शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

Chhattisgarh Tarkash 2025: छत्तीसगढ़ में उपचुनाव

 

तरकश, 15 फरवरी 2026

संजय के. दीक्षित

छत्तीसगढ़ में उपचुनाव-1

चुनाव आयोग ने राज्यसभा की 37 सीटों के लिए चुनाव का ऐलान किया है, उनमें छत्तीसगढ़ की दो सीटें भी शामिल हैं। छत्तीसगढ़ के कांग्रेस कोटे से राज्यसभा में गए केटीएस तुलसी और फूलोदेवी नेताम की सीटें अप्रैल में खाली हो रही हैं। चूकि विधानसभा में बीजेपी के अब 54 विधायक हैं, इसलिए इस बार पार्टी को एक सीट मिलना निश्चित है। बची एक सीट कांग्रेस की झोली में जाएगी। कांग्रेस से अबकी नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत की दावेदारी की बड़ी चर्चा है। महंत विधानसभा से लेकर लोकसभा के लिए कई-कई बार चुने जा चुके हैं। कई मौकों पर उन्होंने राज्यसभा में जाने की इच्छा प्रगट भी की है। वैसे भी महंत जी किस्मत के बड़े धनी हैं...पद उनके पास खुद से चलकर आते हैं। इसलिए, इसमें कोई अचरज की बात नहीं कि पाटीं कहीं उनकी अधूरी इच्छा इस बार पूरी न कर दें। महंतजी अभी 73 के हैं, राज्यसभा में जाने के बाद लगभग 80 साल तक दिल्ली में रहने का सम्मानजनक इंतजाम हो जाएगा। वैसे हर बड़े राजनीतिज्ञों की तरह महंतजी का भी अपना एक सपना है...उनके ठीकठाक रहते सियासत में उनके सूरज का उदय हो जाए। और इसके लिए राज्यसभा चुनाव से बढ़ियां मौका क्या हो सकता है...जांजगीर, सक्ती में इस समय सारे विधायक कांग्रेस के हैं...फिर बात बेटे की, तो महंतजी की पकड़ सभी पार्टियों में है...बेटे की नैया पार करा ही लेंगे। अगर ऐसा हुआ तो आजादी के बाद देश की सियासत में एक नया रिकार्ड बनेगा। एक परिवार के पति राज्यसभा, पत्नी लोकसभा और बेटा विधानसभा में।

छत्तीसगढ़ में उपचुनाव-2

राज्यसभा के लिए टीएस सिंहदेव भी कांग्रेस से स्वाभाविक दावेदार होंगे। गांधी परिवार से नजदीकियों के बाद भी उनकी किस्मत बार-बार दगा दे जा रही। न वे मुख्यमंत्री बन पाए और न ही उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनने दिया जा रहा। दूसरा, अगर पीसीसी चीफ बदलना होगा तो राज्यसभा के लिए दीपक बैज की दावेदारी प्रबल हो जाएगी। तीसरा नाम भूपेश बघेल का है। वैसे, भूपेश का चांस कम प्रतीत होता है। भूपेश जननेता हैं...कांग्रेस पंजाब से लेकर असम तक उनका उपयोग कर रही है। मगर राजनीत में कब, क्या हो जाए कौन जानता है। भूपेश अगर राज्यसभा गए तो फिर पाटन से उनके बेटे चैतन्य की विधायकी तय हो जाएगी। याने पाटन में उपचुनाव होगा।

बीजेपी और सरप्राइज

राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस से चरणदास महंत की दावेदारी हो या फिर फूलोदेवी नेताम को रिपीट करने की...कम-से-कम अटकलें तो लगाने की गुजाइश है। सत्ताधारी पार्टी की बात जुदा है। बीजेपी में आजकल इस कदर चौंकाने वाले फैसले हो रहे कि बड़े-से-बड़े लीडरों को कुछ पता नहीं होता। पिछली बार का राज्यसभा का वाकया याद ही होगा। बीजेपी के लोगों को नहीं पता था कि देवेंद्र प्रताप सिंह हैं कौन? उनका नाम इतना अनजान था कि सोशल मीडिया में यूपी के देवेंद्रप्रताप की फोटो लगाकर लोग भाजपा का लगे टारगेट करने...कांग्रेस की तरह बीजेपी ने भी आयातित नेता को राज्यसभा भेज दिया। बीजेपी की लिस्ट आने के करीब आधे घंटे बाद जाकर क्लियर हो पाया कि देवेंद्र प्रताप सिंह रायगढ़ के रहने वाले हैं। इस बार भी राज्यसभा चुनाव में कुछ वैसा ही होगा। हां, इतना जरूर है कि प्रदेश की सियासत में ओबीसी और आदिवासी का कोटा फुल है। आदिवासी मुख्यमंत्री हैं, तो ओबीसी से डिप्टी सीएम समेत सात मिनिस्टर। लिहाजा, अनुसूचित जाति या सामान्य वर्ग से गुंजाइश बन सकती है।

बाहरी प्रत्याशी

छत्तीसगढ़ बनने के बाद अप्रैल 2002 में राज्यसभा की दो सीटों के लिए पहला चुनाव हुआ था। उसमें कांग्रेस से मोतीलाल वोरा और रामाधार कश्यप चुने गए थे। उसके बाद अभी तक 22 राज्यसभा सदस्यों के चुनाव हुए हैं। इसमें बीजेपी ने हमेशा लोकल को मौका दिया, कांग्रेस ने पांच बार बाहरी प्रत्याशियों को राज्यसभा में भेजा। सबसे पहले जून 2004 में मोहसिना किदवई छत्तीसगढ़ से निर्वाचित हुई। जून 2020 में उन्हें फिर रिपीट किया गया। उसके बाद 2018 से 2023 के बीच सबसे अधिक तीन बाहरी उम्मीदवारों को कांग्रेस ने राज्यसभा में भेजा। केटीएस तुलसी, राजीव शुक्ला और रंजीता रंजन। मोतीलाल वोरा चूकि कद्दावर नेता रहे इसलिए वे 18 साल तक एक कोटा अपने पास रखा। वरना, और दो-एक बाहरी प्रत्याशी कांग्रेस से राज्यसभा में पहुंच गए होते। हालांकि, लोकल बॉडी की अनिच्छा के बाद भी एक सरकार में तीन-तीन बाहरी लोगों को राज्यसभा में भेजकर कांग्रेस अंजाम भुगत चुकी है, इसलिए इस बार कांग्रेस के लोगां को डरने की जरूरत नहीं है।

नेता प्रतिपक्ष चेंज?

कांग्रेस पार्टी ने चरणदास महंत के राजनीतिक कद और संसदीय अनुभवों को देखते भले ही नेता प्रतिपक्ष बना दिया मगर उनका स्वभाव नेता प्रतिपक्ष वाला नहीं है। यही वजह है कि पार्टी सदन में जैसी आक्रमकता चाहती है, वैसा कुछ हो नहीं रहा। अलबत्ता, एकाधिक बार नेता प्रतिपक्ष सरकार की भी सराहना कर चुके हैं। महंतजी राज्यसभा में जाएं या नहीं, कांग्रेस पार्टी नेता प्रतिपक्ष को लेकर संवेदनशील है। अगर नया नेता चुनने का अवसर आया तो जाहिर तौर पर दो नाम केंद्र में होंगे। उमेश पटेल और देवेंद्र यादव। भूपेश बघेल का नाम बड़ा जरूर है मगर पार्टी उनका उपयोग दूसरों प्रदेशों में कर रही है। देवेंद्र तेज-तर्रार विधायक होने के साथ सतनामी समुदाय के मसले पर जेल जाकर अपना कद बढ़ा चुके हैं तो उमेश पटेल के साथ नंदकुमार पटेल का नाम जुड़ा है। विधानसभा में इस समय उमेश बढ़ियां परफार्म कर रहे हैं। भविष्य में अगर नेता प्रतिपक्ष चुनने का समय आया तो बहुत संभावना है कि उसके लिए ये दो नेता ही तगड़े दावेदार होंगे।

पूत के पांव पालने में

छत्तीसगढ़ का दुर्भाग्य कहें या एसडीएम का? शायद ही किसी स्टेट में ऐसा हुआ होगा, जब कोई सब डिवीजन मजिस्ट्रेट दो बार जेल गया हो। मगर छत्तीसगढ़ में ऐसा हुआ, जब सात साल की सर्विस में अफसर को दो बार जेल जाना पड़ा और दो बार सस्पेंड। राप्रसे अधिकारी करुण डहरिया को गरियाबंद में 20 हजार रिश्वत लेते एसीबी ने ट्रेप किया था। वे तीन महीने जेल में रहकर छूटे और फिर जैसा कि देश के सिस्टम में होता है, निलंबन से बहाल होकर फिर से एसडीएम बन गए। पूत के पांव जब पालने में दिख गया था, तब तो बलरामपुर कलेक्टर रिमजिएस एक्का को उन्हें एसडीएम नहीं बनाना था। मगर पिछले दो साल से वे कुसमी सब डिवीजन के प्रमुख बने बैठे थे। और ग्रामीणों से मारपीट और मौत केस में उन्हें जेल जाना पड़ गया।

कमाऊ पूत

कलेक्टर पहले काबिल डिप्टी कलेक्टरों को एसडीएम बनाते थे। मगर अब एसडीएम बनाने के पैरामीटर बदल गए हैं। मैदानी इलाकों में 25 परसेंट तक काबिलियत चल जाता है, बस्तर, सरगुजा में हंड्रेड परसेंट कमाऊ पूत चाहिए। जो एसडीएम ज्यादा पैसा लाकर देगा, कलेक्टर के वे उतने ही करीबी और चेहेते होते हैं। कलेक्टरों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह डिप्टी कलेक्टर किन-किन धतकरमों में लिप्त है या लिप्त रहा है। कलेक्टर हों या नेता-मंत्री सभी को आखिर कमाऊ पूत ही तो चाहिए।

बड़ा सवाल

बलरामपुर के एसडीएम कांड से सवाल उठता है, क्या रिश्वत लेते पकड़े गए अधिकारियों, कर्मचारियों को फिर से महत्वपूर्ण पोस्टिंग दी जानी चाहिए? छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में सरकारी मुलाजिम ऐसे हैं, जो रिश्वत लेते जेल की हवा खाकर लौटने के बाद फिर से मलाईदार कुर्सी पर बैठे हैं। जीरो टॉलरेंस पर काम कर रही सरकार को ऐसे मुलाजिमों की एक लिस्ट बनानी चाहिए, ताकि उन्हें अहम पदस्थापनाओं से अलग रखा जा सकें। क्योंकि, ऐसे अफसरों के साथ इन बिल्ट प्राब्लम रहता है...आगे चलकर फिर सरकार की साख को डेंट करते हैं।

