रविवार, 10 मई 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: महतारी कलेक्टर



तरकश, 10 मई 2026

संजय के. दीक्षित

महतारी कलेक्टर

प्रशासनिक सर्जरी में सरकार ने ब्यूरोक्रेसी की महतारियों का सम्मान बढ़ाया है। बुधवार को सात जिलों में नए कलेक्टर पोस्ट किया गया, उनमें पांच महिलाएं हैं। इन पांच को मिलाकर छत्तीसगढ़ में अब 10 महतारी कलेक्टर हो गई है। राज्य बनने के बाद यह पहला मौका है, जब कलेक्टरी में महिलाओं की संख्या 10 टच कर गया है। इससे पहले रमन सिंह की तीसरी पारी में एक समय महिला कलेक्टरों की संख्या छह हुई थीं। हालांकि, राज्य निर्माण के 13-14 साल तक महिला आईएएस की संख्या काफी कम थीं, इसलिए इक्का-दुक्का महिला कलेक्टर होती थीं। इस समय ब्यूरोक्रेसी की जो माताएं कलेक्टर हैं, उनमें प्रतिष्ठा ममगई बेमेतरा, नुपूर राशि पन्ना कोंडागांव, नम्रता जैन नारायणपुर, रेना जमीन सूरजपुर, चंदन त्रिपाठी बलरामपुर, दिव्या मिश्रा बालोद, तुलिका प्रजापति मानपुर मोहला, रोक्तिमा यादव कोरिया, संतन देवी जांगड़े एमसीबी और पदमिनी भोई सारंगढ़ शामिल हैं।

लोकल अफसरों को वेटेज

वैसे तो ऑल इंडिया सर्विस का लेवल चिपकने के बाद जाति, धर्म और क्षेत्र गौण हो जाता है। फिर भी यह पहली बार हुआ...राज्य सरकार ने बीते बुधवार को सात जिलों में नया कलेक्टर पोस्ट किया, उनमें से चार लोकल अधिकारियों को अवसर दिया। चारों अफसरों की जड़े छत्तीसगढ़ में है और वे राज्य प्रशासनिक सेवा से प्रमोट होकर आईएएस बने हैं। इसके साथ लोकल याने प्रमोटी आईएएस कलेक्टर की संख्या बढ़कर 12 हो गई है। आरआर वालों को जरूर इससे झटका लगा होगा। मगर स्टेट वाले आईएएस खुश हैं...पिछली सरकार में भी प्रमोटी आईएएस को इतनी संख्या में कलेक्टर नहीं बनाया गया।

एक और लिस्ट

42 आईएएस अधिकारियों की ट्रांसफर लिस्ट देखने से प्रतीत होता है कि उसे बनाने में काफी दिमाग दौड़ाया गया होगा। फेरबदल में प्रशासनिक एंगल के साथ अगले विधानसभा चुनाव को देखते पॉलिटिकिल तड़का भी लगा। खैर, कलेक्टरों की एक छोटी लिस्ट और आएगी। कांकेर कलेक्टर नीलेश श्रीरसागर डेपुटेशन पर दिल्ली जा रहे हैं। राज्य सरकार ने उन्हें एनओसी दे दिया है। सो, इस महीने के अंत या अगले महीने के फर्स्ट वीक तक उन्हें केंद्र में पोस्टिंग मिल जाएगी। लिहाजा, उनकी जगह कांकेर में किसी आईएएस को पोस्ट किया जाएगा। जाहिर है, कांकेर बड़ा जिला है, इसलिए कम-से-कम दो-एक जिले की कलेक्टरी किए हुए आईएएस को ही प्राथमिकता मिलेगी। याने एक छोटी लिस्ट और निकलेगी।

राप्रसे ट्रांसफर पर ब्रेक?

राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों की ट्रांसफर लिस्ट काफी दिनों से प्रतीक्षित है। बताते हैं, मई में एक लिस्ट निकलनी थी। मगर उससे पहले बिचौलियों ने वसूली शुरू कर दी। राप्रसे अधिकारियों को यह कहकर भ्रमित किया गया कि लिस्ट तैयार हो रही है, किसी भी दिन निकल जाएगी। इसकी सूचना सरकार को मिल गई। लिहाजा, सरकार ने फिलहाल इस पर ब्रेक लगा दिया है। वैसे जानकारों का कहना है कि राप्रसे की कोई लिस्ट बनी नहीं है। तोरी करने के लिए भ्रम फैलाया गया। बहरहाल, अब जो ट्रांसफर होंगे, काफी ठोक बजाकर किए जाएंगे। मगर कब होंगे? सरकार ही बता पाएगी।

बेबस मिनिस्टर

सिस्टम में कुछ ऐसे खटराल लोग बैठ गए हैं, जिनसे मई मंत्री भी विवश महसूस कर रहे हैं। बात परिवहन विभाग की है। इसमें हर छह महीने में इंस्पेक्टरों का रोटेशन किया जाता है। एक बार मार्च मेें और दूसरा सितंबर में। ये सालों से चला आ रहा है। इस बार परिवहन मंत्री केदार कश्यप ने करीब 100 इंस्पेक्टरों के रोटेशन को अनुमोदित करके नोटशीट नीचे भेजा। परिवहन सचिव ने भी हर बार की तरह उसे अनुमोदित कर दिया। मगर किन्हीं अज्ञात शक्तियों ने आदेश निकलने से रोक दिया। मई शुरू हो गया है, अभी कोई बताने वाला नहीं है कि रोटेशन आदेश क्यों रोका गया, किसने रोका? और उस रोटेशन का क्या होगा? जो राज्य बनने के समय से एक प्रचलित नियम बन गया था। केदार कश्यप के फॉरेस्ट में भी यही हाल है। प्रोबेशनर एसडीओ ट्रेनिंग के बाद महीने भर से पोस्टिंग की आस में बैठे हैं, मगर उनके आदेश का कोई अता-पता नहीं है।

दो महिला मंत्री?

अगले महीने के लास्ट तक विष्णुदेव साय मंत्रिमंडल का विस्तार होना लगभग तय समझा जा रहा है। इसमें कई मंत्रियों के विभाग बदलेंगे। चार मंत्रियों की विदाई होगी...सरगुजा संभाग के दो मंत्रियों के पत्ते कटने की भी खबरें हैं। अलबत्ता, बीजेपी की महिला विधायकों की लाटरी लगने वाली है। मंत्रिमंडल में 15 परसेंट की लिमिट तय होने के बाद से सूबे में चाहे किसी की भी सरकार रही हो, हमेशा एक महिला मंत्री रहीं। मगर अब इसकी संख्या बढ़ाकर कम-से-कम दो किया जाएगा। यदि अच्छा फेस मिले तो तीन भी संभव है। पूर्व मंत्रियों को कैबिनेट में शामिल न करने का कंडिशन अगर हटाया जाएगा तो बस्तर से लता उसेंडी भी एक तगड़ा दावेदार हो सकती हैं। उनसे आदिवासी और महिला, दोनों कोटा कंप्लीट होगा। डिप्टी सीएम विजय शर्मा अगर संगठन में गए तो फिर भावना बोथरा के नाम पर विचार हो सकता है। या हो सकता है बीजेपी किसी और को सामने लाकर चौंका दें।

कांग्रेस में उठापटक

भूपेश बघेल खेमे ने चिर परिचित प्रतिद्वंद्वी सिंहदेव गुट को मात देते हुए विधायक संगीता सिनहा को प्रदेश महिला कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त करा लिया। देर-सबेर संगीता अध्यक्ष भी घोषित हो जाए, तो आश्चर्य नहीं। उधर, खबर है कि कांग्रेस में 15 मई के बाद कुछ बड़ा होने वाला है। नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की भी नियुक्ति हो सकती है। चूकि अगले विधानसभा चुनाव में अब दो साल बच गया है। सो, इस समय जो कांग्रेस का अध्यक्ष बनेगा, उसी की अगुआई में चुनाव लड़ा जाएगा। उधर, खबर है कि लगातार हार के बाद कांग्रेस अब जमीनी नेताओं को पार्टी में ज्यादा वेटेज देना चाहती है। भूपेश को हो सकता है, केंद्र में कोई बड़ी जिम्मेदारी मिल जाए। केंद्र में वे अगर ताकतवर होंगे तो जाहिर है छत्तीसगढ़ में भी कोई उनका अपना आदमी ही मजबूत होगा।

अफसरशाही में जातिवाद

जाति का वायरस अब तक सियासत में ही घुसा था, मगर अब छत्तीसगढ़ की अफसरशाही भी अछूती नहीं रही। जिलों में कलेक्टर, एससपी भी एसडीएम, एसडीओपी और थानेदारों की पोस्टिंग में इस सिंड्रोम के शिकार दिख रहे हैं। स्थिति यह हो चली है कि सूबे में कर्मचारियों, अधिकारियों की योग्यता की पैमाना अब कास्ट हो गया है। कोई खास वर्ग का मुलाजिम है तो गंभीर श्रेणी की गल्ती करने पर भी कार्रवाई नहीं होगी। राज्य की प्रगति की दृष्टि से यह सही नहीं है। सरकारी दफ्तर जात-पात और धर्म से मुक्त होना चाहिए। छत्तीसगढ़ के सिस्टम में करप्शन और मनमौजीपन बढ़ने के पीछे इस वायरस की बड़ी भूमिका है।

