तरकश, 20 सितंबर 2026
संजय के. दीक्षित
प्रशासन में उल्टी गंगा
छत्तीसगढ़ के राजस्व केसों में अंधेर नगरी जैसा हाल हो गया है। आम आदमी इस उम्मीद से तहसील कोर्ट के फैसलों के खिलाफ कलेक्टर और कमिश्नर कोर्ट में अपील करता है कि उसे न्याय मिलेगा, मगर कमोवेश सभी जगहों पर देखने में आ रहा कि ये साहबान लोग उसे बिना कोई निर्णय किए नीचे के अधिकारियों को लौटा दे रहे। जबकि, भू-राजस्व संहिता 49 की धारा 3 में स्पष्ट उल्लेख है कि अपीलीय प्राधिकारी याने कलेक्टर, कमिश्नर राजस्व केसों को पुनर्विचार या फिर से निर्णय करने के लिए केस को नीचे कदापि नहीं भेज सकते। उन्हें हर हाल में अपना फैसला देना होगा। केस की सुनवाई में अगर उन्हें कुछ और डक्यूमेंट की जरूरत होगी तो वे खुद ही तलब करेंगे...और अपने स्तर पर ही उसका निबटारा करेंगे। मगर छत्तीसगढ़ में राम राज है। कोई देखने वाला है नहीं...स्थिति यह है कि 90 परसेंट से अधिक केसेज कलेक्टर, कमिश्नर अपने अधीनस्थ अफसरों को लौटा दे रहे। इससे तहसील कार्यालयों में केसों की पेंडेंसी लगातार बढ़ती जा रही। दरअसल, सूबे के कलेक्टरों और कमिश्नरों ने अपनी जिम्मेदारी से बचने का ये तरीका निकाला है...अब आम आदमी भटकता रहे, उन्हें क्या फर्क पड़ना। आगे जब भी कलेक्टर कांफ्रेंस हो, इसे एजेंडा में शामिल करना चाहिए कि कितने अपीलीय प्राधिकारी ने अपील के कितने मामलों को निबटारा किया और कितने को नीचे वापिस किया, चौंकाने वाली संख्या सामने आएगी।
बड़े मियां तो बड़े मियां...
वो युग चला गया, जब कलेक्टर, कमिश्नर राजस्व मामलों के गहरी दिलचस्पी लेते थे। कलेक्टर साल में एकाध बार ब्लॉकों में पहुंुचकर खुद ही डक्यूमेंट चेक कर लेते थे। मगर अब के कलेक्टरों को राजस्व से कोई वास्ता नहीं। गलती उनकी भी नहीं। अब डीएमएफ में इतना पैसा आ गया है कि बेचारे कलेक्टर उसी गुनतारे में व्यस्त रहते हैं कि उसे खर्च कैसे करें। खैर बात मुद्दे की। छत्तीसगढ़ सरकार ने जमीन या संपत्ति की रजिस्ट्री के बाद ऑटो नामंतरण जैसा बड़ा रिफार्म किया है। मगर राजस्व विभाग उसे सफल होने दें तब तो! पिछले हफ्ते इसी स्तंभ में हमने बताया था कि किस तरह प्रायोजित आपत्तियां लगाकर नामंतरण रोका जा रहा। इसमें नया अपडेट यह है कि रजिस्ट्री के बाद आटो नामंतरण हो भी गया तो पटवारी अपना रिकार्ड नहीं सुधारता। पटवारी या तहसील ऑफिस में आप जाएंगे तो कहा जाएगा कि त्रुटि सुधार का आप्लीकेशन लगाइये। याने त्रुटि राजस्व विभाग का और आवेदन करें भुक्तभोगी व्यक्ति। उपर से बिना चढ़ावा कुछ होगा नहीं। याने सरकार कोई भी रिफार्म कर लें, आपको पटवारी के पास जाना ही होगा।
नाम चढ़ाने का 27 लाख
एक बड़े जिले का मामला है...एक रोड कंट्रेक्टर ने करीब 54 करोड़ में 20-22 एकड़ जमीन परचेज किया। जमीन की रजिस्ट्री हो गई। नाम भी चढ़ गया। मगर उसे ऑनलाइन करने के लिए राजस्व महकमा अड़ गया, क्योंकि सामने वाला बड़ा आसामी था। ठेकेदार को डर था कि इतना बड़ा सौदा है...राजस्व विभाग कहीं किसी मामले में उलझा दिया या दोबारा किसी की रजिस्ट्री करवा दिया...जैसा की आमतौर पर होता है...तो बड़ी चपत लग जाएगी। थक हारकर उसे 27 लाख देना पड़ा, तब जाकर ऑनलाइन नाम चढ़ा।
