ इतना पता रहता है कि फलां फाइल किस अफसर के पास है, मगर उसमें नोटिंग क्या है, इस बारे में वह कुछ नहीं बता सकता। कुल मिलाकर कहा जाए तो पीए और स्टेनो का काम अब साहब के लिए मीटिंग का फोल्डर बनाना, चाय-नाश्ते का इंतजाम करना और पब्लिक से मिलवाना बच गया है।

नौकरशाहों में खलबली

बीजेपी लीगल सेल के अ-संतुष्ट नेता ने चीफ सेकेट्री विकास शील से 27 पन्नों की ऐसी गंभीर शिकायत की है कि नौकरशाही हिल गई है। कंप्लेन में दो पूर्व मुख्य सचिव समेत कई अफसरों के नाम हैं। असल में, ब्यूरोक्रेसी भी अपनी अड़ी में रहती है, वरना PSC में मेंबर के दो पद खाली हैं, तीसरा खाली होने वाला है। नीति आयोग में भी मेम्बर की एक वैकेंसी है। सरकार को बोल-बालकर नेताजी को एडजस्ट कराना चाहिए। वरना, दिक्कतें बढ़ती जाएंगी।

आईएएस को अभयदान!

पटवारी से आरआई प्रमोशन स्कैम में एसीबी ने कई लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। मगर चालान में इस घोटाले का मास्टरमाइंड तक एसीबी पहुंचने की कोशिश नहीं की। हालांकि, एक एसीबी ने एक आईएएस से पूछताछ के लिए जीएडी से अनुमति मांगी थी। अनुमति मिली कि नहीं, इस पर कोई मुंह खोलने तैयार नहीं। हालांकि, 1300 पेज के चालान में एसीबी ने इस बात का जिक्र अवश्य किया है कि अतिविशिष्ट लोगों के यहां पर्चा सेट हुआ और उत्तरपुस्तिकाएं तैयार की गई। मगर मिलियन डॉलर का सवाल यह है कि एसीबी के हाथ आईएएस तक क्यों नहीं पहुंच पाए।

अजब संयोग

रिटायर आईएएस गणेश शंकर मिश्रा को राज्य सरकार ने नीति आयोग का उपाध्यक्ष अपाइंट किया है। नौकरी से रिटायरमेंट के बाद गणेश शंकर ने जब बीजेपी ज्वाईन किया था, तब विष्णुदेव साय पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे। इस नाते उन्होंने ही गणेश शंकर को पार्टी में प्रवेश कराया था। अब जब पार्टी में प्रवेश कराने वाले ही राज्य सरकार के मुखिया बन गए तो फिर इतना तो बनता ही था कि गणेश शंकर को सम्मानजनक कुर्सी मिल जाए। विष्णुदेव साय ने गणेश शंकर को उस आयोग का उपाध्यक्ष बनाया, जिसके वे खुद अध्यक्ष हैं। यही नहीं, उनकी ताजपोशी के समय खुद मौजूद रहे। चलिये, ये सब वक्त और संयोग की बात है। गणेश शंकर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह के काफी नजदीक रहे। मगर रिटायरमेंट के बाद 2017 में उन्हें अल्पज्ञात सहकारिता निर्वाचन का कमिश्नर बनाया गया था। मगर अब जो कुर्सी मिली है, वह चीफ सिकरेट्री के समकक्ष है। उनसे पहले जितने भी लोग नीति आयोग के उपाध्यक्ष बने हैं, वे या तो चीफ सिकरेट्री रहे हैं या फिर एक्स चीफ सिकरेट्री। हालांकि, गणेश शंकर की नियुक्ति के बाद जिन लोगों ने विष्णुदेव साय के हाथों उनके पार्टी अध्यक्ष रहते बीजेपी ज्वाईन किया होगा, उनकी उम्मीदें बढ़ गई होंगी।

अच्छी खबर

छत्तीसगढ़ के लिए अच्छी खबर है, राज्य बनने के 25 साल बाद रायपुर मेडिकल कॉलेज में DM की पढ़ाई होगी। NMC ने अम्बेडकर हॉस्पिटल के एडवांस कार्डियक इंस्टिट्यूट को 2 सीट की हरी झंडी दे दी है। मध्यप्रदेश के भोपाल और इंदौर मेडिकल कॉलेज में DM की पढ़ाई होती है। मगर छत्तीसगढ़ में चना-मुर्रा की तरह कॉलेज खुलते गए मगर क़्वालिटी एजुकेशन न होने से NMC ने DM कोर्स की मंजूरी नहीं दी। ACI के हेड डॉ. स्मित श्रीवास्तव को इसका क्रेडिट जाना चाहिए, वे दो साल से लगातार इसके लिए प्रयासरत थे। ACI को स्थापित करने में उन्हीं का एफर्ट रहा है।

आखिरी बात हौले से

1835 में जन्मे अमेरिका के महान लेखक और हास्य कलाकार सैम्यूअल लैंघोर्न क्लेमेन्स उर्फ मार्क ट्वेन 150 साल पहले कहा था...राजनीति मात्र ऐसा पेशा है, जहां चोरी कर सकते हैं, झूठ बोल सकते हैं, घोखा दे सकते हैं, फिर भी सम्मानित हो सकते हैं।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव और पाठ्य पुस्तक निगम के अध्यक्ष राजा पांडेय के बीच कितने दिनों से बात नहीं हुई है?

