रविवार, 13 अक्तूबर 2019

माशूका का हाथ, हाथ में….

13 अक्टूबर 2019
भाजपा के भीतर आजकल पार्टी की स्थिति पर खूब तंज कसे जा रहे हैं। बीजेपी के लोग मान रहे हैं कि पार्टी की हालत दिलीप कुमार के मशहूर डॉयलाग….माशूका का हाथ, हाथ में आने पर हथियार छूट जाता है, सरीखी हो गई है। बात सही भी है। 15 साल सत्ता में रहने के बाद अब नेताओं में संघर्ष करने का माद्दा रहा नहीं। पार्टी सिरे से गायब है। दंतेवाड़ा में हारे ही चित्रकोट में भी पराजय तय दिख रहा है। इसी से समझा जा सकता है, बस्तर में चुनाव है और वहां से ताल्लुकात रखने वाले पार्टी के एक शीर्ष नेता सीएम हाउस का चक्कर लगा रहे हैं। जाहिर है, चित्रकोट इलेक्शन से पहिले ही भाजपा ने हथियार डाल दिया है। नगरीय निकाय में भी बीजेपी की स्थिति खास नहीं रहने वाली। वजह? कार्यकर्ताओं में उत्साह नदारत है। और, उनमें जोश जगाने के लिए पार्टी के पास कोई कार्यक्रम है और न ही कोई चेहरा।

तरकश का असर

15 सितंबर के तरकश स्तंभ में एक खबर थी, नौकरशाहों ने रायपुर, नया रायपुर के आवासों को बैंकों को ऑब्लाइज कर मोटी राशि में किराये में उठा दिया। हाउसिंग बोर्ड ने इस पर करीब दर्जन भर ब्यूरोक्रेट्स को नोटिस थमा दी है….हाउसिंग बोर्ड ने लिखा है कि आपने आवासीय उपयोग के लिए मकान खरीदा तो उसे कामर्सियल यूज के लिए कैसे दे दिया। अब अफसर परेशान हैं। और, हाउसिंग बोर्ड के कमिश्नर भीम सिंह भी। आखिर, लोग उन्हीं को फोन करेंगे न।

वीवीआईपी अफसर

छत्तीसगढ़ में 2012 बैच के आईएफएस अफसर हैं प्रणय मिश्रा। प्रणय रायबरेली से हैं। धरमजयगढ़ के डीएफओ रहते उन्होंने बलरामपुर का डीएफओ बनने के लिए ट्राय किया था। लेकिन, वन विभाग ने उन्हें हल्के में ले लिया। और, पिछले महीने बलरामपुर की बजाए उन्हें राजनांदगांव का डीएफओ बनाकर भेज दिया। मगर, प्रणय ठहरे रायबरेली वाले। रायबरेली का मतलब आप समझ सकते हैं। कहीं से फोन आया और अफसरों के हाथ-पांव फुल गए। मंत्रालय से तत्काल एक आर्डर निकाला गया। और, प्रणय 20 दिन से भी कम समय में राजनांदगांव से बलरामपुर के डीएफओ बन गए। बलरामपुपर याने यूपी का बॉर्डर। ठीक भी है। प्रणय का रायबरेली कनेक्शन बना रहेगा।

ये अपना छत्तीसगढ़िया…

अब छत्तीसढ़िया आईएफएस मनीष कश्यप की बात कर लें। मनीष बिलासपुर शहर में समाहित हो गए मंगला गांव के रहने वाले हैं। मंगला बोलें तो कुर्मी, काछी बहुल गांव। मनीष इन्हीं कुर्मी परिवार से आते हैं। खड़गपुर आईआईटी से सिविल में बीई किए हैं। कोरिया डीएफओ के रूप में वे जबर्दस्त काम कर रहे थे। लेकिन, पिछले महीने फॉरेस्ट डिपार्टमेंट ने अचानक उन्हें उठाकर बिलासपुर के वन विस्तार मंडल में डंप कर दिया। एक ओर सरकार लोकल को अहमियत देने की बात कर रही, वहीं दूसरी ओर आईआईटीयन माटी पुत्र के साथ ऐसी नाइंसाफी?

भोपाल लॉबी 

राज्य बनने के 19 साल बाद मंत्रालय में भोपाल लॉबी का असर कुछ कम हुआ है। लेकिन, विधानसभा में अभी भी मजबूत पोजिशन में है। इसकी बानगी है एडिशनल सिकरेट्री शिवकुमार राय का एक्सटेंशन। शिवकुमार के रिटायरमेंट के पहिले से स्पीकर चरणदास महंत के सिकरेट्री दिनेश शर्मा का इस पद पर प्रमोशन तय माना जा रहा था। दिनेश स्पीकर के सिकरेट्री हैं। लेकिन, विधानसभा में उनका रैंक डिप्टी सिकरेट्री का है। शिवकुमार रिटायर होते तो दिनेश एडिशनल सिकरेट्री बन जाते। लेकिन, शिवकुमार को एक अक्टूबर से एक साल के लिए एक्सटेंशन मिल गया। और, दिनेश प्रमोशन की बाट जोहते रह गए। जांजगीर के रहने वाले दिनेश अब बिलासपुर के बाशिंदा हो गए हैं। याने विशुद्ध छत्तीसगढ़ियां। उपर से स्पीकर के सिकरेट्री। उसके बाद भी ये हालत!

एक बैच, एक विभाग

2006 बैच के भूवनेश यादव हेल्थ डिपार्टमेंट में पहिले से स्पेशल सिकरेट्री थे और अब उन्हीं के बैच के सीआर प्रसन्ना को स्पेशल सिकरेट्री हेल्थ बनाया गया है। याने एक बैच, एक विभाग। आमतौर पर ऐसा होता नहीं कि छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में एक बैच के आईएएस एक ही विभाग में रहे। इसमें मजेदार यह भी हुआ है कि प्रसन्ना मानव के स्वास्थ्य का जिम्मा संभालेंगे और पशुओं के भी। उनके पास डायरेक्टर वेटनरी का तो चार्ज है ही, स्वस्थ्य विभाग एडिशनल मिल गया है। मंत्रालय में इस पर चुटकी ली जा रही…वेटनरी की दवाई कहीं गफलत में स्वास्थ्य विभाग को सप्लाई हो गया तो क्या होगा।

सिंहदेव का निशाना

भोपाल के नेशनल शूटिंग एकेडमी में आज सूबे के वरिष्ठ मंत्री टीएस सिंहदेव का अचूक निशाना देखकर लोग हतप्रभ रह गए। उन्होंने बंदूक से पोजिशन ली और टारगेट पर फायर कर दिया। इस पर लोग मजे लेने से नहीं चूके…. सियासत में उनका निशाना कैसे चूक गया। जाहिर है, छत्तीसगढ़ का सीएम डिसाइड होने के दौरान एक नाम टीएस का भी था। लेकिन, सियासी निशानेबाजी में भूपेश बघेल बाजी मार ले गए।

कलेक्टर का खेद

कांकेर कलेक्टर केएल चौहान ने पीडब्लूडी के ईई एपीसोड में खेद व्यक्त कर बड़ा दिल दिखाया। वरना, मामला बिगड़ता जा रहा था। कलेक्टर ने सीएम के कार्यक्रम में तैयारियों में लापरवाही के लिए ईई को थाने में बिठा दिया। ऐसा काम सूबे में तेज-तर्रार कलेक्टरी के लिए याद किए जाने वाले कलेक्टरों ने भी कभी नहीं किया। चलिये, ये अच्छा है। कलेक्टर ने मामला खतम कर दिया।

अंत में दो सवाल आपसे

1. रिटायर आईएएस हेमंत पहारे को पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग किसकी सिफारिश पर मिली?
2. 31 अक्टूबर को रिटायर होने जा रहे एसीएस केडीपी राव को क्या पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग मिलेगी?

रविवार, 6 अक्तूबर 2019

ड्रॉप होंगे तीन मंत्री?

