बुधवार, 29 जुलाई 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: छत्तीसगढ़ और पेपर लीक

 


तरकश, 26 जुलाई 2026

संजय के. दीक्षित

छत्तीसगढ़ और पेपर लीक

पेपर लीक की बात करें, तो छत्तीसगढ़ के लोगों के भी अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं। बात 2010 की है, जब पीएमटी होता था। तखतपुर के एक हॉल में 27 बच्चों को पेपर लीक कर उन्हें आंसर सॉल्व कराया जा रहा था। उनमें मुंगेली निवासी अविभाजित मध्यप्रदेश के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री की पोती भी शामिल थी। पुलिस ने छापा मारा मगर बिना किसी ठोक कार्रवाई के केस को रफा-दफा कर दिया गया। उससे पहले 2007 में पीएमटी का टॉपर भी फर्जी निकला था। उसकी जगह दूसरे छात्र ने परीक्षा दी। पुलिस ने मेडिकल स्टूडेंट कोे गिरफ्तार कर जेल भेजा। मगर केस इतना कमजोर बनाया गया कि कुछ दिन बाद उसकी जमानत मिल गई। और फर्जीवाड़ा करने वाला छात्र डॉक्टरी पास कर आराम से यहां से निकल गया। उधर, 12वीं बोर्ड की टॉपर पोरा बाई को भला कौन नहीं जानता। परीक्षा से पहले ही पोरा बाई को पेपर मिल गए थे। वे घर से किसी और से उत्तर पुस्तिका लिखवा कर लाई और मेरिट में प्रथम स्थान हासिल कर लिया। उसमें भी कुछ खास नहीं हुआ। जेल से छूटकर वह शिक्षिका बन गई। बाकी 2003 और 2021 के पीएसस में क्या हुआ, ये बताने की आवश्यकता नहीं।

दो गए, सात आए

पुलिस महकमे में अफसरों की संख्या इतनी अधिक हो गई है कि अब बैठने के लिए जगह का टोटा पड़ गया है। दरअसल, आईपीएस के ट्रांसफर में दो आईपीएस को फील्ड में शिफ्ट किया गया। बद्री मीणा बस्तर आईजी बनें तो सुनील शर्मा सारंगढ़ एसपी। इन दो अफसरों की जगह सरकार ने सात आईपीएस अधिकारियों को पीएचक्यू बुला लिया। दो आईजी और पांच डीआईजी, एसपी। इनमें बालाजी सोमावार, प्रशांत अग्रवाल, रामकृष्ण साहू, राजेश कुकरेजा, भावना गुप्ता, रवि कुर्रे जैसे आईपीएस शामिल हैं। उसमें भी बद्री मीणा के चेंबर खाली करते ही उसमें संविदा पोस्टिंग वाले सुशील शुक्ला ने कब्जा जमा लिया। अब डीजीपी अरुणदेव गौतम के लिए सिरदर्द हो जाएगा अफसरों को कहां बिठाएं। याने जो हालत मंत्रालय की है, वहीं स्थिति अब पीएचक्यू की होने वाली है।

15 अगस्त को ऐलान

इसी साल 23 जनवरी को देर शाम रायपुर में सूबे के फर्स्ट पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम को आधे-अधूरे ढंग से लागू किया गया था। जाहिर है, रायपुर एयरपोर्ट, कैपिटल सिटी याने नवा रायपुर समेत उरला, उरकुरा जैसे इंडस्ट्रियल इलाका इससे अछूता रह गया था। मगर अब लगता है, सिस्टम के भीतर इस चूक को दुरुस्त करने पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जा रहा है। तभी डीजीपी अरुणदेव गौतम ने सरकार को इस संदर्भ में पत्र लिखा है। अब डीजीपी ने खुद से पत्र लिखा या लिखवाया गया, ये अलग विषय है। सवाल है कंप्लीट पुलिस कमिश्रेट बनाने का, तो लगता है 15 अगस्त को सरकार इसका ऐलान कर सकती है, और लगे हाथ बिलासपुर में भी पुलिस कमिश्नरेट बनाने की घोषणा हो सकती है। अंदरखाने की खबर है, विधानसभा चुनाव के पहले तक रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग, तीनों पुलिस कमिश्रेट बन जाएंगे। पोलिसिंग की दिशा में राज्य सरकार का यह बड़ा रिफार्म होगा।

कलेक्टरी, कप्तानी का क्रेज

रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग, छत्तीसगढ़ के टॉप के तीन जिलों में आते हैं। खासकर, कलेक्टरी या एसपी की पोस्टिंग की दृष्टि से इन तीनों जिलों का बड़ा क्र्रेज रहता है। मगर रायपुर के बाद बिलासपुर और दुर्ग भी पुलिस कमिश्रेट बन गया तो फिर एसपी का पद समाप्त हो जाएगा, कलेक्टरों का रुतबा भी घट जाएगा। विदित है, पुलिस कमिश्नरेट बन जाने के बाद कलेक्टरों के कई अधिकार पुलिस कमिश्नर को शिफ्ट हो जाते हैं। इसलिए, छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश की ब्यूरोक्रेसी इस पक्ष में नहीं रहती कि पुलिस कमिश्नरेट बनाया जाए। मगर वक्त की जरूरत को देखते अधिकांश राज्यों में पुलिस कमिश्रेट सिस्टम का विस्तार प्रारंभ हो गया है।

एसएएस की लिस्ट

राज्य प्रशासनिक सेवा के 19 अधिकारियों का बीते दिनों सरकार ने ट्रांसफर किया। मगर चर्चा है, एक लिस्ट और तैयार हो रही है। दरअसल, राप्रसे अधिकारियों की लिस्ट लंबे समय से प्रतीक्षित थी। सरकार ने ज्यादा ही जरूरी वाले अफसरों का तबादला कर दिया। खासकर लंबे समय वाले जिला पंचायत के कई सीईओ के। चूकि वो लिस्ट कंप्लीट नहीं थी...राप्रसे अफसरों की संख्या 500 से क्रॉस कर गई है, इस दृष्टि से 19 की संख्या कुछ भी नहीं है। लिहाजा, एक बड़ी लिस्ट की अटकलें बड़ी तेज है।

समरथ को नहीं दोष गोसाई

छत्तीसगढ़ में अगर साम्यर्थ है तो कुछ भी असंभव नहीं है। एक राप्रसे अधिकारी ने जनपद सीईओ रहते शिक्षकों के एरियर्स के नाम पर 14 करोड़ रुपए का कांड कर दिया। स्कूल शिक्षा विभाग की जांच रिपोर्ट में स्पष्ट तौर से राप्रसे अधिकारी को दोषी बताया गया। शिक्षाकर्मियों को संविलियन के बाद सरकार ने एरियर्स का कोई प्रावधान नहीं किया था और न ही किसी को दिया गया। मगर सीईओ साब ने मिलीजुली कुश्ती कर कमाल कर दिया...खजाने से 14 करोड़ रुपए गोल कर डाला। खैर, 2022 में इसकी शिकायत हुई मगर कुछ भी नहीं हुआ। सितंबर 2025 में विकास शील चीफ सिकरेट्री बनें तो उनके सामने यह मसला पहुंचा। उन्होंने अर्जेंट जांच करने का आदेश दिया। मगर अफसर की पहंुच देखिए, स्कूल शिक्षा विभाग ने तब तक फाइल को दबाए रखा, जब तक राप्रसे अधिकारी को आईएएस अवार्ड नहीं हो गया। हालांकि, आईएएस बन जाने के बाद भी जांच की फाइल अभी भी कछुआ चाल में रेंग रही है। हो सकता है कि आईएएस के किसी जिले के कलेक्टर बनते तक फाइल रेंगती रह जाए। ये वहीं अफसर हैं, जो एसडीएम रहते एनटीपीसी के जमीन अधिग्रहण में 500 करोड़ का खेला कर दिए थे। सरकार ने न केवल उन्हें सस्पेंड किया था बल्कि कलेक्टर ने अपराध दर्ज कराया था। लंबे समय तक वे फरार रहे। पिछले जीएडी सिकेट्री ने उन्हें बिना जांच क्लीन चिट देने से मना किया तो उनका विकेट उड़ गया। नए सिकेट्री ने विवादित क्लीन चिट दिया और इसका नतीजा यह हुआ कि उन्हें आईएएस अवार्ड हो गया।। बहरहाल, चीफ सिकेट्री दिल्ली से आए या मनीला से, ऐसे साम्यर्थवान अफसरों के खिलाफ कौन कार्रवाई कर सकता है।

संयोग और हार्ड लक

आईएएस में दूसरे नंबर के सबसे सीनियर अफसर सुब्रत साहू और आईपीएस के सबसे वरिष्ठ अधिकारी पवन देव के साथ संयोग ये है कि दोनों न केवल 92 बैच वाले हैं, बल्कि दोनों एक का बर्न भी एक ही मंथ में है। दोनों जुलाई 1968 वाले हैं। जाहिर है, 60 साल के हिसाब से 31 जुलाई 2028 को एक साथ रिटायर होंगे। दोनों अगर चीफ सिकेट्री और डीजीपी बनते तो एक ही दिन सूबे की दोनों शीर्ष कुर्सी वैकेंट हो जाती। खैर, दोनों के साथ हार्ड लक ये रहा कि दोनों राज्य के सबसे बड़े चेयर पर बैठने से चूक गए। सुब्रत साहू मुख्य सचिव बनते-बनते रह गए। उधर, पवन देव के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बैचवाइज देखें तो 92 बैच में पवनदेव नंबर वन पर हैं। उनके बाद अरुणदेव गौतम आते हैं। मगर हाथ की लकीरों का खेल है। सुब्रत इस समय राजस्व बोर्ड के चेयरमैन हैं तो पवनदेव पिछले साढ़े छह साल से पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन में बैठे हैं। हालांकि, पुलिस महकमे में ऐसा नहीं कि डीजी लेवल के और पद नहीं हैं। मगर फिर वही, बात मुकद्दर की...। हथेली की रेखाएं अगर बदलेगी तो सिस्टम का ध्यान अपने आप उनके तरफ चला जाएगा।

रेपिस्ट बाबा, शिष्य कुलपति

राजधानी रायपुर में पिछले दिनों एक बाबा खम्हारडीह पुलिस के हत्थे चढ़ गए। उन पर आरोप है कि उन्होंने तंत्र-मंत्र का झांसा देकर अनेक महिलाओं के साथ दुष्कर्म किया। बाबा की गिरफ्तारी के बाद रायपुर के एक बड़ी यूनिवर्सिटी के कुलपति मुंह छिपाते फिर रहे हैं। असल में, विद्वान कुलपति को बाबा पर इतना विश्वास था कि दो खोखा देने के बाद भी उन्हें लगता था कि बाबा के चलते ही कुलपति बन पाए। सो, बाबा के साथ फेसबुक पर उनकी फोटुएं अटी पड़ी हुई थी। कभी पत्नी के साथ बाबा के पांव पखारते, तो कभी उनके चरणों को पकड़े हुए। मगर उनकी आस्था तब खतरे में पड़ गई, जब पुलिस ने बाबा के स्कैंडल का भंडाफोड़ कर दिया। लानत है, समाज में पढ़े-लिखे विद्वान माने जाने वाले कुलपति साहबान अंधभक्ति में बाबाओं को नहीं पहचान पाते, तो फिर विद्यार्थियों की प्रतिभाओं को क्या समझेंगे?

आईएएस का डबल डिमोशन?

