Chhattisgarh Tarkash 2026:
तरकश, 19 अप्रैल 2026
संजय के. दीक्षित
डिलिमिटेशनः बैकबोन और त्राहिमाम
परिसीमन बिल के पारित होने से छत्तीसगढ़ के विधानसभा, लोकसभा की सीटों में वृद्धि होती, मगर इससे किसी सियासी पार्टी को नफा-नुकसान नहीं होता। इसका सबसे ज्यादा इम्पैक्ट वहां पड़ेगा, जहां मुस्लिम वोटर अधिक संख्या में हैं। अभी असम का उदाहरण सामने है। जम्मू-कश्मीर के बाद असम देश का दूसरा सर्वाधिक मुस्लिम आबादी वाला प्रदेश है। वहां 35 फीसदी मुस्लिम हैं। बीजेपी की सरकार के दौरान भी इस समय वहां 31 मुस्लिम विधायक हैं। बहरहाल, वहां जो मुस्लिम आबादी तीन दर्जन से अधिक विधानसभाई इलाकों में निर्णायक वर्चस्व रखती थी, परिसीमन के बाद अब ये सिनेरियो बदल गया है। दरअसल, परिसीमन की कैंची ऐसी चली कि कई इलाकों में फैले मुस्लिम आबादी को एक विधानसभा में लाने से उस क्षेत्र में उनकी आबादी तो काफी बढ़ गई मगर अगल-बगल के विस क्षेत्रों उनकी संख्या घट गई। इसे ऐसे समझे...आसपास के चार विधानसभा क्षेत्रों के मुस्लिम बहुल इलाकों को काटकर एक या दो विधानसभाओं में जोड़ा गया। इससे चार की जगह अब एक या दो विधानसभा सीटों पर मुस्लिमों का प्रभुत्व सिमट गया है। असम में परिसीमन के बाद हुए इस चुनाव में मुस्लिम विधायकों की संख्या 12 से 14 घट जाने का अनुमान है। जाहिर है, असम में मुस्लिम विधायक ही विपक्ष के बैनबोन होते थे। इसी तरह बिहार, यूपी समेत दक्षिण के कई राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जिनकी परिसीमन के बाद स्थिति बदल जाएगी। इसके बाद कुछ राजनीतिक दलों का बड़ा नुकसान होगा, तो कुछ के शटर गिर जाएंगे। तभी तो बवाल मचा है। विपक्ष इसलिए भी त्राहिमाम की स्थिति में है कि सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली। याचिका खारिज हो गई। दरअसल, सीटों की परिसीमन में एक जाति, समुदाय या वर्ग को क्लब कर नया विधानसभा या लोकसभा बनाए जाने को प्राथमिकता देना है। इस दृष्टि से इस पर उंगली भी नहीं उठाई जा सकती।
डेपुटेशन का फर्स्ट केस
यूपीएससी क्रैक कर आईएएस, आईपीएस बनने वाले हर अफसर का ख्वाब होता है...जिले में कलेक्टरी और कप्तानी करें। मगर बिना एसपी बने कोई आईपीएस अधिकारी अगर सेंट्रल डेपुटेशन पर निकल ले तो इसे क्या कहा जाना चाहिए। ये वाकया इसलिए चौंकाने वाला है कि छत्तीसगढ़ ही नहीं अविभाजित मध्यप्रदेश में ऐसा कभी नहीं हुआ। कलेक्टर बने बिना न कोई आईएएस प्रतिनियुक्ति पर गया और न आईपीएस एसपी बने। लेकिन, 2020 बैच के आईपीएस विकास कुमार ने भारत सरकार से प्रतिनियुक्ति मांगी और एनआईए में उन्हें पोस्टिंग मिल भी गई। अब मामला नाराजगी का है या कोई और बात...