रविवार, 31 मई 2015

तरकश, 31 मई


tarkash photo 

संजय दीक्षित

पीए का कमाल

मंत्रियों के पीए और उनके स्टाफ द्वारा तोरी की बात कोई नई नहीं है। लेकिन, एक नए मंत्री का स्टाफ इतना जल्दी शुरू हो जाएगा, हैरत होती है। मंत्रीजी ने 22 मई को शपथ लिया और 25 मई को उनके एक चंगु ने बिलासपुर के डिप्टी डायरेक्टर को फोन लगा दिया, मंत्रीजी के किचन का सामान लेने के लिए एक पेटी भिजवा दो। फिर, दूसरे से गाड़ी में फ्यूल भराने के लिए 50 हजार का डिमांड। दुर्ग के डिप्टी डायरेक्टर को भी फोन लगवाया गया। हालांकि, दुर्ग वाले ने दो टूक इंकार कर दिया। मंत्रीजी का स्टाफ इसी तरह सक्रिय रहा, तो मंत्री को लेने के देने पड़ सकते हैं।

जरा संभलके

श्रम मंत्री बनने के बाद भैयालाल राजवाड़े बड़े उत्साहित है। सिस्टम बदलने की बात कर रहे हैं। बिलासपुर में मीडिया से चर्चा में अपने सूट को लेकर विवादित बयान दे डाला। कोट-टाई पहनकर शपथ लेने पर मीडिया ने सवाल किया, तो मंत्रीजी तमतमा गए। बोले, क्या वे बिना कपड़े के शपथ लेते। राजवाड़े का उत्साह स्वाभाविक भी है। पहली बार मंत्री बने हैं…..बड़े-बड़े कल-कारखाने सीधे उनके अंदर आ गए हैं। जब चाहे किसी को टाईट कर सकते हैं। मगर मंत्रीजी को शायद नहीं मालूम कि इंडस्ट्रीज लाबी के तार कहां से जुड़े होते हैं। सरकार किसी की भी पार्टी की हो, चलती उन्हीं की है। बीजेपी की पहली पारी में बृजमोहन अग्रवाल को गृह के साथ श्रम विभाग भी मिला था। याद होगा, बृजमोहन तब कितने पावरफुल थे। इसके बाद भी, आठ महीने में श्रम विभाग चेंज हो गया था। इसलिए, मंत्रीजी जरा संभलके।

नए तेवर

संस्कृति एवं सहकारिता मंत्री दयालदास बघेल का पिछला कार्यकाल कैसा रहा, ये बताने की जरूरत नहीं है मगर अबकी तो वे नए तेवर में नजर आ रहे हैं। गुरूवार को उन्होंने मार्कफेड के अफसरों की जमकर क्लास ले डाली। एक डीएमओ को यहां तक कह दिया, तुम जेल से छुटकर फिर से उसी जिले का डीएमओ कैसे बन गए तो रायपुर वाले से बोले, सस्पेंशन रिस्टेट होने के बाद तुम्हें रायपुर जैसे बड़े जिले की कमान कैसे मिल गई। अब, ये अलग सवाल है कि मंत्रीजी ने पहली बैठक मार्कफेड की ही क्यों ली। और, उन्हें इसके लिए फीडबैक कौन दिया…..इसके पीछे कौन-सी लाबी काम कर रही है। बहरहाल, कारण कोई भी हो, मंत्रीजी जोर से बरसे।

वाह मंत्रीजी!

नान घोटाले में अफसर भले ही टारगेट में रहे, मगर अपने मंत्रीजी लोग कम थोड़े ही हैं। एक बानगी देखिए। दिल्ली का एक फर्म नान में दाल सप्लाई करता है। नान के नियमों केे अनुसार छत्तीसगढ़ में उसकी दाल मिल होनी चाहिए। सो, उरकुरा में 2010 से कागजों में दाल मिल चल रही थी। इस बार जब मिल की अनुमति का नवीनीकरण करने फैक्ट्री अफसर पहुंचे, तो वहां मिल के बदले घास उपजा हुआ था। फैक्ट्री विभाग ने जब फर्जी दाल मिल का रीनिवल करने से मना किया तो एक तेज-तर्रार मिनिस्टर का फोन आ गया। अब नान का केस मुकेश गुप्ता के पास है। मिनिस्टर के प्रेशर में अगर वह फर्जी मिल का रीनिवल करता तो एसीबी के लपेटे में आता। ऐसे में, अफसर ने लंबी छ्ट्टी पर जाना ही मुनासिब समझा।

