शनिवार, 27 दिसंबर 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: छत्तीसगढ़ सरकार के काम बड़े...संदेश छोटे!

 तरकश, 28 दिसंबर

संजय के. दीक्षित

काम बड़े...संदेश छोटे!

लास्ट वीक तरकश में एक प्रश्न था...सरकार के कई रिफार्म के बाद भी संदेश क्यों नहीं जा रहे, इसके जवाब अनेक आए। खैर...नई सरकार के दो साल के हिसाब से कैलकुलेट करें तो अतिश्योक्ति नहीं कि 25 साल में सबसे अधिक काम और रिफार्म दो बरस में हुए हैं। देखते-देखते में नक्सलमुक्त छत्तीसगढ़...किसी ने कल्पना नहीं की होगी। नई उद्योग नीति के बाद 8000 करोड़ के निवेश। पहली बार पूंजी निवेश की साइज के आधार पर सब्सिडी की बजाए लोकल लोगों को रोजगार के आधार पर सब्सिडी। सूबे में सेमीकंडक्टर और फार्मा जैसी इंडस्ट्रीज आ रही। राजस्व और पंजीयन में ऐतिहासिक सुधार। जमीनों का आटोमेटिक नामंतरण, ऋण पुस्तिका की समाप्ति, गाइडलाइन रेट का युक्तियुक्तकरण। 13 हजार से अधिक स्कूलों और शिक्षकों का युक्तियुक्तकरण। वर्क कल्चर के लिए ऑनलाइन अटेंडेंस। पारदर्शिता के लिए ई-ऑफिस सिस्टम...सारी फाइलें, नोटशीट अब ऑनलाइन। देश में छत्तीसगढ़ फर्स्ट स्टेट, जहां मंत्रालय और एचओडी ऑफिस में ऑनलाइन वर्किंग। जीएसटी में सबसे अधिक टैक्स। अब आपका सवाल, इतने काम तो फिर आम आदमी में इसके संदेश क्यों नहीं? दरअसल, ओवरऑल गुड परफार्मेंस के लिए काम और रिफार्म के अलावे सिस्टम का औरा भी जरूरी होता है, जो दो साल में बन नहीं पाया। जाहिर है, जनता इस औरे से ज्यादा चमत्कृत होती है। करप्शन का लेवल कम नहीं हुआ। पहले कुछ परसेंट काम बिना पैसे के हो जाते थे, अब मंत्री-मिनिस्टर या बड़े लोगों की सिफारिशों का भी महत्व नहीं रहा। मंत्रिमंडल में सामूहिक उत्तरदायित्व की कमी। कई ऐसे मसले आए, जब मंत्री अपने साथी मंत्री या सरकार के बचाव में सामने आना मुनासिब नहीं समझा। उल्टे गाइडलाइन रेट को लेकर अपने ही सरकार पर हमलावर। शुरूआती बरस में संगठन में बैठे कुछ दिव्य आत्माओं द्वारा ट्रांसफर, पोस्टिंग और नियुक्तियों में सरकार को डेंट। तो बीजेपी के असंतुष्ट नेताओं द्वारा सेल्फ गोल। रुलिंग पार्टी के लोग ही लगेंगे सरकार की चाल में मीन-मेख निकालने तो आम आदमी क्या कहेगा? कुछ बुनियादी चीजें भी। सबसे अधिक हेल्थ की हालत खराब। किसी भी सरकारी अस्पतालों में समूचित दवाइयां नहीं। बच्चों के वैक्सीन के लिए भटकता आम आदमी। दवाइयां खरीदने की बजाए ज्यादा कमाई वाला काम बिल्डिंग निर्माण में दिमाग दौड़ाता सीजीएमएससी। सिस्टम का औरा पुलिस से भी दिखता है। मगर पुलिस बाबाओं के पैर छूने में व्यस्त। वीडियो में दिखा ही, अपराधी को पकड़ने में भले ही कोई हड़बड़ी नहीं, मगर बाबाजी को देखते जूता और टोपी उतारने में देर नहीं। महिला डीएसपी को गिफ्ट में 12 लाख के डायमंड हार मगर सिस्टम गांधीजी के तीन बंदर की तरह। डीएसपी, एडिशनल एसपी के ट्रांसफर की नोटशीट महीनों तक डंप। छह महीने से पुलिस अफसरों के खिलाफ इंक्वायरी की फाइल कहीं दबी पड़ी। ऐसी कई वजहें हैं, जो सरकार के अच्छे कामों का माहौल बनने से रोक दे रहीं। वैसे सीएस विकास शील और पीएस टू सीएम सुबोध सिंह ने चीजों को व्यवस्थित करने का प्रयास किया है। मगर राजनीतिक फैसलों के लिए सिस्टम के पास जरूरी है चाबुक चलाने वाले एक शख्सियत की। क्योंकि, सेल्फ गोल से सरकार की छबि को ज्यादा धक्का लग रहा है। इसी कॉलम में एकाधिक बार लिखा जा चुका है कि रमन सिंह की कामयाबी में सौदान सिंह की बड़ी भूमिका रही।

आईपीएस को विदाई गिफ्ट

2008 बैच के आईपीएस अधिकारियों का अगले महीने जनवरी में आईजी प्रमोशन ड्यू हो जाएगा। मगर डेट ऑॅफ बर्थ के चक्कर में कमललोचन कश्यप के आईजी बनने पर संकट खड़ा हो गया है। सरकारी रिकार्ड में एक जनवरी उनका बर्थ डेट है। जाहिर है, स्कूल में दाखिला लेते समय एक तारीख का डेट दर्ज कराया गया होगा। बहरहाल, रिटायरमेंट नियमों के तहत एक या दो तारीख को अगर जन्म हुआ है तो उसके पहले महीने के लास्ट डेट को रिटायरमेंट हो जाएगा। लिहाजा, कमललोचन इसी 31 दिसंबर को रिटायर हो जाएंगे। अब सवाल उठता है, राज्य सरकार क्या उन्हें आईजी प्रमोट कर विदाई देगी या डीआईजी से ही उन्हें सेवानिवृत्त होना पड़ेगा। इससे पहले कई दृष्टांत है कि आईएएस, आईपीएस को समय से पहले प्रमोशन दिया गया। रमन सिंह की दूसरी पारी में आईपीएस आरसी पटेल को एडीजी प्रमोशन का आदेश रिटायरमेंट की रात 10 बजे जारी हुआ था। जबकि, उनके बैच के प्रमोशन में तीन-चार महीना बाकी था। आईएएस में जवाहर श्रीवास्तव से लेकर आरएस विश्वकर्मा को सचिव से प्रमुख सचिव भी इसी तरह आखिरी दिन बनाया गया। कमललोचन आदिवासी हैं...धुर नक्सली इलाका दंतेवाड़ा से ताल्लुकात रखते हैं...नक्सलियों के खिलाफ उन्होंने लड़ा भी है। छत्तीसगढ आदिवासी राज्य है और मुखिया विष्णुदेव साय भी आदिवासी हैं तो फिर कमललोचन के प्रमोशन को लेकर लोगों की उत्सुकता स्वाभाविक है...सरकार क्या कमललोचन को रिटायमेंट गिफ्ट देगी? पीएचक्यू ने भले ही प्रस्ताव भेजने में लेट किया मगर सरकार के लिए कुछ असंभव नहीं होता। तत्कालीन सीएस सुनिल कुमार फरवरी 2013 में जाते-जाते एएन उपध्याय को 29 साल की सर्विस में डीजी बनवा डाले थे।

खुफिया चीफ और माफी

छत्तीसगढ़ में पोलिसिंग की स्थिति कैसी है, इस घटना से आप अंदाजा लगा सकते हैं। हाल की बात है...राजधानी रायपुर के बीयर-बारों के बाउंसरों के उत्पातों को रोकने एडीजी इंटेलिजेंस अमित कुमार ने एसएसपी लाल उमेद सिंह से कार्रवाई करने कहा। खुफिया चीफ का आदेश था, इसलिए एसएसपी ने फोर्स भेजकर दर्जन भर से अधिक शिकायती बारों के बाउंसरों को लाकर थाने में बिठा लिया। मगर इसमें से आधे बाउंसरों को पुलिस महकमे के सीनियर अफसरों ने फोन कर छुड़वा लिया। वो इसलिए क्योंकि वीआईपी रोड के कई बीयर-बारों में उनका पैसा लगा है। कुछ के लिए नेताओं ने फोन किया और कुछ को कोर्ट में पेश होते ही जमानत मिल गई। याने पकड़ कर लाने के बाद भी एक भी बाउंसरों को पुलिस जेल नहीं भेज पाई। जाहिर है, इससे पुलिस डिमरलाइज होगी ही। बताते हैं, एसएसपी इस पूरे एपिसोड से बहुत दुखी हुए। उन्होंने अमित कुमार को बताया। अमित बोले...सॉरी लाल उमेद, अब आगे से इस तरह के मामलों में कार्रवाई करने नहीं कहूंगा।

न्यू ईयर गिफ्ट

जनवरी में 2001 बैच की आईएएस शहला निगार प्रमुख सचिव प्रमोट हो जाएंगी तो 2010 बैच के आईएएस जेपी मौर्या, कार्तिकेय गोयल, सारांश मित्तर, पीएस एल्मा रमेश शर्मा और धमेंद्र साहू सिकेट्री बनेंगे। रानू साहू सस्पेंड हैं, इसलिए उनका प्रमोशन नहीं होगा। हालांकि, सरकार चाहे तो प्रमुख सचिव सुबोध सिंंह और निहारिका बारिक को ड्यू टाईम से एक साल पहले प्रमोट कर एसीएस बना सकती है। एसीएस के छह पद हैं और इस समय मुख्य सचिव को मिलाकर तीन ही अफसर हैं। उसमें भी मनोज पिंगुआ फरवरी-मार्च तक दिल्ली चले जाएंगे और ऋचा शर्मा का भी कोई भरोसा नहीं, कब तक यहां हैं। कहीं दोनों दिल्ली चले गए तो एसीएस की संख्या जीरो हो जाएगी, यह एक अजीब स्थिति होगी। वैसे टाईम से पहले प्रमोशन पहले भी मिलता रहा है। पिछली सरकार में रेणु पिल्ले को समय से छह महीने और सुब्रत साहू को डेढ़ साल पहले एसीएस बनाया गया। रमन सिंह सरकार में सीके खेतान और आरपी मंडल छह महीने पहले सचिव से प्रमुख सचिव बनाए गए थे। सरकार चाहे तो 2002 बैच के आईएएस डॉ0 रोहित यादव और डॉ0 कमलप्रीत सिंह को भी सचिव से प्रमुख सचिव प्रमोट कर सकती है। क्योंकि, प्रमुख सचिव में भी काफी वैकेंसी है। इस समय तीन ही प्रमुख सचिव हैं। सुबोध, निहारिका और सोनमणि बोरा। इसमें भी सुबोध को काउंट नहीं। वे सीएम सचिवालय के हेड हैं। विभागीय पीएस की दृष्टि से देखें तो दो ही प्रिंसिपल सिकेट्री हुए। सचिवों की फौज भी काफी बड़ी हो गई है। लिहाजा रोहित और कमलप्रीत को प्रमुख सचिव बनाने में कोई दिक्कत नहीं होगी। दोनों का ड्यू टाईम जनवरी 2027 है।

