तरकश, 11 अक्टूबर 2026
संजय के. दीक्षित
अफसर...और घर की मुर्गी
छत्तीसगढ़ कैडर के एक आईएफएस अधिकारी की मिस यूपी रह चुकी खूबसूरत युवती से बड़ी धूमधाम से शादी हुई थी। उनका एक बड़ा प्यारा बेटा भी हुआ। मगर आठ साल बाद अब स्थिति यह है कि पत्नी अपने पति की लंपटई और प्रताड़ना को लेकर सोशल मीडिया पर गुहार लगा रही है। पत्नी का आरोप है...पति ने मेरा जीवन तबाह कर मुझे मायके में शरण लेने मजबूर कर दिया। आईएफएस अफसर का सूबे की एक चर्चित महिला डीएसपी से लंबे समय से यराना रहा है। राजधानी रायपुर में शायद ही कोई अनभिज्ञ होगा कि महिला डीएसपी का पहले आईएफएस के साथ संबंध रहा। बाद में एक कारोबारी की इंट्री हुई और उसके बाद वे मैदान से आउट हो गए मगर आईएफएस अभी भी पिच पर बने हुए हैं। खैर, फंडा यह है कि कई लोगों के लिए खूबसूरती मैटर नहीं करता। खासकर, आईएएस, आईपीएस और आईएफएस जैसे ऑल इंडिया सर्विस के अफसरों के लिए, जिनके पास 'पावर' और 'पैसा' दोनों होता है। चूकि ये देश की सबसे बड़ी सर्विस में सलेक्ट होते हैं, लिहाजा आमतौर से पत्नियां खूबसूरत ही मिलती हैं। मगर बड़े अफसर बनने के बाद गुलाटी मारना जब 'इनबिल्ट' हो जाए, तो बेचारी पत्नी क्या कर सकती है। बेशक, छत्तीसगढ़ के 80 परसेंट से अधिक आईएएस, आईपीएस और आईएफएस लंगोट के ढीले हैं। मौका मिला नहीं कि हर-हर गंगे। उपर से भारी इनोसेंट दिखने वाले कई अफसरों को लेकर विश्वास नहीं होगा...मगर उनके चटपटे किस्से सुन आप दंग रह जाएंगे। जब से डीएमएफ आया है, अधिकांश कलेक्टरों का भी यही हाल है...कईयों ने चरित्रहीनता की पराकाष्ठा कर दी है। दरअसल, यूपीएससी क्रेक कर आए हैं, चतुर तो वे होते ही हैं...पोस्टिंग मिलते ही पीए को बोलते हैं, सबसे अच्छी वाली गाड़ी मैडम के लिए घर भेजो। पत्नियां सप्लायरों, ठेकेदारों से मिलने वाले महंगे गिफ्ट, ज्वेलरी और लग्जरी सुख-सुविधाओं में उलझ जाती है। उधर पति लोग मीटिंग के बहाने मुंबई, गोवा में बंदरों टाईप गुलाटी मारने निकल जाते हैं। बहरहाल, बात आईएफएस की मिस यूपी बीवी पर तो पत्नी कितनी भी खूबसूरत हो जाए...आखिर, एक देसी कहावत है...घर की मुर्गी दाल बराबर।
कदाचरण...एक्शन क्यों नहीं?
87 बैच के आईएएस अजयपाल सिंह की पत्नी सरकार और मीडिया के दरवाजों पर पति की प्रताड़ना को लेकर गिड़गिड़ाती रही। हालांकि, उनकी पीड़ा लंपटई को लेकर नहीं थी। बावजूद इसके उस समय की बीजेपी सरकार ने कभी उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं सौंपी। बाद में ड्यूटी से महीनों गायब रहना, कामकाज में लापरवाही के मामले में उन्हें फोर्सली रिटायर कर दिया गया। मगर इस समय आईएफएस की पत्नी अपने पति की लंपटई पर गुहार लगाते बिलख रही है। ऐसे अफसर को सिस्टम ने बड़े डिविजन डीएफओ बनाकर रखा है। ये ठीक नहीं। इसे आप पति-पत्नी का पर्सनल विवाद बोल खारिज नहीं सकते। इससे पूरे देश में छत्तीसगढ़ कैडर मजाक बनता है। फिर डीएसपी प्रकरण में जो जांच हुई है, खुफिया विभाग के पास इसके इनपुट्स भी तो होंगे ही। फिर भी ऐसे आंख क्यों मूंदना?