आईएएस संतोष देवांगन का ग्रह-नक्षत्र ऐसा बिगड़ा कि दो महीने में डबल डिमोशन हो गया। एक तो उन्हें दो महीने में ही कलेक्टरी से हटाकर मंत्रालय भेज दिया गया और दूसरा, यहां से जब कलेक्टर बन जीपीएम गए थे, तब वे हायर एजुकेशन में कमिश्नर थे और अब उन्हें स्कूल शिक्षा में स्पेशल सिकेट्री पोस्ट किया गया है। याने हायर एजुकेशन से स्कूल एजुकेशन। हालांकि, पोस्टिंग की दृष्टि से इसे डिमोशन नहीं माना जाता...हायर एजुकेशन से ज्यादा पूछपरख वाला विभाग स्कूल एजुकेशन माना जाता है। मगर इसे डिमोशन बता चुटकी लेने से लोगों का मुंह कैसे बंद किया जा सकता है।

जूनियर को सैल्यूट

पिछले दिनों आईपीएस के ट्रांसफर हुए। उसमें एक केस ऐसा आया, जिसमें सीनियर अफसर अब अपने से दो बैच जूनियर को रिपोर्ट करेगा। बात छत्तीसगढ़ आर्म्स फोर्स की कर रहे हैं। दरअसल, 2010 बैच के आईपीएस शंकर बघेल 16वीं बटालियन के कमांडेंट हैं। उनके उपर 2012 बैच की श्वेता राजमणि को आर्म्स फोर्स का डीआईजी बनाया गया है। ऐसे में, बघेल की स्थिति समझी जा सकती है...उन्हें अब श्वेता को सैल्यूट ठोकना पड़ेगा।

एमडी की नियुक्ति और मुश्किलें

फॉरेस्ट में दो अहम नियुक्तियां होनी है। वन विकास निगम के एमडी प्रेम कुमार और लघु वनोपज संघ से अनिल साहू 31 जुलाई को रिटायर हो जाएंगे। इसमें प्रश्न यह नहीं कि दो शीर्ष अफसर सेवानिवृत्त होने वाले हैं। मसला ये है कि सरकार के पास विकल्प का टोटा है। ये दोनों पद पीसीसीएफ लेवल का है और इस स्तर के अफसर हैं नहीं। अगर एडिशनल पीसीसीएफ लेवल की बात करें तो उसमें भी कमोवेश यही स्थिति है। देखना है, अब सरकार संजीता गुप्ता और अमरनाथ प्रसाद में से विकल्प ढूंढती है या इन दोनों संस्थाओं को और जूनियर अफसरों के हवाले करती है।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. किस जिले के कलेक्टर दोनों हाथ से पैसा कमाने और अपने प्रेयसी पर लुटाने के लिए कुख्यात होते जा रहे हैं?

2. सरगुजा और सुकमा में कप्तानी और राजभवन में एडीसी रहने के बाद भी आईपीएस सुनील शर्मा को सारंगढ़ जैसे नए और छोटे जिले का एसपी क्यों बनाया गया?

शनिवार, 11 जुलाई 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: एसपी ट्रांसफर कंप्लीट नहीं!


 

तरकश, 12 जुलाई 2026

संजय के. दीक्षित

एसपी ट्रांसफर कंप्लीट नहीं!

सरकार ने एक पुलिस रेंज के आईजी के साथ 12 जिलों के पुलिस अधीक्षकों को बदल दिया। मगर अभी भी ट्रांसफर कंप्लीट नहीं हुआ है। बस्तर, बिलासपुर, कोरबा जैसे जिलों के एसपी को इस लिस्ट में शामिल नहीं किया गया। जबकि, इन तीनों कप्तानों को ढाई साल से ज्यादा हो गया है। बताते हैं, बस्तर के एसपी शलभ सिनहा को एक बड़े जिले में पोस्ट करना था, मगर वहां के आईजी बद्री मीणा अभी-अभी ज्वाईन किए हैं, इसलिए आईजी के साथ एसपी बदलने का सरकार ने रिस्क नहीं लिया। इस चक्कर में बिलासपुर, कोरबा और दुर्ग का मामला लटक गया। हालांकि, दुर्ग एसपी विजय अग्रवाल को अभी साल भर ही हआ है मगर रजनेश सिंह को दुर्ग भेजना है, इसलिए विजय अग्रवाल बिलासपुर या कोरबा जाएंगे। चर्चा ये भी है कि कोरबा एसपी बस्तर जाएंगे और वहां से शलभ बिलासपुर या कोरबा आएं। कुल मिलाकर अगस्त तक एसपी की एक लिस्ट और आएगी, जिसमें कम-से-कम इन तीन जिलों के एसपी बदलेंगे ही।

महिला कप्तानः एक इन, एक आउट

छत्तीसगढ़ के 33 में एकमात्र महिला पुलिस अधीक्षक रहीं भावना गुप्ता तीन महीने की लीव से लौटकर सोमवार को बलौदा बाजार में ज्वाईन करने वाली थीं कि इससे दो दिन पहले उन्हें हटा दिया गया। हालांकि, लोगों को यह नहीं समझ में आ रहा कि तीन महीने अवकाश में रहने के दौरान एडिशनल एसपी से काम चलाया गया और भावना के छुट्टी से लौटते ही आखिर क्या हुआ कि उन्हें हटा दिया गया...वो भी ज्वाईन करने से जस्ट पहले। खैर, उनकी जगह एक दूसरी भावना को सरकार ने एसपी बनाया है। भावना पाण्डेय धमतरी की एसपी होंगी। इसके लिए सूरज परिहार को साल भर में ही खो कर दिया गया। यद्यपि, भावना को पोलिसिंग की अच्छी समझ है। सीएसपी, एएसपी रहने के दौरान उनका कामकाज ठीक रहा था। मगर पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करने उन्होंने लंबे समय से खुद को भिलाई में समेट लिया था...मगर अब वे फ्री होकर फिर से फील्ड में आ गई हैं। उनके हसबैंड विजय पाण्डेय जांजगीर में एसपी हैं। छत्तीसगढ़ में ये पहली बार होगा, जब आईपीएस दंपती एक साथ एसपी होंगी।

पुलिस कमिश्नरेट को झटका

एसपी की लिस्ट का एक महत्वपूर्ण प्वाइंट यह है कि इसमें डायरेक्ट आईपीएस को बड़े जिले के लिए तैयार करने का खास प्रयास नहीं दिखा। जाहिर है, कोरबा और बस्तर को छोड़ आज भी बड़े जिले प्रमोटी आईपीएस ही संभाल रहे हैं। ठीक है...सूबे की पूरी पुलिस डिरेल्ड हो गई है तो सिर्फ उसका रोना रोने से काम नहीं चलेगा। उसे पटरी पर लाने का दायित्व गृह विभाग और पीएचक्यू का है। आखिर विजय अग्रवाल, रजनेश सिंह और शशिमोहन सिंह का विकल्प ढूंढना पड़ेगा न। खैर, ट्रांसफर में सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट रायपुर पुलिस कमिश्नर को बड़ा झटका लगता दिखाई पड़ रहा है। रायपुर के तीन डीसीपी को हटाकर सरकार ने एसपी बना दिया मगर उनकी जगह पोस्ट किया सिर्फ एक डीसीपी। याने दो खाली। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार अब दो में सीनियर एडिशनल एसपी को डीसीपी पोस्ट कर दे। यदि ऐसा हुआ तो पुलिस कमिश्नर सिस्टम डिमरलाइज होगा। क्योंकि, देश के किसी भी कमिश्नरेट में एसपी लेवल के आईपीएस अफसर ही डीसीपी होते हैं। एक तरफ गृह मंत्री विजय शर्मा बिलासपुर में पुलिस कमिश्नरेट की बात कर रहे, दूसरी ओर जो पहले से कमिश्नरेट है, वही डगमगाता दिख रहा...।

पोस्टिंग का संयोग

हालांकि, अफसरशाही को कभी जाति या वर्ग के चश्मे से नहीं देखना चाहिए, उनके काम की बात होनी चाहिए मगर पोस्टिंग में कोई रोचक संयोग बनेंगे, तो चर्चाएं तो होगी ही। धमतरी जिले में भावना पाण्डेय एसपी अपाइंट हुई हैं। वहां पहले से शैलेंद्र पाण्डेय एडिशनल एसपी और अभिषेक चतुर्वेदी सीएसपी हैं। कलेक्टर अविनाश मिश्रा वहां पहले से हैं। याने संयोग से सभी ब्राम्हण। उधर, राजनांदगांव में अजय यादव को आईजी पोस्ट किया गया है। वहां पहले से मधुसुदन यादव महापौर हैं और गजेंद्र यादव प्रभारी मंत्री। फिर कलेक्टर भी जीतेंद्र यादव। अब अजय यादव न जाने किसके कोटे से राजनांदगांव पहुंचे हैं, मगर ये सही है कि विधानसभा अध्यक्ष डॉ0 रमन सिंह के विस क्षेत्र की टीम अब काफी मजबूत हो गई है। आईजी, कलेक्टर, एसपी, जिपं सीईओ सभी को चुनकर लाया गया है।

इमोशनल मंत्री, विदा कलेक्टर

9 जुलाई का कैबिनेट कुछ अलग रहा। एजेंडा पर चर्चा उपरांत मुख्य सचिव समेत तमाम अफसर बाहर निकल गए। ऐसा कई बार होता है, मंत्रिपरिषद में कोई गंभीर मुद्दा पर चर्चा करनी होती है तो अधिकारियों को बाहर भेज दिया जाता है। 9 जुलाई को भी ऐसा ही हुआ। इशारा भांपते ही अफसर हॉल से निकल गए। इसके बाद कैबिनेट कक्ष में करीब घंटे भर मंत्री बैठे रहे। फिर जब बाहर निकले तो एक मंत्री इमोशनल दिखे...बाकी मंत्रियों की भाव-भंगिमा भी थोड़ी तनी हुई थी। मंत्रियों का चेहरा देख लगा कि अंदरखाने में कुछ तो हुआ है और अगले दिन जीपीएम के कलेक्टर की छुट्टी हो गई। बताते हैं, एक मंत्री ने कलेक्टर संतोष देवांगन को फोन किया और उस दौरान ऐसा कुछ हुआ कि वे आहत हो गए। और वह बात कैबिनेट में बड़ी गंभीरता के साथ पहंुच गई। हालांकि, मंत्रीजी बड़ा साफ्ट स्पोकन है, आमतौर से अफसरों से बातचीत में वे शालीनता बरतते हैं। मगर ये भी सही है कि संतोष देवांगन का अतीत चाहे जैसा भी रहा हो, जीपीएम के आप किसी को भी फोन लगा लें, आपकी धारणा बदल जाएगी। दरअसल, पिछली सरकार ने जीपीएम को जिला बनाया मगर उसके बाद कभी भी कोई ढंग का कलेक्टर वहां भेजा नहीं गया। 2025 के सुशासन तिहार में खुद मुख्यमंत्री गुस्से में बोल गए थे कि तीन थाना का जिला नहीं संभलता आप लोगों से। ऐसे में, संतोष देवांगन ने वहां अच्छी झांकी बना ली थी। खासतौर से प्रायवेट अस्पताल को सील करने के बाद लोगों को लगा कि कलेक्टर ऐसा ही होना चाहिए। जाहिर है, संतोष देवांगन का विकेट गिरने से संगठन या सिस्टम के जिस भी नेता का इगो तो शांत हो गया मगर उससे सत्ताधारी पार्टी को कोई फायदा नहीं हुआ है, बल्कि नुकसान ही बोल सकते हैं। क्योंकि, जीपीएम के लोग इस एपिसोड से खुश नहीं है।

सोशल इंजीनियरिंग को धक्का!