प्रमोशन में खटका

ऑल इंडिया कैडर के आईएएस, आईपीएस और आईएफएस सर्विस में कुछ सालों से सबसे स्लो पुलिस मुख्यालय है, जिसने अपने ही अफसरों के प्रमोशन की फाइल इस बार भी सबसे लेट सरकार को भेजा। अब अनुमति के लिए कब दिल्ली जाएगा और कब डीपीसी होगी कोई भरोसा नहीं। बहरहाल, 2001 बैच एडीजी, 2008 बैच आईजी, 2012 बैच डीआईजी और 2013 बैच सलेक्शन ग्रेड याने एसएसपी बनेगा। 2001 बैच में डॉ0 आनंद छाबड़ा का सिंगल नाम है। वहीं, आईजी बनने वाले 2008 बैच में पारुल माथुर, प्रशांत अग्रवाल, नीतू कमल, डी0 श्रवण और मिलना कुर्रे हैं। इनमें पारुल माथुर को चार्जशीट इश्यू हो गया है। एक और किसी के खिलाफ जांच प्रक्रियाधीन है। नीतू कमल और डी0 श्रवण डेपुटेशन पर हैं। ऐसे में, इस बार आईजी कौन बन पाएगा, ये सरकार ही बता पाएगी। उधर, 2012 बैच के सात आईपीएस डीआईजी प्रमोट होंगे। इनमें आशुतोष सिंह, विवेक शुक्ला, रजनेश सिंह, शशिमोहन सिंह, राजेश कुकरेजा, राजेश अग्रवाल, विजय अग्रवाल और रामकृष्ण साहू शामिल हैं। आशुतोश सीबीआई में चले गए हैं। इसके अलावा 2013 बैच के चार आईपीएस को सलेक्शन ग्रेड मिलेगा। सलेक्शन ग्रेड मिलने के बाद जिलों में पोस्टेड एसपी का पदनाम बदलकर एसएसपी हो जाएगा। इन चार में जितेंद्र शुक्ला, मोहित गर्ग, अभिषेक पल्लव और भोजराम पटेल हैं। भोजराम इस समय मुंगेली के एसपी है।

रिफार्म

रायपुर में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू किया जा रहा है। पुलिस में रिफार्म की दिशा में सरकार की एक अच्छी पहल है। मगर मध्यप्रदेश की तरह एक और प्रयोग किया जा सकता है। एमपी के थानों के प्रधान आरक्षकों को विवेचना का पावर दिया गया है। चूकि एएसआई, एसआई और थानेदारों के पास काम का बोझ ज्यादा रहता है इसलिए कम-से-कम छोटे लूट, जेबकटी और 151 जैसे मामलों की विवेचना हेड कांस्टेबल कर ही सकते हैं। इससे फायदा यह होगा कि थानों में केसेज लंबित नहीं रहेंगे। फिर थाने के बड़े अफसर बड़े मामलों की विवेचना में अपना फोकस कर सकेंगे।

कमिश्नर ऑफिस में पुलिस

रायपुर में एक जनवरी से पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू होगा या आगे टलेगा, यह 31 दिसंबर के कैबिनेट में तय हो जाएगा। वैसे यह लगभग तय हो चुका है कि नया कमिश्नरेट बिल्डिंग बनने तक डिविजनल कमिश्नर ऑफिस में पुलिस कमिश्नर बैठेंगे। डिविजनल कमिश्नर महादेव कांवड़े नए भवन में शिफ्ट हो गए हैं। सो, कमिश्नर ऑफिस खाली है। उसमें पुलिस अधीक्षक कार्यालय जाने वाला था। मगर जब पुलिस अधीक्षक सिस्टम खतम हो जाएगा तो फिर उस ऑफिस का औचित्य नहीं। ऐसे में, सरकार डिविजनल कमिश्नर कार्यालय में पुलिस कमिश्नर को बिठाने पर विचार कर रही है।

पुलिस में बड़ी उलटफेर

रायपुर में पुलिस कमिश्नर सिस्टम को देखते पुलिस महकमे में बड़े बदलाव का अंदेशा है। पुलिस कमिश्नरेट के बाद रायपुर ग्रामीण नाम से नया पुलिस रेंज बनेगा। इसका मुख्यालय महासमुंद होगा या रायपुर से कार्य संचालित होगा, इस बारे में अभी कोई खुलासा नहीं हुआ है। मगर उसके लिए एक अलग आईजी की पोस्टिंग करनी होगी। रायपुर कमिश्नरेट में कम-से-कम तीन आईपीएस की पोस्टिंग की जाएगी। पुलिस कमिश्नर के बाद सबसे अधिक उत्सुकता एडिशनल पुलिस कमिश्नर को लेकर है। किसी जिले के एसएसपी को इस पद पर बिठाया जाएगा। वो रायपुर, जशपुर, बिलासपुर और दुर्ग एसएसपी में से कोई भी हो सकता है।

बदनाम निगम

2009 बैच की आईएएस प्रियंका शुक्ला सेंट्रल डेपुटेशन पर दिल्ली जा रही हैं। उन्हें मेरा युवा भारत का सीईओ बनाया गया है। उनकी जगह सरकार को समग्र शिक्षा और पाठ्य पुस्तक निगम में एमडी नियुक्त करना होगा। सरकार को पाठ्य पुस्तक निगम को बदनामी से उबारने का प्रयास करना चाहिए। कायदे से वहां ढांचागत बदलाव की जरूरत है। एमडी से अधिक वहां जीएम पावरफुल हो जाते हैं। एमडी का काम सिर्फ कमीशन लेकर चुप बैठना होता है। बाकी काम जीएम संभालते हैं। पापुनि में कागज का टेंडर अलग, प्रिंटिंग का अलग, उसे स्कूलों तक पहुंचाने का अलग टेंडर होता है। जबकि, बाकी राज्यों में सारे कामों का टेंडर एक साथ हो रहा है। मगर अलग-अलग कामों का अलग-अलग टेंडर करने से कमीशन ज्यादा मिलता है। भले ही स्कूलों में टाईम पर किताबें न पहुंच पाए। इस साल दिसंबर बीतने को है, ढेरों स्कूलों में अभी तक किताबें नहीं पहुंची हैं।

कलेक्टरों की वैकेंसी

हाल में राज्य सरकार ने आधा दर्जन जिलों के कलेक्टर बदले। इसके बाद एक लिस्ट और निकल सकती है। दरअसल, दो जिलों के कलेक्टरों को राज्य सरकार ने सेंट्रल डेपुटेशन के लिए एनओसी दे दिया है। जनवरी में हो सकता है भारत सरकार में उनकी पोस्टिंग हो जाए। ऐसे में कलेक्टर पोस्टिंग की एक और लिस्ट निकलेगी। कलेक्टर के दावेदारों के लिए ये गुड न्यूज है...नए साल में जिला मिलेगा।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या ये सही है कि पाठ्य पुस्तक निगम की छपने वाली किताबों के पन्नों का वेट 70 जीएसएम से बढ़ाकर 80 जीएसएम किया गया है ताकि बिलिंग ज्यादा हो सके?

2. कांग्रेस में प्रियंका गांधी के स्ट्रांग होने से छत्तीसगढ़ कांग्रेस की राजनीति में भूपेश बघेल और मजबूत होंगे?

शनिवार, 20 दिसंबर 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: नितिन नबीन: कहीं खुशी, कहीं गम

 तरकश, 21 दिसंबर

संजय के. दीक्षित

कहीं खुशी, कहीं गम

छत्तीसगढ़ के बीजेपी प्रभारी नितिन नबीन अब पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बन गए हैं और अगले महीने पूर्णकालिक भी हो जाएंगे। नितिन के पार्टी सुप्रीमो बनने से छत्तीसगढ़ के बीजेपी नेताओं का एक वर्ग खुश है तो कुछ लोगों को 440 वोल्ट का झटका लगा है। इनमें कई मंत्री शामिल हैं तो कुछ निगम-मंडलों के चेयरमैन और संगठन के बड़े नेता भी। असल में, नितिन के पास सारे नेताओं की कुंडली है कि कौन क्या गुल खिला रहा है। उन्हें उन मंत्रियों के बारे में भी पता है कि सरकार बनते ही बिना वक्त गंवाए कैसे तूफानी बैटिंग शुरू कर दी। और उनकी नोटिस में यह भी है कि संगठन का कौन नेता पोस्टिंग और सप्लाई-ठेका के जरिये अपने होने की कीमत वसूल रहा है। जाहिर है, आने वाले टाईम में मंत्रिमंडल का पुनगर्ठन होगा, फिर उसमें नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने का असर भी दिखेगा। बता दें, नितिन छत्तीसगढ़ के पहले बीजेपी प्रभारी होंगे, जो दो साल में पूरे छत्तीसगढ़ को मथ दिया। 146 ब्लॉकों में से शायद ही कोई उनकी पहुंच से बचा होगा। रायपुर बीजेपी ऑफिस में बैठकर किस विधानसभा में कितना पोस्टर-बैनर भेजना है, वे ये भी तय करते थे और ग्राउंड पर जाकर खुद भी परखते थे कि वहां की सीट निकालने के लिए किस रणनीति पर काम करना होगा। इसके चलते छोटे-से-छोटे अल्पज्ञात कार्यकर्ताओं से भी उनके सीधे संवाद है। ऐसे में, दिल्ली में बैठकर भी छत्तीसगढ़ की चीजें उनसे अछूती नहीं रहेंगी। और चीजें जब उनकी नोटिस में रहेंगी तो जानते ही हैं क्या होगा? लिहाजा, कुछ लोगों का दुखी होना स्वाभाविक है।

सप्लायर को फटकार 

बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन की छबि कितनी साफ-सुथरी है कि बिहार में लगातार 20 साल से विधायक और मंत्री होने के बाद भी उन पर अब तक कोई आरोप नहीं लगा। छत्तीसगढ़ से जुड़ा एक वाकया भी उनका काफी चर्चा में रहा था। दिसंबर 2023 में बीजेपी की सरकार बनने के बाद बहुचर्चित 300 करोड़ के सीजीएमएससी कांड में जब ठेकेदार को कहीं से कोई रहम मिलता नहीं दिखा तो कुछ भाई साहबों ने उसे सलाह दी कि नितिन नबीन से जाकर मिलो, शायद वहां मोक्ष मिल जाए। सप्लायर सूटकेस लेकर पटना पहुंच गया। नितिन को पता चला कि तो उन्होंने न केवल मिलने से मना किया बल्कि स्टाफ से जमकर फटकार भी लगवाई। नितिन नबीन जब ऐसे हैं तो मंत्रियों के 40 परसेंट रेट का क्या होगा?

सातवें नंबर से टॉप पर

नितिन नबीन को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का फैसला इतना चौंकाने वाला था कि किसी को सहसा यकीं नहीं हुआ। जब यह खबर आई तो वे पटना के कार्यकर्ता सम्मेलन में थे और वक्ता के तौर पर उनके बोलने का क्रम सातवें नंबर पर था। प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल, उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी तथा विजय सिनहा, सांसद रविशंकर प्रसाद, विवेक ठाकुर, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष नंदकिशोर यादव। फिर नितिन नबीन। मगर एक झटके में वे सातवें से नंबर वन पर पहुंच गए। बीजेपी में वे नंबर वन रहेंगे ही, पार्टी प्रोटोकॉल में भी पीएम नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के बाद उनका स्थान होगा।

बिल्डरों को तोहफा, जनता को?

