रविवार, 4 अक्टूबर 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: 18 बरस का 'तरकश'



संजय के दीक्षित

तरकश, 4 अक्टूबर 2026

18 बरस का 'तरकश'

NPG.NEWS वेबसाइट का सबसे लोकप्रिय साप्ताहिक स्तम्भ 'तरकश' ने अपने सफर के 18 बरस पूरे कर लिया है. 2008 में हरिभूमि समाचार पत्र में इस स्तंभ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था। जाहिर है, किसी भी स्तंभ के लिए सबसे जरूरी होती है उसकी निरंतरता। 'तरकश' ने इस पैरामीटर पर खरा उतरने का पूरा प्रयास किया। इन 18 बरसों में बड़े कम मौके आए...जब विषम परिस्थितियों में तीर नहीं चल पाए। वरना...छत्तीसगढ़ में रहे, या छत्तीसगढ़ से बाहर, कॉलम का क्रम टूटा नहीं। इस डेढ़ दशक के लगातार सफर का क्रेडिट जाता है छत्तीसगढ़ के उन लाखों सुधि पाठकों को, जिनका भरोसा समय के साथ और मजबूत होता चला गया। हर रविवार...पाठकों के घनघनाते फोन और मैसेज ने प्रेरित किया कि कठिन हालातों में भी ’तरकश’ कभी रुकना नहीं चाहिए। और वैसा ही हुआ। 2008 में यह स्तंभ प्रारंभ हुआ, उसके बाद चार विधानसभा चुनाव हुए। सरकारें बदली। सिस्टम बदला। मगर स्तंभ न रुका, न तेवर बदला। यह एक तपस्या की तरह रहा। पर्सनल राग-द्वेष से बिल्कुल दूर। इस चक्कर में कई बार अपने भी आहत हुए...दुखी हुए। मगर फिर जुड़ गए। क्योंकि मंशा साफ थी। बहरहाल, किसी एक अखबार में किसी कॉलम की 18 बरस याने डेढ़ दशक की यात्रा कम नहीं कही जा सकती। जाहिर है, 2008 में जन्मे बच्चे आज वोटर हो गए हैं। जब यह स्तंभ प्रारंभ हुआ, तब संवाद प्रेषण का जरिया सिर्फ एसएमएस था...और थोड़ा बहुत फेसबुक। व्हाट्सएप का अविष्कार नहीं हुआ था। इस अनवरत सफर के लिए हरिभूमि पत्र समूह और उसके प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी को आभार...जिन्होंने 'तरकश' जैसे प्रहारक स्तंभ के लिए अपना प्लेटफार्म उपलब्ध कराया। आभार छत्तीसगढ़ के उन लाखों 'सुधि पाठकों' का भी...जिनकी बदौलत 'तरकश' का सफर अविराम जारी है।

पब्लिक के हक पर डाका!

बात 14 साल बरस पुरानी है। 2012 की। राजधानी रायपुर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए भारत सरकार से 100 बसें मिली थीं। उसी दौरान...यही कोई अक्टूबर का महीना होगा। मंत्रालय और विभागाध्यक्ष कार्यालय रायपुर से नवा रायपुर में शिफ्थ किए जा रहे थे। सिस्टम ने पब्लिक के लिए मिली बसों को नवा रायपुर जाने वाले कर्मचारियों के लिए लगा दिया। तब शायद बेंगलुरू की कंपनी से कंट्रेक्ट यह हुआ था कि कर्मचारियों को नवा रायपुर ले जाने, ले आने के बाद बचे समय में रायपुर शहर में बसों को चलाई जाएगी, ताकि आम आदमी को उसका फायदा मिल सकें। कुछ दिन तक ऐसा हुआ भी, मगर बाद में कंपनी ने शहरों में बसें चलानी बंद कर दी। क्योंकि, कंपनी को जब कर्मचारियों को लाने-ले जाने पर ही भरपूर पैसा मिल जा रहा तो फिर आम आदमी की उसे परवाह क्यों होनी चाहिए। आजकल सारी बसें दिन भर मंत्रालय के आसपास ख़डी रहती हैं. हालांकि, अफसर कागजों में दावा करते हैं कि 20 बसें अभी भी शहर में चल रही मगर वो किधर चलती है, कभी किसी को दिखी नहीं। याने पब्लिक को मिली 100 बसों की सुविधा छीन गई।

