रविवार, 24 मई 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: सिंगल पावर सेंटर!



 तरकश, 24 मई 2026

संजय के. दीक्षित

सिंगल पावर सेंटर!

अगले महीने दिल्ली में छत्तीसगढ़ समेत उन पांच राज्य सरकारों की समीक्षा शुरू होनी है, जहां नवंबर 2023 में विधानसभा चुनाव हुए थे। रिव्यू के बाद ही मंत्रिमंडल में सर्जरी का खाका तैयार किया जाएगा। वैसे खबर ये आ रही कि पार्टी नेतृत्व अब राज्यों में दो डिप्टी सीएम का कंसेप्ट खतम करने पर विचार कर रहा है। शीर्ष नेताओं के संज्ञान में ये बात है कि जिन राज्यों में दो-दो डिप्टी सीएम हैं, वहां पावर सेंटर तीन हिस्सों में बंट गया है। और शायद यही वजह है कि असम और पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने डिप्टी सीएम नहीं बनाया। उससे पहले बिहार में इसलिए दो उप मुख्यमंत्री बनाए गए, क्योंकि वहां गठबंधन की सरकार है। वैसे सियासी पंडितों का मानना है, जिन राज्यों में डिप्टी सीएम हैं, वहां मुख्यमंत्री का औरा प्रभावित हुआ है। कुछ महीने पहले की बात है...यूपी में योगी आदित्यनाथ जैसे हाई प्रोफाइल मुख्यमंत्री होने के बाद भी वहां डिप्टी सीएम मौर्य ने सरकार के कामकाज पर सार्वजनिक तौर पर बयानबाजी शुरू कर दी थी। कुल मिलाकर राज्यों के मुख्यमंत्री भी चाहेंगे कि कोई डिप्टी सीएम न रहे। ताकि सिंगल पावर सेंटर रहे। अब देखना है, छत्तीसगढ़ के संदर्भ में बीजेपी क्या फैसला लेती है...डिप्टी सीएम का कंसेप्ट यहां भी लागू है।

हमाम में...हर-हर गंगे

छत्तीसगढ़ में एक महिला का मामला सामने आया है, उसके बाद नेताओं से लेकर नौकरशाहों तक की हालत खराब है। उधर फोटो देखकर लोग खूब आनंद प्राप्त कर रहे हैं...फेसबुक पर फोटो को जूम कर देखा जा रहा...कौन कितना करीब था। असल में, महिला को एनजीओ संचालिका से हाई प्रोफाइल बनाने में बड़े लोगों की बड़ी भूमिका रही। उसके एनजीओ को कॉरपोरेट से फंड दिलाने में कुछ आईएएस अधिकारियों ने लिमिट से बाहर जाकर मदद की। मांसल देह के भूखे नौकरशाहों और नेताओं ने ये भी देखने की कोशिश नहीं की...उसका बैकग्राउंड क्या है। अब बड़े लोगों को खौफ खाए जा रहा...अगर पर्दा उठ गया तो क्या होगा! जाहिर है, पिछले एक दशक में छत्तीसगढ़ में विषकन्याओं का प्रकोप तेजी से बढ़ा है। कोविड के बाद तो और ज्यादा। एनजीओ या बड़ी आईटी कंपनियों की रिप्रेजेंटेटिव की आड़ में ये विषकन्याएं अफसरों और नेताओं को अपने जाल में फंसा करोड़ों में खेल रही हैं। कलेक्टर, एसपी समेत कुछ अधिकारियों के बारे में इंटेलिजेंस एजेंसियों के पास पुख्ता सूचना है। कुछ कलेक्टरों ने तो गर्दा उड़ा दिया है। मध्यप्रदेश जैसे हनीट्रेप कांड छत्तीसगढ़ में हो जाए, इससे पहले सिस्टम को अलर्ट हो जाना चाहिए।

सीएम के पास होम?

उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा के बारे में चर्चाएं बड़ी गर्म हैं कि संगठन में उन्हें बड़ा ब्रेक मिलने वाला है। उनके करीबी नेता भी तस्दीक कर रहे कि नितिन नबीन की टीम में भाई साब का कुछ अच्छा हो सकता है। हालांकि, लोगों के बीच स्वाभाविक सवाल ये भी है कि डिप्टी सीएम का पद छोड़ विजय शर्मा दिल्ली क्यों जाएंगे? तो इसका जवाब इस रुप में दिया जा रहा कि छत्तीसगढ़ में रहकर वे मंत्री से उपर नहीं जा पाएंगे मगर दिल्ली से कभी भी वे बड़े पद पर आ सकते हैं। उनके पास उम्र भी काफी हैं। बहरहाल, विजय शर्मा अगर दिल्ली गए तो फिर गृह विभाग लगता है मुख्यमंत्री के पास आ जाएगा। दरअसल, देश के अधिकांश राज्यों में मुख्यमंत्रियों ने गृह विभाग को अपने पास रखा है। यूपी, बिहार में तो पहले से रहा, अब मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल भी इस सूची में शामिल हो गया है। सीएम के पास होम आने से होगा ये कि जीएडी और गृह दोनों मुख्यमंत्री के पास हो जाएंगे। वैसे पुलिस में राजपत्रित अधिकारी से लेकर ऑल इंडिया सर्विस याने आईपीएस के मैटर मुख्यमंत्री के अधीन होते हैं मगर उसमें गृह मंत्री का अनुमोदन अवश्य लगता है। गृह मंत्री की चीड़िया बिठाने के बाद ही नोटशीट मुख्यमंत्री के पास जाती है। यद्यपि, रमन सिंह और भूपेश बघेल के दौर में कई बार सरकार फैसला ले लेती थी, उसके बाद गृह मंत्री से अनुमोदन लिया जाता था। कई बार तो पोस्टिंग आदेश निकलने के बाद गृह मंत्रियों को अफसरों के ट्रांसफर का पता चलता था। लेकिन, विजय शर्मा काफी तेज-तर्रार गृह मंत्री हैं। हालांकि, तेज तो बीजेपी सरकार के फर्स्ट होम मिनिस्टर बृजमोहन अग्रवाल भी थे। मगर डेढ़ साल के भीतर उनकी गृह से विदाई हो गई थी। खैर, विजय शर्मा इतने मजबूत हो गए हैं कि कम-से-कम इस टर्म में उनका विभाग बदलना संभव नहीं। उनका विभाग उसी केस में चेंज होगा, अगर वे दिल्ली जाएं।

नए पीसीसीएफ

छत्तीसगढ़ में नए हेड ऑफ फॉरेस्ट की नियुक्ति का काउंट डाउन प्रारंभ हो गया है। श्रीनिवास राव 31 मई को वन विभाग के शीर्ष पद से रिटायर होंगे। उनकी जगह कौन लेगा, इसको लेकर लोगों में काफी जिज्ञासा है। विदित है पीसीसीएफ अरुण पाण्डेय हेड ऑफ फॉरेस्ट के प्रबल दावेदार हैं। अरुण के बाद ओपी यादव भी हैं। मगर श्रीनिवास राव के एक्सटेंशन की अटकलों को भी लोग हल्के में नहीं ले रहे। जाहिर है, श्रीनिवास राव की क्षमता और पहुंच पर प्रश्नचिन्ह खड़ा नहीं किया जा सकता। उधर, अरुण पाण्डेय भी कमजोर नहीं हैं। अरुण इस समय पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ के साथ-साथ बजट और पईसा-कौड़ी वाला विभाग डेवलपमेंट संभाल रहे हैं। देश के किसी भी राज्य में अब तक किसी पीसीसीएफ को इतना बड़ा पोर्टफोलियो नहीं मिला है। इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि सरकार में अरुण पाण्डेय का कैसा प्रभाव है। बहरहाल, 30 और 31 मई को सरकारी अवकाश है। लिहाजा, जो भी होना होगा 29 मई को दोपहर तक सरकार को ऐलान करना होगा। सरकार अगर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची तो हो सकता है वन विभाग में प्रभारी मुखिया की नियुक्ति हो जाए...जिसकी संभावना काफी क्षीण है।

दो और पुलिस कमिश्नर?

रायपुर के बाद बिलासपुर और दुर्ग में भी पुलिस कमिश्नरेट बनेगा। गृह मंत्री विजय शर्मा ने इसका ऐलान किया है। यद्यपि इस तरह के नीतिगत फैसले सरकार लेती है और घोषणा भी उसी स्तर पर होती हैं। मगर हो सकता है, गृह मंत्री जी की उपर में बात हो गई होगी। अलबत्ता, प्रश्न यह है कि क्या रायपुर कंप्लीट कमिश्नरेट बन पाया? गृह मंत्री के पुराने बंगले में कमिश्नर बैठ रहे। कमिश्नरेट को एक पैसे का फंड नहीं मिला। आसपास के जिलों से उधार में फोर्स आई है। बिलासपुर और दुर्ग में पुलिस कमिश्नरेट बन जाए, इससे अच्छी बात कुछ हो नहीं सकती...ये वक्त की जरूरत भी है। मगर इससे पहले सेटअप और इंफ्रास्ट्रक्चर जुटाने का प्रयास करना चाहिए। वरना, कहीं से ईंट, कहीं का रोड़ा वाला पुलिस कमिश्नरेट बनाने से वो रिजल्ट नहीं मिलेगा, जो दीगर राज्यों में दिखता है। सिस्टम को पहले तय करना होगा कि पुलिस और सुरक्षा उसकी प्राथमिकता में किस स्थान पर है।