जमीनों के गाइडलाइन रेट के युक्तियुक्तकरण से आई कयामत के बावजूद छत्तीसगढ़ के बिल्डर बड़े गदगद हैं। सरकार ने उन्हें न्यू ईयर गिफ्ट देते हुए रजिस्ट्रेशन में सुपर बिल्डअप का क्लॉज समाप्त कर दिया है। याने फ्लैट की रजिस्ट्री अब बिल्डअप एरिया के हिसाब से होगी। जाहिर है, इससे रजिस्ट्री का रेट 30 से 40 परसेंट कम हो जाएगा। ये पैसा सरकार के खजाने में जाता था। बिल्डअप एरिया के हिसाब से रजिस्ट्री होने से अब फ्लैट का रेट कम हो जाएगा। इससे फ्लैट के सेल तेज होगा। मगर प्रश्न उठता है सुपर बिल्डअप का रजिस्ट्री चार्ज नहीं लगेगा तो फिर आम आदमी से सुपर बिल्डअप का रेट कैसे? रेरा के एक्ट में भी स्पष्ट तौर से कहा गया है कि सुपर बिल्डअप डेवलपमेंट का हिस्सा है, उसका रेट अलग से नहीं लिया जा सकता। सुपर बिल्डअप में सीढ़ी से लेकर लॉन और बाल्कनी तक बिल्डर जोड देते हैं। अब आप कहेंगे कि बिल्डर को अगर सुपर बिल्डअप का रेट नहीं लेने कहा जाएगा तो वो वह फ्लैट का रेट बढ़ा देगा...याने घूमा-फिराकर वही पड़ेगा। तो इसका जवाब है...बिल्डअप-सुपरबिल्डअप के फेर में आम आदमी गुमराह हो जाता है। आमतौर पर होता ऐसा है कि कोई फ्लैट खरीदने जाता है तो उसे फुट के हिसाब से रेट बताया जाता है। बाद में जब सौदा पटने लगता है तो पता चलता है कि रजिस्ट्री इतने की नहीं, इतने सुपरबिल्डअप एरिया की होगी। ऐसे में, कस्टमर बिल्डरों के ट्रिक में फंस जाता है। इसे रेरा को देखना चाहिए। 2013 में उसका गठन ही उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने के लिए किया गया था।

सीएस का सचिवालय

मुख्यमंत्री की तरह मुख्य सचिव को भी अपने सचिवालय में अपने हिसाब से अफसर पोस्ट करने की स्वतंत्रता होती है। फिर भी सक्षम अधिकारियों को ही सीएस सचिवालय में पोस्टिंग होती है। देश के कई राज्यों में आईएएस भी सिकेट्री होते हैं और राज्य प्रशासनिक सेवा के भी। छत्तीसगढ़ में भी सुनिल कुमार ने 2003 बैच की आईएएस ऋतु सैन को अपना ज्वाइंट सिकरेट्री बनाया था। उनसे पहले आरपी बगाई के सीएस रहने के समय आईएएस ईशिता राय उनके सचिवालय में रहीं। इन दो के अलावा हमेशा राप्रसे अधिकारियों को ही सीएस सचिवालय का हेड बनाया गया। दरअसल, सीएस के सिकरेट्री को पीएमओ, डीओपीटी से लेकर भारत सरकार के मंत्रालयों तक से बात करनी होती है, इसलिए कंपिटेंट अफसरों को ही इस पद पर बिठाया जाता है। हालांकि, अमिताभ जैन ने नया प्रयोग किया था...नायब तहसीलदार कैडर से प्रमोट हुए अधिकारी को अपना सिकेट्री बनाया था। इससे उनको कितना फायदा हुआ, ये तो नहीं मालूम। मगर अब नए सीएस सचिवालय के हेड की तलाश शुरू हो गई है। कायदे से सीएस सचिवालय में आईएएस को ही बिठाना चाहिए। भले ही राजभवन की तरह एक अच्छी पोस्टिंग उसके लिए सुनिश्चित कर दी जाए।

मंत्री आगे, सिकेट्री पीछे!

सरकार ने सचिवों को हर तीन महीने में अपने विभाग का रिपोर्ट कार्ड मीडिया से शेयर करने कहा था। इसके अतिरिक्त प्रेस नोट, सक्सेस स्टोरी से लेकर सोशल मीडिया पोस्ट तक में मार्किंग सिस्टम बनाया गया था। याने इतने पोस्ट पर इतने अंक मिलेंगे। इससे सचिवों का परफर्मेंस परखा जाना था। प्रेस कांफ्रेंस के लिए सरकार ने बकायदा शेड्यूल जारी किया था। इस तारीख को ये सिकेट्री प्रेस मिलेंगे तो फलां तारीख को ये। मगर आलम यह है कि 20 दिन से ज्यादा गुजर गया, अभी तक दो-तीन सचिव ही मीडिया को फेस कर पाए हैं। सचिवों से आगे मंत्री निकल गए हैं। अभी तक चार-पांच मंत्री सरकार की उपलब्धियों पर मीडिया को एड्रेस कर चुके हैं। मुख्यमंत्री के अनुमोदन से सचिवों को यह काम सौंपा गया था, इसे तो टॉप प्रायरिटी पर होना चाहिए।

सीईओ गायब?

बेमेतरा जिला पंचायत सीईओ प्रेमलता पद्माकर के आवास पर 19 नवंबर को एसीबी ने छापा मारा था। कमिश्नर लैंड रिकार्ड में पोस्टिंग के दौरान पटवारी से आरआई प्रमोशन घोटाले में उनका भी नाम है। इसी सिलसिले में एसीबी उनके घर दबिश दी। छापे में अहम साक्ष्य मिलने पर एसीबी ने उनके खिलाफ मुकदमा कायम कर लिया। इसके बाद से सीईओ का कोई पता नहीं है। पता नहीं, पंचायत या जीएडी की नोटिस में ये है भी कि नहीं? अगर नोटिस में नहीं है तो ये भी गंभीर है और नोटिस में होने के बाद भी वहां अब तक कोई पोस्टिंग नहीं करना उससे भी ज्यादा गंभीर है।

प्रशासन या तमाशा!

राजधानी रायपुर से लगभग लगा जिला है बेमेतरा। बेमेतरा में प्रशासन का क्या हाल है, आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि एक अफसर पूरे जिले का माई-बाप है। अपर कलेक्टर में प्रमोट होने के बाद प्रकाश भारद्वाज के पास अभी भी एसडीएम का प्रभार है। इसके साथ एडीएम का चार्ज भी। जिला पंचायत सीईओ के गोल होने पर कलेक्टर के कहने पर वहां का दायित्व भी संभाल रहे तो दो दिन से प्रभारी कलेक्टर भी। रणवीर शर्मा ने ट्रांसफर के बाद अपर कलेक्टर को चार्ज हैंड ओवर कर दिया। याने एक ही आदमी एसडीएम, एडीएम, अपर कलेक्टर, जिला पंचायत सीईओ और कलेक्टर भी। गजबे हाल है भाई प्रशासन का।

कार्रवाई या प्रमोशन?

सरकार ने कोरबा कलेक्टर अजीत बसंत का ट्रासंफर कर सरगुजा का कलेक्टर बनाया है। उनके तबादले को पूर्व गृह मंत्री ननकीराम कंवर की नाराजगी से जोड़कर देखा गया। सोशल मीडिया में भी इसी लाईन पर खबर चली। मगर ये समझ में नहीं आता कि अंबिकापुर जैसे जिले का कलेक्टर बनना कार्रवाई कैसे हुई? संभागीय मुख्यालय होने की वजह से अंबिकापुर का इम्पार्टेंस अभी भी कम नहीं हुआ है। फिर वह मुख्यमंत्री का गृह संभाग भी है। इस दृष्टि से भी सरगुजा में ठीकठाक अधिकारियों की पोस्टिंग दी जाती है। रही बात...कोरबा की तो वह कमाई-धमाई के हिसाब से टॉप का जिला हो सकता है। मगर अजीत बसंत इस टेम्परामेंट वाले रहे नहीं। सो, कोरबा में रहें या अंबिकापुर में, उन्हें क्या फर्क पड़ता है। ऐसे में तो ये प्रमोशन ही हुआ न।

सबसे खराब पोस्टिंग?

छत्तीसगढ़ सरकार ने इस हफ्ते 11 आईएएस अधिकारियों के तबादले किए, उनमें सबसे खराब पोस्टिंग अंबिकापुर के कलेक्टर भोस्कर विलास संदीपन की रही। उन्हें एडिशनल इलेक्शन ऑफिसर बनाया गया है। सूबे के टॉप फाइव रैंक के जिले की कलेक्टरी करके आने वाले अफसर को कभी भी इतनी खराब पोस्टिंग नहीं मिली। अभी कोई इलेक्शन भी नहीं है, जिसके लिए वहां अफसरों की जरूरत हो। अलबत्ता, हैरानी इस बात की भी कम नहीं है कि इतने लंबे समय तक अंबिकापुर में वे टिक कैसे गए? छबि तो उनकी साफ-सुथरी है मगर इसके साथ व्यवहारिक होना भी जरूरी है। बहरहाल, यह सवाल बना रहेगा कि डिविजनल हेडक्वार्टर वाले जिले से सीधे निर्वाचन में पटक देना...आखिर ये हुआ क्यों?

प्रमोटी आईएएस मायूस

कलेक्टरों के बहुप्रतीक्षित ट्रांसफर से प्रमोटी आईएएस अधिकारियों को भी बड़ी उम्मीदें थीं। तीन-चार अधिकारी कुछ भाई साहबों की परिक्रमा भी कर चुके थे। मगर लिस्ट आई तो आवाक रह गए। किसी को कामयाबी मिली नहीं। सभी छह जिलों में डायरेक्ट आईएएस को कलेक्टर बनाया गया। प्रमोटी वालों को कम-से-कम बेमेतरा और नारायणपुर से बड़ी आस थी। खास कर नारायणपुर से। क्योकि, पिछले दो-तीन बार से ऐसा हो रहा कि डायरेक्ट वाले वहां से कम समय में ही खो हो जा रहे। कांग्रेस शासनकाल में एक विधायक की नाराजगी से अभिजीत सिंह छह महीने में ही हटा दिए गए थे तो अभी प्रतिष्ठा ममगई को लेकर भी कुछ बातें थीं। मगर सरकार ने नारायणपुर के साथ बेमेतरा में भी डायरेक्ट वालों को पोस्ट करना मुनासिब समझा।

कलेक्टर्स अच्छे और एसपी?

छह कलेक्टरों की पोस्टिंग के बाद 33 में से 20 से अधिक जिलों में कलेक्टरों की टीम अच्छी हो गई हैं। इससे पहले जो लिस्ट आई थी, उसमें भी सरकार ने काम और छबि का ध्यान रखा था...इस बार की लिस्ट में भी इसे टॉप प्रायरिटी दिया गया। जाहिर है, मंत्रालय और डायरेक्ट्रेट सरकार के इंजन होते हैं तो कलेक्टर उसके पहिया। पहिया ही डिफेक्टिव रहेगा तो ट्रेन स्पीड में कैसे दौड़ेगी? बहरहाल, कलेक्टरों की टीम लगभग अच्छी हो गई है मगर पुलिस अधीक्षकों में अभी स्थिति खास बदली नहीं। लिहाजा, रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, जांजगीर और जशपुर जैसे महत्वपूर्ण जिले प्रमोटी आईपीएस संभाल रहे। पिछले कुछ बरसों में आईपीएस का कैडर इतना डिरेल्ड हो गया कि सरकार को उस लायक कोई क्रेन और जेसीबी नहीं मिल रहा कि उसे उठाकर पटरी पर रखा जाए। पूर्व डीजीपी को छह महीने का एक्सटेंशन मिल गया और वर्तमान डीजीपी के आगे से प्रभारी शब्द हट नहीं पा रहा। पूरा दोष पीएचक्यू को भी नहीं दिया जा सकता...आधा दर्जन अधिकारियों के खिलाफ इंक्वायरी की फाइलें छह महीने से घूम रही, अनुमति मिलेगी कि नहीं, ये भी क्लियर नहीं। कुछ मिलाकर छत्तीसगढ़ पुलिस का भगवान मालिक हैं।

आईपीएस के तबादले

31 दिसंबर को आईपीएस अधिकारियों की एक लिस्ट निकलेगी। इसमें आईजी लेवल से लेकर डीआईजी, एसपी रैंक के आईपीएस होंगे। दरअसल, एक जनवरी से रायपुर में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू होना लगभग पक्का हो गया है। आईजी रैंक के किसी आईपीएस को पुलिस कमिश्नर बनाया जाएगा और डीआईजी या सलेक्शन ग्रेड वाले को एडिशनल पुलिस कमिश्नर। इसके अलावे चार डीसीपी में से दो आईपीएस एसपी रैंक के होंगे। इसके लिए कुछ दूसरे जिलों से भी आईपीएस अधिकारियों को रायपुर बुलाया जाएगा। कुल मिलाकर आईपीएस की लिस्ट में अबकी गुड गवर्नेंंस दिख सकता है।

सूचना आयुक्तों पर उलझन

विधानसभा का शीतकालीन सत्र भी निकल गया। 17 दिसंबर की देर शाम तक मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के दावेदार टकटकी लगाए रह गए। शायद जीएडी से कोई आदेश निकल जाए। कई बार सरकार देर रात भी आर्डर जारी कर रही, इसलिए रात आंखों में कट गई। मगर सरकार बड़ी निर्मोही निकली...कम-से-कम अपने एक्स चीफ सिकरेट्री का ही ध्यान रख लेती। वो भी नहीं हुआ। पता चला है, सिफारिशों की बोझ से सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की फाइल दब गई है। सिस्टम करें तो क्या करें। इतने भाई साहबों के फोन आ चुके हैं कि सिस्टम कुछ समझ नहीं पा रहा...आखिर किसको नाराज करें। उधर अप्लीमेंट भी पीछे नहीं हैं...सवाल चार लाख महीने सेलरी की है। सवा दो लाख वेतन और उपर से 54 परसेंट डीए। सब मिलाकर एकाउंट में करीब-करीब चार लाख। आवेदकों में कुछ योग्य और काबिल लोग भी हैं। मगर बाकी के चक्कर में उनका मामला भी उलझ गया है।

कमिश्नर, जय रामजी

मनरेगा का नाम बदलकर जी जय रामजी हो गया है। मगर जब तक यह प्रचलन में नहीं आएगा तब तक इस योजना में कार्यरत लोगों को काफी कठिनाई आएगी। अब पदनाम को ही देखिए। छत्तीसगढ़ में इस योजना के कमिश्नर हैं तारन सिनहा। वे अब अपना परिचय क्या देंगे....कमिश्नर जी जय रामजी। कुछ दिन तो लोग समझ नहीं पाएंगे। पूछ रहा हूं पदनाम और बोल रहे जी...जयराम। जय राम जी का उल्टा अर्थ भी निकाला जाता है। याने जय राम हो गए। जी रामजी के इम्प्लाई ग्रुप में भी इस पर खूब चुटकी ली जा रही। 

अंत में दो सवाल आपसे

1. सरकार ने डेपुटेशन पर जा रहीं आईएएस डॉ0 प्रियंका शुक्ला को पाठ्य पुस्तक निगम और समग्र शिक्षा में क्यों बिठाया?

