रविवार, 1 नवंबर 2020

प्रमोटी नहीं, डायरेक्ट कलेक्टर

 संजय के दीक्षित

तरकश, 1नवंबर 2020
गरियाबंद के कलेक्टर छत्तर सिंह डेहरे आज छह महीने की अल्प पारी पूरी कर रिटायर हो गए। उनकी जगह पर किसी प्रमोटी आईएएस को कलेक्टर बनाने की चर्चा थी। धर्मेश साहू का नाम चल भी रहा था। दोपहर में आरआर याने डायरेक्ट आईएएस नम्रता गांधी का नाम उड़ा। लेकिन, सरकार ने आरआर आईएएस नीलेश क्षीरसागर को गरियाबंद भेजना मुनासिब समझा। नीलेश का ये दूसरा जिला होगा। पहला जिला उनका जशपुर था। अलबत्ता, जशपुर से हटने के बाद भी सरकार ने उन्हें महत्वपूर्ण पोर्टफोलिया दिया था।

संख्या घटी

कांकेर कलेक्टर केएल चौहान जिस तरह विवादों में घिर रहे थे, उससे यह क्लियर था कि अब उनकी कलेक्टरी नहीं रहेगी। सरकार ने आज उन्हें हटा दिया। लेकिन, इस लिस्ट से खासकर प्रमोटी आईएएस अधिकारियों को धक्का लगा होगा। गरियाबंद में डायरेक्ट आईएएस नीलेश क्षीरसागर। और, कांकेर में भी डायरेक्ट आईएएस चंदन कुमार। प्रमोटी कलेक्टरों की संख्या दो और कम हो गई, तो जाहिर है उन्हें तकलीफ होगी ही।

सिर्फ ट्रेनी आईएएस नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रेनी आईएएस को दिखास और छपास से बचने की नसीहत दी है। अहमदाबाद में उन्होंने कहा कि अखबारों और टीवी चैनलों में सिर्फ छपने की लालसा से आईएएस काम न करें। वे काम ऐसा करें कि उस काम से उनका नाम हो। प्रधानमंत्री ने ये बात सिर्फ नए अफसरों के संदर्भ में नहीं कही है। दरअसल, उनका तो ये बस इशारा मात्र था। वैसे भी, ट्रेनी तो सभी माने जाते हैं। आईएएस के पूरे कैरियर में ट्रेनिंग प्रोग्राम चलते रहते हैं। डीओपीटी हर दो साल में ट्रेनिंग प्रोग्राम कंडक्ट करते रहता है। गौर करने वाली बात ये है कि प्रधानमंत्री को आखिर सिविल सर्विसेज के अधिकारियों को नसीहत देने की जरूरत क्यों पड़ गई। ब्यूरोक्रेसी के लोग ही बताते हैं, पीएमओ में डीपीओटी से एक रिपोर्ट पहुंची है, जिसमें बताया गया है कि मीडिया और सोशल मीडिया के अतिशय प्रेम मे चलते नौकरशाहों के काम के स्तर में काफी गिरावट आई है। ब्यूरोक्रेट्स वही काम कर रहे, जिसमें उन्हें मीडिया में स्पेस मिले। मीडिया में न तो फिर फेसबुक और यूट्यूब तो है ही।

छत्तीसगढ़ में भी ये बीमारी

प्रधानमंत्री ने नौकरशाहों की ओर जिस बीमारी का इशारा किया है, उससे छत्तीसगढ़ की नौकरशाही भी नहीं बची है। बल्कि जकडी हुई है। पिछली सरकार में सार्वजनिक नल पर पानी पीते एक आईएएस की फोटो वायरल हुई थी। लोगों ने उस आईएएस को खूब सैल्यूट किया था। उसके बाद तो ये बीमारी फैलती चली गई। सूबे में एक समय ऐसा आ गया था कि अफसर सोशल मीडिया में ही काम करने लगे थे। पिछली सरकार का जो हश्र हुआ, उसमें बड़ा योगदान फेसबुकिया अधिकारियों का भी रहा। धरातल पर कोई काम ही नहीं हुआ। दरअसल, अफसर काम वही पकड़ता है, जिसमें माइलेज मिले। कलेक्टर अपने पसंद का एक काम पकड लेता है, बाकी की ओर वो आंख उठाकर नहीं देखेगा। मंत्रालय में सचिवों का भी लगभग यही हाल है। मंत्री जिस काम से खुश वही प्रमुखता से होगा बाकी योजनाओं की फाइलें धूल खाते पड़ी रह जाती हैं। ब्यूरोक्रेसी की यही प्रवृति उसके भरोसा खोने की वजह बन रही है।

गेहूं के साथ घुन

दिल्ली में हुई डीपीसी में छत्तीसगढ़ के सात डिप्टी कलेक्टरों को आईएएस अवार्ड करने हरी झंडी मिल गई है। इसमेें 2005 बैच के डिप्टी कलेक्टर शामिल हैं या नहीं, इसका खुलासा नहीं हुआ है। मगर ये बात सही है कि गेहूं के साथ घून पिसता है। 2005 बैच में 13 डिप्टी कलेक्टर हैं इनमें ऐसा नहीं है कि सारे-के-सारे गलत तरीके से सलेक्ट हुए होंगे। कुछ अफसर फील्ड में काम भी बढ़ियां कर रहे। लेकिन, जिस तरह इस बैच के लोगों ने जांच को रोकवाने में अपनी पूरी ताकत लगाई, उसकी बजाए अगर वे जांच होने दिए होते तो अच्छे वाले बच जाते। जाहिर है, उन्हें आईएएस अवार्ड में होने में कोई दिक्कत नहीं होती। लेकिन, हाईकोर्ट ने जब नियुक्ति निरस्त कर पीएससी को फिर से स्केलिंग करने कहा तो इस बैच ने सुप्रीम कोर्ट में देश के सबसे महंगे वकील हरीश साल्वे को खड़ा कर दिया। वहां से उन्हें स्टे मिल गया। दिल्ली में हुई डीपीसी में इस बैच को मौका मिला कि नहीं, इस बारे में कोई जानकारी सामने नहीं आ रही। मगर यूपीएससी ने सुप्रीम कोर्ट की जांच तक अगर इन्हें डीपीसी में शामिल करने से मना कर दिया होगा तो? तब खतरा ये रहेगा कि इस बैच के सभी 13 डिप्टी कलेक्टरों को बिना आईएएस बने ही रिटायर होना पड जाएगा। इसमें उन अधिकारियों का नुकसान हो जाएगा, जो मेहनत करके पीएससी क्लियर किए थे।

20 साल में पहली बार

भूपेश बघेल कैबिनेट ने जल मिशन का विवादित टेंडर निरस्त कर दिया। राज्य बनने के 20 बरस में यह पहली बार हुआ कि सरकार इतना बड़ा एक्शन लेते हुए किसी टेंडर को कैबिनेट में लेकर गई और वहां उसे निरस्त किया गया। इस मामले में मंत्रालय में बैठे आईएएस अफसर भी सवालों के घेरे में हैं। स्वाभाविक प्रश्न है कि अफसरों को इस बारे में क्या सरकार को सचेत नहीं करना था। या विधि विपरीत था तो उसे रोकना था। पिछली सरकार ने जब तेरहवें वित्त आयोग के पैसे से बस्तर में टाॅवर लगाने का फैसला किया तो तत्कालीन एसीएस पंचायत एमके राउत और तत्कालीन डायरेक्टर पंचायत तारण सिनहा ने नोटशीट में लिख दिया था कि नियमानुसार ऐसा नहीं किया जा सकता। तब सरकार उसे लेकर कैबिनेट में गई थी। खैर, वो मामला अलग था। बहरहाल, इस टेंडर मामले में गनीमत है कि समय रहते सरकार ने बड़ा स्टेप लेते हुए टेेंडर रद्द कर दिया। वरना. भारत सरकार का पैसा था, सीबीआई जांच होती तो कई अधिकारी निबट जाते।

