तरकश, 22 मार्च 2026
संजय के. दीक्षित
बजट 9500...खर्च 3000 करोड़
छत्तीसगढ़ का सिस्टम कितना फास्ट वर्क कर रहा है, इसका जीता-जागता नमूना है पीडब्लूडी। ढाई साल गुजर जाने के बाद भी यह विभाग जहां से चला था, वहीं पर खड़ा है। जाहिर है, किसी भी सूबे में पीडब्लूडी सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण विभाग इसलिए माना जाता है कि गरीब हो या अमीर, सड़कों से सबको वास्ता पड़ता है। अगर किसी विभाग का काम धरातल पर बिना चश्मा लगाए दिखता है तो वह पीडब्लूडी ही है। इसीलिए, इस विभाग का बजट सबसे अधिक रखा जाता है। छत्तीसगढ़ में इस विभाग को 2025-26 में सबसे अधिक 9500 करोड़ का बजट मिला था। लेकिन, इसमें से खर्च कितना हुआ? जवाब सुन आप अपना माथा पकड़ लेंगे। मात्र 3000 करोड़। जबकि, मार्च क्लोजिंग में अब सिर्फ सात रोज बच गए हैं। ये भी 3000 करोड़ खर्च तब हुआ, जब वित्त विभाग सभी विभागों को पत्र लिख बजट खर्च करने तगादा किया और मुख्य सचिव विकास शील लगातार डंडा चला रहे थे। छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े बजट वाले इस विभाग की हालत ये है कि मुख्यमंत्री को पीडब्लूडी के रिव्यू में बड़ी तल्खी के साथ कहना पड़ा...पीडब्लूडी का काम कहीं दिखता नही ंतो वहां बैठे सारे लोग सकपका गए थे।
सड़क और दिग्विजय सिंह की हार
2003 के विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह सरकार की करारी हार हुई, उसमें खराब सड़कों की बड़ी भूमिका रही। अजीत जोगी के दौर में छत्तीसगढ़ में इतनी अच्छी सड़कें बन गई थी कि बार्डर पर के रोडों को देख समझ में आ जाता था कि कहां से मध्यप्रदेश की सीमा चालू हो रही है। छत्तीसगढ़ में भी कमोवेश अभी वही हाल है। पीडब्लूडी के अफसरों को कायदे से उल्टा लटका देना चाहिए। इसलिए कि अपने विभागीय मंत्री और सूबे के मुखिया के इलाके की भी उन्हें परवाह नहीं। पीडब्लूडी मिनिस्टर के गृह जिले मुंगेली आपको जाना है तो नांदघाट से जाने पर भगवान राम याद आ जाएंगे। लोगों को 40 किलोमीटर का एक्स्ट्रा चक्कर लगा सरगांव के आगे से पथरिया होकर मुंगेली जाना पड़ रहा है। यही हाल अंबिकापुर से जशपुर जाते समय बतौली से चरईडांड के बीच है। कई जगह पर सड़कों के नाम पर गड्डे पाएंगे आप। कायदे से अब समय भी नहीं बच गया है। अभी टेंडर का प्रॉसेज प्रारंभ भी हुआ तो फायनल होते-होते बरसात आ जाएगा। फिर अक्टूबर के बाद चुनाव में सिर्फ डेढ़ साल बच जाएगा। तब तक सिस्टम के खिलाफ इतना नैरेटिव बन जाएगा कि मोदीजी, अमित शाह और नितिन नबीन के लिए भी मामला पेचिदा हो जाएगा।
अमित शाह का भी खौफ नहीं
बस्तर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का पूरा फोकस है तो राज्य सरकार भी कोई कसर नहीं रख रही। खुद मुख्यमंत्री अभी तक बस्तर के 100 दौरे कर चुके हैं। इसके बाद भी सरकारी एजेंसी की रिपोर्ट है कि बस्तर के तीन जिलों के कलेक्टर, एसपी और डीएफओ कार्टेल बनाकर सड़कों में डंके की चोट पर कमीशन खा रहे हैं। दिल्ली का ठेकेदार परेशान है, क्योंकि, इन तीनों के अलावा एक मंत्रीजी को भी पैसा चाहिए। समझ में नहीं आता कि आईबी और इंटेलिजेंस का इतना बड़ा अमला यहां क्या कर रहा है। बहरहाल, एक कलेक्टर तो जाते ही शुरू...उनका परिवार फूड डिपार्टमेंट के खेल में फंसते-फंसते बचा है...या यों कहें कि बचाया गया है वरना कलेक्टर बिरादरी की बदनामी हो जाती। बहरहाल, सवाल यह भी कि सड़क ठेकेदार इतना पैसा बांट देगा तो फिर क्वालिटी कैसे मेंटेन करेगा? छत्तीसगढ़ का दुर्भाग्य ही कहें कि इतने सारे अफसरों के जेल जाने के बाद भी उन्हें सद्बुद्धि नहीं आ रही। वो भी तब हो रहा, जब सूबे के चीफ सिकरेट्री से लेकर पीएस टू सीएम, डीजीपी, खुफिया चीफ चारों की छबि पर कोई सवाल नहीं उठा सकता।
