तरकश, 26 जुलाई 2026
संजय के. दीक्षित
छत्तीसगढ़ और पेपर लीक
पेपर लीक की बात करें, तो छत्तीसगढ़ के लोगों के भी अनुभव अच्छे नहीं रहे हैं। बात 2010 की है, जब पीएमटी होता था। तखतपुर के एक हॉल में 27 बच्चों को पेपर लीक कर उन्हें आंसर सॉल्व कराया जा रहा था। उनमें मुंगेली निवासी अविभाजित मध्यप्रदेश के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री की पोती भी शामिल थी। पुलिस ने छापा मारा मगर बिना किसी ठोक कार्रवाई के केस को रफा-दफा कर दिया गया। उससे पहले 2007 में पीएमटी का टॉपर भी फर्जी निकला था। उसकी जगह दूसरे छात्र ने परीक्षा दी। पुलिस ने मेडिकल स्टूडेंट कोे गिरफ्तार कर जेल भेजा। मगर केस इतना कमजोर बनाया गया कि कुछ दिन बाद उसकी जमानत मिल गई। और फर्जीवाड़ा करने वाला छात्र डॉक्टरी पास कर आराम से यहां से निकल गया। उधर, 12वीं बोर्ड की टॉपर पोरा बाई को भला कौन नहीं जानता। परीक्षा से पहले ही पोरा बाई को पेपर मिल गए थे। वे घर से किसी और से उत्तर पुस्तिका लिखवा कर लाई और मेरिट में प्रथम स्थान हासिल कर लिया। उसमें भी कुछ खास नहीं हुआ। जेल से छूटकर वह शिक्षिका बन गई। बाकी 2003 और 2021 के पीएसस में क्या हुआ, ये बताने की आवश्यकता नहीं।
दो गए, सात आए
पुलिस महकमे में अफसरों की संख्या इतनी अधिक हो गई है कि अब बैठने के लिए जगह का टोटा पड़ गया है। दरअसल, आईपीएस के ट्रांसफर में दो आईपीएस को फील्ड में शिफ्ट किया गया। बद्री मीणा बस्तर आईजी बनें तो सुनील शर्मा सारंगढ़ एसपी। इन दो अफसरों की जगह सरकार ने सात आईपीएस अधिकारियों को पीएचक्यू बुला लिया। दो आईजी और पांच डीआईजी, एसपी। इनमें बालाजी सोमावार, प्रशांत अग्रवाल, रामकृष्ण साहू, राजेश कुकरेजा, भावना गुप्ता, रवि कुर्रे जैसे आईपीएस शामिल हैं। उसमें भी बद्री मीणा के चेंबर खाली करते ही उसमें संविदा पोस्टिंग वाले सुशील शुक्ला ने कब्जा जमा लिया। अब डीजीपी अरुणदेव गौतम के लिए सिरदर्द हो जाएगा अफसरों को कहां बिठाएं। याने जो हालत मंत्रालय की है, वहीं स्थिति अब पीएचक्यू की होने वाली है।
15 अगस्त को ऐलान
इसी साल 23 जनवरी को देर शाम रायपुर में सूबे के फर्स्ट पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम को आधे-अधूरे ढंग से लागू किया गया था। जाहिर है, रायपुर एयरपोर्ट, कैपिटल सिटी याने नवा रायपुर समेत उरला, उरकुरा जैसे इंडस्ट्रियल इलाका इससे अछूता रह गया था। मगर अब लगता है, सिस्टम के भीतर इस चूक को दुरुस्त करने पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जा रहा है। तभी डीजीपी अरुणदेव गौतम ने सरकार को इस संदर्भ में पत्र लिखा है। अब डीजीपी ने खुद से पत्र लिखा या लिखवाया गया, ये अलग विषय है। सवाल है कंप्लीट पुलिस कमिश्रेट बनाने का, तो लगता है 15 अगस्त को सरकार इसका ऐलान कर सकती है, और लगे हाथ बिलासपुर में भी पुलिस कमिश्नरेट बनाने की घोषणा हो सकती है। अंदरखाने की खबर है, विधानसभा चुनाव के पहले तक रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग, तीनों पुलिस कमिश्रेट बन जाएंगे। पोलिसिंग की दिशा में राज्य सरकार का यह बड़ा रिफार्म होगा।
कलेक्टरी, कप्तानी का क्रेज
रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग, छत्तीसगढ़ के टॉप के तीन जिलों में आते हैं। खासकर, कलेक्टरी या एसपी की पोस्टिंग की दृष्टि से इन तीनों जिलों का बड़ा क्र्रेज रहता है। मगर रायपुर के बाद बिलासपुर और दुर्ग भी पुलिस कमिश्रेट बन गया तो फिर एसपी का पद समाप्त हो जाएगा, कलेक्टरों का रुतबा भी घट जाएगा। विदित है, पुलिस कमिश्नरेट बन जाने के बाद कलेक्टरों के कई अधिकार पुलिस कमिश्नर को शिफ्ट हो जाते हैं। इसलिए, छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश की ब्यूरोक्रेसी इस पक्ष में नहीं रहती कि पुलिस कमिश्नरेट बनाया जाए। मगर वक्त की जरूरत को देखते अधिकांश राज्यों में पुलिस कमिश्रेट सिस्टम का विस्तार प्रारंभ हो गया है।
एसएएस की लिस्ट
राज्य प्रशासनिक सेवा के 19 अधिकारियों का बीते दिनों सरकार ने ट्रांसफर किया। मगर चर्चा है, एक लिस्ट और तैयार हो रही है। दरअसल, राप्रसे अधिकारियों की लिस्ट लंबे समय से प्रतीक्षित थी। सरकार ने ज्यादा ही जरूरी वाले अफसरों का तबादला कर दिया। खासकर लंबे समय वाले जिला पंचायत के कई सीईओ के। चूकि वो लिस्ट कंप्लीट नहीं थी...राप्रसे अफसरों की संख्या 500 से क्रॉस कर गई है, इस दृष्टि से 19 की संख्या कुछ भी नहीं है। लिहाजा, एक बड़ी लिस्ट की अटकलें बड़ी तेज है।
समरथ को नहीं दोष गोसाई
छत्तीसगढ़ में अगर साम्यर्थ है तो कुछ भी असंभव नहीं है। एक राप्रसे अधिकारी ने जनपद सीईओ रहते शिक्षकों के एरियर्स के नाम पर 14 करोड़ रुपए का कांड कर दिया। स्कूल शिक्षा विभाग की जांच रिपोर्ट में स्पष्ट तौर से राप्रसे अधिकारी को दोषी बताया गया। शिक्षाकर्मियों को संविलियन के बाद सरकार ने एरियर्स का कोई प्रावधान नहीं किया था और न ही किसी को दिया गया। मगर सीईओ साब ने मिलीजुली कुश्ती कर कमाल कर दिया...खजाने से 14 करोड़ रुपए गोल कर डाला। खैर, 2022 में इसकी शिकायत हुई मगर कुछ भी नहीं हुआ। सितंबर 2025 में विकास शील चीफ सिकरेट्री बनें तो उनके सामने यह मसला पहुंचा। उन्होंने अर्जेंट जांच करने का आदेश दिया। मगर अफसर की पहंुच देखिए, स्कूल शिक्षा विभाग ने तब तक फाइल को दबाए रखा, जब तक राप्रसे अधिकारी को आईएएस अवार्ड नहीं हो गया। हालांकि, आईएएस बन जाने के बाद भी जांच की फाइल अभी भी कछुआ चाल में रेंग रही है। हो सकता है कि आईएएस के किसी जिले के कलेक्टर बनते तक फाइल रेंगती रह जाए। ये वहीं अफसर हैं, जो एसडीएम रहते एनटीपीसी के जमीन अधिग्रहण में 500 करोड़ का खेला कर दिए थे। सरकार ने न केवल उन्हें सस्पेंड किया था बल्कि कलेक्टर ने अपराध दर्ज कराया था। लंबे समय तक वे फरार रहे। पिछले जीएडी सिकेट्री ने उन्हें बिना जांच क्लीन चिट देने से मना किया तो उनका विकेट उड़ गया। नए सिकेट्री ने विवादित क्लीन चिट दिया और इसका नतीजा यह हुआ कि उन्हें आईएएस अवार्ड हो गया।। बहरहाल, चीफ सिकेट्री दिल्ली से आए या मनीला से, ऐसे साम्यर्थवान अफसरों के खिलाफ कौन कार्रवाई कर सकता है।
संयोग और हार्ड लक
आईएएस में दूसरे नंबर के सबसे सीनियर अफसर सुब्रत साहू और आईपीएस के सबसे वरिष्ठ अधिकारी पवन देव के साथ संयोग ये है कि दोनों न केवल 92 बैच वाले हैं, बल्कि दोनों एक का बर्न भी एक ही मंथ में है। दोनों जुलाई 1968 वाले हैं। जाहिर है, 60 साल के हिसाब से 31 जुलाई 2028 को एक साथ रिटायर होंगे। दोनों अगर चीफ सिकेट्री और डीजीपी बनते तो एक ही दिन सूबे की दोनों शीर्ष कुर्सी वैकेंट हो जाती। खैर, दोनों के साथ हार्ड लक ये रहा कि दोनों राज्य के सबसे बड़े चेयर पर बैठने से चूक गए। सुब्रत साहू मुख्य सचिव बनते-बनते रह गए। उधर, पवन देव के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। बैचवाइज देखें तो 92 बैच में पवनदेव नंबर वन पर हैं। उनके बाद अरुणदेव गौतम आते हैं। मगर हाथ की लकीरों का खेल है। सुब्रत इस समय राजस्व बोर्ड के चेयरमैन हैं तो पवनदेव पिछले साढ़े छह साल से पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन में बैठे हैं। हालांकि, पुलिस महकमे में ऐसा नहीं कि डीजी लेवल के और पद नहीं हैं। मगर फिर वही, बात मुकद्दर की...। हथेली की रेखाएं अगर बदलेगी तो सिस्टम का ध्यान अपने आप उनके तरफ चला जाएगा।