तीन विभागों का घनचक्कर

कर्मचारियों के लिए बसें चलाने में तीन विभाग इंवाल्व हैं। सामान्य प्रशासन विभाग एनआरडीए को पैसा देता है। एनआरडीए ने बसों का संचालन का जिम्मा रायपुर नगर निगम को दे दिया है। अब आप बसों की शर्तों के बारे में जीएडी से पूछेंगे तो वह एनआरडीए पर डाल देगा और एनआरडीए के पास जाइयेगा तो वह नगर निगम से पूछिए। बताते हैं, जीएडी 2700 रुपए प्रति कर्मचारी के हिसाब से कंपनी को हर महीने इन बसों के लिए 90 लाख रुपए देता है। इस 90 लाख में कंपनी का काम सिर्फ ड्राईवर और फ्यूल का इंतजाम करना है। बाकी बसें तो भारत सरकारी से मिली है। इसमें ये भी एक लोचा है कि बड़ी संख्या में कर्मचारी नवा रायपुर में रहने लगे हैं और काफी संख्या में वे अपने साधन से आते हैं। मगर उन्होंने बस के पास सरेंडर नहीं किए हैं। दूसरा फ्री की बस सेवा सिर्फ सरकारी कर्मचारियों के लिएा थी, मगर प्लेसमेंट के कर्मचारी भी इस सरकारी सुविधा का लाभ उठा रहे। अब मुश्किल यह है कि 12 बरस में बसें कंडम होेती जा रही हैं। दो बार आग लगने की घटना हो चुकी है। सिस्टम उलझन में है कि नई बसें कैसे खरीदी जाए और फिर कर्मचारियों को और कितने साल तक फ्री ट्रांसपोर्ट की सुविधा मुहैया कराई जाए। दरअसल, इस पर सहमति नहीं बन पा रही। अफसरों के एक वर्ग का मानना है कि 14 साल फ्री सर्विस बहुत होता है...फिर अब तो नई राजधानी में आवास भी खाली पड़़े हैं। तो दूसरे वर्ग को लगता है फ्री सेवा बंद करने से कहीं कर्मचारी नाराज न हो जाएं। क्योंकि, सवाल तो उठेगा...करोड़ों का बंगला लेने के बाद भी मंत्री कौन सा नवा रायपुर में आकर रह रहे हैं।

अफसर को संविदा पोस्टिंग

राज्य बनने के 25 साल मेे यह दूसरी बार हुआ कि किसी ऑल इंडिया सर्विस के अफसर ने वीआरएस लिया और फिर से उसे संविदा पोस्टिंग मिल गई। पहली बार अमन सिंह को जब भारत सरकार ने डेपुटेशन को बढ़ाने से इंकार किया था, तो फिर उन्होंने वीआरएस ले लिया था। आईआरएस अफसर शीतल शाश्वत वर्मा के साथ भी ऐसा ही हुआ। सात साल तक डेपुटेशन पर रायपुर मंत्रालय में काम करने के बाद जब एक्टेंशन की गुंजाइश नहीं बची तो उन्होंने वीआरएस ले लिया। तब इसी स्तंभ में इस बात की ओर इशारा किया गया था कि कुछ दिन बाद वे संविदा पोस्टिंग में लौटेंगी और वैसा ही हुआ। शीतल को चीफ सिकेट्री ऑफिस में स्पेशल सिकेट्री का भी प्रभार दिया गया है। ये भी फर्स्ट टाईम हुआ है। डायरेक्टर आईएएस में भी दो ही महिला अफसर सीएस की ज्वाइंट सिकेट्री बनी हैं। पहले ईशिता राय और फिर रेणु पिल्ले। शीतल आईआरएस अफसर रही हैं। उन्हें उन दोनों से उपर स्पेशल सिकेट्री टू सीएस बनाया गया है।