बस्तर हनीमून डेस्टिनेशन

80 की दशक में जैसा बस्तर था...अफसरों के लिए वैसा ही...हनीमून डेस्टिनेशन जैसा बनता जा रहा है। माओवादियों के चलते पहले तो जान सांसत में पड़ी होती थी, न जाने किस पल क्या हो जाएगा? अधिकारी बस्तर से मीटिंग में रायपुर आने से डरते थे। बहुत आवश्यक हुआ तो देर रात प्रायवेट गाड़ी में बिना गनमैन के, हनुमान चालीसा पढ़ते हुए निकलते थे। कोशिश रहती थी, सुबह के पहले-पहले कम-से-कम कांकेर क्रॉस कर जाएं। मगर अमित शाह ने बस्तर की रौनक फिर से लौटा दी है। सरकार भी युवा अधिकारियों पर इनायत बरत रही है। न्यू कपल को अगल-बगल के जिलों में पोस्टिंग दी जा रही। इससे हो ये रहा कि वीकेंड में कई-कई जिला मुख्यालय खाली हो जा रहे। न्यू कपल हैं तो दोनों करना चाहिए। काम भी खूब और इंजॉय भी।

चना-मूर्रा जैसे आईएएस

एक तो दिग्विजय सिंह ने छंटे हुए अफसरों को छत्तीसगढ़ भेज दिया। उपर से रही-सही कसर पीएससी ने पूरी कर दी। हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने पीएससी परीक्षा निरस्त कर दी थी मगर सरकार ने उदारता बरतने में कोई कमी नहीं की...सबके सब आईएएस बन गए। पिछले साल भी दर्जन भर अधिकारियों में से एकाध ही आईएएस बनने लायक रहे होंगे, और इस बार सात में भी कमोवेश वही हाल रहा। छत्तीसगढ़ में अब हालात ऐसे बनते जा रहे कि लोग दिग्विजय सिंह को कोसना बंद कर देंगे। इस समय मुआवजा घोटालों से लेकर अनेक कर्मकांडों में डिप्टी कलेक्टर दागदार हो रहे...जेल जा रहे, देखिएगा कुछ सालों बाद ये सबके सब भारतीय प्रशासनिक सेवा का तमगा लगाकर घूमेंगे। क्योंकि, 50 खोखा कमा लिया तो उसमें से पांच-सात खोखा फेंकने में उनके घर से क्या जाएगा? फंडा यह है कि जमकर कमाओ, जमकर खर्च करो और फिर आईएएस बन जाओ। बाकी आम पब्लिक छत्तीसगढ़ियां, सबले बढ़ियां...पर ताली बजाता रहे।

संगठन मंत्री का प्रमोशन!

छत्तीसगढ़ के संगठन मंत्री पवन साय के प्रमोशन की इन दिनों बड़ी चर्चा है। वैसे भी पिछले तीन महीने से छत्तीसगढ़ से लगभग वे बाहर ही हैं। बीजेपी ने उन्हें पश्चिम बंगाल के मोर्चे पर लगा रखा है। जाहिर है, पवन साय ने छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान काफी काम किया था। पार्टी अब उन्हें इसका ईनाम देना चाहती है। पवन साय को क्षेत्रीय संगठन मंत्री बनाया जा सकता है। क्षेत्रीय संगठन मंत्री बनने का मतलब होगा, वे एकाधिक राज्यों के प्रभारी होंगे। पवन साय के प्रमोशन से उनके समर्थक क्या सोच रहे हैं, ये तो नहीं मालूम। मगर ये जरूर पता है कि पार्टी में जल्द कुछ अहम बदलाव होंगे। जाहिर है, प्रमोशन होने पर पवन की जगह कोई नया आदमी संगठन प्रभारी बनकर आएगा। फिर नितिन नबीन की जगह प्रदेश प्रभारी की भी नियुक्ति होगी।

ओपी के पिटारे से क्या?

जिस राज्य में बजट का 40 परसेंट हिस्सा कर्मचारियों, अधिकारियों के वेतन और 35 परसेंट फ्रीब्रीज में निकल जा रहा हो, वहां के बजट से कोई चमत्कारित उम्मीद कैसे रखी जा सकती है। छत्तीसगढ़ के खजाने की यह स्थिति है कि कोई महीना ऐसा नहीं जाता, जब 15 तारीख क्रॉस करते ही वित्त विभाग के अधिकारियों की पेशानी पर बल नहीं पड़ते हों। हर महीने 2500 करोड़ वेतन और करीब 800 करोड़ महतारी वंदन याने 3200 करोड़ चाहिए-ही-चाहिए। फिर भी, ओपी पढ़े-लिखे मिनिस्टर हैं, किल्लतों के बावजूद कुछ हटके करने का प्रयास करेंगे ही। अंदेशा है कि इस बार बजट में शहरी क्षेत्रों के डेवलपमेंट के लिए ठीकठाक राशि का प्रावधान किया जाएगा। खासकर, बिलासपुर और रायपुर को संवारने पर। युवाओं और रोजगार से जुड़ी कुछ अहम घोषणाओं की भी उम्मीदें हैं।

नेताओं की आंखों में धूल

छत्तीसगढ़ के ह्यूमन रिसोर्स को मजबूत करने सरकार कई मोर्चो पर काम कर रही है। एजुकेशन में नित नए प्रयोग और नवाचार किए जा रहे हैं। मगर यह भी सनद रहे कि रिजल्ट को लेकर अफसरशाही नेताओं की आंखों में धूल झोंकने का भी काम करती है। खासकर, स्कूल शिक्षा में। नकल के नाम पर यूपी-बिहार बदनाम थे। वहां अब स्थिति बदल गई है। और छत्तीसगढ़ में? स्कूल शिक्षा में छत्तीसगढ़ पिछले 25 सालों से देश में नीचे से तीसरे स्थान से उपर नहीं आ पाया। बता दें, कुछ बरसों पहले दो कलेक्टरों के बारे में पुख्ता जानकारी मिली थी कि अपने जिले का नंबर बढ़ाने स्कूल वालों को कुछ भी करने के लिए कह डाला था। जाहिर है, छत्तीसगढ़ के कलेक्टरों में अभी भी श्रेय लेने की होड़ है कि उनके जिले से इतने लोग मेरिट में आए। चिंतन पर इस पर भी होनी चाहिए कि रिमोट एरिया के स्कूलों में रिजल्ट इतने बढ़ियां कैसे आ जाते हैं। और, अगर ऐसा ही रहा तो सवाल उठता है...छत्तीसगढ़ के ह्यूमन रिसोर्स का क्या होगा? इस पर मनन करना चाहिए।

बजट सत्र में ट्रांसफर

ब्यूरोक्रेसी में ऐसा परसेप्शन चला आ रहा, बजट सत्र में ट्रांसफर नहीं होते। मगर छत्तीसगढ़ में ऐसा कई बार हो चुका है। इसी सरकार ने मानसून सत्र के दौरान ट्रांसफर किया था। बहरहाल, 23 फरवरी से बजट सत्र प्रारंभ हो रहा है। और 24-25 फरवरी के आसपास बलौदा बाजार कलेक्टर दीपक सोनी सेंट्रल डेपुटेशन के लिए रिलीव होंगे। 24-25 इसलिए क्योंकि 24 को गिरौदापुरी मेला समाप्त हो जाएगा। इसके बाद सरकार उन्हें कार्यमुक्त कर देगी। सवाल उठता है, बलौदा बाजार का अगला कलेक्टर कौन होगा? कलेक्ट्रेट को जलाने जैसी घटना के बाद तो सरकार कोई रिस्क नहीं लेना चाहेगा। लिहाजा, बतौर कलेक्टर दो-एक जिला करने वाले अनुभवी आईएएस अफसर को ही बलौदा बाजार भेजा जाएगा। हो सकता है, इस चक्कर में एक छोटा चेन बन जाए।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या छत्तीसगढ़ के इस बजट में रायपुर-भिलाई में मेट्रो रेल की घोषणा हो सकती है?

2. एक मंत्री का नाम बताएं, जो कुर्सी की स्थिरता के लिए कामख्या के एक पंडित से यज्ञ करवाएं हैं?

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: अफसर, दुःसाहस और संरक्षण

 


तरकश
, 15 फरवरी 2026

संजय के. दीक्षित

अफसर, दुःसाहस और संरक्षण

जिले के एक पुलिस कप्तान द्वारा मुख्यमंत्री को पत्र लिखने का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि एक डीएफओ ने अपने विभाग के सिकेट्री को फोन पर गरिया दिया। गाली भी छोटी-मोटी नहीं...सरकार को निलंबन आदेश में लिखना पड़ा...डीएफओ ने लैंगिक गालियां दी। आश्चर्य तो यह कि सिकेट्री भी आईएफएस हैं। इसके बाद भी डीएफओ ने कोई कंजूसी नहीं की। सिकेट्री साहब को पहले विश्वास नहीं हुआ...उन्हीं के कैडर का कोई अधिकारी भला ऐसा कैसे कर सकता है...शायद रांग नंबर लग गया होगा। इसलिए उन्होंने लैंडलाइन से दोबारा फोन लगवाया, मगर फिर गालियों की बौछारें। इसके बाद फिर कुछ बचता नहीं था। बात एसीएस फॉरेस्ट ऋचा शर्मा तक पहुंची और जाहिर है, वे किसी की सुनती नहीं...इसलिए दाल गल नहीं पाई। सस्पेंशन आदेश में गालियों तक को कोट किया गया। सवाल यह है कि ऐसे उदंडता को संरक्षण दे कौन रहा है? इससे पहले डीएफओ ने बीजेपी नेताओं को ऑफिस से भगा दिया था। फिर भी पार्टी के मुखिया किरण सिंहदेव को गुस्सा नहीं आया। इसके बाद डीएफओ का हौसला इतना बढ़ गया कि अपने बॉस की ही लानत-मलानत कर दी। अनुशासनहीनता के बढ़ते केसों में कार्रवाई करने में आगे-पीछे होते सिस्टम को समझना चाहिए नेता और मंत्री नहीं, मोदी गारंटी बड़ा है और इसी मोदी गारंटी से बीजेपी सत्ता में लौटी। बहरहाल, ऐसा ही रहा तो एसपी, डीएफओ के बाद अब किसी कलेक्टर की बारी होगी। सिस्टम को कौंवा मारकर लटकाना होगा।

कांग्रेस का मजबूत गढ़!

