शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

Chhattisgarh Tarkash 2026: 5 घंटे कैबिनेट, मास्टर स्ट्रोक और...

 


तरकश, 31 अक्टूबर 2026

संजय के. दीक्षित

5 घंटे कैबिनेट, मास्टर स्ट्रोक और...

दिसंबर 2023 में सरकार बनने के बाद यह पहला कैबिनेट था, जो करीब पांच घंटे चला। ढाई घंटे तो सिर्फ धान खरीदी पर चर्चा हुई। बिचौलियों के खेल को रोकने के लिए कृषि विभाग के अफसरों ने एमएसपी पर धान खरीदी के अलावा प्रति एकड़ 10 हजार रुपए देने का प्रस्ताव रखा तो मंत्रिपरिषद ने उसे सिरे से खारिज कर दिया। क्योंकि, 10 हजार का कैलकुलेशन एक अंदाज पर था। उससे किसानों को करीब 3600 रुपए का नुकसान हो रहा था। बैठक में सीएम समेत सभी मंत्री इस पर एकमत थे कि 3100 रेट और 21 क्विंटल प्रति एकड़ धान खरीदी पर कोई कंप्रोमाइज नहीं होगा। आखिरकार, ऐतिहासिक फैसले पर सहमति बनी...किसान के खेत में प्रति एकड़ चाहे कितना भी धान हो, बोनस 21 क्विंटल के हिसाब से दिया जाएगा। याने अगर प्रति एकड़ 12 क्विंटल धान हुआ तो उसे बोनस मिलेगा 21 क्विंटल का। इससे किसानों को दूसरे प्रांतों या बिचौलिये तथा राईस मिलरों से रिसायकिलिंग के धान अनाप-शनाप दर पर खरीदने के लिए मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। क्योंकि, छत्तीसगढ़ में प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान होता नहीं। जाहिर है, सूबे में वास्तविक तौर पर करीब 100 से 110 लाख क्विंटल धान होता है। जबकि, पिछले साल 141 और उससे पहले 149 लाख क्विंटल धान की खरीदी हुई थी। एक मोटा अनुमान है, 40 लाख मीट्रिक टन धान खरीदी फर्जी यानी कागजों में होती है, जिसका करीब 10 हजार करोड़ रुपए राईस मिलरों और बिचौलियों की जेब में जाता है। हालांकि, पिछले साल सरकार ने सख्ती बरतने की कोशिश की थी...कलेक्टरों ने जैसे ही कड़ाई शुरू की...मंत्री लगे त्राहि माम करने...हुजूर, ऐसे में, हम चुनाव हार जाएंगे। तो फिर सरकार को तेवर नरम करना पड़ा। फिर भी 135 लाख मीट्रिक टन पर खरीदी रुक गई थी, मगर बिचौलियों ने किसानों की नाराजगी की ऐसी नैरेटिव बनाई कि सरकार को धान खरीदी दो दिन और बढ़ाना पड़ा और बड़ा खेल हो गया। दो दिन में छह लाख मीट्रिक टन धान बिचौलियों ने खपा दिया। इसलिए खरीदी 135 से बढ़कर 141 लाख मीट्रिक टन पर पहुंच गई। बहरहाल, कैबिनेट ने जो पैसा बिचौलियों की जेब में जाता था, उसे किसानों को देने के लिए मास्टर स्ट्रोक का निर्णय तो किया मगर उसका आदेश निकालने में अफसर आगे-पीछे हो रहे हैं। इसकी वजह है, सिस्टम में बैठे एक वर्ग का मानना है, एमएसपी साल-दर-साल बढ़ता जा रहा। ऐसे में, बोनस की अंतर राशि कम होने से किसानों में नाराजगी न बढ़े। मगर देर-सबेर यह फैसला करना ही पड़ेगा। क्योंकि, किसानों की जेब में पैसा जाए, तो कोई दिक्कत नहीं, बिचौलिये मालामाल हो, ये ठीक नहीं।

