रविवार, 30 मार्च 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: 2500 करोड़ वेतन और लालफीताशाही

 तरकश, 30 मार्च 2025

संजय के. दीक्षित

2500 करोड़ वेतन और लालफीताशाही 

छत्तीसगढ़ में कर्मचारियों, अधिकारियों के वेतन पर हर महीने खजाने का 25 सौ करोड़ रुपए खर्च बैठता है। सूबे में इस समय 3.84 लाख राज्य शासन के कर्मचारी, अधिकारी हैं, जिनमें 2.10 लाख शिक्षक हैं। 25 सौ करोड़ महीने के हिसाब से वेतन कैलकुलेट करें तो यह साल का 30 हजार करोड़ होता है। इसके बाद भी लालफीताशाही हॉवी है, तो इससे बड़ी विडंबना क्या होगी। सिस्टम को इस पर मंथन करना चाहिए कि राज्य स्थापना के 25 वर्ष पूरे करने के बाद भी छत्तीसगढ़ में वर्किंग कल्चर क्यों नहीं बन पाया। मध्यप्रदेश के समय राजधानी भोपाल बस्तर और सरगुजा से 900 किलोमीटर दूर था, फिर भी छत्तीसगढ़ के पटवारी, तहसीलदार और बाबू, अधिकारी उस समय निरंकुश नहीं हुए थे। स्कूल के मास्टर साहबों में इतनी स्वच्छंदता नहीं थी। बड़़े लोगों के बच्चे भी सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे। तब जिले के कलेक्टरों का रुतबा होता था। कलेक्टर जिस दिशा में निकल जाए, उस इलाके में हड़कंप मच जाता था...सरकारी ऑफिस के लोग अलर्ट हो जाते थे। हालांकि, वर्किंग कल्चर बनाने विष्णुदेव सरकार ने कोशिशें शुरू की है, मगर चीजें इतनी बिगड़ चुकी है कि सरकारी प्रयास नाकाफी प्रतीत हो रहा। इसके लिए एक मुहिम चलानी पड़ेगी। ई-ऑफिस और अफसरों की टाईम से उपस्थिति सिर्फ मंत्रालय तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। दूरदराज के गांवों के स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों में शिक्षकों और डॉक्टरों की मौजूदगी सुनिश्चित हो...टारगेट उस लेवल का रखना चाहिए। आखिर, महीने का 2500 करोड़ खर्च हो रहा वेतन पर।

ब्यूरोक्रेसी में बहादुर अली

करप्शन को लेकर देश में बदनाम हो रहे छत्तीसगढ़ कैडर से चिंतित आईएएस एसोसियेशन ने कुछ दिन पहले अफसरों की एक अहम बैठक बुलाई थी। शाम पांच बजे के बाद हुई इस बैठक को काफी गुप्त रखा गया। मीटिंग को होस्ट करते हुए अपर मुख्य सचिव मनोज पिंगुआ और ऋचा शर्मा ने चिंता जताई उसका लब्बोलुआब यह था कि इतना छोटा कैडर होने के बाद भी दो-दो आईएएस अधिकारी इस समय जेल में हैं, उसके बाद भी कई अफसर बहादुर अली बने हुए हैं। अफसरों से कहा गया कि वे देश के सबसे प्रतिष्ठित सर्विस में हैं, उन्हें इसके मान-सम्मान का खयाल रखना चाहिए। एसोसियेशन की चिंता सही है। ईडी की बड़ी कार्रवाइयों के बाद भी अफसरशाही के तौर-तरीकों में कोई बदलाव नहीं आया है। अब तो मसूरी के आईएएस एकेडमी में छत्तीसगढ़ कैडर की चर्चाएं हो रही हैं...2010 तक छत्तीसगढ़ कैडर मिलने पर अफसर नाक-भौं सिकोड़ते थे, अब प्रायरिटी देकर छत्तीसगढ़ आ रहे हैं। कारण आप समझ सकते हैं।

करप्शन को संरक्षण

छत्तीसगढ़ कैडर की बदनामी को लेकर आईएएस एसोसियेशन चिंतित जरूर है मगर कैडर को पथभ्रष्ट करने में उनके पूर्वजों का बड़ा हाथ है। राज्य बनने के बाद मध्यप्रदेश से छांट कर छत्तीसगढ़ को टिकाए गए अधिकांश पुराने अफसरों ने दोनों हाथ से लूटा ही, किसी अफसर का कोई मामला फंसा तो उनके लिए ढाल बनकर खड़े हो गए। राधाकृष्णन माध्यमिक शिक्षा मंडल के एकाउंट से आठ करोड़ निकाल आराम से रिटायर होकर घर चले गए। आईएएस केडीपी राव ने जीएडी को इसकी रिपोर्ट भेजी मगर आईएएस लॉबी ने डीई-डीई खेलकर आज तक कोई एक्शन नहीं होने दिया। तत्कालीन खेल सचिव एमएस मूर्ति ने क्रिकेट स्टेडियम बनाने में घोटाले के नए प्रतिमान स्थापित किए। रेणु पिल्ले की जांच में उन्हें दोषी ठहराया गया। मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई। सारे मुख्य सचिव गांधीजी के तीन बंदर की तरह इस पर आंख मूंदे रहे। एनटीपीसी के 500 करोड़ के मुआवजा प्रकरण में रायगढ़ के तत्कालीन कलेक्टर और एसपी ने दमदारी दिखाते हुए एसडीएम को सस्पेंड कराने के साथ एफआईआर दर्ज कराया था। कई महीने तक एसडीएम फरारी में रहे। कुछ दिनों पहले सिस्टम ने उन्हें क्लीन चिट दे दिया, वो भी तब जब उस समय के रायगढ़ के कलेक्टर, एसपी इस समय बेहद पावरफुल पोजिशन में हैं। अभनपुर के भारतमाला प्रोजेक्ट में 324 करोड़ के बंदरबांट मामले में जांच रिपोर्ट छह महीने पहले आ गई थी। अक्टूबर 2024 में राजस्व विभाग ने दो पटवारियों को सस्पेंड कर मामले को दबा दिया। मीडिया में जब यह मामला उछला तो फिर दो राप्रसे अधिकारियों को निलंबित किया गया। इसमें दो आईएएस की संलिप्तता सामने आ रही है कि, जिन्होंने दलालों के साथ मिलकर जमीन खरीदी और उसके टुकड़े कर करोड़ों रुपए का मुआवजा अंदर कर लिया...फिर भी सिस्टम आंख बंद किया हुआ है।

ब्यूरोक्रेसी की कड़वी सच्चाई

ये अच्छी बात है कि आईएएस एसोसियेशन कैडर की शुचिता को लेकर गंभीर हुआ है। उंच-नीच देखने पर सीएम सचिवालय के अफसर आजकल फोन खड़का अफसरों को टोक दे रहे हैं। मगर ब्यूरोक्रेसी की कड़वी सच्चाई यह है कि साफ-सुथरी छबि के जो 20-25 परसेंट अफसर हैं, अपनी लाइन तो सही रखते हैं मगर भ्रष्ट अफसरों को टोकने और क्रीटिसाइज करने की बजाए उनके बचाव में उतर आते हैं...इससे अपचारियों को बल मिल जाता है। ये छत्तीसगढ़ ही नहीं, कमोवेश पूरे देश की स्थिति है। कैडर के साथियों के प्रति अति-अनुराग का ही नतीजा है कि शायद ही कोई राज्य बचा होगा, जहां के एकाध आईएएस जेल में न हों। अच्छे अधिकारियों को इस पर विचार करना चाहिए। जिसके जींस में करप्शन का वायरस घुस गया है, उन्हें तो इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि कितने साथी उनके जेल में हैं। मगर कम-से-कम नए अफसरों को सही रास्ता दिखाया जा सकता है।

ऐसे भी आईएएस

ऐसा नहीं कि छत्तीसगढ़ की पूरी ब्यूरोक्रेसी दागदार हो गई है। छत्तीसगढ़ में कुछ ऐसे आईएएस भी हैं, जिनके पास अपना स्वाभिमान है और काम भी। एक जिला पंचायत की महिला आईएएस सीईओ पानी और फसल चक्र पर ऐसा काम कर रही कि उसका जवाब नहीं। उसी तरह एक छोटे जिले के कलेक्टर एक बड़े नगर निगम में कमिश्नर रहते ऐसे बड़े-बड़े काम कर डाले कि वहां के लोग आज भी याद करते हैं। पिछली सरकार में जब ब्यूरोक्रेसी के लोग काम करने का माहौल नहीं होने का रोना रो रहे थे, तब यंग आईएएस ने बड़े लोगों का कब्जा तोड़ 40 फुट नया रोड निकाल दिया। इसके लिए उन्होंने हाई कोर्ट जाने से भी गुरेज नहीं किया। अफसर ने कई गंदे तालाबों को रमणीक स्थल बना दिया...शहर को लाइट से ऐसा रौशन किया कि रायपुर भी उसके सामने फीका पड़ जाता है। इसी तरह एक प्रमोटी कलेक्टर का ग्राउंड पर इतना तगड़ा काम है कि सरकार उसे मॉडल के तौर पर पेश कर सकती है। सिस्टम को ऐसे अफसरों की लिस्टिंग करनी चाहिए कि कौन रीयल वर्कर है और कौन कागजी? जाहिर है, काम करने वाले अफसर एक हद से अधिक जी-हुजूरी करते नहीं। और कड़वा सत्य है कि सिस्टम को चाटुकारिता पसंद होता है। मामला यही पर गड़बड़ा जाता है। इससे नुकसान राज्य का होता है।

पूर्णकालिक डीजीपी

अशोक जुनेजा के रिटायर होने के बाद सरकार ने अरुणदेव गौतम को कार्यकारी डीजीपी बना दिया है। मगर पूर्णकालिक पुलिस प्रमुख के लिए पेनल फायनल नहीं हो रहा। यूपीएससी से बार-बार क्वेरी आ जा रही। पेनल में पवनदेव, अरुणदेव गौतम और हिमांशु गौतम के साथ अब जीपी सिंह का नाम भी जुड़ गया है। जीपी सीनियरिटी में तीसरे नंबर पर हैं। याने हिमांशु से उपर। बहरहाल, सरकार को क्वेरी क्लियर कराकर जल्द पेनल मंगवानी चाहिए। क्योंकि, पूर्णकालिक डीजीपी का एक कांफिडेंस अलग होता है। हालांकि, अशोक जुनेजा 11 महीने तक कार्यकारी डीजीपी रहे थे। सितंबर 2021 में डीएम अवस्थी को हटाकर उन्हें एक्टिंग डीजीपी बनाया गया था। उसके बाद सितंबर 2022 में उनका पूर्णकालिक का आदेश हुआ। बहरहाल, अरुणदेव गौतम के लिए राहत की बात यह है कि नक्सल मोर्चे पर कामयाबी बदस्तूर जारी है। उनकी फोर्स ने 30 नक्सलियों को ढेर कर दिया। मगर मैदानी इलाकों में स्थिति जस-की-तस बनी हुई है। रायपुर जहां पूरा सिस्टम बैठा है, वहां की हालत यह है कि इस हफ्ते एक महिला को इसलिए आत्महत्या करनी पड़ गई कि थाने में उसकी रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई। महिला की मौत होते ही रिपोर्ट दर्ज कर ली गई। रायपुर के एक थाने में इसी तरह की घटना और हुई। कहने का आशय यह है कि अरुणदेव को मेजर सर्जरी करनी होगी। सरकार को भी एसपी, आईजी की पोस्टिंग में उनकी राय को वेटेज देना होगा। वरना, छत्तीसगढ़ की पोलिसिंग शीर्षासन मुद्रा में बनी रहेगी।

पीएचक्यू में बदलाव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 30 मार्च को छत्तीसगढ़ दौरे के बाद पुलिस मुख्यालय में भी कुछ बदलाव हो सकता है। सूबे के सबसे सीनियर आईपीएस अधिकारी पवनदेव को हाउसिंग कारपोरेशन में सवा पांच साल हो गए हैं। इतना टाईम तो टीआई और डीएसपी भी एक जगह नहीं टिकते। ऑल इंडिया सर्विस के अधिकारियों के लिए तीन-चार साल का समय स्ट्रीम होता है। पांच साल से अधिक समय तक एक ही कुर्सी पर बैठने से उसकी मानसिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसे समझा जा सकता है। ऐसे में, लगता है सरकार पवनदेव को कोई और पोस्टिंग दे सकती है। जीपी सिंह को भी ज्वाईनिंग के बाद अभी कोई पोस्टिंग नहीं मिली। अरुणदेव गौतम को प्रदेश पुलिस का मुखिया बनाने के बाद उन्हें होमगार्ड, फायर ब्रिगेड समेत कई जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं किया गया है। एफएसएल और अभियोजन खाली पड़ा है। इससे ऐसा लगता है कि सरकार डीजीपी को अन्य दायित्वों से अलग करते हुए उन्हें पोलिसिंग पर फोकस करने का मौका देगी। वैसे, कोई डीजीपी चाहता भी नहीं कि पुलिस का सुप्रीमो बनने के बाद कोई और चार्ज उसके पास रहे। ये तो ऐसा ही हुआ कि चीफ सिकरेट्री बना दिया और साथ में एक विभाग भी थमा दिया जाए। एएन उपध्याय के साथ भी ऐसा ही हुआ था। डीजी बनाने के बाद भी उनके पास काफी समय तक प्रशासन विभाग की जिम्मेदारी रही।

कलेक्टर, एसपी ट्रांसफर पर ब्रेक?

