तरकश, 12 जुलाई 2026
संजय के. दीक्षित
एसपी ट्रांसफर कंप्लीट नहीं!
सरकार ने एक पुलिस रेंज के आईजी के साथ 12 जिलों के पुलिस अधीक्षकों को बदल दिया। मगर अभी भी ट्रांसफर कंप्लीट नहीं हुआ है। बस्तर, बिलासपुर, कोरबा जैसे जिलों के एसपी को इस लिस्ट में शामिल नहीं किया गया। जबकि, इन तीनों कप्तानों को ढाई साल से ज्यादा हो गया है। बताते हैं, बस्तर के एसपी शलभ सिनहा को एक बड़े जिले में पोस्ट करना था, मगर वहां के आईजी बद्री मीणा अभी-अभी ज्वाईन किए हैं, इसलिए आईजी के साथ एसपी बदलने का सरकार ने रिस्क नहीं लिया। इस चक्कर में बिलासपुर, कोरबा और दुर्ग का मामला लटक गया। हालांकि, दुर्ग एसपी विजय अग्रवाल को अभी साल भर ही हआ है मगर रजनेश सिंह को दुर्ग भेजना है, इसलिए विजय अग्रवाल बिलासपुर या कोरबा जाएंगे। चर्चा ये भी है कि कोरबा एसपी बस्तर जाएंगे और वहां से शलभ बिलासपुर या कोरबा आएं। कुल मिलाकर अगस्त तक एसपी की एक लिस्ट और आएगी, जिसमें कम-से-कम इन तीन जिलों के एसपी बदलेंगे ही।
महिला कप्तानः एक इन, एक आउट
छत्तीसगढ़ के 33 में एकमात्र महिला पुलिस अधीक्षक रहीं भावना गुप्ता तीन महीने की लीव से लौटकर सोमवार को बलौदा बाजार में ज्वाईन करने वाली थीं कि इससे दो दिन पहले उन्हें हटा दिया गया। हालांकि, लोगों को यह नहीं समझ में आ रहा कि तीन महीने अवकाश में रहने के दौरान एडिशनल एसपी से काम चलाया गया और भावना के छुट्टी से लौटते ही आखिर क्या हुआ कि उन्हें हटा दिया गया...वो भी ज्वाईन करने से जस्ट पहले। खैर, उनकी जगह एक दूसरी भावना को सरकार ने एसपी बनाया है। भावना पाण्डेय धमतरी की एसपी होंगी। इसके लिए सूरज परिहार को साल भर में ही खो कर दिया गया। यद्यपि, भावना को पोलिसिंग की अच्छी समझ है। सीएसपी, एएसपी रहने के दौरान उनका कामकाज ठीक रहा था। मगर पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करने उन्होंने लंबे समय से खुद को भिलाई में समेट लिया था...मगर अब वे फ्री होकर फिर से फील्ड में आ गई हैं। उनके हसबैंड विजय पाण्डेय जांजगीर में एसपी हैं। छत्तीसगढ़ में ये पहली बार होगा, जब आईपीएस दंपती एक साथ एसपी होंगी।
पुलिस कमिश्नरेट को झटका
एसपी की लिस्ट का एक महत्वपूर्ण प्वाइंट यह है कि इसमें डायरेक्ट आईपीएस को बड़े जिले के लिए तैयार करने का खास प्रयास नहीं दिखा। जाहिर है, कोरबा और बस्तर को छोड़ आज भी बड़े जिले प्रमोटी आईपीएस ही संभाल रहे हैं। ठीक है...सूबे की पूरी पुलिस डिरेल्ड हो गई है तो सिर्फ उसका रोना रोने से काम नहीं चलेगा। उसे पटरी पर लाने का दायित्व गृह विभाग और पीएचक्यू का है। आखिर विजय अग्रवाल, रजनेश सिंह और शशिमोहन सिंह का विकल्प ढूंढना पड़ेगा न। खैर, ट्रांसफर में सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट रायपुर पुलिस कमिश्नर को बड़ा झटका लगता दिखाई पड़ रहा है। रायपुर के तीन डीसीपी को हटाकर सरकार ने एसपी बना दिया मगर उनकी जगह पोस्ट किया सिर्फ एक डीसीपी। याने दो खाली। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार अब दो में सीनियर एडिशनल एसपी को डीसीपी पोस्ट कर दे। यदि ऐसा हुआ तो पुलिस कमिश्नर सिस्टम डिमरलाइज होगा। क्योंकि, देश के किसी भी कमिश्नरेट में एसपी लेवल के आईपीएस अफसर ही डीसीपी होते हैं। एक तरफ गृह मंत्री विजय शर्मा बिलासपुर में पुलिस कमिश्नरेट की बात कर रहे, दूसरी ओर जो पहले से कमिश्नरेट है, वही डगमगाता दिख रहा...।
