तरकश, 28 जून 2026
संजय के. दीक्षित
निलंबन और पनिशमेंट का महीना!
विधानसभा के मानसून सत्र और मंत्रिमंडल की सर्जरी की दृष्टि से जुलाई महीना छत्तीसगढ़ के लिए खासा महत्वपूर्ण रहेगा, तो कर्मचारियों, अधिकारियों के लिए काफी संवेदनशील भी। संवेदनशील मतलब खतरा भरा। दरअसल, जुलाई में सीएम हेल्पलाइन का रिव्यू किया जाना है। हेल्पलाइन का अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। लोग लगातार अपनी बातें फोन कॉल के जरिये रख रहे हैं। शिकायतों के संबंध में आवेदकों को प्रॉपर रिप्लाई कर उनसे पेपर भी मंगाए जा रहे हैं। याने कंप्लेन को सिर्फ दर्ज कर छोड़ नहीं दिया जा रहा, बल्कि संपर्क कर साक्ष्य जुटाए जा रहे। सीएम सचिवालय खुद इसकी मॉनिटरिंग कर रहा। यह एक्सरसाइज इसलिए किया जा रहा कि सीएम हेल्पलाइन की वाजिब शिकायतों पर सरकार ने बड़ी कार्रवाई करने की मनःस्थिति बना ली है। खासकर, करप्शन और लापरवाही के मामलों में। जाहिर है, जुलाई महीना कर्मचारियों, अधिकारियों के लिए निलंबन और पनिशमेंट वाला रहेगा। सरकार चाहती है कि लोगों में सीएम हेल्पलाइन का भय हो। सही भी है...एमपी, बिहार, यूपी, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों ने काफी पहले हेल्पलाइन बना लिया था और उन्हें इसका फायदा मिला।
मंत्रियों का दिल्ली प्रवास
विधानसभा के मानसून सत्र से पहले मंत्रिमंडल का फेरबदल मुमकिन प्रतीत नहीं हो रहा। वैसे भी पहले मोदी कैबिनेट में बदलाव होना है। उसके बाद ही राज्यों का नंबर आएगा। हालांकि, सर्जरी के लिए एक्सरसाइज प्रारंभ हो चुका है। मंत्री, विधायकों का दिल्ली जाना जारी है। डिप्टी सीएम विजय शर्मा और हेल्थ मिनिस्टर श्यामबिहारी जायसवाल इस हफ््ते दिल्ली गए तो उसके अगले दिन पूर्व मंत्री लता उसेंडी दिल्ली में थी। 29 जून को स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव दिल्ली जा रहे हैं। बताते हैं, संघ कार्यालय से उन्हें बुलावा है। जाहिर है, लता उसेंडी का नाम मंत्री बनने वालों की चर्चाओं में सबसे उपर है, तो यूपी चुनाव को देखते गजेंद्र यादव का भी कद बढ़ाया जा सकता है। गजेंद्र को एकाध और विभाग मिल सकता है। वैसे इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं कि किसी डिप्टी सीएम का विकेट अगर गिरा तो फिर गजेंद्र का प्रमोशन भी हो जाए...आखिर राजनीति मुकद्दर का खेल तो है।
माननीयों के स्टाफ और नया ठीहा
वैसे विष्णुदेव कैबिनेट में पांच मंत्रियों के बदले जाने की चर्चाएं चल रही हैं। मगर बीजेपी का कोई भरोसा नहीं, संख्या इससे उपर भी जा सकती है। बहरहाल, जिन पांच मंत्रियों की विदाई की अटकलें तेज हैं, उनके घरों और आसपास के लोगों में माहौल भारी हो गया है। असल में, पांच मंत्रियों के खिलाफ परसेप्शन इतना गहरा है कि सोशल मीडिया में लोग खुलेआम ऐलान कर रहे हैं, फलां-फलां मंत्री...। और लोग उस पर ऐतबार भी कर ले रहे, क्योंकि रिपोर्ट कार्ड ही उनका ऐसा है...ढाई साल उन्होंने सिर्फ अपने लिए काम किया। खैर, इन मंत्रियों के पीए, स्टॉफ, कारोबारी और समर्थक अपने अगले ठीहे की संभावनाएं तलाशने में लग गए हैं।
जुगाड़ का डिप्टी कमिश्नर
