तरकश, 14 जून 2026
संजय के. दीक्षित
मंत्रियों का सामूहिक इस्तीफा!
छत्तीसगढ़ में मंत्रिमंडल सर्जरी की अटकलों के बीच एक अपडेट ये आ रहा कि पार्टी पहले सभी 13 मंत्रियों का इस्तीफा लेगी, उसके बाद नए सिरे से मंत्रिमंडल का गठन किया जाएगा। ठीक उसी तरह, जैसा गुजरात में दो बार हुआ। जाहिर है, बीजेपी में मंत्रियों का सामूहिक इस्तीफा तभी लिया जाता है, जब हटाए जाने वाले मंत्रियों की तादात ज्यादा हो। छत्तीसगढ़ में 13 में से से करीब पांच मंत्रियों को बदलना है। अगर दो-तीन मंत्रियों को हटाना होता तो फिर सिर्फ उन्हीं से इस्तीफा लिया जाता। मगर फिगर ज्यादा है, इसलिए बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व सभी मंत्रियों का इस्तीफा लेगा, फिर उसमें नए मंत्रियों को शामिल किया जाएगा। इस्तीफा देने वाले पांच मंत्रियों की जगह कौन लेगा...उनमें पुराने विधायक कितने होंगे और कितने नए...इस बारे में इस समय बता पाना मुमकिन नहीं, क्योंकि, नए जमाने के बीजेपी में कब, क्या होगा...किसी को कुछ पता नहीं होता। सब कुछ काफी कंफिडेंशियल होता है। बताते हैं, खुद नितिन नबीन को आभास नहीं था कि पार्टी ने उन्हें सर्वोच्च पर बिठाने का फैसला किया है। पीएम नरेंद्र मोदी ने जब फोन किया, तो उन्हें लगा कि बिहार बीजेपी का अध्यक्ष बनाने की बात कर रहे हैं। मगर अगले पल जो हुआ, उससे नितिन भी हैरान रह गए। खैर, बात छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल फेरबदल की, तो जून लगभग आधा निकल गया है। हो सकता है, इस महीने के आखिर या जुलाई फर्स्ट वीक तक राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की टीम फायनल हो जाए। इसके बाद जुलाई फर्स्ट या सेकेंड वीक तक छत्तीसगढ़ में मंत्रिमंडल पर काम होगा। तब तक सभी तेरहवों मंत्रियों की सांसे गले में लटकी रहेगी।
ओड़िया आईएएस और ग्रहण
रिटायर आईएएस और साहित्यकार बीकेएस रे नहीं रहे। 79 साल की उम्र में 3 जून को उनका देहावसान हो गया। उसके अगले दिन महादेव घाट में उनका अंतिम संस्कार हुआ। मुक्तिधाम में जैसा कि आमतौर पर गपशप होता है...उस रोज भी तरह-तरह के पुराने किस्से, चर्चाएं निकली। बात इस पर भी हुई कि एसके मिश्रा के सीएस रहने के दौरान आखिर ऐसा क्या हुआ कि ओड़िया आईएएस अधिकारियों का ग्रह-नक्षत्र बिगड़ गया। एसके मिश्रा ओड़िसा के रहने वाले थे। छत्तीसगढ़ के फर्स्ट चीफ सिकेट्री अरुण कुमार के रिटायर होने के बाद अजीत जोगी ने मिश्रा को मुख्य सचिव बनाया था। मगर उनके बाद फिर कोई दूसरा ओड़िया भाषी अफसर सीएस नहीं बन पाया। दिवंगत ओड़िया निवासी बीकेएस रे सीएस की दौड़ में दो बार सुपरसीड हुए। पहली बार उनके जूनियर शिवराज सिंह को सीएस बनाया गया और उसके बाद पी0 जॉय उम्मेन को। रे के बाद डीएस मिश्रा और एमके राउत लाख प्रयास के बाद भी मुख्य सचिव बनने से वंचित हो गए। और अब सुब्रत साहू के साथ यही हुआ। सुब्रत 92 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। मगर उन्हें सुपरसीड कर सरकार ने 94 बैच के आईएएस विकास शील को ब्यूरोक्रेसी की शीर्ष कुर्सी सौंप दी। ऐसा भी नहीं कि ये ओड़िया अधिकारी चीफ सिकेट्री बनने लायक नहीं थे। छत्तीसगढ. में एक से बढ़कर एक ..... मुख्य सचिव हुए हैं, उनसे तो ये अच्छे ही थे। ओड़िया आईएएस अधिकारियों को जगन्नाथ महाप्रभु की नगरी पुरी में ठीकठाक किसी पंडित से अनुष्ठान कराना चाहिए।