चेयरमैन के फैसले, जी का जंजाल

राजस्व बोर्ड के चेयरमैन रहे राधाकृष्णन द्वारा अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर लिए गए फैसले बोर्ड को अब भारी पड़ रहा है। उनके करीब तीन दर्जन आदेशों को बिलासपुर हाई कोर्ट ने फिर से रिव्यू कि लिए रेवेन्यू बोर्ड को भेज दिया है। बता दें, आईएएस राधाकृष्णन ने चेयरमैन रहते निरंकुश होकर ऐसे आदेश पारित करने लगे थे कि जिलों के कलेक्टरों में हाहाकार मच गया था। सीएम रमन सिंह तक जब शिकायत पहुंची तो उन्होंने राधाकृष्णन को हटाकर वहां डीएस मिश्रा को बिठाया। राधाकृष्णन ने जमीनों और जमीनों की रजिस्ट्री के मामलों में बड़े औद्योगिक समूहों को उपकृत करते हुए सरकार को करोड़ों का नुकसान पहुंचाया।

क्योंकि, वे आईएएस थे

चर्चा चूकि पूर्व आईएएस राधाकृष्णन की तो फिर पुराना प्रसंग स्मरण हो आया। राधाकृष्णन जब माध्यमिक शिक्षा मंडल के चेयरमैन थे, तो उन्होंने बोर्ड के एकाउंट में रखे साढ़े आठ करोड़ रुपए अपने पर्सनल एकाउंट में ट्रांसफर करा लिया था। कायदे से किसी भी वित्तीय लेन देन पर चेयरमैन और सिकेट्री दोनों के हस्ताक्षर होने चाहिए। मगर उस समय के सिकेट्री आईएफएस अनिल राय अवकाश पर थे, उस दौरान राधाकृष्णन ने बैंक मैनेजर पर दबाव डाल बच्चों की फीस का पैसा डकार गए। बाद में इसकी जांच भी हुई। बाद में आए चेयरमैन केडीपी राव ने कार्रवाई करने जीएडी को लेटर लिखा। इस पर विभागीय जांच हुई। मगर जांच के बाद फाइल दबा दी गई। क्यों? इसलिए कि वे आईएएस अफसर थे। करीब 15 साल पहले का ये वाकया है। उस समय का साढ़े आठ करोड़ आज 25 करोड़ के बराबर हो गया होगा। फिर ब्याज की बात करें तो रकम और भी ज्यादा। मगर वाह रे सिस्टम...किसी ऑफिस का के कर्मचारी से अगर घोखे में कोई फायनेंसियल चूक हो जाए तो ब्याज समेत उसकी रिकवरी निकाल दी जाती है, पेंशन रुक जाती है। मगर राधाकृष्णन सरकारी खजाने से करोड़ों रुपए की डकैती कर चले गए...और पेंशन वगैरह सब ले रहे हैं...कोई कार्रवाई नहीं हुई। क्योंकि, वे आईएएस अफसर थे। और कार्रवाई करने वाले भी आईएएस। फिर भाई के खिलाफ भाई एक्शन कैसे लेगा। इसलिए पी. जॉय उम्मेन, सुनिल कुमार, विवेक ढांड, अजय सिंह, आरपी मंडल और अमिताभ जैन जैसे मुख्य सचिवों ने आंखें बंद कर ली।

एसपी ट्रांसफर जून में?

पुलिस अधीक्षकों के ट्रांसफर अब शायद 10 जून के बाद ही होंगे। वो इसलिए कि मई और जून का प्रथम सप्ताह नक्सल दृष्टि से काफी संवेदनशील माना जाता है। बस्तर से भले ही नक्सलियों का खात्मा हो गया मगर फोर्स अभी भी चौकस है। सतर्क इसलिए कि सरकार के दावे पर सवाल खड़े करने कभी भी कोई घटना को अंजाम दिया जा सकता है। इसलिए, जून फर्स्ट वीक के बाद ही एसपी के तबादले होंगे। अब प्रश्न उठेगा एसपी के तबादले से बस्तर से क्या संबंध? असल में, बस्तर के कई एसपी लंबे समय से वहां पोस्टेड हैं। उनमें से अधिकांश को मैदानी एरिया में लाकर उन्हें अच्छे जिले का इनाम दिया जाएगा। सिर्फ एसपी ही नहीं, एसडीओपी, सीएसपी और एडिशनल एसपी भी लंबे समय से वहां पोस्टिंग काट रहे हैं। सरकार उन्हें भी अब वहां से शिफ्ट करेगी। लिहाजा, पुलिस में बड़े स्तर पर तबादले अगले महीने होंगे।

तीन झंडी, चार नेता और...

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस हफ्ते छत्तीसगढ़ दौरे में डॉयल 112 की 400 गाड़ियों को हरी झंडी दिखा जिलों में रवाना किया। 400 गाड़ियां...याने बड़ा इवेंट। गृह या पुलिस विभाग की चूक कि झंडी दिखाने वाले नेता थे चार, मगर झंडी थी तीन। अमित शाह के सामने जब ट्रे में झंडी आई तो उन्होंने एक उठा लिया। सीएम विष्णुदेव साय ने एक झंडी उठाकर अमित शाह के पीछे खड़े गृह मंत्री विजय शर्मा को दे दिया। अब झंडी बची एक और नेता दो। सीएम और विधानसभा अध्यक्ष डॉ0 रमन सिंह। इस सिचएशन से सीएम थोड़ा ठिठके...तब तक अमित शाह विजय शर्मा की तरफ पीछे मुड़े और झंडी रमन सिंह को देने इशारा किया। विजय ने आज्ञाकारी शिष्य की तरह तुरंत झंडी रमन सिंह के हाथ में सौंप दी। पांच से सात सेकेंड के इस पूरे एपिसोड में अमित शाह का गजब का शार्पनेस दिखा। पलक झपकते ही माजरा समझ उन्होंने सिचुएशन को हैंडिल कर लिया। इस पांच सेकेंड के दृश्य में सबसे टचिंग था...अमित शाह द्वारा रमन सिंह को दिया गया सम्मान।

सीएम बनने की शुभकामनाएं

पीसीसी अध्यक्ष पद को लेकर छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेताओं में खींचतान कम होने का नाम नहीं ले रही है। हाल की बात है, टीएस सिंहदेव ने अध्यक्ष बनने की इच्छा प्रगट की तो पीसीसी चीफ दीपक बैज का गुबार सामने आ गया। दीपक बोले, बाबा बड़े नेता हैं, तमिलनाडु, त्रिपुरा के प्रभारी रह चुके हैं, इतने बड़े नेता को केंद्र की राजनीति में जाना चाहिए। इसके बाद ठहाके लगाते हुए बाबा का मोबाइल पर किसी से बातचीत करते एक वीडियो वायरल हुआ, उसमें वे कहते सुनाई दे रहे...हमने तो दीपक भाई को खूब आगे बढ़ने, मुख्यमंत्री बनने की शुभकामनाएं दे दी है। अब दीपक बैज को सीएम बनने की शुभकामनाएं भूपेश बघेल को कैसी लगी होगी, ये नहीं पता। मगर ये सही है कि कांग्रेस के सियासत में नए समीकरण बन रहे हैं...शतरंज के बिसात पर नए दांव चले जा रहे हैं। पीसीसी चीफ दीपक बैज और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आज जिला युवक कांग्रेस अध्यक्षों का इंटरव्यू लेने वाले हैं तो चरणदास महंत और टीएस सिंहदेव इससे अलग कोरबा में मछुआरा सम्मेलन मेें शिरकत करेंगे। उधर, अध्यक्ष पद के युवा दावेदार उमेश पटेल और देवेंद्र यादव के खिलाफ पार्टी नेतृत्व को चिठ्ठी-पत्तरी भेजने का काम भी प्रारंभ हो गया है। क्योंकि, देवेंद्र ने सूबे में दौरे तेज कर दिए हैं। जाहिर है, आने वाले समय में कांग्रेस की गुटीय लड़ाई और तेज होगी। वो इसलिए कि इन सभी नेताओं की दिल्ली में गहरी पैठ है और ये सभी चाहेंगे कि सामने वाले को मौका न मिले।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या ये सही है कि मुख्यमंत्री को छोड़ सारे मंत्रियों का पहले इस्तीफा लिया जाएगा, उसके बाद मंत्रिमंडल का पुनर्गठन होगा?

2. किस आईएएस अधिकारी के खिलाफ मुख्य सचिव ने 15 करोड़ रुपए के घोटाले में जांच का आदेश दिया है?

