शनिवार, 11 जुलाई 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: सीबीआई जांच के पीछे...



तरकश, 5 जुलाई 2026

संजय के. दीक्षित

सीबीआई जांच के पीछे

छत्तीसगढ़ सरकार ने कोरिया के चर्चित तिहरे हत्याकांड की जांच सीबीआई के सुपूर्द कर दिया। सरकार के इस फैसले पर लोगों को हैरानी हो सकती है...हुई भी। मगर रेत के नाम पर सूबे में जो खेल चल रहा, उसमें सरकार की बदनाम हो रही और मंत्री, मिनिस्टर, नेताजी लोग मौज काट रहे। असल में, कोरिया हत्याकांड में दोनों पक्ष रुलिंग पार्टी से जुड़ा हुआ है। इसमें अगर पुलिस जांच करती तो अनेक सवाल खड़े होते। अलबत्ता, सिस्टम के पास इनपुट्स ये भी थे कि रायपुर में बैठे कई नेता, मंत्रीजी जिलों में रेत माफियाओं को खुला संरक्षण दे रहे हैं...बकायदा जिला तक बांट लिया गया है...यहां हमारा आदमी, वहां आपका। सरगुजा में जो रेत का खेल चल रहा, उसमें भी रायपुर के कनेक्शन से इंकार नहीं किया जा रहा। वहां संघर्ष की स्थिति इसलिए बन रही कि रायपुर वाले चाहते हैं हमारे आदमी को संरक्षण मिले और लोकल नेता चाहते हैं कि उनके आदमी रेत का काम करें। पक्ष-बिपक्ष के विधायकों के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही, सो अलग। इससे सरगुजा की लॉ एंड आर्डर की स्थिति बिगड़ती जा रही। लिहाजा, राज्य सरकार ने रेत माफियाओं के खेल पर ब्रेक लगाने तिहरे मर्डर कांड को सीबीआई को सौंप दिया। मुमकिन है, सीबीआई की तफ्तीश में कई बड़े खुलासे होंगे, तो कई बड़े नाम लोगों को चौंका सकते हैं।

गरीब विधायक, गरीब अफसर

मुख्यमंत्री रहने के दौरान अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ के संदर्भ में एक स्लोगन दिया था...'अमीर धरती के गरीब लोग।' अब इस स्लोगन को बदल 'अमीर धरती के गरीब विधायक, गरीब अफसर' करना पड़ेगा. वो इसलिए कि छत्तीसगढ़ के विधायक, अफसर ऐसे गरीब होते चले गए कि बिना सरकारी जमीन के मकान नहीं बना सकते. हर विधानसभा के विधायकों को जमीन चाहिए तो हर बैच के आईएएस अफसरों को. ऐसे में सवाल उठता है...आखिर कब तक विधायकों और अफसरों को घर बनाने बेशकीमती जमीनें मुहैया कराई जाती रहेगी? कहीं पर भी तो इसका एंड होगा? प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि गरीब विधायकों और अफसरों पर तरस खाते हुए सरकार ने कौड़ियो के मोल प्लॉट दिया, तो उसमें घर क्यों नहीं बनाए गए? अनेक लोगों ने उसे बेच क्यों दिया? जो अधिकारी यहां से रिटायर होकर या किसी अन्य वजहों से बाहर चले गए, उनकी बात अलग है, जो छत्तीसगढ़ में है, उनमें भी ऐसे लोगों की संख्या बड़ी है, जो सरकार से जमीन तो ली मगर उसे कई गुना अधिक रेट में सेल कर दिया। ऐसे में, सिस्टम को विचार करना चाहिए कि सरकारी जमीनों को इन्वेस्टमेंट के लिए देना कितना जरूरी है।