देवती कर्मा के विधायक निर्वाचित होने के बाद सियासी गलियारों में उन्हें मंत्री बनाने की अटकलें बड़़ी तेज हैं। इसके पीछे ठोस तर्क भी दिए जा रहे….बस्तर का मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व बेहद कम है। सिर्फ एक। कवासी लकमा उद्योग और आबकारी विभाग संभाल रहे हैं। वहीं, सरगुजा से तीन मंत्री हैं। सबसे सीनियर टीएस सिंहदेव। फिर प्रेमसाय सिंह और नए मंत्री अमरजीत भगत। जाहिर है, सरकार मंत्रिमंडल में बस्तर का प्रतिनिधित्व बढ़ाना चाहेगी। और, सियासी दृष्टि से देवती से अच्छा कोई नाम नहीं हो सकता। बस्तर शेर कहे जाने वाले दिवंगत नेता महेंद्र कर्मा की पत्नी हैं। ट्राईबल भी और महिला भी। कहने के लिए हो जाएगा, भूपेश सरकार ने राज्य बनने के बाद पहली बार दो महिलाओं को मंत्रिमंडल में जगह दी। लेकिन, इसके लिए सरकार को मंत्रिमंडल में एक सर्जरी करनी होगी। क्योंकि, कोटा फुल है। 12 ही मंत्री बन सकते हैं। एक सीट खाली थी, उस पर अमरजीत को मौका मिल गया। वैसे, नगरीय निकाय चुनाव के बाद माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल में एक सर्जरी होगी। इसमें दो-से-तीन मंत्री ड्रॉप हो सकते हैं। तीनों के परफारमेंस पुअर है। एक विकेट सरगुजा से गिरेगा। दो और नामों की चर्चा है।
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चीफ सिकरेट्री सुनील कुजूर को छह महीने का एक्सटेंशन देने के लिए सरकार ने केंद्र को रिमाइंडर भेजा है। उसमें बताया गया है कि वर्तमान सीएस को एक्सटेंशन देना क्यों जरूरी है। लिहाजा, अब सीके खेतान और आरपी मंडल के साथ ही सुनील कुजूर का नाम भी सीएस की दौड़ में शामिल हो गया है। हालांकि, पहले यह माना जा रहा था कि भारत सरकार आसानी से एक्सटेंशन देती नहीं। लेकिन, सरकार के रिमाइंडर से यह जाहिर हुआ है कि कुजूर को लेकर सरकार गंभीर है। बहरहाल, रिमाइंडर पर भारत सरकार क्या रुख अपनाती है यह आखिरी समय में ही तय होगा। जानकारों का कहना है, ऐसे केस में भारत सरकार लास्ट वीक या लास्ट दिन भी कई बार फैसले करती है। याने 31 अक्टूबर को कुजूर रिटायर होने वाले हैं तो उससे एक-दो दिन पहले सरकार का फैसला आएगा। यदि एक्सटेंशन मिलेगा तो लेटर आ जाएगा। और, नहीं तो 30 अक्टूबर तक वेट कर राज्य सरकार नए सीएस का ऐलान कर देगी। उससे पहिले सूबे में अटकलों का दौर जारी है। खासकर, ब्यूरोक्रेसी में इसको लेकर खूब गुणा-भाग किए जा रहे हैं। हालांकि, कैलकुलेशन का कोई मतलब नहीं। चीफ सिकरेट्री और डीजीपी वही बनता है, जिसके माथे पर लिखा होता है। वरना, कई आईएएस, आईपीएस बिना इस पद को इनज्वॉय किए बिदा नहीं हो गए होते। सुनील कुजूर भी भला कभी सोचे होंगे कि वे चीफ सिकरेट्री बन सकते हैं। और, एक्सटेंशन देने के लिए सरकार प्रयास करेगी। वे तो बेचारे अदद एक बढ़ियां विभाग के मोहताज थे। इसी तरह रिटायर डीजीपी एएन उपध्याय भी हैं। उनके जैसा दुनियादारी से दूर रहने वाले अफसर को सरकार डीजीपी बनाएगी, उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन, उपध्याय ने पोस्टिंग का रिकार्ड ही बना दिया। पूरे पौने पांच साल डीजीपी रहे।

मंत्री के लेटरहेड पर वसूली

स्कूल शिक्षा विभाग के ट्रांसफर में गोलमाल को लेकर सरकार ने मंत्री के ओएसडी और विशेष सहायक की छुट्टी कर दी। लेकिन, इसके बाद भी विभाग में नित नए कारनामे सामने आ रहे हैं। बताते हैं, स्कूल शिक्षा डायरेक्ट्रेट के स्थापना शाखा के एक अधिकारी ने डीईओ, बीईओ के ट्रांसफर के लिए दूसरे विभाग के एक मंत्री का लेटरहेड जुगाड़ लिया। और, जिसने पैसा दिया, उसके लिए उसी लेटरहेड पर मंत्री की तरफ से खुद ही ट्रांसफर की अनुशंसा कर आर्डर निकाल दिया। ताकि, कोई पूछ तो बता दें कि फलां मंत्रीजी ने रिकमांड किया था। स्कूल शिक्षा इससे बेखबर रहे। अफसर के खेल का भंडाफोड़ तब हुआ, जब लिस्ट में एक ही समुदाय के 70 परसेंट से अधिक लोग डीईओ, बीईओ बन गए। सरकार को इसकी जानकारी मिल गई है। जल्द ही स्कूल शिक्षा में तीसरा विकेट गिर जाए, तो आश्चर्य नहीं।

विवेकानंद का रिकार्ड

लांग कुमेर के बाद विवेकानंद बस्तर के पहिले आईजी होंगे, जिन्होंने वहां ढाई साल का लंबा कार्यकाल पूरा कर लिया है और अभी भी पिच पर जमे हुए हैं। वे ऐसे समय में बिलासपुर से बस्तर गए थे, जब बिलासपुर में आईजी बने उनका तीन महीना भी नहीं हुआ था। एसआरपी कल्लूरी को बस्तर से हटाने के बाद सरकार किसी उपयुक्त चेहरे की तलाश कर रही थी। उस समय तत्कालीन डीजीपी एएन उपध्याय ने सरकार को सुझाया कि विवेकानंद बस्तर के लिए बेहतर होंगे। इस बेहतर के फेर में विवेकानंद फंस गए। वरना, बस्तर गए अधिकांश आईजी साल, डेढ़ साल में जोर-जुगाड़ लगाकर रायपुर लौट आए। सिर्फ लांग कुमेर ही ऐसे आईपीएस थे, जो लंबे समय तक बस्तर में रहे। लेकिन, वे वैसा खुद चाह रहे थे। उन्हें हिन्दी का प्राब्लम था फिर वहां उन्होंने ऐसा कुछ जमा लिया था कि डीआईजी, आईजी और एडीजी बनने तक कुछ दिन वे बस्तर रेंज में रहे।

अमिताभ और सोनमणि


अमिताभ जैन जब दिल्ली डेपुटेशन से लौटे थे तो उस समय शेखर दत्त सूबे के गवर्नर थे। राज्य में भाजपा की सरकार थी और केंद्र में कांग्रेस की। शेखर दत्त ने मुख्यमंत्री डा0 रमन सिंह से अमिताभ जैन को सिकरेट्री के रूप में मांगा था। और, यह दूसरी बार हुआ कि राज्यपाल अनसुईया उईके ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को फोन कर सोनमणि बोरा सचिव के रूप में मांगा। और, मुख्यमंत्री ने इसमें तनिक भी देरी नहीं लगाई। सोनमणि का आदेश राजभवन के लिए जारी हो गया।

22 दिन का कार्यकाल

सोनमणि बोरा के लिए अखरने वाली बात यह रही कि सबसे कम दिन तक किसी विभाग में सिकरेट्री रहने का रिकार्ड उनके नाम दर्ज हो गया। सिर्फ 22 दिन। इस 22 दिन में एक बहुत बड़ा काम उन्होंने यह किया कि हाईकोर्ट में रिट दायर कर सहायक प्राध्यापकों की भरती पर लगी रोक उन्होंने हटवा दी। संस्कृति सचिव के रूप में ट्राईबल डांस को लेकर भी वे बड़ा तेजी से काम कर रहे थे। ये दोनों उनके हाथ से निकल गए। हालांकि, पहले भी राजभवन के साथ ही हायर एजुकेशन या किसी और विभाग का चार्ज अफसरों के पास हमेशा रहा है। वैसे, छत्तीसगढ़ राजभवन में सुनील कुजूर, आईसीपी केसरी, शैलेष पाठक, अमिताभ जैन सिकरेट्री रहे हैं। आरआर के रूप में सोनमणि का नाम भी इसमें जुड़ गया।

दुआ कीजिए!