रविवार, 17 मई 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: डीजीपी, डंडी और आइडिया



तरकश, 17 मई 2026

संजय के. दीक्षित

डीजीपी, डंडी और आइडिया

गृह विभाग ने अरुणदेव गौतम के पदनाम से प्रभारी का टेका हटाते हुए उन्हें पूर्णकालिक पुलिस प्रमुख नियुक्त कर दिया। अरुणदेव 14 महीने प्रभारी रहे और अब आठ महीने पूर्णकालिक डीजीपी रहेंगे। दोनों को मिला दें तो 22 महीने का डीजीपी का कार्यकाल कम नहीं होता। मगर ये भी सही है कि प्रभारवाद के दौरान 14 महीने संशय की स्थिति रही, उससे पोलिसिंग किसी-न-किसी रूप में प्रभावित हुई। और अब पूर्णकालिक आदेश में गृह विभाग ने दिमाग दौड़ाते हुए जिस चतुराई से डीजीपी का आदेश निकाला, उससे गौतम समझ नहीं पा रहे होंगे कि वे खुश होएं या...। गौतम की नियुक्ति अगर आज 16 मई की डेट से होती तो दो साल के हिसाब से 15 मई 2028 तक उनका कार्यकाल रहता। मगर 14 महीने बैक डेट याने 5 फरवरी 2025 से आदेश निकाला गया, इससे 4 फरवरी 2027 को उनका पीरियड खतम हो जाएगा। अर्थात सिस्टम ने उनके टेन्योर में 14 महीने की डंडी मार दी। इससे गौतम कितने उत्साह से काम करेंगे? और उससे पुलिस विभाग का क्या नफा-नुकसान होगा, ये अलग बात। मिलियन डॉलर का सवाल है...चाणक्य बृद्धि के किस अफसर ने बैक डेट वाला यह रास्ता निकाला...इस लाइन पर तो किसी ने सोचा ही नहीं था। इससे यूपीएससी और सुप्रीम कोर्ट भी खुश और सरकार भी उलझन मुक्त।

नए डीजीपी की कवायद

आईपीएस अरुणदेव गौतम के आदेश में स्पष्ट तौर पर दो साल के कार्यकाल का उल्लेख नहीं किया गया है। मगर सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइन के अनुसार डीजीपी का मिनिमम कार्यकाल दो बरस होना चाहिए। इस दृष्टि से 4 फरवरी 2027 को उनका दो साल हो जाएगा। इसके बाद डिपेंड करेगा कि सिस्टम और डीजीपी के बीच कितना कंफर्टनेस है। वैसे अरुणदेव गौतम पक्के ठाकुर हैं, उनके लिए लिमिट से ज्यादा लचीलापन मुमकिन नहीं होगा। अगर ऐसा नहीं होता तो फिर लास्ट मई में यूपीएससी से पैनल आने के बाद अभी तक आदेश लटका नहीं रहता। इसलिए ऐसा प्रतीत हो रहा कि इस साल नवंबर से नए डीजीपी चयन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। जाहिर है, यूपीएससी को तीन महीने पहले डीजीपी के पेनल के लिए प्रपोजल भेजना होता है।

अगले डीजीपी!

डीजीपी अरुणदेव गौतम का कार्यकाल 4 फरवरी 2027 को पूरा हो जाएगा। उसके बाद सरकार चाहे तो उन्हें जुलाई 2027 में रिटायरमेंट तक कंटीन्यू कर सकती है, जिसकी संभावनाएं काफी क्षीण हैं। बहरहाल, अरुणदेव के बाद जीपी सिंह ने कहीं करिश्माई ढंग से वापसी कर ली तो ठीक, वरना एडीजी प्रदीप गुप्ता, विवेकानंद और अमित कुमार अगले डीजीपी के प्रबल दावेदार होंगे। हालांकि, इस साल नवंबर में नए डीजीपी के लिए यूपीएससी को पेनल बनाने प्रस्ताव भेजा जाएगा, उसमें हिमांशु गुप्ता का नाम फिर शामिल होगा। हिमांशु के रिटायरमेंट में टाईम भी काफी बचा है। उनके अलावे एसआरपी कल्लूरी भी होंगे। यद्यपि, यूपीएससी जिन तीन नामों की अनुशंसा करेगा, उनमें से ही कोई अगला डीजीपी बनेगा। लेकिन, मजबूत दावेदारी की बात करें तो प्रदीप, विवेकानंद और अमित के नाम सबसे उपर होंगे।

बीजेपी, बस और चेतावनी

रायपुर में अरसा बाद बीजेपी कार्यसमिति की बैठक हुई। बैठक में संगठन महामंत्री शिवप्रकाश ने तल्ख अंदाज में मंत्रियों और नेताओं को चेता दिया। उन्होंने घाटी में चढ़ रहे बस की उस सवारी और ड्राईवर का दिलचस्प किस्सा सुनाया। शिवप्रकाश बोले...बस का बाया हिस्सा जब खाई की तरफ आता था तो सवारी अपनी सीट छोड़ दायी तरफ की सीट पर जा बैठता था और जब दाया हिस्सा खाई की तरफ तो वह बायी तरफ की सीट पर बैठ जाता था। यात्री के इस तरह बार-बार सीट बदलता देख ड्राईवर से रहा नहीं गया। उसने यात्री से कहा, तुम्हारे सीेट बदलने से कोई फायदा नहीं। बस जब खाई में गिरेगी तो तुम अकेले नहीं, बल्कि बस में बैठे सभी यात्री उपर जाएंगे। शिवप्रकाश बोले...इसी तरह जब सरकार को कोई नुकसान होगा, तो चाहे मंत्री हो या नेता, सभी सड़क पर आ जाएंगे। इसलिए आप ये मत समझिए कि पार्टी या सरकार में कुछ इधर-उधर हो रहा तो उसे देख आंख मूद लें या यह सोच निकल लें कि इससे मुझे क्या फर्क पड़ता है...असल में, सबको इसकी कीमत चुकानी होगी। संगठन मंत्री ने ये भी नसीहत दी...संगठन और सरकार एक सायकिल के दो पहिये नहीं बल्कि एक सेतु हैं। इस सेतु से पार्टी के कार्यकर्ताओं और आम जनता को फायदा मिलना चाहिए। कुल मिलाकर कार्यसमिति की बैठक मंत्रियों और नेताओं को आईना दिखाने वाली रही।

सरकार बड़ी या विभाग?

छत्तीसगढ़ के करीब एक लाख आंगनबाड़ी और मिनी आंगनबाड़ी केंद्रों में रेडी टू ईट सप्लाई करने का काम महिला स्व सहायता समूहों द्वारा किया जाता था। मगर 2018 में आई कांग्रेस सरकार ने इसे स्व सहायता समूहों के हाथ से लेकर ठेकेदारों को दे दिया था। महिला बाल विकास विभाग ने इसके लिए बीज विकास निगम को एजेंसी बनाया। अब खेती-किसानी का काम करने वाले बीज विकास निगम को रेडी टू ईट सप्लाई का काम क्यों दिया गया, इस पर फिर कभी। अभी ये इश्यू है कि बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में कहा था कि सरकार बनते ही रेडी टू ईट का काम महिला स्व सहायता समूहों को सुपूर्द कर दिया जाएगा। मगर ढाई साल हो गया, अभी तक सिर्फ एक जिला ने इसे लागू कर पाया। मंत्री ओपी चौधरी ने महिला बाल विकास विभाग से लड़-भिड़कर 10 जुलाई 2025 को अपने रायगढ़ जिले में इसे शुरू करा लिया। इस मौके पर सरकार ने भी कहा था कि जल्द ही पूरे प्रदेश में रेडी टू ईट का काम स्व-सहायता समूहों को दे दिया जाएगा। मगर, इसके बाद दस महीना निकल गया...महिला बाल विकास के लोगों के कान पर जूं नहीं रेंगा। पता चला है, बीजेपी के दिल्ली में बैठे लोगों ने इसे नोटिस किया है। पार्टी के केंद्रीय नेताओं का मानना है, जिस योजना में सरकार के खजाने का कोई पैसा नहीं लगना, उसमें देरी नहीं करनी चाहिए। जाहिर है, छत्तीसगढ़ में 10 लाख से अधिक महिला स्व-सहायता समूह हैं, उसमें 30 लाख से अधिक महिलाएं हैं। रेडी टू ईट सप्लाई का काम मिलने से लाखों महिलाएं स्वालंबी बन रही थीं। मगर ठेकेदारी सिस्टम में महिला बाल विकास विभाग के लोगों की पांचों उंगलियां ऐसा घी में है कि घोषणा पत्र और स्व-सहायता समूह सब गौण हो गए हैं।

मंत्रियों की मेजर सर्जरी

बीजेपी अगले महीने राज्य सरकारों के कामकाज का रिव्यू करने जा रही है। इसमें छत्तीसगढ़ समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव नवंबर 2023 में हुए थे, उनका नंबर सबसे उपर है। जाहिर है, सरकार के ढाई बरस पूरे होने पर मंत्रिमंडल का पुनर्गठन भी होना है। कुछ मंत्रियों की छंटनी भी होगी। हालांकि, कैबिनेट में कौन भीतर आएगा और कौन बाहर...इस बारे में कुछ कहना व्यर्थ है। इसलिए कि बीजेपी के इस दौर में एक कान को पता नहीं होता कि दूसरे कान को क्या हो रहा है। इसलिए, पब्लिक डोमेन में जितने नाम चल रहे हैं, वे सिर्फ और सिर्फ अटकलबाजियां हैं। हां ये अवश्य है...इस बार कुछ बड़ा और हटकर होगा। क्योंकि, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन छत्तीसगढ़ के प्र्रभारी रहे हैं। उनके पास सभी मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड है। फिर बीजेपी के लोग भी मान रहे कि 2029 की जंग के लिए मंत्रिमंडल में बिना मेजर सर्जरी किए स्थिति अनुकूल नहीं होगी।

एसपी ट्रांसफर

सात जिलों के कलेक्टरों के बदले जाने के बाद पुलिस अधीक्षकों के ट्रांसफर की चर्चांएं बड़ी तेज है। पब्लिक डोमेन में भविष्यवाणियां की जा रही...फलां यहां तो वो वहां जा रहा। मगर सरकारी सूत्रों से पता चला है अभी हफ्ते भर कुछ नहीं होगा। 17 मई को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तीन दिन के दौरे पर छत्तीसगढ़ आ रहे हैं। उनके दिल्ली लौटने के बाद एसपी ट्रांसफर पर विचार किया जाएगा। कुल मिलाकर जो संकेत मिल रहे, हफ्ता भर से पहले पुलिस अधीक्षकों के तबादले पर कोई हलचल नहीं होना है।

हफ्ते की सबसे बड़ी खबर

इस हफ्ते की सबसे बड़ी खबर बीजेपी कोर ग्रुप में बदलाव रहा। कोर ग्रुप में सालों से जमे ऐसे-ऐसे दिग्गजों को हटाया गया है, जिसका फैसला पार्टी की लोकल बॉडी के लिए नामुमकिन था। निश्चित तौर पर इसमें दिल्ली की भूमिका रही होगी। केंद्रीय शीर्ष नेतृत्व ने इसके जरिये बड़ा संदेश दिया है। 12 मंत्रियों में से सिर्फ तीन को मौका मिला। डिप्टी सीएम अरुण साव एवं विजय शर्मा। और मंत्री ओपी चौधरी। अमर अग्रवाल का नाम इसलिए चौंकाने वाला रहा कि पुराने नेताओं की विदाई हो रही, ऐसे में उन्हें कोर गु्रप में शामिल करने के पीछे यकीनन कोई सियासी निहितार्थ होंगे। कोर ग्रुप के पुनर्गठन से यह साफ हो गया है कि मंत्रिमंडल की सर्जरी भी कुछ इसी अंदाज में किया जाएगा।

हफ्ते का कोट

जिसके पास तुम्हारे लिए वक्त नहीं, उसको कभी परेशान मत करना, क्योंकि वो अपनी दुनिया में व्यस्त है, और उस दुनिया में तुम्हारी कोई जरूरत नहीं। तथा सुख में उस व्यक्ति को निमंत्रण देना, जो दुख में बिना बुलाए आ जाते हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या ये सही है कि जिन मंत्रियों पर छंटनी की आशंका ज्यादा है, उनके विभागों में करप्शन और बढ़ गया है?

