शनिवार, 24 जनवरी 2026

Chhattisgarh Tarkash 2025: पुलिस कमिश्नरः जो जीता वो सिकंदर

 तरकश, 25 जनवरी 2025

संजय के. दीक्षित

पुलिस कमिश्नरः जो जीता वो सिकंदर

रायपुर पुलिस कमिश्नर सिस्टम सिर्फ सिटी में लागू किया जाए या फिर पूरे जिले में, इसको लेकर सत्ता के गलियारों में शह-मात का खूब खेल चला। 31 दिसंबर के कैबिनेट की बैठक में रायपुर सिटी में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करने का फैसला लिया गया, उसमें किसी ने मुंह खोलना मुनासिब नहीं समझा। मगर 16 जनवरी को जैसे ही लॉ एवं गृह विभाग से अनुमोदन के बाद नोटिफिकेशन राजपत्र में प्रकाशित करने के लिए लेटर सरकारी प्रेस को गया कि गृह मंत्री का फोन आ गया। इसके बाद उपर से और भी फोन...अभी नोटिफिकेशन रोका जाए। दोनों फोन कॉल का लब्बोलुआब यह था कि शहर नहीं, पूरे जिले को पुलिस कमिश्नरेट में शामिल किया जाएगा। बताते हैं, आखिरी समय में आईपीएस बिरादरी के सीनियर अफसरों का एक धड़ा गृह मंत्री और बीजेपी संगठन के कुछ नेताओं को कंविंस करने में कामयाब हो गया कि सिर्फ शहर के लिए पुलिस कमिश्नरेट बनाने का कोई मतलब नहीं। इसका नतीजा यह हुआ कि नोटिफिकेशन पर ब्रेक लग गया। इसके बाद लोग एकदम अश्वस्त हो गए कि पुलिस कमिश्नर सिस्टम अब पूरे जिले में लगेगा। मगर जो जीता वो सिकंदर...परदे के पीछे चली चकरी ने पूरी बाजी पलट दी। लोगों को समझना चाहिए कि आईएएस देश की सर्वोच्च सर्विस है। यूपीएससी में पहले आईएएस, फिर आईपीएस का नंबर आता है। आईएएस अगर टॉप पर हैं तो उनका ब्रेन भी टॉप का ही चलता होगा न। वैसा ही हुआ। इस गेम का अंतिम नतीजा यह रहा कि ओल्ड रायपुर सिटी में ही पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू करने नोटिफिकेशन जारी हो गया।

सरकार को माइलेज नहीं

रायपुर के पड़ोसी शहर नागपुर में 30 बरस पहले पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू हो गया था। ओड़िसा भी छत्तीसगढ़ से आगे निकल गया था। ऐसे में, राज्य बनने के 25 साल बाद विष्णुदेव साय सरकार ने पुलिस में रिफार्म का यह ऐतिहासिक कार्य किया। मगर इस काम के लिए जिस तरह धूम-धड़ाके के साथ उसे पॉलिटिकल माइलेज लेना था, वह नहीं हो सका। इसके पीछे क्या वजह रही...ये सरकार के रणनीतिकार बता पाएंगे। जाहिर है, दूसरे विभागों में छोटे से रिफार्म में भी सितारा होटलों में बड़ा इवेंट किया जाता है। किन्तु देश के पुलिस कमिश्नर के नक्शे में रायपुर का नाम शामिल होने के बाद भी कोई जलसा या कार्यक्रम तो हुआ नहीं, पुलिस कमिश्नर ऑफिस में कोई नारियल फोड़ने भी नहीं गया। फर्स्ट पुलिस कमिश्नर संजीव शुक्ला का ऑफिस के पोर्च में गाड़ी से उतरते और रायपुर के आखिरी कप्तान लाल उमेद सिंह को बुके देते फोटू और फूटेज के अलावे कुछ भी नहीं हुआ। सरकार के लिए यह एक बड़ा श्रेय लेने का अवसर था।

आखिरी कप्तान

रायपुर पुलिस कमिश्नरेट उल्लासविहीन माहौल में प्रारंभ हुआ मगर रायपुर पुलिस अधीक्षक कार्यालय के लोगों ने अतीत की यादों को सहेजने के लिए जरूर एक छोटा सा भावुक कार्यक्रम किया। आधा दर्जन से अधिक रायपुर के पूर्व कप्तान इस मौके पर पहुंचे थे। चाय-नाश्ता और पुरानी यादों तो ताजा करने के साथ ही फोटो सेशन हुआ। बहरहाल, 23 जनवरी को रायपुर पुलिस अधीक्षक का अस्तित्व हमेशा के लिए खतम होने के साथ ही रायपुर के आखिरी कप्तान के तौर पर लाल उमेद सिंह का नाम दर्ज हो गया। इस स्तंभ में पहले भी लिखा गया था कि रायपुर आईजी अमरेश मिश्रा की सेहत पर पुलिस कमिश्नर का कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उनका रायपुर रेंज और पांचों जिला सलामत रहेगा। उनका ऑफिस भी वही रहेगा। रायपुर ग्रामीण जिला उनके पास रहेगा। इसलिए जिलों की संख्या भी यथावत रहेगी।

5 रंगरुट आईपीएस

फर्स्ट पुलिस कमिश्नर के लिए शुरू से दुर्ग आईजी रामगोपाल गर्ग का नाम प्रमुखता से चल रहा था। 22 जनवरी की रात आठ बजे तक यही था कि रामगोपाल गर्ग कल सुबह रायपुर पहुंचकर कमिश्नरेट में कार्यभार ग्रहण करेंगे। मगर सरकार ने बिलासपुर आईजी संजीव शुक्ला को फर्स्ट पुलिस कमिश्नर बनने के लिए सलेक्ट किया। संजीव का चयन इसलिए किया गया कि उन्हें रायपुर की समझ हैं। स्कूलिंग और कॉलेज की पढ़ाई के बाद पुलिस की सर्विस में वे रायपुर में सीएसपी, एडिशनल एसपी और एसएसपी रहे। एमपी की राजधानी भोपाल में भी वे सीएसपी रहे हैं। वे प्रमोटी आईपीएस जरूर हैं मगर प्रोफाइल उनका बड़ा साउंड है। सरकार ने उन्हें सीबीआई में काम कर चुके अमित कांबले को एडिशनल कमिश्नर बनाया है तो डीसीपी और क्राइम, ट्रैफिक के लिए 2020 बैच के पांच अधिकारियों को दिया है। याने रायपुर शहर में अब सीपी और एडिशनल सीपी के अलावे पांच यंग आईपीएस बैठेंगे। सरकार में बैठे अफसरों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में आईपीएस का तीन-चार बैच बुरी कदर डिरेल्ड हो गया था। 2020 बैच को इसलिए डीसीपी बनाया गया है कि पांचों पोलिसिंग में दक्ष हो जांए। अलबत्ता, इस बैच के एक जूनियर आईपीएस नारायणपुर में एसपी हैं। इसको लेकर 2020 बैच वालों में कुछ-कुछ चल रहा था। मगर फर्स्ट डीसीपी बनाए जाने से हो सकता है कि इनकी व्यथा थोड़ी कम हो जाए।

प्रमोटी आईपीएस का दबदबा

छत्तीसगढ़ में प्रमोटी आईपीएस अधिकारियों के लिए यह स्वर्णिम टाईम होगा। इस समय 33 में से 14 जिलों के कप्तान प्रमोटी हैं। इसमें रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, जांजगीर रायगढ़ और वीवीआईपी जिला जशपुर भी शामिल हैं। रायपुर के पुलिस कमिश्नर के लिए भी प्रमोटी आईपीएस को चुना गया तो रायपुर ग्रामीण में भी प्रमोटी। महत्वपूर्ण यह है कि प्रमोटी होने के बाद भी पोलिसिंग में आरआर याने डायरेक्ट से कहीं पीछे नहीं हैं। दरअसल, पिछले कुछ सालों में पुलिस महकमे का ग्रह-नक्षत्र बिगड़ा, उससे सबसे अधिक डायरेक्ट वाले ही प्रभावित हुए। जुआ, सट्टा और शराब ने कई होनहार डायरेक्टर आईपीएस अधिकारियों का कैरियर चौपट कर दिया। बता दें, इस वक्त रायपुर पुलिस कमिश्नर, रायपुर ग्रामीण, बिलासपुर, दुर्ग, जांजगीर, सक्ती, रायगढ़, जीपीएम, कोरिया, जशुपर, बेमेतरा, सूरजपुर, कोंडागांव, कवर्धा और गरियाबंद में स्टेट कैडर वाले आईपीएस कप्तान हैं। ये जरूर है कि कमिश्नरेट में पोस्टेड पांच आईपीएस एकाध साल बाद बाहर निकलेंगे तो फिर आरआर का दबदबा बढ़ेगा।

सरकार और संघ का सेतु!

भूपेश बघेल के दौर से मुख्यमंत्री का मीडिया एडवाइजर बनाने की परंपरा शुरू हुई। रुचिर गर्ग उनके मीडिया सलाहकार रहे। विष्णुदेव सरकार में पंकज झा पहले मीडिया सलाहकार बने और अभी आर0 कृष्णा दास को मीडिया सलाहकार बनाया गया है। कृष्णा संघ पृष्ठभूमि से हैं। बचपन से संघ की शाखाओं में सक्रिय रहे। इस समय संघ के मीडिया सेल के प्रमुख की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। कृष्णा को एडवाइजर टू सीएम बनने का एक मतलब सरकार और संघ के बीच सेतु निर्माण भी हो सकता है। याद होगा, रमन सिंह की तीनों पारी में संघ कोटे से विवेक सक्सेना ओएसडी टू सीएम रहे। फर्क इतना है कि कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर सरकार ने कृष्णा दास का कद बढ़ा दिया है। ऐसा प्रतीत होता है, कृष्णा मीडिया के साथ संघ के मसले भी देखेंगे।

हनी ट्रेप या ट्रेप हनी?

महिला डीएसपी और रायपुर के बिजनेसमैन के लव स्टोरी और विवाद की जांच कर पुलिस ने 1400 पेज की रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। जांच रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। इंवेस्टिगेशन का दिलचस्प पार्ट यह रहा कि पुलिस अधिकारी उलझे रहे...कौन हनी है और कौन ट्रेप हुआ। दरअसल, इस केस में हनी का स्वाद दोनों पक्ष़्ां ने लिया। हनी ने टारगेट का शिकार किया मगर बाद में वह खुद ही ट्रेप हो गई।

कलेक्टर की लिस्ट

जगदलपुर कलेक्टर हरीश एस0 को सरकार ने सेंट्रल डेपुटेशन के लिए रिलीव कर दिया। इसके साथ ही 2017 बैच के आईएएस आकाश छिकारा को वहां का कलेक्टर अपाइंट कर दिया गया। 31 जनवरी के आसपास कलेक्टर की एक लिस्ट और निकलेगी। बलौदा बाजार कलेक्टर दीपक सोनी को भी दिल्ली में पोस्टिंग मिल गई है। पोस्टिंग आर्डर निकलने के बाद थ्री वीक की मियाद पूरी होने वाली है। धान खरीदी को देखते हो सकता है कि सरकार 31 के दो-चार दिन आगे-पीछे उन्हें रिलीव करे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. सरकार बने दो साल से अधिक होने के बाद भी बीजेपी नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्ति क्यों नहीं कर पा रही?

2. डीजीपी अरुणदेव गौतम के पदनाम से प्रभारी शब्द कब हटेगा?