पोस्टिंग का संयोग
हालांकि, अफसरशाही को कभी जाति या वर्ग के चश्मे से नहीं देखना चाहिए, उनके काम की बात होनी चाहिए मगर पोस्टिंग में कोई रोचक संयोग बनेंगे, तो चर्चाएं तो होगी ही। धमतरी जिले में भावना पाण्डेय एसपी अपाइंट हुई हैं। वहां पहले से शैलेंद्र पाण्डेय एडिशनल एसपी और अभिषेक चतुर्वेदी सीएसपी हैं। कलेक्टर अविनाश मिश्रा वहां पहले से हैं। याने संयोग से सभी ब्राम्हण। उधर, राजनांदगांव में अजय यादव को आईजी पोस्ट किया गया है। वहां पहले से मधुसुदन यादव महापौर हैं और गजेंद्र यादव प्रभारी मंत्री। फिर कलेक्टर भी जीतेंद्र यादव। अब अजय यादव न जाने किसके कोटे से राजनांदगांव पहुंचे हैं, मगर ये सही है कि विधानसभा अध्यक्ष डॉ0 रमन सिंह के विस क्षेत्र की टीम अब काफी मजबूत हो गई है। आईजी, कलेक्टर, एसपी, जिपं सीईओ सभी को चुनकर लाया गया है।
इमोशनल मंत्री, विदा कलेक्टर
9 जुलाई का कैबिनेट कुछ अलग रहा। एजेंडा पर चर्चा उपरांत मुख्य सचिव समेत तमाम अफसर बाहर निकल गए। ऐसा कई बार होता है, मंत्रिपरिषद में कोई गंभीर मुद्दा पर चर्चा करनी होती है तो अधिकारियों को बाहर भेज दिया जाता है। 9 जुलाई को भी ऐसा ही हुआ। इशारा भांपते ही अफसर हॉल से निकल गए। इसके बाद कैबिनेट कक्ष में करीब घंटे भर मंत्री बैठे रहे। फिर जब बाहर निकले तो एक मंत्री इमोशनल दिखे...बाकी मंत्रियों की भाव-भंगिमा भी थोड़ी तनी हुई थी। मंत्रियों का चेहरा देख लगा कि अंदरखाने में कुछ तो हुआ है और अगले दिन जीपीएम के कलेक्टर की छुट्टी हो गई। बताते हैं, एक मंत्री ने कलेक्टर संतोष देवांगन को फोन किया और उस दौरान ऐसा कुछ हुआ कि वे आहत हो गए। और वह बात कैबिनेट में बड़ी गंभीरता के साथ पहंुच गई। हालांकि, मंत्रीजी बड़ा साफ्ट स्पोकन है, आमतौर से अफसरों से बातचीत में वे शालीनता बरतते हैं। मगर ये भी सही है कि संतोष देवांगन का अतीत चाहे जैसा भी रहा हो, जीपीएम के आप किसी को भी फोन लगा लें, आपकी धारणा बदल जाएगी। दरअसल, पिछली सरकार ने जीपीएम को जिला बनाया मगर उसके बाद कभी भी कोई ढंग का कलेक्टर वहां भेजा नहीं गया। 2025 के सुशासन तिहार में खुद मुख्यमंत्री गुस्से में बोल गए थे कि तीन थाना का जिला नहीं संभलता आप लोगों से। ऐसे में, संतोष देवांगन ने वहां अच्छी झांकी बना ली थी। खासतौर से प्रायवेट अस्पताल को सील करने के बाद लोगों को लगा कि कलेक्टर ऐसा ही होना चाहिए। जाहिर है, संतोष देवांगन का विकेट गिरने से संगठन या सिस्टम के जिस भी नेता का इगो तो शांत हो गया मगर उससे सत्ताधारी पार्टी को कोई फायदा नहीं हुआ है, बल्कि नुकसान ही बोल सकते हैं। क्योंकि, जीपीएम के लोग इस एपिसोड से खुश नहीं है।
सोशल इंजीनियरिंग को धक्का!