2. सरकार द्वारा कई बड़े रिफार्म करने के बाद भी उसका मैसेज आम जनता में नहीं जा पा रहा, उसके पीछे कौन-सी वजहें हैं?


शनिवार, 13 दिसंबर 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: पुलिस और कल्पनाएं

 तरकश, 14 दिसंबर

संजय के. दीक्षित

पुलिस और कल्पनाएं

पुलिस की कल्पना के बारे में जानकर छत्तीसगढ़ ही नहीं, दूसरे राज्यों के लोग भी हतप्रभ हैं। आईपीएस अधिकारियों के दीगर राज्यों में पोस्टेड बैचमेटों के दो दिन तक लगातार फोन घनघनाते रहे...भाई क्या हो रहा तुम्हारे राज्य में। हालांकि, छत्तीसगढ़ पुलिस के लिए ये कोई नई बात नहीं है...पुलिस की अनेक कल्पनाएं हैं। पुलिस के कई लोगों ने इस स्तंभ के लेखक को फोन कर सरगुजा और दुर्ग पुलिस रेंज में तैनाती के दौरान दो कल्पनाओं के खेल के बारे में बताया, तो विश्वास नहीं हुआ...आखिर अपनी पुलिस इस किस्म के घोर कलयुग का शिकार कैसे हो सकती है? दोनों कल्पनाएं गजटेड रैंक की। एक अपने पुलिस और जिला प्रशासन के अधिकारियों को ही ट्रेप कर जेबें ढिली कर देती थीं। दूसरी, गिरोह चलाकर नामदार लोगों को शिकार बनाती थीं। ये बातें पहले की हैं, पता नहीं अब वे जहां पोस्टेड हैं, वहां क्या हो रहा होगा। बहरहाल, अंबिकापुर में एक राजपत्रित रैंक के साहब और थे। सेक्सटॉर्शन गिरोह के जरिये उन्होंने सरगुजा संभाग के कई संभ्रांत लोगों को निशाना बना अच्छा खासा पैसा बनाया। मगर तत्कालीन डीजीपी एएन उपध्याय उनके घृणित कारनामे से इतने खफा हुए कि जब तक कुर्सी पर रहे, प्रमोशन नहीं होने दिया। ये साब अभी जहां पोस्टेड हैं, आप सुनेंगे हैरान रह जाएंगे। मगर जाने दीजिए।

उछलती टोपी!

पता चला है, सेक्सटॉर्शन केस में पुलिस ने कोई कार्रवाई करने से मना कर दिया है। क्योंकि, रिपोर्ट दोनों तरफ से हुई है। हो सकता है, आम सहमति के केस को पुलिस तूल नहीं देना चाहती। मगर सोशल मीडिया में कई दिनों से पुलिस की टोपी उछल रही है। फिर सवाल यह है कि क्या इस तरह के मामलों को नजरअंदाज करने से उच्छृंखलताएं और नहीं बढ़ेंगी? और अगर पुलिस को लगता है कि सामने वाला गुनाहगार है तो उसके खिलाफ कार्रवाई से पुलिस सरेंडर क्यों कर रही? छोटे-छोटे मामलों में पुलिस आईटी एक्ट लगाकर घर से उठा लेती है और सोशल मीडिया में सरेआम टोपी उछलने पर आंख मूंद लेना...ये तो गृह और पुलिस विभाग में गजबे हो रहा है। जाहिर है, पुलिस में सभी कल्पना नहीं हैं, अच्छे और संभ्रांत घरों के अनेक अफसर कर्मठता और ईमानदारी से सेवा दे रहे हैं। मगर एक मछली, तालाब को गंदा कर देती है....इससे अच्छे लोग भी कटघरे में होंगे। इतने बड़े केस में पुलिस को कुछ तो मैसेज देना था, कम-से-कम एक जांच कमेटी ही बना देती, ताकि आगे से इस तरह की चीजां के पहले लोग दस बार सोचते। बता दें, छत्तीसगढ़ में पोलिसिंग के डिरेल्ड होने की सबसे बड़ी वजह है कार्रवाई का अभाव। बड़ी-से-बड़ी घटनाओं में पुलिस मैसेज नहीं दे पा रही। पुलिस में अनुशासन बिगड़ने का बड़ा कारण सिस्टम भी है। इंस्पेक्टरों के ट्रांसफर करने का अधिकार डीजीपी को जरूर दिया गया है मगर कुछ सालों से हालत यह है कि अपने मन से वे एक दरोगा का ट्रांसफर नहीं कर सकते। एसपी और आईजी को हटाने की तो दूर की बात। एसपी की पोस्टिंग में डीजीपी का सम्मान सिर्फ एएन उपध्याय के कुर्सी पर रहने तक रहा। उपध्याय भले ही भोले-भंडारी थे मगर एसपी की पोस्टिंग उनकी जानकारी में होती थी। पुलिस का अगर औरा कायम करना है तो कड़े फैसले लेने होगे...पहले जैसे अधिकार देने होंगे। मंत्री, विधायक और नेता अपने हिसाब से थानेदारों की नियुक्ति कराते रहेंगे तो फिर छत्तीसगढ़ का अपराधगढ़ बनना तय है। मिलियन डॉलर का प्रश्न है...बरसों से बदनाम रही यूपी और बिहार की पोलिसिंग अब वंदे भारत ट्रेन की तरह पटरी पर दौड़ रही है और छत्तीसगढ़ पुलिस?

अफसरशाही की गति

सरकार के मंत्रियों ने दो साल में अपना कितना इकबाल बनाया, ये नहीं पता मगर अफसरशाही में जिस तरह कड़ाई शुरू हुई है, उससे लगता है कि सिस्टम की गाड़ी अब गति पकड़ लेगी। 9 दिसंबर को मुख्य सचिव विकास शील ने जिस अंदाज में सिकेट्री और डायरेक्टरों की मीटिंग ली, उससे अधिकारी तबका सकते में है। विधानसभा में जिस तरह मंत्री 10 में से नौ प्रश्न के जवाब में कहते हैं, दिखवा लेंगे और फिर उसे कभी देखा नहीं जाता, उसी तरह कई अधिकारियों ने जब कहा दिखवा लूंगा तो सीएस ने कहा, दिखवा नहीं कीजिए। कई सीनियर सिकेट्री मानते हैं कि इस अंदाज में किसी चीफ सिकरेट्री ने कभी मीटिंग नहीं ली। उन्होंने बजट खर्च करने को लेकर सचिवों से ही 31 दिसंबर तक का सेल्फ टारगेट घोषित करवा लिया। 31 में अब 17 दिन बच गया है। टारगेट के चक्कर में अफसर क्रिसमस और न्यू ईयर की छुट्टियों को भूल गए हैं। चीफ सिकेट्री की नियुक्ति के समय मंत्रालय के एक वरिष्ठ अफसर ने कहा था, अमित अग्रवाल अगर सीएस बने तो ऐसी स्थिति आएगी कि कई आईएएस पांचवे फ्लोर से कूद जाएंगे। इस समय मंत्रालय के पांचवे फ्लोर से कूदने जैसी स्थिति तो नहीं है, मगर अफसरों की रात की नींद जरूर उड़ी हुई है। क्योंकि, आजकल बंद कमरे में नहीं, ऑडिटोरियम में हंड्रेड के करीब अफसरों के बीच इज्जत का सवाल है।

जुगाड़ के आईएएस

छत्तीसगढ़ में अलायड सर्विस से रिक्त आईएएस के दो पदों के लिए 10 नामों का पेनल यूपीएससी को भेज दिया गया है। जल्द ही इसके लिए डीपीसी होगी। डीपीसी में यूपीएससी चेयरमैन, डीओपीटी के सिकरेट्री या उनके नॉमिनी, छत्तीसगढ़ के चीफ सिकरेट्री, सीनियर एसीएस और जीएडी सिकरेट्री शामिल होंगे। अब सवाल उठता है, 10 में से आईएएस बनने का अवसर किन दो अफसरों को मिलेगा। तो इसका जवाब है छत्तीसगढ़ में एलायड कोटे से आईएएस बनाने में कभी भी योग्यता को मापदंड नहीं बनाया गया...सिर्फ आलोक अवस्थी को छोड़कर। मध्यप्रदेश में आरएस विश्वकर्मा और सुशील त्रिवेदी जैसे नियम-कायदों के जानकार अधिकारियों को आईएएस बनाया गया था, जिन्होंने राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ आकर अपना कौशल दिखाया भी। मगर उसके बाद? विष्णुदेव सरकार सुशासन पर काम कर रही है, ऐसे में लोगों में जिज्ञासा है कि इस बार आईएएस के दो पद किसी कोटे, सिफारिश और जोर-जुगाड़ से भरे जाएंगे या काबिलियत के आधार पर। जाहिर है, सरकार के गुड गवर्नेंस की मुहिम को देखते अच्छे कंडिडेट इस बार ज्यादा आशान्वित हैं।

एक मंत्री, एक सचिव

सीएम सचिवालय की कमान संभालने के बाद सुबोध सिंह ने कामकाज को स्मूथली संचालित करने के लिए एक मंत्री, एक सचिव का प्रयोग किए थे। इस समय 90 परसेंट से अधिक सचिवों के एक मंत्री हैं। यही प्रयोग अब मंत्रालय में पोस्टेड राज्य प्रशासनिक सेवा के डिप्टी सिकरेट्री में भी किया गया है। इस हफ्ते राप्रसे अधिकारियों की लंबी-चौडी लिस्ट निकली, उसमें अधिकांश को उनके अतिरिक्त विभाग से मुक्त किया गया। अभी तक एक-एक डिप्टी सिकरेट्री के पास दो-दो, तीन-तीन विभाग थे। एक विभाग की मीटिंग के लिए उप सचिव को बुलाओ तो पता चलता था दूसरे विभाग की मीटिंग में बैठे हुए हैं। इससे फाइलों के डिस्पोजल में भी विलंब हो रहा था। अफसरों के पास बहाने भी थे, क्या बताएं...हमारे पास कई विभाग हैं। अब अधिकांश डिप्टी सिकरेट्री को डबल प्रभार से मुक्त कर दिया गया है। ये दिक्कतें सचिवों के साथ होती थीं। अलग-अलग विभाग होने से अलग-अलग मंत्री होते थे। विधानसभा सत्र के दौरान कई बार एक ही टाईम में मंत्री की ब्रीफिंग हो जाती थी। अब एक सचिव के पास एक मंत्री हैं। सुशासन की दिशा में इसे अहम कदम माना जा रहा है।

