शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: डेटा का खेल, CM की खरी-खरी



तरकश, 18 अक्टूबर 2026

संजय के. दीक्षित

डेटा का खेल, CM की खरी-खरी

सीएम विष्णुदेव साय ने शुक्रवार को सीएम हेल्पलाईन का रिव्यू किया। इसमें सभी जिलों के कलेक्टर भी वर्चुअली कनेक्ट थे। कुछ जिलों में काफी अच्छे काम हुए हैं मगर कई जिलों में शिकायतों की पेंडेंसी देख सीएम तल्ख हो गए। खासकर, राजस्व मामलों को लेकर...सीमांकन, बटांकन के मामले कई जिलों में बरसों से लंबित पड़े हैं। लोगों ने सीएम हेल्पलाइन में कांप्लेन दर्ज कराया, इसके बाद भी कलेक्टरों ने सुध नहीं ली। उल्टे, रिव्यू के दौरान कुछ कलेक्टरों ने आंकड़ों के जरिये भरमाने का प्रयास किया। इस पर सीएम बोले...डेटा का खेल मत कीजिए...सीएम हेल्पलाईन का निबटारा टाईम लिमिट में होना चाहिए। उन्होंने कवर्धा जिले के एक तहसीलदार को मीटिंग में ही सस्पेंड कर दिया तो एक जिले के तहसीलदार को शोकाज नोटिस जारी किया गया। बताते हैं, कलेक्टरों को यह अनुमान नहीं था कि सीएम सीधे हेल्पलाइन का रिव्यू करेंगे और वो भी कलेक्टरों को कनेक्ट करके। कलेक्टरों को जैसे ही खबर मिली दिन-रात एक कर डेटा का खेल करने का प्रयास किया मगर फिर भी कई पकड़े गए। इसमें सबसे अहम बात यह है कि सीएम ने कहा कि वे अब हर महीने हेल्पलाईन का रिव्यू करेंगे। उधर, रिव्यू के अगले दिन अवकाश होने के बाद भी सीएम सचिवालय हरकत में आया और 13 अफसरों को इसी मामले में नोटिस जारी करवा दिया। खैर, इस स्तंभ में हमने कई बार लिखा है कि कलेक्टर राजस्व मामलों में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं लेते। न वे कोर्ट में बैठते और न कभी तहसील की तरफ झांकने का कष्ट करते। कलेक्टर अगर चाह लें तो महीने भर के भीतर सारे मामले खतम हो जाएंगे, जिसको लेकर लोग सालों से भटक रहे, या फिर लड़ाई-झगड़ा, फसाद, कोर्ट-कचहरी करना पड़ता है। चलिये, अब हर महीने रिव्यू के बाद राजस्व अमले की मनमानी पर कुछ तो अंकुश लगेगा।

सरकारी अस्पताल में कलेक्टर

रायपुर से जस्ट लगे एक बड़े जिले के कलेक्टर की दो दिन पहले तबियत बिगड़ गई थी। उनके पेट में इंफेक्शन था। उन्होंने बड़े प्रायवेट अस्पताल में जाने की बजाए सरकारी हॉस्पिटल में जाना बेहतर समझा। उपचार के बाद अगले दिन वे डिस्चार्ज हो गए। हालांकि, किसी भी चीज के दो पहलू होते हैं। पहला, कलेक्टर को भला क्या दिक्कत हुई होगी...उनके लिए पूरा सिस्टम बिछ गया होगा। या फिर यह...उन्होंने दिखावे के लिए सरकारी अस्पताल को चुना। मगर दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कलेक्टर के अस्पताल में रहने से कम-से-कम दो दिन वहां की व्यवस्था दुरूस्त हो गई होगी। इसी तरह वीआईपी, वीवीआईपी अगर सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए पहुंचने लगे तो निश्चित तौर पर सरकारी अस्पतालों के सिस्टम में सुधार आएगा। डॉक्टर टाईम पर ओपीडी में बैठने लगेंगे, दवाइयां उपलब्ध हो जाएंगी...इसका लाभ कमजोर वर्ग के लोगों को मिलेगा। सो, कलेक्टर ने जो किया, अच्छा किया। बहुत गंभीर बीमारी न हो तो सक्षम और प्रभावशाली लोगों को सरकारी अस्पतालों का रुख करना चाहिए। उससे सरकारी सिस्टम पर आम आदमी का विश्वास बढ़ेगा।

फॉरेस्ट में पोस्टिंग

फॉरेस्ट में सीतानदी टाईगर रिजव से वरुण जैन को बदले जाने की खबर आ रही है। हालांकि, उन्हें डेपुटेशन पर एनआईए में दिल्ली जाना था। मगर अभी तक वहां से कुछ क्लियरेंस मिला नहीं। सो, अब उन्हें बदले जाने की कवायद प्रारंभ हो गई है। वे वहां करीब चार साल से पोस्टेड थे। वरुण को वन भूमि से अतिक्रमण हटाना महंगा पड़ गया। वरुण हटेंगे तो आईएफएस अधिकारियों का एक छोटा चेन बन ही जाएगा। उधर, रेंजर और रेंजर से प्रमोट हुए एसीएफ की पोस्टिंग भी अगले हफ्ते होने के संकेत मिल रहे हैं।

पीएससी चेयरमैन की नियुक्ति

जेन जी के आंदोलन के दौर में छत्तीसगढ़ में पीएससी चेयरमैन और मेंबर के पद पिछले दो महीने से खाली पड़े हुए हैं, यह सरकार के लिए चिंता का सबब बन गया है। दरअसल, भर्तियों को लेकर दागदार हो चुका पीएससी में सरकार किसी ठीकठाक व्यक्ति को बिठाना चाहती है मगर वो तलाश पूरी नहीं हो पा रही। अपुष्ट खबर है, अगले साल रिटायर होने वाली प्रदेश की सबसे सीनियर आईएएस रेणु पिल्ले से इसके लिए पूछा गया, मगर शायद वह तैयार नहीं हुईं। दूसरा कोई डायरेक्ट आईएएस इस समय रिटायर नहीं होने वाला। वैसे, 62 वर्ष वाले इस पोस्ट पर रिटायरमेंट के बाद कोई ब्यूराक्रेट्स आना नहीं चाहता क्योंकि 60 में रिटायर होने के बाद उसे दो साल ही मिलता है। डीजीपी मोहन शुक्ला, अशोक दरबारी, और आईएएस केएम पिस्दा नौकरी से वीआरएस लेकर चेयरमैन बने थे, इसलिए उन्हें पीएससी में ठीकठाक टाईम मिल गया था। मगर पोस्ट रिटायरमेंट के लिए बाकी अफसर पांच साल वाली पोस्टिंग को प्राथमिकता देते हैं। कुल मिलाकर ताजा अपडेट यह है कि अगले हफ्ते किसी भी दिन नए चेयरमैन और सदस्यों की नियुक्ति हो जाएगी। चेयरमैन की तलाश सरकार ने पूरी कर ली है। खबर है, कोई बढ़ियां पोस्टिंग होने वाली है।

ट्रांसफर में अब मनीराम नहीं?

छत्तीसगढ़ के कई मंत्रियों ने ट्रांसफर का शो-रुम खोल लिया था, उस पर अब ब्रेक लग सकता है। दरअसल, नव नियुक्त प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी से सूबे के एक बीजेपी लीडर सौजन्य भेंट करने गए थे। वहां जाने से पता चला कि प्रदेश प्रभारी को छत्तीसगढ़ आए बिना ही सब कुछ पता चल चुका है...कौन मंत्री क्या कर रहा है। जाहिर है, पिछली सरकार में ये खेल शुरू हुआ था, मगर इस समय एक कदम आगे वाली स्थिति है। पोस्टिंग के बाद अब हर साल रिचार्ज सिस्टम लागू हो गया है। स्थिति इतनी बदतर हो गई है कि पोस्टिंग से पहले बोली लग रही। अच्छे अफसर लूप लाईन में और खटराल अधिकारी मौज काट रहे। इससे सिस्टम की साख पर असर पड़ रहा...सरकार द्वारा किए जा रहे ऐतिहासिक सुधार के कार्य भी दब जा रहे। बहरहाल, ऐसे मंत्रियों की अब शामत आ सकती है...स्मृति किस अंदाज में बात करती है, बताने की जरूरत नहीं।

तीन नए डीजी और रोड़ा

छत्तीसगढ़ में तीन आईपीएस अफसरों को डीजी बनाए जाने की अटकलें बड़ी तेज हैं। यह जरूरत इसलिए पड़ रही कि डीजी बनने की 30 साल की एजिबिलिटी तीन आईपीएस अधिकारियों ने क्रॉस कर लिया हैं। एक तरह से कहा जाए, तो यह उनके साथ अन्याय है। खासतौर से एसआरपी कल्लूरी के साथ। सरगुजा से नक्सलियों का पैर उखाड़ने वाले 94 बैच के आईपीएस कल्लूरी को 2024 में ही डीजी बन जाना चाहिए था। उनके दोनों बैचमेट डीजी बन चुके हैं। मगर वे बेचारे अभी भी मुुंह ताक रहे। उनके अलावे 95 बैच के प्रदीप गुप्ता और 96 बैच के विवेकानंद का भी प्रमोशन ड्यू है। असल में दिक्कत यह है कि छत्तीसगढ़ में डीजी के पद चार ही हैं। दो कैडर और दो एक्स कैडर। इस पर अरुणदेव गौतम, पवनदेव, जीपी सिंह और हिमांशु गुप्ता पोस्टेड हैं। इनमें से गौतम के अगले साल जुलाई में रिटायर होने पर एक पद खाली होगा और दूसरा जुलाई 2028 में पवनदेव के जाने के बाद। बाकी जीपी और हिमांशु का रिटायरमेंट में काफी टाईम है। इसको देखते सरकार ने तय किया कि कल्लूरी, प्रदीप और विवेकानंद को स्पेशल डीजी बना दिया जाए। इसके लिए फाइल भी चली है मगर उसमें लिंगारान करने की कोशिशें शुरू हो गई हैं।

पुलिस का दुर्भाग्य या...?