चीफ जस्टिस और नैतिकता

अफसरशाही ने बड़ी चतुराई से अधिकारियों को प्लॉट देने से पहले ज्यूडिशिरी से नाम मांगा था। ताकि, मामला कोर्ट-कचहरी में जाए, तो उसका इंतज़ाम रहे। इसके लिए हाई कोर्ट को पत्र लिख लिस्ट मांगी गई। मगर चीफ जस्टिस रमेश सिनहा ने सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला देकर फाइल को आगे बढ़ने से रोक दिया। उन्होंने लिखा...सुप्रीम कोर्ट ने चूकि रियायत दर पर 'किसी को भी' जमीन देना अवैधानिक बताया है, इसलिए न्यायपालिका के लोगों को इससे बचना चाहिए। चीफ जस्टिस का यह फैसला न्यायपालिका के लोगों को कैसा लगा, ये नहीं पता। लेकिन, इस चक्कर में अफसरों का प्लॉट आबंटन भी रुक गया। राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर जोर-जुगाड़ लगाकर इससे पहले सेरीखेड़ी के प्राइम लोकेशन पर प्लॉट लेने में जरूर कामयाब हो गए। जाहिर है, सरकारी प्लॉट विशुद्ध रूप से इंवेस्टमेंट का एक तरीका होता है। कोई उसमें मकान बनाता नहीं। चूकि, सरकारी कॉलोनियों में सड़क समेत मूलभूत सुविधाएं अच्छी होती है...पानी, बिजली और रोड का काम फोकट में हो जाता है, मगर लोकेशन बढ़ियां होने से रेट अच्छा मिल जाता है। वीआईपी रोड के पास धरमपुरा में 200 रुपए फुट में जमीन मिली थी। अब 4000 में बेच रहे हैं। प्लॉट भी छोटा-मोटा नहीं। चार-चार हजार साइज का। अफसर अगर प्रभावशाली तो इससे बड़े साइज का भी हथिया लिए।

बस्तर में नया नक्सलवाद

बस्तर का अपना समृद्धशाली इतिहास रहा है। मगर यह विडंबना है कि माओवादियों के जमाने से ही यह तीन विचारधाराओं में बंटना प्रारंभ हो गया था। पहला वे आदिवासी, जो अपने को हिन्दू मानते हैं। दूसरा, जो आदिवासी तो हैं मगर अपने को हिन्दू नहीं मानते। और, तीसरा धर्म बदल आदिवासी से ईसाई बने लोग...खासकर, कांकेर, नारायणपुर इलाकों में इनका प्रभुत्व है। कई बार इसको लेकर वर्ग संघर्ष और हिंसा तक भड़क चुकी है। ताजा अपडेट यह है कि नक्सलवाद के खात्मे के बाद एक खास विचारधारा के लोग लोकल और बाहरी बस्तरिया केे नाम पर अपनी रोजी-रोटी का बंदोबस्त करने में जुट गए हैं। खुफिया रिपोर्ट है, दंतेवाड़ा और उसके आसपास करीब आधा दर्जन छोटी घटनाएं हुई, उसे सीधे लोकल और बाहरी से जोड़कर उत्पात मचाने का प्रयास किया गया। मसलन, स्कूटर दुर्घटना को भी बाहरी से जोड़ डाला। नक्सलवाद के बाद यह प्रभुत्व कायम करने की नई कोशिशें है, सरकार को इस खुफिया रिपोर्ट को गंभीरता से लेनी चाहिए। क्योंकि, बस्तर में नए सिरे से डेवलपमेंट कार्य शुरू होना है...केंद्रीय गृह मंत्री का दावा है कि बस्तर को देश का सबसे समृद्ध आदिवासी संभाग बनाया जाएगा। मगर लोकल-बाहरी का चक्कर आया तो फिर यह नामुमकिन हो जाएगा।

नौकर-चाकर वाला बंगला

रमन सरकार के दौर में सरकारी बंगले में 40 एसी लगाने को लेकर चर्चित हुए बीजेपी के एक सीनियर नेता को पिछली कांग्रेस सरकार में जीएडी कॉलोनी में एक बड़ा, विशाल बंगला अलॉट हुआ था। हालांकि, उसमें वे कभी रहे नहीं, उन्हें ईश्वर ने इतना दिया है कि उन्हें वहां रहने की जरूरत भी नहीं। आईएएस, आईपीएस कॉलोनी के इस बंगले में पिछले साढ़े सात साल से नेताजी के नौकर-चाकर रह रहे हैं। और, रात में कई बार इतना हुड़दंग मचा डालते हैं कि आसपास के लोगों की शामत आ जाती है। पिछली सरकार में नेताजी की पहुंच इतनी तगड़ी थी कि कोई मुंह नहीं खोल सकता था और अब तो बीजेपी की ही सरकार है। वहां रहने वाले अधिकारियों को अब निहारिका बारिक से उम्मीद बनी है। सरकार ने उन्हें गृह विभाग की जिम्मेदारी सौंपी है। निहारिका रहती भी वहीं...जीएडी कॉलोनी में। और उन्हीं के विभाग में संपदा भी आता है। सो, हो सकता है, हिम्मत जुटाकर वे मकान खाली करा लें।