2. छत्तीसगढ़ में किन-किन मंत्रियों की मंत्रिमंडल से विदाई हो सकती है?

शनिवार, 7 मार्च 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: राजपरिवारों को झटका

 


तरकश, 8 मार्च 2026

संजय के. दीक्षित

राजपरिवारों को झटका

राज्यसभा में पहुंचने के लिए बीजेपी, कांग्रेस दोनों पार्टियों से जुड़े राजपरिवारों की प्रबल दावेदारी थी। बीजेपी से जशपुर राजपरिवार के रणविजय सिंह पहले राज्यसभा में रह चुके हैं। फिर भी उम्मीदें उन्हें कम नहीं थी। पिछले विधानसभा चुनाव में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रणविजय को कई रोड शो, रैलियों में अपने साथ घुमाया था। मगर सरकार बनने के बाद उन्हें कुछ मिला नहीं। लाल बत्ती की रेवड़ी अब बची नहीं, रही-सही राज्यसभा की आशा भी चली गई। उधर, जगदलपुर पैलेस के कोमल भंजदेव भी इस बार पूरा जोर लगा डाले थे। रमन सिंह के दौर में युवा आयोग के चेयरमैन रह चुके भंजदेव को राज्यसभा की दावेदारी इसलिए जोर पकड़ रही थी, क्योंकि बस्तर लाल आतंक से मुक्त हो रहा तो शायद पार्टी उनके नाम पर मुहर लगा दे। लेकिन, किस्मत से ज्यादा कुछ मिलता नहीं। बीजेपी ने लक्ष्मी वर्मा को राज्यसभा में भेजने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। उधर, कांग्रेस के सौम्य लीडर टीएस सिंहदेव को पार्टी ने वादे के विपरीत मुख्यमंत्री बनाया नहीं, विधानसभा चुनाव हारने से वे अभी किसी पद पर भी नहीं हैं। सो, आस उन्हें भी थी। कई मौकों पर टीएस ने बेबाकी से कहा भी था...पार्टी अगर चाहेगी तो राज्यसभा जरूर जाउंगा। मगर पार्टी ने फूलोदेवी नेताम को राज्यसभा में रिपीट कर दिया।

CM फेस और अलार्म

नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत और पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव जैसे दिग्गज नेताओं की दावेदारी को नजरअंदाज कर कांग्रेस पार्टी ने फूलोदेवी नेताम को राज्यसभा में भेजने का फैसला किया है, तो उसके अपने निहितार्थ हैं। दअरसल, फूलोदेवी पीसीसी की पसंद तो कतई नहीं थी। पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज खुद दावेदार थे। मगर फूलोदेवी के नाम को पार्टी सुप्रीमो सोनिया गांधी से हरी झंडी मिल गई। उसके बाद कांग्रेस में किन्तु-परन्तु का कोई स्पेस नहीं बच जाता। जाहिर है, छत्तीसगढ़ से लगातार तीन बाहरी नेताओं को राज्यसभा में भेजने का खामियाजा भुगत चुकी कांग्रेस ने इस बार स्थानीय को प्राथमिकता दी। मगर ये भी सही है...फूलोदेवी के चयन ने सूबे के बड़े नेताओं का चैन उड़ा डाला है। दरअसल, फूलोदेवी की गांधी परिवार के इनर सर्किल में इंट्री हो गई है। फिर महिला और आदिवासी भी हैं। जाहिर है, 2028 के विधानसभा चुनाव में सीएम की रेस में फूलोदेवी मजबूत दावेदार होंगी। ऐसे में नेताओं की नींद उड़ेगी ही।

जातिगत समीकरण

लक्ष्मी वर्मा को राज्यसभा सदस्य बना बीजेपी ने जातिगत समीकरण साधने का प्रयास किया है। सरकार के रणनीतिकारों को भले ही लगता है कि कुर्मी समाज का वोट उनके प्रतिद्वंद्वी को ज्यादा मिला। मगर भविष्य को भी देखना जरूरी है। जाहिर तौर पर सरकार में कुर्मी समुदाय का प्रतिनिधित्व कम है। साहू समाज से अरुण साव डिप्टी सीएम हैं और तोखन साहू केंद्रीय राज्य मंत्री। मगर कुर्मी समाज से मंत्रिमंडल में सिर्फ टंकराम वर्मा। विभागों की हिस्सेदारी में भी उनका नंबर उपर से दसवां होगा। लक्ष्मी वर्मा को राज्यसभा में भेज बीजेपी ने नारी शक्ति को साधने के साथ ही जातिगत संतुलन बनाने का प्रयास किया है।

सबसे पावरफुल चेयरमैन!