पद खाली नहीं रहने पर राज्य सरकार को डीजी बनाने का अधिकार है। पंजाब में इस समय ऐसे 12 डीजी हैं। छत्तीसगढ़ में भी रमन सरकार ने 2029 में विधानसभा चुनाव के आचार संहिता के आधा घंटा पूर्व कैबिनेट के जरिये संजय पिल्ले, आरके विज और मुकेश गुप्ता को डीजी बनाया था। उस समय पिल्ले के लिए एक पद वैकेंट था मगर विज और गुप्ता के लिए पद नहीं था। अब सुनने में आ रहा कि नए डीजी के लिए ब्रेकर लगाए जा रहे हैं...भारत सरकार से अनुमति मांगने की बातें हो रही। उसके लिए पिछली सरकार का हवाला दिया जा रहा कि सरकार ने संजय पिल्ले, आरके विज और मुकेश गुप्ता को डिमोट कर दिया था। मुकेश गुप्ता जब कोर्ट गए तो सरकार ने तर्क दिया कि बिना केंद्र की अनुमति के डीजी बना दिए गए थे। मगर सवाल यह भी उठता है कि मुकेश गुप्ता का नाम उसमें अगर शामिल नहीं होता तो पिछली सरकार ऐसा करती क्या। कुल मिलाकर राज्य कैबिनेट चाहे तो दो साल के लिए डीजी बना सकता है। आखिर, इसी सरकार ने पद ना होने के बाद भी आईएफएस एसएस बजाज को पीसीसीएफ बनाया ही था। फिर अभी पिछले साल भी पीसीसीएफ के मामले में राज्य सरकार ने जब केंद्र से पूछा तो वहां से यही लिखकर आया, राज्य सरकार सक्षम है। कुल मिलाकर पुलिस महकमे का ये दुर्भाग्य कहें या नाकारापन कि केंद्र सरकार नक्सलियों के खात्मा करने को लेकर वाहवाही लूट रही, उस राज्य की पुलिस अपने अफसरों के लिए डीजी का पोस्ट क्रियेट नहीं करवा पा रही।

नाइंसाफी की पराकाष्ठा!

जब पुलिस मुख्यालय अपने सीनियर अफसरों के सम्मान का ध्यान नहीं रख रहा तो राज्य पुलिस सेवा और उसके नीचे वालों के बारे में भला कौन सोचने वाला है। राज्य पुलिस सेवा का हाल ये है कि 2005 बैच के सभी अफसर अभी आईपीएस नहीं बने हैं। जबकि, राज्य प्रशासनिक सेवा में 2013 बैच का आईएएस बनना प्रारंभ हो गया है। याने रापुसे अधिकारी राप्रसे से आठ साल पीछे चल रहे हैं। बाकी नीेचे वाले बेचारे टीआई, एसआई और सिपाही-हवलदार को कौन पूछता है। विडंबना तो ये है...ये तब हो रहा, जब छत्तीसगढ़ में अब तक के सबसे काबिल गृह मंत्री हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय में उनका सीधा कनेक्शन है। ऐसा लगता है, पुलिस वाले खुद भी इतनी गुटबाजी में व्यस्त हैं कि गृह मंत्री से समक्ष अपना पक्ष रख भी नहीं पाते होंगे। बहरहाल, पुलिस अफसरों को एक बार चीफ सिकेट्री को भी प्रेजेंटेशन देना चाहिए। सीएस आखिर पूरे राज्य के प्रशासनिक प्रमुख होते हैं। किसी भी विभाग का डीपीसी आरगेनाइज करने से लेकर कैबिनेट के पदेन सिकेट्री भी होते हैं।

पर्यटन और विप्र

पर्यटन विभाग को स्थापित करने का दायित्व सरकार ने ब्राम्हण अफसरों को सौंप दिया है। इस समय बोर्ड के चेयरमैन हैें नीलू शर्मा। एमडी बनाया गया है आईएएस सौमिल रंजन चौबे को। राज्य प्रशासनिक सेवा की अधिकारी पूनम शर्मा और पुष्पेंद्र शर्मा डीजीएम हैं। इनके नीचे भी कई ब्राम्हण अधिकारी अनुराधा दुबे, राकेश मिश्रा...पर्यटन बोर्ड में अहम दायित्व संभाल रहे हैं। पर्यटन बोर्ड में इस पर खूब चुटकी ली जा रही...पर्यटन को उबारने के लिए सरकार ने विप्र जनों को ही क्यों चुना?

ट्रांफसर पर यू टर्न

राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के ट्रांसफर में भले ही लेट हुआ मगर सिस्टम ने अच्छा काम किया। वरना, पहले तो 10 से 25 पेटी की बोली लग रही थी। सीएम सचिवालय ने लिस्ट पर पहले ब्रेक लगाया और फिर 150 अफसरों की लिस्ट जारी की तो उसे काफी एप्रिसियेट किया गया। उतनी बड़ी लिस्ट में आठ-दस ही एप्रोच, सिफारिश वाले होंगे। मगर कल शुक्रवार को जीएडी ने 18 अफसरों का संशोधित लिस्ट जारी किया, उसका मैसेज अच्छा नहीं गया। आखिर, रायपुर में चार साल से जमे कोई राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी को हटाया क्यों नहीं जाना चाहिए? ऐसे कई लोग सिफारिश की बदौलत अपना ट्रांसफर चेंज कराने में सफल हो गए। हो सकता है, इसके पीछे राजनीतिक मजबूरियां हों मगर उसके लिए भी कई तरीके हैं। चार-छह महीने बाद भी उन्हें चेंज किया जा सकता था।

मंत्रिमंडल में असंतुलन

25 अक्टूबर को नई प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी आ रही हैं। उनके दौरे का शेड्यूल आने के साथ ही मंत्रिमंडल में फेरबदल की अटकलें शुरू हो गई है। मंत्रिमंडल की सर्जरी में सबसे बड़ा इश्यू होगा रिजल्ट देने वाले चेहरों के साथ क्षेत्रीय असंतुलन को ठीक करना। अभी स्थिति यह है कि सरगुजा से चार मंत्री हैं, और बस्तर से सिर्फ एक। अगल-बगल की सीट से पार्टी ने दो-दो डिप्टी सीएम बना दिया। जाहिर है, लोरमी और कवर्धा लगभग लगा हुआ ही है। फिर उसी लोरमी से केेंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू भी। यही नहीं, विभागों के बंटवारे में भी यही स्थिति है। अब सर्जरी में बस्तर का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाएगा। हो सकता है, बस्तर से अब तीन मंत्री हो जाएं। सरगुजा में खतरा लक्ष्मी राजवाड़े और राजेश अग्रवाल को ज्यादा दिख रहा। अब स्मृति ईरानी की नजर तिरछी हो जाए तो बात अलग है वरना सरगुजा से श्याम बिहारी खुद को काफी मजबूत पोजिशन में कर लिए हैं। टंकराम वर्मा और दयालदास बघेल को लेकर भी डेंजर जोन का परसेप्शन बना हुआ है। मगर बीजेपी की सियासत में जब तक शपथ लेने वाले मंत्रियों की लिस्ट फायनल न हो जाए, तब तक गारंटी के साथ कुछ कहा नहीं जा सकता।

75 परसेंट विभाग बदलेंगे

जैसे की खबरें आ रहीं...मंत्रिमंडल में सिर्फ सर्जरी ही नहीं होगी, 75 परसेंट विभाग भी बदले जाएंगे। मंत्रियों के चेहरे बदलने के साथ विभाग बदलने का मकसद ये है कि आम आदमी को सिस्टम में बदलाव महसूस हो। और फिर यह भी कि जो मंत्री तीन साल में कुछ नहीं कर पाया अब डेढ़ साल में क्या ही कर लेगा। इससे अच्छा है कि उसका विभाग ही बदल दिया जाए। नया मंत्री कम-से-कम कुछ तो अच्छा करने का प्रयास करेगा।

हफ्ते का कोट                  

'जब आप दूसरों के लिए अच्छा चाहते हैं, तो वही अच्छी चीजें आपके जीवन में वापस आती है। यही प्रकृति का नियम है।' और, 'यदि कोई आपकी गलती आपके मुंह पर कहने की ताकत रखता है, तो उससे अच्छा मित्र और कोई हो नहीं सकता।'

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या विष्णुदेव साय मंत्रिमंडल का कोई सदस्य बन सकता है बीजेपी का नया प्रदेश अध्यक्ष?

2. पीएससी का नया चेयरमैन अफसरशाही से होगा या कोई शिक्षाविद या टेक्नोक्रेट?

रविवार, 11 अक्टूबर 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: अफसर...और घर की मुर्गी

 


तरकश, 11 अक्टूबर 2026

संजय के. दीक्षित

अफसर...और घर की मुर्गी

छत्तीसगढ़ कैडर के एक आईएफएस अधिकारी की मिस यूपी रह चुकी खूबसूरत युवती से बड़ी धूमधाम से शादी हुई थी। उनका एक बड़ा प्यारा बेटा भी हुआ। मगर आठ साल बाद अब स्थिति यह है कि पत्नी अपने पति की लंपटई और प्रताड़ना को लेकर सोशल मीडिया पर गुहार लगा रही है। पत्नी का आरोप है...पति ने मेरा जीवन तबाह कर मुझे मायके में शरण लेने मजबूर कर दिया। आईएफएस अफसर का सूबे की एक चर्चित महिला डीएसपी से लंबे समय से यराना रहा है। राजधानी रायपुर में शायद ही कोई अनभिज्ञ होगा कि महिला डीएसपी का पहले आईएफएस के साथ संबंध रहा। बाद में एक कारोबारी की इंट्री हुई और उसके बाद वे मैदान से आउट हो गए मगर आईएफएस अभी भी पिच पर बने हुए हैं। खैर, फंडा यह है कि कई लोगों के लिए खूबसूरती मैटर नहीं करता। खासकर, आईएएस, आईपीएस और आईएफएस जैसे ऑल इंडिया सर्विस के अफसरों के लिए, जिनके पास 'पावर' और 'पैसा' दोनों होता है। चूकि ये देश की सबसे बड़ी सर्विस में सलेक्ट होते हैं, लिहाजा आमतौर से पत्नियां खूबसूरत ही मिलती हैं। मगर बड़े अफसर बनने के बाद गुलाटी मारना जब 'इनबिल्ट' हो जाए, तो बेचारी पत्नी क्या कर सकती है। बेशक, छत्तीसगढ़ के 80 परसेंट से अधिक आईएएस, आईपीएस और आईएफएस लंगोट के ढीले हैं। मौका मिला नहीं कि हर-हर गंगे। उपर से भारी इनोसेंट दिखने वाले कई अफसरों को लेकर विश्वास नहीं होगा...मगर उनके चटपटे किस्से सुन आप दंग रह जाएंगे। जब से डीएमएफ आया है, अधिकांश कलेक्टरों का भी यही हाल है...कईयों ने चरित्रहीनता की पराकाष्ठा कर दी है। दरअसल, यूपीएससी क्रेक कर आए हैं, चतुर तो वे होते ही हैं...पोस्टिंग मिलते ही पीए को बोलते हैं, सबसे अच्छी वाली गाड़ी मैडम के लिए घर भेजो। पत्नियां सप्लायरों, ठेकेदारों से मिलने वाले महंगे गिफ्ट, ज्वेलरी और लग्जरी सुख-सुविधाओं में उलझ जाती है। उधर पति लोग मीटिंग के बहाने मुंबई, गोवा में बंदरों टाईप गुलाटी मारने निकल जाते हैं। बहरहाल, बात आईएफएस की मिस यूपी बीवी पर तो पत्नी कितनी भी खूबसूरत हो जाए...आखिर, एक देसी कहावत है...घर की मुर्गी दाल बराबर।

कदाचरण...एक्शन क्यों नहीं?

