तरकश, 18 अक्टूबर 2026
संजय के. दीक्षित
डेटा का खेल, CM की खरी-खरी
सीएम विष्णुदेव साय ने शुक्रवार को सीएम हेल्पलाईन का रिव्यू किया। इसमें सभी जिलों के कलेक्टर भी वर्चुअली कनेक्ट थे। कुछ जिलों में काफी अच्छे काम हुए हैं मगर कई जिलों में शिकायतों की पेंडेंसी देख सीएम तल्ख हो गए। खासकर, राजस्व मामलों को लेकर...सीमांकन, बटांकन के मामले कई जिलों में बरसों से लंबित पड़े हैं। लोगों ने सीएम हेल्पलाइन में कांप्लेन दर्ज कराया, इसके बाद भी कलेक्टरों ने सुध नहीं ली। उल्टे, रिव्यू के दौरान कुछ कलेक्टरों ने आंकड़ों के जरिये भरमाने का प्रयास किया। इस पर सीएम बोले...डेटा का खेल मत कीजिए...सीएम हेल्पलाईन का निबटारा टाईम लिमिट में होना चाहिए। उन्होंने कवर्धा जिले के एक तहसीलदार को मीटिंग में ही सस्पेंड कर दिया तो एक जिले के तहसीलदार को शोकाज नोटिस जारी किया गया। बताते हैं, कलेक्टरों को यह अनुमान नहीं था कि सीएम सीधे हेल्पलाइन का रिव्यू करेंगे और वो भी कलेक्टरों को कनेक्ट करके। कलेक्टरों को जैसे ही खबर मिली दिन-रात एक कर डेटा का खेल करने का प्रयास किया मगर फिर भी कई पकड़े गए। इसमें सबसे अहम बात यह है कि सीएम ने कहा कि वे अब हर महीने हेल्पलाईन का रिव्यू करेंगे। उधर, रिव्यू के अगले दिन अवकाश होने के बाद भी सीएम सचिवालय हरकत में आया और 13 अफसरों को इसी मामले में नोटिस जारी करवा दिया। खैर, इस स्तंभ में हमने कई बार लिखा है कि कलेक्टर राजस्व मामलों में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं लेते। न वे कोर्ट में बैठते और न कभी तहसील की तरफ झांकने का कष्ट करते। कलेक्टर अगर चाह लें तो महीने भर के भीतर सारे मामले खतम हो जाएंगे, जिसको लेकर लोग सालों से भटक रहे, या फिर लड़ाई-झगड़ा, फसाद, कोर्ट-कचहरी करना पड़ता है। चलिये, अब हर महीने रिव्यू के बाद राजस्व अमले की मनमानी पर कुछ तो अंकुश लगेगा।
सरकारी अस्पताल में कलेक्टर
रायपुर से जस्ट लगे एक बड़े जिले के कलेक्टर की दो दिन पहले तबियत बिगड़ गई थी। उनके पेट में इंफेक्शन था। उन्होंने बड़े प्रायवेट अस्पताल में जाने की बजाए सरकारी हॉस्पिटल में जाना बेहतर समझा। उपचार के बाद अगले दिन वे डिस्चार्ज हो गए। हालांकि, किसी भी चीज के दो पहलू होते हैं। पहला, कलेक्टर को भला क्या दिक्कत हुई होगी...उनके लिए पूरा सिस्टम बिछ गया होगा। या फिर यह...उन्होंने दिखावे के लिए सरकारी अस्पताल को चुना। मगर दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कलेक्टर के अस्पताल में रहने से कम-से-कम दो दिन वहां की व्यवस्था दुरूस्त हो गई होगी। इसी तरह वीआईपी, वीवीआईपी अगर सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए पहुंचने लगे तो निश्चित तौर पर सरकारी अस्पतालों के सिस्टम में सुधार आएगा। डॉक्टर टाईम पर ओपीडी में बैठने लगेंगे, दवाइयां उपलब्ध हो जाएंगी...इसका लाभ कमजोर वर्ग के लोगों को मिलेगा। सो, कलेक्टर ने जो किया, अच्छा किया। बहुत गंभीर बीमारी न हो तो सक्षम और प्रभावशाली लोगों को सरकारी अस्पतालों का रुख करना चाहिए। उससे सरकारी सिस्टम पर आम आदमी का विश्वास बढ़ेगा।
फॉरेस्ट में पोस्टिंग
फॉरेस्ट में सीतानदी टाईगर रिजव से वरुण जैन को बदले जाने की खबर आ रही है। हालांकि, उन्हें डेपुटेशन पर एनआईए में दिल्ली जाना था। मगर अभी तक वहां से कुछ क्लियरेंस मिला नहीं। सो, अब उन्हें बदले जाने की कवायद प्रारंभ हो गई है। वे वहां करीब चार साल से पोस्टेड थे। वरुण को वन भूमि से अतिक्रमण हटाना महंगा पड़ गया। वरुण हटेंगे तो आईएफएस अधिकारियों का एक छोटा चेन बन ही जाएगा। उधर, रेंजर और रेंजर से प्रमोट हुए एसीएफ की पोस्टिंग भी अगले हफ्ते होने के संकेत मिल रहे हैं।
