रविवार, 10 मई 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: महतारी कलेक्टर



तरकश, 10 मई 2026

संजय के. दीक्षित

महतारी कलेक्टर

प्रशासनिक सर्जरी में सरकार ने ब्यूरोक्रेसी की महतारियों का सम्मान बढ़ाया है। बुधवार को सात जिलों में नए कलेक्टर पोस्ट किया गया, उनमें पांच महिलाएं हैं। इन पांच को मिलाकर छत्तीसगढ़ में अब 10 महतारी कलेक्टर हो गई है। राज्य बनने के बाद यह पहला मौका है, जब कलेक्टरी में महिलाओं की संख्या 10 टच कर गया है। इससे पहले रमन सिंह की तीसरी पारी में एक समय महिला कलेक्टरों की संख्या छह हुई थीं। हालांकि, राज्य निर्माण के 13-14 साल तक महिला आईएएस की संख्या काफी कम थीं, इसलिए इक्का-दुक्का महिला कलेक्टर होती थीं। इस समय ब्यूरोक्रेसी की जो माताएं कलेक्टर हैं, उनमें प्रतिष्ठा ममगई बेमेतरा, नुपूर राशि पन्ना कोंडागांव, नम्रता जैन नारायणपुर, रेना जमीन सूरजपुर, चंदन त्रिपाठी बलरामपुर, दिव्या मिश्रा बालोद, तुलिका प्रजापति मानपुर मोहला, रोक्तिमा यादव कोरिया, संतन देवी जांगड़े एमसीबी और पदमिनी भोई सारंगढ़ शामिल हैं।

लोकल अफसरों को वेटेज

वैसे तो ऑल इंडिया सर्विस का लेवल चिपकने के बाद जाति, धर्म और क्षेत्र गौण हो जाता है। फिर भी यह पहली बार हुआ...राज्य सरकार ने बीते बुधवार को सात जिलों में नया कलेक्टर पोस्ट किया, उनमें से चार लोकल अधिकारियों को अवसर दिया। चारों अफसरों की जड़े छत्तीसगढ़ में है और वे राज्य प्रशासनिक सेवा से प्रमोट होकर आईएएस बने हैं। इसके साथ लोकल याने प्रमोटी आईएएस कलेक्टर की संख्या बढ़कर 12 हो गई है। आरआर वालों को जरूर इससे झटका लगा होगा। मगर स्टेट वाले आईएएस खुश हैं...पिछली सरकार में भी प्रमोटी आईएएस को इतनी संख्या में कलेक्टर नहीं बनाया गया।

एक और लिस्ट

42 आईएएस अधिकारियों की ट्रांसफर लिस्ट देखने से प्रतीत होता है कि उसे बनाने में काफी दिमाग दौड़ाया गया होगा। फेरबदल में प्रशासनिक एंगल के साथ अगले विधानसभा चुनाव को देखते पॉलिटिकिल तड़का भी लगा। खैर, कलेक्टरों की एक छोटी लिस्ट और आएगी। कांकेर कलेक्टर नीलेश श्रीरसागर डेपुटेशन पर दिल्ली जा रहे हैं। राज्य सरकार ने उन्हें एनओसी दे दिया है। सो, इस महीने के अंत या अगले महीने के फर्स्ट वीक तक उन्हें केंद्र में पोस्टिंग मिल जाएगी। लिहाजा, उनकी जगह कांकेर में किसी आईएएस को पोस्ट किया जाएगा। जाहिर है, कांकेर बड़ा जिला है, इसलिए कम-से-कम दो-एक जिले की कलेक्टरी किए हुए आईएएस को ही प्राथमिकता मिलेगी। याने एक छोटी लिस्ट और निकलेगी।

राप्रसे ट्रांसफर पर ब्रेक?

राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों की ट्रांसफर लिस्ट काफी दिनों से प्रतीक्षित है। बताते हैं, मई में एक लिस्ट निकलनी थी। मगर उससे पहले बिचौलियों ने वसूली शुरू कर दी। राप्रसे अधिकारियों को यह कहकर भ्रमित किया गया कि लिस्ट तैयार हो रही है, किसी भी दिन निकल जाएगी। इसकी सूचना सरकार को मिल गई। लिहाजा, सरकार ने फिलहाल इस पर ब्रेक लगा दिया है। वैसे जानकारों का कहना है कि राप्रसे की कोई लिस्ट बनी नहीं है। तोरी करने के लिए भ्रम फैलाया गया। बहरहाल, अब जो ट्रांसफर होंगे, काफी ठोक बजाकर किए जाएंगे। मगर कब होंगे? सरकार ही बता पाएगी।

बेबस मिनिस्टर

सिस्टम में कुछ ऐसे खटराल लोग बैठ गए हैं, जिनसे मई मंत्री भी विवश महसूस कर रहे हैं। बात परिवहन विभाग की है। इसमें हर छह महीने में इंस्पेक्टरों का रोटेशन किया जाता है। एक बार मार्च मेें और दूसरा सितंबर में। ये सालों से चला आ रहा है। इस बार परिवहन मंत्री केदार कश्यप ने करीब 100 इंस्पेक्टरों के रोटेशन को अनुमोदित करके नोटशीट नीचे भेजा। परिवहन सचिव ने भी हर बार की तरह उसे अनुमोदित कर दिया। मगर किन्हीं अज्ञात शक्तियों ने आदेश निकलने से रोक दिया। मई शुरू हो गया है, अभी कोई बताने वाला नहीं है कि रोटेशन आदेश क्यों रोका गया, किसने रोका? और उस रोटेशन का क्या होगा? जो राज्य बनने के समय से एक प्रचलित नियम बन गया था। केदार कश्यप के फॉरेस्ट में भी यही हाल है। प्रोबेशनर एसडीओ ट्रेनिंग के बाद महीने भर से पोस्टिंग की आस में बैठे हैं, मगर उनके आदेश का कोई अता-पता नहीं है।

दो महिला मंत्री?

अगले महीने के लास्ट तक विष्णुदेव साय मंत्रिमंडल का विस्तार होना लगभग तय समझा जा रहा है। इसमें कई मंत्रियों के विभाग बदलेंगे। चार मंत्रियों की विदाई होगी...सरगुजा संभाग के दो मंत्रियों के पत्ते कटने की भी खबरें हैं। अलबत्ता, बीजेपी की महिला विधायकों की लाटरी लगने वाली है। मंत्रिमंडल में 15 परसेंट की लिमिट तय होने के बाद से सूबे में चाहे किसी की भी सरकार रही हो, हमेशा एक महिला मंत्री रहीं। मगर अब इसकी संख्या बढ़ाकर कम-से-कम दो किया जाएगा। यदि अच्छा फेस मिले तो तीन भी संभव है। पूर्व मंत्रियों को कैबिनेट में शामिल न करने का कंडिशन अगर हटाया जाएगा तो बस्तर से लता उसेंडी भी एक तगड़ा दावेदार हो सकती हैं। उनसे आदिवासी और महिला, दोनों कोटा कंप्लीट होगा। डिप्टी सीएम विजय शर्मा अगर संगठन में गए तो फिर भावना बोथरा के नाम पर विचार हो सकता है। या हो सकता है बीजेपी किसी और को सामने लाकर चौंका दें।