78 सीटों का क्या
बस्तर से नक्सलवाद का खात्मा हो गया, छत्तीसगढ़ के लिए इससे बड़ी खुशी की बात हो नहीं सकती। निश्चित तौर पर बस्तर के डेवलपमेंट पर सिस्टम का फोकस होना चाहिए। सरकार ने बस्तर को प्रायरिटी में रखा भी है। उसे देश का सबसे विकसित आदिवासी संभाग बनाने का फैसला किया गया है। यहां तक ठीक है। मगर सिस्टम को खुश करने सारा तंत्र लगे सिर्फ बस्तर का राग अलापने, तो स्टेट और सत्ताधारी पार्टी की सेहत के लिए ये ठीक नहीं है। इस समय स्थिति यह है कि जिसे बस्तर से कोई मतलब नहीं, वो भी बस्तर की बात कर रहा। सिस्टम में बैठे लोगोें को यह ध्यान रखना होगा कि बस्तर में 12 विधानसभा सीटें हैं। बाकी 78 सीटें सरगुजा और मैदानी इलाके में हैं। मैदानी और शहरी इलाके में पानी से लेकर सड़क जैसी कई बुनियादी समस्याएं मुंह बाए खड़ी है, मगर इन विभागों के जिम्मेदार अफसर सिर्फ बस्तर की जाप करेंगे तो यह असंतुलन की स्थिति होगी। सिस्टम में बैठे लोगों को इसे नोटिस में लेनी चाहिए।
रिटर्न गिफ्ट में ब्रेकर
नगरीय निकाय चुनाव में एकतरफा जीत के बाद विष्णुदेव सरकार ने नगरीय क्षेत्रों को रिटर्न गिफ्ट देने एक अच्छा कंसेप्ट शुरू किया था। इसके तहत चुनिंदा शहरों के विकास के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक हाई लेवल की मीटिंग होती थी। इसमें नगरीय निकाय मंत्री के साथ वित्त मंत्री और संबंधित विभागों के सचिवों के साथ संबंधित जिले के कलेक्टर, एसपी तथा विधायकों को बुलाया जाता था। लेकिन, रायपुर और बिलासपुर के बाद कतिपय कारणों से इस बैठक पर ब्रेक लग गया। इसे फिर से चालू करना चाहिए। क्योंकि इस हाई लेवल बैठक में मौके पर ही कई समस्याओं या पेंडिंग कार्य क्लियर हो जा रहे थे। इससे फायदा भाजपा को ही होता, क्योंकि शहरी इलाकों में बीजेपी का प्रभाव ज्यादा है। वैसे भी किसी स्टेट का भौतिक विकास उसके शहरों की चकाचौंध से परखा जाता है। फिर ग्रामीण इलाकों के लोग भी आमोद-प्रमोद के लिए शहर ही आते हैं। मगर शहर ही बेतरतीब, अव्यवस्थित रहेगा तो फिर बाहर के लोग स्टेट की क्या छबि लेकर जाएंगे।
फॉरेस्ट और आईएएस
श्रीनिवास राव और तपेश झा के रिटायरमेंट के बाद सरकार ने अरुण पाण्डेय को हेड ऑफ फॉरेस्ट बनाया। इसके बाद वैक्यूम को दूर करने चार शीर्ष अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार देकर सरकार ने काम चला लिया। मगर फॉरेस्ट में असली दिक्कत आएगी अगले महीने, जब माइनर फॉरेस्ट फेडरेशन से अनिल साहू और फॉरेस्ट डेवलपमेंट कॉरपोरेशन से प्रेम कुमार रिटायर होंगे। ये दोनों पीसीसीएफ लेवल के पोस्ट हैं और प्राब्लम यह है कि वन विभाग के पास इस स्तर के अधिकारी अब बचे नहीं हैं। इनमें फेडरेशन तो बस्तर के आदिवासी इलाके और वोट बैंक की दृष्टि से काफी अहम है। ये अलग बात है कि फेडरेशन के वर्तमान एमडी अनिल साहू संजय शुक्ला और अनिल राय के काम को आगे बढ़ा नहीं पाए। मगर विधानसभा चुनाव में अब दो साल बच गए हैं, लिहाजा सरकार अब किसी ठीकठाक अफसर को ही इस पद पर बिठाना चाहेगी। मगर अफसर है नहीं। ऐसे में, सवाल उठता है...