तरकश, 27 सितंबर 2026
संजय के. दीक्षित
पितृ पक्ष में...या देवी सर्व भूतेषु
पितृ पक्ष में छत्तीसगढ़ के मंत्री अगर दुर्गा सप्तशती का पाठ करने लगे, तो समझा जा सकता है, उनकी मनोदशा कैसी होगी। दरअसल, बीजेपी ने 24 घंटे के भीतर डबल सर्जिकल स्ट्राइक करते हुए संगठन महामंत्री, क्षेत्रीय संगठन महामंत्री को बदलते हुए प्रदेश प्रभारी भी नया पोस्ट कर दिया। वो भी स्मृति ईरानी जैसी। ऐसे में, पित्तरों की पूजा कौन करें...मंत्रीगण नवरात्रि से पहले ही...या देवी सर्व भूतेषु...का पाठ शुरू कर दिए हैं। दरअसल, ढाई साल तक बेलगाम रहे अधिकांश मंत्री अब बड़े सहमे हुए हैं...आखिर, अगला नंबर उन्हीं का आने वाला है। वो तो भला हुआ...पितृ पक्ष आ गया, वरना किसी भी दिन राजभवन में शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया जा सकता था। बहरहाल, जिस तरह से बीजेपी हाईकमान ने तेवर दिखाया है, उससे कोई आश्चर्य नहीं कि मंत्रियों में आधे-से-अधिक चेहरे बदल जाएं। अत्यधिक संभावना है, बीजेपी अब दिवाली का वेट ना करें। सियासी पंडितों भी मानते हैं...बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने छत्तीसगढ़ को लेकर जिस तरह की गंभीरता दिखाई है, दिवाली से पहले मंत्रियों से इस्तीफा मांग लिया जाए तो हैरत नहीं। जाहिर है, मंत्रिमंडल के पुनर्गठन मेदो-से-तीन पुराने मंत्रियों को मौका मिल सकता है। लास्ट दिसंबर में बस्तर के एक सामान्य वर्ग के नेता का नाम मंत्री बनने के लिए बड़े जोर से चला था। मगर बदले राजनीतिक समीकरण में अब अमर अग्रवाल, अजय चंद्राकर और राजेश मूणत जैसे पूर्व मंत्रियों में से कुछ के भाग्य बदल जाए, तो ताज्जुब नहीं। अमर तो दिसंबर 2025 में ही शपथ ले लिए होते, मगर किन्हीं अदृश्य हाथों ने बस्तरिया नेता का नाम आगे बढ़ा अमर के रास्ते में दीवार खड़ा कर दिया था। ऐसा इसलिए हुआ कि उस दौर में यस मैन चाहिए था। बहरहाल, चर्चाएं ये भी है कि अगर सामूहिक इस्तीफा हुआ तो फिर डिप्टी सीएम का कंसेप्ट खतम हो जाएगा। क्योंकि, हाई कमान अब राज्यों में सिंगल पावर सेंटर पर जोर दे रहा। और अगर चार-पांच मंत्रियों के इस्तीफे लिए गए तो फिर डिप्टी सीएम कंटीन्यू करते रहेंगे। कुल मिलाकर आधे-से-अधिक मंत्री दिवाली ठीक से मना पाएंगे...इस पर संशय है।
सवाल करोड़ों का
बीजेपी के संगठन में स्ट्राइक के बाद जाहिर है, सूबे में मंत्रियों की पूछपरख प्रभावित होगी! क्योंकि, भाजपा हाईकमान के रुख देखकर लोग अब मान बैठे हैं कि मंत्रिमंडल में सर्जरी अब किसी भी वक्त हो सकता है। यही वजह है खासकर ठेकेदार, सप्लायर अब थोड़ा डिस्टेंस मेंटेन करने लगे हैं। आज ही एक ठेकेदार को एक मिनिस्टर से मिलना था, बताते हैं, उसने बेंगलुरु जाने का बहाना बनाकर आगे का टाईम मांग लिया। उधर, दिवाली से पहले मंत्रिमंडल में सर्जरी हो गई तो सरकारी मुलाजिमों के करोड़ों रुपए डूब जाएंगे। क्योंकि, आजकल हंड्रेड परसेंट एडवांस का जमाना चल रहा, और मनचाही पोस्टिंग के लिए ंबड़ी संख्या में पेमेंट हो चुके है। असल में, मंत्रिमंडल में सर्जरी के साथ व्यापक तौर पर विभाग भी बदलेंगे। अब स्मृति ईरानी और कर्मवीर सिंह मिलकर विभाग तय करेंगे और दिल्ली उस पर मुहर लगाएगा। ऐसे में, आश्चर्य नहीं कि मलाईदार विभाग वाले मंत्रियों के पास छोटे विभाग आ जाए और काबिल मंत्रियों के पास बड़े विभाग। तो कामों के लिए जो करोड़ों रुपए एडवांस हैं, वे तो डूबेंगे ही।
मोदी की च्वाइस?