कांग्रेस में उठापटक

भूपेश बघेल खेमे ने चिर परिचित प्रतिद्वंद्वी सिंहदेव गुट को मात देते हुए विधायक संगीता सिनहा को प्रदेश महिला कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त करा लिया। देर-सबेर संगीता अध्यक्ष भी घोषित हो जाए, तो आश्चर्य नहीं। उधर, खबर है कि कांग्रेस में 15 मई के बाद कुछ बड़ा होने वाला है। नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की भी नियुक्ति हो सकती है। चूकि अगले विधानसभा चुनाव में अब दो साल बच गया है। सो, इस समय जो कांग्रेस का अध्यक्ष बनेगा, उसी की अगुआई में चुनाव लड़ा जाएगा। उधर, खबर है कि लगातार हार के बाद कांग्रेस अब जमीनी नेताओं को पार्टी में ज्यादा वेटेज देना चाहती है। भूपेश को हो सकता है, केंद्र में कोई बड़ी जिम्मेदारी मिल जाए। केंद्र में वे अगर ताकतवर होंगे तो जाहिर है छत्तीसगढ़ में भी कोई उनका अपना आदमी ही मजबूत होगा।

अफसरशाही में जातिवाद

जाति का वायरस अब तक सियासत में ही घुसा था, मगर अब छत्तीसगढ़ की अफसरशाही भी अछूती नहीं रही। जिलों में कलेक्टर, एससपी भी एसडीएम, एसडीओपी और थानेदारों की पोस्टिंग में इस सिंड्रोम के शिकार दिख रहे हैं। स्थिति यह हो चली है कि सूबे में कर्मचारियों, अधिकारियों की योग्यता की पैमाना अब कास्ट हो गया है। कोई खास वर्ग का मुलाजिम है तो गंभीर श्रेणी की गल्ती करने पर भी कार्रवाई नहीं होगी। राज्य की प्रगति की दृष्टि से यह सही नहीं है। सरकारी दफ्तर जात-पात और धर्म से मुक्त होना चाहिए। छत्तीसगढ़ के सिस्टम में करप्शन और मनमौजीपन बढ़ने के पीछे इस वायरस की बड़ी भूमिका है।

कौवा कान ले गया

छत्तीसगढ़ के कर्मचारी किसी प्रायवेट समिति, संगठन के सदस्य नहीं हो सकते। छत्तीसगढ़ सरकार के इस आदेश पर पिछले दिनों इतना कोहराम मचा कि जीएडी को अपना आदेश वापिस लेना पड़ा। जबकि, जिस संघ के कंधे पर बंदूक रख सरकार को निशाने पर लेने की कोशिशें हुई, उसमें फैक्ट यह है कि विष्णुदेव साय सरकार के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद जीएडी ने एक आदेश निकालकर सरकारी कर्मचारियों को संघ के कार्यक्रमों में जाने के लिए फ्री कर दिया था। सरकारी सिस्टम को समझने वालों को पता है कि जब तक कोई आदेश लिखित में निरस्त नहीं होता, तब तक वह स्टैंड रहता है। संघ में जाने वाला 2014 का आदेश निरस्त नहीं हुआ, इसलिए वह लागू है। मगर कौवा कान ले गया...सिस्टम पर हमले करने में संघ के मौसमी कार्यकर्ता पिल पड़े। सोशल मीडिया में इस पर लंबे-लंबे पोस्ट लिखे गए। जाहिर है, संघ के ओरिजिनल लोग कभी दिखावा नहीं करते कि वे संघ वाले हैं। एमपी के दिनों में दिग्विजय सिंह सरकार ने भी सिर्फ आदेश निकाला था...कभी सख्ती नहीं बरती। उस दौरान भी कर्मचारी, अधिकारी संघ के कार्यक्रमों में जाते रहे। बहरहाल, अंदरखाने की बात यह है कि सरकारी मुलाजिमों मेें अनुशासन का वातावरण बनाने उपर के अफसरों ने एक सामान्य आदेश निकालने कहा, उसे तिल का ताड़ बना दिया गया। इससे नुकसान सिस्टम का हुआ। आदेश वापस लेने की कड़ी में एक संख्या का इजाफा हो गया। अब आप पूछेंगे, मौसमी कार्यकर्ता? ये वो नस्ल है जो अपनी सुविधा से वामपंथी, कांग्रेसी और संघी बन जाता है। अभी कई कार्यक्रमों में ये मौसमी कार्यकर्ता बिना बुलाए भी पहुंच जा रहे।

ट्रांसफर पर पेंच?