आईएएस अफसरों का दिल्ली कूच
छत्तीसगढ़ के साथ विडंबना है कि पिछली सरकार में भी अच्छे अफसर दिल्ली भागने लगे थे और इस सरकार में भी आईएएस अधिकारियों को दिल्ली जाने का सिलसिला रुका नहीं है। अभी तक अंबलगन पी, अलरमेल मंगई, प्रियंका शुक्ला, सौरव कुमार, फकीर भाई अय्याज तंबोली, दीपक सोनी, सर्वेश भूरे, नम्रता गांधी, ऋचा प्रकाश चौधरी, हरीश जैसे कई अफसर दिल्ली जा चुके हैं। अमित अग्रवाल, गौरव द्विवेदी, मनिंदर कौर द्विवेदी, अलेक्स पाल मेनन, संगीता पी, नीरज बंसोड़ पहले से प्रतिनियुक्ति पर हैं। 2005 बैच के मुकेश बंसल ने भी सरकार को पत्र लिख एनओसी मांगा है। मुकेश रिजल्ट देने वाले अफसर हैं, उनका फिर दिल्ली जाना सरकार के लिए झटका माना जाएगा। उधर पिछले कई साल से राज्य से बाहर रह रहीं श्रृति सिंह इस समय दिल्ली में रेजिडेंस कमिश्नर हैं, वे भी फिर से डेपुटेशन के लिए एनओसी मांग रही हैं। कांकेर कलेक्टर नीलेश क्षीरसागर ने भी आवेदन लगाया हैं।
सरकार की सख्ती
छत्तीसगढ़ में आईएएस अधिकारियों की संख्या जरूर बढ़ गई है, मगर काम वाले मुठ्ठी भर ही हैं। अभी सीपीआर समेत कई विभागों में सिकेट्री बदलना है, मगर ढंग के आदमी दिख नहीं रहे। सरकार को बाहर गए अफसरों के मामले में सख्ती दिखानी चाहिए। क्योंकि, कई अफसर दिल्ली जाने के बाद लौटना नहीं चाह रहे। रमन सिंह के दौर में बीवीआर सुब्रमणियम को पीएमओ से वापिस बुलाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह तक ने पत्र लिखा था। जबकि, उस समय विरोधी पार्टी की सरकार थी। बार-बार तगादे के बाद मनमोहन सिंह को फिर कहना पड़ा था कि क्या प्रधानमंत्री को इतना भी अधिकार नहीं कि अपने पसंद के किसी अफसर को अपने सचिवालय में रख सकें। तब जाकर सरकार शांत हुई थी। मगर 2014 में जैसे ही केंद्र में बीजेपी की सरकार आई, सुब्रमणियम को बुला लिया गया। जाहिर है, सारे अफसर दिल्ली चले जाएंगे तो फिर छत्तीसगढ़ में काम कौन करेगा। श्रुति सिंह कई साल यूपी में रहीं। फिर वहीं से सीधे छत्तीसगढ़ भवन में पोस्टिंग कराई और अब फिर से डेपुटेशन पर जाना चाह रहीं। ऐसे में, सवाल यह कि अंकित आनंद ने क्या गुनाह किया कि उन्हें रोक लिया गया।
प्रवासी सिकेट्री
छत्तीसगढ़ के कई आईएएस प्रवासी हो गए हैं। उनमें एक नाम वर्तमान सिकेट्री का भी जुड़ गया है। सरकार ने उनके साथ उदारता बरतते हुए दिल्ली में एडिशनल पोस्टिंग दे दी, ताकि उसकी आड़ में उन्हें दिल्ली में मकान मिल जाए। मगर सरकार की यह उदारता उल्टी पड़ गई। सिकेट्री साब को जब से दिल्ली में आवास मिला है, रायपुर में टिक ही नहीं पा रहे। हर तीसरे दिन पता चलता है साब दिल्ली में हैं। यहां विभाग को वॉट लगा हुआ है। छह महीना और यही हाल रहा तो लोगों में त्राहि माम मच जाएगा। क्योंकि, सवाल सेहत से जुड़ा हुआ है।
2005 बैच बदनाम!