प्रधानमंत्री के दौरे के बाद सरकार तुरंत लोक सुराज अभियान का ऐलान करेगी। हो सकता है, नवरात्रि में ही इसकी घोषणा हो जाए। सचिवालय में इसकी युद्ध स्तर पर तैयारी की जा रही है। ऐसे में, कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों का ट्रांसफर लोक सुराज से पहले होगा या बाद में, सीन क्लीयर नहीं हो रहा है। वैसे, ट्रांसफर पर डिसिजन करना सीएम और उनके सचिवालय का काम है। मगर इसमें महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि ट्रांसफर की लटकी तलवार के चलते कई जिलों के कलेक्टर, एसपी काम करना लगभग बंद कर दिए हैं...उन जिलों में सिर्फ रुटीन के काम निबटाए जा रहे हैं। जाहिर है, जिन कलेक्टर्स, एसपी पर खतरे मंडरा रहे हैं, उनका काम में मन कैसे लगेगा? वे जब तक रहेंगे, सिर्फ खानापूर्ति ही होगा। सो, ट्रांसफर जितना लंबा खींचेगा, सिस्टम का उतना नुकसान होगा।

अंत में दो सवाल आपसे

1. डीजीपी अरुणदेव गौतम के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती पोलिसिंग है या कुछ और?

2. सीएस अमिताभ जैन और रिटायर डीजीपी अशोक जुनेजा में से कोई मुख्य सूचना आयुक्त बनेगा या किसी तीसरे की इंट्री होगी?

रविवार, 23 मार्च 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: महिला IAS, तीखे तेवर...

 तरकश, 23 मार्च 2025

संजय के. दीक्षित

महिला IAS, तीखे तेवर

आबकारी सचिव आर. शंगीता की हाई प्रोफाइल मीटिंग की ब्यूरोक्रेसी में बड़ी चर्चा है। नई आबकारी पॉलिसी में शराब दुकानों की संख्या बढ़ाने से लेकर उससे जुड़े तमाम पहलुओं पर आबकारी सचिव ने 19 मार्च को कलेक्टर, एसपी, आईजी, कमिश्नर्स की वीडियोकांफ्रेंसिंग कर क्लास ली। संगीता कुछ पुलिस अधीक्षकों से इसलिए खफा थीं कि होली के दिन शराब दुकान वाले सुरक्षा के मद्देनजर थानों में पैसा रखवाने गए तो थानेदारों ने इंकार कर दिया। कुछ जिलों में आबकारी विभाग के मुलाजिमों के साथ दुर्व्यव्हार हुआ, तो कुछ जगहों पर कार्रवाई के नाम पर पुलिस वाले आबकारी अधिकारियों से भिड़ गए...इस पर तीन-चार एसपी साहबों की खिंचाई हुई। मसला यह भी आया कि शराब दुकानों के बाहर पुलिस वाले ताक में बैठे रहते हैं, थोड़ी-सी मात्रा अधिक हुई नहीं कि लोगों को पकड लें।

आबकारी सचिव ने कलेक्टरों से भी खरी-खरी अंदाज में ही बात की। बिलासपुर और बस्तर कलेक्टरों की जरूर तारीफ हुई कि उनके जिलों में शराब दुकानें काफी व्यवस्थित और साफ-सुथरी हैं। बहरहाल, महिला ब्यूरोक्रेट्स में सख्त एडमिनिस्ट्रेशन के लिए अभी तक रेणु पिल्ले और ऋचा शर्मा जानी जाती थीं। आर. शंगीता के प्रशासनिक तेवर देख कलेक्टर, एसपी हैरान थे। अफसरों को झेंप कुछ इसलिए भी आई कि वीडियोकांफ्रेंसिंग में जिला आबकारी अधिकारी भी कनेक्ट थे। और उनके सामने सारा कुछ हुआ...डेढ़ घंटे की मीटिंग के बाद एसी में बैठे कलेक्टर, एसपी, आईजी, कमिश्नर पसीना पोंछ रहे थे। ठीक भी है, छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक हलकों में जिस तरह लचरता आ गई है, सख्ती की जरूरत तो है। मगर इसके साथ कुछ उठते सवाल भी हैं....

प्रोटोकॉल का सवाल

आबकारी सचिव की वीडियोकांफ्रेंसिंग के बाद सवाल उठ रहा कि क्या मंत्रालय का कोई सचिव कलेक्टर, एसपी के साथ ही आईजी और कमिश्नरों की मीटिंग ले सकता है? दरअसल, छत्तीसगढ़ के अस्तित्व में आने के बाद 25 साल में ऐसा कभी हुआ नहीं। किसी प्रमुख सचिव या अपर मुख्य सचिव को भी ऐसी बैठकें लेते देखा नहीं। हो सकता है कि ब्यूरोक्रेसी के प्रोटोकॉल की हमारी समझ थोड़ी कम हो। मुझे अभी तक ये ही पता था कि कलेक्टर, एसपी के साथ आईजी, कमिश्नरों की बैठक या तो मुख्यमंत्री लेते हैं या फिर चीफ सिकरेट्री। सीएम सचिवालय के शीर्ष अफसर भी ऐसी बैठक ले तो कोई हर्ज नहीं, क्योंकि सीएम सचिवालय को सीएम का हिस्सा समझा जाता है। ऐसे में, एक प्रसंग याद आता है। पिछली सरकार में 2022 की बात रही होगी। डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने कलेक्टरों की मीटिंग लेनी चाही। ग्रामीण और पंचायत सचिव गौरव द्विवेदी ने सभी कलेक्टरों को सूचना भेज दी। मगर बाद में प्रोटोकॉल के नाम पर बैठक को रद्द कर दिया गया। खैर, सचिव कमिश्नर, आईजी की बैठक ले सकता है या नहीं, यह देखना सिस्टम का काम है।

कांग्रेस का नया पायलट

चर्चा है, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी को जल्द ही नया प्रदेश प्रभारी मिल सकता है। सचिन पायलट को राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाए जाने की खबर है। उन्हें वहां अगर पीसीसी की कमान सौंप दी गई तो फिर पार्टी छत्तीसगढ में नए प्रभारी बनाकर भेजेगी। वैसे भी सचिन बेमन से ही प्रभारी थे। नगरीय निकाय चुनाव के दौरान एक बार भी वे छत्तीसगढ़ नहीं आए। सत्ता में होने के बाद भी बीजेपी के प्रदेश प्रभारी नीतीन नबीन महीने में छत्तीसगढ़ का दो चक्कर लगा जाते हैं। सचिन पायलट 25 जनवरी को महापौर प्रत्याशियों की टिकिट फायनल करने वाली मीटिंग में हिस्सा लेने रायपुर आए थे, उसके बाद पूरा चुनाव निबट गया, पायलट का कोई पता नहीं था। दो महीने बाद सीधे 19 मार्च को वे रायपुर आए। और कहीं वे राजस्थान पीसीसी के अध्यक्ष बन गए तो फिर उनका यह आखिरी दौरा ही होगा। याने छत्तीसगढ़ कांग्रेस को नया पायलट मिलेगा।

5 नामों का पेनल!

एक से बढ़कर एक दावेदारों के चलते छत्तीसगढ़ में मुख्य सूचना आयुक्त का सलेक्शन काफी हाई प्रोफाइल हो गया है। 26 मार्च को एसीएस मनोज पिंगुआ की अध्यक्षता वाली पांच आईएएस अधिकारियों की कमेटी के समक्ष 33 दावेदारों का इंटरव्यू होगा। कमेटी सभी का साक्षात्कार लेकर एक पेनल बनाएगी। हालांकि, अभी ये फायनल नहीं हुआ है कि पेनल तीन का होगा या पांच का। सूत्रों का कहना है कि कमेटी किसी तरह के विवाद से बचने कोशिश करेगी कि ज्यादा नामों का ही पेनल बनाए। ऐसे में, पांच की संभावना अधिक है। इंटरव्यू के बाद सर्च कमेटी पेनल बनाकर सामान्य प्रशासन विभाग को सौंप देगी। पेनल तैयार होने के बाद सलेक्शन कमेटी की बैठक के लिए नियमानुसार 15 दिन का समय रखा जाना चाहिए। याने 26 मार्च को इंटरव्यू लेने के बाद अगर 27 को पेनल जीएडी में जाएगा तो 11 अप्रैल से पहले सलेक्शन कमेटी की बैठक नहीं होगी। मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और सीनियर मंत्री की तीन सदस्यीय कमेटी पेनल में से किसी एक नाम पर टिक लगाएगी। याने सब कुछ ठीक रहा तो 25 अप्रैल से पहले सीआईसी की नियुक्ति हो जाएगी।

चीफ सिकरेट्री पर सस्पेंस

बड़े-बड़े लोग सीआईसी के लिए अप्लाई किए हैं, सिर्फ इसलिए लोगों की इसमें उत्सुकता नहीं है। दरअसल, मुख्य सूचना आयुक्त के साथ मुख्य सचिव की नियुक्ति जुड़ी हुई है। मुख्य सचिव अमिताभ जैन अगर सीआईसी बन गए तो छत्तीसगढ़ का अगला चीफ सिकरेट्री कौन होगा, ये सवाल बड़ा है। इस समय नए सीएस के लिए पांच दावेदार हैं। सीनियरिटी की बात करें तो अमिताभ के बाद 91 बैच की आईएएस रेणु पिल्ले हैं। उनके बाद फिर 92 बैच में सुब्रत साहू। 93 बैच के अमित अग्रवाल सेंट्रल डेपुटेशन पर हैं। 94 बैच में मनोज पिंगुआ और ऋचा शर्मा हैं। ये तय है कि इन पांच में से ही कोई एक छत्तीसगढ़ का नया प्रशासनिक मुखिया बनेगा। मगर वह एक कौन? इस बारे में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ही बता सकते हैं या फिर उनके प्रमुख सचिव सुबोध सिंह। दरअसल, सीएस, डीजीपी और पीसीसीएफ की नियुक्ति मुख्यमंत्री पर निर्भर करता है। विष्णुदेव केंद्र के शीर्ष नेताओ के विश्वासप्राप्त भी हैं, सो यहां यूपी, एमपी जैसा कोई सरप्राइजिंग होगा नहीं।

