शनिवार, 25 अप्रैल 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: सचिवों की मेजर सर्जरी



तरकश, 26 अप्रैल 2026

संजय के. दीक्षित

सचिवों की मेजर सर्जरी

मंत्रालय में सचिव स्तर पर एक बड़ी उठापटक जल्द हो सकती है। इसमें उन आधा दर्जन से अधिक सचिवों का विभाग बदल सकता है, जिनका कार्यकाल सवा दो साल से अधिक हो गया है। जाहिर है, दिसंबर 2023 में सरकार बदलने के बाद जनवरी 2024 में सचिवों की बड़ी लिस्ट निकली थी, उसके बाद कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। वैसे, एसीएस मनोज पिंगुआ का गृह विभाग में साढ़े तीन साल से ज्यादा हो गया है। पिछली सरकार के समय से उनके पास गृह विभाग का दायित्व है। इसी तरह निहारिका बारिक पंचायत एवं ग्रामीण विकास, शहला निगार कृषि, कमलप्रीत सिंह पीडब्लूडी, सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी स्कूल शिक्षा, भुवनेश यादव समाज कल्याण, एस भारतीदासन हायर एजुकेशन, बसव राजू नगरीय प्रशासन, शम्मी आबिदी महिला बाल विकास विभाग को सवा दो साल से अधिक हो गया है। लिहाजा, इन अधिकारियों के विभाग बदलने की अटकलें बड़ी तेज हैं। अलबत्ता, अमित कटारिया हेल्थ में जम नहीं पा रहे, इसलिए उनका पोर्टफोलियो चेंज हुआ तो कोई आश्चर्य नहीं। सेंट्रल डेपुटेशन से अमित लौटे थे, उस समय उनका इंटरेस्ट नगरीय प्रशासन में था मगर बसव राजू को वे हिला नहीं सकें। अमित का नाम पीडब्लूडी को लेकर भी चर्चाओं में है। वैसे तो पीडब्लूडी के लिए मुकेश बंसल को भी राइट च्वाइस बताया जा रहा, मगर उनके पास वर्कलोड ज्यादा है, मंत्री ओपी चौधरी उन्हें छोड़ेंगे भी नहीं, इसलिए मुकेश की संभावना कम प्रतीत हो रही।

गृह विभाग का निजाम कौन?

बैचमेट को चीफ सिकरेट्री बन जाने के बाद एसीएस होम मनोज पिंगुआ ने सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने के लिए अर्जी लगाई थी मगर उन्हें अब तक पोस्टिंग नहीं मिली है। हालांकि, उन्होंने अभी तक अपना आवेदन वापिस भी नहीं लिया है। मगर खबरें आ रही कि दिल्ली जाने का उनका इरादा अब डगमगा रहा है। हो सकता है कि सीएस विकास शील से उनकी कोई बात हुई हो...आखिर हैं तो पुराने बैचमेट ही। बहरहाल, मनोज अगर दिल्ली नहीं गए तो सरकार उनकी वरिष्ठता की दृष्टि से कौन सा विभाग देगी, इस पर भी धर्मसंकट रहेगा। उनके पास पहले हेल्थ और फॉरेस्ट रह चुका हैं। विष्णुदेव साय के सीएम बनने के बाद मनोज को उनके सचिवालय में जाने की चर्चाएं भी हुई थी। उसके बाद 30 जून 2025 को कैबिनेट की मीटिंग के बाद उनका सीएस का आर्डर निकलते-निकलते रह गया था। दिल्ली से अमिताभ जैन को एक्सटेंशन देने का संदेशा आ गया। और उसके बाद मनीला से विकास शील आ गए। बहरहाल, सवाल यह है कि सोनमणि बोरा, कमलप्रीत सिंह या किसी अन्य को सिकेट्री होम बनाया जाएगा तो फिर मनोज पिंगुआ को क्या मिलेगा? इसका जवाब सीएम या उनके पीएस के पास ही होगा।

ट्रांसफर का महीना?

सचिवों के विभाग बदले जाने की चर्चाओं के बीच बता दें कि कलेक्टर, एसपी, जिला पंचायत सीईओ और डीएफओ के ट्रांसफर लंबे समय से प्रतीक्षित है। एक मई से सुशासन तिहार भी प्रारंभ होने जा रहा है। हालांकि, सुनने में आ रहा कि सुशासन तिहार के साथ-साथ अफसरों की लिस्ट भी जारी होते रहेगी। सरकार में बैठे लोग इस बात को स्वीकार कर रहे कि दो साल से अधिक जिन अधिकारियों का हो गया है, वहां ट्रांसफर की प्रत्याशा में कोई काम नहीं हो रहा है...उन जिलों के अफसरों को बदलना ही श्रेयस्कर होगा। अलबत्ता, कलेक्टर, एसपी के ट्रांसफर होंगे या नहीं, आने वाला दो-तीन दिन काफी महत्वपूर्ण होंगे। यदि बदलना होगा तो सरकार इसी दौरान कोई निर्णय लेगी। पीएस टू सीएम सुबोध सिंह भी ट्रेनिंग से लौट आएं हैं।

25 साल में जीरो

न्वंबर 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ बनने के दौरान छत्तीसगढ़ में सड़कों की जो स्थिति थी, कमोवेश वही हालत अभी भी है। नेशनल हाईवे को छोड़ दें, तो पीडब्लूडी मिनिस्टर और सीएम के विधानसभा इलाकों की हालत बेहद दयनीय है। तभी रिव्यू मीटिंग में सीएम बड़े नाराज हुए थे। वे यहां तक बोल गए थे...पीडब्लूडी का कहीं कोई काम दिख नहीं रहा है। दरअसल, सड़कें कनेक्टिविटी की सुविधा के साथ-साथ किसी भी राज्य की शान होती है। पड़ोसी राज्यों में तेलांगना और महाराष्ट्र की बात तो छोड़िये, कालाहांडी की भूखमरी के नाम से बदनाम ओड़िसा की सड़कें विकसित प्रदेशों टाईप अहसास दिला रही है। बगल में, विशाखापट्टनम या नागपुर चले जाइये, सड़कें देखकर आप हतप्रभ रह जाएंगे। असल में, छत्तीसगढ़ में इस सेक्टर में काम ही नहीं हुआ। और न ही सरकार ने इसे प्राथमिकता में रखा। राजधानी रायपुर की बात करें तो 25 साल में एक एक्सप्रेसवे बन पाया। ऐसा नहीं कि पीडब्लूडी में हाई प्रोफाइल अफसर नहीं आए। पी. जाय उम्मेन, एमके राउत, आरपी मंडल और अमिताभ जैन जैसे पीडब्लूडी सिकेट्री हुए। बावजूद इसके आलम यह है कि धर्मजयगढ़ और पत्थलगांव को जोड़ने वाली सड़क पिछले 15 साल से निर्माणाधीन है। पीडब्लूडी किस रफ्तार में चल रहा, इसका अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि पिछले साल 9500 करोड़ का बजट मिला मगर मार्च क्लोजिंग तक इसमें से मात्र 3000 करोड़ खर्च हो पाया।

10 साल में आरओबी

93 बैच के आईएएस अफसर अमित अग्रवाल 2015-16 के दौरान वित्त सचिव थे। कचना के जीएडी कालोनी से शहर तरफ आने-जाने मे फाटक पर वे हमेशा लोगों के जाम का शिकार होते देखते थे। लिहाजा, उन्होंने खुद ही पहल कर पीडब्लूडी वालों से प्रस्ताव मंगा बजट में शामिल किया। उसके बाद 10 साल निकल गया। अभी तक कचना ओवर ब्रिज पूरा नहीं हुआ है। 2016 के बजट में आने के बाद इसका 2021 में इसका काम प्रारंभ हुआ। मार्च 2025 की डेडलाइन थी और अप्रैल 2026 समाप्त होने वाला है। इससे पीडब्लूडी की मंथर गति को समझा जा सकता है।

तीन महीने का एक्सटेंशन

तरकश में पीसीसीएफ और हेड ऑफ फॉरेस्ट श्रीनिवास राव के एक्सटेंशन का जिक्र किया गया था। तरकश की खबर सही निकली। छह महीने की सेवा विस्तार की चकरी भारत सरकार में घूमी, मगर बात कुछ जम नहीं पाई। कहीं से एडवाइस आया है कि छह महीने ज्यादा है, तीन महीने की फाइल मूव किया जाए। श्रीनिवास राव को एक्सटेंशन मिल पाएगा या इंकार हो जाएगा, 10 मई से पहले इस पर क्लियरिटी आ जाएगी। हालांकि, एक्सटेंशन की फाइल पीएम तक जाती है, इसलिए सब कुछ इतना आसान नहीं है। श्रीनिवास राव को अगर एक्सटेंशन नहीं मिला तो फिर अरुण पाण्डेय की दावेदारी पक्की हो जाएगी। क्योंकि, ओपी यादव हेड ऑफ फॉरेस्ट बनने इच्छुक नहीं बताए जा रहे। वैसे अरुण और ओपी दोनों सरगुजिहा तो हैं ही पड़ोस में रहते हैं और रोज साथ बैठने वाले मित्र भी हैं। इसलिए, अरुण के पक्ष में ओपी शायद अपना इंटरेस्ट ना दिखाएं। अब अगर उनके माथे पर कुछ लिखा है तो बात अलग है...उसी तरह जैसे आईपीएस एएन उपध्याय के पास डीजीपी का पद चलकर आ गया था। वरना अरुण पाण्डेय के नाम पर मुहर लगेगी। वैसे भी मंत्रालय और फॉरेस्ट विभाग की पसंद अरुण पाण्डेय ही हैं मगर बीच में श्रीनिवास राव के विधायक भाई के सक्रिय होने से मामला पेचीदा हो गया है।