प्लेसमेंट, करप्शन और बदनामी

छत्तीसगढ़ के सरकारी सिस्टम में पिछले एक दशक में बड़ा चेंज आया है। खासतौर से मुलाजिमों के मामले में। सूबे में ऐसा कोई महकमा नहीं, जहां 10, 20, 50 कर्मचारी प्लेसमेंट के नहीं। कुछ विभागों में तो पूरा सेक्शन-का-सेक्शन प्रायवेट लोगों के हाथों में है। जाहिर है, प्लेसमेंट एजेंसियों के जरिये कर्मचारियों के रखने से सरकार के खजाने पर ज्यादा लोड नहीं पड़ रहा मगर यह भी सही है कि छत्तीसगढ़ में करप्शन बढ़ने का एक कारण प्लेसमेंट एजेंसियां हैं। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं। कारपोरेट के इस दौर में भी सरकारी नौकरियों का अपना आकर्षण है। वो चाहे डेली वेजेज या प्लेसमेंट की ही क्यों न हो। समाज में उसका अपना रुतबा होता है। सम्मानजनक ढंग से शादी-ब्याह हो जाता है। प्लेसमेंट एजेंसियां इसी का फायदा उठा रहीं। एक विभाग में भर्ती के लिए एजेंसी दो से पांच लाख वसूल रही हैं।

अब, जरा बताइये, जो लोग कई लाख देकर प्लेसमेंट में नौकरी करने आएंगे तो वे गरिमा और मर्यादा थोड़े ही देखेंगे। उन्हें अपना मूलधन भी तो निकालना है। अब तो आलम यह है कि रुटीन फाइल को सरकाने के लिए भी पैसों की डिमांड की जा रही। सरकार ने सिस्टम को भले ही ऑनलाइन कर दिया है मगर आज भी एक बड़े वर्ग की निर्भरता च्वाइस सेंटरों पर ज्यादा है। सरकार ने राजस्व में बड़ा रिफार्म किया है। मगर राजस्व विभाग के एक छोटे से काम के लिए च्वाइस सेंटर जाइये, वहां बैठा आदमी कहेगा, इतना पैसा तहसील कार्यालय के फलां का और इतना मेरा। अब आम और गरीब आदमी कहां इसकी शिकायत करने जाएगा। मगर वो मन में सिस्टम की यही छबि लेकर जाएगा कि कहा कुछ जाता है, होता कुछ है। कायदे से सरकारी नुमाइंदों को प्लेसमेंट एजेंसियों की भर्ती पर नजर रखने कोई सिस्टम बनाना चाहिए। इससे न बेरोजगार लूटे जाएंगे और न इतना करप्शन बढ़ेगा। लेकिन, इस पर बड़े स्तर पर निर्णय लेने होंगे क्योंकि, सिस्टम में बैठे लोग ही इन प्लेसमेंट एजेंसियों को पाल रहे।

लाखों की नौकरी

चूकि सरकारी भर्तियां लगभग बंद हैं इसलिए प्लेसमेंट के नाम पर गजबे खेल हो रहे हैं। कई विभागों में बिना कोई प्रक्रिया के कई-कई लाख मासिक पगार पर भर्तियां की जा रही। प्लेसमेंट में आपको 10 हजार से लेकर पांच लाख वेतन तक आदमी मिल जाएंगे। कई विभागों में स्थिति यह है कि वहां मैनपावर होने के बाद भी करोड़ों के काम प्रायवेट एजेंसियों को दिए जा रहे ताकि उससे अपना हित सध सकें। कर्मचारियों की संख्या में भी बड़ा झोल है। जितनी संख्या में कर्मचारी मुहैया कराने की करार होती है, कुछ विभागों में काफी कम संख्या में लोग काम कर रहे मगर पैसा पूरे का पेमेंट किया जा रहा। याने कागजों में कर्मचारी...।