87 बैच के आईएएस अजयपाल सिंह की पत्नी सरकार और मीडिया के दरवाजों पर पति की प्रताड़ना को लेकर गिड़गिड़ाती रही। हालांकि, उनकी पीड़ा लंपटई को लेकर नहीं थी। बावजूद इसके उस समय की बीजेपी सरकार ने कभी उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं सौंपी। बाद में ड्यूटी से महीनों गायब रहना, कामकाज में लापरवाही के मामले में उन्हें फोर्सली रिटायर कर दिया गया। मगर इस समय आईएफएस की पत्नी अपने पति की लंपटई पर गुहार लगाते बिलख रही है। ऐसे अफसर को सिस्टम ने बड़े डिविजन डीएफओ बनाकर रखा है। ये ठीक नहीं। इसे आप पति-पत्नी का पर्सनल विवाद बोल खारिज नहीं सकते। इससे पूरे देश में छत्तीसगढ़ कैडर मजाक बनता है। फिर डीएसपी प्रकरण में जो जांच हुई है, खुफिया विभाग के पास इसके इनपुट्स भी तो होंगे ही। फिर भी ऐसे आंख क्यों मूंदना?

अफसर, पत्नी और अलार्म

करीब 22 साल से छत्तीसगढ़ की अफसरशाही को कवरेज करते बड़े करीब से वाकिफ हूं। जो अफसर पत्नी को लिमिट से ज्यादा वेटेज देते हैं। सार्वजनिक जगहों पर साथ जाएंगे, तारीफ के पुल बांधते मिलेंगे। डीपी, स्टेट्स में भी साथ-साथ। ऐसे अफसर लंगोट के ज्यादा ढीले होते हैं। हो सकता है, इसमें इक्का-दुक्का अफसर अपवाद हों, अलबत्ता, एक इंटरनेशनल रिसर्च में ये बात निकलकर आई है कि विवाहेत्तर संबंध रखने वाले अधिकांश लोग पत्नी को काफी खुश रखने का प्रयास करते हैं। एकदम चापलूस की तरह। इसलिए...ताकि उसे कोई संदेह न हो। खैर, ऐसे ब्रीड वाले अफसरों के लिए अब संभावनाओं के द्वार काफी खुल गए हैं। मंत्रालय से लेकर इंद्रावती भवन और कलेक्ट्रेट तक अब कारपोरेट, कंसलटेंट की आड़ में मेट्रो सिटी की आधे-अधूरे वस्त्र पहनी हनी गर्ल भौंरे की तरह मंडरा रही हैं। कुल मिलाकर घोर कलयुग आ गया है... अफसरों की पत्नियों को अत्यधिक अलर्ट रहने की जरूरत है।

बीजेपी में भी ग्लेमर

कांग्रेस चूकि बरसों सत्ता में रही है, इसलिए उसके बड़े-बड़े नेताओं की अनगिनत कहांनियां रही हैं। मगर अब शुचिता के लिए जानी जाने वाली बीजेपी भी इससे अछूती नहीं। छत्तीसगढ़ में चौथी बार सत्ता में आई बीजेपी भी अब ग्लेमरस महिलाओं से प्रभावित दिखती हैं। बरसों से पार्टी का झंडा, बैनर उठाने वाली महिलाएं किनारे हो गई हैं, और हाल के दिनों में पार्टी में घुसी महिला नेत्रियां अब आगे होती जा रहीं। बिलासपुर की एक घटना को लेें...एक ग्लेमरस युवती ने पार्टी में पद दिलाने का लालच देकर एक बीजेपी कार्यकर्ता से 82 लाख रुपए ठग लिया। अरसा गुजर जाने के बाद जब उसे पार्टी में कोई पद नहीं मिला तो उसने पुलिस की शरण ली। कुछ महीने पहिले बिलासपुर की ही एक ग्लेमरस नेत्री ने थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी...एक ठेकेदार ने उससे कार में दुष्कर्म किया। उधर, ठेकेदार ने कहा, उल्टे काम दिलाने के लिए नेत्री ने उससे एक करोड़ रुपए हड़प लिया। अब असलियत क्या थी, वे दोनों जाने। लेकिन, अब कमाल ये कि नेत्री फिर बिलासपुर से लेकर रायपुर तक, बड़े-बड़े नेताओं के साथ खूब फोटो खिंचवा रही। पता नहीं, छत्तीसगढ़ में पोस्टेड भारी-भरकम अमला वाली केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियां क्या कर रही हैं। आखिर, कुछ ऊँच-नीच हुआ तो नाम तो पूरी पार्टी का खराब होगा न। क्योंकि, बीजेपी नेता भी आखिरकार हैं इंसान ही न!

कलेक्टर, कोर्ट रुम और मॉनिटरिंग

विधानसभा अध्यक्ष के जिले राजनांदगांव से एक अच्छी खबर है। वहां राजस्व मामले के निबटारे में 94 से लेकर 100 परसेंट तक कामयाबी मिली है। छत्तीसगढ़ में ये अपने आप में एक रिकार्ड होगा। जाहिर है, जमीन जायदाद के मामले तहसीलों में सालों तक अटके रहते हैं। पिछले तरकश में राजस्व मामलों का जिक्र होने पर अगले दिन बलरामपुर से लेकर भोपालपटनम तक से कमेंट्स और शिकायतों की बाढ़ आ गई थी। लोग दुखड़ा रो रहे थे, फलां तहसीलदार ने इतने महीने से फाइल दबा कर बैठा है तो किस तरह सरगुजा जिले की एक कलेक्टर ने कमिश्नर से बोल जमीन विवाद पर स्टे लगवा दिया...इसलिए कि एक समाज विशेष के एक आदमी ने जमीन पर कब्जा किया है। इससे लॉ एंड आर्डर की स्थिति उत्पन्न होती, तो उन्हें झेलना पड़ता। सरकार को कम-से-कम रेवेन्यू मामलों को हर महीने समीक्षा करनी चाहिए कि किस जिले मेें कितनी पेंडेंसी है। ई-ऑफिस के बाद भी अगर तहसीलदार, एसडीएम महीनों फाइलें दबाकर बैठे रहें तो ये दुर्भाग्यजनक है। दूसरा, अब तो ऑनलाइन और सीसीटीवी का दौर है। चीफ सिकेट्री खुद भी अधिकारियों के अटेंडेंस पर नजर रख रहे। सीसीटीवी से सीधे पता चल जाएगा कि कौन कलेक्टर महीने में कितने दिन कोर्ट रुम में बैठता है। वास्तविकता यह है कि 80 परसेंट कलेक्टर कोर्ट में बैठते नहीं। एडिशनल कलेक्टर को कोर्ट सौंप देते हैं। राजनांदगांव को मॉडल बनाकर अगर मंत्रालय से कलेक्टरों की मॉनिटरिंग प्रारंभ हो जाए तो चीजें काफी सुधर जाएंगी। क्योंकि, आंकड़े बताते हैं, सबसे अधिक किसी विभाग में भ्रष्टाचार है तो वह राजस्व विभाग में है। और आम आदमी सबसे अधिक त्रस्त भी इसी विभाग से है।

पहले के कलेक्टर और अबके

आज से दो दशक पहले कलेक्टर जमकर दौरे भी करते थे और रेगुलर कोर्ट में बैठकर राजस्व केसों का निबटारा भी करते थे। तब जिले काफी बड़े होते थे। केसों की संख्या भी काफी होती थी। मगर अब दो-दो, तीन-तीन ब्लॉक के जिले हो गए, उसके बाद भी कलेक्टरों के पास राजस्व मामलों का रिव्यू करने टाईम नहीं। ऐसा नहीं कि पहले के कलेक्टर पैसा नहीं कमाते थे। वे पैसा भी कमाते थे और दबाकर काम भी करते थे। अभी विडंबना यह है कि कलेक्टर सुबह से कैलकुलेटर लेकर बैठ जाते हैं, डीएमएफ का पैसा कहां और कैसे खर्च किया जा सकता है, काम-वाम से ज्यादा कोई मतलब नहीं। और, सिस्टम ने जिन्हें ईमानदारी के बेसिस पर कलेक्टर बनाया है, वे मूरत बनकर ऑफिस में बैठे रहते हैं, उन्हें आम आदमी से कोई मतलब नहीं। अलबत्ता, इस स्तंभ में पहले भी कई बार लिखा जा चुका है...छत्तीसगढ़ में कलेक्टरों की वर्किंग खराब करने में सबसे बड़ा रोल डीएमएफ का है। कायदे से अघोषित तौर से इसे सरकार को अपने नियंत्रण में लेना चाहिए। नियंत्रण का मतलब ये कि भारत सरकार ने कलेक्टरों को डीएमएफ का हेड बनाया है, इसलिए उन्हें बदल तो सकते नहीं। मगर सरकार चाहे तो काम कराने से पहले पूछ सकती है... रिव्यू कर सकती है कि वो जो काम करने जा रहे, उसकी जनहित में कितनी उपयोगिता है। कई जिलों में सप्लायर तय करते हैं...डीएमएफ में क्या होना चाहिए। इसका एक बानगी देखिए। एक सप्लायर हाथी प्रभावित कई जिलों के कलेक्टरों को बताया कि हाथी आएगा, तो मोबाइल पर अलर्ट आएगा। इसी में उसने डीएमएफ से करोड़ों रुपए ऐंठ लिया। इससे कलेक्टर भी खुश और सप्लायर भी। मगर जंगलों में रहने वाले आम लोगो का कोई भला नहीं हुआ, क्योंकि वे मोबाइल नहीं देखते। मगर डीएमएफ का पैसा खर्च करना था, वो काम हो गया। अलबत्ता, पिछली सरकार में डीएमएफ पर रायपुर से नियंत्रण करने का प्रयास किया था, भले ही उसकी मंशा और दिशा सही नहीं रही।