हायर एजुकेशन में चार महीने में चार सिकरेट्री चेंज हो गए। 31 मई को सुरेंद्र जायसवाल रिटायर हुए थे। रेणु पिल्ले को उनकी जगह सिकरेट्री बनाया गया था। 9 सितंबर को उन्हें हटाकर सोनमणि बोरा को हायर एजुकेशन का दायित्व सौंपा गया। एक अक्टूबर को वे भी बिदा हो गए। अलरमेल मंगई डी अब उच्च शिक्षा की नई सिकरेट्री बनी हैं। इस विभाग के अधिकारियों, कर्मचारियों को कुछ अनुष्ठान वगैरह करना चाहिए। ताकि, मंगई कुछ दिन हायर एजुकेशन में बनी रहें।

अंत में दो सवाल आपसे

1. रायपुर के लोकल हनी के गिरफ्त में फंसे कितने आईएएस और आईएफएस के नाम इंटेलिजेंस ने सरकार को दिए हैं?
2. डिप्रेशन के शिकार किस आईएएस को उपचार कराने में मदद की बजाए आईएएस अफसर ही उनका मजाक उड़ा रहे हैं?

रविवार, 29 सितंबर 2019

मंत्री हो जाएं अलर्ट

30 सितंबर 2019
स्कूल शिक्षा मंत्री डा0 प्रेमसाय सिंह के चर्चित ओएसडी राजेश सिंह की छुट्टी हो गई। मंत्री लाख कोशिश करके अपने ओएसडी को नहीं बचा पाए। याद होगा, शिक्षकों के ट्रांसफर में जब व्यापक गोलमाल उजागर हुआ था तो कांग्रेस विधायक मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सामने खड़े हो गए थे। विधायकों की पीड़ा थी कि बीजेपी नेताओं के लोगों के ट्रांसफर हो गए और उनके रिकमंडेशन को कूड़ेदान में डाल दिया गया। इसमें मंत्री के ओएसडी की भूमिका अहम बताई गई थी। हालांकि, मंत्री के बचाव में कैबिनेट में दूसरे नम्बर के मंत्री टीएस सिंहदेव सामने आए थे। उन्होंने विधायकों को नसीहत दी थी….अपने मंत्री पर इस तरह के आरोप लगाकर मर्यादा को न लांघे। बावजूद इसके प्रेमसाय के ओएसडी बच नहीं पाए। मंत्रियों के लिए यह अलार्मिंग है। खटराल पीए और ओएसडी रखने वाले मंत्रियों को सावधान हो जाना चाहिए। सरकार अभी ट्वेंटी-ट्वेंटी के मोड में बैटिंग कर रही है। मंत्रियों के पीए और ओएसडी सरकार के राडार पर हैं। जाहिर है, पिछली सरकार की छबि खराब करने में मंत्रियों के पीए और ओएसडी का बड़ा हाथ रहा। दिल्ली में तो जब से मोदी की सरकार आई है, मंत्री अपने हिसाब से पीएस भी नहीं रख पा रहे। किसी मंत्री की हिम्मत नहीं है कि पीएस के लिए पीएम को नोटशीट लिख दें। मंत्री अगर अपने पीए को नियंत्रित कर लें तो 90 परसेंट प्राब्लम खतम हो जाएगा। छत्तीसगढ़ में कई मंत्रियों के पीए अभी से फुलफार्म में आ गए हैं।

अमर, अकबर

पिछली सरकार के वरिष्ठ मंत्री अमर अग्रवाल इसलिए अपनी छबि बचा पाने में कामयाब हुए कि उन्होंने अपने विभाग और स्टाफ के सिस्टम पर पूरा कंट्रोल रखा हुआ था। मजाल नहीं कि अमर के पीए कोई खेल कर दें। यही वजह है, 15 साल में ट्रांसफर, पोस्टिंग में कभी उनके उपर उंगली नहीं उठी। भूपेश सरकार में अकबर के यहां भी कुछ ऐसा ही है। ट्रांसफर, पोस्टिंग में वे कोई इंटरेस्ट नहीं लेते। वन विभाग का नीचे से लेकर उपर तक के ट्रांसफर की लिस्ट पीसीसीएफ राकेश चतुर्वेदी ने बनाई है। हाल की बात है, कुछ लोग एक यंग आईएफएस की तारीफ की तो अगले हफ्ते अफसर का डीएफओ के लिए आदेश निकल गया। जबकि, पिछली सरकार में डीएफओ या अन्य कोई पोस्टिंग पाने के पहिले लंबी प्रक्रियाओं से गुजरनी पड़ती थी। दीगर मंत्रियों को भी जल्दीबाजी में न आते हुए अमर, अकबर से प्रेरणा लेनी चाहिए।

आईपीएस की पोस्टिंग

एसपी, आईजी और एडीजी रैंक के कुछ आईपीएस अफसरों की पोस्टिंग आजकल में हो सकती है। हालांकि, लिस्ट कई दिन पहले से बन गई है लेकिन, धमतरी एसपी की वजह से मामला अटक गया। दरअसल, पहले धमतरी एसपी बालाजी सोमावार को हटाना तय हो गया था। बताते हैं, लिस्ट में बालाजी का नाम शामिल था। लेकिन, कहीं से बात आई है कि उन्हें कुछ दिन और धमतरी में रखना चाहिए। इसके बाद सीएम दिल्ली और पटना के दौरे पर चले गए। उसके बाद दंतेवाड़ा चुनाव आ गया। फिर, राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत आ गए। सीएम को जब समय मिलेगा, लिस्ट जारी हो जाएगी।

डीआईजी के लिए रास्ते

डीआईजी बनने के बाद पीएचक्यू में टाईम पास कर रहे या दिल्ली डेपुटेशन का रास्ता ढूंढ रहे आईपीएस अफसरों के लिए राज्य सरकार ने जिले में कप्तानी करने की फिर से आस जगा दी है। दो साल पहले डीआईजी बन गए 2004 बैच के आईपीएस अजय यादव को सरकार एसएसपी बनाने जा रही है। संभवतः वीवीआईपी जिले दुर्ग का। 2005 बैच के आरिफ शेख रायपुर के एसएसपी हैं ही। वे भी डीआईजी बन चुके हैं। हो सकता है, कुछ और बड़े जिलों में और सीनियर आईपीएस को भेजे।

कमिश्नर प्रणाली

पिछली सरकार में कई बार पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने की बात चली थी। मगर ताकतवर आईएएस लॉबी के प्रेशर में सरकार पीछे हट गई। अब चूकि, नौकरशाही बेहद सहमी हुई है….चीफ सिकरेट्री का बंगला छीन गया और कोई चू-चाएं नहीं। यही ब्यूरोक्रेट्स कभी छोटी-छोटी बातों पर मंत्रालय में इंक्लाब करने लगते थे। ऐसे में, फिर से पुलिस कमिश्नर प्रणाली की बात उठने लगी है। रायपुर शहर की आबादी 12 लाख से अधिक हो गई है। जिले की तो दुगुना से भी अधिक है। जाहिर है, पुलिस कमिश्नर सिस्टम में पुलिस के पास दंडाधिकारी पावर भी आ जाते हैं। मजिस्ट्रेटियल पावर अभी कलेक्टरों के पास होते हैं।

आईएफएस की वापसी

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चर्चा है, कुछ आईएफएस अफसरों की मंत्रालय में फिर से वापसी हो सकती है। इसके लिए कई आईएफएस तगड़ा प्रयास कर रहे हैं। नई सरकार ने एक दर्जन से अधिक आईएफएस अफसरों को मंत्रालय से बाहर का रास्ता दिखा दिया था।