जुगाड़ की माया देखिए...कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड में राजस्थान का एक व्यक्ति पर्यटन अधिकारी बना। इसमें अधिकारी जरूर जुड़ा है, मगर वास्तव में यह क्लास थ्री का पद होता है। खैर, कुछ दिनों बाद उन्होंने जोर-जुगाड़ लगाकर रायपुर से दिल्ली के सूचना केंद्र में पोस्टिंग करा ली। और, उसके बाद अब प्रतिनियुक्ति पर रेजिडेंट कमिश्नर ऑफिस में डिप्टी कमिश्नर बन बैठे। दरअसल, रेजिडेंट कमिश्नर श्रुति सिंह ने इस बात को आधार बनाकर नोटशीट भेजा कि फलां पर्यटन अधिकारी का वेतन डिप्टी कमिश्नर के समतुल्य हो गया है और जीएडी से उस पर मुहर लग गई। जबकि, रायपुर में उनके सारे बैचमेट 18 साल बाद भी पर्यटन अधिकारी से उपर नहीं पाए हैं। जाहिर है, बाबू के सीनियर हो जाने पर उसकी भी तनख्वाह असिस्टेंट कलेक्टर के बराबर हो जाती है तो क्या उसे असिस्टेंट कलेक्टर बना दिया जाएगा। बहरहाल, इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि दिल्ली का रेजिडेंट कमिश्नर ऑफिस बाकी राज्यों की तरह स्ट्रांग होना चाहिए, न कि बाबू कैडर के लोगों को वहां बिठा दिया जाए।
कमरा नंबर 109 का रहस्य
2016 में दिल्ली में जब छत्तीसगढ़ सदन बना, तब नियम बना था कि उसमें मुख्यमंत्री और मंत्रियों के अलावा और किसी को कमरा नहीं मिलेगा। विधायकों, सांसदों को भी नहीं। मगर छत्तीसगढ़ के एक मंत्री के कथित पीए ने करीब साल भर से सदन में कमरा नंबर 109 हथिया रखे हैं। अब आप पूछेंगे, कथित पीए क्यों? कथित इसलिए कि किसी मंत्री को दिल्ली में काम करने के लिए पीए नहीं मिलता। वास्तव में पीए होते तो वे मंत्री के साथ छत्तीसगढ़ में रहते। किसी और मंत्री का पीए तो दिल्ली में नहीं रहता। यहां तक कि किसी मुख्यमंत्री के पीए की भी पोस्टिंग दिल्ली में नहीं होती। फिर कमरा नंबर 109 का रहस्य क्या है? स्टेट के इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट को इसे नोटिस में लेना चाहिए...पता यह भी लगाना चाहिए कि रेजिडंेंट कमिश्नर ऑफिस के किस मुलाजिम का मोदी विरोधी नेता से सीधा कनेक्शन हैं।
10 पेटी
राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के तबादले में चल रही तीन-पांच की चर्चाओं को देखते सरकार ने ट्रांसफर लिस्ट रोक दी थी। मगर इसके भीतर की जो बातें निकल कर कर आ रहीं, वो हैरान करने वाली हैं। किसी ने बताया कि एक राप्रसे अधिकारी ने सिर्फ जिले में जाने के लिए एक बड़े बिचौलिये को 10 पेटी दे डाला। हालांकि, इस पर सहसा यकीं नहीं होगा...आखिर वो 10 पेटी निकालेगा कैसे? जवाब मिला, वो डेढ़-दो महीने में निकाल लेगा। वो वैसा ही करेगा, जैसा आजकल जिलों में हो रहा। बहरहाल, कई लोगों का पैसा डूबता लग रहा है। जिन बिचौलियों ने पैसा लिया है, वे पिछले तीन महीने से दिलासा दे रहे हैं, बस लिस्ट निकलने ही वाली है। मगर सरकार टस-से-मस नहीं हो रही।
पोस्टिंग और किस्मत
