शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: ड्रेस कोडः ब्यूरोक्रेसी भी पीछे नहीं



तरकश, 25 अक्टूबर 2026

संजय के. दीक्षित 

ड्रेस कोडः ब्यूरोक्रेसी भी पीछे नहीं 

वैसे वर्दी के मामले में जो हाल पुलिस अधिकारियों का है, कमोवेश वही स्थिति ब्यूरोक्रेट्स का है। आश्चर्य होता है, मुख्यमंत्री की मीटिंगों में अफसर हाफ शर्ट पहनकर चले जाते हैं। पहले सीएम की मीटिंग का एक डेकोरम होता था...एग्जिक्यूटिव फुल शर्ट में जाते थे। आखिर, सीएम जैसे वीवीआईपी की मीटिंग अचानक तो होती नहीं। एक-दो दिन पहले से उसकी जानकारी होती है। हाफ शर्ट तो छोड़िये, कई सिकेट्री जैकेट के उपर आस्तिन चढ़ा लेते हैं। एक सीएस साहब तो हमेशा आस्तिन चढ़ाकर ही सीएम की मीटिंगों में जाते थे। सिस्टम को देखना चाहिए...वीवीआईपी बैठकों की अपनी एक गरिमा होती है।

आईएएस खतम, कंसलटेंट हॉवी

पहले माना जाता था...मसूरी में आईएएस अफसरों की ग्रूमिंग इस तरह की जाती है कि वह कोई भी विभाग चला सकता है। मगर नए दौर में कंसलटेंट ऐसा हॉवी होते जा रहे कि लगता है, कुछ दिन बाद आईएएस की उपयोगिता पर ही कहीं प्रश्न न खड़ा हो जाए। छत्तीसगढ़ में कुछ ज्यादा ही बुरा हाल है। सिस्टम में कंसलटेंट इतना हॉवी होते जा रहे कि बड़ी-बड़ी मीटिंगों में आजकल सिकेट्री के साथ बैठ रहे। एआई और चैट जीपीटी से प्रेजेंटेशन और रिपोर्ट तैयार किया जा रहा। इससे डेटा की सिक्यूरिटी का संकट खड़ा हो गया है। मंत्रालय के अफसर समझ नहीं पा रहे...एआई, चैट जीपीट अमेरिका की कंपनी है, अपना सारा डेटा बाहर जा रहा। इससे पहले इसी स्तंभ में हम इस पर लिख चुके हैं कि जब दसेक साल पहले जब आईएएस की कमी थी, तब कंसलटेंट की जरूरत नहीं पड़ी और आज थोक की संख्या में आईएएस हो गए हैं, तब कंसलटेंट की आवश्यकता क्यों? सिस्टम को भी इस खेल को समझना चाहिए। कंसलटेंट की आड़ में अलाली तो हो ही रही...खोखा का खेल भी चल रहा। वो भी बिना किसी रिस्क के। कंसलटेंट आज है, कल चला जाएगा। कभी किसी गड़बड़ी पर सवाल खड़ा होगा तो सिकेट्री मासूमियत से कह देंगे, कंसलटेंट का फैसला था। दूसरा, कंसलटेंट कंपनियां 50 हजार के आदमी को पांच लाख रुपए में अपाइंट करती है। सरकार से लेती है पांच लाख और उधर मुलाजिम से कैश में साढ़े चार लाख रुपए वापिस ले लेती है। साल में बिना कलम फंसाए अगर अफसरों को दो-तीन खोखा भी मिल गया तो क्या दिक्कत है। गंभीर यह भी...केंद्र सरकार ने बिग फोर कंपनी पर बैन लगाया है, खबर है उसे भी कई विभागों द्वारा काम सौंपा जा रहा। अगर ये बात सही है तो उसे तत्काल प्रतिबंधित करना चाहिए।

प्रोत्साहन का तरीका

आप कभी मंत्रालय जाएं तो एक नंबर गेट के पास एक स्क्रीन चलता दिखेगा। उस पर कई अधिकारियों और कर्मचारियों को पुरस्कार लेते फोटो फ्लैश होता नजर आता है। दरअसल, टाईम पर ऑफिस आने और ई-ऑफिस में बेहतर कार्य करने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने मुख्य सचिव विकास शील हर महीने उन्हें सम्मानित करते हैं। और पूरे महीने स्क्रीन पर उसके फोटो फ्लैश होते रहता है। मंत्रालय में आते-जाते बरबस स्क्रीन पर लोगों का नजर पड़ता है। जाहिर है, जिनसे काम लेना है, उन्हें प्रोत्साहित करने का ये एक तरीका है।