कौवा कान ले गया

छत्तीसगढ़ के कर्मचारी किसी प्रायवेट समिति, संगठन के सदस्य नहीं हो सकते। छत्तीसगढ़ सरकार के इस आदेश पर पिछले दिनों इतना कोहराम मचा कि जीएडी को अपना आदेश वापिस लेना पड़ा। जबकि, जिस संघ के कंधे पर बंदूक रख सरकार को निशाने पर लेने की कोशिशें हुई, उसमें फैक्ट यह है कि विष्णुदेव साय सरकार के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद जीएडी ने एक आदेश निकालकर सरकारी कर्मचारियों को संघ के कार्यक्रमों में जाने के लिए फ्री कर दिया था। सरकारी सिस्टम को समझने वालों को पता है कि जब तक कोई आदेश लिखित में निरस्त नहीं होता, तब तक वह स्टैंड रहता है। संघ में जाने वाला 2014 का आदेश निरस्त नहीं हुआ, इसलिए वह लागू है। मगर कौवा कान ले गया...सिस्टम पर हमले करने में संघ के मौसमी कार्यकर्ता पिल पड़े। सोशल मीडिया में इस पर लंबे-लंबे पोस्ट लिखे गए। जाहिर है, संघ के ओरिजिनल लोग कभी दिखावा नहीं करते कि वे संघ वाले हैं। एमपी के दिनों में दिग्विजय सिंह सरकार ने भी सिर्फ आदेश निकाला था...कभी सख्ती नहीं बरती। उस दौरान भी कर्मचारी, अधिकारी संघ के कार्यक्रमों में जाते रहे। बहरहाल, अंदरखाने की बात यह है कि सरकारी मुलाजिमों मेें अनुशासन का वातावरण बनाने उपर के अफसरों ने एक सामान्य आदेश निकालने कहा, उसे तिल का ताड़ बना दिया गया। इससे नुकसान सिस्टम का हुआ। आदेश वापस लेने की कड़ी में एक संख्या का इजाफा हो गया। अब आप पूछेंगे, मौसमी कार्यकर्ता? ये वो नस्ल है जो अपनी सुविधा से वामपंथी, कांग्रेसी और संघी बन जाता है। अभी कई कार्यक्रमों में ये मौसमी कार्यकर्ता बिना बुलाए भी पहुंच जा रहे।

ट्रांसफर पर पेंच?

एक विभाग में ट्रांसफर के लिए एक हजार से अधिक की लिस्ट सरकार को अनुमोदन के लिए भेजा गया। असल में, ढाई सौ से अधिक नामों की सिफारिश संगठन के एक बड़े नेता ने की है। इसके अलावा बड़ी संख्या में विधायक, सांसद और दीगर नेताओं के लोग भी हैं। मंत्री ने अपना पल्ला झाड़ते हुए लिस्ट को उपर भेज दिया। ट्रांसफर पर बैन के दौरान इतनी बड़ी लिस्ट देख सरकार में बैठे लोगों का सिर चकरा गया। फिलहाल, उपर से इस पर ब्रेक लग गया है।

मंत्री के चेले का होटल

सरगुजा से ताल्लुकात रखने वाले एक नेताजी पिछली कांग्रेस सरकार में स्कूल शिक्षा मंत्री थे। उनके साथ चेला के तौर पर रहने वाला एक युवक ने इतना कुछ अर्जित कर लिया कि मंदिर रायपुर में बड़ा होटल बनवा रहा है। जब वह पीए, स्टाफ जैसे किसी पद पर नहीं था, तो ये हाल है। नए स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव को अलर्ट रहना चाहिए। स्कूल शिक्षा भले ही चमक-धमक वाला विभाग नहीं माना जाता, मगर मैनपावर सर्वाधिक है। इस विभाग के जेडी, डीईओ तो बड़ा पद है...उनके ऑफिस के बाबू मोटे आसामी बन गए हैं। आखिर कौन ऐसा खेला होगा, जो स्कूल शिक्षा में नहीं होता। डीईओ द्वारा शिक्षकों के निलंबन और बहाली के मिला जुला खेल से खुद स्कूल शिक्षा मंत्री भी चिंतित हैं। जाहिर है, जब तक डीईओ, बीईओ ठीक नहीं होंगे, तब तक स्कूल शिक्षा को बदनामी से नहीं बचाया जा सकेगा।

हॉफ की डीपीसी

गुरूवार को मंत्रालय में हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स की डीसीपी आयोजित थी। मगर पता चला ऐन वक्त पर बैठक टल गई। बताते हैं, डीपीसी में एसीएस फॉरेस्ट ऋचा शर्मा मेंबर थीं। मगर एक दिन पहले ही उनका विभाग बदल गया। उसके बाद उन्होंने डीपीसी में शामिल होने से मना कर दिया। कमेटी में अगर बिना नाम पदेन मेंबर लिखा गया होता तो नए एसीएस फॉरेस्ट मनोज पिंगुआ डीपीसी में बैठ सकते थे। इसलिए मामला गड़बड़ा गया। हालांकि, सीएस, पीसीसीएफ थे, तो डीपीसी की जा सकती थी। बहरहाल, डीपीसी टलने के बाद अब भांति-भांति की अटकलों का दौर शुरू हो गया है...किसी ताकतवर शक्ति की बातें भी।

हफ्ते का कोट

दूघ, दही, छाछ, मक्खन, घी सब एक वंश के, फिर भी सबकी कीमत अलग-अलग...क्योंकि श्रेष्ठता जन्म से नहीं, अपने कर्म, कला और गुणों से प्राप्त होती है और कुछ समस्याएं हमारे पास है, सोचकर सदा दुखी होने से अच्छा है, यह सोचकर खुश होना कि दुनिया में बहुत समस्याएं हैं, जो हमारे पास नहीं है।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. प्रशासनिक मुखिया ने कलेक्टरों के व्हाट्सएप ग्रुप में किस कलेक्टर के बारे में लिखा...बिना इजाजत इधर-उधर घूमते रहते हैं?

2. क्या ये सही है कि ट्रांसफर के लिए अब सिर्फ रोकड़ा काफी नहीं, एप्रोच भी चाहिए...दोनों होंगे तभी कामयाबी मिलेगी?

रविवार, 3 मई 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: कलेक्टरों का सीआर, और रिजल्ट


 

तरकश, 3 मई 2026

संजय के. दीक्षित

कलेक्टरों का सीआर, और रिजल्ट

सरकार ने स्कूलों का स्तर सुधारने के लिए 10वीं, 12वीं के रिजल्ट को कलेक्टरों के सीआर में जोड़ा था। याने जिस जिले का रिजल्ट अच्छा आएगा, उसका क्रेडिट कलेक्टरों को मिलेगा। सरकार की मंशा अच्छी थी...कलेक्टर स्कूलों की निगरानी करें, जिससे स्कूलों में पढ़ाई की गुणवता सुधरे। मगर कुछ कलेक्टरों ने कमाल कर दिया। रायपुर के पड़ोसी जिले के एक ही स्कूल के नौ बच्चे मेरिट में आ गए। तो बस्तर और सरगुजा के छोटे जिलों ने रिजल्ट में खंभा गाड़ दिया। यहां यह स्पष्ट कर दें कि मेधावी बच्चों की प्रतिभा पर सवाल खड़ा करने हमारा कोई इरादा नहीं। निश्चित तौर पर बड़ी संख्या में ऐसे विद्यार्थी होंगे, जिन्होंने अपने परिश्रम से सफलता अर्जित की होगी। मगर यह भी सही है...कई कलेक्टरों ने अपनी पीठ थपथपवाने के लिए कुछ तो जरूर किया। तभी रिजल्ट निकालने के मौके पर माध्यमिक शिक्षा मंडल की एक शीर्ष अफसर ने सरकार के संज्ञान में यह विषय लाया कि परीक्षा के समय कलेक्टरों का काफी प्रेशर रहा...कई जिलों में खुलकर नकल कराए गए। बहरहाल, जिले के मुखिया का ही जब नकल को संरक्षण है तो माशिमं के उड़नदस्ता की क्या बिसात? उड़नदस्ता का गठन तो आखिर कलेक्टर के बिहाफ में ही किया जाता है। छत्तीसगढ़ के ह्यूमन रिसोर्स की दृष्टि से ये अच्छी बात नहीं है। स्कूल शिक्षा विभाग भले ही अपना पीठ थपथपा लें मगर बाद में होता यही है कि आगे जाकर बच्चे सरवाइव नहीं कर पाते। फिर नाम खराब राज्य का होता है।

खटराल कलेक्टर और पोरा बाई

10वीं, 12वीं के रिजल्ट में खेला करना नई बात नहीं है। दशक भर पहले की बात होगी। जशपुर के एक कलेक्टर ने रिजल्ट में जिले को अव्वल लाने काफी एक्सरसाइज किया। मगर जब देखे कि परीक्षा का रिजल्ट सुधारना गुरूजी के वश की बात नहीं तो उन्होंने स्कूल शिक्षा के अधिकारियों से फ्री हैंड दे दिया...मुझे नहीं मालूम, किसी भी तरह जिले के बच्चे को मेरिट में आना चाहिए। और वैसा ही हुआ। कलेक्टर के आदेश का पालन हुआ, उस साल जशपुर के तीन बच्चे मेरिट में आ गए थे। अब आपका स्वाभाविक प्रश्न होगा कि नकल मारकर भला मेरिट में या फर्स्ट कैसे आया जा सकता है। तो इसी प्रदेश में आखिर पोरा बाई कांड भी हुआ है। पोरा बाई ने जांजगीर के स्कूल से हायर सेकेंड्री एग्जाम के लिए फार्म भरा था। मगर परीक्षा में कोई और बैठा। पोरा बाई को 12वीं मेरिट में टॉप घोषित किया गया। लेकिन, माध्यमिक शिक्षा मंडल के चेयरमैन आईएएस बीकेएस रे को संदेह हुआ और उन्होंने जांच करा दी। मामला पुलिस में पहुंचा और वह जेल गई। सो, तर्क-कुतर्क की बात नहीं। स्कूल शिक्षा में पहले भी फर्जीवाड़ा के उदाहरण रहे हैं। हालांकि, विष्णुदेव सरकार ने स्कूल शिक्षा में कई रिफार्म किया है। कलेक्टर्स और स्कूल शिक्षा विभाग को इस रिफार्म का फायदा उठाते हुए राज्य के मानव संसाधन को मजबूत करने के लिए भागीरथ प्रयास करना चाहिए। क्योंकि, देश के स्कूल शिक्षा में छत्तीसगढ़ की गिनती नीचे से शुरू होती है।