ब्यूरोक्रेसी के हेल्थ गुुरू

छत्तीसगढ़ के सिकेट्री रैंक के आईएएस अवनीश का इंस्टाग्राम पर बॉडी ट्रांसफार्मेशन की फोटो आई है, तब से हेल्थ और फिटनेस के फील्ड में सनसनी मची हुई है। देश के नेशनल मीडिया में भी यह खबर सुर्खिया बटोरी...इसे फिटनेस और हेल्थ गोल्स की एक नायाब केस स्टडी बताई जा रही। जाहिर है, कौन नहीं चाहता कि उसका हेल्थ अच्छा रहे...वो भी आज के दौर में। हालांकि, खुद अवनीश ने भी नहीं सोचा होगा कि इंस्टाग्राम की बॉडी ट्रांसफार्मेशन वाली फोटो गजब ढा देगी। उनके पास देश भर से फोन आ रहे...अनेक सवाल पूछे जा रहे...कैसे किए...किस जिम में जाते हो...कौन सा प्रोटीन सेक लेते हैं...डाइट क्या है? अलबत्ता, मुमकिन यह भी है, कई हेल्थ सप्लीमेंट्स कंपनियां भी उनसे संपर्क करने का प्रयास करें। अच्छा है। अवनीश ने अपना एक फील्ड और तैयार कर लिया। जनवरी 2042 में रिटायर होने के बाद हेल्थ गुरू बनने का विकल्प उनके सामने रहेगा।

आईएएस का बड़ा बैच

छत्तीसगढ़ में 2019 बैच के सभी आईएएस कलेक्टर बन गए। 6 मई को सात जिले के कलेक्टर बदले गए थे, उनमें इस बैच के विश्वदीप और रैना जमील को भी जिले में पोस्टिंग मिल गई। स्वाभाविक है, अब 2020 बैच का कलेक्टर बनना प्रारंभ होगा। 2020 बैच छत्तीसगढ़ का अब तक का सबसे बड़ा बैच हैं। इसमें आठ आईएएस हैं। हालांकि, 2019 बैच में आठ प्रमोटी आईएएस भी हैं। अब देखना है, सरकार 2019 के प्रमोटी आईएएस में से एकाध को पहले मौका देगी या फिर 2020 बैच शुरू कर देगी। चूकि 20 बैच सबसे बड़ा है, लिहाजा इस साल खाता भले खुल जाए मगर कंप्लीट होना नामुमकिन है। अगले साल मई-जून तक जाकर ये बैच कलेक्टरी में पूरा हो पाएगा। तब तक वेट करना पड़ेगा.

पोस्टिंग और मिम्स

आईएएस जयंत नाहटा को पिछली सरकार में दंतेवाड़ा का एसडीएम बनाया गया था। उसके बाद वहां तीन कलेक्टर बदल गए। विनीत नंदनवार के समय एसडीएम की पोस्टिंग हुई थी। उसके बाद मयंक चतुर्वेदी, कुनाल दुदावत और अब देवेश ध्रुव कलेक्टर हैं। मगर एसडीएम नहीं बदले। अब वे वहीं पर जिला पंचायत सीईओ हैं। दंतेवाड़ा में इस पर खूब मिम्स बनाए जा रहे, एसडीएम, सीईओ के बाद क्या नाहटा दंतेवाड़ा में ही कलेक्टर बनाए जाएंगे। हालांकि, नाहटा ही नहीं, कई जिला पंचायत सीईओ का तीन साल से ऊपर हो गया है. राज्य प्रशासनिक सेवा में भी ऐसे कई दृष्टांत है...कई अफसर चार साल से एक ही जगह पर बोर हो गए हैं। विधानसभा चुनाव 2023 के समय जिनका दो बरस पूरा नहीं हुआ था, वे ट्रांसफर से बच गए थे। इसके बाद सरकार उन्हें भूल सी गई. जाहिर है, बेहतर रिजल्ट के लिए टाईम पर अफसरों का रोटेशन होते रहना चाहिए।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या ये सही है कि विपक्ष की कुछ जिम्मेदारी बीजेपी के नेता निभा दे रहे हैं?

2. कुर्सी बचाने के लिए किस मंत्री ने कामख्या के एक तांत्रिक से बकरा बलि अनुष्ठान कराया है?

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