यदि आपसे पूछा जाए कि छत्तीसगढ़ के निगम-मंडलों में सबसे जलवेदार चेयरमैन कौन होगा? तो मुंह बिचका जवाब मिलेगा, जलवा तो एमडी काटते हैं। चेयरमैन रबड़ स्टैम्प होते हैं। हां...माईनिंग, ब्रेवरेज जैसे कुछ चेयरमैन होते हैं, जिन्हें हिसाब-किताब के लिए कैलकुलेटर की जरूरत पड़ती है। बाकी तो गाड़ी, पेट्रोल और खर्चे का बिल पास कराने में ही उनका कार्यकाल निकल जाता है। मगर ऐसा नहीं है। एक चेयरमैन हैं, जिनका जलवा सबसे अधिक होगा। वो हैं नागरिक आपूर्ति निगम के चेयरमैन संजय श्रीवास्तव। दरअसल, किसी भी चेयरमैन के पास ट्रांसफर के अधिकार नहीं होते। मगर पिछली सरकार में नॉन के चेयरमैन रामगोपाल अग्रवाल की सरकार में तूती बोलती थी। उन्होंने सरकार से अधिकारियों, कर्मचारियों के तबादले का पावर चेयरमैन के नाम करवा लिया था। दिसंबर 2023 में सरकार बदली। इसके बाद संजय श्रीवास्तव नॉन के चेयरमैन बनें और ट्रांसफर का अधिकार उन्हें मिल गया। संजय पढ़े-लिखे नेता हैं, पर्सनाल्टी भी ऐसी कि नगर निगम में सभापति बने या फिर आरडीए का चेयरमैन, छोटे पदों पर भी उन्हें अपना सिक्का जमाने आता है। नॉन मे ंतो उन्हें ट्रांसफर का अधिकार मिल गया है, फिर समझ सकते हैं, उनका पावर कितना बढ़ गया होगा।

एक DGP, तीन चार्ज

राज्य सरकार ने अरुणदेव गौतम को डीजीपी बनाया मगर पुलिस प्रमुख बनने से पहले जो चार्ज थे, उससे उन्हें मुक्त नहीं किया गया। गौतम के पास अभी भी होमगार्ड, फायर और अभियोजन की जिम्मेदारी है। होमगार्ड और अभियोजन में पूर्व में कई डीजी लेवल के अफसर पोस्ट रह चुके हैं। इसलिए, उसे छोटा नहीं आंकना चाहिए। रही बात डीजीपी की, तो राज्य में चीफ सिकरेट्री के बाद दूसरे सबसे बड़े पद पर बैठे अफसर को अतिरिक्त दायित्व नहीं सौंपना चाहिए। ये तो ऐसा ही हुआ कि किसी आईएएस अधिकारी को चीफ सिकरेट्री बनाकर दो-एक विभाग की जिम्मेदारी दे दो। इससे पहले रमन सिंह की तीसरी पारी में एएन उपध्याय जब 29 साल की आईपीएस की सर्विस में डीजीपी बन गए थे, तब उनके पास प्रशासन का चार्ज था। मगर दसेक दिन के भीतर सरकार ने प्रशासन से उन्हें मुक्त कर दिया था। दरअसल, डीजीपी पद की अपनी गरिमा होती है। एकाध-महीना चलता है। प्रभारी डीजीपी बने, उन्हें 13 महीने हो गए मगर अभी भी तिहरा चार्ज से छुटकारा नहीं पा मिला।

DGP को बोनस

छत्तीसगढ़ बनने के 25 सालों में प्रभारी डीजीपी दो ही आईपीएस बने हैं। पहले अशोक जुनेजा और अब अरुणदेव गौतम। अशोक जुनेजा 11 महीने प्रभारी रहे मगर उसके बाद उनका पूर्णकालिक का आदेश आ गया था। नियमानुसार जिस दिन से मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर पूर्णकालिक डीजीपी बनाने का आदेश देता है, उस दिन से दो साल कार्यकाल मिलता है। जुनेजा को इसीलिए रिटायमेंट के बाद 11 महीने की सर्विस एक्स्ट्रा मिली। अरुण गौतम ने 13 महीने प्रभारी डीजीपी रहकर जुनेजा का रिकार्ड तोड़ दिया है। तुर्रा यह....गौतम घाटे में नहीं हैं, 13 महीने ये उनका बोनस है। जिस दिन वे पूर्णकालिक डीजीपी बनेंगे, उस दिन से उनका दो साल का मीटर घूमना शुरू होगा। मसलन, इस महीने मार्च में यदि वे पूर्णकालिक डीजीपी बन जाते हैं तो फिर वे अगले साल जुलाई 2027 में रिटायर नहीं होंगे। मार्च 2028 तक उनका कार्यकाल रहेगा। याने अरुणदेव नुकसान में नहीं हैं।

सत्र बाद बड़ी सर्जरी

विधानसभा के बजट सत्र के बाद कलेक्टरों की एक लिस्ट निकलेगी ही, एसपी लेवल पर बड़ी सर्जरी होगी। इसमें करीब आधे दर्जन से अधिक पुलिस अधीक्षकों का ट्रांसफर होगा। सात एसपी के डेढ़ से दो साल पूरे हो गए हैं। उन्हें इधर-से-उधर किया जाएगा। बलौदा बाजार की एसपी भावना गुप्ता प्रायवेट कारणों से लंबी छुट्टी पर जाने वाली है, वहां भी नया एसपी पोस्ट करना होगा। जिन पुलिस कप्तानों के ट्रांसफर की संभावनाएं हैं, उनमें रजनेश सिंह, भोजराज पटेल प्रशांत ठाकुर, शलभ सिनहा, सिद्धार्थ तिवारी, गौरव राय जैसे नाम हैं। सरकार को हालांकि, इस पर मशक्कत करनी होगी कि इन अधिकारियों को किस जिले में ट्रांसफर करें। इनमें कुछ नाम अच्छे हैं मगर उनकी सीनियरिटी के लायक जिला इस समय खाली नहीं है। सरकार को उसी में से कुछ गुंजाइश बनानी होगी।