19 से पहले नए डीजीपी

5 अप्रैल को पूर्णकालिक डीजीपी की नियुक्ति होते-होते रुक गई थी। मगर सुप्रीम कोर्ट में 19 मई को सुनवाई की डेट लग जाने के बाद अब नहीं लगता कि अब मामला ज्यादा दिन तक खींच पाएगा। सुनने में आ रहा, 19 मई से पहले छत्तीसगढ़ में पूर्णकालिक डीजीपी की नियुक्ति हो जाएगी। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को लेटर जारी कर दिया है। सुनवाई डेट से पहले अगर कोई फैसला नहीं हुआ तो फिर हो सकता है सुप्रीम कोर्ट कोई बड़ा आर्डर पास कर दें या फिर चीफ सिकरेट्री को ही तलब कर लें। सीएस को बुलाने से जाहिर है, मामला काफी बड़ा हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केंद्रीय गृह सचिव को कोर्ट बुला लिया था। दरअसल, छत्तीसगढ़ में सिस्टम की भी अपनी मजबूरियां हैं। कुछ सालों से सीएस, डीजीपी का मसला केंद्र से तय होने लगा है। याद ही होगा, 4 सितंबर 2024 को अशोक जुनेजा का कार्यकाल खतम होने जा रहा था। स्टेट गवनर्मेंट ने नए डीजीपी के लिए नोटशीट बनाने का आदेश दे दिया था। मगर रिटायरमेंट से 24 घंटे पहले केंद्र से अशोक जुनेजा को छह महीने एक्सटेंशन देने का आदेश आ गया। सीएस के समय भी ऐसा ही हुआ। सरकार मनोज पिंगुआ का आदेश जारी करने जा रही थी कि अमिताभ जैन के एक्सटेंशन के लिए दिल्ली से संदेशा आ गया। दिल्ली ने इसके बाद विकास शील को मनीला से बुलाकर सीएस बनाने रायपुर भेज दिया। हालांकि, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद केंद्र अब फ्री है, इसलिए लगता है 19 मई से पहले पूर्णकालिक डीजीपी का मामला क्लियर हो जाएगा।

मंत्रियों में तनातनी-1

एक नए मंत्री के साढ़ू भाई लंबे समय से एक विभाग विशेष में सप्लाई का काम करते हैं। मंत्री बनने के बाद उन्हें लगा कि अब बराबरी का मामला है...आखिर डायन भी एक घर छोड़कर चलती है। फिर भी एहतियात बरतते हुए नए मंत्री ने माननीय से बात भी कर ली। बता दिया...साढ़ू भाई का मसला है। मगर मंत्री के मुलाजिमों ने स्पष्ट कह दिया...25 फीसदी एडवांस देना हीे होगा। ऐसे में, दोनों मंत्रियों में खटास बढ़नी ही थी। हालांकि, नए मंत्री को जल्दी ही हिसाब चुकता करने का मौका मिल गया। लक्ष्मीजी से अति मोह रखने वाले मंत्री के गृह जिले में डिस्ट्रिक्ट लेवल के एक अफसर की पोस्टिंग में उन्होंने अपने आदमी का नाम बताया। मगर नए मंत्री ने उसके उल्टा अफसर को वहां बिठा दिया।

मंत्रियों में तनातनी-2

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को साड़ी बांटने के मामले में मीडिया ने एक मंत्री से सवाल कर दिया। मंत्रीजी चूकि बार-बार एक ही सवाल से उकता गए थे, इसलिए उनकी जुबां फिसल गई। मुंह से निकल गया, स्कूल शिक्षा में कितना भ्रष्टाचार है...वो आपलोगों को नहीं दिखता। मंत्री का यह लूज टॉक लीक होकर एक दूसरे मंत्री के पास पहुंच गया। जाहिर है, इस पर बवाल मचना ही था। मंत्रीजी तमतमा गए। उन्होंने तुरंत फोन लगवा जमकर सुना दिया...आप दूसरे विभाग में भ्रष्टाचार की बात कैसे कर सकते हो। मंत्रीजी ने हालांकि, सफाई देेने का काफी प्रयास किया। मगर वो कोई काम नहीं आया।

सीएस प्रोटोकॉल में 

सरगुजा संभाग की एक महिला विधायक का कलेक्टरों को हड़काते एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ था। विधायक इसलिए नाराज थीं कि उनके कार्यक्रम में एसडीएम नहीं पहुंचे। वीडियो में स्पष्ट देखा गया कि पीछे खड़े उनके चंगु-मंगू जो बोल रहे, विधायक महोदया कलेक्टर को हड़काते समय उसी को दोहरा रही थीं। अलबत्ता, प्रोटोकॉल में ये कहीं नहीं है कि विधायक के हर कार्यक्रम मेें एसडीएम जाए। मगर विधायक जी को भड़ास निकालना था, उन्होंने निकाल लिया। असल में, अफसरशाही को कमतर करने का काम पिछली सरकार में हुआ...जब जीएडी ने आर्डर निकाल प्रोटोकॉल में चीफ सिकरेट्री को विधायक के नीचे कर दिया। और, राज्य का प्रशासनिक मुखिया ही जब प्रोटोकॉल में नीचे हो गए तो फिर कलेक्टर, एसडीएम को विधायक क्या समझेंगे। जाहिर है, प्रोटोकॉल की दृष्टि से यह एक गलत फैसला था। मुख्य सचिव कार्यपालिका के प्रमुख होते हैं। साथ में कैबिनेट के पदेन सिकेट्री भी। कैबिनेट की बैठकों में वे मुख्यमंत्री के बगल में बैठते हैं, मंत्रियों की सीट उनके बाद होती है। इसी तरह केंद्र में कैबिनेट सचिव को भी राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों के बराबर रखा गया है। सांसद का प्रोटोकॉल उनसे काफी नीचे होता है। मगर छत्तीसगढ़ में सब उल्टा-पुलटा चल रहा है।

अफसरों को प्रोटेक्शन

अफसरशाही लाख भ्रष्टाचार से ग्रसित हो, मगर काम तो उनसे ही कराना है। इसलिए, गड़बड़ियों पर कड़ी कार्रवाई हो मगर जो अच्छे काम करने वाले अधिकारी हैं, उन्हें सरकार से प्रोटेक्शन भी मिलना चाहिए। बीते कुछ महीनों में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिसमें अराजकता फैलाने की कोशिशें हुईं। जिला कार्यालयों में घुसकर हंगामा और नारेबाजी के मामले भी कई जिलों में हुए हैं। रसूखदार लोगों को छोड़ दें तो आम आदमी का क्या? वह प्रशासन और पुलिस के पास ही उम्मीद लेकर जाता है। मगर छोटे स्वार्थों के लिए इन्हीं संस्थाओं को डैमेज करने का प्रयास किया जाएगा तो जरा सोचिए आम आदमी़ का क्या होगा, वह किस चौखट पर उम्मीद लेकर जाएगा?

राजा, मंत्री, चोर, सिपाही

बच्चों में बड़ा लोकप्रिय खेल है राजा, मंत्री,, चोर सिपाही। इसमें राजा मंत्री को आदेश देता है कि चोर को पकड़े। मंत्री अगर सही चोर को नहीं पकड़ पाता तो मंत्री को सजा मिलती है। बहरहाल, छत्तीसगढ़ में उल्टा हो रहा है। एक मिनिस्टर साब चोर याने आरोपी को ही बचाने मौके पर पहुंच गए। बात अंबिकापुर की है। वहां के पैसे वाले बड़े होटल कारोबारी का विस्फोटक पदार्थ का उल्टा-सीधा काम है। दो रोज पहले उसमें अचानक आग लग गई। आग भी ऐसी भीषण की, जिला प्रशासन को एसईसीएल, आदानी के दो दर्जन से अधिक दमकल झोंकना पड़ा। सही समय पर अगर आग पर काबू नहीं किया गया होता, तो आसपास के इलाके उसकी चपेट मेें आ गए होते। दुकान के पाटे पर सहज-सरल भाव से बैठ आग की लपटों को निहारते हुए मंत्रीजी ने घटना को छोटा बताते हुए मीडिया को बाइट दिया। अब जब मंत्रीजी मौके पर पहुंच घटना को छोटा बता रहे तो फिर अंबिकापुर पुलिस में इतनी हिम्मत कहां? पुलिस ने मामूली जमानती धाराएं लगाकर पल्ला झाड़ लिया। लेकिन विस्फोटक कारोबारी पर अतिशय मेहरबानी करने की बात किसी ने राजधानी रायपुर पहुंचा दी। और राजधानी से सरगुजा आईजी को फरमान जारी हो गया। दरअसल, सुशासन तिहार का वक्त है। ऐसी चीजें अगर सोशल मीडिया में उछलती तो खामोख्वाह सिस्टम की छबि को नुकसान पहुंचता। सो, राजधानी से सरगुजा आईजी को फरमान गया और उन्होंने एसएसपी को नोटिस जारी कर दिया। जाहिर है, सिस्टम के तेवर के बाद अब अग्निकांड में पर्याप्त धाराएं लग जाएंगी। मगर इस मामले में मंत्रीजी बुरी कदर एक्सपोज हो गए।