बस्तर आईजी के लिए 2004 बैच के दो आईपीएस अफसरों के नामों की बड़ी चर्चा थी। मगर आखिरकार पोस्टिंग मिल बद्री नारायण मीणा को। बद्री वैसे शुरू से पोस्टिंग को लेकर काफी किस्मती रहे हैं। छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक नौ जिलों के पुलिस अधीक्षक रहने का रिकार्ड उन्हीं के नाम है, तो एक साथ दो पुलिस रेंज के आईजी रहने वाले वे सूबे के पहले आईपीएस अधिकारी हैं। बद्री छत्तीसगढ़ के चुनिंदा आईएएस, आईपीएस अधिकारियों में शामिल हैं, जिन्हें सरकार बदलने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। रमन सरकार में वे सात जिलों के एसपी रहे तो भूपेश सरकार में दो जिलों के एसपी और तीन रेंज के आईजी बनने का उन्हें मौका मिला। वे दुर्ग में एसपी रहे और वहीं प्रमोट होकर आईजी बन गए। फिर बिलासपुर के आईजी बने और वहां से फिर दुर्ग आए और दुर्ग के साथ-साथ रायपुर के भी आईजी। ऐसा पोर्टफोलियो पूर्व डीजीपी अशोक जुनेजा का भी नहीं रहा। जुनेजा पुलिस महकमे के सबसे किस्मती पुलिस अधिकारी माने जाते थे। सरकार किसी की भी रही, वे कभी लूप लाईन की पोस्टिंग नहीं की। रमन सरकार के दौरान इंटेलिजेंस चीफ होने के बाद भी वे भूपेश बघेल सरकार में डीजीपी बने और विष्णुदेव साय सरकार में तमाम विरोधों के बाद भी न केवल उन्होंने कंटिन्यू किया, बल्कि छह महीने का एक्सटेंशन भी मिल गया।
आईएफएस की छुट्टी
आईएएस ऋचा शर्मा के एसीएस फॉरेस्ट रहने के दौरान वन मंत्री केदार कश्यप ने आईएफएस अधिकारियों की छुट्टी समेत कुछ फाइलें अपने अधिकार में ले लिए थे। दरअसल, ऋचा के फॉरेस्ट में रहने के समय आईएफएस अधिकारियों को छुट्टी लेना आसान नहीं था। सख्त आईएएस अफसर माने जाने वाली ऋचा शर्मा काफी किंतु-परंतु, क्वेरी के बाद अवकाश स्वीकृत करती थी। लिहाजा, वन मंत्री ने अफसरों की छुट्टी का अधिकार अपने पास रख लिया था। अब ऋर्चा शर्मा फॉरेस्ट से हट गई हैं तो वन मंत्री ने नए एसीएस फॉरेस्ट मनोज पिंगुआ को आईएफएस अधिकारियों के छुट्टियों के अधिकार दे दिए हैं।
सीएस की SOM मीटिंग
विकास शील के चीफ सिकरेट्री बनने के बाद दो-से-तीन हफ्ते के बीच एक सीनियर ऑफिसर्स मीटिंग (SOM) होती है, जिसे अफसरों के बीच SOM मीटिंग कहा जाता है। इसमें सभी विभागों के सिकेट्री शामिल होते हैं। इस मीटिंग को लेकर सचिवों में काफी तनाव रहता है...सीएस न जाने क्या पूछ दें, कब टोक दें। छत्तीसगढ़ बनने के बाद इस तरह की मीटिंग पहली बार हो रही। इसमें लोक सेवा गारंटी से लेकर ई-ऑफिस जैसे तमाम प्वाइंट होते हैं, सीएस जिसका फॉलोअप लेते हैं। एक तरह से कहा जाए तो ये जस्ट रिमाइंडर जैसी बैठक होती है, जिसमें सीएस जो टास्क दिए रहते हैं, उसका रिव्यू करते हैं। सोम मीटिंग के फेर में सिकेट्री लोगों को थोड़ा अलर्ट रहना पड़ता। इससे मंत्रालय की वर्किंग स्मूथ हुई है। फिर चीफ सिकेट्री का भय तो है ही, वे बोलने और टोकने में गुरेज नहीं करते।
चतुर मंत्री और आईडिया
सुनिल कुमार जब चीफ सिकरेट्री थे, तब समन्वय से ट्रांसफर या अफसरों का डेपुटेशन कराना काफी कठिन था। मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह या उनके सचिवालय से कोई मैसेज आ जाए तो बात अलग है वरना, वे नोटशीट पर इतना तगड़ा नोट लिख देते थे कि फिर फाइल को डंप करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता था। उस समय होशियार मंत्री या अफसर कई बार सीधे मुख्यमंत्री से नोटशीट पर लिखवा लेते थे। अब मुख्यमंत्री ने अगर ओके कर दिया तो फिर चीफ सिकेट्री को उसे अनुमोदन देना ही पड़ेगा। फिर सुनिल कुमार भी कुछ नहीं कर पाते थे। वर्तमान चीफ सिकेट्री विकास शील के दौर में भी अब चीजें उतनी आसान नहीं। विभिन्न विभागों से आए उंच-नीच वाले प्रस्तावों पर वे ब्रेक लगाने का प्रयास करते हैं। बताते हैं, स्कूल शिक्षा विभाग के जंबो ट्रांसफर के प्रपोजल पर भी उन्होंने ब्रेक लगाया।