सिंगल पावर सेंटर

स्मृति ईरानी के प्रदेश प्रभारी बनने से अफसरों के एक वर्ग को भी झटका लगेगा। संगठन मंत्री कर्मवीर सिंह भी नए हैं और स्मृति भी। पहले बीजेपी मुख्यालय असंतुष्ट अफसरों के लिए एक ठीहा था। मगर अब स्मृति के पास किसी को जाने का साहस नहीं। कुल मिलाकर सक्षम प्रशासन का फंडा यह है कि पावर सिंगल विंडो होना चाहिए। भले ही इसमें निरंकुश होने का खतरा बना रहता है। मगर इसके बिना काम भी नहीं होता। सिंगल पावर सेंटर से नेताओं और कार्यकर्ताओं को कतिपय शिकायतें हो सकती हैं मगर प्रशासनिक कसावट, रिजल्ट और अनुशासन की दृष्टि से सिंगल पावर सेंटर की अहमियत को खारिज नहीं किया जा सकता। अमूमन हर राज्य में ऐसा होता है, भले ही मुख्यमंत्रियों को इसके लिए आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। मगर उन्हें भी पता है कि इसके बिना काम भी नहीं होने वाला।

हवा में छत्तीसगढ़ के मिनिस्टर

मध्यप्रदेश के दौर में देश का सबसे बड़ा राज्य होने के बाद भी मंत्री सड़क मार्ग से दौरे करते थे। रास्ते में उनका स्वागत-सत्कार चलता था, कार्यकर्ताओं और लोगों से मुलाकातें भी। इससे फायदा यह होता था कि मंत्रियों को सरकारी कामकाज का फीडबैक भी मिल जाता था। मगर इन दिनों सूबे के मंत्रियों का हेलिकाप्टर और प्लेन का प्रेम ऐसा बढ़ा है कि वे सड़क मार्ग से निकलना ही नहीं चाह रहे। बता दें, रमन सिंह और भूपेश बघेल के टेन्योर में मंत्रियों को साल में दो-चार बार हेलिकाप्टर मिल गया तो बहुत था। मगर इस समय हालत जुदा है...अधिकांश मंत्रियों को हेलिकाप्टर चाहिए या प्लेन। रायपुर से बिलासपुर के लिए भी। कल की ही बात है। मंत्रियों को राष्ट्रपति के कार्यक्रम में शामिल होने जगदलपुर जाना था। मंत्री भी सभी नहीं, पांच-सात ही थे। वे चाहते तो रात के डिनर के बाद जगदलपुर रवाना हो सकते थे। मगर उसके लिए दिल्ली से चार्टर प्लेन मंगाया गया। प्लेन वाले ने 70 लाख से अधिक चार्ज कर दिया। क्योंकि, उसने दिल्ली से रायपर आने, रायपुर से जगदलपुर और फिर जगदलपुर से रायपुर और रायपुर से खाली दिल्ली जाने का किराया जोड़ लिया। नए संगठन मंत्री कर्मवीर सिंह को मंत्रियों को ताकीद करनी चाहिए...मंत्री ज्यादा हवा में न उड़े। सड़क मार्ग से चलेंगे तो फायदा मंत्रियों को होगा और सरकार तथा आम आदमी को भी। तभी तो मंत्रियों को भी पता चलेगा कि उनके रिजीम में सड़कों की क्या स्थिति है।

जख्म था पैर में, हाथ....