अफसरों का ट्रांसफर

सुशासन तिहार-02 प्रारंभ हो गया है। जिलों में समस्या निवारण शिविर का आयोजन किया जा रहा है। कुछ शिविरों में मुख्यमंत्री भी जाएंगे तो कहीं औचक निरीक्षण के लिए उनका उड़नखटोला भी उतरेगा। सुशासन तिहार शुरू होने के बाद भी अफसरशाही में सबसे बड़ा सवाल ट्रांसफर का है। दरअसल, यह पहला मौका है, जब लंबे समय से अफसरशाही में तबादले नहीं हुए हैं। मंत्रालय में कई सचिवों के ढाई-तीन साल हो गए हैं तो जिलों में कलेक्टर, एसपी के भी ट्रांसफर अवेटेड रहे हैं। कई एसपी के टाईम भी ओवर हो रहे हैं। ऐसे में, ट्रांसफर को लेकर जिज्ञासा लाजिमी है। यह भी सही है कि पिछले साल सुशासन तिहार के दौरान ही अप्रैल एंड में राजनांदगांव के कलेक्टर संजय अग्रवाल को बिलासपुर शिफ्ट किया गया था। मगर इस बार क्या होगा, इस संदर्भ में अभी कुछ फायनल नहीं हुआ है। सरकार का पूरा फोकस इस समय सुशासन तिहार में आम आदमी की समस्याओं के निवारण पर है। इसलिए, जिलों में चेंज का नहीं लगता। मुख्यमंत्री को अगर समय मिला तो सचिवों के विभाग बदलने पर जरूर कोई चर्चा हो सकती है।

कलेक्टर, एसपी का कार्यकाल?

छत्तीसगढ़ में पिछले छह-सात साल से ऐसा हो रहा कि कलेक्टर, एसपी छह महीने, एक साल में बदल जा रहे। रमन सिंह सरकर के दौर तक दो साल अफसरों का न्यूनतम कार्यकाल होता था। राजेश सुकुमार टोप्पो ने आईएएस के कैरियर में एक जिला किया है। मगर राज्य बनने के बाद कलेक्टर के तौर पर उनका रिकार्ड है। वे करीब साढ़े तीन साल तक बलौदा बाजार के कलेक्टर रहे। इसी तरह मध्यप्रदेश के दौर में आईपीएस शैलेंद्र श्रीवास्तव साढ़े तीन साल से अधिक समय तक बिलासपुर के एसपी रहे। इसलिए, सरकार पर निर्भर करता है...वो किस अफसर को कितने दिन जिले में रखती है। वैसे कलेक्टर, एसपी के साढ़े तीन साल के उदाहरण तो इसी प्रदेश में है।

हफ्ते का कोट

'जीवन में आनंद साधन से नहीं, साधना से प्राप्त होते हैं।' और 'किसी को चोट पहुंचाना उतना ही आसान है, जितना पेड़ का एक पत्ता तोड़ना, लेकिन किसी को सुखी करना एक पेड़ उगाने जैसा है, इसमें बहुत समय, देखभाल और धैर्य लगता है।'

अंत में दो सवाल आपसे?

1. किस आईजी के क्रियाकलापों से पुलिस की छबि खराब हो रही है?

2. क्या ये सही है कि अफसरशाही में भी जातिवाद का वायरस घुसने लगा है?

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: सचिवों की मेजर सर्जरी



तरकश, 26 अप्रैल 2026

संजय के. दीक्षित

सचिवों की मेजर सर्जरी

मंत्रालय में सचिव स्तर पर एक बड़ी उठापटक जल्द हो सकती है। इसमें उन आधा दर्जन से अधिक सचिवों का विभाग बदल सकता है, जिनका कार्यकाल सवा दो साल से अधिक हो गया है। जाहिर है, दिसंबर 2023 में सरकार बदलने के बाद जनवरी 2024 में सचिवों की बड़ी लिस्ट निकली थी, उसके बाद कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। वैसे, एसीएस मनोज पिंगुआ का गृह विभाग में साढ़े तीन साल से ज्यादा हो गया है। पिछली सरकार के समय से उनके पास गृह विभाग का दायित्व है। इसी तरह निहारिका बारिक पंचायत एवं ग्रामीण विकास, शहला निगार कृषि, कमलप्रीत सिंह पीडब्लूडी, सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी स्कूल शिक्षा, भुवनेश यादव समाज कल्याण, एस भारतीदासन हायर एजुकेशन, बसव राजू नगरीय प्रशासन, शम्मी आबिदी महिला बाल विकास विभाग को सवा दो साल से अधिक हो गया है। लिहाजा, इन अधिकारियों के विभाग बदलने की अटकलें बड़ी तेज हैं। अलबत्ता, अमित कटारिया हेल्थ में जम नहीं पा रहे, इसलिए उनका पोर्टफोलियो चेंज हुआ तो कोई आश्चर्य नहीं। सेंट्रल डेपुटेशन से अमित लौटे थे, उस समय उनका इंटरेस्ट नगरीय प्रशासन में था मगर बसव राजू को वे हिला नहीं सकें। अमित का नाम पीडब्लूडी को लेकर भी चर्चाओं में है। वैसे तो पीडब्लूडी के लिए मुकेश बंसल को भी राइट च्वाइस बताया जा रहा, मगर उनके पास वर्कलोड ज्यादा है, मंत्री ओपी चौधरी उन्हें छोड़ेंगे भी नहीं, इसलिए मुकेश की संभावना कम प्रतीत हो रही।

गृह विभाग का निजाम कौन?

बैचमेट को चीफ सिकरेट्री बन जाने के बाद एसीएस होम मनोज पिंगुआ ने सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने के लिए अर्जी लगाई थी मगर उन्हें अब तक पोस्टिंग नहीं मिली है। हालांकि, उन्होंने अभी तक अपना आवेदन वापिस भी नहीं लिया है। मगर खबरें आ रही कि दिल्ली जाने का उनका इरादा अब डगमगा रहा है। हो सकता है कि सीएस विकास शील से उनकी कोई बात हुई हो...आखिर हैं तो पुराने बैचमेट ही। बहरहाल, मनोज अगर दिल्ली नहीं गए तो सरकार उनकी वरिष्ठता की दृष्टि से कौन सा विभाग देगी, इस पर भी धर्मसंकट रहेगा। उनके पास पहले हेल्थ और फॉरेस्ट रह चुका हैं। विष्णुदेव साय के सीएम बनने के बाद मनोज को उनके सचिवालय में जाने की चर्चाएं भी हुई थी। उसके बाद 30 जून 2025 को कैबिनेट की मीटिंग के बाद उनका सीएस का आर्डर निकलते-निकलते रह गया था। दिल्ली से अमिताभ जैन को एक्सटेंशन देने का संदेशा आ गया। और उसके बाद मनीला से विकास शील आ गए। बहरहाल, सवाल यह है कि सोनमणि बोरा, कमलप्रीत सिंह या किसी अन्य को सिकेट्री होम बनाया जाएगा तो फिर मनोज पिंगुआ को क्या मिलेगा? इसका जवाब सीएम या उनके पीएस के पास ही होगा।

ट्रांसफर का महीना?

सचिवों के विभाग बदले जाने की चर्चाओं के बीच बता दें कि कलेक्टर, एसपी, जिला पंचायत सीईओ और डीएफओ के ट्रांसफर लंबे समय से प्रतीक्षित है। एक मई से सुशासन तिहार भी प्रारंभ होने जा रहा है। हालांकि, सुनने में आ रहा कि सुशासन तिहार के साथ-साथ अफसरों की लिस्ट भी जारी होते रहेगी। सरकार में बैठे लोग इस बात को स्वीकार कर रहे कि दो साल से अधिक जिन अधिकारियों का हो गया है, वहां ट्रांसफर की प्रत्याशा में कोई काम नहीं हो रहा है...उन जिलों के अफसरों को बदलना ही श्रेयस्कर होगा। अलबत्ता, कलेक्टर, एसपी के ट्रांसफर होंगे या नहीं, आने वाला दो-तीन दिन काफी महत्वपूर्ण होंगे। यदि बदलना होगा तो सरकार इसी दौरान कोई निर्णय लेगी। पीएस टू सीएम सुबोध सिंह भी ट्रेनिंग से लौट आएं हैं।

25 साल में जीरो

न्वंबर 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ बनने के दौरान छत्तीसगढ़ में सड़कों की जो स्थिति थी, कमोवेश वही हालत अभी भी है। नेशनल हाईवे को छोड़ दें, तो पीडब्लूडी मिनिस्टर और सीएम के विधानसभा इलाकों की हालत बेहद दयनीय है। तभी रिव्यू मीटिंग में सीएम बड़े नाराज हुए थे। वे यहां तक बोल गए थे...पीडब्लूडी का कहीं कोई काम दिख नहीं रहा है। दरअसल, सड़कें कनेक्टिविटी की सुविधा के साथ-साथ किसी भी राज्य की शान होती है। पड़ोसी राज्यों में तेलांगना और महाराष्ट्र की बात तो छोड़िये, कालाहांडी की भूखमरी के नाम से बदनाम ओड़िसा की सड़कें विकसित प्रदेशों टाईप अहसास दिला रही है। बगल में, विशाखापट्टनम या नागपुर चले जाइये, सड़कें देखकर आप हतप्रभ रह जाएंगे। असल में, छत्तीसगढ़ में इस सेक्टर में काम ही नहीं हुआ। और न ही सरकार ने इसे प्राथमिकता में रखा। राजधानी रायपुर की बात करें तो 25 साल में एक एक्सप्रेसवे बन पाया। ऐसा नहीं कि पीडब्लूडी में हाई प्रोफाइल अफसर नहीं आए। पी. जाय उम्मेन, एमके राउत, आरपी मंडल और अमिताभ जैन जैसे पीडब्लूडी सिकेट्री हुए। बावजूद इसके आलम यह है कि धर्मजयगढ़ और पत्थलगांव को जोड़ने वाली सड़क पिछले 15 साल से निर्माणाधीन है। पीडब्लूडी किस रफ्तार में चल रहा, इसका अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि पिछले साल 9500 करोड़ का बजट मिला मगर मार्च क्लोजिंग तक इसमें से मात्र 3000 करोड़ खर्च हो पाया।