राजधानी रायपुर से लगे गरियाबंद में शिक्षिकाओं का दामाद बाबू का स्वागत करते रील्स का मामला सामने आया तो कार्रवाई के खिलाफ बीजेपी के लोग ही खड़े हो गए। ऐसे में, स्कूल विभाग के अधिकारी कैसे पीछे रहते। शिक्षिकाओं को बचाने की एवज में 20-20 हजार वसूल डाले। कहने का आशय यह है कि रुलिंग पार्टी के लोग ही जब सिस्टम की राह में रोड़ा बनेंगे तो अफसर और निरंकुश होंगे ही। इससे सिस्टम का नुकसान हो रहा है। सत्ताधारी पार्टी के नेताओं को समझना चाहिए कि मोदी, अमित शाह और नितिन नबीन की ब्यूहरचना के चलते छत्तीसगढ़ में पांच साल में ही कमल खिल गया। वरना, ये मानने में कोई हिचकिचाहट नहीं, छत्तीसगढ़ कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है और आज भी काडर खतम नहीं हुआ है। जाहिर सी बात है कि बीजेपी के लोकल बॉडी में इतना ही दमखम होता तो 2018 में 15 सीटों पर थोड़ी ही सिमटती। कहने का मतलब यह है कि पार्टी को अपने काडर को कंट्रोल में रखने की जरूरत है। बेलगाम हो चुके कैडर से नुकसान राज्य सरकार की छबि का हो रहा। सरकार कोई महत्वपूर्ण सुधार का काम करती है मगर इस तरह की घटनाओं से साख को डेंट लगता है। सरकार ने स्कूल शिक्षा में सुधार के कई ऐतिहासिक कार्य किए थे। पहली बार स्कूलों का युक्तियुक्तकरण हुआ। मगर पीएमश्री स्कूल की शिक्षिकाएं दामाद बाबू का स्वागत करते रील्स बना रही हैं और बीजेपी के लोग उनके सामने दीवार बनकर खड़े हो जा रहे। पुलिस कप्तान को भी पार्टी के लोग बचा रहे तो डीएफओ के पीछे ढाल बनने वाले भी रुलिंग पार्टी के बड़े नेता हैं। सिस्टम को अपना औरा दिखाना चाहिए।

नया हेड ऑफ फॉरेस्ट

हेड ऑफ फॉरेस्ट श्रीनिवास राव करीब तीन महीने बाद मई में रिटायर हो जाएंगे। उनकी जगह वन विभाग का मुखिया कौन होगा, इसको लेकर महकमे में उत्सुकता बढ़ती जा रही है। सीनियरिटी के हिसाब से देखें तो पीसीसीएफ अरुण पाण्डेय श्रीनिवास के बाद दूसरे नंबर पर है। सरकार अगर पोस्टिंग में सीनियरिटी को वेटेज देगी तो अरुण की किस्मत खुल सकती है। मगर ओपी यादव को हल्के में नहीं लिया जा सकता। जाहिर है, अरुण पाण्डेय का नाम पिछले एक साल से हेड ऑफ फॉरेस्ट के लिए चल रहा है। मगर अरुण की ताजपोशी संभव नहीं हो पाई। अरुण इस समय पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ हैं। वन महकमे में हेड ऑफ फारेस्ट के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा पद है। मगर पिछले कुछ सालों से मिथक चल रहा कि वाइल्डलाइफ चीफ हेड ऑफ फॉरेस्ट नहीं बन पा रहे। ओपी यादव को हल्के में न लेने के पीछे अहम बात यह है कि वे इस समय कैम्पा के प्रमुख हैं। श्रीनिवास राव भी जब हेड ऑफ फॉरेस्ट बने, तब कैम्पा के ही हेड थे। उनके बाद अरुण का नाम कैंपा के लिए चला था मगर ऐसा होने नहीं दिया गया। बहरहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि हेड ऑफ फॉरेस्ट की नियुक्ति में सीनियरिटी को वेटेज दिया जाएगा या फिर ओपी को मौका मिलेगा।

कलेक्टरों की हाजिरी

पिछले हफ्ते मुख्य सचिव विकास शील ने कलेक्टरों की वीडियोकांफ्रेंसिंग की। इसमें वे अफसरों की टाईमिंग की चर्चा करते हुए उन 10 कलेक्टरों के नाम गिना दिए, जो सुबह 10 बजे ऑफिस पहुंच जा रहे। बाकी को उन्होंने इशारे में बता दिया...निर्देशों को हल्के में न लें, उनके स्तर पर इसे वॉच किया जा रहा है। पता चला है, मुख्य सचिव ने जिलों के बायोमेट्रिक सिस्टम का एक्सेज अपने पास रखा है। इससे उन्हें मालूम चल जाता है कौन कलेक्टर टाईम पर ऑफिस आए और कौन लेट। बताते हैं, सीएस के वीडियोकांफ्रेंसिंग के बाद अधिकांश कलेक्टरों ने अपनी टाईमिंग अब दुरूस्त कर ली है। इसकी बड़ी वजह यह है कि सीएस सार्वजनिक तौर से टोकने में गुरेज नहीं करते।

बायोमेट्रिक का फायदा

छत्तीसगढ़ में अटेंडेंस के लिए बायोमेट्रिक सिस्टम लागू करने से एक बड़ा फायदा यह हुआ कि क्लर्कियल कैडर पटरी पर आ गया। वरना, मंत्रालय का ही लें...कर्मचारी आराम से 11.30 बजे तक आते थे। चाय-वाय पीने के बाद डेढ़ बजे लांच हो जाता था। फिर शाम को तीन बजे गांव की देसी सब्जी खरीदने मंत्रालय के सामने चौपाटी पर हाजिर। सब्जी लेकर आने के बाद फिर चार बजे से घर जाने के लिए सामान समेटना शुरू। आश्चर्य की बात...ये तब हुआ जब आदेश में अवर सचिव से नीचे के मुलाजिमों को शामिल नहीं किया गया है, मगर अफसर टाईम पर पहुंच जा रहे इसलिए कर्मचारियों ने भी बिना कहें टाईम पर आना प्रारंभ कर दिया है। रही बात बड़े अधिकारियों की, तो जो फाइलें महीनों तक लटकी रहती थीं, अब लगभग डेली डिस्पोजल हो जा रहीं। इसलिए, क्योंकि पहले साहबानों के आने और जाने पर कोई बंदिशें नहीं थीं। मन पड़े तो मंत्रालय आए, नहीं तो पीए का रटा-सा जवाब....साब फलां जगह मीटिंग में गए हैं...भले ही साब घर में आराम फरमा रहे हों। लेकिन, अब अफसर सुबह सवा दस बजे तक मंत्रालय पहुंच जा रहे तो फिर बैठकर क्या करेंगे। लिहाजा, फाइलें भी तेज गति से हो रही हैं।

5000 करोड़ की बचत, मगर...

धान खरीदी में सिस्टम को कसने का फायदा यह हुआ कि अबकी 141 लाख मीट्रिक टन पर धान खरीदी रुक गई। वरना, पिछले साल 149 लाख मीट्रिक टन हुआ था और इस बार बढ़कर उसे करीब 160 लाख मीट्रिन टन पहुंचने का अंदेशा था। वैसे सरकार की योजना पहले 120 लाख मीट्रिक टन पर धान खरीदी को रोकने की रही मगर सरकार के भीतर से ही सहयोग नहीं मिला। जिम्मेदार नेता लगे बवाल काटने...ऐसा रहा तो अगला चुनाव हार जाएंगे। यही वजह है कि दो-तीन जिलों में ही राईस मिलरों पर कलेक्टर छापा मार पाए। दरअसल, सूबे के 80 परसेंट से अधिक राईस मिलें राजनीतिक पार्टियों से जुड़े हैं। और इतने ताकतवर कि कई मंत्री, नेता उनके लिए दुखी हो गए थे। कुछ चूक सिस्टम के एंड से भी हुई। पता नहीं टोकन का साफ्टवेयर कैसा बनाया गया कि किसानों को टोकन के लिए काफी परेशान होना पड़ा और कुछ माहौल राईस मिल माफियाओं ने बना दिया। इस चलते प्रारंभ में कड़े तेवर दिखा रही सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा। फिर भी, कसावट से करीब 5000 करोड़ बच गया। वरना, बिचौलियों की तैयारी राज्य का खजाना साफ करने की थी।

सीएस पर जिम्मेदारी

सीजीएमएससी को ठीक करने सरकार ने दिल्ली रिटर्न आईएएस अमित कटारिया को सिकेट्री हेल्थ बनाया। सीजीएमएससी से प्रमोटी आईएएस को हटाकर डायरेक्ट आईएएस को एमडी की कमान सौंपी गई। इसके बाद भी हाई कोर्ट को मेडिकल इक्विमेंट्स खरीदी में अक्षमता को लेकर तल्ख टिप्पणी करनी पड़ रही है तो फिर समझा जा सकता है कि सीजीएमएससी किस कदर डिरेल्ड हो चुका है। सीजीएमएससी में कई सालों से अराजकता की स्थिति यह है कि पैसा होते हुए भी दवाइयां और मेडिकल इक्विमेंट नहीं खरीद पा रहा। अस्पताल वालों की मजबूरी यह है कि मेडिकल से संबंधित सारी खरीदी का अधिकार सरकार ने सीजीएमएससी को दे रखा है। सीजीएमएससी को दवाइयां और मेडिकल इक्विमेंट से ज्यादा फायदा बिल्डिंग बनाने में नजर आता है। फिर, दवा सप्लायर जेम पोर्टल में ऐसे कंडिशन डलवा देते हैं कि दूसरी कंपनियां टेंडर में हिस्सा ले नहीं सकें। हाई कोर्ट यह खेल समझ गया, तभी चीफ जस्टिस की डबल बेंच ने कहा है कि मुख्य सचिव इसे देखें। कोर्ट अगर सीएस को व्यवस्था देखने को कह रहा, इसका मतलब तो ये ही हुआ कि सीजीएमएससी का सिस्टम फेल हो चुका है। अब चीफ सिकरेट्री कोई रास्ता निकालेंगे कि सीजीएमएससी दवा खरीदने में सक क्यों नहीं पा रहा।

चौपट सिस्टम

छत्तीसगढ़ बनने के बाद स्वास्थ्य विभाग में एक से बढ़कर एक मंत्री बने और सचिव मगर सूबे में एक बढ़ियां सरकारी अस्पताल मयस्सर नहीं हो पाया। भारत सरकार के पैसे से दो सुपर स्पेशिलिटी अस्तपाल जरूर बने मगर वे अपने किस्मत पर रो रहे हैं। जगदलपुर को प्रायवेट पार्टनरशिप में दिया गया, वो अभी तक प्रारंभ नहीं हो पाया और बिलासपुर में सिर्फ ओपीडी चल रहा है। 250 करोड़ खर्च करने के बाद भी अभी मरीजों की भर्ती की सुविधा नहीं शुरू हो पाई है। सवाल उठता है, छत्तीसगढ़ सरकार से जमीन लेकर जब एम्स इतना बढ़ियां बिल्डिंग बनाकर अस्पताल का संचालन कर सकता है तो फिर राज्य के हेल्थ डिपार्टमेंट द्वारा गरीबों के लिए अदद एक ठीकठाक अस्पताल क्यों नहीं शुरू किया जा सकता? मगर इस पर किसी को सोचने का टाईम नहीं। प्रायवेट अस्पतालों में गरीब लूटते रहे, और आयुष्मान के नाम पर सरकारी खजाना लूटता रहे, कोई फर्क नहीं पड़ता। पता नहीं, एम्स को देखकर सिस्टम में बैठे लोगों को कुछ लगता क्यों नहीं? इस माईनिंग स्टेट में अगर डीएमएफ की ठीक से प्लानिंग की गई होती तो एम्स के समकक्ष रायपुर, बिलासपुर और जगदलपुर में तीन अस्पताल खुल गए होते। और नहीं, तो लखनउ जैसा रायपुर में एक पीजीआई तो खुल ही सकता है।