एक अनार सौ

एलाॅयड सर्विस से आईएएस के एक पद के लिए अबकी रिकार्ड आवेदन आए हैं। अफसर भी मानते हैं कि 20 साल में इतना कभी नहीं आया। दो दर्जन से अधिक। सामान्य प्रशासन विभाग इसकी स्कूटनी करके पांच अधिकारियों का पेनल बनाएगा। इसके बाद दिल्ली में मीटिंग होगी। उसमें चीफ सिकरेट्री, एसीएस और जीएडी सिकरेट्री के साथ यूपीएससी एवं डीओपीटी के अधिकारी होंगे। अभी तक एलायड सर्विस से डाॅ0 सुशील त्रिवेदी, आलोक अवस्थी, शारदा वर्मा और अनुराग पाण्डेय आईएएस बन चुके हैं। इनमें से त्रिवेदी मध्यप्रदेश के समय बन गए थे। बाकी तीनों छत्तीसगढ़ बनने के बाद। बहरहाल, इनमें दो-तीन नामों की चर्चा बड़ी तेज है, उनके साथ अब दिक्कत ये होगी कि वे भी पीएससी के 2005 बैच वाले हैं। अगर इस बैच के डिप्टी कलेक्टरों को आईएएस रुकेगा तो फिर इनका भी नहीं होगा।

आईएफएस रिटायर

पीसीसीएफ बजट और वन विकास निगम के एमडी देवाशीष दास आज रिटायर हो गए। देवाशीष जितने समय वन विकास में रहे होंगे, लगभग उतने समय डेपुटेशन पर मंत्रालय में भी। बहरहाल, सरकार जल्द ही वन विभाग के कुछ खाली पदों पर नई पोस्टिंग करने वाली है तो कुछ अति होशियार अफसरों की छुट्टी भी।

अंत में दो सवाल आपसे

1. ठेकेदार किस विभाग के सिकरेट्री के घर एडवांस वापिस मांगने धमक जा रहे हैं?
2. कुछ जिलों के पुलिस अधीक्षकों को सरकार क्या कमांडेंट बनाने जा रही है?

शनिवार, 24 अक्तूबर 2020

कलेक्टर के लिए सिंगल नाम?

संजय के दीक्षित
तरकश, 25 अक्टूबर 2020
गरियाबंद कलेक्टर छतर सिंह डेहरे के रिटायरमेंट में अब हफ्ता भर बच गया है। 31 अक्टूबर उनकी लास्ट वर्किंग रहेगी। जाहिर है, 30 या 31 अक्टूबर को नए कलेक्टर का आदेश निकल जाएगा। ब्यूरोक्रेसी में जिज्ञासा इस बात की ज्यादा है कि कलेक्टर का सिंगल आर्डर निकलेगा या गरियाबंद के साथ कुछ और जिलों के कलेक्टर बदल जाएंगे। हालांकि, मरवाही विधानसभा उपचुनाव में सरकार की व्यस्तता को देखते ऐसा लगता नहीं कि लिस्ट में एक से ज्यादा नाम होगा। मगर ये पूरा सरकार के उपर निर्भर करेगा। हो सकता है कि राजधानी से किसी प्रमोटी या डायरेक्ट आईएएस को कलेक्टर बनाकर गरियाबंद भेज दें और मरवाही चुनाव के बाद बाकी लिस्ट निकाली जाए।

फर्जी नहीं भाई, असली

सूबे के एक संसदीय सचिव 20 अक्टूबर को एक दिन के चुनाव प्रचार पर बिहार के मधुबनी गए थे। मगर उनके रायपुर से रवाना होने से पहले उनका निज सचिव ने कुछ ऐसा कर डाला कि पटना से लेकर मधुबनी तक कोहराम मच गया। संसदीय सचिव का प्रोग्राम जारी करते हुए उनके स्टाफ ने बिहार के चीफ सिकरेट्री, डीजीपी, राज्य प्रोटोकाॅल अधिकारी समेत मधुबनी के डीएम, एसपी को पत्र भेज सुरक्षा सुनिश्चित करने लिख दिया। बिहार में एक तो चुनाव चल रहा…आचार संहिता के दौरान इस तरह का लेटर….वो भी संसदीय सचिव के लिए….अफसर हैरानी में पड़ गए। दरअसल, इस तरह का पत्र मुख्यमंत्री के दौरे के संदर्भ में भेजा जाता है। ऐसे में, पटना और मधुुबनी के अफसरों का माथा ठनका कि कोई फर्जी मामला है। वहां के प्रशासनिक अफसरान छत्तीसगढ़ के अपने बैचमेट्स को फोन खड़खडाने लगे। यहां के अफसरों ने बताया कि संसदीय सचिव फर्जी नहीं, असली हैं…अति उत्साह में उनका इस तरह प्रोग्राम जारी हो गया। तब जाकर मामला ठंडा हुआ।

बड़ा दिल!

आईएफएस राकेश चतुर्वेदी आखिरकार हेड आफ फाॅरेस्ट फोर्स प्रमोट हो गए। मगर इसमें दिलचस्प यह है कि डीपीसी के लिए चार सदस्यीय जो कमेटी बनाई गई थी, उनमें सीएस आरपी मंडल, पीएस फाॅरेस्ट मनोज पिंगुआ, भारत सरकार के प्रतिनिधि के अलावा एक नाम सीजी काॅस्ट के डायरेक्टर जनरल मुदित कुमार का भी था। मुदित कुमार बोले तो एक्स पीसीसीएफ एवं हेड आफ फाॅरेस्ट। सरकार ने पिछले साल उनकी जगह पर राकेश चतुर्वेदी को पीसीसीएफ अपाइंट किया था। आमतौर पर ऐसे सिचुएशन में दो बड़ों के बीच केमेस्ट्री गड़बड़ा जाती है। लेकिन, मुदित कुमार ने डीपीसी की बैठक में राकेश चतुर्वेदी को हेड आफ फाॅरेस्ट बनाने में कोई मीन-मेख निकालने की बजाए पूरा सपोर्ट किया। चलिये, ये अच्छी बात है।

अमित कांबले लौटे

आईपीएस अमित कांबले एसपीजी के डेपुटेशन से छत्तीसगढ़़ लौट आए हैं। दुर्ग आईजी विवेकानंद के बाद वे एसपीजी में जाने वाले छत्तीसग़ढ के दूसरे आईपीएस थे। कांबले का एसपीजी में तीन साल हो गया था। वे चाहते तो दो साल और कंटीन्यू कर सकते थे। लेकिन, उन्होंने लौटना मुनासिब समझा। 2009 बैच के आईपीएस कांबले का डीआईजी बनने में ढाई साल बचा है।