जीपीएम के कलेक्टर संतोष देवांगन के सस्ते में विकेट डाउन होने से अफसरशाही के सोशल इंजीनियरिंग को बड़ा झटका लगा है। संतोष देवांगन माटी पुत्र तो हैं ही, जांजगीर से जुड़े हैं। वे बुनकर समुदाय से आते हैं। बीजेपी के दिग्गजों के लाख प्रयास के बाद भी पिछले विधानसभा चुनाव में जांजगीर में बीजेपी की झोली खाली रह गई थी। सभी-की-सभी छह सीटें कांग्रेस ले उडी। इस लिहाज से संतोष देवांगन को कलेक्टर बनाया जाना महत्वपूर्ण था। मगर दो महीने में ही उन्हें हटाना पड़ गया। संतोष को अब सरगुजिहा मंत्री लोगों से बातचीत करने में जरा सतर्कता बरतनी चाहिए। बिलासपुर एसडीएम थे तो रामविचार नेताम के साथ उनका लफड़ा हो गया था और अब सरगुजा के दूसरे मंत्री को नाराज कर अपना विकेट गंवा बैठे।
पीएचक्यू का धर्मसंकट
एएसपी और डीएसपी के ट्रांसफर को लेकर पीएचक्यू की स्थिति धर्मसंकट जैसी हो गई है। दरअसल, सुशासन तिहार के बाद से राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों की लिस्ट निकालने कवायद चल रही है। पीएचक्यू को प्रस्ताव बनाने जो नाम मिले थे, उसे नोटशीट की शक्ल में उसने आगे बढाया मगर गृह विभाग ने उसे अनुमोदन करने की बजाए फिर से पीएचक्यू को लौटा दिया। बताते हैं, होम ने लिस्ट में खुद से काटा-पिटी की बजाए पीएचक्यू के नामे में पर्ची फाड़ते हुए कहा कि हमारे इन नामों को लिस्ट में जोड़ा जाए। अब पीएचक्यू के अधिकारियों का बढ़ गया टेंशन। अफसरों के एक तरफ कुंआ था तो दूसरी तरफ खाई। गृह विभाग से मिले नाम जोड़ते तो उनकी शामत आ जाती। ऐसे में, पीएचक्यू ने वही किया, जो कोई भी दिमागदार आदमी करता। मगर इस चक्कर में लिस्ट अटक गई है।
बीजेपी सरकार में कांग्रेस की पॉलिसी?
आज से डेढ़-एक दशक पहले एक फॉरेस्ट मिनिस्टर ने सबसे पहले फॉरेस्ट अफसरों से पेटी लेकर पोस्टिंग का काम शुरू किया था। मगर अब आलम यह हो गया है कि इस पेटी वायरस से कोई विभाग अछूता नहीं रह गया है। बल्कि अब तो बोली लग रही है। मंत्रियों के यहां से फोन जा रहे, फलां जगह खाली है, आप कितना दे सकते हो। बिचौलिये भी बीच में गुगली फेंक दे रहे, उसकी अपनी अलग कहानी है। इस बोली और नीलामी के खेल में ट्रांसफर महीनों खींच जा रहे हैं। मसलन, एक डीएसपी ने मैदानी इलाके के लिए जुगाड़ जमाया था। उसका नाम तय भी हो गया था। मगर किसी बिचौलिये ने खेल कर दिया। फोन कर बताया कि आपका सरगुजा किया जा रहा। डीएसपी भागते-भागते 25 पेटी लेकर पहुंचे तो फिर जाकर उन्हें गारंटी मिली। यही हाल हेल्थ में सीएमओ, सिविल सर्जन का है। पोस्टिंग के लिए 30 से 35 पेटी चाहिए, फिर समय-समय पर रिचार्ज का कंडिशन भी। स्कूल शिक्षा विभाग में जिला शिक्षा अधिकारी के लिए 10 से 25 पेटी चल रहा। छोटे जिला है तो कम-से-कम 10 पेटी चाहिए ही। पिछले दिनों सूरजपुर में डीईओ का पद खाली हुआ तो वहां सरगुजा के नेताओं में प्रतिस्पर्धा छिड़ गई कि कौन बाजी मारता है...विधायक, मंत्री से लेकर सांसद और पार्टी पदाधिकारी तक कूद पड़े। क्योंकि, सवाल 20 पेटी का था। बाकी विभागों में भी कमोवेश यही स्थिति है...सभी ने ट्रांसफर का काउंटर खोल रखा है। ऐसा नहीं कि पूरा खेल मंत्री स्तर पर ही हो रहा। इसमें पार्टी का भी पूरा योगदान है। दरअसल, पेटी के जरिये पोस्टिंग का क्रेडिट पिछली सरकार के मंत्रियों को जाता है। इस सरकार के मंत्रियों ने दिल दिखाते हुए उस ट्रांसफर पॉलिसी को एडॉप्ट कर लिया। मगर बीजेपी के रणनीतिकारों को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसके बाद कांग्रेस की विदाई भी हो गई थी।
च्वाइस पोस्टिंग?
