तरकश, 9 अगस्त 2026
संजय के. दीक्षित
न्यू अर्बन सिकेट्री कौन?
आईएएस आर शंगीता के लंबे अवकाश पर जाने से अर्बन एडमिनिस्ट्रेशन सिकेट्री का पद खाली हो गया है। हालांकि, बसव राजू इस विभाग के लिंक अफसर हैं, इस नाते वे जरूरी फाइलें निबटा रहे हैं। मगर पता चला है, सरकार जल्द ही नया नगरीय प्रशासन सचिव की नियुक्ति करेगी। बता दें, पिछले साल अमित कटारिया जब सेंट्रल डेपुटेशन से लौटे थे, तब इस विभाग को लेकर उनकी चर्चाएं तेज थी। वे खुद भी अर्बन के लिए इच्छुक थे। मगर उस समय बसव राजू को वे हिला नहीं पाए। आखिरकार, उन्हें हेल्थ से संतोष करना पड़ा। यद्यपि, इसी साल 6 मई को सरकार ने बसव राजू को हटाकर शंगीता को इस विभाग की कमान सौंपी थी, मगर वे लीव पर चली गईं। अब देखना है, सरकार किसे नगरीय प्रशासन सिकेट्री बनाती है। वैसे चर्चा आईएएस रजत कुमार के नाम की भी है। संभावना यह भी है, इसके साथ एक-दो विभाग में और बदलाव हो जाए। सचिवों में इस समय सिर्फ भुवनेश यादव ऐसे अफसर हैं, जिन पर सरकार की नजरें इनायत नहीं हो रही। उनसे समाज कल्याण लेकर पंजीयन दिया गया, जिसमें कोई नमस्ते करने भी नहीं आता। राज्य बनने के बाद ये विभाग हमेशा पूछल्ला रहा। याने बड़े विभाग के साथ ऐड किया गया। बाकी इस समय अच्छे और पार्फमिंग से लेकर बदनाम ऑफिसर्स...सबको कुछ-न-कुछ जरूर मिला है।
छत्तीसगढ़ का दुर्भाग्य!
हेल्थ में एक से बढ़कर एक बिग गन सिकेट्री रहे हैं। मगर आलम यह है कि 25 साल बाद भी आदिवासी इलाके में लोग मलेरिया जैसी सामान्य बीमारी से मर रहे हैं, तो शहरी क्षेत्रों के अस्पतालों की स्थिति भी जुदा नहीं है। दरअसल, किसी भी सिकेट्री ने हेल्थ का इंफ्रास्ट्रक्चर दुरूस्त करने की कोशिश नहीं की। जो भी इस विभाग में सचिव बनता है, वह एनजीओ और सप्लायरों से इस कदर घिर जाता है कि बाकी चीजों के लिए उसके पास टाईम नहीं बचता। आखिर, आपने कभी किसी हेल्थ सिकेट्री को जिला अस्पताल या पीएससी, सीएससी का मुआयना करते देखा है। जब तक हेल्थ सिकेट्री खुद स्वास्थ्य संस्थानों में जाकर स्थिति को नहीं समझेंगे, हेल्थ में रिफार्म के लिए क्या प्रयास करेंगे? पीडब्लूडी में इतना फास्ट काम क्यों शुरू हुआ है? नए सिकेट्री ने तीन महीने में पूरे छत्तीसगढ़ को मथ दिया। सरगुजा और बस्तर का कोई इलाका उनसे तीन महीेन में नहीं छूटा है। ईएनसी, सीई से लेकर पीडब्लूडी का पूरा सिस्टम उनके साथ दौड़ रहा है। हेल्थ में इसी तरह का कोई सिकेट्री आए, तभी जाकर इस विभाग का उद्धार होगा, वरना गंभीर बीमारी तो छोड़िये, आज के आधुनिक युग में लोग मलेरिया और बुखार से दम तोड़ते रहेंगे। हेल्थ में सबसे जरूरी है विभाग की बीमारी दूर करना। विभाग की बीमारी दूर हो जाएगी, तो इंसान की बीमारी अपने आप दूर हो जाएगी।
कलेक्टर का साहसिक निर्णय