लिस्ट दिवाली के बाद

एसपी लेवल पर एक लिस्ट निकलने की चर्चा काफी समय से चल रही है। अब चूकि मरवाही चुनाव में सरकार व्यस्त है और फिर सामने दिवाली है। लिहाजा, समझा जाता है अब दिवाली के बाद ही सरकार आईपीएस की लिस्ट निकालेगी। अब अमित कांबले भी छत्तीसगढ़ लौट आए हैं…एसपी के वे भी दावेदार होंगे। उनके अलावे करीब आधा दर्जन जिले के एसपी ट्रांसफर में प्रभावित हो सकते हैं।

डीपीसी के बाद पोस्टिंग नहीं

आमतौर पर डीपीसी के बाद प्रमोशन के साथ पोस्टिंग आदेश भी निकल जाता है। मगर चार सीसीएफ को प्रमोशन करके फाॅरेस्ट डिपार्टमेंट ने एडिशनल पीसीसीएफ तो बना दिया मगर बिना पोस्टिंग के। सुनील मिश्रा, प्रेम कुमार, अनुप विश्वास और ओपी यादव को अब नई पदास्थापना के लिए वेट करना होगा। वैसे ये चारों अफसर फरवरी से प्रमोशन का इंतजार कर रहे थे।

एमडी रिटायर

वन विकास निगम के एमडी देवाशीष दास इस महीने रिटायर हो जाएंगे। यानी निगम में एमडी का पद फिर खाली हो जाएगा। कुछ ही महीने पहले राजेश गोवर्द्धन के रिटायर होने से एमडी की कुर्सी खाली हुई थी। खबर है, राज्य वन अनुुसंधान संस्थान के डायरेक्टर अतुल शुक्ला को निगम की कमान सौंपी जा सकती है। हाथियों की लगातार हो रही मौतों के बाद उन्हें वाइल्डलाईफ से हटाकर एसएफआरआई भेज दिया गया था। हाल ही में पीसीसीएफ प्रमोट हुए पीसी पाण्डेय को अतुल शुक्ला की जगह पर एसएफआरआई भेजने की चर्चा है।

जोगी कांग्रेस से उम्मीद

कहते हैं, बीजेपी 90 में से 88 विधानसभा सीट पर चुनाव लड़ती थी। मरवाही और कोटा, इन दो सीटों पर मजबूरी कहें या कोई दूरभि संधि पार्टी ने कभी दिमाग खर्च नहीं किया। सूबे के दिग्गज आदिवासी नेता डाॅ. भंवर सिंह पोर्ते के कांग्रेस छोड़ने के बाद बीजेपी को मरवाही में घुसने की गली जरूर मिली थी। रामदयाल उईके ने इसका लाभ उठाकर 97 में मरवाही से विधायक बनने में कामयाब भी हो गए। लेकिन, उईके के 2001 में कांग्रेस ज्वाईन करने के बाद बीजेपी ने कभी मरवाही सीट जीतने को छोड़ दीजिए, कैडर बनाने पर भी ध्यान नहीं दिया। अभी भी बीजेपी को उम्मीद है तो सिर्फ जोगी कांग्रेस और अपने मैनेजमेंट पर।

ऐसे थे भंवर सिंह पोर्ते

पिछले 45 साल में सिर्फ दो बार मरवाही सीट बीजेपी के पाले में गई है। और, दोनों बार भंवर सिंह पोर्ते के कारण। मरवाही से चार बार विधायक रहे पोर्ते काफी क्वालिफाइड नेता थे। अभी के आदिवासी नेताओं जैसा नहीं। दिल्ली के बड़े कांग्रेस नेताओं के साथ उठना-बैठना था। हालांकि, उनका बढ़ता कद उनके लिए नुकसानदायक रहा। 80 के दशक में पोर्ते इतने पावरफुल हो गए थे कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को अपनी कुर्सी हिलती लगी। पोर्ते पांचवी बार अगर विस चुनाव जीतते तो मुख्यमंत्री बनना उनका निश्चित था। इसलिए, पोर्ते की टिकिट काट दी गई। अर्जुन सिंह ने भंवर सिंह के एक दूर के रिश्तेदार दीनदयाल पोर्ते को टिकिट दे दिया। हालांकि, मुख्यमंत्री के शपथ लेने के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अर्जुन सिंह को पंजाब का राज्यपाल अपाइंट कर चंडीगढ़ भेज दिया था। मोतीलाल वोरा तब सीएम बने थे। अर्जुन सिंह की उपेक्षा से भंवर सिंह ने पार्टी छोड़ दी थी। लेकिन, बीजेपी में उन्हें वे मान-सम्मान नहीं मिला। सुंदरलाल पटवा सरकार में वे मंत्री जरूर रहे। लेकिन, खुश नहीं थे। लिहाजा, उन्होंने बीजेपी छोड़ दिया। इसका लाभ रामदयाल उईके ने उठाया।

अंत में दो सवाल आपसे

1. एक कलेक्टर का नाम बताइये, जो अगर कोई पांच, सात हजार रुपए भी लेकर आ जा रहा तो उसका वे पूरा सम्मान कर रहे हैं?
2. राजधानी के सिटी सेंटर माॅल की नीलामी में कौन से दो आईपीएस अफसर रुचि दिखा रहे हैं?

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2020

ग्रह-नक्षत्र के शिकार

 संजय के दीक्षित

तरकश, 18 अक्टूबर 2020
ग्रह-नक्षत्र के चक्कर में राजभवन के सचिव सोनमणि बोरा भले ही पिस गए हों मगर इसमें एक वजह और भी बताई जा रही है। खबर है, स्टेट गवर्नमेंट की अहम योजना मोहल्ला क्लीनिक के लिए सरकार ने बोरा से कहा था कि लेबर विभाग के मद से कुछ पैसे नगरीय प्रशासन विभाग को ट्रांसफर कर दें। बोरा ने नियमों का हवाला देकर ऐसा करने से मना कर दिया। सरकार को यह नागवार गुजरा। सरकार ने पिछले हफ्ते बोरा से लेबर विभाग लेकर अंबलगन पी को सौंप दिया। लेबर विभाग से 55 करोड़ रुपए नगरीय प्रशासन को ट्रांसफर कर दिया। कुल मिलाकर बोरा के लिए हार्ड लक वाला मामला रहा। पिछली सरकार में भी वे हांसिये पर रहे। खासकर तीसरी पारी में उन्हें अच्छी पोस्टिंग नहीं मिल पाई। यहां तक कि हायर स्टडी के लिए यूएस जाने के लिए उन्हें कितने पापड़ बेलने पड़े थे। पिछले साल वहां से लौटकर आए तो पोस्टिंग के लिए महीना भर वेट करना पड़ा। फिर हायर एजुकेशन विभाग मिला भी तो 21 दिन में खिसक गया। इसके बाद ऐन आदिवासी नृत्य महोत्सव के पहले संस्कृति विभाग हाथ से निकल गया। और, अब राजभवन। ग्रह-नक्षत्र का कुछ चक्कर तो है बोरा के साथ, वरना वे कमजोर अफसर तो नहीं हैं।