कलेक्टरों के इनोवेशन पर ब्रेक

प्रशासनिक कामकाज को पटरी पर लाने के लिए सिस्टम को एक काम अवश्य करना चाहिए। वह है कलेक्टरों के इनोवेशन पर अंकुश लगाना। दरअसल, होता ऐसा है कि वाहवाही लुटने या फिर पीएम अवार्ड के लिए कलेेक्टर एक-न-एक नवाचार का काम ढूंढ लेते हैं और फिर वही उनके लिए टॉप प्रायरिटी बन जाता है। फिर जनता से जुड़े बाकी काम गौण। आलम यह कि पिछले कलेक्टर ने अगर कोई बढ़ियां लोक कल्याणकारी काम प्रारंभ किया है, तो उसके तरफ देखना नहीं। जबकि, होना ऐसा चाहिए कि कोई कलेक्टर अगर अच्छा काम शुरू किया है तो नए वालों की भी जिम्मेदारी बनती है कि उसे आगे बढ़ाए। जाहिर है, छत्तीसगढ़ बनने के बाद सिर्फ कलेक्टर ओपी चौधरी का दंतेवाड़ा का काम दिख रहा, जिसके लिए उन्हें पीएम अवार्ड मिला। बाकी पीएम अवार्ड वाले क्या काम किए, किसी को याद नहीं। मुख्य सचिव के पास अब तो एक स्पेशल सिकेट्री भी आ गई हैं। कलेक्टरों के कामकाज का पूरा हिसाब सीएस ऑफिस में होना चाहिए। और ट्रांसफर के बाद नए वाले को ज्वाईनिंग से पहले बुलाकर बताना चाहिए कि उसे किन कामों को कंटीन्यू करना है, या फोकस बनाकर रखना है। इससे चीजें काफी सुधरेंगी। क्योंकि, कलेक्टरों की खुद की वाहवाही में जनता के पैसे का काफी नुकसान होता है।

बीजेपी के इंफ्लुएंसर

सत्ताधारी पार्टी को एजेंसियों पर इतना कांफिडेंस नहीं पाल लेना चाहिए। क्योंकि, अब चुनाव में ज्यादा समय नहीं बचा है। बात है दिल्ली से बुलाए गए सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर की। बीजेपी को बुलाना ही था तो चार-पांच को ही बुलाते मगर ठीकठाक का चयन करते। कम-से-कम प्रोफाइल तो देख लेते कि जो इंफ्लएंसर आ रहा, उसका खुद का कितने सबस्क्राबर और व्यूज हैं। मगर एजेंसी से ऐसे-ऐसे लोगोें को पकड़ लाई कि पूछिए मत! एक तो थोक की संख्या में आए। दूसरे छत्तीसगढ़ की ब्रांडिंग करने की बजाए यहां के लोगों के साथ फोटो खिंचवा खुद अपना व्यूज बढ़ा रहे हैं। उससे अच्छा छत्तीसगढ़ के कस्बा, जिलों के लोकल इंफ्लुएंसर को इतना मान-सम्मान दे दिए होते तो पार्टी के लिए फायदेमंद होता। जस्ट ये एक सुझाव है, बाकी तो बीजेपी जाने।

हफ्ते का कोट

आपकी शख्सियत अच्छी होगी तभी लोग आपमें बुराइयां खोजेंगे, वरना बुरे की तरफ देखता ही कौन है।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. किस जिले की महिला कप्तान पुलिस मुख्यालय के प्रभावशाली अफसर की भी परवाह नहीं कर रही?

2. क्या ये सही है कि मंत्रिमंडल में अब सर्जरी दिवाली के बाद ही होगी?


रविवार, 4 अक्टूबर 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: 18 बरस का 'तरकश'



संजय के दीक्षित

तरकश, 4 अक्टूबर 2026

18 बरस का 'तरकश'

NPG.NEWS वेबसाइट का सबसे लोकप्रिय साप्ताहिक स्तम्भ 'तरकश' ने अपने सफर के 18 बरस पूरे कर लिया है. 2008 में हरिभूमि समाचार पत्र में इस स्तंभ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था। जाहिर है, किसी भी स्तंभ के लिए सबसे जरूरी होती है उसकी निरंतरता। 'तरकश' ने इस पैरामीटर पर खरा उतरने का पूरा प्रयास किया। इन 18 बरसों में बड़े कम मौके आए...जब विषम परिस्थितियों में तीर नहीं चल पाए। वरना...छत्तीसगढ़ में रहे, या छत्तीसगढ़ से बाहर, कॉलम का क्रम टूटा नहीं। इस डेढ़ दशक के लगातार सफर का क्रेडिट जाता है छत्तीसगढ़ के उन लाखों सुधि पाठकों को, जिनका भरोसा समय के साथ और मजबूत होता चला गया। हर रविवार...पाठकों के घनघनाते फोन और मैसेज ने प्रेरित किया कि कठिन हालातों में भी ’तरकश’ कभी रुकना नहीं चाहिए। और वैसा ही हुआ। 2008 में यह स्तंभ प्रारंभ हुआ, उसके बाद चार विधानसभा चुनाव हुए। सरकारें बदली। सिस्टम बदला। मगर स्तंभ न रुका, न तेवर बदला। यह एक तपस्या की तरह रहा। पर्सनल राग-द्वेष से बिल्कुल दूर। इस चक्कर में कई बार अपने भी आहत हुए...दुखी हुए। मगर फिर जुड़ गए। क्योंकि मंशा साफ थी। बहरहाल, किसी एक अखबार में किसी कॉलम की 18 बरस याने डेढ़ दशक की यात्रा कम नहीं कही जा सकती। जाहिर है, 2008 में जन्मे बच्चे आज वोटर हो गए हैं। जब यह स्तंभ प्रारंभ हुआ, तब संवाद प्रेषण का जरिया सिर्फ एसएमएस था...और थोड़ा बहुत फेसबुक। व्हाट्सएप का अविष्कार नहीं हुआ था। इस अनवरत सफर के लिए हरिभूमि पत्र समूह और उसके प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी को आभार...जिन्होंने 'तरकश' जैसे प्रहारक स्तंभ के लिए अपना प्लेटफार्म उपलब्ध कराया। आभार छत्तीसगढ़ के उन लाखों 'सुधि पाठकों' का भी...जिनकी बदौलत 'तरकश' का सफर अविराम जारी है।

पब्लिक के हक पर डाका!

बात 14 साल बरस पुरानी है। 2012 की। राजधानी रायपुर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए भारत सरकार से 100 बसें मिली थीं। उसी दौरान...यही कोई अक्टूबर का महीना होगा। मंत्रालय और विभागाध्यक्ष कार्यालय रायपुर से नवा रायपुर में शिफ्थ किए जा रहे थे। सिस्टम ने पब्लिक के लिए मिली बसों को नवा रायपुर जाने वाले कर्मचारियों के लिए लगा दिया। तब शायद बेंगलुरू की कंपनी से कंट्रेक्ट यह हुआ था कि कर्मचारियों को नवा रायपुर ले जाने, ले आने के बाद बचे समय में रायपुर शहर में बसों को चलाई जाएगी, ताकि आम आदमी को उसका फायदा मिल सकें। कुछ दिन तक ऐसा हुआ भी, मगर बाद में कंपनी ने शहरों में बसें चलानी बंद कर दी। क्योंकि, कंपनी को जब कर्मचारियों को लाने-ले जाने पर ही भरपूर पैसा मिल जा रहा तो फिर आम आदमी की उसे परवाह क्यों होनी चाहिए। आजकल सारी बसें दिन भर मंत्रालय के आसपास ख़डी रहती हैं. हालांकि, अफसर कागजों में दावा करते हैं कि 20 बसें अभी भी शहर में चल रही मगर वो किधर चलती है, कभी किसी को दिखी नहीं। याने पब्लिक को मिली 100 बसों की सुविधा छीन गई।

तीन विभागों का घनचक्कर

कर्मचारियों के लिए बसें चलाने में तीन विभाग इंवाल्व हैं। सामान्य प्रशासन विभाग एनआरडीए को पैसा देता है। एनआरडीए ने बसों का संचालन का जिम्मा रायपुर नगर निगम को दे दिया है। अब आप बसों की शर्तों के बारे में जीएडी से पूछेंगे तो वह एनआरडीए पर डाल देगा और एनआरडीए के पास जाइयेगा तो वह नगर निगम से पूछिए। बताते हैं, जीएडी 2700 रुपए प्रति कर्मचारी के हिसाब से कंपनी को हर महीने इन बसों के लिए 90 लाख रुपए देता है। इस 90 लाख में कंपनी का काम सिर्फ ड्राईवर और फ्यूल का इंतजाम करना है। बाकी बसें तो भारत सरकारी से मिली है। इसमें ये भी एक लोचा है कि बड़ी संख्या में कर्मचारी नवा रायपुर में रहने लगे हैं और काफी संख्या में वे अपने साधन से आते हैं। मगर उन्होंने बस के पास सरेंडर नहीं किए हैं। दूसरा फ्री की बस सेवा सिर्फ सरकारी कर्मचारियों के लिएा थी, मगर प्लेसमेंट के कर्मचारी भी इस सरकारी सुविधा का लाभ उठा रहे। अब मुश्किल यह है कि 12 बरस में बसें कंडम होेती जा रही हैं। दो बार आग लगने की घटना हो चुकी है। सिस्टम उलझन में है कि नई बसें कैसे खरीदी जाए और फिर कर्मचारियों को और कितने साल तक फ्री ट्रांसपोर्ट की सुविधा मुहैया कराई जाए। दरअसल, इस पर सहमति नहीं बन पा रही। अफसरों के एक वर्ग का मानना है कि 14 साल फ्री सर्विस बहुत होता है...फिर अब तो नई राजधानी में आवास भी खाली पड़़े हैं। तो दूसरे वर्ग को लगता है फ्री सेवा बंद करने से कहीं कर्मचारी नाराज न हो जाएं। क्योंकि, सवाल तो उठेगा...करोड़ों का बंगला लेने के बाद भी मंत्री कौन सा नवा रायपुर में आकर रह रहे हैं।