पीएससी चेयरमैन की नियुक्ति
जेन जी के आंदोलन के दौर में छत्तीसगढ़ में पीएससी चेयरमैन और मेंबर के पद पिछले दो महीने से खाली पड़े हुए हैं, यह सरकार के लिए चिंता का सबब बन गया है। दरअसल, भर्तियों को लेकर दागदार हो चुका पीएससी में सरकार किसी ठीकठाक व्यक्ति को बिठाना चाहती है मगर वो तलाश पूरी नहीं हो पा रही। अपुष्ट खबर है, अगले साल रिटायर होने वाली प्रदेश की सबसे सीनियर आईएएस रेणु पिल्ले से इसके लिए पूछा गया, मगर शायद वह तैयार नहीं हुईं। दूसरा कोई डायरेक्ट आईएएस इस समय रिटायर नहीं होने वाला। वैसे, 62 वर्ष वाले इस पोस्ट पर रिटायरमेंट के बाद कोई ब्यूराक्रेट्स आना नहीं चाहता क्योंकि 60 में रिटायर होने के बाद उसे दो साल ही मिलता है। डीजीपी मोहन शुक्ला, अशोक दरबारी, और आईएएस केएम पिस्दा नौकरी से वीआरएस लेकर चेयरमैन बने थे, इसलिए उन्हें पीएससी में ठीकठाक टाईम मिल गया था। मगर पोस्ट रिटायरमेंट के लिए बाकी अफसर पांच साल वाली पोस्टिंग को प्राथमिकता देते हैं। कुल मिलाकर ताजा अपडेट यह है कि अगले हफ्ते किसी भी दिन नए चेयरमैन और सदस्यों की नियुक्ति हो जाएगी। चेयरमैन की तलाश सरकार ने पूरी कर ली है। खबर है, कोई बढ़ियां पोस्टिंग होने वाली है।
ट्रांसफर में अब मनीराम नहीं?
छत्तीसगढ़ के कई मंत्रियों ने ट्रांसफर का शो-रुम खोल लिया था, उस पर अब ब्रेक लग सकता है। दरअसल, नव नियुक्त प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी से सूबे के एक बीजेपी लीडर सौजन्य भेंट करने गए थे। वहां जाने से पता चला कि प्रदेश प्रभारी को छत्तीसगढ़ आए बिना ही सब कुछ पता चल चुका है...कौन मंत्री क्या कर रहा है। जाहिर है, पिछली सरकार में ये खेल शुरू हुआ था, मगर इस समय एक कदम आगे वाली स्थिति है। पोस्टिंग के बाद अब हर साल रिचार्ज सिस्टम लागू हो गया है। स्थिति इतनी बदतर हो गई है कि पोस्टिंग से पहले बोली लग रही। अच्छे अफसर लूप लाईन में और खटराल अधिकारी मौज काट रहे। इससे सिस्टम की साख पर असर पड़ रहा...सरकार द्वारा किए जा रहे ऐतिहासिक सुधार के कार्य भी दब जा रहे। बहरहाल, ऐसे मंत्रियों की अब शामत आ सकती है...स्मृति किस अंदाज में बात करती है, बताने की जरूरत नहीं।
तीन नए डीजी और रोड़ा
छत्तीसगढ़ में तीन आईपीएस अफसरों को डीजी बनाए जाने की अटकलें बड़ी तेज हैं। यह जरूरत इसलिए पड़ रही कि डीजी बनने की 30 साल की एजिबिलिटी तीन आईपीएस अधिकारियों ने क्रॉस कर लिया हैं। एक तरह से कहा जाए, तो यह उनके साथ अन्याय है। खासतौर से एसआरपी कल्लूरी के साथ। सरगुजा से नक्सलियों का पैर उखाड़ने वाले 94 बैच के आईपीएस कल्लूरी को 2024 में ही डीजी बन जाना चाहिए था। उनके दोनों बैचमेट डीजी बन चुके हैं। मगर वे बेचारे अभी भी मुुंह ताक रहे। उनके अलावे 95 बैच के प्रदीप गुप्ता और 96 बैच के विवेकानंद का भी प्रमोशन ड्यू है। असल में दिक्कत यह है कि छत्तीसगढ़ में डीजी के पद चार ही हैं। दो कैडर और दो एक्स कैडर। इस पर अरुणदेव गौतम, पवनदेव, जीपी सिंह और हिमांशु गुप्ता पोस्टेड हैं। इनमें से गौतम के अगले साल जुलाई में रिटायर होने पर एक पद खाली होगा और दूसरा जुलाई 2028 में पवनदेव के जाने के बाद। बाकी जीपी और हिमांशु का रिटायरमेंट में काफी टाईम है। इसको देखते सरकार ने तय किया कि कल्लूरी, प्रदीप और विवेकानंद को स्पेशल डीजी बना दिया जाए। इसके लिए फाइल भी चली है मगर उसमें लिंगारान करने की कोशिशें शुरू हो गई हैं।
पुलिस का दुर्भाग्य या...?