चीफ सिकरेट्री विकास शील 2004 में कोरिया के कलेक्टर रहे। उस दौरान खड़गंवा ब्लॉक में डायरिया और मलेरिया बुरी कदर फैली हुई थी। बीजेपी की नई-नई सरकार बनी थी, सिस्टम को समझ में नहीं आ रहा था, लगातार हो रही मौतों को कैसे रोका जाए। जहां तक स्मरण है, हफ्ते भर में करीब 70 आदिवासियों की मौतें हो गई थी। तब कलेक्टर विकास शील ने साहस दिखाते हुए झोला छाप डॉक्टरों की बैठक बुलाई। उन्होंने उनसे आग्रह किया कि आप सब लोगों में मलेरिया की दवाइयां लेने के लिए अवेयर करें और सरकार की दवाइयां उन तक पहुंचाएं। हालांकि, इंडियन मेडिकल एसोसियेशन ने इसका काफी विरोध किया था। मगर आपको जानकर ताज्जुब होगा कि झोला छाप डॉक्टरों के सहयोग से डायरिया और मलेरिया पर काबू पाया गया। असल में, कड़वी सच्चाई यह है कि पांच-सात साल का हार्ड कोर्स करने के बाद कोई डॉक्टर गांवों में जाना चाहता नहीं और दूसरा पक्ष यह है कि वहां कोई सुविधाएं भी नहीं होती। तभी तो अजीत जोगी ने त्रिवर्षीय मेडिकल कोर्स प्रारंभ किया था। तब जोगी को देश भर के डॉक्टरों को जवाब देना पड़ा था। जाहिर है, जोगीजी प्लानर थे। उन्हें पता था कि सरगुजा और बस्तर की जैसी भौगोलिक स्थिति है, गरीबी पसरी हुई है, कोई एमबीबीएस, एमडी किया हुआ डॉक्टर वहां जाएगा नहीं। गांवों में अगर हेल्थ सिस्टम को पहुंचाना है, तो सिस्टम को इसी तरह कुछ करना होगा।
मरीजों के भोजन में कमीशन
हेल्थ विभाग में संवदेनहीनता का आलम ये है कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों को भोजन में भी कमीशन वसूला जा रहा। मरीजों को खाना पहुंचाने वाले ठेकेदारों को, अगर अस्पताल छोटा है तो 50 हजार और बड़ों को एक से दो पेटी। अब ये पैसा कहां जाता है, नहीं पता। मगर नीचता की ये पराकाष्ठा है। पता नहीं, उपर जाकर क्या जवाब देगे। आखिर, सरकारी अस्पताल में कौन भर्ती होता है? गरीब या बेसहारा। ठेकेदार कमीशन देगा तो फिर खाने में डंडी मारेगा ही। और, जब मरीजों के भोजन में कमीशन लिया जा रहा, तो बाकी में क्या होता होगा, समझा जा सकता है।
खबर...जो खबर नहीं बन पाई
लास्ट संडे राजधानी रायपुर में एक बड़ी बैठक हुई। उसमें सीएम विष्णुदेव साय, चीफ जस्टिस रमेश सिनहा समेत हाईकोर्ट के जज, रजिस्ट्रार तो थे ही, डीजीपी सहित पूरा पुलिस मुख्यालय, पीएस होम, सभी जिलों के डिस्ट्रिक्ट जज, रेंज के आईजी, जिलों के सभी 33 एसपी, सीजेएम मौजूद रहे। इसके साथ ही दिल्ली और चंडीगढ़ से गृह और एनआईसी के अफसर भी। मसला यह था कि पुलिस के तीन नए कानून बने हैं, उसके क्रियान्वयन में अपना छत्तीसगढ़ 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 25वें नंबर पर है। बताते हैं, इसको लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सरकार को डीओ लेटर लिखा था। केंद्रीय गृह मंत्रालय का पत्र मिलते ही हड़कंप मचा। सूबे के होम मिनिस्टर विजय शर्मा