2023 के विधानसभा चुनाव में पीएम नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ में नौ सभाएं की थी...एक तरह से उन्होंने छत्तीसगढ़ को मथ दिया था। तब जाकर बीजेपी की सरकार बन पाई। वरना, बीजेपी नेता भूपेश बघेल के सामने इलेक्शन से पहले ही बैकफुट पर आ गए थे। खैर, पिछले ढाई बरसों से केंद्रीय खुफिया एजेंसियां जिस तरह से लगातार रिपोर्टिंग कर रही थी, पीएमओ यहां की स्थितियोें से नावाकिफ नहीं था। उधर, पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन के पास सारे मंत्रियों की रिपोर्ट्स पहुंच ही रहे थे। दिल्ली के सूत्र बताते हैं कि स्मृति ईरानी को छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाने में पीएम मोदी की हरी झंडी रही। छत्तीसगढ़ पीएम मोदी की प्रायरिटी में तो है ही, जेन जी आंदोलन के बाद मोदी अधिकांश चीजों को अब खुद वॉच कर रहे हैं। अहम मामलों की बैठकें अब वे स्वयं ले रहे। कुछ रोज पहले हुई मीटिंग में अधिकारी प्रोजेक्टर पर जब हर पेज में मोदी की फोटो और उनका गुणगान दिखा रहे थे, तो उन्होंने टोक दिया...फोटो-होर्डिग्स पर ज्यादा फोकस मत कीजिए, जनता इसे पसंद नहीं करती...जनता को काम चाहिए। कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है कि मोदी की च्वाइस से अगर स्मृति ईरानी छत्तीसगढ़ आई है तो फिर वे क्या करेंगी, समझा जा सकता है।
रोचक मुकाबला
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद 2001 से 2003 तक की राजनीति बड़ी दिलचस्प थी। मुख्यमंत्री अजीत जोगी और विद्याचरण शुक्ल सरीखे राजनीतिक योद्धा तो थे ही, तो मूंछो पर ताव देने और शेरो-शायरी से महफिल लूटने वाले दिलीप सिंह जूदेव भी रहे। लिहाजा, मीडिया को ब्रेकिंग और फ्रंट पेज की लीड की चिंता नहीं रहती थी। मगर उसके बाद के बरसों में सूबे में वैसी राजनीतिक गरमाहट रही नहीं। रमन सिंह 15 साल सीएम रहे, मगर विपक्ष खतम जैसा रहा। भूपेश बघेल जब मुख्यमंत्री बने तो रमन सिंह के अलावा बीजेपी के सारे पूर्व मंत्री, नेता शुतुरमुर्ग जैसी स्थिति में पहुंच गए थे...और आज जब भूपेश पूर्व हो गए हैं तब भी स्थिति ज्यादा बदली नहीं है। मगर अब स्मृति ईरानी के प्रदेश प्रभारी बनने से ऐसा प्रतीत होता है कि अब मुकाबला दिलचस्प और बराबरी का रहेगा। इधर स्मृति, उधर भूपेश। किसी भी मसले पर बोलने और प्रहार करने में दोनों का कोई जोर नहीं। स्मृति ईरानी तो वैसे भी प्रखर वक्ता हैं। उनकी जब नियुक्ति हुई तो भूपेश बघेल का बयान आया था, वो घायल शेरनी...। हालांकि, बीजेपी वालों का कहना है...घायल शेरनी ज्यादा आक्रमक हो जाती है। बहरहाल, ये तो तय है...मीडिया को अब राजनीतिक खबरें खुब मिलेंगी।
