तरकश, 16 अगस्त 2026
संजय के. दीक्षित
विभाग का ग्रह-नक्षत्र खराब?
विभागीय अफसर अपाइंट करने के चक्कर में दुर्ग नगर निगम में कमिश्नर की पोस्टिंग लटक गई है। दरअसल, नगरीय प्रशासन मंत्री के यहां से आईएएस या राप्रसे अधिकारी की बजाए नगरीय प्रशासन के विभागीय अधिकारी को आयुक्त के लिए प्रस्तावित किया गया था। बताते हैं, मिनिस्टर ने पोस्टिंग के लिए प्रशासकीय अनुमोदन भी दे दिया था। मगर उन्हीं के विभाग के अधिकारियों ने नोटशीट को समन्वय में भेज दिया। इससे पहले दुर्ग में आईएएस सुमित अग्रवाल कमिश्नर थे। 11 जुलाई को सुमित को सूडा का सीईओ बनाया गया। उसके बाद महीने भर से दुर्ग नगर निगम कमिश्नर का पद खाली है। नगरीय प्रशासन सिकेट्री आर शंगीता ने फाइल समन्वय को भेजी थीं, वे अब छह महीने की छुट्टी पर हैं। सिस्टम इसलिए असमंजस में है कि आईएएस के बाद राज्य प्रशासनिक अधिकारी तक चल जाता, एकदम नीचे उतरकर विभागीय अधिकारी को दुर्ग जैसे संभागीय मुख्यालय वाले निगम की कमान कैसे सौंप दी जाए। वैसे भी नगरीय प्रशाासन विभाग का ग्रह-नक्षत्र अभी ठीक नहीं चल रहा। बसव राजू को हटाकर आर शंगीता को सिकेट्री बनाया गया था, वे तीन महीने में ही लंबे अवकाश पर चली गईं। बसव राजू नगरीय प्रशासन के लिंक अफसर हैं...चूकि उन्हें हटाकर शंगीता को लाया गया था, ऐसे में समझा जा सकता है कि वे इस विभाग के कार्यों में दिलचस्पी क्यों रखेंगे। उधर, सूडा के सीईओ भी नए हैं। अब कोई तेज-तर्रार सिकेट्री आएगा, तभी यह विभाग पटरी पर आएगा। हालांकि, पिछले हफ्ते एक नाम चर्चा में था, मगर पता नहीं यह अंजाम तक क्यों नहीं पहुंच सका।
जेबकटी का तरीका
छत्तीसगढ़ में करीब दर्जन भर से अधिक प्रायवेट यूनिवर्सिटीज हो गई हैं। लगभग सभी में प्रोफेशनल कोर्सेज भी चल रहे हैं। प्रोफेशनल कोर्सेज इसलिए क्योंकि मुद्रा इसी के जरिये एकाउंट में आता है। अब बात पत्ते की...पिछले कई सालों से इन प्रोफेशनल कोर्सेज की फीस निर्धारित नहीं हुई है। प्रायवेट यूनिवर्सिटीज नहीं चाहती कि शुल्क निर्धारण किया जाए। इससे उनके हाथ बंध जाएंगे। सो, खेला ऐसा हुआ कि निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग और एडमिशन कमेटी दोनों हाथ खड़े कर दे रहे कि मुझे सरकार से कोई निर्देश प्राप्त नहीं हुए हैं। यानी सरकार की आड़ में निजी विश्वविद्यालयों को फायदा पहुंचाने की कोशिश। जेन जी के दौर में जेबकटी का यह भी एक तरीका है।
गरिमामय कार्यक्रम से 'गरिमा' गायब
राजधानी रायपुर में कल शाम एक गरिमामय आयोजन हुआ. मगर वहां आलम यह था कि कैबिनेट मंत्री का दर्ज़ा प्राप्त नेता और बड़े-बड़े नौकरशाह कुर्सी के लिए संघर्ष करते दिखे. पहली बार 'खास' और 'आम' का भेद ऐसा मिटा कि बड़े-बड़े लोग पसीना पोंछते नजर आये.