2. क्या आईएएस ट्रांसफर की एक और लिस्ट आ सकती है?

रविवार, 10 मई 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: महतारी कलेक्टर



तरकश, 10 मई 2026

संजय के. दीक्षित

महतारी कलेक्टर

प्रशासनिक सर्जरी में सरकार ने ब्यूरोक्रेसी की महतारियों का सम्मान बढ़ाया है। बुधवार को सात जिलों में नए कलेक्टर पोस्ट किया गया, उनमें पांच महिलाएं हैं। इन पांच को मिलाकर छत्तीसगढ़ में अब 10 महतारी कलेक्टर हो गई है। राज्य बनने के बाद यह पहला मौका है, जब कलेक्टरी में महिलाओं की संख्या 10 टच कर गया है। इससे पहले रमन सिंह की तीसरी पारी में एक समय महिला कलेक्टरों की संख्या छह हुई थीं। हालांकि, राज्य निर्माण के 13-14 साल तक महिला आईएएस की संख्या काफी कम थीं, इसलिए इक्का-दुक्का महिला कलेक्टर होती थीं। इस समय ब्यूरोक्रेसी की जो माताएं कलेक्टर हैं, उनमें प्रतिष्ठा ममगई बेमेतरा, नुपूर राशि पन्ना कोंडागांव, नम्रता जैन नारायणपुर, रेना जमीन सूरजपुर, चंदन त्रिपाठी बलरामपुर, दिव्या मिश्रा बालोद, तुलिका प्रजापति मानपुर मोहला, रोक्तिमा यादव कोरिया, संतन देवी जांगड़े एमसीबी और पदमिनी भोई सारंगढ़ शामिल हैं।

लोकल अफसरों को वेटेज

वैसे तो ऑल इंडिया सर्विस का लेवल चिपकने के बाद जाति, धर्म और क्षेत्र गौण हो जाता है। फिर भी यह पहली बार हुआ...राज्य सरकार ने बीते बुधवार को सात जिलों में नया कलेक्टर पोस्ट किया, उनमें से चार लोकल अधिकारियों को अवसर दिया। चारों अफसरों की जड़े छत्तीसगढ़ में है और वे राज्य प्रशासनिक सेवा से प्रमोट होकर आईएएस बने हैं। इसके साथ लोकल याने प्रमोटी आईएएस कलेक्टर की संख्या बढ़कर 12 हो गई है। आरआर वालों को जरूर इससे झटका लगा होगा। मगर स्टेट वाले आईएएस खुश हैं...पिछली सरकार में भी प्रमोटी आईएएस को इतनी संख्या में कलेक्टर नहीं बनाया गया।

एक और लिस्ट

42 आईएएस अधिकारियों की ट्रांसफर लिस्ट देखने से प्रतीत होता है कि उसे बनाने में काफी दिमाग दौड़ाया गया होगा। फेरबदल में प्रशासनिक एंगल के साथ अगले विधानसभा चुनाव को देखते पॉलिटिकिल तड़का भी लगा। खैर, कलेक्टरों की एक छोटी लिस्ट और आएगी। कांकेर कलेक्टर नीलेश श्रीरसागर डेपुटेशन पर दिल्ली जा रहे हैं। राज्य सरकार ने उन्हें एनओसी दे दिया है। सो, इस महीने के अंत या अगले महीने के फर्स्ट वीक तक उन्हें केंद्र में पोस्टिंग मिल जाएगी। लिहाजा, उनकी जगह कांकेर में किसी आईएएस को पोस्ट किया जाएगा। जाहिर है, कांकेर बड़ा जिला है, इसलिए कम-से-कम दो-एक जिले की कलेक्टरी किए हुए आईएएस को ही प्राथमिकता मिलेगी। याने एक छोटी लिस्ट और निकलेगी।

राप्रसे ट्रांसफर पर ब्रेक?

राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों की ट्रांसफर लिस्ट काफी दिनों से प्रतीक्षित है। बताते हैं, मई में एक लिस्ट निकलनी थी। मगर उससे पहले बिचौलियों ने वसूली शुरू कर दी। राप्रसे अधिकारियों को यह कहकर भ्रमित किया गया कि लिस्ट तैयार हो रही है, किसी भी दिन निकल जाएगी। इसकी सूचना सरकार को मिल गई। लिहाजा, सरकार ने फिलहाल इस पर ब्रेक लगा दिया है। वैसे जानकारों का कहना है कि राप्रसे की कोई लिस्ट बनी नहीं है। तोरी करने के लिए भ्रम फैलाया गया। बहरहाल, अब जो ट्रांसफर होंगे, काफी ठोक बजाकर किए जाएंगे। मगर कब होंगे? सरकार ही बता पाएगी।

बेबस मिनिस्टर

सिस्टम में कुछ ऐसे खटराल लोग बैठ गए हैं, जिनसे मई मंत्री भी विवश महसूस कर रहे हैं। बात परिवहन विभाग की है। इसमें हर छह महीने में इंस्पेक्टरों का रोटेशन किया जाता है। एक बार मार्च मेें और दूसरा सितंबर में। ये सालों से चला आ रहा है। इस बार परिवहन मंत्री केदार कश्यप ने करीब 100 इंस्पेक्टरों के रोटेशन को अनुमोदित करके नोटशीट नीचे भेजा। परिवहन सचिव ने भी हर बार की तरह उसे अनुमोदित कर दिया। मगर किन्हीं अज्ञात शक्तियों ने आदेश निकलने से रोक दिया। मई शुरू हो गया है, अभी कोई बताने वाला नहीं है कि रोटेशन आदेश क्यों रोका गया, किसने रोका? और उस रोटेशन का क्या होगा? जो राज्य बनने के समय से एक प्रचलित नियम बन गया था। केदार कश्यप के फॉरेस्ट में भी यही हाल है। प्रोबेशनर एसडीओ ट्रेनिंग के बाद महीने भर से पोस्टिंग की आस में बैठे हैं, मगर उनके आदेश का कोई अता-पता नहीं है।

दो महिला मंत्री?

अगले महीने के लास्ट तक विष्णुदेव साय मंत्रिमंडल का विस्तार होना लगभग तय समझा जा रहा है। इसमें कई मंत्रियों के विभाग बदलेंगे। चार मंत्रियों की विदाई होगी...सरगुजा संभाग के दो मंत्रियों के पत्ते कटने की भी खबरें हैं। अलबत्ता, बीजेपी की महिला विधायकों की लाटरी लगने वाली है। मंत्रिमंडल में 15 परसेंट की लिमिट तय होने के बाद से सूबे में चाहे किसी की भी सरकार रही हो, हमेशा एक महिला मंत्री रहीं। मगर अब इसकी संख्या बढ़ाकर कम-से-कम दो किया जाएगा। यदि अच्छा फेस मिले तो तीन भी संभव है। पूर्व मंत्रियों को कैबिनेट में शामिल न करने का कंडिशन अगर हटाया जाएगा तो बस्तर से लता उसेंडी भी एक तगड़ा दावेदार हो सकती हैं। उनसे आदिवासी और महिला, दोनों कोटा कंप्लीट होगा। डिप्टी सीएम विजय शर्मा अगर संगठन में गए तो फिर भावना बोथरा के नाम पर विचार हो सकता है। या हो सकता है बीजेपी किसी और को सामने लाकर चौंका दें।

कांग्रेस में उठापटक

भूपेश बघेल खेमे ने चिर परिचित प्रतिद्वंद्वी सिंहदेव गुट को मात देते हुए विधायक संगीता सिनहा को प्रदेश महिला कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त करा लिया। देर-सबेर संगीता अध्यक्ष भी घोषित हो जाए, तो आश्चर्य नहीं। उधर, खबर है कि कांग्रेस में 15 मई के बाद कुछ बड़ा होने वाला है। नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की भी नियुक्ति हो सकती है। चूकि अगले विधानसभा चुनाव में अब दो साल बच गया है। सो, इस समय जो कांग्रेस का अध्यक्ष बनेगा, उसी की अगुआई में चुनाव लड़ा जाएगा। उधर, खबर है कि लगातार हार के बाद कांग्रेस अब जमीनी नेताओं को पार्टी में ज्यादा वेटेज देना चाहती है। भूपेश को हो सकता है, केंद्र में कोई बड़ी जिम्मेदारी मिल जाए। केंद्र में वे अगर ताकतवर होंगे तो जाहिर है छत्तीसगढ़ में भी कोई उनका अपना आदमी ही मजबूत होगा।

अफसरशाही में जातिवाद

जाति का वायरस अब तक सियासत में ही घुसा था, मगर अब छत्तीसगढ़ की अफसरशाही भी अछूती नहीं रही। जिलों में कलेक्टर, एससपी भी एसडीएम, एसडीओपी और थानेदारों की पोस्टिंग में इस सिंड्रोम के शिकार दिख रहे हैं। स्थिति यह हो चली है कि सूबे में कर्मचारियों, अधिकारियों की योग्यता की पैमाना अब कास्ट हो गया है। कोई खास वर्ग का मुलाजिम है तो गंभीर श्रेणी की गल्ती करने पर भी कार्रवाई नहीं होगी। राज्य की प्रगति की दृष्टि से यह सही नहीं है। सरकारी दफ्तर जात-पात और धर्म से मुक्त होना चाहिए। छत्तीसगढ़ के सिस्टम में करप्शन और मनमौजीपन बढ़ने के पीछे इस वायरस की बड़ी भूमिका है।

कौवा कान ले गया

छत्तीसगढ़ के कर्मचारी किसी प्रायवेट समिति, संगठन के सदस्य नहीं हो सकते। छत्तीसगढ़ सरकार के इस आदेश पर पिछले दिनों इतना कोहराम मचा कि जीएडी को अपना आदेश वापिस लेना पड़ा। जबकि, जिस संघ के कंधे पर बंदूक रख सरकार को निशाने पर लेने की कोशिशें हुई, उसमें फैक्ट यह है कि विष्णुदेव साय सरकार के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद जीएडी ने एक आदेश निकालकर सरकारी कर्मचारियों को संघ के कार्यक्रमों में जाने के लिए फ्री कर दिया था। सरकारी सिस्टम को समझने वालों को पता है कि जब तक कोई आदेश लिखित में निरस्त नहीं होता, तब तक वह स्टैंड रहता है। संघ में जाने वाला 2014 का आदेश निरस्त नहीं हुआ, इसलिए वह लागू है। मगर कौवा कान ले गया...सिस्टम पर हमले करने में संघ के मौसमी कार्यकर्ता पिल पड़े। सोशल मीडिया में इस पर लंबे-लंबे पोस्ट लिखे गए। जाहिर है, संघ के ओरिजिनल लोग कभी दिखावा नहीं करते कि वे संघ वाले हैं। एमपी के दिनों में दिग्विजय सिंह सरकार ने भी सिर्फ आदेश निकाला था...कभी सख्ती नहीं बरती। उस दौरान भी कर्मचारी, अधिकारी संघ के कार्यक्रमों में जाते रहे। बहरहाल, अंदरखाने की बात यह है कि सरकारी मुलाजिमों मेें अनुशासन का वातावरण बनाने उपर के अफसरों ने एक सामान्य आदेश निकालने कहा, उसे तिल का ताड़ बना दिया गया। इससे नुकसान सिस्टम का हुआ। आदेश वापस लेने की कड़ी में एक संख्या का इजाफा हो गया। अब आप पूछेंगे, मौसमी कार्यकर्ता? ये वो नस्ल है जो अपनी सुविधा से वामपंथी, कांग्रेसी और संघी बन जाता है। अभी कई कार्यक्रमों में ये मौसमी कार्यकर्ता बिना बुलाए भी पहुंच जा रहे।

ट्रांसफर पर पेंच?

एक विभाग में ट्रांसफर के लिए एक हजार से अधिक की लिस्ट सरकार को अनुमोदन के लिए भेजा गया। असल में, ढाई सौ से अधिक नामों की सिफारिश संगठन के एक बड़े नेता ने की है। इसके अलावा बड़ी संख्या में विधायक, सांसद और दीगर नेताओं के लोग भी हैं। मंत्री ने अपना पल्ला झाड़ते हुए लिस्ट को उपर भेज दिया। ट्रांसफर पर बैन के दौरान इतनी बड़ी लिस्ट देख सरकार में बैठे लोगों का सिर चकरा गया। फिलहाल, उपर से इस पर ब्रेक लग गया है।

मंत्री के चेले का होटल

सरगुजा से ताल्लुकात रखने वाले एक नेताजी पिछली कांग्रेस सरकार में स्कूल शिक्षा मंत्री थे। उनके साथ चेला के तौर पर रहने वाला एक युवक ने इतना कुछ अर्जित कर लिया कि मंदिर रायपुर में बड़ा होटल बनवा रहा है। जब वह पीए, स्टाफ जैसे किसी पद पर नहीं था, तो ये हाल है। नए स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव को अलर्ट रहना चाहिए। स्कूल शिक्षा भले ही चमक-धमक वाला विभाग नहीं माना जाता, मगर मैनपावर सर्वाधिक है। इस विभाग के जेडी, डीईओ तो बड़ा पद है...उनके ऑफिस के बाबू मोटे आसामी बन गए हैं। आखिर कौन ऐसा खेला होगा, जो स्कूल शिक्षा में नहीं होता। डीईओ द्वारा शिक्षकों के निलंबन और बहाली के मिला जुला खेल से खुद स्कूल शिक्षा मंत्री भी चिंतित हैं। जाहिर है, जब तक डीईओ, बीईओ ठीक नहीं होंगे, तब तक स्कूल शिक्षा को बदनामी से नहीं बचाया जा सकेगा।

हॉफ की डीपीसी

गुरूवार को मंत्रालय में हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स की डीसीपी आयोजित थी। मगर पता चला ऐन वक्त पर बैठक टल गई। बताते हैं, डीपीसी में एसीएस फॉरेस्ट ऋचा शर्मा मेंबर थीं। मगर एक दिन पहले ही उनका विभाग बदल गया। उसके बाद उन्होंने डीपीसी में शामिल होने से मना कर दिया। कमेटी में अगर बिना नाम पदेन मेंबर लिखा गया होता तो नए एसीएस फॉरेस्ट मनोज पिंगुआ डीपीसी में बैठ सकते थे। इसलिए मामला गड़बड़ा गया। हालांकि, सीएस, पीसीसीएफ थे, तो डीपीसी की जा सकती थी। बहरहाल, डीपीसी टलने के बाद अब भांति-भांति की अटकलों का दौर शुरू हो गया है...किसी ताकतवर शक्ति की बातें भी।

हफ्ते का कोट

दूघ, दही, छाछ, मक्खन, घी सब एक वंश के, फिर भी सबकी कीमत अलग-अलग...क्योंकि श्रेष्ठता जन्म से नहीं, अपने कर्म, कला और गुणों से प्राप्त होती है और कुछ समस्याएं हमारे पास है, सोचकर सदा दुखी होने से अच्छा है, यह सोचकर खुश होना कि दुनिया में बहुत समस्याएं हैं, जो हमारे पास नहीं है।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. प्रशासनिक मुखिया ने कलेक्टरों के व्हाट्सएप ग्रुप में किस कलेक्टर के बारे में लिखा...बिना इजाजत इधर-उधर घूमते रहते हैं?

2. क्या ये सही है कि ट्रांसफर के लिए अब सिर्फ रोकड़ा काफी नहीं, एप्रोच भी चाहिए...दोनों होंगे तभी कामयाबी मिलेगी?

रविवार, 3 मई 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: कलेक्टरों का सीआर, और रिजल्ट


 

तरकश, 3 मई 2026

संजय के. दीक्षित

कलेक्टरों का सीआर, और रिजल्ट

सरकार ने स्कूलों का स्तर सुधारने के लिए 10वीं, 12वीं के रिजल्ट को कलेक्टरों के सीआर में जोड़ा था। याने जिस जिले का रिजल्ट अच्छा आएगा, उसका क्रेडिट कलेक्टरों को मिलेगा। सरकार की मंशा अच्छी थी...कलेक्टर स्कूलों की निगरानी करें, जिससे स्कूलों में पढ़ाई की गुणवता सुधरे। मगर कुछ कलेक्टरों ने कमाल कर दिया। रायपुर के पड़ोसी जिले के एक ही स्कूल के नौ बच्चे मेरिट में आ गए। तो बस्तर और सरगुजा के छोटे जिलों ने रिजल्ट में खंभा गाड़ दिया। यहां यह स्पष्ट कर दें कि मेधावी बच्चों की प्रतिभा पर सवाल खड़ा करने हमारा कोई इरादा नहीं। निश्चित तौर पर बड़ी संख्या में ऐसे विद्यार्थी होंगे, जिन्होंने अपने परिश्रम से सफलता अर्जित की होगी। मगर यह भी सही है...कई कलेक्टरों ने अपनी पीठ थपथपवाने के लिए कुछ तो जरूर किया। तभी रिजल्ट निकालने के मौके पर माध्यमिक शिक्षा मंडल की एक शीर्ष अफसर ने सरकार के संज्ञान में यह विषय लाया कि परीक्षा के समय कलेक्टरों का काफी प्रेशर रहा...कई जिलों में खुलकर नकल कराए गए। बहरहाल, जिले के मुखिया का ही जब नकल को संरक्षण है तो माशिमं के उड़नदस्ता की क्या बिसात? उड़नदस्ता का गठन तो आखिर कलेक्टर के बिहाफ में ही किया जाता है। छत्तीसगढ़ के ह्यूमन रिसोर्स की दृष्टि से ये अच्छी बात नहीं है। स्कूल शिक्षा विभाग भले ही अपना पीठ थपथपा लें मगर बाद में होता यही है कि आगे जाकर बच्चे सरवाइव नहीं कर पाते। फिर नाम खराब राज्य का होता है।