Chhattisgarh Tarkash 20250: पोस्टिंग की गजब परंपरा

 तरकश, 18 जनवरी 2025

संजय के. दीक्षित

पोस्टिंग की गजब परंपरा

छत्तीसगढ़ में चना-मुर्रा टाईप आयोगों में सरकार बनने के साल-डेढ़ साल के भीतर नियुक्तियां हो जाती हैं, मगर राज्य वित्त आयोग के साथ कुछ ऐसी विडंबना रही कि 25 साल में सिर्फ एक बार पांच साल के लिए वीरेंद्र पाण्डेय इसके अध्यक्ष रहे। वरना, हर सरकार में, तीसरे साल ही अध्यक्ष की नियुक्ति हो पाती है। अजीत जोगी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान लगभग आखिरी समय याने विधानसभा चुनाव से जस्ट पहले टीएस सिंहदेव को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था। मगर दिसंबर 2003 में सरकार बदल गई। हालांकि, संवैधानिक पद होने के चलते सिंहदेव इस्तीफा ना भी देते तो कुछ नहीं होता। मगर सिंहदेव ने नैतिकता के नाते पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद मुख्यमंत्री बने डॉ0 रमन सिंह ने वीरेंद्र पाण्डेय को अध्यक्ष बनाया। वे करीब पांच साल इस पद पर रहे। उसके बाद फिर तीसरे साल में नियुक्ति की परंपरा शुरू हो गई। 2011 में अजय चंद्राकर और 2016 में चंद्रशेखर साहू इस आयोग के अध्यक्ष बनाए गए। भूपेश बघेल सरकार ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 2022 में सरजियस मिंज की नियुक्ति की थी। चूकि बीजेपी-04 सरकार का तीसरा साल चालू हो गया है, ऐसे में इस आयोग को लेकर पार्टी नेताओं की उत्सुकता बढ़ गई है। इस आयोग का मूल काम राज्य के कुल कर राजस्व में से स्थानीय निकायों को कितना हिस्सा मिले, इसका तरीका सुझाना है। पंचायतों और नगरपालिकाओं के लिए आय के नए स्त्रोत तलाशने का कार्य भी यह आयोग करता है। चूकि इसमें दिमाग और बुद्धि का काम है, इसलिए नेताओं में भी पढ़े-लिखे बौद्धिक फेस को ही इस आयोग का चेयरमैन बनाया जाता है। बहरहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी कब और किसकी ताजपोशी करती है।

कटप्पा और आईपीएस प्रमोशन

बाहुबली-2 रिलीज होने से पहले पब्लिक डोमेन में ये बड़ा प्रश्न था कि कटप्पा ने आखिर बाहुबली को क्यों मारा? कुछ इसी तरह के यक्ष प्रश्न आईपीएस लॉबी में भी घूम रहे हैं...बैठक में आखिर पेंच लगाई किसने। दरअसल, डीपीसी तक सब कुछ ठीकठाक चल रहा था। पीएचक्यू ने प्रमोशन का प्रस्ताव तैयार कर भेजा, गृह विभाग ने उसे डीपीसी में सम्मिट किया। बताते हैं, प्रमोशन कमेटी की बैठक जैसे ही शुरू हुई किसी मेंबर ने महादेव ऐप्प का मसला उठा दिया। कहा...6000 करोड़ के स्कैम में तीन अफसरों से पूछताछ के लिए केंद्रीय जांच एजेंसी को 17ए के तहत अनुमति दी गई है, तो फिर प्रमोशन कैसे? इसके बाद पेंच ऐसी फंसी कि हाई लेवल के निर्देश और मार्गदर्शन के बाद भी दूसरी डीपीसी में मामला सुलझ नहीं पाया। विदित है, मुख्य सचिव विकास शील, सीनियर एसीएस के नाते ऋचा शर्मा, एसीएस होम मनोज पिंगुआ और डीजीपी अरुणदेव गौतम मौजूद थे। पुलिस महकमे में सबसे अधिक उत्सुकता यह जानने का लेकर है कि कटप्पा की भूमिका किसने निभाई? और क्यों?

डरे-सहमे मंत्री!

2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सरकार को बड़ा झटका लगा था। भूपेश बघेल के 12 में से नौ मंत्री चुनाव नहीं निकाल पाए। ये चीजें बीजेपी सरकार के कई मंत्रियों को बड़ा परेशान कर रही। लिहाजा, सरकार द्वारा किए जा रहे रिफार्म की कोशिशों से मंत्रीजी लोग घबरा जा रहे। जमीनों के गाइडलाइन की युक्तियुक्तकरण को लेकर कैबिनेट की बैठक में कई मंत्रियों ने कह दिया था, ऐसा रहा तो वे चुनाव हार जाएंगे। और अभी सरकार फर्जी धान खरीदी पर अंकुश लगाने का प्रयास कर रही तो कुछ मंत्रियों ने हाय-तोबा मचा दिया। बता दें, फर्जी धान खरीदी में हर साल करीब 10 हजार करोड़ का खेल किया जाता है। इस खेल के मुख्य खिलाड़ी कई राईस मिलरों पर दबिश बढ़ाई जा रही तो मंत्री समेत पक्ष-विपक्ष के विधायक उससे बेचैन हो रहे हैं।

पोस्टिंग में विलंब

पिछले साल डीएसपी प्रमोट हो जाने के बाद भी 40 से अधिक टीआई को तीन महीने तक थानेदारी करनी पड़ी, तब जाकर पोस्टिंग मिली। कुछ ऐसा ही एडिशनल एसपी प्रमोशन में हो रहा। एक तो कई महीने घूमने-फिरने के बाद प्रमोशन की फाइल क्लियर हो पाई। और अब एडिशनल एसपी बन जाने के बाद भी काम डीएसपी का करना पड़ रहा है। बात छोटी मगर महत्वपूर्ण है। इससे पता चलता है कि सिस्टम कितना चुस्त है।

सरकार को क्रेडिट नहीं

छत्तीसगढ के सरकारी स्कूलों में 50 लाख से अधिक बच्चे पढ़ते हैं। सरकार उन्हें मुफ्त में पुस्तकें मुहैया कराती है। याने इन आधा करोड़ परिवारों से सरकार सीधे कनेक्ट होती है। मगर लालफीताशाही के चलते पिछले कुछ सालों में पाठ्य पुस्तक निगम का सिस्टम ऐसा डिरेल्ड हुआ कि दिसंबर तक किताबों का वितरण कंप्लीट नहीं हो पा रहा। आखिर करीब 200 करोड़ रुपए जब इस पर खर्च हो रहा है तो क्या ऐसा नहीं किया जा सकता कि अप्रैल में स्कूल खुलने से पहले किताबें शालाओं में पहुंच जाएं। मगर दुर्भाग्यजनक यह है कि सिस्टम का फोकस स्कूल शिक्षा जैसे विभागों पर नहीं होता। वरना, प्रॉपर मानिटरिंग की जाए तो टाईम पर पुस्तकें स्कूल में पहुंच जाएंगी और सरकार को क्रेडिट भी मिलेगा।

एमडी को डबल चार्ज

सरकार ने जिस तरह हेल्थ को ठीक करने के लिए डायरेक्टर और एनएचएम में अलग-अलग आईएएस अधिकारी बिठाया है, उसी तरह बच्चों को टाईम पर पुस्तकें उपलब्ध हो जाए, इसके लिए समग्र शिक्षा और पाठ्य पुस्तक निगम में अलग-अलग एमडी पोस्ट करना चाहिए। दोनों में एक अफसर को बिठाने का नुकसान यह होता है कि फोकस समग्र शिक्षा पर हो जाता है। सही भी है...समग्र का बजट 2000 करोड़ का है। जाहिर है, बजट बड़ा तो मलाई भी ज्यादा ही होगा। उधर, पापुनि का 200 करोड़ का बजट, उसमें भी कई लेवल की नेतागिरी। हालांकि, पापुनि निर्धनता की केटेगरी में नहीं आता...15 परसेंट के हिसाब से लगभग 30 खोखा का बन जाता है। मगर उसमें चार-से-पांच हिस्से लगते हैं। समग्र शिक्षा में ये हिस्से वाला मामला थोड़ा कम है। इसलिए जरूरी है कि पापुनि के लिए अलग से एमडी बनाया जाए।

पीसीसी चीफ को एक्सटेंशन?

पिछले विधानसभा चुनाव के बाद से पीसीसी चीफ दीपक बैज को हटाने की अटकलें चल रही हैं। एक बार तो बात इस लेवल तक पहुंच गई थी कि लगा कि किसी भी दिन टीएस सिंहदेव का आदेश निकल जाएगा। मगर दीपक ने ढाई साल का टेन्योर पूरा कर लिया। जुलाई 2026 में उनका तीन साल कंप्लीट हो जाएगा। सुनने में आ रहा...दीपक को अगर नहीं हटाया गया तो उनके साथ दो कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति हो सकती है। इसके लिए देवेंद्र यादव, उमेश पटेल, शिव डहरिया और प्रेमचंद जायसी का नाम चल रहा है। हालांकि, भीतर की खबर ये भी है कि उमेश पटेल कार्यकारी अध्यक्ष बनने के लिए तैयार नहीं। जुलाई में अगर दीपक बैच को हटाया गया तो अत्यधिक संभावना है कि टीएस सिंहदेव उनकी जगह लें। कांग्रेस के अंदरखाने में चर्चा इस बात का लेकर भी है कि विधानसभा में पार्टी की आक्रमकता बढ़ाने के लिए उमेश पटेल को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी सौंपी जा सकती है।

प्रमोशन पॉलिसी में खोट

गुड गवर्नेंस और वर्किंग कल्चर बनाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार कई स्तर पर काम कर रही है। इनमें ई-ऑफिस से लेकर डिजिटल अटेंडेंस तक शामिल है। सरकार को इसके साथ प्रमोशन में विसंगतियों को दूर करने पर भी काम करना चाहिए। खासकर, क्लास टू और क्लास थ्री लेवल पर। प्रमोशन पॉलिसी की विडंबना ही कहें कि मंत्रालय का भृत्य डिप्टी सिकरेट्री तक पहुंच जाता है मगर बाकी जगहों पर बाबू से बडा बाबू और सिपाही से प्रधान सिपाही बनने में सालों लग जाते हैं। कर्मचारियों, अधिकारियों से अगर बढ़ियां काम लेना है तो एचआर पॉलिसी को ठीक करना होगा। प्रमोशन देने से खजाने पर खास भार भी नहीं पड़ता। सीनियरिटी के हिसाब से वेतन लगभग प्रमोशन के रेंज में पहुंच ही जाता है। राज्य के भले के लिए सिस्टम को इस पर काम करना चाहिए।

रेल मंत्री के बैचमेट आईएएस

कचना इलाके में रहने वाले 50 हजार से अधिक लोग पिछले तीन साल से रेलवे ओवरब्रिज की समस्या से जूझ रहे हैं। पीडब्लूडी ने मार्च 24 का टारगेट रखा था। ठेकेदार ने टाईम पर इसे कंप्लीट नहीं किया। उपर से सर्विस रोड की हालत ऐसी दयनीय कि पूछिए मत! पीडब्लूडी के अफसरों ने ऐसा वाला काला चश्मा लगा रखा है कि उन्हें सिर्फ रुपिया दिखता है। आलम यह कि अभी रेलवे साइड का गार्डर लग नहीं पाया है। पूरा मामला इगो का है। रेलवे अधिकारी कोई पाकिस्तानी तो हैं नहीं कि उनसे बात नहीं की जा सकती। अफसर अगर रायपुर डीआरएम या बिलासपुर जीएम से एक बार बात कर लें तो प्राब्लम साल्व हो सकता है। वो भी नहीं तो 94 बैच के कई आईएएस छत्तीसगढ़ में हैं। खुद चीफ सिकरेट्री विकास शील। ऋचा शर्मा और मनोज पिंगुआ भी 94 बैच के हैं। इसी बैच के पूर्व आईएएस रेल मंत्री आश्वनी वैष्णव भी हैं। इन तीनों से रेल मंत्री को एक फोन ही काफी होगा। पीडब्लूडी के अधिकारी अगर लेटर-लेटर का खेल करते रहे तो फिर ये साल भी निकल जाए तो आश्चर्य नहीं।

सीएम, जीएम बराबर

राज्य में जो अधिकार मुख्यमंत्री को होता है, रेलवे में वही औरा जीएम का होता है। जीएम चाहे तो क्षेत्रीय जरूरतों का हवाला देते हुए नई लोकल ट्रेन चलवा सकता है, बाद में बोर्ड से एप्रूवल मिल जाता है। सौभाग्य से देश में सबसे अधिक आमदनी देने वाले रेलवे जोन के जीएम बिलासपुर में बैठते हैं। कोआर्डिनेशन अगर ठीक रहता तो दुर्ग से रायपुर के बीच एक 24 कैरेट वाली ट्रेन तो चल ही सकती थी। 24 कैरेट मतलब जिसकी टाईमिंग पर यात्रियों को भरोसा रहे। जब बिलासपुर रेलवे जोन नही बना था, डिवीजन था, तब का एक वाकया बताते हैं। पूर्व मंत्री और कोटा विधायक राजेंद्र प्रसाद शुक्ल को बिलासपुर से पेंड्रा के बीच ट्रेन शुरू करानी थी। कार्यकर्ताओं को लेकर वे खुद ही डीआरएम से मिलने पहुंच गए। डीआरएम ने इधर-उधर से रैक का इंतजाम कर महीने भर के भीतर बिलासपुर-पेंड्रा के बीच ट्रेन चलवा दी थी।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. दुर्ग आईजी रामगोपाल गर्ग को पुलिस कमिश्नर बनाए जाने की चर्चा से रायपुर पुलिस के लोग क्यों घबराए हुए हैं?

