तरकश, 3 मई 2026
संजय के. दीक्षित
कलेक्टरों का सीआर, और रिजल्ट
सरकार ने स्कूलों का स्तर सुधारने के लिए 10वीं, 12वीं के रिजल्ट को कलेक्टरों के सीआर में जोड़ा था। याने जिस जिले का रिजल्ट अच्छा आएगा, उसका क्रेडिट कलेक्टरों को मिलेगा। सरकार की मंशा अच्छी थी...कलेक्टर स्कूलों की निगरानी करें, जिससे स्कूलों में पढ़ाई की गुणवता सुधरे। मगर कुछ कलेक्टरों ने कमाल कर दिया। रायपुर के पड़ोसी जिले के एक ही स्कूल के नौ बच्चे मेरिट में आ गए। तो बस्तर और सरगुजा के छोटे जिलों ने रिजल्ट में खंभा गाड़ दिया। यहां यह स्पष्ट कर दें कि मेधावी बच्चों की प्रतिभा पर सवाल खड़ा करने हमारा कोई इरादा नहीं। निश्चित तौर पर बड़ी संख्या में ऐसे विद्यार्थी होंगे, जिन्होंने अपने परिश्रम से सफलता अर्जित की होगी। मगर यह भी सही है...कई कलेक्टरों ने अपनी पीठ थपथपवाने के लिए कुछ तो जरूर किया। तभी रिजल्ट निकालने के मौके पर माध्यमिक शिक्षा मंडल की एक शीर्ष अफसर ने सरकार के संज्ञान में यह विषय लाया कि परीक्षा के समय कलेक्टरों का काफी प्रेशर रहा...कई जिलों में खुलकर नकल कराए गए। बहरहाल, जिले के मुखिया का ही जब नकल को संरक्षण है तो माशिमं के उड़नदस्ता की क्या बिसात? उड़नदस्ता का गठन तो आखिर कलेक्टर के बिहाफ में ही किया जाता है। छत्तीसगढ़ के ह्यूमन रिसोर्स की दृष्टि से ये अच्छी बात नहीं है। स्कूल शिक्षा विभाग भले ही अपना पीठ थपथपा लें मगर बाद में होता यही है कि आगे जाकर बच्चे सरवाइव नहीं कर पाते। फिर नाम खराब राज्य का होता है।
खटराल कलेक्टर और पोरा बाई
10वीं, 12वीं के रिजल्ट में खेला करना नई बात नहीं है। दशक भर पहले की बात होगी। जशपुर के एक कलेक्टर ने रिजल्ट में जिले को अव्वल लाने काफी एक्सरसाइज किया। मगर जब देखे कि परीक्षा का रिजल्ट सुधारना गुरूजी के वश की बात नहीं तो उन्होंने स्कूल शिक्षा के अधिकारियों से फ्री हैंड दे दिया...मुझे नहीं मालूम, किसी भी तरह जिले के बच्चे को मेरिट में आना चाहिए। और वैसा ही हुआ। कलेक्टर के आदेश का पालन हुआ, उस साल जशपुर के तीन बच्चे मेरिट में आ गए थे। अब आपका स्वाभाविक प्रश्न होगा कि नकल मारकर भला मेरिट में या फर्स्ट कैसे आया जा सकता है। तो इसी प्रदेश में आखिर पोरा बाई कांड भी हुआ है। पोरा बाई ने जांजगीर के स्कूल से हायर सेकेंड्री एग्जाम के लिए फार्म भरा था। मगर परीक्षा में कोई और बैठा। पोरा बाई को 12वीं मेरिट में टॉप घोषित किया गया। लेकिन, माध्यमिक शिक्षा मंडल के चेयरमैन आईएएस बीकेएस रे को संदेह हुआ और उन्होंने जांच करा दी। मामला पुलिस में पहुंचा और वह जेल गई। सो, तर्क-कुतर्क की बात नहीं। स्कूल शिक्षा में पहले भी फर्जीवाड़ा के उदाहरण रहे हैं। हालांकि, विष्णुदेव सरकार ने स्कूल शिक्षा में कई रिफार्म किया है। कलेक्टर्स और स्कूल शिक्षा विभाग को इस रिफार्म का फायदा उठाते हुए राज्य के मानव संसाधन को मजबूत करने के लिए भागीरथ प्रयास करना चाहिए। क्योंकि, देश के स्कूल शिक्षा में छत्तीसगढ़ की गिनती नीचे से शुरू होती है।
19 से पहले नए डीजीपी