खटराल कलेक्टर और पोरा बाई

10वीं, 12वीं के रिजल्ट में खेला करना नई बात नहीं है। दशक भर पहले की बात होगी। जशपुर के एक कलेक्टर ने रिजल्ट में जिले को अव्वल लाने काफी एक्सरसाइज किया। मगर जब देखे कि परीक्षा का रिजल्ट सुधारना गुरूजी के वश की बात नहीं तो उन्होंने स्कूल शिक्षा के अधिकारियों से फ्री हैंड दे दिया...मुझे नहीं मालूम, किसी भी तरह जिले के बच्चे को मेरिट में आना चाहिए। और वैसा ही हुआ। कलेक्टर के आदेश का पालन हुआ, उस साल जशपुर के तीन बच्चे मेरिट में आ गए थे। अब आपका स्वाभाविक प्रश्न होगा कि नकल मारकर भला मेरिट में या फर्स्ट कैसे आया जा सकता है। तो इसी प्रदेश में आखिर पोरा बाई कांड भी हुआ है। पोरा बाई ने जांजगीर के स्कूल से हायर सेकेंड्री एग्जाम के लिए फार्म भरा था। मगर परीक्षा में कोई और बैठा। पोरा बाई को 12वीं मेरिट में टॉप घोषित किया गया। लेकिन, माध्यमिक शिक्षा मंडल के चेयरमैन आईएएस बीकेएस रे को संदेह हुआ और उन्होंने जांच करा दी। मामला पुलिस में पहुंचा और वह जेल गई। सो, तर्क-कुतर्क की बात नहीं। स्कूल शिक्षा में पहले भी फर्जीवाड़ा के उदाहरण रहे हैं। हालांकि, विष्णुदेव सरकार ने स्कूल शिक्षा में कई रिफार्म किया है। कलेक्टर्स और स्कूल शिक्षा विभाग को इस रिफार्म का फायदा उठाते हुए राज्य के मानव संसाधन को मजबूत करने के लिए भागीरथ प्रयास करना चाहिए। क्योंकि, देश के स्कूल शिक्षा में छत्तीसगढ़ की गिनती नीचे से शुरू होती है।

19 से पहले नए डीजीपी

5 अप्रैल को पूर्णकालिक डीजीपी की नियुक्ति होते-होते रुक गई थी। मगर सुप्रीम कोर्ट में 19 मई को सुनवाई की डेट लग जाने के बाद अब नहीं लगता कि अब मामला ज्यादा दिन तक खींच पाएगा। सुनने में आ रहा, 19 मई से पहले छत्तीसगढ़ में पूर्णकालिक डीजीपी की नियुक्ति हो जाएगी। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को लेटर जारी कर दिया है। सुनवाई डेट से पहले अगर कोई फैसला नहीं हुआ तो फिर हो सकता है सुप्रीम कोर्ट कोई बड़ा आर्डर पास कर दें या फिर चीफ सिकरेट्री को ही तलब कर लें। सीएस को बुलाने से जाहिर है, मामला काफी बड़ा हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केंद्रीय गृह सचिव को कोर्ट बुला लिया था। दरअसल, छत्तीसगढ़ में सिस्टम की भी अपनी मजबूरियां हैं। कुछ सालों से सीएस, डीजीपी का मसला केंद्र से तय होने लगा है। याद ही होगा, 4 सितंबर 2024 को अशोक जुनेजा का कार्यकाल खतम होने जा रहा था। स्टेट गवनर्मेंट ने नए डीजीपी के लिए नोटशीट बनाने का आदेश दे दिया था। मगर रिटायरमेंट से 24 घंटे पहले केंद्र से अशोक जुनेजा को छह महीने एक्सटेंशन देने का आदेश आ गया। सीएस के समय भी ऐसा ही हुआ। सरकार मनोज पिंगुआ का आदेश जारी करने जा रही थी कि अमिताभ जैन के एक्सटेंशन के लिए दिल्ली से संदेशा आ गया। दिल्ली ने इसके बाद विकास शील को मनीला से बुलाकर सीएस बनाने रायपुर भेज दिया। हालांकि, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद केंद्र अब फ्री है, इसलिए लगता है 19 मई से पहले पूर्णकालिक डीजीपी का मामला क्लियर हो जाएगा।

मंत्रियों में तनातनी-1

एक नए मंत्री के साढ़ू भाई लंबे समय से एक विभाग विशेष में सप्लाई का काम करते हैं। मंत्री बनने के बाद उन्हें लगा कि अब बराबरी का मामला है...आखिर डायन भी एक घर छोड़कर चलती है। फिर भी एहतियात बरतते हुए नए मंत्री ने माननीय से बात भी कर ली। बता दिया...साढ़ू भाई का मसला है। मगर मंत्री के मुलाजिमों ने स्पष्ट कह दिया...25 फीसदी एडवांस देना हीे होगा। ऐसे में, दोनों मंत्रियों में खटास बढ़नी ही थी। हालांकि, नए मंत्री को जल्दी ही हिसाब चुकता करने का मौका मिल गया। लक्ष्मीजी से अति मोह रखने वाले मंत्री के गृह जिले में डिस्ट्रिक्ट लेवल के एक अफसर की पोस्टिंग में उन्होंने अपने आदमी का नाम बताया। मगर नए मंत्री ने उसके उल्टा अफसर को वहां बिठा दिया।

मंत्रियों में तनातनी-2

आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को साड़ी बांटने के मामले में मीडिया ने एक मंत्री से सवाल कर दिया। मंत्रीजी चूकि बार-बार एक ही सवाल से उकता गए थे, इसलिए उनकी जुबां फिसल गई। मुंह से निकल गया, स्कूल शिक्षा में कितना भ्रष्टाचार है...वो आपलोगों को नहीं दिखता। मंत्री का यह लूज टॉक लीक होकर एक दूसरे मंत्री के पास पहुंच गया। जाहिर है, इस पर बवाल मचना ही था। मंत्रीजी तमतमा गए। उन्होंने तुरंत फोन लगवा जमकर सुना दिया...आप दूसरे विभाग में भ्रष्टाचार की बात कैसे कर सकते हो। मंत्रीजी ने हालांकि, सफाई देेने का काफी प्रयास किया। मगर वो कोई काम नहीं आया।

सीएस प्रोटोकॉल में 

सरगुजा संभाग की एक महिला विधायक का कलेक्टरों को हड़काते एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ था। विधायक इसलिए नाराज थीं कि उनके कार्यक्रम में एसडीएम नहीं पहुंचे। वीडियो में स्पष्ट देखा गया कि पीछे खड़े उनके चंगु-मंगू जो बोल रहे, विधायक महोदया कलेक्टर को हड़काते समय उसी को दोहरा रही थीं। अलबत्ता, प्रोटोकॉल में ये कहीं नहीं है कि विधायक के हर कार्यक्रम मेें एसडीएम जाए। मगर विधायक जी को भड़ास निकालना था, उन्होंने निकाल लिया। असल में, अफसरशाही को कमतर करने का काम पिछली सरकार में हुआ...जब जीएडी ने आर्डर निकाल प्रोटोकॉल में चीफ सिकरेट्री को विधायक के नीचे कर दिया। और, राज्य का प्रशासनिक मुखिया ही जब प्रोटोकॉल में नीचे हो गए तो फिर कलेक्टर, एसडीएम को विधायक क्या समझेंगे। जाहिर है, प्रोटोकॉल की दृष्टि से यह एक गलत फैसला था। मुख्य सचिव कार्यपालिका के प्रमुख होते हैं। साथ में कैबिनेट के पदेन सिकेट्री भी। कैबिनेट की बैठकों में वे मुख्यमंत्री के बगल में बैठते हैं, मंत्रियों की सीट उनके बाद होती है। इसी तरह केंद्र में कैबिनेट सचिव को भी राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों के बराबर रखा गया है। सांसद का प्रोटोकॉल उनसे काफी नीचे होता है। मगर छत्तीसगढ़ में सब उल्टा-पुलटा चल रहा है।

अफसरों को प्रोटेक्शन

अफसरशाही लाख भ्रष्टाचार से ग्रसित हो, मगर काम तो उनसे ही कराना है। इसलिए, गड़बड़ियों पर कड़ी कार्रवाई हो मगर जो अच्छे काम करने वाले अधिकारी हैं, उन्हें सरकार से प्रोटेक्शन भी मिलना चाहिए। बीते कुछ महीनों में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिसमें अराजकता फैलाने की कोशिशें हुईं। जिला कार्यालयों में घुसकर हंगामा और नारेबाजी के मामले भी कई जिलों में हुए हैं। रसूखदार लोगों को छोड़ दें तो आम आदमी का क्या? वह प्रशासन और पुलिस के पास ही उम्मीद लेकर जाता है। मगर छोटे स्वार्थों के लिए इन्हीं संस्थाओं को डैमेज करने का प्रयास किया जाएगा तो जरा सोचिए आम आदमी़ का क्या होगा, वह किस चौखट पर उम्मीद लेकर जाएगा?