अफसर, पत्नी और अलार्म
करीब 22 साल से छत्तीसगढ़ की अफसरशाही को कवरेज करते बड़े करीब से वाकिफ हूं। जो अफसर पत्नी को लिमिट से ज्यादा वेटेज देते हैं। सार्वजनिक जगहों पर साथ जाएंगे, तारीफ के पुल बांधते मिलेंगे। डीपी, स्टेट्स में भी साथ-साथ। ऐसे अफसर लंगोट के ज्यादा ढीले होते हैं। हो सकता है, इसमें इक्का-दुक्का अफसर अपवाद हों, अलबत्ता, एक इंटरनेशनल रिसर्च में ये बात निकलकर आई है कि विवाहेत्तर संबंध रखने वाले अधिकांश लोग पत्नी को काफी खुश रखने का प्रयास करते हैं। एकदम चापलूस की तरह। इसलिए...ताकि उसे कोई संदेह न हो। खैर, ऐसे ब्रीड वाले अफसरों के लिए अब संभावनाओं के द्वार काफी खुल गए हैं। मंत्रालय से लेकर इंद्रावती भवन और कलेक्ट्रेट तक अब कारपोरेट, कंसलटेंट की आड़ में मेट्रो सिटी की आधे-अधूरे वस्त्र पहनी हनी गर्ल भौंरे की तरह मंडरा रही हैं। कुल मिलाकर घोर कलयुग आ गया है... अफसरों की पत्नियों को अत्यधिक अलर्ट रहने की जरूरत है।
बीजेपी में भी ग्लेमर
कांग्रेस चूकि बरसों सत्ता में रही है, इसलिए उसके बड़े-बड़े नेताओं की अनगिनत कहांनियां रही हैं। मगर अब शुचिता के लिए जानी जाने वाली बीजेपी भी इससे अछूती नहीं। छत्तीसगढ़ में चौथी बार सत्ता में आई बीजेपी भी अब ग्लेमरस महिलाओं से प्रभावित दिखती हैं। बरसों से पार्टी का झंडा, बैनर उठाने वाली महिलाएं किनारे हो गई हैं, और हाल के दिनों में पार्टी में घुसी महिला नेत्रियां अब आगे होती जा रहीं। बिलासपुर की एक घटना को लेें...एक ग्लेमरस युवती ने पार्टी में पद दिलाने का लालच देकर एक बीजेपी कार्यकर्ता से 82 लाख रुपए ठग लिया। अरसा गुजर जाने के बाद जब उसे पार्टी में कोई पद नहीं मिला तो उसने पुलिस की शरण ली। कुछ महीने पहिले बिलासपुर की ही एक ग्लेमरस नेत्री ने थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी...एक ठेकेदार ने उससे कार में दुष्कर्म किया। उधर, ठेकेदार ने कहा, उल्टे काम दिलाने के लिए नेत्री ने उससे एक करोड़ रुपए हड़प लिया। अब असलियत क्या थी, वे दोनों जाने। लेकिन, अब कमाल ये कि नेत्री फिर बिलासपुर से लेकर रायपुर तक, बड़े-बड़े नेताओं के साथ खूब फोटो खिंचवा रही। पता नहीं, छत्तीसगढ़ में पोस्टेड भारी-भरकम अमला वाली केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियां क्या कर रही हैं। आखिर, कुछ ऊँच-नीच हुआ तो नाम तो पूरी पार्टी का खराब होगा न। क्योंकि, बीजेपी नेता भी आखिरकार हैं इंसान ही न!