जीएडी का यू-टर्न

छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय की सरकार बनने के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने 2024 में एक आदेश निकाल कर्मचारियों, अधिकारियों को संघ के कार्यक्रमों में जाने के लिए फ्री कर दिया था। मगर इस हफ्ते एक ऐसा आदेश निकला कि संघ में बवाल मच गया। आदेश था...सरकारी कर्मचारी, अधिकारी किसी संगठन के सदस्य नहीं हो सकते। पता चला है...जीएडी के अधिकारियों ने बिना ब्रीफ किए हड़बड़ी में उपर से दस्तखत करा लिया। आदेश निकलने के बाद जब कोहराम मचा तो जीएडी के अफसरों को तलब किया गया। इसके बाद भी जीएडी के अफसर इस आदेश को वापिस लेने की बजाए उसमें संशोधन करने पर अड़े रहे। इसके बाद सीएम ने अपना तेवर दिखाया। बताते हैं, सीएम ने दो टूक कहा...कोई संशोधन नहीं, आदेश बदला जाए, फिर जाकर आदेश चेंज हुआ। वैसे, आदेश निकाल फिर बदलने से संदेश अच्छे नहीं जा रहे, सरकार के रणनीतिकारों को इसे संज्ञान लेना चाहिए।

अफसर पौने दो सौ, मेंबर सिर्फ एक

सिविल सर्विस डे पर राजधानी में अफसरों का एक बड़ा आयोजन हुआ। वर्तमान सीएस विकास शील के साथ इस मौके पर दो पूर्व मुख्य सचिव भी मौजूद थे। मंत्रालय के अफसरों के साथ कलेक्टर, कमिश्नर वीडियोकांफ्रेंसिंग पर कनेक्ट थे। इसमें पता चला कि आईआईपीए याने इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में छत्तीसगढ़ से वैसे तो 66 मेंबर हैं मगर सर्विंग आईएएस में से सिर्फ एक। वो हैं एसीएस मनोज पिंगुआ। जबकि, दीगर राज्यों में इसकी संख्या 75 परसेंट से उपर होती है। सिविल सर्विस के अफसरों को जानकारियों से अपडेट रहने के लिए भारत सरकार ने आजादी के तुरंत बाद आईआईपीए नाम से एक ऑटोनॉमस बांडी बनाई थी। उप राष्ट्रपति को इसका चेयरमैन बनाया गया और डीओपीटी मंत्री को व्हाइस चेयरमैन। डीओपीटी सिकेट्री इसके सीईओ होते हैं। इसके बाद छत्तीसगढ़ में ये हाल है। सीएस विकास शील से सभी से इसकी सदस्यता लेने का आग्रह किया है, तो देखना है कि अब कितने अफसर इससे जुड़ते हैं।

बीजेपी नेता, मछली और धर्म भ्रष्ट

पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान मछली खाने पर बीजेपी द्वारा पाबंदी लगाने का ऐसा दांव चला कि जो बीजेपी नेता सार्वजनिक तौर पर मांस-मछली नहीं खाते थे, वे भी कैमरे के सामने थाली से मछली का कांटा निकालते नजर आने लगे। मगर इस चक्कर में छत्तीसगढ़ में कुछ बीजेपी नेताओं के यहां बवाल मच गया। मालूम हुआ, एक नेताजी का परिवार शुद्ध शाकाहारी और धरम-करम वाला है। उनके घर वालों को व्हाट्सएप ग्रुप से मछली खाते फोटो हाथ लग गई। इसके बाद पत्नी ने बात करना बंद कर दिया है, तो पिता ने चमकाया, तूने धर्म भ्रष्ट कर दिया। अब पश्चिम बंगाल की बात अलग है। वहां बिना मछली खाए कोई शुभ काम संपन्न नहीं होते। मगर बाकी प्रदेशों में ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ से गए कुछ बीजेपी नेताओं ने इस स्तंभ के लेखक को बताया कि फोटो और सोहबत के चक्कर में कई नेताओं को अब मछली का स्वाद भाने लगा है।

हफ्ते का कोट...

’संबंध कभी भी बराबरी करने से नहीं पनपते...उन्हें बनाएं रखने के लिए किसी को बड़ा और किसी को छोटा होना पड़ता है’ और ’परिस्थितियां बदलना जब मुमकिन ना हो तो मनःस्थिति बदल लीजिए, सब कुछ अपने आप ही बदल जाएगा।’

अंत में दो सवाल आपसे?

1. छत्तीसगढ़ बिजली नियामक आयोग के चेयरमैन का पद किसके लिए रिक्त रखा गया है?

2. डीजी पवन देव को पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन में करीब सात साल हो गया है, वे वहीं से 2028 में रिटायर होंगे या उनका ट्रांसफर किया जाएगा?

Chhattisgarh tarkash 2026: डिलिमिटेशनः बैकबोन और त्राहिमाम



 Chhattisgarh Tarkash 2026:

तरकश, 19 अप्रैल 2026

संजय के. दीक्षित

डिलिमिटेशनः बैकबोन और त्राहिमाम

परिसीमन बिल के पारित होने से छत्तीसगढ़ के विधानसभा, लोकसभा की सीटों में वृद्धि होती, मगर इससे किसी सियासी पार्टी को नफा-नुकसान नहीं होता। इसका सबसे ज्यादा इम्पैक्ट वहां पड़ेगा, जहां मुस्लिम वोटर अधिक संख्या में हैं। अभी असम का उदाहरण सामने है। जम्मू-कश्मीर के बाद असम देश का दूसरा सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाला प्रदेश है। वहां 35 फीसदी मुस्लिम हैं। बीजेपी की सरकार के दौरान भी इस समय वहां 31 मुस्लिम विधायक हैं। बहरहाल, वहां जो मुस्लिम आबादी तीन दर्जन से अधिक विधानसभाई इलाकों में निर्णायक वर्चस्व रखती थी, परिसीमन के बाद अब ये सिनेरियो बदल गया है। दरअसल, परिसीमन की कैंची ऐसी चली कि कई इलाकों में फैले मुस्लिम आबादी को एक विधानसभा में लाने से उस क्षेत्र में उनकी आबादी तो काफी बढ़ गई मगर अगल-बगल के विस क्षेत्रों उनकी संख्या घट गई। इसे ऐसे समझे...आसपास के चार विधानसभा क्षेत्रों के मुस्लिम बहुल इलाकों को काटकर एक या दो विधानसभाओं में जोड़ा गया। इससे चार की जगह अब एक या दो विधानसभा सीटों पर मुस्लिमों का प्रभुत्व सिमट गया है। असम में परिसीमन के बाद हुए इस चुनाव में मुस्लिम विधायकों की संख्या 12 से 14 घट जाने का अनुमान है। जाहिर है, असम में मुस्लिम विधायक ही विपक्ष के बैनबोन होते थे। इसी तरह बिहार, यूपी समेत दक्षिण के कई राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जिनकी परिसीमन के बाद स्थिति बदल जाएगी। इसके बाद कुछ राजनीतिक दलों का बड़ा नुकसान होगा, तो कुछ के शटर गिर जाएंगे। तभी तो बवाल मचा है। विपक्ष इसलिए भी त्राहिमाम की स्थिति में है कि सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली। याचिका खारिज हो गई। दरअसल, सीटों की परिसीमन में एक जाति, समुदाय या वर्ग को क्लब कर नया विधानसभा या लोकसभा बनाए जाने को प्राथमिकता देना है। इस दृष्टि से इस पर उंगली भी नहीं उठाई जा सकती।

डेपुटेशन का फर्स्ट केस

यूपीएससी क्रैक कर आईएएस, आईपीएस बनने वाले हर अफसर का ख्वाब होता है...जिले में कलेक्टरी और कप्तानी करें। मगर बिना एसपी बने कोई आईपीएस अधिकारी अगर सेंट्रल डेपुटेशन पर निकल ले तो इसे क्या कहा जाना चाहिए। ये वाकया इसलिए चौंकाने वाला है कि छत्तीसगढ़ ही नहीं अविभाजित मध्यप्रदेश में ऐसा कभी नहीं हुआ। कलेक्टर बने बिना न कोई आईएएस प्रतिनियुक्ति पर गया और न आईपीएस एसपी बने। लेकिन, 2020 बैच के आईपीएस विकास कुमार ने भारत सरकार से प्रतिनियुक्ति मांगी और एनआईए में उन्हें पोस्टिंग मिल भी गई। अब मामला नाराजगी का है या कोई और बात...पीएचक्यू के अफसरों को इस बारे में ठीकठाक पता होगा। मगर बता दें...कवर्धा में एडिशनल एसपी की पोस्टिंग के दौरान एक मामले में विकास कुमार को सस्पेंड किए जाने पर बड़ी टीका-टिप्पणी हुई थी। आमतौर पर डायरेक्ट आईपीएस के कैरियर को देखते इस तरह की कोई कार्रवाई नहीं की जाती। उस पर जब, एडिशनल एसपी की सिस्टम में कोई डिसिजन मेकिंग की भूमिका नहीं होती। डायरेक्ट आईपीएस के लिए यह प्रोबेशन की तरह माना जाता है। बहरहाल, विकास कुमार को निलंबन से बहाल होने के कई महीने बाद उन्हें रायपुर पुलिस कमिश्नरेट में डीसीपी बनाया गया। लेकिन, यहां भी डंडी मार दी गई। जोन की बजाए उन्हें शंट करते हुए ट्रैफिक की जिम्मेदारी थमाई गई। हालांकि, आईएएस, आईपीएस के कैरियर में ऐसे दौर आते हैं, इससे घबराना नहीं चाहिए। वैसे भी ये माना जाता है कि किसी भी ऑल इंडिया अफसर की सर्विस का 10 साल बेस्ट, 10 साल मध्यम और 10 साल बेहद खराब रहता है।