5 अप्रैल को पूर्णकालिक डीजीपी की नियुक्ति होते-होते रुक गई थी। मगर सुप्रीम कोर्ट में 19 मई को सुनवाई की डेट लग जाने के बाद अब नहीं लगता कि अब मामला ज्यादा दिन तक खींच पाएगा। सुनने में आ रहा, 19 मई से पहले छत्तीसगढ़ में पूर्णकालिक डीजीपी की नियुक्ति हो जाएगी। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को लेटर जारी कर दिया है। सुनवाई डेट से पहले अगर कोई फैसला नहीं हुआ तो फिर हो सकता है सुप्रीम कोर्ट कोई बड़ा आर्डर पास कर दें या फिर चीफ सिकरेट्री को ही तलब कर लें। सीएस को बुलाने से जाहिर है, मामला काफी बड़ा हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केंद्रीय गृह सचिव को कोर्ट बुला लिया था। दरअसल, छत्तीसगढ़ में सिस्टम की भी अपनी मजबूरियां हैं। कुछ सालों से सीएस, डीजीपी का मसला केंद्र से तय होने लगा है। याद ही होगा, 4 सितंबर 2024 को अशोक जुनेजा का कार्यकाल खतम होने जा रहा था। स्टेट गवनर्मेंट ने नए डीजीपी के लिए नोटशीट बनाने का आदेश दे दिया था। मगर रिटायरमेंट से 24 घंटे पहले केंद्र से अशोक जुनेजा को छह महीने एक्सटेंशन देने का आदेश आ गया। सीएस के समय भी ऐसा ही हुआ। सरकार मनोज पिंगुआ का आदेश जारी करने जा रही थी कि अमिताभ जैन के एक्सटेंशन के लिए दिल्ली से संदेशा आ गया। दिल्ली ने इसके बाद विकास शील को मनीला से बुलाकर सीएस बनाने रायपुर भेज दिया। हालांकि, पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद केंद्र अब फ्री है, इसलिए लगता है 19 मई से पहले पूर्णकालिक डीजीपी का मामला क्लियर हो जाएगा।
मंत्रियों में तनातनी-1
एक नए मंत्री के साढ़ू भाई लंबे समय से एक विभाग विशेष में सप्लाई का काम करते हैं। मंत्री बनने के बाद उन्हें लगा कि अब बराबरी का मामला है...आखिर डायन भी एक घर छोड़कर चलती है। फिर भी एहतियात बरतते हुए नए मंत्री ने माननीय से बात भी कर ली। बता दिया...साढ़ू भाई का मसला है। मगर मंत्री के मुलाजिमों ने स्पष्ट कह दिया...25 फीसदी एडवांस देना हीे होगा। ऐसे में, दोनों मंत्रियों में खटास बढ़नी ही थी। हालांकि, नए मंत्री को जल्दी ही हिसाब चुकता करने का मौका मिल गया। लक्ष्मीजी से अति मोह रखने वाले मंत्री के गृह जिले में डिस्ट्रिक्ट लेवल के एक अफसर की पोस्टिंग में उन्होंने अपने आदमी का नाम बताया। मगर नए मंत्री ने उसके उल्टा अफसर को वहां बिठा दिया।
मंत्रियों में तनातनी-2
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को साड़ी बांटने के मामले में मीडिया ने एक मंत्री से सवाल कर दिया। मंत्रीजी चूकि बार-बार एक ही सवाल से उकता गए थे, इसलिए उनकी जुबां फिसल गई। मुंह से निकल गया, स्कूल शिक्षा में कितना भ्रष्टाचार है...वो आपलोगों को नहीं दिखता। मंत्री का यह लूज टॉक लीक होकर एक दूसरे मंत्री के पास पहुंच गया। जाहिर है, इस पर बवाल मचना ही था। मंत्रीजी तमतमा गए। उन्होंने तुरंत फोन लगवा जमकर सुना दिया...आप दूसरे विभाग में भ्रष्टाचार की बात कैसे कर सकते हो। मंत्रीजी ने हालांकि, सफाई देेने का काफी प्रयास किया। मगर वो कोई काम नहीं आया।