अफसर को संविदा पोस्टिंग

राज्य बनने के 25 साल मेे यह दूसरी बार हुआ कि किसी ऑल इंडिया सर्विस के अफसर ने वीआरएस लिया और फिर से उसे संविदा पोस्टिंग मिल गई। पहली बार अमन सिंह को जब भारत सरकार ने डेपुटेशन को बढ़ाने से इंकार किया था, तो फिर उन्होंने वीआरएस ले लिया था। आईआरएस अफसर शीतल शाश्वत वर्मा के साथ भी ऐसा ही हुआ। सात साल तक डेपुटेशन पर रायपुर मंत्रालय में काम करने के बाद जब एक्टेंशन की गुंजाइश नहीं बची तो उन्होंने वीआरएस ले लिया। तब इसी स्तंभ में इस बात की ओर इशारा किया गया था कि कुछ दिन बाद वे संविदा पोस्टिंग में लौटेंगी और वैसा ही हुआ। शीतल को चीफ सिकेट्री ऑफिस में स्पेशल सिकेट्री का भी प्रभार दिया गया है। ये भी फर्स्ट टाईम हुआ है। डायरेक्टर आईएएस में भी दो ही महिला अफसर सीएस की ज्वाइंट सिकेट्री बनी हैं। पहले ईशिता राय और फिर रेणु पिल्ले। शीतल आईआरएस अफसर रही हैं। उन्हें उन दोनों से उपर स्पेशल सिकेट्री टू सीएस बनाया गया है।

सफेदपोश चोर

भिलाई स्टील प्लांट में लोहा चोरी की जांच के लिए सीबीआई पहुुंच गई है। इससे वहां के सफेदपोश नेताजी लोग हिल गए हैं। दरअसल, बीएसपी में प्रति दिन तीन-से-चार करोड़ की लोहा चोरी हो रही थी। याने महीने में करीब 100 से 120 करोड़ के। ये भी जान लें कि भिलाई में पिछले दो-ढाई दशक में जितने नेता बने हैं, उनमें 98 परसेंट से अधिक लोग लोहा चोरी में संलिप्त रहे। और जब बेशुमार दौलत बना लिए तो सफेद वस्त्र पहन पॉलिटिक्स में आ गए। राजनीति में आने के बाद वे लोहा चोरों को संऱक्षण दे रहे थे। हालांकि, भारत सरकार की इस स्टील कंपनी से रोज करोड़ों का लोहा पार करने मेें कंपनी के अधिकारियों ने भी बहती गंगा में खूब डूबकी लगाई। आखिर, दुर्ग पुलिस ने बीएसपी के जीएम समेत कई को अरेस्ट कर जेल भेजा है। सीआईएसएफ ने भी अपने डीआईजी को हटा कर असम भेज दिया है। सीआईएसएफ पर आरोप है कि जिस गेट से लोहा चोरी कर ले जाया जाता था, सीआईएफएस ने जानबूझकर वहां न तो सीसीटीवी लगवाया था और न वहां किसी जवान को तैनात किया। खैर, ठीक ही कहा गया है, अति का अंत होता है। बहरहाल, सीबीआई के नाम से भिलाई-दुर्ग के नेताओं की रात की नींद उड़ गई है, न जाने कब उनके दरवाजे पर सीबीआई धमक जाए।

गजब दिवाली

टेंट वालों की इस बार गजबे दिवाली मनेंगी। पीडब्लूडी के ईएनसी ऑफिस ने लंबे समय से बकाया 110 करोेड़ रुपए जारी कर दिया है। इसमें एक-एक टेंट वालों को गिरे हालत में चार-से-पांच करोड़ रुपए मिले हैं। दरअसल, विभिन्न जिलों में मंत्री, मिनिस्टरों के लिए पंडाल, मंच बनते हैं, उसका लंबे समय से बिल बकाया था। खैर, बेचारे टेंट वाले काम किए हैं तो पेमेंट तो होना ही चाहिए। मगर ये भी सनद रखना चाहिए...विधायक अटल श्रीवास्तव ने इसी साल मानसून सत्र में प्रश्न लगाया था कि बिलासपुर में मुख्यमंत्री का कार्यक्रम हुआ एक और टेंट वाले ने बिल लगा दिया दो कार्यक्रमों का। और आश्चर्य ये कि वहां के पीडब्लूडी के एसई ने उसे पास भी कर दिया। सदन में पीडब्लूडी मंत्री ने इसकी जांच कराने कहा, मगर आज तक पता नहीं चला कि डबल पेमेंट मामले में किसी अफसर का एक बाल भी बांका हुआ? बहरहाल, टेंट वाले तो ईएनसी की जय जयकार कर रहे हैं।

नवरात्रि में सियासी गहमागहमी

30 सिंतबर को दिल्ली में राज्यों के नियुक्त नए प्रभारियों और संगठन मंत्रियों की बैठक हो गई। पार्टी अध्यक्ष ने सबको टास्क दिया। साथ में ये निर्देश भी...पितृ पक्ष के बाद सभी अपने प्रभार वाले राज्यों में अपनी जिम्मेदारी संभाल लें। बताते हैं, छत्तीसगढ़ की प्रभारी स्मृति ईरानी और संगठन मंत्री कर्मवीर सिंह नवरात्रि में किसी दिन छत्तीसगढ़ आएंगे। संकेत मिल रहे, नवरात्रि शुरू होने के दूसरे या तीसरे दिन ही दोनों रायपुर आ जाएं। राजनीतिक पंडितों का मानना है, दोनों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे यहां कितना टाईम देते हैं। वैसे, संगठन मंत्री के नाते कर्मवीर सिंह को यहां रहना होगा। मगर प्रश्न स्मृति ईरानी का है। हालांकि, छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के जस्ट बाद लोकसभा चुनाव होता है। लिहाजा, स्मृति अपना परफार्मेस दिखाने में कोई कमी तो नहीं ही करेंगी। बता दें, नितिन नबीन जब पिछले विधानसभा चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ के सह प्रभारी थे, पूरे छत्तीसगढ़ का मथ डाला था। सूबे का शायद ही कोई ब्लॉक होगा, जहां वे नहीं पहुंचे। इसलिए, कार्यकर्ताओं से उनके सीधे रिश्ते बन गए थे। वह विधानसभा चुनाव में काम आया। नए प्रभारी और सह प्रभारी से भी बीजेपी कार्यकर्ता ऐसा ही उम्मीद संजोए हुए हैं। स्मृति से तो थोड़ा ज्यादा ही। कार्यकर्ताओं को लग रहा, स्मृति ही कुछ कर पाएंगी।

एक मंत्री, दो विभाग, दो नियम

डिप्टी सीएम अरुण साव के पास पीडब्लूडी है और नगरीय प्रशासन भी। मुकेश बंसल ने पीडब्लूडी सिकेट्री की जिम्मेदारी संभालते ही ठेकेदारों से काम फास्ट करने के लिए डामर का रेट रिवाइज कर दिया। दरअसल, ईरान युद्ध के बाद डामर का रेट बढ़ गया है। इस वजह से जो ठेकेदार पुराने रेट में टेंडर ले लिए थे, वे काम में रुचि नहीं दिखा रहे थे। जाहिर है, कोई नुकसान में काम करेगा नहीं। मगर अब डामर के रेट रिवाइज होने के बाद सड़कों के कामों में आश्चर्यजनक तौर पर तेजी आ गई है। मगर नगरीय प्रशासन विभाग के अफसरों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। लिहाजा, शहरी इलाकों में सड़कों की मरम्मत का काम ठप्प पड़ा हुआ है। जबकि, डेवलमेंट का मैसेज शहरों से ही जाता है। खैर, अब सरकार ने सोनमणि बोरा को अर्बन एडमिनिस्ट्रेशन का सिकेट्री बनाया है, तो हो सकता है वहां भी डामर का रेट रिवाइज हो और काम में तेजी आए।

हफ्ते का कोट

"अगर सब कुछ अच्छा चल रहा है, तो उसका भरपूर आनंद लें। क्योंकि, वो हमेशा रहने वाला नहीं है। और यदि कुछ बुरा चल रहा है तो चिंता न करें, क्योंकि वो भी हमेशा के लिए रहने वाला नहीं है।" 

अंत में दो सवाल आपसे?

1. रायपुर में ऑल इंडिया सर्विस का कौन अधिकारी है, जो कर्मवीर सिंह को छत्तीसगढ़ का संगठन मंत्री बनने पर मुख्यमंत्री से पहले फोन कर बधाई दे डाली?

2. स्मृति ईरानी के प्रदेश प्रभारी बनने के बाद मंत्रियों की सोशल मीडिया टीम इतना एक्टिव क्यों हो गई है?

शनिवार, 26 सितंबर 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: पितृ पक्ष में...या देवी सर्व भूतेषु



तरकश, 27 सितंबर 2026

संजय के. दीक्षित

पितृ पक्ष में...या देवी सर्व भूतेषु

पितृ पक्ष में छत्तीसगढ़ के मंत्री अगर दुर्गा सप्तशती का पाठ करने लगे, तो समझा जा सकता है, उनकी मनोदशा कैसी होगी। दरअसल, बीजेपी ने 24 घंटे के भीतर डबल सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए संगठन महामंत्री, क्षेत्रीय संगठन महामंत्री को बदलते हुए प्रदेश प्रभारी भी नया पोस्ट कर दिया। वो भी स्मृति ईरानी जैसी। ऐसे में, पित्तरों की पूजा कौन करें...मंत्रीगण नवरात्रि से पहले ही...या देवी सर्व भूतेषु...का पाठ शुरू कर दिए हैं। दरअसल, ढाई साल तक बेलगाम रहे अधिकांश मंत्री अब बड़े सहमे हुए हैं...आखिर, अगला नंबर उन्हीं का आने वाला है। वो तो भला हुआ...पितृ पक्ष आ गया, वरना किसी भी दिन राजभवन में शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया जा सकता था। बहरहाल, जिस तरह से बीजेपी हाईकमान ने तेवर दिखाया है, उससे कोई आश्चर्य नहीं कि मंत्रियों में आधे-से-अधिक चेहरे बदल जाएं। अत्यधिक संभावना है, बीजेपी अब दिवाली का वेट ना करें। सियासी पंडितों भी मानते हैं...बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने छत्तीसगढ़ को लेकर जिस तरह की गंभीरता दिखाई है, दिवाली से पहले मंत्रियों से इस्तीफा मांग लिया जाए तो हैरत नहीं। जाहिर है, मंत्रिमंडल के पुनर्गठन मेदो-से-तीन पुराने मंत्रियों को मौका मिल सकता है। लास्ट दिसंबर में बस्तर के एक सामान्य वर्ग के नेता का नाम मंत्री बनने के लिए बड़े जोर से चला था। मगर बदले राजनीतिक समीकरण में अब अमर अग्रवाल, अजय चंद्राकर और राजेश मूणत जैसे पूर्व मंत्रियों में से कुछ के भाग्य बदल जाए, तो ताज्जुब नहीं। अमर तो दिसंबर 2025 में ही शपथ ले लिए होते, मगर किन्हीं अदृश्य हाथों ने बस्तरिया नेता का नाम आगे बढ़ा अमर के रास्ते में दीवार खड़ा कर दिया था। ऐसा इसलिए हुआ कि उस दौर में यस मैन चाहिए था। बहरहाल, चर्चाएं ये भी है कि अगर सामूहिक इस्तीफा हुआ तो फिर डिप्टी सीएम का कंसेप्ट खतम हो जाएगा। क्योंकि, हाई कमान अब राज्यों में सिंगल पावर सेंटर पर जोर दे रहा। और अगर चार-पांच मंत्रियों के इस्तीफे लिए गए तो फिर डिप्टी सीएम कंटीन्यू करते रहेंगे। कुल मिलाकर आधे-से-अधिक मंत्री दिवाली ठीक से मना पाएंगे...इस पर संशय है।

