तरकश, 2 अगस्त 2026
संजय के. दीक्षित
कलेक्टर और 50 लाख की पूजा
सूबे में एक कलेक्टर की आधा करोड़ की तांत्रिक पूजा को लेकर बड़ी चर्चा है। बताते हैं, कामख्या देवी के किसी पंडित ने कलेक्टर को सलाह दी कि आप 50 लाख वाला तांत्रिक अनुष्ठान करा लो...आपका विकेट सुरक्षित रहेगा। कलेक्टर साब ने आव-देखा का ताव, यस कर दिया। अब कामख्या देवी में इतनी महंगी पूजा होती भी है या पंडित ने उन्हें ठग लिया, इसका पता नहीं। मगर उन्होंने यह बात अपने प्रियतमा को बता दी। अब किसी फेमिनिन जेंडर को जानकारी हो जाए, और बात पसरे नहीं, ऐसा संभव है क्या? सो, बात मार्केट में आ गई। हालांकि, विकेट पर टिके रहने के लिए किसी कलेक्टर के लिए 50 लाख कुछ भी नहीं है। कलेक्टर जिले का मालिक होता है। डीएमएफ ना भी हो तो, एक आदिवासी जमीन को बेचने की परमिशन में छोटे जिलोें के कलेक्टरों को भी कई खोखा मिल जाते हैं। बहरहाल, आधा करोड़ वाले अनुष्ठान का कमाल तो है, आदिवासी स्टेट में खुलेआम बड़े-बड़े धतकरम करने के बाद भी उनका विकेट मुफीद है तो कुछ तो बात है।
एसपी को दंडाधिकारी पावर?
नए पुलिस कानून में जिलों के एसपी और एडिशनल एसपी को कार्यपालिक दंडाधिकारी पावर देने का प्रावधान किया गया है। अधिकांश राज्यों ने इसे इंप्लीमेंट कर दिया है, क्योंकि इसमें स्टेट को मार्क्स मिलता है। छत्तीसगढ़ को अभी इसमें जीरो नंबर मिल रहा। बताते हैं, मुख्य सचिव ने गृह विभाग के रिव्यू में इसको लेकर सवाल भी किया था कि इसमें जब नंबर मिलना है तो करने में क्या दिक्कत है। मगर अभी इस पर कोई सुगबुगाहट नहीं है। हालांकि, कार्यपालिक मजिस्ट्रेट का अधिकार ट्रांसफर होने से कलेक्टरों का कुछ नुकसान नहीं होना है। कार्यपालिक दंडाधिकारी में सिर्फ 151 का अधिकार दिया गया है, जो तहसीलदारों के पास रहता है। नए कानून में एसपी, एसीपी को 151 का अधिकार इसलिए ट्रांसफर किया गया कि कभी आधी रात को 151 में किसी को गिरफ्तार किया गया तो तहसीलदार या एसडीएम को जमानत देने के लिए कहां ढूंढने जाएंगे। हालांकि, राजस्व अधिकारियों का कहना है, पुलिस के पास कार्यपालिक दंडाधिकारी पावर जाएगा तो रेट बढ़ जाएगा। अभी मुजरिम अगर गरीब रहा तो हजार रुपए में काम चल जाता है। 500 वकील लेता है और 500 एसडीएम या तहसीलदार। पुलिस के पास अगर ये अधिकार गया तो फिर रेट काफी हाई हो जाएगा। हालांकि, इस तर्क में दम नहीं दिखता। आखिर, छत्तीसगढ़ के एसपी और एसीपी इतने गरीब नहीं कि पांच सौ, हजार ले लेंगे। इसलिए सीएस साब को दोबार रिमाइंड कर इसका क्रियान्वयन करा देना चाहिए।
धुंआधार विजिट
सीएम विष्णुदेव साय तीन दिन के दिल्ली दौरे में थे। उनका यह दौरा कई मायनों में अलग रहा। संभवतः किसी सीएम का यह पहला विजिट होगा, जिसमें दिल्ली में इतने सारे प्रभावशाली शख्सियतों से मुलाकात हुई। सीएम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिले और संसद में हंगामे, क्रायसिस के बीच पीएम नरेंद्र मोदी से भी। मंत्रियों में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रेल मंत्री आश्वनी वैष्णव, कृषि मंत्री शिवराज सिंह, आदिम जाति मंत्री जुएल उरांव, संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और फूड तथा एचआडी मंत्री प्रह्लाद जोशी। रायपुर लौटते-लौटते उनकी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से भी मुलाकात हो गई। याने प्रेसिडेंट, पीएम, अमित शाह समेत छह यूनियन मिनिस्टर और फिर पार्टी अध्यक्ष। इसके बाद दिल्ली में अब बचता क्या है? असल में, बस्तर से नक्सलियों के खात्मे के बाद भारत सरकार की प्रायरिटी में छत्तीसगढ़ काफी उपर आ गया है। छत्तीसगढ़ को वेटेज देने के संदर्भ में उपर से क्लियर इंस्ट्रक्शन भी है। इसलिए, किसी भी मंत्री से बात करो, तुरंत टाईम मिल जाता है। कुछ भूूमिका सीएम की टीम की भी है। पीएस टू सीएम सुबोध सिंह दिल्ली में रहे हैं, उनका वहां बढियां कनेक्शन है। बहरहाल, कुल मिलाकर सीएम का यह धुंआधार दिल्ली दौरा रहा।
देवपुरूष के नाम पर महापाप!