मनोज पिंगुआ का औरा

चीफ सिकरेट्री बनने की अर्हता रखने करने वाले पांच आईएएस अफसरों में से एक नाम एसीएस मनोज पिंगुआ का भी है। वे चीफ सिकरेट्री बनेंगे या नहीं, ये वक्त बताएगा। वैसे भी चीफ सिकरेट्री वही बनता है, जिसके माथे पर लिखा होता है। मगर ये अवश्य है कि सरकार ने सीआईसी सर्च कमेटी का चेयरमैन बनाकर मनोज पिंगुआ की हैसियत बढ़ा दी है। सिर्फ इससे समझा जाइये कि वे बड़े-बड़े लोगों का इंटरव्यू लेने वाले हैं।

घर में भी सीनियर, बैच में भी

ये जनरल परसेप्शन है कि घरों में महिलाओं की ज्यादा चलती है। पतियों के पास कोई चारा नहीं होता। बहरहाल, छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी में दो जोड़े ऐसे हैं, जो आईएएस के बैच में भी अपने पतियों से सीनियर हैं। 94 बैच की निधि छिब्बर इस बैच में अपने पति विकास शील गुप्ता से उपर हैं। इसी तरह हाल ही में एसीएस प्रमोट हुईं डॉ0 मनिंदर कौर द्विवेदी 95 बैच में अपने हसबैंड गौरव द्विवेदी से सीनियर हैं। ये दोनों आईएएस दंपती एसीएस हैं। और संयोग से चारों इस समय सेंट्रल डुपेटेशन पर हैं। अगर कभी मुख्य सचिव बनने की बारी आई तो सीनियरिटी में इन दोनों महिला अफसरों का नाम उपर होगा। और उनके पतियों को मंत्रालय से बाहर जाना होगा। क्योंकि, सेम बैच का अगर कोई चीफ सिकरेट्री बनता है तो परिपाटी के अनुसार उसके बैच के अफसरों को मंत्रालय से बाहर सीएस के समकक्ष कोई पोस्टिंग दी जाती है।

एम्स की प्रतिष्ठा

एम्स देश का एक बेहद प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान हैं। इस पर लोगों का इतना भरोसा है कि हर आदमी चाहता है कि उसके बीमार परिजन को एम्स में दाखिला मिल जाए। रायपुर एम्स भी कुछ इसी तरह का था। मगर इस समय जो सुनने में आ रहा, उससे थोड़ी हैरानी होती है। रायपुर से एक व्यक्ति हार्निया का ऑपरेशन कराने 5 सितंबर 2024 को एम्स पहुंचा तो उसे दिसंबर 2025 का टेंटेटिव डेट दिया गया। याने 16 महीने आगे का डेट। रायपुर सांसद की चिठ्ठी-पत्तरी भी इसमें कोई काम नहीं आई। एम्स में इलाज के इश्यू को रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने भी लोकसभा में उठाया है। आईएमए रायपुर के प्रेसिडेंट डॉ कुलदीप सोलंकी ने इसको लेकर एम्स प्रबंधन के खिलाफ अहम बयान दिया है. एम्स रायपुर को इसे नोटिस में लेनी चाहिए, ताकि देश की शीर्ष चिकित्सा संस्था पर लोगों का विश्वास कायम रहे।

200 करोड़ के मोड का खेला!

सीजीएमएससी ने चार मेडिकल कॉलेजों को क्लब कर घोटाले का टेंंडर निकाला था, हेल्थ सिकरेट्री अमित कटारिया की सख्ती के बाद उसे रद्द कर दिया गया है। मगर कंसलटेंट मोड के नाम पर 200 करोड़ का खेला की फाइल अभी चल रही है। ईपीसी मोड में चारों कॉलेजों को बनाने में 50 करोड़ के हिसाब से 200 करोड़ ज्यादा बैठ रहा है। याने ढाई सौ करोड़ के कालेज में डिजाइन और कंसलटेंसी के नाम पर 50 करोड़ एक्सट्रा दिया जाएगा। इस पर राजेश मूणत ने विधानसभा में सवाल किया कि तीन मेडिकल कालेज बनवाए जा रहे, वो किस मोड में है तो लिखित जवाब आया, पीएमसी मोड याने प्रोजेक्ट मैनेजमेंट एंड कंसलटेंसी। ईपीसी याने इंजीनियरिंग प्रोक्योरमेंट एंड कंट्रक्शन मोड में एक कॉलेज के पीछे 50 करोड़ रुपए बढ़ा देने का मतलब सीजीएमएससी वाले ही समझा सकते हैं। हेल्थ के जिम्मेदारों को 200 करोड़ के इस खेल का समझना चाहिए कि जब तीन कॉलेज पीएमसी मोड में बन रहे तो फिर ईपीसी की जरूरत क्यों पड़ी।

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस मंत्री ने अपनी भांजी के नाम पर बिल्हा के पास 70 एकड़ जमीन ख़रीदा है?

2. किस जिले में कल एक विशिष्ट व्यक्ति के दौरे में पत्ता गोभी की सब्जी बनने पर अफसरों ने बवाल काट दिया?

Chhattisgarh Tarkash 2025: नाम की लाल बत्ती!

 तरकश, 16 मार्च 2025

संजय के. दीक्षित

नाम की लाल बत्ती!

विधानसभा के बजट सत्र के बाद निश्चित तौर पर बोर्ड और निगमों में अब नियुक्तियों होंगी. लोकसभा, नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव का ब्रेकर भी अब नहीं रहा. लिहाजा, बीजेपी के भीतर जोर आजमाइश तेज़ हो गई है. मगर ये भी सही है कि लाल बत्ती को लेकर नेता लोग जितना उत्सुकता और उतावलापन दिखाते हैं, बाद में यह भ्रम साबित होता है. ब्रेवरेज कारपोरेशन, सीएसआईडीसी, माइनिंग कारपोरेशन, टूरिज्म बोर्ड जैसे तीन-चार में अफसरों के रहमों-करम से थोड़ा-बहुत मिल भी जाता है. बाकी में गाड़ी और पेट्रोल के अलावा मिलता है सिर्फ पदनाम, जो गाड़ियों पर मोटे अक्षरों में लिखवाने का काम आता है. दरअसल, बोर्ड, निगमों के चेयरमैन को लेकर बड़ी भ्रान्ति है. सच्चाई यह है कि पावर पूरा प्रशासनिक अधिकारियों यानी एमडी के पास होता है.

साल में एकाध बार बोर्ड की मीटिंग होती है. उसमें चेयरमैन लोग चाय नाश्ता क़े साथ रुतबा झाड़ लें. टेंडर, सप्लाई से लेकर पेमेंट में चेयरमैन का कोई रोल नहीं होता. रमन सरकार की तीसरी पारी में अभनपुर के एक नेताजी को वेयर हाउस का चेयरमैन बनाया गया था. उन्होंने पदभार ग्रहण करते ही फूँ-फाँ करने की कोशिश की. मगर अंजाम ये हुआ कि किसी मसले पर नाराज होकर ऐन बोर्ड की मीटिंग से पहले चले गए बाहर...देखते हैं कैसे बैठक होती है. मगर MD ने उनकी गैर मौजूदगी में बोर्ड की मीटिंग करा सभी प्रस्ताव पास करा लिया. उसके बाद नेताजी क़े पास भूनभुनाने के अलावा कोई चारा नहीं था. क्योंकि, अफसरों ने बोर्ड, निगमो के संविधान में सबका रास्ता निकाल रखा है. अलबत्ता, ये जरूर है कि सरकार से तगड़ा संरक्षण है और खुद का गॉड्स तो फिर कोई बात नहीं. आखिर, अपवाद तो होता ही है.

इन कारपोरेशनों पर निगाहेँ

पिछली कांग्रेस सरकार ने सीएसआईडीसी और छत्तीसगढ़ ब्रेवरेज कारपोरेशन में नियुक्ति नहीं की. दोनों सबसे अधिक मलाईदार निगम माने जाते हैं. इसलिए किसी पोलिटिकल व्यक्ति की इसमें एंट्री नहीं दी गई. अब देखना है, विष्णुदेव सरकार का इन दोनों निगमों के प्रति क़्या स्टैंड रहता है. वैसे अगर ब्रेवरेज कारपोरेशन में नियुक्ति हुई तो चेयरमैन के लिए प्रबल प्रताप सिंह जूदेव की संभावना अत्यधिक है. उनके भाई युद्धवीर सिंह जूदेव रमन सिंह की दूसरी पारी में इस कारपोरेशन के चेयरमैन रह चुके हैं. तीसरी पारी में भी उन्हें इस निगम की कमान सौंपी गई थी, मगर वे मंत्री बनना चाहते थे, इसलिए पद नहीं संभाला. ऐसे में पांच वर्ष तक ब्रेवरेज कारपोरेशन चेयरमैन का पद खाली रह गया. इसके बाद कांग्रेस सरकार ने भी खाली ही रखा. कांग्रेस प्रवक्ता आरपी सिंह का नाम इस पद बहुप्रचारित हुआ मगर ताज उनके सिर सज नहीं सका. बहरहाल, प्रबल प्रताप को ब्रेवरेज के कामों की समझ है, सो उनकी नियुक्ति का अंदेशा जानकार लोग व्यक्त कर रहे हैं.

आईएएस पर ऐसा बोझ

आईएएस महादेव कावडे इस समय रायपुर और बिलासपुर के डिवीजनल कमिश्नर हैं. रायपुर, बिलासपुर बोले तो आधे से अधिक छत्तीसगढ़. इसके साथ पंडित सुंदर लाल शर्मा स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी और कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वाविद्यालय के कुलपति का भी प्रभार. महादेव कावडे को सिस्टम काबिल मान रहा है तो हम भी उनकी काबिलियत पर कोई संदेह खड़ा नहीं कर रहे हैं. किन्तु वे भी बेचारे आदमी हैं. सिस्टम को उनके साथ थोड़ी सहानुभूति बरतनी चाहिए. ऐसा भी नहीं कि छत्तीसगढ़ में आईएएस अफसरों की कमी पड़ गई है. इस समय सचिव स्तर पर 50 से अधिक आईएएस अधिकारी हैं. फिर भी, आश्चर्यजनक है...पिछली सरकार से कमिश्नर को डबल, ट्रिपल चार्ज देने की परिपाटी शुरू हुई, वो रुक नहीं पा रही. पिछली सरकार में संजय अलंग पहले बिलासपुर और सरगुजा संभाग के कमिश्नर रहे, फिर रायपुर और बिलासपुर के. अलंग इस सरकार में भी इसी पोर्टफोलियो के साथ कंटिन्यू किए. सरकार सुशासन पर तेज गति से काम कर रही है. सुधार के कई उल्लेखनीय काम हो रहे हैं. मगर यह भी सही है कि एक अफसर को आधे छत्तीसगढ़ का प्रभार देने से सुशासन के अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे।

कलेक्टर बड़े या सरकार?

अविभाजित मध्य प्रदेश के समय छत्तीसगढ़ में एक से बढ़कर एक कमिश्नर रहे मगर छत्तीसगढ़ राज्य बनने केबाद कलेक्टर नहीं चाहते कि कोई डायरेक्ट आईएएस अधिकारी कमिश्नर बने. यही वजह है कि पिछले डेढ़ दो दशक में केडीपी राव, सोनमणी बोरा, यशवंत कुमार जैसे चार से अधिक डायरेक्ट आईएएस अफसर कमिश्नर नहीं बन पाए. ब्यूरोक्रेसी के लोगों भी मानते हैं कि कलेक्टर नहीं चाहते कि प्रशासन में कोई पैरेलेल पॉजिशन खड़ा हो जाए. वैसे कमिश्नरों को पावर देने से चीजें ठीक होंगी. सरकार में बैठे शीर्ष अफसरों को इस पर विचार करना चाहिए.