कलेक्टरों पर भरोसा

एक नवंबर से प्रारंभ होने जा रही सरकार की अब तक की सबसे महत्वपूर्ण योजना-मोहल्ला क्लीनिक-की तैयारी युद्ध स्तर पर शुरू हो गई है। मोहल्ला क्लीनिक सिर्फ सीएम का ड्रीम प्रोजेक्ट ही नहीं है बल्कि दिल्ली की तरह अगले विधानसभा चुनाव में इसका काफी इम्पैक्ट रहेगा। इसलिए, इस योजना को सियासत से दूर रखा जा रहा है। हालांकि, प्रारंभ में हेल्थ विभाग को इसका कंसेप्ट बनाने कहा गया था। लेकिन, हेल्थ वाले कुछ नहीं कर पाए। तो सरकार ने इसका जिम्मा नगरीय प्रशासन को सौंप दिया। बाद में, सरकार के रणनीतिकारों को लगा कि नगरीय प्रशासन विभाग के चक्कर में मामला गड़बड़ा न जाए…महापौर, पार्षद आखिर राजनीति करने से मानेंगे कहां। इस वजह से सरकार ने मोहल्ला क्लीनिक को कलेक्टरों के हवाले कर दिया है। इसके आॅपरेशन के लिए अरबन पब्लिक सर्विस सोसाईटी बनाई गई है। कलेक्टर इसके चेयरमैन और नगर निगम कमिश्नर सिकरेट्री होंगे। अब, कलेक्टर मंत्रियों, महापौरों की सुनते नहीं, इसलिए समझा जाता है मोहल्ला क्लीनिक में बेजा दखलांदाजी कम होगी।

गुरू को नमन!

नारी सशक्तिकरण की आईकाॅन पद्यश्री फूलबासन बाई को छत्तीसगढ़ में भला कौन नहीं जानता। फूलबासन बाई 23 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन के केबीसी शो में हिस्सा लेंगी। इसकी रिकार्डिंग हो चुकी है। फूलबासन बाई ने इस शो में अपनी कामयाबी के लिए राजनांदगांव के तत्कालीन कलेक्टर दिनेश श्रीवास्तव को भी याद किया है। शायद नए लोगों को मालूम नहीं होगा कि छत्तीसगढ़ में सबसे पहले स्व सहायता समूह गठित कर महिलाओं को प्रोत्साहित करने का काम दिनेश श्रीवास्तव ने ही राजनांदगांव में शुरू किया था। 2001 में बकरी चराने वाली पांचवी पास फूलबासन बाई उनके संपर्क में आई। श्रीवास्तव ने फूलबासन की प्रतिभा को देखकर मां बम्लेश्वरी स्व सहायता समूह गठित कराया। फूलबासन इसकी अध्यक्ष हैं। और दिनेश श्रीवास्तव आज भी उसके मुख्य संरक्षक। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इस ग्रुप में लगभग दो लाख से अधिक महिलाएं जुड़ी हुई हैं और 20 करोड़ रुपए से अधिक बैंक बैलेंस है। इसी काम के जरिये फूलबासन देश-दुनिया के लिए जानी-पहिचानी शस्खियत बन गई। तभी तो फूलबासन ने केबीसी में दिनेश श्रीवास्तव को याद किया।

हार के बाद जीत

मरवाही उपचुनाव से छत्तीसगढ़ की सियासत गरमाई हुई है। ऐसे में, कोटा उपचुनाव की याद ताजा हो जा रही। 2007 में हुए कोटा उपचुनाव में सत्ताधारी बीजेपी इस सीट को लेकर इतना संजीदा थी कि सभी 13 मंत्रियों और 30 से अधिक विधायकों को कोटा भेज दिया था। आलम यह था कि कमजोर इलाके में दो-दो, तीन-तीन गांव पर एक मंत्री तैनात कर दिए गए थे। इसके बाद भी भाजपा कोटा सीट कांग्रेस से छीन नहीं पाई। कांग्रेस के दिग्गज नेता राजेंद्र प्रसाद शुक्ल के देहावसान की वजह से यह सीट खाली हुई थी। तब राजेंद्र प्रसाद शुक्ल के परिजनों को इस सीट पर टिकिट क्यों नहीं मिली और रेणु जोगी कैसे पार्टी प्रत्याशी बन गईं…इसकी अलग कहानी है। बहरहाल, कोटा की यही हार भाजपा की 2008 में जीत की वजह बनी। इस हार के बाद सरकार को फीडबैक मिला था कि पीडीएस की खामियां सरकार को भारी पड़ी। वहीं से एक रुपए किलो चावल योजना की नींव पड़ी। यही नहीं, तत्कालीन फूड सिकरेट्री डाॅ0 आलोक शुक्ला को पीडीएस ठीक करने का जिम्मा दिया गया और शुक्ला ने छत्तीसगढ़ के पीडीएस को देश का माॅॅडल बना दिया।

राजभवन का रिवार्ड

राजभवन के नए सिकरेट्री अमृत खलको यह सोचकर जगदलपुर से रायपुर रवाना हुए कि राजभवन में एक पोस्टिंग कर लेने के बाद उसके बाद का मामला ठीक-ठाक हो जाएगा। लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। खलको अभी तक ज्वाईन नहीं कर पाए हैं। आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि राजभवन में पोस्टेड अधिकारियों को वहां से हटने पर बढ़ियां पोस्टिंग मिलती है। वो चाहे सिकरेट्री हो या एडीसी। एडीसी में दिपांशु काबरा से लेकर विवेकानंद, राहुल शर्मा, डाॅ0 आनंद छाबड़ा, भोजराम पटेल…सभी को अच्छे जिलों की कप्तानी मिली। इसी तरह शुरू से लेकर अभी तक…राजभवन के फस्र्ट सिकरेट्री सुशील त्रिवेदी भारी-भरकम दो विभाग के सिकरेट्री बनाए गए थे। उनके बाद आईसीपी केसरी पीडब्लूडी के सिकरेट्री बनें। अमिताभ जैन को भी पीडब्लूडी और जनसंपर्क मिला। पीसी दलेई राज्य निर्वाचन आयुक्त बनाए गए। जवाहर श्रीवास्तव और अशोक अग्रवाल सूचना आयुक्त बनें। सुरेंद्र जायसवाल को तो रिटायरमेंट की शाम ही संसदीय सचिव पर संविदा नियुक्ति मिल गई। लेकिन, खलको का पता नहीं अब क्या होगा।

पहली बार दो आईएएस

राज्य बनने के बाद कभी ऐसा नहीं हुआ कि राजभवन में दो आईएएस पोस्ट किए गए हों। एक आईएएस सिकरेट्री रहता है। और, राप्रसे का अफसर डिप्टी या ज्वाइंट सिकरेट्री। इस बार राजभवन को इम्पाॅर्टेंस देते हुए सरकार ने अमृत खलको को सचिव और केडी कुंजाम को ज्वाइंट सिकरेट्री गनाया है। ये अलग बात है कि दोनों अभी ज्वाईन करने में कामयाब नहीं हो पाए हैं।

तरकश की खबर

तरकश स्तंभ के पिछले एपीसोड में अमित के नाम पर संशय और डाॅक्टर के खिलाफ डाॅक्टर…दो खबरें थीं और दोनों सही निकली है। हमने बता दिया था कि मरवाही में अमित का चुनाव लड़ना मुश्किल है। उस समय कांग्रेस और बीजेपी के कंडिडेट घोषित नहीं हुए थे। बावजूद इसके…हुआ वहीं। डाॅक्टर के खिलाफ डाॅक्टर।