तरकश के पिछले स्तंभ में प्रकाशित खबर के बाद राज्य सरकार ने 33 में से एक तिहाई जिलों के जिला पंचायत सीईओ को बदल दिया। तरकश में खासतौर से दंतेवाड़ा के सीईओ जयंत नाहटा के लंबे कार्यकाल का जिक्र किया गया था, उन्हें वहां से हटा दिया गया है। उनके अलावे और लंबे समय से जमे नौ जिलों के सीईओ और बदले गए हैं। कुछ सीईओ को कलेक्टरों के च्वाइस से पोस्टिंग मिली है। कोरिया कलेक्टर का ट्रांसफर बलरामपुर हुआ तो उनके बाद कोरिया के जिपं सीईओ आशुतोष चतुर्वेदी भी बलरामपुर निकल लिए। खैर, बलरामपुर तो अपवाद है, आमतौर पर बड़े जिले के कलेक्टर चाहते हैं कि जिला पंचायत सीईओ या निगम कमिश्नर में से कम-से-कम एक डायरेक्ट आईएएस रहे, ताकि उनका वर्कलोड थोड़ा कम रहे। मसलन, अगर निगम कमिश्नर प्रमोटी या राज्य प्रशासनिक सेवा के हैं तो कोशिश रहती है, जिला पंचायत सीईओ कम-से-कम डायरेक्ट वाले रहें, और पंचायत में प्रमोटी अफसर हैं, तो निगम में डायरेक्ट अफसर रहें। इस लिस्ट में इसकी झलक दिखी है।
कलेक्टरों की लिस्ट
बीते 6 मई को सात कलेक्टरों का ट्रांसफर हुआ था, उसके बाद ब्यूरोक्रेसी की गलियारों में फिर एक छोटी लिस्ट आने की अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि, ये लिस्ट ज्यादा बड़ी नहीं होगी, अधिक-से-अधिक तीन-से-चार जिले प्रभावित हो सकते हैं। अगर कोई बड़ा विघ्न-बाधा नहीं आया तो विधानसभा के मानसून सत्र के बाद कलेक्टरों का आदेश जारी हो सकता है।
सचिवों का ट्रांसफर
बात सरकार के ढाई साल होने पर अफसरशाही की कसावट की, तो कलेक्टरों की लिस्ट के साथ सचिवों की भी एक छोटी लिस्ट निकल सकती है। हालांकि, 6 मई को 42 आईएएस अधिकारियों के ट्रांसफर हुए थे, उनमें कई विभागों के सिकेट्री बदल गए थे। मंत्रालय में लंबे कार्यकाल वाले सिकेट्री में इस समय सिर्फ एक आईएएस बचे हैं। एक ही विभाग में उन्हें ढाई साल हो गया है। अलबत्ता, सचिवों के टेन्योर का ढाई साल कोई लिमिट नहीं है। मनोज पिंगुआ गृह विभाग में करीब तीन साल रहे। मगर एक ही विभाग में लंबा समय होने पर अफसर उकता जाते हैं...उनके पास नया करने के लिए कुछ बचता नहीं। इसलिए आमतौर पर दो-एक साल में सचिवों के विभाग बदल दिए जाते हैं।
राप्रसे अफसरों का इस्तेमाल
अभी हाल ही में राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को उच्च शिक्षा और हेल्थ में भेजा गया। इसके बाद वन और परिवहन मंत्री केदार कश्यप के हायर एजुकेशन में पोस्ट किया गया है। हालांकि, विभाग वाले इससे प्रसन्न नहीं होंगे मगर इसमें कोई किंतु-परन्तु नहीं कि प्रशासनिक कार्यों में प्रशासनिक अफसरों का इस्तेमाल करना चाहिए। वैसे भी सूबे में राप्रसे अधिकारियों की अच्छी खासी फौज खड़ी हो गई है। करीब 500 से अधिक राप्रसे अफसर हो गए हैं। कैबिनेट ने स्कूल शिक्षा विभाग संचालनालय में भी दो-तीन पद प्रशासनिक अधिकारियों के लिए क्रियेट किया है। मगर अभी तक पोस्टिंग नहीं हुई है। अलबत्ता, नजर उन पर भी रखनी होगी, क्योंकि आरोप है कि राजस्व अधिकारी जिन विभागों में जाते हैं, वहां करप्शन का लेवल और हाई हो जाता है।