10 साल में आरओबी

93 बैच के आईएएस अफसर अमित अग्रवाल 2015-16 के दौरान वित्त सचिव थे। कचना के जीएडी कालोनी से शहर तरफ आने-जाने मे फाटक पर वे हमेशा लोगों के जाम का शिकार होते देखते थे। लिहाजा, उन्होंने खुद ही पहल कर पीडब्लूडी वालों से प्रस्ताव मंगा बजट में शामिल किया। उसके बाद 10 साल निकल गया। अभी तक कचना ओवर ब्रिज पूरा नहीं हुआ है। 2016 के बजट में आने के बाद इसका 2021 में इसका काम प्रारंभ हुआ। मार्च 2025 की डेडलाइन थी और अप्रैल 2026 समाप्त होने वाला है। इससे पीडब्लूडी की मंथर गति को समझा जा सकता है।

तीन महीने का एक्सटेंशन

तरकश में पीसीसीएफ और हेड ऑफ फॉरेस्ट श्रीनिवास राव के एक्सटेंशन का जिक्र किया गया था। तरकश की खबर सही निकली। छह महीने की सेवा विस्तार की चकरी भारत सरकार में घूमी, मगर बात कुछ जम नहीं पाई। कहीं से एडवाइस आया है कि छह महीने ज्यादा है, तीन महीने की फाइल मूव किया जाए। श्रीनिवास राव को एक्सटेंशन मिल पाएगा या इंकार हो जाएगा, 10 मई से पहले इस पर क्लियरिटी आ जाएगी। हालांकि, एक्सटेंशन की फाइल पीएम तक जाती है, इसलिए सब कुछ इतना आसान नहीं है। श्रीनिवास राव को अगर एक्सटेंशन नहीं मिला तो फिर अरुण पाण्डेय की दावेदारी पक्की हो जाएगी। क्योंकि, ओपी यादव हेड ऑफ फॉरेस्ट बनने इच्छुक नहीं बताए जा रहे। वैसे अरुण और ओपी दोनों सरगुजिहा तो हैं ही पड़ोस में रहते हैं और रोज साथ बैठने वाले मित्र भी हैं। इसलिए, अरुण के पक्ष में ओपी शायद अपना इंटरेस्ट ना दिखाएं। अब अगर उनके माथे पर कुछ लिखा है तो बात अलग है...उसी तरह जैसे आईपीएस एएन उपध्याय के पास डीजीपी का पद चलकर आ गया था। वरना अरुण पाण्डेय के नाम पर मुहर लगेगी। वैसे भी मंत्रालय और फॉरेस्ट विभाग की पसंद अरुण पाण्डेय ही हैं मगर बीच में श्रीनिवास राव के विधायक भाई के सक्रिय होने से मामला पेचीदा हो गया है।

जीएडी का यू-टर्न

छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय की सरकार बनने के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने 2024 में एक आदेश निकाल कर्मचारियों, अधिकारियों को संघ के कार्यक्रमों में जाने के लिए फ्री कर दिया था। मगर इस हफ्ते एक ऐसा आदेश निकला कि संघ में बवाल मच गया। आदेश था...सरकारी कर्मचारी, अधिकारी किसी संगठन के सदस्य नहीं हो सकते। पता चला है...जीएडी के अधिकारियों ने बिना ब्रीफ किए हड़बड़ी में उपर से दस्तखत करा लिया। आदेश निकलने के बाद जब कोहराम मचा तो जीएडी के अफसरों को तलब किया गया। इसके बाद भी जीएडी के अफसर इस आदेश को वापिस लेने की बजाए उसमें संशोधन करने पर अड़े रहे। इसके बाद सीएम ने अपना तेवर दिखाया। बताते हैं, सीएम ने दो टूक कहा...कोई संशोधन नहीं, आदेश बदला जाए, फिर जाकर आदेश चेंज हुआ। वैसे, आदेश निकाल फिर बदलने से संदेश अच्छे नहीं जा रहे, सरकार के रणनीतिकारों को इसे संज्ञान लेना चाहिए।

अफसर पौने दो सौ, मेंबर सिर्फ एक

सिविल सर्विस डे पर राजधानी में अफसरों का एक बड़ा आयोजन हुआ। वर्तमान सीएस विकास शील के साथ इस मौके पर दो पूर्व मुख्य सचिव भी मौजूद थे। मंत्रालय के अफसरों के साथ कलेक्टर, कमिश्नर वीडियोकांफ्रेंसिंग पर कनेक्ट थे। इसमें पता चला कि आईआईपीए याने इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में छत्तीसगढ़ से वैसे तो 66 मेंबर हैं मगर सर्विंग आईएएस में से सिर्फ एक। वो हैं एसीएस मनोज पिंगुआ। जबकि, दीगर राज्यों में इसकी संख्या 75 परसेंट से उपर होती है। सिविल सर्विस के अफसरों को जानकारियों से अपडेट रहने के लिए भारत सरकार ने आजादी के तुरंत बाद आईआईपीए नाम से एक ऑटोनॉमस बांडी बनाई थी। उप राष्ट्रपति को इसका चेयरमैन बनाया गया और डीओपीटी मंत्री को व्हाइस चेयरमैन। डीओपीटी सिकेट्री इसके सीईओ होते हैं। इसके बाद छत्तीसगढ़ में ये हाल है। सीएस विकास शील से सभी से इसकी सदस्यता लेने का आग्रह किया है, तो देखना है कि अब कितने अफसर इससे जुड़ते हैं।

बीजेपी नेता, मछली और धर्म भ्रष्ट

पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान मछली खाने पर बीजेपी द्वारा पाबंदी लगाने का ऐसा दांव चला कि जो बीजेपी नेता सार्वजनिक तौर पर मांस-मछली नहीं खाते थे, वे भी कैमरे के सामने थाली से मछली का कांटा निकालते नजर आने लगे। मगर इस चक्कर में छत्तीसगढ़ में कुछ बीजेपी नेताओं के यहां बवाल मच गया। मालूम हुआ, एक नेताजी का परिवार शुद्ध शाकाहारी और धरम-करम वाला है। उनके घर वालों को व्हाट्सएप ग्रुप से मछली खाते फोटो हाथ लग गई। इसके बाद पत्नी ने बात करना बंद कर दिया है, तो पिता ने चमकाया, तूने धर्म भ्रष्ट कर दिया। अब पश्चिम बंगाल की बात अलग है। वहां बिना मछली खाए कोई शुभ काम संपन्न नहीं होते। मगर बाकी प्रदेशों में ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ से गए कुछ बीजेपी नेताओं ने इस स्तंभ के लेखक को बताया कि फोटो और सोहबत के चक्कर में कई नेताओं को अब मछली का स्वाद भाने लगा है।

हफ्ते का कोट...

’संबंध कभी भी बराबरी करने से नहीं पनपते...उन्हें बनाएं रखने के लिए किसी को बड़ा और किसी को छोटा होना पड़ता है’ और ’परिस्थितियां बदलना जब मुमकिन ना हो तो मनःस्थिति बदल लीजिए, सब कुछ अपने आप ही बदल जाएगा।’

अंत में दो सवाल आपसे?

1. छत्तीसगढ़ बिजली नियामक आयोग के चेयरमैन का पद किसके लिए रिक्त रखा गया है?

2. डीजी पवन देव को पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन में करीब सात साल हो गया है, वे वहीं से 2028 में रिटायर होंगे या उनका ट्रांसफर किया जाएगा?