जीपीएम के कलेक्टर संतोष देवांगन के सस्ते में विकेट डाउन होने से अफसरशाही के सोशल इंजीनियरिंग को बड़ा झटका लगा है। संतोष देवांगन माटी पुत्र तो हैं ही, जांजगीर से जुड़े हैं। वे बुनकर समुदाय से आते हैं। बीजेपी के दिग्गजों के लाख प्रयास के बाद भी पिछले विधानसभा चुनाव में जांजगीर में बीजेपी की झोली खाली रह गई थी। सभी-की-सभी छह सीटें कांग्रेस ले उडी। इस लिहाज से संतोष देवांगन को कलेक्टर बनाया जाना महत्वपूर्ण था। मगर दो महीने में ही उन्हें हटाना पड़ गया। संतोष को अब सरगुजिहा मंत्री लोगों से बातचीत करने में जरा सतर्कता बरतनी चाहिए। बिलासपुर एसडीएम थे तो रामविचार नेताम के साथ उनका लफड़ा हो गया था और अब सरगुजा के दूसरे मंत्री को नाराज कर अपना विकेट गंवा बैठे।

पीएचक्यू का धर्मसंकट

एएसपी और डीएसपी के ट्रांसफर को लेकर पीएचक्यू की स्थिति धर्मसंकट जैसी हो गई है। दरअसल, सुशासन तिहार के बाद से राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों की लिस्ट निकालने कवायद चल रही है। पीएचक्यू को प्रस्ताव बनाने जो नाम मिले थे, उसे नोटशीट की शक्ल में उसने आगे बढाया मगर गृह विभाग ने उसे अनुमोदन करने की बजाए फिर से पीएचक्यू को लौटा दिया। बताते हैं, होम ने लिस्ट में खुद से काटा-पिटी की बजाए पीएचक्यू के नामे में पर्ची फाड़ते हुए कहा कि हमारे इन नामों को लिस्ट में जोड़ा जाए। अब पीएचक्यू के अधिकारियों का बढ़ गया टेंशन। अफसरों के एक तरफ कुंआ था तो दूसरी तरफ खाई। गृह विभाग से मिले नाम जोड़ते तो उनकी शामत आ जाती। ऐसे में, पीएचक्यू ने वही किया, जो कोई भी दिमागदार आदमी करता। मगर इस चक्कर में लिस्ट अटक गई है।

बीजेपी सरकार में कांग्रेस की पॉलिसी?

आज से डेढ़-एक दशक पहले एक फॉरेस्ट मिनिस्टर ने सबसे पहले फॉरेस्ट अफसरों से पेटी लेकर पोस्टिंग का काम शुरू किया था। मगर अब आलम यह हो गया है कि इस पेटी वायरस से कोई विभाग अछूता नहीं रह गया है। बल्कि अब तो बोली लग रही है। मंत्रियों के यहां से फोन जा रहे, फलां जगह खाली है, आप कितना दे सकते हो। बिचौलिये भी बीच में गुगली फेंक दे रहे, उसकी अपनी अलग कहानी है। इस बोली और नीलामी के खेल में ट्रांसफर महीनों खींच जा रहे हैं। मसलन, एक डीएसपी ने मैदानी इलाके के लिए जुगाड़ जमाया था। उसका नाम तय भी हो गया था। मगर किसी बिचौलिये ने खेल कर दिया। फोन कर बताया कि आपका सरगुजा किया जा रहा। डीएसपी भागते-भागते 25 पेटी लेकर पहुंचे तो फिर जाकर उन्हें गारंटी मिली। यही हाल हेल्थ में सीएमओ, सिविल सर्जन का है। पोस्टिंग के लिए 30 से 35 पेटी चाहिए, फिर समय-समय पर रिचार्ज का कंडिशन भी। स्कूल शिक्षा विभाग में जिला शिक्षा अधिकारी के लिए 10 से 25 पेटी चल रहा। छोटे जिला है तो कम-से-कम 10 पेटी चाहिए ही। पिछले दिनों सूरजपुर में डीईओ का पद खाली हुआ तो वहां सरगुजा के नेताओं में प्रतिस्पर्धा छिड़ गई कि कौन बाजी मारता है...विधायक, मंत्री से लेकर सांसद और पार्टी पदाधिकारी तक कूद पड़े। क्योंकि, सवाल 20 पेटी का था। बाकी विभागों में भी कमोवेश यही स्थिति है...सभी ने ट्रांसफर का काउंटर खोल रखा है। ऐसा नहीं कि पूरा खेल मंत्री स्तर पर ही हो रहा। इसमें पार्टी का भी पूरा योगदान है। दरअसल, पेटी के जरिये पोस्टिंग का क्रेडिट पिछली सरकार के मंत्रियों को जाता है। इस सरकार के मंत्रियों ने दिल दिखाते हुए उस ट्रांसफर पॉलिसी को एडॉप्ट कर लिया। मगर बीजेपी के रणनीतिकारों को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसके बाद कांग्रेस की विदाई भी हो गई थी।

च्वाइस पोस्टिंग?

तरकश के पिछले स्तंभ में प्रकाशित खबर के बाद राज्य सरकार ने 33 में से एक तिहाई जिलों के जिला पंचायत सीईओ को बदल दिया। तरकश में खासतौर से दंतेवाड़ा के सीईओ जयंत नाहटा के लंबे कार्यकाल का जिक्र किया गया था, उन्हें वहां से हटा दिया गया है। उनके अलावे और लंबे समय से जमे नौ जिलों के सीईओ और बदले गए हैं। कुछ सीईओ को कलेक्टरों के च्वाइस से पोस्टिंग मिली है। कोरिया कलेक्टर का ट्रांसफर बलरामपुर हुआ तो उनके बाद कोरिया के जिपं सीईओ आशुतोष चतुर्वेदी भी बलरामपुर निकल लिए। खैर, बलरामपुर तो अपवाद है, आमतौर पर बड़े जिले के कलेक्टर चाहते हैं कि जिला पंचायत सीईओ या निगम कमिश्नर में से कम-से-कम एक डायरेक्ट आईएएस रहे, ताकि उनका वर्कलोड थोड़ा कम रहे। मसलन, अगर निगम कमिश्नर प्रमोटी या राज्य प्रशासनिक सेवा के हैं तो कोशिश रहती है, जिला पंचायत सीईओ कम-से-कम डायरेक्ट वाले रहें, और पंचायत में प्रमोटी अफसर हैं, तो निगम में डायरेक्ट अफसर रहें। इस लिस्ट में इसकी झलक दिखी है।

कलेक्टरों की लिस्ट

बीते 6 मई को सात कलेक्टरों का ट्रांसफर हुआ था, उसके बाद ब्यूरोक्रेसी की गलियारों में फिर एक छोटी लिस्ट आने की अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि, ये लिस्ट ज्यादा बड़ी नहीं होगी, अधिक-से-अधिक तीन-से-चार जिले प्रभावित हो सकते हैं। अगर कोई बड़ा विघ्न-बाधा नहीं आया तो विधानसभा के मानसून सत्र के बाद कलेक्टरों का आदेश जारी हो सकता है।

सचिवों का ट्रांसफर

बात सरकार के ढाई साल होने पर अफसरशाही की कसावट की, तो कलेक्टरों की लिस्ट के साथ सचिवों की भी एक छोटी लिस्ट निकल सकती है। हालांकि, 6 मई को 42 आईएएस अधिकारियों के ट्रांसफर हुए थे, उनमें कई विभागों के सिकेट्री बदल गए थे। मंत्रालय में लंबे कार्यकाल वाले सिकेट्री में इस समय सिर्फ एक आईएएस बचे हैं। एक ही विभाग में उन्हें ढाई साल हो गया है। अलबत्ता, सचिवों के टेन्योर का ढाई साल कोई लिमिट नहीं है। मनोज पिंगुआ गृह विभाग में करीब तीन साल रहे। मगर एक ही विभाग में लंबा समय होने पर अफसर उकता जाते हैं...उनके पास नया करने के लिए कुछ बचता नहीं। इसलिए आमतौर पर दो-एक साल में सचिवों के विभाग बदल दिए जाते हैं।

राप्रसे अफसरों का इस्तेमाल

अभी हाल ही में राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को उच्च शिक्षा और हेल्थ में भेजा गया। इसके बाद वन और परिवहन मंत्री केदार कश्यप के हायर एजुकेशन में पोस्ट किया गया है। हालांकि, विभाग वाले इससे प्रसन्न नहीं होंगे मगर इसमें कोई किंतु-परन्तु नहीं कि प्रशासनिक कार्यों में प्रशासनिक अफसरों का इस्तेमाल करना चाहिए। वैसे भी सूबे में राप्रसे अधिकारियों की अच्छी खासी फौज खड़ी हो गई है। करीब 500 से अधिक राप्रसे अफसर हो गए हैं। कैबिनेट ने स्कूल शिक्षा विभाग संचालनालय में भी दो-तीन पद प्रशासनिक अधिकारियों के लिए क्रियेट किया है। मगर अभी तक पोस्टिंग नहीं हुई है। अलबत्ता, नजर उन पर भी रखनी होगी, क्योंकि आरोप है कि राजस्व अधिकारी जिन विभागों में जाते हैं, वहां करप्शन का लेवल और हाई हो जाता है।

अब डीएफओ का नंबर

आईएएस, राप्रसे और आईपीएस के बाद अब डीएफओ की लिस्ट पर लोगों की नजरें टिक गई है। डीएफओ में पिछले करीब डेढ़ साल से कोई बड़ी लिस्ट नहीं निकली है। अब पीसीसीएफ भी चेंज हो गए हैं। अरुण पाण्डेय भी चाहेंगे कि रिजल्ट देने के लिए कुछ अपने हिसाब से डीएफओ पोस्ट करवाएं। हालांकि, फाईनल क्लियरेंस वन मंत्री और मुख्यमंत्री को देना है। बहरहाल, ऐसा समझा जाता है कि विधानसभा के मानसून सत्र के बाद करीब दर्जन भर डिविजन के डीएफओ चेंज हो जाएं।

याद करो कुर्बानी...

छत्तीसगढ़ अब नक्सल मुक्त हो चुका है। मगर इसके लिए सैकड़ों पुलिस अधिकारियों और जवानों ने अपना बलिदान दिया। इनमें राजनांदगांव के एसपी विनोद चौबे भी शामिल हैं। कल 12 जुलाई को उनकी पुण्यतिथि है। विनोद चौबे नक्सली हमले में शहीद होने वाले सूबे के पहले आईपीएस अधिकारी थे। ज्ञात है, विनोद चौबे को बलरामपुर पोस्टिंग के दौरान गोली लगी थी। कांकेर के माओवादी हमले में बाल-बाल बचे। इसके बाद भी राजनांदगांव में पीछे नहीं हटे। 12 जुलाई 2009 को मानपुर मोहला में फोर्स और नक्सलियों के बीच गोलीबारी हुई। विनोद को खबर मिली कि उनके जवान एंबुश में फंस गए हैं। पहले दो बार जानलेवा हमला हो चुका था, इसके बाद भी उन्होंने अपनी जान की परवाह नहीं की। एंबुश में फंसे अपने जवानों को कवर करने खुद ही एके-47 लेकर मोर्चे पर पहुंच गए। इस दौरान उनके ड्राईवर को गोली लग गई। विनोद चौबे खुद गाड़ी चलाते अपने चालक को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया और जवानों को बचाने घटनास्थल पर लौट गए। तब तक फोर्स वी शेप में नक्सलियों से घिर चुकी थी। विनोद ने जवानों को लेटकर पीछे हटने कहा और गोलियों की बौछार शुरू कर बैकअप देने का प्रयास किया मगर गड्ढे में छिपे नक्सलियों की गोली से वे शहीद हो गए। कल पुण्यतिथि के मौके पर ऐसे बहादुर अफसर को स्मरण करना चाहिए, बार-बार नक्सलियों के हमले की जद में आने के बाद भी जिसका हौसला नहीं टूटा।  

अंत में दो सवाल आपसे?