कलेक्टर्स और डिरेल्ड एसपी

छत्तीसगढ़ में इस समय राजधानी रायपुर, न्यायधानी बिलासपुर, वीवीआईपी डिस्ट्रिक्ट जशपुर के साथ ही सूबे का सबसे कठिन जिला बलौदा बाजार को प्रमोटी आईपीएस अधिकारी संभाल रहे हैं. रायपुर में लाल उमेद सिंह, बिलासपुर में रजनेश सिंह, जशपुर में शशिमोहन सिंह और बलौदा बाजार में विजय अग्रवाल पुलिस कप्तान हैं. सबसे अहम यह है कि इन चारों की नियुक्ति में कोई सियासत नहीं...चारों पुलिस मुख्यालय के टेस्टेड अफसर हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि डायरेक्ट आईपीएस क्यों पिछड़ रहे हैं. जवाब मिलेगा, आईपीएस की कमजोर ट्रेनिंग और दूसरा कलेक्टरों से कॉम्पीटिशन. ट्रेनिंग की कमजोरी से फील्ड में वे फेल हो जा रहे हैं. और कलेक्टरों से प्रतिस्पर्धा में डिरेल्ड. कलेक्टर जिले के मुखिया होते हैं. 35 विभाग उनके अंदर होते हैं. फिर करोड़ों के DMF के मालिक. DMF में काम भी खुद देते हैं और चेक भी. जाहिर हैं, कलेक्टरों के लाइफस्टाइल ऊँचा रहेगा ही. SP के पास सिर्फ एक विभाग होता हैं... पुलिस. ऐसे में होता यह हैं कि कलेक्टर अगर बंगले में 10 लाख का जयपुरी पर्दा लगवा लिया तो एसपी की पत्नियों को भी वही चाहिए. कलेक्टर अगर सरकारी घर को व्हाइट हाउस बनवा लिया तो एसपी को चाहिए पिंक हॉउस. इसके लिए भले ही अवैध शराब, सट्टा और काबाडियों की मदद लेनी पड़ जाए. इस चक्कर में 90 परसेंट एसपी साहब लोग जात भी गवां रहे और धर्म भी. PHQ में इधर-उधर फिकायें डायरेक्ट आईपीएस में कई काबिल अफसर रहे हैं, लेकिन कलेक्टरों के लाइफ स्टाइल के कॉम्पीटिशन में मारे गए. DGP अरुण देव गौतम को डायरेक्ट आईपीएस के लिए अलग से वर्कशॉप आयोजित करनी चाहिए. उन्हें बताएं भी कि कॉम्पीटिशन न करें, दो-दो आईएएस इस समय जेल में हैं.

पीएम और प्रेसिडेंट

किसी भी राज्य में आमतौर से ऐसा नहीं होता कि हफ्ते भर के भीतर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का विजिट हो जाए. मगर छत्तीसगढ़ में बड़ा संयोग बन रहा...24 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आ रहीं तो 30 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. राष्ट्रपति विधानसभा के रजत जयंती समारोह की मुख्य अभ्यागत होंगी तो पीएम मोदी बिलासपुर में दो पावर प्लांट की आधारशीला रखने के साथ पब्लिक मीटिंग को सम्बोधित करेंगे. मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने पिछले दिल्ली दौरे में प्रधानमंत्री को छत्तीसगढ़ आने का न्योता दिया था और वह स्वीकार हो गया. जाहिर है, हफ्ते भर में देश की दो शीर्ष हस्तियों क़े दौरे से छत्तीसगढ़ की तगड़ी ब्रांडिंग होगी.

करप्शन का इनोवेशन

लहरों को गिनकर पैसा कमाने वाली एक बड़ी पुरानी कहावत छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी पर फिट बैठती है. वो इस तरह कि सरकारी प्रेस की पोस्टिंग सबसे सुखाग्रस्त समझा जाता था. लिहाजा, सबसे कमजोर आईएएस अफसर को भी इसे एडिशनल तौर पर सौंपा जाता था. मगर एक प्रमोटी आईएएस अधिकारी ने सरकार प्रेस की पोस्टिंग को भी साल में पांच खोखा का बना दिया. आपको बता दें, सरकारी प्रेस में गजट, डायरी, कैलेंडर छपती है. मगर इस आईएएस ने इनोवेशन करते हुए दूसरी चीजों की छपाई शुरू कर दी. कमाल तो ये किया कि 2020-21 में टेंडर कर उन्हीं प्रिंटर्स से करोड़ों की छपाई करते रहे. 50 परसेंट कमीशन वाला यह काम इसलिए माना जाता है कि सरकारी प्रेस में कोई देखने वाला सिस्टम नहीं कि कितना और कैसा छपा. 25 परसेंट सरकारी प्रेस के अफसरों को और 25 परसेंट सम्बंधित विभाग क़े अधिकारियों को देने के बाद भी प्रिंटर मालामाल, तो आप समझा सकते हैं कि आईएएस ऑफिसर का इनोवेशन कितना दमदार है. सेक्रेटरी टू सीएम मुकेश बंसल ने इस पर ब्रेक लगा दिया. वरना ये खेल चलता रहता.

अंत में दो सवाल आपसे

1. मंत्री अगर विधानसभा में बार-बार घिर रहे हैं तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

2. एक पुलिस रेंज के आईजी-एसपी क़े बीच तनातनी को सिस्टम रोक क्यों नहीं पा

शनिवार, 8 मार्च 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: सड़क पर अफसर, बंगले में मंत्री

 तरकश, 9 मार्च 2025

संजय के. दीक्षित

सड़क पर अफसर, बंगले में मंत्री

पिछली कांग्रेस सरकार में चीफ सेक्रेटरी का इयरमार्क बंगला एक मंत्री को दिया गया तो ब्यूरोक्रेसी स्तब्ध रह गई थी. चीफ सेक्रेटरी सिर्फ प्रशासनिक मुखिया नहीं नौकरशाही का गुरुर होता है, उसका आवास छीन जाने पर ब्यूरोक्रेसी पर क़्या गुजरी, उसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. इसी तरह का एक वाक्या रायपुर से सटे जिले में हुआ है. मंत्री जी के लिए जिला पंचायत के सीईओ को बंगले से रुख़सत होना पड़ गया. चीफ सेक्रेटरी एपिसोड में राहत की बात ये थी कि अजय सिंह पद से हट चुके थे. इसी बीच बंगले का बोर्ड बदल दिया गया. यह मामला ज्यादा संजीदा है. जिला पंचायत सीईओ हाल ही में ट्रांसफर होकर आए थे. सरकारी बंगले में जैसे ही सामान जमाकर उसका सुख लेते, तब तक बेदखली का फरमान आ गया. दूसरा कोई कलेक्टर होता तो अपने सीईओ के सम्मान के लिए कुछ प्रयास करता, मगर उन्होंने तगादा कर और जल्दी मकान खाली करा दिया. ऐसे में सीईओ बेचारे क़्या करते. गृहस्थी का सामान क्लब में रखवा सर्किट हाउस में शरण लिए हैं.

सस्पेंशन...सजा या मजा

सरकारी मुलाजिमों के कदाचरण के केस में सस्पेंशन उस दौर में कार्रवाई मानी जाती थी, जिस समय सामाजिक प्रतिष्ठा नाम की कोई चीज होती थी। अब तो सस्पेंशन में अधिकारियों, कर्मचारियों को आधा वेतन मिल जाता है और जो पैसे कमाए हैं, उसे ठिकाने लगाने के लिए समय भी।

छत्तीसगढ़ में पिछले 24 साल से यही देखने में आ रहा...किसी बड़े स्कैम में अगर कोई अफसर 25-50 करोड़ कमा लिया तो इसमें से दो करोड़ खर्च करके रिस्टेट हो जाएगा और फिर अच्छी पोस्टिंग भी मिल जाएगी। राज्य प्रशासनिक सेवा का अफसर अगर सस्पेंड हुआ तो आगे चलकर आईएएस भी बन जाता है।

अभनपुर के चर्चित भारतमाला परियोजना मुआवजा स्कैम में सस्पेंड हुए एसडीएम जोर-जुगाड़ लगाकर जगदलपुर जैसे नगर निगम कमिश्नर की पोस्टिंग पा गए थे। आगे चलकर वे आईएएस भी बन जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं। रायगढ़ के एनटीपीसी के लारा मुआजवा स्कैम में तत्कालीन एसडीएम सस्पेंड हुए, फरारी काट कर आए। बाद में उन्हें क्लीन चिट मिल गया। अब वे आईएएस भी बन जाएंगे। क्योंकि, उसी क्लीन चिट के आधार पर यूपीएससी ने उनका आईएएस अवार्ड रोका नहीं, बल्कि उनकी सीट रिजर्व रख दिया है।

बहरहाल, ये स्थिति पूरे देश की अफसरशाही की है। करप्शन उजागर होता है, मीडिया में खबरें छपती है...अच्छी सेटिंग नहीं तो अफसर सस्पेंड होता है। उसके बाद बहाल होकर फिर वही काम। छत्तीसगढ़ में कौवा मारकर टांगने का मुहावरा भी फेल हो गया है। दो आईएएस समेत दर्जन भर अफसर इस समय जेल में हैं, उसके बाद कौन सा करप्शन रुक गया। सरकार में बैठे लोगों को अब कुछ नया सोचना पड़ेगा.

राडार पर मंत्रियों के पीएस

10 में से करीब आधे मंत्रियों के यहां ई-ऑफिस पर काम होने लगा है। याने नोटशीट से लेकर आदेश अब ऑनलाईन हो गए हैं। मगर अभी भी कुछ मंत्री इसमें दिलचस्पी नहीं दिखा रहे। कुछ मंत्रियों के पीए नहीं चाहते कि सिस्टम ऑनलाइन हो। इसमें सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि ई-ऑफिस के बाद मंत्रियों के यहां फाइलें रोकी नहीं जा सकेंगी।

इस समय सबसे तेज काम सीएम सचिवालय में हो रहा है। सीएम के यहां फाइलें इतनी फास्ट हो रहीं कि एक से डेढ़ दिन में उसे डिस्पोज कर दिया जा रहा। पीएस टू सीएम सुबोध सिंह खुद देख रहे हैं कि फाइलों में अनावश्यक विलंब न हो। मगर कई मंत्रियों के यहां अभी भी फाइलें डंप हो रही हैं। मंत्रियों के पीए की कारस्तानियां सीएम सचिवालय की नोटिस में है। पता चला है, विधानसभा सत्र के बाद इस पर कार्रवाई होगी। पहले मंत्रियों की नोटिस में इसे लाया जाएगा। यदि इसमें सुधार नहीं हुआ तो जीएडी उनकी छुट्टी करेगा। जाहिर है, शिकायत मिलने पर सरकार इससे पहले दो मंत्रियों के पीएस को हटा चुकी है।

मंत्रियों का प्रदर्शन

पिछले हफ्ते तरकश में एक सवाल था...10 में से आठ मंत्री सरकार के लिए लायबिलिटी हो गए हैं। खैर इस पर चर्चा कभी बाद में। अभी हम विधानसभा में मंत्रियों के प्रदर्शन की बात कर रहे हैं। सदन में जो हाल भूपेश बघेल के मंत्रियों का था, वही हाल विष्णुदेव मंत्रिमंडल का है। खासकर, तीन मंत्रियों का परफार्मेंस इतना खराब है कि प्रश्नकाल में उनकी निरीह हालत देखकर दया आ जाएगी। तीनों हर सवाल में घिरते हैं। इस सत्र में मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल का प्रदर्शन काफी सुधरा है। उनका हेल्थ विभाग जैसा भी हो मगर सदन में कंफिडेंस के साथ जवाब देने में वे निपुण हो गए हैं।

यही वजह है कि मुख्यमंत्री से लेकर कई मंत्रियांं की गैर मौजूदगी में श्यामबिहारी को प्रश्नकाल में जवाब देने का दायित्व सौंपा जा रहा है। 7 मार्च के प्रश्नकाल पर सबकी नजर थी। सवाल सबसे चर्चित स्कैम सीजीएमएससी के रीएजेंट खरीदी से जुड़ा था। इस पर वे अजय चंद्राकर जैसे विधानसभा के सबसे फास्ट बॉलर को झेल गए।

विपक्ष के विधायकों की बात करें तो बजट सत्र में उमेश पटेल का आश्चर्यजनक ढंग से प्रादुर्भाव हुआ है। उमेश बिना उत्तेजित या धैर्य खोते हुए टू द प्वाइंट प्रश्न पूछ रहे हैं, बल्कि दूसरे के प्रश्नों में पूरक प्रश्न भी कर रहे। बुजुर्ग महिलाओं को महतारी वंदन में 500 रुपए काटकर भुगतान करने का उन्होने प्रश्न उठाया और महिला विकास मंत्री ने कहा कि वे इसे ठीक कराएंगी। इसी तरह सत्ता पक्ष के सुशांत शुक्ला ने भी सर्पदंश की आड़ में करोड़ों के मुआवजा बांटने का मुद्दा उठाकर ध्यान खींचा।

मई के बाद बड़ी सर्जरी?