पीडब्लूडी मंत्री अगर सड़कों के गड्ढों की वजह से स्कूटी रैली में गिर जाएं तो समझा जा सकता है कि उनका दिल कितना जख्मी हुआ होगा...क्योंकि बाकी जख्म तो इलाज से चला जाता है, मगर...। बहरहाल, डिप्टी सीएम के जख्मी होने की बात चर्चा का विषय नहीं बनता और न पूर्व सीएम भूपेश बघेल को उनसे सहानुभूति जताते तंज कसने का मौका मिलता। असल मेें, हुआ ऐसा कि डिप्टी सीएम को लगा कि चोट हाथ में है और इसके बाद वे डांडिया में नाच दिए। जबकि, मेन जख्म पैर में था। डांस करने से तकलीफ बढ़ी तो एक्सरे हुआ और फिर प्लास्टर चढ़ाना पड़ा।

मंत्री अध्यक्ष?

छत्तीसगढ़ में कुछ दिनों से बीेजेपी के अध्यक्ष बदलने की चर्चा बड़ी तेज है। चर्चा को पंख इसलिए भी लगा कि पार्टी प्रमुख किरण सिंहदेव कुछ दिन पहले हादसे में जख्मी हो गए थे। वैसे पहले से भी इस जिम्मेदारी को लेकर वे बहुत उत्सुक नहीं थे। पिछले साल तो मंत्री बनने को लेकर बयान भी दे दिए थे। वो तो पार्टी का शीर्ष नेतृत्व तैयार नहीं हुआ और उन्हें फिर से पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया गया। बहरहाल, किरण सिंहदेव के बदलने के साथ ही विष्णुदेव साय मंत्रिमंडल के एक सदस्य को अध्यक्ष बनाने की अटकलें जोर पकड़ी हुई है। असल में, किरण सिंहदेव का कोई ऐसा विकल्प नहीं दिखाई पड़ रहा, जिसके नेतृत्व में अगला विधानसभा चुनाव लड़ा जा सकें। वो भी जेन जी के दौर में। जिस मंत्री का नाम प्रेसिडेंट के लिए उछल रहा...फेस बढ़ियां हैं। बृजमोहन अग्रवाल के बाद वे बीजेपी के दूसरे नेता होंगे, जिनका बलरामपुर से लेकर दंतेवाड़ा तक कार्यकर्ताओं का नेटवर्क है। हालांकि, ये बीजेपी है। जब तक फैसला हो नहीं जाता, तब तक कुछ कहा नहीं जा सकता।

स्टेट पॉलिटिक्स में तोखन

छत्तीसगढ़ बीजेपी के अध्यक्ष बनने वालों में एक नाम केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू का भी है। वैसे भी स्टेट की पॉलिटिक्स में उनकी दिलचस्पी बढ़ती जा रही है। बताते हैं, तोखन अगर अध्यक्ष ना भी बनें तो अब लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। उनके लिए तखतपुर विधानसभा सीट तैयार की जा रही। क्योंकि, बिलासपुर से अमर अग्रवाल को खो करना आसान नहीं, और ऐसे में अरुण साव के पास लोरमी के अलावा कोई चारा नहीं। ऐसे में अगर चर्चाओं को मानें तो धर्मजीत सिंह सेफ सीट कोटा शिफ्ट करने की तैयारी में हैं। धर्मजीत ने तोखन की लांचिंग के लिए तखतपुर के परसदा में उनके जन्म दिन पर मेगा शो कराया। कोटा कांग्रेस का गढ़ जरूर है मगर पिछले चुनाव में अटल श्रीवास्तव ने खुद के मैनेजमेंट से यह सीट निकाली वरना 500 किलोमीटर दूर से आए प्रबल प्रताप सिंह जूदेव ने कांग्रेस के गढ़ को हिला ही दिया था। धर्मजीत कांग्रेस में रहे हैं, कांग्रेस के भीतर उनके पराने संपर्क हैं ही, अब बीजेपी के नेकवर्क का लाभ भी मिलेगा। कोटा में बीजेपी के पास वैसे भी हमेशा कंडिडेट का टोटा रहा है। 73 साल के धर्मजीत चुनाव तक 75 के हो जाएंगे। सो, आखिरी चुनाव के नाम पर सहानुभूति लेने का प्रयास भी होगा। बहरहाल, बात तोखन की तो उनके लिए भी तखतपुर आसान नहीं रहेगा। राजू सिंह क्षत्री, हर्षिता पाण्डेय का भी अपना प्रभाव है। धर्मजीत जैसे खांटी पॉलिटिशियन के जब तखतपुर सीट छोड़ने की हवा उड़ रही तो तोखन साहू को भी वहां सब कुछ आसान नहीं रहेगा...बशर्ते वे तखतपुर से चुनाव लड़ें।