बिहार में बड़ा मूवमेंट
बिहार की नई बीजेपी सरकार ने जमीनों को डिजिटल रिकार्ड दुरूस्त करने बड़ा अभियान चलाया है। 17 सितंबर से लेकर 31 अक्टूबर तक पूरे राज्य में स्पेशल कैंपेन चलाया जा रहा। इसके लिए वहां के सिस्टम ने कलेक्टरों को नोडल अधिकारी बनाया है...कलेक्टर रोज इसकी मॉनिटरिंग करेंगे। राजस्व विभाग से कहा गया है कि गांव में कैंप लगाकर रिकार्ड ठीक करें। अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गई तो उसके वास्तविक वारिस का नाम ऑनलाईन रिकार्ड में चढ़ना चाहिए। याने झगड़े की पूरी वजह ही खतम हो जाएगी। छत्तीसगढ़ में भी ऐसा कुछ करना चाहिए।
कलेक्टरों को मिशन मोड
जमीनों की रजिस्ट्री के साथ ऑटो नामंतरण के लोकार्पण कार्यक्रम में सीएम विष्णुदेव साय ने राजस्व अमले को यमराज से तुलना की थी। उन्होंने बताया...30 साल पहले जब वे विधायक थे, एक तहसीलदार ने उनके एक परिचित की जमीन का नामंतरण 18 साल से लटका कर रखा था...वे खुद मोटर सायकिल पर उसे बिठाकर तहसील ऑफिस गए और फिर नामंतरण करवाया। बहरहाल, पड़ोस के तेलांगना और ओड़िसा ने राजस्व मामलों में काफी बदलाव कर आम आदमी का काम आसान कर दिया। मगर छत्तीसगढ़ में पटवारी और तहसीलदार राज से लोगों को मुक्ति नहीं मिल रही तो इसकी बड़ी वजह प्रशासन तंत्र की कमजोरी है। सरकार ने ऑटो नामंतरण का ऐतिहासिक रिफार्म किया मगर राजस्व विभाग के जिम्मेदार लोगों ने कभी देखने की कोशिश नहीं की, इसमें राजस्व अमला किस तरह रोड़ा अटका रहा। सरकार अगर कलेक्टरों की एकाउंटबिलिट तय कर दें तो महीने भर में राजस्व विभाग का भ्रष्टाचार रुक जाएगा। इसके लिए एकाध कलेक्टरों को लटकाना पड़े, तो इसमें कोई हर्ज नहीं। क्योंकि, बिना कलेक्टर के संरक्षण के राजस्व विभाग का ये खेल कतई संभव नहीं।
लिटमस टेस्ट
छत्तीसगढ़ में चार नगर निगमों में चुनाव होना है। बीरगांव, भिलाई, रिसाली और भिलाई-चरौदा। ये चुनाव बीजेपी और कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न होगा। क्योंकि, चारों सीटें कांग्रेस के पास है और सत्ताधारी पार्टी की कोशिश होगी कि उसमें किस तरह सेंध लगाया जाए। बहरहाल, भिलाई इलाके के तीन नगर निगमों के चुनाव कांग्रेस के भूपेश बघेल और देवेंद्र यादव गुट के लिए भी लिटमस टेस्ट होगा। प्रत्याशी चयन में जिस गुट को ज्यादा मौका मिलेगा, और उसके नतीजे...2028 के विधानसभा चुनाव के राजनीतिक दिशा का संकेत देंगे। हालांकि, इसमें कोई संशय नहीं कि कांग्रेस में भूपेश बघेल गुट इस समय सबसे स्ट्रांग है। मगर भूपेश के शिष्य रहे देवेंद्र यादव उन्हें लगातार टक्कर दे रहे हैं। अलबत्ता, देवेंद्र यादव का राजनीतिक कैनवास अभी स्टेट लेवल नहीं हुआ है मगर यादवों के साथ सतनामी समुदाय में उनकी पैठ बढ़ी है। फिर, कांग्रेस की सियासत में दिल्ली कनेक्शन का बड़ा रोल होता है...और देवेंद्र ने ये काम वहां ठीकठाक कर लिया है। फिलहाल ये देखना दिलचस्प होगा कि प्रत्याशी चयन में कौन गुट भारी पड़ता है।
कलेक्टर, एसपी की ये कैसी ट्रेनिंग?