रायपुर में भी हनी

एमपी के हनी ट्रैप कांड में छत्तीसगढ़ कनेक्शन की बात सामने आने के बाद सूबे के ब्यूरोक्रेट्स सहम गए हैं। जो हनी खाए वो भी और जो नहीं नहीं खाए वो…। कब, कौन, किसका नाम उछाल दे, क्या भरोसा। मगर ये तो मध्यप्रदेश की बात हुई। राजधानी रायपुर का हनियों से पुराना नाता रहा है। सालों पहले टूरिज्म के निर्माण कार्यों में एक हनी ने करोड़ों की कमाई की थी। एनजीओ से संबंधित कई विभागों के सचिवों के यहां आज भी ऐसी हनियां मंडराती हुई दिख जाएंगी। कई सचिवों से हनियों की ऐसे गहरे रिश्ते हो गए हैं कि उसके जवाब नहीं। भूपेश सरकार के एक नरम दिल वाले मंत्री भी राजधानी के एक हनी के प्रभाव में आते जा रहे हैं। सूबे के आईपीएस और आईएफएस तो पहले से ही नाम कमाए हुए लोग हैं। एक आईएफएस के बारे में कहा जाता है, वे डीएफओ से लेकर सीएफ, सीसीएफ….जहां भी रहे, वहां जमकर गुल खिलाए। आईपीएस में तो पूछिए मत! एक-दो नहीं, अंतहीन कहानियां हैं। बहरहाल, कुछ हनियां सरकार के सिस्टम में भी घुसने का प्रयास कर रही हैं। सरकार को इसको लेकर सतर्क रहना चाहिए।

ट्रेवर्ल्स एजेंटों पर प्रेशर

हनी ट्रैप का छत्तीसगढ़ कनेक्शन की बात सामने आने के बाद राजधानी रायपुर के ट्रेवर्ल्स एजेंटों पर प्रेशर बढ़ गया है। नेता से लेकर नौकरशाह तक, सभी लगातार ताकीद कर रहे हैं….भइया डेटा डिलिट मार दो। इंटेलिजेंस से लेकर मीडिया तक कोई भी पूछे नहीं बताना है कि वे कितने बार इंदौर गए हैं। इनमें वे भी शामिल हैं, जिनका हनी से कोई वास्ता नहीं। लेकिन, कब कौन कहानी गढ़ दे, इसलिए सतर्कता तो बरतनी पड़ेगी न।

हफ्ते का व्हाट्सएप

संता-दोस्त हनी ट्रैप में बड़े-बड़े लोगों के नाम आ रहे हैं, अब तो ये गए।
बंता-चुप रह! कोई नहीं जाने वाला। देख नही रहा, कैसे-कैसे लोग….। मंत्री, पूर्व मंत्री। भाजपा, कांग्रेस। नौकरशाह, मीडिया, बिल्डर, कारोबारी सब। अपने मुल्क में कुछ काम दलगत भावना से उपर उठकर होते आए हैं। इसमें जात-पात, धर्म, पार्टी, कोई आड़े नहीं आती। हमाम में सब….। इसलिए, कुछ होने-जाने वाला नहीं है। बस, खबर पढ़ो और मजे लो।

अंत में दो सवाल आपसे

1. रायपुर के एक प्रभावशाली भाजपा नेता का नाम बताइये, जो आजकल अपने कामों को लेकर आए दिन सीएम से मुलाकात कर रहे हैं?
2. पिछले कैबिनेट में तीन डीजी को डिमोट करके एडीजी बना दिया गया, मंत्रियों को इसकी जानकारी कब हुई?

शनिवार, 21 सितंबर 2019

आईएएस का अंधविश्वास!

22 सितंबर 2019
देश की सबसे प्रतिष्ठित सर्विस आईएएस बनने के लिए कितनी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसके बाद भी आईएएस बने कुछ लोग बौरा जाते हैं। पहले एक अजयपाल सिंह थे, जिन्होंने बृजमोहन अग्रवाल जैसे मंत्री के खिलाफ प्रेस कांफें्रस ले लिया था। अजयपाल आईएएस बनकर क्या किए ये खुद उन्हें भी नहीं मालूम होगा। भारत सरकार ने पिछले साल उन्हें फोर्सली रिटायर कर दिया। छत्तीसगढ़ में इसी तरह के एक आयटम और हैं, जो ब्यूरोक्रेसी में चर्चा के विषय बने हुए हैं। युवा आईएएस जिस जिले में जाते हैं, सरकारी आवास में जितने कमरे होते हैं, सबसे पहिले उसमें बेड लगवाते हैं। कामख्या के किसी तांत्रिक ने उन्हें बता दिया है कि रोज कमरे बदलकर सोओगे तो तुम्हारा भला होगा….अच्छी पोस्टिंग मिलेगी। बंगले के नौकर-चाकर भी कई बार चक्कर में पड़ जाते हैं कि साब आज किस कमरे में सोए हैं। आईएएस पर कई बार सनक सवार होता है तो एक जिले से दूसरे जिले में चाय पीने चले जाते हैं। अफसर से ड्राईवर भी परेशान हैं। कई बार आधी रात को उन्हें आउटिंग सूझ जाती है। फिर क्या, ड्राईवर बेचारा आंख मिसते हुए पोर्च से गाड़ी निकालता है। आईएएस एसोसियेशन को इसे भी देखना चाहिए। बिरादरी का एक अफसर ऑफट्रेक हो गया है। इलाज की जरूरत हो तो वह भी किया जाए। क्योंकि, जब छत्तीसगढ़ियां आईएएस को ठीक-ठाक पोस्टिंग मिल रही हो, उस दौर में एक अफसर भारी डिप्रेशन का शिकार हो गया है।

मंत्रीजी और दो पंकज 

वन विभाग में पंकज के नाम के दो आईएफएस हैं। एक पंकज राजपूत और दूसरा पंकज कमल। पंकज राजपूत सरगुजा का डीएफओ बनने के लिए सूबे के एक मंत्रीजी से जैक लगवाए थे। मगर मंत्रीजी से बोलने में चूक हो गई….पंकज राजपूत की जगह वे सरकार को पंकज कमल बोल बैठे। सरकार ने भी अपने मंत्री की इच्छा पूरी करने में देर नहीं लगाई। 19 सितंबर को पंकज कमल का आदेश निकल गया। आदेश में पंकज कमल का नाम देखकर लोग आवाक थे….पंकज राजपूत भी परेशान….सब मेहनत बेकार गया। 2016 बैच के पंकज कमल को भी नहीं पता था कि पहली बार में उन्हें सरगुजा जैसा बड़ा डिविजन मिल जाएगा। उनका तो रायपुर से वन विकास निगम में बिलासपुर ट्रांसफर हुआ था। अभी वहां ज्वाईन भी नहीं किए थे कि डीएफओ बनाने का आदेश निकल गया। ज्वाईन करने से पहिले जब वे वन मुख्यालय में अफसरों से मिलने पहुंचे तो लोगों ने तंज कसा….क्यों मियां मंत्री से जैक….? पंकज कमल को काटो तो खून नहीं! वे मंत्री को जानते भी नहीं। लेकिन, लेबल लगने से घबरा रहे थे। हालांकि, अंदर की बात यह है कि मंत्रीजी ने गलत नाम लिया इसलिए आदेश निकल गया। अगर वे पंकज राजपूत बोले होते तो कतई पोस्टिंग नहीं होती। क्योंकि, पंकज राजनांदगांव में डीएफओ रह चुके हैं। राजनांदगांव में डीएफओ रहने का मतलब आप समझ सकते हैं। पिछली सरकार का लेवल।

हफ्ते भर में ट्रांसफर

किस अफसर की कितने दिन तक कुर्सी सुरक्षित है, छत्तीसगढ़ में इसे कोई नहीं बता सकता। सरगुजा डीएफओ इसकी बानगी हैं। आईएफएस पीआर अरबिंद को हफ्ते भर पहिले ही डीएफओ बनाकर सरगुजा भेजा गया था। अंबिकापुर में उनका अभी स्वागत-सत्कार का दौर भी पूरा नहीं हुआ था कि उनकी कुर्सी खिसक गई। पंकज कमल को सरगुजा भेजने के लिए अरबिंद को कोरिया भेज दिया गया। और कोरिया के माटी पुत्र आईएफएस मनीष कश्यप को वन मुख्यालय बुला लिया गया। याने दो पंकज के फेर में एक छत्तीसगढ़ियां अफसर की डीएफओगिरी चली गई।