350 करोड़ महीने का ब्याज

छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा बोर्ड मार्केटिंग फेडरेशन कर्ज की बोझ से इस कदर दबता जा रहा कि कुछ साल बाद वह दिवालिया होने की स्थिति में आ जाए, तो अचरज नहीं। दरअसल, धान खरीदी के लिए मार्कफेड हर साल लगभग 35 से 40 हजार करोड़ लोन लेता है। आज की तारीख में मार्कफेड पर 39 हजार करोड़ का कर्ज है और इस साल और 35 हजार करोड़ लेने की तैयारी है। 39 हजार करोड़ कर्ज के एवज में मार्कफेड को हर महीने 350 करोड़ रुपए सिर्फ ब्याज चुकाना पड़ता है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि मार्कफेड का करीब 10 हजार करोड़ रुपए फर्जी धान खरीदी पर जाता है। आपको जानकार हैरानी होगी...3100 में धान खरीदने के बाद उसे चावल बनाने के प्रोसेज पर करीब 1300 रुपए खर्च होता है। याने करीब 4400 रुपए। और करीब 40 लाख मीट्रिक टन फर्जी धान खरीदी होती है। आप इसे 4400 से मल्टीप्लाई कर लीजिए...जो अमाउंट आएगा, उससे देख आप हिल जाएंगे। मगर पता नहीं क्यों सिस्टम नहीं हिलता। इस बार अगर 40 लाख मीट्रिक टन फर्जी धान खरीदी को रोक लिया जाए तो मार्कफेड को 9800 करोड़ रुपए कम लोन लेना पड़ेगा, जिसका ब्याज करोड़ों में जाता जाएगा।

3100 रेट और चमत्कार

बस्तर में आमतौर पर प्रति क्विंटल सात-से-आठ क्विंटल प्रति एकड़ धान होता है। धान का रेट 3100 और प्रति एकड़ 21 क्विंटल की लिमिट तय होने से पहले वहां से हर साल करीब पांच लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी होती थी। मगर पिछले साल यह 13 लाख मीट्रिक टन पहुंच गया। प्रश्न उठता है, दो साल में बस्तर में ऐसा कौन सा जादुई छड़ी चली कि धान की फसल लगभग तीगुनी बढ़ गई। जवाब मिलेगा, वही रिसाइकिलिंग और बिचौलियों का खेला। जाहिर है, सरकार अगर बोनस की अंतर की राशि देने के अंतिम फैसले पर पहुंच जाती है तो बस्तर में धान की खरीदी फिर उसी पांच लाख मीट्रिक टन के फिगर पर आ जाएगी। बस्तर के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उधर धान की पैदावार कम होने की वजह से राईस मिल भी नहीं हैै। मार्कफेड को वहां से धान खरीद कर मीलिंग के लिए ट्रांसपोर्टिंग कर धमतरी, कुरूद, रायपुर तरफ लाना पड़ता है। यही स्थिति सरगुजा और बस्तर तरफ भी है।

राईस माफियाओं का कमाल

जाहिर है, छत्तीसगढ़ में प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान होता नहीं। लिहाजा, एक कंपनी ने मोटा धान का ऐसा बीज निर्मित कर दिया, जो एकड़ में 25 से 27 क्विंटल होता है। इससे फायदा यह होगा कि 21 क्विंटल सरकार को टिकाया जाएगा और जो बचेगा उसे बिचौलियों को, जो रिसाईकिलिंग कर मार्कफेड को चूना लगाएंगे। कृषि विभाग के अफसरों का कहना है, इस सरना धान के एक केटेगरी का सबसे बड़ा ड्रा बैक यह है कि इसमें काफी ब्रोकन निकलता है। अफसर इसके बीज पर रोक लगाते तब तक काफी मात्रा में इस बीज को किसानों ने खरीद लिया था। सो, इस बार इस नए धान की प्रजाति भी अपनी खेल दिखाएगी।

पंजाब न बन जाए छत्तीसगढ़!

पंजाब कभी देश का सबसे उन्न्त राज्य हुआ करता था। जीडीपी में पूरे देश में फर्स्ट। प्रति व्यक्ति आमदनी में भी टॉप में। मगर पंजाब की बदहाली अब ऐसी हो गई है कि अर्थव्यवस्था में देश के 28 राज्यों में यह 16वें नंबर पर लुढ़क गया है और प्रति व्यक्ति आय में 19वें नंबर पर। इसकी प्रमुख वजह यह रही कि वहां की सरकार और किसानों का पूरा फोकस चावल और गेहूं पर केंद्रित रहा। कृषि और बिजली में बेतहाशा सब्सिडी दी। लोक लुभावन योजनाओं की वजह से पंजाब के बजट का एक बड़ा हिस्सा रेवड़ी बांटने में निकलता गया। उसका खामियाजा पंजाब को भुगतना पड़ा। गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्र, तेलांगना उससे काफी आगे निकल गए। छत्तीसगढ़ में भी अगर राजनीतिक पार्टियां धान की सियासी प्रतिस्पर्धा में उलझी रही तो वो दिन दूर नहीं, जब छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था भी चरमरा जाए। वैसे छत्तीसगढ़ अभी भी देश में 17वें नंबर पर है। याने पंजाब से एक पायदान नीचे। अलबत्ता, छत्तीसगढ़ के लिए राहत और सौभाग्य की बात यह है कि यहां प्राकृतिक संपदाओं का भंडार है। स्टील और माईनिंग में स्टेट की काफी अच्छी स्थिति है। मगर ऐसा प्लान नहीं बना कि सहायक उद्योगों की संख्या में इजाफा हो। सहायक उद्योगों के बढ़ने से रोजगार सृजित होता। 2015 के बाद छत्तीसगढ़ का औद्योगिक ग्रोथ एकदम ठहर गया। वरना, स्टील में रायपुर मंडी गोविंदगढ़ को पीछे छोड़ दिया था।