सीएस का वेतन, सबसे बड़ा लोचा

देश के सरकारी अस्पतालों की सेहत खराब होने में मुख्य सचिवों के वेतन का भी लोचा है। दरअसल, राज्यों की ब्यूरोक्रेसी डॉक्टरों का वेतन चीफ सिकरेट्री से अधिक होने नहीं देना चाहती। और नीट में सलेक्ट होने के बाद पांच साल एमबीबीएस, तीन साल पीजी और दो साल सुपरस्पेशिलिटी याने 10 साल दिमाग घिसने के बाद कोई स्पेशलिस्ट दो-ढाई लाख पगार में सरकारी अस्पताल में काम करने आएगा नहीं। अलबत्ता, सीएस के पद को उसकी सेलरी से नहीं तौला जा सकता। सीएस कार्यपालिका का हेड होता है। प्रोटोकॉल में मंत्री जरूर सीएस से उपर होते हैं मगर ओवरऑल पकड़ और प्रभाव में सीएस उनसे आगे होते हैं। बिना उसके दस्तखत के एक फाइल आगे नहीं सरक सकती। मुख्य सचिव कैबिनेट के पदेन सचिव होते हैं। लिहाजा, लखनउ की तर्ज पर अलग एक्ट पारित कर पीजीआई जैसा इंस्टिट्यूट तो खोला ही जा सकता है। अपने मुख्य सचिव विकास शील प्रैक्टिकल सुधार में विश्वास रखते हैं। वे छत्तीसगढ़ में हेल्थ सिकरेट्री रह चुके हैं और भारत सरकार में भी इस विभाग में सेवा दे चुके हैं। उनसे अधिक हेल्थ सिस्टम को भला कौन समझ सकता है। इस गरीब प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने उन्हें कोई रास्ता निकालना चाहिए।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. धुरंधर फिल्म की अपार सफलता क्या विपक्षी पार्टियों को अपनी रीति-नीति पर सोचने के लिए मजबूर करेगी?

2. सिस्टम में घुस चुके एक आत्मविश्वासी मंत्री का नाम बताइये, जिन्हें यकीन है कि उनकी कुर्सी को कोई खतरा नहीं?


शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

Chhattisgarh Tarkash 2025: मंत्रियों का बीपी हाई

 तरकश, 8 फरवरी 2026

संजय के. दीक्षित

मंत्रियों का बीपी हाई

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का जब भी छत्तीसगढ़ दौरा होता है सूबे के मंत्रियों का ब्लडप्रेशन हाई हो जाता है। दरअसल, पहले केंद्रीय गृह मंत्री का छत्तीसगढ़ आना बड़ी घटना होती थी। बस्तर में बड़ी नक्सल हिंसा के बाद केंद्रीय गृह मंत्री शहीद जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित करने घंटे-दो घंटे के लिए आते थे। अमित शाह ऐसे गृह मंत्री हैं कि हर दूसरे महीने छत्तीसगढ़ धमक जाते हैं। वो भी दो-तीन घंटे के लिए नहीं, तीन-तीन दिन के लिए। बहरहाल, मंत्रियों का रक्तचाप इसलिए बढ़ जाता है...पता नहीं, उनके कान में कोई कारगुजारी न पहुंच जाए। अब, कारनामे भी तो एक से बढ़कर एक है। कोई अपने माशुका को तीन करोड़ का मकान गिफ्ट कर रहा तो कोई जिले वार वसूली एजेंट तैनात कर डाला है। आधे से अधिक मंत्री दो साल में सिर्फ एक सूत्रीय एजेंडा पर कार्य कर रहे...वो है खुद का विकास। उपर से, कार्यकर्ताओं का कोई काम आए तो अपनी ही सरकार पर लांछन भी...क्या बताएं हमारा कुछ चल नहीं रहा...कोई सुन नहीं रहा है। हालांकि, मंत्रियों को यह भ्रम है कि अमित शाह को यहां आने पर ही उनके बारे में पता चलेगा। आईबी की टीम बिना किसी पूर्वाग्रह के छोटी-से-छोटी जानकारी केंद्र को भेजते रहती हैं। मोदी सरकार ने 360 डिग्री से वॉच का ऐसा मेकेनिज्म बना रखा है कि कोई उससे बच नहीं सकता। सही समय पर एक्शन हो जाता है। कई राज्यों में पूरे मंत्रिमंडल से इस्तीफा ऐसे थोड़े ही ले लिया गया।

छत्तीसगढ़ पुलिस का दुर्भाग्य

पंजाब से आतंकवादियों के उन्मूलन के बाद पंजाब पुलिस की हैसियत ऐसी बढ़ गई थी प्रदेश में उनका रुतबा आईएएस से अधिक हो गया था। तब के डीजीपी जूलियो रिबेरो और केपीएस गिल को भला कौन नहीं जानता था। मगर छत्तीसगढ़ पुलिस का दुर्भाग्य कहिये कि लाल आतंक के खात्मा के समय महकमे की हालत दयनीय है। पुलिस मुख्यालय कुछ कहने-सुनने की स्थिति में नहीं है। पूरा सिस्टम डिरेल्ड हो चुका है। बस्तर की बात आजकल पीएम नरेंद्र मोदी अपने हर बड़ी भाषणों में कर रहे, मगर छत्तीसगढ़ पुलिस के अफसरान बस्तर का क्रेडिट लेने की बजाए या तो बैकफुट पर हैं या फिर अपनों को ही निबटाने में लगे हैं। ये ऐसा वक्त है...जब छत्तीसगढ़ पुलिस पूरे देश में कालर खड़े कर सकती थी। फोर्स को फायदा दिलवाने के साथ पुलिस का इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़वा सकती थी। बस्तर में 10-10 साल से डंप पड़े अधिकारियों और जवानों को वापिस बुला सकती थी...मगर मिलिनयन डॉलर का प्रश्न...ये कौन करेगा? पुलिस का ये दुर्भाग्य तब है, जब देश के अब तक के सबसे ताकतवर गृह मंत्री हर महीने छत्तीसगढ़ आ रहे और राज्य में अब तक के सबसे तेज-तर्रार गृह मंत्री हैं।

जात न देखो अफसर की

मनुस्मृति के अनुसार दण्ड का महत्व समाज में अनुशासन और न्याय बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। दण्ड का उद्देश्य केवल दंडित करना नहीं है, बल्कि यह समाज में एक चेतावनी रूपी संदेश होता है ताकि सिस्टम में बैठे लोग अपने कार्यों के प्रति जिम्मेदार रहें। मोदी युग में तो दंड का अपना अलग तरीका है। छत्तीसगढ़ सरकार को भी इसका अनुसरण करना चाहिए। वरना, इस जाति का, तो उसका आदमी...अगर देखा जाएगा तो फिर अनुशासनहीनता की घटनाएं और तेज होंगी। आपने देखा ही महिला डीएसपी के खिलाफ अनेक स्थापित साक्ष्य होने के बाद भी सिस्टम ने सस्पेंड करने में महीना भर से ज्यादा लगा दिया। सीएम को पत्र लिखने वाले एसपी के खिलाफ कार्रवाई करने में सिस्टम उलझन में पड़ा है। जबकि, ऐसा होना नहीं चाहिए। अफसर न किसी जाति का होता है और न किसी आदमी और पार्टी का। 2004 की घटना याद होगी, आईएएस अजयपाल सिंह ने मंत्री के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस लिया था तो घंटे भर में सस्पेंड हो गए थे। कहने का आशय यह है कि त्वरित कार्रवाई का अपना एक मैसेज होता है। घटना संज्ञान में आते ही तुरंत कार्रवाई करना दूसरों के लिए सबक होता है।

पैरेंट्स ब्लाइंड या लाचार!

पिछले हफ्ते राजधानी रायपुर में एक शादी थी। लड़का चूकि विदेश में पढ़ाई किया है, इसलिए 20 से अधिक उसके विदेशी फेंड्स भी आए थे। स्वाभाविक तौर से वे पार्टी के केंद्र बिंदु भी रहे। खासकर, विदेशी लड़कियां। विदेशी लड़कियों की शालीन वेशभूषा लोगों के बीच चर्चा का विषय रहा। चिंता का सार यही था कि हम कहां जा रहे हैं...विदेशी लोग कपड़ों के मामले में सभ्य होते जा रहे और हम इतना उदार कि देह की नुमाइश में कंपिटिशिन कर रहे हैं। उस शादी में भी कुछ लोकल लोग ऐसे थे, जिन्हें देख सभ्य लोगों को नजरें नीची करनी पड़ रही थी। बहरहाल, प्रश्न उठता है...क्या पैरेंट्स इतने ब्लाइंड हो गए है कि उनके सामने बच्चे क्या पहनकर घर से निकल रहे या कैसा आचरण कर रहे, उन्हें दिखता नहीं। या फिर जेन जी, जेन जेड युग में इतने लाचार कि बोलने की उनकी हिम्मत नहीं। यह इतना संवेदनशील मसला है कि डर के मारे न कोई पॉलिटिशियन बोल पाएगा या न ही कोई समाज सुधारक। अगर जरा सा भी मुंह खोला तो अगले रोज ही चूड़ी लेकर प्रदर्शन। कुल मिलाकर बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए पैरेंट्स को आंखें खोलकर रखनी होगी। वरना आए दिन समाज में जैसी अधर्मी घटनाएं हो रही हैं, वो कम होने की बजाए और तेजी से बढ़ेंगी।

कलेक्टरों की लिस्ट

कलेक्टरों की एक ट्रांसफर लिस्ट अगले हफ्ते के अंत तक आ सकती है। लिस्ट हालांकि, बहुत बड़ी नहीं होगी। दरअसल, बलौदा बाजार कलेक्टर दीपक सोनी सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने वाले हैं। पोस्टिंग आदेश के बाद थ्री वीक का उनका ज्वाईनिंग पीरियड खतम हो गया है। मगर धान खरीदी और मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्य के चलते रिलीव नहीं किया गया। 14 फरवरी को एसआईआर खतम हो जाएगा। इसके बाद सरकार उन्हें कभी भी कार्यमुक्त कर देगी। दीपक की रिलीविंग के साथ ही कलेक्टरों की एक पोस्टिंग लिस्ट भी निकलेगी। बलौदा बाजार के साथ दो-एक और जिलों के कलेक्टर बदले जा सकते हैं। 2019 बैच के विश्वदीप और रेना जमील कलेक्टर बनने से बच गए हैं। अत्यधिक संभावना है कि इस लिस्ट में 2019 बैच कंप्लीट हो जाए। हालांकि, विश्वदीप की जगह रायपुर नगर निगम का कमिश्नर किसे बनाया जाए, इसकी तलाश अभी पूरी नहीं हुई है। रायपुर जिला पंचायत सीईओ को कमिश्नर बनाने की अटकलें जरूर चल रही है। वैसे दो-एक प्रमोटी आईएएस के भी कलेक्टर बनने की चर्चाएं है, मगर देखना है कि इस लिस्ट में उनका नंबर लगता है या फिर मई में निकलने वाली बड़ी लिस्ट में। कुल मिलाकर 14 या 15 फरवरी को कलेक्टरों की एक लिस्ट आ सकती है।