पीएचक्यू के अफसरों को इस बारे में ठीकठाक पता होगा। मगर बता दें...कवर्धा में एडिशनल एसपी की पोस्टिंग के दौरान एक मामले में विकास कुमार को सस्पेंड किए जाने पर बड़ी टीका-टिप्पणी हुई थी। आमतौर पर डायरेक्ट आईपीएस के कैरियर को देखते इस तरह की कोई कार्रवाई नहीं की जाती। उस पर जब, एडिशनल एसपी की सिस्टम में कोई डिसिजन मेकिंग की भूमिका नहीं होती। डायरेक्ट आईपीएस के लिए यह प्रोबेशन की तरह माना जाता है। बहरहाल, विकास कुमार को निलंबन से बहाल होने के कई महीने बाद उन्हें रायपुर पुलिस कमिश्नरेट में डीसीपी बनाया गया। लेकिन, यहां भी डंडी मार दी गई। जोन की बजाए उन्हें शंट करते हुए ट्रैफिक की जिम्मेदारी थमाई गई। हालांकि, आईएएस, आईपीएस के कैरियर में ऐसे दौर आते हैं, इससे घबराना नहीं चाहिए। वैसे भी ये माना जाता है कि किसी भी ऑल इंडिया अफसर की सर्विस का 10 साल बेस्ट, 10 साल मध्यम और 10 साल बेहद खराब रहता है।
शादी के बाद बीजापुर
छत्तीसगढ़ में ऐसे भी आईपीएस अधिकारी रहे हैं, जिन्हें कैरियर की शुरूआत में जोर का झटका मिला मगर बाद में उन्हें बड़ी जिम्मेदारियां संभालने का मौका मिला। 98 बैच के आईपीएस अधिकारी अमित कुमार रायपुर में एडिशनल एसपी थे। वे शादी करके रायपुर लौटे थे कि हफ्ते भर बाद उन्हें बीजापुर का एसपी बना दिया गया। बीजापुर नया जिला बना था, बैठने के लिए जगह भी नहीं थी। नई-नवेली पत्नी को मायके भेज अमित कुमार मन मारकर धुर नक्सल एरिया बीजापुर गए। उसके बाद वे रायपुर समेत सूबे के छह जिलों के एसपी रहे। सीबीआई में 12 साल तक टॉप का पोर्टफोलियो संभाला। और अब खुफिया चीफ हैं। याने नए अफसरों को थोड़ा धैर्य रखना चाहिए। परिस्थितियां हमेशा एक सी नहीं रहती। विकास कुमार भले ही अभी अपमानित महसूस कर रहे होंगे मगर हो सकता था...आगे चलकर उनका वक्त बदलता। इस केस में पीएचक्यू के सीनियर अफसरों को भी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता। पहले के जमाने में सीनियर अफसर अपने जूनियर को काफी समझाते थे, गल्तियां पर टोका-टाकी और डांट भी लगाते थे। मगर ये काम अब बंद हो गए हैं। डीजीपी अरुणदेव गौतम को पीएचक्यू में नए अफसरों के लिए एक एचआर सेल बनाना चाहिए।
एसपी भी डेपुटेशन पर
