शनिवार, 24 अगस्त 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: ब्यूरोक्रेट्स, बायोमेट्रिक और हाय-तोबा

 तरकश, 25 अगस्त 2024

संजय के. दीक्षित

ब्यूरोक्रेट्स, बायोमेट्रिक और हाय-तोबा

कहा जाता है, सिस्टम में किसी चीज की शुरूआत उपर से होनी चाहिए। तभी नीचे उसका मैसेज पहुंचता है। बॉस अगर कर्मठ और ईमानदार है तो मुलाजिम से भी ऐसी अपेक्षा की जा सकती है। मगर उपर के लोग अगर बायोमेट्रिक अटेंडेंस को लेकर हाय-तोबा मचा देंगे तो फिर कर्मचारियों से ऐसी अपेक्षा कैसे की जा सकती है। मगर छत्तीसगढ़ में ऐसा ही हो रहा है। एक तरफ तो आबकारी, पंजीयन, टाउन एंड कंट्री प्लानिंग, पौल्यूशन बोर्ड में बायोमेट्रिक अटेंडेंस अनिवार्य किया जा रहा है। वहीं, दूसरी तरफ सबसे पहले मंत्रालय से इसकी शुरूआत करने की बात की गई थी, मगर अब उसे कोई याद नहीं कर रहा। दरअसल, सरकार चाह रही थी कि डिजिटल अटेंडेंस की शुरूआत मंत्रालय से हो। ई-ऑफिस के साथ ही बायोमेट्रिक को भी लांच किया जाना था। किन्तु अधिकारियों के विरोध के बाद यह ठंडे बस्ते में चला गया। आईएएस अधिकारियों की बायोमेट्रिक के विरोध के पीछे दलील यह है कि उनके पास कई-कई विभाग हैं, वहां उन्हें जाना पड़ता है। फिर, उन्हें लाइन लगाकर बायोमेट्रिक में हाजिरी लगानी होगी। जबकि, नौकरशाहों की सुविधा के लिए ऐसा बायोमेट्रिक डिजाइन किया गया था कि उन्हें कर्मचारियों की तरह लाइन लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। सिर्फ उन्हें अपने मोबाइल में ऐप डाउनलोड करना था। वे जैसे ही मंत्रालय या किसी और आफिस में पहुंचते, मोबाइल के स्क्रीन पर सिर्फ एक क्लिक करना था। उसमें सुविधा ये भी थी कि वे जिस आफिस में जाएंगे, वहां का सर्वर ऑन हो जाएगा। और वहां भी अपने मोबाइल से ही अटेंडेंस लगा सकते थे। अफसरों को आरटीआई का डर भी सता रहा है। कोई आरटीआई में अगर जानकारी मांग लिया तो क्या होगा? यही वजह है कि मंत्रालय में बायोमेट्रिक पर फिलहाल ब्रेक लग गया है।

20 फीसदी को परेशानी

छत्तीसगढ़ के मंत्रालय में सभी आईएएस बायोमेट्रिक का विरोध नहीं कर रहे। कई अफसर ऐसे हैं, जिन्हें सांस लेने की फुरसत नहीं। साढ़े दस से पहले आफिस पहुंच जाते हैं और और वहां से लौटने का कोई टाईम नहीं। ब्यूरोक्रेसी के लोग भी मानते हैं कि 10 परसेंट अफसर आउट स्टैंडिंग हैं। 40 परसेंट अवेरेज। दोनों को मिलाकर हुआ 50 प्रतिशत। इसके बाद 30 फीसदी अफसर ऐसे हैं, जिनमें संभावनाएं हैं मगर देखादेखी वे डिरेल्ड हो गए हैं...थोड़े प्रयास से उन्हें पटरी पर लाया जा सकता है। सो, बायोमेट्रिक से प्राब्लम सिर्फ 20 प्रतिशत नौकरशाहों को है, जो यूपीएससी क्लियर करके आईएएस तो बन गए मगर उनमें काम करने वाला जिंस नहीं है। वे पैसा कमा शाही ठाठबाट मेंटेन करने को ही आईएएस का उद्देश्य समझ बैठे हैं। इनमें कई ऐसे भी मिलेंगे, जो एकाध घंटा के लिए मंत्रालय जाते हैं और उसके बाद फिर घर। उन्हें बायोमेट्रिक से ज्यादा दिक्कत है।

कलेक्टर, एसपी और कबूतर

छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले में 15 अगस्त के कार्यक्रम में एसपी के हाथों कबूतर गिर कर मर जाना देश के मीडिया में सुर्खियों में रहा। दरअसल, चीफ गेस्ट और कलेक्टर का कबूतर उड़ गया मगर एसपी ने जैसे ही उसे उड़ाया, वह लूढ़ककर जमीन पर गिरा और दम तोड़ दिया। सोशल मीडिया में जब इस वायरल वीडियो पर मजाक बनना शुरू हुआ तो एसपी ने इसकी जांच के लिए कलेक्टर को पत्र लिखा और कलेक्टर ने भी आनन-फानन में जांच अधिकारी नियुक्त कर डाला। याने ब्यूरोक्रेसी का फुल जोक हुआ मुंगेली में। उधर, नौकरशाही के लोगों का कहना है कि कबूतर उड़ाना अब बैन कर दिया गया है। जाहिर है, रायपुर में न मुख्यमंत्री कबूतर उड़ाए और न ही राज्यपाल राजभवन में। फिर सवाल यह भी उठता है कि मुख्य अतिथि कबूतर उड़ाए या कौवा....उन्हें राजनीति करनी है। साथ में खड़े कलेक्टर, एसपी को कबूतर उड़ाने का शौक क्यों पालना? 15 अगस्त और 26 जनवरी के समारोह में कलेक्टर, एसपी का काम असिस्ट करना होता है, न कि जो चीफ गेस्ट करें, वो करने लगें। जीएडी को इसके लिए गाइडलाइन जारी करनी चाहिए। ताकि, आगे अब इस तरह की मजाक न बनें।

सीनियर, जुनियर का फर्क

निश्चित तौर पर ऑल इंडिया सर्विस में आईएएस फर्स्ट और आईपीएस दूसरे पायदान पर आता है। इसलिए जिलों में एसपी से दो-तीन साल जूनियर आईएएस को कलेक्टर बना दिया जाता है। मगर इसकी भी एक लिमिट होनी चाहिए। मुंगेली में कुछ ज्यादा हो गया है। वहां कलेक्टर हैं 2016 बैच के और एसपी 2010 के। एसपी डीआईजी रैंक के आईपीएस बन चुके हैं। उपर से कलेक्टर से छह साल सीनियर। आमतौर पर मुंगेली किसी आईपीएस के लिए एसपी के तौर पर पहला जिला होता है। मगर अभी जो वहां एसपी हैं, उनका यह चौथा जिला है। पिछली सरकार में ये परिपाटी शुरू हुई थी। तब डीआईजी रैंक के आईपीएस को जशपुर, गरियाबंद और बलौदा बाजार का एसपी बनाया गया था। आमतौर पर एसपी की पोस्टिंग में उनके रैंक का ध्यान रखा जाता है। डीआईजी या सलेक्शन ग्रेड के आईपीएस अफसरों को अगर एसपी बनाया भी जाता है, तो फिर बड़े जिलों में। सिस्टम को इसके सनद रखना चाहिए।

पोस्टिंग में चूक?

राज्य सरकार ने नौ महीने में सबसे बड़ी लिस्ट निकालते हुए नगरीय प्रशासन विभाग के 166 अधिकारियों, कर्मचारियों को बदल दिया। इसमें रायपुर में एक राजस्व निरीक्षक को रायपुर का जोन कमिश्नर बना दिया गया। राजस्व निरीक्षक का पद क्लास थ्री का है। एक जोन कमिश्नर के नीचे कई-कई राजस्व निरीक्षक होते हैं। जाहिर है, जिस जोन में राजस्व निरीक्षक को कमिश्नर बनाया गया है, वहां पहले से कई राजस्व निरीक्षक होंगे। अब एक समान रैंक का व्यक्ति बॉस होगा और उसी के बराबर के लोग उसके नीचे काम करेंगे। ऐसा एक बार पिछली सरकार में भी हुआ था, जब राजस्व निरीक्षक को जोनल कमिश्नर बना दिया गया था। लगता है, यह आइडिया पिछली सरकार से मिला होगा, मगर मंत्रियों को इसका ध्यान रखना चाहिए। वरना सिस्टम खराब होगा।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या ये सही है कि जिन कलेक्टरों का दो साल हो गया है, उनका नंबर अगली लिस्ट में लग सकता है?

2. बड़े-बड़े आईजी साहबों को बिना काम के भारी-भरकम पगार देना क्या सही है?


रविवार, 18 अगस्त 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: दमदार अफसर, दमदार नेता

 तरकश, 18 अगस्त 2024

संजय के. दीक्षित

दमदार अफसर, दमदार नेता

बात 87 की होगी। रायपुर में उस समय सिर्फ एक सीएसपी होते थे। लेकिन, उस समय के सीएसपी आज के एसपी, आईजी से ज्यादा धाक रखते थे। और वो भी रुस्तम सिंह जैसे आईपीएस सीएसपी हो तो क्या कहने। बहरहाल, रायपुर के एक बड़े नेताजी उस समय प्रभावशाली स्टूडेंट लीडर हुआ करते थे। किसी मामले को लेकर उन्होंने रायपुर बंद का आयोजन किया था। रविवार का दिन होने की वजह से रुस्तम सिंह ने बंद के आयोजकों को समझाने के लिए अपने घर बुलाया। छात्र नेताओं को वहां पहुंचने में कुछ विलंब हो गया। तब तक रुस्तम सिंह भोजन करने बैठ गए। रुस्तम जब बाहर निकले तो छात्र नेताओं से हॉट-टॉक हो गया...नेताओं ने कहा कि हम हड़ताल करेंगे ही और लगे नारेबाजी करने। रुस्तम सिंह ने फिर समझाया, मगर छा़त्र नेताओं ने कुछ कड़ा जवाब दे दिया। इस पर रुस्तम सिंह तमतमा गए। उन्होंने खटाक से पिस्तौल निकाला और एक बड़े नेता पर तान दिया। सारे स्टूडेंट लीडर हक्के-बक्के रह गए। हालांकि, बाद में मामला ठंडा हो गया। रुस्तम सिंह कुछ साल बाद फिर रायपुर के एसपी बनकर आए और इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा गए। उनके लॉ एंड आर्डर को रायपुर ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के पुराने लोग आज भी याद करते हैं।