जैसी खबरें थीं, सरकार ने दो कलेक्टरों ही की पोस्टिंग की। वो भी दोनों जिलों के कलेक्टरों के डेपुटेशन पर जाने की वजह से। बहरहाल, 21 मार्च तक विधानसभा का बजट सत्र चलेगा। 24 को राष्ट्रपति आ रही हैं। 30 मार्च को पीएम नरेंद्र मोदी आएंगे। इसके बाद अप्रैल में सरकार गांवों में विकास कार्यों की मानिटरिंग से संबंधित योजना पर विचार कर रही है। इसमें मुख्यमंत्री के साथ ही अफसरों की चौपाल लगाई जा सकती है। चौपाल योजना यदि शुरू हुई तो फिर कलेक्टर लेवल पर बड़ी सर्जरी फिर मई के बाद ही होगा। तब तक इक्का-दुक्का, या कोई हिट विकेट हो जाए, तो बात अलग है।

आईजी पोस्टिंग

ब्यूरोक्रेसी के संदर्भ में विष्णुदेव साय सरकार की खास बात यह रही कि भारत सरकार से डेपुटेशन से जो भी आईएएस, आईपीएस अफसर लौटे, उन्हें महत्वपूर्ण पोस्टिंग से नवाजा गया। अमित कुमार से लेकर सोनमणि बोरा, रोहित यादव, मुकेश बंसल, रजत कुमार, अमरेश मिश्रा, अविनाश चंपावत सभी को अच्छी पोस्टिंग मिली। सीबीआई से लौटे आईपीएस अमित कुमार को खुफिया चीफ बनाया गया तो एनआईएस से आए अमरेश मिश्रा को रायपुर रेंज आईजी के साथ खुफिया चीफ की जिम्मेदारी दी गई। मगर सीबीआई से लौटे अभिषेक शांडिल्य को अभी इंटेलिजेंस में बिठाकर रखा गया है। इंटेलिजेंस में जबकि आईजी का कोई पद नहीं है। अभी तक आईजी या एडीजी लेवल के इंटेलिजेंस चीफ होते थे, जिनके नीचे एकाध डीआईजी, एआईजी का सेटअप था। मगर पांच साल सीबीआई में काम कर के लौटे अभिषेक की तरह गृह विभाग का ध्यान कैसे नहीं जा रहा, आश्चर्य की बात है। वैसे संभावना है, विधानसभा सत्र तथा प्रेसिडेंट और प्राइम मिनिस्टर विजिट के बाद आईजी लेवल पर कुछ तब्दिलियां की जाए, उसमें अभिषेक शांडिल्य को किसी रेंज में पोस्टिंग मिल जाए।

लाल बत्ती और अटैची

विधानसभा सत्र के बाद निगम, मंडलों में नियुक्तियां होंगी. अब कोई ब्रेकर भी नहीं है. पंचायत चुनाव तक निबट गया है. नगरीय और पंचायत दोनों मे रिजल्ट भी अच्छे आएं हैं, सो अब इसे और टालने की गुंजाईश नहीं हैं. बीजेपी के भीतर भी लाल बत्ती को लेकर सरगर्मिया बढ़ गई है. पार्टी के लिए पसीना बहाने वाले लोग तो लाइन में हैं ही, कुछ ठेकेदार और कारोबारी नेता अटैची लेकर नेताओं के चौखटो पर दस्तक दे रहे हैं. इनमें कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें पैसा नहीं कमाना. उन्हें स्टेटस सिम्बल के लिए लाल बत्ती चाहिए.

अंत में दो सवाल आपसे

1. सूखाग्रस्त माना जाने वाले सरकारी प्रेस की रेटिंग किस आईएएस अफसर ने बढ़ा दी?

2. इस खबर में कितनी सच्चाई है कि सरकार आईएएस रेणु पिल्ले को मुख्य सचिव बनाने जा रही है?

शनिवार, 1 मार्च 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: तरकश से खुलासा

 तरकश, 2 मार्च 2025

संजय के. दीक्षित

तरकश से खुलासा

पिछले हफ्ते के तरकश (Tarkash) स्तंभ में चीफ सिकरेट्री अमिताभ जैन के पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग में स्टेट इलेक्शन कमिश्नर बनने का जिक्र था। उसका लब्बोलुआब ये था कि फरवरी 2026 में अजय सिंह के रिटायर होने के बाद अमिताभ के सामने राज्य निर्वाचन आयुक्त का बेहतर विकल्प रहेगा।

तरकश की इस पोस्ट के बाद ब्यूरोक्रेसी से एक बड़ी जानकारी निकलकर सामने आई कि राज्य निर्वाचन आयुक्त का पद अब छह साल या 66 वर्ष वाला नहीं रहा। पिछली सरकार में पता नहीं कब, इसे एक साल बढ़ाकर 67 कर दिया गया। अगर 66 साल की एज लिमिट होती तो अजय सिंह फरवरी 2026 में रिटायर हो जाते।

मगर अब 67 करने के साथ ही छह महीने अतिरिक्त का भी प्रावधान कर दिया गया है। अतिरिक्त इसलिए कि उस पद के काबिल कोई नहीं मिला तो छह महीने तक उन्हें कंटीन्यू किया जा सके। तभी ठाकुर राम सिंह साढ़े सात साल तक इस पद पर रह लिए। वैसे ठाकुर राम सिंह पोस्टिंग के मामले में पूरे कैरियर में बेहद किस्मती रहे।

रमन सिंह सरकार में रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग और रायगढ़ जिले की कलेक्टरी की। बिना ब्रेक इन चारों बड़े जिलों में वे 9 साल कलेक्टर रहे। इस रिकार्ड को कोई डायरेक्ट आईएएस न तोड़ पाया और न आगे कोई ब्रेक कर पाएगा। आईएएस से रिटायर होने के बाद रमन सरकार ने उन्हें राज्य निर्वाचन आयुक्त बनाया। बाद में भूपेश बघेल सरकार आई तो उन्हें दुर्ग के कलेक्टर रहने का लाभ मिल गया।

डीडी सिंह सीएम सचिवालय में रहने के बाद भी हाथ मलते रह गए। और ठाकुर राम सिंह के लिए जीएडी से एक साल के लिए इस पद का कार्यकाल बढ़ाने का आदेश निकल गया। फिर छह महीने का बोनस भी। ऐसे में, अमिताभ जैन के लिए अब मुख्य सूचना आयुक्त के अलावा कोई और विकल्प नहीं।

नए माफिया की इंट्री

छत्तीसगढ़ मेडिकल कारपोरेशन के एक एमडी ने बस्तर में बांस की ट्रांसपोर्टिंग करने वाले छोटे व्यवसायी को जमीन से उठाकर एक हजार करोड़ का आसामी बना दिया था। हालांकि, वक्त ने उसे अब सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है। मगर अफसर भी कम थोड़े हैं। अब दूसरा चोपड़ा बनाने का प्रयास प्रारंभ कर दिया है।

नए मेडिकल माफिया का भोपाल से ताल्लुकात है। दो-एक साल पहले तक मध्यप्रदेश के हेल्थ विभाग में उसकी तूंती बोलती थी। मगर मोहन यादव की नई सरकार ने उसके खिलाफ मुकदमा कायम कर खेल खतम कर दिया। चूकि छत्तीसगढ़ में पुराने माफिया के रहते उसकी इंट्री नहीं हो सकती थी, सो उसके जेल जाने के बाद नए माफिया के रास्ते खुल गए।

सीजीएमएससी के अफसरों ने उसके लिए जगह तैयार करनी शुरू कर दी है। 44 लाख लोगों की सिकलसेल जांच के लिए न केवल पॉलिसी बदल दिया बल्कि टेंडर में ऐसे क्लॉज डाल दिए हैं कि भोपाल वाले के अलावा किसी और को नहीं मिल सकता।

सवाल यह है कि जब 80 लाख लोगों की इन हाउस सिकलसेल जांच हो चुकी थी तो उसका पैटर्न बदलकर पीपीपी मोड क्यों किया गया? फिर अजीबोगरीब शर्त...ज्वाइंट वेंचर वाली पार्टी ही इसमें अप्लाई कर सकती है। भोपाल वाली पार्टी ने ज्वाइंट वेंचर बनाकर रखा है। टेंडर में ऐसे कई शर्त रख दिए गए हैं, जो इस बात की चुगली कर रही कि किसी नए माफिया को छत्तीसगढ़ में स्थापित करने की तैयारी है।

हेल्थ में त्राहि माम

हेल्थ विभाग के डिरेल्ड सिस्टम को पटरी पर लाने के लिए सरकार ने भले ही अमित कटारिया को स्वास्थ्य सचिव बना दिया। बावजूद इसके विभाग की भर्राशाही कम नहीं हो रही। जिलों के सीएमओ और सिविल सर्जन त्राहि माम कर रहे हैं। नेताओं के लोगों ने रैकेट बनाकर लूट मचा दी है...हर जिले में वसूली एजेंट। हर किसी को महीना चाहिए या फिर सप्लाई का आर्डर। दोनों में से कोई एक नहीं हुआ तो फिर सीएमओ, सिविल सर्जन को अगली लिस्ट में हटाने की चेतावनी।

ताज्जुब इस बात का है कि सीजीएमएससी या हेल्थ डायरेक्ट्रेट से उन्हें अ्रस्पतालों के रिक्वायरमेंट की लिस्ट कैसे मिल जा रही? वे लिस्ट लेकर पहुंच जा रहे...आप सीजीएमएससी को पैसा ट्रांसफर कीजिए, बाकी जेम पोर्टल को वे देख लेंगे।

सुबोध की चुनौती

पीएस टू सीएम सुबोध सिंह करप्शन रोकने के लिए ऑनलाइन वर्किंग पर जोर देते रहे हैं। माइनिंग और बिजली विभाग को उन्होंने ही ऑनलाइन किया था। राजस्व को भी उन्होंने पटरी पर लाने का प्रयास किया था मगर तब तक उनके डेपुटेशन को हरी झंडी मिल गई।

बहरहाल, उनके लिए बड़ी चुनौती होगी कि छत्तीसगढ़़ में ऑनलाइन सिस्टम भी करप्शन से अछूता नहीं रह गया है। जेम और भुईया पोर्टल इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। भुईया पोर्टल लाया ही इसलिए गया था कि पटवारियों की कारगुजारी रुक जाए। मगर इसमें क्या हुआ...विधानसभा में सबने देखा। विधानसभा अध्यक्ष डॉ0 रमन सिंह को तल्ख नसीहत देनी पड़ गई...मंत्रीजी सिस्टम को वेंटिलेटर पर जाने से पहले ठीक कर लीजिए।

दरअसल, भुईया के जरिये पटवारी और तहसीलदार मालामाला हो रहे हैं। दस्तावेजों में कृत्रिम त्रुटि कर आम आदमी का जेब काटो। इसी तरह खटराल सप्लायरों के आगे बेचारा जेम पोर्टल असहाय नजर आ रहा। जेम की तोड़ के लिए सप्लायरों ने तीन-चार कंपनियां बना लिया है। इसमें होता ऐसा है कि टेंडर निकालने से पहले ही विभागों में सेटिंग हो जा रही...ये क्लॉज डाल दीजिएगा, बाकी हम देख लेंगे।