रेपिस्ट बाबा, शिष्य कुलपति
राजधानी रायपुर में पिछले दिनों एक बाबा खम्हारडीह पुलिस के हत्थे चढ़ गए। उन पर आरोप है कि उन्होंने तंत्र-मंत्र का झांसा देकर अनेक महिलाओं के साथ दुष्कर्म किया। बाबा की गिरफ्तारी के बाद रायपुर के एक बड़ी यूनिवर्सिटी के कुलपति मुंह छिपाते फिर रहे हैं। असल में, विद्वान कुलपति को बाबा पर इतना विश्वास था कि दो खोखा देने के बाद भी उन्हें लगता था कि बाबा के चलते ही कुलपति बन पाए। सो, बाबा के साथ फेसबुक पर उनकी फोटुएं अटी पड़ी हुई थी। कभी पत्नी के साथ बाबा के पांव पखारते, तो कभी उनके चरणों को पकड़े हुए। मगर उनकी आस्था तब खतरे में पड़ गई, जब पुलिस ने बाबा के स्कैंडल का भंडाफोड़ कर दिया। लानत है, समाज में पढ़े-लिखे विद्वान माने जाने वाले कुलपति साहबान अंधभक्ति में बाबाओं को नहीं पहचान पाते, तो फिर विद्यार्थियों की प्रतिभाओं को क्या समझेंगे?
आईएएस का डबल डिमोशन?
आईएएस संतोष देवांगन का ग्रह-नक्षत्र ऐसा बिगड़ा कि दो महीने में डबल डिमोशन हो गया। एक तो उन्हें दो महीने में ही कलेक्टरी से हटाकर मंत्रालय भेज दिया गया और दूसरा, यहां से जब कलेक्टर बन जीपीएम गए थे, तब वे हायर एजुकेशन में कमिश्नर थे और अब उन्हें स्कूल शिक्षा में स्पेशल सिकेट्री पोस्ट किया गया है। याने हायर एजुकेशन से स्कूल एजुकेशन। हालांकि, पोस्टिंग की दृष्टि से इसे डिमोशन नहीं माना जाता...हायर एजुकेशन से ज्यादा पूछपरख वाला विभाग स्कूल एजुकेशन माना जाता है। मगर इसे डिमोशन बता चुटकी लेने से लोगों का मुंह कैसे बंद किया जा सकता है।
जूनियर को सैल्यूट
पिछले दिनों आईपीएस के ट्रांसफर हुए। उसमें एक केस ऐसा आया, जिसमें सीनियर अफसर अब अपने से दो बैच जूनियर को रिपोर्ट करेगा। बात छत्तीसगढ़ आर्म्स फोर्स की कर रहे हैं। दरअसल, 2010 बैच के आईपीएस शंकर बघेल 16वीं बटालियन के कमांडेंट हैं। उनके उपर 2012 बैच की श्वेता राजमणि को आर्म्स फोर्स का डीआईजी बनाया गया है। ऐसे में, बघेल की स्थिति समझी जा सकती है...उन्हें अब श्वेता को सैल्यूट ठोकना पड़ेगा।
एमडी की नियुक्ति और मुश्किलें
फॉरेस्ट में दो अहम नियुक्तियां होनी है। वन विकास निगम के एमडी प्रेम कुमार और लघु वनोपज संघ से अनिल साहू 31 जुलाई को रिटायर हो जाएंगे। इसमें प्रश्न यह नहीं कि दो शीर्ष अफसर सेवानिवृत्त होने वाले हैं। मसला ये है कि सरकार के पास विकल्प का टोटा है। ये दोनों पद पीसीसीएफ लेवल का है और इस स्तर के अफसर हैं नहीं। अगर एडिशनल पीसीसीएफ लेवल की बात करें तो उसमें भी कमोवेश यही स्थिति है। देखना है, अब सरकार संजीता गुप्ता और अमरनाथ प्रसाद में से विकल्प ढूंढती है या इन दोनों संस्थाओं को और जूनियर अफसरों के हवाले करती है।
अंत में दो सवाल आपसे?
1. किस जिले के कलेक्टर दोनों हाथ से पैसा कमाने और अपने प्रेयसी पर लुटाने के लिए कुख्यात होते जा रहे हैं?
2. सरगुजा और सुकमा में कप्तानी और राजभवन में एडीसी रहने के बाद भी आईपीएस सुनील शर्मा को सारंगढ़ जैसे नए और छोटे जिले का एसपी क्यों बनाया गया?