शादी के बाद बीजापुर

छत्तीसगढ़ में ऐसे भी आईपीएस अधिकारी रहे हैं, जिन्हें कैरियर की शुरूआत में जोर का झटका मिला मगर बाद में उन्हें बड़ी जिम्मेदारियां संभालने का मौका मिला। 98 बैच के आईपीएस अधिकारी अमित कुमार रायपुर में एडिशनल एसपी थे। वे शादी करके रायपुर लौटे थे कि हफ्ते भर बाद उन्हें बीजापुर का एसपी बना दिया गया। बीजापुर नया जिला बना था, बैठने के लिए जगह भी नहीं थी। नई-नवेली पत्नी को मायके भेज अमित कुमार मन मारकर धुर नक्सल एरिया बीजापुर गए। उसके बाद वे रायपुर समेत सूबे के छह जिलों के एसपी रहे। सीबीआई में 12 साल तक टॉप का पोर्टफोलियो संभाला। और अब खुफिया चीफ हैं। याने नए अफसरों को थोड़ा धैर्य रखना चाहिए। परिस्थितियां हमेशा एक सी नहीं रहती। विकास कुमार भले ही अभी अपमानित महसूस कर रहे होंगे मगर हो सकता था...आगे चलकर उनका वक्त बदलता। इस केस में पीएचक्यू के सीनियर अफसरों को भी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। पहले के जमाने में सीनियर अफसर अपने जूनियर को काफी समझाते थे, गल्तियां पर टोका-टाकी और डांट भी लगाते थे। मगर ये काम अब बंद हो गए हैं। डीजीपी अरुणदेव गौतम को पीएचक्यू में नए अफसरों के लिए एक एचआर सेल बनाना चाहिए।

एसपी भी डेपुटेशन पर

आईपीएस आंजनेय वार्ष्णेय भारत सरकार में डेपुटेशन पर जा रहे हैं। वे इस समय सारंगढ़़-बिलाईगढ़ जिले के एसपी हैं। आंजनेय के प्रतिनियुक्ति पर जाने का कारण पारिवारिक बताया जा रहा है। उनके जाने के बाद सरकार को सारंगढ़ जिले में नए कप्तान की नियुक्ति करनी होगी। जल्द ही आईपीएस की लिस्ट निकलेगी, उसमें सारंगढ़ भी शामिल होगा। या हो सकता है, सारंगढ़ का सिंगल आर्डर निकल जाए।

ट्रांसफर पर संशय

छत्तीसगढ़ सरकार ने अचानक से सुशासन तिहार का आदेश निकाल अफसरशाही को चौंका दिया। पहले ऐसे संकेत मिले थे कि इस बार सुशासन तिहार को ड्रॉप किया जाएगा। बहरहाल, दो-सवा दो साल से एक ही जगह पर जमे अधिकारियों की उम्मीद थी कि मई फर्स्ट वीक में ताबड़तोड़ ट्रांसफर होंगे। कलेक्टर, एसपी, जिपं सीईओ और डीएफओ बदले जाएंगे। मगर सुशासन तिहार के ऐलान से वे उलझन में पड़ गए हैं। हालांकि, सुशासन तिहार की वजह से ये नहीं कहा जा सकता कि ट्रांसफर अब टल ही जाएंगे। सरकार के नजदीकी सूत्रों का कहना है कि ये अभी तय नहीं हुआ है कि सुशासन तिहार के दौरान ट्रांसफर नहीं होंगे, मगर अत्यधिक संभावना है कि सुशासन तिहार चलते रहेंगे और साथ में ट्रांसफर भी। जाहिर है, सुशासन तिहार एक मई से प्रारंभ होकर 10 जून तक चलेंगे।

अलग मोड में सुशासन तिहार

सुशासन तिहार इस बार अलग मोड में किया जाएगा। इस बार जिलों में 15-20 ग्राम पंचायतों के बीच एक जनसमस्या शिविर लगेगा। पूरा फोकस इस बार लोगों की समस्याओं पर केंद्रित रहेगा। अधिकांश शिविरों में कलेक्टर, एसपी मौजूद रहेंगे। मुख्यमंत्री बीच-बीच में इन शिविरों में हिस्सा लेंगे। अपने उड़नचिरैया से औचक निरीक्षण करने भी जाएंगे। मगर पिछली बार की तरह शेड्यूल बनाकर वे हर जिले में नहीं जाएंगे। कुल मिलाकर सरकार का मोटिव सिस्टम को एक्टिव करना और ज्यादा-से-ज्यादा लोगों की परेशानियां दूर करना है।

कार्रवाई का डंडा

सुशासन तिहार में इस बार सीएम विष्णुदेव साय प्वाइंटेड जगहों पर अपने हेलिकाप्टर से उतरेंगे...लोगों से राज्य में चल रही योजनाओं और उनकी समस्याओं पर फीडबैक लेंगे। संकेत मिल रहे हैं...कोई गड़बड़ी मिली तो इस बार मारक कार्रवाई भी होगी। जाहिर है, कार्रवाई के नाम पर पिछला सुशासन तिहार टोका-टोकी तक सिमट गया था...कोई बड़ा विकेट नहीं गिरा। सीएम ने जीपीएम के कलेक्टर को लेकर बड़ी तंज कसी थी। बोले...तीन थानों का जिला नहीं संभलता तो फिर कलेक्टर बनने का क्या मतलब? लेकिन, इस बार मामला कुछ आगे का हो सकता है। इसलिए कलेक्टर, एसपी संभलकर।

रेडक्रॉस को खत्म?

जो काम देश के किसी सूबे में नहीं हुआ, वह छत्तीसगढ़ ने कर डाला। छत्तीसगढ़ में प्रदेश स्तर से लेकर जिला स्तर तक रेडक्रॉस सोसाइटी का चुनाव हुआ है। रायपुर में अब सत्ताधारी से जुड़ा प्रायवेट आदमी चेयरमैन बन गया है। जिलों में भी नई बॉडी बन गई है। मगर प्राब्लम है कि जिले वालों को कोई कलेक्टर मिलने तक का टाईम नहीं दे रहे। दरअसल, मध्यप्रदेश के दौर से लेकर छत्तीसगढ़ में अभी तक रेडक्रॉस में कभी चुनाव नहीं हुए। जिलों के कलेक्टर इसके पदेन प्रमुख होते थे। कलेक्टरों का अपना औरा होता है, इसलिए रेडक्रॉस बचा हुआ था। कई कलेक्टर इसमें काफी दिलचस्पी लेकर काम करते थे। अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर कलेक्टर रेडक्रॉस के लिए अच्छा खासा फंड कलेक्शन कर लेते थे। मगर अचानक चुनाव कराकर सिस्टम ने रेडक्रॉस को प्रायवेट हाथों में सौंप दिया। रेडक्रॉस सोसायटी का भगवान ही मालिक हैं।

कागजों में एसीआर

पिछले साल जीएडी ने कर्मचारियों, अधिकारियों के एसीआर के लिए कड़ा आदेश जारी किया था। कहा गया था कि अब ऑनलाइन भरा जाएगा, किसी अधिकारी को अब अफसरों का चक्कर नहीं लगाना पडे़गा। मगर आलम यह है कि अभी भी एसीआर के लिए सरकारी मुलाजिम चक्कर लगाते दिख रहे हैं। पुलिस वालों की तो और स्थिति खराब है। एसपी ने भरकर भेज दिया तो कई आईजी साहब लोग उसे दबाकर बैठ गए हैं। बाकी विभागों का हाल भी जुदा नहीं है। तभी जीएडी ने 17 अप्रैल को फिर एक आर्डर निकाल 2024-25 का एसीआर भरने तगादा किया है।

डिप्टी सीएम साहबों की उम्मीदें

बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे। नीतिश कुमार के इस्तीफे के बाद उन्हें राज्य की बागडोर सौंपी गई है। इससे छत्तीसगढ़ की उपमुख्यमंत्रियों की उम्मीदें भी कुंलाचे भर रही होंगी। मगर सम्राट चौधरी एक अपवाद की तरह है। अविभाजित मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ बनने के बाद तक डिप्टी सीएम साहबों का तजुर्बा अच्छा नहीं रहा। बल्कि, डिप्टी सीएम बनने के बाद सियासी कैरियर ही ढलान पर आ गया। मध्यप्रदेश के दौर में सुभाष यादव जैसे जमीनी और कद्दावर सहकारिता नेता उप मुख्यमंत्री बनने के बाद बियाबान में चले गए। तो उनके साथ डिप्टी सीएम रहे कोरबा निवासी प्यारेलाल कंवर डिप्टी सीएम रहने के बाद अगले विधानसभा चुनाव में अपनी सीट तक नहीं निकाल सके। उनसे पहले वीरेंद्र सखलेखा, शिवभानु सिंह सोलंकी और जमुना देवी का हश्र भी बहुत अच्छा नहीं हुआ। वीरेंद्र सखलेचा अपवाद स्वरूप 1978 में मुख्यमंत्री बने मगर ज्यादा दिन इस पद पर रह नहीं सकें। सुंदरलाल पटवा उन्हें खो कर गद्दी पर बैठ गए थे। छत्तीसगढ़ में पिछली सरकार में ही टीएस सिंहदेव पार्टी हाईकमान द्वारा किए गए करार और आश्वासनों के बाद भी डिप्टी सीएम से सीएम न बन सकें। उपर से गुस्से में पंचायत से इस्तीफा देकर उन्होंने अपने एक विभाग का नुकसान कर लिया। कहीं ऐसा तो नहीं...डिप्टी सीएम पद के साथ जुड़े इन्हीं बुरे योगों को देखते छत्तीसगढ़ के एक उप मुख्यमंत्री दिल्ली जाने का खयाल पाल लिए हैं।

हफ्ते का कोट

’जो रास्ता कठिन है, वही आपको मंजिल तक ले जाएगा, संघर्ष से घबराओं मत, यही तुम्हें आगे बढ़ाएगा’ और ’कर्म किसी के बेकार नहीं जाते, तुम किसी का जीना मुश्किल कर दो, उपरवाला तुम्हारा मरना मुश्किल कर देगा।’

अंत में दो सवाल आपसे?