फिर अपनी ही तीनों कंपनियों से टेंडर डलवा काम हथिया लिया जा रहा। हेल्थ, सीजीएमएससी से लेकर सभी विभागों की खरीदी में ऐसा ही हो रहा। सरकार जेम से सरकारी खरीदी का ढिढोरा पिटती है, उधर जेम अवैध को वैध करने का पोर्टल बनकर रह गया है। सुबोध को इसे नोटिस में लेनी चाहिए।

सीएम के तेवर और संदेश

विधानसभा के बजट सत्र में राज्यपाल के अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर सीएम विष्णुदेव साय के घंटे भर के भाषण की सत्ता के गलियारों में बड़ी चर्चा है। असल में, मुख्यमंत्री ने जिन कठोर शब्दों का प्रयोग किया, वह उनकी स्थापित छबि से मेल नहीं खाता।

पीएससी स्कैम का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य सिविल सेवा के अफसर शासन में सरिया की तरह होते हैं। पिछली सरकार ने सिविल सर्विस में भ्रष्टाचार का नकली सरिया लगा दिया गया। इशारे में उन्होंने महाभारत के पात्रों की तुलना करते हुए प्रोटेक्शन मनी और महादेव ऐप्प की भी बात कर डाली। जाहिर है, सीएम के इस बदले अंदाज में विरोधियों और भ्रष्ट सिस्टम के लिए बड़ा संदेश छिपा है।

राजा की दंड व्यवस्था

मनु स्मृति के मुताबिक राजा को दंड का रुप माना गया है...दंड से राजा प्रजा का शासन करता है...दंड से प्रजा का रक्षा होती है...दंड से प्रजा खुश रहती है। मगर छत्तीसगढ़ के साथ दुर्भाग्य यह रहा कि राज्य बनने के बाद दंड की बजाए भ्रष्टचारियों, धतकरमियों के साथ अतिशय उदारता बरती गई।

स्थिति यह है कि हर शाख पर उल्लू बैठा है...जिस विभाग में हाथ डालिये, 50-100 करोड़ का भ्रष्टाचार निकल आएगा। न मंत्री पर कोई कंट्रोल है और न अफसरों पर। जाहिर है, पीएससी 2003 में अगर चेयरमैन और एग्जाम कंट्रोलर के साथ कठोर कार्रवाई की गई होती तो पीएससी 2021 में सैकड़ों युवाओं का भविष्य खराब करने की टामन सोनवानी की हिम्मत नहीं होती।

पीएमटी परीक्षा का फर्जी टॉपर डॉक्टर बन मजे में नौकरी कर रहा है तो 12वीं बोर्ड की फर्जी टॉपर स्कूल में मास्टरनी बन गई। 2010 के रायगढ़ एनटीपीसी लैंड मुआवजा स्कैम में तत्कालीन कलेक्टर मुकेश बंसल ने एसडीएम तीर्थराज अग्रवाल के खिलाफ 2700 पेज की जांच रिपोर्ट सरकार को भेज सस्पेंड करवाया था। तत्कालीन एसपी राहुल भगत ने एफआईआर दर्ज कराया था। इस मामले में तीर्थराज को क्लीन चिट मिल गई।

इसका नतीजा यह हुआ कि अभनपुर के एसडीएम ने केंद्र के भारतमाला प्रोजेक्ट में 35 करोड़ की जगह 326 करोड़ का मुआवजा घोटाला कर दिया। राज्य बनने के बाद अनियमितता और भ्रष्टाचार के 500 से अधिक केसेज होंगे, जिनमें आरोपियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। कार्रवाई हुई भी तो दिखावे वाली। सरकारों को प्रजा को सुखी रहने और अपना औरा स्थापित करने के लिए मनु स्मृति को फॉलो करना चाहिए।

रमन का रिकार्ड

वित्त मंत्री ओपी चौधरी 3 मार्च को दूसरी बार राज्य का बजट पेश करेंगे। बता दें, 24 साल में सबसे अधिक बजट पेश करने का रिकार्ड पूर्व मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह के नाम दर्ज है। अमर अग्रवाल की एक सियासी चूक की वजह से वित्त विभाग रमन िंसंह के पास गया और उसके बाद 2018 तक उन्हीं के पास रह गया। उन्होंने लगातार 12 बजट पेश किया।

अमर ने अगर इस्तीफा नहीं दिया होता तो 15 बजट पेश करने का रिकार्ड उनके नाम होता। अमर के इस्तीफे के बाद वित्त विभाग 17 साल के लिए मुख्यमंत्री के पास चला गया। जाहिर है, 12 साल रमन सिंह और उसके बाद पांच साल भूपेश बघेल ने वित्त संभाला। बहरहाल, रमन के बाद दूसरे नंबर पर भूपेश बघेल हैं। उन्होंने पांच बजट पेश किया। उनके बाद स्व0 रामचंद्र सिंहदेव और अमर अग्रवाल ने तीन-तीन बजट पेश किए।

पीसीसीएफ, वन मंत्री और धोखा

वन मंत्री केदार कश्यप 15 साल मंत्री रहे हैं, इसके बाद भी खुलकर सामने नहीं आ रहे तो इसकी वजह पीसीसीएफ का मैटर तो नहीं है? जाहिर है, सरकार बदलने के बाद तय हो गया था कि नया पीसीसीएफ अपाइंट किया जाएगा। बताते हैं, पीसीसीएफ श्रीनिवास राव ने खुद ही पेशकश की थी कि उन्हें हटाकर वाईल्डलाइफ में पोस्ट कर दिया जाए।

इसके बाद वन मंत्री केदार कश्यप ने सरकार से चर्चा कर अनिल राय को पीसीसीएफ बनाने की नोटशीट चलाई। मुख्यमंत्री से अनुमोदन भी हो गया। मगर दो दिन के लिए एसीएस फॉरेस्ट छुट्टी पर गए और खेला हो गया। दिल्ली से किसी अदृश्य शक्ति का फोन आया, उसके बाद अनिल राय की नोटशीट आसमान खा गया या जमीं निगल गई...कोई पता नहीं चला। उपर से अनिल राय के खिलाफ खबरें भी प्लांट होने लगी।

बताते हैं, इस विश्वासघात से केदार कश्यप का मन टूट गया। हालांकि, अरण्य के विरोध और एसीएस फॉरेस्ट से भिड़-भाड़कर वन मंत्री ने कैबिनेट से पीसीसीएफ के लिए पांच नए पदों का सृजन करा लिया है। मगर जिनको वे नए पीसीसीएफ बनाना चाहते हैं, उनसे भी उनसे वफादारी की उम्मीद नही करनी चाहिए।

वन विभाग के लिए दुर्भाग्य रहा कि पीसीसीएफ की कुर्सी पर मिलनसार और अच्छे व्यक्ति तो कई रहे, मगर विभाग को ताड़ने वाला कोई नहीं मिला। संजय शुक्ला की धमक जरूर थी, अगर वे दो साल पीसीसीएफ रह गए होते तो आज तस्वीर अलग होती। सुनील मिश्रा एक अच्छा नाम हो सकता है मगर वे इंटरेस्टेड नहीं, इसी साल अक्टूबर में उनका रिटायरमेंट है।

ये बनेंगे पीसीसीएफ

कैबिनेट से पीसीसीएफ के पांच अतिरिक्त पदों की मंजूरी मिली है। इसके बाद 93 बैच के कौशलेंद्र कुमार, आलोक कटियार, 94 बैच के अरुण पाण्डेय सुनील मिश्रा, प्रेम कुमार और ओपी यादव पीसीसीएफ प्रमोट हो जाएंगे। ओपी यादव को वेटिंग प्रमोशन दिया जाएगा। अक्टूबर में सुनील मिश्रा के रिटायरमेंट से खाली पद पर ओपी को प्रमोट किया जाएगा।

अंत में दो सवाल आपसे

1. विधानसभा में अगर अजय चंद्राकर और राजेश मूणत नहीं होते तो फिर विपक्ष का क्या होता?

2. छत्तीसगढ़ के 10 में से आठ मंत्री सरकार के लिए लायबिलिटी क्यों बन गए हैं?


शनिवार, 22 फ़रवरी 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: सरकार बड़ी या अफसर

 तरकश, 23 फरवरी

संजय के. दीक्षित

सरकार बड़ी या अफसर

छत्तीसगढ़ में जमीन के धंधे में नेता से लेकर नौकरशाह तक ऐसे आकंठ डूबे हुए हैं कि इससे जुड़ा कोई अफसर अगर कोई बड़ा कांड भी कर दे तो उसका कोई बाला बांका नहीं हो पाएगा। हम बात कर रहे हैं आरआई विभागीय परीक्षा स्कैम का।

कमिश्नर लैंड रिकार्ड ऑफिस के जिन लोगों ने 2018 के विधानसभा चुनाव के दौरान आरआई एग्जाम में खेला किया, उसी पैटर्न पर...वही लोग 2023 के विधानसभा चुनाव और नई सरकार बनने के दरम्यान परीक्षा में घालमेल कर डाला। बवाल मचा तो दो-दो आईएएस अफसरों की कमेटी से जांच कराई गई।

जांच कमेटी के चेयरमैन केडी कुंजाम पर इतना प्रेशर था कि उन्होंने गोलमोल रिपोर्ट देते हुए अलग से जांच कराने की अनुशंसा कर दी। असल में, जांच कमेटी के कुछ लोग दूध-का-दूध, और....करने पर अड़ गए, इसलिए कुंजाम खुलकर क्लिन चिट नहीं दे पाए।

मगर अलग जांच के लिए लिखा तो इसकी लीपापोती के लिए राजस्व विभाग ने एसीएस होम को इंवेस्टिगेशन के लिए पत्र लिख दिया। जबकि, गृह विभाग कोई जांच एजेंसी नहीं है। एसीएस होम ने मीडिया से कहा भी, उन्हें थाने में रिपोर्ट दर्ज कराना चाहिए।

मीडिया में खबर उछली तो लैंड विभाग से जुड़े अफसर मंत्रालय के अफसरों का परिक्रमा कर आए। अब छत्तीसगढ़ के 97 परसेंट ब्यूरोक्रेट्स जमीन वाले हैं, तो फिर वे जमीन से जुड़े अफसर के खिलाफ कार्रवाई कैसे करते? मगर इतना ही पूछ लेते कि जब कोई मामला ही नहीं था तो भाई जांच कमेटी क्यों बनाई गई? एसीएस होम को पत्र क्यों लिखा जांच के लिए?