1. छत्तीसगढ़ में जिस तरह नए कलेक्टरों को मौका देकर बड़े जिलों के लिए तैयार किया जा रहा है, वैसा एसपी में क्यों नहीं किया जा रहा?

2. आईपीएस पवनदेव लगातार साढ़े छह साल से पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन में पोस्टेड हैं। क्या सिस्टम उन्हें पोस्टिंग कर भूल गया है या कोई और बात है?

Chhattisgarh Tarkash 2026: सीबीआई जांच के पीछे...



तरकश, 5 जुलाई 2026

संजय के. दीक्षित

सीबीआई जांच के पीछे

छत्तीसगढ़ सरकार ने कोरिया के चर्चित तिहरे हत्याकांड की जांच सीबीआई के सुपूर्द कर दिया। सरकार के इस फैसले पर लोगों को हैरानी हो सकती है...हुई भी। मगर रेत के नाम पर सूबे में जो खेल चल रहा, उसमें सरकार की बदनाम हो रही और मंत्री, मिनिस्टर, नेताजी लोग मौज काट रहे। असल में, कोरिया हत्याकांड में दोनों पक्ष रुलिंग पार्टी से जुड़ा हुआ है। इसमें अगर पुलिस जांच करती तो अनेक सवाल खड़े होते। अलबत्ता, सिस्टम के पास इनपुट्स ये भी थे कि रायपुर में बैठे कई नेता, मंत्रीजी जिलों में रेत माफियाओं को खुला संरक्षण दे रहे हैं...बकायदा जिला तक बांट लिया गया है...यहां हमारा आदमी, वहां आपका। सरगुजा में जो रेत का खेल चल रहा, उसमें भी रायपुर के कनेक्शन से इंकार नहीं किया जा रहा। वहां संघर्ष की स्थिति इसलिए बन रही कि रायपुर वाले चाहते हैं हमारे आदमी को संरक्षण मिले और लोकल नेता चाहते हैं कि उनके आदमी रेत का काम करें। पक्ष-बिपक्ष के विधायकों के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही, सो अलग। इससे सरगुजा की लॉ एंड आर्डर की स्थिति बिगड़ती जा रही। लिहाजा, राज्य सरकार ने रेत माफियाओं के खेल पर ब्रेक लगाने तिहरे मर्डर कांड को सीबीआई को सौंप दिया। मुमकिन है, सीबीआई की तफ्तीश में कई बड़े खुलासे होंगे, तो कई बड़े नाम लोगों को चौंका सकते हैं।

गरीब विधायक, गरीब अफसर

मुख्यमंत्री रहने के दौरान अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ के संदर्भ में एक स्लोगन दिया था...'अमीर धरती के गरीब लोग।' अब इस स्लोगन को बदल 'अमीर धरती के गरीब विधायक, गरीब अफसर' करना पड़ेगा. वो इसलिए कि छत्तीसगढ़ के विधायक, अफसर ऐसे गरीब होते चले गए कि बिना सरकारी जमीन के मकान नहीं बना सकते. हर विधानसभा के विधायकों को जमीन चाहिए तो हर बैच के आईएएस अफसरों को. ऐसे में सवाल उठता है...आखिर कब तक विधायकों और अफसरों को घर बनाने बेशकीमती जमीनें मुहैया कराई जाती रहेगी? कहीं पर भी तो इसका एंड होगा? प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि गरीब विधायकों और अफसरों पर तरस खाते हुए सरकार ने कौड़ियो के मोल प्लॉट दिया, तो उसमें घर क्यों नहीं बनाए गए? अनेक लोगों ने उसे बेच क्यों दिया? जो अधिकारी यहां से रिटायर होकर या किसी अन्य वजहों से बाहर चले गए, उनकी बात अलग है, जो छत्तीसगढ़ में है, उनमें भी ऐसे लोगों की संख्या बड़ी है, जो सरकार से जमीन तो ली मगर उसे कई गुना अधिक रेट में सेल कर दिया। ऐसे में, सिस्टम को विचार करना चाहिए कि सरकारी जमीनों को इन्वेस्टमेंट के लिए देना कितना जरूरी है।

चीफ जस्टिस और नैतिकता

अफसरशाही ने बड़ी चतुराई से अधिकारियों को प्लॉट देने से पहले ज्यूडिशिरी से नाम मांगा था। ताकि, मामला कोर्ट-कचहरी में जाए, तो उसका इंतज़ाम रहे। इसके लिए हाई कोर्ट को पत्र लिख लिस्ट मांगी गई। मगर चीफ जस्टिस रमेश सिनहा ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला देकर फाइल को आगे बढ़ने से रोक दिया। उन्होंने लिखा...सुप्रीम कोर्ट ने चूकि रियायत दर पर 'किसी को भी' जमीन देना अवैधानिक बताया है, इसलिए न्यायपालिका के लोगों को इससे बचना चाहिए। चीफ जस्टिस का यह फैसला न्यायपालिका के लोगों को कैसा लगा, ये नहीं पता। लेकिन, इस चक्कर में अफसरों का प्लॉट आबंटन भी रुक गया। राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर जोर-जुगाड़ लगाकर इससे पहले सेरीखेड़ी के प्राइम लोकेशन पर प्लॉट लेने में जरूर कामयाब हो गए। जाहिर है, सरकारी प्लॉट विशुद्ध रूप से इंवेस्टमेंट का एक तरीका होता है। कोई उसमें मकान बनाता नहीं। चूकि, सरकारी कॉलोनियों में सड़क समेत मूलभूत सुविधाएं अच्छी होती है...पानी, बिजली और रोड का काम फोकट में हो जाता है, मगर लोकेशन बढ़ियां होने से रेट अच्छा मिल जाता है। वीआईपी रोड के पास धरमपुरा में 200 रुपए फुट में जमीन मिली थी। अब 4000 में बेच रहे हैं। प्लॉट भी छोटा-मोटा नहीं। चार-चार हजार साइज का। अफसर अगर प्रभावशाली तो इससे बड़े साइज का भी हथिया लिए।

बस्तर में नया नक्सलवाद

बस्तर का अपना समृद्धशाली इतिहास रहा है। मगर यह विडंबना है कि माओवादियों के जमाने से ही यह तीन विचारधाराओं में बंटना प्रारंभ हो गया था। पहला वे आदिवासी, जो अपने को हिन्दू मानते हैं। दूसरा, जो आदिवासी तो हैं मगर अपने को हिन्दू नहीं मानते। और, तीसरा धर्म बदल आदिवासी से ईसाई बने लोग...खासकर, कांकेर, नारायणपुर इलाकों में इनका प्रभुत्व है। कई बार इसको लेकर वर्ग संघर्ष और हिंसा तक भड़क चुकी है। ताजा अपडेट यह है कि नक्सलवाद के खात्मे के बाद एक खास विचारधारा के लोग लोकल और बाहरी बस्तरिया केे नाम पर अपनी रोजी-रोटी का बंदोबस्त करने में जुट गए हैं। खुफिया रिपोर्ट है, दंतेवाड़ा और उसके आसपास करीब आधा दर्जन छोटी घटनाएं हुई, उसे सीधे लोकल और बाहरी से जोड़कर उत्पात मचाने का प्रयास किया गया। मसलन, स्कूटर दुर्घटना को भी बाहरी से जोड़ डाला। नक्सलवाद के बाद यह प्रभुत्व कायम करने की नई कोशिशें है, सरकार को इस खुफिया रिपोर्ट को गंभीरता से लेनी चाहिए। क्योंकि, बस्तर में नए सिरे से डेवलपमेंट कार्य शुरू होना है...केंद्रीय गृह मंत्री का दावा है कि बस्तर को देश का सबसे समृद्ध आदिवासी संभाग बनाया जाएगा। मगर लोकल-बाहरी का चक्कर आया तो फिर यह नामुमकिन हो जाएगा।

नौकर-चाकर वाला बंगला

रमन सरकार के दौर में सरकारी बंगले में 40 एसी लगाने को लेकर चर्चित हुए बीजेपी के एक सीनियर नेता को पिछली कांग्रेस सरकार में जीएडी कॉलोनी में एक बड़ा, विशाल बंगला अलॉट हुआ था। हालांकि, उसमें वे कभी रहे नहीं, उन्हें ईश्वर ने इतना दिया है कि उन्हें वहां रहने की जरूरत भी नहीं। आईएएस, आईपीएस कॉलोनी के इस बंगले में पिछले साढ़े सात साल से नेताजी के नौकर-चाकर रह रहे हैं। और, रात में कई बार इतना हुड़दंग मचा डालते हैं कि आसपास के लोगों की शामत आ जाती है। पिछली सरकार में नेताजी की पहुंच इतनी तगड़ी थी कि कोई मुंह नहीं खोल सकता था और अब तो बीजेपी की ही सरकार है। वहां रहने वाले अधिकारियों को अब निहारिका बारिक से उम्मीद बनी है। सरकार ने उन्हें गृह विभाग की जिम्मेदारी सौंपी है। निहारिका रहती भी वहीं...जीएडी कॉलोनी में। और उन्हीं के विभाग में संपदा भी आता है। सो, हो सकता है, हिम्मत जुटाकर वे मकान खाली करा लें।

प्लेसमेंट, करप्शन और बदनामी

छत्तीसगढ़ के सरकारी सिस्टम में पिछले एक दशक में बड़ा चेंज आया है। खासतौर से मुलाजिमों के मामले में। सूबे में ऐसा कोई महकमा नहीं, जहां 10, 20, 50 कर्मचारी प्लेसमेंट के नहीं। कुछ विभागों में तो पूरा सेक्शन-का-सेक्शन प्रायवेट लोगों के हाथों में है। जाहिर है, प्लेसमेंट एजेंसियों के जरिये कर्मचारियों के रखने से सरकार के खजाने पर ज्यादा लोड नहीं पड़ रहा मगर यह भी सही है कि छत्तीसगढ़ में करप्शन बढ़ने का एक कारण प्लेसमेंट एजेंसियां हैं। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं। कारपोरेट के इस दौर में भी सरकारी नौकरियों का अपना आकर्षण है। वो चाहे डेली वेजेज या प्लेसमेंट की ही क्यों न हो। समाज में उसका अपना रुतबा होता है। सम्मानजनक ढंग से शादी-ब्याह हो जाता है। प्लेसमेंट एजेंसियां इसी का फायदा उठा रहीं। एक विभाग में भर्ती के लिए एजेंसी दो से पांच लाख वसूल रही हैं।

