शनिवार, 12 मार्च 2022

कलेक्टरों की बढ़ी मुश्किलें

 

संजय के. दीक्षित

तरकश, 13 मार्च २०२२


विधानसभा के बजट सत्र के बाद विधानसभावार दौरे का ऐलान कर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कलेक्टरों के दिल की धड़कनें बढ़ा दी है। मुख्यमंत्री सिर्फ दौरे ही नहीं करेंगे बल्कि रात्रि विश्राम के साथ ही विभिन्न संगठनों के लोगों से वन-टू-वन मिलेंगे भी। अब मुख्यमंत्री आम आदमी से मिलेंगे तो समझा जा सकता है क्या होगा? दरअसल, छत्तीसगढ़ में हो ऐसा रहा है कि कई कलेक्टर जनता के प्रति दायित्वों का समुचित निर्वहन नहीं कर रहे। सरकार जो टास्क दें, उसे टाईम लिमिट में कर दो। और बड़े नेताओं का दौरा हो तो डीएफएफ के पैसे से ऐसा झांकी दिखा दो कि लोग वाह कर उठे। इसके बाद कुर्सी सुरक्षित। ऐसे कलेक्टरों का खामियाजा पिछली सरकार को भी उठाना पड़ा। बहरहाल, इस बार मुख्यमंत्री ग्रामीण इलाकों में पहुंच कर देखना चाहते हैं कि कलेक्टर किस तरह काम कर रहे हैं। ऐसे में, कलेक्टरों को परेशानी तो होगी।

विधायकों का रिपोर्ट कार्ड

मुख्यमंत्री अपने दौरे में विकास कार्यो की समीक्षा नहीं करेंगे बल्कि सुनने में आ रहा, वे आम लोगों से विधायकों के परफारमेंस की रिपोर्ट भी लेंगे। नाइट हॉल्ट में देर रात तक विभिन्न संगठनों के नुमाइंदों के साथ ही पार्टी के छोटे-छोटे से पदाधिकारियों से वन-टू-वन चर्चा भी उनके कार्यक्रमों में शामिल किया जा रहा है। मुख्यमंत्री यह भी तस्दीक करेंगे कि किस विधायक की उनके इलाके में क्या स्थिति है...अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हें रिपीट किया जाए या नहीं। सीएम के दौरे से विधायकों में भी खलबली है। 

अब अप्रैल-मई तक

कलेक्टरों की बहुप्रतीक्षित ट्रांसफर अब बजट सत्र की बजाए मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र के दौरे के बाद होगा। मुख्यमंत्री का दौरा बजट सत्र के तुरंत बाद शुरू हो जाएगा। सीएम सबसे पहिले बस्तर, सरगुजा और बिलासपुर संभाग के विधानसभा जाएंगे। इसके बाद फिर रायपुर और दुर्ग में। मुख्यमंत्री के दौरे के बाद परफारमेंस के बेस पर कलेक्टरों का लिस्ट निकाली जाएगी। सो, अप्रैल लास्ट या मई फर्स्ट वीक से पहले लिस्ट निकलनी मुश्किल प्रतीत हो रही। चलिए, चला-चली की बेला वाले कलेक्टरों को मार्च का लाभ मिल जाएगा। अब फायनेंसियल ईयर एंडिंग से पहले वे बेफिकर होकर डीएमएफ का चेक काट सकेंगे।

मार्च का खेला

सामान्य जनों में मार्च का महीना होली या फिर बच्चों की परीक्षा के संदर्भ में जाना जाता है, मगर बड़े अधिकारियों के लिए मार्च का महीना वन टू का फोर करने के लिए। ये सालों से चला आ रहा है....विभागों का बजट 31 मार्च तक खतम करने के लिए सप्लायरों को बुला-बुलाकर आर्डर दिया जाता है...आर्डर के कुछ घंटे के भीतर चेक भी। आप देखिएगा, अधिकांश विभागों की 50 फीसदी से अधिक खरीदी मार्च में होती है। क्योंकि, उसके पास राशि लेप्स हो जाती है। कागजों में खरीदी के इस खेला में अफसर भी लाल होते हैं और सप्लायर भी।