ब्लैक मनी और घर से विरोध

बीजेपी के दिवंगत नेता अरुण जेटली के पत्र लिखने के आठ साल बाद राज्य सरकार ने जमीनों के गाइडलाइन रेट का युक्तियुक्तकरण कर ब्लैक मनी पर अंकुश लगाने का प्रयास किया। मगर इसका विरोध इस स्तर पर हुआ कि सरकार हिल गई। सरकार ने कुछ रियायतें देते हुए कुछ कंडिकाओं को बदला। अब मसला यह नहीं कि विरोध इतना संगठित और बड़े स्तर पर कैसे हुआ...यह बताने की आवश्यकता भी नहीं कि जमीन-धंधे के कारोबार में कैसे-कैसे ताकतवर और रसूखदार लोग जुड़े हैं। फिर धंधे पर चोट पड़ेगी तो कैसे कोई बर्दाश्त करेगा। सो, हंगामा तो खड़ा होना ही था। अफसरों से ये जरूर चूक हुई कि वे जमीन दलालों और भूमाफियाओं की रसूख का अंदाजा नहीं लगा पाए। दूसरा, आश्चर्य इस बात का कि गाइडलाइन रेट बढ़ने का सबसे अधिक विरोध बीजेपी के भीतर से हुआ। इतने बड़े रिफार्म का पार्टी के लीगल सेल से जुड़े नरेश गुप्ता का बयान आया, बाकी किसी एक नेता और मंत्री इसके पक्ष में सामने नहीं आए। अलबत्ता, कैबिनेट की बैठक में मंत्रियों ने हंगामा कर दिया...गाइडलाइन रेट नहीं बदला तो हम चुनाव हार जाएंगे। बता दें, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री को डीओ लेटर लिख बताया था कि देश में सबसे कम गाइडलाइन रेट छत्तीसगढ़ में ब्लैकमनी का इंवेस्टमेंट तेजी से बढ़ रहा है। इससे इंकम टैक्स का काफी नुकसान हो रहा है। दूसरा छत्तीसगढ़ मनी लॉडिं्रग का हब बनते जा रहा है।

था बुखार, दवा दे दी दस्त की

गाइडलाइन रेट में मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली शीर्ष अफसरों की कमेटी ने कुछ ऐसा किया कि पूरे प्रदेश में रायता फैल गया। दरअसल, केंद्रीय भूतल परिवहन मिनिस्टर नितिन गडकरी इस बात से काफी नाराज थे कि छत्तीसगढ़ में जमीनों के वर्ग मीटर दर और हेक्टेयर दर में चार गुना से 20 गुना तक अंतर होने के कारण भू-अर्जन से पहले लोग जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े कर लेते हैं, ताकि मुआवजा बढ़ सके। इससे केंद्रीय परियोजनाओं की लागत काफी बढ़ जा रही थी। मसलन, अरपा भैंसाझार परियोजना एक उदाहरण है, जिसकी लागत 300 करोड़ थी जो भू अर्जन मुआवजे के कारण बढ़कर 860 करोड रुपए हो गई थी। नीतीन गडकरी की नाराजगी को देखते सरकार ने मुख्य सचिव की अध्यक्षता में शीर्ष सचिवों की एक कमेटी बनाई। कमेटी ने बिना सोचे-समझे रिपोर्ट दे दी और कैबिनेट ने उसे लागू कर गांव से वर्ग मीटर दर को समाप्त करने का फैसला ले लिया। 29 जुलाई 2025 को राज्य कैबिनेट द्वारा गांव से वर्ग मीटर दर समाप्त करने के निर्णय लिए जाने के फलस्वरुप ग्रामीण इलाकों में 500 वर्ग मीटर तक के जमीन का मूल्यांकन कई कई गुना कम हो गया। शहर से लगे अर्बन क्षेत्र में इसका विशेष प्रभाव हुआ, जहां 1500 वर्ग मीटर तक जमीन का मूल्यांकन नगर निगम क्षेत्र की तरह होता था, वहां 1500 वर्ग मीटर तक जमीन का मूल्यांकन कई गुना कम हेक्टेयर दर पर होने लगा। जाहिर है, इससे लोगों का नुकसान तो होना ही था। कायदे से सिस्टम को वर्ग मीटर रेट समाप्त करने की बजाए राजस्व विभाग को टाईट कर जमीन को टुकड़े करने पर रोक लगाना था। अभनपुर के चर्चित भारतमाला समेत कई जगहों पर ऐसा ही हुआ, खरीदी-बिक्री पर रोक का ऐलान होने के बाद भी भूमाफियाओं ने जमीनों को टुकड़े कर आठ गुना मुआवजा प्राप्त कर लिया। बहरहाल, सीएस की अध्यक्षता वाली कमेटी ने बुखार में दस्त की दवा दी...इससे केस बिगड़ना ही था।

एक व्यक्ति, 7 सलेक्शन, किसकी चूक?

सात साल बाद पुलिस महकमे में सिपाहियों की भर्ती हुई। मगर वह भी मुकम्मल नहीं हो पाई। करीब छह हजार पदों पर भर्ती में यह प्रयास नहीं किया गया कि एक आदमी अनेक जिलों में अप्लाई नहीं कर सके। इसका खामियाजा यह हुआ कि एक-एक का कई जिलों में सलेक्शन हो गया। रायपुर के एक युवक का सात जिलों में चयन हुआ है। यही वजह है कि जिलों में अभी तक 50 परसेंट के आसपास ही आरक्षकों ने आमद दी है। 6000 में से मुश्किल से चार हजार के आसपास ही कांस्टेबल मिलेंगे। बड़ी संख्या में आवेदकों ने सेफ रहने के लिए कई जिलों में आवेदन कर दिया। कायदे से व्यापम से बात कर ऐसा इंतजाम करना था कि जो जिस जिले का है, उसी जिले में आवेदन करें। पुलिस मुख्यालय के सीनियर अफसर व्यापम के सीनियर अफसरों से तार्किक ढंग से बात कर लेते तो वे भी इससे सहमत हो जाते। जाहिर है, वेटिंग क्लीयर करने के बाद भी अब स्वीकृत पद नहीं भर सकेंगे और फिर से भर्ती निकालनी होगी। बे-रोजगार युवाओं में इसको लेकर बड़ा असंतोष है।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. दो बरस का कार्यकाल पूरा होने के बाद भी अधिकांश मंत्री कामकाज के मामले में अपनी छाप छोड़ने में नाकाम क्यों रहे?

2. छत्तीसगढ़ की पूरी अफसरशाही इन दिनों बेहद परेशान चल रही है, इसकी वजह क्या होगी?

Chhattisgarh Tarkash 2025: रोवर युग में कड़ी और चांदा

 

तरकश | 7 दिसंबर | संजय के. दीक्षित

रोवर युग में कड़ी और चांदा

आंध्रप्रदेश जैसे कई राज्यों में जमीनों के सीमांकन के लिए रोवर सिस्टम चालू हो गया है। मगर छत्तीसगढ़ में जमीनों के नापजोख के लिए सिस्टम अभी भी वही कड़ी और चांदा के भरोसे है। वैसे बार-बार जमीनों के सीमांकन की जरूरत पड़नी भी नहीं चाहिए। मगर दिक्कत यह है कि कोई सुधार के लफड़े में पड़ना नहीं चाहता। ब्यूरोक्रेसी लकीर की फकीर बनी रहना चाहती है। हालांकि, ब्यूरोक्रेसी के कई यंग अफसर मानते हैं कि बार-बार सीमांकन की कोई जरूरत नहीं। सीमांकन की कोई वैद्यता भी नहीं है। उपर से एक पार्टी सीमांकन कराता है, सामने वाला उसे मानने से इंकार कर देता है। उसके बाद सीमांकन पर सीमांकन चलता रहता है। राजस्व विभाग को कायदे से एक बार सीमाकंन कराकर छोड़ देना चाहिए। जिसे अपील करना हो, कोर्ट में करे। जाहिर है, सीमांकन के फेर में तहसीलों में जेब काटने का काम किया जाता है। आम आदमी को अनावश्यक तहसीलों का चक्कर लगाना पड़ता हैं।

एमपी जैसा सिस्टम क्यों नहीं?

जमीनों के नामंतरण में हालांकि, छत्तीसगढ़ अब अपने बड़े भाई मध्यप्रदेश से आगे निकल गया है। अपने यहां अब जमीनों की रजिस्ट्री होते ही आटोमेटिक नामंकन हो जा रहा। मगर बाकी राजस्व मामलों में अभी काफी पीछे है। जमीन या संपत्ति के मामलों को लेकर अभी भी सूबे के तहसीलों में लोग महीनों, सालों भटकते रहते हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने रेवेन्यू में बड़ा रिफार्म करते हुए तहसीलों में न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था को अलग कर दिया है। वहां सिविल केसेज के लिए अलग तहसीलदार हैं और प्रशासनिक के लिए अलग। इससे प्रकरणों का निबटारा बेहद फास्ट हो गया है। इससे पहले तहसील ऑफिसों का चक्कर लगाते आम आदमी के चप्पल घिस जाते थे। तहसीलदार कभी दौरे में होते थे, तो कभी प्रशासनिक काम के सिलसिले में फील्ड या कलेक्ट्रेट में। एमपी गवर्नमेंट ने इस दिक्कत को समझते हुए दोनों व्यवस्थाओं को अलग कर दिया। छत्तीसगढ़ सरकार चाहे तो एमपी से एक कदम आगे बढ़ते हुए तहसीलदारों के साथ एसडीएम में भी न्यायिक और एडमिनिस्ट्रेशन को अलग किया जा सकता है। छत्तीसगढ़ में डिप्टी कलेक्टरों की वैसे भी कमी नहीं है। चीफ सिकरेट्री विकास शील को इस बड़े रिफार्म पर फोकस करना चाहिए। इससे लोगों को काफी राहत मिलेगी। वैसे भी मुख्य सचिव डिजिटलाइजेशन पर जोर दे रहे हैं। तहसीलों का करप्शन कम करने के लिए सुनवाई को भी ऑनलाइन किया जा सकता है। जब हाई कोर्ट में ऑनलाइन सुनवाई हो सकती तो फिर तहसीलों में क्यों नहीं। इससे आम आदमी को तहसीलों के झंझटों से छुटकारा मिलेगा ही, जेब कटने से भी बचेगा।

पति-पत्नी और दो घर

रायपुर एयरपोर्ट के पास नकटी में विधायकों को और सेरीखेड़ी में नौकरशाहों को भले ही कुछ समय के लिए सरकारी जमीन आबंटन का मामला स्थगित कर दिया गया है, मगर जैसे ही सूबे की न्यायिक स्थिति अनुकूल होगी, फिर से आबंटन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसमें विधायकों, सांसदों और नौकरशाहों के लिए गुड न्यूज यह है कि अब पति-पत्नी दोनों को सरकारी जमीन का सुख मिलेगा। पिछली सरकार ने पति-पत्नी के केस में एक को जमीन का नियम बदलकर दोनों को सरकारी जमीन के लिए पात्र कर दिया था। याने पति-पत्नी विधायक हैं या आईएएस-आईपीएस, आईएफएस तो उन्हें अलग-अलग प्लॉट मिलेगा। एक पूर्व मुख्यमंत्री की पत्नी को इसी नियम के तहत प्लॉट दिया गया। अब, इसे आप ये मत समझिएगा कि पिछली सरकार पति-पत्नी को अलग प्लॉट देकर उनके घर को बांटना चाहती थी। ऐसा भी हो सकता है कि जितने बड़े नेता या आईएएस, आईपीएस, आईएफएस, उतने अधिक स्ट्रेस, तनाव और लफड़े होते हैं। उनसे सहानुभूति रखते हुए पिछली सरकार ने फैसला किया कि सभी को फ्रीडम चाहिए, सबको अपने अंदाज में लाइफ जीने के लिए छूट देना चाहिए। वैसे भी सेपेरेट घर के अभाव में कई अफसर और नेता वीकेंड में मुंबई, गोवा चले जाते हैं...अलग घर रहने पर वे अपने हिसाब से रह सकेंगे। सो, आइडिया अच्छा है।