अब डीएफओ का नंबर
आईएएस, राप्रसे और आईपीएस के बाद अब डीएफओ की लिस्ट पर लोगों की नजरें टिक गई है। डीएफओ में पिछले करीब डेढ़ साल से कोई बड़ी लिस्ट नहीं निकली है। अब पीसीसीएफ भी चेंज हो गए हैं। अरुण पाण्डेय भी चाहेंगे कि रिजल्ट देने के लिए कुछ अपने हिसाब से डीएफओ पोस्ट करवाएं। हालांकि, फाईनल क्लियरेंस वन मंत्री और मुख्यमंत्री को देना है। बहरहाल, ऐसा समझा जाता है कि विधानसभा के मानसून सत्र के बाद करीब दर्जन भर डिविजन के डीएफओ चेंज हो जाएं।
याद करो कुर्बानी...
छत्तीसगढ़ अब नक्सल मुक्त हो चुका है। मगर इसके लिए सैकड़ों पुलिस अधिकारियों और जवानों ने अपना बलिदान दिया। इनमें राजनांदगांव के एसपी विनोद चौबे भी शामिल हैं। कल 12 जुलाई को उनकी पुण्यतिथि है। विनोद चौबे नक्सली हमले में शहीद होने वाले सूबे के पहले आईपीएस अधिकारी थे। ज्ञात है, विनोद चौबे को बलरामपुर पोस्टिंग के दौरान गोली लगी थी। कांकेर के माओवादी हमले में बाल-बाल बचे। इसके बाद भी राजनांदगांव में पीछे नहीं हटे। 12 जुलाई 2009 को मानपुर मोहला में फोर्स और नक्सलियों के बीच गोलीबारी हुई। विनोद को खबर मिली कि उनके जवान एंबुश में फंस गए हैं। पहले दो बार जानलेवा हमला हो चुका था, इसके बाद भी उन्होंने अपनी जान की परवाह नहीं की। एंबुश में फंसे अपने जवानों को कवर करने खुद ही एके-47 लेकर मोर्चे पर पहुंच गए। इस दौरान उनके ड्राईवर को गोली लग गई। विनोद चौबे खुद गाड़ी चलाते अपने चालक को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया और जवानों को बचाने घटनास्थल पर लौट गए। तब तक फोर्स वी शेप में नक्सलियों से घिर चुकी थी। विनोद ने जवानों को लेटकर पीछे हटने कहा और गोलियों की बौछार शुरू कर बैकअप देने का प्रयास किया मगर गड्ढे में छिपे नक्सलियों की गोली से वे शहीद हो गए। कल पुण्यतिथि के मौके पर ऐसे बहादुर अफसर को स्मरण करना चाहिए, बार-बार नक्सलियों के हमले की जद में आने के बाद भी जिसका हौसला नहीं टूटा।
अंत में दो सवाल आपसे?
1. छत्तीसगढ़ में जिस तरह नए कलेक्टरों को मौका देकर बड़े जिलों के लिए तैयार किया जा रहा है, वैसा एसपी में क्यों नहीं किया जा रहा?
2. आईपीएस पवनदेव लगातार साढ़े छह साल से पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन में पोस्टेड हैं। क्या सिस्टम उन्हें पोस्टिंग कर भूल गया है या कोई और बात है?