चलिए....कोई नहीं। न जाने कितने चीफ सिकरेट्री, एसीएस, पीएस सिकरेट्री और कलेक्टरों को भू-पति बनने में मदद की तो इसका ईनाम तो उन्हें मिलना चाहिए न।

विधायक जीते, बीजेपी हारी

छत्तीसगढ़ के नगरीय निकाय इलेक्शन बीजेपी के लिए ऐतिहासिक रहा तो पंचायत चुनाव में भी ट्रेंड कमोवेश वही रहा। जिन इलाकों में सत्ताधारी पार्टी को झटका लगा, उसके लिए वहां के विधायक और पार्टी के नेता जिम्मेदार हैं।

राजधानी रायपुर से लगे अभनपुर ब्लॉक के तीन जिपं सदस्य चुनाव हार गए तो सोशल मीडिया के स्टेट संयोजक जनपद सदस्य की सीट नहीं निकाल पाए। पता चला है, पार्टी ने जिन पार्टी समर्थित लोगों को चुनाव में उतारा था, वहां के लोकल नेताओं को पसंद नहीं आया। उनने अपने लोगों को पैरेलेल खड़ा कर दिया।

यही वजह रही कि अभनपुर में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा। जशपुर में बीजेपी तीन सीट हार गई, उसके पीछे भी वहां के लोकल नेताओं की जिद रही। सरगुजा के सांसद चिंतामणि महाराज के भाई को बगीचा से टिकिट नहीं देने दिया। वजह? जशपुर के विधायक को अगला चुनाव बगीचा से लड़ना है।

अगर चिंतामणि के भाई जीत जाते तो...? हालांकि, बीजेपी नेताओं की तमाम जोर-आजमाइश के बाद भी चिंतामणि के भाई बगीचा से जीत गए। सूरजपुर और मनेंद्रगढ़ में भी ऐसा ही हुआ। आगे चलकर विधायक टिकिट का दावेदार न बन जाएं, इसलिए योग्य प्रत्याशियों का पत्ता काट दिया गया। संगठन मंत्री पवन साय को अनुशासन का डंडा चलाना चाहिए, क्योंकि इससे बीजेपी की अनुशासित पार्टी की छबि को धक्का लगा है।

मिनिस्टर लेट

22 फरवरी को मंत्रालय में विष्णुदेव कैबिनेट की अहम बैठक हुई। अहम इसलिए कि कैबिनेट में मंत्रियों के साथ गहन विचार-विमर्श के बाद विधानसभा में पेश किए जाने वाले बजट को हरी झंडी दी गई। ऐसे में मंत्री अगर विलंब से पहुंचेंगे तो बातें तो होगी ही।

दो मंत्री आज काफी विलंब से बैठक में पहुंचे। उनमें एक तो लेटलतीफी के लिए बदनाम हो चुके हैं। बहरहाल, मुख्यमंत्री ने कुछ बोला नहीं मगर बैठक के बाद मंत्रियों के बीच इस पर काफी देर तक खुसुर-फुसुर होती रही।

वैसे, ये प्रोटोकॉल के खिलाफ भी है। कैबिनेट में सीएम के पहुंचने से पहले मंत्रियों को पहुंच जाना चाहिए।

वैश्यों की पार्टी?

कुछ साल पहले तक बीजेपी अग्रवालों, मारवाड़ियों की पार्टी कही जाती थी। खासकर, छत्तीसगढ़ में वाकई दबदबा था। 2018 तक इस व्यवसायिक समुदाय से तीन-तीन मंत्री होते थे।

बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल और राजेश मूणत। स्पीकर भी गौरी शंकर अग्रवाल। छगन मूंदड़ा सीएसआईडीसी और संतोष बाफना पर्यटन बोर्ड चेयरमैन।

संगठन में भी काफी एकतरफा था...चार-से-पांच जिला अध्यक्ष तो होते ही थे। मगर समय का चक्र कहिए कि मंत्री और बोर्ड के चेयरमैन कौन कहें, आज की तारीख में बीजेपी के 33 जिला अध्यक्षों में एक भी इस समुदाय से नहीं हैं।

अमर अग्रवाल को जरूर मंत्री बनाए जाने की संभावनाएं हैं, मगर सिर्फ वैश्य समुदाय से होने से नहीं...इसके पीछे उनकी काबिलियत और मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत पसंद होगी। अलबत्ता, बीजेपी द्वारा रेखा गुप्ता के दिल्ली की मुख्यमंत्री बनाए जाने से इस समुदाय से जुड़े नेताओं के चेहरे पर रौनक लौटी है।

बीजेपी की चाबुक

नगरीय निकाय चुनाव में बीजेपी ने ट्रिपल इंजन का स्लोगन दिया और जनता ने इसे हाथोहाथ लेते हुए एकतरफा जनादेश भी दे दिया। मगर इससे बीजेपी की चुनौतियां बढ़ गई है। रुलिंग पार्टी अब दूसरों पर ठीकरा नहीं फोड़ सकती।

छत्तीसगढ़ में बीजेपी सरकार 01, 02 और 03 के दौरान पार्टी कई नगरीय निकायों की सीटें हार जाती थी। सो, शहरों के डेवलपमेंट का काम नहीं होने पर सरकार को विपक्ष पर आरोप लगाने का स्पेस मिल जाता था।

अब शहरी इलाकों में विकास कार्यों के साथ महापौरों, अध्यक्षों और पार्षदों पर लगाम रखने की जरूरत पड़ेगी। जाहिर है, 2023 के चुनाव में जीतने वाले कई नए विधायकों की उच्छृंखलता से बीजेपी परेशान रही। उन्हें पटरी पर लाने में एक साल लग गए।

अब तो महापौर से देकर पार्षद तक भरे पड़े हैं। विधानसभा चुनाव 2028 में वे एंटी इंकाम्बेंसी का कारण न बन जाए, इसके लिए बीजेपी संगठन को अभी से चाबुक तैयार रखना होगा।

अफसरशाही में जातिवाद

अफसरशाही को जाति, धर्म और क्षेत्रवाद से अलग रहना चाहिए। मगर छत्तीसगढ़ में एक विशेष वर्ग के अफसर, सरकार और आम जनता के लिए नहीं, अपने वर्ग के लिए समर्पित हो गए हैं, ये ठीक नहीं।

ये अफसर जातिवादी संगठनों को चंदा दिलवाते हैं, उनके कार्यक्रमों में खुलकर हिस्सा लेते हैं बल्कि उनकी गोपनीय बैठकों में भी शिरकत कर रहे हैं। यदि ऐसा रहा तो अफसरशाही पर से जनता का विश्वास उठेगा। जीएडी को इसे देखना चाहिए।

सीआईसी कौन-1

राज्य सरकार ने तीनेक साल से खाली मुख्य सूचना आयुक्त सलेक्शन का प्रॉसेज प्रारंभ कर दिया है। इसके लिए एसीएस मनोज पिंगुआ की अध्यक्षता में चार सचिवों की सर्च कमेटी गठित कर दी गई है।

संकेत हैं, सरकार आसन्न बजट सत्र में नए सीआईसी के नाम पर मुहर लगा देगी।

मगर सवाल उठता है बनेगा कौन? कुछ दिन पहले तक मुख्य सचिव अमिताभ जैन का नाम इस पद के लिए पक्का माना जा रहा था। दरअसल, पोस्ट विज्ञापित होते ही उन्होंने अप्लाई कर दिया।

मगर इसमें ट्विस्ट तब आया, जब पता चला अमिताभ के बाद निवर्तमान डीजीपी अशोक जुनेजा, पूर्व मुख्य सचिव आरपी मंडल और पूर्व डीजीपी डीएम अवस्थी ने भी आवेदन भर दिया है। इससे लगता है कि विवेक ढांड का इतिहास कहीं दुहरा न जाए।

सीआईसी कौन-2

सरजियस मिंज के रिटायर होने के बाद तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी पर तत्कालीन चीफ सिकरेट्री विवेक ढांड ने रुमाल रख दिया था। लिहाजा, करीब साल भर तक ये कुर्सी खाली रही। इसी बीच रेरा का गठन हो गया।

चमक-धमक वाले इस पद को देख ढांड का मन बदल गया। उन्होंने अप्लाई किया और रेरा के फर्स्ट चेयरमैन के लिए उनका सलेक्शन हो भी गया। अमिताभ के सामने भी इस तरह के विकल्प हैं। वे चाहें तो सीआईसी का मोह छोड़ राज्य निर्वाचन आयुक्त के लिए वेट कर सकते हैं।

अमिताभ के पास अभी राज्य योजना आयोग के व्हाइस चेयरमैन का पद अतिरिक्त प्रभार है। 30 जून को रिटायरमेंट के बाद वे इस पद पर कंटीन्यू कर सकते हैं। उसके बाद अजय सिंह के 11 फरवरी 2026 को रिटायर होने से राज्य निर्वाचन आयुक्त का पद खाली हो जाएगा।

अमिताभ को सात महीने राज्य योजना आयोग में रहना होगा। तत्पश्चात उन्हें छह साल वाली पोस्टिंग मिल जाएगी। वैसे भी एमके राउत के बाद सीआईसी में अब कुछ खास बचा नहीं है।

2020 से सीआईसी का पद पांच साल से घटाकर तीन साल कर दिया गया है, बल्कि सुविधाओं में भी काफी कटौती कर दी गई है। कहने का आशय यह है कि अशोक विजयवर्गीय, सरजियस मिंज और एमके राउत के दौर वाला तामझाम इसमें नहीं बच नहीं गया है।

ऐसे में, अमिताभ के लिए तीन साल वाले सीआईसी से कहीं ज्यादा बेहतर राज्य निर्वाचन आयुक्त की पोस्टिंग होगी। फरवरी में भी अगर वे ज्वाईन करेंगे तो इसमें उन्हें साढ़े पांच साल रहने का वक्त मिल जाएगा। ये समीकरण अगर काम किया तो फिर कोई पूर्व डीजीपी सीआईसी बन जाएगा।

यंग अफसर और विदेश

ये ठीक है कि विदेश का सैर-सपाटा अब बहुत खर्चिला नहीं रहा। लोवर मीडिल क्लास के लोग भी अब दो-एक चक्कर लगा आ रहे हैं तो फिर आईएएस, आईपीएस अधिकारियों की तो बात ही नहीं। मगर पैसा है तो इसका ये मतलब नहीं...एक सेल्फ डिस्पिलीन होनी चाहिए...आंखों में पानी भी।

छत्तीसगढ़ के खासकर यंग अफसरों में यह देखने को आ रहा कि साल में वे दो-दो, तीन-तीन फॉरेन टूर कर ले रहे। पता नहीं, सरकार से दूसरी, तीसरी बार इजाजत मांगने की हिम्मत कैसे हो जा रही।

एसपी जिले से गायब

छत्तीसगढ़ सरकार ने कलेक्टर, एसपी के लिए एक सर्कुलर जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि बिना अनुमति जिला मुख्यालय छोड़ने वालों की अब खैर नहीं। मगर कई कलेक्टर, एसपी जिला मुख्यालय कौन कहें, बिना इजाजत लिए कुंभ में डूबकी लगा आए।

पिछले दिनों दो पुलिस अधीक्षक बिना बताए गृह मंत्री से मिलने कवर्धा पहुंच गए थे। पुलिस मुख्यालय ने पूछा तो बताए गृह मंत्रीजी ने बुलाया है। इस पर पीएचक्यू ने अफसरों को यह कहते हुए फटकारा कि गृह मंत्री बुलाएं तो जाओ मगर जिला मुख्यालय छोड़कर जाने का सूचना तो दो।

असल में, पिछले कुछ सालों में कलेक्टर, एसपी इस कदर बेलगाम हो गए हैं कि उन पर जीएडी और पीएचक्यू के फारमानों का भी कोई असर नहीं हो रहा।

एक करोड़ की सरपंची

पंचायती राज ने सरपंचों को इतना अधिकारसंपन्न बना दिया है कि शहरों के बड़े-बड़े पार्षद उसके सामने फीके पड़ जा रहे। वर्तमान पंचायत चुनाव की ही बात करें...सरपंच पद का एक-एक प्रत्याशी 10 लाख से लेकर एक करोड़ तक खर्च कर रहा है।

उद्योग तो छोड़ दीजिए, जिन पंचायतों में मुरुम और पत्थर खदानें ज्यादा हैं, वहां बजट करोड़ को क्रॉस कर गया है। नगद नारायण में भी सरपंच आगे हैं। रायपुर, बिलासपुर जैसे शहरों में पार्षद या महापौर के लिए प्रति वोट 500 रुपए बांटे गए, वहीं गांवों में सरपंच के लिए एक वोट का रेट ढाई से तीन हजार तक पहुंच गया है।

दरअसल, सरपंचों के पास इन दिनों असीमित पावर हो गए हैं...उनके बिना एनोसी के आप कुछ कर ही नहीं सकते। अदद आटा चक्की लगाना होगा तो सरपंच बिना 20-25 हजार लिए एनओसी नहीं देगा। छत्तीसगढ़ के सैकड़ों सरपंच अगर स्कार्पियो और इनोवा मेंटेन कर रहे हैं तो आप समझ सकते हैं सरपंची का आउटकम कैसा होगा।

गांवों की जीडीपी टॉप पर

छत्तीसगढ़ के सरपंच प्रत्याशियों से ढाई-से-तीन हजार रुपए मिल ही रहे हैं, जनपद सदस्य, जिला पंचायत सदस्य बांट रहे, वो अलग। एक घर में अगर चार वोट भी है तो गिरे हालत में 20-25 हजार आ ही जा रहा।

एक से अधिक प्रत्याशियों को टोपी पहनाने में सफल हो गए तो फिर और वृद्धि। आपको बता दें, इस समय गांवों में कैश का फ्लो ऐसा बढ़ गया है कि वित्त विभाग अगर कैलकुलेशन करा ले तो इस फरवरी महीने में छत्तीसगढ़ के गांवों की जीडीपी देश में टॉप पर होगा।

अंत में दो सवाल आपसे

1. जेल से छूटकर आए कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव क्या विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाए जाएंगे?