1. छत्तीसगढ़ का आईपीएस कैडर कुछ ज्यादा ही निराश और उत्साहविहीन क्यों हो गया हैं?

2. पूर्णकालिक डीजीपी की नियुक्ति न होने से चीफ सिकेट्री और एसीएस होम क्यों घबरा रहे हैं?

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: डिप्टी सीएम की वैकेंसी?



तरकश, 12 अप्रैल 2026

संजय के. दीक्षित

डिप्टी सीएम की वैकेंसी?

राजनीतिक गलियारों में जैसी की चर्चाएं हैं, 3 मई के बाद छत्तीसगढ़ में एक डिप्टी सीएम की वैकेंसी हो सकती है। 3 मई को पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की काउंटिंग है। इसके बाद बीजेपी नितिन नबीन की टीम बनाने पर अपना फोकस करेगी। यूपी में अगले साल इलेक्शन है और वहां ब्राम्हण समेत कई जातियां बीजेपी से बहुत खुश नहीं है। इसलिए टीम नितिन में सबको साधने का प्रयास किया जाएगा। बहरहाल, बात छत्तीसगढ़ में डिप्टी सीएम की वैकेंसी की...तो डिप्टी सीएम के करीबी लोग भी तस्दीक कर रहे हैं कि भाई साब को राष्ट्रीय महासचिव बनाया जाएगा। छत्तीसगढ़ में फिलवक्त दो डिप्टी सीएम हैं। एक अगर दिल्ली गए तो फिर सिंगल डिप्टी सीएम बच जाएंगे। सियासी संतुलन के हिसाब से सरकार भी नहीं चाहेगी कि एक उप मुख्यमंत्री रहें। इसलिए, जुलाई में संभावित मंत्रिमंडल की सर्जरी में किसी नए या पुराने में से एक को डिप्टी सीएम बनाया जाएगा। मगर तब, जब भाई साब जनरल सिकेट्री बन जाएं।

जनरल सिकेट्री के मायने

वैसे तो बीजेपी की नेशनल बॉडी में पूर्व मंत्री लता उसेंडी के शामिल होने की संभावना अधिक है। वे 10 साल तक मिनिस्टर रही हैं। जगतप्रकाश नड्डा की टीम में भी रहीं। उनके बनने से दो कोटे की पूर्ति होगी। ट्राईबल और महिला। बहरहाल, डिप्टी सीएम के नितिन नबीन की टीम में शामिल होने की चर्चाएं हैं तो सवाल भी उठते हैं कि उप मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ भाई साब दिल्ली में इतनी उत्सुकता क्यों दिखा रहे? इसका जवाब है कि उनका एज अभी काफी कम है। दिल्ली के क्लोज अगर हो गए तो राज्य में बड़े एक्सपोजर के साथ कभी भी वापसी हो सकती है। राज्य में नहीं भी आए, दिल्ली की सियासत में मामला ठीकठाक जम गया तो वो भी बुरा नहीं...ओजस्वी वक्ता तो हैं ही इंग्लिश भी ठीकठाक झाड़ लेते हैं। इसलिए, डिप्टी सीएम साब भी जनरल सिकेट्री बनने की चर्चाओं को खारिज नहीं कर रहे।

जुलाई में सर्जरी

छत्तीसगढ़ समेत पांच राज्यों में नवंबर 2023 में विधानसभा चुनाव हुए, जुलाई में वहां ढाई साल पूरा हो जाएगा। अब बाकी राज्यों के बारे में गारंटी के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता मगर छत्तीसगढ़ में मंत्रियों के जो हालात है, उससे मेगा सर्जरी अवश्यंभावी है। जुलाई में ही सर्जरी इसलिए कि 3 मई को काउंटिंग के बाद करीब 15 मई तक बीजेपी सरकार बनाने और जश्न सेलिब्रेट करने में व्यस्त रहेगी। 15 मई के बाद टीम नितिन नबीन बनाने पर मंथन प्रारंभ होगा। ऐसी संभावना है कि मई लास्ट या जून फर्स्ट वीक तक राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन कर लिया जाएगा। इसके बाद फिर केंद्र सरकार जिन राज्यों के ढाई साल कंप्लीट हो गए हैं, उस पर अपना ध्यान केंद्रित करेगी। केंद्र को इसमें ज्यादा वक्त नहीं लगेगा क्योंकि उसके पास पूरी रिपोर्ट है। छत्तीसगढ़ की आईबी तो और काफी एक्टिव है। यहां मंत्रियों के कारनामों की छोटी-से-छोटी सूचना भी मुख्यालय को भेजती है। लिहाजा, जुलाई में जो सर्जरी होगी, वो मेजर होगी। दावे तो ये किए जा रहे...आधा दर्जन से अधिक मंत्रियों को शानो-शौकत वाले लग्जरी बंगले से बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ सकता है।

बेलगाम मंत्री, भ्रष्ट विभाग

छत्तीसगढ़ सरकार एक तरफ महिलाओं के उत्थान के लिए महतारी वंदन योजना चला रही है। हर महीने उनके खाते में नियम से हजार रुपए ट्रांसफर किया जाता है। दूसरी तरफ शर्मनाक स्थिति यह है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को साड़ी बांटने में डंडी मारी जा रही। हद है...महिला बाल विकास विभाग ने साढ़े पांच की जगह पांच मीटर की साड़ी सप्लाई कर दी। सरकार को इसमें कड़ा तेवर दिखा जिम्मेदारों को उल्टा लटकाना चाहिए। क्योंकि, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताएं सरकार और सत्ताधारी पार्टी के लिए ओपिनियन मेकर होती हैं। वैसे भी सरकार की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। आश्चर्य की बात कि कई बड़े और ऐतिहासिक सुधार के काम करने के बाद भी सरकार को उसका क्रेडिट नहीं मिल रहा तो उसकी मूल वजह करप्शन है और मंत्रियों का बेलगाम होना। बीजेपी के लोग भी मान रहे कि अगले दो-तीन महीने में अगर मंत्रिमंडल में सर्जरी नहीं हुई तो फिर 2028 के विधानसभा चुनाव में बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। आखिर, मंत्री और नेता अपने हाथों ही पार्टी और सरकार की लंका कर देंगे तो मोदी, अमित शाह और नितिन नबीन कितना क्या कर लेंगे?

डीजीपी और कांटे का टक्कर

लास्ट संडे को छुट्टी का दिन होने के बाद भी गृह विभाग के मुलाजिमों को शाम तक मंत्रालय में बिठाकर रखा गया कि पूर्णकालिक डीजीपी का आदेश निकालना है। मगर टक्कर इतना जोरदार है कि सिस्टम किसी एक नाम पर फैसला नहीं कर पाया। डीजीपी के दावेदारों में एक यूपी के ठाकुर हैं तो दूसरे राजस्थान के वैश्य। जाहिर है, दोनों अपनी तरफ से कोशिशें कम नहीं कर रहे होंगे। मगर सरकार बड़ी दुविधा में है। किसके नाम पर मुहर लगाएं...एक है तो वो कुछ सुनता नहीं...सिस्टम को चिंता यह भी खाये जा रही है। सियासी दृष्टि से भी दोनों कमजोर नहीं। वैसे भी ठाकुर और वैश्य कम्यूनिटी में ये अच्छी बात है कि उनके लिए समाज फर्स्ट होता है, पार्टी सेकेंड्री। सो, मुकाबला टाईट है। हालांकि, एक बात तय है कि दोनों में से डीजीपी वही बनेगा, जिसके माथे पर लिखा होगा। भला अमरनाथ उपध्याय ने कभी कहां सोचा था कि गिरधारी नायक जैसे आईपीएस के होते वे कभी डीजीपी बन जाएंगे। मगर ऐसा हुआ...29 साल की सर्विस में एडीजी होते हुए वे डीजीपी बन गए थे। उनके लिए तत्कालीन मुख्य सचिव सुनिल कुमार प्रगट हो गए थे। उन्होंने अशोक जुनेजा को हाथोंहाथ लेटर लेकर दिल्ली भेजा और एमएचए सिकेट्री को फोन कर उसी दिन शाम को 29 साल की सर्विस में डीजीपी बनाने का परमिशन ले लिया। तो अतीत में ऐसा भी हुआ है, इसका स्मरण रखना चाहिए।

2001 बैच तक दावेदार

छोटे राज्यों में अफसरों की कमी की वजह से भारत सरकार ने डीजीपी बनाने के लिए आईपीएस की 30 बरस की सर्विस को पांच साल कम कर 25 साल कर दिया है। छत्तीसगढ़ सरकार अगर इसे फॉलो करें तो 2001 बैच तक के आईपीएस अधिकारी डीजीपी के लिए दावेदार हो जाएंगे। याने एसआरपी कल्लूरी से लेकर प्रदीप गुप्ता, विवेकानंद, दीपांशु काबरा, अमित कुमार और डॉ0 आनंद छाबड़ा तक। तब सरकार के पास ढेरो विकल्प होते। मगर सरकार ने डीजीपी के पेनल के लिए 30 साल की सर्विस को मान्य करते हुए तीन अफसरों के नाम ही यूपीएससी को भेजे थे। इनमें से यूपीएससी ने दो के ही पेनल भेजे।

एडीजी के नीचे एडीजी

अफसरों की सरकार से नाराजगी कोई नई बात नहीं। हर टेन्योर में कुछ अफसर सिस्टम के निशाने पर होते हैं। मगर पोस्टिंग प्रोटोकॉल में वह शो नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए दीपांशु काबर और डॉ0 आनंद छाबड़ा की पोस्टिंग को लें। दीपांशु काबरा पीएचक्यू में एडीजी ट्रेनिंग हैं और प्रमोट हुए एडीजी छाबड़ा भी एडीजी ट्रेनिंग। याने एडीजी के नीचे एडीजी। कायदे से ऐसा होना नहीं चाहिए। सिस्टम चाहे तो भले ही पोस्टिंग न दें, मगर सीनियर, जूनियर को एक ही पद पर नहीं बिठाना चाहिए।