सेम इसी हेडिंग से एक जून 2025 को इसी जगह पर तरकश में खबर लगी थी और फिर उसे रिपीट करना पड़ रहा तो आप समझ सकते हैं कि झंकझोरने वाला कोई मसला होगा। जी हां, ऐसा ही है। दरअसल, छत्तीसगढ़ में दूसरी बार सरकार बनने के बाद बीजेपी ने तय किया था कि सूबे के सभी 182 नगरीय निकायों में अटल पार्क बनाया जाएगा और उसमें धातु की अटल जी की प्रतिमा लगाई जाएगी। इसके लिए नगरीय प्रशासन विभाग ने 45 करोड़ रुपए स्वीकृत किया था। मजरा इसी 45 करोड़ से शुरू होता है। तरकश में हमने एक साल पहले चेताया था कि टेंडर होने के बाद भी रायपुर में कुछ लोग दबाव बना रहे कि अटल जी की मूर्ति टेंडर से बाहर जाकर अनाधिकृत रूप से पांच लोगोें से खरीदा जाए। इसको लेकर प्रसिद्ध मूर्तिकार और पद्यश्री नेल्सन ने नगरीय प्रशासन के डायरेक्टर से लिखित शिकायत की थी कि अनुभवहीन लोगों को मूर्ति सप्लाई का काम दिया जा रहा। इसमें व्यापक गड़बड़ी हो सकती है। मगर वाह रे सिस्टम। इसके बाद भी होश नहीं आया। और अनाड़ी लोगों से वन-टू-का-फोर करते हुए मूर्तियां ले ली गई। अब सुनिये....कई निकायों की मूर्तियां पहली बारिश में ही खराब होने लगी। कटघोरा नगर पंचायत की अटल प्रतिमा को धातु की बजाए सीमेंट की निकली। इसलिए, बारिश से उसकी परतें निकल गई। वहां के बीजेपी अध्यक्ष ने इसकी शिकायत की। और नगरीय प्रशासन विभाग ने वहां के सब इंजीनियर को सस्पेंड कर दिया।
बलि का बकरा
जब नगरीय निकायों को फोन करके निर्देशित किया गया था कि रायपुर के पांच ठेकेदारों से ही अटलजी की प्रतिमाएं खरीदनी है तो फिर प्रश्न यह है कि कटघोरा नगर पंचायत के सब इंजीनियर का इसमें क्या कसूर। दरअसल, ऐसे कृत्यों की वजह से ही बलि का बकरा मुहावरा बनाया गया होगा। आखिर किसी पर भी ठीकरा फोड़ना ही था। क्योंकि, मामला बीजेपी के देवपुरूष की प्रतिमा में भ्रष्टाचार से जुड़ा था...सोशल मीडिया में इस पर काफी तीखी प्रतिक्रिया आ रही थी। वैसे भी बड़े लोगों के खिलाफ कभी कार्रवाई कहां होती है। मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पैसे के लिए इतना नीचे गिरा जा सकता है? अटलजी के प्रति बीजेपी ही नहीं पूरा देश श्रद्धा रखता है। आम आदमी भी कम-से-कम अटलजी जैसे विराट शख्सियत की प्रतिमा मामले में कुछ इधर-उधर करने से पहले सोचेगा। मगर बीजेपी के सिस्टम में बैठे लोग....?