मंत्रियों की भूल

सूबे के कुछ मंत्रियों को लक्ष्मण रेखा का ध्यान नहीं है। वे कलेक्टर, एसपी से उलझ जा रहे। जबकि, सबको पता है कि कलेक्टर, एसपी मंत्री के अधीन नहीं, वे जिले में सरकार के प्रतिनिधि होते हैं और सीधे चीफ मिनिस्टर के बिहाफ में काम करते हैं। और यही सिस्टम भी है। कई बार अपनी पार्टी के नेताओ को टाईट करने के लिए सरकार टाईट कलेक्टर, एसपी को भेज देती है। अर्जुन सिंह से लेकर दिग्विजय सिंह, अजीत जोगी और रमन सिंह भी यह ट्रिक अपनाते रहे हैं। दो साल पहले एक कलेक्टर सीनियर मंत्री से भिड़ गए थे। सरकार ने कलेक्टर का प्रमोशन करके और बड़े जिले में भेज दिया था। मध्यप्रदेश के समय बिलासपुर के कुछ नेताओं को ठीक करने के लिए दिग्विजय सिंह ने कड़क आईएएस शैलेंद्र सिंह को कलेक्टर और विजय यादव को एसपी बनाकर भेज दिया था। शैलेंद्र सिंह ने मजिस्ट्रेटियल पावर का इस्तेमाल कर बिलासपुर में अपनी जबर्दस्त हनक कायम की। उन्होंने कड़े एक्शन लेते हुए कई कांग्रेस नेताओ को भी जेल भेजा था। छत्तीसगढ़ में भी कुछ मंत्री समझ रहे हैं कि उनके जिले में पोस्टेड कलेक्टर, एसपी जो बोलेंगे, वो करेंगे। लेकिन, ये उनकी भूल है। कलेक्टर, एसपी वो ही करते हैं, जो सरकार चाहती है। सभी राज्यों में ऐसा ही होता है। नए जिले में ज्वाईन करने के पहिले या बाद में कलेक्टर और एसपी सीएम से मिलकर उनका मार्गदर्शन लेते हैं। अगर कुछ इशारा करना होता है तो सीएम के सिकरेट्री या कोई बेहद करीबी अधिकारी अफसरों को संकेत में बता देते हैं कि उन्हें किस लाईन पर काम करना है….किसे ठीक करना है और किसे सपोर्ट।
नायक की जांच रिपोर्ट
मिक्की मेहता केस की जांच के लिए सरकार ने डीजी गिरधारी नायक को जिम्मा सौंपा था। नायक ने रिटायर होने से पहिले सरकार को रिपोर्ट भी सौंप भी। लेकिन, मामला जरा गड़बड़ा गया। जांच रिपोर्ट ने डीजीपी डीएम अवस्थी की उलझनें बढ़ा दी। बताते हैं, नायक ने रिपोर्ट में फाइंडिंग नहीं दी है। सिर्फ….ये कमियां हैं, इसकी ठीक से जांच नहीं की गई, ये होना था, की सिफारिश कर रिपोर्ट सौंप दी। नायक अगर एक लाइन भी लिख दिए होते कि इस मामले में अपराध किया गया है, तो उसी बेस पर थानेदार को बोलकर प्राथमिकी दर्ज करा दी जाती। अब एक बार फिर से जांच करने के लिए डीजीपी ने रायपुर आईजी को आदेशित किया है। चूकि, जांच अधिकारी बदल गए हैं, इसलिए फिर वहीं प्रक्रिया अपनाई जा रही है। फिर से गवाहों को बुलाया जा रहा है। याने डबल मेहनत। जाहिर है, नायक ने बचने की कोशिश की। ऐसे में, सवाल उठते हैं, रिटायरमेंट के बाद उन्हें उम्मीद से कैसे होना चाहिए।

पहाड़े की विदाई

आईएएस हेमंत पहाड़े इस महीने 30 सितंबर को रिटायर हो जाएंगे। राप्रसे से आईएएस बनें पहाड़े बिलासपुर के रहने वाले हैं। अजीत जोगी के मुख्यमंत्रित्व काल में पहाड़े उनके स्टाफ में रहे। तब उनका काफी रुतबा रहा। लेकिन, उसके बाद उन्हें कोई खास अहमियत नहीं मिली। गरियाबंद के वे कलेक्टर बनें तो चंद महीनों में ही उन्हें राजधानी लौटना पड़ गया। 2013 के विधानसभा चुनाव के आचार संहिता के दौरान वे राजनीति का शिकार हो गए। अलबत्ता, आखिरी वक्त में उन्हें जरूर अच्छी पोस्टिंग मिल गई थी। उनके पास सिकरेट्री एग्रीकल्चर, ग्रामोद्योग समेत छोटे-छोटे और कुछ चार्ज हैं। बहरहाल, पहाड़े पर जोगी का लेवल चस्पा है, लिहाजा पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग मिलने की संभावना कम ही है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. अजय सिंह को दूसरी बार चीफ सिकरेट्री बनाने की बात किसने और क्यों फैलाई?
2. सीएस सुनील कुजूर को एक्सटेंशन मिलने की कितने फीसदी संभावना है?

रविवार, 15 सितंबर 2019

मसूरी में CM का प्रोजेक्ट

15 सितंबर 2019
भूपेश सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट नरवा, गरूवा, घुरवा और बाड़ी योजना की चर्चा आईएएस अकादमी मसूरी में हो रही है। खासकर नरवा और बाड़ी की। नए आईएएस को छत्तीसगढ़ का एग्जाम्पल देते हुए बताया जा रहा है कि ये दोनों योजनाएं देश के लिए क्यों और कितना जरूरी है। नरवा से तेजी से फॉल हो रहे वाटरलेवल को ठीक किया जा सकता है। तो बाड़ी से कुपोषण की समस्या दूर होगी। देश में एक बड़ा वर्ग आज भी भयंकर अभावों के बीच जी रहा है। पौष्टिक सब्जियां एवं फलों के रेट ऐसे महंगाई छू रहे हैं कि उसके पहुंच से बाहर है। बाड़ी में सब्जी, भाजी एवं देशी फल लगाने से पौष्टिक आहार का प्राब्लम दूर हो जाएगा। चलिये, छत्तीसगढ़ की किसी योजना की चर्चा अगर मसूरी में हो रही है तो निश्चित तौर पर वह देश के अन्य हिस्सों में भी पहुंचेगी। क्योंकि, ट्रेनिंग के बाद आईएएस अपने काडर वाले राज्यों में पहुंचेंंगे तो इसे क्रियान्वयन करने का प्रयास अवश्य करेंगे।

पोस्ट 41 और आईएएस?

छत्तीसगढ़ के आईएएस के लिए डेपुटेशन के 41 पोस्ट है। मगर गए कितने हैं, संख्या जानकार आप हैरान रह जाएंगे। इस साल सरकार ने दो को दिल्ली जाने की अनुमति दी। रीचा शर्मा पहले गइंर्। अगले हफ्ते तक सुबोध सिंह दिल्ली की फ्लाइट पकड़ लेंगे। इससे पहिले तो निधि छिब्बर को दिल्ली जाने के लिए पसीना बहाना पड़ गया था। राज्य सरकार ने पहले उन्हें एनओसी दे दिया और भारत सरकार ने जब उन्हें पोस्टिंग दे दी तो राज्य सरकार ने रिलीव करने से इंकार कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि निधि को केंद्र ने डेपुटेशन के लिए पांच साल के लिए डिबार कर दिया था। निधि कैट की शरण में गईं। तब उनका डिबार हटा और वे दिल्ली जा पाईं। अभी बैजेंद्र कुमार, वीबीआर सुब्रमणियम, अमित अग्रवाल, रीचा शर्मा, विकास शील, निघि छिब्बर, रोहित यादव, रीतू सेन, अमित कटारिया प्रतिनियुक्ति पर हैं। सुबोध सिंह जाने वाले हैं। टोटल हुए 10। याने 41 की तुलना में 25 परसेंट भी नहीं।