आईपीएस आंजनेय वार्ष्णेय भारत सरकार में डेपुटेशन पर जा रहे हैं। वे इस समय सारंगढ़़-बिलाईगढ़ जिले के एसपी हैं। आंजनेय के प्रतिनियुक्ति पर जाने का कारण पारिवारिक बताया जा रहा है। उनके जाने के बाद सरकार को सारंगढ़ जिले में नए कप्तान की नियुक्ति करनी होगी। जल्द ही आईपीएस की लिस्ट निकलेगी, उसमें सारंगढ़ भी शामिल होगा। या हो सकता है, सारंगढ़ का सिंगल आर्डर निकल जाए।
ट्रांसफर पर संशय
छत्तीसगढ़ सरकार ने अचानक से सुशासन तिहार का आदेश निकाल अफसरशाही को चौंका दिया। पहले ऐसे संकेत मिले थे कि इस बार सुशासन तिहार को ड्रॉप किया जाएगा। बहरहाल, दो-सवा दो साल से एक ही जगह पर जमे अधिकारियों की उम्मीद थी कि मई फर्स्ट वीक में ताबड़तोड़ ट्रांसफर होंगे। कलेक्टर, एसपी, जिपं सीईओ और डीएफओ बदले जाएंगे। मगर सुशासन तिहार के ऐलान से वे उलझन में पड़ गए हैं। हालांकि, सुशासन तिहार की वजह से ये नहीं कहा जा सकता कि ट्रांसफर अब टल ही जाएंगे। सरकार के नजदीकी सूत्रों का कहना है कि ये अभी तय नहीं हुआ है कि सुशासन तिहार के दौरान ट्रांसफर नहीं होंगे, मगर अत्यधिक संभावना है कि सुशासन तिहार चलते रहेंगे और साथ में ट्रांसफर भी। जाहिर है, सुशासन तिहार एक मई से प्रारंभ होकर 10 जून तक चलेंगे।
अलग मोड में सुशासन तिहार
सुशासन तिहार इस बार अलग मोड में किया जाएगा। इस बार जिलों में 15-20 ग्राम पंचायतों के बीच एक जनसमस्या शिविर लगेगा। पूरा फोकस इस बार लोगों की समस्याओं पर केंद्रित रहेगा। अधिकांश शिविरों में कलेक्टर, एसपी मौजूद रहेंगे। मुख्यमंत्री बीच-बीच में इन शिविरों में हिस्सा लेंगे। अपने उड़नचिरैया से औचक निरीक्षण करने भी जाएंगे। मगर पिछली बार की तरह शेड्यूल बनाकर वे हर जिले में नहीं जाएंगे। कुल मिलाकर सरकार का मोटिव सिस्टम को एक्टिव करना और ज्यादा-से-ज्यादा लोगों की परेशानियां दूर करना है।
कार्रवाई का डंडा
सुशासन तिहार में इस बार सीएम विष्णुदेव साय प्वाइंटेड जगहों पर अपने हेलिकाप्टर से उतरेंगे...लोगों से राज्य में चल रही योजनाओं और उनकी समस्याओं पर फीडबैक लेंगे। संकेत मिल रहे हैं...कोई गड़बड़ी मिली तो इस बार मारक कार्रवाई भी होगी। जाहिर है, कार्रवाई के नाम पर पिछला सुशासन तिहार टोका-टोकी तक सिमट गया था...कोई बड़ा विकेट नहीं गिरा। सीएम ने जीपीएम के कलेक्टर को लेकर बड़ी तंज कसी थी। बोले...तीन थानों का जिला नहीं संभलता तो फिर कलेक्टर बनने का क्या मतलब? लेकिन, इस बार मामला कुछ आगे का हो सकता है। इसलिए कलेक्टर, एसपी संभलकर।
रेडक्रॉस को खत्म?