सीएस प्रोटोकॉल में
सरगुजा संभाग की एक महिला विधायक का कलेक्टरों को हड़काते एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ था। विधायक इसलिए नाराज थीं कि उनके कार्यक्रम में एसडीएम नहीं पहुंचे। वीडियो में स्पष्ट देखा गया कि पीछे खड़े उनके चंगु-मंगू जो बोल रहे, विधायक महोदया कलेक्टर को हड़काते समय उसी को दोहरा रही थीं। अलबत्ता, प्रोटोकॉल में ये कहीं नहीं है कि विधायक के हर कार्यक्रम मेें एसडीएम जाए। मगर विधायक जी को भड़ास निकालना था, उन्होंने निकाल लिया। असल में, अफसरशाही को कमतर करने का काम पिछली सरकार में हुआ...जब जीएडी ने आर्डर निकाल प्रोटोकॉल में चीफ सिकरेट्री को विधायक के नीचे कर दिया। और, राज्य का प्रशासनिक मुखिया ही जब प्रोटोकॉल में नीचे हो गए तो फिर कलेक्टर, एसडीएम को विधायक क्या समझेंगे। जाहिर है, प्रोटोकॉल की दृष्टि से यह एक गलत फैसला था। मुख्य सचिव कार्यपालिका के प्रमुख होते हैं। साथ में कैबिनेट के पदेन सिकेट्री भी। कैबिनेट की बैठकों में वे मुख्यमंत्री के बगल में बैठते हैं, मंत्रियों की सीट उनके बाद होती है। इसी तरह केंद्र में कैबिनेट सचिव को भी राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों के बराबर रखा गया है। सांसद का प्रोटोकॉल उनसे काफी नीचे होता है। मगर छत्तीसगढ़ में सब उल्टा-पुलटा चल रहा है।
अफसरों को प्रोटेक्शन
अफसरशाही लाख भ्रष्टाचार से ग्रसित हो, मगर काम तो उनसे ही कराना है। इसलिए, गड़बड़ियों पर कड़ी कार्रवाई हो मगर जो अच्छे काम करने वाले अधिकारी हैं, उन्हें सरकार से प्रोटेक्शन भी मिलना चाहिए। बीते कुछ महीनों में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिसमें अराजकता फैलाने की कोशिशें हुईं। जिला कार्यालयों में घुसकर हंगामा और नारेबाजी के मामले भी कई जिलों में हुए हैं। रसूखदार लोगों को छोड़ दें तो आम आदमी का क्या? वह प्रशासन और पुलिस के पास ही उम्मीद लेकर जाता है। मगर छोटे स्वार्थों के लिए इन्हीं संस्थाओं को डैमेज करने का प्रयास किया जाएगा तो जरा सोचिए आम आदमी़ का क्या होगा, वह किस चौखट पर उम्मीद लेकर जाएगा?
राजा, मंत्री, चोर, सिपाही
बच्चों में बड़ा लोकप्रिय खेल है राजा, मंत्री,, चोर सिपाही। इसमें राजा मंत्री को आदेश देता है कि चोर को पकड़े। मंत्री अगर सही चोर को नहीं पकड़ पाता तो मंत्री को सजा मिलती है। बहरहाल, छत्तीसगढ़ में उल्टा हो रहा है। एक मिनिस्टर साब चोर याने आरोपी को ही बचाने मौके पर पहुंच गए। बात अंबिकापुर की है। वहां के पैसे वाले बड़े होटल कारोबारी का विस्फोटक पदार्थ का उल्टा-सीधा काम है। दो रोज पहले उसमें अचानक आग लग गई। आग भी ऐसी भीषण की, जिला प्रशासन को एसईसीएल, आदानी के दो दर्जन से अधिक दमकल झोंकना पड़ा। सही समय पर अगर आग पर काबू नहीं किया गया होता, तो आसपास के इलाके उसकी चपेट मेें आ गए होते। दुकान के पाटे पर सहज-सरल भाव से बैठ आग की लपटों को निहारते हुए मंत्रीजी ने घटना को छोटा बताते हुए मीडिया को बाइट दिया। अब जब मंत्रीजी मौके पर पहुंच