दिसंबर 2023 में सरकार बदलने के बाद पोस्टिंग के मामले में आईएएस का 2005 बैच काफी चर्चाओं में रहा। मगर मुकेश बंसल को अगर सरकार ने प्रतिनियुक्ति के लिए हरी झंडी दे दी तो फिर सिचुएशन 180 डिग्री की दिशा में घूम जाएगा। सरकार को नया वित्त और जीएसटी सचिव की तलाश करनी होगी। वैसे भी जीएसटी में सचिव से अधिक कमिश्नर का रोल रहता है और वित्त में पूछपरख के अलावा चवन्नी नहीं मिलता। ऐसा कह सकते हैं...मुकेश जवानी के दिनों में पैसा कमाने की जगह अपने मित्र के लिए वित्त विभाग में हमाली कर रहे हैं। हालांकि, सुबोध सिंह के दिल्ली से आने के बाद अब यह नहीं कहा जा सकता कि पोस्टिंग में असंतुलन हैं। उन्होंने सबको कुछ-न-कुछ दिया है। शहला निगार जूनियर होने के बाद भी एपीसी जैसे पद संभाल रही, जो दीगर राज्यों में एसीएस या पीएस लेवल के अफसर के नीचे किसी को मिलता नहीं। बड़े विभागों की बात करें तो पीडब्लूडी कमलप्रीत सिंह देख रहे तो उर्जा रोहित यादव के पास है। हालांकि, रोहित इस समय ओवरलोडेड हैं। बिजली कंपनियों के चेयरमैन के साथ उनके पास उर्जा, जनसंपर्क और टूरिज्म भी है। रीना बाबा कंगाले फूड जैसे अहम विभाग संभाल रही हैं। अंकित आनंद पौल्यूशन बोर्ड के चेयरमैन के साथ सिकेट्री आवास पर्यावरण और एमडी स्टेट कैपिटल रीजन हैं। कहने का मतलब यह कि मुकेश अगर दिल्ली गए तो 2005 बैच में रजत के पास उद्योग, शंगीता आर के पास आबकारी और एस प्रकाश के पास ट्रांसपोर्ट बच जाएगा। इनमें उद्योग ही एक काम का विभाग है। बाकी ट्रांसपोर्ट और आबकारी में कोई डेवलपमेंट वर्क नहीं होता। सिवाय पेटी और खोखा का हिसाब कर इधर-उधर पहुंचवाने के।
मंत्रालय में बड़ी उठापटक
विधानसभा का बजट सत्र समाप्त हो गया है। इस बार सुशासन तिहार नहीं होगा। ऐसे में अगले हफ्ते प्रशासनिक हलको में बड़ी उठापटक होने के संकेत मिल रहे हैं। मंत्रालय में कई विभागों के सिकेट्री बदलेंगे। स्पेशल सिकेट्री टू सीएम डॉ0 रवि मित्तल के दिल्ली जाने के बाद एक या दो आईएएस अफसर को सीएम सचिवालय में पोस्ट किया जाएगा। जिन सचिवों के दो साल से अधिक हो गए हैं, उनके विभाग बदले जाएंगे। एसीएस मनोज पिंगुआ को गृह विभाग में साढ़े तीन साल हो गया है। सुनने में आ रहा कि वे अब डेपुटेशन पर दिल्ली न जाने पर सोच रहे हैं। अगर वे नहीं गए तो गृह विभाग में भी बदलाव होगा। सरकार चेंज होने के बाद पहली लिस्ट में जिन्हें पोस्टिंग मिली थी, उनमें निहारिका बारिक, कमलप्रीत सिंह, सिद्धार्थ परदेशी, अब्दुल कैसर हक और शम्मी आबिदी शामिल हैं। कमलप्रीत के पास पीडब्लूडी, परदेशी के पास स्कूल शिक्षा, कैसर हक के पीएचई और शम्मी आबिदी महिला और बाल विकास है। हो यह भी सकता है, प्रमुख सचिव बन गए सोनमणि बोरा को फेरबदल में कोई और अहम विभाग दिया जाए। या फिर किसी विभाग का अतिरिक्त प्रभार। पीडब्लूडी में वीरेंद्र सहवाग टाईप किसी फास्ट बैट्समैन को उतारा जा सकता है।