जो काम देश के किसी सूबे में नहीं हुआ, वह छत्तीसगढ़ ने कर डाला। छत्तीसगढ़ में प्रदेश स्तर से लेकर जिला स्तर तक रेडक्रॉस सोसाइटी का चुनाव हुआ है। रायपुर में अब सत्ताधारी से जुड़ा प्रायवेट आदमी चेयरमैन बन गया है। जिलों में भी नई बॉडी बन गई है। मगर प्राब्लम है कि जिले वालों को कोई कलेक्टर मिलने तक का टाईम नहीं दे रहे। दरअसल, मध्यप्रदेश के दौर से लेकर छत्तीसगढ़ में अभी तक रेडक्रॉस में कभी चुनाव नहीं हुए। जिलों के कलेक्टर इसके पदेन प्रमुख होते थे। कलेक्टरों का अपना औरा होता है, इसलिए रेडक्रॉस बचा हुआ था। कई कलेक्टर इसमें काफी दिलचस्पी लेकर काम करते थे। अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर कलेक्टर रेडक्रॉस के लिए अच्छा खासा फंड कलेक्शन कर लेते थे। मगर अचानक चुनाव कराकर सिस्टम ने रेडक्रॉस को प्रायवेट हाथों में सौंप दिया। रेडक्रॉस सोसायटी का भगवान ही मालिक हैं।
कागजों में एसीआर
पिछले साल जीएडी ने कर्मचारियों, अधिकारियों के एसीआर के लिए कड़ा आदेश जारी किया था। कहा गया था कि अब ऑनलाइन भरा जाएगा, किसी अधिकारी को अब अफसरों का चक्कर नहीं लगाना पडे़गा। मगर आलम यह है कि अभी भी एसीआर के लिए सरकारी मुलाजिम चक्कर लगाते दिख रहे हैं। पुलिस वालों की तो और स्थिति खराब है। एसपी ने भरकर भेज दिया तो कई आईजी साहब लोग उसे दबाकर बैठ गए हैं। बाकी विभागों का हाल भी जुदा नहीं है। तभी जीएडी ने 17 अप्रैल को फिर एक आर्डर निकाल 2024-25 का एसीआर भरने तगादा किया है।
डिप्टी सीएम साहबों की उम्मीदें
बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे। नीतिश कुमार के इस्तीफे के बाद उन्हें राज्य की बागडोर सौंपी गई है। इससे छत्तीसगढ़ की उपमुख्यमंत्रियों की उम्मीदें भी कुंलाचे भर रही होंगी। मगर सम्राट चौधरी एक अपवाद की तरह है। अविभाजित मध्यप्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ बनने के बाद तक डिप्टी सीएम साहबों का तजुर्बा अच्छा नहीं रहा। बल्कि, डिप्टी सीएम बनने के बाद सियासी कैरियर ही ढलान पर आ गया। मध्यप्रदेश के दौर में सुभाष यादव जैसे जमीनी और कद्दावर सहकारिता नेता उप मुख्यमंत्री बनने के बाद बियाबान में चले गए। तो उनके साथ डिप्टी सीएम रहे कोरबा निवासी प्यारेलाल कंवर डिप्टी सीएम रहने के बाद अगले विधानसभा चुनाव में अपनी सीट तक नहीं निकाल सके। उनसे पहले वीरेंद्र सखलेखा, शिवभानु सिंह सोलंकी और जमुना देवी का हश्र भी बहुत अच्छा नहीं हुआ। वीरेंद्र सखलेचा अपवाद स्वरूप 1978 में मुख्यमंत्री बने मगर ज्यादा दिन इस पद पर रह नहीं सकें। सुंदरलाल पटवा उन्हें खो कर गद्दी पर बैठ गए थे। छत्तीसगढ़ में पिछली सरकार में ही टीएस सिंहदेव पार्टी हाईकमान द्वारा किए गए करार और आश्वासनों के बाद भी डिप्टी सीएम से सीएम न बन सकें। उपर से गुस्से में पंचायत से इस्तीफा देकर उन्होंने अपने एक विभाग का नुकसान कर लिया। कहीं ऐसा तो नहीं...डिप्टी सीएम पद के साथ जुड़े इन्हीं बुरे योगों को देखते छत्तीसगढ़ के एक उप मुख्यमंत्री दिल्ली जाने का खयाल पाल लिए हैं।
हफ्ते का कोट
’जो रास्ता कठिन है, वही आपको मंजिल तक ले जाएगा, संघर्ष से घबराओं मत, यही तुम्हें आगे बढ़ाएगा’ और ’कर्म किसी के बेकार नहीं जाते, तुम किसी का जीना मुश्किल कर दो, उपरवाला तुम्हारा मरना मुश्किल कर देगा।’
अंत में दो सवाल आपसे?
1. छत्तीसगढ़ का आईपीएस कैडर कुछ ज्यादा ही निराश और उत्साहविहीन क्यों हो गया हैं?
2. पूर्णकालिक डीजीपी की नियुक्ति न होने से चीफ सिकेट्री और एसीएस होम क्यों घबरा रहे हैं?
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