गोल्फ प्रेम को झटका 

मंत्रालय समेत सरकारी कार्यालयों में बायोमेट्रिक अटेंडेंस प्रारंभ होने से उन अफसरों को गोल्फ खेलना छूट गया है जिनकी सरकारी गाड़ियां सुबह छह और सात बजे नवा रायपुर की तरफ दौड़ती रहती थी। कुछ सालों से अभिजात्य वर्ग के इस खेल के प्रति छत्तीसगढ़ के अफसरों की रुचि गहरी हुई थी। कुछ अफसर तो यह दिखाने के लिए भी जाते थे कि वे गोल्फ खेलते हैं। हालांकि, उस समय कोई रोक-टोक भी नहीं थी...अफसरशाही में पूरी डेमोक्रेसी थी। गोल्फ खेल-खालकर अफसर 10 बजे तक घर पहुंचते थे...फिर मूड हुआ तो दोपहर बारह-एक बजे तक मंत्रालय। मगर बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम ने स्टे्टस सिंबल बताने का सबका खेल बिगाड़ दिया। जो नवा रायपुर में रहते हैं, उनको दिक्कत नहीं मगर ओल्ड रायपुर वालों को अब साढ़े नौ बजे घर से निकलना पड़ता है। ऐसे में, गोल्फ प्रेम छूटेगा ही।

वायरल रील्स और उठते सवाल

छत्तीसगढ़ की पुलिस बिरादरी में एक रील्स बड़ी वायरल है। उसमें इंटरव्यू बोर्ड पुलिस की नौकरी के लिए अप्लाई किए अभ्यर्थी से पूछा...पुलिस के लिए 150 रुपए पौष्टिक भत्ता मिलता है, आप पुलिस में हैं तो इसे कैसे मैनेज करेंगे? जवाब बड़ा इंटरेस्टिंग और सिस्टम पर करारा प्रहार करने वाला है। अप्लीकेंट बोला, सर...150 रुपए के हिसाब से एक दिन का पांच रुपए हुआ। पांच रुपए का एक नींबू आता है, रोज उसमें नमक लगाकर चाट लेंगे। इससे विटामिन सी की पूर्ति हो जाएगी फिर आयोडिन मिलेगा, इससे पुलिस वालों को घेंघा रोग नहीं होगा। हालांकि, रील्स बनाने वाले ने त्रुटिवश इसमें 50 रुपए बढ़ा दिया है। वास्तव में हमारे जवानों को पौष्टिक भत्ते के रूप में मिलता 100 रुपए है। मध्यप्रदेश के दौर में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने 1982 में पुलिस वालों के लिए 100 रुपए पौष्टिक भत्ता शुरू किया था। और 44 साल बाद भी यह 100 से बढ़ा नहीं। जबकि, यूपी में 5000 और पंजाब में 6000 पौष्टिक भत्ता मिलता है। जाहिर है, पुलिस की नौकरी सबसे टफ है। बरसात हो या चिलचिलाती धूप, या हाड़ कंपाने वाली ठंड...पुलिस को मुस्तैद रहना होता है। मंत्री, मिनिस्टर या बड़े लोगों का वीवीआईपीनेस भी वर्दीधारियों की संख्या के चलते ही प्रगट होता है फिर भी ये हाल? छत्तीसगढ़ में अभी तक 11 डीजीपी रह चुके। मगर किसी ने भी कोई जवानों के लिए एफर्ट नहीं दिखाया। दरअसल, आईपीएस और स्टेट पुलिस सर्विस वालों को काजू-बादाम जैसे पोष्टिक चीजें खरीदनी नहीं पड़ती, इसलिए वे पौष्टिक पदार्थो के रेट से वाकिफ नही होते। इसलिए, उन्हें जवानों की चिंता भी नहीं होती। अर्जुन सिंह राजा होकर भी संवेदनशील थे, ये अलग बात है। बहरहाल, प्रभारी डीजीपी अरुणदेव गौतम को पौष्टिक भत्ता बढ़ाने के लिए अब तक के सबसे तेज-तर्रार गृह मंत्री विजय शर्मा से बात करनी चाहिए। क्योंकि, बाकी डीजीपी के समय विजय शर्मा जैसा कोई ताकतवर गृह मंत्री नहीं रहा।

हफ्ते का कोट

"तुलना के खेल में मत उलझो, इस खेल का कोई अंत नहीं...जहां तुलना की शुरूआत होती है, वहीं से आनंद और अपनापन खत्म होता है।" और फिर..."नहीं खाई ठोकरे राह में तो, मंजिल की अहमियत क्या जानोगे, नहीं मिले गलत लोग राह में तो, सही की कदर कैसे पहचानोगे।"

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या 2010 बैच का कोई आईएएस अफसर भी डेपुटेशन पर दिल्ली जा रहा है?

2. छत्तीसगढ़ के एक मिनिस्टर का नाम बताइये, जिन्हें कुछ समझ में नहीं आता, उनके विभाग सिकेट्री चला रहे हैं?


Chhattisgarh Tarkash 2026: एमडी टू मिनिस्टर



तरकश, 5 अप्रैल 2026

संजय के. दीक्षित

एमडी टू मिनिस्टर

तरकश के पिछले स्तंभ में बिजली कंपनी के एक एमडी के नवाबी ठसन का किस्सा बयां किया था...कैसे वे मंत्रियों की तरह अपने काफिले की पायलेटिंग कराते हैं। अब पता चला है कि एमडी अगला विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। उन्हें किसी ने कह दिया है कि अगर चुनाव जीत गए तो मंत्री पक्का बनोगे...जब ऐसे-वैसे लोग मंत्री बन सकते हैं तो तुम तो पढ़े-लिखे...बड़े इंजीनियर से एमडी पद पर पहुंचे हो। इसके बाद से एमडी के लटके-झटके अभी से मंत्रियों जैसे हो गए हैं। चुनाव लड़ने के लिए उनके मैडम भी खूब निभा रही हैं। जिस इलाके में चुनाव लड़ने की तैयारी है वहां धड़ाधड़ समाधान शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। शिविरों में गरीबों के बिजली बिल का बकाया बिल मैडम भुगतान कर देती हैं। पीछे बैठे जेई, एई जेब से मैडम को पैसे निकाल कर देते हैं, और मैडम उसे जमा करा देती हैं। फिर होता है...जय-जयकार। व्हाट एन आईडिया। अफसर रहते नेताओं जैसा जय-जयकार।

अफसर को एक्सटेंशन!

पीसीसीएफ और हेड ऑफ फॉरेस्ट श्रीनिवास राव का रिटायरमेंट का समय नजदीक आ गया है। अगले महीने 31 मई को उनकी सेवानिवृत्ति है। मगर इसी के साथ उन्हें एक्सटेंशन मिलने की अटकलें भी तेज हो गई है। जाहिर है, श्रीनिवास राव भूपेश बघेल सरकार में सात सीनियर अफसरों को सुपरसीड कर हेड ऑफ फॉरेस्ट बने थे। जब वे फॉरेस्ट के हेड बने थे, तब आश्चर्यजनक तौर से वे पीसीसीएफ भी प्रमोट नहीं हुए थे। और दिसंबर 2023 में विष्णुदेव साय की सरकार आने के बाद भी ढाई साल से पिच पर बने हुए हैं, तो उनमें कुछ तो बात होगी। वैसे उनके एक्सटेंशन की अटकलों के पीछे मजबूत पॉलिटिकल बैकिंग बताई जा रही है। श्रीनिवास राव के निकटतम परिजन आंध्रप्रदेश में ऐसे कद्दावर नेता है, जिनके खेमे में दो दर्जन विधायक हैं। उसी गुट के सपोर्ट पर चंद्राबाबू नायडू की सरकार चल रही है और चंद्राबाबू के सपोर्ट पर केंद्र सरकार। तो फिर उनके एक्सटेंशन की खबरों को एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता।

माटी पुत्र

श्रीनिवास राव के बाद सीनियरिटी में पहले नंबर पर अरुण पाण्डेय हैं। 94 बैच के आईएफएस अरुण हेड ऑफ फॉरेस्ट के प्रबल दावेदार हैं। मगर श्रीनिवास राव को एक्सटेंशन मिला तो फिर अरुण पाण्डेय को हेड ऑफ फॉरेस्ट बनने की संभावनाएं क्षीण हो जाएंगी। अलबत्ता, श्रीनिवास को अगर एक्सटेंशन न मिला तो फिर हॉफ के लिए मुख्य मुकाबला दो अंबिकापुरिया में होगा। अरुण पाण्डेय और ओपी यादव दोनों अंबिकापुर के रहने वाले हैं। याने दोनों में से कोई भी बने, कोई माटी पुत्र ही हेड ऑफ फॉरेस्ट होगा। बशतें एक्सटेंशन की चकरी न चले।

नो ट्रांसफर

छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक ट्रांसफर पर कुछ दिनों के लिए ब्रेक लग गया है। अब मई के फर्स्ट वीक तक जाकर ही कुछ हो पाएगा। बता दें, सूबे में कलेक्टर, एसपी, डीएफओ, जिला पंचायत सीईओ समेत डिप्टी कलेक्टरों के ट्रांसफर काफी दिनों से अवेटेड है। मगर सरकार ने फैसला किया है कि फिलहाल कोई चेंज नहीं किया जाए। जो होगा अब मई फर्स्ट वीक तक...या हो सकता है 15 मई तक चला जाए। इसकी एक बड़ी वजह पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं। इसमें छत्तीसगढ़ से बड़ी संख्या में अफसरों की ड्यूटी लगी है। वेस्ट बंगाल में अप्रैल के अंत में वोटिंग है। सीएम सचिवालय के सूत्रों का कहना है, अफसरों के इलेक्शन से लौटने के बाद ही ट्रांसफर होंगे। याने मई ट्रांसफर का महीना रहेगा। जाहिर है, कई जिलों के कलेक्टर, एसपी, डीएफओ बोरिया-बिस्तर बांध कर प्रतीक्षा कर रहे हैं। मगर उन्हें अभी महीना-डेढ़ महीना और इंतजार करना पड़ेगा।