कलेक्टर, एसपी, डीएफओ भी
सरकार का ढाई साल यानी इंटरवल है। अभी जो अफसर पोस्ट होंगे, वे अगले विधानसभा चुनाव तक कार्य करेंगे। इसलिए सरकार इस बार ठोक बजाकर रिजल्ट देने वाले अफसरों को मैदान में उतारेगी। सबसे पहले जनसंपर्क आयुक्त बनाने की चुनौती है। चुनौती इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया के दौर में सरकार की छबि बनाना कठिन टास्क है और फिर अभी जो सीपीआर बनेगा, जाहिर तौर पर वही अगले विधानसभा चुनाव तक रहेगा। इसके लिए आरआर में अवनीश शरण, रजत बंसल, प्रभात मलिक का नाम चर्चा में हैं। प्रमोटी में जीतेंद्र शुक्ला और संजय अग्रवाल के नाम पर भी विचार किया जा सकता है। इसके साथ कई जिलों के कलेक्टर, एसपी, डीएफओ और जिला पंचायत सीईओ भी चेंज होंगे।
भर्ती बोर्ड में सीनियर आईएएस
कर्मचारी चयन मंडल बनने के बाद व्यापम का अस्तित्व अब समाप्त हो जाएगा। भर्ती बोर्ड के एक्ट के अनुसार व्यापम मंडल में मर्ज हो जाएगा और जो भर्तिया व्यापम में प्रक्रियागत थी, उसे अब कर्मचारी चयन मंडल करेगा। इसमें भी शीघ्र ही नियुक्तियां होंगी। मंडल का चेयरमैन प्रमुख सचिव या उसके उपर का होगा। वो वर्तमान भी हो सकता है या रिटायर्ड भी। इसके अलावे तीन मेंबर होंगे। इसमें ज्वाइंट सिकरेट्री स्केल वाले लोग नियुक्त होंगे। इसमें रिटायर अफसर से लेकर प्रोफेसर या अन्य सर्विसों से रिटायर लोग भी मेंबर बन सकते हैं।
चार बड़े बिल
विधानसभा का बजट सत्र नए कानून बनाने के मामले में बड़ा महत्वपूर्ण रहा। वैसे तो इस बार कई विधेयक पेश्ज्ञ किए गए मगर चार विधेयक छत्तीसगढ़ के लिए मिल का पत्थर साबित होंगे। पहला मुख्यमंत्री के विभाग जीएडी का कर्मचारी चयन बोर्ड और नकल प्रकरण विधेयक। व्यापम को भंग कर कर्मचारी चयन मंडल बनाना सरकार का बड़ा फैसला है। अभी लोग इसे समझ नहीं पा रहे मगर नौकरी में फास्ट भर्तियों के लिए इसे याद किया जाएगा। इसका ड्राफ्ट खुद पीएस टू सीएम सुबोध सिंह ने तैयार किया है। फार्म भरने से लेकर परीक्षा और रिजल्ट के लिए अब युवाओं को भागीरथी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। सब कुछ बेहद फास्ट होगा। वहीं व्यापम से लेकर पीएससी तक घालमेल को लेकर शुरू से बदनाम रहा है। इसी व्यापम में पीएमटी का पर्चा लीक होने की वजह से दो बार परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी। नकल