24 घंटे में परसेप्शन बदला
बीजेपी नेतृत्व ने छत्तीसगढ़ में ऐसा सर्जिकल स्ट्राइक किया कि 24 घंटे में परसेप्शन की रेटिंग अचानक लो से हाई हो गई। उससे पहले खुद बीजेपी के लोग मान रहे थे कि 2028 का विधानसभा चुनाव आसान नहीं होगा। मगर पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को प्रदेश प्रभारी बनाने के बाद परसेप्शन में हैरान करने वाला चेंज आया है। आम आदमी भी अब मान रहा कि बीेजेपी जिस मोड में आई है, उससे काफी चीजें बदलेंगी और ओपोजिशन के लिए अब एकतरफा जैसे परसेप्शन नहीं रहेंगे।
आईएएस की एक लिस्ट
प्रशासनिक गलियारों में आईएएस अधिकारियों की एक छोटी लिस्ट निकलने की चर्चाएं बड़ी तेज हैं। हालांकि, कहां-कहां, किस-किस जगहों पर बदलाव होगा...लिस्ट में कितने अफसर शामिल होंगे, ये अंदर की बात है। मगर सब कुछ ठीक रहा तो एक लिस्ट अवश्य आ सकती है।
कलेक्टर, एसपी से हारा हाई कोर्ट?
यूपी के बलरामपुर में डीजे की तेज आवाज से स्कूल में एक सात साल की बच्ची का मौत हो गई तो छत्तीसगढ़ में...अंबिकापुर में डीजे की तेज आवाज से अस्पताल में भर्ती एक प्रसूता की तबियत इतनी बिगड़ गई कि डॉक्टरों को उसका बीपी नार्मल करने में चार-पांच घंटे लग गए। छत्तीसगढ़ में इससे पहले डीजे से हर्ट अटैक की घटनाएं भी हो चुकी हैं। बिलासपुर हाई कोर्ट में करीब पांच-सात साल से केस चल रहा है। हाई कोर्ट ने 2022 में दो टूक कह दिया था कि डीजे अगर बजा तो जिले के कलेक्टर, एसपी जिम्मेदार होंगे। कोर्ट ने तत्कालीन चीफ सिकेट्री अमिताभ जैन से इस पर हलफनामा भी मांगा था। मगर बात आई-गई, चली गई। कोर्ट में जब भी पेशी का वक्त आता है, गृह विभाग खानापूर्ति के लिए रिव्यू बैठक करता है और कोर्ट में बताता है...सरकार जल्द ही कोलाहल कंट्रोल अधिनियम लाने जा रही है। मगर चार साल से अधिक वक्त गुजर गया, कोलाहल अधिनियम किधर है, किसी को पता नहीं। कलेक्टर, एसपी को अपनी कुर्सी सुरक्षित रखनी है, इसलिए किसी को कार्डियक अरेस्ट हो जाए, या फिर मौत...इससे उन्हें क्या वास्ता। उधर, पिछली सरकार में एक मंत्री जी को डीजे वालों की रोजी रोटी की चिंता सताती थी, तो इस सरकार में एक मंत्री जी ने बयान दिया...बिना डीजे का गणेश विसर्जन कैसे होगा? अब जब सिस्टम ही नहीं चाहता कि डीजे बंद हो तो हाई कोर्ट क्या कर सकता है।
मंत्री जी, गरीबों को कैंसर क्यों?