सवाल करोड़ों का

बीजेपी के संगठन में स्ट्राइक के बाद जाहिर है, सूबे में मंत्रियों की पूछपरख प्रभावित होगी! क्योंकि, भाजपा हाईकमान के रुख देखकर लोग अब मान बैठे हैं कि मंत्रिमंडल में सर्जरी अब किसी भी वक्त हो सकता है। यही वजह है खासकर ठेकेदार, सप्लायर अब थोड़ा डिस्टेंस मेंटेन करने लगे हैं। आज ही एक ठेकेदार को एक मिनिस्टर से मिलना था, बताते हैं, उसने बेंगलुरु जाने का बहाना बनाकर आगे का टाईम मांग लिया। उधर, दिवाली से पहले मंत्रिमंडल में सर्जरी हो गई तो सरकारी मुलाजिमों के करोड़ों रुपए डूब जाएंगे। क्योंकि, आजकल हंड्रेड परसेंट एडवांस का जमाना चल रहा, और मनचाही पोस्टिंग के लिए ंबड़ी संख्या में पेमेंट हो चुके है। असल में, मंत्रिमंडल में सर्जरी के साथ व्यापक तौर पर विभाग भी बदलेंगे। अब स्मृति ईरानी और कर्मवीर सिंह मिलकर विभाग तय करेंगे और दिल्ली उस पर मुहर लगाएगा। ऐसे में, आश्चर्य नहीं कि मलाईदार विभाग वाले मंत्रियों के पास छोटे विभाग आ जाए और काबिल मंत्रियों के पास बड़े विभाग। तो कामों के लिए जो करोड़ों रुपए एडवांस हैं, वे तो डूबेंगे ही।

मोदी की च्वाइस?

2023 के विधानसभा चुनाव में पीएम नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ में नौ सभाएं की थी...एक तरह से उन्होंने छत्तीसगढ़ को मथ दिया था। तब जाकर बीजेपी की सरकार बन पाई। वरना, बीजेपी नेता भूपेश बघेल के सामने इलेक्शन से पहले ही बैकफुट पर आ गए थे। खैर, पिछले ढाई बरसों से केंद्रीय खुफिया एजेंसियां जिस तरह से लगातार रिपोर्टिंग कर रही थी, पीएमओ यहां की स्थितियोें से नावाकिफ नहीं था। उधर, पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन के पास सारे मंत्रियों की रिपोर्ट्स पहुंच ही रहे थे। दिल्ली के सूत्र बताते हैं कि स्मृति ईरानी को छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाने में पीएम मोदी की हरी झंडी रही। छत्तीसगढ़ पीएम मोदी की प्रायरिटी में तो है ही, जेन जी आंदोलन के बाद मोदी अधिकांश चीजों को अब खुद वॉच कर रहे हैं। अहम मामलों की बैठकें अब वे स्वयं ले रहे। कुछ रोज पहले हुई मीटिंग में अधिकारी प्रोजेक्टर पर जब हर पेज में मोदी की फोटो और उनका गुणगान दिखा रहे थे, तो उन्होंने टोक दिया...फोटो-होर्डिग्स पर ज्यादा फोकस मत कीजिए, जनता इसे पसंद नहीं करती...जनता को काम चाहिए। कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है कि मोदी की च्वाइस से अगर स्मृति ईरानी छत्तीसगढ़ आई है तो फिर वे क्या करेंगी, समझा जा सकता है।

रोचक मुकाबला

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद 2001 से 2003 तक की राजनीति बड़ी दिलचस्प थी। मुख्यमंत्री अजीत जोगी और विद्याचरण शुक्ल सरीखे राजनीतिक योद्धा तो थे ही, तो मूंछो पर ताव देने और शेरो-शायरी से महफिल लूटने वाले दिलीप सिंह जूदेव भी रहे। लिहाजा, मीडिया को ब्रेकिंग और फ्रंट पेज की लीड की चिंता नहीं रहती थी। मगर उसके बाद के बरसों में सूबे में वैसी राजनीतिक गरमाहट रही नहीं। रमन सिंह 15 साल सीएम रहे, मगर विपक्ष खतम जैसा रहा। भूपेश बघेल जब मुख्यमंत्री बने तो रमन सिंह के अलावा बीजेपी के सारे पूर्व मंत्री, नेता शुतुरमुर्ग जैसी स्थिति में पहुंच गए थे...और आज जब भूपेश पूर्व हो गए हैं तब भी स्थिति ज्यादा बदली नहीं है। मगर अब स्मृति ईरानी के प्रदेश प्रभारी बनने से ऐसा प्रतीत होता है कि अब मुकाबला दिलचस्प और बराबरी का रहेगा। इधर स्मृति, उधर भूपेश। किसी भी मसले पर बोलने और प्रहार करने में दोनों का कोई जोर नहीं। स्मृति ईरानी तो वैसे भी प्रखर वक्ता हैं। उनकी जब नियुक्ति हुई तो भूपेश बघेल का बयान आया था, वो घायल शेरनी...। हालांकि, बीजेपी वालों का कहना है...घायल शेरनी ज्यादा आक्रमक हो जाती है। बहरहाल, ये तो तय है...मीडिया को अब राजनीतिक खबरें खुब मिलेंगी।

24 घंटे में परसेप्शन बदला

बीजेपी नेतृत्व ने छत्तीसगढ़ में ऐसा सर्जिकल स्ट्राइक किया कि 24 घंटे में परसेप्शन की रेटिंग अचानक लो से हाई हो गई। उससे पहले खुद बीजेपी के लोग मान रहे थे कि 2028 का विधानसभा चुनाव आसान नहीं होगा। मगर पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को प्रदेश प्रभारी बनाने के बाद परसेप्शन में हैरान करने वाला चेंज आया है। आम आदमी भी अब मान रहा कि बीेजेपी जिस मोड में आई है, उससे काफी चीजें बदलेंगी और ओपोजिशन के लिए अब एकतरफा जैसे परसेप्शन नहीं रहेंगे।

आईएएस की एक लिस्ट

प्रशासनिक गलियारों में आईएएस अधिकारियों की एक छोटी लिस्ट निकलने की चर्चाएं बड़ी तेज हैं। हालांकि, कहां-कहां, किस-किस जगहों पर बदलाव होगा...लिस्ट में कितने अफसर शामिल होंगे, ये अंदर की बात है। मगर सब कुछ ठीक रहा तो एक लिस्ट अवश्य आ सकती है।

कलेक्टर, एसपी से हारा हाई कोर्ट?

यूपी के बलरामपुर में डीजे की तेज आवाज से स्कूल में एक सात साल की बच्ची का मौत हो गई तो छत्तीसगढ़ में...अंबिकापुर में डीजे की तेज आवाज से अस्पताल में भर्ती एक प्रसूता की तबियत इतनी बिगड़ गई कि डॉक्टरों को उसका बीपी नार्मल करने में चार-पांच घंटे लग गए। छत्तीसगढ़ में इससे पहले डीजे से हर्ट अटैक की घटनाएं भी हो चुकी हैं। बिलासपुर हाई कोर्ट में करीब पांच-सात साल से केस चल रहा है। हाई कोर्ट ने 2022 में दो टूक कह दिया था कि डीजे अगर बजा तो जिले के कलेक्टर, एसपी जिम्मेदार होंगे। कोर्ट ने तत्कालीन चीफ सिकेट्री अमिताभ जैन से इस पर हलफनामा भी मांगा था। मगर बात आई-गई, चली गई। कोर्ट में जब भी पेशी का वक्त आता है, गृह विभाग खानापूर्ति के लिए रिव्यू बैठक करता है और कोर्ट में बताता है...सरकार जल्द ही कोलाहल कंट्रोल अधिनियम लाने जा रही है। मगर चार साल से अधिक वक्त गुजर गया, कोलाहल अधिनियम किधर है, किसी को पता नहीं। कलेक्टर, एसपी को अपनी कुर्सी सुरक्षित रखनी है, इसलिए किसी को कार्डियक अरेस्ट हो जाए, या फिर मौत...इससे उन्हें क्या वास्ता। उधर, पिछली सरकार में एक मंत्री जी को डीजे वालों की रोजी रोटी की चिंता सताती थी, तो इस सरकार में एक मंत्री जी ने बयान दिया...बिना डीजे का गणेश विसर्जन कैसे होगा? अब जब सिस्टम ही नहीं चाहता कि डीजे बंद हो तो हाई कोर्ट क्या कर सकता है।

मंत्री जी, गरीबों को कैंसर क्यों?