कमिश्नर रिटायर

रायपुर के डिविजनल कमिश्नर महादेव कावड़े अगले महीने सेवानिवृत्त हो जाएंगे। 31 मई उनका लास्ट डेट रहेगा। इसलिए, रायपुर में नया कमिश्नर भी अपाइंट करना होगा। मई में होने वाली प्रशासनिक सर्जरी में नए रायपुर कमिश्नर भी शामिल होंगे। वैसे, सरकार ने प्रमोटी आईएएस को कमिश्नर बनाने का स्टैंडर्ड सेट कर दिया है। लिहाजा, अत्यधिक संभावना है कोई प्रमोटी आईएएस रायपुर का नया कमिश्नर बनेगा। भले ही वह मंत्रालय के सचिव स्तर का कोई अधिकारी क्यों न हो।

सिंगल ऑफिसर और हनी ट्रेप

बिलासपुर में आईजी लेवल के दो अफसरों को ट्रेप किया गया। ये दोनों सिंगल थे और जाहिर तौर से सिंगल वाले को फंसना-फंसाना ज्यादा आसान होता है। इसलिए, बिलासपुर के नए आईजी ज्वाईनिंग के साथ ही परिवार लेकर बिलासपुर चले गए। ऐसा करना भी चाहिए। बिलासपुर के कप्तान को भी सतर्क रहना चाहिए। बदमाशों, अपराधियों को वे लगातार जेल भेज रहे हैं। वैसे, हनी ट्रेप के शिकार ज्यादा सिंगल अफसर ही होते हैं। सिंगल वाले पर डोरे डालना आसान होता है। बिलासपुर संभाग के एक पूर्व कलेक्टर सिंगल रहने के चलते बाल-बाल बचे। हालांकि, बदनामी तो पूरी हो गई। बस्तर संभाग के एक कलेक्टर भी कब हनी ट्रेप के शिकार होकर मीडिया की सनसनी बन जाएं, कुछ कहा नहीं जा सकता। खतरा मंत्रालय में भी कम नहीं है। कई अफसर परिस्थितियोंवश सिंगल हैं। वहां कई सप्लाई कंपनियों और मेट्रो सिटीज के एनजीओ की कुड़ियां शिकार की तलाश में घूमती रहती हैं। कुल मिलाकर पावर और पैसा जहां है, वहां मधुमक्खियां मंडराएंगी ही। ऐसे अफसरों की पत्नियों को विशेष अलर्ट रहने की जरूरत है। वरना, बाद में पछताने के अलावा कोई चारा नहीं बचता।

नाइंसाफी?

सरगुजा से नक्सलियों का सफाया करने वाले आईपीएस अधिकारी एसआरपी कल्लूरी ऐसे घनचक्कर में फंस गए हैं कि सीनियर होने के बाद उन्हें डीजी बनने में लंबा वेट करना होगा। दरअसल, परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि 94 बैच में सीनियर होने के बाद भी जीपी सिंह और एसआरपी कल्लूरी डीजी प्रमोशन से चूक गए। जीपी तो लड़-भिड़कर अपना प्रमोशन करा लिए मगर अत्यधिक तेज-तरार्र आईपीएस माने जाने वाले कल्लूरी पता नहीं क्यों ठंडे पड़ गए। और अब आगे उनके लिए कोई स्कोप भी नजर नहीं आता। डीजी के चार ही पद है। दो कैडर, दो एक्स कैडर। इन चार पदों पर इस समय अरुण देव गौतम, पवनदेव, जीपी सिंह और हिमांशु गुप्ता बैठे हैं। गौतम का अगले साल रिटायरमेंट है मगर कहीं पूर्णकालिक डीजीपी बन गए तो फिर उनका कार्यकाल दो साल का हो जाएगा। याने फिर 2028 में रिटायर होंगे। उसके बाद ही कल्लूरी का रास्ता साफ हो पाएगा। तिरूपति वाले बालाजी की कहीं विशेष चकरी चल गई तो फिर बात अलग है....सरकार चाहे तो उन्हें केंद्र से बात कर स्पेशल डीजी बना सकती है।

चंदे से शादी

अभी तक गांवों में अनाथ या गरीबों की बेटियों की शादी लोग जरूर चंदा देकर करा देते थे। मगर प्रभावशाली लोग ऐसा करने लगे तो ये ठीक नहीं। इससे सूबे में एक नई परिपाटी शुरू हो जाएगी। कुछ दिनों पहले एक मंत्री के साथ साये की तरह रहने वाले की शादी हुई, उसमें भी अधिकारियों, सप्लायरों से बड़ा चंदा हुआ। और इस समय फिर ऐसी ही वसूली हो रही है। रायपुर में अफसरों से कहा जा रहा...भले ही परचेजिंग तेज कर दो, मगर इतना चाहिए तो चाहिए। अब इसमें से उपर कितना पहुंचेगा और कितना चेले-चपाटी भाई साहब के नाम पर अंदर कर लेंगे, ये भी बड़ा प्रश्न है। सार यह है कि बड़े लोगों को इन सबको लेकर सजग रहना चाहिए।

बिना एसपी के डीआईजी

छत्तीसगढ़ में राज्य पुलिस सेवा का बड़ा बुरा हाल है। डिप्टी कलेक्टरों में 2013 बैच तक आईएएस अवार्ड हो गया मगर डीएसपी में अभी 2002 बैच में ही मामला अटका हुआ है। नाइंसाफी भी ऐसी कि जो आईपीएस बने, उन्हें एसपी बनने का मौका नहीं मिला। श्वेता राजमणि बिना एसपी बने ही डीआईजी प्रमोट हो गई। हालांकि, सरकार चाहे तो डीआईजी को भी एसपी बना सकती है मगर सिस्टम में समरथ को न दोष गोसाई जैसी स्थिति है। उमेश चौधरी भी आईपीएस बनकर पीएचक्यू में टाईम काट रहे हैं। उधर, मनोज खिलाड़ी कुछ सीनियर आईपीएस अफसरों के जोर लगाने पर जीपीएम जैसे जिले के एसपी बन पाए। जबकि, उनके बाहर से अतिक्रमण करके आए बैचमेट दो-दो, तीन-तीन जिले की कप्तानी कर चुके हैं। कुल मिलाकर रापुसे पर ’दुबर पर दो आसाढ़’ वाली स्थिति है...एक तो आईपीएस अवार्ड में पीछे और उपर से आईपीएस हो गए तो बिना किसी एप्रोच के जिला नहीं मिल पाएगा।

डिप्टी कलेक्टरों के बुरे दिन

डीएसपी की जैसा हाल अब डिप्टी कलेक्टरों का भी होना है। 2013 बैच के 30 में से तीन आईएएस बने हैं। अभी 27 बचे हैं। 2014 बैच में भी 30 डिप्टी कलेक्टर हैं और 2015 बैच में उससे दुगुना। याने 60। हालांकि, आईएएस का कैडर रिवीजन में पद बढ़ गया है फिर भी अब आईएएस अवार्ड होने के लिए काफी पापड़ बेलने पड़ेंगे। हो सकता है कई को एडिशनल कलेक्टर से ही रिटायर होना पड़ जाए। इस समय राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की संख्या बढ़कर 448 पहुंच गई है। इतने छोटे राज्य में कभी इतना ज्यादा अफसर होते नहीं। मगर डिप्टी कलेक्टरों को जनपद सीईओ बनाने के लिए एक बार पद बढ़ाया गया तो फिर बढ़ता चला गया। इसका खामियाजा अब अफसरों को उठाना पड़ेगा।

’उड़ता छत्तीसगढ़’

दुर्ग पुलिस द्वारा हाइड्रोपोनिक गांजा बरामद करने से हड़कंप मच गया है। हाइड्रोपोनिक गांजा बैंकॉक और हांगकांग के समुद्र में उगाया जाता है। यह इतनी कीमती है कि बाजार रेट इसका एक करोड़ रुपए किलो है। इसके बाद भी छत्तीसगढ़ में इसकी सप्लाई हो रही है तो समझा जाता है कि छत्तीसगढ़ में किस लेवल पर गांजे का इस्तेमाल किया जा रहा है। लोकल गांजा लोवर क्लास के लोग इस्तेमाल करते ही हैं, लोगों को नशे की लत ऐसी लगती जा रही कि बड़े-बड़े लोग सिगरेट में भरकर गांजा पी रहे हैं। दुर्भाग्यजनक यह है कि छत्तीसगढ़ के कुछ युवा नौकरशाहों के नाम भी गांजे का सेवन करने में आ रहा है। वाकई, यह चिंताजनक है। आखिर नई पीढ़ी कहां जा रही है?

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस तेज-तर्रार पुलिस अधीक्षक को हटाने के लिए नेताओं और माफियाओं ने नवरात्रि में बकरे की बलि दी है?

2. पूर्णकालिक डीजीपी का फैसला दो-एक दिन में होना है, अरुणदेव गौतम और हिमांशु गुप्ता में से किसके सिर सजेगा पुलिस प्रमुख का ताज?