2. क्या आईपीएस अंकित गर्ग और बद्री मीणा में से कोई दुर्ग पुलिस रेंज का आईजी बनेगा?

रविवार, 11 जनवरी 2026

Chhattisgarh Tarkash 2025: छत्तीसगढ़ के दो पैर वाले पेटू चूहे

 तरकश, 11 जनवरी 2025

संजय के. दीक्षित

छत्तीसगढ़ के दो पैर वाले पेटू चूहे

पिछले साल झारखंड की एक खबर बेहद चर्चा में रही...चूहे 800 बोतल शराब गटक डाले तो एक करोड़ का गांजा पीकर मतवाले हो गए। मगर छत्तीसगढ़ के चूहे उनसे आगे निकल गए। बल्कि पेटू भी। राजधानी रायपुर से 100 किलोमीटर दूर कवर्धा में चूहे सात करोड़ के धान खा गए। स्टॉक के मिलान में खुलासा हुआ कि 26 हजार क्विंटल धान गायब है। अकेले चारभाटा केंद्र से ही 22 हजार क्विंटल। अफसरों ने कहा, चूहे खा गए। 22 हजार क्विंटल धान करीब सात करोड़ के होते हैं। याने कवर्धा के चूहे सात करोड़ के धान खा गए। अब आप कहेंगे के ये असंभव है...बेचारे, छोटे मूसक 26 हजार क्विंटल धान कैसे खा सकते हैं? तो आपको यकीन करना होगा...चूहे ही धान चट किए हैं...भले ही वो दो पैर वाले चूहे क्यों न हो। पिछले साल ऐसे ही दो पैर वाले बेईमान चूहों की वजह से धान खरीदी में 8000 करोड़ का नुकसान हुआ था। इन पेटू चूहों के चलते स्थिति ये आ गई है कि दो-एक साल बाद सरकार धान खरीदने की स्थिति में नहीं रहेगी। 38 हजार करोड़ मार्कफेड पर लोन हो गया है। इन चूहों के बड़े पेट का ही नतीजा है कि सूबे में धान का रकबा लगभग उतना ही है, मगर खरीदी नौ गुना बढ़ गई। 2002-03 में 18 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी हुई थी, पिछले साल यह 149 लाख मीट्रिक टन पहुंच गया। छत्तीसगढ़ के ये चूहे धान खा-खाकर इतने स्ट्रांग हो गए हैं कि ईडी भी ज्यादा कुछ नहीं कर पा रही। राईस मिलों के चूहे तो और भी खटराल हैं...वे सिर्फ धान को रिसाइकिलिंग कर नहीं खाते बल्कि नोट भी रिसाइकिल कर लेते हैं। सिस्टम से सौदा कर अकाउंट में लेकर कैश में वापसी करने का मसला आखिर ईडी की जांच में आया ही था। मगर फिर बात वहीं पर...चूहे बहुत मजबूत हैं। लास्ट ईयर 10 हजार करोड़ के धान दो पैर वाले चूहे खा गए। तो समझ सकते हैं, 25 साल में कितने हजार करोड़ के धान खाकर वे कितने बड़े माफिया बन गए होंगे।

किधर हैं कलेक्टर?

धान खरीदी के फर्जीवाड़े पर अंकुश लगाने इस बार सरकार ने बड़ी तैयारी की थी। कलेक्टरों की कई बार वीसी हुई। कलेक्टर कांफ्रेंस में भी आगाह किया गया। दावे किए गए इस बार ऐसी टेक्नालॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा कि धान खरीदी में परिंदा पर नहीं मार सकता। ठीक है, परिंदा तो नहीं मगर चूहे जरूर माल हजम कर गए। और इसमें हुआ क्या? चूहों के जरिये सात करोड़ के धान चट करवाने वाले डीएमओ को नोटिस दी गई है। डीएमओ का यह कहना भी गौरतलब है कि हमारे जिले की स्थिति काफी अच्छी है। याने बाकी जिलों की अगर जांच हो जाए तो फिर कयामत आ जाएगी। बहरहाल, जब तक दो-चार बड़े कौवे को मारकर नहीं लटकाया जाएगा, तब तक सरकार के लिए फर्जी धान खरीदी रोकना मुमकिन नहीं होगा। चीफ सिकरेट्री विकास शील खुद भी सिकेट्री फूड रह चुके हैं। कलेक्टरों को तलब कर उनसे टू द प्वाइंट बात करनी चाहिए। कलेक्टर अगर ठान ले तो विभागों के खटराल अधिकारियों की क्या मजाल।

कमिश्नर की रेटिंग डाउन

छत्तीसगढ़ सरकार ने पोलिसिंग में बड़ा रिफार्म करते हुए पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू करने का फैसला लिया मगर कमिश्नरेट के एरिया में कैंची चल जाने की वजह से इस पद की रेटिंग डाउन हो गई है। पुलिस कमिश्नर के दावेदारों में चार्म सिर्फ फर्स्ट पुलिस कमिश्नर बनने तक रह गया है। बाकी तो सिटी एसपी जैसा ही मामला रहेगा। पुलिस कमिश्नर के बाद दूसरे नंबर का पद ज्वाइंट कमिश्नर का होता है। इस पर डीआईजी लेवल के अधिकारी की पोस्टिंग की जाएगी। मगर सवाल यह है कि डीआईजी रैंक के जो एसपी बड़े जिले संभाल रहे हैं, वे रायपुर कमिश्नरेट में एडिशनल एसपी टाईप काम करना क्यों चाहेंगे। अगर ऐसा हुआ तो ये उनका डिमोशन ही तो होगा। कुल मिलाकर कमिश्नरेट को लेकर पुलिस महकमे में कोई उत्सुकता नहीं है।

ओएसडी की नियुक्ति

जैसा कि विदित है, रायपुर में पुलिस कमिश्नर सिस्टम 23 जनवरी से प्रारंभ हो जाएगा। कमिश्नरेट में उस दिन एक बड़ा जलसा होगा। मुख्यमंत्री समेत सारे मंत्री इस मौके पर मौजूद रहेंगे। उससे पहले कमिश्नरेट की तैयारियों के लिए दो-एक दिन में पुलिस कमिश्नर की नियुक्ति कर दी जाएगी। हालांकि, अभी उनका पदनाम ओएसडी होगा। ठीक उसी तरह जैसे नए जिले बनते हैं तो कलेक्टर, एसपी को पहले ओएसडी बनाकर भेजा जाता है। ताकि, वे तैयारी वगैरह करा लें। फिर जिस दिन से जिला बनता है, उस रोज उन्हें कलेक्टर, एसपी नियुक्त कर दिया जाता है। उसी तरह रायपुर पुलिस कमिश्नरेट में भी ओएसडी की नियुक्ति होने वाली है।

फर्स्ट पुलिस कमिश्नर?

जाहिर तौर पर आईजी रैंक के आईपीएस अधिकारी को रायपुर का फर्स्ट पुलिस कमिश्नर बनाया जाएगा। इससे पहले ओएसडी की नियुक्ति होगी। इसके लिए दुर्ग आईजी रामगोपाल गर्ग और बिलासपुर आईजी संजीव शुक्ला का नाम प्रमुख तौर पर चर्चा में है। रामगोपाल साफ-सुथरी छबि के आईपीएस हैं। सीबीआई में सात साल डेपुटेशन पर रह चुके हैं। नियम-कायदे, कानून के जानकार भी हैं। संजीव शुक्ला की छबि भी अच्छी है। वे रायपुर के एसपी रह चुके हैं और छत्तीसगढ़ पुलिस की दृष्टि से काफी अनुभवी हैं। लोकल होने की वजह से उनके अपने कंटेक्ट हैं। उनके माइनस प्वाइंट है कि अगले साल जनवरी में रिटायरमेंट है। याने पोस्टिंग के बाद सिर्फ 11 महीने बचेगा। रामगोपाल गर्ग के साथ एक ड्रॉ बैक है कि रायपुर के लिए नए होंगे। रामगोपाल अगर पुलिस कमिश्नर बनते हैं तो रायपुर को समझने वाले किसी ठीकठाक डीआईजी को ज्वाइंट कमिश्नर बनाया जा सकता है। वो या तो अजातशत्रु हो सकते हैं या फिर शशिमोहन सिंह। या रजनेश सिंह या विजय अग्रवाल। मगर प्रश्न है दसेक साल पहले ये चारों अफसर रायपुर में एडिशनल एसपी रह चुके हैं फिर डीआईजी बनने के बाद एडिशनल एसपीगिरी करने यहां क्यों आएंगे? बहरहाल, बात ओएसडी और नए पुलिस कमिश्नर की तो सरकार में इस पर मंथन चल रहा है कि रामगोपाल और संजीव में से कौन बेहतर रहेगा।

IG यथावत! SSP चेंज

आईपीएस अफसरों की पेंडिंग डीपीसी सोमवार को कंप्लीट हो जाएगी। उसके दो-एक दिन बाद आदेश भी निकल जाएगा। प्रमोशन के बाद नई पोस्टिंग होगी, फिर दुर्ग या बिलासपुर में से कोई आईजी अगर पुलिस कमिश्नर बना तो फिर वहां नए आईजी की नियुक्ति करनी होगी। इसके लिए जल्द ही आईपीएस की एक लिस्ट निकलेगी। इसमें कई जिलों के एसपी भी होंगे। खासकर, जिनका दो साल हो गया है। सबसे अधिक उत्सुकता रायपुर रेंज को लेकर है। पुलिस कमिश्नर बनने के बाद अमरेश मिश्रा आईजी बने रहेंगे। सिर्फ शहर के 21 थाना उनके कार्यक्षेत्र से कम हो जाएंगे। शंकर नगर स्थित रायपुर आईजी ऑफिस भी यथावत रहेगा और उनकी कुर्सी भी। रही बात, रायपुर एसएसपी लाल उमेद सिंह की, तो 22 जनवरी को विदाई के बाद उन्हें अच्छी पोस्टिंग मिलने की चर्चा है...ट्रांसपोर्ट को लेकर भी कुछ सुनने में आ रहा हैं।

मोदीजी की चूक!

केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू का नाम न होने की वजह से बीते सोमवार को बिलासपुर में आयोजित नगरीय निकाय का कार्यक्रम निरस्त हो गया। वो भी ऐसे वक्त पर जब पब्लिक आनी शुरू हो गई थी। इश्यू यह रहा कि बिलासपुर के सांसद होने के नाते तोखन साहू का नाम अतिथियों में शामिल नहीं था। बिलासपुर विधायक अमर अग्रवाल भी गोल थे। कुछ दिन पहले बिलासपुर में आयोजित युवा महोत्सव में भी तोखन साहू का नाम प्रोटोकॉल के अनुसार नहीं लिखा गया, इसको लेकर भी तोखन खेमे में बेचैनी थी। असल में, चूक मोदी जी से हुई, जिन्होंने तोखन साहू को अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया। अब डिप्टी सीएम अरुण साव और तोखन साहू एक ही विधानसभा क्षेत्र से हैं। दोनों साहू। एक ही स्कूल के सहपाठी भी। मोदीजी ने अरुण साव की अध्यक्षी में चुनाव होने के बाद भी उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया, उपर से तोखन साहू को प्रोटोकॉल में उपर कर दिया। उधर, बिलासपुर के अफसर भी मजे लेने में कम नहीं...नेहरु चौक पर घर अलॉट कर दिया अगल-बगल। याने सुबह उठने के साथ फुल तनाव। जाहिर है, दोनों में से कोई एक ही साहू आगे जाएगा। केंद्रीय राज्य मंत्री प्रोटोकॉल में राज्य के मंत्री से उपर होता है। अरुण साव भले ही डिप्टी सीएम हैं मगर नेशनल प्रोटोकॉल में डिप्टी सीएम का कोई जिक्र नहीं है। डिप्टी सीएम को मंत्री मानते हुए केंद्रीय मंत्री को उपर रखा गया है। ऐसे में, अगर तोखन साहू किसी कार्यक्रम में पहुंचेंगे तो उनका नाम सबसे उपर लिखा जाएगा। अरुण को यह नागवार गुजरेगा ही। जाहिर है, मोदीजी की इस चूक के चक्कर में बिलासपुर के अधिकारी पिस रहे हैं। अमर, धरम, अरुण और तोखन को अगर टेंशन होगा तो गुस्सा अफसरों पर ही निकलेगा न।

कांक्लेव पर सस्पेंस

चीफ सिकरेट्री विकास शील काम धाम में जितना अनुशासित और कड़क हैं उतने ही अच्छे सिंगर भी हैं। किशोर कुमार उनके फेवरेट हैं और उन्हीं के गाने गाते हैं। आईएएस कांक्लेव में उन्होंने दो गाने गाकर अफसरों को मंत्रमुग्ध कर दिया। मगर पता नहीं क्यों, उनके अफसरों ने आईएएस कांक्लेव को गोपनीय बनाने में पूरी उर्जा लगा दी। आखिर इतना खौफ क्यों? अफसर भी आखिर इंसान हैं, उन्हें भी जीवन जीने, इंज्वाय करने का अधिकार है। फिर ऐसे कार्यक्रमों से टीम स्पिरिट आती है। सीनियर-जूनियर अफसरों में इंटरेक्शन होता है। इस बार का कांक्लेव इस मायने में भी खास था कि पीएम अवार्ड की तरह सीएम अवार्ड समारोह भी इसमें शामिल था। फिर देश के सर्वोच्च सर्विस में हैं तो उनके प्रति आम आदमी की उत्सुकता भी रहेगी ही। अच्छे काम करने वाले अधिकारियों की मीडिया में सदैव सराहना मिलती है। और ऐसा भी नहीं कि छत्तीसगढ़ के सारे आईएएस ईडी, सीबीआई, एसीबी ब्रांड वाले हैं। अच्छे अधिकारियों की संख्या कहीं अधिक है, फिर भी कांक्लेव पर अगर सस्पेंस बरता गया तो फिर क्या ही कहा जा सकता है।

एक और अफसर डेपुटेशन पर

बलौदा बाजार कलेक्टर दीपक सोनी को भारत सरकार के हेल्थ डिपार्टमेंट में डायरेक्टर की पोस्टिंग मिल गई है। इस महीने के लास्ट तक वे यहां से रिलीव हो जाएंगे। दीपक को उस समय बलौदा बाजार के कलेक्टर का दायित्व सौंपा गया था, जब जिला मुख्यालय हिंसा की चपेट में था। उग्र भीड़ ने कलेक्ट्रेट, एसपी ऑफिस समेत न्यायिक कार्यालयों को फूंक दिया था। उस कठिन परिस्थितियों में दीपक को बलौदा बाजार भेजा गया। और प्रशासनिक सूझबूझ से वे बेकाबू स्थिति को हैंडिल करने में कामयाब रहे। बहरहाल, दीपक सोनी के बाद अब जगदलपुर कलेक्टर एस0 हरीश भी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने वाले हैं।

डबल पोस्टिंग

रिटायर आईएएस अधिकारी उमेश अग्रवाल को सरकार ने सूचना आयुक्त बनाया है। जून 2022 में रिटायर होने वाले उमेश को सरकार ने पहले पुलिस जवाबदेही प्राधिकरण में मेंबर बनाया था। वहां 62 साल एज है, सो वहां से हटने के बाद अब उन्हें सूचना आयुक्त की पोस्टिंग मिल गई। जून 2027 में वे 65 साल के हो जाएंगे, सो डेढ़ साल का उनका कार्यकाल रहेगा। याने सरकार को अगले साल फिर सूचना आयुक्त का विज्ञापन निकालना होगा। अक्खड़ स्वभाव के उमेश अग्रवाल तेज और समझ वाले माने अफसर माने जाते हैं। वैसा अफसर रिटायरमेंट के बाद भी सूचना आयुक्त की पोस्टिंग ग्रहण कर लेगा, इस पर आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा है। परिजनों के साथ जंगल में नेचर के बीच बढ़ियां जीवन गुजारते, कहां वे माया-मोह के चक्कर में पड़ वे भीड़ में शामिल हो गए। बहरहाल, सूचना आयोग की नियुक्तियों में नौकरशाही भारी पड़ी। तीन में से सीआईसी और सूचना आयुक्त के दो पद उनके खाते में गए।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. छत्तीसगढ़ के मंत्रीजी लोग अपने खटराल पीए को बदल रहे, क्या नितिन नबीन के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनने का ये इफेक्ट है?

2. आलाकमान के बरदहस्त के बाद भी दीपक बैज भूपेश बघेल को डोमिनेंट कर पार्टी का फेस क्यों नहीं बन पा रहे?

शनिवार, 3 जनवरी 2026

Chhattisgarh Tarkash 2025: ब्यूरोक्रेसी में संक्रमण काल

 तरकश, 4 जनवरी 2025

संजय के. दीक्षित

ब्यूरोक्रेसी में संक्रमण काल

चीफ सिकरेट्री विकास शील कल पांच जनवरी को सभी 34 सचिवों की बैठक लेने जा रहे हैं। इसमें लास्ट मीटिंग में जो टास्क दिए गए थे, उस पर सवाल होगा। विकास शील लगभग हर 15 रोज में सचिवों की क्लास लगा रहे हैं। ऐसा 25 साल में कभी हुआ नहीं। सुनिल कुमार जैसे सबसे तेज-तर्रार चीफ सिकरेट्री के दौर में भी नहीं। टास्क देकर सचिवों को कभी तगादा नहीं किया गया। उपर से भरी बैठक में बिना लाग-लपेट के टोक और नसीहत। अफसरों ने ऐसी स्थिति की कभी कल्पना नहीं की थी। सही भी है...देश की सर्वोच्च सर्विस में सलेक्ट होने के बाद सात घंटा काम करना पड़े, भरी मीटिंग में बात सुननी पड़े, आने-जाने का टाईम नोट किया जाए, तो अधिकारियों का अभिमान आहत होगा ही। उधर, पीएस टू सीएम सुबोध सिंह अफसरों के कामों को वॉच करने अपना अलग अटल पोर्टल लगाकर बैठे हैं। सिकेट्री टू सीएम राहुल भगत सुशासन का एक अलग विभाग खोलवा डाले हैं। जाहिर है, छत्तीसगढ़ की नौकरशाही में संक्रमण काल चल रहा है। याने पुराने से नए दौर में बदलाव की अवस्था। राज्य बनने के बाद 25 साल नौकरशाही अपने मस्त अंदाज में चलती रही। ढाई दशक का यह वक्त शाही ठाठ-बाट और लक्ष्मीजी की प्राप्ति का रहा। जमीन-जायदाद, फार्म हाउसेज, रियल इस्टेट में इंवेस्टमेंट। बिल्डरों, भूमाफियाओं से गलबहियां। मगर, अब चीजें बदल रही हैं। नॉन परफॉर्मिंग किनारे किए जा रहे हैं, परफार्मिंग को अहमियत मिल रही। सिस्टम को डिटॉक्स कर एकाउंटबिलीटी तय की जा रही है। ऐसे में, अफसरों को तकलीफ होना स्वाभाविक है।

100 करोड़ की शराब

छत्तीसगढ़ में साल 2025 की तुलना में 2026 का स्वागत जोरदार रहा। पिछले साल की तुलना में लोगों ने खूब मौज-मस्ती की। होटल, रिसोर्ट एक दिन पहले से फुल हो गए थे। अब मौज-मस्ती बिना शराब के तो हो नहीं सकती। इसलिए, शराब भी इस बार ठीकठाक बिक गई। दो दिन का रेवेन्यू अबकी 100 करोड़ क्रॉस कर गया। छत्तीसगढ़ में पिछले साल 31 दिसंबर और एक जनवरी को 46 और 50 करोड़ की शराब बिकी थी, इस बार थर्टी फर्स्ट को 53 करोड़ और एक जनवरी को 49 करोड़ की बिक्री हुई। याने 102 करोड़ की। इससे एक दिन पहले 30 दिसंबर को भी लोग 36 करोड़ की देसी और अंग्रेजी शराब गटक गए।

ओएसडी की छुट्टी क्यों?

उप मुख्यमंत्री अरुण साव के ओएसडी विपुल गुप्ता की छुट्टी सत्ता के गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। डिप्टी सीएम ने विपुल को ओएसडी बनाया था, तब वे पूर्व सीएम भूपेश बघेल के पाटन के एसडीएम थे। इसको लेकर तब खूब टिका-टिप्पणी हुई थी। फिर भी विपुल ने वहां पूरे दमदारी से काम किया और शानदार दो साल निकाला। मगर जिस अंदाज में उनकी विदाई हुई, स्पष्ट है कि कहीं से कुछ हुआ। तभी मैसेज देने 31 दिसंबर की रात आठ बजे, जब नए साल के स्वागत के स्वागत के मोड में पूरा प्रदेश आ गया था, विपुल गुप्ता की छुट्टी का आदेश निकालने जीएडी सिकेट्री अंशिका पाण्डेय को फोन किया गया। अब प्रश्न उठता है...31 दिसंबर की रात ओएसडी की विदाई क्यों? इसकी तीन संभावित वजह गिनाई जा रही हैं। दो को लिखा नहीं जा सकता। तीसरे की अभी पुष्टि नहीं हुई है। आपको कुछ पता चले तो बताइयेगा।

आर्मीमैन ओएसडी

राज्य प्रशासनिक सेवा के सीनियर अफसर अजय त्रिपाठी को डिप्टी सीएम अरुण साव का नया ओएसडी बनाया गया है। अजय एयरफोर्स से रिटायर होकर आर्मी कोटे से राप्रसे अधिकारी बने। वे अंबिकापुर में एसडीएम तो बिलासपुर जैसे निगम में कमिश्नर रह चुके हैं। राप्रसे अधिकारियों ने भले ही उन्हें स्टेट प्रेसिडेंट की कुर्सी पर बिठा दिया है, मगर तीन-पांच वाले वे हैं नहीं। कवर्धा में जिला पंचायत सीईओ बनकर गए तो एक वीआईपी ने उनका बंगला ही हड़प लिया। बेचारे को रातोरात बोरिया बिस्तर बांध कर सर्किट हाउस में शरण लेनी पड़ी थी। वहां से छूटे तो दूसरे उप मुख्यमंत्री के पास पहुंच गए। चलिये...एक्स आर्मीमैन को ओएसडी बनाकर अरुण साव लगता है अपनी छबि को लेकर संजीदा हुए हैं।

ओएसडी या इंतजाम अली!

छत्तीसगढ़ सरकार गुड गवर्नेंस पर काफी काम कर रही है। उसे कुछ सालों में शुरू हुई खराब परंपराओं को बदलना चाहिए। इनमें राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को ओएसडी बनाना भी है। पीएससी परीक्षा क्लियर कर राप्रसे अधिकारी मंत्रियों के यहां इंतजाम अली का काम करें, सूबे के लिए ये किसी विडंबना से कम नहीं। छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के दौर में दो-तीन राप्रसे ओएसडी थे। पिछली सरकार में सारे मंत्रियों के ओएसडी डिप्टी कलेक्टर हो गए। और इस सरकार में भी वही हो रहा है। मंत्री के बंगले में बैठ सारे काले-पीले कामों को ओएसडी अंजाम देते हैं। मंत्रियों की जिस रास्ते की जानकारी नहीं होती, वो ओएसडी लोग सुझाते हैं। वे इंतजाम अली की भूमिका निभाते हैं और खाजांची की भी। रमन सरकार के दौर में अमर अग्रवाल, अजय चंद्राकर, राजेश मूणत जैसे मंत्री कभी भी अपने स्टाफ को लिमिट क्रॉस करने की छूट नहीं दी, इस वजह से इन मंत्रियों पर कोई इल्जाम नहीं लगा। इस सरकार में ओपी चौधरी के स्टाफ को मंत्रालय से आदेश निकलने के बाद पता चलता है कि उनके विभागों में ट्रांसफर हुआ है।

ऐतिहासिक फैसला, मगर...