अब, जरा बताइये, जो लोग कई लाख देकर प्लेसमेंट में नौकरी करने आएंगे तो वे गरिमा और मर्यादा थोड़े ही देखेंगे। उन्हें अपना मूलधन भी तो निकालना है। अब तो आलम यह है कि रुटीन फाइल को सरकाने के लिए भी पैसों की डिमांड की जा रही। सरकार ने सिस्टम को भले ही ऑनलाइन कर दिया है मगर आज भी एक बड़े वर्ग की निर्भरता च्वाइस सेंटरों पर ज्यादा है। सरकार ने राजस्व में बड़ा रिफार्म किया है। मगर राजस्व विभाग के एक छोटे से काम के लिए च्वाइस सेंटर जाइये, वहां बैठा आदमी कहेगा, इतना पैसा तहसील कार्यालय के फलां का और इतना मेरा। अब आम और गरीब आदमी कहां इसकी शिकायत करने जाएगा। मगर वो मन में सिस्टम की यही छबि लेकर जाएगा कि कहा कुछ जाता है, होता कुछ है। कायदे से सरकारी नुमाइंदों को प्लेसमेंट एजेंसियों की भर्ती पर नजर रखने कोई सिस्टम बनाना चाहिए। इससे न बेरोजगार लूटे जाएंगे और न इतना करप्शन बढ़ेगा। लेकिन, इस पर बड़े स्तर पर निर्णय लेने होंगे क्योंकि, सिस्टम में बैठे लोग ही इन प्लेसमेंट एजेंसियों को पाल रहे।

लाखों की नौकरी

चूकि सरकारी भर्तियां लगभग बंद हैं इसलिए प्लेसमेंट के नाम पर गजबे खेल हो रहे हैं। कई विभागों में बिना कोई प्रक्रिया के कई-कई लाख मासिक पगार पर भर्तियां की जा रही। प्लेसमेंट में आपको 10 हजार से लेकर पांच लाख वेतन तक आदमी मिल जाएंगे। कई विभागों में स्थिति यह है कि वहां मैनपावर होने के बाद भी करोड़ों के काम प्रायवेट एजेंसियों को दिए जा रहे ताकि उससे अपना हित सध सकें। कर्मचारियों की संख्या में भी बड़ा झोल है। जितनी संख्या में कर्मचारी मुहैया कराने की करार होती है, कुछ विभागों में काफी कम संख्या में लोग काम कर रहे मगर पैसा पूरे का पेमेंट किया जा रहा। याने कागजों में कर्मचारी...।

ब्यूरोक्रेसी के हेल्थ गुुरू

छत्तीसगढ़ के सिकेट्री रैंक के आईएएस अवनीश का इंस्टाग्राम पर बॉडी ट्रांसफार्मेशन की फोटो आई है, तब से हेल्थ और फिटनेस के फील्ड में सनसनी मची हुई है। देश के नेशनल मीडिया में भी यह खबर सुर्खिया बटोरी...इसे फिटनेस और हेल्थ गोल्स की एक नायाब केस स्टडी बताई जा रही। जाहिर है, कौन नहीं चाहता कि उसका हेल्थ अच्छा रहे...वो भी आज के दौर में। हालांकि, खुद अवनीश ने भी नहीं सोचा होगा कि इंस्टाग्राम की बॉडी ट्रांसफार्मेशन वाली फोटो गजब ढा देगी। उनके पास देश भर से फोन आ रहे...अनेक सवाल पूछे जा रहे...कैसे किए...किस जिम में जाते हो...कौन सा प्रोटीन सेक लेते हैं...डाइट क्या है? अलबत्ता, मुमकिन यह भी है, कई हेल्थ सप्लीमेंट्स कंपनियां भी उनसे संपर्क करने का प्रयास करें। अच्छा है। अवनीश ने अपना एक फील्ड और तैयार कर लिया। जनवरी 2042 में रिटायर होने के बाद हेल्थ गुरू बनने का विकल्प उनके सामने रहेगा।

आईएएस का बड़ा बैच

छत्तीसगढ़ में 2019 बैच के सभी आईएएस कलेक्टर बन गए। 6 मई को सात जिले के कलेक्टर बदले गए थे, उनमें इस बैच के विश्वदीप और रैना जमील को भी जिले में पोस्टिंग मिल गई। स्वाभाविक है, अब 2020 बैच का कलेक्टर बनना प्रारंभ होगा। 2020 बैच छत्तीसगढ़ का अब तक का सबसे बड़ा बैच हैं। इसमें आठ आईएएस हैं। हालांकि, 2019 बैच में आठ प्रमोटी आईएएस भी हैं। अब देखना है, सरकार 2019 के प्रमोटी आईएएस में से एकाध को पहले मौका देगी या फिर 2020 बैच शुरू कर देगी। चूकि 20 बैच सबसे बड़ा है, लिहाजा इस साल खाता भले खुल जाए मगर कंप्लीट होना नामुमकिन है। अगले साल मई-जून तक जाकर ये बैच कलेक्टरी में पूरा हो पाएगा। तब तक वेट करना पड़ेगा.

पोस्टिंग और मिम्स

आईएएस जयंत नाहटा को पिछली सरकार में दंतेवाड़ा का एसडीएम बनाया गया था। उसके बाद वहां तीन कलेक्टर बदल गए। विनीत नंदनवार के समय एसडीएम की पोस्टिंग हुई थी। उसके बाद मयंक चतुर्वेदी, कुनाल दुदावत और अब देवेश ध्रुव कलेक्टर हैं। मगर एसडीएम नहीं बदले। अब वे वहीं पर जिला पंचायत सीईओ हैं। दंतेवाड़ा में इस पर खूब मिम्स बनाए जा रहे, एसडीएम, सीईओ के बाद क्या नाहटा दंतेवाड़ा में ही कलेक्टर बनाए जाएंगे। हालांकि, नाहटा ही नहीं, कई जिला पंचायत सीईओ का तीन साल से ऊपर हो गया है. राज्य प्रशासनिक सेवा में भी ऐसे कई दृष्टांत है...कई अफसर चार साल से एक ही जगह पर बोर हो गए हैं। विधानसभा चुनाव 2023 के समय जिनका दो बरस पूरा नहीं हुआ था, वे ट्रांसफर से बच गए थे। इसके बाद सरकार उन्हें भूल सी गई. जाहिर है, बेहतर रिजल्ट के लिए टाईम पर अफसरों का रोटेशन होते रहना चाहिए।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या ये सही है कि विपक्ष की कुछ जिम्मेदारी बीजेपी के नेता निभा दे रहे हैं?

2. कुर्सी बचाने के लिए किस मंत्री ने कामख्या के एक तांत्रिक से बकरा बलि अनुष्ठान कराया है?

शनिवार, 27 जून 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: निलंबन और पनिशमेंट का महीना!



 तरकश, 28 जून 2026

संजय के. दीक्षित

निलंबन और पनिशमेंट का महीना!

विधानसभा के मानसून सत्र और मंत्रिमंडल की सर्जरी की दृष्टि से जुलाई महीना छत्तीसगढ़ के लिए खासा महत्वपूर्ण रहेगा, तो कर्मचारियों, अधिकारियों के लिए काफी संवेदनशील भी। संवेदनशील मतलब खतरा भरा। दरअसल, जुलाई में सीएम हेल्पलाइन का रिव्यू किया जाना है। हेल्पलाइन का अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। लोग लगातार अपनी बातें फोन कॉल के जरिये रख रहे हैं। शिकायतों के संबंध में आवेदकों को प्रॉपर रिप्लाई कर उनसे पेपर भी मंगाए जा रहे हैं। याने कंप्लेन को सिर्फ दर्ज कर छोड़ नहीं दिया जा रहा, बल्कि संपर्क कर साक्ष्य जुटाए जा रहे। सीएम सचिवालय खुद इसकी मॉनिटरिंग कर रहा। यह एक्सरसाइज इसलिए किया जा रहा कि सीएम हेल्पलाइन की वाजिब शिकायतों पर सरकार ने बड़ी कार्रवाई करने की मनःस्थिति बना ली है। खासकर, करप्शन और लापरवाही के मामलों में। जाहिर है, जुलाई महीना कर्मचारियों, अधिकारियों के लिए निलंबन और पनिशमेंट वाला रहेगा। सरकार चाहती है कि लोगों में सीएम हेल्पलाइन का भय हो। सही भी है...एमपी, बिहार, यूपी, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों ने काफी पहले हेल्पलाइन बना लिया था और उन्हें इसका फायदा मिला।

मंत्रियों का दिल्ली प्रवास

विधानसभा के मानसून सत्र से पहले मंत्रिमंडल का फेरबदल मुमकिन प्रतीत नहीं हो रहा। वैसे भी पहले मोदी कैबिनेट में बदलाव होना है। उसके बाद ही राज्यों का नंबर आएगा। हालांकि, सर्जरी के लिए एक्सरसाइज प्रारंभ हो चुका है। मंत्री, विधायकों का दिल्ली जाना जारी है। डिप्टी सीएम विजय शर्मा और हेल्थ मिनिस्टर श्यामबिहारी जायसवाल इस हफ््ते दिल्ली गए तो उसके अगले दिन पूर्व मंत्री लता उसेंडी दिल्ली में थी। 29 जून को स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव दिल्ली जा रहे हैं। बताते हैं, संघ कार्यालय से उन्हें बुलावा है। जाहिर है, लता उसेंडी का नाम मंत्री बनने वालों की चर्चाओं में सबसे उपर है, तो यूपी चुनाव को देखते गजेंद्र यादव का भी कद बढ़ाया जा सकता है। गजेंद्र को एकाध और विभाग मिल सकता है। वैसे इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं कि किसी डिप्टी सीएम का विकेट अगर गिरा तो फिर गजेंद्र का प्रमोशन भी हो जाए...आखिर राजनीति मुकद्दर का खेल तो है।

माननीयों के स्टाफ और नया ठीहा

वैसे विष्णुदेव कैबिनेट में पांच मंत्रियों के बदले जाने की चर्चाएं चल रही हैं। मगर बीजेपी का कोई भरोसा नहीं, संख्या इससे उपर भी जा सकती है। बहरहाल, जिन पांच मंत्रियों की विदाई की अटकलें तेज हैं, उनके घरों और आसपास के लोगों में माहौल भारी हो गया है। असल में, पांच मंत्रियों के खिलाफ परसेप्शन इतना गहरा है कि सोशल मीडिया में लोग खुलेआम ऐलान कर रहे हैं, फलां-फलां मंत्री...। और लोग उस पर ऐतबार भी कर ले रहे, क्योंकि रिपोर्ट कार्ड ही उनका ऐसा है...ढाई साल उन्होंने सिर्फ अपने लिए काम किया। खैर, इन मंत्रियों के पीए, स्टॉफ, कारोबारी और समर्थक अपने अगले ठीहे की संभावनाएं तलाशने में लग गए हैं।

जुगाड़ का डिप्टी कमिश्नर

जुगाड़ की माया देखिए...कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड में राजस्थान का एक व्यक्ति पर्यटन अधिकारी बना। इसमें अधिकारी जरूर जुड़ा है, मगर वास्तव में यह क्लास थ्री का पद होता है। खैर, कुछ दिनों बाद उन्होंने जोर-जुगाड़ लगाकर रायपुर से दिल्ली के सूचना केंद्र में पोस्टिंग करा ली। और, उसके बाद अब प्रतिनियुक्ति पर रेजिडेंट कमिश्नर ऑफिस में डिप्टी कमिश्नर बन बैठे। दरअसल, रेजिडेंट कमिश्नर श्रुति सिंह ने इस बात को आधार बनाकर नोटशीट भेजा कि फलां पर्यटन अधिकारी का वेतन डिप्टी कमिश्नर के समतुल्य हो गया है और जीएडी से उस पर मुहर लग गई। जबकि, रायपुर में उनके सारे बैचमेट 18 साल बाद भी पर्यटन अधिकारी से उपर नहीं पाए हैं। जाहिर है, बाबू के सीनियर हो जाने पर उसकी भी तनख्वाह असिस्टेंट कलेक्टर के बराबर हो जाती है तो क्या उसे असिस्टेंट कलेक्टर बना दिया जाएगा। बहरहाल, इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि दिल्ली का रेजिडेंट कमिश्नर ऑफिस बाकी राज्यों की तरह स्ट्रांग होना चाहिए, न कि बाबू कैडर के लोगों को वहां बिठा दिया जाए।