पोस्टिंग ठंडे बस्ते में

बिजली नियामक आयोग के चेयरमैन को इस्तीफा दिए लगभग दो महीने हो गए मगर अभी नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। इस पोस्ट के लिए बकायदा विज्ञापन जारी करने का प्रावधान है। आवेदन जमा करने के महीने भर बाद भर्ती प्रॉसेज प्रारंभ होगा। मगर अभी इस बारे में उर्जा विभाग में कोई सुगबुगाहट नहीं है। नियामक आयोग के गठन के बाद दो बार इंजीनियरिंग साइट से चेयरमैन रहे हैं और तीन बार रिटायर आईएएस। इस बार प्रतीत होता है कि इंजीनियरिंग साइट से कोई चेयरमैन बनें। क्योंकि, रिटायर आईएएस में अभी अमिताभ जैन के अलावा कोई है नहीं। और अमिताभ को मुख्य सूचना आयुक्त बनेंगे।

गुड न्यूज

मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त के दावेदारों के लिए गुड न्यूज है। हाई कोर्ट से केस क्लियर होने के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने सलेक्शन कमेटी की बैठक बुलाने के संदर्भ में लेटर भेज दिया है। मुख्यमंत्री सचिवालय जल्द ही चयन कमेटी की बैठक आहूत करेगा। कमेटी में मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल मेंबर हैं। मुख्यमंत्री की व्यस्तता की वजह से बैठक हो नहीं पा रही। मगर विधानसभा सत्र से पहले किसी भी दिन मुख्य सूचना आयुक्त और दो सूचना आयुक्तों की नियुक्ति का आदेश निकल सकता है।

मंत्रालय में मजमा

छत्तीसगढ़ के मंत्रालय महानदी भवन में एक दिसंबर को सुबह पौने दस बजे से दस बजे के बीच 15 मिनट ऐसा नजारा रहा, वैसा 25 साल में कभी नहीं हुआ। पोर्च से गेट तक करीब 300 मीटर का फासला है। आलम यह था कि अफसरों की गाड़ियों की कतार गेट से बाहर सड़क तक पहुंच गई। उससे पहले पोर्च में गाड़ियों की कभी लाइन नहीं लगी। दफ्तर के टाईम में पांच-सात मिनट के अंतराल में एकाध गाड़ी आ गई तो बड़ी बात। मगर एक दिसंबर को मजमा जैसी स्थिति थी। दरअसल, एक दिसंबर से मंत्रालय में सचिवों के लिए बायोमेट्रिक अटेंडेंस शुरू हुआ। हालांकि, मोबाइल में भी उसका एक्सेज दिया गया है। मगर पहले दिन कई सारे अधिकारियों ने ऐप्प डाउनलोड किया नहीं था। और, 10 बजे के पहले मंत्रालय पहुंचना भी था। इसलिए, एक साथ गाड़ियां का रेला मंत्रालय पहुंच गया। हालांकि, दिल्ली में भारत सरकार के ऑफिसों में ऐसा ही होता है। वहां 10 मिनट के अंतराल में सारे अधिकारी ऑफिस पहुंच जाते हैं, सो गाड़ियों की लाइन लग जाती है। बहरहाल, रायपुर मंत्रालय में सीएस खुद मॉनिटरिंग कर रहे हैं। उनके कंप्यूटर में 11 बजे पूरा अटेंडेंस डाउनलोड हो जाता है। 10 बजे तक मंत्रालय गुलजार हो जाने का यह भी एक बड़ा कारण है।

टूरिस्ट एंड ट्रेकिंग डेस्टिनेशन

दंतेवाड़ा के ढोलकल पहाड़ पर विराजित गणेशजी लोगों के आस्था के केंद्र तो हैं ही, ढोलकल पहाड़ अब टूरिज्म और ट्रेकिंग डेस्टिनेशन बनने जा रहा। दंतेवाड़ा जिला प्रशासन ने ट्रेकिंग के लिए रास्ता बना दिया है। वीकेंड में 500 से अधिक लोग ढोलकल पहुंच रहे हैं। पहाड़ी के नीचे आंध्र की एक कंपनी पीपीपी मोड में करीब साढ़े तीन एकड़ में रिसॉर्ट बना रही है। जाहिर है, चित्रकोट के बाद ढोलकल बस्तर का दूसरे नम्बर का टूरिस्ट सेंटर बन जाएगा। हालांकि, अध्यात्म के मामले में ढोलकल प्लस ही होगा।

मोदी और रमन की फ़ोटो

छत्तीसगढ़ में पीएम नरेंद्र मोदी और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह की एक फोटो की बड़ी चर्चा है। डीजीपी कांफ्रेंस के दौरान रमन अपने परिवार संग मोदी से मिलने पहुंचे थे। उसकी फोटो जारी हुई, उसमें एक छोटे से सोफे में मोदी और रमन एक साथ बैठे हैं। फ़ोटो चर्चा का विषय इसलिए भी बन गई कि मोदी के 11 साल पीएम रहने के दौरान ऐसी फ़ोटो देश में किसी देखी नहीं। प्रधानमंत्री कार्यालय फ़ोटो को लेकर काफी संजीदा रहता है। इस समय बिना PMO की इजाजत कोई फ़ोटो जारी नहीं होती। इससे इस बात पर मुहर लगी कि डॉ रमन को पीएम मोदी खास वेटेज देते हैं।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. किस मंत्री ने पैसों के हिसाब के लिए एक अकाउंटेंट रख लिया है?

2. गाइड लाइन रेट बढ़ने से आम आदमी को नुकसान होगा या भूमाफियाओं और जमीन दलालों का?

शनिवार, 29 नवंबर 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: प्रमोटी आईएएस और भरोसा

 तरकश, 30 नवंबर 2025

संजय के. दीक्षित

प्रमोटी आईएएस और भरोसा

27 नवंबर की आईएएस की लिस्ट से ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने यह जतलाने का प्रयास किया है कि उसके पास विकल्प की कोई कमी नहीं है। जाहिर है, दो दिन पहले जिन 13 आईएएस अधिकारियों के ट्रांसफर किए गए, उनमें सात प्रमोटी आईएएस हैं। उसमें भी ऐन धान खरीदी के सीजन में जीतेंद्र शुक्ला को मार्कफेड एमडी का चुनौतीपूर्ण दायित्व सौंपा गया। उनके पास जलजीवन मिशन भी रहेगा। इसके अलावा पीएस एल्मा को शराब खरीदी करने वाली स्टेट मार्केटिंग कंपनी के साथ ब्रेवरेज कारपोरेशन का एमडी का बनाया गया है। इफ़्फ़त आरा स्पेशल सिकरेट्री रेवेन्यू के साथ नागरिक आपूर्ति निगम की एमडी होंगी। संतनदेवी जांगड़े संचालक आयुष, रेणुका श्रीवास्तव को डायरेक्टर महिला बाल विकास, रीता यादव प्रबंध संचालक खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड तथा लोकेश कुमार को डायरेक्टर हार्टिकल्चर की जिम्मेदारी दी गई है। कह सकते हैं, इस लिस्ट में प्रमोटी अफसरों का दबदबा रहा।


नारी शक्ति कमजोर?

छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक हलको में एक समय नारी शक्ति बहुत मजबूत हो गई थी। मगर वक्त के पहिये के साथ पराभाव होता चला गया। जूनियर अफसर के चीफ सिकरेट्री बनने की वजह से रेणु पिल्ले मंत्रालय से बाहर हो गईं। ऋचा शर्मा को चीफ सिकरेट्री बनने का मौका नहीं मिला, उपर से खाद्य विभाग भी हाथ से निकल गया। उधर, 27 नवंबर को 13 आईएएस अधिकारियों की लिस्ट निकली, उसमें भी माताजी लोगों को बड़ा झटका लगा...कोई इधर गिरा, कोई...। आर शंगीता का शराब से जुड़ी कंपनी और बोर्ड के एमडी का प्रभार भी पीएस एल्मा के पास चला गया। कुल मिलाकर लग रहा...ब्यूरोक्रेसी की नारी शक्ति जरा कमजोर हुई हैं।

बीजेपी-कांग्रेस भाई-भाई

जमीनों के गाइडलाइन रेट में वृद्धि को लेकर छत्तीसगढ़ में तूफान मचा है, उसमें बीजेपी और कांग्रेस नेताओं का भाईचारा भी परिलक्षित हो रहा है। बात ऐसी है कि जोर का झटका दोनों को लगा है। गाइडलाइन रेट बढ़ने से भूमाफियाओं और बिल्डरों को नुकसान होगा तो नेताओं का भी जमीन में इंवेस्टमेंट का धंधा मार खाएगा। ब्यूरोक्रेट्स की अपनी अलग बेचैनी है...काली कमाई को अब कहां खपाएंगे? यही वजह है कि चौतरफा प्रेशर बनाए जा रहे। सेल्फ गोल का खेल भी चल रहा। बीजेपी नेताओं के घेराव में किसका हाथ है, इंटेलिजेंस वालों से ये छिपा नहीं है। भ्रम ऐसा फैला दिया गया है कि गाइडलाइन रेट बढ़ने से सूबे का रियल इस्टेट बैठ जाएगा। जबकि, सच्चाई यह है कि जब हर साल 10 परसेंट बढ़ता था, तब रियल इस्टेट ज्यादा ग्रो किया। बता दें, गाइडलाइन रेट बढ़ने से आम आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। आखिर 2017 तक हर साल 10 परसेंट रेट बढ़ता ही था। बाकी राज्यों में भी ऐसा ही होता है। 2018 के बाद रेट बढ़ना बंद हो गया। इसमें जमीनों का धंधा खूब फला-फूला। अब आप इससे समझ सकते हैं कि कचना, विधानसभा रोड पर बिल्डरों का रेट है छह हजार से सात हजार रुपए फुट और सरकारी दर था हजार-बारह सौ। इसका सिर्फ युक्तियुक्तकरण किया गया है। आम आदमी को इसलिए भी इससे फर्क नहीं पड़ने वाला कि बाजार दर से पेमेंट पहले भी करना पड़ता था और अभी भी वैसा ही होगा। जिनके पास दो नंबर का पैसा था उन्हें उस व्यवस्था में काफी लाभ था। मगर मीडिल और लोवर क्लास के पास काली कमाई होती नहीं, सो गाइडलाइन रेट बढ़ने से खरीदी जाने वाली जमीन या मकान का रेट बढ़ेगा, तो उस हिसाब से उन्हें बैंकों से लोन मिल जाएगा। बहरहाल, बात बीजेपी-कांग्रेस भाई-भाई से तो यह बात छिपी नहीं कि छत्तीसगढ़ में इन दोनों पार्टियों के नेताओं का छत्तीसगढ़ की माटी से कितना प्रेम है। बल्कि, अब यह प्रेम भूख में बदल गया है।

गोल्ड में इंवेस्ट

छत्तीसगढ़ में अभी तक काली कमाई खपाने के दो ही प्रमुख माध्यम थे। जमीन और सोना। सोना चूकि एक लिमिट से अधिक नहीं खरीदा जा सकता। उसे सुरक्षित रखने का लफड़ा होता है, इसलिए इंवेस्टरों को जमीन में निवेश आकर्षित करता था। सरकारी रेट कौड़ियों के मोल होने से जमीन में 60 से 70 परसेंट रकम कैश में देना होता है और 30 से 40 परसेंट एक नंबर में। इससे इंकम टैक्स की भी काफी बचत होती थी। एक करोड़ रुपए की कोई जमीन खरीदी गई तो कागज में वो 30 से 40 लाख शो होता था। याने 60 से 70 लाख रुपए ब्लैक से व्हाइट हो गया। मगर गाइडलाइन रेट बढ़ने से अब जमीनों में काली कमाई का इंवेस्टमेंट नहीं होगा। जमीनों का सरकारी रेट बढ़ने के बाद छत्तीसगढ़ में मनी लॉड्रिंग पर अंकुश लगेगा मगर गोल्ड में निवेश बढ़ेगा। इससे सराफा व्यापारियों के चेहरे खिल गए हैं।