डायरेक्ट IPS, कोपभवन

कप्तानी में कभी डायरेक्ट आईपीएस अधिकारियों का दबदबा रहता था। पिछली सरकार तक दुर्ग से लेकर रायपुर, बिलासपुर, जांजगीर, रायगढ़ तक डायरेक्ट आईपीएस कप्तान रहे। मगर अब सिचुएशन 360 डिग्री में घूम गया है। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, जांजगीर, रायगढ़, जशपुर जैसे बड़े जिलों में प्रमोटी आईपीएस एसपी हैं। यहां तक कि रायपुर पुलिस कमिश्नर की पोस्टिंग से उन्हें काफी उम्मीदें थी। लेकिन, वे हाथ मलते रह गए। इसके बाद असंतोष और गहरा गया है। आरआर याने डायरेक्ट आईपीएस अधिकारियों की इन दिनों बस एक ही गुहार...हमारी उपेक्षा हो रही। रायपुर पुलिस कमिश्नरेट में चार डायरेक्ट वाले डीसीपी बने हैं, वे भी खुश नहीं। उन्हें लगता है सीएसपी हो गए हैं। जिलों में कप्तान का जो जलवा होता है, वो रायपुर पुलिस कमिश्नरेट में कहां मिलेगा? उपर में संजीव शुक्ला और अमित कांबले जैसे अफसर उपर बैठ गए हैं। फिर कमिश्नरेट वाली ठसन भी नहीं है। छत्तीसगढ़ पुलिस ऐसी डिरेल्ड हुई है कि पहले जैसी ठसन आ भी नहीं सकती। पुलिस में जान फूंकने वाला कोई क्रांतिकारी आईपीएस अवतार लेगा, उसके बाद ही पुलिस का पुराना वैभव लौट पाएगा...मगर वो भी तब जब छत्तीसगढ़ के पॉलिटिशियन चाहेंगे। बहरहाल, इन परिस्थितियों में हो सकता है कि खाली होने वाले दो-एक जिलों में इस बार डायरेक्ट आईपीएस अफसरों को मौका मिल जाए।

नासमझ अफसर!

शराब से 1200 करोड़ का टारगेट पूरा करने का ये मतलब नहीं की कुछ भी कर दें। होली में शराब दुकान खोलने का मामला लगभग ऐसा ही रहा। जनवरी तक 867 करोड़ का ही रेवेन्यू आया है। दो महीने में 1200 करोड़ पहुंचाना था, बल्कि इससे क्रॉस होता तब वाहवाही मिलती। लिहाजा, होली के दिन दुकान ओपन रखने का आदेश जारी कर दिया। नासमझी की ये चरम स्थिति थी...सालों की सर्विस के बाद अफसरों को ये समझ नहीं आया कि होली और शराब का क्या रिश्ता है। महाराष्ट्र और साउथ के राज्यों में होली नहीं मनती। इसलिए वहां शराब दुकानें खुली रहती हैं। छत्तीसगढ़ में शराब दुकान बंद होने के बाद पुलिस वालों को लॉ एंड आर्डर में पसीना निकल जाता है। हालांकि, भारी विरोध के बाद बैकफुट पर आते हुए अफसरों ने फैसला बदला। मगर दुकानें खुली रहती तो इस होली को खून-खराबे के नाम पर याद किया जाता। क्योंकि, दुकानें बंद होने और पुलिस की तगड़ी चौकसी के बाद रायपुर जिले में शराब के नशे में 4 हत्याएं हो गई। जाहिर है, अफसरों को सिर्फ टारगेट के पीछे नहीं भागना चाहिए। आदेश वापिस लेने से सिस्टम पर भी सवाल खड़े हुए, जो कि सिर्फ अफसरों की वजह से हुआ।

सफलता का क्रेडिट

बस्तर में लाल आतंक के खात्मे का 90 फीसदी क्रेडिट केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को जाता है। उन्होंने जो कहा, उसे करके दिखाया। मगर बचे 10 परसेंट क्रेडिट सूबे में किसे मिलना चाहिए, इस पर असमंजस की स्थिति है। सिस्टम में बैठे अफसर और पुलिस मुख्यालय का यह दायित्व है कि क्रेडिट किसे दिलाया जाए। इसके लिए अहम पदों पर बैठे सरकार के रणनीतिकारों को फ्रंट पर आकर खेलना होगा। सरकार के दो साल पूरे होने के बाद भी अफसर अगर डिफेंसिव रहेंगे तो फिर औरा कायम नहीं हो पाएगा।

गुस्से में CM, और पब्लिक!