रविवार, 29 मार्च 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: ब्रांडेड शराब, मुख्य सचिव और खेला



 तरकश, 29 मार्च 2026

संजय के. दीक्षित

ब्रांडेड शराब, मुख्य सचिव और खेला

रमन सरकार 2.0 के दौरान शराब माफियाओं को झटका देते हुए गवर्नमेंट द्वारा शराब बेचने की नीति बनाई गई थी, उसमें शराब खरीदने-बेचने वाली स्टेट मार्केटिंग कंपनी में चीफ सिकरेट्री को पदेन चेयरमैन बनाया गया था। इसलिए, ताकि कोई गड़बड़ी न हो। बावजूद इसके 3200 करोड़ का घोटाला हो गया। हालांकि, मुख्य सचिव बनते के बाद विकास शील ने स्टेट मार्केटिंग कंपनी की पहली बैठक में ही शराब में ’वन टू का फोर’ के खेल को बंद करने की कवायद शुरू कर दी। उससे पहले शराब कंपनियां दुकानों में प्रतिद्वंद्वी कंपनियों की बजाए अपना ब्रांड रखवा देती थी। इससे लोग पसंदीदा ब्रांड के लिए भटकते रहते थे। स्टेट कंपनी के अफसरों से गठजोड़ कर इस खेल को अंजाम दिया जाता था। मगर आश्चर्य यह है कि बीजेपी की सरकार आने के बाद भी पिछले दो साल से ये खेल बदस्तूर जारी था। बहरहाल, सीएस ने अब ’मनपसंद’ ऐप्प चालू करवा दिया है। अब ऐप्प पर जाकर देखा जा सकता है कि किस शॉप में उनके पसंद का ब्रांड उपलब्ध है और कहां नहीं। दूसरा, अब शराब खरीदने के लिए यूपीआई से पेमेंट करना होगा। यानी नो कैश ट्रांजेक्शन। दरअसल, ईडी इसी खेल की जांच कर रही है...कई अफसर सलाखों के पीछे हैं। खेल था...सरकारी शराब के पैरेलेल प्रायवेट तौर पर शराब बेचकर करोड़ों अंदर करना। यूपीआई से पेमेंट होने पर अब गोलमाल संभव नहीं हो पाएगा। अलबत्ता, सीएस के इस एक्शन से कई शराब कारोबारियों को झटका लगा है। कसमसा तो आबकारी विभाग वाले भी रहे हैं और कुछ बीजेपी के नेता भी, क्योंकि उनके पेट पर चोट पहुंच रही।

सरकार संज्ञान ले

बात निकली चीफ सिकरेट्री के अहम संस्थाओं में चेयरमैन बनाने की तो सीजीएमएससी भी उनमें शामिल था। बता दें, स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के दौर में सीजीएमएससी का गठन किया था और उसमें मुख्य सचिव को पदेन चेयरमैन बनाया गया था। ताकि, नीचे के मुलाजिमों में भय बना रहे। मगर पिछली सरकार में इसे उलट सरगुजा से विधायक डॉ0 प्रीतम राम को ढाई करोड़ लोगों की जान की रक्षा करने वाले सीजीएमएससी का चेयरमैन बना दिया गया। चलिये प्रीतम राम तो पेशे से चिकित्सक थे, उन्हें दवा, मशीन के बारे में कुछ तो जानकारियां रही होगी। बीजेपी शासनकाल में दीपक महस्के को इस निगम का अध्यक्ष बनाया गया है। जाहिर है, बीजेपी का आईटी सेल देखने वाले महस्के को मेडिकल लाइन का एबीसीडी का ज्ञान नहीं होगा। और जब डॉक्टर के चेयरमैन होने के बाद सीजीएमएससी में 400 करोड़ का रीएजेंट घोटाला हो गया...आधा दर्जन अफसर और सप्लायर जेल में हैं और आधा दर्जन कभी भी भीतर जा सकते हैं तो फिर इस समय क्या होगा, भगवान ही मालिक है।

वीआईपी एमडी

ऐसा जलवा तो निगम, बोर्डों में पोस्टेड आईएएस एमडी भी नहीं काटते होंगे, जैसा बिजली कंपनी के एक प्रबंध निदेशक काट रहे हैं। उनके काफिले में एक पायलट गाड़ी चलती है। उसमें बिजली कंपनी का खाकी वर्दी वाला सिक्यूरिटी अफसर चलता है। सिक्यूरिटी अफसर को इतना अपटूडेट रखा जाता है कि सड़क पर लोग भ्रम खा जाए कि छत्तीसगढ़ आर्म्स फोर्स का कोई रंगरूट होगा। एमडी इतने शौकीन हैं कि उन्हें कलम भी सरकारी पैसे का चाहिए...वो भी हल्का-फुल्का नहीं...हाल में उन्होंने 5000 का पेन खरीदवाया है। रही बात, पायलेटिंग की तो छत्तीसगढ़ में चीफ सिकरेट्री और डीजीपी की भी पायलेटिंग नहीं होती। सूबे में अब तक किसी डीजीपी की अगर पायलेटिंग हुई है तो वे थे विश्वरंजन। विश्वरंजन का पिछले हफ्ते ही स्वर्गवास हुआ है। दिल्ली आईबी से लौटे विश्वरंजन का रसूख भी ऐसा था कि उनका एक बार चलता था। मगर इंजीनियर से प्रमोट होकर एमडी बने अफसर अगर पायलेटिंग करवा रहा तो समझा जा सकता है छत्तीसगढ़ में क्या हो रहा है।

सीएस, डीजीपी का प्रोटोकॉल

बात चीफ सिकरेट्री और डीजीपी की पायलेटिंग की आई तो ये दोनों कार्यपालिका और सिक्योरिटी के सुप्रीम पद हैं। इनके सिकरेट्री प्रोटोकॉल में भी पायलेटिंग और फॉलोगार्ड आता है। सीएस को वाय और डीजीपी को जेड केटेगरी की सुरक्षा होनी चाहिए। मगर फोकस में आने से बचने के लिए छत्तीसगढ़ में सीएस और डीजीपी इसका इस्तेमाल नहीं करते। मगर कायदे से दोनों को अपने पद के औरा का खयाल रखना चाहिए। ठीक है, सरकारी मुलाजिम लोक सेवक होता है मगर पद के अनुरूप उसका तामझाम और सिक्योरिटी होनी चाहिए। वरना, कलेक्टर और सीएस तथा एसपी और डीजीपी में क्या फर्क रहेगा।

100 अटेंडेंस

छत्तीसगढ़ के मंत्रालय में एक जनवरी से बायोमेट्रिक अटेंडेंस लागू किया गया, उस टाईम एकमात्र अफसर टाईम से आ रहे थे। याने दिसंबर का फिगर सिर्फ एक रहा। इसके बाद जनवरी में 10 बजे तक मंत्रालय पहुंचने वालों की संख्या 18 हुई और फरवरी में 100 । मार्च में लगभग दुगुना होने का अंदेशा हैं। जीएडी का प्रयास है कि इसके बाद इसे पब्लिक के लिए ओपन कर दिया जाए। याने कोई भी सरकार के वेबसाइट पर जाकर देख सकेगा कि कितने अफसर कितने बजे तक ऑफिस आते हैं और शाम को कितने बजे जाते हैं। हालांकि, इसमें अफसरों का नाम नहीं रहेगा, संख्या रहेगी।

ई-ऑफिस के फायदे?

अब इसे ई-ऑफिस में फंसना कहें कि टेक्नालॉजी का फायदा, विभिन्न राज्यों में चुनाव कराने गए कई आईएएस अफसर रायपुर में न रहने के बाद भी ई-ऑफिस पर फाइलें क्लियर कर रहे। यदि ऐसा रहा तो सरकार को लिंक अफसर बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अफसरों के अवकाश में रहने के बाद भी महत्वपूर्ण फाइलों के लिए लिंक अफसर नियुक्त किए जाते हैं। चीफ सिकरेट्री को इसकी रिपोर्ट मांगनी चाहिए कि चुनाव ड्यूटी में रहने के बाद भी कितने अफसरों ने ई-ऑफिस से सरकारी काम भी करते रहे...उन्हें सम्मानित करना चाहिए।

पोस्टिंग में सियासत?

प्रदेश के दूसरे बड़े शहर मंत्रिपरिषद में प्रतिनिधित्व के मामले में दुर्भाग्यशाली तो है ही अफसरों की पोस्टिंग के मामले में इस शहर के साथ दोयम व्यवहार किया जा रहा है। बिलासपुर नगर निगम में अजीत जोगी सरकार के समय से डायरेक्ट आईएएस कमिश्नर रहे। कभी-कभार राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर आयुक्त बने भी तो वे पारफर्मेंस वाले रहे। मगर अभी जो पोस्टिंग हुई है, उसके बाद स्थिति यह है कि एक सड़क को पीडब्लूडी ने ठेका दे दिया और उसी ठेकेदार को नगर निगम ने भी ठेका दे डाला। निगम के अफसरों का खेल ये था कि पीडब्लूडी सड़क बनवाएं और निगम से भी उसका बिल पास कर करोड़ों रुपए अंदर कर लिया जाए। मगर उससे पहले खेल का भंडाफोड़ हो गया। हो सकता है, इसमें दोष निगम कमिश्नर का न हो। काफी लो प्रोफाइल के वे सीधे-साधे अफसर हैं। तभी तो स्मार्ट सिटी के मद से 16 करोड़ में बनवाए गए मल्टीलेवल पार्किंग में एक आटो डील वाले ने कब्जा कर लिया है। पार्किंग के एक फ्लोर पर डीलर ने 500 मोटरसायकिलें लाकर खड़ी कर दी। वो भी निगम मुख्यालय के ठीक सामने स्थित पार्किंग में। इससे समझा जा सकता है, नगर निगम में क्या चल रहा होगा। बहरहाल, बात पोस्टिंग में सियासत की तो जिस एसडीएम को एसीबी छापे के बाद हटा कर बस्तर भेजा गया, आश्चर्यजनक तौर से उसकी पोस्टिंग फिर बिलासपुर कर दी गई। सिस्टम को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा तो कम-से-कम बीजेपी को देखना चाहिए। अभी तो जांजगीर गड्ढा हुआ है, कोई भरोसा नहीं कि 2028 के इलेक्शन में बिलासपुर जिला भी बड़ा गड्ढा बन जाए। कलेक्टर संजय अग्रवाल को टीम अच्छी नहीं मिलेगी तो वे अकेले क्या कर लेंगे। वैसे भी किसी जमाने में अविभाजित बिलासपुर जिले की 19 की 19 सीटें कांग्रेस की झोली में जाती थी।