कलेक्टर, कोर्ट रुम और मॉनिटरिंग
विधानसभा अध्यक्ष के जिले राजनांदगांव से एक अच्छी खबर है। वहां राजस्व मामले के निबटारे में 94 से लेकर 100 परसेंट तक कामयाबी मिली है। छत्तीसगढ़ में ये अपने आप में एक रिकार्ड होगा। जाहिर है, जमीन जायदाद के मामले तहसीलों में सालों तक अटके रहते हैं। पिछले तरकश में राजस्व मामलों का जिक्र होने पर अगले दिन बलरामपुर से लेकर भोपालपटनम तक से कमेंट्स और शिकायतों की बाढ़ आ गई थी। लोग दुखड़ा रो रहे थे, फलां तहसीलदार ने इतने महीने से फाइल दबा कर बैठा है तो किस तरह सरगुजा जिले की एक कलेक्टर ने कमिश्नर से बोल जमीन विवाद पर स्टे लगवा दिया...इसलिए कि एक समाज विशेष के एक आदमी ने जमीन पर कब्जा किया है। इससे लॉ एंड आर्डर की स्थिति उत्पन्न होती, तो उन्हें झेलना पड़ता। सरकार को कम-से-कम रेवेन्यू मामलों को हर महीने समीक्षा करनी चाहिए कि किस जिले मेें कितनी पेंडेंसी है। ई-ऑफिस के बाद भी अगर तहसीलदार, एसडीएम महीनों फाइलें दबाकर बैठे रहें तो ये दुर्भाग्यजनक है। दूसरा, अब तो ऑनलाइन और सीसीटीवी का दौर है। चीफ सिकेट्री खुद भी अधिकारियों के अटेंडेंस पर नजर रख रहे। सीसीटीवी से सीधे पता चल जाएगा कि कौन कलेक्टर महीने में कितने दिन कोर्ट रुम में बैठता है। वास्तविकता यह है कि 80 परसेंट कलेक्टर कोर्ट में बैठते नहीं। एडिशनल कलेक्टर को कोर्ट सौंप देते हैं। राजनांदगांव को मॉडल बनाकर अगर मंत्रालय से कलेक्टरों की मॉनिटरिंग प्रारंभ हो जाए तो चीजें काफी सुधर जाएंगी। क्योंकि, आंकड़े बताते हैं, सबसे अधिक किसी विभाग में भ्रष्टाचार है तो वह राजस्व विभाग में है। और आम आदमी सबसे अधिक त्रस्त भी इसी विभाग से है।
पहले के कलेक्टर और अबके
आज से दो दशक पहले कलेक्टर जमकर दौरे भी करते थे और रेगुलर कोर्ट में बैठकर राजस्व केसों का निबटारा भी करते थे। तब जिले काफी बड़े होते थे। केसों की संख्या भी काफी होती थी। मगर अब दो-दो, तीन-तीन ब्लॉक के जिले हो गए, उसके बाद भी कलेक्टरों के पास राजस्व मामलों का रिव्यू करने टाईम नहीं। ऐसा नहीं कि पहले के कलेक्टर पैसा नहीं कमाते थे। वे पैसा भी कमाते थे और दबाकर काम भी करते थे। अभी विडंबना यह है कि कलेक्टर सुबह से कैलकुलेटर लेकर बैठ जाते हैं, डीएमएफ का पैसा कहां और कैसे खर्च किया जा सकता है, काम-वाम से ज्यादा कोई मतलब नहीं। और, सिस्टम ने जिन्हें ईमानदारी के बेसिस पर कलेक्टर बनाया है, वे मूरत बनकर ऑफिस में बैठे रहते हैं, उन्हें आम आदमी से कोई मतलब नहीं। अलबत्ता, इस स्तंभ में पहले भी कई बार लिखा जा चुका है...छत्तीसगढ़ में कलेक्टरों की वर्किंग खराब करने में सबसे बड़ा रोल डीएमएफ का है। कायदे से अघोषित तौर से इसे सरकार को अपने नियंत्रण में लेना चाहिए। नियंत्रण का मतलब ये कि भारत सरकार ने कलेक्टरों को डीएमएफ का हेड बनाया है, इसलिए उन्हें बदल तो सकते नहीं। मगर सरकार चाहे तो काम कराने से पहले पूछ सकती है... रिव्यू कर सकती है कि वो जो काम करने जा रहे, उसकी जनहित में कितनी उपयोगिता है। कई जिलों में सप्लायर तय करते हैं...