बुधवार, 26 मई 2021

कलेक्टरों की जंबो लिस्ट?

 

तरकश के तीर : कलेक्टरों की जंबो लिस्ट?

संजय के दीक्षित

कोरोना के दौरान ही पिछले साल 27 मई को भूपेश सरकार ने सबसे बड़ी प्रशासनिक सर्जरी करते हुए 28 में से 23 कलेक्टरों को बदल दिया था। अव्वल इस बार विधानसभा के शीतकालीन सत्र के पहले से कलेक्टरों के फेरबदल की अटकलें चल रही है। इस फेर में कई कलेक्टर मनीराम के अलावा दीगर कोई काम हाथ में ले नहीं रहे…न जाने कब बोरिया-बिस्तर बांधना पड़ जाए। कोरोना में वैसे भी लोग देख ही रहे हैं…अधिकांश कलेक्टर शतरंज की गोटी की तरह उतने ही कदम आगे बढ़ा रहे हैं, जिससे उनकी कुर्सी सुरक्षित रहे। बहरहाल, ये मई महीना कलेक्टरों को बेचैन कर रखा है। पिछले मई की तरह सरकार ने कुछ वैसा ही किया तो एक लाइन से कलेक्टर साफ हो जाएंगे। सुनने में आ भी कुछ ऐसा ही रहा है। डेढ़ दर्जन से कम कलेक्टर इस बार भी नहीं बदलेंगे। ये मई अंत तक भी हो सकता है या फिर जून के फर्स्ट वीक तक भी। जब भी हो, होगा तो बड़ा चेन्ज।

एसपी भी!

कलेक्टरों के साथ-साथ एसपी लेवल पर भी जल्द ही बड़ी उठापटक होगी। एसपी की लिस्ट भले ही दो-तीन फेज में निकले, पर संख्या कलेक्टरों के बराबर ही रहेगी। एसपी में कई का लंबा कार्यकाल हो गया है। दंतेवाड़ा एसपी डॉ अभिषेक पल्लव पिछले सरकार के समय से वहां पोस्टेड हैं। नक्सल मोर्चे पर उनका काम ऐसा है कि सरकार चाहकर भी उन्हें मैदानी इलाके में नहीं ला पा रही। उधर, कुछ एसपी प्रमोट होकर डीआईजी बनने वाले हैं। इसमें बालोद जैसे जिले खाली होंगे। जगदलपुर एसपी दीपक झा भी प्रमोशन वाली सूची में हैं। लेकिन, उनके बारे में खबर है, डीआईजी बनने के बाद भी वे वहीं रहेंगे या फिर किसी बड़े जिले में एसएसपी बनकर जा सकते हैं। जांजगीर एसपी पारुल माथुर का भी काफी समय हो गया है। इस तरह कह सकते हैं, एसपी की लिस्ट भी लंबी होगी।

सिर्फ डेढ़ साल

भूपेश सरकार के पांच में से ढाई साल निकल गए हैं। बचे सिर्फ ढाई साल। इसमें से आखिरी साल को काउंट किया नहीं जाता। छत्तीसगढ़ में नवंबर में विधानसभा चुनाव होते हैं, उससे पहिले मई से प्रशासनिक तैयारी प्रारंभ हो जाती है। कहने का आशय यह है कि सरकार के पास मोटे तौर पर डेढ़ साल बचे हैं। जाहिर है, सरकार अबकी मैदान में तेज दौड़ने वाले घोड़ों पर दांव लगाना चाहेगी। कलेक्टर हो या एसपी…का चयन इस बार थोक बजाकर किया जाएगा, ताकि डेढ़ साल में सरकार की योजनाओं में वो पंख लगा सकें। संकेत है, इस बार पोस्टिंग के मापदंड कड़े होंगे।

प्रभावशाली पीएस

प्रमुख सचिव डॉ. आलोक शुक्ला के पास पहले से स्कूल शिक्षा, तकनीकी शिक्षा के साथ व्यापमं और माध्यमिक शिक्षा मंडल के चेयरमैन का दायित्व था। सरकार ने अब कोविड के समय स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा के प्रमुख सचिव की जिम्मेदारी भी उन्हें सौंप दी है। आम आदमी से जुड़े ये दोनों विभाग नौकरशाही की डिक्सनरी में भले ही क्रीम विभाग नहीं माने जाते। लेकिन, बावजूद इसके, है तो अति महत्वपूर्ण। आखिर, अरबिंद केजरीवाल इन्हीं दोनों विभागों पर फोकस कर दूसरी बार सत्ता में आने में कामयाब हो गए। बहरहाल, आलोक पहले भी इन दोनों विभागों को संभाल चुके हैं। 2005 में वे स्कूल शिक्षा में रहे तो उसके बाद दो बार हेल्थ में। फ़ूड में सिकरेट्री रहते उन्होंने हफ्ते भर में पीडीएस का नेटवर्किंग बना दिया था तो इस बार हेल्थ में आते ही टीका पोर्टल। नए अफसरों को आलोक से काम के प्रति कमिटमेंट सीखनी चाहिए। पुराने मंत्रालय में लोगों को अच्छी तरह याद है, पीडीएस बनाते समय अपना चेम्बर छोड़कर एनआईसी के हॉल में कंप्यूटर वालों के बगल में बैठे रहते थे। काम और उसका रिजल्ट आखिर मिलता भी ऐसे ही है।

कलेक्टर मतलब?