अफसरशाही और कछुआ गति

मार्च में नक्सलियों के खात्मे का ऐलान होने के बाद नेताओं की सुरक्षा में कटौती करने जून में पीएस होम की अध्यक्षता में प्रोटेक्शन रिव्यू ग्रुप की बैठक हुई थी। इसी बैठक में करीब सवा सौ नेताओं और अधिकारियों की सुरक्षा में कटौती करने का फैसला लिया गया था। जून के बाद जुलाई, अगस्त, सितंबर, और अक्टूबर भी निकल गया। स्मृति ईरानी अगर न आती तो शायद गृह विभाग में इस फाइल दबी रह गईं होती। दरअसल, स्मृति ईरानी की खबर यहां वायरल हो गई कि उन्होंने हरियाणा प्रभार वाले राज्य में बीजेपी के जिला अध्यक्षों की सुरक्षा एक झटके में हटवा दी। इस खबर के बाद गृह विभाग हरकत में आया और फाइल रेंगनी शुरू की। अब खबर है किसी भी दिन इसका आदेश निकल जाएगा। गृह विभाग की हालत यह तब है जब प्रदेश में विजय शर्मा जैसे दमदार विभागीय मंत्री हैं...ई-ऑफिस पर लगातार फाइलों की मॉनिटरिंग की जा रही...चीफ सिकेट्री महीने में दो बार खुद सीनियर सिकेट्रीज की मीटिंग लेकर रिव्यू करते हैं। गृह विभाग की स्थिति और क्या बताएं...? सीएस ने आदेश निकाला था...बजट पारित होने के बाद एक अप्रैल तक सारे विभाग प्रशासकीय स्वीकृति दे दें। गृह विभाग ने बजट की प्रशासकीय स्वीकृति अभी तक नहीं दी है।

नए डीजीपी का पेनल

डीजी के तीन नए पदों को लेकर भी गृह विभाग के अफसर कंफ्यूजन की स्थिति में हैं। जबकि, तीनों का प्रमोशन ड्यू हो चुका है। यही स्थिति अगर आईएएस की होती तो तूफान मच गया होता। एक बार प्रमोटी आईपीएस राजीव श्रीवास्तव को डीजी बना दिया तो सीएम सचिवालय के एक सीनियर सिकेट्री अफसरों को लेकर डॉ0 रमन सिंह के पास पहुंच गए थे कि सुनील कुजूर को सचिव से प्रमुख सचिव क्यों नहीं बनाया जा रहा। सरकार को आखिरकार कुजूर को पीएस बनाना पड़ा। जबकि, 2013 के विधानसभा चुनाव में कुछ चीजों को लेकर वह सरकार उनसे काफी खफा थी। बहरहाल, करीब तीन महीने बाद 5 फरवरी को डीजीपी अरुणदेव गौतम का कार्यकाल खतम हो जाएगा। यूपीएससी के नियमानुसार डीजीपी के रिटायर होने से मिनिमम तीन महीने पहले पेनल बनाने की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए। सरकार अगर उनके रिटायरमेंट तक याने जुलाई तक एक्सटेंशन दे दे ंतो बात अलग है। वरना, नए डीजी के लिए पेनल को भेजना होगा। अगर डीजी के नए पद क्रियेट नहीं होंते तो फिर ये कैसे होगा? ऐसे में जीपी सिंह और हिमांशु गुप्ता के अलावा सरकार के पास कोई विकल्प नहीं बचेगा। क्योंकि, एसआरपी कल्लूरी अभी डीजी नहीं बने हैं। सवाल ये भी...फिर प्रदीप गुप्ता और विवेकानंद का क्या होगा?