छत्तीसगढ़ से क्यों नहीं

अब सवाल उठते हैं, सेंट्रल डेपुटेशन पर छत्तीसगढ़ के अफसर इतने कम क्यों हैं। दरअसल, छत्तीसगढ़ काडर में दिक्कत यह है कि यहां की माटी इतनी फर्टाइल है…..आईएएस एक बार यहां आ जाते हैं तो फिर बाहर जाकर अपना नुकसान करना नहीं चाहते। सेंट्रल डेपुटेशन का मतलब होता है कैरियर बनाना। हमारे अफसर कैरियर वगैरह के फालतू चीजों में पड़ना नहीं चाहते। और, जो थोड़े-बहुत अधिकारी जाना चाहते हैं, उन्हें अनुमति नहीं मिलती। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व दिल्ली में बेहद निराशाजनक है। न कोई सिकरेट्री है, न एडिशनल सिकरेट्री। बस गिने-चुने पांच ज्वाइंट सिकरेट्री। दूसरे राज्यों के सिकरेट्री के साथ ही डेपुटेशन वाले अफसरों का भारत सरकार में जमावड़ा रहता है। इसलिए, उन राज्यों को केंद्रीय योजनाओं में उसी हिसाब से लाभ भी मिलता है। आखिर, कोई भी अफसर अपने राज्य का खयाल तो रखेगा ही।

बैंक और आईएएस-1

राज्य सरकार आईएएस और बैंकों के बीच क्या रिश्ता है, इसकी पड़ताल करने पर विचार कर रही है। सरकार को पता चला है कि अफसर अपने निहित स्वार्थों के चलते बैंकों पर कुछ ज्यादा ही दरियादिली दिखा रहे हैं। सरकारी योजना में पैसा आया नहीं कि बैंक वाले अपने यहां जमा कराने अफसरों के आगे-पीछे मंडराने लगते हैं। ये राशि 50 करोड़ से लेकर हजार करोड़ तक होती है। जाहिर है, इस एमाउंट से किसी भी बैंक की लाटरी निकल आएगी। लेकिन, ताली एक हाथ से थोड़े ही बजती है। अफसरों के पुराने रायपुर से लेकर नए रायपुर में जितने मकान हैं, सभी में बैंक खुल गए हैं। ऐसे-ऐसे बैंक, जिसका आप नाम भी नहीं सुने होंगे। जहां 25 हजार किराया मिलना चाहिए, वहां बैंक वाले 80 हजार से लेकर एक लाख तक चूका रहे हैं। अब इसे किराया चुकाना माने या अफसरों का एहसान। मगर सरकार की नोटिस में ये बात आ गई है। इसलिए, किसी भी दिन मामला बिगड़ सकता है।

बैंक और आईएएस-2

एक सीनियर आईएएस का अपना यहां कोई मकान नहीं था। फिर बैंकों को किराये के लिए कैसे कहें। इसलिए, उन्होंने रास्ता निकाला था सीधे-सीधे कमीशन का। उनके साथ एक बार दिलचस्प वाकया हुआ। एक बोर्ड के चेयरमैन रहते उन्होंने एक सरकारी बैंक में करीब 70 करोड़ रुपया जमा कराया था। कोई आईएएस इतना मोटा रोकड़ा जमा कराएगा तो जाहिर है, वह अपने बाल-बच्चों के लिए भी सोचेगा ही। उन्होंने बैंक मैनेजर पर प्रेशर बनाकर ज्वाइंट एकाउंट मद में जमा 8 करोड़ रुपए निकाल लिए। और खर्चा बता दिया। वह आडिट वाली राशि नहीं थी। जबकि, कायदे से चेयरमैन और सिकरेट्री के दस्तखत से ही पैसे निकल सकते थे। बाद में केडीपी राव और अनिल राय ने हल्ला मचाया तो दो साल बाद विभागीय जांच शुरू हुई। तब तक वे रिटायर होकर निकल लिए। जांच अभी चल रही है। जैसा की नौकरशाही में होता है। सब भाई-भाई। एक को भी पकड़ाना नहीं चाहिए। और, वैसा ही हुआ।

एसआइटी को बल

नान घोटाले में प्रमुख आरोपी शिवशंकर भट्ट के शपथ पत्र से और कुछ हो या नहीं मगर नान के लिए गठित एसआइटी को ताकत मिल गई है। अब एसआइटी के अफसर दमदारी से कह सकेंगे कि मामला बड़ी राशि का है और हाईप्रोफाइल लोग भी इनवाल्व हैं, इसलिए उसकी जांच आवश्यक है।

पवनदेव की पोस्टिंग

पुलिस महकमे में लंबे समय से हांसिये पर चल रहे एडीजी पवनदेव का लगता है भाग्य योग प्रबल होने वाला है। उन्हें जल्द ही कोई ठीक-ठाक पोस्टिंग मिल सकती है। दंतेवाड़ा बाइ इलेक्शन के बाद पुलिस महकमे में चेंजेस होने वाले हैं। इसमें पवन को कुछ ठीक-ठाक मिलने की अटकलें लगाई जा रही है। नई सरकार ने जब शपथ ली थी, तब उन्हें एसीबी और ईओडब्लू मिलने की चर्चा थी। लोग बोल रहे थे, बस आदेश निकलने ही वाला है। लेकिन, अचानक एसआरपी कल्लूरी का आर्डर हो गया था। फिलहाल, पवनदेव के पास कहने के लिए तीन-तीन पोस्टिंग है। लेकिन, इसमें से ढंग की एक भी नहीं।

राइट च्वाइस

छत्तीसगढ़ बनने के बाद हायर एजुकेशन डिपार्टमेंट कभी किसी के प्रायरिटी में नहीं रहा। यही वजह है कि हर छह महीने, साल भर में सिकरेट्री बदलते रहे। एजेवी प्रसाद, एमके राउत और बीएल अग्रवाल ही ऐसे सचिव हुए, जो डेड़ साल से अधिक समय तक इस विभाग में रह पाए। अब सोनमणि बोरा को नया सिकरेट्री अपाइंट किया गया है। सोनमणि अमेरिका से मैनेजमेंट कोर्स करके लौटे हैं। फिर, गुरू घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर के रजिस्ट्रार भी रह चुके हैं। याने विश्वविद्यालयों के फंक्शनिंग के बारे में उन्हें बखूबी पता होगा। ठीक है, यूनिवर्सिटी आटोनॉमस बॉडी होती है लेकिन, कुलपति और रजिस्ट्रार कम-से-कम उन्हें मिसगाइड तो नही कर पाएंगे। इसे सरकार का राइट च्वाइस कह सकते हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. नगरीय प्रशासन चुनाव के बाद क्या किसी मंत्री को रिप्लेस किया जा सकता है?
2. एसएस बड़गैया बिलासपुर के सीएफ बनते-बनते रायपुर के सीएफ कैसे बन गए?

शनिवार, 7 सितंबर 2019

जीएडी का यूनिक रुल?

8 सितंबर 2019
डेपुटेशन या स्टडी टूर से लौटने वाले नौकरशाहों के लिए लगता है, सामान्य प्रशासन विभाग ने नियम बना दिया है कि शुरू में एकाध महीने लटकाया जाएगा। बीजेपी गवनर्मेंट में भी ऐसा ही होता था। अमित अग्रवाल, अमिताभ जैन को महीना भर से अधिक बिना विभाग का रखा गया। सीके खेतान को भी कई दिन बाद पोस्टिंग मिली थी, वह भी प्रशासन अकादमी में। पीएस टू सीएम गौरव द्विवेदी भी इस पीड़ादायक दौर से गुजर चुके हैं। आज भले ही वे अहम विभाग संभाल रहे हों, मगर दिल्ली से लौटने पर उन्हें भी एक महीने तक आईएएस मेस में पोस्टिंग के लिए बाट जोहना पड़ा था। मुकेश बंसल जरूर इसमें अपवाद रहे। वरना, सोनमणि बोरा को भी पोस्टिंग के लिए पूरे एक महीने वेट करना पड़ा। सोनमणि 8 अगस्त को मंत्रालय में ज्वाईनिंग दी थी और सात सितंबर को उनका आदेश निकला। ग्रेट….।