पद खाली नहीं रहने पर राज्य सरकार को डीजी बनाने का अधिकार है। पंजाब में इस समय ऐसे 12 डीजी हैं। छत्तीसगढ़ में भी रमन सरकार ने 2029 में विधानसभा चुनाव के आचार संहिता के आधा घंटा पूर्व कैबिनेट के जरिये संजय पिल्ले, आरके विज और मुकेश गुप्ता को डीजी बनाया था। उस समय पिल्ले के लिए एक पद वैकेंट था मगर विज और गुप्ता के लिए पद नहीं था। अब सुनने में आ रहा कि नए डीजी के लिए ब्रेकर लगाए जा रहे हैं...भारत सरकार से अनुमति मांगने की बातें हो रही। उसके लिए पिछली सरकार का हवाला दिया जा रहा कि सरकार ने संजय पिल्ले, आरके विज और मुकेश गुप्ता को डिमोट कर दिया था। मुकेश गुप्ता जब कोर्ट गए तो सरकार ने तर्क दिया कि बिना केंद्र की अनुमति के डीजी बना दिए गए थे। मगर सवाल यह भी उठता है कि मुकेश गुप्ता का नाम उसमें अगर शामिल नहीं होता तो पिछली सरकार ऐसा करती क्या। कुल मिलाकर राज्य कैबिनेट चाहे तो दो साल के लिए डीजी बना सकता है। आखिर, इसी सरकार ने पद ना होने के बाद भी आईएफएस एसएस बजाज को पीसीसीएफ बनाया ही था। फिर अभी पिछले साल भी पीसीसीएफ के मामले में राज्य सरकार ने जब केंद्र से पूछा तो वहां से यही लिखकर आया, राज्य सरकार सक्षम है। कुल मिलाकर पुलिस महकमे का ये दुर्भाग्य कहें या नाकारापन कि केंद्र सरकार नक्सलियों के खात्मा करने को लेकर वाहवाही लूट रही, उस राज्य की पुलिस अपने अफसरों के लिए डीजी का पोस्ट क्रियेट नहीं करवा पा रही।
नाइंसाफी की पराकाष्ठा!
जब पुलिस मुख्यालय अपने सीनियर अफसरों के सम्मान का ध्यान नहीं रख रहा तो राज्य पुलिस सेवा और उसके नीचे वालों के बारे में भला कौन सोचने वाला है। राज्य पुलिस सेवा का हाल ये है कि 2005 बैच के सभी अफसर अभी आईपीएस नहीं बने हैं। जबकि, राज्य प्रशासनिक सेवा में 2013 बैच का आईएएस बनना प्रारंभ हो गया है। याने रापुसे अधिकारी राप्रसे से आठ साल पीछे चल रहे हैं। बाकी नीेचे वाले बेचारे टीआई, एसआई और सिपाही-हवलदार को कौन पूछता है। विडंबना तो ये है...ये तब हो रहा, जब छत्तीसगढ़ में अब तक के सबसे काबिल गृह मंत्री हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय में उनका सीधा कनेक्शन है। ऐसा लगता है, पुलिस वाले खुद भी इतनी गुटबाजी में व्यस्त हैं कि गृह मंत्री से समक्ष अपना पक्ष रख भी नहीं पाते होंगे। बहरहाल, पुलिस अफसरों को एक बार चीफ सिकेट्री को भी प्रेजेंटेशन देना चाहिए। सीएस आखिर पूरे राज्य के प्रशासनिक प्रमुख होते हैं। किसी भी विभाग का डीपीसी आरगेनाइज करने से लेकर कैबिनेट के पदेन सिकेट्री भी होते हैं।
पर्यटन और विप्र
पर्यटन विभाग को स्थापित करने का दायित्व सरकार ने ब्राम्हण अफसरों को सौंप दिया है। इस समय बोर्ड के चेयरमैन हैें नीलू शर्मा। एमडी बनाया गया है आईएएस सौमिल रंजन चौबे को। राज्य प्रशासनिक सेवा की अधिकारी पूनम शर्मा और पुष्पेंद्र शर्मा डीजीएम हैं। इनके नीचे भी कई ब्राम्हण अधिकारी अनुराधा दुबे, राकेश मिश्रा...पर्यटन बोर्ड में अहम दायित्व संभाल रहे हैं। पर्यटन बोर्ड में इस पर खूब चुटकी ली जा रही...पर्यटन को उबारने के लिए सरकार ने विप्र जनों को ही क्यों चुना?