ब्यूरोक्रेसी को फ्री हैंड

पिछले दो महीनों में गुजरात, तेलांगना, बिहार और यूपी जाने का मौका लगा। वहां तेज गति से चल रहे डेवलपमेंट वर्क देखकर हैरानी हुई। खासकर यूपी, बिहार...जहां विकास की बातें बेमानी थी, अपराधों के नाम से इन दोनों प्रदेशों को जाना जाता था, ऐसे राज्य अब विकास के कार्यों में होड़ कर रहे हैं। इसका लाभ भी वहां के नेतृत्व को मिल रहा। इस सवाल पर कि 20 साल के शासन के बाद नीतीश कुमार लोकप्रिय क्यों? इसका जवाब आश्चर्यजनक आया। लोगों ने कहा...नीतीश कुमार ने नेताओं के लिए लक्ष्मण रेखा खींच दिया है। प्रशासन और पुलिस में नेताओं का हस्तक्षेप नहीं के बराबर रह गया है। जिस बिहार में कलेक्टर्स, एसपी के साथ बदसलूकी आम बात थी, वहां की अफसरशाही अब फ्री होकर डेवलपमेंट को अंजाम दे रही है।

छत्तीसगढ़ और अफसरशाही

अब बात छत्तीसगढ़ की करें, तो राज्य बनने के बाद सबसे खराब दौर में यहां की ब्यूरोक्रेसी गुजर रही है। बीजेपी के कई नेताओं को भी ये बात अच्छी नहीं लगेगी कि रमन सिंह सरकार अगर 15 साल चली तो उसके पीछे ब्यूरोक्रेसी और उसकी कर्मठ टीम की बड़ी भूमिका रही। कांग्रेस की सरकार पांच साल में विदा हो गई तो इसके पीछे एक बड़ा कारण सशक्त टीम का अभाव रहा। मध्यप्रदेश के समय डीपी मिश्रा, पीसी सेठी, अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह के दौर मे ंहमेशा इस हाईट के अफसर उनके पास रहे, जो गलत तो गलत कहने की हिम्मत रखते थे। इससे उन नेताओं को बड़ा फायदा मिला। बहरहाल बात छत्तीसगढ़ की तो...पहली बात, नए राज्य में पैसों के आए फ्लो ने अफसरशाही का बड़ा नुकसान किया। छत्तीसगढ़ अच्छा काम करने वाला कैडर नहीं रहा बल्कि देश की ब्यूरोक्रेसी में मलाईदार कैडर में केटेराइज्ड हो गया। कई आईएएस, आईपीएस ने इतना पैसा बना लिया कि बिल्डरों और कारोबारियों के साथ मिलकर व्यापार शुरू कर दिया। दूसरा कारण है राजनीतिक हस्तक्षेप। रिजल्ट देने वाले अच्छे अफसर भी आगे बढ़़कर काम करना नहीं चाहते। नौकरशाही की स्थिति इस समय ये हो गई है कि कोई भी बुरा भला बोल के चल दे रहा। यूपी में अपराधी द्वारा सोशल मीडिया में जिले के एसपी को गाली देने पर एनकाउंटर करके अरेस्ट कर लिया गया। मगर छत्तीसगढ़ के एक बड़े जिले के पुलिस कप्तान को फेसबुक पर एक छंटे बदमाश द्वारा क्या-क्या लांछन नहीं लगाया गया, मगर पुलिस दोनों हाथ बांधे बैठी रही। और जब एसपी साहब लोगों का ये स्थिति है तो एएसपी, डीएसपी और टीआई बेचारे क्या करेंगे? जाहिर है, इन सब चीजों से राज्य का बड़ा नुकसान हो रहा।

रिफार्म की ऐसी चोट

छत्तीसगढ़ में ये गजबे हो रहा है। रिफार्म हो रहा किसी और विभाग में और उसका इफेक्ट दिख रहा दूसरे विभाग में। हम बात कर रहे पंजीयन और राजस्व महकमे की। पंजीयन विभाग ने सबसे पहले रजिस्ट्री के साथ ऑटोमेटिक नामंतरण प्रारंभ किया। फिर पंजीयन में ऋण पुस्तिका की अनिवार्यता खतम की और अब रजिस्ट्री के 70 बिंदु वाले नियमों का सरलीकरण कर 15 कर दिया। पंजीयन विभाग में किए गए इन ऐतिहासिक सुधारों ने राजस्व विभाग के मुलाजिमों का बड़ा नुकसान कर डाला। तहसीलदारों से लेकर पटवारियों का इन्हीं तीनों कामों के लिए लोगों को चक्कर लगाना पड़ता था। मगर सरकार ने सुधार करके बड़ा गड़बड़ कर डाला। इस विभाग के लोगों की 70 परसेंट आमदनी इन्हीं तीनों चीजों से होती थी। रोड की जमीन को पटवारी कागजों में भीतर बता देते थे तो ऋण पुस्तिका बनवा लेना आसान काम नहीं था। मगर अब आलम यह हो गया कि छत्तीसगढ़ में नायब तहसीलदार और पटवारी की नौकरी का जादुई आकर्षण खतम हो जाएगा।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. फर्जी ईडी अफसर ने छत्तीसगढ़ के किन-किन आईएएस अधिकारियों से लाखों रुपए वसूल डाला?

2. क्या ये सही है कि डीजीपी कांफ्रेंस की कल समाप्ति के बाद कलेक्टर, एसपी की एक लिस्ट निकलेगी?

शनिवार, 15 नवंबर 2025

Chhattisgarh Tarkash 2025: नारी शक्ति और कलेक्टरों की परीक्षा

 तरकश, 16 नवंबर

संजय के. दीक्षित

नारी शक्ति और कलेक्टरों की परीक्षा

छत्तीसगढ़ सरकार ने खजाने का करीब 10 हजार करोड़ रुपए बिचैलिये और भ्रष्ट तंत्र की जेब में जाने के खिलाफ कमर कस लिया है। इसके लिए फूड सिकरेट्री रीना बाबा कंगाले और मार्कफेड एमडी किरण कौशल की जोड़ी इस बार मुस्तैद हैं। कलेक्टरों को भी बार-बार फरमान जा रहा है। चीफ सिकरेट्री विकास शील खुद सिकरेट्री फूड रह चुके हैं, वे लगातार माॅनटरिंग कर रहे। जाहिर है, धान खरीदी अगर अबकी 120 लाख मीट्रिक टन पर रुक गया तो भ्रष्टाचार पर बड़ी चोट होगी ही, आर्थिक मोर्चे पर इस सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी होगी। क्योंकि, सरकारी खजाने की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। आज की तारीख में मार्कफेड पर 38 हजार करोड़ का लोन है और पिछले सीजन में ओवर परचेजिंग से 8 हजार करोड़ की चपत लग चुकी है। दरअसल, दिक्कत किसान और धान से नहीं, दिक्कत धान की रिसाइकिलिंग और राईस माफियाओं के खेल से है। छत्तीसगढ़ में धान खरीदी का ग्राफ इस तेजी से बढ़ रहा कि अच्छे-अच्छे कृषि वैज्ञानिक हैरान हैं। 2002-03 में मात्र 18 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी हुई थी। 20 साल में यह नौ गुना बढ़ गई। जबकि, खेती का रकबा तेजी से कम हो रहा है। ये कहना भी कुतर्क होगा कि रेट बढ़ने से धान ज्यादा बोए जा रहे हैं। आखिर पहले भी सिर्फ धान बोए जाते थे...और कोई फसल लगाए नहीं जाते थे कि उसे बंद कर अब धान बोया जा रहा। जाहिर है, 2024-25 में सारे रिकार्ड तोड़ते हुए धान खरीदी 149 लाख मीट्रिक टन पर पहुंच गई। जबकि, जानकारों का कहना है कि छत्तीसगढ़ में वास्तविक धान 100 से 110 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा नहीं होना चाहिए। याने बिचैलियों और अधिकारियों की मिलीभगत से की जाने वाली रिसाइकिलिंग, पटवारियों की कृपा से कागजों में पैदावार लेना और दूसरे प्रदेशों से आने वाले अवैध धानों को रोक दिया जाए तो सीधे-सीधे 30 से 35 लाख मीट्रिक टन की फर्जी खरीदी रुक जाएगी। यह करीब 10 हजार करोड़ रुपए का होता है, जिसे राईस माफिया, राईस मिलर्स, अफसर और पाॅलिटिशियन हजम कर जाते हैं। निश्चित तौर पर फर्जी धान खरीदी रोकने में दोनों महिला अधिकारियों के साथ कलेक्टरों की परीक्षा होगी। जो कलेक्टर जितना ज्यादा सक्रिय होकर कार्रवाई करेगा, उस जिले में कम फर्जी खरीदी होगी।

नितिन डिप्टी सीएम!

छत्तीसगढ़ के प्रभारी नितिन नबीन बिहार के बांकीपुर सीट से रिकार्ड मतों से चुनाव जीत गए हैं। 50 हजार से अधिक वोटों से चुनाव जीतने वाले आठ नेताओं के क्लब में उनका भी नाम है। पटना जिले के इस सीट से वे लगातार पांचवी बार चुने गए हैं। उससे पहले उनके पिता नवीन किशोर सिनहा 1995 से विधायक थे। उनके निधन के बाद उपचुनाव में पार्टी ने 2006 में नितिन को टिकिट दिया और उन्होंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2020 के चुनाव में उन्होंने फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिनहा के बेटे को बड़े मतों के अंतर से पराजित किया था। बहरहाल, नितिन की लोकप्रियता बिहार में तो है ही, अपने राजनीतिक कौशल से शीर्ष नेतृत्व का ध्यान भी खींचा है। छत्तीसगढ़ में पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान लोगों ने उनका काम देखा। सूबे का शायद ही कोई ब्लाॅक होगा, जहां वे नहीं गए। चुनाव का कंप्लीट मैदानी कमान उन्होंने अपने हाथ में ले ली थी, और पूरा छत्तीसगढ़ छान मारा। इसका उन्हें ईनाम भी मिला। ओम माथुर की जगह उन्हें प्रमोट कर सह प्रभारी से प्रभारी बनाया गया। पिछले साल नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ सरकार बनाई तो उसमें उन्हें कैबिनेट मंत्री का दायित्व मिला। और अब...बिहार में एनडीए की सुनामी के बाद उन्हें डिप्टी सीएम बनाने की अटकलें तेज हो गई है। फार्मूला यह है कि नीतीश मुख्यमंत्री बनेंगे तो जनरल और एससी से दो उप मुख्यमंत्री बन सकते हैं। सामान्य वर्ग में नितिन नबीन से बेहतर कोई नाम नहीं हो सकता, वहीं अनुसूचित जाति से लोक जनशक्ति पार्टी से कोई एक डिप्टी सीएम बनेगा। नितिन नबीन अगर बिहार के उप मुख्यमंत्री बने तो फिर उनके पास छत्तीसगढ़ के लिए टाईम नहीं बचेगा। ऐसे में, हो सकता है कि छत्तीसगढ़ में किसी और नेता को प्रभारी नियुक्त किया जाए।

बांकीपुर में छत्तीसगढ़

चूकि नितिन नबीन छत्तीसगढ़ के प्रभारी हैं, सो स्वाभाविक तौर पर उनके प्रचार के लिए छत्तीसगढ़ से बड़ी संख्या में नेताओं, मंत्रियों, विधायकों की फौज बांकीपुर पहुंची थी। बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला 10 दिन तक लगातार वहां कैंप किए तो पार्टी के स्टेट प्रेसिडेंट किरण सिंहदेव, डिप्टी सीएमद्वय अरुण साव, विजय शर्मा, वित्त मंत्री ओपी चैधरी, विधायक गोमती साय, मोतीलाल साहू, राम गर्ग, राजीव अग्रवाल, राजा पाण्डेय, नीलू शर्मा समेत दो दर्जन से अधिक नेताओं ने वहां प्रचार किया। खासकर, कलेक्टर-टू-मंत्री के नाम से ओपी ने वहां खूब शमां बांधा।