अमरजीत का कद

भूपेश सरकार के सबसे जूनियर मंत्री अमरजीत भगत धीरे-धीरे बेहद ताकतवर होते जा रहे हैं। सरगुजा इलाके में उनका प्रभाव तो बढ़ ही रहा है, सरकार के भीतर भी उनकी हाइट बढ़ रही है। आलम यह है कि अमरजीत के फोन पर अब दीगर विभागों के अधिकारी सस्पेंड हो जा रहे। 6 सितंबर को चक्रधर समारोह में हिस्सा लेने सरगुजा से रायगढ़ जा रहे मंत्रीजी को सड़क खराब होने से काफी हिचखोले खाने पड़ गए। नाराज होकर मंत्री ने कार में बैठे-बैठे पीडब्लूडी सिकरेट्री को फोन लगा दिया। और, चंद मिनटों में कार्यपालन अभियंता सस्पेंड हो गए। आमतौर पर ऐसा होता नहीं। कोई मंत्री अगर दूसरे विभाग के किसी अफसर के खिलाफ कार्रवाई के लिए रिकमंड करता है तो नोटशीट घूमने में एक-दो दिन का वक्त लग ही जाता है। लेकिन, मामला अमरजीत का था। सो, अफसरों ने वक्त जाया नहीं किया।

भूपेश का रिकार्ड

अमरजीत भगत ने तो फोन करके दूसरे विभाग के ईई को सस्पेंड कराया। छत्तीसगढ़ बनने के बाद एक बार ऐसा हुआ है कि एक मंत्री ने दीगर विभाग के एक साथ 13 इंजीनियरों को खुद सस्पेंड कर दिया था। वे मंत्री थे, आज के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल। अजीत जोगी सरकार में भूपेश रेवन्यू मिनिस्टर थे। 2002 में विधानसभा में सूखा राहत में घपले को लेकर बड़ा बवाल हुआ था। सिंचाई विभाग के अफसरों ने तब राहत कार्यों में घोटालों के कई नए कीर्तिमान गढ़ डाले थे। राजस्व मंत्री भूपेश बघेल ने इस पर दम दिखाते हुए सदन में ही सिंचाई विभाग के 13 इंजीनियरों को सस्पेंड करने का ऐलान कर दिया था।

कलेक्टरों में निरंकुशता?

छत्तीसगढ़ में कलेक्टरों को पहले जिस तरह योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर ताकीद किया जाता था, उस टाईप का इन दिनों कुछ हो नहीं रहा। सरकार से जुड़े लोग भी मान रहे हैं कि कलेक्टर्स फुल मजे में हैं। न कोई बोलने वाला है, न कोई टोकने वाला। कुछ को छोड़े दें तो ज्यादातर कलेक्टर सिर्फ गोठानों पर काम कर रहे हैं। बाकी कुछ नहीं। सीएम की अपनी सीमा है। कलेक्टरों का डेली मानिटरिंग करना सरकार के मुखिया का काम भी नहीं है। जाहिर है, कलेक्टर जिले में सरकार के प्रतिनिधि होते हैं। वे ही अगर निष्क्रिय हो जाएंगे तो निश्चित तौर पर सरकार के परफारमेंस पर असर पड़ेगा।

अफसर छत्तीसगढ़िया मगर…

छत्तीसगढ़ में पता नहीं ऐसा क्या हुआ है कि माटी पुत्र ही एक-दूसरे को निबटा रहे हैं। इसमें एक नया नाम जुड़ गया है ज्वाइंट कलेक्टर संतोष देवांगन का। बलौदा बाजार के अपर कलेक्टर रहने के दौरान जमीन के एक मामले में एसीबी ने उन्हें गिरफ्तार किया था। बाद में सरकार ने उन्हें बर्खास्त कर दिया। बिलासपुर हाईकोर्ट ने संतोष को बाईज्जत बरी कर दिया है। संतोष ने हाईकोर्ट के फैसले की कॉपी लगाते हुए जीएडी से आग्रह किया कि उन्हें बहाल किया जाए। लेकिन, जीएडी सिकरेट्री ने पांच दिन तक उनके आवेदन को अपने पास रखने के बाद इस नोट के साथ एसीबी को भेज दिया कि हाईकोर्ट के फैसले के बाद अपील की जा सकती है कि नहीं, वे परीक्षण कर बताएं। एसीबी ने 25 दिन तक आवेदन को अपने पास रखने के बाद महाधिवक्ता को लीगल सलाह के लिए भेजा। महाधिवक्ता कार्यालय ने 20 दिन बाद एसीबी को रिप्लाई किया कि इसमें अपील की संभावना न्यूनतम है। वो भी सुप्रीम कोर्ट में होगी। एसीबी में 15 दिन से यह फाइल पड़ी है। याने 65 दिन यूं ही निकल गए। जबकि, जीएडी सिकरेट्री रीता शांडिल्य छत्तीसगढ़ियां हैं…संभवतः बेमेतरा की। संतोष भी चांपा के बाशिंदा हैं। उनके साथ ही माईनिंग अधिकारी बीएल बंजारे को भी हाईकोर्ट ने बरी किया था। बंजारे को बहाल हुए डेढ़ महीने हो चुके हैं। जीएडी सिकरेट्री अगर चाहतीं तो हाईकार्ट के आदेश के बेस पर संतोष की ज्वाईनिंग करा सकती थीं। लेकिन, उन्होंने एसीबी को भेज दिया। बस, वही माटी पुत्र एक-दूसरे को…..।

ढेर जोगिया, मठ के उजाड़

ट्रांसपोर्ट विभाग में पहली बार तीन आईपीएस, दो आईएएस अफसर एसोसियेट हैं। एसआरपी कल्लूरी वहां एडिशनल ट्रांसपोर्ट कमिश्नर हैं। डी रविशंकर ज्वाइंट कमिश्नर। और, अरुणदेव गौतम सिकरेट्री। ये तीनो आईपीएस हैं। मंत्रालय में मनोज पिंगुआ प्रिंसिपल सिकरेट्री और ट्रांसपोर्ट कमिश्नर हैं। विजय धुर्वे ज्वाइंट सिकरेट्री। हालांकि, पहले ऐसा कभी नहीं रहा। राज्य बनने के बाद हमेश एक आईपीएस एडिशनल कमिश्नर होते थे। वो भी जूनियर आईजी लेवल के। और, मंत्रालय में एक आईएएस ट्रांसपोर्ट कमिश्नर। सिकरेट्री होम के पास ही यह चार्ज होता था। लेकिन, जिस तरह ढेर जोगी से मठ उजाड़ हो जाता है, उसी तरह ट्रांसपोर्ट में भी अब मामला गडबड़ा रहा है। सरकार कुछ खुश नहीं है। आने वाले दिनों में कुछ अफसरों के पर कतर दिए जाएं या उन्हें चेंज कर दिया जाए, तो आश्चर्य नहीं।

ऐसे सलाहकार

सीएम के सलाहकार प्रदीप शर्मा के बिलासपुर स्थित घर में चोरों ने धावा बोला। जाहिर है, चोरों को उम्मीद होगी कि सरकार के एडवाइजर हैं तो कुछ अच्छा ही मिलेगा। मगर उनके हाथ कुछ लगा नहीं। चोर निराश होकर लौट गए। सोशल मीडिया में इस पर लोगों ने खूब चुटकी ली। कई लोगों ने लिखा, चोरों ने जल्दीबाजी कर दी। अभी छह, आठ महीने ही तो हुए हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस पुलिस रेंज के आईजी द्वारा तबाही मचा देने से सरकार भी उन्हें पोस्टिंग देकर अफसोस कर रही है?
2. रिटायर आईपीएस गिरधारी नायक की पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग की प्रतीक्षा कब खतम होगी?