छत्तीसगढ़ की मंत्रिपरिषद ने पुलिस में बड़ा रिफार्म करते हुए रायपुर में पुलिस कमिश्नर सिस्टम प्रारंभ करने का रास्ता साफ कर दिया है। इसके लिए 23 जनवरी का डेट भी फायनल कर दिया गया है। इसके बाद देश के पुलिस कमिश्नर सिस्टम के नक्शे में छत्तीसगढ़ का नाम भी जुड़ जाएगा। मगर इसके लिए जो एरिया तय किया गया है, वह इसकी सफलता पर संशय खड़ा करता है। पंडरी के आगे का पुराना विधानसभा थाना, माना, नवा रायपुर, अभनपुर जैसे बाहरी इलाके इससे अलग होंगे। याने पुलिस कमिश्नर का कार्यक्षेत्र सिटी एसपी से भी कम हो गया। जबकि, गृह विभाग भी इस वास्तविकता ये अवगत होगा कि शहरों के आउटर में ही सबसे अधिक क्राइम होते हैं और आउटर ही क्रिमिनल के ठौर-ठिकानों के लिए सबसे मुफीद होते हैं। और यही इलाके पुलिस कमिश्नर के दायरे में नहीं होंगे। फिर यह भी...माना एयरपोर्ट पर कोई वीवीआईपी आएगा तो ग्रामीण एसपी उसे रिसीव करेंगे और वीआईपी रोड पर आने के बाद फिर पुलिस कमिश्नर। रायपुर से मंत्रालय और विधानसभा जाने वाले मंत्रियों के लिए अब डबल पायलेटिंग की व्यवस्था करनी होगी। माना थाना से पहले तक रायपुर पुलिस कमिश्नर अपनी गाड़ी लगाएंगे और माना के आगे रायपुर ग्रामीण एसपी की व्यवस्था रहेगी। बहरहाल, सवाल यह नहीं है कि पुलिस कमिश्नर को सरकार कौन-कौन सा अधिकार देगी, फिलहाल, प्रश्न यह है कि जब आधे से कम जिले में कमिश्नर सिस्टम लागू होगा तो रिजल्ट की अपेक्षा क्यों और कैसे की जाएगी? निश्चित तौर पर छत्तीसगढ़ सरकार ने पुलिस में रिफार्म का बड़ा प्रयास किया है। मगर पता नहीं कैसे, इसमें कुछ कसर रह गई, उसे दूर करना चाहिए।

वोट जरूरी या प्रदेश

तमनार हिंसा में महिला पुलिस का वीडियो देखकर गृह विभाग और पुलिस महकमे की नजरें नीचे हुई कि नहीं...ये मालूम नहीं। मगर यह जरूर है कि पार्टी-पॉलिटिक्स से दूर अब छत्तीसगढ़ में पोलिसिंग को सशक्त बनाने का समय आ गया है। वरना, स्थिति इतनी खराब हो जाएगी कि उसे संभालना मुश्किल हो जाएगा। पिछले पांच सालों की घटनाओं पर गौर करें तो सुकमा कलेक्ट्रेट में भीड़ का घुसकर तोड़फोड़ करना, नारायणपुर में एसपी पर हमला, बलौदा बाजार में कलेक्ट्रेट, एसपी ऑफिस को फूंक देना। सरगुजा के अमेरा कोल ब्लॉक में पुलिस पर पथराव। 10 दिन के भीतर कांकेर और तमनार जैसी हिंसा। महिला पुलिस पर तालिबानी हमला। जाहिर है, वोट बैंक के चक्कर में छत्तीसगढ़ के गांव जातियों में बंटते जा रहे, शहरों में धार्मिकता बढ़ रही तो शांतप्रिय माने जाने वाले कुछ वर्गों में आक्रमता घर कर रही है। इसके लिए पुलिस का पेशेवर होना जरूरी हो गया है। नहीं तो नक्सलवाद के नासूर से मुक्ति के बाद प्रदेश दूसरे संघर्ष में उलझ जाएगा। सियासी लोगों को भी समझना होगा...वोट का कोई मतलब तभी होगा, जब प्रदेश में सब ठीक रहेगा। और शांति के लिए पुलिस का संशाधनों से लैस होना आवश्यक है। वैसे भी पुलिस कोई सामान्य विभाग नहीं। वह आम आदमी का भरोसा है। बड़े और रसूखदार लोगों के खुद का कनेक्शन होने से उनका कोई काम रुकता नहीं। मगर कोई विपदा आने पर आम आदमी सबसे पहले थाने पहुंचता है। उसी पुलिस पर अगर लात-जूते और डंडे बरसाये जाएं, तो सोचिए आम आदमी के विश्वास पर यह कितनी बड़ी चोट होगी। इसलिए, पोलिसिंग को टॉप प्रायरिटी देने का वक्त आ गया है।

उधार में खुफिया

मध्यप्रदेश के दौर में एलआईबी का बड़ा तगड़ा नेटवर्क होता था। कॉफी हाउस, सामाजिक संगठनों और अखबार के दफ्तरों में एलआईबी वाले आए दिन बैठे होते थे। मगर छत्तीसगढ़ बनने के बाद खुफिया विभाग पर कभी ध्यान नहीं दिया गया। 25 साल में छत्तीसगढ़ के इंटेलिजेंस में एक आदमी की भर्ती नहीं हुई। जबकि, खुफिया में डीएम अवस्थी, मुकेश गुप्ता, अशोक जुनेजा जैसे अफसर रहे। बावजूद इसके छत्तीसगढ़ का इंटेलिजेंस उधार के पुलिस कर्मियों के भरोसे खींचता रहा। अब उधार याने डेपुटेशन पर आने वालों से इंफरमेशन की उम्मीद कैसे की जा सकती है। उन्हें तो मालूम है कि दो-चार साल बाद फिर अपने थानों में लौट जाना है। अब आवश्यक हो गया है, रेगुलर भर्तियां कर खुफिया सिस्टम को मजबूत किया जाए।

डीएमएफ दोषी!

कहा जाता है कि लीडर अगर बढ़िया रहें तो नीचे वाले अपने आप अच्छे हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ के साथ बुरी स्थिति यह हुई कि पुलिस के लीडर ही बहक गए। इसके लिए काफी कुछ जिम्मेदार पूर्व मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह और कलेक्टरों का डीएमएफ रहा। रमन सिंह ने शराब के ठेके बंद कर दिए और उपर से ट्रांसपोर्ट के बैरियर हटा दिए। पुलिस को मुख्यतः शराब और बैरियर से पैसे आते थे...रमन सरकार के फैसले से आय के दोनों जरिये क्लोज हो गए। उधर, कलेक्टरों का डीएमएफ और बढ़ता गया। कलेक्टर दोनों हाथ से लक्ष्मीजी की आवभगत करते रहे और बेचारे एसपी उन्हें देखकर कसमसाते रहे। बहरहाल, आय के इन दोनों स्त्रोतों के बंद होने का नतीजा रहा कि पुलिस को अपना लेवल डाउन कर कबाड़ी, जुआ-सट्ा पर अपना फोकस बढ़ाना पड़ा। फिर भी कम पड़ा तो एसपी लगे थानों का रेट फिक्स करने। छत्तीसगढ़ के अधिकांश जिलों में अब ये चलन बन गया है। थानों की बोली लगती है। छत्तीसगढ़ के 50 थाने ऐसे हैं, जिसके लिए प्रति महीने दो पेटी से लेकर पांच पेटी तक की बोली लगती है। जाहिर सी बात है, थानेदार महीने का दो लाख देगा तो पांच लाख का इंतजाम अपने लिए भी करेगा। ऐसे में, पोलिसिंग की उम्मीद क्यों की जानी चाहिए?

118 नेताओं में चुनाव

बीजेपी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनने के लिए पूरा एक साल एक्सरसाइज किया। 28 राज्यों के 40 से 50 साल के युवा नेताओं का डेटाबेस तैयार किया। सबकी कुंडली खंगालने और फिल्टर करने के बाद 18 की लिस्ट बनाया गया। बताते हैं, यह काम इतनी सर्तकता के साथ किया गया कि किसी को भनक नहीं लग पाई कि इसका असली मकसद क्या है। डेटा एकत्र करते समय बताया गया कि पार्टी भविष्य के युवा नेताओं का सर्वे करा रही है। बहरहाल, 18 के फायनल पेनल में एक नाम बिहार के कैबिनेट मंत्री नितिन नबीन का था। पार्टी ने उन्हें उपयुक्त मान कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया। यह जानकार आपको आश्चर्य होगा कि छंटनी के बाद तैयार की गई 18 में छत्तीसगढ़ के एक युवा नेता का नाम भी शामिल था।

2019 बैच कंप्लीट

छत्तीसगढ़ के दो जिले के कलेक्टर डेपुटेशन पर दिल्ली जा रहे हैं। संभवतः इसी महीने उनका पोस्टिंग आर्डर निकल जाए। इसके बाद कलेक्टरों की एक लिस्ट निकलेगी। काफी संभावना है कि इस लिस्ट में 2019 बैच की कलेक्टरी कंप्लीट हो जाए। इस बैच के विश्वदीप और रैना जमील को छोड़ सभी कलेक्टर बन गए हैं। जीतेंद्र यादव को सबसे पहले राजनांदगांव का कलेक्टर बनाया गया। उनके बाद नम्रता जैन को कोंडागांव और अमित कुमार को सुकमा। नए साल में विश्वदीप और रैना जमीन को कलेक्टरी का तोहफा मिल सकता है। हालांकि, विश्वदीप रायपुर नगर निगम कमिश्नर हैं। रायपुर निगम कमिश्नर की पोस्टिंग छोटे जिलों की कलेक्टरी से ज्यादा एक्सपोजर वाली होती है। इसलिए, विश्वदीप को भी कलेक्टर बनने की कोई जल्दी नहीं होगी।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. इस बात में कितनी सत्यता है कि छत्तीसगढ़ में होली के बाद पूरे मंत्रिमंडल का इस्तीफा हो जाएगा?

2. छत्तीसगढ़ में आईपीएस जीपी सिंह को लेकर चर्चाएं क्यों शुरू हो गई है?

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: छत्तीसगढ़ सरकार के काम बड़े...संदेश छोटे!

 तरकश, 28 दिसंबर

संजय के. दीक्षित

काम बड़े...संदेश छोटे!

