सोमवार, 26 अगस्त 2013

तरकश, 25 अगस्त

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सीएस ने बात संभाली

20 अगस्त को कैबिनेट में बात बिगड़ जाती अगर चीफ सिकरेट्री सुनिल कुमार ने आगे आकर न संभाला होता। असल में, जनप्रतिनिधियों के खिलाफ केस वापिस लेने के लिए मंत्रिमंडलीय उपसमिति बनी है। गृह मंत्री ननकीराम कंवर इसके अध्यक्ष हैं और राजेश मूणत और हेमचंद यादव सिकरेट्री। मंत्रालय में उपसमिति की बैठक हुई और हैरतनाक यह रहा कि गृह विभाग का एक बाबू तक नहीं पहुंचा। तीनों मंत्री आधा घंटे तक अफसरों का इंतजार किए, इसके बाद घर लौट गए। ऐसे में मंत्रियों का भड़कना स्वाभाविक था। कैबिनेट शुरू होते ही तीनों मंत्रियों ने चढ़ाई कर दी। मूणत तो खासा आक्रमक थे। उनका कहना था, अगर कोई विवशता थी तो अफसरों को इंफार्म करना था। मौके की नजाकत को भांपकर चीफ सिकरेट्री ने मोर्चा संभाला और मातहतों की चूक को अपने उपर लेते हुए कहा, मैं इसके लिए माफी मांगता हूं। सीएस के ऐसा कहते ही मंत्री ठंडे पड़ गए।

नई पोस्टिंग

राज्यपाल के सिकरेट्री जवाहर श्रीवास्तव का एक साल का संविदा 30 अगस्त को खतम हो जाएगा। जवाहर को सूचना आयुक्त बनाने की खबर है। इसके लिए रमन कैबिनेट ने सूचना आयुक्त के एक नए पद की मंजूरी दे दी है। सब कुछ ठीक रहा, तो 30 को या इससे पहले उनकी नई पोस्टिंग का आर्डर जारी हो जाएगा। ऐसे में जवाहर की जगह पर राजभवन के लिए नए सिकरेट्री की तलाश शुरू हो गई है। फुलफ्लैश नहीं हुआ तो मंत्रालय के किसी सिकरेट्री को अतिरिक्त प्रभार दिया जा सकता है। वैसे पता चला है, रिटायरमेंट के स्टेज वाले आईएएस राजभवन में जाने के लिए खूब जोर लगा रहे हैं। दरअसल, राजभवन की पोस्टिंग का अपना मतलब है। डा0 सुशील त्रिवेदी और पीसी दलेई वहीं से रिटायर होने के बाद राज्य निर्वाचन आयुक्त बने थे और जवाहर श्रीवास्तव का देख ही रहे हैं। अब ऐसे में राजभवन जाना भला कौन नहीं चाहेगा।

दो के झगड़े में

30 अगस्त को आईएफएस अफसरों की डीपीसी हो रही है। 20 से अधिक आईएफएस इसमें लाभान्वित होंगे। मगर सबकी नजर पीसीसीएफ की पोस्ट पर है। इस एक पद के लिए दो दावेदार हैं। और दोनों के बीच भारत-पाकिस्तान वाले हालात हैं। डीपीसी तय होने के बाद तो वार और तेज हो गया है। मंत्रालय में रोज शिकायतों का पुलिंदा भेजा जा रहा है। पी जाय उम्मेन अगर सीएस होते तो इनमें से एक का पदोन्नत होना तय था। हालांकि, उन्होंने एक दिग्गज कांग्रेस नेता को पकड़ा रखा है। मगर मामला मुश्किल लगता है। असल में, दोनों के खिलाफ पुराने मामले हैं। ऐसे में एडिशनल पीसीसीएफ जीतेंद्र उपाध्याय को फायदा हो जाए, तो अचरज नहीं। क्योंकि, चुटिया वाले बाबा चमत्कारिक ढंग से एडिशनल पीसीसीएफ जरूर बन गए मगर और उपर जाना संभव नहीं है। क्योंकि, उनके खिलाफ भी गंभीर चार्ज हैं।

अनूठी एकता

आईपीएस और आईएफएस भले ही आपस में झगड़ते रहें मगर आईएएस में अनूठी एकता है। 83 बैच के आईपीएस गिरधारी नायक जब डीजी बन गए और उसी बैच के अजय सिंह और एनके असवाल प्रींसिपल सिकरेट्री रह गए तो सारे आईएएस सीएम के पास पहुंच गए। इनमें अजय सिंह के घोर विरोधी भी थे। और एसीएस के दो पोस्ट स्वीकृत करा ही लिया। यहीं नहीं, कोशिश इस बात की हो रही है कि 30 को आईएफएस की डीपीसी के साथ एसीएस की डीपीसी हो जाए। इसके लिए धुर विरोधी दो आला आईएएस अवकाश लेकर दिल्ली में डटे हैं। ताकि, डीओपीटी से एपूव्हल मिल जाए। ये होती है यूनिटी।