आईएएस अफसरों का स्टॉपेज

राजधानी रायपुर के प्रॉपर डेवलपमेंट के लिए रमन सरकार ने साल 2004 के लास्ट में रायपुर विकास प्राधिकरण का गठन किया था। कमल विहार के निर्माण याने लगभग 2018 तक इस प्राधिकरण की अहमियत रही, उसके बाद यह आईएएस अफसरों के स्टॉपेज जैसा बन गया है। अफसर आते हैं, और दो-चार महीने में दूसरी पोस्टिंग की रवानगी डाल देते हैं। आरडीए बनने के 21 साल में अभी तक 22 सीईओ पोस्ट हो चुके हैं। खासकर, 2018 से लेकर अभी तक सात साल में 14 सीईओ। कई आईएएस दो-तीन महीने में ही विदा हो गए। बार-बार निजाम बदलने से आरडीए में मौज की स्थिति है। अधिकारी, कर्मचारी मानकर चलते हैं कि नए सीईओ दो-तीन महीने में निकल लेंगे, तो फिर डरना क्यों? हालांकि, आवास और पर्यावरण मंत्री ओपी चौधरी की इच्छा पर सरकार ने इस बार सिकेट्री रैंक के आईएएस अधिकारी अवनीश शरण को आरडीए को ठीक करने की जिम्मेदारी सौंपी है। अब मंत्री ने रुचि ली है...पहली बार किसी बड़े स्तर के आईएएस को इस प्राधिकरण में बिठाया गया है तो देखना है कि इसकी सूरत बदलती है या फिर....?

जोगी डबरी नहीं, विष्णुदेव डबरी

छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने आज से 25 साल पहले छत्तीसगढ़ का वाटरलेवल ठीक रखने डबरी बनाने का फैसला किया था। तब उसे बोलचाल में जोगी डबरी कहा जाता था। जोगी ने अपने कार्यकाल के तीसरे साल में यह सोचकर डबरी की प्लानिंग की थी कि अभी तो उन्हें लंबी पारी खेलनी है। मगर छत्तीसगढ़ की जनता ने उनकी पारी को जल्दी समेट दी। जोगीजी जो काम नहीं कर पाए, अब विष्णुदेव सरकार उसे पूरा करने जा रही है। मनरेगा मद से गांव-गंवई में 12 हजार डबरी बनाने का काम प्रारंभ हो गया है। जाहिर है, छत्तीसगढ़ में जिस तरह पानी का लेवल डाउन हो रहा, उसमें ये डबरी बड़ी कारगर होगी।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. छत्तीसगढ़ पुलिस की हनी गर्ल की अगर जांच हो जाए तो कितने आईपीएस, एसपीएस और नेता उसके जद में आएंगे?

2. नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्ति में बीजेपी विलंब क्यों कर रही है?


Chhattisgarh Tarkash 2025: एसपी की पीड़ा या दुःसाहस!

 तरकश, 1 फरवरी 2026

संजय के. दीक्षित

एसपी की पीड़ा या दुःसाहस!

छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले के एसपी धर्मेंद्र छवई ने प्रमोशन में नाइंसाफी को लेकर सीधे मुख्यमंत्री और डीजीपी को पत्र लिख डाला। पत्र भी सिंपल नहीं। नाराजगी और गंभीर आरोपों के साथ...फलां-फलां अफसरों का प्रमोशन किया गया तो मेरा क्यों नहीं? हो सकता है, प्रमोशन में एसपी के साथ न्याय न हुआ हो। मगर इससे बड़ा सवाल यह है कि एसपी क्या सीधे मुख्यमंत्री को पत्र लिख सकता है? सरकारी सिस्टम में मुलाजिमों को अपना पक्ष रखने का एक तरीका बनाया गया है। उपर से एसपी ऐसा करें...देश के किसी राज्य में ऐसा नहीं हुआ होगा। जाहिर है, कलेक्टर और एसपी जिलों में मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि के तौर पर काम करते हैं। सरकार अपने पसंदीदा अफसरों को ही कलेक्टर-एसपी बनाती है। मगर कलेक्टर-एसपी ही लगे सरकार को निशाने पर लेने तो फिर उस राज्य के सिस्टम का क्या होगा? एक बड़ा प्रश्न यह भी...एसपी ने अगर सीमाएं लांघी तो सिस्टम ने क्या किया? अभी तक नोटिस या शोकॉज जारी होने की भी कोई जानकारी नहीं है। सरकार के अच्छे कामों का संदेश अगर जनता के बीच नहीं जा पा रहा तो इसके पीछे इस तरह की घटनाओं का बड़ा हाथ है।

दमदार अफसर

प्रमोटी आईपीएस अधिकारी सरकार को चमका दे...छत्तीसगढ़ बनने के 25 साल में ऐसा कभी डायरेक्ट आईपीएस अफसरों ने भी नहीं किया। मुकेश गुप्ता जैसे अब तक के सबसे दमदार आईपीएस की भी हिम्मत नहीं पड़ी। अच्छी तरह याद है...मुकेश को डीआईजी से आईजी बनने के लिए कई साल वेट करना पड़ा था। तत्कालीन डीजीपी ओपी राठौर एकदम अड़ गए थे...प्रमोशन नहीं होने दूंगा। मगर मुकेश गुप्ता ने कभी मुख्यमंत्री को पत्र नहीं लिखा। हालांकि, बाद में रमन सिंह ने डीजीपी से बात कर उन्हें मुकेश के प्रमोशन का रास्ता निकाला था। बहरहाल, मुकेश गुप्ता से अधिक डेसिंग वाले प्रमोटी आईपीएस धर्मेंद्र छवई निकले। बता दें, छवई पर बैकडोर से आईपीएस बनने का आरोप लगा था। उन्होंने रापुसे अधिकारी के रूप में पूरी नौकरी एमपी में की थी। वहां एक संवेदनशील केस में सस्पेंड हुए, एफआईआर भी हुआ। खैर, ये निजता का मामला है, इसलिए इस पर टिप्पणी मुनासिब नहीं। बहरहाल, धर्मेंद्र छवई प्लानिंग के तहत एमपी से 18 साल बाद 2018 में छत्तीसगढ़ आए। और उन्होंने छत्तीसगढ़ के रापुसे अधिकारियों के विरोध के बाद भी आईपीएस बनकर दिखा दिया कि उनमें दम तो है। धर्मेंद्र अगर एमपी में होते तो इस साल आईपीएस बनते। बैच भी 2016 या 17 मिलता। छत्तीसगढ़ में वे 2023 में आईपीएस बने और बैच भी 2013 का मिल गया। एसपी के तौर पर बेमेतरा, महासमुंद के बाद कवर्धा उनका तीसरा जिला है। छत्तीसगढ़ में इतने बड़े-बड़े लॉटरी पाने के बाद भी वे सरकार को पत्र लिख मार रहे तो इससे साबित होता है कि वे कितने साहसी पुलिस अधिकारी हैं।

सीएस, डीजीपी की जिम्मेदारी!

छत्तीसगढ़ का सिस्टम अगर डिरेल्ड हो रहा तो, कार्यपालिका की भी जिम्मेदारी बनती है। नए-नए अफसर अगर राज्यपाल के एडीसी बनने से इंकार कर दें, अफसर सरकार का आदेश न माने, पुलिस अधीक्षक नियम-कायदों को ताक पर रख सरकार को पत्र लिख दें, तो इसकी एकाउंटबिलिटी से मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक मुक्त नहीं हो सकते। सरकारी मुलाजिमों की घोर अनुशासनहीनता पर सीएस और डीजीपी अगर कोई कार्रवाई नहीं कर सकते को बुलाकर क्लास लगाने से कौन रोक सकता है। कुल मिलाकर सूबे के मुलाजिमों में अराजकता बढ़ती जा रही है। कर्मचारियों की तुलना में बड़े अधिकारी ज्यादा अनुशासनहीनता कर रहे। इसे अगर ठीक नहीं किया गया तो पूरी पौध खराब हो जाएगी।

आईजी का वसूलीबाज गैंग

पुलिस मुख्यालय जितना सक पा रहा, कार्रवाई भी कर रहा है। एक आईजी साहब ने पिच पर उतरते ही धुआंधार बैटिंग शुरू कर डाली। एक एडिशनल एसपी को गैंग का मुखिया बनाया तो दूसरे जिले के एक सिपाही को भी बुलाकर काम में लगा दिया। मगर बात पहुंच गई इंटेलिजेंस चीफ के पास। उन्होंने आईजी और एडिशनल एसपी को जमकर हड़काया। इससे ज्यादा उनके हाथ में भी नहीं। कॉन्स्टेबल को जरूर एसपी को बोल निपटवा दिया। मगर ये भी सही है कि सिस्टम जब तक सख्त संदेश नहीं देगा, तब तक अराजकता कम नहीं होने वाला।

अफसर सस्पेंड

बात अनुशासनहीनता की निकली तो यहां रायपुर पुलिस कमिश्नर के बैचमेट के निलंबन की घटना ताजा हो गई। बात 2004 की है। सरकार ने नॉन आईपीएस संजय तिवारी को बीजापुर का एसपी बनाया था। उन्होंने नक्सल प्रभावित जिले में जाने से इंकार कर दिया। इस पर डीजीपी ओपी राठौर बड़े नाराज हुए। उन्होंने खुद ही मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह से बात कर संजय तिवारी को सस्पेंड करवाया। बाद मे संजय अपने मूल कैडर एमपी चले गए।

बालाघाट आगे, जशपुर पीछे

छत्तीसगढ़ सरकार ने कुछ साल पहले तय किया था कि अब किसी को न तो एक्सटेंशन दिया जाएगा और न संविदा नियुक्ति। मगर यह संकल्प ऐसा टूटा कि ईएनसी जैसे पदों पर लगातार संविदा नियुक्ति दी जा रही। जल संसाधन के ईएनसी इंद्रजीत को रिटायर होने के बाद जुलाई 2025 में उसी पद पर छह महीने की संविदा नियुक्ति मिली थी। सुना है, उनको अब एक्सटेंशन मिल गया है। ऐसा नहीं कि वहां ईएनसी का कोई दावेदार नहीं। जशपुर के रहने वाले छत्तीसगढ़िया आदिवासी अफसर जेआर भगत ने ईएनसी के संविदा नियुक्ति के खिलाफ कोर्ट में याचिका लगाई तो पर्दे के पीछे पता नहीं क्या चकरी घुमाई गई कि उन्होंने अपनी अर्जी वापिस ले ली। बताते हैं, भगत को बैकफुट पर लाने के लिए उनकी पुरानी फाइल खोल दी गई। उधर, विभाग ने बालाघाट के इंद्रजीत को उपकृत करने ऐसा ताना-बाना बनाया कि एसई से सीई में सालों तक प्रमोशन नहीं हुआ। ताकि, इंद्रजीत को कोई रिप्लेस नहीं कर पाए। भीतरखाने में चर्चाएं ये भी है कि ईएनसी के दावेदार छत्तीसगढ़ियां मुख्य अभियंता को रिटायरमेंट के बाद संविदा पोस्टिंग का प्रलोभन दिया गया ताकि वे मुंह बंद कर लें। पता नहीं इंद्रजीत ने क्या जादू किया कि पूरे सिस्टम को जीत लिया है।