फिफ्टी-फिफ्टी

मरवाही बाइ इलेक्शन में कांग्रेस को सत्ता होने का स्वाभाविक लाभ तो मिलेगा ही, कुछ और बातें हैं जो उसके पक्ष में जा रहे हैं। पहला, कांग्रेस कंडिडेट डाॅ केके ध्रुव का मरवाही में अच्छी पकड़ है। पेंड्रा और गौरेला कांग्रेस के लिए जरूर बड़ा गड्ढा रहा है। पिछले चुनाव में इन दोनों इलाकों में जोगी के पक्ष में एकतरफा वोट पड़े थे। इस बार जोगी का कोई कंडिडेट है नहीं। और, उनके 90 परसेंट करीबी लोग पार्टी छोड़ कांग्रेस ज्वाईन कर लिए हैं। कांग्रेस के लिए यह उत्साह की वजह है। किन्तु, सवाल यह है कि अब जोगी के वोट किस पार्टी को मिलेंगे। पिछले चुनाव में अजीत जोगी को 74 हजार वोट मिले थे। सियासी पंडितों का कहना है कि जोगी के फिफ्टी-फिफ्टी वोट कांग्रेस-भाजपा में बंट जाएंगे। लेकिन, कांग्रेस जी तोड़ कोशिश में है कि जोगी के प्रभाव वाले वोट किसी भी सूरत में बीजेपी की ओर टर्न न करें।

अंत में दो सवाल आपसे

1. इस शिगूफे में कितनी सच्चाई है कि मरवाही उपचुनाव कानूनी दांव-पेंच में फंसकर अधर में लटक सकता है?
2. किस जिले के एसपी आईपीएस की मान-मर्यादा को ताक पर रख एक सूत्रीय वसूली अभियान मे जुटे हुए हैं?

 

रविवार, 11 अक्तूबर 2020

छत्तीसगढ़ लौटेंगे सुब्रमणियम?

 संजय के दीक्षित

तरकश, 11 अक्टूबर 2020
आईएएस बीवीआर सुब्रमणियम के जम्मू-कश्मीर से लौटने की अटकलें तेज होती जा रही है। ब्यूरोक्रेसी में कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि वे छत्तीसगढ़ के अगले चीफ सिकरेट्री बनेंगे। सुब्रमणियम जेके के चीफ सिकेरट्री हैं। भारत सरकार ने 2018 में उन्हें डेपुटेशन पर श्रीनगर भेजा था। सुब्रमणियम लंबे समय तक पीएमओ में रहे जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। 2018 में जब छत्तीसगढ में सरकार बदली तो उस दौरान भी मुख्य सचिव के लिए उनका नाम चर्चा में रहा। लेकिन, इस समय जब सुब्रमणियम छत्तीसगढ़ लौटेंगे, इसमेें संशय है। जम्मू-कश्मीर के सीएस से हटे भी तो छत्तीसगढ़ आने की बजाए उनकी प्रायरिटी होगी कि भारत सरकार में कोई अच्छा पोर्टफोलियो मिल जाए। फिर, आरपी मंडल के एक्सटेंशन के लिए राज्य सरकार ने केंद्र को प्रपोजल भेजा है। ऐसे में, सुब्रमणियम के लौटने की अटकलें जरूर लगाई जा रही है लेकिन, सुब्रमणियम अब शायद ही छत्तीसगढ़ लौटें। उनको अगर लौटना ही होता तो अपनी आईएफएस पत्नी का छत्तीसगढ़ से दिल्ली डेपुटेशन नहीं कराया होता।

डेपुटेशन की तैयारी

आईएएस सोनमणि बोरा से सरकार ने वर्क लोड कम करना शुरू कर दिया है। पिछले हफ्ते हुए फेरबदल में उनसे श्रम विभाग लेकर अंबलगन पी को सौंप दिया। बोरा की अब मूल पोस्टिंग अब सिकरेट्री संसदीय कार्य है। साथ में राजभवन सिकरेट्री का अतिरिक्त प्रभार। जाहिर है, बोरा सेंट्रल डेपुटेशन पर दिल्ली जा रहे हैं। राज्य सरकार ने उन्हें एनओसी दे दिया है। भारत सरकार से पोस्टिंग आर्डर निकलने के बाद बोरा दिल्ली की फ्लाइट पकड़ लेंगे। इसको देखते सरकार ने बोरा के विभागों को हल्का करना शुरू कर दिया है। उनके रिलीव होने पर सरकार किसी आईएएस को संसदीय कार्य के साथ राजभवन सिकरेट्री का चार्ज सौंप देगी। बोरा की जगह राजभवन का सिकरेट्री कौन होगा, इस पर अटकलों का दौर जारी है। आमतौर पर राजभवन सिकरेट्री के लिए राज्यपाल की पसंद को वेटेज दिया जाता है। अब देखना है, सरकार किसे राजभवन भेजती है।

अमित पर संशय!

छजपा सुप्रीमो अमित जोगी ने मरवाही विधानसभा उपचुनाव में जोर-शोर से कैम्पेनिंग प्रारंभ कर दिया है। कांग्रेस और सरकार पर हमला करने का वे कोई मौका नहीं छोड रहे। मगर लाख टके का सवाल है क्या वे चुनाव लड़ पाएंगे? दरअसल, सियासी पंडितों को उनके चुनाव लड़ने पर संशय दिखाई पड़ रहा है। ऐसा मानना है कि जाति मामला अमित के लिए भारी पड़ सकता है। हो सकता है कि ऐन चुनाव के समय उन्हें चुनाव प्रक्रिया से अलग होना पड़ जाए।

डाॅक्टर के खिलाफ डाॅक्टर

मरवाही से कांग्रेस के डाॅ0 केके ध्रुव को उम्मीदवार बनाया जाना लगभग पक्का हो गया है। बीजेपी से डाॅ0 गंभीर को टिकिट मिल सकती है। बीजेपी से अभी दो नाम है। गंभीर और समीरा पैकरा। लेकिन, गंभीर की संभावना अधिक है। अगर अमित जोगी किन्ही परिस्थितियों में चुनाव से हट गए तो जाहिर है चुनाव ट्रेंगुलर की बजाए कांग्रेस-भाजपा के बीच बदल जाएगा। याने डाॅक्टर के खिलाफ डाॅक्टर।

टिकिट पर असंतोष

कांग्रेस डाॅ0 केके ध्र्रुव को मरवाही उपचुनाव में उतारने जा रही है लेकिन, उनको लेकर पार्टी में अभी से असंतोष की स्थिति निर्मित होने लगी है। पार्टी नेताओं का मानना है कि ध्रुव का बाहरी होना नुकसान हो सकता है। वे बलौदा बाजार से हैं। इसके अलावा अजीत जोगी का उन पर संरक्षण रहा है। इसीलिए वे 15 साल से मरवाही बीएमओ पद पर बने हुए हैं। कांग्रेस के रणनीतिकार इसको लेकर भी सतर्क हैं कि डाॅ0 ध्रुव को टिकिट देने पर बीजेपी कहीं समीरा पैकरा को मैदान में न उतार दे। समीरा लोकल हैं। इससे चुनाव लोकल वर्सेज बाहरी में बदल जाएगा। जाहिर है, इससे कांग्रेस को नुकसान होगा।

संदीपन या धमेंद्र?