लास्ट वीक तरकश में एक प्रश्न था...सरकार के कई रिफार्म के बाद भी संदेश क्यों नहीं जा रहे, इसके जवाब अनेक आए। खैर...नई सरकार के दो साल के हिसाब से कैलकुलेट करें तो अतिश्योक्ति नहीं कि 25 साल में सबसे अधिक काम और रिफार्म दो बरस में हुए हैं। देखते-देखते में नक्सलमुक्त छत्तीसगढ़...किसी ने कल्पना नहीं की होगी। नई उद्योग नीति के बाद 8000 करोड़ के निवेश। पहली बार पूंजी निवेश की साइज के आधार पर सब्सिडी की बजाए लोकल लोगों को रोजगार के आधार पर सब्सिडी। सूबे में सेमीकंडक्टर और फार्मा जैसी इंडस्ट्रीज आ रही। राजस्व और पंजीयन में ऐतिहासिक सुधार। जमीनों का आटोमेटिक नामंतरण, ऋण पुस्तिका की समाप्ति, गाइडलाइन रेट का युक्तियुक्तकरण। 13 हजार से अधिक स्कूलों और शिक्षकों का युक्तियुक्तकरण। वर्क कल्चर के लिए ऑनलाइन अटेंडेंस। पारदर्शिता के लिए ई-ऑफिस सिस्टम...सारी फाइलें, नोटशीट अब ऑनलाइन। देश में छत्तीसगढ़ फर्स्ट स्टेट, जहां मंत्रालय और एचओडी ऑफिस में ऑनलाइन वर्किंग। जीएसटी में सबसे अधिक टैक्स। अब आपका सवाल, इतने काम तो फिर आम आदमी में इसके संदेश क्यों नहीं? दरअसल, ओवरऑल गुड परफार्मेंस के लिए काम और रिफार्म के अलावे सिस्टम का औरा भी जरूरी होता है, जो दो साल में बन नहीं पाया। जाहिर है, जनता इस औरे से ज्यादा चमत्कृत होती है। करप्शन का लेवल कम नहीं हुआ। पहले कुछ परसेंट काम बिना पैसे के हो जाते थे, अब मंत्री-मिनिस्टर या बड़े लोगों की सिफारिशों का भी महत्व नहीं रहा। मंत्रिमंडल में सामूहिक उत्तरदायित्व की कमी। कई ऐसे मसले आए, जब मंत्री अपने साथी मंत्री या सरकार के बचाव में सामने आना मुनासिब नहीं समझा। उल्टे गाइडलाइन रेट को लेकर अपने ही सरकार पर हमलावर। शुरूआती बरस में संगठन में बैठे कुछ दिव्य आत्माओं द्वारा ट्रांसफर, पोस्टिंग और नियुक्तियों में सरकार को डेंट। तो बीजेपी के असंतुष्ट नेताओं द्वारा सेल्फ गोल। रुलिंग पार्टी के लोग ही लगेंगे सरकार की चाल में मीन-मेख निकालने तो आम आदमी क्या कहेगा? कुछ बुनियादी चीजें भी। सबसे अधिक हेल्थ की हालत खराब। किसी भी सरकारी अस्पतालों में समूचित दवाइयां नहीं। बच्चों के वैक्सीन के लिए भटकता आम आदमी। दवाइयां खरीदने की बजाए ज्यादा कमाई वाला काम बिल्डिंग निर्माण में दिमाग दौड़ाता सीजीएमएससी। सिस्टम का औरा पुलिस से भी दिखता है। मगर पुलिस बाबाओं के पैर छूने में व्यस्त। वीडियो में दिखा ही, अपराधी को पकड़ने में भले ही कोई हड़बड़ी नहीं, मगर बाबाजी को देखते जूता और टोपी उतारने में देर नहीं। महिला डीएसपी को गिफ्ट में 12 लाख के डायमंड हार मगर सिस्टम गांधीजी के तीन बंदर की तरह। डीएसपी, एडिशनल एसपी के ट्रांसफर की नोटशीट महीनों तक डंप। छह महीने से पुलिस अफसरों के खिलाफ इंक्वायरी की फाइल कहीं दबी पड़ी। ऐसी कई वजहें हैं, जो सरकार के अच्छे कामों का माहौल बनने से रोक दे रहीं। वैसे सीएस विकास शील और पीएस टू सीएम सुबोध सिंह ने चीजों को व्यवस्थित करने का प्रयास किया है। मगर राजनीतिक फैसलों के लिए सिस्टम के पास जरूरी है चाबुक चलाने वाले एक शख्सियत की। क्योंकि, सेल्फ गोल से सरकार की छबि को ज्यादा धक्का लग रहा है। इसी कॉलम में एकाधिक बार लिखा जा चुका है कि रमन सिंह की कामयाबी में सौदान सिंह की बड़ी भूमिका रही।

आईपीएस को विदाई गिफ्ट

2008 बैच के आईपीएस अधिकारियों का अगले महीने जनवरी में आईजी प्रमोशन ड्यू हो जाएगा। मगर डेट ऑॅफ बर्थ के चक्कर में कमललोचन कश्यप के आईजी बनने पर संकट खड़ा हो गया है। सरकारी रिकार्ड में एक जनवरी उनका बर्थ डेट है। जाहिर है, स्कूल में दाखिला लेते समय एक तारीख का डेट दर्ज कराया गया होगा। बहरहाल, रिटायरमेंट नियमों के तहत एक या दो तारीख को अगर जन्म हुआ है तो उसके पहले महीने के लास्ट डेट को रिटायरमेंट हो जाएगा। लिहाजा, कमललोचन इसी 31 दिसंबर को रिटायर हो जाएंगे। अब सवाल उठता है, राज्य सरकार क्या उन्हें आईजी प्रमोट कर विदाई देगी या डीआईजी से ही उन्हें सेवानिवृत्त होना पड़ेगा। इससे पहले कई दृष्टांत है कि आईएएस, आईपीएस को समय से पहले प्रमोशन दिया गया। रमन सिंह की दूसरी पारी में आईपीएस आरसी पटेल को एडीजी प्रमोशन का आदेश रिटायरमेंट की रात 10 बजे जारी हुआ था। जबकि, उनके बैच के प्रमोशन में तीन-चार महीना बाकी था। आईएएस में जवाहर श्रीवास्तव से लेकर आरएस विश्वकर्मा को सचिव से प्रमुख सचिव भी इसी तरह आखिरी दिन बनाया गया। कमललोचन आदिवासी हैं...धुर नक्सली इलाका दंतेवाड़ा से ताल्लुकात रखते हैं...नक्सलियों के खिलाफ उन्होंने लड़ा भी है। छत्तीसगढ आदिवासी राज्य है और मुखिया विष्णुदेव साय भी आदिवासी हैं तो फिर कमललोचन के प्रमोशन को लेकर लोगों की उत्सुकता स्वाभाविक है...सरकार क्या कमललोचन को रिटायमेंट गिफ्ट देगी? पीएचक्यू ने भले ही प्रस्ताव भेजने में लेट किया मगर सरकार के लिए कुछ असंभव नहीं होता। तत्कालीन सीएस सुनिल कुमार फरवरी 2013 में जाते-जाते एएन उपध्याय को 29 साल की सर्विस में डीजी बनवा डाले थे।

खुफिया चीफ और माफी

छत्तीसगढ़ में पोलिसिंग की स्थिति कैसी है, इस घटना से आप अंदाजा लगा सकते हैं। हाल की बात है...राजधानी रायपुर के बीयर-बारों के बाउंसरों के उत्पातों को रोकने एडीजी इंटेलिजेंस अमित कुमार ने एसएसपी लाल उमेद सिंह से कार्रवाई करने कहा। खुफिया चीफ का आदेश था, इसलिए एसएसपी ने फोर्स भेजकर दर्जन भर से अधिक शिकायती बारों के बाउंसरों को लाकर थाने में बिठा लिया। मगर इसमें से आधे बाउंसरों को पुलिस महकमे के सीनियर अफसरों ने फोन कर छुड़वा लिया। वो इसलिए क्योंकि वीआईपी रोड के कई बीयर-बारों में उनका पैसा लगा है। कुछ के लिए नेताओं ने फोन किया और कुछ को कोर्ट में पेश होते ही जमानत मिल गई। याने पकड़ कर लाने के बाद भी एक भी बाउंसरों को पुलिस जेल नहीं भेज पाई। जाहिर है, इससे पुलिस डिमरलाइज होगी ही। बताते हैं, एसएसपी इस पूरे एपिसोड से बहुत दुखी हुए। उन्होंने अमित कुमार को बताया। अमित बोले...सॉरी लाल उमेद, अब आगे से इस तरह के मामलों में कार्रवाई करने नहीं कहूंगा।

न्यू ईयर गिफ्ट

जनवरी में 2001 बैच की आईएएस शहला निगार प्रमुख सचिव प्रमोट हो जाएंगी तो 2010 बैच के आईएएस जेपी मौर्या, कार्तिकेय गोयल, सारांश मित्तर, पीएस एल्मा रमेश शर्मा और धमेंद्र साहू सिकेट्री बनेंगे। रानू साहू सस्पेंड हैं, इसलिए उनका प्रमोशन नहीं होगा। हालांकि, सरकार चाहे तो प्रमुख सचिव सुबोध सिंंह और निहारिका बारिक को ड्यू टाईम से एक साल पहले प्रमोट कर एसीएस बना सकती है। एसीएस के छह पद हैं और इस समय मुख्य सचिव को मिलाकर तीन ही अफसर हैं। उसमें भी मनोज पिंगुआ फरवरी-मार्च तक दिल्ली चले जाएंगे और ऋचा शर्मा का भी कोई भरोसा नहीं, कब तक यहां हैं। कहीं दोनों दिल्ली चले गए तो एसीएस की संख्या जीरो हो जाएगी, यह एक अजीब स्थिति होगी। वैसे टाईम से पहले प्रमोशन पहले भी मिलता रहा है। पिछली सरकार में रेणु पिल्ले को समय से छह महीने और सुब्रत साहू को डेढ़ साल पहले एसीएस बनाया गया। रमन सिंह सरकार में सीके खेतान और आरपी मंडल छह महीने पहले सचिव से प्रमुख सचिव बनाए गए थे। सरकार चाहे तो 2002 बैच के आईएएस डॉ0 रोहित यादव और डॉ0 कमलप्रीत सिंह को भी सचिव से प्रमुख सचिव प्रमोट कर सकती है। क्योंकि, प्रमुख सचिव में भी काफी वैकेंसी है। इस समय तीन ही प्रमुख सचिव हैं। सुबोध, निहारिका और सोनमणि बोरा। इसमें भी सुबोध को काउंट नहीं। वे सीएम सचिवालय के हेड हैं। विभागीय पीएस की दृष्टि से देखें तो दो ही प्रिंसिपल सिकेट्री हुए। सचिवों की फौज भी काफी बड़ी हो गई है। लिहाजा रोहित और कमलप्रीत को प्रमुख सचिव बनाने में कोई दिक्कत नहीं होगी। दोनों का ड्यू टाईम जनवरी 2027 है।

प्रमोशन में खटका

ऑल इंडिया कैडर के आईएएस, आईपीएस और आईएफएस सर्विस में कुछ सालों से सबसे स्लो पुलिस मुख्यालय है, जिसने अपने ही अफसरों के प्रमोशन की फाइल इस बार भी सबसे लेट सरकार को भेजा। अब अनुमति के लिए कब दिल्ली जाएगा और कब डीपीसी होगी कोई भरोसा नहीं। बहरहाल, 2001 बैच एडीजी, 2008 बैच आईजी, 2012 बैच डीआईजी और 2013 बैच सलेक्शन ग्रेड याने एसएसपी बनेगा। 2001 बैच में डॉ0 आनंद छाबड़ा का सिंगल नाम है। वहीं, आईजी बनने वाले 2008 बैच में पारुल माथुर, प्रशांत अग्रवाल, नीतू कमल, डी0 श्रवण और मिलना कुर्रे हैं। इनमें पारुल माथुर को चार्जशीट इश्यू हो गया है। एक और किसी के खिलाफ जांच प्रक्रियाधीन है। नीतू कमल और डी0 श्रवण डेपुटेशन पर हैं। ऐसे में, इस बार आईजी कौन बन पाएगा, ये सरकार ही बता पाएगी। उधर, 2012 बैच के सात आईपीएस डीआईजी प्रमोट होंगे। इनमें आशुतोष सिंह, विवेक शुक्ला, रजनेश सिंह, शशिमोहन सिंह, राजेश कुकरेजा, राजेश अग्रवाल, विजय अग्रवाल और रामकृष्ण साहू शामिल हैं। आशुतोश सीबीआई में चले गए हैं। इसके अलावा 2013 बैच के चार आईपीएस को सलेक्शन ग्रेड मिलेगा। सलेक्शन ग्रेड मिलने के बाद जिलों में पोस्टेड एसपी का पदनाम बदलकर एसएसपी हो जाएगा। इन चार में जितेंद्र शुक्ला, मोहित गर्ग, अभिषेक पल्लव और भोजराम पटेल हैं। भोजराम इस समय मुंगेली के एसपी है।

रिफार्म

रायपुर में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू किया जा रहा है। पुलिस में रिफार्म की दिशा में सरकार की एक अच्छी पहल है। मगर मध्यप्रदेश की तरह एक और प्रयोग किया जा सकता है। एमपी के थानों के प्रधान आरक्षकों को विवेचना का पावर दिया गया है। चूकि एएसआई, एसआई और थानेदारों के पास काम का बोझ ज्यादा रहता है इसलिए कम-से-कम छोटे लूट, जेबकटी और 151 जैसे मामलों की विवेचना हेड कांस्टेबल कर ही सकते हैं। इससे फायदा यह होगा कि थानों में केसेज लंबित नहीं रहेंगे। फिर थाने के बड़े अफसर बड़े मामलों की विवेचना में अपना फोकस कर सकेंगे।

कमिश्नर ऑफिस में पुलिस

रायपुर में एक जनवरी से पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू होगा या आगे टलेगा, यह 31 दिसंबर के कैबिनेट में तय हो जाएगा। वैसे यह लगभग तय हो चुका है कि नया कमिश्नरेट बिल्डिंग बनने तक डिविजनल कमिश्नर ऑफिस में पुलिस कमिश्नर बैठेंगे। डिविजनल कमिश्नर महादेव कांवड़े नए भवन में शिफ्ट हो गए हैं। सो, कमिश्नर ऑफिस खाली है। उसमें पुलिस अधीक्षक कार्यालय जाने वाला था। मगर जब पुलिस अधीक्षक सिस्टम खतम हो जाएगा तो फिर उस ऑफिस का औचित्य नहीं। ऐसे में, सरकार डिविजनल कमिश्नर कार्यालय में पुलिस कमिश्नर को बिठाने पर विचार कर रही है।

पुलिस में बड़ी उलटफेर

रायपुर में पुलिस कमिश्नर सिस्टम को देखते पुलिस महकमे में बड़े बदलाव का अंदेशा है। पुलिस कमिश्नरेट के बाद रायपुर ग्रामीण नाम से नया पुलिस रेंज बनेगा। इसका मुख्यालय महासमुंद होगा या रायपुर से कार्य संचालित होगा, इस बारे में अभी कोई खुलासा नहीं हुआ है। मगर उसके लिए एक अलग आईजी की पोस्टिंग करनी होगी। रायपुर कमिश्नरेट में कम-से-कम तीन आईपीएस की पोस्टिंग की जाएगी। पुलिस कमिश्नर के बाद सबसे अधिक उत्सुकता एडिशनल पुलिस कमिश्नर को लेकर है। किसी जिले के एसएसपी को इस पद पर बिठाया जाएगा। वो रायपुर, जशपुर, बिलासपुर और दुर्ग एसएसपी में से कोई भी हो सकता है।

बदनाम निगम

2009 बैच की आईएएस प्रियंका शुक्ला सेंट्रल डेपुटेशन पर दिल्ली जा रही हैं। उन्हें मेरा युवा भारत का सीईओ बनाया गया है। उनकी जगह सरकार को समग्र शिक्षा और पाठ्य पुस्तक निगम में एमडी नियुक्त करना होगा। सरकार को पाठ्य पुस्तक निगम को बदनामी से उबारने का प्रयास करना चाहिए। कायदे से वहां ढांचागत बदलाव की जरूरत है। एमडी से अधिक वहां जीएम पावरफुल हो जाते हैं। एमडी का काम सिर्फ कमीशन लेकर चुप बैठना होता है। बाकी काम जीएम संभालते हैं। पापुनि में कागज का टेंडर अलग, प्रिंटिंग का अलग, उसे स्कूलों तक पहुंचाने का अलग टेंडर होता है। जबकि, बाकी राज्यों में सारे कामों का टेंडर एक साथ हो रहा है। मगर अलग-अलग कामों का अलग-अलग टेंडर करने से कमीशन ज्यादा मिलता है। भले ही स्कूलों में टाईम पर किताबें न पहुंच पाए। इस साल दिसंबर बीतने को है, ढेरों स्कूलों में अभी तक किताबें नहीं पहुंची हैं।

कलेक्टरों की वैकेंसी

हाल में राज्य सरकार ने आधा दर्जन जिलों के कलेक्टर बदले। इसके बाद एक लिस्ट और निकल सकती है। दरअसल, दो जिलों के कलेक्टरों को राज्य सरकार ने सेंट्रल डेपुटेशन के लिए एनओसी दे दिया है। जनवरी में हो सकता है भारत सरकार में उनकी पोस्टिंग हो जाए। ऐसे में कलेक्टर पोस्टिंग की एक और लिस्ट निकलेगी। कलेक्टर के दावेदारों के लिए ये गुड न्यूज है...नए साल में जिला मिलेगा।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या ये सही है कि पाठ्य पुस्तक निगम की छपने वाली किताबों के पन्नों का वेट 70 जीएसएम से बढ़ाकर 80 जीएसएम किया गया है ताकि बिलिंग ज्यादा हो सके?

2. कांग्रेस में प्रियंका गांधी के स्ट्रांग होने से छत्तीसगढ़ कांग्रेस की राजनीति में भूपेश बघेल और मजबूत होंगे?

शनिवार, 20 दिसंबर 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: नितिन नबीन: कहीं खुशी, कहीं गम

 तरकश, 21 दिसंबर

संजय के. दीक्षित

कहीं खुशी, कहीं गम

छत्तीसगढ़ के बीजेपी प्रभारी नितिन नबीन अब पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बन गए हैं और अगले महीने पूर्णकालिक भी हो जाएंगे। नितिन के पार्टी सुप्रीमो बनने से छत्तीसगढ़ के बीजेपी नेताओं का एक वर्ग खुश है तो कुछ लोगों को 440 वोल्ट का झटका लगा है। इनमें कई मंत्री शामिल हैं तो कुछ निगम-मंडलों के चेयरमैन और संगठन के बड़े नेता भी। असल में, नितिन के पास सारे नेताओं की कुंडली है कि कौन क्या गुल खिला रहा है। उन्हें उन मंत्रियों के बारे में भी पता है कि सरकार बनते ही बिना वक्त गंवाए कैसे तूफानी बैटिंग शुरू कर दी। और उनकी नोटिस में यह भी है कि संगठन का कौन नेता पोस्टिंग और सप्लाई-ठेका के जरिये अपने होने की कीमत वसूल रहा है। जाहिर है, आने वाले टाईम में मंत्रिमंडल का पुनगर्ठन होगा, फिर उसमें नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने का असर भी दिखेगा। बता दें, नितिन छत्तीसगढ़ के पहले बीजेपी प्रभारी होंगे, जो दो साल में पूरे छत्तीसगढ़ को मथ दिया। 146 ब्लॉकों में से शायद ही कोई उनकी पहुंच से बचा होगा। रायपुर बीजेपी ऑफिस में बैठकर किस विधानसभा में कितना पोस्टर-बैनर भेजना है, वे ये भी तय करते थे और ग्राउंड पर जाकर खुद भी परखते थे कि वहां की सीट निकालने के लिए किस रणनीति पर काम करना होगा। इसके चलते छोटे-से-छोटे अल्पज्ञात कार्यकर्ताओं से भी उनके सीधे संवाद है। ऐसे में, दिल्ली में बैठकर भी छत्तीसगढ़ की चीजें उनसे अछूती नहीं रहेंगी। और चीजें जब उनकी नोटिस में रहेंगी तो जानते ही हैं क्या होगा? लिहाजा, कुछ लोगों का दुखी होना स्वाभाविक है।

सप्लायर को फटकार 

बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन की छबि कितनी साफ-सुथरी है कि बिहार में लगातार 20 साल से विधायक और मंत्री होने के बाद भी उन पर अब तक कोई आरोप नहीं लगा। छत्तीसगढ़ से जुड़ा एक वाकया भी उनका काफी चर्चा में रहा था। दिसंबर 2023 में बीजेपी की सरकार बनने के बाद बहुचर्चित 300 करोड़ के सीजीएमएससी कांड में जब ठेकेदार को कहीं से कोई रहम मिलता नहीं दिखा तो कुछ भाई साहबों ने उसे सलाह दी कि नितिन नबीन से जाकर मिलो, शायद वहां मोक्ष मिल जाए। सप्लायर सूटकेस लेकर पटना पहुंच गया। नितिन को पता चला कि तो उन्होंने न केवल मिलने से मना किया बल्कि स्टाफ से जमकर फटकार भी लगवाई। नितिन नबीन जब ऐसे हैं तो मंत्रियों के 40 परसेंट रेट का क्या होगा?

सातवें नंबर से टॉप पर

नितिन नबीन को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का फैसला इतना चौंकाने वाला था कि किसी को सहसा यकीं नहीं हुआ। जब यह खबर आई तो वे पटना के कार्यकर्ता सम्मेलन में थे और वक्ता के तौर पर उनके बोलने का क्रम सातवें नंबर पर था। प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल, उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी तथा विजय सिनहा, सांसद रविशंकर प्रसाद, विवेक ठाकुर, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष नंदकिशोर यादव। फिर नितिन नबीन। मगर एक झटके में वे सातवें से नंबर वन पर पहुंच गए। बीजेपी में वे नंबर वन रहेंगे ही, पार्टी प्रोटोकॉल में भी पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के बाद उनका स्थान होगा।

बिल्डरों को तोहफा, जनता को?

जमीनों के गाइडलाइन रेट के युक्तियुक्तकरण से आई कयामत के बावजूद छत्तीसगढ़ के बिल्डर बड़े गदगद हैं। सरकार ने उन्हें न्यू ईयर गिफ्ट देते हुए रजिस्ट्रेशन में सुपर बिल्डअप का क्लॉज समाप्त कर दिया है। याने फ्लैट की रजिस्ट्री अब बिल्डअप एरिया के हिसाब से होगी। जाहिर है, इससे रजिस्ट्री का रेट 30 से 40 परसेंट कम हो जाएगा। ये पैसा सरकार के खजाने में जाता था। बिल्डअप एरिया के हिसाब से रजिस्ट्री होने से अब फ्लैट का रेट कम हो जाएगा। इससे फ्लैट के सेल तेज होगा। मगर प्रश्न उठता है सुपर बिल्डअप का रजिस्ट्री चार्ज नहीं लगेगा तो फिर आम आदमी से सुपर बिल्डअप का रेट कैसे? रेरा के एक्ट में भी स्पष्ट तौर से कहा गया है कि सुपर बिल्डअप डेवलपमेंट का हिस्सा है, उसका रेट अलग से नहीं लिया जा सकता। सुपर बिल्डअप में सीढ़ी से लेकर लॉन और बाल्कनी तक बिल्डर जोड देते हैं। अब आप कहेंगे कि बिल्डर को अगर सुपर बिल्डअप का रेट नहीं लेने कहा जाएगा तो वो वह फ्लैट का रेट बढ़ा देगा...याने घूमा-फिराकर वही पड़ेगा। तो इसका जवाब है...बिल्डअप-सुपरबिल्डअप के फेर में आम आदमी गुमराह हो जाता है। आमतौर पर होता ऐसा है कि कोई फ्लैट खरीदने जाता है तो उसे फुट के हिसाब से रेट बताया जाता है। बाद में जब सौदा पटने लगता है तो पता चलता है कि रजिस्ट्री इतने की नहीं, इतने सुपरबिल्डअप एरिया की होगी। ऐसे में, कस्टमर बिल्डरों के ट्रिक में फंस जाता है। इसे रेरा को देखना चाहिए। 2013 में उसका गठन ही उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने के लिए किया गया था।

सीएस का सचिवालय

मुख्यमंत्री की तरह मुख्य सचिव को भी अपने सचिवालय में अपने हिसाब से अफसर पोस्ट करने की स्वतंत्रता होती है। फिर भी सक्षम अधिकारियों को ही सीएस सचिवालय में पोस्टिंग होती है। देश के कई राज्यों में आईएएस भी सिकेट्री होते हैं और राज्य प्रशासनिक सेवा के भी। छत्तीसगढ़ में भी सुनिल कुमार ने 2003 बैच की आईएएस ऋतु सैन को अपना ज्वाइंट सिकरेट्री बनाया था। उनसे पहले आरपी बगाई के सीएस रहने के समय आईएएस ईशिता राय उनके सचिवालय में रहीं। इन दो के अलावा हमेशा राप्रसे अधिकारियों को ही सीएस सचिवालय का हेड बनाया गया। दरअसल, सीएस के सिकरेट्री को पीएमओ, डीओपीटी से लेकर भारत सरकार के मंत्रालयों तक से बात करनी होती है, इसलिए कंपिटेंट अफसरों को ही इस पद पर बिठाया जाता है। हालांकि, अमिताभ जैन ने नया प्रयोग किया था...नायब तहसीलदार कैडर से प्रमोट हुए अधिकारी को अपना सिकेट्री बनाया था। इससे उनको कितना फायदा हुआ, ये तो नहीं मालूम। मगर अब नए सीएस सचिवालय के हेड की तलाश शुरू हो गई है। कायदे से सीएस सचिवालय में आईएएस को ही बिठाना चाहिए। भले ही राजभवन की तरह एक अच्छी पोस्टिंग उसके लिए सुनिश्चित कर दी जाए।

मंत्री आगे, सिकेट्री पीछे!

सरकार ने सचिवों को हर तीन महीने में अपने विभाग का रिपोर्ट कार्ड मीडिया से शेयर करने कहा था। इसके अतिरिक्त प्रेस नोट, सक्सेस स्टोरी से लेकर सोशल मीडिया पोस्ट तक में मार्किंग सिस्टम बनाया गया था। याने इतने पोस्ट पर इतने अंक मिलेंगे। इससे सचिवों का परफर्मेंस परखा जाना था। प्रेस कांफ्रेंस के लिए सरकार ने बकायदा शेड्यूल जारी किया था। इस तारीख को ये सिकेट्री प्रेस मिलेंगे तो फलां तारीख को ये। मगर आलम यह है कि 20 दिन से ज्यादा गुजर गया, अभी तक दो-तीन सचिव ही मीडिया को फेस कर पाए हैं। सचिवों से आगे मंत्री निकल गए हैं। अभी तक चार-पांच मंत्री सरकार की उपलब्धियों पर मीडिया को एड्रेस कर चुके हैं। मुख्यमंत्री के अनुमोदन से सचिवों को यह काम सौंपा गया था, इसे तो टॉप प्रायरिटी पर होना चाहिए।

सीईओ गायब?

बेमेतरा जिला पंचायत सीईओ प्रेमलता पद्माकर के आवास पर 19 नवंबर को एसीबी ने छापा मारा था। कमिश्नर लैंड रिकार्ड में पोस्टिंग के दौरान पटवारी से आरआई प्रमोशन घोटाले में उनका भी नाम है। इसी सिलसिले में एसीबी उनके घर दबिश दी। छापे में अहम साक्ष्य मिलने पर एसीबी ने उनके खिलाफ मुकदमा कायम कर लिया। इसके बाद से सीईओ का कोई पता नहीं है। पता नहीं, पंचायत या जीएडी की नोटिस में ये है भी कि नहीं? अगर नोटिस में नहीं है तो ये भी गंभीर है और नोटिस में होने के बाद भी वहां अब तक कोई पोस्टिंग नहीं करना उससे भी ज्यादा गंभीर है।

प्रशासन या तमाशा!

राजधानी रायपुर से लगभग लगा जिला है बेमेतरा। बेमेतरा में प्रशासन का क्या हाल है, आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि एक अफसर पूरे जिले का माई-बाप है। अपर कलेक्टर में प्रमोट होने के बाद प्रकाश भारद्वाज के पास अभी भी एसडीएम का प्रभार है। इसके साथ एडीएम का चार्ज भी। जिला पंचायत सीईओ के गोल होने पर कलेक्टर के कहने पर वहां का दायित्व भी संभाल रहे तो दो दिन से प्रभारी कलेक्टर भी। रणवीर शर्मा ने ट्रांसफर के बाद अपर कलेक्टर को चार्ज हैंड ओवर कर दिया। याने एक ही आदमी एसडीएम, एडीएम, अपर कलेक्टर, जिला पंचायत सीईओ और कलेक्टर भी। गजबे हाल है भाई प्रशासन का।

कार्रवाई या प्रमोशन?

सरकार ने कोरबा कलेक्टर अजीत बसंत का ट्रासंफर कर सरगुजा का कलेक्टर बनाया है। उनके तबादले को पूर्व गृह मंत्री ननकीराम कंवर की नाराजगी से जोड़कर देखा गया। सोशल मीडिया में भी इसी लाईन पर खबर चली। मगर ये समझ में नहीं आता कि अंबिकापुर जैसे जिले का कलेक्टर बनना कार्रवाई कैसे हुई? संभागीय मुख्यालय होने की वजह से अंबिकापुर का इम्पार्टेंस अभी भी कम नहीं हुआ है। फिर वह मुख्यमंत्री का गृह संभाग भी है। इस दृष्टि से भी सरगुजा में ठीकठाक अधिकारियों की पोस्टिंग दी जाती है। रही बात...कोरबा की तो वह कमाई-धमाई के हिसाब से टॉप का जिला हो सकता है। मगर अजीत बसंत इस टेम्परामेंट वाले रहे नहीं। सो, कोरबा में रहें या अंबिकापुर में, उन्हें क्या फर्क पड़ता है। ऐसे में तो ये प्रमोशन ही हुआ न।

सबसे खराब पोस्टिंग?

छत्तीसगढ़ सरकार ने इस हफ्ते 11 आईएएस अधिकारियों के तबादले किए, उनमें सबसे खराब पोस्टिंग अंबिकापुर के कलेक्टर भोस्कर विलास संदीपन की रही। उन्हें एडिशनल इलेक्शन ऑफिसर बनाया गया है। सूबे के टॉप फाइव रैंक के जिले की कलेक्टरी करके आने वाले अफसर को कभी भी इतनी खराब पोस्टिंग नहीं मिली। अभी कोई इलेक्शन भी नहीं है, जिसके लिए वहां अफसरों की जरूरत हो। अलबत्ता, हैरानी इस बात की भी कम नहीं है कि इतने लंबे समय तक अंबिकापुर में वे टिक कैसे गए? छबि तो उनकी साफ-सुथरी है मगर इसके साथ व्यवहारिक होना भी जरूरी है। बहरहाल, यह सवाल बना रहेगा कि डिविजनल हेडक्वार्टर वाले जिले से सीधे निर्वाचन में पटक देना...आखिर ये हुआ क्यों?

प्रमोटी आईएएस मायूस

कलेक्टरों के बहुप्रतीक्षित ट्रांसफर से प्रमोटी आईएएस अधिकारियों को भी बड़ी उम्मीदें थीं। तीन-चार अधिकारी कुछ भाई साहबों की परिक्रमा भी कर चुके थे। मगर लिस्ट आई तो आवाक रह गए। किसी को कामयाबी मिली नहीं। सभी छह जिलों में डायरेक्ट आईएएस को कलेक्टर बनाया गया। प्रमोटी वालों को कम-से-कम बेमेतरा और नारायणपुर से बड़ी आस थी। खास कर नारायणपुर से। क्योकि, पिछले दो-तीन बार से ऐसा हो रहा कि डायरेक्ट वाले वहां से कम समय में ही खो हो जा रहे। कांग्रेस शासनकाल में एक विधायक की नाराजगी से अभिजीत सिंह छह महीने में ही हटा दिए गए थे तो अभी प्रतिष्ठा ममगई को लेकर भी कुछ बातें थीं। मगर सरकार ने नारायणपुर के साथ बेमेतरा में भी डायरेक्ट वालों को पोस्ट करना मुनासिब समझा।

कलेक्टर्स अच्छे और एसपी?

छह कलेक्टरों की पोस्टिंग के बाद 33 में से 20 से अधिक जिलों में कलेक्टरों की टीम अच्छी हो गई हैं। इससे पहले जो लिस्ट आई थी, उसमें भी सरकार ने काम और छबि का ध्यान रखा था...इस बार की लिस्ट में भी इसे टॉप प्रायरिटी दिया गया। जाहिर है, मंत्रालय और डायरेक्ट्रेट सरकार के इंजन होते हैं तो कलेक्टर उसके पहिया। पहिया ही डिफेक्टिव रहेगा तो ट्रेन स्पीड में कैसे दौड़ेगी? बहरहाल, कलेक्टरों की टीम लगभग अच्छी हो गई है मगर पुलिस अधीक्षकों में अभी स्थिति खास बदली नहीं। लिहाजा, रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, जांजगीर और जशपुर जैसे महत्वपूर्ण जिले प्रमोटी आईपीएस संभाल रहे। पिछले कुछ बरसों में आईपीएस का कैडर इतना डिरेल्ड हो गया कि सरकार को उस लायक कोई क्रेन और जेसीबी नहीं मिल रहा कि उसे उठाकर पटरी पर रखा जाए। पूर्व डीजीपी को छह महीने का एक्सटेंशन मिल गया और वर्तमान डीजीपी के आगे से प्रभारी शब्द हट नहीं पा रहा। पूरा दोष पीएचक्यू को भी नहीं दिया जा सकता...आधा दर्जन अधिकारियों के खिलाफ इंक्वायरी की फाइलें छह महीने से घूम रही, अनुमति मिलेगी कि नहीं, ये भी क्लियर नहीं। कुछ मिलाकर छत्तीसगढ़ पुलिस का भगवान मालिक हैं।

आईपीएस के तबादले

31 दिसंबर को आईपीएस अधिकारियों की एक लिस्ट निकलेगी। इसमें आईजी लेवल से लेकर डीआईजी, एसपी रैंक के आईपीएस होंगे। दरअसल, एक जनवरी से रायपुर में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू होना लगभग पक्का हो गया है। आईजी रैंक के किसी आईपीएस को पुलिस कमिश्नर बनाया जाएगा और डीआईजी या सलेक्शन ग्रेड वाले को एडिशनल पुलिस कमिश्नर। इसके अलावे चार डीसीपी में से दो आईपीएस एसपी रैंक के होंगे। इसके लिए कुछ दूसरे जिलों से भी आईपीएस अधिकारियों को रायपुर बुलाया जाएगा। कुल मिलाकर आईपीएस की लिस्ट में अबकी गुड गवर्नेंंस दिख सकता है।

सूचना आयुक्तों पर उलझन

विधानसभा का शीतकालीन सत्र भी निकल गया। 17 दिसंबर की देर शाम तक मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के दावेदार टकटकी लगाए रह गए। शायद जीएडी से कोई आदेश निकल जाए। कई बार सरकार देर रात भी आर्डर जारी कर रही, इसलिए रात आंखों में कट गई। मगर सरकार बड़ी निर्मोही निकली...कम-से-कम अपने एक्स चीफ सिकरेट्री का ही ध्यान रख लेती। वो भी नहीं हुआ। पता चला है, सिफारिशों की बोझ से सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की फाइल दब गई है। सिस्टम करें तो क्या करें। इतने भाई साहबों के फोन आ चुके हैं कि सिस्टम कुछ समझ नहीं पा रहा...आखिर किसको नाराज करें। उधर अप्लीमेंट भी पीछे नहीं हैं...सवाल चार लाख महीने सेलरी की है। सवा दो लाख वेतन और उपर से 54 परसेंट डीए। सब मिलाकर एकाउंट में करीब-करीब चार लाख। आवेदकों में कुछ योग्य और काबिल लोग भी हैं। मगर बाकी के चक्कर में उनका मामला भी उलझ गया है।

कमिश्नर, जय रामजी

मनरेगा का नाम बदलकर जी जय रामजी हो गया है। मगर जब तक यह प्रचलन में नहीं आएगा तब तक इस योजना में कार्यरत लोगों को काफी कठिनाई आएगी। अब पदनाम को ही देखिए। छत्तीसगढ़ में इस योजना के कमिश्नर हैं तारन सिनहा। वे अब अपना परिचय क्या देंगे....कमिश्नर जी जय रामजी। कुछ दिन तो लोग समझ नहीं पाएंगे। पूछ रहा हूं पदनाम और बोल रहे जी...जयराम। जय राम जी का उल्टा अर्थ भी निकाला जाता है। याने जय राम हो गए। जी रामजी के इम्प्लाई ग्रुप में भी इस पर खूब चुटकी ली जा रही। 

अंत में दो सवाल आपसे

1. सरकार ने डेपुटेशन पर जा रहीं आईएएस डॉ0 प्रियंका शुक्ला को पाठ्य पुस्तक निगम और समग्र शिक्षा में क्यों बिठाया?

2. सरकार द्वारा कई बड़े रिफार्म करने के बाद भी उसका मैसेज आम जनता में नहीं जा पा रहा, उसके पीछे कौन-सी वजहें हैं?