घटना को छोटा बता रहे तो फिर अंबिकापुर पुलिस में इतनी हिम्मत कहां? पुलिस ने मामूली जमानती धाराएं लगाकर पल्ला झाड़ लिया। लेकिन विस्फोटक कारोबारी पर अतिशय मेहरबानी करने की बात किसी ने राजधानी रायपुर पहुंचा दी। और राजधानी से सरगुजा आईजी को फरमान जारी हो गया। दरअसल, सुशासन तिहार का वक्त है। ऐसी चीजें अगर सोशल मीडिया में उछलती तो खामोख्वाह सिस्टम की छबि को नुकसान पहुंचता। सो, राजधानी से सरगुजा आईजी को फरमान गया और उन्होंने एसएसपी को नोटिस जारी कर दिया। जाहिर है, सिस्टम के तेवर के बाद अब अग्निकांड में पर्याप्त धाराएं लग जाएंगी। मगर इस मामले में मंत्रीजी बुरी कदर एक्सपोज हो गए।
अफसरों का ट्रांसफर
सुशासन तिहार-02 प्रारंभ हो गया है। जिलों में समस्या निवारण शिविर का आयोजन किया जा रहा है। कुछ शिविरों में मुख्यमंत्री भी जाएंगे तो कहीं औचक निरीक्षण के लिए उनका उड़नखटोला भी उतरेगा। सुशासन तिहार शुरू होने के बाद भी अफसरशाही में सबसे बड़ा सवाल ट्रांसफर का है। दरअसल, यह पहला मौका है, जब लंबे समय से अफसरशाही में तबादले नहीं हुए हैं। मंत्रालय में कई सचिवों के ढाई-तीन साल हो गए हैं तो जिलों में कलेक्टर, एसपी के भी ट्रांसफर अवेटेड रहे हैं। कई एसपी के टाईम भी ओवर हो रहे हैं। ऐसे में, ट्रांसफर को लेकर जिज्ञासा लाजिमी है। यह भी सही है कि पिछले साल सुशासन तिहार के दौरान ही अप्रैल एंड में राजनांदगांव के कलेक्टर संजय अग्रवाल को बिलासपुर शिफ्ट किया गया था। मगर इस बार क्या होगा, इस संदर्भ में अभी कुछ फायनल नहीं हुआ है। सरकार का पूरा फोकस इस समय सुशासन तिहार में आम आदमी की समस्याओं के निवारण पर है। इसलिए, जिलों में चेंज का नहीं लगता। मुख्यमंत्री को अगर समय मिला तो सचिवों के विभाग बदलने पर जरूर कोई चर्चा हो सकती है।
कलेक्टर, एसपी का कार्यकाल?
छत्तीसगढ़ में पिछले छह-सात साल से ऐसा हो रहा कि कलेक्टर, एसपी छह महीने, एक साल में बदल जा रहे। रमन सिंह सरकर के दौर तक दो साल अफसरों का न्यूनतम कार्यकाल होता था। राजेश सुकुमार टोप्पो ने आईएएस के कैरियर में एक जिला किया है। मगर राज्य बनने के बाद कलेक्टर के तौर पर उनका रिकार्ड है। वे करीब साढ़े तीन साल तक बलौदा बाजार के कलेक्टर रहे। इसी तरह मध्यप्रदेश के दौर में आईपीएस शैलेंद्र श्रीवास्तव साढ़े तीन साल से अधिक समय तक बिलासपुर के एसपी रहे। इसलिए, सरकार पर निर्भर करता है...वो किस अफसर को कितने दिन जिले में रखती है। वैसे कलेक्टर, एसपी के साढ़े तीन साल के उदाहरण तो इसी प्रदेश में है।
हफ्ते का कोट
'जीवन में आनंद साधन से नहीं, साधना से प्राप्त होते हैं।' और 'किसी को चोट पहुंचाना उतना ही आसान है, जितना पेड़ का एक पत्ता तोड़ना, लेकिन किसी को सुखी करना एक पेड़ उगाने जैसा है, इसमें बहुत समय, देखभाल और धैर्य लगता है।'
अंत में दो सवाल आपसे?
1. किस आईजी के क्रियाकलापों से पुलिस की छबि खराब हो रही है?
2. क्या ये सही है कि अफसरशाही में भी जातिवाद का वायरस घुसने लगा है?
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