एक विभाग में ट्रांसफर के लिए एक हजार से अधिक की लिस्ट सरकार को अनुमोदन के लिए भेजा गया। असल में, ढाई सौ से अधिक नामों की सिफारिश संगठन के एक बड़े नेता ने की है। इसके अलावा बड़ी संख्या में विधायक, सांसद और दीगर नेताओं के लोग भी हैं। मंत्री ने अपना पल्ला झाड़ते हुए लिस्ट को उपर भेज दिया। ट्रांसफर पर बैन के दौरान इतनी बड़ी लिस्ट देख सरकार में बैठे लोगों का सिर चकरा गया। फिलहाल, उपर से इस पर ब्रेक लग गया है।

मंत्री के चेले का होटल

सरगुजा से ताल्लुकात रखने वाले एक नेताजी पिछली कांग्रेस सरकार में स्कूल शिक्षा मंत्री थे। उनके साथ चेला के तौर पर रहने वाला एक युवक ने इतना कुछ अर्जित कर लिया कि मंदिर रायपुर में बड़ा होटल बनवा रहा है। जब वह पीए, स्टाफ जैसे किसी पद पर नहीं था, तो ये हाल है। नए स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव को अलर्ट रहना चाहिए। स्कूल शिक्षा भले ही चमक-धमक वाला विभाग नहीं माना जाता, मगर मैनपावर सर्वाधिक है। इस विभाग के जेडी, डीईओ तो बड़ा पद है...उनके ऑफिस के बाबू मोटे आसामी बन गए हैं। आखिर कौन ऐसा खेला होगा, जो स्कूल शिक्षा में नहीं होता। डीईओ द्वारा शिक्षकों के निलंबन और बहाली के मिला जुला खेल से खुद स्कूल शिक्षा मंत्री भी चिंतित हैं। जाहिर है, जब तक डीईओ, बीईओ ठीक नहीं होंगे, तब तक स्कूल शिक्षा को बदनामी से नहीं बचाया जा सकेगा।

हॉफ की डीपीसी

गुरूवार को मंत्रालय में हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स की डीसीपी आयोजित थी। मगर पता चला ऐन वक्त पर बैठक टल गई। बताते हैं, डीपीसी में एसीएस फॉरेस्ट ऋचा शर्मा मेंबर थीं। मगर एक दिन पहले ही उनका विभाग बदल गया। उसके बाद उन्होंने डीपीसी में शामिल होने से मना कर दिया। कमेटी में अगर बिना नाम पदेन मेंबर लिखा गया होता तो नए एसीएस फॉरेस्ट मनोज पिंगुआ डीपीसी में बैठ सकते थे। इसलिए मामला गड़बड़ा गया। हालांकि, सीएस, पीसीसीएफ थे, तो डीपीसी की जा सकती थी। बहरहाल, डीपीसी टलने के बाद अब भांति-भांति की अटकलों का दौर शुरू हो गया है...किसी ताकतवर शक्ति की बातें भी।

हफ्ते का कोट

दूघ, दही, छाछ, मक्खन, घी सब एक वंश के, फिर भी सबकी कीमत अलग-अलग...क्योंकि श्रेष्ठता जन्म से नहीं, अपने कर्म, कला और गुणों से प्राप्त होती है और कुछ समस्याएं हमारे पास है, सोचकर सदा दुखी होने से अच्छा है, यह सोचकर खुश होना कि दुनिया में बहुत समस्याएं हैं, जो हमारे पास नहीं है।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. प्रशासनिक मुखिया ने कलेक्टरों के व्हाट्सएप ग्रुप में किस कलेक्टर के बारे में लिखा...बिना इजाजत इधर-उधर घूमते रहते हैं?

2. क्या ये सही है कि ट्रांसफर के लिए अब सिर्फ रोकड़ा काफी नहीं, एप्रोच भी चाहिए...दोनों होंगे तभी कामयाबी मिलेगी?

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