रविवार, 7 मार्च 2021

नौकरशाहों से धोखा?

 संजय के दीक्षित

तरकश, 7 मार्च 2021
नवा रायपुर के सेक्टर 15 में जिन नौकरशाहों और बड़े कारोबारियों ने प्लाॅट लिया है, उनके लिए यह खबर परेशां कर सकती है। दरअसल, इसी सेक्टर के सामने रेलवे स्टेशन बनने वाला था। एनआरडीए ने भी प्लाॅट निकालने के लिए रेलवे स्टेशन के नाम पर ब्रांडिंग की थी। इसका नतीजा हुआ कि बड़ी संख्या में सूबे के नौकरशाहों और राजधानी के बड़े लोगों ने यहां पिछले छह महीने में प्लाॅट की बुकिंग कराई। मगर अब रेलवे स्टेशन का काम खटाई में पड़ता दिख रहा है। जिस कंपनी को रेलवे स्टेशन बनाने का काम दिया गया था, उसे साल भर में एनआरडीए ने एक कौड़ी नहीं दिया। इस महीने कंट्रेक्ट खतम होने पर कंपनी बोरिया-बिस्तर समेट कर लौट जाएगी। बता दें, 2014 में प्राॅसेज शुरू हुआ था तो सात साल में मिट्टी भराई का काम प्रारंभ हुआ था। अब नए सिरे से टेंडर होगा तो समझ लीजिए स्टेशन बनते-बनते एक दशक से ज्यादा टाईम लग जाएगा।


17 मार्च तक

विधानसभा का बजट सत्र कभी भी पूरे समय तक नहीं चला। इस बार भी ऐसा ही प्रतीत हो रहा है। देखा ही आपने, दो दिन में पांच मंत्रियों के विभागों पर चर्चा हो गई। अब मुख्यमंत्री समेत आठ मंत्री बचे हैं। अगले हफ्ते 11 मार्च को महाशिवरात्रि है। लिहाजा, चार दिन ही सत्र चलेगा। उसके बाद 15 मार्च सोमवार को सत्र प्रारंभ होगा और अंदेशा है कि 17-18 तक खतम हो जाए। सरकार चाहे तो तीन से चार दिन में आठ मंत्रियों के विभागों पर चर्चा करा सकती है। आधा दिन सरकारी बिल पास करने में लगेगा। और एक दिन चाहिए विनियोग विधेयक पर बहस और चर्चा के लिए। वैसे भी, बंगाल और असम समेत पांच राज्यों में चुनाव है। फिर ये भी है…सरकार विपक्ष को राजनीति करने का नाहक मौका क्यों देना चाहेगी।

प्रभारी मंत्री की पत्नी

एक बड़े जिले के प्रभारी मंत्री की पत्नी से जिले के अधिकारी बड़ा असहज महसूस कर रहे हैं। मंत्रीजी जब जिले के दौरे में होते हैं, उनकी अद्र्धागिनी अनिवार्य रूप से उनके साथ होती हैं। उसके बाद फिर पूछिए मत! अफसरों से तरह-तरह की फरमान। पराकाष्ठा तब होती है, जब सर्किट हाउस में अधिकारियों की मीटिंग में भी वे कुर्सी जमा लेती हैं। अब प्रभारी मंत्री की मैडम हैं, अफसर कुछ कर भी नहीं सकते। वैसे मंत्री पत्नी की विवशता भी समझी जा सकती है। पति महोदय सीधे-साधे हैं। ऐसे में, उन्हें तो नजर रखनी पड़ेगी न।

2013 बैच की धड़कनें

कलेक्टरों की लिस्ट में जैसे-जैस विलंब हो रहा, आईएएस के 2013 बैच की धड़कनें बढ़ती जा रही है। इस बैच में सात आईएएस हैं। इनमें से अब तक सिर्फ दो ही कलेक्टर बन पाए हैं। पांच क्यूं में हैं। इनकी वेटिंग इस साल के अंत तक भी क्लियर हो पाएगी, इसमें संशय है। ये भी जाहिर है कि तीसरे साल के बाद सरकारें कलेक्टर के लिए डायरेक्ट की बजाए प्रमोटी आईएएस को तरजीह देती हैं। इसलिए, नए अफसरों की दिक्कतें बढ़ेंगी। अभी लिस्ट निकलेगी, उसमें कुछ प्रमोटी के नाम तो रहेंगे ही, डायरेक्ट आईएएस में अभी तक जिन अफसरों ने एक या दो जिले की कलेक्टरी की है, उनकी भी कोशिश होगी कि एक जिला और कर लें। ऐसे में, सामान्य प्रशासन विभाग को कुछ ऐसा रास्ता निकालना चाहिए कि वेटिंग कम-से-कम हो जाए।