गरियाबंद के कलेक्टर छतर सिंह डेहरे इस महीने 30 तारीख को रिटायर हो जाएंगे। उनकी जगह पर सरकार किसे कलेक्टर बनाकर भेजेगी इसको लेकर चर्चाएं शुरू हो गई है। सरकार अगर डायरेक्ट आईएएस में से किसी को भेजना चाहेगी तो इनमें एक नाम विलास संदीपन भोस्कर का हो सकता है। वे कोरिया कलेक्टर से डेढ़ महीने में राजधानी वापिस बुला लिए गए थे। और, प्रमोटी की कहीं बात आई तो धर्मेंद्र साहू का पलड़ा भारी रहेगा। धर्मेद्र 96 बैच के राप्रसे अधिकारी हैं। उनके बैच के लगभग सभी कलेक्टर बन गए हैं। रमेश शर्मा, केएल चैहान, सुनील जैन और पी एल्मा सभी धर्मेंद्र के समकक्ष हैं। हालांकि, एक विपीन मांझी भी हैं। लेकिन, गरियाबंद उनका गृह जिला है, इसलिए उनकी संभावना नही ंके बराबर है।

2013 बैच की वेटिंग

कई राज्यों में 2014 बैच के आईएएस कलेक्टर बन गए हैं। उड़ीसा में तो 2015 बैच चालू हो गया है। लेकिन, छत्तीसगढ़ में 2013 बैच वेटिंग में चल रहा है। वैसे, अविभाजित मध्यप्रदेश में भी आईएएस बनने के पांच से छह वर्ष के भीतर कलेक्टरी मिल जाती थी। लेकिन, छत्तीसगढ़ में 2009 बैच से यह ट्रेंड टूट गया। 2010, 2011 और 2012 तीनों ही बैच काफी लेट से कलेक्टर बना। दरअसल, वजह यह है कि कुछ सालों से हर साल छह-छह, सात-सात आईएएस छत्तीसगढ़ आ रहे हैं। लिहाजा, दावेदारों की संख्या बढ़ती जा रही है। फिर, प्रमोटी कलेक्टरों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। पहले सिर्फ चुनाव के समय सरकार 12 से 13 जिलों में प्रमोटी आईएएस को कलेक्टर बनाती थी। बाकी समय इनकी संख्या सात-आठ होती थी। एक समय तो सिर्फ चार रह गए थे। लेकिन, अभी प्रमोटी आईएएस का वेटेज बढ़ा है। इस समय 10 जिलों में प्रमोटी कलेक्टर हैं। इनमें कोरिया, बलरामपुर, जशपुर, मरवाही, बलौदा बाजार, गरियाबंद, राजनांदगांव, कवर्धा, बालोद और कांकेर शामिल हैं। हालांकि, प्रमोटी में भी 2010 से लेकर 2012 तक में अभी कई आईएएस कलेक्टरी के वेटिंग में है। सरकार को उन्हें भी देखना होगा। बहरहाल, 2013 बैच में रेगुलर रिक्रूट्ड सात आईएएस हैं। नम्रता गांधी, गौरव सिंह, अजीत बसंत, विनीत नंदनवार, इंद्रजीत चंद्रवाल, जगदीश सोनकर और राजेंद्र कटारा। ये सरकार की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. राजभवन का अगला सचिव कौन बनेगा?
2. क्या अमित जोगी मरवाही उपचुनाव लड़ पाएंगे और नहीं लड़े तो किस पार्टी को सपोर्ट करेंगे?

रविवार, 4 अक्तूबर 2020

बदलेंगे कलेक्टर

 संजय के दीक्षित

तरकश, 4 अक्टूबर 2020
इस महीने 31 अक्टूबर को गरियाबंद के कलेक्टर छतर सिंह डेहरे रिटायर हो जाएंगे। राज्य प्रशासनिक सेवा से आईएएस बने छतर सिंह का कलेक्टर के रूप में गरियाबंद पहला और आखिरी जिला होगा। इसी साल 27 मई को सरकार ने उन्हें कलेक्टर बनाकर गरियाबंद भेजा था। कुल मिलाकर पांच महीने वे कलेक्टर रहे। फिर भी छतर सिंह किस्मती अफसर रहे, जिन्हें सरकार ने कलेक्टर बनने का अवसर दे दिया। वरना, छत्तीसगढ़ में कई ऐसे प्रमोटी आईएएस रहे हैं, जिन्हें कलेक्टर बनने का मौका नहीं मिल पाया। बहरहाल, जिले से रिटायर करने वाले डेहरे दूसरे आईएएस होंगे। उनसे पहिले बीपीएस नेताम कांकेर कलेक्टर रहते रिटायर हुए थे। रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़ जैसे चार बड़े जिलों की कलेक्टरी किए ठाकुर राम सिंह के समय लगा था कि वे रायपुर कलेक्टर से रिटायर होंगे। लेकिन, सरकार ने आखिरी समय में उन्हें कमिश्नर बना दिया था। वैसे, छतर सिंह डेहरे के रिटायर होने पर गरियाबंद में नए कलेक्टर की पोस्टिंग की जाएगी। खबर है गरियाबंद के साथ ही सरकार दो-तीन और कलेक्टरों को इधर-से-उधर कर सकती है।

सुबोध और सोनमणि

अधिकांश आईएएस रायपुर का कलेक्टर बनना इसलिए पसंद नहीं करते क्योंकि माना जाता है कि रायपुर आखिरी कलेक्टरी होती है…यानि कलेक्टरी की इनिंग समाप्त हो जाती है। लेकिन, ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ में दो ऐसे आईएएस हैं, जिन्हें रायपुर के बाद बिलासपुर का कलेक्टर बनने का मौका मिला। वे हैं सुबोध सिंह और सोनमणि बोरा। सुबोध तो रायपुर से बिलासपुर गए और फिर बिलासपुर से दोबारा रायपुर के कलेक्टर बनें। रायपुर कलेक्टर से फिर वे सीएम सचिवालय गए। सुबोध ने रायपुर में दो बार कलेक्टरी की। इसी तरह सोनमणि कवर्धा से रायपुर आए थे और रायपुर से फिर बिलासपुर कलेक्टर बनें। हालांकि, ये सही है कि अधिकांश कलेक्टरों के लिए रायपुर लास्ट जिला रहा। एमके राउत, सीके खेतान, आरपी मंडल, अमिताभ जैन, रोहित यादव, सिद्धार्थ परदेशी, ठाकुर राम सिंह सभी का रायपुर आखिरी जिला रहा। ओपी चैधरी का भी कलेक्टर के तौर पर रायपुर आखिरी जिला रहा। लेकिन, उन्होेंने खुद से वीआरएस ले लिया। मगर ये सही है कि वीआरएस नहीं भी लिए होते तो सरकार बदलते उन्हें रायपुर से हटना पड़ता। फिलहाल, एस भारतीदासन रायपुर के कलेक्टर हैं। प्रदेश के सबसे सीनियर कलेक्टर भारतीदासन को भी समझा जाता है कि रायपुर उनका आखिरी जिला होगा। फिर भी उम्मीद के लिए सुबोध और सोनमणि…ये दो नाम तो हैं…हो सकता है, जो रायपुर का कलेक्टर बने, उसे आगे चलकर बिलासपुर जिले में अवसर मिल जाए।

सीएम का सीधा संवाद

गांधी जयंती के दिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मंत्रियों के साथ वीडियोकांफें्रसिंग से वन अधिकार पट्टा वितरण किया। सीएम ने पट्टा सौंपने के बाद कुछ हितग्राहियों से सीधे संवाद करना चाहा। इससे कलेक्टर हड़बड़ा गए। क्योंकि, इसकी तैयारी की नहीं थी। आमतौर पर ऐसे वक्त के लिए प्रशासनिक अधिकारी ग्रामीणों को ट्रेंड कर देते हैं। लेकिन, अफसरों को इसका अंदेशा नहीं था कि इतने व्यस्त कार्यक्रम के बाद भी सीएम ग्रामीणों से बात करने की इच्छा व्यक्त कर देंगे।