CM, मंत्री सर्वोच्च
वन मंत्री केदार कश्यप ने आईएफएस अधिकारियों के अवकाश का अधिकार अपने पास रख लिया था, इस प्रसंग से सवाल उठता है, क्या कोई मंत्री ऐसा कर सकता है। बता दें, संविधान में मुख्यमंत्री को सरकार माना गया है...मंत्रियों के सारे अधिकार मुख्यमंत्री में निहित होते हैं। मुख्यमंत्री सरकार के कामकाज में सुविधा के लिए मंत्री बनाते हैं मगर वे चाहे तो किसी भी मंत्री के आदेश को पलट सकते हैं। उसी तरह सचिवों के सारे अधिकार मंत्री में समाहित होते हैं। मंत्री चाहे तो कोई भी फाइल मंगा सकता है, सचिव के नोट को बदल सकता है। ये अलग बात है कि यदि कोई गलत चीज होगी तो उसके लिए मंत्री ही जिम्मेदार होंगे। मगर सत्ता मंत्रियों की ही सर्वोच्च होती है। अब वो अलग बात है कि कई बार घुड़सवार कमजोर होता है, तो घोड़ा लगता है नचाने, वही स्थिति मंत्री और अफसर की होती है।
कलेक्टर, एसपी पर कसावट?
मुख्य सचिव विकास शील ने मंत्रालय और डायरेक्ट्रेट के अफसरों को काफी कस दिया है। मंत्रालय में 90 परसेंट अफसर अब 10 बजे पहुंच जाते हैं, तो मीटिंग, रिव्यू से सिस्टम टाईट हुआ है। मगर जिलों का हाल अभी भी डिरेल्ड है। न कलेक्टर टाईम को फॉलो कर रहे और न एसपी। अधिकांश जिलों में अराजकता जैसी स्थिति है। खासकर, उन जिलों की स्थिति काफी खराब है, जहां नए प्रमोटी कलेक्टर गए हैं। इनमें से कई ने तो जाते ही गर्दा उड़ा दिया है। दरअसल, नए प्रमोटी कलेक्टरों को कहीं से भनक मिल गई कि उन्हें खानापूर्ति के लिए कलेक्टर बनाया गया है, इसके बाद कभी भी उन्हें विदा कर दिया जाएगा। इसके बाद कामधाम छोड़ वे रोज सुबह कैलकुलेटर लेकर बैठ जा रहे। खैर, कलेक्टर, एसपी अगर टाईट होते तो कोरिया में ट्रिपल मर्डर थोड़े हो जाता। सोनहत का जघन्य हत्याकांड पुलिस और प्रशासन की घोर लापरवाही का नमूना है। रेत जैसी चीजों के लिए अगर तीन-तीन हत्याएं हो जाए तो सबसे पहले कलेक्टर, एसपी को लटकाना चाहिए। मुख्य सचिव को भी जिलों की अराजकता को लेकर स्ट्रांग होना पड़ेगा। जो अफसर इधर-उधर कर रहा, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की वे सिफारिश तो कर ही सकते हैं।
विधायकों की मजबूरी-1
छत्तीसगढ़ में रुलिंग पार्टी के विधायक हो या फिर आपोजिशन के, सभी एक सूत्रीय अभियान में जुटे हुए हैं, तो उनकी भी अपनी मजबूरी है। दरअसल, चुनाव इतने कॉस्टली होते जा रहे कि ग्रामीण सीटों पर भी अब 10 से 15 खोखा निकल जा रहा। शहरों तो 25 से उपर मानिये। ऐसे में, वो सब होंगे, जो कभी कल्पना से बाहर थे। जाहिर है, अब रेत और मुरूम ठेके तक पर एकाधिकार की कोशिशें हो रही। जांजगीर जिले की एक महिला विधायक का रेत माफिया से अपना हिस्सा मांगते वीडियो वायरल हुआ ही था तो कोरिया में दो बीेजीेपी