शनिवार, 22 नवंबर 2014

तरकश, 22 नवंबर

तरकश, 23 नवंबर

तरकश

मंत्रीजी का गांव प्रेम

रमन सिंह की तीसरी पारी में गृह मंत्री भले ही चेंज हो गए मगर पुलिस महकमे की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। नए गृह मंत्री रामसेवक पैकरा के साथ दिक्कत यह है कि उनका अधिकांश समय अपने गांव में गुजरता है। कैबिनेट न रहा, तो कई बार पंद्रह-पंद्रह दिन मंत्रीजी राजधानी से बाहर रहते हैं। उनके पास कंपीटेंट स्टाफ का भी टोटा है। किसी तरह फाइल मंत्रीजी के आफिस तक पहुंच भी गई, तो आसानी से कोई उसे समझने वाला नहीं है। ऐसे में, मंत्रालय और पुलिस मुख्यालय में फाइलों का ढेर लगना लाजिमी है। पता चला है, सरकार अब मंत्रीजी को एक डिप्टी कलेक्टर देने पर विचार कर रही है, ताकि फाइलों का डिस्पोजल तेज हो सकें। साथ ही, उन्हें कुछ वक्त राजधानी को देने के लिए भी कहा जा सकता है।

असरदार लोग

देश की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित न्यूज मैग्जीन इंडिया टुडे के इस साल के उंचे और असरदार लोगों के ताजा अंक में सभी राज्यों से 10-10 पावरफुल शख्सियतों को शामिल किया गया है। इंडिया टुडे ने दिल्ली की एक एजेंसी को सर्वे का काम सौंपा था। उसकी रिपोर्ट के आधार पर छत्तीसगढ़ में राजनीति से अजीत जोगी, सौदान सिंह और अभिषेक सिंह, ब्यूरोके्रट्स में चीफ सिकरेट्री विवेक ढांड, प्रींसिपल सिकरेट्री टू सीएम अमन सिंह, सिकरेट्री टू सीएम सुबोध सिंह, बस्तर आईजी एसआरपी कल्लूूरी, ज्वाइंट सिकरेट्री टू सीएम एंड डीपीआर रजत कुमार, मीडिया से हरिभूमि के प्रबंध संपादक डा0 हिमांशु द्विवेदी, समाज सेवा से रायगढ़ के रमेश अग्रवाल को शामिल किया गया है।

इसे कहते हैं जोगी

अजीत जोगी के संगठन खेमे से रिश्ते कैसे हैं, यह बताने की जरूरत नहीं। मगर बिना किसी मान-मनुहार के जोगी ने अगर पीसीसी की पदयात्रा में शामिल होने की सहमति दे दी है, तो इसके अपने कारण हैं। असल में, जोगी के पास कोई चारा नहीं है। केंद्र में सरकार है नहीं, और छत्तीसगढ़ में चार साल तक कोई चांस नहीं है। इसलिए, अब संगठन ही बच गया है। जाहिर है, सदस्यता अभियान के बाद प्रदेश में चुनाव होगा। जोगी सतर्क हैं कि उनकी एकला चलो वाली राजनीति का संदेश अब कार्यकर्ताओं में न जाए। रणनीति के तहत अब वे एकला भी चलेंगे और सबके साथ भी। याद होगा, चुनाव आयोग के खिलाफ वे पार्टी के दिल्ली धरना में भी शामिल हुए थे। धान मामले में भी वे चक्का जाम में शामिल होने का ऐलान किया था। मगर राजधानी के तेलीबांधा पहुंचे, तो पता चला कि वहां कोई कार्यकर्ता नहीं है। वे उल्टे पांव वापिस हो गए थे। जाहिर है, दोनों मैसेज गए। एक, जोगीजी पार्टी कार्यक्रम को अंगीकार किया। दूसरा, संगठन एक्सपोज हुआ कि उसमें आंदोलन चलाने का दम नहीं है। इसे ही कहते हैं जोगी।

लास्ट बाल पर छक्का

संजय पिल्ले एसीबी से जाते-जाते लास्ट बाल पर छक्का मार गए। एसीबी ने 15 नवंबर को सुबह हाउसिंग बोर्ड के डिप्टी कमिश्नर डीके दीवान के घर छापा मारा और शाम को पिल्ले को एडीजी योजना और प्रबंध तथा सशस्त्र बल का आर्डर हो गया। दीवान के घर से 10 करोड़ रुपए से अधिक की संपति का खुलासा हुआ है। याने राज्य बनने के बाद 14 साल में एसीबी का यह सबसे बड़ा शिकार होगा। तभी तो सरकार ने पिल्ले को छक्का मारने का ईनाम कुछ घंटे में ही दे दिया।