कमरा नंबर 109 का रहस्य

2016 में दिल्ली में जब छत्तीसगढ़ सदन बना, तब नियम बना था कि उसमें मुख्यमंत्री और मंत्रियों के अलावा और किसी को कमरा नहीं मिलेगा। विधायकों, सांसदों को भी नहीं। मगर छत्तीसगढ़ के एक मंत्री के कथित पीए ने करीब साल भर से सदन में कमरा नंबर 109 हथिया रखे हैं। अब आप पूछेंगे, कथित पीए क्यों? कथित इसलिए कि किसी मंत्री को दिल्ली में काम करने के लिए पीए नहीं मिलता। वास्तव में पीए होते तो वे मंत्री के साथ छत्तीसगढ़ में रहते। किसी और मंत्री का पीए तो दिल्ली में नहीं रहता। यहां तक कि किसी मुख्यमंत्री के पीए की भी पोस्टिंग दिल्ली में नहीं होती। फिर कमरा नंबर 109 का रहस्य क्या है? स्टेट के इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट को इसे नोटिस में लेना चाहिए...पता यह भी लगाना चाहिए कि रेजिडंेंट कमिश्नर ऑफिस के किस मुलाजिम का मोदी विरोधी नेता से सीधा कनेक्शन हैं।

10 पेटी

राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के तबादले में चल रही तीन-पांच की चर्चाओं को देखते सरकार ने ट्रांसफर लिस्ट रोक दी थी। मगर इसके भीतर की जो बातें निकल कर कर आ रहीं, वो हैरान करने वाली हैं। किसी ने बताया कि एक राप्रसे अधिकारी ने सिर्फ जिले में जाने के लिए एक बड़े बिचौलिये को 10 पेटी दे डाला। हालांकि, इस पर सहसा यकीं नहीं होगा...आखिर वो 10 पेटी निकालेगा कैसे? जवाब मिला, वो डेढ़-दो महीने में निकाल लेगा। वो वैसा ही करेगा, जैसा आजकल जिलों में हो रहा। बहरहाल, कई लोगों का पैसा डूबता लग रहा है। जिन बिचौलियों ने पैसा लिया है, वे पिछले तीन महीने से दिलासा दे रहे हैं, बस लिस्ट निकलने ही वाली है। मगर सरकार टस-से-मस नहीं हो रही।

पोस्टिंग और किस्मत

बस्तर आईजी के लिए 2004 बैच के दो आईपीएस अफसरों के नामों की बड़ी चर्चा थी। मगर आखिरकार पोस्टिंग मिल बद्री नारायण मीणा को। बद्री वैसे शुरू से पोस्टिंग को लेकर काफी किस्मती रहे हैं। छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक नौ जिलों के पुलिस अधीक्षक रहने का रिकार्ड उन्हीं के नाम है, तो एक साथ दो पुलिस रेंज के आईजी रहने वाले वे सूबे के पहले आईपीएस अधिकारी हैं। बद्री छत्तीसगढ़ के चुनिंदा आईएएस, आईपीएस अधिकारियों में शामिल हैं, जिन्हें सरकार बदलने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। रमन सरकार में वे सात जिलों के एसपी रहे तो भूपेश सरकार में दो जिलों के एसपी और तीन रेंज के आईजी बनने का उन्हें मौका मिला। वे दुर्ग में एसपी रहे और वहीं प्रमोट होकर आईजी बन गए। फिर बिलासपुर के आईजी बने और वहां से फिर दुर्ग आए और दुर्ग के साथ-साथ रायपुर के भी आईजी। ऐसा पोर्टफोलियो पूर्व डीजीपी अशोक जुनेजा का भी नहीं रहा। जुनेजा पुलिस महकमे के सबसे किस्मती पुलिस अधिकारी माने जाते थे। सरकार किसी की भी रही, वे कभी लूप लाईन की पोस्टिंग नहीं की। रमन सरकार के दौरान इंटेलिजेंस चीफ होने के बाद भी वे भूपेश बघेल सरकार में डीजीपी बने और विष्णुदेव साय सरकार में तमाम विरोधों के बाद भी न केवल उन्होंने कंटिन्यू किया, बल्कि छह महीने का एक्सटेंशन भी मिल गया।

आईएफएस की छुट्टी

आईएएस ऋचा शर्मा के एसीएस फॉरेस्ट रहने के दौरान वन मंत्री केदार कश्यप ने आईएफएस अधिकारियों की छुट्टी समेत कुछ फाइलें अपने अधिकार में ले लिए थे। दरअसल, ऋचा के फॉरेस्ट में रहने के समय आईएफएस अधिकारियों को छुट्टी लेना आसान नहीं था। सख्त आईएएस अफसर माने जाने वाली ऋचा शर्मा काफी किंतु-परंतु, क्वेरी के बाद अवकाश स्वीकृत करती थी। लिहाजा, वन मंत्री ने अफसरों की छुट्टी का अधिकार अपने पास रख लिया था। अब ऋर्चा शर्मा फॉरेस्ट से हट गई हैं तो वन मंत्री ने नए एसीएस फॉरेस्ट मनोज पिंगुआ को आईएफएस अधिकारियों के छुट्टियों के अधिकार दे दिए हैं।

सीएस की SOM मीटिंग

विकास शील के चीफ सिकरेट्री बनने के बाद दो-से-तीन हफ्ते के बीच एक सीनियर ऑफिसर्स मीटिंग (SOM) होती है, जिसे अफसरों के बीच SOM मीटिंग कहा जाता है। इसमें सभी विभागों के सिकेट्री शामिल होते हैं। इस मीटिंग को लेकर सचिवों में काफी तनाव रहता है...सीएस न जाने क्या पूछ दें, कब टोक दें। छत्तीसगढ़ बनने के बाद इस तरह की मीटिंग पहली बार हो रही। इसमें लोक सेवा गारंटी से लेकर ई-ऑफिस जैसे तमाम प्वाइंट होते हैं, सीएस जिसका फॉलोअप लेते हैं। एक तरह से कहा जाए तो ये जस्ट रिमाइंडर जैसी बैठक होती है, जिसमें सीएस जो टास्क दिए रहते हैं, उसका रिव्यू करते हैं। सोम मीटिंग के फेर में सिकेट्री लोगों को थोड़ा अलर्ट रहना पड़ता। इससे मंत्रालय की वर्किंग स्मूथ हुई है। फिर चीफ सिकेट्री का भय तो है ही, वे बोलने और टोकने में गुरेज नहीं करते।

चतुर मंत्री और आईडिया

सुनिल कुमार जब चीफ सिकरेट्री थे, तब समन्वय से ट्रांसफर या अफसरों का डेपुटेशन कराना काफी कठिन था। मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह या उनके सचिवालय से कोई मैसेज आ जाए तो बात अलग है वरना, वे नोटशीट पर इतना तगड़ा नोट लिख देते थे कि फिर फाइल को डंप करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता था। उस समय होशियार मंत्री या अफसर कई बार सीधे मुख्यमंत्री से नोटशीट पर लिखवा लेते थे। अब मुख्यमंत्री ने अगर ओके कर दिया तो फिर चीफ सिकेट्री को उसे अनुमोदन देना ही पड़ेगा। फिर सुनिल कुमार भी कुछ नहीं कर पाते थे। वर्तमान चीफ सिकेट्री विकास शील के दौर में भी अब चीजें उतनी आसान नहीं। विभिन्न विभागों से आए उंच-नीच वाले प्रस्तावों पर वे ब्रेक लगाने का प्रयास करते हैं। बताते हैं, स्कूल शिक्षा विभाग के जंबो ट्रांसफर के प्रपोजल पर भी उन्होंने ब्रेक लगाया।

CM, मंत्री सर्वोच्च

वन मंत्री केदार कश्यप ने आईएफएस अधिकारियों के अवकाश का अधिकार अपने पास रख लिया था, इस प्रसंग से सवाल उठता है, क्या कोई मंत्री ऐसा कर सकता है। बता दें, संविधान में मुख्यमंत्री को सरकार माना गया है...मंत्रियों के सारे अधिकार मुख्यमंत्री में निहित होते हैं। मुख्यमंत्री सरकार के कामकाज में सुविधा के लिए मंत्री बनाते हैं मगर वे चाहे तो किसी भी मंत्री के आदेश को पलट सकते हैं। उसी तरह सचिवों के सारे अधिकार मंत्री में समाहित होते हैं। मंत्री चाहे तो कोई भी फाइल मंगा सकता है, सचिव के नोट को बदल सकता है। ये अलग बात है कि यदि कोई गलत चीज होगी तो उसके लिए मंत्री ही जिम्मेदार होंगे। मगर सत्ता मंत्रियों की ही सर्वोच्च होती है। अब वो अलग बात है कि कई बार घुड़सवार कमजोर होता है, तो घोड़ा लगता है नचाने, वही स्थिति मंत्री और अफसर की होती है।

कलेक्टर, एसपी पर कसावट?

मुख्य सचिव विकास शील ने मंत्रालय और डायरेक्ट्रेट के अफसरों को काफी कस दिया है। मंत्रालय में 90 परसेंट अफसर अब 10 बजे पहुंच जाते हैं, तो मीटिंग, रिव्यू से सिस्टम टाईट हुआ है। मगर जिलों का हाल अभी भी डिरेल्ड है। न कलेक्टर टाईम को फॉलो कर रहे और न एसपी। अधिकांश जिलों में अराजकता जैसी स्थिति है। खासकर, उन जिलों की स्थिति काफी खराब है, जहां नए प्रमोटी कलेक्टर गए हैं। इनमें से कई ने तो जाते ही गर्दा उड़ा दिया है। दरअसल, नए प्रमोटी कलेक्टरों को कहीं से भनक मिल गई कि उन्हें खानापूर्ति के लिए कलेक्टर बनाया गया है, इसके बाद कभी भी उन्हें विदा कर दिया जाएगा। इसके बाद कामधाम छोड़ वे रोज सुबह कैलकुलेटर लेकर बैठ जा रहे। खैर, कलेक्टर, एसपी अगर टाईट होते तो कोरिया में ट्रिपल मर्डर थोड़े हो जाता। सोनहत का जघन्य हत्याकांड पुलिस और प्रशासन की घोर लापरवाही का नमूना है। रेत जैसी चीजों के लिए अगर तीन-तीन हत्याएं हो जाए तो सबसे पहले कलेक्टर, एसपी को लटकाना चाहिए। मुख्य सचिव को भी जिलों की अराजकता को लेकर स्ट्रांग होना पड़ेगा। जो अफसर इधर-उधर कर रहा, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की वे सिफारिश तो कर ही सकते हैं।