रिटायर आईएएस पोस्टिंग

पिछले तरकश में पूर्व आईएएस के पुनर्वास पर खबर थी। ये सही निकली। सरकार के सिंगल नाम के पेनल पर राजभवन ने मुहर लगा दिया। ब्रजेश चंद मिश्र छत्तीसगढ़ निजी विष्वविद्यालय निमायक आयोग के मेम्बर अपाइंट हो गए। ब्रजेश राप्रसे से आईएएस बनें और जांजगीर और दुर्ग के कलेक्टर रहे। रायपुर और दुर्ग के संभागायुक्त भी। पानीदार आईएएस अफसरों के लिए ये जानकार तकलीफ हो सकती है कि प्रमोटी ही सही, अभी तक कोई रिटायर आईएएस निजी विवि नियामक आयोग का मेम्बर बनने की बात दूर, चेयरमैन नहीं बना। इसके गठन के बाद अभी तक प्राध्यापक ही चेयरमैन रहते आए हैं। अब रिटायर आईएएस विनियामक आयोग के मेम्बर होंगे।

अफसर लौटे

पांच राज्यों में चुनाव कराकर छत्तीसगढ़ के डेढ़ दर्जन अधिकारी आज रायपुर लौट आए। सोमवार से वे ड्यूटी ज्वाइन कर लेंगे। चुनाव कराने बाहर गए अफसरों से सरकार में बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों को उन राज्यों के बारे में अपडेट लेना चाहिए। हो सकता है, कोई अच्छी योजना वे देखकर आएं हों, उसका लाभ छत्तीसगढ़ को मिले। क्योंकि, वे डेढ़, दो महीने चप्पे चप्पे का दौरा करके लौटे हैं। वैसे, सियासी नेताओं के लिए भी इन अफसरों का अनुभव उपयोगी होगा...चार राज्यों में सरकार का रिपीट होना, पंजाब में जाना, अफसरों से बेहतर फीडबैक मिल सकता है।

आसंदी की अवमानना?

बात छोटी है...मगर बात आसंदी के सम्मान से जुड़ी हुई हो, तो वह खबर बनती है। दरअसल, विधानसभा में बजट सत्र के दौरान मीडिया के लिए दोपहर के भोजन का बंदोबस्त रहता है। मीडिया के साथ सरकार की छबि निर्मित करने वाले विभाग के चार-पांच अधिकारी-कर्मचारी भी जिस दिन सदन चलता है, भोजन कर लिया करते हैं...ये अभी से नहीं, सालों से चला आ रहा है। मगर पिछले हफते अचानक विधानसभा के स्टाफ द्वारा उन्हें खाने से रोक दिया गया। अधिकारियों को इससे आहत होना स्वाभाविक था। खबर विभाग प्रमुख से होते हुए स्पीकर चरणदास महंत तक पहुंची। स्पीकर खासे नाराज हुए...बोले मैं खुद मध्यप्रदेश में जनसंपर्क मंत्री रहा हूं और मेरे होते विस में ये बर्ताव...बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने एक सीनियर अफसर को तलब कर कहा कि आप देखिए इसे...आइंदा से ऐसा नहीं होना चाहिए। इसके बाद गुरूवार को सब ठीक-ठाक रहा। मगर अगले दिन भोजनालय के गेट पर विधानसभा के दो लोग फिर खड़े हो गए...बिल्कुल घुसने नहीं देंगे। ये आसंदी की अवमानना हुई न!

प्रमुख सचिव को एक्सटेंशन

विधानसभा के सचिव चंद्रशेखर गंगराले का 21 महीने का एक्सटेंशन 31 मार्च को समाप्त हो जाएगा। गंगराले 2020 में रिटायर हो गए थे। मगर विस में अघोषित नियम बन चुका है...सिकरेटी को रिटायरमेंट के बाद दो साल का एक्सटेंशन दिया जाएगा। गंगराले को भी इसका लाभ मिला। उन्हें छह-छह महीने का तीन बार सेवावृद्धि दी गई। मगर चौथी बार स्पीकर ने तीन महीने कर दिया। 31 को तीन महीने कंप्लीट हो जाएगा। गंगराले के बाद दिनेश शर्मा का नम्बर है। दिनेश चरणदास महंत के साथ मध्यप्रदेश के समय से जुड़े हुए हैं। केंद्र में महंतजी मंत्री बनें, तब भी वे उनके साथ रहे। मगर ठहरे छत्तीसगढ़िया। तभी स्पीकर के इतना क्लोज होने के बाद भी अपना वाजिब हक नहीं ले पाए। सो, दिनेश की चर्चा जरूर है, मगर जब तक आदेश नहीं निकल जाता, तब तक एक अप्रैल को उनके सिकरेट्री बनने पर एतबार नहीं किया जा सकता।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या विधानसभा सत्र के बाद लाल बत्ती की एकाध लिस्ट और निकलेगी?

2. इस खबर में कितनी सच्चाई है कि विधानसभा सत्र के बाद ट्रांसफर पर लगी रोक हटाई जाएगी?

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