एक समय था, जब कैंसर जैसी घातक बीमारी मीडिल या अपर मीडिल क्लास वालों को ज्यादा होती थी। मगर छत्तीसगढ़ के कैंसर अस्पतालों के ओपीडी और वार्डों का सीन देखेंगे तो आप हिल जाएंगे। उसके बाद आपको समझ में आएगा कि रायपुुर जैसी बी क्लास की सिटी में महीने भर के भीतर दो-दो कारपोरेट कैंसर अस्पताल कैसे खुल गए। बता दें, रायपुर में एक दशक पहले तक कैंसर का एक भी प्रायवेट हॉस्पिटल नहीं था, इस समय छह अस्पताल सिर्फ कैंसर के हैं। इस स्तंभकार को रायपुर के एक जाने-माने अंकोलॉजिस्ट ने बताया, वो चौंकाने वाला था...छत्तीसगढ़ में 85 परसेंट से अधिक कैंसर गरीबों को हो रहे। उसमें भी आधे से अधिक मुंह, गले या फेफड़े का कैंसर। इसकी वजह है, पाउच-गुटखा बनाने वाली कंपनियां धड़ल्ले से उसमें जहरीला मैगनेशियम कार्बोनेट मिला रही। मैगनेशियम कार्बोनेट इसलिए मिलाया जाता है कि गुटखा की लाइफ बढ़े, आपस में चिपके मत और गले में ठंडक महसूस हो। अब इसमें आगे की खबर यह है कि इन गुटखा कंपनियां की जांच और सेंपल लेने का काम जिस ड्रग विभाग के पास है, पिछले तीन साल से किसी का भी सेंपल नहीं लिया है। ड्रग विभाग के पास सेंपल लेने वाले 63 अधिकारियों का अमला है, मगर उन्हें सख्त हिदायत है कि गुटखा कंपनियों तरफ झांकना नहीं है। पिछले तरकश में इसका जिक्र करने पर पता चला है, दो दिन पहले एकाध छोटी कंपनियों पर दबिश दी गई है। बहरहाल, हेल्थ मिनिस्टर और हेल्थ सिकेट्री को इसकी जांच करानी चाहिए कि गरीबों को ही कैंसर क्यों? और फिर ड्र्रग विभाग भी इन्हीं के अंदर आता है। अगर पान मसालों पर जहरीला पदार्थ मिलाने से मंत्री और सिकेट्री रोक देंगे तो छत्तीसगढ़ की गरीब जनता का उन्हें बड़ा पुण्य मिलेगा।
घाटे का फेडरेशन
लघु वनोपज संघ कभी साल का 500 करोड़ से अधिक नफे में रहता था। इलेक्शन के दौरान आदिवासी इलाकों में चरण पादुका से लेकर साड़ी, कंबल आदि चीजें ऑफिसियल बांटे जाते थे, इस नाम पर कि जंगलों में वास करने वालों को सहूलियतें मुहैया कराई जा सकें। मगर वोट बैंक की राजनीति का नतीजा यह हुआ कि पिछले एक दशक में सरकार का अर्निंग वाला लघु वनोपज संघ अब घाटे में आ गया है। सरकार को पैसे देने वाले इस संघ को उल्टे 200 करोड़ देने पड़े हैं। ये स्थिति इसलिए आई कि तेंदूपत्ता संग्रहण का रेट 4 हजार से बढ़ते-बढ़ते 5500 प्रति बोरे तक पहंुच गया। जबकि, वह बिकता काफी कम में है। जानकारों का कहना है, करीब 50 परसेंट से अधिक तेंदूपत्ते की क्वालिटी इतनी खराब होती है कि पांच सौ-छह सौ में बिकता है। यानी 5500 रुपए पेंमेंट कर 600 में बेचना, तो ये करोेड़ों रुपए मुनाफे वाले फेडरेशन को घाटे में आना ही था।
ठाकुर लॉबी