पीएम आवास का प्रोग्राम सक्ती में क्यों रखा गया, ये अलग प्रश्न है मगर केंद्रीय पंचायत मिनिस्टर शिवराज सिंह की मौजूदगी में काले झंडे से लेकर जिस तरह हूटिंग हुई, वह प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय है। दरअसल, कार्यक्रम ऐसा नहीं था कि उसे मैनेज नहीं किया जा सके। चूकि जांजगीर और सक्ती कांग्रेस का गढ़ है...बीजेपी के एक भी विधायक वहां नहीं, सो जैसी सतर्कता बरतनी चाहिए थी, वो हुआ नहीं। सिस्टम को चाहिए कि जिले में कलेक्टर या एसपी बनाने से पहले किसी अच्छे कलेक्टर या एसपी के अंदर में रख एकाध महीने की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। वो इसलिए कि आजकल एडीएम या अपर कलेक्टर वाला सिस्टम खतम हो गया है। 80 परसेंट कलेक्टर्स, एसपी को लॉ एंड आर्डर फेस करने का तजुर्बा नहीं। सक्ती में जिन्हें कलेक्टर बनाया गया, वे लंबे समय तक मुख्य सचिव की स्टाफ अफसर रहीं। फील्ड में कब पोस्टिंग की, शायद उन्हें भी याद नहीं होगा। बिलासपुर में जिला पंचायत सीईओ बनाया गया तो चार महीने में ही छुट्टी पर चली गई, फिर सरकार को पोस्टिंग बदलनी पड़ी। अब उन्हें सीधे नेता प्रतिपक्ष के जिले में भेज दिया गया। हालांकि, छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक इनोवेशन पर काफी काम हो रहा। कलेक्टर बनाने से पहले आईएएस अधिकारियों को एडीएम की एक पोस्टिंग देने की परंपरा फिर शुरू करनी चाहिए। वरना, वही होगा कि बलौदा बाजार में हिंसा की घटना हुई तो कलेक्टर जिला छोड़ भाग निकले थे...अभी भी स्थिति बदली नहीं है। इस तरह की कोई नौबत आए तो कितने कलेक्टर, एसपी फ्रंट पर टिक पाएंगे, सिस्टम में बैठे लोगों को इसे सनद रखना चाहिए।
झारखंड से दीये
पीएम नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर दीये जलाने का टारगेट तो कलेक्टरों ने बढ़-चढ़कर दे दिया मगर दीयों का बंदोबस्त करने में उनके पसीने छूट गए। दरअसल, कुम्हार बरसात बाद दिवाली के लिए दीये बनाने प्रारंभ करते हैं। इसलिए दीये का स्टॉक था नहीं। उपर से मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और बीजेपी कार्यकर्ताओं में दीये खरीदने की होड़ मच गई। सो, बाजार से दीये पहले ही खतम हो गए थे। कलेक्टरों के समक्ष दिक्कत ये भी थी...लाख रुपए का बजट मिला, उपर से सवा लाख दीये का टारगेट...और मार्केट से दीये नदारत। कई कलेक्टरों ने झारखंड तक आदमी दौड़ाए। झारखंड में गैर बीजेपी सरकार है, इसलिए वहां दीयों की उतनी डिमांड नहीं रही। कुल मिलाकर पर्सनल एप्रोच लगाकर कलेक्टरों ने ठीकठाक दीये जलवा लिए।
24 आईएएस डेपुटेशन पर
छत्तीसगढ़ में एक वो भी टाईम था, जब दो आईएएस सेेंट्रल डेपुटेशन पर होते थे। एक सुनिल कुमार और दूसरा बीवीआर सुब्रमणियम। सुब्रमणियम तो राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ आए ही नहीं थे, सो उनका काउंट भी नहीं होता था। याने एक ही डेपुटेशन माने। मगर धीरे-धीरे अफसरों की संख्या बढ़ी तो प्रतिनियुक्ति में भी उसी के अनुरूप इजाफा हुआ। इस समय पूरे 24 आईएएस अधिकारी डेपुटेशन पर हैं। इनमें 93 बैच के दूसरे नंबर के सबसे सीनियर आईएएस अमित अग्रवाल भी शामिल हैं। 2011 बैच के नीलेश श्रीरसागर भी डेपुटेशन के लिए ट्राई कर रहे थे, मगर अब डायरेक्टर अर्बन की पोस्टिंग मिलने का मतलब है, वे अब शायद ही जाएं। मगर 2012 बैच के दो-तीन आईएएस अगले साल जरूर दिल्ली का रुख करेंगे। उससे पहले बहुत संभावना है कि दिसंबर तक अंकित आनंद भी दिल्ली जाएं। यानी संख्या और बढ़नी ही हैं। खैर, भारत सरकार ने ज्वाइंट सिकेट्री बनने के लिए सेंट्रल डेपुटेशन अनिवार्य कर दिया है। मगर दिक्कत यह है कि चुनिंदा अफसरों को ही केंद्र क्लियरेंस देता है। छत्तीसगढ़ से 24 आईएएस दिल्ली गए हैं, उनमें से कम-से-कम 15 तो काफी अच्छे अफसर होंगे। इससे राज्य को नुकसान तो होता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में और भी...जहां रीढ़ सीधा करके काम करने वाले अफसरों की बड़ी जरूरत है।
हफ्ते का कोट
ज़मीर ज़िंदा रख...कबीर ज़िंदा रख...सुल्तान भी बन जाए तो दिल में फ़कीर ज़िंदा रख। हौंसले के तरकश में कोशिश का वो तीर ज़िंदा रख...हार जा चाहे ज़िन्दगी में सब कुछ, मगर फिर से जीतने की उम्मीद ज़िंदा रख।
अंत में दो सवाल आपसे?
1. जिन 12 जिलों में महिलाओं को कलेक्टर बनाया गया है, उनके परफार्मेंस के बारे में पब्लिक ओपिनियन क्या हैं?
2. मंत्री अगर सूटकेस के वजन को पोस्टिंग का पैरामीटर बना लेंगे तो क्या छत्तीसगढ़ में वर्किंग कल्चर डेवलप होने की कल्पना करनी चाहिए?