मीडिया में खबर है...छत्तीसगढ़ में सड़कों की दुर्दशा पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय पीडब्ल्यूडी के अफसरों पर बरस पड़े। अब बंद कमरे में क्या-क्या हुआ, इस बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं। मगर ये बात सही है कि सूबे की सड़कों की जर्जर स्थिति से पब्लिक भी खुश नहीं। भर्राशाही का आलम ये है कि सीएम के गृह जिलों की सड़कों पर पीडब्ल्यूडी का कोई ध्यान नहीं। मीटिंग में अफसरों की वर्किंग से सीएम काफी दुखी हुए। पीडब्ल्यूडी की मंथर गति के कई उदाहरण राजधानी रायपुर में भी है। कचना रेल ओवर ब्रिज का घिसट-घिसट कर चल रहे काम से दो लाख से ऊपर लोग तीन साल से त्रस्त हैं। मगर अफसरों की संवेदनशीलता हिलने-डुलने का नाम नहीं ले रही। सवाल उठता है बबूल के पौधे लगाने पर आम कैसे मिलेंगे। पिछली सरकार में जिस अफसर को लोगों का आक्रोश बढ़ने पर सस्पेंड किया गया, इस सरकार ने लाल जाजम बिछा न उसका स्वागत किया बल्कि विभाग का प्रमुख भी बना दिया। पता नहीं, उस अफसर में कौन सी वो खासियत कि पिछली सरकार के भी वे प्रिय रहे और अब इस सरकार के भी। जाहिर है, पिछली सरकार ने चुनाव से कुछ समय पहले दिखावे के लिए सस्पेंड किया था। कांग्रेस सरकार का काम न दिखने का एक बड़ा कारण सड़कों का खास्ता हाल भी रहा। लोगों ने सरकार को विदा कर दिया। बहरहाल, अगले चुनाव में सड़क और लॉ एंड आर्डर बड़ा मुद्दा बनने वाला है। लोगों ने बीजेपी को इसलिए वोट दिया कि इस सरकार में कम-से-कम सड़कों की दशा सुधर जाएगी। मगर आधा कार्यकाल खत्म होने वाला है, मुख्यमंत्री और पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर के जिले में आप जाएंगे तो माथा पकड़ लेंगे। ऐसे में, मुख्यमंत्री को भला गुस्सा क्यों नहीं आएगा। अब बात पब्लिक की...तो वह पांच साल में एक बार गुस्सा दिखाती है।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. एक मिनिस्टर का नाम बताइये...बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पेनल में नाम आने के बाद उनका कांफिडेंस काफी बढ़ गया है?

2. लक्ष्मी वर्मा के राज्यसभा सदस्य बनने से राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा खुश होंगे दुखी?

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

hhattisgarh Tarkash 2026: ऐसे अफसर, खेत कौन बचाए?



 तरकश, 1 मार्च 2026

संजय के. दीक्षित

भक्षक बने अफसर, खेत कौन बचाए?

सक्ती शहर का यह मामला सोचने पर विवश करेगा कि आदिवासी राज्य में आदिवासियों की जमीनों के साथ एडमिनिस्ट्रेशन में बैठे अधिकारियों द्वारा कैसा खेला किया जा रहा है। बात सक्ती कलेक्ट्रेट के ठीक सामने प्राइम लोकेशन की जमीन की है। 70 के दशक में एक आदिवासी को जीवन यापन के लिए डेढ़ एकड़ का जमीन मिली थी। 50 साल पहले उस जमीन की कोई मोल नहीं थी मगर समय के साथ वह सोने से भी कीमती हो गई। कुछ भूमाफियाओं की इस जमीन पर नजर लगी और 15 करोड़ की जमीन 15 लाख में खरीद ली। जमीन की रजिस्ट्री के बाद नामंतरण के लिए तहसीलदार के पास केस गया तो उसने आदिवासी जमीन का नामंतरण करने से इंकार कर दिया। इसके बाद एसडीएम के पास अपील हुई। और एसडीएम ने गुपचुप ढंग से धनाढ्यों के नाम पर आदिवासी जमीन को सौंप दिया। दरअसल, गांधीजी की फोटो में बड़ी ताकत होती है। एसडीएम ने हास्यपद तरीके से उसे गैर-आदिवासी लिख अनुमति की आवश्यकता को गैर जरूरी बता दिया। आदिवासी संगठनों ने जब हंगामा किया तो कलेक्टर की नाक के नीचे बैठे एसडीएम ने केस को पुनर्विलोकन में लेकर रजिस्ट्री केंसिल कर उसे मूल पट्टेदार याने आदिवासी के नामे कर दिया। कायदे से इतनी बेशकीमती जमीन को पट्टेदार को सौंपने की बजाए उसे राजस्व विभाग के सुपूर्द करना चाहिए था। मगर ये काम भी खास रणनीति के तहत किया गया। ताकि, भूमाफियाओं के पक्ष़्ा में न्यायिक स्टे की गुंजाइश बनी रहे। जाहिर है, आदिवासियों को स्वाभिमान के साथ जीने के लिए सरकारी जमीनें दी जाती हैं। अगर वो बेच रहा...वो भी बिना कलेक्टर की अनुमति के तो उसे राजसात करना चाहिए। मगर पता चला है, 15 करोड़ की जमीन 15 लाख में खरीदने के लिए एडमिनिस्ट्रेशन के एक अधिकारी को 50 और दूसरे को 10 पेटी दिया गया। ऐसे में, सवाल उठता है...बाड़ ही जब खेत खाने लगे तो उसकी रखवाली कौन करेगा?