अफसर और कमाल की स्ट्रैटजी
छत्तीसगढ़ के पूर्व ब्यूरोक्रेट रहे अमन सिंह को भला कौन नहीं जानता. उनका जो पॉजिशन CM रमन सिंह के दौर में था, वही पॉजिशन इस समय वे अदानी ग्रुप में होल्ड कर रहे हैं. और खास बात यह है कि अमन सिंह ने अदानी ग्रुप में भी अपनी रणनीतिक काबिलियत साबित कर दिया है. अमेरिकी अदालत ने गौतम अदानी और उनके भतीजे को रिश्वत और धोखाधड़ी के केस से बरी किया, उसमें अमन की भूमिका बेहद अहम रही. आश्चर्यजनक तौर पर अमरीका के न्याय विभाग ने कोर्ट से लिखित दरख्वास्त की...अदानी के खिलाफ केस खत्म कर दी जाए. पता चला है, अमन ने इसके लिए जबरदस्त रणनीतिक कुशलता दिखाई. बताते हैं, पिछले दो महीने से वें अमेरिका में कैम्प कर रहे थे. इससे पहले हिंडनबर्ग विवाद में भी जब अदानी का शेयर लुढ़क गया था, उस मामले को खत्म कराने में अमन सिंह की भूमिका महत्वपूर्ण रही. जाहिर है, अमन छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के सचिव और प्रमुख रणनीतिकार रहे. कांकेर के झलियामारी कांड में जब पूरी सरकार हिल गईं थी, अमन सिंह ने विपक्ष को बिना मौका दिए, कुछ घंटे में आदिवासी हॉस्टल रेप कांड को साल्व कर दिया था. कलेक्टर अलेक्स पॉल मेनन अपहरण कांड में भी उन्होंने इतनी तत्परता से स्ट्रैट्जी बनाई कि तीसरे ही दिन नक्सलियों को उन्हें रिहा करना पड़ा. अमन की शार्पनेस का फायदा रमन सिंह को भी मिला. 15 साल CM रहने के बाद भी रमन के खिलाफ विपक्ष को किसी एक पेपर में खोट नहीं मिला. अमन ने छत्तीसगढ़ के इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, डिजिटल और सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में करीब एक दशक तक निर्णायक भूमिका निभाई.
कलेक्टरों पर देशभक्ति का रंग
स्वतंत्रता या गणतंत्र दिवस पर अभी तक कलेक्टर गांधी टोपी पहनते थे. पगड़ी सिर्फ नेता, मंत्री बांधते थे. मगर इस बार छत्तीसगढ़ के कई कलेक्टर स्वतंत्रता दिवस पर देश भक्ति के रंग में ऐसे डूबे कि पगड़ी बांध कलेक्ट्रेट में झंडा फहराया. इनमें मुंगेली कलेक्टर कुंदन कुमार, सुकमा कलेक्टर अमित कुमार और बीजापुर कलेक्टर विश्वजीत शामिल हैं. इन तीनों ने पगड़ी से माहौल खींच दिया. अच्छा है, पगड़ी भारतीय संस्कृति का प्रतीक है.
प्रमोटी अफसरों का दबदबा
आईएफएस के ट्रांसफर में प्रमोटी अधिकारियों ने जबर्दस्त बाजी मारी। खासकर, इस बार का ट्रांसफर आईएफएस के 2015 बैच के नामे रहा। 2005 बैच के इन एसीएफ को दस साल में आईएफएस एलॉट हो गया। बैच भी मिल गया 2015। और इस बार मैदान भी मार लिया। कटघोरा, मनेंद्रगढ, सरगुजा, खैरागढ़, महासमुंद, गरियाबंद, धरमजयगढ़...छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े ये सात डिविजन हैं। इन सभी डिविजनों से प्रमोटियों ने डायरेक्ट आईएफएस अधिकारियों को खो कर दिया। ऐसा एक बार पिछले कांग्रेस शासन काल में हुआ था, जब 33 डिविजनों में से 20 से अधिक में प्रमोटी आईएफएस अधिकारियों का कब्जा हो गया था। बहरहाल, प्रमोटी अफसरों के कैंप में खुशी की लहर है...पुरानी बादशाहत फिर जो कायम हो गई है। अब ये कैसे संभव हुआ, फिर कभी...