विधेयक कानून के बाद अब परीक्षाओं में गड़बड़ियों पर अंकुश लगेगा। तीसरा विधेयक रहा मंत्री ओपी चौधरी के हाउसिंग बोर्ड को पीडब्लूडी और आरईएस के समकक्ष बनाने का। सरकार ने अब पीडब्लूडी की लेटलतीफी को देखते हाउसिंग बोर्ड को विकल्प के तौर पर पेश कर दिया है। इस विधयेक को लेकर ओपी इतना गंभीर थे कि विधानसभा में पारित होने के 24 घंटे के भीतर नोटिफिकेशन जारी हो गया। और चौथा गृह मंत्री विजय शर्मा का धर्मान्तरण विधेयक। धर्मांतरण को लेकर अब कड़े कानून बनाए गए हैं। निश्चित तौर पर इस बिल के पास होने से धर्मांतरण पर कंट्रोल होगा।
बीजेपी का अनुशासन
भारतीय जनता पार्टी अनुशासन के नाम से जानी जाती है मगर छत्तीसगढ़ में उल्टा हो रहा है। विधानसभा में मंत्रियों को बार-बार आगाह किए जाने के बाद सदन में जाकर हथियार डालने का सिलसिला थमा नहीं। रमन सिंह के दौर में 15 बरस मंत्री रहे मंत्री अगर जवाब देने के लिए पन्ना पलटते रह जाएं तो फिर बीजेपी को सोचने पर मजबूर करेगा। उपर से पार्टी का विधायकों पर भी कंट्रोल नहीं रह गया है। सदन में परफर्मेंस को लेकर विधायकों की बैठक बुलाई गई, उसमें पता चला है, छह-सात विधायक गायब रहे। हो सकता है, दो-एक को कोई अपरिहार्य काम आ गया हो मगर छह-छह, सात-सात एमएलए नदारत हो जाए तो ये पार्टी के अनुशासन पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है।
एसपी हो तो ऐसा
छत्तीसगढ़ के सारे पुलिस अधीक्षक भ्रष्ट और रीढ़विहीन नहीं हैं। एक जिले के कप्तान की पोलिसिंग इतनी तगड़ी है कि खुद पुलिस वाले परेशान हैं। नेताओं को उनसे उल्टे सीधे काम की सिफारिश करने में घबराहट होती हैं। उनका एक वाकया आजकल बड़ी चर्चा में है। रुलिंग पार्टी के एक विधायक जी एसपी से उनके ऑफिस में मिलने गए। उन्होंने जिला बदर वाले क्रिमिनल की वकालत करते हुए कहा, चुनाव में वह 600 से 700 वोट दिलवाता है...उसके यहां पारिवारिक फंक्शन है...वो आएगा तो जरा देख लीजिएगा। एसपी ने उन्हें दो टूक कह दिया...वो यहां आया तो एनकाउंटर हो जाएगा। विधायक जी अब अपनी पीड़ा लोगों को बता रहे हैं। हालांकि, वो यह नहीं समझते कि शातिर क्रिमिनल को पनाह देकर 600 वोट की जगह अपना हजारों वोट खराब कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के वोटर ऐसे जनप्रतिनिधियों को कभी पसंद नहीं करते जो अपराधियों को संरक्षण देते हैं।
अंत में दो सवाल आपसे?
1. वित्त मंत्री ओपी चौधरी के साथ काम करने के लिए अफसर तत्पर क्यों रहते हैं?
2. कर्मचारी भर्ती बोर्ड का प्रथम चेयरमैन किस आईएएस को बनाया जाएगा?

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें