रविवार, 10 जून 2012

तरकश, 10 जून


फिर विवाद में

आठ साल के वनवास के बाद मेन स्ट्रीम में लौटे हायर एजुकेशन सिकरेट्री आरसी सिनहा एक बार फिर विवाद में घिर गए हैं। मामला है, मापदंड पूरा न करने वाले 10 बीएड कालेजों को काउंसलिंग की इजाजत देने का। इसके लिए उन्होंने न तो सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइन का ध्यान रखा और न ही उदधार करके वनवास से वापसी कराने वाले अपने चीफ सिकरेट्री सुनील कुमार के फैसले का ही खयाल किया। दरअसल, सुविधाओं के अभाव में इन कालेजों को पिछले साल एडमिशन देने से रोक दिया गया था। मगर कालेज संचालकों ने हार नहीं मानी। परदे के पीछे हुए डील के बाद पिछले साल की काउंसलिंग इस साल कराने के लिए फाइल मूव हुर्इ। लेकिन एससीर्इआरटी ने सुप्रीम कोर्ट के इस नियम का हवाला देते हुए, 30 सितंबर के बाद किसी भी प्रोफेशनल कोर्सेज में दाखिला नहीं हो सकता, काउंसलिंग कराने से इंकार कर दिया था। मगर डील को अंजाम तक पहुंचाना था......सो, यह जानते हुए भी कि काउंसलिंग का अधिकार एससीर्इआरटी का है, स्कूल शिक्षा विभाग ने, कहीं से भी हां हो जाए, हायर एजुकेशन सिकरेट्री सिनहा से अभिमत मांगा। और उन्होंने अनुमति दे भी दी। जबकि, तत्कालीन एसीएस स्कूल एजुकेशन सुनील कुमार ने कड़ी टीप लिखते हुए जनवरी में काउंसलिंग की फाइल लौटा दी थी। सुनील कुमार ने इस स्तंभकार से बातचीत में साफ कहा था, मेरे रहते सवाल ही नहीं उठता। मगर उनके स्कूल एजुकेशन से हटते ही खेल हो गया। मंत्रालय में चर्चा है, सिनहा ने दबाव में आकर अपनी कलम फंसा ली।

दस का दम

रिटायर आर्इएएस अफसर एसवी प्रभात को प्रशासनिक अकादमी में संविदा नियुकित देने में कड़ा रुख अखितयार कर सरकार ने आखिर अपना दम दिखाया। प्रभात हमेशा डेपुटेशन पर रहे और एक बार तो डेपुटेशन के लिए इजाजत न मिलने पर आर्इएएस से इस्तीफे की धमकी भी दे डाली थी। हालांकि, राज्य को पुनर्वास केंद्र समझने वाले आर्इएएस अधिकारियों को सरकार के इस फैसले से झटका लगा होगा मगर लोगों में इसके अच्छे संदेश गए हैं। हर जगह यही चर्चा है, पहली बार लगा, सरकार बड़ी होती है.....। इससे पहले, आठ साल में चार सीनियर आर्इएएस अफसरों को सस्पेंड करने के बाद भी रमन सरकार अफसरशाही हावी होने के आरोप से बच नहीं पा रही थी। इसको लेकर सत्ताधारी पार्टी के आला नेता भी मुखर हो रहे थे। आयकर छापे के बाद आखिर एक आर्इएएस पर कार्रवार्इ में सरकार ने कर्इ हफते जो लगा दिए थे।

चिंता

कलेक्टरों के पुअर पारफारमेंस ने सरकार की चिंता बढ़ी दी है। पिछले सोमवार को सरकार ने कलेक्टरों से वीडियोकांफ्रेंसिंग के जरिये राज्य का हाल जानना चाहा तो 27 में से एक भी कलेक्टर कसौटी पर खरे नहीं उतरे। तेज-तर्रार माने जाने वाले रायगढ़ कलेक्टर अमित कटारिया को चीफ सिकरेट्री सुनील कुमार ने चुप करा दिया। वे बार-बार पटरी से उतर जा रहे थे। सवाल कुछ, जवाब कुछ और। बेमेतरा कलेक्टर श्रुति सिंह से मुख्यमंत्री ने पूछा, आपके जिले में कितने पटवारी हैं, जवाब मिला, पांच सौ। मंत्रालय के वीडियोकांफें्रसिंग हाल में बैठे सारे लोग माथा पकड़ लिए। छोटे जिले में पांच सौ पटवारी हो ही नहीं सकते। कर्इ कलेक्टर मामूली सवालाें पर भी बगले झांकते रहे। सुकमा कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन का पारफारमेंस एकदम बैड रहा। वे बोल नहीं पा रहे थे। एक अफसर की टिप्पणी थी, लग नहीं रहा, एलेक्स नक्सलियों के चंगुल से छुट गया है। इसे देखकर लगता है, मानसून सत्र के बाद कलेक्टरों की मेजर सर्जरी होगी।