टेम्पोरेरी पोस्टिंग

बलौदा बाजार कलेक्टर राजेश टोप्पो की कमिश्नर ट्राईबल की पोस्टिंग टेम्पोरेरी मानी जा रही है। इसके पीछे तर्क यह कि साढ़े तीन साल रिकार्ड कलेक्टरी करने वाला आईएएस इस तरह डिरेल्ड नहीं होगा…..एक जिला करने के बाद आउट हो जाए। समझा जाता है, ठीक-ठाक जिले में भेजने के चक्कर में ही उनके ट्रांसफर में लेट हुआ। फिलहाल, कोई बड़ा जिला खाली भी नहीं है, इसलिए उन्हें कमिश्नर ट्राईबल बनाया गया है। जुलाई में विधानसभा के मानसून सत्र के बाद कलेक्टरों की एक लिस्ट निकलेगी, उनमें उनका नम्बर लग सकता है। हालांकि, दो-तीन छोटे जिलों के कलेक्टरों की लिस्ट अगले महीने निकल सकती है। इसमें 2008 बैच के एकाध आईएएस को एडजस्ट किया जाएगा। इस बैच में राजेश राणा और शिखा राजपूत बचे हैं। इनके चक्कर में 2009 बैच का नम्बर नहीं लग पा रहा है।

पहला जिला

रीता शांडिल्य के कलेक्टर पोस्ट होने के बाद बेमेतरा देश का पहला जिला बन गया है, जहां कलेक्टर एवं एसपी, दोनों महिला हैं। बेमेतरा में पारुल माथुर पहले से एसपी हैं। फिलहाल, वे मैटरनिटी लीव पर हैं। जल्द ही वापस लौटने वाली हैं। बहरहाल, सूबे में कलेक्टरी में महिलाओं का वर्चस्व लगातार बढ़ता जा रहा है। दुर्ग, रायगढ़, कोरबा, अंबिकापुर, कांकेर के बाद बेमेतरा में भी महिला कलेक्टर हो गई हैं। बड़े जिलों में अब रायपुर, बिलासपुर, जांजगीर और राजनांदगांव बच गया है, जहां महिलाएं अभी नहीं पहुंच सकी हैं। मगर 2009 बैच में प्रियंका शुक्ला, किरण कौशल कलेक्टर की तगड़ी दावेदार हैं। 2008 बैच की शिखा राजपूत है हीं। अभी जिन छह जिलों में महिला कलेक्टर पोस्टेड हैं, वहां तलवार लटकने जैसी स्थिति नहीं है। ऐसे में, महिला कलेक्टरों की संख्या एक तिहाई पहुंच जाए, तो अचरज नहीं।

अब आईएएस

अगला डायरेक्टर, मेडिकल एजुकेशन आईएएस हो सकता है। वर्तमान डायरेक्टर प्रताप सिंह आईएफएस हैं और सितंबर में रिटायरमेंट होने के कारण वे वन मुख्यालय लौटना चाहते हैं। ताकि, उनका पेंशन आदि प्रकरणों को बनवाने में सहूलियतें हो सकें। हालांकि, डाक्टरों की एक लाबी नए हेल्थ मिनिस्टर अजय चंद्राकर पर प्रेशर बनाने के लिए चंद्राकर और प्रताप सिंह में विवाद की बात फैला रहा कि नाराज होकर वे वन मुख्यालय लौटना चाहते हैं। जबकि, वास्तविकता यह है कि चंद्राकर को हेल्थ मिलने से पहले ही डीएमई ने सीएस को रिलीव करने के लिए लेटर लिख दिया था। सोशल मीडिया में कहानी गढ़ दी गई कि चंद्राकर के वन मंत्री रहते दोनों में विवाद हुआ था। मगर वास्तविकता यह है कि चंद्राकर के पास कभी वन रहा ही नहीं। मेडिकल लाबी की कोशिश यह है कि किसी डाक्टर को ही डीएमई बनाया जाए।

कटारिया माडल

सूबे की एक जिला पंचायत सीईओ भी इन दिनों कटारिया की राह पर हैं। हालांकि, वे सार्वजनिक नल पर पानी पीते हुए फोटो तो नहीं खिंचवा रही मगर काम कुछ उसी तरह का है। पहले वे सिस्टम में खामियां गिनाकर अफसरों को जमकर लताड़ती हैं, फिर उसके वीडियो व्हाट्सएप पर लोड कर सोशल मीडिया में वाहवाही लेती हैं। सरकार की नोटिस में यह बात आ गई है। अगले फेरबदल में मैडम की जिले से बिदाई हो जाए, तो ताज्जुब नहीं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. सोशल मीडिया के सबसे चर्चित आईएएस अमित कटारिया आखिर, इस बात का खंडन क्यों नहीं करते कि वे एक रुपए वेतन लेतेे है?
2. मनिराम से अत्यधिक प्यार करने वाली एक महिला आईएएस का नाम बताइये, जिन्हें सरकार कलेक्टर बनाने से हिचकिचा रही है?

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