विधायकों के रेत पर वर्चस्व में कितना बड़ा कांड हो गया, इसे सबने देखा। जघन्य वारदात हो गई। और जब विधायकजी लोग ही रेत से तेल निकालने लगेंगे तो सिस्टम क्या कर लेगा। कलेक्टर लोग कुर्सी बचाने मौन रहना ही श्रेष्ठ समझ रहे। क्योंकि, एक तो वो दमदार वाले कलेक्टर अब बचे नहीं, दूसरा जरा सा भी टोक दिए तो फिर अगले दिन से कलेक्टर की शिकायतें शुरू। यही वो वजह है कि अच्छे खासे मार्जिन से जीतकर आए विधायकों के खिलाफ एंटी इंकाम्बेंसी तेज होता जा रहा।
विधायकों की मजबूरी-2
विधायकजी लोग मजबूरी में दोनों हाथ से किस तरह काम कर रहे, इसका नमूना है जिला शिक्षा अधिकारियों की पोस्टिंग। सरकार ने 16 जिलों के डीईओ बदले, उनमें से छह जिलों का मामला हाई कोर्ट पहुंच गया है। कोर्ट ने इस पर नाराजगी भी व्यक्त किया है। दरअसल, छहों विधायकों ने जिद करके अपने जिले में नियम विरुद्ध व्याख्याताओं को डीईओ बनवा लिया। हालांकि, गजेंद्र यादव मजबूत बैकग्राउंड के हैं, इसलिए उन्हें नहीं झुकना था मगर मंत्रिमंडल में सर्जरी और प्रमोशन का समय है, वे भी विधायकों के प्रेशर में आ गए। बीजेपी संगठन को इसे देखना चाहिए। क्योंकि, इससे सरकार की छबि प्रभावित हो रही।
अध्यक्ष पर मंथन
इस समय सत्ताधारी पार्टी और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस दोनों के प्रदेश अध्यक्ष बस्तर से हैं। और यह कड़वी सच्चाई यह है कि दोनों की प्रदेश में वैसी पकड़ नहीं बन पाई है, जैसी कि पार्टी के मुखिया की होनी चाहिए। बीेजेपी अध्यक्ष किरण सिंहदेव ने तो अध्यक्ष की जगह मंत्री बनने की इच्छा जताई थी, हालांकि पार्टी ने उन्हें अध्यक्ष पद पर कंटिन्यू कर दिया। उधर, पीसीसी चीफ दीपक बैज भी ढाई साल में अपनी कोई पहचान नहीं छोड़ पाए हैं। वास्तविकता यह है कि आज भी पूर्व सीएम भूपेश बघेल ही पूरे प्रदेश में एकतरफा माहौल बनाए हुए हैं। हफ्ते भर के भीतर वे दो बार सरगुजा पहुंच गए। उनके बाद विधायक देवेंद्र यादव की सक्रियता है। बहरहाल, बीजेपी और कांग्रेस के सियान नेताओं को इस पर मंथन करना चाहिए बस्तर से जुड़े पार्टी नेताओं की पूरे प्रदेश में स्वीकार्यता क्यों नहीं बन पाती? और क्या अध्यक्ष रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग जैसे प्रदेश के बीच के हिस्से से बनाना चाहिए?
एसपी की लिस्ट
मुख्यमंत्री के व्यस्त होने की वजह से एसपी की लिस्ट नहीं निकल पाई। मगर अब आजकल में कभी भी आदेश जारी हो सकता है। इसमें करीब 10-12 जिलों के एसपी बदले जाएंगे तो रायपुर पुलिस कमिश्नरेट के चारों चारों डीसीपी एसपी बनकर जिलों में जा सकते हैं। दरअसल, चारों 2020 बैच के आईपीएस हैं। इस बैच के एक आईपीएस नारायणपुर में काफी पहले एसपी बन चुका है। सो, इन चारों में इस बात को लेकर क्षोभ रहता है। खैर, इन चारों का नंबर इस बार लग सकता है।
अंत में दो सवाल आपसे?
1. किस मंत्री ने सूटकेस की शक्ति के जरिये मान लिया था कि उसका कोई विकल्प नहीं है मगर अब कुर्सी डगमगा रही है?
2. सरकार को सिस्टम में शुचिता लाने मंत्रियांें के साथ विधायकों के उपर भी अंकुश लगाने की जरूरत नहीं है?

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