आईएएस, छुट्टी और डेपुटेशन
आईएएस आर शंगीता पिछली कांग्रेस सरकार में कारण कोई भी हो, पूरे पांच साल लीव पर रहीं। दिसंबर 2023 में बीजेपी की सरकार आई तो वापस ज्वाईन की और फिर छह महीने की लीव पर अमेरिका जा रही हैं। शंगीता अच्छी अफसर हैं। एक तो सिस्टम ने उनसे शराब बिकवाकर अच्छा काम नहीं किया। जाहिर है, इस विभाग में कभी भी अच्छे अफसरों को पोस्ट नहीं करना चाहिए, क्योंकि वहां पैसे गिनने के अलावे, कोई काम नहीं होता। बहरहाल, 6 मई के आईएएस ट्रांसफर में शंगीता को अर्बन एडमिनिस्ट्रेशन का सिकेट्री बनाया गया और उन्होंने तीन महीने में ही विभाग को हिलाकर रख दिया। चुनावी दृष्टि से नगर निगम बड़ा महत्वपूर्ण विभाग है। पता नहीं क्यों, इतना अच्छा काम कर रही शंगीता को अवकाश कैसे स्वीकृत कर दिया गया। हालांकि, ये पहली बार नहीं हुआ है कि अच्छे अफसरों को सिस्टम ने सुध नहीं लिया। दिवंगत आईएएस एम. गीता बढ़ियां हैंड थीं। वे राज्य बनने के 16 साल बाद छत्तीसगढ़ लौटी थीं तो बीबीआर सुब्रमणियम 17 साल बाद दिल्ली से वापस आए। 2003 बैच की आईएएस ऋतु सेन भी रिजल्ट देने के नाम से जानी जाती हैं। उनके कलेक्टर रहने के दौरान उनके चलाए स्वच्छता अभियान से अंबिकापुर आज भी रैंक कर रहा है। वे पिछले 13 साल से रायपुर से बाहर हैं। श्रुति सिंह पांच साल यूपी में डेपुटेशन पर रहीं और पांच साल से दिल्ली में रेजिडेंट कमिश्नर हैं। याने 10 साल से छत्तीसगढ़ से आउट। इसी तरह नीरज बंसोड़ और संगीता पी का भी पांच साल से अधिक हो गया है। सवाल उठता है, जब सुबोध सिंह, मुकेश बंसल और अमरेश मिश्रा जब डेपुटेशन से लौट सकते हैं या बुलाया जा सकता है, तो लंबे समय से जमे अफसरों को क्यों नहीं। जाहिर है, छत्तीसगढ़ से लंबे समय से बाहर कई अफसर काफी अच्छे हैं। वे अगर यहां होते तो राज्य का भला होता, ब्यूरोक्रेसी में काम को लेकर स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा होता। चीफ सिकरेट्री को सरकार से बात कर अच्छे अफसरों को बुलाने का प्रयास करना चाहिए।
महिला अफसर का वीआरएस
भारतीय राजस्व सेवा की अफसर पिछले कई साल से डेपुटेशन पर मंत्रालय में पदस्थ थी। सुनने में आ रहा कि उनका डेपुटेशन नहीं बढ़ा तो उन्होंने स्वेच्छिक सेवानिवृत्ति की अर्जी लगा दी है। याने वे नौकरी छोड़ रही हैं। छत्तीसगढ़ में अमन सिंह के बाद वे दूसरी आईआरएस अफसर होंगी, जो नौकरी छोड़ रही हैं। हालांकि, अमन सिंह का मसला दूसरा था। वे तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह के सिकेट्री थे। डेपुटेशन एक्सटेंड नहीं हुआ, तो उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। अब महिला आईआरएस का क्या मामला है, पता नहीं।
आईपीएस को नोटिस
पुलिस मुख्यालय ने एक आईपीएस अधिकारी को कारण बताओ नोटिस थमा दी है। बताते हैं, पिछले महीने एक जिले के एसपी रहते आईपीएस ने बिना मुख्यालय को सूचित किए, दूसरे प्रदेश का दौरा कर आए थे। खुफिया विभाग को इसका पता चल गया। नियम यह है कि एसपी को जिला छोड़ने की सूचना अपने आईजी के साथ पीएचक्यू को देना चाहिए। मगर न उन्होंने आईजी को बताया और न पीएचक्यू को। और तफरीह करने दूसरे राज्य चले गए। पीएचक्यू के अधिकारियों ने संबंधित आईजी से पूछा तो आईजी बोले, साब ये तो पहले भी मुझे बताए बिना कई बार दिल्ली, मुंबई जा चुका था। यह सुनकर पुलिस मुख्यालय ने अफसर को सबक सिखाने का फैसला किया।
साल में दो विदेश दौरा