एक समय था, जब कैंसर जैसी घातक बीमारी मीडिल या अपर मीडिल क्लास वालों को ज्यादा होती थी। मगर छत्तीसगढ़ के कैंसर अस्पतालों के ओपीडी और वार्डों का सीन देखेंगे तो आप हिल जाएंगे। उसके बाद आपको समझ में आएगा कि रायपुुर जैसी बी क्लास की सिटी में महीने भर के भीतर दो-दो कारपोरेट कैंसर अस्पताल कैसे खुल गए। बता दें, रायपुर में एक दशक पहले तक कैंसर का एक भी प्रायवेट हॉस्पिटल नहीं था, इस समय छह अस्पताल सिर्फ कैंसर के हैं। इस स्तंभकार को रायपुर के एक जाने-माने अंकोलॉजिस्ट ने बताया, वो चौंकाने वाला था...छत्तीसगढ़ में 85 परसेंट से अधिक कैंसर गरीबों को हो रहे। उसमें भी आधे से अधिक मुंह, गले या फेफड़े का कैंसर। इसकी वजह है, पाउच-गुटखा बनाने वाली कंपनियां धड़ल्ले से उसमें जहरीला मैगनेशियम कार्बोनेट मिला रही। मैगनेशियम कार्बोनेट इसलिए मिलाया जाता है कि गुटखा की लाइफ बढ़े, आपस में चिपके मत और गले में ठंडक महसूस हो। अब इसमें आगे की खबर यह है कि इन गुटखा कंपनियां की जांच और सेंपल लेने का काम जिस ड्रग विभाग के पास है, पिछले तीन साल से किसी का भी सेंपल नहीं लिया है। ड्रग विभाग के पास सेंपल लेने वाले 63 अधिकारियों का अमला है, मगर उन्हें सख्त हिदायत है कि गुटखा कंपनियों तरफ झांकना नहीं है। पिछले तरकश में इसका जिक्र करने पर पता चला है, दो दिन पहले एकाध छोटी कंपनियों पर दबिश दी गई है। बहरहाल, हेल्थ मिनिस्टर और हेल्थ सिकेट्री को इसकी जांच करानी चाहिए कि गरीबों को ही कैंसर क्यों? और फिर ड्र्रग विभाग भी इन्हीं के अंदर आता है। अगर पान मसालों पर जहरीला पदार्थ मिलाने से मंत्री और सिकेट्री रोक देंगे तो छत्तीसगढ़ की गरीब जनता का उन्हें बड़ा पुण्य मिलेगा।

घाटे का फेडरेशन

लघु वनोपज संघ कभी साल का 500 करोड़ से अधिक नफे में रहता था। इलेक्शन के दौरान आदिवासी इलाकों में चरण पादुका से लेकर साड़ी, कंबल आदि चीजें ऑफिसियल बांटे जाते थे, इस नाम पर कि जंगलों में वास करने वालों को सहूलियतें मुहैया कराई जा सकें। मगर वोट बैंक की राजनीति का नतीजा यह हुआ कि पिछले एक दशक में सरकार का अर्निंग वाला लघु वनोपज संघ अब घाटे में आ गया है। सरकार को पैसे देने वाले इस संघ को उल्टे 200 करोड़ देने पड़े हैं। ये स्थिति इसलिए आई कि तेंदूपत्ता संग्रहण का रेट 4 हजार से बढ़ते-बढ़ते 5500 प्रति बोरे तक पहंुच गया। जबकि, वह बिकता काफी कम में है। जानकारों का कहना है, करीब 50 परसेंट से अधिक तेंदूपत्ते की क्वालिटी इतनी खराब होती है कि पांच सौ-छह सौ में बिकता है। यानी 5500 रुपए पेंमेंट कर 600 में बेचना, तो ये करोेड़ों रुपए मुनाफे वाले फेडरेशन को घाटे में आना ही था।

ठाकुर लॉबी

ऐसी चर्चा है कि क्षेत्रीय संगठन महामंत्री के लिए सौदान सिंह का नाम भी चला था। मगर वो हुआ नहीं। ऐसा भी हो सकता है, वे दोबारा छत्तीसगढ़ आना नहीं चाहते होंगे। इसलिए शिवप्रकाश को छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी दी गई। अलबत्ता, संगठन मंत्री कर्मवीर सिंह छत्तीसगढ़ आ रहे, वे यूपी के ठाकुर हैं। कर्मवीर सिंह भले ही जात-पात में विश्वास नहीं रहते होंगे, मगर उनके नाम से बीजेपी की ठाकुर लॉबी गदगद है।

पीएससी फेल आईएएस पर भारी

पिछले तरकश में सिस्टम में प्रायवेट कंसलटेंट की दखलंदाजी का जिक्र किया गया था। उसके बाद कई आईएएस लोगों को बता रहे...ये चार-पांच लाख वेतन पाने वाला बंदा नहीं होता तो प्रोजेक्ट का काम नहीं होता। दिलचस्प यह है कि उनमें से जो कोट-टाई बांध कर कंसलटेंट बने घूम रहे, वे यूपीएससी तो छोड़ि़ये, पीएससी नहीं निकाल सके। मगर अफसरों को कुतर्क कर कंसलटेंसी से काम कराना है तो क्या ही कहा जा सकता है। अब ये नौकरशाह कंसलटेंट की हिमायत क्यों कर रहे, उसके पीछे भी मजेदार खेल है। कंसलटेंट कंपनियां जिनकी तनख्वाह चार-से-पांच लाख रुपए बताती है, उसमें से मुश्किल से उन्हें एकाध लाख मिलता है, बाकी पैसा कैश में कंपनियों को वापिस हो जाता है। फिर कितने अधिकारी और कर्मचारी काम कर रहे, उनकी संख्या में भी बड़ा गोलमाल होता है। इस कंसलटेंसी के खेल में अफसरों को मोटी रकम एकमुश्त मिल जाती है। बिना किसी जोखिम के। हालांकि, हाउसिंग बोर्ड के एमडी अवनीश शरण ने बड़़ी कार्रवाई करते हुए प्लेसमेंट एजेंसी को निरस्त कर दिया, उसकी सिक्यूरिटी मनी भी जब्त कर ली। जांच में पता चला कि प्लेसमेंट एजेंसी मुलाजिमों को पूरे पैसे नहीं दे रही थी। और जो जमा राशि थी, उसे भी लटका रखी थी। चीफ सिकेट्री को कंसलटेंट की उपयोगिता पर एक रिव्यू करना चाहिए, क्योंकि जो काम सरकारी सिस्टम में बैठे लोग कर सकते हैं, उसके लिए करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाया जा रहा। जो काम 50 से 75 हजार के आदमी से कराया जा सकता, उसके लिए चार-चार, पांच-पांच लाख फेंके जा रहे। और इनमें से अधिकांश बड़े अफसरों के नाते-रिश्तेदार होते हैं। कोई भी विभाग इस खेल से अछूता नहीं है।

हफ्ते का कोट

'सफलता वह नहीं है...जब दुनिया आपकी प्रशंसा करें। सफलता तब है...जब वर्षों के संघर्ष के बाद भी, आपके भीतर का मनुष्य जीवित रहे, क्योंकि शिखर तक पहुंचना कठिन है, पर वहां पहुंचकर स्वयं को बचाए रखना, उससे भी कठिन।'

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या स्मृति ईरानी और कर्मवीर सिंह के आने के बाद मंत्रियों द्वारा डंके की चोट पर पोस्टिंग के लिए बोली लगाई जाती है, उस पर रोक लगेगी?

2. पार्टी को चंदा देने की आड़ में किन-किन मंत्रियों ने मंत्री पद की गरिमा को ताक पर रख आरगेनाइज लूट मचा दी है?



शनिवार, 19 सितंबर 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: प्रशासन में उल्टी गंगा

 


तरकश, 20 सितंबर 2026

संजय के. दीक्षित

प्रशासन में उल्टी गंगा

छत्तीसगढ़ के राजस्व केसों में अंधेर नगरी जैसा हाल हो गया है। आम आदमी इस उम्मीद से तहसील कोर्ट के फैसलों के खिलाफ कलेक्टर और कमिश्नर कोर्ट में अपील करता है कि उसे न्याय मिलेगा, मगर कमोवेश सभी जगहों पर देखने में आ रहा कि ये साहबान लोग उसे बिना कोई निर्णय किए नीचे के अधिकारियों को लौटा दे रहे। जबकि, भू-राजस्व संहिता 49 की धारा 3 में स्पष्ट उल्लेख है कि अपीलीय प्राधिकारी याने कलेक्टर, कमिश्नर राजस्व केसों को पुनर्विचार या फिर से निर्णय करने के लिए केस को नीचे कदापि नहीं भेज सकते। उन्हें हर हाल में अपना फैसला देना होगा। केस की सुनवाई में अगर उन्हें कुछ और डक्यूमेंट की जरूरत होगी तो वे खुद ही तलब करेंगे...और अपने स्तर पर ही उसका निबटारा करेंगे। मगर छत्तीसगढ़ में राम राज है। कोई देखने वाला है नहीं...स्थिति यह है कि 90 परसेंट से अधिक केसेज कलेक्टर, कमिश्नर अपने अधीनस्थ अफसरों को लौटा दे रहे। इससे तहसील कार्यालयों में केसों की पेंडेंसी लगातार बढ़ती जा रही। दरअसल, सूबे के कलेक्टरों और कमिश्नरों ने अपनी जिम्मेदारी से बचने का ये तरीका निकाला है...अब आम आदमी भटकता रहे, उन्हें क्या फर्क पड़ना। आगे जब भी कलेक्टर कांफ्रेंस हो, इसे एजेंडा में शामिल करना चाहिए कि कितने अपीलीय प्राधिकारी ने अपील के कितने मामलों को निबटारा किया और कितने को नीचे वापिस किया, चौंकाने वाली संख्या सामने आएगी।

बड़े मियां तो बड़े मियां...

वो युग चला गया, जब कलेक्टर, कमिश्नर राजस्व मामलों के गहरी दिलचस्पी लेते थे। कलेक्टर साल में एकाध बार ब्लॉकों में पहुंुचकर खुद ही डक्यूमेंट चेक कर लेते थे। मगर अब के कलेक्टरों को राजस्व से कोई वास्ता नहीं। गलती उनकी भी नहीं। अब डीएमएफ में इतना पैसा आ गया है कि बेचारे कलेक्टर उसी गुनतारे में व्यस्त रहते हैं कि उसे खर्च कैसे करें। खैर बात मुद्दे की। छत्तीसगढ़ सरकार ने जमीन या संपत्ति की रजिस्ट्री के बाद ऑटो नामंतरण जैसा बड़ा रिफार्म किया है। मगर राजस्व विभाग उसे सफल होने दें तब तो! पिछले हफ्ते इसी स्तंभ में हमने बताया था कि किस तरह प्रायोजित आपत्तियां लगाकर नामंतरण रोका जा रहा। इसमें नया अपडेट यह है कि रजिस्ट्री के बाद आटो नामंतरण हो भी गया तो पटवारी अपना रिकार्ड नहीं सुधारता। पटवारी या तहसील ऑफिस में आप जाएंगे तो कहा जाएगा कि त्रुटि सुधार का आप्लीकेशन लगाइये। याने त्रुटि राजस्व विभाग का और आवेदन करें भुक्तभोगी व्यक्ति। उपर से बिना चढ़ावा कुछ होगा नहीं। याने सरकार कोई भी रिफार्म कर लें, आपको पटवारी के पास जाना ही होगा।

नाम चढ़ाने का 27 लाख

एक बड़े जिले का मामला है...एक रोड कंट्रेक्टर ने करीब 54 करोड़ में 20-22 एकड़ जमीन परचेज किया। जमीन की रजिस्ट्री हो गई। नाम भी चढ़ गया। मगर उसे ऑनलाइन करने के लिए राजस्व महकमा अड़ गया, क्योंकि सामने वाला बड़ा आसामी था। ठेकेदार को डर था कि इतना बड़ा सौदा है...राजस्व विभाग कहीं किसी मामले में उलझा दिया या दोबारा किसी की रजिस्ट्री करवा दिया...जैसा की आमतौर पर होता है...तो बड़ी चपत लग जाएगी। थक हारकर उसे 27 लाख देना पड़ा, तब जाकर ऑनलाइन नाम चढ़ा।