क्या किसी आईएएस को फेडरेशन और कॉरपोरेशन में नहीं बिठाया जा सकता। इन दोनों में काम एडमिनिस्ट्रटिव और कोआर्डिनेशन का है। वैसे, ब्यूरोक्रेसी में इस पर चर्चा भी चल रही कि जब आईएएस के कैडर पद पर अनेक आईएफएस काम कर चुके हैं तो फिर वन विभाग में आईएएस पोस्ट क्यों नहीं हो सकते। बहरहाल, निर्णय सरकार को लेना है।
कमाल के अफसर
एनएमएसी ने सूबे के पांच नए मेडिकल कॉलेजों को परमिशन देने से इंकार कर दिया है। अफसरों ने बिना किसी तैयारी के प्रपोजल भेज दिया था। कई जगह अस्पताल नहीं है तो कहीं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को ही अस्पताल दिखा डाला था। अफसरों की नाकामी इसलिए कि पांच में से तीन कवर्धा, जांजगीर और गीदम कॉलेज के लिए भारत सरकार ने पिछली सरकार में बिल्डिंग बनाने के लिए पैसा भेज दिया था। 2022 से यह पैसा डंप पड़ा है। दिसंबर 2023 में सरकार बदलने के बाद सीजीएमएससी ने अफसरों ने टेंडर में खेला करने में दो बरस बर्बाद कर दिया। 500 करोड़ ओवर रेट पर एक ही कंपनी को ठेका देने की साजिश रची गई। मगर इसी स्तंभ के लेखक की लगातार खबरों के बाद घोटाले का टेंडर निरस्त हुआ और सरकारी खजाने का 272 करोड़ बचा। मगर सरकार के पैसे बच गए मगर यहां के बच्चों का जो नुकसान हुआ, उसका क्या? जरा सोचिए, टेंडर में गफलत करने की कोशिश में अगर टाईम खराब नहीं किया गया होता तो अभी तक बिल्डिंग कंप्लीट हो रही होती। और, उस बेस पर शायद एनएमसी कम-से-कम तीन कॉलेजों को अनुमति दे दी होती। स्वास्थ्य विभाग में उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों ने अगर अपने पड़ोसी प्रदेश से ही समझ लिया होता...एमपी में पहले कॉलेज बिल्डिंग और अस्पताल तैयार किया जाता है फिर मान्यता के लिए प्रस्ताव भेजा जाता है। मगर छत्तीसगढ़ के कमाल के अफसरों ने कमाल कर डाला।
सीजीएमएससी की नाकामी
एनएमसी ने पांच मेडिकल कॉलेजों को मान्यता नहीं दिया है मगर वास्तविकता यह है कि पिछली सरकार में तीन कॉलेज खुले हैं, वहां भी अगर एनएमसी एक बार इंस्पेक्शन कर लें तो तीनों की मान्यता निरस्त हो जाएंगी। कोरबा, महासमुंद और कांकेर, तीनों मेडिकल कॉलेजों को कोविड काल का लाभ मिला और उन्हें बिना निरीक्षण के मान्यता मिल गई थी। मगर उन तीनों कॉलेजों का बुरा हाल है। न कॉलेज की बिल्डिंग बनी है और न अस्पताल। और-तो-और, रमन सिंह सरकार के दौरान अंबिकापुर में खुले मेडिकल कॉलेज अस्पताल की पूरी बिल्डिंग अभी नहीं बन पाई है। सरकार ने उसके लिए 100 करोड़ स्वीकृत किया मगर तीन साल बाद भी जस-की-तस स्थिति है। और ये भी, पिछले साल एक जुलाई को मेडिकल कॉलेज में सीएम के कार्यक्रम में हॉस्टल को लेकर बतंगड़ हुआ था। सीएम को वास्तविकता की जानकारी मिली तो उन्होंने हॉस्टल के लिए तुरंत 80 करोड़ स्वीकृत कर दिया था मगर उसके बाद भी काम शुरू नहीं हो पाया।