खतरे में मूलधन

अन्य राज्यों की तरह फारेस्ट सर्किल में सीएफ की जगह सीसीएफ पोस्ट करने की खबर से कर्इ आर्इएफएस अफसरों की नींद उड़ गर्इ है। खास तौर से उनकी, जो छह महीने पहले सीएफ बनें हैं। इसके लिए क्या नहीं किया। मगर दुर्भाग्य देखिए, जितना इंवेस्ट किए, उसका मूलधन भी वसूल नहीं हुआ और खतरे का अलार्म बज गया। दो सीएफ ने गरमी में ठंड प्रदेशों में जाने के लिए छुटटी की अर्जी लगार्इ थी। मगर सीसीएफ पोसिटंग की खबर मिलते ही आवेदन वापस ले लिया। आखिर, कुछ तो रिटर्न आ जाए। यही नहीं, डीएफओ से सीएफ प्रमोट होने वाले अफसरों में उदासी छायी हुर्इ है। अब सात-आठ साल वन मुख्यालय में दिन काटने पडे़ंगे। अलबत्ता, अरण्य में दिन काट रहे सीसीएफ के चेहरे अब खिले हुए हैं। सीसीएफगिरी करने का मौका जो मिलने जा रहा है।

नंदू की बारी

गुटबाजी भाजपा में भी कम नहीं है और इससे कोर्इ पार्टी बच भी नहीं सकती। मगर कांग्रेस की गुटजाबी की तो बात ही अलग है। भाजपा मेंं गुटबाजी की एक लक्ष्मण रेखा है। कांग्रेस ने ऐसी कोर्इ रेखा नहीं बनार्इ है। जिस इंग्रेड मैक्लाउड का अपना जनाधार नहीं है, मंच पर न बिठाने से खफा होकर उन्होंने राहुल गांधी के कार्यक्रम में इस्तीफे की घोषणा कर दी। और अब देखिए, बुधवार को अजीत जोगी नंदकुमार पटेल के विधानसभा क्षेत्र खरसिया गए थे। इसके दो दिन पहले से उनके समर्थक दौरे को राजनीतिक रंग देने में जुटे रहे। यह भी बताते रहे, पिछले बार भूपेश बघेल और महंेंद्र कर्मा निशाने पर थे......दोनों चुनाव में निबट गए। अबकी नंदू और चौबे की बारी है। यही हाल रहा तो अनुमान लगाइये, अगले चुनाव में कांग्रेस का क्या होगा?

गजब

किसानों के लिए काम करने वाले कृषि मंडी बोर्ड में क्या चल रहा है, आपको इससे अंदाजा लग जाएगा। सूचना के अधिकार में जानकारी लगी है, बोर्ड के अधिकारी महीने भर में आठ हजार रुपए की काफी पाउडर खरीद डाले। दूध, चीनी अलग से। बोर्ड की मीटिंग के नाम पर दो साल में डेढ़ लाख रुपए खाने पर खर्च का बिल पास हुआ है। बोर्ड में गिने-चुने अधिकारी हैं। सब मिलाकर 50 लोग भी नहीं होंगे। पता चला है, बोर्ड से जुड़े लोगों के घर का खर्च भी बोर्ड से पास हो रहा है। ऐसे में अनाप-शनाप बिल तो बनेगा ही।

अंत में दो सवाल आपसे

1. राज्य प्रशासनिक सेवाओं के 14 अफसरों को आर्इएएस अवार्ड के लिए केंद्र सरकार को मिनिटस भेजने में सामान्य प्रशासन विभाग ने तीन महीने क्यों लगा दिए?
2. आरपी मंडल को पहले प्रींसिपल सिकरेट्री और अब, प्रधान को इंजीनियर इन चीफ बनाने से पीडब्लूडी मिनिस्टर बृजमोहन अग्रवाल खुश होंगे या नाखुश?

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