कलेक्टर की भूमिका कटघरे में

सक्ती कलेक्टर का एक कारनामा इसी तरकश में पिछले साल प्रकाशित हुआ था। कलेक्टर ने आदिवासी जमीन के केस में रजिस्ट्रार को लिखित में दे दिया था, इसमें अनुमति की आवश्यकता नहीं है। इसी आधार पर रजिस्ट्रार ने आदिवासी जमीन की रजिस्ट्री कारोबारियों के नाम कर दी। मगर जब हड़कंप मचा तो उन्होंने उल्टे रजिस्ट्री अधिकारी को दोषी बताते हुए कमिश्नर को लिखित अनुशंसा कर सस्पेंड करा दिया। इस केस को तरकश में प्रमुखत से एक्सपोज किया गया। उसके बाद रजिस्ट्रार संघ ने हड़ताल पर जाने की धमकी दी तो बिलासपुर कमिश्नर ने आनन-फानन में सक्ती के रजिस्ट्री अधिकारी का निलंबन समाप्त किया। इसके बाद जाकर आदिवासी जमीन हलाल होने से बची।

खिलाड़ी कलेक्टर

आदिवासी जमीन के मामले में छत्तीसगढ़ में अजब-गजब खेल हो रहे। हाल ही में अंबिकापुर में सौ से अधिक राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले पंडो आदिवासियों की जमीन पर खास समुदाय के लोगों द्वारा कब्जा कर घर बनाने का मामला सामने आया है। यही नहीं, बस्तर समेत कई जिलों में आदिवासियों की जमीनों को हड़पा जा रहा। इस खेल का ट्विस्ट यह है कि अब तरीका बदल गया है। कलेक्टर से अनुमति के चक्कर में पड़ने की बजाए आदिवासियों की जमीनों को लीज पर लेकर पेट्रोल पंच, होटल समेत व्यवसायिक संस्थानों का निर्माण किया जा रहा है। वैसे, सरकार अगर पिछले पांच साल की आदिवासी जमीनों की जांच करवा दें तो दर्जन भर से अधिक कलेक्टर-पूर्व कलेक्टर सलाखों के पीछे जाएंगे। हालांकि, इतने अधिकारियों को जेल तो भेजा नहीं जा सकता। मगर सिस्टम को कम-से-कम जांच तो करा ही लेना चाहिए...पता चल सके कौन कलेक्टर, कितना बड़ा खिलाड़ी निकला।

सौम्य सीएम, बदले तेवर

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बेहद विनम्र और सौम्य राजनेता माने जाते हैं। दो साल के टेन्योर में कभी उन्हें गुस्से या तमतमाते हुए नहीं देखा गया। मगर विधानसभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए सीएम के भाषण में जो तल्खी दिखी, उससे पक्ष-विपक्ष के विधायक आवाक थे। मुख्यमंत्री ने पिछली कांग्रेस सरकार पर हमला बोलते हुए 'भ्रष्टाचार स्पेशलिस्ट सरकार' करार दिया। जाहिर है, हर पीएम, सीएम के भाषण का स्क्रिप्ट कोई-न-कोई तैयार करता है। क्योंकि, मुख्यमंत्रियों के पास इतना टाईम नहीं होता। हालांकि, सीएम सचिवालय के अधिकारी सीएम से स्क्रिप्ट अनुमोदित कराके ही फायनल करते हैं। बहरहाल, विधानसभा की स्पीच के बाद उसकी चर्चा काफी है, क्योंकि था वह काफी पिन प्वाइंटेड।

विजय-भावना, दूरियां-नजदीकियां

विधानसभा में कई बार दिलचस्प प्रसंग, हास-परिहास देखने को मिलते हैं, तो तंज और तीर भी चलते हैं। ऐसा ही कुछ पिछले हफ्ते प्रश्नकाल में हुआ, जब विधायक भावना बोहरा ने पंचायत मंत्री विजय शर्मा से अपने विधानसभा पंडरिया इलाके की सड़कों के बारे में पूछा। इस पर एक्स सीएम भूपेश बघेल ने मुस्कुराते हुए तंज कस दिया...क्या बात है? अगल-बगल के आपलोग विधायक और मंत्री। फिर सदन में सवाल करना पड़ रहा है। क्या दुरियां काफी बढ़ गई है? इस पर मंत्री विजय शर्मा और भावना, दोनों ने अपनी तरफ से सफाई दी। मगर दोनों के बीच सियासी अदावत किसी से छिपी भी नहीं है। इसलिए सदन में इस पर जमकर ठहाके लगे।

गरीबों की कौन सुने?