मूंछ और चोटी वाले अफसर

नाम जरूर हायर है मगर इस विभाग में आमतौर पर हायर प्रोफाइल वाले अफसर कभी रहे नहीं और कोई जाना भी नहीं चाहता। बात हायर एजुकेशन की हो रही है। सरकार ने इस विभाग में अभिनंदन स्टाईल वाले मूंछेले अफसर और चोटी वाले आईएएस को बिठाया है। और इस समय विभाग का हाल ये है कि सालों से अटके सलेक्शन, पोस्टिंग और सस्पेंशन धड़ाधड़ हो रहे हैं। इससे पहले कभी कालेजों के प्रोफेसरों को निलंबित होते नहीं देखा गया। लेकिन पिछले छह महीने में कई प्रिंसिपल और असिस्टेंट प्रोफेसर निलंबित हो गए हैं। ऐसा तो नहीं...मूंछ और चोटी रखने से एक्स्ट्रा एनर्जी मिल जाती है?

कमजोर कलेक्टर-1

छत्तीसगढ़ ने कभी उदय वर्मा, प्रशांत मेहता, शैलेंद्र सिंह, नजीब जंग, सुनिल कुमार, अजय नाथ, देवराज बिरदी, विवेक ढांड, एमके राउत जैसे दमदार कलेक्टरों को देखा है। मगर अब आलम यह है कि 33 में से 25 से अधिक 'पठरू' कलेक्टर हैं। दरअसल, कलेक्टरों में दमदारी दिख नहीं रही। छोटे-मोटे लॉ एंड आर्डर होने पर वे मुख्य सचिव और सीएम सचिवालय की ओर देखने लगते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद के कलेक्टरों की बात करें, तो सुबोध सिंह रायपुर और बिलासपुर में किसी से मिलने से कतराते नहीं थे। दलित समाज के एक बड़े धर्मगुरू अक्सर उनके चेंबर में बैठे पाए जाते थे। इन्हीं संपर्को के जरिये उन्होंने गिरौदपुरी और बिल्हा की कई हिंसक घटनाओं पर काबू पाने में कामयाबी पाई। तो रायपुर में एक व्यापारी समुदाय के युवक की मौत के बाद मामला काफी बिगड़ गया था। भगत सिंह चौक पर लाश लेकर समाज के लोग बैठ गए थे। सुबोध सिंह बिना घबराये मौके पर पहुंच गए थे। अब तो हालत यह है कि कलेक्टर की तो दूर की बात एसपी, आईजी बिना फॉलोगार्ड लेकर मौके पर नहीं पहुंचते। कलेक्टर तो कोई घटना होती है तो बंगले में दुबक जाते हैं। बलौदा बाजार में जैसे ही हिंसा शुरू हुई, कलेक्टर शहर से बाहर चले गए थे।

कमजोर कलेक्टर-2

सरकार और जीएडी सिकेट्री रजत कुमार को कलेक्टरों की कमजोरी का कोई सौल्यूशन निकालना चाहिए। रजत खुद भी दमदार रहे हैं...कोरबा के लोगों ने देखा भी है। दरअसल, दिक्कत वहां से शुरू हुई, जब राज्य बनने के बाद आईएएस अधिकारियों को बिना एडीएम बनाए कलेक्टर बनाया जाने लगा। एक तो इस समय छत्तीसगढ़ में सबसे कम समय सिर्फ छह साल में कलेक्टरी मिल जा रही। उसमें एसडीएम की एक पोस्टिंग, उसके बाद जिला पंचायत सीईओ या निगम कमिश्नर और उसके बाद फिर सीधे जिले में डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट। इससे प्रशासन की बारीकियों से वे अनभिज्ञ रह जा रहे। चीफ सिकेट्री को पता होगा, मध्यप्रदेश के दौर में कलेक्टर बनने से पहले एडीएम बनना अनिवार्य था, फिर उस समय डीआरडीए का सीईओ, तब जाकर कलेक्टरी मिलती थी। एडीएम कलेक्टर और एसडीएम के बीच की कड़ी होते थे। हर धरना, प्रदर्शनों पर एडीएम को भेजा जाता था तो ज्ञापन भी एडीएम लेते थे। उससे कलेक्टरों को जिले के लिए प्लानिंग करने का टाईम मिलता था और एडीएम को एडमिनिस्ट्रेशन का अनुभव। एडीएम बनने का मतलब था कि पक्ष-विपक्ष दोनों ही दलों के नेताओं से बढ़ियां कनेक्शन बन जाना। कलेक्टर या उसके उपर की पोस्टिंगों में ये चीजें बडे काम आती थी। मगर अब तो ये हाल है कि अधिकांश कलेक्टरों को नेताओं या आम आदमी से कोई वास्ता नहीं रह गया है। सरकारें बदलती है, जनदर्शन लगाने का आदेश जारी करती हैं और फिर वह कूडे़दान में चला जाता है।

कलेक्टर-एसपी भाई-भाई

सिकरेट्री टू सीएम बनने के बाद तत्कालीन जीएडी सिकेट्री मुकेश बंसल ने फर्स्ट व्हाट्सएप कलेक्टर-एसपी के पारफर्मेंस और ट्यूनिंग को लेकर किया था। मगर वो बेमतलब निकला। अधिकांश जिलों के कलेक्टर-एसपी एक सूत्रीय एजेंडा में डटे हुए हैं। रही बात जनदर्शन की तो ऐसे जिले उंगलियों पर गिने जाने वाले होंगे। वैसे, वर्तमान दौर में जनदर्शन का कोई औचित्य नहीं भी नहीं रह गया है। इससे पब्लिक में नाराजगी और बढ़ती है। रमन सिंह के दौर तक अफसरशाही पटरी पर थी। मगर अब सब डिरेल्ड है। आखिर, पटवारी, आरआई और तहसीलदार, एसडीएम से जब न्याय नहीं मिलता तो आम आदमी कलेक्टर के पास पहुंचता है और कलेक्टर साब लोग समस्या ठीक से सुने बिना....नीचे रीडर को मार्क कर देते हैं। रीडर आवेदन को फिर उन्हीं खटराल तहसीलदार, एसडीएम के पास भेज देते हैं जांच के लिए, जहां से आदमी पहले ही आजिज आ चुका होता है। यही हाल कप्तान साब लोगों का है। एसपी से थाना या सीएसपी की शिकायत लेकर जाओ तो कलेक्टर जैसे ही नीचे मार्क कर देते हैं। ऐसे में आम आदमी को टाईम और पैसा खर्च होने के अलावा कुछ हासिल होता नहीं। फिर चुनाव आता है तो लोग सबक सिखाते हैं। जैसे कांग्रेस गवर्नमेंट में हुआ। उस समय विडबंना ये थी कि मुख्यमंत्री तेज-तर्रार थे मगर किन्हीं कारणों से प्रशासनिक सिस्टम निरंकुश हो गया था। उसकी कीमत कांग्रेस सरकार को चुकानी पड़ी।

सीएस का तीर?

कैबिनेट की बैठकों में अफसरों की बढ़ती भीड़ पर सख्ती दिखाते हुए चीफ सिकरेट्री ने इस पर अंकुश लगाने सचिवों को कड़ा पत्र लिखा है। भीड़ बढ़ने की एक बड़ी वजह सचिवों का सब्जेक्ट की स्टडी न होना भी है। अधिकांश सिकेट्री विभागों के कामकाज पर पकड़ नहीं रखते। इसलिए अपने डायरेक्टर, एमडी को तो बुलाते ही हैं, विभाग के सौ ताले की एक चाबी या श्रमजीवी मुलाजिम को कैबिनेट की बैठकों में बुला लेते हैं, ताकि चर्चा के दौरान कहीं गाडी अटकी तो तुरंत उनसे पूछ जवाब दे सकें। बहरहाल, सीएस के लेटर रुपी तीर ने कई और लोगों को जख्मी किया है, जो बिना काम कैबिनेट में घूस आते थे।

गॉड गिफ्टेड

विधानसभा अध्यक्ष डॉ0 रमन सिंह कोयंबटूर में इलाज कर रायपुर लौट आए हैं, और अब बिल्कुल स्वस्थ हैं। इसमें खबर ये है कि उनके आए लगभग पखवाड़ा गुजर चुका है, बावजूद उनसे मिल कुशल क्षेम पूछने वालों का तांता लगा है। कह सकते हैं...मुख्यमंत्री पद से हटे सात साल गुजर जाने के बाद भी उनकी लोकप्रियता का ग्राफ कम नहीं हुआ तो इसमें कुछ उपर वाले का भी हाथ है। 2018 में विधानसभा चुनाव बुरी कदर हारने के बाद लोगों ने अफसरशाही पर ठीकरा फोड़ा...मंत्रियों की अहंकार को कोसा...मगर रमन को एक शब्द नहीं। इसका निहितार्थ यह कि सूबे की राजनीति में रमन का रुतबा कायम है। ऐसा सम्मान छत्तीसगढ़ के किसी और नेता को नहीं मिला।

अंत में दो सवाल आपसे

1. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की पत्नियां आजकल बिलासपुर की पोस्टिंग से क्यों घबरा रही हैं?

2. खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ के 33 में से किन पांच कलेक्टरों को लंगोट का ढीला बताया गया है?