आईपीएस या बाबू

गृह विभाग कछुआ गति से चल रहा तो पुलिस मुख्यालय का हाल भी जुदा नहीं है। 2021 बैच के यंग आईपीएस अफसरों को फील्ड में डंडा भांजना चाहिए, तो उन्हें पीएचक्यू में बाबू बनाकर बिठा दिया गया है। अमन झा, अजय कुमार, आकाश श्रीश्रीमाल, अक्षय सबद्रा, आकाश शुक्ला और रविंद्र कुमार मीणा बेचारे कई साल से बस्तर में नक्सलियों से लोहा लेकर लौटे थे। नक्सलवाद के खात्मे के बाद सरकार को उन्हें ईनाम देना था तो मुख्यालय में पोस्ट कर दिया। इसी तरह पीएचक्यू ने बस्तर में एसपी रहे अफसरों को छोटे जिले टिका दिया। उधर, रायपुर कमिश्नरेट को एक तो आईएएस लॉबी ने सही शेप नहीं लेने दिया, उपर से पुलिस मुख्यालय ने नित नए प्रयोेग से उसका कबाड़ा जैसी स्थिति कर दी है। आईपीएस को हटाकर एडिशनल एसपी को डीसीपी बना डाला। ऐसे में, ये सवाल तो पूछे ही जाएंगे, जब एएसपी को ही डीसीपी बनाना था तो फिर पुलिस कमिश्नरेट क्यों बनाया। फिर बदला क्या? अगर रायपुर की तरह पुलिस कमिश्नरेट बनाना हो तो बिलासपुर और दुर्ग के नेताओं को हाथ जोड़ लेना चाहिए...रहने दीजिए, जब सोच और संसाधन हो जाए, तब कमिश्नरेट बनाइयेगा।

प्रमोेटी के भरोसे कब तक?

नो दाउट, एसपी में विजय अग्रवाल, रजनेश सिंह, शशिमोहन सिंह जैसे अफसरों का जवाब नहीं है। मगर सवाल उठता है, आखिर इनसे कब तक कप्तानी कराई जाएगी। ये सभी डीआईजी बन गए हैं। पुलिस महकमे को कायदे से नए अफसरों को तैयार करना चाहिए था। वो काम हो नहीं रहा। रायपुर में कमिश्नरेट बनाने के बाद चार यंग आईपीएस को डीसीपी बनाया गया था। कायदे से उन्हें बताकर पोस्ट करना था कि साल-डेढ़ साल के पहले हिलना नहीं है, ताकि वे ट्रासंफर की कोशिश नहीं करते। मगर कहां से चकरी चली, उन्हें एसपी बनाकर जिलों में भेज दिया गया। वे कुछ दिन और रायपुर में रह गए होते तो और बड़े जिले संभालने लायक उनकी ट्र्रेनिंग और अच्छी हो गई होती। इसी तरह 2021 बैच के आईपीएस के साथ मजाक किया जा रहा। उन्हें ही कमिश्नरेट में डीसीपी बना दिया गया होता, तो कुछ अफसर भविष्य के लिए तैयार होते। यूपीएससी के दूसरी सबसे प्रतिष्ठित सर्विस में सलेक्ट होकर आए इन अफसरों की स्थिति यह है कि पीएचक्यू में बैठने के लिए जगह नहीं। उन्हें कमरा शेयर करने कहा जा रहा। उधर, बस्तर से जो एसपी लौटे, उनमें गौरव राय को बलौदा बाजार जिला मिला, बाकी सभी को छोटे जिले टिका दिए गए। इससे आरआर याने डायरेक्ट आईपीएस का मनोबल काफी डाउन हो रहा है।

होर्डिंग्स पर स्मृति के तेवर

छत्तीसगढ़ में पिछले एक-डेढ़ दशक से होर्डिंग्स का धंधा पिक पर था। मगर स्मृति ईरानी के तीखे तेवर के बाद लगता है, होर्डिंग्स में जिना लोगों ने इंवेस्ट किया है, उन्हें अब कारपोरेट पर निर्भर रहना होगा। दरअसल, स्मृति ने होर्डिंग्स, बैनर पर सख्ती खुद से नहीं दिखाया। जेन जी के आंदोलन के बाद पीएम नरेंद्र मोदी बैठक में कई बार ताकीद कर चुके हैं, होर्डिंग्स मेें स्कीम और फोटो की बजाए काम कीजिए। हो सकता है, स्मृति ईरानी का इशारा भांप सूबे के सत्ताधारी पार्टी के नेता अब होर्डिंग्स से ज्यादा वास्तवित काम पर फोकस करेंगे।

हफ्ते का कोट

'हर अच्छे काम करने वाले का विरोध होता है। आज के दौर में अगर आपकी छबि अच्छी है, वो भी दूसरों के लिए ईर्ष्या की वजह बन सकती है। इससे बचने का एक ही तरीका है, हार्ड वर्क से अपनी लकीर लंबी करते जाइये, दुनिया फिर आपका लोहा मानेगी।'

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस बड़े बोर्ड के चेयरमैन स्मृति ईरानी के सामान्य सा प्रश्न का जवाब नहीं दे पाए?

2. ऐसा क्यों कहा जा रहा...स्मृति ईरानी को महीने में कम-से-कम हफ्ते भर रायपुर में कैंप करना चाहिए?

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