पिछले कई विधानसभा सत्रों के प्रश्नकाल में यह सवाल आता है कि रायपुर के सरकारी आंबेडकर अस्पताल में पैट स्कैन मशीन को डिब्बे से बाहर क्यों नहीं निकाला जा रहा और मंत्री का रटा-सा जवाब आता है...खरीदी में कुछ झोल थी, उसकी जांच चल रही है। सवाल है क्या पेट स्कैन मशीन का उपयोग और खरीदी की जांच एक साथ नहीं की जा सकती? और फिर प्रश्न यह भी कि जांच कितने साल तक चलेगी? पेट स्कैन मशीन 20 करोड़ से उपर की आती है। और इसी जांच के बाद कैंसर की पुष्टि होती है। प्रायवेट अस्पताल वाले इस जांच का 20 से 25 हजार रुपए चार्ज करते हैं। जानना यह भी जरूरी है कि कैंसर अब साधन संपन्न वर्ग की बीमारी नहीं रही। रायपुर के कैंसर अस्पतालों में जाकर देखा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में कैसे-कैसे लोग इस बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। राजधानी रायपुर में सिर्फ कैंसर के तीन अस्पताल खुल गए हैं। इसके अलावे चार-पांच बड़े अस्पतालों में भी कैंसर यूनिट है। छत्तीसगढ़ के हेल्थ सिकेट्री को देश का सबसे अमीर आईएएस कहा जाता है। उन्हें मानवीय आधार पर आंबेडकर अस्पताल के पेट स्कैन मशीन को बक्से से बाहर निकाल उसका उपयोग शुरू कराना चाहिए। वरना, छत्तीसगढ़ के गरीबों की जेबें कटती रहेंगी।

हाई प्रोफाइल सेक्स स्कैंडल!

खैरागढ़ के पूर्व विधायक के खिलाफ उन्हीं की पार्टी की नेत्री की दुष्कर्म की शिकायत के बाद पुलिस ने मुकदमा कायम कर लिया है। चूकि मामला काफी हाई प्रोफाइल है, इसलिए राजनांदगांव के आईजी ने स्कैंडल की जांच के लिए पुलिस अधिकारियों की पांच सदस्यीय कमेटी गठित कर दी है। महिला नेत्री की शिकायत की अगर दूध-का-दूध और पानी-की-पानी की तरह जांच हो जाए तो एक राजनीतिक पार्टी को काफी दिक्कतें हो जाएंगी। 2028 के विधानसभा चुनाव में उतारने के लिए कोई प्रत्याशी नहीं मिलेगा। क्योंकि, खैरागढ़ के जितने भी टॉप के नेता हैं, सबने बहती गंगा में डूबकी लगाई है। यद्यपि, मामला राजी-खुशी, सहमति जैसा रहा मगर मालूम ही है, सहमति के बाद जब असहमति के स्वर उभरते हैं, तो फिर कयामत आ जाती है...वैसा ही कुछ इन दिनों खैरागढ़ में आया हुआ है।

ऐसे पावरफुल अफसर

छत्तीसगढ़ में शुक्रवार को एक डिप्टी कलेक्टर का गजबे ट्रांसफर हुआ। आमतौर पर सिंगल आर्डर निकलता नहीं। मगर न केवल सिंगल ट्रांसफर हुआ, बल्कि आदेश में लिखा गया...आदेश की डेट 27 फरवरी को अपरान्ह से बीजापुर से एकपक्षीय कार्यमुक्त किया जाता है। याने ट्रांसफर के साथ रिलिविंग। छत्तीसगढ़ में इससे पहले शायद ही ऐसा हुआ होगा, तबादले के साथ कार्यमुक्ति भी। ऐसा इसलिए किया गया कि बस्तर में नियम है कि बिना किसी नए अधिकारी के आए रिलिविंग नहीं होती। अब अधिकारी की ताकत का अंदाजा लगा सकते हैं, जो जीएडी से सिंगल आर्डर ही नहीं...रिलिविंग भी लिखवा लिया। कमाल तो ये कि डिप्टी कलेक्टर का बिलासपुर ट्रांसफर किया गया है, उसी बिलासपुर में उन्होंने कहर ढा डाला था। उनके कार्यकाल में जमीनों के ऐसे-ऐसे नायाब खेल हुए कि वहां हाहाकार मच गया था। गंभीर शिकायतों के बाद एसीबी का उनके यहां छापा पड़ा। और रिपोर्ट के अनुसार उनके यहां बेहिसाब अनुपातहीन संपत्तियां मिली। मगर बलिहारी गुरू उस पॉलिटिशियन की...जिन्होंने ऐसे हरफनमौला अफसर की फिर से बिलासपुर पोस्टिंग के लिए रिकमंड किया। कायदे से बिलासपुर के लोगों को उस नेताजी का शाल-श्रीफल से सम्मान करना चाहिए।

ब्यूरोक्रेसी के लिए अच्छी खबर

आईएएस के 94 बैच में निधि छिब्बर सीनियर थीं। मगर सरकार ने उनके पति को मनीला से बुलाकर राज्य की ब्यूरोक्रेसी की कमान सौंपी। मगर प्रभाव के मामले में अब निधि छिब्बर पति विकास शील से आगे निकल गई हैं। भारत सरकार ने निधि को नीति आयोग का सीईओ का चार्ज दिया है। पावर की दृष्टि से निश्चित तौर से मुख्य सचिव का ओहदा बड़ा होता है। अगर दोनों में से किसी को चुनने कहा जाए तो निश्चित तौर पर सीएस का पद ही चुनेगा। मगर जब तक निधि इस कुर्सी पर हैं...नेशनल लेवल पर एक्सपोजर और प्रोटोकॉल में उपर रहेंगी। हालांकि, इन सबसे अलग छत्तीसगढ़ ब्यूरोक्रेसी के लिए महत्वपूर्ण यह कि लगातार यह दूसरा मौका होगा, जब छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस अधिकारी को नीति आयोग की जिम्मेदारी मिली है। इससे पहले बीवीआर सुब्रमणियम नीति आयोग के सीईओ रहे और अब निधि छिब्बर।

कलेक्टरों की वैकेंसी?