Chhattisgarh tarkash 2026: डिलिमिटेशनः बैकबोन और त्राहिमाम



 Chhattisgarh Tarkash 2026:

तरकश, 19 अप्रैल 2026

संजय के. दीक्षित

डिलिमिटेशनः बैकबोन और त्राहिमाम

परिसीमन बिल के पारित होने से छत्तीसगढ़ के विधानसभा, लोकसभा की सीटों में वृद्धि होती, मगर इससे किसी सियासी पार्टी को नफा-नुकसान नहीं होता। इसका सबसे ज्यादा इम्पैक्ट वहां पड़ेगा, जहां मुस्लिम वोटर अधिक संख्या में हैं। अभी असम का उदाहरण सामने है। जम्मू-कश्मीर के बाद असम देश का दूसरा सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाला प्रदेश है। वहां 35 फीसदी मुस्लिम हैं। बीजेपी की सरकार के दौरान भी इस समय वहां 31 मुस्लिम विधायक हैं। बहरहाल, वहां जो मुस्लिम आबादी तीन दर्जन से अधिक विधानसभाई इलाकों में निर्णायक वर्चस्व रखती थी, परिसीमन के बाद अब ये सिनेरियो बदल गया है। दरअसल, परिसीमन की कैंची ऐसी चली कि कई इलाकों में फैले मुस्लिम आबादी को एक विधानसभा में लाने से उस क्षेत्र में उनकी आबादी तो काफी बढ़ गई मगर अगल-बगल के विस क्षेत्रों उनकी संख्या घट गई। इसे ऐसे समझे...आसपास के चार विधानसभा क्षेत्रों के मुस्लिम बहुल इलाकों को काटकर एक या दो विधानसभाओं में जोड़ा गया। इससे चार की जगह अब एक या दो विधानसभा सीटों पर मुस्लिमों का प्रभुत्व सिमट गया है। असम में परिसीमन के बाद हुए इस चुनाव में मुस्लिम विधायकों की संख्या 12 से 14 घट जाने का अनुमान है। जाहिर है, असम में मुस्लिम विधायक ही विपक्ष के बैनबोन होते थे। इसी तरह बिहार, यूपी समेत दक्षिण के कई राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जिनकी परिसीमन के बाद स्थिति बदल जाएगी। इसके बाद कुछ राजनीतिक दलों का बड़ा नुकसान होगा, तो कुछ के शटर गिर जाएंगे। तभी तो बवाल मचा है। विपक्ष इसलिए भी त्राहिमाम की स्थिति में है कि सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली। याचिका खारिज हो गई। दरअसल, सीटों की परिसीमन में एक जाति, समुदाय या वर्ग को क्लब कर नया विधानसभा या लोकसभा बनाए जाने को प्राथमिकता देना है। इस दृष्टि से इस पर उंगली भी नहीं उठाई जा सकती।

डेपुटेशन का फर्स्ट केस

यूपीएससी क्रैक कर आईएएस, आईपीएस बनने वाले हर अफसर का ख्वाब होता है...जिले में कलेक्टरी और कप्तानी करें। मगर बिना एसपी बने कोई आईपीएस अधिकारी अगर सेंट्रल डेपुटेशन पर निकल ले तो इसे क्या कहा जाना चाहिए। ये वाकया इसलिए चौंकाने वाला है कि छत्तीसगढ़ ही नहीं अविभाजित मध्यप्रदेश में ऐसा कभी नहीं हुआ। कलेक्टर बने बिना न कोई आईएएस प्रतिनियुक्ति पर गया और न आईपीएस एसपी बने। लेकिन, 2020 बैच के आईपीएस विकास कुमार ने भारत सरकार से प्रतिनियुक्ति मांगी और एनआईए में उन्हें पोस्टिंग मिल भी गई। अब मामला नाराजगी का है या कोई और बात...पीएचक्यू के अफसरों को इस बारे में ठीकठाक पता होगा। मगर बता दें...कवर्धा में एडिशनल एसपी की पोस्टिंग के दौरान एक मामले में विकास कुमार को सस्पेंड किए जाने पर बड़ी टीका-टिप्पणी हुई थी। आमतौर पर डायरेक्ट आईपीएस के कैरियर को देखते इस तरह की कोई कार्रवाई नहीं की जाती। उस पर जब, एडिशनल एसपी की सिस्टम में कोई डिसिजन मेकिंग की भूमिका नहीं होती। डायरेक्ट आईपीएस के लिए यह प्रोबेशन की तरह माना जाता है। बहरहाल, विकास कुमार को निलंबन से बहाल होने के कई महीने बाद उन्हें रायपुर पुलिस कमिश्नरेट में डीसीपी बनाया गया। लेकिन, यहां भी डंडी मार दी गई। जोन की बजाए उन्हें शंट करते हुए ट्रैफिक की जिम्मेदारी थमाई गई। हालांकि, आईएएस, आईपीएस के कैरियर में ऐसे दौर आते हैं, इससे घबराना नहीं चाहिए। वैसे भी ये माना जाता है कि किसी भी ऑल इंडिया अफसर की सर्विस का 10 साल बेस्ट, 10 साल मध्यम और 10 साल बेहद खराब रहता है।

शादी के बाद बीजापुर

छत्तीसगढ़ में ऐसे भी आईपीएस अधिकारी रहे हैं, जिन्हें कैरियर की शुरूआत में जोर का झटका मिला मगर बाद में उन्हें बड़ी जिम्मेदारियां संभालने का मौका मिला। 98 बैच के आईपीएस अधिकारी अमित कुमार रायपुर में एडिशनल एसपी थे। वे शादी करके रायपुर लौटे थे कि हफ्ते भर बाद उन्हें बीजापुर का एसपी बना दिया गया। बीजापुर नया जिला बना था, बैठने के लिए जगह भी नहीं थी। नई-नवेली पत्नी को मायके भेज अमित कुमार मन मारकर धुर नक्सल एरिया बीजापुर गए। उसके बाद वे रायपुर समेत सूबे के छह जिलों के एसपी रहे। सीबीआई में 12 साल तक टॉप का पोर्टफोलियो संभाला। और अब खुफिया चीफ हैं। याने नए अफसरों को थोड़ा धैर्य रखना चाहिए। परिस्थितियां हमेशा एक सी नहीं रहती। विकास कुमार भले ही अभी अपमानित महसूस कर रहे होंगे मगर हो सकता था...आगे चलकर उनका वक्त बदलता। इस केस में पीएचक्यू के सीनियर अफसरों को भी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। पहले के जमाने में सीनियर अफसर अपने जूनियर को काफी समझाते थे, गल्तियां पर टोका-टाकी और डांट भी लगाते थे। मगर ये काम अब बंद हो गए हैं। डीजीपी अरुणदेव गौतम को पीएचक्यू में नए अफसरों के लिए एक एचआर सेल बनाना चाहिए।

एसपी भी डेपुटेशन पर

आईपीएस आंजनेय वार्ष्णेय भारत सरकार में डेपुटेशन पर जा रहे हैं। वे इस समय सारंगढ़़-बिलाईगढ़ जिले के एसपी हैं। आंजनेय के प्रतिनियुक्ति पर जाने का कारण पारिवारिक बताया जा रहा है। उनके जाने के बाद सरकार को सारंगढ़ जिले में नए कप्तान की नियुक्ति करनी होगी। जल्द ही आईपीएस की लिस्ट निकलेगी, उसमें सारंगढ़ भी शामिल होगा। या हो सकता है, सारंगढ़ का सिंगल आर्डर निकल जाए।

ट्रांसफर पर संशय

छत्तीसगढ़ सरकार ने अचानक से सुशासन तिहार का आदेश निकाल अफसरशाही को चौंका दिया। पहले ऐसे संकेत मिले थे कि इस बार सुशासन तिहार को ड्रॉप किया जाएगा। बहरहाल, दो-सवा दो साल से एक ही जगह पर जमे अधिकारियों की उम्मीद थी कि मई फर्स्ट वीक में ताबड़तोड़ ट्रांसफर होंगे। कलेक्टर, एसपी, जिपं सीईओ और डीएफओ बदले जाएंगे। मगर सुशासन तिहार के ऐलान से वे उलझन में पड़ गए हैं। हालांकि, सुशासन तिहार की वजह से ये नहीं कहा जा सकता कि ट्रांसफर अब टल ही जाएंगे। सरकार के नजदीकी सूत्रों का कहना है कि ये अभी तय नहीं हुआ है कि सुशासन तिहार के दौरान ट्रांसफर नहीं होंगे, मगर अत्यधिक संभावना है कि सुशासन तिहार चलते रहेंगे और साथ में ट्रांसफर भी। जाहिर है, सुशासन तिहार एक मई से प्रारंभ होकर 10 जून तक चलेंगे।

अलग मोड में सुशासन तिहार

सुशासन तिहार इस बार अलग मोड में किया जाएगा। इस बार जिलों में 15-20 ग्राम पंचायतों के बीच एक जनसमस्या शिविर लगेगा। पूरा फोकस इस बार लोगों की समस्याओं पर केंद्रित रहेगा। अधिकांश शिविरों में कलेक्टर, एसपी मौजूद रहेंगे। मुख्यमंत्री बीच-बीच में इन शिविरों में हिस्सा लेंगे। अपने उड़नचिरैया से औचक निरीक्षण करने भी जाएंगे। मगर पिछली बार की तरह शेड्यूल बनाकर वे हर जिले में नहीं जाएंगे। कुल मिलाकर सरकार का मोटिव सिस्टम को एक्टिव करना और ज्यादा-से-ज्यादा लोगों की परेशानियां दूर करना है।

कार्रवाई का डंडा

सुशासन तिहार में इस बार सीएम विष्णुदेव साय प्वाइंटेड जगहों पर अपने हेलिकाप्टर से उतरेंगे...लोगों से राज्य में चल रही योजनाओं और उनकी समस्याओं पर फीडबैक लेंगे। संकेत मिल रहे हैं...कोई गड़बड़ी मिली तो इस बार मारक कार्रवाई भी होगी। जाहिर है, कार्रवाई के नाम पर पिछला सुशासन तिहार टोका-टोकी तक सिमट गया था...कोई बड़ा विकेट नहीं गिरा। सीएम ने जीपीएम के कलेक्टर को लेकर बड़ी तंज कसी थी। बोले...तीन थानों का जिला नहीं संभलता तो फिर कलेक्टर बनने का क्या मतलब? लेकिन, इस बार मामला कुछ आगे का हो सकता है। इसलिए कलेक्टर, एसपी संभलकर।

रेडक्रॉस को खत्म?