ने खुद ही मोर्चा संभाला। उन्होंने खुद ही बिलासपुर जाकर चीफ जस्टिस से मीटिंग के लिए आग्रह किया। राज्य के कानून-व्यवस्था और नए कानूनों पर अमल करने दिन भर मंथन चला। और निष्कर्ष यह निकला कि पुलिस से लेकर एफएसएल, अभियोजन नए कानूनों को लेकर कतई गंभीर नहीं है। एफएसएल के सारी रिपोर्ट ऑनलाइन होनी चाहिए, मगर इस पर अभी काम ही शुरू नहीं हुआ है। एफआईआर दर्ज होने के 90 दिन के भीतर मामलों का निराकरण हो जाना चाहिए, छत्तीसगढ़ में इसको लेकर किसी को सुध नहीं है। बहरहाल, इतनी अहम बैठक रायपुर में हुई मगर पता नहीं कैसे, खबरों में कहीं नजर नहीं आई।
आईआरएस को संविदा नियुक्ति
छत्तीसगढ़ में एक और आईआरएस अफसर को वीआरएस के बाद संविदा नियुक्ति मिल सकती है। ज्ञातव्य है, डायरेक्टर फायनेंस इंस्टिट्यूशन शीतल वर्मा ने वीआरएस के लिए अप्लाई कर दिया है। शीतल इंडियन रेवेन्यू सर्विस की अधिकारी हैं। वे करीब 18 साल से छत्तीसगढ़ में हैं। पहले इंकम टैक्स में रही। पिछली सरकार में राज्य सरकार में उन्हें डेपुटेशन मिला। सात साल कंप्लीट हो जाने के बाद भारत सरकार ने उनका डेपुटेशन बढ़ाने से मना कर दिया। इसके बाद शीतल ने वीआरएस के लिए अप्लाई कर दो महीने की छुट्टी पर चली गई हैं। सरकार के सूत्रों का कहना है, फायनेंस में उनके अनुभवों का लाभ लेने वीआरएस एक्सेप्ट होने के बाद संविदा नियुक्ति दी जा सकती है।
आईएएस सस्पेंड
सांसद बृजमोहन अग्रवाल और आईएएस अमित कटारिया एपिसोड में 2005 की घटना ताजा हो गई। तब बृजमोहन फॉरेस्ट के साथ पर्यटन मंत्री थे। और 87 बैच के आईएएस अजयपाल सिंह पर्यटन बोर्ड के एमडी। दोनों के बीच तनातनी इतनी बढ़ गई थी कि अजयपाल सिंह ने मंत्रालय में प्रेस कांफ्रेंस बुला मंत्री के खिलाफ टिप्पणी कर दी। रमन सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए कुछ ही घंटे में अजयपाल को सस्पेंड कर दिया था। उसके बाद अजयपाल का कैरियर इतना खराब हो गया कि उसके बाद उन्हें कोई ढंग की पोस्टिंग नहीं मिली। और आखिरकार 2017 में उन्हें फोर्सली रिटायर कर दिया गया।
विशेषाधिकार हनन और कार्रवाई
टेलीफोन पर हॉट टॉक के बाद रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने लोकसभा में विशेषाधिकार हनन की शिकायत की है। लोकसभा सचिवालय ने इस पर डीओपीटी से रिपोर्ट मांगी है। अब लोगों की जिज्ञासा है, इसके आगे क्या होगा? डीओपीटी के रिप्लाई से अगर लोकसभा सचिवालय संतुष्ट नहीं हुआ तो मामला प्रीविलेज कमेटी के पास जाएगा। सांसद प्रीविलेज कमेटी के सदस्य होते हैं। कमेटी चाहेगी तो अफसर को तलब कर विवाद का पटाक्षेप करने उन्हें सॉरी कहने बोल सकती है। अफसर ने अगर सॉरी नहीं बोला तो फिर उसके खिलाफ कमेटी कमेंट्स लिख देती है। चूकि, नीचे से उपर तक हर जगह आईएएस का दबदबा रहता है, इसलिए इसमें फिर कुछ होता नहींे। और प्रीविलेज कमेटी का कमेंट्स फाइलों में दफन हो जाता है। अफसर का नुकसान ये होता है कि तब तक अफसर का अच्छा खासा मीडिया ट्रॉयल हो जाता है।