सजा नहीं, इनाम
असल में दिक्कत यह है कि सिस्टम में किसी काम के फेल्योरनेस के लिए कोई जिम्मेदारी तय नहीं है। छत्तीसगढ़ जैसे गरीब प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग और सीजीएमएससी के लोगों ने मेडिकल कॉलेजों को खोलने में लापरवाही बरती तो उसके लिए उन अफसरों को चिन्हित किया जाना चाहिए...दंड का प्रावधान होना चाहिए। मगर ऐसा होता नहीं। बल्कि, उपर से उन्हें बढ़िया पोस्टिंग मिल जाती है। सीजीएमएससी के अधिकारियों को कलेक्टर बनाकर ईनाम दे दिया जाता है। हेल्थ में बडे़-बड़े घोटाले के बाद भी किसी अफसर का बाल तक बांका नहीं हुआ। तो फिर कोई अफसर अपने दायित्वों के प्रति सजग क्यों रहेगा? वो काला-पीला करेगा ही, क्योंकि उन्हें मालूम है, आईएएस भाई लोग बचा ही लेंगे।
सीजीएमससी फेल क्यों?
हेल्थ डायरेक्ट्रेट में सीबीआई के छापे और डायरेक्टर, ज्वाइंट डायरेक्टर समेत कई डॉक्टरों को जेल जाने के बाद रमन सिंह सरकार ने यह सोचकर सीजीएमएससी को बनाया कि डॉक्टर लोग खरीदी-वरीदी जैसे प्रशासनिक कार्यो में पारंगत नहीं होते, इसलिए कॉरपोरेशन के जरिये खरीदी, सप्लाई किया जाएगा। तब आईएफएस अधिकारी प्रताप सिंह को सीजीएमएससी का फर्स्ट एमडी बनाया गया। उनके रहते तक सीजीएमएससी में अच्छा काम हुआ। मगर उसके बाद आए दूसरे आईएफएस अधिकारी ने तबाही मचा दी। उसके बाद से कॉरपोरेशन की चाल-चलन बिगड़ा, वह पटरी पर नहीं लौट पाया। अलबत्ता, समय के साथ सीजीएमससी के खटराल अधिकारियों ने स्वास्थ्य विभाग से बात कर मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों का सिविल कार्य भी शामिल करवा लिया। जबकि, सीजीएमएससी के पास सिविल का अपना कोई सेटअप नहीं। इसके लिए दूसरे विभागों से उधारी पर इंजीनियर लिए गए। और हजार-हजार करोड़ करोड़ का काम शुरू कर डाले। कोरबा, महासमुंद और कांकेर के बाद पांच नए मेडिकल कॉलेज का काम भी सीजीएमएससी ही कर रहा है। अब बात सीजीएमएससी फेल क्यों, तो बताते हैं एक तो सीजएमएससी के पास सेटअप नहीं, और दूसरा जो सबसे महत्वपूर्ण...काम प्रारंभ करने से पहले ठेकेदार को आठ फीसदी कमीशन बंगले में पहुंचाना पड़ता है और पांच-सात परसेंट खुरचन-पानी सीजीएमएससी में इधर-उधर। अब 200 करोड़ में से 20-25 करोड़ पहले ही बांट देता है मगर काम का भुगतान जल्दी होता नहीं। याने एडवांस जेब से गया है, निर्माण में जो खर्च हुआ, वो भी टाईम से पेमेंट नहीं मिलता। कोरबा, कांकेर और महासमंुद का काम लटकने के पीछे ये भी एक बड़ा कारण है।
वर्जित मास में शादी और बवाल