जो काम देश के किसी सूबे में नहीं हुआ, वह छत्तीसगढ़ ने कर डाला। छत्तीसगढ़ में प्रदेश स्तर से लेकर जिला स्तर तक रेडक्रॉस सोसाइटी का चुनाव हुआ है। रायपुर में अब सत्ताधारी से जुड़ा प्रायवेट आदमी चेयरमैन बन गया है। जिलों में भी नई बॉडी बन गई है। मगर प्राब्लम है कि जिले वालों को कोई कलेक्टर मिलने तक का टाईम नहीं दे रहे। दरअसल, मध्यप्रदेश के दौर से लेकर छत्तीसगढ़ में अभी तक रेडक्रॉस में कभी चुनाव नहीं हुए। जिलों के कलेक्टर इसके पदेन प्रमुख होते थे। कलेक्टरों का अपना औरा होता है, इसलिए रेडक्रॉस बचा हुआ था। कई कलेक्टर इसमें काफी दिलचस्पी लेकर काम करते थे। अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर कलेक्टर रेडक्रॉस के लिए अच्छा खासा फंड कलेक्शन कर लेते थे। मगर अचानक चुनाव कराकर सिस्टम ने रेडक्रॉस को प्रायवेट हाथों में सौंप दिया। रेडक्रॉस सोसायटी का भगवान ही मालिक हैं।

कागजों में एसीआर

पिछले साल जीएडी ने कर्मचारियों, अधिकारियों के एसीआर के लिए कड़ा आदेश जारी किया था। कहा गया था कि अब ऑनलाइन भरा जाएगा, किसी अधिकारी को अब अफसरों का चक्कर नहीं लगाना पडे़गा। मगर आलम यह है कि अभी भी एसीआर के लिए सरकारी मुलाजिम चक्कर लगाते दिख रहे हैं। पुलिस वालों की तो और स्थिति खराब है। एसपी ने भरकर भेज दिया तो कई आईजी साहब लोग उसे दबाकर बैठ गए हैं। बाकी विभागों का हाल भी जुदा नहीं है। तभी जीएडी ने 17 अप्रैल को फिर एक आर्डर निकाल 2024-25 का एसीआर भरने तगादा किया है।

डिप्टी सीएम साहबों की उम्मीदें

बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे। नीतिश कुमार के इस्तीफे के बाद उन्हें राज्य की बागडोर सौंपी गई है। इससे छत्तीसगढ़ की उपमुख्यमंत्रियों की उम्मीदें भी कुंलाचे भर रही होंगी। मगर सम्राट चौधरी एक अपवाद की तरह है। अविभाजित मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ बनने के बाद तक डिप्टी सीएम साहबों का तजुर्बा अच्छा नहीं रहा। बल्कि, डिप्टी सीएम बनने के बाद सियासी कैरियर ही ढलान पर आ गया। मध्यप्रदेश के दौर में सुभाष यादव जैसे जमीनी और कद्दावर सहकारिता नेता उप मुख्यमंत्री बनने के बाद बियाबान में चले गए। तो उनके साथ डिप्टी सीएम रहे कोरबा निवासी प्यारेलाल कंवर डिप्टी सीएम रहने के बाद अगले विधानसभा चुनाव में अपनी सीट तक नहीं निकाल सके। उनसे पहले वीरेंद्र सखलेखा, शिवभानु सिंह सोलंकी और जमुना देवी का हश्र भी बहुत अच्छा नहीं हुआ। वीरेंद्र सखलेचा अपवाद स्वरूप 1978 में मुख्यमंत्री बने मगर ज्यादा दिन इस पद पर रह नहीं सकें। सुंदरलाल पटवा उन्हें खो कर गद्दी पर बैठ गए थे। छत्तीसगढ़ में पिछली सरकार में ही टीएस सिंहदेव पार्टी हाईकमान द्वारा किए गए करार और आश्वासनों के बाद भी डिप्टी सीएम से सीएम न बन सकें। उपर से गुस्से में पंचायत से इस्तीफा देकर उन्होंने अपने एक विभाग का नुकसान कर लिया। कहीं ऐसा तो नहीं...डिप्टी सीएम पद के साथ जुड़े इन्हीं बुरे योगों को देखते छत्तीसगढ़ के एक उप मुख्यमंत्री दिल्ली जाने का खयाल पाल लिए हैं।

हफ्ते का कोट

’जो रास्ता कठिन है, वही आपको मंजिल तक ले जाएगा, संघर्ष से घबराओं मत, यही तुम्हें आगे बढ़ाएगा’ और ’कर्म किसी के बेकार नहीं जाते, तुम किसी का जीना मुश्किल कर दो, उपरवाला तुम्हारा मरना मुश्किल कर देगा।’

अंत में दो सवाल आपसे?

1. छत्तीसगढ़ का आईपीएस कैडर कुछ ज्यादा ही निराश और उत्साहविहीन क्यों हो गया हैं?

2. पूर्णकालिक डीजीपी की नियुक्ति न होने से चीफ सिकेट्री और एसीएस होम क्यों घबरा रहे हैं?

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: डिप्टी सीएम की वैकेंसी?



तरकश, 12 अप्रैल 2026

संजय के. दीक्षित

डिप्टी सीएम की वैकेंसी?

राजनीतिक गलियारों में जैसी की चर्चाएं हैं, 3 मई के बाद छत्तीसगढ़ में एक डिप्टी सीएम की वैकेंसी हो सकती है। 3 मई को पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की काउंटिंग है। इसके बाद बीजेपी नितिन नबीन की टीम बनाने पर अपना फोकस करेगी। यूपी में अगले साल इलेक्शन है और वहां ब्राम्हण समेत कई जातियां बीजेपी से बहुत खुश नहीं है। इसलिए टीम नितिन में सबको साधने का प्रयास किया जाएगा। बहरहाल, बात छत्तीसगढ़ में डिप्टी सीएम की वैकेंसी की...तो डिप्टी सीएम के करीबी लोग भी तस्दीक कर रहे हैं कि भाई साब को राष्ट्रीय महासचिव बनाया जाएगा। छत्तीसगढ़ में फिलवक्त दो डिप्टी सीएम हैं। एक अगर दिल्ली गए तो फिर सिंगल डिप्टी सीएम बच जाएंगे। सियासी संतुलन के हिसाब से सरकार भी नहीं चाहेगी कि एक उप मुख्यमंत्री रहें। इसलिए, जुलाई में संभावित मंत्रिमंडल की सर्जरी में किसी नए या पुराने में से एक को डिप्टी सीएम बनाया जाएगा। मगर तब, जब भाई साब जनरल सिकेट्री बन जाएं।

जनरल सिकेट्री के मायने

वैसे तो बीजेपी की नेशनल बॉडी में पूर्व मंत्री लता उसेंडी के शामिल होने की संभावना अधिक है। वे 10 साल तक मिनिस्टर रही हैं। जगतप्रकाश नड्डा की टीम में भी रहीं। उनके बनने से दो कोटे की पूर्ति होगी। ट्राईबल और महिला। बहरहाल, डिप्टी सीएम के नितिन नबीन की टीम में शामिल होने की चर्चाएं हैं तो सवाल भी उठते हैं कि उप मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ भाई साब दिल्ली में इतनी उत्सुकता क्यों दिखा रहे? इसका जवाब है कि उनका एज अभी काफी कम है। दिल्ली के क्लोज अगर हो गए तो राज्य में बड़े एक्सपोजर के साथ कभी भी वापसी हो सकती है। राज्य में नहीं भी आए, दिल्ली की सियासत में मामला ठीकठाक जम गया तो वो भी बुरा नहीं...ओजस्वी वक्ता तो हैं ही इंग्लिश भी ठीकठाक झाड़ लेते हैं। इसलिए, डिप्टी सीएम साब भी जनरल सिकेट्री बनने की चर्चाओं को खारिज नहीं कर रहे।

जुलाई में सर्जरी

छत्तीसगढ़ समेत पांच राज्यों में नवंबर 2023 में विधानसभा चुनाव हुए, जुलाई में वहां ढाई साल पूरा हो जाएगा। अब बाकी राज्यों के बारे में गारंटी के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता मगर छत्तीसगढ़ में मंत्रियों के जो हालात है, उससे मेगा सर्जरी अवश्यंभावी है। जुलाई में ही सर्जरी इसलिए कि 3 मई को काउंटिंग के बाद करीब 15 मई तक बीजेपी सरकार बनाने और जश्न सेलिब्रेट करने में व्यस्त रहेगी। 15 मई के बाद टीम नितिन नबीन बनाने पर मंथन प्रारंभ होगा। ऐसी संभावना है कि मई लास्ट या जून फर्स्ट वीक तक राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन कर लिया जाएगा। इसके बाद फिर केंद्र सरकार जिन राज्यों के ढाई साल कंप्लीट हो गए हैं, उस पर अपना ध्यान केंद्रित करेगी। केंद्र को इसमें ज्यादा वक्त नहीं लगेगा क्योंकि उसके पास पूरी रिपोर्ट है। छत्तीसगढ़ की आईबी तो और काफी एक्टिव है। यहां मंत्रियों के कारनामों की छोटी-से-छोटी सूचना भी मुख्यालय को भेजती है। लिहाजा, जुलाई में जो सर्जरी होगी, वो मेजर होगी। दावे तो ये किए जा रहे...आधा दर्जन से अधिक मंत्रियों को शानो-शौकत वाले लग्जरी बंगले से बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ सकता है।

बेलगाम मंत्री, भ्रष्ट विभाग

छत्तीसगढ़ सरकार एक तरफ महिलाओं के उत्थान के लिए महतारी वंदन योजना चला रही है। हर महीने उनके खाते में नियम से हजार रुपए ट्रांसफर किया जाता है। दूसरी तरफ शर्मनाक स्थिति यह है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को साड़ी बांटने में डंडी मारी जा रही। हद है...महिला बाल विकास विभाग ने साढ़े पांच की जगह पांच मीटर की साड़ी सप्लाई कर दी। सरकार को इसमें कड़ा तेवर दिखा जिम्मेदारों को उल्टा लटकाना चाहिए। क्योंकि, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताएं सरकार और सत्ताधारी पार्टी के लिए ओपिनियन मेकर होती हैं। वैसे भी सरकार की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। आश्चर्य की बात कि कई बड़े और ऐतिहासिक सुधार के काम करने के बाद भी सरकार को उसका क्रेडिट नहीं मिल रहा तो उसकी मूल वजह करप्शन है और मंत्रियों का बेलगाम होना। बीजेपी के लोग भी मान रहे कि अगले दो-तीन महीने में अगर मंत्रिमंडल में सर्जरी नहीं हुई तो फिर 2028 के विधानसभा चुनाव में बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। आखिर, मंत्री और नेता अपने हाथों ही पार्टी और सरकार की लंका कर देंगे तो मोदी, अमित शाह और नितिन नबीन कितना क्या कर लेंगे?