डीएमएफ में क्या होना चाहिए। इसका एक बानगी देखिए। एक सप्लायर हाथी प्रभावित कई जिलों के कलेक्टरों को बताया कि हाथी आएगा, तो मोबाइल पर अलर्ट आएगा। इसी में उसने डीएमएफ से करोड़ों रुपए ऐंठ लिया। इससे कलेक्टर भी खुश और सप्लायर भी। मगर जंगलों में रहने वाले आम लोगो का कोई भला नहीं हुआ, क्योंकि वे मोबाइल नहीं देखते। मगर डीएमएफ का पैसा खर्च करना था, वो काम हो गया। अलबत्ता, पिछली सरकार में डीएमएफ पर रायपुर से नियंत्रण करने का प्रयास किया था, भले ही उसकी मंशा और दिशा सही नहीं रही।
कलेक्टरों के इनोवेशन पर ब्रेक
प्रशासनिक कामकाज को पटरी पर लाने के लिए सिस्टम को एक काम अवश्य करना चाहिए। वह है कलेक्टरों के इनोवेशन पर अंकुश लगाना। दरअसल, होता ऐसा है कि वाहवाही लुटने या फिर पीएम अवार्ड के लिए कलेेक्टर एक-न-एक नवाचार का काम ढूंढ लेते हैं और फिर वही उनके लिए टॉप प्रायरिटी बन जाता है। फिर जनता से जुड़े बाकी काम गौण। आलम यह कि पिछले कलेक्टर ने अगर कोई बढ़ियां लोक कल्याणकारी काम प्रारंभ किया है, तो उसके तरफ देखना नहीं। जबकि, होना ऐसा चाहिए कि कोई कलेक्टर अगर अच्छा काम शुरू किया है तो नए वालों की भी जिम्मेदारी बनती है कि उसे आगे बढ़ाए। जाहिर है, छत्तीसगढ़ बनने के बाद सिर्फ कलेक्टर ओपी चौधरी का दंतेवाड़ा का काम दिख रहा, जिसके लिए उन्हें पीएम अवार्ड मिला। बाकी पीएम अवार्ड वाले क्या काम किए, किसी को याद नहीं। मुख्य सचिव के पास अब तो एक स्पेशल सिकेट्री भी आ गई हैं। कलेक्टरों के कामकाज का पूरा हिसाब सीएस ऑफिस में होना चाहिए। और ट्रांसफर के बाद नए वाले को ज्वाईनिंग से पहले बुलाकर बताना चाहिए कि उसे किन कामों को कंटीन्यू करना है, या फोकस बनाकर रखना है। इससे चीजें काफी सुधरेंगी। क्योंकि, कलेक्टरों की खुद की वाहवाही में जनता के पैसे का काफी नुकसान होता है।
बीजेपी के इंफ्लुएंसर
सत्ताधारी पार्टी को एजेंसियों पर इतना कांफिडेंस नहीं पाल लेना चाहिए। क्योंकि, अब चुनाव में ज्यादा समय नहीं बचा है। बात है दिल्ली से बुलाए गए सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर की। बीजेपी को बुलाना ही था तो चार-पांच को ही बुलाते मगर ठीकठाक का चयन करते। कम-से-कम प्रोफाइल तो देख लेते कि जो इंफ्लएंसर आ रहा, उसका खुद का कितने सबस्क्राबर और व्यूज हैं। मगर एजेंसी से ऐसे-ऐसे लोगोें को पकड़ लाई कि पूछिए मत! एक तो थोक की संख्या में आए। दूसरे छत्तीसगढ़ की ब्रांडिंग करने की बजाए यहां के लोगों के साथ फोटो खिंचवा खुद अपना व्यूज बढ़ा रहे हैं। उससे अच्छा छत्तीसगढ़ के कस्बा, जिलों के लोकल इंफ्लुएंसर को इतना मान-सम्मान दे दिए होते तो पार्टी के लिए फायदेमंद होता। जस्ट ये एक सुझाव है, बाकी तो बीजेपी जाने।
हफ्ते का कोट
आपकी शख्सियत अच्छी होगी तभी लोग आपमें बुराइयां खोजेंगे, वरना बुरे की तरफ देखता ही कौन है।
अंत में दो सवाल आपसे?
1. किस जिले की महिला कप्तान पुलिस मुख्यालय के प्रभावशाली अफसर की भी परवाह नहीं कर रही?
2. क्या ये सही है कि मंत्रिमंडल में अब सर्जरी दिवाली के बाद ही होगी?
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