आईपीएस की किस्मत खराब थी, बिना इजाजत अदर स्टेट चले गए और पकड़े गए। छत्तीसगढ़ में तो ये कॉमन हो गया है। कलेक्टर, एसपी बिना जीएडी या पीएचक्यू को इंफार्म किए जिला छोड़ देते हैं। कुछ महीने की पहले की बात है, एक कलेक्टर, एसपी बिना किसी को बताए शादी में मुंबई चले गए थे। मुख्य सचिव भी दो-एक कलेक्टरों को बिना नाम लिए टोक चुके हैं, कि जिला छोड़ वे घूमते रहते हैं। अब तो एक और चीज हो रही। फील्ड में रहते कलेक्टर, एसपी साल में दो-दो बार विदेश घूमकर आ जा रहे। ये सही है कि विदेश जाना अब खास कॉस्टली नहीं रहा, मगर कोई लिमिट तो होनी चाहिए। मुख्यमंत्री से लेकर कई मंत्री एक बार ही फॉरेन जा पाए हैं, मगर शायद ही कोई अफसर होगा, जो ढाई साल में चार-पांच देश न घूम आया होगा। आईएएस, आईपीएस तो बड़ी बात, राप्रसे और रापुसे भी पीछ्रे नहीं। एक एडिशनल एसपी को पीएचक्यू की फटकार के बाद विदेश में सैर-सपाटे की फोटो सोशल मीडिया से हटाना पड़ा।
लोहा चोर जनप्रतिनिधि
छत्तीसगढ़ के करप्शन के वायरस से केंद्र सरकार की कंपनियां भी अब अछूती नहीं रही। बात एशिया का सबसे बड़ा स्टील प्लांट कहे जाने वाले बीएसपी की कर रहे हैं। पुलिस ने 250 टन लोहा चोरी के मामले में दर्जन भर लोगों को पकड़ने के अलावा भिलाई स्टील प्लांट के जीएम, एजीएम को भी गिरफ्तार किया। पुलिस के राडार पर सीआईएसएफ के कई अधिकारी भी है। जाहिर है, बीएसपी में 600 सीआईएसएफ के जवान तैनात हैं। मगर आश्चर्य कि जहां से ट्रक-के-ट्रक लोहा पार हो रहा था, वहां पर सीआईएसएफ ने उस प्वाइंट पर न किसी जवान को तैनात किया और न ही वहां सीसीटीवी कैमरा लगवाया। याने पूरी मिली-जुली कुश्ती थी। पुलिस की जांच में ये बात सामने आई है कि सिर्फ मार्च से लेकर अब तक 3000 टन लोहा चोरी हुई है, जो करीब 16-17 करोड़ की होती है। हालांकि, बीएसपी में लोहा चोरी का खेल प्रबंधन और माफियाओं के साथ मिलकर करीब दशक भर से चल रहा था। वो तो एसएसपी का कमाल कि वे किसी की परवाह नहीं करते, सो गिरोह पर हाथ डाल दिए। बहरहाल, वहां के लोगों का कहना है, भिलाई के अधिकांश जनप्रतिनिधि लोहा चोरी करते-करते नेता बन गए। भिलाई के 90 परसेंट सफेद कपड़े पहनने वाले लोहा चोरी कर बड़े और सम्मानित आदमी बन बैठे। उन चोरों के कार्यक्रमों में बड़े-बड़े लोग, नेता-मिनिस्टर पहुंचते हैं।
किस्मत-किस्मत की बात
अफसरों की पोस्टिंग में किस्मत का भी बड़ा रोल रहता है। अब देख ही रहे हैं, कवर्धा के कलेक्टर गोपाल वर्मा पूर्व मुख्यमंत्री के सगे भांजी दामाद हैं। कांग्रेस सरकार में वे एलायड कोटे से डंके की चोट पर आईएएस बनें और कुछ ही दिन बाद उन्हें खैरागढ़ की कलेक्टरी मिल गई। दिसंबर 2023 में सरकार बदली तो लगा कि वर्मा जी के अच्छे दिन अब चले गए। मगर वर्मा जी ने तो कमाल कर दिया। डिप्टी सीएम के गृह जिले में कलेक्टर बन गए और अब तो दो साल होने जा रहे हैं। कवर्धा में दो एसपी बदल गए...पुलिस अधीक्षक धर्मेंद्र छवई से तो उनकी तनातनी हो गई थी। मगर वर्मा जी को कोई हिला नहीं पाया। ये होती है किस्मत। कई अफसर आज भी पिछली सरकार के लेवल को धो नहीं पाए हैं तो आधा दर्जन से अधिक आईपीएस अधिकारी ढाई साल बाद भी बियाबान में पड़े हैं। मगर दामाद बाबू का जलवा देखिए। तभी तो ब्यूरोक्रेसी में लोग चुटकी ले रहे...वर्मा जी की कुंडली देखनी पड़ेगी....आखिर जिस जिले में सिद्धार्थ परदेशी, मुकेश बंसल, सोनमणि बोरा, दयानंद, अवनीश शरण जैसे कलेक्टर रहे हैं, वहां वर्मा जी डटे हुए हैं। अलबत्ता, गंभीर सवाल ये भी कि सिस्टम का कोई मापदंड है भी या नहीं! एक तरफ, ढाई साल गुजरने के बाद भी पिछली सरकार के कई अफसरों को लेकर नाक-भौं सिकोड़ा जाता है, और दूसरी तरफ दामाद बाबू...?