पवन साय को अहम जिम्मेदारी

छत्तीसगढ़ बीजेपी के प्रदेश संगठन मंत्री पवन साय को पश्चिम बंगाल की जिम्मेदारी दी गई है। हालांकि, यह टेम्पोरेरी दायित्व है मगर सुनने में आ रहा...पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के लिए उन्हें वहां की पूर्णकालिक जिम्मेदारी दी जा सकती है। पवन साय संघ के काफी कर्मठ चेहरा रहे हैं। इसीलिए उन्हें छत्तीसगढ़ बीजेपी का संगठन मंत्री बनाया गया था। उन्होंने अपना काम भी दिखाया। उधर, वेस्ट बंगाल के पिछले विधानसभा चुनाव में काफी पसीना बहाने के बाद बीजेपी सत्ता तक नहीं पहुंच पाई। किन्तु इस बार बीजेपी और संघ की कोर टीम दो साल पहले से काम प्रारंभ कर दिया है। आरएसएस के टाॅप फाइव में शामिल रामदत्त चक्रधर के पास इस समय पश्चिम बंगाल का प्रभार है। रामदत्त भी छत्तीसगढ़ के रहने वाले हैं। और अगर पवन साय गए तो वे छत्तीसगढ़ के दूसरे शख्सियत होंगे, जिन्हें पश्चिम बंगाल में अहम जिम्मेदारी मिलेगी।

ब्यूरोक्रेसी और वक्त

छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी में एक वक्त वो भी था, जब मुख्यमंत्री ने एक जनवरी 2025 को मंत्रालय में मीटिंग लेकर अफसरों की टाईमिंग ठीक न होने को लेकर स्पष्ट रूप से इशारा किया था। उसके बाद कुछ हद तक मंत्रालय आने-जाने का टाईम सुधरा। लेकिन बायोमेट्रिक अटेंडेंस के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। अलबत्ता, सवाल उठाया गया...आईएएस लाईन लगाकर थंब इंप्रेशन कैसे लगाएगा। तत्पश्चात जीएडी ने मोबाइल में ऐप्प अपलोड करने का विकल्प दिया, उसमें मंत्रालय के भीतर आते ही अपने आप अटेंडेंस लग जाता। मगर इसके लिए भी कोई टस-से-मस नहीं हुआ। मगर अब एक दिसंबर से सचिवालय का एक नंबर गेट, जहां से अफसर प्रवेश करते हैं, वहां के लिए बायोमेट्रिक मंगा लिया गया है। दो-चार दिन में उसका ट्राॅयल प्रारंभ हो जाएगा। दरअसल, चीफ सिकरेट्री विकास शील ने ज्वाईन करते ही साफ कह दिया था कि दिल्ली की तरह मंत्रालय में भी बायोमेट्रिक लगाया जाए। दिल्ली में मुख्य सचिव के समकक्ष भारत सरकार के सचिव से लेकर सेक्शन आॅफिसर और बाबू तक थंब लगाते हैं, फिर भीतर जाते हैं। खैर, छत्तीसगढ़ के नौकरशाहों ने वक्त को भांप लिया है। वैसे भी ब्यूरोक्रेट वक्त को भांपने और उसके हिसाब से आस्था और निष्ठा बदलने में माहिर होते हैं।

अफसरशाही को संरक्षण

जाहिर सी बात है, सरकार पाॅलिसी और प्लान बनाती है और उसका क्रियान्वयन अफसरशाही करती है। यह भी सत्य है कि अफसरशाही तभी अपना सर्वस्व दांव पर लगाती है, जब उसे सत्ता प्रतिष्ठान से संरक्षण मिले। मध्यप्रदेश के दौर में अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह के दौर में ये देखा गया और छत्तीसगढ़ बनने के बाद अजीत जोगी तथा रमन सिंह के समय भी ऐसा हुआ। अफसरशाही में ऐसा नहीं कि सभी भ्रष्ट और निकम्मा हो। सभी कैडर में 10 से 15 परसेंट अफसर साफ-सुथरी छबि के होते हैं तो 25 से 30 परसेंट बैलेंस। यही अफसर किसी भी सरकार के बैक बोन्स होते हैं। 10 से 15 परसेंट वाले आक्रमक बैटिंग करते हैं और 25 से 30 परसेंट पिच पर टिके होते हैं। कई बार अच्छा करने के बावजूद मानवीय चूक हो जाती है। ऐसे में, उनका इंटेंशन अगर गलत नहीं हो तो सरकारों आंख मूंदना पड़ता है। हालांकि, एक कलेक्टर के मामले में राज्य सरकार ने भी ये किया है। मगर इसका वैसा मैसेज नहीं गया, जैसा कि होना चाहिए...ब्यूरोक्रेसी के फारवर्ड प्लेयर अभी भी उस तरह के अश्वस्त नहीं हैं, जैसा कि होना चाहिए। वरना, रिजल्ट कम-से-कम 30 परसेंट और ज्यादा दिखता। दरअसल, परसेप्शन बन गया है, कुछ हुआ तो कौन बचाएगा, इसलिए उतना ही खेलो, जिसमें विकेट बचा रहे। पिछली कांग्रेस सरकार में यही हुआ, जिसका उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। और अभी भी हालत बहुत ज्यादा नहीं बदला है। याद होगा, सरकार बनने के कुछ महीने बाद एक नेत्री के पति के अवैध रेत परिवहन पर शिकंजा कसने पर एक आईएएस एसडीएम लक्ष्मण तिवारी को सूरजपुर से हटाकर 900 किलोमीटर दूर सुकमा भेज दिया गया था। इससे आहत होकर वे अपना कैडर ट्रांसफर करा बिहार चले गए। इससे नौकरशाही अभी उबरी नहीं है। उपर से सोशल मीडिया पर सत्ताधारी पार्टी से जुड़े लोग लगातार हमलावर हैं। यहां तक कि सीएम सचिवालय को भी नहीं बख्शा जा रहा और सत्ता, संगठन में बैठे लोग मौन हैं। ऐसे में, कोई अफसर जोखिम लेकर कैसे काम करेगा? सवाल गंभीर है। सत्ता और संगठन को इसे नोटिस में लेना चाहिए।

प्रभारी मंत्री, सचिव का औचित्य

मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद छत्तीसगढ़ में चार-पांच साल प्रभारी मंत्री और प्रभारी सचिवों का सिस्टम चला मगर उसके बाद अब यह नाम के लिए बच गया है। न किसी मंत्री को अपने प्रभार वाले जिले से मतलब होता, और न ही प्रभारी सचिवों को अपने जिले का जायजा से कोई वास्ता। मध्यप्रदेश के दौर में दो-तीन महीने में एक बार प्रभारी मंत्री अपने जिलों का दौरा कर लेते थे। दिग्विजय सिंह ने जिला सरकार बनाया था, उसमें प्रभारी मंत्रियों की मौजूदगी अनिवार्य होती थी। तब फ्लाइट भी नहीं थी। मंत्री अमरकंटक, महानदी या फिर छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से रातभर का सफर कर छत्तीसगढ़ आते थे। और अब...? छत्तीसगढ़ में अनेक ऐसे जिले हैं, जहां कई-कई महीने से प्रभारी मंत्रियों ने झांकने की जरूरत नहीं समझी। मंत्री या तो रायपुर में रहते हैं या फिर सीधे अपने विधानसभा भागते हैं...मानो प्रदेश के मंत्री नहीं, अपने विधानसभा क्षेत्र के मंत्री हो गए हों। प्रभारी सचिवों का हाल तो और खराब है। पिछले दो दशक से हर सरकार और मुख्यमंत्री के तरफ से फरमान जारी होता है...प्रभारी सचिव अपने जिलों में रात्रि विश्राम करेंगे, मीटिंग लेंगे। मगर इसमें खानापूर्ति के अलावा कुछ नहीं होता। मुख्यमंत्री या किसी वीआईपी का दौरा हुआ तो सचिव की इच्छा हुई तो जाएंगे वरना वो भी नहीं।

प्रभारी सचिवों का जुगाड़

सरकार सचिवों की उपलब्धता की दृष्टि से प्रभारी सचिवों की नियुक्ति करती है मगर इसमें भी बड़ा जुगाड़ चलता है। अधिकांश सीनियर या जोर-जुगाड़ वाले आईएएस रायपुर के आसपास के जिले ले लेते हैं, ताकि रात रुकने की जरूरत ना पड़े...साल में घूमने-घामने का मन हुआ तो एकाध बार चक्कर लगाकर शाम तक रायपुर लौट जाएं। मगर प्रशासनिक रिफार्म के क्रम में राज्य सरकार प्रभारी सचिवों की लिस्ट बनाने में थोड़ी सख्त हुई है। इस बार जो लिस्ट जारी होगी, वह शायद जुगाड़ वाली न हो। सरकार चाहती है कि जनता से सीधे जुड़े विभागों के सचिवों को सरगुजा और बस्तर जैसे जिलों का दायित्व दिया जाए, ताकि आने-जाने के दौरान रास्ते में पड़ने वाले जिलों पर भी उनकी नजर रहे। चलिये, ये अच्छा प्रयास है।

मोदी ड्रेस

छत्तीसगढ़ के पाॅलिटिशियन के लिए खुशी की बात है कि मोदीजी का ड्रेस डिजाइन करने वाली टेक्सटाइल कंपनी जेड ब्लू छत्तीसगढ़ में इंवेस्ट करने के इच्छुक है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के गुजरात दौरे में कंपनी के प्रोप्राइटर ने उनसे मुलाकात की। चलिये, अच्छी बात है पीएम नरेंद्र मोदी के स्टाईल का कुर्ता, पायजामा और जैकेट अब छत्तीसगढ़ में बनेगा और यहां के नेताओं के लिए सुलभ होगा।

सीआईसी की ऐसी नियुक्ति

बिलासपुर हाई कोर्ट ने मुख्य सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के खिलाफ लगी याचिका को खारिज कर इस रास्ते की बड़ी बाधा दूर कर दी है। याने किसी भी दिन अब सलेक्शन कमेटी की मीटिंग होगी और सीआईसी, आईसी की नियुक्ति हो जाएगी। बहरहाल, इस घटना से 2017 में हुए सीआईसी की नियुक्ति का प्रसंग याद आ गया। रिटायर आईएएस एमके राउत को सीआईसी बनाना था। सरकार ने फैसला ले लिया था मगर राज्यपाल बलरामदास टंडन इलाज के सिलसिले में दिल्ली में थे। उनसे नोटिफाई कराने फ्लाइट से एक मुलाजिम को दिल्ली भेजा गया और उनके हस्ताक्षर होने के अगले दिन रविवार का दिन था। कोई जोर-जुगाड़ या सिफारिश लगाए, उससे पहले सरकार ने 11 बजे नियुक्ति का आदेश निकाल दिया था। राज्यपाल दिल्ली से लौटे तो बात शपथ की आई। राजभवन ने कहा, इतना जल्दी कैसे संभव होगा। सबको सूचित करना होगा। इस दौरान राउत तत्कालीन मुख्यमंत्री डाॅ0 रमन सिंह को थैंक्स बोलने पहुंचे। उन्होंने पूछा...ज्वाईन कर लिए। राउत बोले...सर अभी शपथ नहीं हुआ है। क्यों? राउत ने वास्तविकता बताई। इस पर रमन सिंह पास में खड़े ओएसडी से बोले, राजभवन फोन लगाओ। और अगले दिन का टाईम शपथ के लिए मुकर्रर हो गया। बहरहाल, सब कुछ ठीक रहा तो अमिताभ जैन अगले हफ्ते किसी दिन शपथ ग्रहण कर लेंगे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. बिजली विनियामक आयोग के चेयरमैन अपाइंटमेंट की प्रक्रिया शुरू होने में सिस्टम कोई हड़बड़ी क्यों नहीं दिखा रहा?

2. क्या ये सही है कि महिला मित्र को तीन करोड़ का बंगला गिफ्ट करने वाले मंत्रीजी पार्टी के हिट लिस्ट में सबसे उपर हैं?