ट्रांफसर पर यू टर्न
राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के ट्रांसफर में भले ही लेट हुआ मगर सिस्टम ने अच्छा काम किया। वरना, पहले तो 10 से 25 पेटी की बोली लग रही थी। सीएम सचिवालय ने लिस्ट पर पहले ब्रेक लगाया और फिर 150 अफसरों की लिस्ट जारी की तो उसे काफी एप्रिसियेट किया गया। उतनी बड़ी लिस्ट में आठ-दस ही एप्रोच, सिफारिश वाले होंगे। मगर कल शुक्रवार को जीएडी ने 18 अफसरों का संशोधित लिस्ट जारी किया, उसका मैसेज अच्छा नहीं गया। आखिर, रायपुर में चार साल से जमे कोई राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी को हटाया क्यों नहीं जाना चाहिए? ऐसे कई लोग सिफारिश की बदौलत अपना ट्रांसफर चेंज कराने में सफल हो गए। हो सकता है, इसके पीछे राजनीतिक मजबूरियां हों मगर उसके लिए भी कई तरीके हैं। चार-छह महीने बाद भी उन्हें चेंज किया जा सकता था।
मंत्रिमंडल में असंतुलन
25 अक्टूबर को नई प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी आ रही हैं। उनके दौरे का शेड्यूल आने के साथ ही मंत्रिमंडल में फेरबदल की अटकलें शुरू हो गई है। मंत्रिमंडल की सर्जरी में सबसे बड़ा इश्यू होगा रिजल्ट देने वाले चेहरों के साथ क्षेत्रीय असंतुलन को ठीक करना। अभी स्थिति यह है कि सरगुजा से चार मंत्री हैं, और बस्तर से सिर्फ एक। अगल-बगल की सीट से पार्टी ने दो-दो डिप्टी सीएम बना दिया। जाहिर है, लोरमी और कवर्धा लगभग लगा हुआ ही है। फिर उसी लोरमी से केेंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू भी। यही नहीं, विभागों के बंटवारे में भी यही स्थिति है। अब सर्जरी में बस्तर का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाएगा। हो सकता है, बस्तर से अब तीन मंत्री हो जाएं। सरगुजा में खतरा लक्ष्मी राजवाड़े और राजेश अग्रवाल को ज्यादा दिख रहा। अब स्मृति ईरानी की नजर तिरछी हो जाए तो बात अलग है वरना सरगुजा से श्याम बिहारी खुद को काफी मजबूत पोजिशन में कर लिए हैं। टंकराम वर्मा और दयालदास बघेल को लेकर भी डेंजर जोन का परसेप्शन बना हुआ है। मगर बीजेपी की सियासत में जब तक शपथ लेने वाले मंत्रियों की लिस्ट फायनल न हो जाए, तब तक गारंटी के साथ कुछ कहा नहीं जा सकता।
75 परसेंट विभाग बदलेंगे
जैसे की खबरें आ रहीं...मंत्रिमंडल में सिर्फ सर्जरी ही नहीं होगी, 75 परसेंट विभाग भी बदले जाएंगे। मंत्रियों के चेहरे बदलने के साथ विभाग बदलने का मकसद ये है कि आम आदमी को सिस्टम में बदलाव महसूस हो। और फिर यह भी कि जो मंत्री तीन साल में कुछ नहीं कर पाया अब डेढ़ साल में क्या ही कर लेगा। इससे अच्छा है कि उसका विभाग ही बदल दिया जाए। नया मंत्री कम-से-कम कुछ तो अच्छा करने का प्रयास करेगा।
हफ्ते का कोट
'जब आप दूसरों के लिए अच्छा चाहते हैं, तो वही अच्छी चीजें आपके जीवन में वापस आती है। यही प्रकृति का नियम है।' और, 'यदि कोई आपकी गलती आपके मुंह पर कहने की ताकत रखता है, तो उससे अच्छा मित्र और कोई हो नहीं सकता।'
अंत में दो सवाल आपसे?
1. क्या विष्णुदेव साय मंत्रिमंडल का कोई सदस्य बन सकता है बीजेपी का नया प्रदेश अध्यक्ष?
2. पीएससी का नया चेयरमैन अफसरशाही से होगा या कोई शिक्षाविद या टेक्नोक्रेट?