डीजीपी और कांटे का टक्कर

लास्ट संडे को छुट्टी का दिन होने के बाद भी गृह विभाग के मुलाजिमों को शाम तक मंत्रालय में बिठाकर रखा गया कि पूर्णकालिक डीजीपी का आदेश निकालना है। मगर टक्कर इतना जोरदार है कि सिस्टम किसी एक नाम पर फैसला नहीं कर पाया। डीजीपी के दावेदारों में एक यूपी के ठाकुर हैं तो दूसरे राजस्थान के वैश्य। जाहिर है, दोनों अपनी तरफ से कोशिशें कम नहीं कर रहे होंगे। मगर सरकार बड़ी दुविधा में है। किसके नाम पर मुहर लगाएं...एक है तो वो कुछ सुनता नहीं...सिस्टम को चिंता यह भी खाये जा रही है। सियासी दृष्टि से भी दोनों कमजोर नहीं। वैसे भी ठाकुर और वैश्य कम्यूनिटी में ये अच्छी बात है कि उनके लिए समाज फर्स्ट होता है, पार्टी सेकेंड्री। सो, मुकाबला टाईट है। हालांकि, एक बात तय है कि दोनों में से डीजीपी वही बनेगा, जिसके माथे पर लिखा होगा। भला अमरनाथ उपध्याय ने कभी कहां सोचा था कि गिरधारी नायक जैसे आईपीएस के होते वे कभी डीजीपी बन जाएंगे। मगर ऐसा हुआ...29 साल की सर्विस में एडीजी होते हुए वे डीजीपी बन गए थे। उनके लिए तत्कालीन मुख्य सचिव सुनिल कुमार प्रगट हो गए थे। उन्होंने अशोक जुनेजा को हाथोंहाथ लेटर लेकर दिल्ली भेजा और एमएचए सिकेट्री को फोन कर उसी दिन शाम को 29 साल की सर्विस में डीजीपी बनाने का परमिशन ले लिया। तो अतीत में ऐसा भी हुआ है, इसका स्मरण रखना चाहिए।

2001 बैच तक दावेदार

छोटे राज्यों में अफसरों की कमी की वजह से भारत सरकार ने डीजीपी बनाने के लिए आईपीएस की 30 बरस की सर्विस को पांच साल कम कर 25 साल कर दिया है। छत्तीसगढ़ सरकार अगर इसे फॉलो करें तो 2001 बैच तक के आईपीएस अधिकारी डीजीपी के लिए दावेदार हो जाएंगे। याने एसआरपी कल्लूरी से लेकर प्रदीप गुप्ता, विवेकानंद, दीपांशु काबरा, अमित कुमार और डॉ0 आनंद छाबड़ा तक। तब सरकार के पास ढेरो विकल्प होते। मगर सरकार ने डीजीपी के पेनल के लिए 30 साल की सर्विस को मान्य करते हुए तीन अफसरों के नाम ही यूपीएससी को भेजे थे। इनमें से यूपीएससी ने दो के ही पेनल भेजे।

एडीजी के नीचे एडीजी

अफसरों की सरकार से नाराजगी कोई नई बात नहीं। हर टेन्योर में कुछ अफसर सिस्टम के निशाने पर होते हैं। मगर पोस्टिंग प्रोटोकॉल में वह शो नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए दीपांशु काबर और डॉ0 आनंद छाबड़ा की पोस्टिंग को लें। दीपांशु काबरा पीएचक्यू में एडीजी ट्रेनिंग हैं और प्रमोट हुए एडीजी छाबड़ा भी एडीजी ट्रेनिंग। याने एडीजी के नीचे एडीजी। कायदे से ऐसा होना नहीं चाहिए। सिस्टम चाहे तो भले ही पोस्टिंग न दें, मगर सीनियर, जूनियर को एक ही पद पर नहीं बिठाना चाहिए।

गोल्फ प्रेम को झटका 

मंत्रालय समेत सरकारी कार्यालयों में बायोमेट्रिक अटेंडेंस प्रारंभ होने से उन अफसरों को गोल्फ खेलना छूट गया है जिनकी सरकारी गाड़ियां सुबह छह और सात बजे नवा रायपुर की तरफ दौड़ती रहती थी। कुछ सालों से अभिजात्य वर्ग के इस खेल के प्रति छत्तीसगढ़ के अफसरों की रुचि गहरी हुई थी। कुछ अफसर तो यह दिखाने के लिए भी जाते थे कि वे गोल्फ खेलते हैं। हालांकि, उस समय कोई रोक-टोक भी नहीं थी...अफसरशाही में पूरी डेमोक्रेसी थी। गोल्फ खेल-खालकर अफसर 10 बजे तक घर पहुंचते थे...फिर मूड हुआ तो दोपहर बारह-एक बजे तक मंत्रालय। मगर बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम ने स्टे्टस सिंबल बताने का सबका खेल बिगाड़ दिया। जो नवा रायपुर में रहते हैं, उनको दिक्कत नहीं मगर ओल्ड रायपुर वालों को अब साढ़े नौ बजे घर से निकलना पड़ता है। ऐसे में, गोल्फ प्रेम छूटेगा ही।

वायरल रील्स और उठते सवाल

छत्तीसगढ़ की पुलिस बिरादरी में एक रील्स बड़ी वायरल है। उसमें इंटरव्यू बोर्ड पुलिस की नौकरी के लिए अप्लाई किए अभ्यर्थी से पूछा...पुलिस के लिए 150 रुपए पौष्टिक भत्ता मिलता है, आप पुलिस में हैं तो इसे कैसे मैनेज करेंगे? जवाब बड़ा इंटरेस्टिंग और सिस्टम पर करारा प्रहार करने वाला है। अप्लीकेंट बोला, सर...150 रुपए के हिसाब से एक दिन का पांच रुपए हुआ। पांच रुपए का एक नींबू आता है, रोज उसमें नमक लगाकर चाट लेंगे। इससे विटामिन सी की पूर्ति हो जाएगी फिर आयोडिन मिलेगा, इससे पुलिस वालों को घेंघा रोग नहीं होगा। हालांकि, रील्स बनाने वाले ने त्रुटिवश इसमें 50 रुपए बढ़ा दिया है। वास्तव में हमारे जवानों को पौष्टिक भत्ते के रूप में मिलता 100 रुपए है। मध्यप्रदेश के दौर में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने 1982 में पुलिस वालों के लिए 100 रुपए पौष्टिक भत्ता शुरू किया था। और 44 साल बाद भी यह 100 से बढ़ा नहीं। जबकि, यूपी में 5000 और पंजाब में 6000 पौष्टिक भत्ता मिलता है। जाहिर है, पुलिस की नौकरी सबसे टफ है। बरसात हो या चिलचिलाती धूप, या हाड़ कंपाने वाली ठंड...पुलिस को मुस्तैद रहना होता है। मंत्री, मिनिस्टर या बड़े लोगों का वीवीआईपीनेस भी वर्दीधारियों की संख्या के चलते ही प्रगट होता है फिर भी ये हाल? छत्तीसगढ़ में अभी तक 11 डीजीपी रह चुके। मगर किसी ने भी कोई जवानों के लिए एफर्ट नहीं दिखाया। दरअसल, आईपीएस और स्टेट पुलिस सर्विस वालों को काजू-बादाम जैसे पोष्टिक चीजें खरीदनी नहीं पड़ती, इसलिए वे पौष्टिक पदार्थो के रेट से वाकिफ नही होते। इसलिए, उन्हें जवानों की चिंता भी नहीं होती। अर्जुन सिंह राजा होकर भी संवेदनशील थे, ये अलग बात है। बहरहाल, प्रभारी डीजीपी अरुणदेव गौतम को पौष्टिक भत्ता बढ़ाने के लिए अब तक के सबसे तेज-तर्रार गृह मंत्री विजय शर्मा से बात करनी चाहिए। क्योंकि, बाकी डीजीपी के समय विजय शर्मा जैसा कोई ताकतवर गृह मंत्री नहीं रहा।

हफ्ते का कोट

"तुलना के खेल में मत उलझो, इस खेल का कोई अंत नहीं...जहां तुलना की शुरूआत होती है, वहीं से आनंद और अपनापन खत्म होता है।" और फिर..."नहीं खाई ठोकरे राह में तो, मंजिल की अहमियत क्या जानोगे, नहीं मिले गलत लोग राह में तो, सही की कदर कैसे पहचानोगे।"

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या 2010 बैच का कोई आईएएस अफसर भी डेपुटेशन पर दिल्ली जा रहा है?

2. छत्तीसगढ़ के एक मिनिस्टर का नाम बताइये, जिन्हें कुछ समझ में नहीं आता, उनके विभाग सिकेट्री चला रहे हैं?