2. कलेक्टरों की ट्रांसफर लिस्ट क्या अगले सप्ताह निकल जाएगी?

शनिवार, 15 फ़रवरी 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: हिन्दुत्व की इंट्री!

 तरकश, 16 फरवरी

संजय के. दीक्षित

हिन्दुत्व की इंट्री!

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के नतीजों ने चौंकाया ही था, नगरीय निकाय के परिणाम ने लोगों को स्तब्ध कर दिया है। बात महज सीटों की नहीं, जीतने वाली पार्टी का वोट शेयर और मार्जिन कभी ऐसा नहीं रहा।

रायपुर में मुस्लिम बहुत इलाके से एजाज ढेबर जैसे नेता को पराजय का सामना करना पड़ा। तो मीनल चौबे को 1.53 लाख की ऐतिहासिक लीड मिली।

बिलासपुर में ओबीसी को छोड़ दें तो भी मुस्लिम, क्रिश्चियन और दलितों के 40 हजार वोट निर्णायक हैं। कांग्रेस के प्रमोद नायक का चेहरा अपेक्षाकृत ज्यादा वजनदार और सौम्य था। उसके बाद भी पूजा विधानी 66 हजार मतों से जीत गई।

अंबिकापुर में डॉ0 अजय तिर्की की लोकप्रियता ऐसी कि कांग्रेस को छोड़िये, बीजेपी भी मान रही थी कि उन्हें 10 में से नौ सीटें मिल रही हैं। याने डॉ0 तिर्की की हैट्रिक में भाजपा को भी कोई संशय नहीं दिख रहा था। मगर तिर्की को भी हार का मुंह देखना पड़ा।

रायगढ़ में चाय बेचने वाले जीवर्द्धन चौहान 61 परसेंट वोट शेयर के साथ चमकदार जीत दर्ज करने में कामयाब हुए। कांकेर में 50 साल और आरंग में 25 साल से बीजेपी जीत के लिए तरस रही थी, इस चुनाव में ये दोनों नगरपालिका भी कांग्रेस के हाथ से निकल गई। हालांकि, इससे कोई इंकार नहीं कि लोकल इलेक्शन में रुलिंग पार्टी को फायदा मिलता है।

बीजेपी का टिकिट वितरण और मैनेजमेंट भी बहुत बढ़िया रहा। नेताओं ने ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। फिर भी....बिना किसी करंट के ऐसे नतीजे नहीं आते। और आज के दौर में ऐसे करंट जाति और धर्म के बिना मुमकिन नहीं। छत्तीसगढ़ में जाति की राजनीति कभी परवान नहीं चढ़ सकी। लोगों ने इसे 2003 के विधानसभा चुनाव में भी देखा और 2023 में। मगर विधानसभा के बाद लोकसभा और नगरीय निकाय चुनाव के नतीजों से लगता है छत्तीसगढ़ में दबें पांव हिन्दुत्व की इंट्री हो गई है।

मंत्रिमंडल का विस्तार?

नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव निबटने के साथ ही विष्णुदेव कैबिनेट विस्तार का जिन्न फिर बाहर आने लगा है। चुनाव के दौरान भी बीजेपी के अंदर इस पर बातें हो रही थी कि विधानसभा के बजट सत्र से पहले या उस दौरान भी नए मंत्रियों को शपथ दिलाई जा सकती है। वैसे कोई ऐसा नियम भी नहीं है कि सत्र के दौरान कोई बडा काम नहीं हो सकता।

बहरहाल, कैबिनेट विस्तार सत्र से पहले हो या बाद में, इतना जरूर है कि नगरीय निकाय चुनाव के ऐतिहासिक नतीजों से मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय राजनीतिक तौर पर काफी स्ट्रांग हो गए हैं। याने अब उनके पंसदीदा मंत्रियों के शपथ लेने में कोई संशय नहीं।

दो एक्स एमएलए

नगरीय निकाय चुनाव में इस बार बीजेपी ने एक और कांग्रेस ने दो डॉक्टरों को चुनाव मैदान में उतारा था। इनमें दो पूर्व विधायक थे। बीजेपी ने पूर्व विधायक और महासमुंद नगरपालिका के पूर्व अध्यक्ष डॉ0 विमल चोपड़ा को खडा किया था। वहीं कांग्रेस ने पूर्व विधायक डॉ. विनय जायसवाल को चिरमिरी से और डॉ. अजय तिर्की को अंबिकापुर से टिकिट दिया था। तीनों डॉक्टर चुनाव हार गए। चिरमिरी और अंबिकापुर में अपने प्रत्याशी को जीताने के लिए चरणदास महंत का यह बयान भी काम नहीं आया, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगला विधानसभा चुनाव महराज याने टीएस सिंहदेव के नेतृत्व में होगा।

कांग्रेस का प्रत्याशी चयन

नगरीय निकाय चुनाव में कांग्रेस पार्टी को शर्मनाक हार का मुंह देखना पड़ा तो इसकी एक अहम वजह प्रत्याशी चयन भी रही। एक तो टिकिट फायनल करने में पार्टी ने काफी देर लगा दी, उपर से गुटीय लड़ाई आखिरी दौर तक जारी रही। 27 जनवरी को नामंकन का आखिरी दिन था और 26 जनवरी की शाम तक कांग्रेस में शह-मात का खेल चल रहा था। कांग्रेस के लोग भी स्वीकार करते हैं कि बिलासपुर और अंबिकापुर जैसे दो-एक नगर निगमों को छोड़ दें कांग्रेस ने ठीकठाक चेहरों को मैदान में उतारा नहीं।

रायपुर में पांच साल महापौर और पांच साल सभापति रहे प्रमोद दुबे की पत्नी को टिकिट दे डाला, वहीं चिरमिरी में डॉ. विनय जायसवाल को। पांच साल विधायक रहने के कारण उनकी एंटीइम्बेंसी थी ही, उनकी पत्नी चिरमिरी की महापौर रहीं। याने एक और एक ग्यारह हो गया। अपने लोगों को टिकिट देने के चक्कर में कांग्रेस नेताओं ने ऐसी गल्तियां कई जगहों पर की।

हर शाख पे उल्लू बैठे हैं...

शौक बहराइच का शेर...हर शाख पे उल्लू बैठे हैं, अंजाम ऐ गुलिस्तां क्या होगा...छत्तीसगढ़ के संदर्भ में एकदम सटीक बैठता है। छत्तीसगढ़ के जिस विभाग में हाथ डाल दीजिए, कोई-न-कोई स्कैम निकल आएगा। पीएससी परीक्षा से लेकर सीजीएमससी, आरआई परीक्षा, आयुष्मान योजना, पाठ्य पुस्तक निगम, पुलिस भर्ती, फॉॅरेस्ट गार्ड भर्ती, कालोनाईजर स्कैम...याने जिधर नजर डालिये, उधर स्कैम। सरकार भी परेशान और एसीबी भी हलाकान। लोग भी हैरान...हमर छत्तीसगढ़ को किसकी नजर लग गई, जिसको मौका मिला, वो लूटने से चूक नहीं रहा। सूरजपुर के डीईओ को देखिए रिटायरमेंट से 14 दिन पहले एक लाख रिश्वत लेते ट्रेप हो गया।

साल में 40 खोखा

पाठ्य पुस्तक निगम का कबाड़ घोटाला इस समय खूब चर्चा में है। दरअसल, यह निगम शुरू से बदनाम रहा है। इसमें सब कुछ फिक्स रहता है। साल में दो बार खेल होगा और इतना बड़ा कि उसके बाद कुछ करने की जरूरत नहीं। पहला कागजों के टेंडर में। 12 लाख मीट्रिक टन कागज खरीदी में कागजों के जीएसएम और ब्राइटनेंस का बड़ा रोल होता है। दो परसेंट जीएसएम और ब्राइटनेस कम हो गया तो 10 करोड़ का खेल हो गया।

इसी तरह बाजार से चार गुने रेट पर किताबों को छापने का टेंडर किया जाता है। उसमें 15 से 20 खोखा का जुगाड़। फिर हर साल 10 से 15 लाख किताबों कागजों में छपवाई जाती है। कुल मिलाकर पापुनि में 40 खोखा का काम हो जाता है। तभी तो वहां का एक जीएम सरकार से लड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।

कलेक्टरों का ट्रांसफर

पंचायत चुनाव की आचार संहिता खतम होने से एक रोज पहले इस बार विधानसभा का बजट सत्र प्रारंभ हो जाएगा। उधर, कलेक्टरों को बदला जाना भी अपरिहार्य हो गया है। धमतरी और दुर्ग की दोनों महतारी कलेक्टर दिल्ली डेपुटेशन पर जा रही हैं। जाहिर है, पंचायत चुनाव के बाद उन्हें रिलीव किया जाएगा। यद्यपि, एक मिथक बना हुआ है कि विधानसभा सत्र के दौरान अफसरों के ट्रांसफर नहीं किए जाते। मगर रमन सिंह की सरकार ने तीसरी पारी में दो बार इस मिथक को तोड़ लोगों को चौंका दिया था।

वैसे, विधानसभा की सत्र से कलेक्टरों को कोई वास्ता भी नहीं होता। प्रश्नों के जवाब नीचे का स्टाफ बनाता है...वह कलेक्टर कोई भी रहे सिस्टम अपना काम करता है। ऐसे में, इस बार विधानसभा सत्र के दौरान ही कलेक्टरों की लिस्ट निकलेगी, इसमें कोई संशय नहीं है।

हाजिरी 90 परसेंट, बट...

सरकार अगर चाह ले तो कुछ भी संभव है। मंत्रालय में सरकार ने टाईमिंग को लेकर मजबूत इच्छा शक्ति दिखाई, उसकी नतीजा यह हुआ कि उपर से लेकर नीचे के 80 परसेंट अफसर टाईम पर आने लगे हैं। अलबत्ता, कई तो 10 बजे से पहले महानदी भवन पहुंच जा रहे। दरअसल, सिस्टम मैसेज से चलता है। मुख्यमंत्री ने एक जनवरी को अफसरों की टाईमिंग को लेकर खरी-खरी बात की। उसके बाद सीएम सचिवालय हरकत में आया। पीएस टू सीएम ने आईएएस ग्रुपों में मैसेज किया...अनौपचारिक मैसेज यह भी हुआ कि सीएम सचिवालय अफसरों के अटेंडेंस की मानिटरिंग कर रहा है।

हालांकि, मानिटरिंग हो भी रही है। रोज दोपहर दो बजे हाजिरी चार्ट सीएम सचिवालय के एक अफसर के पास पहुंच जाता है। चार्ट में कोई बड़ा-छोटा नहीं...चीफ सिकरेट्री से लेकर सीएम सचिवालय तक के अफसरों का टाईम दर्ज किया जाता है। मगर बता दें, यह सुधार अभी नया रायपुर तक सीमित है। जिलों में वही पुराना ढर्रा चल रहा है। सीएम सचिवालय और जीएड को कलेक्टरों को टाईट करना पड़ेगा, तभी जिलों का वर्किंग कल्चर बदलेगा।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या ये सही है कि सीजीएमएससी की गंगा में डूबकी लगाने के लिए एक ब्यूरोक्रेट्स ने पार्टनरशीप में रायपुर से 50 किलोमीटर दूर दवाई की फैक्ट्री खोल ली है?

2. क्या टीएस सिंहदेव को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाने का आदेश जल्द निकलने वाला है?