सफेदपोश चोर

भिलाई स्टील प्लांट में लोहा चोरी की जांच के लिए सीबीआई पहुुंच गई है। इससे वहां के सफेदपोश नेताजी लोग हिल गए हैं। दरअसल, बीएसपी में प्रति दिन तीन-से-चार करोड़ की लोहा चोरी हो रही थी। याने महीने में करीब 100 से 120 करोड़ के। ये भी जान लें कि भिलाई में पिछले दो-ढाई दशक में जितने नेता बने हैं, उनमें 98 परसेंट से अधिक लोग लोहा चोरी में संलिप्त रहे। और जब बेशुमार दौलत बना लिए तो सफेद वस्त्र पहन पॉलिटिक्स में आ गए। राजनीति में आने के बाद वे लोहा चोरों को संऱक्षण दे रहे थे। हालांकि, भारत सरकार की इस स्टील कंपनी से रोज करोड़ों का लोहा पार करने मेें कंपनी के अधिकारियों ने भी बहती गंगा में खूब डूबकी लगाई। आखिर, दुर्ग पुलिस ने बीएसपी के जीएम समेत कई को अरेस्ट कर जेल भेजा है। सीआईएसएफ ने भी अपने डीआईजी को हटा कर असम भेज दिया है। सीआईएसएफ पर आरोप है कि जिस गेट से लोहा चोरी कर ले जाया जाता था, सीआईएफएस ने जानबूझकर वहां न तो सीसीटीवी लगवाया था और न वहां किसी जवान को तैनात किया। खैर, ठीक ही कहा गया है, अति का अंत होता है। बहरहाल, सीबीआई के नाम से भिलाई-दुर्ग के नेताओं की रात की नींद उड़ गई है, न जाने कब उनके दरवाजे पर सीबीआई धमक जाए।

गजब दिवाली

टेंट वालों की इस बार गजबे दिवाली मनेंगी। पीडब्लूडी के ईएनसी ऑफिस ने लंबे समय से बकाया 110 करोेड़ रुपए जारी कर दिया है। इसमें एक-एक टेंट वालों को गिरे हालत में चार-से-पांच करोड़ रुपए मिले हैं। दरअसल, विभिन्न जिलों में मंत्री, मिनिस्टरों के लिए पंडाल, मंच बनते हैं, उसका लंबे समय से बिल बकाया था। खैर, बेचारे टेंट वाले काम किए हैं तो पेमेंट तो होना ही चाहिए। मगर ये भी सनद रखना चाहिए...विधायक अटल श्रीवास्तव ने इसी साल मानसून सत्र में प्रश्न लगाया था कि बिलासपुर में मुख्यमंत्री का कार्यक्रम हुआ एक और टेंट वाले ने बिल लगा दिया दो कार्यक्रमों का। और आश्चर्य ये कि वहां के पीडब्लूडी के एसई ने उसे पास भी कर दिया। सदन में पीडब्लूडी मंत्री ने इसकी जांच कराने कहा, मगर आज तक पता नहीं चला कि डबल पेमेंट मामले में किसी अफसर का एक बाल भी बांका हुआ? बहरहाल, टेंट वाले तो ईएनसी की जय जयकार कर रहे हैं।