बिहार में बड़ा मूवमेंट

बिहार की नई बीजेपी सरकार ने जमीनों को डिजिटल रिकार्ड दुरूस्त करने बड़ा अभियान चलाया है। 17 सितंबर से लेकर 31 अक्टूबर तक पूरे राज्य में स्पेशल कैंपेन चलाया जा रहा। इसके लिए वहां के सिस्टम ने कलेक्टरों को नोडल अधिकारी बनाया है...कलेक्टर रोज इसकी मॉनिटरिंग करेंगे। राजस्व विभाग से कहा गया है कि गांव में कैंप लगाकर रिकार्ड ठीक करें। अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गई तो उसके वास्तविक वारिस का नाम ऑनलाईन रिकार्ड में चढ़ना चाहिए। याने झगड़े की पूरी वजह ही खतम हो जाएगी। छत्तीसगढ़ में भी ऐसा कुछ करना चाहिए।

कलेक्टरों को मिशन मोड

जमीनों की रजिस्ट्री के साथ ऑटो नामंतरण के लोकार्पण कार्यक्रम में सीएम विष्णुदेव साय ने राजस्व अमले को यमराज से तुलना की थी। उन्होंने बताया...30 साल पहले जब वे विधायक थे, एक तहसीलदार ने उनके एक परिचित की जमीन का नामंतरण 18 साल से लटका कर रखा था...वे खुद मोटर सायकिल पर उसे बिठाकर तहसील ऑफिस गए और फिर नामंतरण करवाया। बहरहाल, पड़ोस के तेलांगना और ओड़िसा ने राजस्व मामलों में काफी बदलाव कर आम आदमी का काम आसान कर दिया। मगर छत्तीसगढ़ में पटवारी और तहसीलदार राज से लोगों को मुक्ति नहीं मिल रही तो इसकी बड़ी वजह प्रशासन तंत्र की कमजोरी है। सरकार ने ऑटो नामंतरण का ऐतिहासिक रिफार्म किया मगर राजस्व विभाग के जिम्मेदार लोगों ने कभी देखने की कोशिश नहीं की, इसमें राजस्व अमला किस तरह रोड़ा अटका रहा। सरकार अगर कलेक्टरों की एकाउंटबिलिट तय कर दें तो महीने भर में राजस्व विभाग का भ्रष्टाचार रुक जाएगा। इसके लिए एकाध कलेक्टरों को लटकाना पड़े, तो इसमें कोई हर्ज नहीं। क्योंकि, बिना कलेक्टर के संरक्षण के राजस्व विभाग का ये खेल कतई संभव नहीं।

लिटमस टेस्ट

छत्तीसगढ़ में चार नगर निगमों में चुनाव होना है। बीरगांव, भिलाई, रिसाली और भिलाई-चरौदा। ये चुनाव बीजेपी और कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न होगा। क्योंकि, चारों सीटें कांग्रेस के पास है और सत्ताधारी पार्टी की कोशिश होगी कि उसमें किस तरह सेंध लगाया जाए। बहरहाल, भिलाई इलाके के तीन नगर निगमों के चुनाव कांग्रेस के भूपेश बघेल और देवेंद्र यादव गुट के लिए भी लिटमस टेस्ट होगा। प्रत्याशी चयन में जिस गुट को ज्यादा मौका मिलेगा, और उसके नतीजे...2028 के विधानसभा चुनाव के राजनीतिक दिशा का संकेत देंगे। हालांकि, इसमें कोई संशय नहीं कि कांग्रेस में भूपेश बघेल गुट इस समय सबसे स्ट्रांग है। मगर भूपेश के शिष्य रहे देवेंद्र यादव उन्हें लगातार टक्कर दे रहे हैं। अलबत्ता, देवेंद्र यादव का राजनीतिक कैनवास अभी स्टेट लेवल नहीं हुआ है मगर यादवों के साथ सतनामी समुदाय में उनकी पैठ बढ़ी है। फिर, कांग्रेस की सियासत में दिल्ली कनेक्शन का बड़ा रोल होता है...और देवेंद्र ने ये काम वहां ठीकठाक कर लिया है। फिलहाल ये देखना दिलचस्प होगा कि प्रत्याशी चयन में कौन गुट भारी पड़ता है।

कलेक्टर, एसपी की ये कैसी ट्रेनिंग?

पीएम आवास का प्रोग्राम सक्ती में क्यों रखा गया, ये अलग प्रश्न है मगर केंद्रीय पंचायत मिनिस्टर शिवराज सिंह की मौजूदगी में काले झंडे से लेकर जिस तरह हूटिंग हुई, वह प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय है। दरअसल, कार्यक्रम ऐसा नहीं था कि उसे मैनेज नहीं किया जा सके। चूकि जांजगीर और सक्ती कांग्रेस का गढ़ है...बीजेपी के एक भी विधायक वहां नहीं, सो जैसी सतर्कता बरतनी चाहिए थी, वो हुआ नहीं। सिस्टम को चाहिए कि जिले में कलेक्टर या एसपी बनाने से पहले किसी अच्छे कलेक्टर या एसपी के अंदर में रख एकाध महीने की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। वो इसलिए कि आजकल एडीएम या अपर कलेक्टर वाला सिस्टम खतम हो गया है। 80 परसेंट कलेक्टर्स, एसपी को लॉ एंड आर्डर फेस करने का तजुर्बा नहीं। सक्ती में जिन्हें कलेक्टर बनाया गया, वे लंबे समय तक मुख्य सचिव की स्टाफ अफसर रहीं। फील्ड में कब पोस्टिंग की, शायद उन्हें भी याद नहीं होगा। बिलासपुर में जिला पंचायत सीईओ बनाया गया तो चार महीने में ही छुट्टी पर चली गई, फिर सरकार को पोस्टिंग बदलनी पड़ी। अब उन्हें सीधे नेता प्रतिपक्ष के जिले में भेज दिया गया। हालांकि, छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक इनोवेशन पर काफी काम हो रहा। कलेक्टर बनाने से पहले आईएएस अधिकारियों को एडीएम की एक पोस्टिंग देने की परंपरा फिर शुरू करनी चाहिए। वरना, वही होगा कि बलौदा बाजार में हिंसा की घटना हुई तो कलेक्टर जिला छोड़ भाग निकले थे...अभी भी स्थिति बदली नहीं है। इस तरह की कोई नौबत आए तो कितने कलेक्टर, एसपी फ्रंट पर टिक पाएंगे, सिस्टम में बैठे लोगों को इसे सनद रखना चाहिए।

झारखंड से दीये

पीएम नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर दीये जलाने का टारगेट तो कलेक्टरों ने बढ़-चढ़कर दे दिया मगर दीयों का बंदोबस्त करने में उनके पसीने छूट गए। दरअसल, कुम्हार बरसात बाद दिवाली के लिए दीये बनाने प्रारंभ करते हैं। इसलिए दीये का स्टॉक था नहीं। उपर से मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और बीजेपी कार्यकर्ताओं में दीये खरीदने की होड़ मच गई। सो, बाजार से दीये पहले ही खतम हो गए थे। कलेक्टरों के समक्ष दिक्कत ये भी थी...लाख रुपए का बजट मिला, उपर से सवा लाख दीये का टारगेट...और मार्केट से दीये नदारत। कई कलेक्टरों ने झारखंड तक आदमी दौड़ाए। झारखंड में गैर बीजेपी सरकार है, इसलिए वहां दीयों की उतनी डिमांड नहीं रही। कुल मिलाकर पर्सनल एप्रोच लगाकर कलेक्टरों ने ठीकठाक दीये जलवा लिए।

24 आईएएस डेपुटेशन पर

छत्तीसगढ़ में एक वो भी टाईम था, जब दो आईएएस सेेंट्रल डेपुटेशन पर होते थे। एक सुनिल कुमार और दूसरा बीवीआर सुब्रमणियम। सुब्रमणियम तो राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ आए ही नहीं थे, सो उनका काउंट भी नहीं होता था। याने एक ही डेपुटेशन माने। मगर धीरे-धीरे अफसरों की संख्या बढ़ी तो प्रतिनियुक्ति में भी उसी के अनुरूप इजाफा हुआ। इस समय पूरे 24 आईएएस अधिकारी डेपुटेशन पर हैं। इनमें 93 बैच के दूसरे नंबर के सबसे सीनियर आईएएस अमित अग्रवाल भी शामिल हैं। 2011 बैच के नीलेश श्रीरसागर भी डेपुटेशन के लिए ट्राई कर रहे थे, मगर अब डायरेक्टर अर्बन की पोस्टिंग मिलने का मतलब है, वे अब शायद ही जाएं। मगर 2012 बैच के दो-तीन आईएएस अगले साल जरूर दिल्ली का रुख करेंगे। उससे पहले बहुत संभावना है कि दिसंबर तक अंकित आनंद भी दिल्ली जाएं। यानी संख्या और बढ़नी ही हैं। खैर, भारत सरकार ने ज्वाइंट सिकेट्री बनने के लिए सेंट्रल डेपुटेशन अनिवार्य कर दिया है। मगर दिक्कत यह है कि चुनिंदा अफसरों को ही केंद्र क्लियरेंस देता है। छत्तीसगढ़ से 24 आईएएस दिल्ली गए हैं, उनमें से कम-से-कम 15 तो काफी अच्छे अफसर होंगे। इससे राज्य को नुकसान तो होता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में और भी...जहां रीढ़ सीधा करके काम करने वाले अफसरों की बड़ी जरूरत है।

हफ्ते का कोट

ज़मीर ज़िंदा रख...कबीर ज़िंदा रख...सुल्तान भी बन जाए तो दिल में फ़कीर ज़िंदा रख। हौंसले के तरकश में कोशिश का वो तीर ज़िंदा रख...हार जा चाहे ज़िन्दगी में सब कुछ, मगर फिर से जीतने की उम्मीद ज़िंदा रख।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. जिन 12 जिलों में महिलाओं को कलेक्टर बनाया गया है, उनके परफार्मेंस के बारे में पब्लिक ओपिनियन क्या हैं?

2. मंत्री अगर सूटकेस के वजन को पोस्टिंग का पैरामीटर बना लेंगे तो क्या छत्तीसगढ़ में वर्किंग कल्चर डेवलप होने की कल्पना करनी चाहिए?