पीएससी खाली क्यों?
छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी सरकारी परीक्षा एजेंसी पीएससी में चेयरमैन प्लस थ्री मेंबर का सेटअप एपूव्ह हुआ था। मगर विडंबना है कि इस समय वन प्लस वन की स्थिति है। याने एक चेयरमैन और एक मेंबर। बता दें, पीएससी के गठन के बाद ऐसा कभी नहीं हुआ कि पूरे तीन मेंबर रहे हों। इस समय तो स्थिति और खराब हो गई है। ऐसा नहीं कि कोई पीएससी का मेंबर नहीं बनना चाहेगा। पीएससी मेंबर का पद चीफ सिकरेट्री के समकक्ष होता है, बंगला-गाड़ी, नौकर और चार लाख के करीब सेलरी मिलती है। मगर पिछली सरकार ने भी मेंबरों के सभी पद नहीं भरे और इस सरकार में भी यही हो रहा है। परीक्षाओं के आयोजन में महीनो ंसे लेकर सालों विलंब होने की वजह भी शायद यही होगी। सिस्टम चाहे तो अच्छी छबि वाले शिक्षाविदों या रिटायर अधिकारियों को पोस्ट किया जा सकता है।
चेयरमैनों के नाते-रिश्तेदार
छत्तीसगढ़ पीएससी के साथ विडबंना यह है कि या तो परीक्षा घपले-घोटालों की भेंट चढ़ गई या फिर चेयरमैन या मेंबरों के नाते-रिश्तेदार डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी बन गए। इसमें जेल की सैर कर रहे टामन सिंह सोनवानी सबसे आगे हैं। हालांकि, टामन सिंह ने सीमाओं को लांघ दिया, इसलिए एक्सपोज हो गए। वरना, प्रदीप जोशी को छोड़ अधिकांश चेयरमैनों के बेटे-बेटियां आज की तारीख में डिप्टी कलेक्टर या कलेक्टरी कर रही हैं। जिसके बच्चे नहीं, वे अपने भाई-बहनों के बच्चों को उपकृत कर गए।
सबसे बड़ा रुपैया!
डायन भी एक घर छोड़कर चलती है। मगर छत्तीसगढ़ के डॉक्टर्स जेबकटी में ऐसे ब्लाइंड हो गए हैं कि अपना-पराया, बिरादरी की भी परवाह नहीं। मसला राजनांदगांव मेडिकल कॉलेज की एक इंटर्न स्टूडेंट का है। एमबीबीएस के फायनल ईयर की स्टूडेंट्स को कैंसर डिटेक्ट हुआ। ऑपरेशन से पहले वह एक रुपए में सरकारी जमीन लेकर पैथोलेब खड़ा करने वाले धनपशुओं के इंस्टिट्यूट में पहुंची। छात्रा के परिजनों का कहना है कि तीन हजार के टेस्ट के बदले 12500 रुपए वसूला गया। वो भी गलत रिपोर्ट का। जिस अस्पताल में ऑपरेशन हुआ, वहां का टेस्ट रिपोर्ट बिल्कुल उल्टा आया। मेडिकल छात्रा ने पैथोलेब से आग्रह किया, एक तो रेट ज्यादा, वो भी गलत रिपोर्ट...कम-से-कम कुछ पैसा ही वापस कर दें। छात्रा छत्तीसगढ़ की है, आर्थिक दृष्टि से कमजोर भी। मगर धनपशुओं ने टका-सा जवाब दे दिया...पैसा वापस करने का सवाल ही नहीं। रायपुर के डॉक्टर बिरादरी को इस पर विचार करना चाहिए...एमबीबीएस की छात्रा, कैंसर से पीड़ित...फिर भी धरती के भगवान का दिल नहीं पसीजा? क्या पैसा ही सब कुछ हो गया है?
अंत में दो सवाल आपसे?
1. कलेक्टरी सुरक्षित रखने के लिए आधा करोड़ की पूजा कराने वाले कलेक्टर किस संभाग के हैं?
2. क्या ये सही है कि मंत्रिमंडल की सर्जरी अब अगले अक्टूबर, नवंबर तक के लिए टल गया है?