विधायकों की मजबूरी-1

छत्तीसगढ़ में रुलिंग पार्टी के विधायक हो या फिर आपोजिशन के, सभी एक सूत्रीय अभियान में जुटे हुए हैं, तो उनकी भी अपनी मजबूरी है। दरअसल, चुनाव इतने कॉस्टली होते जा रहे कि ग्रामीण सीटों पर भी अब 10 से 15 खोखा निकल जा रहा। शहरों तो 25 से उपर मानिये। ऐसे में, वो सब होंगे, जो कभी कल्पना से बाहर थे। जाहिर है, अब रेत और मुरूम ठेके तक पर एकाधिकार की कोशिशें हो रही। जांजगीर जिले की एक महिला विधायक का रेत माफिया से अपना हिस्सा मांगते वीडियो वायरल हुआ ही था तो कोरिया में दो बीेजीेपी विधायकों के रेत पर वर्चस्व में कितना बड़ा कांड हो गया, इसे सबने देखा। जघन्य वारदात हो गई। और जब विधायकजी लोग ही रेत से तेल निकालने लगेंगे तो सिस्टम क्या कर लेगा। कलेक्टर लोग कुर्सी बचाने मौन रहना ही श्रेष्ठ समझ रहे। क्योंकि, एक तो वो दमदार वाले कलेक्टर अब बचे नहीं, दूसरा जरा सा भी टोक दिए तो फिर अगले दिन से कलेक्टर की शिकायतें शुरू। यही वो वजह है कि अच्छे खासे मार्जिन से जीतकर आए विधायकों के खिलाफ एंटी इंकाम्बेंसी तेज होता जा रहा।

विधायकों की मजबूरी-2

विधायकजी लोग मजबूरी में दोनों हाथ से किस तरह काम कर रहे, इसका नमूना है जिला शिक्षा अधिकारियों की पोस्टिंग। सरकार ने 16 जिलों के डीईओ बदले, उनमें से छह जिलों का मामला हाई कोर्ट पहुंच गया है। कोर्ट ने इस पर नाराजगी भी व्यक्त किया है। दरअसल, छहों विधायकों ने जिद करके अपने जिले में नियम विरुद्ध व्याख्याताओं को डीईओ बनवा लिया। हालांकि, गजेंद्र यादव मजबूत बैकग्राउंड के हैं, इसलिए उन्हें नहीं झुकना था मगर मंत्रिमंडल में सर्जरी और प्रमोशन का समय है, वे भी विधायकों के प्रेशर में आ गए। बीजेपी संगठन को इसे देखना चाहिए। क्योंकि, इससे सरकार की छबि प्रभावित हो रही।

अध्यक्ष पर मंथन

इस समय सत्ताधारी पार्टी और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस दोनों के प्रदेश अध्यक्ष बस्तर से हैं। और यह कड़वी सच्चाई यह है कि दोनों की प्रदेश में वैसी पकड़ नहीं बन पाई है, जैसी कि पार्टी के मुखिया की होनी चाहिए। बीेजेपी अध्यक्ष किरण सिंहदेव ने तो अध्यक्ष की जगह मंत्री बनने की इच्छा जताई थी, हालांकि पार्टी ने उन्हें अध्यक्ष पद पर कंटिन्यू कर दिया। उधर, पीसीसी चीफ दीपक बैज भी ढाई साल में अपनी कोई पहचान नहीं छोड़ पाए हैं। वास्तविकता यह है कि आज भी पूर्व सीएम भूपेश बघेल ही पूरे प्रदेश में एकतरफा माहौल बनाए हुए हैं। हफ्ते भर के भीतर वे दो बार सरगुजा पहुंच गए। उनके बाद विधायक देवेंद्र यादव की सक्रियता है। बहरहाल, बीजेपी और कांग्रेस के सियान नेताओं को इस पर मंथन करना चाहिए बस्तर से जुड़े पार्टी नेताओं की पूरे प्रदेश में स्वीकार्यता क्यों नहीं बन पाती? और क्या अध्यक्ष रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग जैसे प्रदेश के बीच के हिस्से से बनाना चाहिए?

एसपी की लिस्ट

मुख्यमंत्री के व्यस्त होने की वजह से एसपी की लिस्ट नहीं निकल पाई। मगर अब आजकल में कभी भी आदेश जारी हो सकता है। इसमें करीब 10-12 जिलों के एसपी बदले जाएंगे तो रायपुर पुलिस कमिश्नरेट के चारों चारों डीसीपी एसपी बनकर जिलों में जा सकते हैं। दरअसल, चारों 2020 बैच के आईपीएस हैं। इस बैच के एक आईपीएस नारायणपुर में काफी पहले एसपी बन चुका है। सो, इन चारों में इस बात को लेकर क्षोभ रहता है। खैर, इन चारों का नंबर इस बार लग सकता है। 

अंत में दो सवाल आपसे?

1. किस मंत्री ने सूटकेस की शक्ति के जरिये मान लिया था कि उसका कोई विकल्प नहीं है मगर अब कुर्सी डगमगा रही है?

2. सरकार को सिस्टम में शुचिता लाने मंत्रियांें के साथ विधायकों के उपर भी अंकुश लगाने की जरूरत नहीं है?


शनिवार, 20 जून 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: मंत्री और बीपी का एक्स्ट्रा डोज



तरकश, 21 जून 2026

संजय के. दीक्षित

मंत्री और बीपी का एक्स्ट्रा डोज

18 जून की शाम मंत्रियों के लिए ही नहीं, बल्कि मीडिया के सियासी बीट कवर करने वाले पत्रकारों के लिए बड़ा तनाव भरा रहा। दरअसल, मंत्रियों की इमरजेंसी बैठक बुलाई गई थी मगर इससे अधिक अपडेट देने कोई तैयार नहीं था। जिनसे पूछो, वे खुद ही जिज्ञासु बने बैठे थे। उधर, सूचना मिलते ही मंत्री रायपुर के लिए भागे तो मीडियाकर्मियों का भी आधी रात के बाद तक सीएम हाउस के सामने जमावड़ा लगा रहा। बताते हैं, अंबिकापुर के एक मंत्रीजी को रास्ते में डॉक्टर से बात करनी पड़ गई। डॉक्टर के कहने पर उन्होंने बीपी का एक एडिशनल डोज लिया, तब जाकर सीएम हाउस पहुंच पाए। मंत्रियों की बैठक को सनसनीखेज बनाने में हेलिकाप्टर और स्टेट प्लेन का भी बड़ा हाथ रहा। कोई यह यकीन करने के लिए तैयार नहीं था कि बिना किसी गंभीर इश्यू के इस तरह मंत्रियों को बुलाया नहीं जाता। डिप्टी सीएम विजय शर्मा राज्यसभा चुनाव के सिलसिले में रांची में थे, वे स्टेट प्लेन से रायपुर पहुंचे। खैर, मंत्रियों को क्यों बुलाया गया? इसके पीछे के निहितार्थ क्या थे? इस पर अलग-अलग ढंग से बातें की जा रही हैं। मगर बीजेपी के हीे लीडरों का मानना है कि सिर्फ मीटिंग बुलाने से ही चीजें नहीं बदलने वाली। बल्कि एक साथ कई मोर्चों पर काम करना होगा। मंत्री रिजल्ट नहीं दे पा रहे और अफसर सुन क्यों नहीं रहे, इसकी जड़ में जाना होगा। मंत्रिमंडल के कुछ बड़े विकेट चटखाने होंगे...छोटी-मोटी बलि लेने से सिस्टम के प्रति परसेप्शन नहीं बदलेगा।

सांप भी मर जाए और...

बेशक, दुनिया की कोई भी राजनीतिक पार्टी बिना पैसे के नहीं चलती। खासतौर पर जब पार्टी सरकार में होती है...चंदे के लिए उसकी अपनी व्यवस्था होती है। खैर...सियासी चंदे की बात आई, तो बीजेपी के पिछली सरकार के दौर का एक वाकया स्मरण हो आया। एक बार सरकार के साथ कुछ चुनिंदा मंत्रियों की बैठक हो रही थी। बैठक में क्षेत्रीय संगठन मंत्री सौदान सिंह भी थे। बातचीत के दौरान एक मंत्री का संदर्भ आया। किसी ने कहा...पार्टी के लिए योगदान देने फलां मंत्री को भी जिम्मेदारी देनी चाहिए। मगर सौदान सिंह ने एकदम से मना कर दिया। बोले...पार्टी के लिए चंदा देने के लिए अथॉराइज्ड करने का मतलब होगा, उन्हें दोनों हाथ से बटोरने के लिए फ्री कर देना। इसके बाद उस मंत्री का पत्ता कट गया। फंडा यह है कि पार्टी के योगदान के लिए उन्हीं मंत्रियों की सेवाएं लेनी चाहिए, जिसका काम और अंदाज गरिमामय हो। इससे सांप भी मार जाता है और लाठी भी नहीं टूटती।

एक एफआईआर और तीन जान

सिस्टम के एक जिम्मेदार अफसर से एफआईआर के संदर्भ में बात हो रही थी। मजमूं था...पुलिस को एफआईआर करने में देरी नहीं करनी चाहिए, भले ही अपराधो के आंकड़े बढ़ जाएं, मगर उसके दूरगामी फायदे होंगे। अफसर भी इससे पूर्णतः सहमत थे। अब इसे एक इतेफाक कहें कि जिस शाम एफआईआर पर इस स्तंभ के लेखक की शीर्ष अफसर से बात हो रही थी, उसी दौरान कोरिया में एक भयावह हमले में बीजेपी नेता समेत तीन लोगों की हत्या हो गई। और एफआईआर ही उसका कारण बना। रेत के माफियागिरी में जब एक पक्ष के खिलाफ सोनहत थाने में मुकदमा दर्ज हो गया तो दूसरा पक्ष भी थाना पहुंचा। मगर थाने का दरोगा ने इसे हल्के में लेते हुए एफआईआर दर्ज करने की बजाए यह कहकर लौटा दिया कि चिंता मत कीजिए, बात कर सब ठीक करा दूंगा। जाहिर है, अगर सेकेंड पार्टी की भी सुनवाई करते हुए अपराध दर्ज कर लिया गया होता तो काफी कुछ भड़ास निकल गया होता। मगर थाने से बैरंग वापसी ने पूर्व जनपद पंचायत अध्यक्ष के लोगों के गुस्से को और भड़का दिया। और आव देखा, न ताव, चार गाड़ियों में शाम के समय निकल गए, हिसाब चुकता करने। उधर, विरोधी पार्टी के गांव में पूरी तैयारी थी। जैसे ही गाड़ियां गांव में रुकी, चौतरफा हमले शुरू हो गए। बाकी गाड़ियों में बैठे लोग वक्त को भांपते हुए भाग निकले। मगर पूर्व जनपद पंचायत अध्यक्ष की गाड़ी फंस गई। उसके बाद जो हुआ, घटनास्थल को देख लोगों के रोंगटे खड़े हो गए। बताते हैं, लाठी-डंडे से पीटकर अधमरा करने के बाद गाड़ी में डाल आग लगा दी गई। इस जघन्य कांड की जड़ एक अदद एफआईआर रहा। बता दें, पुलिस द्वारा कार्रवाई की बजाए समझौता कराने के चलते सूबे में कई बड़ी घटनाएं हो चुकी है। फिर उसके बाद वही होता है...दो-चार पुलिस वालों का निलंबन, दिखावटी जांच और फिर वहीं ढर्रा। जिम्मेदार लोगों को इस बारे में सोचना चाहिए कि जब सक्षम लोगों की थाने में एफआईआर दर्ज नहीं की जा रही तो आम आदमी के साथ क्या सलूक होता होगा? वही भड़ास फिर चुनाव में निकलता है।