पिछले हफ्ते बेमेतरा सियासी तौर पर बेहद सुर्खियों में रहा। असल में, जो अकल्पनीय था, वह हो गया। उस घटना के नीर-क्षीर, विवेचन से पता चला, खता अफसरों ने की और उसकी कीमत सिस्टम ने चुकाई। दरअसल, सनातन धर्म में मलमास याने पुरूषोतम मास में शादी-ब्याह पूर्णतः वर्जित है। इस प्रतिबंधित महीने में अफसरों ने सामूहिक विवाह का कार्यक्रम रख दिया। उस पर, आश्चर्य यह कि बीजेपी जैसी धर्म-कर्म में विश्वास रखने वाली पार्टी के किसी नेता ने भी इस पर ध्यान नहीं गया। अलबत्ता, बेमेतरा के विधायक भी दूल्हा बन बैलगाड़ी में बैठ गए, तो उत्साहित होकर डिप्टी सीएम अरुण साव उनके गाड़ीवान बन लगे गाड़ी हांकने। अब मलमास में शादी होगी, तो उसका साइड इफेक्ट आना ही था...वीवीआईपी कार्यक्रम में अराजकता की खबर सोशल मीडिया की सनसनी बन गई। खैर, विधायक समेत सभी नव ब्याहितों को सुखी दांपत्य जीवन के लिए शुभकामनाएं। और, महिला बाल विकास मंत्री को सलाह भी...उन्हें काशी के किसी पंडित से कुछ हवन वगैरह करा लेना चाहिए...मंत्रिमंडल सर्जरी की चर्चाओं के बीच उनके विभाग ने वर्जित मास में शुभ काम करा डाला।
एसपी की पोस्टिंग
छत्तीसगढ़ राज्य के अब तक के सबसे तेज-तर्रार गृह मंत्री होने के बाद भी दो-दो जिलों में एसपी की पोस्टिंग नहीं हो पा रही तो यह आश्चर्यजनक है। बता दें, सारंगढ़ और बलौदा बाजार में काफी दिनों से एसपी की कुर्सी खाली पड़ी है। दोनों जिले काफी संवेदनशील हैं। बलौदा बाजार में दो साल पहले कलेक्ट्रेट और एसपी ऑफिस फूंक देने जैसी हिंसक घटनाएं हो चुकी है। बावजूद इसके, दोनों जिले टेम्पोरेरी व्यवस्था में चल रहे। दोनों में एडिशनल एसपी को बिठाया गया है। बलौदा बाजार की एसपी भावना गुप्ता पर्सनल कारणों से लंबे अवकाश पर हैं तो सारंगढ़ के एसपी आंजनेय वार्ष्णेय सेंट्र्रल डेपुटेशन पर निकल गए हैं। पीएचक्यू और गृह विभाग की ड्यूटी है कि जिन जिलों में कप्तान नहीं है, वहां बात करके पोस्टिंग कराए। मगर पता नहीं तालमेल कहां पर गड़बड़ा रहा है। इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। कोई महिला एसपी अगर लंबी छुट्टी पर जाती थीं या कोई कप्तान डेपुटेशन पर गया तो तुरंत ही गृह विभाग से वहां पोस्टिंग कर दी जाती थी।
मंत्रियों का ऐसा परफार्मेंस
सुशासन तिहार में कई दिलचस्प एपिसोड सामने आए। एक सीनियर मंत्री के विधानसभा क्षेत्र के एक गांव में सीएम का चौपाल लगना था। मुख्यमंत्री ने वहां जाने से पहले मंत्री से पूछ दिया, आप तो फलां गांव को जानते ही होगे, अब मंत्री लगे अगल-बगल झांकने। मंत्रीजी रायपुर से रात में ही भागते-भागते अपने विस क्षेत्र पहंुचे, फिर अगली सुबह सीधे गांव में। मंत्री को डर था कि कहीं कलई खुल न जाए...रमन सिंह के दौर से मंत्री रहने के बाद भी माननीय एक बार भी अपने क्षेत्र के गांव में नहीं आए।
अंत में दो सवाल आपसे?
1. केंद्रीय मंत्री तोखन साहू और डिप्टी सीएम अरुण साव में से किसका फ्यूचर ज्यादा ब्राइट है?
2. छत्तीसगढ़ आर्म्स फोर्स की 22 बटालियन में से अधिकांश में कमांडेंट डबल चार्ज में है, तो इसका मतलब ये निकाला जाना चाहिए कि पुलिस सिस्टम के प्रायरिटी में नहीं है?
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