उंट पहाड़ के नीचे

रमन सरकार ने सीएसआईडीसी से ठाकुर एमडी को हटाकर ब्राम्हण अफसर को पोस्ट किया था। माना गया था कि चेयरमैन ब्राम्हण हैं, दोनों में पटरी बैठेगी। मगर हुआ उल्टा। बिचैलियों ने यह कहकर चेयरमैन को भड़काना चालू कर दिया कि एमडी बाहरी ब्राम्हण हैं। यही नहीं, एमडी से अनाप-शनाप काम का डिमांड भी। लेकिन पता चला है, सरकार ने सीएसआईडीसी के झगड़े की बीमारी पकड़ ली है। चेयरमैन के ओएसडी की इंजीनियरिंग की डिग्री की जांच बिठा दी गई है और जब तक जांच रिपोर्ट न आ जाए, सभी कामों से बेदखल कर दिया गया है। वैसे, सीएसआईडीसी के रोज के विवादों से सरकार इतना हलाकान है कि चुनाव नहीं होता तो चेयरमैन को भी चेंज कर देती।

झारखंड जैसा

छत्तीसगढ़ में तीसरे मोर्चे को लेकर कयासों का दौर शुरू हो गया है। आशंका यह भी…….छत्तीसगढ़ कहीं झारखंड न बन जाए। वहां हर छह महीने में सीएम बदल जाता है या प्रेसिडेंट रुल लग जाता है। छत्तीसगढ़ में दो दलीय व्यवस्था के चलते राजनीतिक स्थिरता है। लेकिन, तीसरे मोर्चे को पांच से सात सीटें भी मिल गई तो जरा सोचिए, स्थिति क्या होगी। अजीत जोगी नम्बर दो रहना पसंद नहीं करते। अविभाजित मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह जरूर सीएम थे मगर जोगी उन्हें अपने होने का लगातार अहसास कराते रहे। छत्तीसगढ़ बना तब भी जोगी के साथ एक विधायक नहीं थे लेकिन ताजपोशी उनकी हुई। जाहिर है, विधानसभा चुनाव में कुछ सीटें जीतकर भी वे किंग बनना पसंद करेंगे, किंगमेकर नहीं। सियासी प्रेक्षक भी मानते हैं, ऐसे में सूबे में जोड़-तोड़ की राजनीति बढ़ेगी।

अक्टूबर में

चुनाव आयोग जरूर अबकी समय से पहले सक्रिय हो गया है। मगर जो संकेत मिल रहे हैं, आचार संहिता पिछले साल की तरह अक्टूबर के पहिले हफ्ते में लगेगी। 2008 में 14 अक्टूबर को अधिसूचना जारी हुई थी और 14 नवंबर को पोल हुआ था। इस बार फस्र्ट वीक में दीपावली होने के कारण माना जा रहा है, 10 नवंबर के पहले चुनाव नहीं होंगे। पिछले बार एक ही चरण हुआ था। इस बार दो की तैयारी है। याने 15 से 17 तक खींच जाएगा। ऐसे में सितंबर में आचार संहिता लगने का सवाल नहीं उठता।

चैथा विजिट

अगले महीने की 19 तारीख को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह छत्तीसगढ़ आ सकते हैं। वे एनटीपीसी के लारा प्रोजेक्ट की आधारशिला रखेंगे। साथ ही बिलासपुर जिले के सीपत संयंत्र को देश का समर्पित करेंगे। हालांकि, यह प्रोग्राम एनटीपीसी का है मगर प्रोटोकाल के तहत मुख्यमंत्री डा0 रमन सिंह ने उन्हें आमंत्रित किया था। और पीएमओ ने 17 सितंबर को हरी झंडी दे दी है। अब पीएमओ में मिनट-टू-मिनट प्रोग्राम तैयार हो रहा है। पता चला है, इसके लिए दो विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। पहला, या तो सीपत या लारा में से किसी एक जगह पर जाकर एक ही जगह पर दोनों कार्यक्रम हो जाए या फिर सीपत और लारा दोनों जगहों पर जाएं। बहरहाल, साढ़े नौ साल में प्रधानमंत्री का यह चैथा छत्तीसगढ़ प्रवास होगा। दो बार वे पहली पारी में आए थे। इसके बाद जीरम नक्सली हमले के दूसरे दिन रायपुर आए थे। और अब, यह चैथा होगा।

अंत में दो सवाल आपसे

1. भरी सभा में अगर कोई व्यक्ति कलेक्टर से बदतमीजी करने लगे, तो कलेक्टर को उसकी आवभगत करनी चाहिए या कार्रवाई?
2. दुर्गा शक्ति नागपाल जैसे अफसर छत्तीसगढ़ में कितने होंगे?

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