शह-मात की सियासत और गोद

पहले मध्यप्रदेश और फिर राज्य बनने के बाद 18 साल तक बिलासपुर सियासत के मजबूत केंद्र के तौर पर जाना जाता था। मगर 2019 से बिलासपुर की उपेक्षा शुरू हुई, वह निरंतर जारी है। अलबत्ता, अब तो बीजेपी के भीतर ही बिलासपुर में वर्चस्व की लड़ाई छिड़ गई है। पिछले 25 साल से अमर अग्रवाल विधायक हैं। मगर इस समय पड़ोसी जिले के डिप्टी सीएम अरुण साव की नजर बिलासपुर पर है। वे ताकत दिखाने का कोई अवसर नहीं जाने दे रहे। उधर, केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू भी बिलासपुर से ही सांसद हैं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर नेता प्रतिपक्ष और विधानसभा अध्यक्ष रह चुके धरमलाल कौशिक बिलासपुर से हैं तो कद्दावर नेता धर्मजीत सिंह भी बिलासपुर के रहवासी हैं। छोटे मियां सुशांत शुक्ला भी जलवा जलाल में कम नहीं। उधर पिछले कुछ दिनों में बिलासपुर में दबदबा कायम करने शह-मात के खेल की कई घटनाएं हुईं, उसका मैसेज अच्छा नहीं गया। लगता है इसीलिए, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बिलासपुर को गोद जैसा लेने का फैसला किया।

जाहिर है, शहरों के विकास की बात आई तो सीएम ने रायपुर से पहले बिलासपुर की मीटिंग ली। इस बार 26 जनवरी को उन्होंने झंडा भी बिलासपुर में ही फहराया। 23 साल बाद बिलासपुर में किसी मुख्यमंत्री ने गणतंत्र दिवस को झंडा फहराया। तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने आखिरी बार 26 जनवरी 2003 को वहां झंडारोहण किया था। इसके बाद डॉ0 रमन सिंह ने 15 साल और भूपेश बघेल ने पांच साल 26 जनवरी को जगदलपुर में झंडा फहराया। बहरहाल, CM का फोकस बढ़ा है तो हो सकता है बिलासपुर का पुराना वजन फिर लौटे। वैसे CM का पुराना संभागीय मुख्यालय बिलासपुर ही रहा है।

रिफार्म पर ब्रेक के पीछे

जमीनों के डायवर्सन के लिए लोगों को रिश्वत देने के बाद भी एसडीएम कार्यालय में काफी चप्पलें घिसनी पड़ती थी। सरकार ने इसकी तोड़ निकाला और आम आदमी को सहूलियत देने के लिए एसडीएम के जमीनों के डायवर्सन के अधिकार को समाप्त कर दिया। डायवर्सन को ऑनलाइन किया गया। कोई भी आदमी खुद ही ऑनलाइन एसडीएम के यहां अप्लाई करेगा और 15 दिन में अगर कोई एक्शन नहीं हुआ तो उसे स्वतः डायवर्टेड मान लिया जाएगा। 13 दिसंबर को नोटिफिकेशन राजपत्र में प्रकाशित भी हो गया। मगर इसके बाद राजस्व विभाग का अमला हरकत में आया। डिप्टी कलेक्टर्स और तहसीलदारों का एक प्रतिनिधिमंडल मंत्री के यहां पहुंच गया। इसका नतीजा यह हुआ कि इस महत्वपूर्ण सुधार के क्रियान्वयन पर ब्रेक लग गया।

SCR का सीईओ

छत्तीसगढ़ के स्टेट कैपिटल रीजन के लिए सरकार ने सेटअप मंजूर कर दिया है। जल्द ही नियुक्यिं शुरू हो जाएंगी। एससीआर में फर्स्ट पोस्टिंग सीईओ की होगी। सीईओ ही एससीआर का हेड होगा। पता चला है, सिकेट्री लेवल के आईएएस को इस कुर्सी पर बिठाया जाएगा। अत्यधिक संभावना है कि आवास और पर्यावरण विभाग के सिकेट्री अंकित आनंद को सीईओ की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी जाए। जाहिर है, विभागीय सचिव के नाते एससीआर का ड्राफ्ट और सेटअप तैयार करने में अंकित की भूमिका रही है।

नेता, समारोह और सोशल मीडिया

सालेक भर से शादी या जन्मदिन जैसी पार्टियों में नेताओं ने एक नया ट्रेंड शुरू किया है। मंत्री, पूर्व मंत्री या जनप्रतिनिधि आजकल पार्टियों में जा रहे तो वहां स्टेज की फोटो और फिर सोशल मीडिया में यह बताते हुए पोस्ट...फलां के यहां शादी या इस कार्यकम में शरीक होकर बधाई दिया। खैर, यह आईडिया बुरा नहीं है। टाईम निकाल नेताजी लोग ऐसे कार्यक्रमों में पहुंचते हैं, तो इसका कुछ आउटकम मिल जाए तो क्या दिक्कत?

प्यास लगने पर कुंआ खोदना

रायपुर में पुलिस कमिश्नरेट लागू हो गया मगर इसके लिए अलग से राशि का प्रावधान नहीं किया गया है। इससे संसाधनों की बात तो दूर, बैठने के ठौर-ठिकानों को लेकर दिक्कतें जा रही। पुलिस कमिश्नर संजीव शुक्ला उधारी के कार्यालय में बैठ रहे। पांच डीसीपी पोस्ट हुए हैं, उन्हें कहां बिठाया जाए, यह यक्ष प्रश्न है। पांचों एसपी लेवल के आईपीएस हैं। उन्हें सीएसपी ऑफिस में तो नहीं बिठाया जा सकता। डीसीपी सेंट्रल उमेश गुप्ता को सिविल लाइन थाने के पास ठीकठाक ऑफिस मिल गया है। मगर डीसीपी वेस्ट संदीप पटेल को आमानाका थाने के छत पर बैठना पड़ रहा है।

वहीं, डीसीपी नार्थ मयंक गुर्जर के लिए जगह का जुगाड़ नहीं बैठ पा रहा। बाकी एडिशनल डीसीपी और एसीपी को कौन पूछे? सिस्टम को कायदे से पुलिस कमिश्नर के लिए बजट का इंतजाम रखना था। क्योंकि, पुलिस कमिश्नरेट कोई ओवरनाइट नहीं बना है। करीब डेढ़ साल पहले इसकी घोषणा हुई थी। राज्योत्सव के मौके पर ही इसका उद्घाटन किया जाना था, जो किसी कारणों से नहीं हो पाया। 31 दिसंबर को कैबिनेट की बैठक में डेट का भी ऐलान कर दिया गया था। कमिश्नरेट की तैयारी के लिए 23 दिन कम नहीं होते। मगर सिस्टम ने कुछ नहीं किया। अब प्यास लगने पर कुंआ खोदने जैसा काम किया जा रहा।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या ये सही है कि पुलिस कमिश्नरेट बनने से अफसरशाही इतनी दुखी हुई कि उद्घाटन के मौके पर कोई जलसा या कार्यक्रम नहीं किया गया?

2. अफसरों की अनुशासनहीनता पर भी सिस्टम सौम्य क्यों बना हुआ है?

शनिवार, 24 जनवरी 2026

Chhattisgarh Tarkash 2025: पुलिस कमिश्नरः जो जीता वो सिकंदर

 तरकश, 25 जनवरी 2025

संजय के. दीक्षित

पुलिस कमिश्नरः जो जीता वो सिकंदर

रायपुर पुलिस कमिश्नर सिस्टम सिर्फ सिटी में लागू किया जाए या फिर पूरे जिले में, इसको लेकर सत्ता के गलियारों में शह-मात का खूब खेल चला। 31 दिसंबर के कैबिनेट की बैठक में रायपुर सिटी में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने का फैसला लिया गया, उसमें किसी ने मुंह खोलना मुनासिब नहीं समझा। मगर 16 जनवरी को जैसे ही लॉ एवं गृह विभाग से अनुमोदन के बाद नोटिफिकेशन राजपत्र में प्रकाशित करने के लिए लेटर सरकारी प्रेस को गया कि गृह मंत्री का फोन आ गया। इसके बाद उपर से और भी फोन...अभी नोटिफिकेशन रोका जाए। दोनों फोन कॉल का लब्बोलुआब यह था कि शहर नहीं, पूरे जिले को पुलिस कमिश्नरेट में शामिल किया जाएगा। बताते हैं, आखिरी समय में आईपीएस बिरादरी के सीनियर अफसरों का एक धड़ा गृह मंत्री और बीजेपी संगठन के कुछ नेताओं को कंविंस करने में कामयाब हो गया कि सिर्फ शहर के लिए पुलिस कमिश्नरेट बनाने का कोई मतलब नहीं। इसका नतीजा यह हुआ कि नोटिफिकेशन पर ब्रेक लग गया। इसके बाद लोग एकदम अश्वस्त हो गए कि पुलिस कमिश्नर सिस्टम अब पूरे जिले में लगेगा। मगर जो जीता वो सिकंदर...परदे के पीछे चली चकरी ने पूरी बाजी पलट दी। लोगों को समझना चाहिए कि आईएएस देश की सर्वोच्च सर्विस है। यूपीएससी में पहले आईएएस, फिर आईपीएस का नंबर आता है। आईएएस अगर टॉप पर हैं तो उनका ब्रेन भी टॉप का ही चलता होगा न। वैसा ही हुआ। इस गेम का अंतिम नतीजा यह रहा कि ओल्ड रायपुर सिटी में ही पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू करने नोटिफिकेशन जारी हो गया।

सरकार को माइलेज नहीं

रायपुर के पड़ोसी शहर नागपुर में 30 बरस पहले पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू हो गया था। ओड़िसा भी छत्तीसगढ़ से आगे निकल गया था। ऐसे में, राज्य बनने के 25 साल बाद विष्णुदेव साय सरकार ने पुलिस में रिफार्म का यह ऐतिहासिक कार्य किया। मगर इस काम के लिए जिस तरह धूम-धड़ाके के साथ उसे पॉलिटिकल माइलेज लेना था, वह नहीं हो सका। इसके पीछे क्या वजह रही...ये सरकार के रणनीतिकार बता पाएंगे। जाहिर है, दूसरे विभागों में छोटे से रिफार्म में भी सितारा होटलों में बड़ा इवेंट किया जाता है। किन्तु देश के पुलिस कमिश्नर के नक्शे में रायपुर का नाम शामिल होने के बाद भी कोई जलसा या कार्यक्रम तो हुआ नहीं, पुलिस कमिश्नर ऑफिस में कोई नारियल फोड़ने भी नहीं गया। फर्स्ट पुलिस कमिश्नर संजीव शुक्ला का ऑफिस के पोर्च में गाड़ी से उतरते और रायपुर के आखिरी कप्तान लाल उमेद सिंह को बुके देते फोटू और फूटेज के अलावे कुछ भी नहीं हुआ। सरकार के लिए यह एक बड़ा श्रेय लेने का अवसर था।