कप्तानी पारी

कप्तान कितना भी अच्छा हो मगर अगर टीम अनकूल नहीं है, तो कप्तान की सफलता पर हमेशा संशय बना रहता है। ऐसा ही कुछ रायपुर के एसएसपी अजय यादव के साथ हो रहा है। हैं तो काबिल अफसर मगर रायपुर में अभी उनकी अपनी टीम नहीं बन पाई है। दुर्ग से जब वे रायपुर आए थे तो समझा गया था कि वहां से कुछ अफसरों को लेकर रायपुर आएंगे। मगर ऐसा हुआ नहीं। 2004 बैच के आईपीएस अजय प्रदेश के सबसे सीनियर पुलिस कप्तान हैं। उनकी जब रायपुर में पोस्टिंग हो रही थी तो एक वर्ग ऐसा था, जो नहीं चाह रहा था कि उनके जैसे अफसर को रायपुर का एसपी बनाया जाए। लेकिन, सीएम ने उसे अनसूना करते हुए अजय यादव को एसएसपी अपाइंट कर दिया। अजय यादव को राजधानी में कप्तानी पारी खेलनी है तो अपनी टीम बना लेनी चाहिए।

बड़ी बात

राज्य पुलिस सेवा से आईपीएस बने अफसरों के लिए यह बड़ी बात होगी…सरकार ने सुकमा के एसपी शलभ सिनहा को कवर्धा और कवर्धा के एसपी केएल ध्रुव को सुकमा का कप्तान बना दिया है। दरअसल, सुकमा में नक्सलियों का उत्पात बढ़ता जा रहा है। माओवादियों ने वहां तीसरा लड़ाकू दस्ता बना लिया है। नक्सलियों के पास अभी तक दो कंपनी थी। मगर मिरतूर और सुकमा के पास हुए नक्सली वारदातों में जवानों से करीब 35 हथियार नक्सलियों ने इस साल लूट लिए। पुलिस के पास पुख्ता खबर है कि नक्सलियों ने 100 लड़ाकों की नई हथियारबंद कंपनी बनाई है। इसकी खबर मिलने पर आंतरिक सुरक्षा सलाहकार विजय कुमार छत्तीसगढ़ आए थे। वे बस्तर गए। लौटकर सीएम से भी मिले। उसके बाद केएल ध्रुव को सुकमा का एसपी बनाने का आदेश जारी हो गया। बताते हैं, ध्रुव ने बीजापुर के एसपी रहते नक्सलियों के खिलाफ फोर्स की तगड़ी मोर्चेबंदी की थी। धु्रव प्रमोटी आईपीएस हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. आदिवासी इलाके के एक ऐसे कलेक्टर का नाम बताइये, जिन्हें एक लोकल नेता बोलते हैं बैठ, तो बैठ जाते हैं और बोलते हैं खड़ा, तो खड़े हो जाते हैं?
2. किस जिले के एसपी को अगला एडिशनल ट्रांसपोर्ट कमिश्नर बनाने की चर्चा है?

शनिवार, 26 सितंबर 2020

बीजेपी के मंतूराम

 संजय के दीक्षित

तरकश, 27 सितंबर 2020
मरवाही उपचुनाव में प्रत्याशी को लेकर भाजपा में भी मशक्कत कम नहीं चल रही। पार्टी कई चेहरों में संभावनाएं टटोल रही है। चार बार के विधायक रहे रामदयाल उइके के नाम पर भी पार्टी ने विचार किया। वे बीजेपी से पहली बार मरवाही से ही चुनाव जीते थे। 2001 में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने न केवल विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था बल्कि भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। हालांकि, 17 साल कांग्रेस में रहने के बाद रामदयाल भाजपा में लौट आए हैं। लेकिन, बीजेपी को कांफिडेंस नहीं है। पार्टी को लगता है कहीं, मंतूराम जैसी स्थिति न पैदा हो जाए। अंतागढ़ विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के मंतूराम पवार ने नाम वापस लेकर भाजपा को वाॅक ओवर दे दिया था। ऐसे में, भाजपा समीरा पैकरा और डाक्टर गंभीर में से किसी एक पर दांव आजमा सकती है। ठीक भी हैं। प्रत्याशी चयन में सावधानी बरतनी चाहिए। आखिर, मंतूरामों के बारे में बीजेपी से बेहतर कौन समझ सकता है।

अजीत की जगह अजीत

कांग्रेस से मरवाही उपचुनाव के लिए तीन नाम सबसे उपर हैं। अजीत श्याम, प्रमोद परस्ते और डाॅ0 ध्रुव। अजीत श्याम बरसों से कांग्रेस के लिए काम कर रहे हैं। उनकी पत्नी पेंड्रा जनपद पंचायत की उपाध्यक्ष हैं। प्रमोद परस्ते किसी जांच की वजह से सिविल जज से इस्तीफा देकर कांग्रेस ज्वाईन किए थे। और डाॅ0 ध्रुव लोकल नहीं हैं। वे करीब 15 साल से सरकारी सेवा में हैं। प्रैक्टिस उनकी अच्छी है। लेकिन, उन पर जोगी का संरक्षण रहा है और फिर बाहरी होने का इश्यू भी रहेगा। ऐसे में, अजीत श्याम का पलड़ा भारी लग रहा है। यानी अजीत जोगी की खाली सीट पर कांग्रेस से अजीत को उतारा जा सकता है।

कलेक्टर के बाबू

छत्तीसगढ़ बनने के पहिले तक लोगों ने देखा है…जिला मुख्यालयों में तीन बंगले सबसे बड़े होते थे। कलेक्टर, एसपी और सीएमएचओ के। सीएमएचओ तब काफी प्रभावशाली होते थे। लोग इनके नामों से जानते थे। लेकिन, धीरे-धीऐ ऐसा हुआ कि सीएमएचओ नाम का औरा खतम हो गया। सरकारें एक के बाद एक कलेक्टरों को पावर देती गईं। अब आलम यह है कि सीएमएचओ और सिविल सर्जन को छोटा सा भी काम करना है तो इसके लिए कलेक्टर से बात करनी पड़ती है। आज की तारीख में सीएमएचओ की हैसियत कलेक्टर के बाबू से ज्यादा नहीं रह गई है। उनका एक प्रमुख काम रह गया है…कलेक्टरों को टाईम पर खरीदी का कमीशन पहुंचा आओ। ऐसे मेें, स्वास्थ्य योजनाओं का बंटाधार तो होगा ही।

बंगले की बात

बंगले की बात निकली तो देवेंद्र नगर का आफिसर्स कालोनी की बात भी हो जाए। चीफ सिकरेट्री बनने के बाद आरपी मंडल जब नया रायपुर कूच किए तो बहुतों को अंदेशा था कि काफी लोग उनके साथ नया रायपुर जाएंगे। मगर ऐसा हुआ नहीं। सिर्फ रीता शांडिल्य गईं। कई अफसर अब मान रहे हैं…नया रायपुर शिफ्थ हो गए होते तो इस तरह दुबक कर नहीं रहना पड़ता। देवेंद्र नगर की हालत बड़ी खराब है। हर लेन के दो-एक घरों में कोरोना अब तक दस्तक दे चुका है। डीआईजी ओपी पाल के इंफेक्टेड होने के बाद तो दहशत और बढ़ गई है। अफसरों ने वाॅक पर निकलना बंद कर दिया है। दरअसल, देवेंद्र नगर काफी सघन काॅलोनी है। घरों की दीवारे एक-दूसरे से लगी हुई हैं। काम करने वाले स्टाफ एक-दूसरे से मिलते हैं और या तो कोरोना दे आते है या फिर ले आते हैं।