आईपीएस की बढ़ी मुसीबतें
अंबिकापुर के प्रोबेशनर आईएएस राहुल बंसल एक करोड़ रिश्वत लेने के आरोपों का सामना कर रहे थे, अब उनके खिलाफ ईडब्लूएस कोटे में आईपीएस बनने के खिलाफ डीओपीटी में शिकायत हो गई है। कंप्लेन में उनके परिवार की संपत्ति की जांच की मांग की गई है। मालूम हो, प्रोबेशनर आईपीएस का मसला छत्तीसगढ़ पुलिस के लिए सिरदर्द बन गया है। भले ही दिल्ली की एसीबी कोर्ट का छत्तीसगढ़ क्षेत्राधिकार न हो, मगर डीजीपी को एक्शन और टेकन रिपोर्ट मांगने की खबर सोशल मीडिया में ट्रेंड कर रही है। अब बात, राहुल बंसल पर रिश्वत के आरोप की। पुलिस अधिकारियों का कहना है, अभी तक राहुल के खिलाफ कोई एविडेेंस सामने नहीं आया है। आईपीएस की एएसआई और कांस्टेबल के साथ लेन-देन का कोई ऑडियों भी नहीं है। पुलिस की पूरी जांच अब उस बिचौलियों पर टिक गई है, जिसके खिलाफ 50 लाख कैश लेने का आरोप है। इस घटना के सामने आने के बाद वह फरार हो गया है। उसी से पूछताछ के बाद मामले पर से पर्दा उठ पाएगा। अलबत्ता, सरगुजा पुलिस की एक दलील ये भी है कि करोड़ों के साइबर फ्रॉड की पुलिस जांच कर रही है। इस मामले में 23 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। हो सकता है, जांच को प्रभावित करने के लिए पुलिस पर रिश्वत का आरोप लगाया गया हो। चलिये, 17 अगस्त को सीबीआई कोर्ट की अगली पेशी में इस मामले में काफी कुछ क्लियर हो जाएगा। क्योंकि, शिकायत करने वालों ने कोर्ट से कुछ आवश्यक दस्तावेज पेश करने के लिए टाईम मांगा है।
पोस्टिंग में नवाचार
कलेक्टर, एसपी की पोस्टिंग में पहले छोटे जिलों से होते हुए फिर बड़े जिलों में पोस्टिंग होती थी। एमपी के समय भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर और रायपुर की पोस्टिंग सबसे टॉप की समझी जाती थी। कई जिले घूमने के बाद तब कलेक्टर, एसपी उन जिलों में पहुंचते थे। छत्तीसगढ़ में भी अगस्त 2018 तक ये मेंटेन हुआ। उसके बाद फिर बड़े से छोटे जिले का एक अलग कंसेप्ट शुरू हो गया। जाहिर है, अगस्त 2018 में किरण कौशल को अंबिकापुर से बालोद का कलेक्टर बनाया गया था। अंबिकापुर के सामने बालोद काफी छोटा है। इसके बाद कांग्रेस शासन काल में कई आईपीएस अफसरों के साथ ऐसा हुआ। दीपक झा को बिलासपुर से हटाकर बलौदा बाजार का एसपी बनाया गया। जबकि, उससे पहले वे रायगढ़ जैसे बड़े जिले की कप्तानी कर चुके थे। इसी तरह संतोष सिंह को रायगढ़ से बुलाकर कोरिया का एसपी बनाया गया। पिछली सरकार में रजत बंसल को जगदलपुर से हटाकर बलौदा बाजार का डीएम बनाया गया था। जगदलपुर से पहले वे धमतरी के कलेक्टर रह चुके थे। इसके बाद बलरामपुर और अंबिकापुर जिले का कलेक्टर रह चुके कुंदन कुमार को मुंगेली का कलेक्टर बनाया गया तो जगदलपुर जैसे बड़े जिले में रह चुके विजय दयाराम को हाल ही में जीपीएम का कलेक्टर पोस्ट किया गया है। आईपीएस भोजराम पटेल कोरबा के एसपी रहने के बाद अब मुंगेली जिला संभाल रहे हैं। आमतौर पर मुंगेली आईएएस, आईपीएस के लिए पहला जिला होता था। मगर अब पोस्टिंग में नवाचार शुरू हो गया है।
हफ्ते का कोट
महत्वपूर्ण व्यक्ति बनने की अपेक्षा उपयोगी बनो, क्योंकि जो उपयोगी होता है, वह जीवनपर्यंत महत्वपूर्ण बना रहता है।
अंत में दो सवाल आपसे?
1. क्या स्वतंत्रता दिवस के बाद आईएएस और राप्रसे की एक ट्रांसफर लिस्ट निकलेगी?
2. जेन जी के मूव्हमेंट के बाद छत्तीसगढ़ के छंटनी होने वाले मंत्रियों को क्या कुछ समय के लिए मोहलत मिल गई है?

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