हड़ताल और एसीबी का खौफ

पंजीयन विभाग ने जमीनों की रजिस्ट्री में व्यापक गड़बड़िया उजागर होने पर बड़ा एक्शन लेते हुए तीन अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया। चूकि इस विभाग में कभी ऐसी कोई कार्रवाई हुई नहीं थी, इसलिए खलबली मचनी ही थी। ट्रिपल सस्पेंशन के अगले दिन रविवार था, इसके बाद भी दोपहर से लेकर आधी रात तक फैसले के विरोध को लेकर मीटिंगें होती रही। पंजीयन अधिकारी संघ ने हड़ताल पर जाने की पूरी तैयारी कर ली थी। तभी रात एक बजे कहीं से प्वाइंट चला...और भी कई अफसरों की फाइलें तैयार है...सभी केस एसीबी को सौंप दिए जाएंगे। इतना सुनते ही अधिकारियों के हाथ-पांव फुल गए। व्हाट्सएप ग्रुप में सुबह से क्रांतिकारी बातें करने वाले अधिकारियों ने अपनी वीरता दिखाने वाली पोस्टों को फटाफट डिलीट मार दिया। फिर अगले दिन अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल पंजीयन मंत्री ओपी चौधरी से क्षमा याचना करने मंत्रालय पहुंच गया। मंत्री ने अफसरों से दो टूक कहा, आठ महीने में मैं आठ रुपिया लिया हूं तो बताओ...मेरे आईजी, सचिव इनलोगों ने लिया क्या? पहले क्या हुआ, ये मैं नहीं जानता...पर मेरे कार्यकाल में करप्शन होगा तो फिर बख्शा नहीं जाएगा। इसके बाद निलंबित अधिकारियों ने सर गलती हो गई...माफी मांगी और फिर बैठक समाप्त हो गई। बताते हैं, पंजीयन विभाग के अधिकारियों की स्वाभाविक तौर से भूमाफियाओं, बिल्डरों और सफेदपोश लोगों से निकटता है, सो कार्रवाई के खिलाफ अधिकारियों को कहीं से उर्जा मिल रही थी, मगर सब गुड़ गोबर हो गया। अब देखना है...मंत्री की चमकाइटिस का कितन असर होता है।

प्लीज...नो पॉलिटिक्स

छत्तीसगढ़ के एक रेंज आईजी ने छत्तीसगढ़ की बेहतरी और फोर्स पर भरोसा कायम रखने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए 100 से अधिक कांस्टेबलों का ट्रांसफर कर दूसरे जिलों में भेज दिया है। दरअसल, आईजी को अपने रेंज में कांस्टेबलों का तबादला करने का अधिकार है मगर आईजी साब लोग हिम्मत नहीं दिखाते। और उधर नेताजी लोग फोर्स का लोकलाइजेशन करने का मोह नहीं छोड़ पाते। कायदे से गृह गांव से 40 किमी के भीतर कांस्टेबलों की पोस्टिंग नहीं होनी चाहिए। मगर फोर्स के सारे नियम-कायदों को ताक पर रख छत्तीसगढ़ में कांस्टेबलों की पोस्टिंग उनके गृह इलाके के थानों में हो जा रही है। अलबत्ता, कांस्टेबलों का अब प्रयास ये होने लगा है कि खुद के गांव में कोई चौकी खुल जाए, जिससे लोग उनका जलवा देख सकें। नेताओं को भी यह भाता है...उनकी ड्यूटी बजाने वाले सिपाही मिल जाते हैं। किंतु इसका खामियाजा यह हुआ कि छत्तीसगढ़ के बस्तर से लेकर सरगुजा और रायगढ़, सारंगढ़ से लेकर बलौदा बाजार तक 50 प्रतिशत से अधिक लोकल पुलिस हो गई है। सूबे के लिए यह खतरनाक संकेत है। ऐसा ही रहा तो बलौदा बाजार जैसी घटनाओं की जगह-जगह पुनरावृत्ति होगी। चाहे बीजेपी के नेता हो या कांग्रेस के...फोर्स के मामले में सिस्टम को कड़ा स्टैंड लेना होगा...पुलिस की पोस्टिंग में नो पॉलिटिक्स।

गलत पंरपरा

छत्तीसगढ़ निर्माण के 24 बरसों में कभी वर्क कल्चर बनाने का प्रयास नहीं हुआ। उपर से फाइव डे वीक से लेकर सरकारी छुट्टियों की बरसात कर दी गई। अब एक गलत परंपरा की शुरूआत हो रही है...सरकार कड़ाई करे या सुधार की दिशा में कोई कोशिश हो तो उसका विरोध। अभी कुछ दिनों पहले पटवारियों ने हड़ताल की। राजस्व विभाग ने उन्हें हाथ-पैर जोड़कर हड़ताल तोड़वाया। कुछ और विभाग भी सुधार के कार्यों के विरोध में आंदोलन प्रारंभ करने की तैयारी कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ की भलाई के लिए सिस्टम को सख्त होना पड़ेगा। तभी अंतिम व्यक्ति तक गुड गवर्नेंस का लाभ पहुंच पाएगा।

पेटी लाओ, आदेश ले जाओ

डॉ0 रमन सिंह की पहली पारी में डॉ0 कृष्णमूर्ति बांधी को स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया था। वे पहली बार विधायक बने थे और सीधे मंत्री। हेल्थ का सिस्टम चरमराने लगा तो रमन सिंह ने अमर अग्रवाल को विभाग की कमान सौंपी थी। इस समय भी हालत जुदा नहीं है। मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल अच्छे व्यक्ति हैं, मगर उन्हें थोड़ा अलर्ट रहना पड़ेगा, वरना उनके अधिकारी और आसपास रहने वाले लोग मुसीबतें पैदा कर देंगे। आखिर, लोकसभा चुनाव के आचार संहिता के दौरान अधिकारियों ने संविदा अधिकारियों का ट्रांसफर कर डालने का कारनामा किया ही था। उसमें जीएडी की जांच कमिटी बनी। मगर चुनाव निबट जाने के बाद ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। और अभी सीएमओ और सिविल सर्जन के ट्रांसफर में ऐसा ही खेला हुआ। सीएमओ का रेट 35 पेटी तो सिविल सर्जन का 20। एक सीएमओ 25 पेटी देने तैयार था मगर 35 से नीचे लोग टस-से-मस नहीं हुए, लिहाजा प्रभारी सीएमओ की छुट्टी कर जिसने ज्यादा बोली लगाई, उसकी पोस्टिंग कर दी गई। ऐसे में फिर स्वास्थ्य विभाग को भगवान भी नहीं बचा पाएगा।

एक अनार, ....

छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त के दो पदों के लिए संघ, संगठन और सरकार पर बड़ा प्रेशर है। दावेदारों में रिटायर आईएएस, आईपीएस से लेकर वकीलों और पत्रकारों की एक लंबी सूची है। हर आदमी अपने-अपने स्तर पर जैक लगा रहा है। इस समय नरेंद्र शुक्ला रिटायर आईएएस के कोटे से सूचना आयुक्त हैं। मगर ऐसा समझा जा रहा कि मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर किसी रिटायर आईएएस या आईपीएस को मौका दिया जा सकता है। हालांकि, ऐसा कोई नियम नहीं है कि पूर्व नौकरशाहों को ही मुख्य सूचना आयुक्त बनाया जाए। छत्तीसगढ़ में भले ही तीनों मुख्य सूचना आयुक्त रिटायर आईएएस रहे हैं। मगर कई राज्यों में सीनियर वकीलों और पत्रकारों को भी सीआईसी बनाया गया है। गोवा में एक विधायक सीआईसी रहे। इसका सलेक्शन पूरी तरह सरकारों पर निर्भर करता है। कमेटी तो सिर्फ नाम के लिए बनती है। बहरहाल, राज्य सरकार अगर पुरानी लीक पर चलते हुए अगर रिटायर आईएएस, आईपीएस को ही सीआईसी बनाना चाहेगी तो फिर पत्रकारों, वकीलों या अन्य वर्गो के लिए सिर्फ एक पद बचेगा। सूचना आयुक्त का। जाहिर तौर पर इसमें पत्रकारों का पलड़ा भारी रहेगा। पिछली सरकार में भी प्रेस कोटे से दो लोगों को सूचना आयुक्त बनाया गया था। अब देखना है, सरकार क्या फैसला करती है।

सुनील और संजय में भिड़ंत

रायपुर की दक्षिण विधानसभा सीट पर चुनावी भिड़त से पहले बीजेपी के सुनील सोनी और संजय श्रीवास्तव के बीच भिडं़त होगी। जाहिर है, इस उपचुनाव के लिए ये दो ही तगड़े दावेदार है और ये भी तय है कि इन दोनों में से किसी एक को प्रत्याशा बनाया जाएगा। सुनील सांसद बृजमोहन अग्रवाल के करीबी हैं। सुनील रायपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष, महापौर और सांसद रह चुके हैं। वहीं पार्टी के पढ़े-लिखे और जुझारू चेहरा संजय श्रीवास्तव को रायपुर विकास प्राधिकरण के चेयरमैन के साथ ही नगर निगम में एक बार सभापति रहने का मौका मिला है। हालांकि, 2003 में छत्तीसगढ़ बीजेपी के पितृ पुरूष लखीराम अग्रवाल ने राजेश मूणत के लिए वीटो नहीं लगाया होता तो उस समय संजय श्रीवास्तव को टिकिट मिल गया होता। बहरहाल, अब देखना है कि संजय की किस्मत का ताला इस बार खुलेगा या फिर पार्टी सुनील सोनी पर दांव लगाएगी। पलड़ा इसमें सुनील का भारी है क्योंकि पार्टी का एक वर्ग नहीं चाहता कि कोई दमदार नेतृत्व रायपुर में खड़ा हो।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या एक्स सीएम भूपेश बघेल को राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व मंत्री टीएस सिंहदेव को पीसीसी चीफ बनाया जा रहा?

2. सरगुजा आईजी अंकित गर्ग बस्तर के नए आईजी होंगे या किसी और को पोस्ट किया जाएगा?


रविवार, 11 अगस्त 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: जी उठा सीआईडी

 Chhattisgarh Tarkash, Agust 11, 2024:

संजय के. दीक्षित

जी उठा सीआईडी

एक जमाने में सीआईडी पुलिस का बड़ा क्रेज होता था। पुलिस मुख्यालय का सबसे महत्वपूर्ण विभाग। पीएचक्यू के सबसे तेज-तर्रार आईपीएस अधिकारी को इसकी कमान सौंपी जाती थी। जिस तरह इस समय पीएचक्यू में इंटेलिजेंस चीफ का रुतबा होता है, सीआईडी चीफ का जलवा उससे ज्यादा ही होता था। कठिन और हाईप्रोफाइल मामलों की जांच सीआईडी को सौंपी जाती थी। बिल्कुल सीबीआई की तरह। मगर दुर्भाग्य की बात यह कि छत्तीसगढ़ में सीआईडी को खतम कर दिया गया। अब ये डेटा हब बनकर रह गया है। विधानसभा के प्रश्नों का जवाब तैयार करना सीआईडी का प्रमुख काम रह गया है। छत्तीसगढ़ पुलिस के जिलों से लेकर रेंज तक के सारे डेटा आजकल सीआईडी संभाल रहा। प्रमोटी आईपीएस इस समय सीआईडी के आईजी हैं। इससे आगे कुछ कहने की जरूरत नहीं। मगर बात सीआईडी के जी उठने की...तो छत्तीसगढ़ के सीआईडी के लिए आज बड़ा दिन है। बिलासपुर के चर्चित डॉ0 पूजा चौरसिया केस में हाई कोर्ट ने आठ हफ्ते में सीआईडी जांच कर रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है। राज्य बनने के करीब ढाई दशक में मुझे याद नहीं कि हत्या जैसे किसी मामले की जांच सीआईडी को किसी सरकार ने सौंपी होगी। जो काम सरकारों ने नहीं किया, वह हाई कोर्ट ने कर दिया। चलिये, उम्मीद करते हैं कि सीआईडी का अब कुछ होगा। वैसे भी बड़े अपराधों की जांच के लिए स्टेट लेवल की एक एजेंसी होनी ही चाहिए। मगर इसके लिए सरकार को सीबीआई या एनआईए रिटर्न आईपीएस को ढूंढना पड़ेगा।

कलेक्टर और क्राइम

बात राज्य बनने के थोड़े ही पहले की है। शायद 1999 की बारिश का महीना होगा। बिलासपुर जिले के बिल्हा के एक पहुंचविहीन गांव में एक छात्रा की हत्या हो गई थी। पहुंच विहीन इसलिए याद कि करीब दो किलोमीटर तक कठिन रास्तों पर पैदल चलकर गांव जाना पड़ा था। वहां पता चला गांव के प्रभावशाली परिवार के युवक ने कालेज जा रही छात्रा की रास्ते में गला दबाकर शव को नाले में फेंक दिया था। आरोपी का परिवार दबंग था, सो उसके खिलाफ मुंह खोलने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही थी। मैंने बिल्हा थाना फोन लगाया तो खैनी मूंह में दबाए मुंशीजी बोले, कैसे हुआ, कुछ पता नहीं चल रहा, क्या कर सकते हैं...गीता में लिखा है, जो आया है, वह जाएगा ही। जिस अखबार में उस समय मैं काम करता था, उसमें अगले दिन आठ कॉलम में यह खबर प्रकाशित हुई। खबर छपते ही सुबह-सुबह तत्कालीन एसपी शैलेंद्र श्रीवास्तव का लैंडलाइन पर फोन आया। लैंडलाइन ही उस समय संचार का साधन था। एसपी साब बोले, क्या छाप दिए हो...कलेक्टर साब पूछ रहे हैं। फिर उन्होंने मुझसे घटना का ब्रीफ लिया और दोपहर बाद आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। कलेक्टर थे शैलेंद्र सिंह। राज्य बनने के बाद दोनों शैलेंद्र मध्यप्रदेश चले गए। बहरहाल, अबके कलेक्टर क्राइम की तरफ झांकते नहीं...कोई घटना हुई तो जाने एसपी साब। बलौदा बाजार में अगर कलेक्टर ने इनिशियेटिव लिया होता, तो कलेक्ट्रेट जलाने की घटना नहीं हुई होती।

कलेक्टर कमजोर क्यों-1

कलेक्टर के चेम्बर और कार में पहले वायरलेस सेट लगा होता था। जिले में क्राइम के सारे अपडेट कंट्रोल रुम से सीधे कलेक्टर को मिलते रहते थे। कलेक्टर के पावर को बताने के लिए शैलेंद्र सिंह को यहां एक बार और उद्धृत करना जरूरी होगा। बिलासपुर में यूथ कांग्रेस के एक प्रेसिडेंट का बड़ा जलजला था। यूनिर्वसिटी में आए दिन उठापटक चलती रहती थी। शैलेंद्र सिंह एक दिन गाड़ी से लंच के लिए निकले, रास्ते में वायरलेस पर संदेश आया, यूनिर्वसिटी में यूथ कांग्रेस ने तोड़फोड़ कर दिया है। कलेक्टर को पता था कि पुलिस की यूथ कांग्रेसी पर कुछ ज्यादा मेहरबानी है, ऐसे में कोई कार्रवाई होगी नहीं। कलेक्टर ने अपनी गाड़ी यूनिर्वसिटी की तरफ मोड़ दी। उन्होंने एसपी को भी सूचित कर दिया। पीछे-पीछे एसपी भी भागते हुए यूनिर्वसिटी पहुंचे। उसके बाद रुलिंग पार्टी के जिला अध्यक्ष और उसके साथियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। कहने का मतलब यह है कि कलेक्टरों की भी ड्यूटी होती है कि वह क्राईम पर नजर रखें। चीफ सिकरेट्री और डीजीपी को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कलेक्टर-एसपी मिलकर काम करें और अपने दायित्वों का सम्यक निर्वहन करें। राज्य बनने के 24 साल बाद भी आखिर यह सुनने में क्यों आता है कि पुराने मध्यप्रदेश में सिस्टम रन कर रहा है और छत्तीसगढ़ में? सिस्टम शीर्षासन कर रहा है। कलेक्टर-एसपी कांफ्रेंस में साल में एक बार कह देने से नहीं होगा कि दोनों मिलकर काम करें। उसका फॉलोअप भी लेना चाहिए। वरना, छत्तीसगढ़ को बिहार, यूपी के रास्ते पर जाने से कोई रोक नहीं पाएगा।

कलेक्टर कमजोर क्यों-2

छत्तीसगढ़ में कलेक्टर-एसपी में तालमेल का बड़ा अभाव है। कई जिलों में आलम यह है कि हफ्ता निकल जाता है, दोनों में बातें नहीं होती। सरकार के निर्देशों के बाद भी एसपी कलेक्टर की टीएल मीटिंग में नहीं जाते। कलेक्टर भी चाहते हैं...एसपी से दूर ही रहे। दरअसल, उसकी एक बड़ी वजह करप्शन हैं। खासतौर से डीएमएफ ने कलेक्टर सिस्टम को पंगु बना दिया। डीएमएफ से हर साल करोड़ों रुपए बरस रहे हैं। और कलेक्टर इसके मालिक हैं, वही चेक काटते हैं। इसमें 20 से 30 परसेंट ही जमीन पर काम होता है। 70 परसेंट से ज्यादा का कलेक्टर साब लोग खेला कर डालते हैं। ऐसे में उन्हें चोर की दाढ़ी में तिनका की तरह डर सताता रहता है....एसपी कहीं उसे ट्रेप न कर लें। लिहाजा, वे क्राइम की तरफ देखना नहीं चाहते...एसपी साब कहीं नाराज हो गए तो।

सम्मान से विदाई की तैयारी

छत्तीसगढ़ के डीजीपी अशोक जुनेजा को भारत सरकार ने छह महीने का एक्सटेंशन दे दिया है। सर्विस पूरी होने के बाद भारत सरकार से एक्सटेंशन मिलने का यह पहला केस है। बहरहाल, 5 अगस्त 2022 को डीजीपी जुनेजा को दो साल की पूर्णकालिक नियुक्ति मिली थी, सो 4 अगस्त को उनका टेन्योर कंप्लीट हो रहा था। उस दिन रविवार था। अब जुनेजा जैसे डीजीपी छुटटी के दिन विदा होते तो अच्छा नहीं लगता। सो, सरकार में सेपरेट नोटशीट चलाई गई। इसमें रविवार का हवाला देते हुए उनके रिटायरमेंट को एक दिन बढ़ाया गया ताकि उन्हें सम्मान पूर्वक ग्रेंड फेयरवेल दिया जा सकें। मगर दिल्ली से ऐसी चकरी घुमी कि रिटायरमेंट डेट बढ़ाने का कोई मतलब नहीं हुआ। अचानक जब दिल्ली से एक लाईन का संदेश आया कि अशोक जुनेजा के छह महीने का एक्सटेंशन का प्रापोजल भेजिए...छत्तीसगढ़ के लोग हतप्रभ रह गए। हतप्रभ इसलिए कि उसी दिन सुबह गृह विभाग ने दो नामों को पेनल यूपीएससी को भेजा गया था और अरूणदेव गौतम को प्रभारी डीजीपी बनाने की तैयारी शुरू हो चुकी थी। दरअसल, नक्सल मोर्चे पर मिली अभूतपूर्व कामयाबी के बाद दिल्ली में जुनेजा का खासा औरा कायम हो गया है। जुनेजा दो बार सेंट्रल डेपुटेशन कर चुके हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स के वे सिक्यूरिटी इंचार्ज थे और तत्कालीन कैबिनेट सिकरेट्री अजीत सेठ चेयरमैन। वे सीधे कैबिनेट सिकरेट्री को रिपोर्ट करते थे। तात्पर्य यह है कि दिल्ली की ब्यूरोक्रेसी में उनके अच्छे रिश्ते हैं। इसका उन्हें लाभ मिला।

कमिश्नर मटेरियल

छत्तीसगढ़ सरकार ने महादेव कांवरे को रायपुर का कमिश्नर बनाया है। वे पहले भी कमिश्नर रह चुके हैं। बहरहाल, छत्तीसगढ़ में कुछ आईएएस अधिकारी कमिश्नर के लिए पेटेंट हो गए हैं। इनमें पहला नाम है जी चुरेंद्र। चुरेंद बिलासपुर छोड़कर छत्तीसगढ़ के चारों संभाग के कमिश्नर रह चुके हैं। सरगुजा में वे कमिश्नर की दूसरी पारी खेल रहे हैं। उनके बाद नाम आता है दसेक दिन पहले रिटायर हुए संजय अलंग का। संजय का नया रिकार्ड बनाया, डबल कमिश्नर का। पहले बिलासपुर कमिश्नर रहते उनके पास सरगुजा का भी चार्ज रहा। और अभी रायपुर के साथ ही बिलासपुर संभाग भी उनके पास था। दिलीप वासनीकर भी बस्तर, रायपुर और दुर्ग के कमिश्नर रहे। इससे पहिले महादेव कांवरे भी दुर्ग के कमिश्नर रह चुके हैं। इस कड़ी में अब नीलम एक्का का नाम जुड़ गया है।

नीलम का कद बढ़ा या घटा?

नीलम एक्का को बिलासपुर संभाग का कमिश्नर बनाया गया है। पहली बात, आप नीलम के नाम पर मत जाईयेगा, नीलम अच्छी छबि के पुरूष अधिकारी हैं। छत्तीसगढ़ के प्रमोटी आईएएस में सबसे सीनियर। 2005 बैच में दो अधिकारी हैं। टीपी वर्मा और नीलम एक्का। नीलम इससे पहले राजस्व सिकरेट्री रह चुके हैं। इस हैसियत से वे पूरे स्टेट के राजस्व मामले की सुनवाई करते थे। अब संभाग के आयुक्त बन गए हैं। इस तरह की कुर्सी तोड़ने वाली पोस्टिंग उनके स्वभाव में नहीं। हालांकि, ये क्लियर नहीं कि वे कमिश्नर की पोस्टिंग से वाकई खुश नहीं हैं मगर ब्यूरोक्रेसी में कहा तो ऐसा ही जा रहा है।

छोटी लिस्ट

छत्तीसगढ़ में आईएएस, आईपीएस ट्रांसफर की एक लिस्ट आने की चर्चा बड़ी तेज है। चार-पांच दिन से लोग डेट के भी दावे कर रहे...9-10 अगस्त तक आदेश निकल जाएगा। खैर चर्चाओं में कुछ दम तो नजर आ रहा। एक छोटी लिस्ट आ सकती है। इनमें दो-एक आईएएस और लगभग इतने ही आईपीएस होंगे। मगर डेट का अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि, ट्रांसफर का इतना हल्ला हो गया है कि हो सकता है डेट आगे टल जाए।

अंत में दो सवाल आपसे

1. ओबीसी कल्याण आयोग के अध्यक्ष के लिए रिटायर आईएएस आरएस विश्वकर्मा को ढ़ूंढ कर क्यों निकाला गया?

2. आठ महीना गुजर जाने के बाद भी छत्तीसगढ़ सरकार के कई मंत्रियों का लाइन और लेंग्थ क्यों नहीं सुधर रहा?


रविवार, 4 अगस्त 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: साहूकार मालामाल, और छत्तीसगढ़ियां...?

तरकश, 4 अगस्त 2024

संजय के, दीक्षित

साहूकार मालामाल, और छत्तीसगढ़ियां...?

छत्तीसगढ़ में हायर एजुकेशन का एक शर्मनाक आंकड़ा सामने आया है। भारत सरकार की एजेंसी के अनुसार सूबे में 18 से 23 वर्ष के बीच सिर्फ 19.6 फीसदी युवा ही उच्च शिक्षा की देहरी तक पहुंच पा रहे हैं। इस श्रेणी में देश में नीचे तीसरे नंबर पर है छत्तीसगढ़। सबसे नीचे हैं असम। उसके बाद बिहार और फिर अपना छत्तीसगढ़। जिस राज्य के मानव संसाधन का ये हाल होगा...जहां 80 फीसद से अधिक यूथ उच्च तालिम से वंचित हों... उस राज्य की तरक्की की क्या उम्मीद की जा सकती है। असल में, मध्यप्रदेश के समय छत्तीसगढ़ का बुरा हाल तो रहा ही, राज्य बनने के बाद की सरकारों ने कभी स्किल डेवलपमेंट पर जोर नहीं दिया, सिवाय सरकार बनाने के लिए फ्री की चीजें बांटने के। अलबत्ता, फर्जी डिग्री बांटने वाले प्रायवेट कालेज, यूनिवर्सिटी खुलते गए और युवाओं की जेब काट मानव संसाधन का कबाड़ा करते गए। हद तो यह कि सरकारी शैक्षणिक संस्थानों की स्थिति जुदा नहीं है। 365 सरकारी कॉलेजों में एक भी प्रोफेसर नहीं हैं। लायब्रेरी, लेबोरेटरी ये सब तो दूर की चीजें हैं। ऐसा नहीं है कि राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ का विकास नहीं हुआ। डेवलपमेंट हुआ मगर एक खास सेक्टर में। स्टील, कोल, पावर, राईस और रियल इस्टेट में बूम आया और इससे जुड़े लोगों ने दिन-दुनी और रात चौगुनी टाईप तरक्की की। सूबे के सेठ-साहूकार मालामाल होते गए और आम आदमी नेताओं के मुंह से छत्तीसगढ़ियां...सबले बढ़ियां सुन गदगद होते रहे।

अंधा सिस्टम, ब्लाइंड अफसर

छत्तीसगढ़ के स्कूलों में 13 हजार से अधिक टीचर मक्ख्यिं मार रहे हैं क्योंकि उनके पास कोई काम नहीं है...वे जोर-जुगाड़ या फिर धन के बल पर शहरों के उन स्कूलों में ठस गए हैं, जहां पहले से शिक्षक भरे पडे़ हैं। दुर्ग शहर इसकी बानगी है, जहां एक मीडिल स्कूल में 90 बच्चों पर 11 शिक्षक तैनात हैं। दरअसल, छत्तीसगढ़ बनने के बाद पैसे और पहुंच के बल पर ये खेल प्रारंभ हुआ। चूकि दूरस्थ इलाकों में कंपीटिशन कम होता है इसलिए वहां अप्लाई करके पहले नौकरी हथिया लो और फिर स्कूल शिक्षा के खटराल अफसरों को भेंट-पूजा देकर शहरों में घर के पास ट्रांसफर करा लो। अब जरा सोचिए! जिस स्टेट में 13 हजार अतिशेष शिक्ष़्ाक, वहां सालां से यह प्रचारित किया जाता रहा...स्कूलों में शिक्षकों की काफी कमी है। विधानसभा के हर सत्र में सवाल लगते हैं और मंत्री का जवाब आता है...इतने स्कूल शिक्षक विहीन हैं और इतने सिंगल टीचर के भरोसे चल रहे। बात सही भी है..एक तरफ शिक्षक स्कूलों में जबरिया कुर्सी तोड़ रहे और दूसरी तरफ गांवों के 300 स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं हैं तथा 5500 स्कूल सिंगल टीचर के भरोसे संचालित हो रहे। विष्णुदेव साय सरकार ने इसके लिए स्कूलों और शिक्षकों का युक्तियुक्तकरणक करने का फैसला किया है। मगर देखना है कि सरकार इसमें कितना कामयाब हो पाती है। क्योंकि, स्कूल शिक्षा और हेल्थ में भ्रष्ट अफसरों और घाघ नेताओं की ऐसी पैठ है कि सरकारें सुधार के कदम वापिस खींच लेती हैं। लिहाजा, छत्तीसगढ़ में अगर स्कूलों और शिक्षकों का युक्तियुक्तकरण 80 परसेंट भी सफल हो गया, तो एक नजीर कायम होगा। क्यांकि, सिर्फ वोट बैंक के लिए नेताओं ने पांच हजार से अधिक ऐसे स्कूल खोलवा डाले हैं, जहां राष्ट्रीय मानक से आधे बच्चे भी नहीं हैं। कई स्कूल ऐसे हैं, जहां बच्चे चार-पांच हैं तो शिक्षक पांच-सात। चूकि इस समय शिक्षा विभाग खुद मुख्यमंत्री के पास है। उन्होंने युक्तियुक्तकरण के लिए अफसरों को गो कह दिया है। इसलिए उम्मीद तो बनती है।

पुलिस को ट्रेनिंग

देश के कानून में कई अहम बदलाव किए गए हैं। इसके बारे में छत्तीसगढ़ में पुलिस अधिकारियों को अवगत कराने पुलिस मुख्यालय से लेकर जिलों तक ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए गए। मगर कोई काम नहीं आया...ट्रेनिंग पर खर्च किया पैसा बेकार गया। कई जिले के पुलिस अधिकारियों को यह भी नहीं पता कि पास्को में एफआईआर पहले किया जाता है या प्रारंभिक विवेचना। कई जिलों में पास्को जैसे संवेदनशील मामलों में जबदर्स्त लापरवाही की जा रही। पास्को में स्पष्ट है कि मामला गलत हो या सही, सबसे पहले एफआईआर करना है। अगर बच्ची के मां-बाप मुकदमा दर्ज नहीं करा रहे तो उनके खिलाफ भी रिपोर्ट दर्ज हो सकती है। पुलिस को अगर-मगर करना ही नहीं है। मगर छत्तीसगढ़ में पुलिस अधिकारी खुद ही जांच कर आरोपों को खारिज कर दे रहे। डीजीपी साब को इसे संज्ञान लेकर पास्को की संजीदगी के बारे में अफसरों को ट्रेनिंग की व्यवस्था करानी चाहिए।

छत्तीसगढ़ पुलिस, यूपी स्टाईल

यूपी में लंबे समय से यह परंपरा चली आ रही है...सावन में जब कांवर यात्री निकलते हैं तो स्टेट की पुलिस उनका स्वागत करती है...फूल बरसाती है। छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में पिछले दिनों इसी तरह का दृश्य देखने में आया। एसपी के नेतृत्व में पुलिस अधिकारी कांवरियों को आरती उतार उन पर फूल बरसाये। पुलिस की इस नई और अटपटी परंपरा को देख छत्तीसगढ़ के लोगों का चौंकना स्वाभाविक था। वो इसलिए कि यूपी का अनुसरण ठीक नहीं। कम-से-कम फोर्स को जाति, धर्म से अलग रखना चाहिए। हाल ही में बलौदा बाजार में तोड़फोड़ और आगजनी की घटना हुई, उसमें भी पुलिस और जाति को लेकर कुछ बातें हुई थीं। खैर, कवर्धा पुलिस ने जिस तरह से और जैसे भी किया...उसकी फोटो हजम नहीं हुई।

कलेक्टरों की एक लिस्ट और

सरकार ने 20 आईएएस अधिकारियों का ट्रांसफर किया या फिर उनकी जिम्मेदारियों में बदलाव किया। इनमें कोरिया, महासमुंद और बीजापुर के कलेक्टर भी बदले गए। हालांकि, कलेक्टर बनने वालों की सूची में सर्वेश भूरे, कुंदन कुमार, चंदन कुमार, ऋतुराज रघुवंशी जैसे और आईएएस अफसरों के नाम थे। मगर ऐन वक्त पर सरकार ने तय किया कि फिलहाल तीन ही कलेक्टरों को बदल जाए। इस चक्कर में बाकी का मामला गड़बड़ा गया। महासमुंद कलेक्टर प्रभात मलिक का गुड गर्वनेंस में अत्यधिक दिलचस्पी दिखाना आ बैल मुझे मार...जैसा हाल हो गया। सरकार ने उन्हें कलेक्टरी के ट्रेक से वापिस बुला गुड गर्वनेंस में ज्वाइंट सिकरेट्री बना दिया। हालांकि, उन्हें चिप्स के सीईओ का दायित्व दिया गया है। लेकिन, कलेक्टरी तो चली गई। इसको लेकर ब्यूरोक्रेसी में चुटकी ली जा रही है। दरअसल, अब के आईएएस को कलेक्टर से नीचे कोई पोस्टिंग पसंद नहीं आती। उपर से गुड गवर्नेंस...। अरे भाई जब गवर्नेंस गुड हो जाएगा तो नौकरशाहों को पइसा-कौड़ी कहां से मिलेगा...इसलिए जितने दुखी प्रभात मलिक नहीं होंगे, उनसे अधिक उनकी गुड गवर्नेंस की पोस्टिंग पर दूसरे आईएएस परेशान हैं। बहरहाल, एकाध महीने में फिर एक लिस्ट निकल सकती है। मुंगेली और जगदलपुर कलेक्टर भी बदेलेंगे या फिर इधर-से-उधर किए जाएंगे। लिस्ट में नाम जशपुर कलेक्टर डॉ. रवि मित्तल का भी था, मगर अब सुनने में आ रहा कि नगरीय निकाय चुनाव तक रवि को जशपुर में ही रखने का फैसला किया गया है।

एक प्लस, एक माइनस

आईएएस अधिकारियों के फेरबदल में एसीएस मनोज पिंगुआ को एक हैंड दिया गया और दूसरे को ले लिया गया। मनोज के पास होम और हेल्थ है। उनके विभाग में किरण कौशल को कमिश्नर मेडिकल एजुकेशन बनाया गया है। मगर होम से नीलम एक्का माइनस कर दिए गए। नीलम को बिलासपुर संभाग का कमिश्नर बनाया गया है। हालांकि, होम में अरुण गौतम हैं मगर उनके पास और दो-तीन चार्ज हैं। और फिर डीजी रैंक के आईपीएस। 92 बैच के सीनियर आईपीएस। बहरहाल, लगता है सरकार भी समझ गई है कि मनोज पिंगुआ का कंधा मजबूत है।

बस्तर आईजी डेपुटेशन पर

बस्तर के आईजी सुंदरराज लंबे समय बाद माओवादग्रस्त इलाके से लौट रहे हैं। वे करीब एक दशक से बस्तर में पोस्टेड हैं। इस दौरान थोड़े दिनो के लिए जरूर रायपुर लौटे थे मगर यहां भी उन्हें नक्सल विभाग ही मिला था। वे बस्तर में डीआईजी रहे और अब आईजी हैं। उन्होंने पिछली सरकार में भी डेपुटेशन के लिए अनुमति मांगी थी मगर बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ चल रहे अभियान को देखते उन्हें एनओसी नहीं दिया गया। बहरहाल, पता चला है कि सुंदरराज को नई सरकार से एनओसी मिल गया है। उनकी एनआईए में पोस्टिंग हो रही है। सुंदरराज के प्रतिनियुक्ति पर जाने के बाद जाहिर है आईजी की एक लिस्ट जल्द ही निकलेगी। इसमें पांच में से तीन-से-चार पुलिस रेंज के आईजी बदल सकते हैं। पुलिस मुख्यालय में खाली बैठे एकाध आईजी का भी किसी रेंज में नंबर लग सकता है।

राप्रसे अधिकारियों को झटका

आईएएस अवार्ड के लिए पिछले दो बरस से संघर्ष कर रहे छत्तीसगढ़ राज्य प्रशासनिक अधिकारियों को अभी आईएएस अवार्ड के लिए और वेट करना होगा। उनके लिए 5 अगस्त को यूपीएससी में डीपीसी रखी गई थी। मुख्य सचिव समेत सभी अधिकारियों ने जाने की तैयारी कर ली थी। मगर मामला गड़बड़ा गया।

अंत में दो सवाल आपसे

1. कौन बनेगा बस्तर का नया पुलिस महानिरीक्षक?

2. सरकार की योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए दक्ष कलेक्टरों का होना क्यों जरूरी होता है?



शनिवार, 20 जुलाई 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: छत्तीसगढ़ की पूजा खेडकर

 तरकश, 21 जुलाई 2024

संजय के. दीक्षित

छत्तीसगढ़ के किस्मती आईएएस अफसर 

डोमन सिंह को राज्य सरकार ने बस्तर का डिवीजनल कमिश्नर नियुक्त किया है। डोमन भारत देश के पहले प्रमोटी कलेक्टर हैं, जिनके नाम सात जिलों की कलेक्टरी करने का रिकार्ड दर्ज है। छत्तीसगढ़ में इतने जिलों की कलेक्टरी किसी आरआर याने डायरेक्टर आईएएस को भी नसीब नहीं हुआ। सोनमणि बोरा, सिद्धार्थ कोमल परदेशी, पी. दयानंद, ठाकुर राम सिंह चार जिलों से आगे नहीं बढ़ पाए। नए वालों में भीम सिंह, किरण कौशल और चंदन कुमार चार जिले के कलेक्टर रहे हैं। और नीलेश क्षीरसागर, दीपक सोनी फोर्थ डिस्ट्रिक्ट क्लब में अभी पहुंचे हैं। याने छत्तीसगढ़ में कोई आईएएस कलेक्टरी में चार जिलों को क्रॉस नहीं कर पाया। मगर डोमन सिंह को पिछली सरकार में पांच साल में पांच जिलों की कलेक्टरी करने का गौरव प्राप्त हुआ। हालांकि, रमन सिंह सरकार में डोमन की कलेक्टरी की पारी शुरू हुई थी। बीजेपी सरकार में वे मुंगेली और कोरिया कलेक्टर रहे। फिर भूपेश बघेल सरकार में कांकेर, महासमुंद, जीपीएम और राजनांदगांव के कलेक्टर बनाए गए। दिसंबर 2023 में छत्तीसगढ़ में बीजेपी की नई सरकार गठन होने के बाद उन्हें राजनांदगांव से हटाया गया। डोमन 2009 बैच के आईएएस हैं। उनका भाग्य कितना प्रबल है, इस बात से आप समझ सकते हैं कि एक तरफ वे कलेक्टरी का कीर्तिमान बना डाले और उनके बैच के बेचारे आरआर अवनीश शरण, डॉ0 प्रियंका शुक्ला और अय्याज तंबोली को दो-तीन जिले से आगे मौका नहीं मिल पाया। बहरहाल, सात जिलों के कलेक्टर रहे डोमन को अब सात जिलों वाले बस्तर संभाग का कमिश्नर बनाया गया है। ब्यूरोक्रेसी में चुटकी ली जा रही...डोमन पोस्टिंग प्राप्ति का ज्ञान बढ़ाने कौन सा चूरण खाते हैं...जिले के बाद क्या अब कमिश्नरी में पोस्टिंग का रिकार्ड बनाएंगे।

एक लिस्ट और

राज्य सरकार ने कल चार आईएएस अधिकारियों का ट्रांसफर किया। इसमें बस्तर कमिश्नर डोमन सिंह की पोस्टिंग देखकर प्रतीत हो रहा कि जल्द ही एक लिस्ट और आएगी। दरअसल, डोमन सिंह के बैच वाले दो प्रमोटी आईएएस बस्तर में कलेक्टर हैं। अब एक ही बैच का कमिश्नर और कलेक्टर कैसे होगा? दरअसल, डोमन 2009 बैच के आईएएस हैं और बीजापुर कलेक्टर अनुराग पाण्डेय और नारायणपुर कलेक्टर विपीन मांझी भी उन्हीं के बैच के। अलबत्ता, मांझी तो डोमन से बैचवाइज सीनियर हैं। अनुराग पाण्डेय चूकि अगले महीने रिटायर हो रहे, इसलिए उतना चल सकता है। मगर मांझी का रिटायरमेंट अगले साल है। ऐसे में सीनियर कलेक्टर रहेगा, और जूनियर कमिश्नर, इसमें सीनियरिटी का इश्यू तो आएगा ही। सवाल यह भी है कि जूनियर अफसर सीनियर का सीआर कैसे लिखेगा? सो, लिस्ट देखकर लगता है...पोस्टिंग में सीनियरिटी और जूनियरिटी का फर्क मिटाने बस्तर में सरकार कुछ और कलेक्टरों को चेंज करेगी। वैसे भी रायपुर और बिलासपुर के कमिश्नर डॉ. संजय अलंग इस महीने रिटायर होने जा रहे हैं। विधानसभा का मानसून सत्र और अलंग का रिटायरमेंट लगभग एक साथ समाप्त होगा। सत्र का उल्लेख करने का आशय यह है कि इसके बाद 31 जुलाई को आईएएस पोस्टिंग की लिस्ट निकलेगी, जिसमें रायपुर और बिलासपुर में नए कमिश्नर अपाइंट किए जाएंगे।

छत्तीसगढ़ की पूजा खेड़कर-1

छत्तीसगढ़ में भी कई पूजा खेड़कर हैं, जिन्होंने फर्जी जाति, विकलांगता और ईडब्लूएस के सर्टिफिकेट के जरिये नौकरी हथियाने में कामयाब हो गईं। एक लेडी डिप्टी कलेक्टर के खिलाफ मामला बिलासपुर हाई कोर्ट तक मामला पहुंचा। महिला अफसर ने कान से कम सुनाई देने का हवाला दिया और विकलांग कोटे से पीएससी में उप जिलाधीश सलेक्ट हो गई। दिव्यांगों की समिति ने उनका कोटा हड़पने का आरोप लगाते हुए हाई कोर्ट में अर्जी लगाई। कोर्ट ने मेडिकल टेस्ट कर रिपोर्ट जमा करने का आदेश दिया। मगर जिला अस्पताल के डॉक्टरों से किसी बीमारी के कागज पर साइन कराना कितना आसान है, इसे बताने की जरूरत नहीं। महिला अफसर ने कागज जमा कर दिया। हालांकि, मामला अभी खतम नहीं हुआ है। मगर यही टेस्ट अगर एम्स में कराया गया होता तो जाहिर है, महिला डिप्टी कलेक्टर को नौकरी बचाना मुश्किल हो जाता।

छत्तीसगढ़ की पूजा खेड़कर-2

पुराने लोग पोरा बाई को भूले नहीं होंगे। पोरा बाई 2008 में बारहवीं बोर्ड में मेरिट में टॉप आई थी। सेकेंड, थर्ड डिवीजन से हमेशा परीक्षा पास करने वाला अगर प्रदेश में टॉप आ जाएगा, तो कोहराम मचना ही था। बलौदा बाजार जिले की रहने वाली पोरा बाई ने नकल के नाम पर कुख्यात जांजगीर के बिर्रा स्कूल से परीक्षा में बैठी थी। मेरिट में टॉप आने के बाद लोगों के कान खड़े हो गए...टॉपर स्टूडेंट परीक्षा में बैठने के लिए स्कूल तो नहीं बदलते। माध्यमिक शिक्षा मंडल के तत्कालीन चेयरमैन बीकेएस रे ने जांच हुई तो पता चला आंसरशीट में हैंडराईटिंग किसी और की निकली। पुलिस ने पोरा बाई समेत स्कूल के प्रिंसिपल और परीक्षक समेत आधा दर्जन से अधिक लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया। पोरा बाई जेल भी गई। मगर 12 साल बाद इस आधार पर कोर्ट ने बरी कर दिया कि पुलिस ने अभियोजन को साबित नहीं किया। पराकाष्ठा तो यह हो गई कि जांच में हैंडराईटिंग किसी और का पाए जाने के बाद भी माशिमं ने पोरा बाई का रिजल्ट केंसिल नहीं किया। और वे इस समय बलौदा बाजार में शिक्षिका बन गई हैं।

मंत्री की बेटी, मंत्री की पोती

देश में जब नीट परीक्षा और पूजा खेड़कर का मामला सुर्खियो में है तो छत्तीसगढ़ का पीएमटी परीक्षा कांड कैसे विस्मित हो सकता है। मामला 2011 पीएमटी का है। तब नीट प्रारंभ नहीं हुआ था। राज्य अपने-अपने हिसाब से प्री मेडिकल टेस्ट लेते थे। 2011 में राज्य सरकार को दो बार पीएमटी परीक्षा निरस्त करनी पड़ी। एक बार गलत पेपर बंटने की वजह से। और दूसरी बार यूपी के एक गैंग ने पर्चा हथिया उसे 13-13 लाख रुपए में बेचने पर। दूसरी बार भंडाफोड़ तब हुआ, जब बिलासपुर जिले के तखतपुर के एक बड़े हॉल में 72 बच्चे पीएमटी का पर्चा हल करते पकड़े गए थे। इनमें मुंगेली से बिलांग करने वाले एमपी के समय के एक पूर्व स्वास्थ्य मंत्री की पोती भी शामिल थी। इतने के बाद अब परीक्षा रद्द तो बनता ही था। ले-देकर तीसरी बार में परीक्षा जाकर संपन्न हो पाई, जब सरकार ने प्रदीप चौबे को परीक्षा नियंत्रक बनाया। मगर छत्तीसगढ़ में जैसा कि होता है, इतने बड़े कांड के बाद भी कुछ हुआ नहीं। तमाम साक्ष्यों के बाद भी पुलिस ने ऐसा केस बनाया कि सारे आरोपी बरी हो गए। जबकि, मध्यप्रदेश के व्यापम कांड में मंत्री तक जेल चले गए थे। उससे पहले एक स्वास्थ्य मंत्री की बेटी कोटे के चलते पीएमटी क्लियर कर ली थी। मगर बारहवी बोर्ड परीक्षा में फेल हो गई, क्योंकि उसमें कोटा होता नहीं। बाद में सप्लीमेंट्री परीक्षा में पास कराकर एमबीबीएस में दाखिला करा दिया गया, तब तक मेडिकल की सीट रोक रखी गई। मेडिकल एजुकेशन के डायरेक्टर ने नियमों को ताक पर रख सेंट्रल कोटे से अपनी बेटी का रायपुर मेडिकल कॉलेज में दाखिला करा दिया। कोर्ट ने इस आधार पर 50 हजार रुपए फाइन करके छोड़ दिया कि अब दो साल की पढ़ाई पूरी कर ली है उनकी बेटी। प्रायवेट कालेज में उस समय 60 लाख फीस थी। अब 60 लाख की जगह 50 हजार में सरकारी मेडिकल कॉलेज से पढ़कर बेटी डॉक्टर बन गई, डीएमई साब फायदे में ही रहे। कहने का मतलब यह है कि छत्तीसगढ़ का परीक्षाओं का ट्रेक रिकार्ड पोरा बाई और मुन्ना भाई, मुन्नी बहनों से भरा पड़ा है।

कलेक्टर से रिटायर

बीजापुर कलेक्टर अनुराग पाण्डेय अगले महीने 31 अगस्त को रिटायर हो जाएंगे। चूकि उनके रिटायरमेंट में अब एक महीना 10 दिन बच गए हैं, सो नहीं लगता कि उनका अब कहीं और ट्रांसफर किया जाएगा। याने कलेक्टर से ही वे सेवानिवृत्त होंगे। कलेक्टर से रिटायर होने वाले अनुराग छत्तीसगढ़ के दूसरे आईएएस होंगे। उनसे पहिले गरियाबंद कलेक्टर छतरसिंह देहरे 2021 में गरियाबंद कलेक्टर से रिटायर हुए थे।

उमेद पर भरोसा

पिछली सरकार से एसपी सीएम सिक्यूरिटी की जिम्मेदारी संभाल रहे प्रफुल्ल ठाकुर को राज्य सरकार ने हटा दिया है। उन्हें चौथी बटालियन में कमांडेंट बनाकर भेजा गया है। उनकी जगह पर बलरामपुर जिले के एसपी लाल उमेंद सिंह को सीएम सिक्यूरिटी की कमान सौंपी गई है। उमेंद मैच्योर पुलिस अधिकारी हैं। राजधानी रायपुर में लंबे समय तक पोस्टेड रहे हैं। मगर इससे इतर लोगों की उत्सुकता इस बात को जानने में है कि आईपीएस राजेश अग्रवाल कैसे उमेंद को खो कर बलरामपुर एसपी बनने में कामयाब हो गए?

अंत में दो सवाल आपसे

1. आईएएस विनीत नंदनवार को ब्रेवरेज कारपोरेशन का एमडी बनाकर सरकार ने पहले उपर चढ़ाया और फिर तीन महीने के भीतर पूर्व की स्थिति में पहुंचा दिया, ऐसा क्यों?

2. SAS अफसर अभिषेक अग्रवाल शराब मार्केंटिंग कंपनी से हटाकर बिना विभाग क्यों कर दिए गए?

शनिवार, 13 जुलाई 2024

Chhattisgarh Tarkash 2024: क्या इसलिए टला छत्तीसगढ़ में कैबिनेट विस्तार!

 तरकश, 14 जुलाई 2024

संजय के. दीक्षित

क्या इसलिए टला छत्तीसगढ़ में कैबिनेट विस्तार!

राजधानी रायपुर में बीजेपी की हाई प्रोफाइल बैठक हुई और उसी दिन देर रात राज्य सरकार ने मंत्री केदार कश्यप को संसदीय कार्यमंत्री का अतिरिक्त प्रभार सौंपने का आदेश जारी कर दिया। मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के इस्तीफे के बाद यह विभाग खाली था। कुछ दिन बाद छत्तीसग़ढ़ विधानसभा का मानसून सत्र है। विपक्ष खामोख्वाह इसे इश्यू बनाता, इसलिए सरकार को अतिरिक्त प्रभार का फैसला करना पड़ा। केदार कश्यप को संसदीय कार्य विभाग देने के बाद जाहिर है कम-से-कम विधानसभा सत्र से पहले अब मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं होगा। मगर उसके बाद कब...? बीजेपी के शीर्ष सूत्रों की मानें तो कैबिनेट का विस्तार अब नवंबर के बाद तक जा सकता है। दरअसल, पार्टी को लग रहा कि मंत्रियों के दो पद खाली रखने का परिणाम नगरीय निकाय चुनावों में देखने मिल सकता है। मंत्री बनने की आस में सारे विधायक अपने-अपने इलाकों में लगकर काम करेंगे। जैसे लोकसभा चुनाव में काम हुआ। विधानसभा चुनाव में बिलासपुर में अमर अग्रवाल की लीड थी 28959 हजार, मगर लोकसभा चुनाव में बढ़कर 52432 हजार हो गई। याने लगभग डबल। इसी तरह रायपुर पश्चिम में राजेश मूणत की विस की लीड थी 41229 और लोस में 87 हजार, कुरूद में अजय चंद्राकर जीते थे 8090 वोटों से और लोस चुनाव में लीड मिली 24929 वोटों की। याने तीगुनी। इससे लगता है, नगरीय निकाय में भी पार्टी को फायदा होगा। मगर सवाल यह भी है कि जिन मंत्रियों के इलाके में लोकसभा चुनाव में पार्टी की लीड बुरी कदर कम हुई या पिछड़ गई....नगरीय निकाय चुनावों में पारफर्मेंस नहीं आया, तो क्या ऐसे मंत्रियों के लिए भी पार्टी रिप्लेसमेंट का कोई फार्मूला बनाएगी? क्योंकि, लोकसभा चुनाव में मोदी का भी असर था, नगरीय निकाय चुनाव विशुद्ध तौर पर मंत्रियों के लिए लिटमस टेस्ट होगा। बहरहाल, बात कैबिनेट विस्तार की, तो कुर्ता, पायजामा और जैकेट सिलवाकर शपथ लेने का इंतजार कर रहे विधायकों को अभी और वेट करना होगा।

एक पोस्ट, 5 का पेनल

एडीजी पवनदेव का बंद लिफाफा खुलने से अब डीजी पुलिस की दौड़ में एक नाम और शामिल हो गया है। दरअसल, डीजी प्रमोशन में डीपीसी ने अरुणदेव गौतम और हिमांशु गुप्ता के नाम को हरी झंडी देते हुए आईपीएस पवनदेव के नाम का लिफाफा बंद कर दिया था। मगर जांच कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने पवनदेव का नाम ओके कर दिया। सरकार से सहमति मिलने के बाद गृह विभाग ने लिफाफा ओपन कर उन्हें डीजी प्रमोट करने की नोटशीट चला दी है। आजकल में कभी भी पवनदेव को डीजी बनाने का आदेश हो जाएगा। इसके साथ ही अगले महीने 4 अगस्त को खाली हो रहे डीजी पुलिस के लिए अब तीन दावेदार हो जाएंगे। अरुणदेव गौतम और हिमांशु गुप्ता के साथ पवनदेव भी। हालांकि, गृह विभाग पांच नामों का पेनल यूपीएससी को भेजने जा रहा है। इनमें एसआरपी कल्लूरी और प्रदीप गुप्ता का नाम भी शामिल है। डीजीपी सलेक्शन का प्रॉसेज यह है कि यूपीएससी चेयरमैन की अध्यक्षता में डीपीसी बैठेगी। इनमें एमएचए के ज्वाइंट सिकरेट्री के साथ ही छत्तीसगढ़ के चीफ सिकरेट्री और वर्तमान डीजीपी होंगे। डीपीसी के बाद यूपीएससी तीन नामों का पेनल फायनल कर राज्य सरकार को भेजेगी। राज्य सरकार उनमें से किसी एक नाम को ओके कर डीजीपी अपाइंट करेगी। लोगों की उत्सुकता इस बात को लेकर है कि विष्णुदेव सरकार इन पांच में से किस पर भरोसा कर छत्तीसगढ़ पुलिस की कमान सौंपती है।

आईपीएस की ट्रेनिंग

छत्तीसगढ़ में पोलिसिंग इस समय बेहद बुरे दौर से गुजर रही तो इसके लिए नए आईपीएस की ट्रेनिंग भी काफी कुछ जिम्मेदार है। आरआर याने डायरेक्ट आईपीएस अधिकारियों को इस तरह पोस्टिंग और दायित्व नहीं मिल रहा, जिससे वे विपरीत परिस्थितियों को कुशलता से हैंडिल कर सके। अब सवाल ट्रेनिंग कमजोर क्यों...तो इसके लिए पीछे चलना होगा। मध्यप्रदेश के दौरान सब कुछ ठीक था। वहां के सिस्टम का असर करीब-करीब 2002-03 तक दिखा। मगर इसके बाद डायरेक्टर आईपीएस की ट्रेनिंग बेपटरी होती गई। दरअसल, एमपी के दिनों में आईपीएस को एडिशनल एसपी का टेन्योर पूरा करने के बाद ही जिले की कमान याने एसपी बनाया जाता था। खुद डीजीपी अशोक जुनेजा बिलासपुर और रायगढ़ के एडिशनल एसपी रहे। मगर राज्य बनने के बाद एडिशनल वाला कल्चर खतम होता गया। प्रोबेशन के बाद बड़े शहरों में आईपीएस अधिकारियों को सीएसपी बनाया जाता है मगर उसके बाद कुछ दिनों के लिए बस्तर भेज फिर सीधे कप्तान अपाइंट कर दिया जा रहा। अब बस्तर में नक्सल को छोड़ और कोई लॉ एंड आर्डर का प्राब्लम नहीं है। इसलिए, वहां के एडिशनल एसपी का अनुभव मैदानी इलाकों में काम नहीं आता। डायरेक्ट आईपीएस को बड़े शहरों में सीएसपी बनाया जाता है मगर सीएसपी के अधिकार क्षेत्र में दो-चार थानों से अधिक कुछ होता नहीं। उन्हें पूरे शहर का अनुभव नहीं मिल पाता। आप याद कीजिए...मध्यप्रदेश के दौर में अमूमन सभी जिलों में दो एडिशनल एसपी होते थे....एक शहर और दूसरा ग्रामीण। डायरेक्ट आईपीएस अफसर को शहर की जिम्मेदारी दी जाती थी और स्टेट सर्विस वाले ग्रामीण की। यह अब पुरानी बात हो गई। लॉ एंड आर्डर की स्थिति हो या फिर कोई वीवीआईपी मूवमेंट का...डायरेक्ट आईपीएस की जगह स्टेट सर्विस वाले आईपीएस को भेज दिया जाता है। प्राईम मिनिस्टर या प्रेसिडेंट का जब भी दौरा होता है तो विजय अग्रवाल का स्कवॉड अफसर बनाया जाता है या फिर शशिमोहन सिंह को। डायरेक्ट आईपीएस को बचा कर रखने की छत्तीसगढ़ में जो परिपाटी सेट हो गई है, वह छत्तीसगढ़ पुलिस की सेहत के लिए अच्छी नहीं। विजय अग्रवाल और शशिमोहन आठ-दस साल में रिटायर हो जाएंगे...वक्त की जरूस्त है नए अफसरों को ट्रेंड किया जाए। वरना, छत्तीसगढ़ पुलिस पोलिसिंग का नहीं, करप्शन का प्रतीक बनकर रह जाएगी।

कका जिंदा हे

बीजेपी और कांग्रेस में फर्क यह है कि कांग्रेस नेता बड़े जीवट होते हैं, विपरीत परिस्थितियों में भी सीना तानकर खड़े रहने वाले। देख ही रहे हैं, पराजय के बाद भी सरकार पर हमला बोलने में कांग्रेस नेता पीछे नहीं। जिन विधायकों पर कई आरोप, वे भी दहाड़ रहे। जबकि, 2018 में जब बीजेपी की करारी पराजय हुई थी, मंत्री समेत सारे नेताओं की बिल में घुसने जैसी स्थिति थी। कई नेताओं का तो अगले विधानसभा चुनाव तक मुंह नहीं खुला। सभी डरे-सहमे सिमटे रहे...कहीं कुछ बोल दिया और फाइल खुल गई तो फिर क्या होगा? आखिरी समय में राजेश मूणत ने कुछ तेवर दिखाने की कोशिश की तो रायपुर पुलिस ने उनके साथ क्या किया, मूणतजी ही जानते हैं...उनके लिए रमन सिंह को थाने जाना पड़ गया। मगर अब तो सरकार बन गई है...10 मंत्री भी हैं लेकिन अधिकांश मंत्री पता नहीं क्यों...डिफेंसिव और बैकफुट पर...। इसके उलट कांग्रेस 2003 से लेकर 2018 तक याने 15 साल सत्ता से बाहर रही...बावजूद इसके, अंदरखाने में भले ही बीजेपी नेताओं के साथ गलबहियां करते करते रहे हो मगर पब्लिक के बीच हमेशा तने रहे। अलबत्ता, इस समय पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सरकारी निवास में पोस्टर-बैनर लगाए गए है, काबर चिंता करथस...कका अभी जिंदा हे। बलौदा बाजार की पुलिस विधायक देवेंद्र यादव को पूछताछ़ के लिए इंतजार कर रही थी। और देवेंद्र मीडिया को दमदारी के साथ बयान दे रहे थे। इसे ही बोलते हैं जीवटता। बीजेपी के मंत्रियों को भी अब खोल से बाहर निकलना चाहिए।

किस्मती इंजीनियर

कैबिनेट ने सुपरिटेंडेंट इंजीनियर से चीफ इंजीनियर के प्रमोशन में वन टाईम के लिए अनुभव में एक साल की छूट देते हुए पांच साल से चार साल कर दिया है। इससे राज्य के कितने एसई लाभान्वित होंगे ये तो नहीं पता, मगर ये सही है कि रायपुर में पीडब्लूडी के एक एसई का रुतबा बढ़ गया है। कैबिनेट के फैसले के बाद उनके पास ट्रांसफर, पोस्टिंग की सिफारिशें लेकर लोग पहुंचने लगे हैं। सबको लग रहा कि एसई साब बेहद पावरफुल हैं...तभी उनके लिए कैबिनेट ने प्रमोशन नियम को शिथिल कर दिया।

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस महिला अफसर को जिले से शिफ्थ कर सरकार ने एक कलेक्टर को मुकेश के गाने सुनने की स्थिति में ला दिया है?

2. ऐसा क्यों कहा जा रहा कि एसीबी की शराब घोटाले की सप्लीमेंट्री चार्जशीट बडे़ धमाकेदार होगी?

शनिवार, 6 जुलाई 2024

Chhattisgarh Trakash 2024: छत्तीसगढ़ में MP कैडर के DGP


 तरकश, 7 जुलाई 2024

संजय के. दीक्षित

छत्तीसगढ़ में MP कैडर के DGP

डीजीपी अपाइंटमेंट का टाईम है, सो इस शीर्षक से आप चौंकिएगा मत! छत्तीसगढ़ में कोई बाहर से डीजीपी नहीं आ रहा। इस खबर का तात्पर्य आपको स्मरण कराना है कि छत्तीसगढ़ में एमपी कैडर के भी आईपीएस डीजीपी रह चुके हैं। आईपीएस थे आरएलएस यादव। राज्य बंटवारे के बाद छत्तीसगढ़ पुलिस का सेटअप ठीक करने उन्हें यहां भेजा गया था। यादव का रिटायरमेंट करीब था, जाहिर है उन्हें एमपी में डीजीपी बनने का मौका नहीं मिलता। इसलिए वे यहीं रुक गए। उस समय डीजीपी नियुक्ति के न तो कड़े नियम थे और न ही कैडर को लेकर भारत सरकार सख्त थी। तभी छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री जोगीजी ने उन्हें 26 मई 2001 को सूबे का डीजीपी अपाइंट कर दिया। याने राज्य बनने के छह महीने के भीतर ही। मगर इसके लिए जोगीजी को मानसिक झंझावतों से गुजरना पड़ा। उनके समक्ष धर्मसंकट यह था कि छत्तीसगढ़ के फर्स्ट डीजीपी श्रीमोहन शुक्ला, जिन्हें उन्होंने ही नियुक्त किया था, उन्हें वे बेहद चाहते थे और आरएलएस यादव तो उनके अपने थे ही। उधर, यादव का रिटायरमेंट भी करीब था। ऐसे में जोगीजी ने श्रीमोहन शुक्ला से आग्रह किया पीएससी चेयरमैन बनने के लिए। आग्रह शब्द का इस्तेमाल यहां इसलिए किया जा रहा कि जोगीजी ने उन्हें सीएम हाउस बुलाकर एक मैसेज देने के लिए सबके सामने कहा था कि ये फैसला मैं आप पर छोड़ता हूं। मैसेज यह था कि वे शुक्ला को हटा नहीं रहे हैं, उनका सम्मान करते हैं। तब शुक्ला के रिटायरमेंट में छह महीने से अधिक समय बचा था। उन्होंने जोगीजी की इच्छा का सम्मान करते हुए आईपीएस से वीआरएस ले लिया और 26 मई 2001 को उन्हें पीएससी का फर्स्ट चेयरमैन बना दिया गया। यादव भी करीब छह महीने ही डीजीपी रहे। जनवरी 2002 में वे सेवानिवृत हो गए। रिटायरमेंट के बाद जोगीजी ने उन्हें अपना सलाहकार बनाया था। बहरहाल, जोगीजी नहीं रहे। मगर उनके इस फैसले की आज भी ब्यूरोक्रेसी में चर्चा होती है कि उन्होंने आरएलएस यादव को डीजीपी बनाने का वादा भी निभाया और श्रीमोहन शुक्ला का सम्मान भी बरकरार रखा। याने जोगीजी ने दोनों को खुश कर दिया।

DGP: संयोग या दुर्योग

यह जानकर आपको हैरानी होगी कि मध्यप्रदेश बंटवारे में जो आईपीएस खुद की इच्छा से छत्तीसगढ़ आए थे, उनमें से एक को भी डीजीपी बनने का मौका नहीं मिला। और जो आईपीएस सुप्रीम कोर्ट जाकर केस जीत गए, वे सभी छत्तीसगढ़ के पुलिस प्रमुख बने। बता दें, छत्तीसगढ़ में अब तक जितने भी डीजीपी बने हैं, वे अगर एमपी में होते तो उनमें से कोई भी वहां डीजीपी नहीं बनता। क्योंकि, एमपी में कैडर बड़ा है। अभी 87 बैच के आईपीएस वहां डीजी हैं। और छत्तीसगढ़ में 91 बैच से नीचे के अफसर इस पद पर पहुंचने वाले हैं। दरअसल, नवंबर 2000 में आईपीएस कैडर का बंटवारा हुआ, उसे छत्तीसगढ़ कैडर के 16 आईपीएस अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया था। उनका कहना था कि गलत रोस्टर के चलते उन्हें छत्तीसगढ़ भेजा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में वे केस जीत गए। आदेश यह हुआ था कि दोनों राज्यों की सहमति से 16 आईपीएस एमपी जाते और उनके बदले एमपी से 16 अफसर छत्तीसगढ़ आते। मगर एमपी के सीएम दिग्विजय सिंह ने सहमति देने से इंकार कर दिया। इसके बाद 16 आईपीएस अधिकारियों को मन मारकर छत्तीसगढ़ रहना पड़ा। तब छत्तीसगढ़ नक्सल और आदिवासी स्टेट माना जाता था। आईएएस हो या आईपीएस...छत्तीसगढ़ कैडर उनके लिए बज्रपात समान था। अब बात उनकी जो इच्छा व्यक्त कर छत्तीसगढ़ आए थे। इनमें राजीव माथुर, संतकुमार पासवान और गिरधारी नायक प्रमुख हैं। ये तीनों सारे एजिबिलिटी के बाद भी डीजीपी नहीं बन पाए। नायक को भाग्य इतना खराब था कि भूपेश बघेल उन्हें डीजीपी बनाना चाहते थे मगर उसमें छह महीने का रोड़ा आ गया। दरअसल, उस समय नियम यह था कि जिसके रिटायरमेंट में अगर छह महीने से कम समय बचा है, उसे डीजीपी नहीं बनाया जा सकता। और जैसे ही भूपेश सरकार ने डीएम अवस्थी को डीजीपी बनाया, महीने भर बाद छह महीने वाला नियम हट गया। अब इसे संयोग बोलिये या दुर्योग।

एसपी, आईजी का नुकसान

एसीबी ने राजधानी रायपुर के महिला थाना प्रभारी को रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। ये तब हुआ, जब एसीबी चीफ अमरेश मिश्रा खुद रायपुर रेंज के आईजी हैं। बहरहाल, इस कार्रवाई से टीआई लोग भारी दुखी और नाराज हैं। ठीक भी है...अमरेश ने अच्छा नहीं किया। सूबे के टीआई लोग अगर ईमानदार हो जाएंगे तो फिर एसपी और आईजी साहबों का क्या होगा? जिस प्रदेश में थानों की बोली लगती हो, वहां एसीबी इस तरह की कार्रवाई करने लगे तो फिर पोस्टिंग के लिए पैसा कोई क्यों देगा? लेकिन, अमरेश के साथ दिक्कत यह है कि वे अपनों को भी नहीं बख्शते। कोरबा में एसपी थे तो रिश्वत के मामले में एक सब इंस्पेक्टर की थाने के भीतर जमकर धुलाई कर डाले थे। जाहिर है, अमरेश अगर दो-एक साल एसीबी में टिक गए तो कोई आश्चर्य नहीं की राजस्थान की तरह दो-चार आईएएस और आईपीएस भी सलाखों के पीछे पहुंच जाएं।

एचओडी पर वर्कलोड

सरकार के दो विंग होते हैं। पहला सिकरेट्री...जो सचिवालय में बैठते हैं...एक तरह से उन्हें सरकार ही कहा जाता है। इनका काम है नीतियां बनाना और उसकी मानिटरिंग करना। दूसरा, सरकार की नीतियों को एग्जीक्यूट करने के लिए विभागीय एचओडी होते हैं। इसमें सेटअप के हिसाब से डायरेक्टर और कमिश्नर बिठाए जाते हैं। चूकि सरकार की योजनाओं को आम आदमी तक पहुंचाने का जिम्मा विभागीय कार्यालयों का होता है, इससे आप समझ सकते हैं कि एचओडी का पद कितना महत्वपूर्ण है। मगर इस समय डायरेक्टर लेवल के अफसरों की कमी कहेंं या सक्षम अफसर न होने से एचओडी पर लोड बढ़ता जा रहा है। सिकरेट्री की संख्या चूकि काफी बढ़ गई है, लिहाजा वे विभाग के लाले पड़ गए हैं और उधर एक-एक एचओडी के पास दो-दो, तीन प्रभार। जाहिर है, इससे काम की गुणवता पर असर पड़ सकता है।

दो नए कमिश्नर

आईएएस की बहुप्रतीक्षित लिस्ट छोटी हो या बड़ी...ये अवश्य यह है कि इस महीने के लास्ट में दो संभागों में नए कमिश्नर की पोस्टिंग की जाएगी। रायपुर के साथ बिलासपुर संभाग की कमान संभाल रहे डॉ0 संजय अलंग इस महीने 31 जुलाई को रिटायर होने जा रहे हैं। उनके रिटायर होने से पहले सरकार दो कमिश्नर अपाइंट करेगी। हो सकता है, अफसरों को इधर-से-उधर करने के क्रम में दो-एक और कमिश्नरों के नाम जुड़ जाएं।

गुस्से में सांसदजी

राजनांदगांव के सांसद संतोष पाण्डेय ने दिल्ली में हाई प्रोफाइल डिनर कराकर अपनी ताकत दिखा दिए। इससे छत्तीसगढ़ में उनका रुतबा बढ़ना था। मगर उल्टा हो गया। कवर्धा में दो करोड़ की लागत से थाना भवन का लोकार्पण हुआ, उस कार्यक्रम में उन्हें पूछा तक नहीं गया। राजनांदगांव में आईजी आफिस का लोकार्पण करने पूर्व मुख्यमंत्री डॉ0 रमन सिंह पहुंचे थे, उस कार्यक्रम के आमंत्रण पत्र से सांसदजी का नाम गोल था। ऐसे में, सांसद का भड़कना स्वाभाविक था...चार दिन पहले दिल्ली में मुख्यमंत्री से लेकर बीएलए संतोष, शिवप्रकाश जैसे दिग्गजों को अपने घर पर डिनर कराने के बाद ये हाल...। पता चला है, सरकार से भी अफसरों को इसके लिए तीखी झिड़की मिली है। मगर इसमें अफसरों का क्या कसूर? कसूर यही कि दो बड़ों के विवाद में सरकारी मुलाजिम पिसता ही है।

मंत्रिमंडल का विस्तार?

छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय कैबिनेट का विस्तार जुलाई फर्स्ट वीक में होना तय माना जा रहा था। मगर पूरा हफ्ता निकल गया, अभी इस पर कोई सुगबुगाहट नहीं है। सत्ता प्रतिष्ठान से भी खामोश है। जानकारों की मानें तो, विधानसभा के मानसून सत्र तक कैबिनेट का विस्तार टल सकता है। तब तक जैसा चल रहा है, वैसा चलता रहेगा। सत्र भी सिर्फ पांच दिन का है। सो, इसमें संसदीय कार्य मंत्री का बहुत रोल नहीं है। बृजमोहन अग्रवाल के इस्तीफे के बाद यही एक विभाग ऐसा है जिसका भूमिका सदन में होती है।

खटराल अफसर

बात करीब दो दशक पुरानी होगी...बिल्डरों और भूमाफियाओं को फायदा पहुंचाने रजिस्ट्री विभाग के एक खटराल आईजी ने ऐसा नियम दिया, जिससे न केवल राज्य सरकार को बल्कि इंकम टैक्स को भी चुना लग रहा है। नियम है...अगर कोई अपने जमीन से लगा अनडायवर्टेड जमीन खरीदता है, तो बाजार दर एकड़ रेट से निर्धारित किया जाएगा। ऐसा नासमझी भरा नियम देश के किसी भी प्रांत में नहीं है। असल में, एकड़ में रेट कर देने से बाजार मूल्य 5 से 10 गुना कम हो जाता है। हकीकत यह है कि बाजार का प्राइस मेकैनिज्म लगे हुए भूमि की कीमत कभी कम नहीं कर सकता। बल्कि यह हास्यपद है। इस नियम के आड़ में भूमि चाहे लगा हो, चाहे ना लगा हो, जमीन माफिया अपने छोटे टुकड़ों का एकड़ रेट में बाजार मूल्य निकालता है और इनकम टैक्स, रजिस्ट्री आदि कई विभागों को नुकसान पहुंचता है। इस नियम के संरक्षण में बड़े पैमाने पर मनी लॉन्ड्रिंग होता है। रजिस्ट्री सिकरेट्री को इस पर गौर करना चाहिए।

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या ये सही है कि किसी बड़े नौकरशाह को पीएससी का चेयरमैन बनाने सरकार विचार कर रही है?

2. क्या जातिगत समीकरणों की वजह से मंत्रिमंडल विस्तार का मामला फंस गया है?