रविवार, 1 सितंबर 2019

डिप्रेशन में पूर्व मंत्री

1 सितंबर 2019
डेढ़ दशक तक सत्ता सुख भोग चुके बीजेपी के कुछ मंत्रियों की स्थिति बेहद खराब होती जा रही है। खबर है, एक पूर्व मंत्रीजी डिप्रेशन में चले गए हैं। परिवार के लोग लगातार बिगड़ रही उनकी स्थिति से बेहद परेशान है। इलाज के लिए मुंबई के किसी डाक्टर से टाईम लेने का प्रयास किया जा रहा है। रमन मंत्रिमंडल में 12 मंत्री थे। इनमें से तीन चुनाव जीत पाए। बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर और पुन्नूलाल मोहले। हालांकि, कुछ पूर्व मंत्रियों ने अपने को पढ़ने-लिखने या फिर संगठन के काम में इंगेज कर लिया है। अमर अग्रवाल और अजय चंद्राकर को नगरीय और संगठन चुनाव की अहम जिम्मेदारी मिल गई है। इससे दोनों के घर पर मिलने-जुलने वालों की संख्या बढ़ने लगी है। एक आदिवासी मंत्री हैदराबाद में अपने अ-सरदार मित्रों के साथ कारोबार चालू कर दिए हैं। लिहाजा, हैदराबाद का उनका महीने में तीन-चार चक्कर लग जाता है। लेकिन, बाकी पूर्व मंत्रियों की स्थिति ठीक नहीं है….बेचारों के पास सुविधाओं के नाम पर सब कुछ है लेकिन हाथ जोड़े खड़ी पब्लिक नहीं है, जिसे देखकर वे कभी मुंह फेर लेते थे।

बदलेंगे प्रभारी मंत्री

दंतेवाड़ा के प्रभारी मंत्री जयसिंह का प्रभार जिला बदल सकता है। वे हरेली में दंतेवाड़़ा नहीं जा पाए थे और न ही स्वतंत्रता दिवस पर परेड में शामिल हुए। जय सिंह की अनुपस्थिति में सरकार ने दोनों कार्यक्रमों में मनोज मंडावी को अतिथि बनाया था। अब अमरजीत भगत बारहवें मंत्री के रूप में कामकाज संभाल लिए हैं। लिहाजा, उन्हें भी जिला का प्रभार दिया ही जाएगा। समझा जाता है, प्रभार वाले जिलों का एक बार फिर पुनर्गठन करके अमरजीत को एडजस्ट किया जाएगा। उसी में जय सिंह को किसी जिले का प्रभार दिया जा सकता है।

आईपीएस आगे

बाकी मामलों में भले ही आईएएस आगे रहते होंगे, लेकिन छत्तीसगढ़ में जिला संभालने के मामले में आईपीएस आगे निकल गए हैं। सूबे में 2014 बैच के आईपीएस पुलिस अधीक्षक बन गए हैं। मगर कलेक्टर बनने में अभी आईएएस का 2011 बैच ही कंप्लीट हुआ है। 2012 बैच का कुछ दिनों पहिले ही खाता खुला है। रजत बंसल इस बैच के पहिले आईएएस हैं, जिन्हें कलेक्टर बनने का मौका मिला। वे धमतरी के कलेक्टर हैं। दरअसल, राज्य में आईपीएस कम आ रहे हैं। इसलिए, उन्हें चार साल में जिले की कमान मिल जा रही। आईएएस में ऐसी बात नहीं है। 2005 बैच से हर साल पांच से छह आईएएस छत्तीसगढ़ को मिल रहे हैं। इससे कलेक्टरी में कंपीटिशन टफ होता जा रहा है।

नए जिले में OSD

छत्तीसगढ़ का नया जिला पेंड्रा-गौरेला के लिए जल्द ही नोटिफिकेशन जारी होने वाला है। नोटिफिकेशन के बाद किसी आईएएस को वहां विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी याने ओएसडी नियुक्ति किया जाएगा। ओएसडी नवगठित जिले की तमाम औपचारिकताएं पूरी कराएंगे। इसमें जिले स्तर के कार्यालय, अफसरों के आवास समेत जिले की सीमा का निर्धारण भी शामिल होगा। लगभग छह महीने का यह प्रासेज होता है। इसके बाद फिर विधिवत रूप से नए जिले का आगाज होगा। वैसे, आमतौर पर ओएसडी को ही संबंधित जिले का कलेक्टर अपाइंट कर दिया जाता है। पिछली सरकार ने लास्ट में छह नए जिले बनाई थी, उसमें भी छह महीने का वक्त लग गया था। 15 अगस्त को तत्कालीन सीएम रमन सिंह ने ऐलान किया था। और, अगले जनवरी में नए जिलों में कामकाज प्रारंभ हो पाया था। इस बार सरकार चाहती है राज्योत्सव के दिन याने एक नवंबर को पेंड्रा-गौरेला-मरवाही के लोगों को नए जिले की सौगात मिल जाए। अगर ऐसा है, तो सरकार को ठीक-ठाक आईएएस को ओएसडी अपाइंट करना होगा, जो दो महीने में पूरा काम निबटा दे।

दिक्कत नहीं

नए जिले में पोस्टिंग से अफसर इसलिए घबराते हैं कि वहां बुनियादी सुविधाएं होती नहीं। कनेक्टीविटी का भी प्राब्लम रहता है। लेकिन, पेंड्रा-गौरेला में पोस्ट होने वाले कलेक्टर, एसपी समेत तमाम अफसरों को इसकी दिक्कत नहीं जाएगी। पेंड्रा रेल मार्ग पर है। वहीं, बिलासपुर के एडिशनल कलेक्टर हफ्ते में तीन दिन वहां पहले से बैठते हैं। एडिशनल एसपी का भी आफिस है। लिहाजा, बंगला, गाड़ी की दिक्कत नहींं होगी। गौरेला-पेंड्रा का मार्केट भी सूबे के करीब दस जिला मुख्यालयों से बड़ा होगा। दोनों जगहों पर व्यापारिक वर्ग की बहुतायत है। इसलिए, ओएडी बनने वाले बिना किसी टेंशन के पेंड्रा जाएं।

मंत्री की मुश्किलें

हायर एजुकेशन मिनिस्टर उमेश पटेल की नाराजगी आईएएस हिमशिखर गुप्ता पर भारी पड़ी। सरकार ने उन्हें कमिश्नर हायर एजुकेशन से हटाकर प्रशासन अकादमी भेज दिया। हिमशिखर के बाद शारदा वर्मा को नया कमिश्नर अपाइंट किया गया है। रेणु पिल्ले हायर एजुकेशन में पहिले से प्रिंसिपल सिकरेट्री हैं। दोनों महिला अफसर। रेणु नियम कायदों पर चलने वाली तेज-तर्राट आईएएस….अपनी भी नहीं सुनने वाली। शारदा वर्मा की भी फाइल और नोटशीट की लिखा-पढ़ी में जवाब नहीं है। ऐसे में, क्या होगा युवा मंत्री उमेश पटेल का। सरकार कितने बार, कितनों को हटाएगी।

अच्छी खबर

छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस एन बैजेंद्र कुमार एनएमडीसी के सीएमडी हैं। और, अब छत्तीसगढ़ में असिस्टेंट कलेक्टर, सीईओ और कलेक्टर रहे आईएएस प्रमोद अग्रवाल कोल इंडिया के चेयरमैन सलेक्ट हो गए हैं। राज्य के बंटवारे से पहले प्रमोद महासमुंद के कलेक्टर रहे। इसके बाद उनका कैडर मघ्यप्रदेश हो गया। छत्तीसगढ़ के लिए इससे अच्छी बात क्या होगी। देश की दो मिनी रत्न कंपनियों में अब छत्तीसगढ़ का दबदबा होगा। इससे निश्चित तौर पर सूबे को लाभ होगा। आखिर, बैजेंद्र कुमार यहां से जुड़े थे, इसीलिए तो नगरनार स्टील प्लांट का मुख्यालय जगदलपुर और एनएमडीसी में क्लास थ्री और फोर्थ क्लास की भरती परीक्षा दंतेवाड़ा में आयोजित करने करने का फैसला करने में देर नही लगाई। इसी तरह प्रमोद अग्रवाल से भी लोगों की उम्मीदें रहेगी ही। कोल इंडिया की सबसे बड़ी कंपनी साउथ ईस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड की 80 फीसदी से अधिक कोयला खदाने छत्तीसगढ़ में ही है। मुख्यालय भी बिलासपुर में है। एसईसीएल में रोजगार के अवसर बढ़ाने पर के लिए भी राज्य सरकार उनसे बात कर सकती है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले का मुख्यालय इन तीनों में से कहां बनेगा?
2. भूपेश बघेल सरकार के एक सीनियर मंत्री को आजकल स्वभाव के विपरीत गुस्सा क्यों आ रहा है?