राजा, मंत्री, चोर, सिपाही

बच्चों में बड़ा लोकप्रिय खेल है राजा, मंत्री,, चोर सिपाही। इसमें राजा मंत्री को आदेश देता है कि चोर को पकड़े। मंत्री अगर सही चोर को नहीं पकड़ पाता तो मंत्री को सजा मिलती है। बहरहाल, छत्तीसगढ़ में उल्टा हो रहा है। एक मिनिस्टर साब चोर याने आरोपी को ही बचाने मौके पर पहुंच गए। बात अंबिकापुर की है। वहां के पैसे वाले बड़े होटल कारोबारी का विस्फोटक पदार्थ का उल्टा-सीधा काम है। दो रोज पहले उसमें अचानक आग लग गई। आग भी ऐसी भीषण की, जिला प्रशासन को एसईसीएल, आदानी के दो दर्जन से अधिक दमकल झोंकना पड़ा। सही समय पर अगर आग पर काबू नहीं किया गया होता, तो आसपास के इलाके उसकी चपेट मेें आ गए होते। दुकान के पाटे पर सहज-सरल भाव से बैठ आग की लपटों को निहारते हुए मंत्रीजी ने घटना को छोटा बताते हुए मीडिया को बाइट दिया। अब जब मंत्रीजी मौके पर पहुंच घटना को छोटा बता रहे तो फिर अंबिकापुर पुलिस में इतनी हिम्मत कहां? पुलिस ने मामूली जमानती धाराएं लगाकर पल्ला झाड़ लिया। लेकिन विस्फोटक कारोबारी पर अतिशय मेहरबानी करने की बात किसी ने राजधानी रायपुर पहुंचा दी। और राजधानी से सरगुजा आईजी को फरमान जारी हो गया। दरअसल, सुशासन तिहार का वक्त है। ऐसी चीजें अगर सोशल मीडिया में उछलती तो खामोख्वाह सिस्टम की छबि को नुकसान पहुंचता। सो, राजधानी से सरगुजा आईजी को फरमान गया और उन्होंने एसएसपी को नोटिस जारी कर दिया। जाहिर है, सिस्टम के तेवर के बाद अब अग्निकांड में पर्याप्त धाराएं लग जाएंगी। मगर इस मामले में मंत्रीजी बुरी कदर एक्सपोज हो गए।

अफसरों का ट्रांसफर

सुशासन तिहार-02 प्रारंभ हो गया है। जिलों में समस्या निवारण शिविर का आयोजन किया जा रहा है। कुछ शिविरों में मुख्यमंत्री भी जाएंगे तो कहीं औचक निरीक्षण के लिए उनका उड़नखटोला भी उतरेगा। सुशासन तिहार शुरू होने के बाद भी अफसरशाही में सबसे बड़ा सवाल ट्रांसफर का है। दरअसल, यह पहला मौका है, जब लंबे समय से अफसरशाही में तबादले नहीं हुए हैं। मंत्रालय में कई सचिवों के ढाई-तीन साल हो गए हैं तो जिलों में कलेक्टर, एसपी के भी ट्रांसफर अवेटेड रहे हैं। कई एसपी के टाईम भी ओवर हो रहे हैं। ऐसे में, ट्रांसफर को लेकर जिज्ञासा लाजिमी है। यह भी सही है कि पिछले साल सुशासन तिहार के दौरान ही अप्रैल एंड में राजनांदगांव के कलेक्टर संजय अग्रवाल को बिलासपुर शिफ्ट किया गया था। मगर इस बार क्या होगा, इस संदर्भ में अभी कुछ फायनल नहीं हुआ है। सरकार का पूरा फोकस इस समय सुशासन तिहार में आम आदमी की समस्याओं के निवारण पर है। इसलिए, जिलों में चेंज का नहीं लगता। मुख्यमंत्री को अगर समय मिला तो सचिवों के विभाग बदलने पर जरूर कोई चर्चा हो सकती है।

कलेक्टर, एसपी का कार्यकाल?

छत्तीसगढ़ में पिछले छह-सात साल से ऐसा हो रहा कि कलेक्टर, एसपी छह महीने, एक साल में बदल जा रहे। रमन सिंह सरकर के दौर तक दो साल अफसरों का न्यूनतम कार्यकाल होता था। राजेश सुकुमार टोप्पो ने आईएएस के कैरियर में एक जिला किया है। मगर राज्य बनने के बाद कलेक्टर के तौर पर उनका रिकार्ड है। वे करीब साढ़े तीन साल तक बलौदा बाजार के कलेक्टर रहे। इसी तरह मध्यप्रदेश के दौर में आईपीएस शैलेंद्र श्रीवास्तव साढ़े तीन साल से अधिक समय तक बिलासपुर के एसपी रहे। इसलिए, सरकार पर निर्भर करता है...वो किस अफसर को कितने दिन जिले में रखती है। वैसे कलेक्टर, एसपी के साढ़े तीन साल के उदाहरण तो इसी प्रदेश में है।

हफ्ते का कोट

'जीवन में आनंद साधन से नहीं, साधना से प्राप्त होते हैं।' और 'किसी को चोट पहुंचाना उतना ही आसान है, जितना पेड़ का एक पत्ता तोड़ना, लेकिन किसी को सुखी करना एक पेड़ उगाने जैसा है, इसमें बहुत समय, देखभाल और धैर्य लगता है।'

अंत में दो सवाल आपसे?

1. किस आईजी के क्रियाकलापों से पुलिस की छबि खराब हो रही है?

2. क्या ये सही है कि अफसरशाही में भी जातिवाद का वायरस घुसने लगा है?

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: सचिवों की मेजर सर्जरी



तरकश, 26 अप्रैल 2026

संजय के. दीक्षित

सचिवों की मेजर सर्जरी

मंत्रालय में सचिव स्तर पर एक बड़ी उठापटक जल्द हो सकती है। इसमें उन आधा दर्जन से अधिक सचिवों का विभाग बदल सकता है, जिनका कार्यकाल सवा दो साल से अधिक हो गया है। जाहिर है, दिसंबर 2023 में सरकार बदलने के बाद जनवरी 2024 में सचिवों की बड़ी लिस्ट निकली थी, उसके बाद कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। वैसे, एसीएस मनोज पिंगुआ का गृह विभाग में साढ़े तीन साल से ज्यादा हो गया है। पिछली सरकार के समय से उनके पास गृह विभाग का दायित्व है। इसी तरह निहारिका बारिक पंचायत एवं ग्रामीण विकास, शहला निगार कृषि, कमलप्रीत सिंह पीडब्लूडी, सिद्धार्थ कोमल सिंह परदेशी स्कूल शिक्षा, भुवनेश यादव समाज कल्याण, एस भारतीदासन हायर एजुकेशन, बसव राजू नगरीय प्रशासन, शम्मी आबिदी महिला बाल विकास विभाग को सवा दो साल से अधिक हो गया है। लिहाजा, इन अधिकारियों के विभाग बदलने की अटकलें बड़ी तेज हैं। अलबत्ता, अमित कटारिया हेल्थ में जम नहीं पा रहे, इसलिए उनका पोर्टफोलियो चेंज हुआ तो कोई आश्चर्य नहीं। सेंट्रल डेपुटेशन से अमित लौटे थे, उस समय उनका इंटरेस्ट नगरीय प्रशासन में था मगर बसव राजू को वे हिला नहीं सकें। अमित का नाम पीडब्लूडी को लेकर भी चर्चाओं में है। वैसे तो पीडब्लूडी के लिए मुकेश बंसल को भी राइट च्वाइस बताया जा रहा, मगर उनके पास वर्कलोड ज्यादा है, मंत्री ओपी चौधरी उन्हें छोड़ेंगे भी नहीं, इसलिए मुकेश की संभावना कम प्रतीत हो रही।

गृह विभाग का निजाम कौन?

बैचमेट को चीफ सिकरेट्री बन जाने के बाद एसीएस होम मनोज पिंगुआ ने सेंट्रल डेपुटेशन पर जाने के लिए अर्जी लगाई थी मगर उन्हें अब तक पोस्टिंग नहीं मिली है। हालांकि, उन्होंने अभी तक अपना आवेदन वापिस भी नहीं लिया है। मगर खबरें आ रही कि दिल्ली जाने का उनका इरादा अब डगमगा रहा है। हो सकता है कि सीएस विकास शील से उनकी कोई बात हुई हो...आखिर हैं तो पुराने बैचमेट ही। बहरहाल, मनोज अगर दिल्ली नहीं गए तो सरकार उनकी वरिष्ठता की दृष्टि से कौन सा विभाग देगी, इस पर भी धर्मसंकट रहेगा। उनके पास पहले हेल्थ और फॉरेस्ट रह चुका हैं। विष्णुदेव साय के सीएम बनने के बाद मनोज को उनके सचिवालय में जाने की चर्चाएं भी हुई थी। उसके बाद 30 जून 2025 को कैबिनेट की मीटिंग के बाद उनका सीएस का आर्डर निकलते-निकलते रह गया था। दिल्ली से अमिताभ जैन को एक्सटेंशन देने का संदेशा आ गया। और उसके बाद मनीला से विकास शील आ गए। बहरहाल, सवाल यह है कि सोनमणि बोरा, कमलप्रीत सिंह या किसी अन्य को सिकेट्री होम बनाया जाएगा तो फिर मनोज पिंगुआ को क्या मिलेगा? इसका जवाब सीएम या उनके पीएस के पास ही होगा।

ट्रांसफर का महीना?