ईओडब्लू का मतलब

मुकेश गुप्ता को ईओडब्लू और एसीबी का एडीजी बनाकर भेजने से लगता है कि भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ अब मुहिम तेज की जाएगी। एजेंसी में कई आईएएस अफसरों, आला अधिकारियों और नेताओं के खिलाफ सालों से मामले दर्ज हैं। ईओडब्लू में दर्ज मामले के आधार पर ही तमिलनाडू की सीएम जयललिता को कुर्सी गंवानी पड़ी तो आंध्र के सीनियर आईएएस प्रदीप शर्मा जेल में हैं। और, इसी साल छत्तीसगढ़ के एक मंत्रीजी भी बाल-बाल बचे थे। मुकेश गुप्ता के ईओडब्लू में आने से भ्रष्ट अफसरों में खलबली तो होगी मगर लाख टके का सवाल यह है कि बिना टीम के वे करेंगे क्या। मैनपावर का भारी टोटा है। ईओडब्लू में पिछले दो साल से एसपी का पोस्ट खाली है, चार की जगह एक डीएसपी हैं। 12 में तीन इंस्पेक्टर हैं। कमोवेश यही स्थिति एसीबी की भी है। छापे डालने से वाहवाही मिल जाती है मगर स्टाफ है नहीं इसलिए, विवेचना ठंडे बस्ते में चली जाती है। इसी वजह से पंद्रह-पंद्रह साल के मामले ब्यूरो में लंबित हैं।

हेवी डोज

नसबंदी कांड में इस्तेमाल किए गए सिप्रोसिन की श्रीराम लेब दिल्ली और नागपुर से जांच रिपोर्ट आ गई है। इसमें सिर्फ जिंक फास्फेट की पुष्टि ही नहीं हुई है, बल्कि हेवी डोज का पता चला है। रिपोर्ट के अनुसार श्रीराम लेब में पांच चूहों को सिप्रोसिन खिलाई गई थी। इनमें से चार मौके पर ही घुलट गए। पांचवें की मौत आधा घंटा बाद हुई। जांच में पता चला कि टेबलेट में 500 एमजी की बजाए 290 एमजी ही सिप्रोसिन है। दवा बनाने वालों ने 210 एमजी की डंडी मार ली। मगर इससे यह नहीं कि आपरेशन करने वाले सर्जन बच जाएं। इंवेस्टीगेशन टीम ने इसके पुख्ता प्रमाण जुटा लिए हंै कि आपरेशन करने में सर्जन ने घोर लापरवाही बरती। छह महीने से बंद अस्पताल, जिसमें चारों तरफ जाला लटका हुआ था, डाक्टर ने जमीन पर सुला कर मरीजों का आपरेशन कर डाला। पुलिस की जांच में यह भी है कि डा0 आरके गुप्ता ने स्टैंडर्ड आपरेशन प्रोसिजर के एक भी प्वाइंट को फालो नहीं किया।

छेद

सरकार ने सीएमओज को इसलिए 10 फीसदी दवाइयां लोकल परजेच करने की छूट दी थी कि दवाई सप्लाई में कभी देरी भी हो तो कुछ जरूरी दवाइयां वे खरीद सकें। इसके लिए अनिवार्य शर्त थी कि इसमें सिर्फ और सिर्फ इमरजेंसी दवाइयां खरीदनी है। मगर सीएमओज ने एंटीबैटिक जैसी नार्मल मेडिसीन भी लोकल परचेज करने लगे। बिलासपुर सीएमओ तो और बड़े वाले निकलेै। उन्होंने महावर फार्मा के लायसेंस भी नहीं देखा और सिप्रोसिन खरीद डाली। पता चला है, महावर फार्मा के पास सितंबर तक का लायसेंस था। मगर बिलासपुर सीएमओ ने अक्टूबर में उससे सिप्रोसिन खरीद ली।

अंत में दो सवाल आपसे

1. नवंबर 2000 में नेता प्रतिपक्ष चयन के लिए पर्यवेक्षक बन कर आए नरेंद्र मोदी को जब बृजमोहन अग्रवाल के समर्थकों ने रौद्र रूप दिखाया था, तो मोदी को किस नेता ने बचाया था?
2. एक मंत्री का नाम बताएं, जो एक दिन इस खेमे में रहते हैं, तो अगले दिन दूसरे में नजर आते हैं?

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें