शनिवार, 8 जून 2013

तरकश, 9 जून

सलवा-जुडूम

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बस्तर में भले ही सलवा-जुडूम बंद हो गया मगर आईएएस अफसरों के बीच इंटरनेटी सलवा-जुडूम चालू हो गया है। और इसमें खूब ज्ञान बघारे जा रहे हैं और भड़ास भी। दरअसल, छत्तीसगढ से जुड़े आईएएस अफसरों ने दरभा हमले के बाद बस्तर को लेकर पर्सनल मेल ग्रुप  बनाया है। इनमें रिटायर्ड आईएएस से लेकर प्रोबेशनर तक शमिल हैं। इसका इतना नशा हो गया है कि एक सीनियर आईएएस रात के तीन-तीन बजे तक नेट पर बैठ रहे है। सिंगापुर में छुट्टियां मना रही आईएएस रिचा शर्मा भी वहीं से कमेंट दे रही हैं कि बस्तर में विकास के लिए क्या-क्या नहीं हुआ। दिलचस्प यह कि रिचा पिछले 10 साल से छत्तीसगढ़ से बाहर हैं। राज्य के एडिशनल चीफ सिकरेट्री डीएस मिश्रा और सीके खेतान के बीच तो नेट पर जंग के हालात बनते जा रहे हैं। खेतान डेपुटेशन पर दिल्ली में हैं। उन्होंने बस्तर में हुए विकास पर कमेंट करते हुए उसे कंट्रोवर्सी डेवलपमेंट लिख दिया। इससे नाराज होकर मिश्रा ने खेतान को एक के बाद एक कई मेल कर डाला। अंत में यह भी कि मैं आपको हर्ट नहीं करना चाहता। खेतान ने जवाब दिया, ये तो एक बहस है, विचारों का आदान-प्रदान है, इसमें हर्ट की बात कहां से आ गई। एक प्रोबेशनर आईएएस की सुनिये, सीनियर अफसरों के सलवा-जुडूम का हमलोग खूब आनंद ले रहे हैं। 

तू डाल-डाल.....

सरकार के साथ लड़ाई में प्रींसिपल सिकरेट्री केडीपी राव जिस तरह से भारी पड़ रहे हैं, उससे आईएएस अफसर अब महसूस कर रहे हैं कि ला की पढ़ाई अब जरूरी हो गई है। राव ने सिकरेट्री रहने के दौरान 2010 में एलएलबी किया था। वो अब उनके ही काम आ रहा है। 31 मई को राव को कैट से राहत न मिलने पर राज्य सरकार को लगा था कि वे अब स्टे के लिए बिलासपुर हाईकोर्ट जाएंगे। सो, वहां केवियट लगाया था। मगर राव ने सरकार को गच्चा दे दिया। कैट जबलपुर में है, इसलिए उन्होंने जबलपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कैट के फैसले को चुनौती दे दी। और उन्हें राहत भी मिल गई। हाईकोर्ट ने कैट को मामले का जल्द निबटारा करने के साथ ही, तब तक सरकार को राव के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने के लिए कहा है। जबकि, हाईकोर्ट में केवियट लगाने के बाद सरकार बेफिकर थी कि अब राव को स्टे नहीं मिलेगा। अब, सरकार के समक्ष संकट पैदा हो गया है कि केडीपी से किस तरह निबटा जाए।

बड़ा सवाल

केडीपी राव के इंकार कर दिए जाने के बाद बिलासपुर कमिश्नर का पोस्ट 40 दिनों से खाली है। कैट में 31 जुलाई को अगली सुनवाई है। कैट कितना भी जल्दी करेगा, तो भी दो-तीन महीने लग जाएगा। तब तक अचार संहित लग जाएगी। ऐसे में, सरकार को किसी दूसरे आईएएस को बिलासपुर कमिश्नर पोस्ट करना पड़ेगा। अलबत्ता, कमिश्नर लेवल के अफसरों की भारी कमी है। डायरेक्ट आईएएस में कोई कमिश्नर बनने लायक नहीं है। कमिश्नर बोले तो, जो कहंी चल नहीं पा रहा हो। इन दिनों प्रमोटी आईएएस को ही डिवीजन में पोस्ट किया जा रहा है। उधर, सरगुजा कमिश्नर एमएस पैकरा भी इसी महीने रिटायर हो रहे हैं। सो, संकट और गहराएगा। प्रमोटी आईएएस में केआर पिस्दा और बीएस अनंत सिकरेट्री हैं। अनंत रायपुर से बाहर पोस्टिंग के इच्छुक नहीं हैं। पिस्दा को सरगुजा भेजने की खबर है। ऐसे में सरकार के सामने बड़ा सवाल है कि बिलासपुर किसे भेजा जाए। 

सिंहों के सिंह

सिंहों के साथ काम करने की वजह से पीएस टू सीएम बैजेंद्र कुमार का उनके मित्रों ने सरनेम ही बदल दिया है। मजाक में ही सही, उन्हें बैजेंद्र सिंह कहा करते हैं। जाहिर है, दिग्विजय सिंह, अर्जुन सिंह के बाद अब वे रमन सिंह के साथ काम कर रहे हैं। सो, डेसिंग के मामले में भी वे सिंह सरीखे ही हो गए है। मंत्रालय के एकमात्र आईएएस होंगे, जो किसी से हेठा नहीं खाते और मुंह पर ना बोलने का साहस रखते हैं। इसीलिए, सीएम भी उन्हें पसंद करते हैं। और अब, दरभा हमले के बाद ब्यूरोक्रेसी में उन्हें विबियन रिचर्ड कहा जाने लगा है। विब ने सही समय पर क्र्रिकेट से सन्यास ले लिया था। उसी तरह छह साल से पब्लिक रिलेशंस संभाल रहे बैजेंद्र ने अप्रैल में सीएम से बोलकर जनसंपर्क को बाय-बाय कर दिया था। अगर दो महीने और इस पद पर रह गए होते तो सोचिए क्या होता। पुलिस ने उन्हें शून्य पर ला दिया होता। दरभा हमले के बाद सरकार की छबि को पटरी पर लाने के लिए सिकरेट्री पीआर अमन सिंह को आखिर, कौन-कौन से जतन करने पड़ रहे हैं। हमले की रात चार बजे तक वे मीडिया को अपडेट देते रहे। उनका आखिरी एसएमएस विद्याचरण को मेदांता के लिए एयर एंबुलेंस से उड़ान भरने का था।

वल्र्ड हेरिटेज

सिरपुर की स्मृतियों का छत्तीसगढ़ में भले ही कोई मोल न हो, मगर दलाई लामा को वहां खुदाई में निकली बौद्ध की निशानियां इतना प्रभावित किया कि जनवरी में वे तीन दिन के दौरे पर फिर छत्तीसगढ़ आएंगे। उनके दौरे की तैयारियां शुरू हो गई है। तीनों दिन वे सिरपुर में ही कैम्प करेंगे। जाहिर है, वल्र्ड के मैप पर सिरपुर आ जाएगा। मार्च में दलाई लामा के आधा घंटे के विजिट के बाद गूगल पर सिरपुर का सर्च बढ़ गया है। हालांकि, दलाई लामा को सिरपुर लाने का लाभ टूरिज्म बोर्ड के एमडी संतोष मिश्रा का नम्बर बढ़ गया। तमिलनाडू से डेपुटेशन पर आए मिश्रा को सरकार ने फिलहाल टूरिज्म बोर्ड में बनाए रखने का फैसला किया है। वरना, राजनीतिक दबावों की वजह से उनको हटाने की चर्चा चल पड़ी थी। 

बुरी खबर

कैडर रिव्यू के बाद प्रमोशन के सपने देख रहे आईएफएस अफसरों को यह खबर परेशान कर सकता है कि केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय ने उनके प्रपोजल को मानने से इंकार कर दिया है। काफी विरोध के बाद भी राज्य सरकार ने कैडर रिव्यू का प्रस्ताव दिल्ली भेजा था। मगर वहां अड़ंगा लग गया है। बताते हैं, पीसीसीएफ धीरेंद्र मिश्रा को डीओपीटी के एक अफसर ने दो टू कह दिया कि छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य के लिए इतने बड़े सेटअप की कोई जरूरत नहीं है। इससे पहले, आईएफएस एसोसियेशन जब चीफ सिकरेट्री सुनिल कुमार से इस मामले में मिलने गया था तो उन्होंने कड़ी टिप्पणी की थी, आपलोग पद बड़ा और काम छोटा करना चाहते हैं। असल में, आईएफएस एसोसियेशन सर्किल में सीएफ के बजाए सीसीएफ पोस्ट करना चाहता है। कैडर रिव्यू में मेन प्वाइंट यही था।      

अंत में दो सवाल आपसे

1.    दिग्विजय सिंह ने कहा है, वे गुटबाजी कम करने छत्तीसगढ़ आए थे, इससे आप कितना सहमत हैं?
2.    एक ऐसे आईएएस का नाम बताइये, जो किसानों के पैसे से आला अफसरों को ब्लैकबेरी मोबाइल बांट दिया?

शनिवार, 1 जून 2013

तरकश, 2 जून

पैसा इतना और काम....

खुफिया पुलिस बढि़यां से काम करें, इसलिए रमन सरकार ने गोपनीय सूचनाओं की राशि बढ़ाकर साढ़े छह करोड़ कर दी मगर वह काम किस तरह कर रही है, दरभा हमले में इसकी पोल खुल गई। इससे कम राशि में आंध्रप्रदेश ने नक्सलियों का सफाया कर दिया। बस्तर में कोई घटना होती है, तो आंध्र को पहले खबर मिलती है, अपने को बाद में। आंध्र के मुखबिर बस्तर में जगह-जगह फैले हुए हैं। मगर जरा छत्तीसगढ़ का हाल देखिए, कांग्रेस काफिले पर हमले के दो दिन पहले से दरभा इलाके में नक्सलियों का मूवमेंट था। मगर खुफिया पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लग सकी। आपको बता दें, गोपनीय सेवा राशि का कोई हिसाब-किताब नहीं होता और ना ही आडिट। सूचना देने वालों को पुलिस अपने हिसाब से भुगतान करती है। छत्तीसगढ़ जब बना था, तब इसका बजट मात्र 5 लाख रुपए था। 2005 में सलवा-जुडूम प्रारंभ हुआ, तब तक यह बढ़कर 40 लाख पहुंचा था। और अब ये बढ़कर साढ़े छह करोड़ हो गया है। याने राज्य बनने के बाद इसमें 130 फीसदी का इजाफा हुआ है। और इसी हिसाब से नक्सली हिंसा भी बढ़ी है। 

होइहे सोई जो....

डीजीपी की कुर्सी संभालने के बाद रामनिवास ने आखिर क्या नहीं किया था। अवधूत शिवानंद महाराज ने रायपुर आकर य़ज्ञ किया। अभिषेक का जल पुलिस मुख्यालय में छिड़का गया। अवधूत बाबा खुद डीजीपी के कमरे में गए। वास्तु के हिसाब से डीजीपी के चेम्बर का दरवाजा से लेकर पीए रुम तक का नक्शा बदला गया। मगर कुछ काम नहीं आया। नक्सल इतिहास की सबसे शर्मनाक घटना छत्तीसगढ़ में हो गई। पूरा देश हिल गया। ट्रेन को हाईजैक कर कुख्यात अपराधी को भगा ले जाने की वारदात भी छत्तीसगढ़ में ही हुई। इस मामले में पूर्व डीजीपी अनिल नवानी किस्मती रहे। उनके 17 महीने के कार्यकाल में कोई बड़ी घटना नहीं हुई। पीएचक्यू के लोग अब काका को याद कर रहे हैं। 

दीया तले अंधेरा

राज्य की लालफीताशाही से पुलिस के आला अधिकारी भी नहीं बच पा रहे। आठ महीने बाद डीजीपी की कुर्सी संभालने वाले गिरधारी नायक भी इससे जूझ रहे हैं। नायक डीजी के लिए 30 साल की सेवा की अर्हता पूरी कर लिए हैं और संतकुमार पासवान के रिटायरमेंट के बाद डीजी की एक पोस्ट भी खाली है। इसके बाद भी उन्हें दो महीने से झुलाया जा रहा है। जबकि, आईएएस का प्रमोशन टाईम से दो-चार महीने पहले हो जाता है। टाईम से पहले नहीं हुआ तो उनके लिए यह प्रेस्टिज इश्यू बन जाता है। खैर, नायक तो एक बानगी हैं। ऐसे ढेरों केस हैं। ऐसे में पुलिस नक्सलियों से किस उत्साह से लडेंगी, समझा जा सकता है।

अलग-थलग

दरभा नक्सली हमले के बाद सबसे बड़ा खतरा बस्तर का अलग-थलग पड़ने का दिख रहा है। डेढ़ दशक में 2 हजार से अधिक नागरिकों और सुरक्षा बलों को मारने पर भी माओवादी आम लोगों में भय पैदा करने में कामयाब नहीं हो पाए थे। लोगों में धारणा थी कि माओवादी आम आदमी और जनप्रतिनिधियों को आमतौर पर निशाना नहीं बनाते। मगर दरभा के बाद यह धारणा टूट गई है। अब तो लोग बस्तर जाने की सोच कर कांप जा रहे। भय अफसरों में भी है। एक सीनियर आईएएस ने दो टूक कहा, अब तो कांकेर के आगे जाना ही नहीं है। जान है तो जहां है। सरकार हेलीकाप्टर देगी तब ही बस्तर जाया जाएंगे। मगर इस ओर किसी भी राजनीतिक पार्टी का ध्यान नहीं है। सभी आरोपी-प्रत्यारोप में लगी हुई हैं।  

सेंसेटिव मंथ

नक्सली हमले के हिसाब से फरवरी से मई तक का समय काफी संवेदनशील माना जाता है। अप्रैल और मई तो और भी ज्यादा। नक्सलियों ने बस्तर में पहला ब्लास्ट राजीव गांधी की मौत के दो दिन पहले 19 मई 1990 को किया था। तब आठ जवान शहीद हुए थे। देश को दहला देने वाली ताड़मेटला की घटना में 6 अप्रैल को हुई। दरभा हमला भी 25 मई को हुआ। आंकड़ों पर गौर करें तो बस्तर में 70 फीसदी से अधिक घटनाएं मार्च से मई के बीच हुई हैं। इसके बाद भी अगर खुफिया तंत्र सजग नहीं था तो फिर राज्य का भगवान ही मालिक हैं।

ब्लैक आपरेशन

आपरेशन ग्रीन हंट छत्तीसगढ़ के लिए ब्लैक आपरेशन बन गया। 6 अप्रैल 2010 को नक्सलियों ने सीआरपीएफ के 76 जवानों को मार डाला था, तब बस्तर में आपरेशन ग्रीन हंट चालू करने की तैयारी थी। घटना के बाद आपरेशन बंद कर दिया गया। चुनावी साल में नक्सलियों को मारने से सरकार को लाभ होगा, इस अंदेशे से पुलिस महकमा फिर आपरेशन ग्रीन हंट शुरू करने जा रहा था। हालांकि, मीडिया को इससे अनभिज्ञ रखा गया, लेकिन यह सौ फीसदी सही है कि ताड़मेटला कांड के तीन साल बाद फोर्स को जंगल में मूव किया जा रहा था। फोर्स कोई कार्रवाई करती, इससे पहले नक्सलियों ने खूनी हमले को अंजाम दे दिया।

खाता खुला

दरभा नक्सली हमले में रमन सरकार ने जगदलपुर एसपी मयंक श्रीवास्तव को सस्पेंड कर दिया। सस्पेंड होने वाले वे छत्तीसगढ़ के पहले आईपीएस होंगे। इससे पहले, राज्य बनने के बाद 12 साल में कोई आईपीएस निलंबित नहीं हुआ था। जबकि, तीन आईएएस सस्पेंड हो चुके हैं। और चैथा भी आजकल में सस्पेंड हो सकता है। बहरहाल, आईपीएस अफसरों का खाता खुल गया है। आगे देखिए, चुनावी साल में और किसका-किसका नम्बर लगता है। 

संकट में सौरभ

पीसीसी अघ्यक्ष नंदकुमार पटेल के नहीं रहने से अकलतरा विधायक सौरभ सिंह का कांग्रेस प्रवेश अटक सकता है। सौरभ का न केवल कांग्रेस प्रवेश पक्का हो गया था  बल्कि टिकिट मिलना भी तय था। सौरभ ने भी मन बना लिया था और इसकी जानकारी बताते हैं, उन्होंने बसपा को भी दे दी थी। बस, अब उन्हें कांग्रेस से हरी झंडी का इंतजार था। दरअसल, पटेल ने ही उन्हें अश्वस्त किया था और इसके लिए दिल्ली के नेताओं को राजी भी कर लिए थे। जबकि, अजीत जोगी खेमा सौरभ के कांग्रेस प्रवेश का लगातार विरोध कर रहा है। अब, चूकि जोगी खेमा प्रभावशाली हो गया है, जाहिर है, सौरभ की दिक्कतें बढ़ सकती हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1.    सरगुजा और बस्तर में आईजी रहे एएन उपध्याय के अनुभवों का लाभ नक्सली आपरेशन में क्यों नहीं लिया जा रहा है?
2.    प्रशासन और पुलिस के दो शीर्ष अधिकारी राज्यपाल से किसलिए मिलने गए थे?

















तरकश, 26 मई


झूला घर

मंत्रालय दूर बनने का खामियाजा यह हुआ कि उसका झूला घर का स्वरूप बनता जा रहा है। महिला कर्मियों को दुधमुंहा बच्चों के लिए लांच आवर में 30 किलोमीटर दूर रायपुर आना मुमकिन नहीं है। सो, कुछ महिला अफसर अपने बच्चों को लेकर मंत्रालय आ रही हैं। उनके साथ कार से बच्चे को लेकर आया आती है। और शाम को साथ ही घर लौटती है। यही वजह है कि आजकल मंत्रालय के कुछ कमरों से बच्चों की किलकारियां सुनाई पड़ती है। खैर, उंचे ओहदे पर बैठी महिला अफसरों को ज्यादा परेशानी इसलिए नहीं है, क्योंकि, उन्हें दो कमरे वाला चेम्बर मिला हुआ है। एक में वे बैठती हैं, और दूसरे में आया और उनका बच्चा। मगर छोटे अधिकारियों और कर्मचारियों को परेशानी है। न उनके पास कार है, न आया है और ना ही एक्सट्रा कमरा। पता चला है, मंत्रालय कर्मचारी संघ अब चीफ सिकरेट्री सुनिल कुमार से मंत्रालय में झूला घर बनवाने के लिए मिलने वाला है।

बड़े घर में

सूबे के दो कुंवारे आईएएस में से एक, बिलासपुर नगर निगम कमिश्नर अवनिश शरण की शादी पक्की हो गई है। शादी देर से हो रही है मगर बड़े घर में हो रही है। सीबीआई डायरेक्टर रंजीत सिनहा की बेटी स्मिता से। छत्तीसगढ़ के लिए इससे अच्छी बात क्या होगी। देश के शीर्ष जांच एजेंसी के चीफ की बेटी छत्तीसगढ़ की बहू बनकर आ रही हैं। 21 मई को दिल्ली में अवनिश की सगाई हुई और जुलाई में शादी होगी। उनकी होने वाली पत्नी आईबी में पोस्टेड हैं। और शादी के बाद घूमने-फिरने के लिए स्विटजरलैंड की टिकिट भी हो चुकी है। उधर, दूसरे आईएएस ओपी चैधरी की भी सगाई हो चुकी है। मगर शादी कब होगी, यह तय नहीं है। उनकी मंगेतर एमबीबीएस करने के बाद दिल्ली में यूपीएससी की तैयारी कर रही हैं। 

मोदी और रमन

राजनांदगांव की सभा में नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ को सबसे तेज प्रगति करने वाला राज्य बताकर रमन को स्वाभाविक तौर पर अपने करीब कर लिया है। चुनाव के पहले विकास यात्रा के जरिये लोगों से सीधे संवाद करने निकले रमन की 18 मई को राजनांदगांव सभा में पहुंचे मोदी ने रमन के तारीफ की झड़ी लगा दी, बल्कि यहां तक कह डाला कि रमन सिंह देश के पहले सीएम होंगे, जो अपने कार्यों का हिसाबा देने जनता के बीच जा रहे हैं और मुझे गर्व होता है कि मैं रमन का मित्र हूं। मोदी यहीं नहीं रुके, उन्होंने कहा, छत्तीसगढ़ का जिस तरह विकास हो रहा, आने वाले पांच बरसों में वह गुजरात से भी आगे निकल जाएगा। तो रमन ने भी गुजरात को विकास का माडल बताया। गौरतलब है, भाजपा में प्रधानमंत्री के प्रत्याशी के मसले पर मध्यप्रदेश के सीएम शिवराज सिंह आडवानी की वकालत कर रहे हैं। तो आडवानी भी विभिन्न मंचों से शिवराज की तारीफ करते नहीं थकते। ऐसे में, रमन सिंह अब नरेंद्र मोदी के साथ खड़े दिखाई दें, तो अचरज नहीं।
वोट फार्मूला
विधानसभा चुनाव को देखते राज्य के कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू ने मतदाताओं से सीधा संपर्क करने के लिए अलग तरीका निकाला है। विकास यात्रा के सिलसिले में वे हफ्ते भर से अपने विधानसभा क्षेत्र के दौरे पर हैं, और इस दौरान जिस गांव में शाम हो जाती है, वहां किसी किसान के घर या खलिहान में रात्रि विश्राम कर रहे हैं। और उसी घर में भोजन भी। हालांकि, उनका अभनपुर विधानसभा रायपुर से बहुत दूर नहीं है। कहीं से भी वे अधिकतम घंटे भर में राजधानी लौट सकते हैं। लेकिन मतदाताओं को रिझाने के लिए तकलीफ तो सहनी पड़ेंगी न।

लकी मुख्यालय

बीजेपी का भव्य और हाईटेक मुख्यालय बन कर तैयार हो जाने के बाद भी पुराना आफिस याने एकात्म परिसर का मोह पार्टी नहीं छोड़ पा रही है। भाजपा की समूची गतिविधियां यहीं से संचालित हो रही है। पता चला है, विधानसभा चुनाव के बाद ही वहां के बारे में सोचा जाएगा। इसकी वजह यह है कि एकात्म परिसर बीजेपी के लिए काफी लकी रहा है। इस बिल्डिंग के बनने के बाद सूबे में न केवल भाजपा की सीटें बढ़ीं बल्कि दो-दो बार सरकार बनाने मे ंकामयाब रही। तो ऐसे लकी मुख्यालय को भला कौन छोड़ना चाहेगा। वो भी चुनाव के समय में।

सबसे पहले

अटलबिहारी सरकार ने देश में छह नए एम्स बनाने की घोषणा की थी, उनमें से रायपुर एम्स का ओपीडी सबसे पहले प्रारंभ होने जा रहा है। 3 जून इसकी तारीख मुकर्रर हो गई है। बाकी पांच, 1 जुलाई से शुरू होंगे। एम्स को जिस तरह से तैयार किया जा रहा है, वह छत्तीसगढ़ के लिए वारदान साबित होगा। वारदान इसलिए, कि अस्पताल खुलने से पहले ही वहां राज्य की सिकलसेल, फल्सीफेरम मलेरिया जैसी गंभीर बीमारियों पर काम चालू हो गया है, जिससे हर साल सैकड़ों लोग असमय काल के ग्रास बन जाते हैं। सिकलसेल पर डाटा कलेक्ट किया जा रहा है और शुक्रवार को इस पर एम्स में कांफें्रस हुई। साल के अंत तक एम्स में ट्रामा सेंटर खुल जाएगा और अगले साल तक सेंट्रल इंडिया का यह सबसे बड़ा अस्पताल पूर्ण स्वरूप में आ जाएगा। फिलहाल, 67 डाक्टरों की नियुक्ति हो गई है। रायपुर एम्स इस मामले में भी लकी है कि उसे डा0 नागरकर जैसे डायरेक्टर मिले हैं। लंबे समय तक इंगलैंड में रहने के बाद नागरकर पीजीआई चंडीगढ़ में मेडिकल सुपरिंटेंडेंट बनकर लौटे। और अब उन्होंने एम्स ज्वाईन किया है।

अंत में दो सवाल आपसे

1.    बिलासपुर नगर निगम कमिश्नर अवनिश शरण से बड़े-बड़े आईएएस, आईपीएस और मिनिस्टर क्यों चमकने लगे हैं?
2.  विकास यात्रा के बाद रायपुर और बिलासपुर संभाग के किन दो कलेक्टरों की छुट्टी तय मानी जा रही है?



शनिवार, 18 मई 2013

तरकश, 19 मई

गीता का ज्ञान

मुकाम हासिल करने के लिए सूबे के एक वरिष्ठ मंत्री ने कोई कसर नहीं छोड़ी। राज्य के कोने-कोने में समर्थकों की फौज-फटाका तैयार करने से लेकर हर साल साधु-संतों का जमावड़ा तक। मगर कोई युक्ति काम नहीं आ रही है। बल्कि, मंजिल उनसे और दूर होती जा रही है। अब, वे अपने बंगले में श्रीमद्भागवत कथा करा रहे हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है, कर्म पर तुम्हारा अधिकार है, फल पर नहीं। इसलिए, फल की चिंता मत करो। तुम अपना काम करते जाओ। मंत्रीजी को भी फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। राजयोग बनेगा, तो स्वयमेव उनके मन की मुराद पूरी हो जाएगी।    

जातिवाद की ट्रेनिंग

 वैसे तो राजधानी के स्टेट इंस्टिट्यूट आफ रुरल डेवलपमेंट में पंचायत एवं ग्रामीण विकास से संबंधित लोगों को टे्रनिंग दी जाती है, मगर इन दिनों वहां जातिवाद की टे्रनिंग चल रही है। परशुराम जयंती के दिन तो इंतेहा हो गई। दिल्ली से विशेष तौर पर आमंत्रित वक्ता ने इंस्टिट्यूट के सेमिनार हाल में ब्राम्हणों को जी भर कर गालियां बकी। इतनी भद्दी कि सभ्य आदमी कान पर हाथ रख ले। असल में, जिस अफसर को इंस्टिट्यूट में पोस्ट किया गया है, वे एक खास विचारधारा से ताल्लुकात रखते हंै। और उन्हें अपने विचारधारा को सींचने के लिए सरकार ने बढि़यां अवसर जो मुहैया करा दिया है।
 

अग्रेसिव स्ट्रेज्डी


विकास यात्रा शुरू होने के बाद पत्र-पत्रिकाओं में सीएम और उनकी योजनाआंे को प्रमुखता ऐसे ही नहीं मिल रही है। बल्कि, इसके पीछे नए सिकरेट्री पीआर अमन सिंह की अग्रेसिव स्टे्रज्डी है। वे पहले जनसंपर्क सचिव होंगे, जो ब्यूरोके्रटिक इगो त्याग कर अखबारों के दफ्तरों में गए। और अब, शायद ही कोई दिन जाता होगा, जब वे प्रभावशाली मीडिया संस्थानों से उनकी बात न होती होगी। आशय विनम्र आग्रह होता है कि सरकार विज्ञापन दे रही है, तो उसकी खबरों को भी वेटेज दिया जाए। और अमन सिंह जैसे प्रभावशाली शख्सियत नियमित संपर्क में रहे, तो सरकारी खबरों की अनदेखी भला कैसे की जा सकती है। यहीं नहीं, विकास यात्रा में फलां तारीख को किस जर्नलिस्ट को सीएम के हेलिकाप्टर पर या विकास रथ पर भेजना है, फोटो किस तरह की होगी, विज्ञापन का मजमूं क्या होगा, इसका स्क्रिप्ट अमन के हाथ में रहता है। शुक्रवार को वे राजनांदगांव के एक पुलिस अफसर को फोन करते हैं, विकास रथ पर साब की फोटो क्लीयर नहीं आ रही, के्रन का इंतजाम कर फोटो खिंचवाओ। दो मिनट बाद टीवी पर डांेगरगढ़ सभा का लाइव देखकर एक टीवी चैनल को फोन लगवाते हैं, कैमरा सिर्फ मंच पर ही फोकस है, उसे भीड़ को भी कवर करना चाहिए। विकास यात्रा को कवर करने दिल्ली की मीडिया भी पहुंच रही है। एसएमएस के जरिये मीडिया को पल-पल की खबरें सेंड की जा रही है। डीपीआर ओपी चैधरी यात्राओं में साथ चल रहे हैं। ऐसे में कवरेज क्यों नहीं मिलेगा।   

लकी मुख्यालय

बीजेपी का भव्य और हाईटेक मुख्यालय बन कर तैयार हो जाने के बाद भी पुराना आफिस याने एकात्म परिसर का मोह पार्टी नहीं छोड़ पा रही है। पार्टी की समूची गतिविधियां यहीं से संचालित हो रही है। पता चला है, विधानसभा चुनाव के बाद ही वहां के बारे में सोचा जाएगा। इसकी वजह यह है कि एकात्म परिसर बीजेपी के लिए काफी लकी रहा है। इस बिल्डिंग के बनने के बाद सूबे में न केवल भाजपा की सीटें बढ़ीं बल्कि दो-दो बार सरकार बनाने मे ंकामयाब रही। तो ऐसे लकी मुख्यालय को भला कौन छोड़ना चाहेगा। वो भी चुनाव के समय में।

सबसे पहले

अटलबिहारी सरकार ने देश में छह नए एम्स बनाने की घोषणा की थी, उनमें से रायपुर एम्स का ओपीडी सबसे पहले प्रारंभ होने जा रहा है। 3 जून इसकी तारीख मुकर्रर हो गई है। बाकी पांच, 1 जुलाई से शुरू होंगे। एम्स को जिस तरह से तैयार किया जा रहा है, वह छत्तीसगढ़ के लिए वारदान साबित होगा। वारदान इसलिए, कि अस्पताल खुलने से पहले ही वहां राज्य की सिकलसेल, फल्सीफेरम मलेरिया जैसी गंभीर बीमारियों पर काम चालू हो गया है, जिससे हर साल सैकड़ों लोग असमय काल के ग्रास बन जाते हैं। सिकलसेल पर डाटा कलेक्ट किया जा रहा है और शुक्रवार को इस पर एम्स में कांफें्रस हुई। साल के अंत तक एम्स में ट्रामा सेंटर खुल जाएगा और अगले साल तक सेंट्रल इंडिया का यह सबसे बड़ा अस्पताल पूर्ण स्वरूप में आ जाएगा। फिलहाल, 67 डाक्टरों की नियुक्ति हो गई है। रायपुर एम्स इस मामले में भी लकी है कि उसे डा0 नागरकर जैसे डायरेक्टर मिले हैं। लंबे समय तक इंगलैंड में रहने के बाद नागरकर पीजीआई चंडीगढ़ में मेडिकल सुपरिंटेंडेंट बनकर लौटे। और अब उन्होंने एम्स ज्वाईन किया है। 

अच्छी खबर

ऐसे दौर में जब बुजुर्ग माता-पिता बोझ समझे जाने लगे हों, लोग पत्नी और अपनी संतान से इतर सोच नहीं पाते, बिलासपुर के युवा पत्रकार यशवंत गोहिल का प्रयास लोगों के लिए एक प्रेरणा बन सकती है। मदर्स डे के दिन यशवंत ने अपनी दादी के 100 साल होने पर समारोहपूर्वक उनका जन्मदिन मनाया। दादी के मनभावन भजनों पर आधारित एक पुस्तक का विमोचन किया गया और सारगर्भित संगोष्ठी भी हुई। काश! और लोग भी इससे नसीहत लेते, तो आज बुजुर्गोंे की यह दशा नहीं होती।  

अंत में दो सवाल आपसे

1.    भाजपा के एक लाल बत्ती वाले नेता का नाम बताइये, जो शादी के बाद विशाखापटनम में बसने के बारे में सोच रहे हैं?
2.    क्या अमित जोगी को बेलतरा और महंत गुट को बिलासपुर से टिकिट देने और जीतवाने की कांग्रेस में कोई डील हुई है?

शनिवार, 11 मई 2013

तरकश, 12 मई


कांग्रेस की डील


पिछला हफ्ता कांग्रेस के लिए काफी अहम रहा। और राजधानी में अमितेश शुक्ल के निवास पर कांग्रेस के सभी गुटीय नेताओं का एक टेबल पर बैठकर भोजन करना उतना महत्वपूर्ण नहीं था, जितना कि दिल्ली से दिग्विजय सिंह के साथ रेणू जोगी और अमित जोगी का रायपुर आना रहा। तीनों नियमित विमान के एक्जीक्यूटिव क्लास में साथ आएं। सियासी पंडितों की मानें तो दिल्ली में कोई बड़ी डील हुई और उसके बाद कांग्रेस में परिस्थितियां तेजी से पलटी है। लोगों में उत्सुकता इस बात की है कि दिग्गी ने किस शर्त पर डील कराई। जाहिर है, जोगी गुट कम में तो समझौता किया नहीं होगा। उसकी झलक दिख भी रही है। दिग्गी की वापसी के बाद अमित जोगी ने जब गुरूवार को दो दिनों की बिलासपुर शहर की पदयात्रा शुरू की तो विरोधी गुट के नेता भी अमित के पीछे-पीछे दौड़ते दिखे। अमित हीरो की तरह घूमे और बिलासपुर के बड़े नेता उनके पीछे-पीछे। बिलासपुर के लोग यह नजारा देखकर अवाक थे। चैक-चैराहों पर अमित का स्वागत करने के लिए महंत गुट, पटेल गुट के नेताओं की होड़ लग गई थी। इनमें कुछ तो पिछले एक दशक से जोगी का एलानिया विरोध करते आ रहे थे और पिछले लोकसभा चुनाव में रेणू जोगी को हराने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन डील का ही नतीजा है कि अब, सब कुछ बदल गया है। 

नो कमेंट्स


अपने राज्य में करप्शन की स्थिति क्या है, जरा इस पर गौर कीजिए। मल्टीमीडिया के जरिये 12वीं के छात्रों को साइंस पढ़ाने के लिए एससीईआरटी ने पिछले दिनों टेंडर किया था। टेंडर में तीन पार्टियों ने अप्लाई किया। सबसे लो रेट था 90 लाख और सबसे हाई 30 करोड़। स्कूल शिक्षा विभाग की कोशिश थी कि 30 करोड़ वाले को काम मिल जाए। 30 करोड़ याने 20 फीसदी के हिसाब से छह करोड़ अंदर होने की गारंटी। बल्कि उससे अधिक भी। मगर 90 लाख सबसे कम रेट था और नियमानुसार उसे ही काम मिलना था। 90 लाख वाली मुंबई की पार्टी थी और उसका कहना था कि उसने कम रेट इसलिए कोट किया है कि वह सीबीएसई के लिए इसी तरह का प्रोग्राम बनाती है। उसके लिए यह बेहद आसान है। एससीईआरटी ने मुंबई की पार्टी को फाइनल करते हुए फाइल आगे बढ़ाया। मगर उसे काम नहीं मिलां। सरकार ने टेंडर निरस्त करके दोबारा टेंडर करने का फारमान जारी कर दिया। कारण बताया गया, रेट बहुत कम है, इसलिए वह काम नहीं कर पाएगी। एक ओर, आईपीएल के लिए 32 करोड़ का काम पीडब्लूडी ने 21 करोड़ में करके चमत्कृत कर डाला और दूसरी ओर, स्कूल शिक्षा विभाग मल्टीमीडिया प्रोग्राम को 90 लाख के बजाए 30 करोड़ में कराने के लिए प्रेशर बना रहा है। ताज्जुब यह कि दोनों विभागों का मंत्री एक है। तो फिर गड़बड़ी कहां हो रही है। नो कमेंट्स।

पुनर्वास


रिटायर डीजीपी अनिल नवानी को पुलिस शिकायत प्राधिकरण में पुनर्वास मिलने के बाद कई रिटायर आईपीएस ने कोशिशें तेज कर दी है। खबर तो ये भी है कि विकास यात्रा के बाद एक और रिटायर डीजी का किसी आयोग में एडजस्टमेंट हो जाएगा। इसे देखते एक अन्य रिटायर डीजीपी भी सरकार से रिश्ते सुधारने में जुट गए हैं। असंतुष्टों का जमावड़ा लगाने से उन्हंे आखिर कोई लाभ नहीं हुआ। पिछले हफ्ते वे मंत्रालय में सिकरेट्री टूू सीएम अमन सिंह से मिले। काफी देर तक चर्चा हुई। अब अमन सिंह से मिलने का मतलब समझा जा सकता है।    

अंडर एस्टीमेट


सत्ताधारी पार्टी स्वाभिमान मंच को भले ही हलके में ले रही हो, मगर विधानसभा चुनाव में वह दुर्ग का येदियुरप्पा बन जाए, तो आश्चर्य नहीं। पुराने दुर्ग जिले में 12 सीटें हैं। इनमें से सात भाजपा और पांच कांग्रेस के पास है। दुर्ग जिले में 12 परसेंट साहू वोट है। ओबीसी की बात करें तो 30 फीसदी से अधिक। कांग्र्रेस स्वाभिमान मंच की अहमियत समझ रही है। तभी दिग्विजय सिंह के रायपुर प्रवास में दीपक साहू की उनकी बंद कमरे में मीटिंग कराई गई। पता चला है, चुनाव में कांग्रेस मंच को पूरी मदद करेगी। हर तरह की मदद। बस, उसे अपना प्रत्याशी उतारना होगा।  


अब राजनीति


इस बार का विधानसभा चुनाव इस मायने में भी दिलचस्प होगा कि इसमें कुछ रिटायर नौकरशाह भी राजनीति के मैदान मंे किस्मत आजमाते नजर आएंगे। राज्य सूचना आयोग में पोस्टेड एक रिटायर आईएएस राज्यसभा की ट्रेन छूटने के बाद अब कुनकुरी से विधानसभा में जाने की तैयारी कर रहे हैं। महीने में तीन-चार चक्कर उनका कुनकुरी का लग जा रहा है। आयोग के एक कमिश्नर बेमेतरा से भाजपा की टिकिट के लिए प्रयासरत हैं। गृह विभाग के ज्वाइंट सिकरेट्री एसपी सोढ़ी ने वीआरएस के लिए आवेदन लगाया ही है। खबर है, वे कांकेर के लिए ट्राई कर रहे हैं। तीन साल से अंबिकापुर में पोस्टेड कमिश्नर एमएस पैकरा इस साल जुलाई में रिटायर होंगे। वे भी विधानसभा चुनाव के लिए वार्मअप हो रहे हैं। रिटायर आईएएस एवं गोंडवाना समाज के अध्यक्ष बीपीएस नेताम भी टिकिट की दौड़ में पीछे नहीं हैं। आईजी होमगार्ड आरसी पटेल के चुनाव लड़ने की चर्चा तो काफी पहले से है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इनमे ंसे कितने टिकिट पाने में कामयाब हो पाते हैं। 

दीया तले अंधेरा


याद होगा, मंत्रालय की सुरक्षा में तैनात एक 55 वर्षीय डीएसपी यूपी में 15 वर्षीय बालिका से शादी रचाते पकड़ा गया था। यह मामला मीडिया में खूब उछला और यूपी में छत्तीसगढ़ पुलिस की खासी फजीहत हुई थी। मगर इसके तीसरे दिन डीएसपी वाकी-टाकी धरे मंत्रालय में डृयूटी करते पाया गया। असल में, यूपी में यादवों की सरकार है, छग पुलिस में यादवों का दबदबा है और डीएसपी भी यादव है। ऐसे में कार्रवाई कैसे होगी। अलबत्ता, अफसरों का कु-तर्क है, उसे डार्क में रखकर शादी की जा रही थी। याने नहीं बताया गया कि लड़की नाबालिग है। बात गले नहीं उतर रहा। एक डीएसपी बिना लड़की देखे शादी कर लेगा। बहरहाल, आम आदमी ऐसा गुस्ताखी करें, तो उसे यही पुलिस सलाखों के पीछे भेजने में देर नहीं लगाती। नैतिकता के नाते डीएसपी को कम-से-कम मंत्रालय जैसी जगह से तो हटा देना था। मगर ऐसा नहीं हुआ। याने दीया तले अंधेरा वाली ही स्थिति है। 

अंत में दो सवाल आपसे

1. प्रींसिपल सिकरेट्री केडीपी राव का तबादला क्यांे किया गया?
2. आईएफएस अफसर आनंद बाबू की के्रडा में पोस्टिंग का क्रेडा के किस अफसर के इशारे पर कर्मचारियों ने विरोध किया?



रविवार, 5 मई 2013

तरकश, 5 मई

खफा

जीएमआर ने आईपीएल कराकर भले ही वाहवाही बटोर ली मगर लाख कोशिशों के बावजूद उद्योग मंत्री राजेश मूणत की नाराजगी दूर न कर सका। जीएमआर के अफसरों ने मंत्री को मनाने की अपनी ओर से कम कोशिशें नहीं की। उन्हें पूरा कारपोरेट बाक्स की टिकिट का आफर दिया गया। मगर मूणत टस-से-मस नहीं हुए। रायपुर से ही उनके साथी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने आईपीएल में अपनी ताकत दिखाने की कोई कमी नहीं की। मगर जीएमआर से नाराजगी का लेवल इतना ज्यादा था कि मूणत मैच देखने तक नहीं गए। ऐसे में सत्ता के गलियारों में इसकी चर्चा कैसे नहीं होगी। लोगों की उत्सुकता नाराजगी की वजह जानने की है।

 

वाह भाई!


मुद्दों को हाईजैक करना कोई पीडब्लूडी मिनिस्टर बृजमोहन अग्रवाल से सीखे। छत्तीसगढ़ क्रिकेट संघ को स्टेडियम की चाबी सौंपने के मौके पर अग्रवाल को जब नहीं बुलाया गया, तो बंद कमरे में किसी को कोसने के बजाए अगले दिन खेल और पीडब्लूडी अफसरों को साथ लेकर स्टेडियम का निरीक्षण करने चले गए। और वहां से फोटो के साथ बयान जारी हुआ, 60 दिन की मिली चुनौती और 45 दिनों में कर दिखाया। स्टेडियम को पीडब्लूडी ने तैयार किया, इसलिए उन्होंने इसे कैश करने की कोई कोशिश नहीं छोड़ी। जबकि, स्टेडियम से बृजमोहन को अलग रखा गया। आईपीएल लाने में सिकरेट्री टू सीएम अमन सिंह की भूमिका अहम रही तो स्टेडियम को तैयार करने की पूरी कमान चीफ सिकरेट्री सुनील कुमार और आरपी मंडल की टीम ने संभाली थी। मगर बृजमोहन तो बृजमोहन हैं। वे माहौल बनाना जातने हैं।

अब वनडे


आप ताज्जुब मत कीजिएगा, अगर अक्टूबर, नवम्बर मंे रायपुर में आस्टे्रलिया का वन डे मैच हो जाए। इसके लिए रमन के रणनीतिकारों ने कोशिशें शूरू कर दी है। बीसीसीआई के उपाध्यक्ष राजीव शुक्ल ने भी संकेत दिए हैं कि छत्तीसगढ़ को एक वनडे की मेजबानी मिल सकती है। उधर, दिल्ली किक्रेट एसोसियेशन के अरुण जेटली के जरिये बीसीसीआई को साधने में सरकार जुट गई है। चुनाव के दौरान वन डे मिलने का मतलब समझा जा सकता है सरकार के लिए कितना फायदेमंद रहेगा। आईपीएल से ही सत्ताधारी पार्टी की रेटिंग बढ़ गई है। और क्रिकेट ऐसा इश्यू है कि कांग्रेस भी इसका विरोध नहीं कर पाएगी। आईपीएल का शुरू मे कांग्रेस नेताओं ने विरोध किया था मगर हवा का रुख भांपकर बाद में खामोश रहना ही बेहतर समझा। 

हैट्रिक


रायपुर के आईपीएल में भले ही हैट्रिक न बन सकी, मगर महीने भर के भीतर सूबे के तीन आईएएस अफसरों ने राष्ट्रीय स्तर पर धमक दर्ज कराने की हैट्रिक जरूर बनाई है। एक नेशनल डेली के सर्वे में पीएस टू सीएम एन बैजेंद्र कुमार देश के दूसरे प्रभावशाली ब्यूरोके्रट्स चुने गए। डायरेक्टर पब्लिक रिलेशन ओपी चैधरी को धुर नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा में एजुकेशन प्रोग्राम के लिए प्रधानमंत्री के हाथों राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। और अब हाउसिंग बोर्ड कमिश्नर सोनमणि बोरा को केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय ने देश के उन पांच आईएएस अफसरों में शामिल किया है, जिन्होंने फील्ड में मार्केबल काम किया है। बिलासपुर कलेक्टर रहने के दौरान बोरा ने महतारी एक्सप्रेस योजना शुरू की थी। बाद मंे राज्य सरकार ने इसे पूरे प्रदेश में लागू किया। डीओपीटी ने इसे पसंद किया है। नागपुर में 6 मई से होने जा रही डीओपीटी की कांफ्रेंस में आल इंडिया सर्विसेज के चुनिंदा 50 अफसरों के बीच बोरा अपने कामों को शेयर करंेगे। कुल मिलाकर कहा जा सकता है, अप्रैल महीना नौकरशाहों के लिए बढि़यां रहा। कम समय, कम लागत और क्वालिटी वर्क का सेहरा आखिर, ब्यूरोके्रट्स के माथे पर ही बंधा। पीएस हेल्थ एमके राउत ने स्मार्ट कार्ड से बिदक रहे प्रदेश के डाक्टरों को समझौते के मेज पर लाने का काम बखूबी किया। वहीं, आरएस विश्वकर्मा ने गुजरे महीने कामर्सियल टैक्स और आबकारी से रिकार्ड 400 करोड़ रुपए जुटाया।

सुरक्षित सीट


दूसरा कोई नेता पुत्र विधानसभा चुनाव लड़े या न लड़े, अजीत जोगी के बेटे अमित का अबकी चुनाव लड़ना तय है। और यह भी तय है कि बिलासपुर जिले की किसी सीट से राजनीति में अपनी किस्मत आजमाएंगे। जोगी खेमा उनके लिए चार सीटों पर काम कर रहा है, बेलतरा, बिल्हा, कोटा और तखतपुर। बेलतरा भाजपा के बद्रीधर दीवान का क्षेत्र है और कांग्रेस के लिए यह सबसे मुफीद है। मगर वह ब्राम्हण बाहूल्य सीट है और ब्राम्हण सपोर्ट करेंगे कि नहीं, जोगी कैंप में संशय है। फिर बेलतरा में महंत गुट भी खासा प्रभाव है। गुरूवार को परिवर्तन रैली में महंत गुट के एक अल्पज्ञात नेता की रैली में अधिक भीड़ जुट जाने के कारण जोगी गुट को अपना कार्यक्रम निरस्त करना पड़ गया। एससी वोटों के चलते अमित का बिल्हा क्षेत्र में भी मूवमेंट हो रहा है। बिल्हा स्पीकर धरमलाल कौशिक का इलाका है। सियासी पंडितों का कहना है, बेलतरा और बिल्हा में बात नहीं बनीं, तो अमित अपनी मां की कोटा सीट से चुनाव लड़ना पसंद करेंगे। 

खैर नहीं


सेल टेक्स चोरी करने वाले कारोबारियों की अब खैर नहीं। उन पर शिकंजा कसने के लिए सरकार अब पुलिस की तरह मुखबिर तैनात करने जा रही है। मुखबिर बाजार पर नजर रखेंगे और वाणिज्यिक कर विभाग को सेल टैक्स चोरी की सूचना देंगे। इस आधार पर विभाग छापे की कार्रवाई करेगा। अफसरों का अनुमान है कि सेल टैक्स की चोरी पर लगाम लग जाए, तो वाणिज्यिक कर विभाग का 15 से 20 फीसदी राजस्व बढ़ जाएगा। चलिये, बिना टैक्स बढ़ाए ही राजस्व बढ़ जाए, तो सरकार के लिए इससे अच्छी बात क्या होगी।

अंत में दो सवाल आपसे

1.    राजस्व कम होने पर जब गणेशशंकर मिश्रा को सरकार ने हटा दिया तो अप्रैल महीने में ही बोर्ड और कारपोरेशन के आगे हाथ फैलाने पर वित्त विभाग के अफसरों के खिलाफ कार्रवाई क्यां नहीं होनी चाहिए?
2.    अनिल नवानी के बाद अब किस रिटायर आईपीएस की पुनर्वास की चर्चा है?



शनिवार, 27 अप्रैल 2013

तरकश, 28 अप्रैल


छक्का


आईपीएल में चैका-छक्का पड़ने के दो रोज पहले ही मुख्यमंत्री डा0 रमन सिंह ने शिक्षाकर्मियों को रेगुलर टीचर के सामान वेतन और सुविधाएं देने का ऐलान करके सियासी छक्का लगा दिया। इस छक्के के दर्द को कांग्रेस से अधिक भला कौन महसूस कर सकता है। कहां इसे बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी हो रही थी। आखिर, सवा लाख शिक्षक कम नहीं होते। ग्रामीण इलाके में वोटों के समीकरण को बनाने-बिगाड़ने में इनकी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सो, आंदोलन के दौरान शिक्षाकर्मियों और सरकार के बीच तल्खी आई तो विरोधी पार्टियांे की बांछे खिल गई थी। उन्हें लगा, सवा लाख एजेंट हमें मुफ्त में मिल गए। इसे गुगली के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। जोगी सरकार के समय लाठी खाने के बाद भी शिक्षाकर्मियों का स्वाभाविक झुकाव कांग्रेस की ओर बढ़ रहा था। मगर रमन ने गुगली पर छक्का जड़ कर बता दिया कि हैट्रिक बनाना है, इसलिए कोई मौका नहीं देंगे।

मुसीबत 


आईपीएल को लेकर सूबे के लोगों में भले ही जबर्दस्त उत्साह हो, मगर 90 विधायकों और छह महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के टिकिट के चार सौ से अधिक दावेदारों के लिए यह किसी मुसीबत से कम प्रतीत नहीं हो रहा हैं। कितने को आईपीएल की टिकिट दें और किसे नाराज करें। सिर्फ टिकिट ही नहीं, गाड़ी में रायपुर लेकर आने से लेकर ठहरने, खाने-पीने का भी इंतजाम। आईपीएल में दोनों पार्टियों के नेता लंबे से उतर रहे हैं। टिकिट का शार्टेज ऐसे ही नहीं हुआ। खेल विभाग के एक आला अधिकारी की मानें तो चुनावी साल में आधे से अधिक टिकिट तो नेताओं ने खरीद लिया। 90 में से 55 विधायकों ने 14 हजार टिकिट लिया है। एक मंत्रीजी ने अकेले 2 हजार टिकिट का इंतजाम किया है। यह अलग बात है कि इसके लिए आधा दर्जन ठेेकेदारों को टोपी पहनाया गया। अब, ऐसे में टिकिट की क्रायसिस तो होनी ही थी।

दीवानगी


राज्य के मंत्रियों को क्रिकेट से कोई लगाव नहीं है लेकिन कई नौकरशाहों में इसकी जबर्दस्त दीवानगी है। मंत्रालय में अधिकांश अफसरों के चेम्बर में काम के दौरान क्रिकेट भी चलता रहता है टीवी पर। सीएम सचिवालय में अमन सिंह और सुबोध सिंह एवं पीएस एमके राउत और आरपी मंडल क्रिकेट प्रेमी अफसरों मंे सबसे उपर हंै। फाइलों में डूबे होने के बाद भी अमन की एक आंख टीवी पर रहती है। आसपास के शहरों में कहीं मैच हो, तो राउत और मंडल वहां जाना हीं भूलते। इनमें से कई तो चंडीगढ़ और मुंबई तक हो आते हैं। इसलिए, ब्यूरोक्रेसी में नौकरशाही का क्रेज समझा जा सकता है।

भरोसा


अजीत जोगी सरकार के समय डिप्टी एडवोकेट जनरल रहे युवा अधिवक्ता संजय अग्रवाल को रमन सरकार ने जब एडवोकेट जनरल बनाना चाहा तो संगठन के भीतर ही कई तरह की बातें हुई थीं। मगर संघ की पृष्ठभूमि के पूर्व एजी जो काम न करा सकें, वह संजय अग्रवाल ने करा दिया। सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट कमल विहार, पीएससी, सब इंस्पेक्टर भरती जैसे कई केसेज में सरकार के पक्ष में फैसले हुए हैं। कमल विहार के खिलाफ तो दर्जन भर से अधिक याचिकाएं लगी थी। और ज्यादातर सत्ताधारी पार्टी के नेताओं ने लगवाई थी। हाईकोर्ट ने समूची याचिकाओं को खारिज कर दिया। 48 वर्ष के अग्रवाल देश के सबसे युवा एजी होंगे। और साढ़े नौ साल में पहला मौका है, जब सरकार एजी के पारफारमेंस से प्रसन्न है। ठीक की कहा गया है, लेवल के बजाए काम पर जाना चाहिए। तेज आदमी पर किसी का भी लेवल लगा हो, वह काम में तेज ही होगा।

जन्मोत्सव 


राजनेताओं को ताकत दिखाने के लिए जन्मदिन से बढि़यां कोई मौका नहीं होता। उपर से चुनावी साल हो, तब तो मत पूछिए। अजीत जोगी का 29 अप्रैल और बृजमोहन अग्रवाल का 1 मई को जन्मदिन है और दोनों के यहां इसकी जोर-शोर से तैयारी चल रही है। खासकर अजीत जोगी के सागौन बंगले में। उनके लिए इस जन्मदिन का अबकी विशेष महत्व है। वे रोबेटिक पैरों पर चलकर समर्थकों के बीच आएंगे। इसके इत्तर, चुनावी साल मंे विरोधियों को हैसियत भी दिखानी है। इसलिए, कोई कमी नहीं रखी जा रही। बताते हैं, पूरे जिलों से कार्यकर्ताओं का जमावड़ा लगेगा। 30 विधायकों के आने की सहमति मिल चुकी है। जोगी खेमे की तो इसकी संख्या और बढ़ सकती है। और भाजपा से ज्यादा कांग्रेस नेताआंे को यह संदेश दिया जाएगा कि सूबे में कांग्रेस का कोई छत्रप है, तो वह अपने साहब हैं।

पद बड़ा और....


कैडर रिव्यू कराकर आईएफएस अफसरों ने आल इंडिया सर्विसेज में बाजी मार ली। आईएफएस की देखादेखी आईएएस का भी कैडर रिव्यू का प्रपोजल दिल्ली गया है। आईपीएस का तो अभी अता-पता नहीं है। अलबत्ता, आईएफएस के कैडर रिव्यू के कुछ प्वाइंट जरूर लोगों को खटक रहे है। अभी तक वन विभाग के सर्किल में सीएफ होते थे, अब सीसीएफ पोस्ट होंगे। ऐसा ही हुआ, जैसे कमिश्नर कलेक्टरी करेगा। आईएएस में भी बहुत पहले प्रयोग के तौर पर कमिश्नर लेवल के अफसरों को राजधानी का कलेक्टर बनाया था, मगर बाद में इसे दुरुस्त कर लिया गया। आईएफएस एसोसियेशन कैडर रिव्यू के लिए पिछले दिनों जब एक शीर्ष अफसर से मिलने गया था तो उन्होंने तीखे कमेंट किए थे, आप लोग पद बड़ा और काम छोटा करना चाहते हैं। आईएफएस इस पर खूब झेंपे।

 
अंत में दो सवाल आपसे

1. जन्मदिन के जरिये अजीत जोगी खेमा भाजपा को अपनी ताकत दिखाना चाहता है या कांग्रेस नेताओं को?
2. पीडब्लूडी के बदनाम इंजीनियरों ने आईपीएल के लिए 32 करोड़ के बजट में से 21 करोड़ में काम कैसे कर दिया?