ये पहला मौका होगा, जब कलेक्टरों के लिए बड़े जिलों में कोई वैकेंसी नहीं है। बिलासपुर, कोरबा, रायगढ़, दुर्ग, राजनांदगांव, दंतेवाड़ा, जगदलपुर, अंबिकापुर... इन सभी जिलों में नए कलेक्टर हैं...मुश्किल से ये दो महीने से लेकर 10 महीने वाले हैं। अब इतनी जल्दी कलेक्टर बदलते नहीं। अंदेशा है, मई में कुछ बड़ा हो। दीपक सोनी के सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने की वजह से सरकार ने बलौदा बाजार में नए कलेक्टर की पोस्टिंग करने आईएएस अधिकारियों की एक लिस्ट निकाली है। मगर बड़ी लिस्ट सुशासन तिहार के बाद मई एंड तक आएगी। तब तक कुछ कलेक्टरों का कार्यकाल साल-डेढ़ साल क्रॉस कर जाएगा।

आईएएस को रिवार्ड?

बलौदा बाजार जिले का ग्रह-नक्षत्र कुछ ऐसा खराब चल रहा था कि जिले में सुनील जैन के बाद कोई कलेक्टर साल पूरा नहीं कर पाया। 10 जून की हिंसा के बाद चार महीने में ही कलेक्टर केएल चौहान सस्पेंड होकर पेवेलियन लौट गए थे। कलेक्ट्रेट में आगजनी और हिंसा में जिले का नाम खराब हुआ सो अलग। कलेक्टर चौहान को निलंबित करने के बाद राज्य सरकार ने विपरीत परिस्थितियों में रायपुर से आईएएस दीपक सोनी को बलौदा बाजार संभालने के लिए भेजा और वे सरकार की उम्मीदों पर खरे ही नहीं उतरे बल्कि पौने दो साल पूरा कर भी किया। हालांकि, उन्हें इस बात का मलाल रहेगा कि बलौदा बाजार की स्थिति को संभालने का उन्हें रिवार्ड नहीं मिला। दीपक सूरजपुर, दंतेवाड़ा, कोंडागांव के बाद बलौदा बाजार में रहे। याने उन्हें कोई बड़ा मैदानी जिला करने का मौका नहीं मिला। जबकि, बलौदा बाजार के नाम से घबराने वाले कई आईएएस अधिकारियों को बड़े जिले मिल गए।

विधायक को खुशखबरी

बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला के लिए छत्तीसगढ़ का 25वां बजट हमेशा के लिए यादगार बन गया। 24 फरवरी को ओपी चौधरी विधानसभा में बजट पेश कर रहे थे और उधर सुशांत को बिलासपुर से खबर आई...घर में नया मेहमान आया है। बजट खतम होते बिलासपुर भागे। याने ओपी का बजट सुशांत के लिए सुखद रहा। उनके सियासी वारिस का आगमन हुआ।

होली खराब?

छत्तीसगढ़ की सियासत के लिए अगला हफ्ता काफी महत्वपूर्ण रहने वाला है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियों से राज्यसभा के लिए एक-एक नेता का चुनाव करना है। उधर, होली में अब तीन दिन बच गए हैं, दोनों पार्टियों ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। हालांकि, दो और तीन मार्च को भी नामंकन के लिए विधानसभा खुला रहेगा। मगर पुराने दृष्टांतो से लगता नहीं कि लास्ट डेट से पहले नामंकन जमा हो पाएगा। खासकर, कांग्रेस में लास्ट मोमेंट में ही तय होता है। ऐसे में, विधायकों को डर सता रहा कि अगर 5 मार्च को नामंकन दाखिल हुआ तो उन्हें होली छोड़ रायपुर आना पड़ेगा।

रायपुर, साहित्य और पहचान

बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने कहा कि रायपुर साहित्या उत्सव की सफलता को देखते सरकार ने तय किया है कि अब हर साल साहित्य उत्सव आयोजित किए जाएंगे। जाहिर है, पिछले महीने नवा रायपुर में आयोजित साहित्य उत्सव बेहद सफल रहा था। आयोजन इतना कसा हुआ था कि लोग तीन दिनों तक वहां डटे रहे। अब हर साल इस आयोजन से साहित्य के मामले में जयपुर जैसी पहचान रायपुर की भी बनेगी।       

अंत में दो सवाल आपसे?

1. छत्तीसगढ़ के एक ऐसे राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी का नाम बताइये, जिनके रुतबे से उनके हाई प्रोफाइल सिकेट्री भी घबराते हैं?

2. ग्लैमरस ड्रग पैडलर नव्या मलिक में आखिर ऐसा क्या है, जिससे पक्ष-विपक्ष दोनों असहज महसूस कर रहा है?