शनिवार, 25 जनवरी 2020

सीएस से खफा अफसरों की पत्नियां

26 जनवरी 2020
ब्यूरोक्रेसी के मुखिया आरपी मंडल ने नया रायपुर शिफ्थ होकर ब्यूरोक्रेसी की मुसीबतें बढ़ा दी है। अब अफसरों पर स्वाभाविक दबाव बन गया है कि वे भी नया रायपुर कूच करें। जाहिर है, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पहली बार नया रायपुर की बसाहट देखने पहुंचे थे तो उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि पिछली सरकार ने जनता की गाढ़ी कमाई का 700 करोड़ लगा दिया है तो जरूरी है कि इसे बसाया जाए। उनके निर्देश पर ही सीएम हाउस समेत अन्य मंत्रियों के आवासों के निर्माण की प्रक्रिया तेज हो गई है। एजेंसियों को टारगेट दिया गया है अक्टूबर तक इसे पूरी कर दे। छह महीने इंटिरियर में लगेगे। याने अगले साल सीएम हाउस भी वहां शिफ्थ हो जाएगा। इस बीच मंडल वहां पहुंच गए हैं। कुछ और अफसर बॉस की देखादेखी नया रायपुर जाने के लिए घरवालियों को तैयार कर रहे हैं। तीन अफसरों का तो पक्का हो गया है। वैसे, ये संख्या चार हो जाती। मगर चौथे आईएएस की पत्नी एकदम अड़ गई…तुम्हें जाना है तो जाओ, मैं नहीं जाने वाली। अब घर वाली से पंगा कौन ले…अफसर ने हथियार डाल दिया। सुनने में आ रहा है, अफसरों की पत्नियां सीएस से बेहद नाराज हो गई हैं….नया रायपुर जाकर सबको फंसवा डाले।

आठ करोड़ की चोट

अफसरों को नया रायपुर जाने और उनके लिए गरम खाना पहुंचाने पर हर साल सरकार का आठ करोड़ रुपए खर्च हो रहा है। दरअसल, नया रायपुर में मंत्रालय जाने के बाद तत्कालीन सरकार ने अफसरों की गाड़ियों का फ्यूल का लिमिट बढ़ाकर 80 से 240 लीटर कर दिया था। याने एक गाड़ी पर महीने का 160 लीटर तेल का इजाफा। उपर से अफसरों के पास एक गाड़ी सिर्फ इसलिए होती है कि दोपहर में घर से गरम खाना मंत्रालय पहुंच जाए। हालांकि, कुछ अफसर ऐसे भी हैं, जो सुबह लांच बॉक्स लेकर मंत्रालय जाते हैं। लेकिन, उनकी संख्या नगण्य है। ज्यादतर इसे सर्विस की गरिमा के खिलाफ समझते हैं। उधर, अफसर के निज सचिव काले-पीले में इनवाल्व होते हैं, इसलिए विभागों से उनके लिए भी एक गाड़ी। मोटे अनुमान के तौर पर सिर्फ फ्यूल में ही सरकार अफसरों की सरकारी गाड़ियों पर आठ करोड़ फूंक रही है। जबकि, नया रायपुर में पीएचक्यू के पीछे 120 बंगले तीन साल से खाली पड़े हुए हैं। सरकार चाहे तो ये बंगले गुलजार हो सकते हैं।

एक बैच के दो दावेदार

सरगुजा आईजी केसी अग्रवाल इस महीने रिटायर हो जाएंगे। सरकार को 31 जनवरी को वहां नया आईजी अपाइंट करना होगा। हालांकि, आईजी लेचल पर विकल्प बेहद सीमित हैं। पांच रेंज हैं और पांच ही आईजी। इसमें भी दीपांशु काबरा सरगुजा के आईजी रह चुके हैं। फिर उनके ग्रह-नक्षत्र ठीक नहीं चल रहे…एक साल से बेविभाग हैं। वर्किंग में बच गए चार आईजी। लिहाजा, बस्तर में डीआईजी सुंदरराज को प्रभारी आईजी बनाकर भेजा गया। सरगुजा में भी कुछ ऐसा ही होने का चल रहा। सरकार किसी डीआईजी को प्रभारी आईजी बनाकर भेजेगी। एक ही बैच के दो डीआईजी सरगुजा के लिए दावेदार हैं। ओपी पाल और रतनलाल डांगी। दोनों 2003 बैच के आईपीएस हैं। देखना दिलचस्प होगा कि इनमें से किसकी किस्मत चमकती है।

कमिश्नर भी नया

दुर्ग कमिश्नर दिलीप वासनीकर 31 जनवरी को रिटायर हो जाएंगे। कमिश्नर का पद चूकि सरकार ने अघोषित तौर पर प्रमोटी आईएएस के लिए रिजर्व कर दिया है, लिहाजा किसी प्रमोटी आईएएस को ही दुर्ग कमिश्नर बनने का मौका मिल सकता है। हालांकि, दुर्ग वीवीआईपी संभाग है, इसलिए ठीक ठाक अफसर को ही वहां भेजा जाएगा।

दूसरा आईआईटीयन

अजीत जोगी ने अपने समय में आईएएस अमित अग्रवाल को चिप्स का पहला सीईओ बनाया था। वे आईआईटी से पढ़े थे। और 19 बरस बाद भूपेश बघेल सरकार ने आईआईटीयन समीर विश्नोई को चिप्स की कमान सांंपी है। समीर कानपुर आईआईटी से बीटेक किए हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. चलाचली की बेला में किस अफसर ने नीचे तक के अफसरों को दस-दस, बीस-बीस हजार का टारगेट दे दिया है?
2. ऐन पंचायत चुनाव के दौरान सरकार ने डायरेक्टर पंचायत को क्यों बदल दिया?

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