आखिरी कप्तान

रायपुर पुलिस कमिश्नरेट उल्लासविहीन माहौल में प्रारंभ हुआ मगर रायपुर पुलिस अधीक्षक कार्यालय के लोगों ने अतीत की यादों को सहेजने के लिए जरूर एक छोटा सा भावुक कार्यक्रम किया। आधा दर्जन से अधिक रायपुर के पूर्व कप्तान इस मौके पर पहुंचे थे। चाय-नाश्ता और पुरानी यादों तो ताजा करने के साथ ही फोटो सेशन हुआ। बहरहाल, 23 जनवरी को रायपुर पुलिस अधीक्षक का अस्तित्व हमेशा के लिए खतम होने के साथ ही रायपुर के आखिरी कप्तान के तौर पर लाल उमेद सिंह का नाम दर्ज हो गया। इस स्तंभ में पहले भी लिखा गया था कि रायपुर आईजी अमरेश मिश्रा की सेहत पर पुलिस कमिश्नर का कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उनका रायपुर रेंज और पांचों जिला सलामत रहेगा। उनका ऑफिस भी वही रहेगा। रायपुर ग्रामीण जिला उनके पास रहेगा। इसलिए जिलों की संख्या भी यथावत रहेगी।

5 रंगरुट आईपीएस

फर्स्ट पुलिस कमिश्नर के लिए शुरू से दुर्ग आईजी रामगोपाल गर्ग का नाम प्रमुखता से चल रहा था। 22 जनवरी की रात आठ बजे तक यही था कि रामगोपाल गर्ग कल सुबह रायपुर पहुंचकर कमिश्नरेट में कार्यभार ग्रहण करेंगे। मगर सरकार ने बिलासपुर आईजी संजीव शुक्ला को फर्स्ट पुलिस कमिश्नर बनने के लिए सलेक्ट किया। संजीव का चयन इसलिए किया गया कि उन्हें रायपुर की समझ हैं। स्कूलिंग और कॉलेज की पढ़ाई के बाद पुलिस की सर्विस में वे रायपुर में सीएसपी, एडिशनल एसपी और एसएसपी रहे। एमपी की राजधानी भोपाल में भी वे सीएसपी रहे हैं। वे प्रमोटी आईपीएस जरूर हैं मगर प्रोफाइल उनका बड़ा साउंड है। सरकार ने उन्हें सीबीआई में काम कर चुके अमित कांबले को एडिशनल कमिश्नर बनाया है तो डीसीपी और क्राइम, ट्रैफिक के लिए 2020 बैच के पांच अधिकारियों को दिया है। याने रायपुर शहर में अब सीपी और एडिशनल सीपी के अलावे पांच यंग आईपीएस बैठेंगे। सरकार में बैठे अफसरों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में आईपीएस का तीन-चार बैच बुरी कदर डिरेल्ड हो गया था। 2020 बैच को इसलिए डीसीपी बनाया गया है कि पांचों पोलिसिंग में दक्ष हो जांए। अलबत्ता, इस बैच के एक जूनियर आईपीएस नारायणपुर में एसपी हैं। इसको लेकर 2020 बैच वालों में कुछ-कुछ चल रहा था। मगर फर्स्ट डीसीपी बनाए जाने से हो सकता है कि इनकी व्यथा थोड़ी कम हो जाए।

प्रमोटी आईपीएस का दबदबा

छत्तीसगढ़ में प्रमोटी आईपीएस अधिकारियों के लिए यह स्वर्णिम टाईम होगा। इस समय 33 में से 14 जिलों के कप्तान प्रमोटी हैं। इसमें रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, जांजगीर रायगढ़ और वीवीआईपी जिला जशपुर भी शामिल हैं। रायपुर के पुलिस कमिश्नर के लिए भी प्रमोटी आईपीएस को चुना गया तो रायपुर ग्रामीण में भी प्रमोटी। महत्वपूर्ण यह है कि प्रमोटी होने के बाद भी पोलिसिंग में आरआर याने डायरेक्ट से कहीं पीछे नहीं हैं। दरअसल, पिछले कुछ सालों में पुलिस महकमे का ग्रह-नक्षत्र बिगड़ा, उससे सबसे अधिक डायरेक्ट वाले ही प्रभावित हुए। जुआ, सट्टा और शराब ने कई होनहार डायरेक्टर आईपीएस अधिकारियों का कैरियर चौपट कर दिया। बता दें, इस वक्त रायपुर पुलिस कमिश्नर, रायपुर ग्रामीण, बिलासपुर, दुर्ग, जांजगीर, सक्ती, रायगढ़, जीपीएम, कोरिया, जशुपर, बेमेतरा, सूरजपुर, कोंडागांव, कवर्धा और गरियाबंद में स्टेट कैडर वाले आईपीएस कप्तान हैं। ये जरूर है कि कमिश्नरेट में पोस्टेड पांच आईपीएस एकाध साल बाद बाहर निकलेंगे तो फिर आरआर का दबदबा बढ़ेगा।

सरकार और संघ का सेतु!

भूपेश बघेल के दौर से मुख्यमंत्री का मीडिया एडवाइजर बनाने की परंपरा शुरू हुई। रुचिर गर्ग उनके मीडिया सलाहकार रहे। विष्णुदेव सरकार में पंकज झा पहले मीडिया सलाहकार बने और अभी आर0 कृष्णा दास को मीडिया सलाहकार बनाया गया है। कृष्णा संघ पृष्ठभूमि से हैं। बचपन से संघ की शाखाओं में सक्रिय रहे। इस समय संघ के मीडिया सेल के प्रमुख की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। कृष्णा को एडवाइजर टू सीएम बनने का एक मतलब सरकार और संघ के बीच सेतु निर्माण भी हो सकता है। याद होगा, रमन सिंह की तीनों पारी में संघ कोटे से विवेक सक्सेना ओएसडी टू सीएम रहे। फर्क इतना है कि कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर सरकार ने कृष्णा दास का कद बढ़ा दिया है। ऐसा प्रतीत होता है, कृष्णा मीडिया के साथ संघ के मसले भी देखेंगे।

हनी ट्रेप या ट्रेप हनी?

महिला डीएसपी और रायपुर के बिजनेसमैन के लव स्टोरी और विवाद की जांच कर पुलिस ने 1400 पेज की रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। जांच रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। इंवेस्टिगेशन का दिलचस्प पार्ट यह रहा कि पुलिस अधिकारी उलझे रहे...कौन हनी है और कौन ट्रेप हुआ। दरअसल, इस केस में हनी का स्वाद दोनों पक्ष़्ां ने लिया। हनी ने टारगेट का शिकार किया मगर बाद में वह खुद ही ट्रेप हो गई।

कलेक्टर की लिस्ट

जगदलपुर कलेक्टर हरीश एस0 को सरकार ने सेंट्रल डेपुटेशन के लिए रिलीव कर दिया। इसके साथ ही 2017 बैच के आईएएस आकाश छिकारा को वहां का कलेक्टर अपाइंट कर दिया गया। 31 जनवरी के आसपास कलेक्टर की एक लिस्ट और निकलेगी। बलौदा बाजार कलेक्टर दीपक सोनी को भी दिल्ली में पोस्टिंग मिल गई है। पोस्टिंग आर्डर निकलने के बाद थ्री वीक की मियाद पूरी होने वाली है। धान खरीदी को देखते हो सकता है कि सरकार 31 के दो-चार दिन आगे-पीछे उन्हें रिलीव करे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. सरकार बने दो साल से अधिक होने के बाद भी बीजेपी नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्ति क्यों नहीं कर पा रही?

2. डीजीपी अरुणदेव गौतम के पदनाम से प्रभारी शब्द कब हटेगा?

Chhattisgarh Tarkash 20250: पोस्टिंग की गजब परंपरा

 तरकश, 18 जनवरी 2025

संजय के. दीक्षित

पोस्टिंग की गजब परंपरा

छत्तीसगढ़ में चना-मुर्रा टाईप आयोगों में सरकार बनने के साल-डेढ़ साल के भीतर नियुक्तियां हो जाती हैं, मगर राज्य वित्त आयोग के साथ कुछ ऐसी विडंबना रही कि 25 साल में सिर्फ एक बार पांच साल के लिए वीरेंद्र पाण्डेय इसके अध्यक्ष रहे। वरना, हर सरकार में, तीसरे साल ही अध्यक्ष की नियुक्ति हो पाती है। अजीत जोगी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान लगभग आखिरी समय याने विधानसभा चुनाव से जस्ट पहले टीएस सिंहदेव को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था। मगर दिसंबर 2003 में सरकार बदल गई। हालांकि, संवैधानिक पद होने के चलते सिंहदेव इस्तीफा ना भी देते तो कुछ नहीं होता। मगर सिंहदेव ने नैतिकता के नाते पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद मुख्यमंत्री बने डॉ0 रमन सिंह ने वीरेंद्र पाण्डेय को अध्यक्ष बनाया। वे करीब पांच साल इस पद पर रहे। उसके बाद फिर तीसरे साल में नियुक्ति की परंपरा शुरू हो गई। 2011 में अजय चंद्राकर और 2016 में चंद्रशेखर साहू इस आयोग के अध्यक्ष बनाए गए। भूपेश बघेल सरकार ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 2022 में सरजियस मिंज की नियुक्ति की थी। चूकि बीजेपी-04 सरकार का तीसरा साल चालू हो गया है, ऐसे में इस आयोग को लेकर पार्टी नेताओं की उत्सुकता बढ़ गई है। इस आयोग का मूल काम राज्य के कुल कर राजस्व में से स्थानीय निकायों को कितना हिस्सा मिले, इसका तरीका सुझाना है। पंचायतों और नगरपालिकाओं के लिए आय के नए स्त्रोत तलाशने का कार्य भी यह आयोग करता है। चूकि इसमें दिमाग और बुद्धि का काम है, इसलिए नेताओं में भी पढ़े-लिखे बौद्धिक फेस को ही इस आयोग का चेयरमैन बनाया जाता है। बहरहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी कब और किसकी ताजपोशी करती है।

कटप्पा और आईपीएस प्रमोशन

बाहुबली-2 रिलीज होने से पहले पब्लिक डोमेन में ये बड़ा प्रश्न था कि कटप्पा ने आखिर बाहुबली को क्यों मारा? कुछ इसी तरह के यक्ष प्रश्न आईपीएस लॉबी में भी घूम रहे हैं...बैठक में आखिर पेंच लगाई किसने। दरअसल, डीपीसी तक सब कुछ ठीकठाक चल रहा था। पीएचक्यू ने प्रमोशन का प्रस्ताव तैयार कर भेजा, गृह विभाग ने उसे डीपीसी में सम्मिट किया। बताते हैं, प्रमोशन कमेटी की बैठक जैसे ही शुरू हुई किसी मेंबर ने महादेव ऐप्प का मसला उठा दिया। कहा...6000 करोड़ के स्कैम में तीन अफसरों से पूछताछ के लिए केंद्रीय जांच एजेंसी को 17ए के तहत अनुमति दी गई है, तो फिर प्रमोशन कैसे? इसके बाद पेंच ऐसी फंसी कि हाई लेवल के निर्देश और मार्गदर्शन के बाद भी दूसरी डीपीसी में मामला सुलझ नहीं पाया। विदित है, मुख्य सचिव विकास शील, सीनियर एसीएस के नाते ऋचा शर्मा, एसीएस होम मनोज पिंगुआ और डीजीपी अरुणदेव गौतम मौजूद थे। पुलिस महकमे में सबसे अधिक उत्सुकता यह जानने का लेकर है कि कटप्पा की भूमिका किसने निभाई? और क्यों?