नवरात्रि में सियासी गहमागहमी

30 सिंतबर को दिल्ली में राज्यों के नियुक्त नए प्रभारियों और संगठन मंत्रियों की बैठक हो गई। पार्टी अध्यक्ष ने सबको टास्क दिया। साथ में ये निर्देश भी...पितृ पक्ष के बाद सभी अपने प्रभार वाले राज्यों में अपनी जिम्मेदारी संभाल लें। बताते हैं, छत्तीसगढ़ की प्रभारी स्मृति ईरानी और संगठन मंत्री कर्मवीर सिंह नवरात्रि में किसी दिन छत्तीसगढ़ आएंगे। संकेत मिल रहे, नवरात्रि शुरू होने के दूसरे या तीसरे दिन ही दोनों रायपुर आ जाएं। राजनीतिक पंडितों का मानना है, दोनों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे यहां कितना टाईम देते हैं। वैसे, संगठन मंत्री के नाते कर्मवीर सिंह को यहां रहना होगा। मगर प्रश्न स्मृति ईरानी का है। हालांकि, छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के जस्ट बाद लोकसभा चुनाव होता है। लिहाजा, स्मृति अपना परफार्मेस दिखाने में कोई कमी तो नहीं ही करेंगी। बता दें, नितिन नबीन जब पिछले विधानसभा चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ के सह प्रभारी थे, पूरे छत्तीसगढ़ का मथ डाला था। सूबे का शायद ही कोई ब्लॉक होगा, जहां वे नहीं पहुंचे। इसलिए, कार्यकर्ताओं से उनके सीधे रिश्ते बन गए थे। वह विधानसभा चुनाव में काम आया। नए प्रभारी और सह प्रभारी से भी बीजेपी कार्यकर्ता ऐसा ही उम्मीद संजोए हुए हैं। स्मृति से तो थोड़ा ज्यादा ही। कार्यकर्ताओं को लग रहा, स्मृति ही कुछ कर पाएंगी।

एक मंत्री, दो विभाग, दो नियम

डिप्टी सीएम अरुण साव के पास पीडब्लूडी है और नगरीय प्रशासन भी। मुकेश बंसल ने पीडब्लूडी सिकेट्री की जिम्मेदारी संभालते ही ठेकेदारों से काम फास्ट करने के लिए डामर का रेट रिवाइज कर दिया। दरअसल, ईरान युद्ध के बाद डामर का रेट बढ़ गया है। इस वजह से जो ठेकेदार पुराने रेट में टेंडर ले लिए थे, वे काम में रुचि नहीं दिखा रहे थे। जाहिर है, कोई नुकसान में काम करेगा नहीं। मगर अब डामर के रेट रिवाइज होने के बाद सड़कों के कामों में आश्चर्यजनक तौर पर तेजी आ गई है। मगर नगरीय प्रशासन विभाग के अफसरों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। लिहाजा, शहरी इलाकों में सड़कों की मरम्मत का काम ठप्प पड़ा हुआ है। जबकि, डेवलमेंट का मैसेज शहरों से ही जाता है। खैर, अब सरकार ने सोनमणि बोरा को अर्बन एडमिनिस्ट्रेशन का सिकेट्री बनाया है, तो हो सकता है वहां भी डामर का रेट रिवाइज हो और काम में तेजी आए।

हफ्ते का कोट

"अगर सब कुछ अच्छा चल रहा है, तो उसका भरपूर आनंद लें। क्योंकि, वो हमेशा रहने वाला नहीं है। और यदि कुछ बुरा चल रहा है तो चिंता न करें, क्योंकि वो भी हमेशा के लिए रहने वाला नहीं है।" 

अंत में दो सवाल आपसे?

1. रायपुर में ऑल इंडिया सर्विस का कौन अधिकारी है, जो कर्मवीर सिंह को छत्तीसगढ़ का संगठन मंत्री बनने पर मुख्यमंत्री से पहले फोन कर बधाई दे डाली?

2. स्मृति ईरानी के प्रदेश प्रभारी बनने के बाद मंत्रियों की सोशल मीडिया टीम इतना एक्टिव क्यों हो गई है?

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