गंगा नहान

छत्तीसगढ़ में जमीन, जायदाद या ठगी, घोखाधड़ी तो दूर की बात गंुडे-मवालियों के खिलाफ आप थाने जाएं और तुरंत अपराध दर्ज हो गया तो समझिए गंगा नहा लिए। दो-चार जिले या थाने अपवाद हो सकते हैं। बाकी पूरे छत्तीसगढ़ में कमोवेश यही स्थिति है। बिना उपर के अफसरों से सिफारिश कराए थाने में मुकदमा दर्ज नहीं करा सकते आप। छत्तीसगढ़ के पुलिस सिस्टम को यूपी से प्रेरणा लेनी चाहिए। यूपी में जब से योगी आदित्यनाथ की सरकार आई है, थानों को निर्देश है...भले ही जांच के बाद खात्मा डाल दें, मगर एफआईआर करना होगा। कोरिया में भी अदद एक एफआईआर दर्ज कर लिया गया होता तो तीन लोगों की जान बच गई होती, बल्कि सूबे का नाम भी खराब नहीं होता कि यहां इस तरह की घटनाएं भी होती हैं।

कलेक्टर से रिटायर

कलेक्टर से रिटायर होने वाले अधिकारियों की बात करें तो अभी तक सिर्फ एक ही नाम है। छतर सिंह देहरे। पिछली कांग्रेस सरकार में वे गरियाबंद जिले से रिटायर हुए थे। रमन सिंह के दौर में रायपुर कलेक्टर ठाकुर राम सिंह चूकि सिकेट्री प्रमोट हो गए थे, लिहाजा रिटायरमेंट से महीना भर पहले उन्हें कमिश्नर बनाया गया था। बहरहाल, बात कलेक्टर से रिटायरमेंट की, तो इस समय गरियाबंद जिले में भगवान सिंह उइके कलेक्टर हैं। नवंबर में उनका रिटायरमेंट है। जाहिर है, वे हिट विकेट नहीं हुए तो भगवान सिंह उइके छतर सिंह के रिकार्ड की बराबरी कर लेंगे।

आईपीएस, पोस्टिंग और रिकार्ड

आईपीएस सुुंदरराज एनआईए में आईजी बनकर जा रहे हैं। बस्तर में उनकी पोस्टिंग बेमिसाल रही। सिर्फ इस मायने में नहीं कि देश के इस सर्वाधित हिंसाग्रस्त इलाके से माओवादियों के पैर उखड़ गए, बल्कि रिकार्ड लंबी पोस्टिंग के लिहाज से भी। जाहिर है, बस्तर की पोस्टिंग के नाम पर आईपीएस अधिकारियों की सांसें उखड़ने लगती थी, उस पुलिस रेंज में सुंदरराज पूरे 14 साल पोस्टेड रहे। याने 23 साल की आईपीएस की सर्विस में आधे से अधिक वक्त उनका बस्तर में गुजरा। एएसपी से लेकर एसपी, डीआईजी और आईजी तक रहे। उन्होंने लांग कुमेर के बस्तर पोस्टिंग का रिकार्ड तोड़ा नहीं, बल्कि उनसे काफी आगे निकल गए। सुुंदरराज ने कभी किसी नेता या अफसर से सिफारिश नहीं की, न गिडगिड़ाए, उन्हें वहां से हटाया जाए। जबकि, बस्तर से कई एसपी और आईजी जोर-जुगाड़ लगा साल भर से कम समय में ही भाग निकले।

तोते की जान...

बात आईपीएस सुंदरराज की बस्तर में 14 साल पोस्टिंग की हो रही तो यह भी जानना जरूरी है कि आईएएस, आईपीस की जान कहां अटकी रहती है। तोते की तरह आईएएस, आईपीएस की जान पोस्टिंग में अटकी रहती है। देश के लिए ये एक विडंबना है कि सबसे कठिन एग्जाम क्लियर कर सर्वाेच्च सर्विस में आने वाले ये अफसर देवपूत से कम नहीं होते। मगर अदद पोस्टिंग के लिए पॉलिटिशियन के आगे अपनी जमीर से समझौता कर डालते हैं। छत्तीसगढ़ में ईडी द्वारा सीज किए गए व्हाट्सएप चौट को कोई देख लेगा तो उसे विश्वास नहीं होगा कि इतने टॉप के अफसर ऐसा भी कर सकते हैं। जबकि, आईएएस, आईपीएस सिर्फ पोस्टिंग का मोह त्याग दे तो मजाल नहीं कि सिस्टम में बैठे लोग उनसे कोई गलत काम करा लें। मगर अफसरों को पोस्टिंग और पईसा का ऐसा चार्म...लगातार अफसर जेल जा रहे, तब भी स्थितियां नहीं बदल रही।

2004 बैच के आईजी

बस्तर आईजी सुंदरराज के सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने के बाद जिन आईपीएस अधिकारियों को नया आईजी बनाए जाने की चर्चाएं चल रही हैं, उनमें 2004 बैच के आईपीएस अजय यादव और बद्री नारायण मीणा का नाम सबसे प्रमुख है। दोनों के पास पर्याप्त तजुर्बा है। अजय सात जिलों के एसपी और तीन रेंज के आईजी रह चुके हैं, तो बद्री नौ जिले के एसपी और तीन रेंज के आईजी रह चुके हैं। हालांकि, बस्तर आईजी की पोस्टिंग अभी भी चुनौतीपूर्ण है। नक्सलियों का खात्मा हो गया है मगर बड़ी तादात में फोर्स अब भी वहां तैनात है। बस्तर के डेवलपमेंट पर भी सरकार का भरपूर फोकस है। जाहिर है, डेवलपमेंट के साथ सिविल क्राइम में भी इजाफा होता है। लिहाजा, सरकार ठोक बजाकर ही आईजी का फैसला करेगी।

मामा से गुहार

छत्तीसगढ़ के 12 हजार मनरेगा कर्मचारियों को पिछले तीन महीने से पगार नहीं मिला है। मनरेगा के अफसरों को अब काम लेना मुश्किल होता जा रहा। दरअसल, केंद्रीय पंचायत मंत्री शिवराज सिंह ने कई बार आश्वासन दिया मगर अभी तक पैसे रिलीज नहीं किए हैं। सूबे के पंचायत मिनिस्टर विजय शर्मा को मामा से बात करनी चाहिए वरना डबल इंजन सरकार के खिलाफ कर्मचारियों का परसेप्शन बिगड़ेगा।

मंत्रालय का कॉफी हाउस

2012 में नवा रायपुर में मंत्रालय शिफ्ट हुआ था, तब से वहां की केटरिंग कॉफी हाउस के हाथ में रहा। कॉफी हाउस वे अधिकारियों, कर्मचारियों को जायकेदार व्यंजन वाजिब रेट पर तो मिलते ही थे, उसकी सर्विस भी कमाल की थी। सचिवालय के अफसरों का फरमान होता नहीं था कि गरमागरम चाय-कॉफी, स्नेक्स पहुंच जाता था। मगर पता नहीं क्या हुआ, कॉफी हाउस को वहां से चलता कर किसी प्रायवेट पार्टी को केटरिंग का काम सौंप दिया गया और अब हालत यह है कि सिकेट्री साब लोग दुखी हैं। कई बार तो ऐसा हुआ कि गेस्ट के जाने के बाद कॉफी या सूप पहंुचता है। कई अफसर अब अपने फ्रीज में छांछ, लस्सी और कोकोनॉट वॉटर रखने लगे हैं। ताकि, कुछ तो आवभगत कर सकें।

कलेक्टर का डेपुटेशन

बस्तर और बलौदा बाजार कलेक्टर के डेपुटेशन के बाद कांकेेर कलेक्टर नीलेश श्रीरसागर ने सेंट्रल डेपुटेशन के लिए अर्जी लगाई थी। सरकार ने उन्हें एनओसी भी दे दिया था। मगर अभी तक उन्हें क्लियरेंस मिला नहीं। पहले वे मसूरी एकेडमी जाना चाहते थे। मगर अब सुना है, अब वे दिल्ली के लिए ट्रॉय कर रहे हैं। अब देखते हैं, भारत सरकार से उनकी पोस्टिंग कब आती है, तब तक कांकेर कलेक्टर बनने की बाट जोह रहे दावेदारों को वेट करना होगा। और यदि, नीलेश का कहीं डेपुटेशन नहीं हुआ तो फिर उनके किसी और बड़े जिले में कलेक्टर बनने की दावेदारी प्रबल रहेगी। कांकेर में वैसे भी उनका दो साल कंप्लीट हो गया है। लोकसभा चुनाव 2024 के जस्ट बाद वे कांकेर कलेक्टर बन गए थे। जाहिर है, वे प्रतिभाशाली आईएएस तो हैं।

मंत्री की चार धाम यात्रा

मंत्री राजेश अग्रवाल का पिछले हफ्ते जन्मदिन था। उन्होंने परिवार के साथ चार धाम यात्रा कर अपना जन्मदिन मनाया। इस दौरान बाबा केदारनाथ और बद्री विशाल के समक्ष मत्था टेका। यद्यपि, मंत्रिमंडल की सर्जरी में राजेश अग्रवाल के उपर कोई खतरा तो नहीं दिखता। मंत्री बने उन्हें साल भर भी नहीं हुआ है। हो सकता है, बाबा केदारनाथ के दरबार में कमजोर विभागों को लेकर उन्होंने गुहार लगाई हो। पता ही है, राजेश मंत्री तो बन गए लेकिन, उन्हें पर्यटन में निबटा दिया गया। सरकार और संगठन ने ये भी ध्यान नहीं रखा...टीएस सिंहदेव को हराने में उनका कितना पेटी, खोखा निकल गया। लखनपुर की फर्नीचर दुकान तक खाली हो गई। वोटर्स बिना पैसा दिए, कुर्सी, टेबल, सोफा उठाकर ले गए। चलिये, बाबा केदारनाथ की कृपा रही, तो ब्याजमय सब वापिस हो जाएगा।

एसपी की बड़ी लिस्ट

छिटपुट तबादलों को छोड़ दें तो आईपीएस में जनवरी 2024 के बाद कोई बड़ी लिस्ट नहीं निकली है। जबकि, आईएएस और कलेक्टरों में हर साल दो-एक बड़ी लिस्ट निकल जाती है। 6 मई को ही सात कलेक्टरों समेत 42 आईएएस अधिकारियों का तबादला किया गया। बहरहाल, इस समय स्थिति यह है कि कई पुलिस अधीक्षक छोटे-छोटे जिलों में प्रमोट होकर डीआईजी हो गए हैं। पहले डीआईजी को संभागीय मुख्यालयों जैसे बड़े जिलों में ही पोस्ट किया जाता था। मगर पिछले पांच-सात सालों से अब तो दो-तीन ब्लॉक वाले जिलों में भी डीआईजी हैं। खैर, ढाई साल बाद आईपीएस की एक बड़ी लिस्ट निकलने वाली है। इसमें बस्तर में नए आईजी की पोस्टिंग होगी। जिले की बात करें तो 10 से 12 जिलों के एसपी चेंज होंगे। अधिकांश बड़े जिलों में नए एसपी पोस्ट होंगे। जाहिर है, एसपी की पोस्टिंग अगले विधानसभा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए की जाएगी...नए एसपी 2028 में चुनाव कराएंगे।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. सीएम हाउस में मंत्रियों की बैठक हुई, उसमें प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव क्यों नहीं पहुंच पाए?

2. मंत्रियों और विधायकों की इमेज खराब करने में उनके स्टॉफ और चंगु-मंगू की कितनी भूमिका होगी?