मंत्री-विधायकों में अज्ञात भय

छत्तीसगढ़ की सत्ता के शीर्ष गलियारों और राजधानी रायपुर के सत्ताधारी खेमे में इन दिनों एक अजीब माहौल को महसूस किया जा रहा है। सत्ता की चमचमाती गाड़ियों में घूमने वाले मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के चेहरों पर साफ तौर पर एक अनजाना दबाव पढ़ा जा सकता है। कारण? 25 अक्टूबर से भाजपा की नवनियुक्त प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी का दो दिवसीय छत्तीसगढ़ प्रवास शुरू हो रहा है। उनके आगमन की खबर ने नेताओं और अफसरों की नींद उड़ा दी है। प्रशासनिक और संगठनात्मक स्तर पर कसते इस शिकंजे के बीच केवल एक ही सवाल हर मंत्री और विधायक की जुबान पर तैर रहा है, क्या स्मृति राज के आगाज के साथ ही कुछ बड़ा होने वाला है? जाहिर है, स्मृति ईरानी के रायपुर की धरती पर कदम रखने से पहले ही दिल्ली से आए फरमानों ने सत्ता और संगठन के बड़े-बड़े महारथियों के पसीने छुड़ा दिए हैं। इस बार हवाई अड्डे से लेकर राजधानी की सड़कों पर होर्डिंग्स, बैनर, पोस्टर या भव्य कट-आउट्स नहीं लगाए जाएंगे। यही नहीं, स्मृति के यहां से एक अत्यंत गोपनीय और सख्त चिट्ठी भेजी गई है। इसमें राज्य सरकार के मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और प्रदेश पदाधिकारियों का डिजिटल ऑडिट माँगा गया है। इस रिपोर्ट कार्ड की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें नेताओं की व्यक्तिगत ब्रांडिंग, आत्ममुग्धता वाली पोस्टर्स या निजी दौरों के प्रचार को पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। ऐसे में, मंत्री, विधायकों में डर तो फैलेेगा ही।

सरकार, विभाग और बपौती!

छत्तीसगढ़ में गजबे हो रहा...पिछली सरकार में डीपीआई में दो राप्रसे अधिकारियों को पोस्ट किया गया तो वहां के मुलाजिम हाई कोर्ट चले गए और इस बार हेल्थ में प्रशासनिक अधिकारियों को बिठाने पर आयुष्मान योजना के नोडल अफसर हाई कोर्ट की शरण में पहुंच गए। ये तो एक तरह की बपौती सरीखा मामला बनता जा रहा। किसको कहां पोस्ट करना है, कहां काम कराना है, ये तय करना सरकार का काम है कि मुलाजिमों का। ऐसे मे ंतो शिक्षकों से इतना सारा कार्य कराया जाता है, वे भी कोर्ट चले जाएंगे। सर्वविदित है, आईएएस के पोस्ट पर कई बार नॉन आईएएस अफसर की पोस्टिंग कर दी जाती है, तब ताकतवर आईएएस लॉबी तो कोर्ट नहीं जाती। सरकार को इस मामले में कड़ा स्टैंड लेना चाहिए वरना लोग सिस्टम को हल्के में लेने लगेंगे। हालांकि, सरकार ने इस बार जरा दमदारी दिखाने की कोशिश की है। आयुष्मान के नोडल अधिकारी को सस्पेंड कर दिया है।

हफ्ते का कोट

'अपने चेहरे से जो जाहिर है, उसे छुपाएं कैसे? तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आएं कैसे? लाख तलवारें बढ़ी आती हो गर्दन की तरफ, सर झुकाना नहीं आता तो झुकाएं कैसे?'

अंत में दो सवाल आपसे?

1. क्या किसी कलेक्टर को तांत्रिक अनुष्ठान के लिए नवरात्रि के लॉ एंड आर्डर के दौरान लंबी छुट्टी देने का कोई प्रावधान हैं?

2. एक ऐसे मंत्रीजी का नाम बताइये, जिन्हें अपने विशेष मेकेनिज्म पर इतना भरोसा है कि उन्हें लगता है कि कोई हिला नहीं पाएगा?

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