ऐसी चर्चा है कि क्षेत्रीय संगठन महामंत्री के लिए सौदान सिंह का नाम भी चला था। मगर वो हुआ नहीं। ऐसा भी हो सकता है, वे दोबारा छत्तीसगढ़ आना नहीं चाहते होंगे। इसलिए शिवप्रकाश को छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी दी गई। अलबत्ता, संगठन मंत्री कर्मवीर सिंह छत्तीसगढ़ आ रहे, वे यूपी के ठाकुर हैं। कर्मवीर सिंह भले ही जात-पात में विश्वास नहीं रहते होंगे, मगर उनके नाम से बीजेपी की ठाकुर लॉबी गदगद है।
पीएससी फेल आईएएस पर भारी
पिछले तरकश में सिस्टम में प्रायवेट कंसलटेंट की दखलंदाजी का जिक्र किया गया था। उसके बाद कई आईएएस लोगों को बता रहे...ये चार-पांच लाख वेतन पाने वाला बंदा नहीं होता तो प्रोजेक्ट का काम नहीं होता। दिलचस्प यह है कि उनमें से जो कोट-टाई बांध कर कंसलटेंट बने घूम रहे, वे यूपीएससी तो छोड़ि़ये, पीएससी नहीं निकाल सके। मगर अफसरों को कुतर्क कर कंसलटेंसी से काम कराना है तो क्या ही कहा जा सकता है। अब ये नौकरशाह कंसलटेंट की हिमायत क्यों कर रहे, उसके पीछे भी मजेदार खेल है। कंसलटेंट कंपनियां जिनकी तनख्वाह चार-से-पांच लाख रुपए बताती है, उसमें से मुश्किल से उन्हें एकाध लाख मिलता है, बाकी पैसा कैश में कंपनियों को वापिस हो जाता है। फिर कितने अधिकारी और कर्मचारी काम कर रहे, उनकी संख्या में भी बड़ा गोलमाल होता है। इस कंसलटेंसी के खेल में अफसरों को मोटी रकम एकमुश्त मिल जाती है। बिना किसी जोखिम के। हालांकि, हाउसिंग बोर्ड के एमडी अवनीश शरण ने बड़़ी कार्रवाई करते हुए प्लेसमेंट एजेंसी को निरस्त कर दिया, उसकी सिक्यूरिटी मनी भी जब्त कर ली। जांच में पता चला कि प्लेसमेंट एजेंसी मुलाजिमों को पूरे पैसे नहीं दे रही थी। और जो जमा राशि थी, उसे भी लटका रखी थी। चीफ सिकेट्री को कंसलटेंट की उपयोगिता पर एक रिव्यू करना चाहिए, क्योंकि जो काम सरकारी सिस्टम में बैठे लोग कर सकते हैं, उसके लिए करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाया जा रहा। जो काम 50 से 75 हजार के आदमी से कराया जा सकता, उसके लिए चार-चार, पांच-पांच लाख फेंके जा रहे। और इनमें से अधिकांश बड़े अफसरों के नाते-रिश्तेदार होते हैं। कोई भी विभाग इस खेल से अछूता नहीं है।
हफ्ते का कोट
'सफलता वह नहीं है...जब दुनिया आपकी प्रशंसा करें। सफलता तब है...जब वर्षों के संघर्ष के बाद भी, आपके भीतर का मनुष्य जीवित रहे, क्योंकि शिखर तक पहुंचना कठिन है, पर वहां पहुंचकर स्वयं को बचाए रखना, उससे भी कठिन।'
अंत में दो सवाल आपसे?
1. क्या स्मृति ईरानी और कर्मवीर सिंह के आने के बाद मंत्रियों द्वारा डंके की चोट पर पोस्टिंग के लिए बोली लगाई जाती है, उस पर रोक लगेगी?
2. पार्टी को चंदा देने की आड़ में किन-किन मंत्रियों ने मंत्री पद की गरिमा को ताक पर रख आरगेनाइज लूट मचा दी है?
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