सचिवों के विभाग बदले जाने की चर्चाओं के बीच बता दें कि कलेक्टर, एसपी, जिला पंचायत सीईओ और डीएफओ के ट्रांसफर लंबे समय से प्रतीक्षित है। एक मई से सुशासन तिहार भी प्रारंभ होने जा रहा है। हालांकि, सुनने में आ रहा कि सुशासन तिहार के साथ-साथ अफसरों की लिस्ट भी जारी होते रहेगी। सरकार में बैठे लोग इस बात को स्वीकार कर रहे कि दो साल से अधिक जिन अधिकारियों का हो गया है, वहां ट्रांसफर की प्रत्याशा में कोई काम नहीं हो रहा है...उन जिलों के अफसरों को बदलना ही श्रेयस्कर होगा। अलबत्ता, कलेक्टर, एसपी के ट्रांसफर होंगे या नहीं, आने वाला दो-तीन दिन काफी महत्वपूर्ण होंगे। यदि बदलना होगा तो सरकार इसी दौरान कोई निर्णय लेगी। पीएस टू सीएम सुबोध सिंह भी ट्रेनिंग से लौट आएं हैं।

25 साल में जीरो

न्वंबर 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ बनने के दौरान छत्तीसगढ़ में सड़कों की जो स्थिति थी, कमोवेश वही हालत अभी भी है। नेशनल हाईवे को छोड़ दें, तो पीडब्लूडी मिनिस्टर और सीएम के विधानसभा इलाकों की हालत बेहद दयनीय है। तभी रिव्यू मीटिंग में सीएम बड़े नाराज हुए थे। वे यहां तक बोल गए थे...पीडब्लूडी का कहीं कोई काम दिख नहीं रहा है। दरअसल, सड़कें कनेक्टिविटी की सुविधा के साथ-साथ किसी भी राज्य की शान होती है। पड़ोसी राज्यों में तेलांगना और महाराष्ट्र की बात तो छोड़िये, कालाहांडी की भूखमरी के नाम से बदनाम ओड़िसा की सड़कें विकसित प्रदेशों टाईप अहसास दिला रही है। बगल में, विशाखापट्टनम या नागपुर चले जाइये, सड़कें देखकर आप हतप्रभ रह जाएंगे। असल में, छत्तीसगढ़ में इस सेक्टर में काम ही नहीं हुआ। और न ही सरकार ने इसे प्राथमिकता में रखा। राजधानी रायपुर की बात करें तो 25 साल में एक एक्सप्रेसवे बन पाया। ऐसा नहीं कि पीडब्लूडी में हाई प्रोफाइल अफसर नहीं आए। पी. जाय उम्मेन, एमके राउत, आरपी मंडल और अमिताभ जैन जैसे पीडब्लूडी सिकेट्री हुए। बावजूद इसके आलम यह है कि धर्मजयगढ़ और पत्थलगांव को जोड़ने वाली सड़क पिछले 15 साल से निर्माणाधीन है। पीडब्लूडी किस रफ्तार में चल रहा, इसका अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि पिछले साल 9500 करोड़ का बजट मिला मगर मार्च क्लोजिंग तक इसमें से मात्र 3000 करोड़ खर्च हो पाया।

10 साल में आरओबी

93 बैच के आईएएस अफसर अमित अग्रवाल 2015-16 के दौरान वित्त सचिव थे। कचना के जीएडी कालोनी से शहर तरफ आने-जाने मे फाटक पर वे हमेशा लोगों के जाम का शिकार होते देखते थे। लिहाजा, उन्होंने खुद ही पहल कर पीडब्लूडी वालों से प्रस्ताव मंगा बजट में शामिल किया। उसके बाद 10 साल निकल गया। अभी तक कचना ओवर ब्रिज पूरा नहीं हुआ है। 2016 के बजट में आने के बाद इसका 2021 में इसका काम प्रारंभ हुआ। मार्च 2025 की डेडलाइन थी और अप्रैल 2026 समाप्त होने वाला है। इससे पीडब्लूडी की मंथर गति को समझा जा सकता है।

तीन महीने का एक्सटेंशन

तरकश में पीसीसीएफ और हेड ऑफ फॉरेस्ट श्रीनिवास राव के एक्सटेंशन का जिक्र किया गया था। तरकश की खबर सही निकली। छह महीने की सेवा विस्तार की चकरी भारत सरकार में घूमी, मगर बात कुछ जम नहीं पाई। कहीं से एडवाइस आया है कि छह महीने ज्यादा है, तीन महीने की फाइल मूव किया जाए। श्रीनिवास राव को एक्सटेंशन मिल पाएगा या इंकार हो जाएगा, 10 मई से पहले इस पर क्लियरिटी आ जाएगी। हालांकि, एक्सटेंशन की फाइल पीएम तक जाती है, इसलिए सब कुछ इतना आसान नहीं है। श्रीनिवास राव को अगर एक्सटेंशन नहीं मिला तो फिर अरुण पाण्डेय की दावेदारी पक्की हो जाएगी। क्योंकि, ओपी यादव हेड ऑफ फॉरेस्ट बनने इच्छुक नहीं बताए जा रहे। वैसे अरुण और ओपी दोनों सरगुजिहा तो हैं ही पड़ोस में रहते हैं और रोज साथ बैठने वाले मित्र भी हैं। इसलिए, अरुण के पक्ष में ओपी शायद अपना इंटरेस्ट ना दिखाएं। अब अगर उनके माथे पर कुछ लिखा है तो बात अलग है...उसी तरह जैसे आईपीएस एएन उपध्याय के पास डीजीपी का पद चलकर आ गया था। वरना अरुण पाण्डेय के नाम पर मुहर लगेगी। वैसे भी मंत्रालय और फॉरेस्ट विभाग की पसंद अरुण पाण्डेय ही हैं मगर बीच में श्रीनिवास राव के विधायक भाई के सक्रिय होने से मामला पेचीदा हो गया है।

जीएडी का यू-टर्न

छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय की सरकार बनने के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने 2024 में एक आदेश निकाल कर्मचारियों, अधिकारियों को संघ के कार्यक्रमों में जाने के लिए फ्री कर दिया था। मगर इस हफ्ते एक ऐसा आदेश निकला कि संघ में बवाल मच गया। आदेश था...सरकारी कर्मचारी, अधिकारी किसी संगठन के सदस्य नहीं हो सकते। पता चला है...जीएडी के अधिकारियों ने बिना ब्रीफ किए हड़बड़ी में उपर से दस्तखत करा लिया। आदेश निकलने के बाद जब कोहराम मचा तो जीएडी के अफसरों को तलब किया गया। इसके बाद भी जीएडी के अफसर इस आदेश को वापिस लेने की बजाए उसमें संशोधन करने पर अड़े रहे। इसके बाद सीएम ने अपना तेवर दिखाया। बताते हैं, सीएम ने दो टूक कहा...कोई संशोधन नहीं, आदेश बदला जाए, फिर जाकर आदेश चेंज हुआ। वैसे, आदेश निकाल फिर बदलने से संदेश अच्छे नहीं जा रहे, सरकार के रणनीतिकारों को इसे संज्ञान लेना चाहिए।

अफसर पौने दो सौ, मेंबर सिर्फ एक

सिविल सर्विस डे पर राजधानी में अफसरों का एक बड़ा आयोजन हुआ। वर्तमान सीएस विकास शील के साथ इस मौके पर दो पूर्व मुख्य सचिव भी मौजूद थे। मंत्रालय के अफसरों के साथ कलेक्टर, कमिश्नर वीडियोकांफ्रेंसिंग पर कनेक्ट थे। इसमें पता चला कि आईआईपीए याने इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में छत्तीसगढ़ से वैसे तो 66 मेंबर हैं मगर सर्विंग आईएएस में से सिर्फ एक। वो हैं एसीएस मनोज पिंगुआ। जबकि, दीगर राज्यों में इसकी संख्या 75 परसेंट से उपर होती है। सिविल सर्विस के अफसरों को जानकारियों से अपडेट रहने के लिए भारत सरकार ने आजादी के तुरंत बाद आईआईपीए नाम से एक ऑटोनॉमस बांडी बनाई थी। उप राष्ट्रपति को इसका चेयरमैन बनाया गया और डीओपीटी मंत्री को व्हाइस चेयरमैन। डीओपीटी सिकेट्री इसके सीईओ होते हैं। इसके बाद छत्तीसगढ़ में ये हाल है। सीएस विकास शील से सभी से इसकी सदस्यता लेने का आग्रह किया है, तो देखना है कि अब कितने अफसर इससे जुड़ते हैं।

बीजेपी नेता, मछली और धर्म भ्रष्ट

पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान मछली खाने पर बीजेपी द्वारा पाबंदी लगाने का ऐसा दांव चला कि जो बीजेपी नेता सार्वजनिक तौर पर मांस-मछली नहीं खाते थे, वे भी कैमरे के सामने थाली से मछली का कांटा निकालते नजर आने लगे। मगर इस चक्कर में छत्तीसगढ़ में कुछ बीजेपी नेताओं के यहां बवाल मच गया। मालूम हुआ, एक नेताजी का परिवार शुद्ध शाकाहारी और धरम-करम वाला है। उनके घर वालों को व्हाट्सएप ग्रुप से मछली खाते फोटो हाथ लग गई। इसके बाद पत्नी ने बात करना बंद कर दिया है, तो पिता ने चमकाया, तूने धर्म भ्रष्ट कर दिया। अब पश्चिम बंगाल की बात अलग है। वहां बिना मछली खाए कोई शुभ काम संपन्न नहीं होते। मगर बाकी प्रदेशों में ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ से गए कुछ बीजेपी नेताओं ने इस स्तंभ के लेखक को बताया कि फोटो और सोहबत के चक्कर में कई नेताओं को अब मछली का स्वाद भाने लगा है।

हफ्ते का कोट...

’संबंध कभी भी बराबरी करने से नहीं पनपते...उन्हें बनाएं रखने के लिए किसी को बड़ा और किसी को छोटा होना पड़ता है’ और ’परिस्थितियां बदलना जब मुमकिन ना हो तो मनःस्थिति बदल लीजिए, सब कुछ अपने आप ही बदल जाएगा।’

अंत में दो सवाल आपसे?

1. छत्तीसगढ़ बिजली नियामक आयोग के चेयरमैन का पद किसके लिए रिक्त रखा गया है?

2. डीजी पवन देव को पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन में करीब सात साल हो गया है, वे वहीं से 2028 में रिटायर होंगे या उनका ट्रांसफर किया जाएगा?