डरे-सहमे मंत्री!

2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सरकार को बड़ा झटका लगा था। भूपेश बघेल के 12 में से नौ मंत्री चुनाव नहीं निकाल पाए। ये चीजें बीजेपी सरकार के कई मंत्रियों को बड़ा परेशान कर रही। लिहाजा, सरकार द्वारा किए जा रहे रिफार्म की कोशिशों से मंत्रीजी लोग घबरा जा रहे। जमीनों के गाइडलाइन की युक्तियुक्तकरण को लेकर कैबिनेट की बैठक में कई मंत्रियों ने कह दिया था, ऐसा रहा तो वे चुनाव हार जाएंगे। और अभी सरकार फर्जी धान खरीदी पर अंकुश लगाने का प्रयास कर रही तो कुछ मंत्रियों ने हाय-तोबा मचा दिया। बता दें, फर्जी धान खरीदी में हर साल करीब 10 हजार करोड़ का खेल किया जाता है। इस खेल के मुख्य खिलाड़ी कई राईस मिलरों पर दबिश बढ़ाई जा रही तो मंत्री समेत पक्ष-विपक्ष के विधायक उससे बेचैन हो रहे हैं।

पोस्टिंग में विलंब

पिछले साल डीएसपी प्रमोट हो जाने के बाद भी 40 से अधिक टीआई को तीन महीने तक थानेदारी करनी पड़ी, तब जाकर पोस्टिंग मिली। कुछ ऐसा ही एडिशनल एसपी प्रमोशन में हो रहा। एक तो कई महीने घूमने-फिरने के बाद प्रमोशन की फाइल क्लियर हो पाई। और अब एडिशनल एसपी बन जाने के बाद भी काम डीएसपी का करना पड़ रहा है। बात छोटी मगर महत्वपूर्ण है। इससे पता चलता है कि सिस्टम कितना चुस्त है।

सरकार को क्रेडिट नहीं

छत्तीसगढ के सरकारी स्कूलों में 50 लाख से अधिक बच्चे पढ़ते हैं। सरकार उन्हें मुफ्त में पुस्तकें मुहैया कराती है। याने इन आधा करोड़ परिवारों से सरकार सीधे कनेक्ट होती है। मगर लालफीताशाही के चलते पिछले कुछ सालों में पाठ्य पुस्तक निगम का सिस्टम ऐसा डिरेल्ड हुआ कि दिसंबर तक किताबों का वितरण कंप्लीट नहीं हो पा रहा। आखिर करीब 200 करोड़ रुपए जब इस पर खर्च हो रहा है तो क्या ऐसा नहीं किया जा सकता कि अप्रैल में स्कूल खुलने से पहले किताबें शालाओं में पहुंच जाएं। मगर दुर्भाग्यजनक यह है कि सिस्टम का फोकस स्कूल शिक्षा जैसे विभागों पर नहीं होता। वरना, प्रॉपर मानिटरिंग की जाए तो टाईम पर पुस्तकें स्कूल में पहुंच जाएंगी और सरकार को क्रेडिट भी मिलेगा।

एमडी को डबल चार्ज

सरकार ने जिस तरह हेल्थ को ठीक करने के लिए डायरेक्टर और एनएचएम में अलग-अलग आईएएस अधिकारी बिठाया है, उसी तरह बच्चों को टाईम पर पुस्तकें उपलब्ध हो जाए, इसके लिए समग्र शिक्षा और पाठ्य पुस्तक निगम में अलग-अलग एमडी पोस्ट करना चाहिए। दोनों में एक अफसर को बिठाने का नुकसान यह होता है कि फोकस समग्र शिक्षा पर हो जाता है। सही भी है...समग्र का बजट 2000 करोड़ का है। जाहिर है, बजट बड़ा तो मलाई भी ज्यादा ही होगा। उधर, पापुनि का 200 करोड़ का बजट, उसमें भी कई लेवल की नेतागिरी। हालांकि, पापुनि निर्धनता की केटेगरी में नहीं आता...15 परसेंट के हिसाब से लगभग 30 खोखा का बन जाता है। मगर उसमें चार-से-पांच हिस्से लगते हैं। समग्र शिक्षा में ये हिस्से वाला मामला थोड़ा कम है। इसलिए जरूरी है कि पापुनि के लिए अलग से एमडी बनाया जाए।

पीसीसी चीफ को एक्सटेंशन?

पिछले विधानसभा चुनाव के बाद से पीसीसी चीफ दीपक बैज को हटाने की अटकलें चल रही हैं। एक बार तो बात इस लेवल तक पहुंच गई थी कि लगा कि किसी भी दिन टीएस सिंहदेव का आदेश निकल जाएगा। मगर दीपक ने ढाई साल का टेन्योर पूरा कर लिया। जुलाई 2026 में उनका तीन साल कंप्लीट हो जाएगा। सुनने में आ रहा...दीपक को अगर नहीं हटाया गया तो उनके साथ दो कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति हो सकती है। इसके लिए देवेंद्र यादव, उमेश पटेल, शिव डहरिया और प्रेमचंद जायसी का नाम चल रहा है। हालांकि, भीतर की खबर ये भी है कि उमेश पटेल कार्यकारी अध्यक्ष बनने के लिए तैयार नहीं। जुलाई में अगर दीपक बैच को हटाया गया तो अत्यधिक संभावना है कि टीएस सिंहदेव उनकी जगह लें। कांग्रेस के अंदरखाने में चर्चा इस बात का लेकर भी है कि विधानसभा में पार्टी की आक्रमकता बढ़ाने के लिए उमेश पटेल को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी सौंपी जा सकती है।

प्रमोशन पॉलिसी में खोट

गुड गवर्नेंस और वर्किंग कल्चर बनाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार कई स्तर पर काम कर रही है। इनमें ई-ऑफिस से लेकर डिजिटल अटेंडेंस तक शामिल है। सरकार को इसके साथ प्रमोशन में विसंगतियों को दूर करने पर भी काम करना चाहिए। खासकर, क्लास टू और क्लास थ्री लेवल पर। प्रमोशन पॉलिसी की विडंबना ही कहें कि मंत्रालय का भृत्य डिप्टी सिकरेट्री तक पहुंच जाता है मगर बाकी जगहों पर बाबू से बडा बाबू और सिपाही से प्रधान सिपाही बनने में सालों लग जाते हैं। कर्मचारियों, अधिकारियों से अगर बढ़ियां काम लेना है तो एचआर पॉलिसी को ठीक करना होगा। प्रमोशन देने से खजाने पर खास भार भी नहीं पड़ता। सीनियरिटी के हिसाब से वेतन लगभग प्रमोशन के रेंज में पहुंच ही जाता है। राज्य के भले के लिए सिस्टम को इस पर काम करना चाहिए।

रेल मंत्री के बैचमेट आईएएस

कचना इलाके में रहने वाले 50 हजार से अधिक लोग पिछले तीन साल से रेलवे ओवरब्रिज की समस्या से जूझ रहे हैं। पीडब्लूडी ने मार्च 24 का टारगेट रखा था। ठेकेदार ने टाईम पर इसे कंप्लीट नहीं किया। उपर से सर्विस रोड की हालत ऐसी दयनीय कि पूछिए मत! पीडब्लूडी के अफसरों ने ऐसा वाला काला चश्मा लगा रखा है कि उन्हें सिर्फ रुपिया दिखता है। आलम यह कि अभी रेलवे साइड का गार्डर लग नहीं पाया है। पूरा मामला इगो का है। रेलवे अधिकारी कोई पाकिस्तानी तो हैं नहीं कि उनसे बात नहीं की जा सकती। अफसर अगर रायपुर डीआरएम या बिलासपुर जीएम से एक बार बात कर लें तो प्राब्लम साल्व हो सकता है। वो भी नहीं तो 94 बैच के कई आईएएस छत्तीसगढ़ में हैं। खुद चीफ सिकरेट्री विकास शील। ऋचा शर्मा और मनोज पिंगुआ भी 94 बैच के हैं। इसी बैच के पूर्व आईएएस रेल मंत्री आश्वनी वैष्णव भी हैं। इन तीनों से रेल मंत्री को एक फोन ही काफी होगा। पीडब्लूडी के अधिकारी अगर लेटर-लेटर का खेल करते रहे तो फिर ये साल भी निकल जाए तो आश्चर्य नहीं।

सीएम, जीएम बराबर

राज्य में जो अधिकार मुख्यमंत्री को होता है, रेलवे में वही औरा जीएम का होता है। जीएम चाहे तो क्षेत्रीय जरूरतों का हवाला देते हुए नई लोकल ट्रेन चलवा सकता है, बाद में बोर्ड से एप्रूवल मिल जाता है। सौभाग्य से देश में सबसे अधिक आमदनी देने वाले रेलवे जोन के जीएम बिलासपुर में बैठते हैं। कोआर्डिनेशन अगर ठीक रहता तो दुर्ग से रायपुर के बीच एक 24 कैरेट वाली ट्रेन तो चल ही सकती थी। 24 कैरेट मतलब जिसकी टाईमिंग पर यात्रियों को भरोसा रहे। जब बिलासपुर रेलवे जोन नही बना था, डिवीजन था, तब का एक वाकया बताते हैं। पूर्व मंत्री और कोटा विधायक राजेंद्र प्रसाद शुक्ल को बिलासपुर से पेंड्रा के बीच ट्रेन शुरू करानी थी। कार्यकर्ताओं को लेकर वे खुद ही डीआरएम से मिलने पहुंच गए। डीआरएम ने इधर-उधर से रैक का इंतजाम कर महीने भर के भीतर बिलासपुर-पेंड्रा के बीच ट्रेन चलवा दी थी।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. दुर्ग आईजी रामगोपाल गर्ग को पुलिस कमिश्नर बनाए जाने की चर्चा से रायपुर पुलिस के लोग क्यों घबराए हुए हैं?

2. क्या आईपीएस अंकित गर्ग और बद्री मीणा में से कोई दुर्ग पुलिस रेंज का आईजी बनेगा?