अलरमेल को फायनेंस

11 आईएएस अफसरों की पोस्टिंग लिस्ट में सबसे अहम अलरमेल मंगई का नाम रहा। मंगई को सिकरेट्री फायनेंस बनाया गया है। फायनेंस में अमिताभ जैन एसीएस हैं। वे रमन सरकार के समय से फायनेंस संभाल रहे हैं। लेकिन, अब उनका इस पद पर रहना संभव नहीं होगा। क्योकि, 30 नवंबर को चीफ सिकरेट्री आरपी मंडल का रिटायरमेंट है। मंडल के बाद सीनियरिटी में अमिताभ हैं। वे सीएस बने तब भी और ना बने तब भी उन्हें फायनेंस छोड़ना पड़ेगा। ऐसे में, सीएम भूपेश ने सोच-समझकर अमिताभ का विकल्प तैयार करने के लिए मंगई को फायनेंस में भेजा है। असल में, फायनेंस सबके वश की बात नहीं होती। इस विभाग में लंबे समय तक दो ही अफसर काम किए हैं। एक डीएस मिश्रा। रमन सरकार के 15 साल में करीब नौ साल डीएस ने फायनेंस संभाला। और, लगभग चार साल से अमिताभ इस विभाग को देख रहे हैं। सरकारें अगर बदलती हैं तब भी फायनेंस सिकरेट्री नहीं बदला जाता। 2003 में मुख्यमंत्री डाॅ0 रमन सिंह ने भी अशोक विजयवर्गीय को फायनेंस सिकरेट्री के रूप में कंटीन्यू रखा था। फायनेंस सिकरेट्री के पास सरकार के खजाने की चाबी होती है। भरोसेमंद अफसर को ही सरकार फायनेंस का जिम्मा सौंपती है।

ट्रांसपोर्ट में चेंज

ट्रांसपोर्ट के एडिशनल कमिश्नर टीआर पैकरा प्रमोट होकर आईजी बन गए हैं। हालांकि, ट्रांसपोर्ट में हमेशा आईजी लेवल के अफसर ही आमतौर पर एडिशनल कमिश्नर रहे हैं। वायकेएस ठाकुर, आरके विज, अशोक जुनेजा, संजय पिल्ले, बीएस मरावी, एमएस तोमर, एसआरपी कल्लूरी सभी आईजी रहे। रमन सरकार ने पहली बार डीआईजी ओपी पाल को एडिशनल कमिश्नर बनाया था। उनके बाद डीआईजी पैकरा। अब चर्चा है, पैकरा की जगह अब किसी बड़े जिले के एसपी को ट्रांसपोर्ट में बिठाया जा सकता है।

नाम से गफलत

ब्यूरोक्रेसी में हमनाम या मिलते-जुलते नाम के कारण कई बार ब्लंडर हो जाता है। दो दिन पहले ही आर प्रसन्ना को मेडिकल एजुकेशन सिकरेट्री बनाने का आदेश जारी हुआ। और, इसके एक घंटे बाद पता चला कि मामला गफलत का रहा। आदेश निकालना था सीआर प्रसन्ना का तो निकल गया आर प्रसन्ना का। जीएडी ने डेढ़ घंटे बाद फिर संशोधित आदेश निकालकर बताया कि आर प्रसन्ना नहीं, सीआर प्रसन्ना पढ़ा जाए। इससे पहिले भी डीएस मिश्रा और जीएस मिश्रा में बड़ा कंफ्यूजन था। लोगों को दोबारा रिपीट करना पड़ता था…डीएस या जीएस। प्रसन्नाद्वय के साथ भी यही दिक्कत है। फर्क करने के लिए सीआर प्रसन्ना को छोटा प्रसन्ना और आर प्रसन्ना को बड़ा प्रसन्ना कहा जाता है। छत्तीसगढ़ में संगीता भी दो हैं। एक संगीता आर और दूसरी संगीता पी। इसमें भी छोटी संगीता, बड़ी संगीता।

धनंजय को मौका

कांग्रेस सरकार में धनंजय देवांगन को पहली बार इंडिपेंडेंट चार्ज मिला है। उन्हें हायर एजुकेशन विभाग का सिकरेट्री बनाया गया है। राप्रसे से आईएएस बनने वाले अधिकारियों में वे काफी अनुभवी माने जाते हैं। रिकार्ड पांच जिला पंचायत में वे सीईओ रह चुके हैं। बिलासपुर नगर निगम के कमिश्नर भी। रजिस्ट्रार भी रहे हैं। हालांकि, प्रमोटी में उमेश अग्रवाल को भी स्वतंत्र चार्ज मिलने की उम्मीद थी मगर ऐसा हुआ नहीं। एसीएस सुब्रत साहू के उर्जा विभाग में उन्हें सिकरेट्री का अतिरिक्त चार्ज दिया गया। होम उनके पास पहले से है।

डीजीपी साहब….हमें भी

तरकश की खबर पर संज्ञान लेते हुए डीजीपी डीएम अवस्थी ने एसपी और आईजी को कड़े पत्र लिखकर कहा कि ट्रांसफर हुए अफसरों को अगर रिलीव नहीं किया गया तो उनके खिलाफ एक्शन लिया जाएगा। अगले दिन 60 अधिकारी कार्यमुक्त हो गए। इसके बाद बस्तर रेंज के कई जिलों के थानेदारों ने इस स्तंभ के लेखक को मैसेज किया…सर, डीजीपी साहब ने मेरा भी ट्रांसफर किए हैं….मगर एसपी साहब मान नहीं रहे, कहते हैं…बस्तर में डीजीपी साहब का आदेश नहीं चलता…सर! मेरे लिए भी कुछ कीजिए।

डीजीपी और डीजी नक्सल भी

छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में डीजीपी और डीजी नक्सल के प्रयोग पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं। कह सकते हैं…इससे पुलिस महकमे का तालमेल गड़बड़ा रहा है। एएन उपध्याय जब डीजीपी थे और डीएम अवस्थी डीजी नक्सल तब ये प्रयोग इसलिए चल गया क्योंकि, उपध्याय भोले-भंडारी थे। बाद में डीएम डीजीपी बन गए और गिरधारी नायक डीजी नक्सल। पुलिस के सीनियर अधिकारी भी स्वीकार करते हैं कि डीजी नक्सल अलग होने के बाद मैदानी और नक्सल इलाकों के बीच एक लकीर खींच गई है। जाहिर तौर पर बस्तर के पुलिस अधिकारी डीजी नक्सल को ही सब कुछ मानते हैं। अगर वास्तव में ऐसा है, तो ये ठीक नहीं है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. इसमें कितनी सच्चाई है कि मरवाही में भाजपा दम लगाकर चुनाव लड़ने की बजाए छजपां के अमित जोगी को मदद पहुंचाएगी?
2. 2 अक्टूबर को 70 बरस के हो रहे बिलासपुर विश्वविद्यालय के कुलपति गौरीदत्त शर्मा का कार्यकाल बढ़ेगा या सरकार कमिश्नर को विवि की कमान सौंप देगी?