रुलिंग पार्टी, अप्रिय एपिसोड
छत्तीसगढ़ के दो सांसदों ने अपनी ही सरकार में एक आईएएस और दो राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के खिलाफ लोकसभा में विशेषाधिकार हनन की शिकायत की है और लोकसभा सचिवालय ने इस पर कार्रवाई भी शुरू कर दी है। कायदे से ऐसे अप्रिय प्रसंग अपनी सरकार में नहीें होते। सिस्टम और संगठन में बैठे लोगों को इसमें हस्तक्षेप कर इसे टाला जा सकता था। सांसद और अफसर दोनों को साथ बिठाकर इस मसले का खतम किया जा सकता था। मगर बीजेपी पार्टी ने पूर्व सीएम भूपेश बघेल को मौज लेने का मौका दे दिया। ऐसा नहीं है कि इससे पहले कभी ऐसा हुआ नहीं। रमन सिंह की दूसरी पारी में एक वरिष्ठतम मंत्री का चीफ सिकेट्री सुनिल कुमार के साथ काफी तनातनी हुई थी। कोरबा कलेक्टर से भी बहस हो गई थी। मगर उस समय बात आगे नहीं बढ़ी, क्योंकि क्षेत्रीय संगठन मंत्री सौदान सिंह इस तरह के विषयों को बखूबी संभाल लेते थे। सौदान सिंह का सरकार से लेकर मंत्रियों पर इतना प्रभाव था...उनके बीच इतना समन्वय बनाकर रखते थे कि 15 साल में किसी मंत्री ने मुख्यमंत्री रमन सिंह को पत्र लिखने की जुर्रत नहीं की।
एक रुपए वेतन की कहानी
देश के छोटे से लेकर नामचीन मीडिया की रिपोर्ट में एक रुपए वेतन की खबर से खुद आईएएस अमित कटारिया भी हैरान होंगे। दरअसल, इस एक रुपए के वेतन के पीछे अपनी कहानी है। ब्यूरोक्रेट्स बताते हैं...अमित कवर्धा के एसडीएम थे। कुछ कागजी दिक्कतों की वजह से दो-तीन महीने उनका वेतन नहीं बन पाया। इसी बीच उनका कांकेर ट्रांसफर हो गया। बताते हैं, उनके बाद जो आईएएस एसडीएम बनकर आए, उन्होंने हंसी-मजाक में कह दिया...अमित सर, को वेतन नहीं मिला तो क्या फर्क पड़ता है, वे एक रुपए वेतन में भी काम कर लेंगे। वहीं से एक रुपए वेतन का रायता फैल गया। जबकि, सच्चाई यह है कि बाकी आईएएस की तरह अमित कटारिया भी हर महीने अपना पूरा वेतन ड्रॉ करते हैं। 2004 बैच के आईएएस के हिसाब से उनका वेतन करीब दो लाख 85 हजार बनता है। अब चूकि एक रुपए वेतन की खबर इस कदर फैल गई कि अमित बोले तो क्या बोले। लोग नासमझी दिखाएं तो वे क्या करेंगे...वे भी मौज ले रहे हैं।
प्रेरणादायी...
हरिवंश राय बच्चन की कविता है.....गिरना भी जरूरी है, औकात का पता चलता है। बढ़ते हैं जब हाथ उठाने को, तब अपनों का पता चलता है। जिन्हें गुस्सा आता है, अक्सर वे लोग सच्चे होते हैं, मैंने झूठों को अक्सर दिन-रात मुस्कुराते हुए देखा है। सीख रहा हूं अब मैं भी इंसानों को पढ़ने का हुनर, सुना है चेहरे पर किताबों से ज्यादा लिखा होता है।
अंत में एक सवाल आपसे?
1. क्या कलेक्टरों की एक ट्रांसफर लिस्ट जल्दी आ सकती है?