एक और वैकेंसी

बिजली विनियामक आयोग के चेयरमैन डीएस मिश्रा का कार्यकाल एक अप्रैल को समाप्त हो जाएगा। यानी 24 दिन बाद रिटायर आईएएस के लिए एक वैकेंसी और निर्मित हो जाएगी। मगर दिक्कत यह है कि आयोग के चेयरमैन का पद चीफ सिकरेट्री के समकक्ष है। इस लेवल का कोई अधिकारी छत्तीसगढ़ में फिलहाल है नहीं। आरपी मंडल रिटायर होने के बाद एनआरडीए चेयरमैन बन गए हैं। सीके खेतान 31 जुलाई को रिटायर होने वाले हैं। सरकार उन्हें चीफ सिकरेट्री नहीं बनाई तो हो सके, इस पद के लिए विचार कर लें। आईएएस नारायण सिंह ने नियामक आयोग का प्रमुख बनने के लिए एसीएस पद से रिटायरमेंट से छह महीने पहले वीआरएस ले लिया था। खेतान के संदर्भ में यह तब होगा, जब मुख्यमंत्री से हरी झंडी मिले। बहरहाल, सरकार के पास विकल्प के तौर पर आईएएस में खेतान हैं। उनका नहीं हुआ तो सरकार फिर किसी गैर आईएएस यानी इंजीनियर कैडर के किसी व्यक्ति को इस पर बिठाएगी। चेयरमैन का कार्यकाल पांच साल या फिर 65 साल तक की उम्र तक रहता है। इनमें से जो पहले आएगा, वो लागू होता है। डीएस मिश्रा रिटायरमेंट से करीब ढाई साल बाद चेयरमैन नियुक्त हुए थे। इसलिए, ढाई साल ही इस पद पर रह पाए।

ब्यूरोक्रेसी को झटका

सूचना आयोग में मीडिया से जुड़े मनोज त्रिवेदी और धनवेंद्र जायसवाल को सूचना आयुक्त बनाने से जाहिर तौर पर ब्यूरोक्रेसी को करंट लगा होगा। इस आयोग के गठन के बाद अभी तक सिर्फ दो ही गैर अफसर सूचना आयुक्त बन पाए हैं। अनिल जोशी और मोहन पवार। दोनों लीगल फील्ड से थे। पत्रकार वो भी एक साथ दो-दो….यह पहली दफा हुआ। सूचना आयुक्त बनने के लिए आधा दर्जन से अधिक रिटायर आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारी कतार में थे। लेकिन, सरकार ने पत्रकारों को यह पद देना मुनासिब समझा।

जीजा पीछे….

रिटायर आईएएस आलोक अवस्थी की स्वाभाविक इच्छा रही कि छत्तीसगढ़ में पोस्ट रिटायरमेंट कोई पद मिल जाए। लेकिन, अभी तक उन्हें कोई गुड न्यूज नहीं मिला। लेकिन, मनोज त्रिवेदी सूचना आयुक्त बन गए। मनोज आलोक अवस्थी के रियल साले हैं। कह सकते हैं, जीजा पीछे रह गए और साला आगे निकल गया।

ऐसे डरपोक वीसी क्यों?

बिलासपुर अटल बिहारी विवि के कुलपति 10 साल नौकरी करके चले गए और ओपन यूनिवर्सिटी के वीसी एक टर्म पूरा करके दूसरी पारी खेल रहे हैं। मगर शर्मनाक यह है कि इन दोनों विवि में दो परसेंट पद भी नहीं भर पाए। ये तो एक बानगी है। सूबे के सभी विश्वविद्यालयों का कमोवेश यही हाल है। नियुक्तियों में प्रेशर के डर से कुलपति मैनपावर की भर्ती कर ही नहीं रहे हैं। उनकी रुचि कम रिस्क और अधिक आमदनी वाले चीजों में रहती है। मसलन, खरीदी और बिल्डिंग निर्माण में। जबकि, वहीं स्व0 लक्षमण चतुर्वेदी भी एक वीसी थे। वे रायपुर विवि में भी दर्जनों पदों पर नियुक्तियां की और बिलासपुर सेंट्रल यूनिवर्सिटी में भी। सेंट्रल यूनिवर्सिटी बिलासपुर की वर्तमान वीसी अंजिला गुप्ता ने भी व्यापक स्तर पर नियुक्तियां की है। सवाल उठता है, जब फैकल्टी और मैनपावर नहीं होगा तो विवि के गुणवता का क्या होगा। और जब कुलपतियों को भर्ती करने का साहस नहीं है तो फिर उन्हें अपने पदों पर क्यों रहना चाहिए। सिर्फ अपना घर भरने के लिए…ये ठीक नहीं है।

महिला विधायक

वैसे तो छत्तीसगढ़ विधानसभा में 20 महिला विधायक हैं। इससे पहिले भी बड़ी संख्या में महिला विधायक रहीं हैं। लेकिन, प्रदर्शन के नाम पर किसी महिला विधायक अपना छाप नहीं छोड़ पाई। इस बजट सत्र में रंजना साहू का पारफारमेंस जरूर हैरान कर रहा है। प्रश्नों की तैयारी और लच्छेदार….आक्रमक अंदाज में सदन में जिस तरह वे अपनी बात रख रही हैं, कह सकते हैं कि छत्तीसगढ़ की महिला नेत्रियां भी सशक्त हो रही हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. कांग्रेस के प्रभारी महासचिव पीएल पुनिया छत्तीसगढ़ आना कम क्यों कर दिए हैं?
2. चरणदास महंत जैसे स्पीकर से वास्तव में विपक्ष को दिक्कत हो रही है या इसके पीछे सियासत है?

 

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