कलेक्टर जिले का मुखिया और सरकार का नुमाइंदा होता है। पहले वो जो बोल देता था वो आदेश समझा जाता था। मगर अब ये पुरानी बात हो गई। बिलासपुर का एक वाकया हम आपको बताते हैं। वहां के कलेक्टर डॉ सारांश मित्तर ने सबसे बड़े सरकारी अस्पताल सिम्स की खामियों को दुरुस्त करने आईएएस नूपुर राशि पन्ना को प्रशासक नियुक्त करने का आदेश दिया। मगर 15 दिन बाद भी इसका क्रियान्वयन वे नहीं करा सके। पहले रोड़ा अटकाया गया कि उनका पावर नहीं है। उसके बाद अनुमोदन के लिए फ़ाइल स्वास्थ्य विभाग भेजी गई, और फिर आई, गई बात हो गई । उसी बिलासपुर का एक दृष्टांत और है। आरपी मंडल बिलासपुर के कलेक्टर होते थे। उन्होंने किसी बात पर पीडब्ल्यूडी के एसीई को सस्पेंड कर दिया। चूंकि, कलेक्टर एसीई को निलंबित नहीं कर सकता। सो, उन्होंने मौखिक ऐलान किया और तुरंत मुख्यमंत्री अजीत जोगी से बात कर ओके करा लिया।

रसूख पर सवाल

एक जमाना था जब पार्षद लेवल के नेता कलेक्टर के चेम्बर में जाने का साहस नहीं जुटा पाता था। और अब..? एक सत्य घटना है…कुछ महीने पहले की बात है, सूबे के एक बड़े राजनेता एक जिले के दौरे पर गए। वहां एक नेता को सर्किट हाउस में एंट्री नहीं मिल पाई। उसने कलेक्टर को फोन खड़कया। कलेक्टर वीवीआइपी ड्यूटी में थे, उन्होंने फोन पिक नहीं किया। नेता ने कलेक्टर को व्हाट्सएप दे मारा…कुछ दिन रुक जाओ, फलां महीने की फलां तारीख से आप नहीं हम तय करेंगे कि साहब से सर्किट हाउस में कौन मिलेगा, कौन नहीं। जाहिर सी बात है, छोटे राज्य के अफसरों की स्थिति वैसे भी बहुत अच्छी नहीं होती। पोस्टिंग जैसी चीजें अफसरों को इतना कंपा कर रखती है कि जिस अफसरी की वे सपने यूपीएससी का एग्जाम देते और मसूरी में ट्रेनिंग के दौरान देखते हैं, वे रीयल लाइफ में धराशायी हो जाते हैं। इसके लिए सिर्फ सिस्टम नहीं, बल्कि वे खुद ज्यादा जिम्मेदार होते हैं।

अब डॉक्टर लॉबी?

कोविड जैसी महामारी ऐसे ही आती रही तो खतरा ये है कि एक और लॉबी बेहद ताकतवर हो जाएगी, वो है मेडिकल लॉबी। देश में अभी सबसे सशक्त आईएएस लॉबी मानी जाती है। फिर भी उन पर सरकार का अंकुश इसलिए होता है कि पोस्टिंग को लेकर वे बेहद संजीदा होते हैं। मगर डॉक्टरों के साथ ऐसा है नहीं। प्राइवेट डॉक्टर का कुछ कर नहीं सकते और सरकारी डॉक्टर को कंट्रोल करने पर वो नौकरी छोड़ देंगे। कोविड के समय तो अच्छे-अच्छों की सुनवाई नहीं हो पा रही। राजधानी के एक नेताजी ने जो शेयर किया, उसकी आहट ठीक नहीं है। एक पूर्व मंत्री और एक वर्तमान मंत्री, यानी दो-दो सिफारिश पर वे डॉक्टर से मिलने गए। डॉक्टर के रूखा व्यवहार से वह दंग रह गए। कह सकते हैं, डॉक्टर भी अब मजबूत हो रहे हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. कोविड के इस दौर में आप अनुमान लगा सकते हैं कि नर्सिंग होमों को संरक्षण देने की एवज में सीएमओ प्रतिदिन कितना कमा रहे होंगे?

2. सरकार ने मंत्रालय और इंद्रावती भवन खोल दिया है मगर कितने अफसर रोज ड्यूटी पर जा रहे हैं ?

सीएम की फोटो क्यों नहीं?

 संजय के दीक्षित

तरकश 2 मई 2021. 18 प्लस को वैक्सीन लगाने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने शुक्रवार शाम कैबिनेट के साथियों और कलेक्टरों के साथ वर्चुअल चर्चा की। इसमें कृषि मंत्री रविंद्र चैबे ने सुझाव दिया. 45 प्लस को वैक्सीन के सर्टिफिकेट में जब प्रधानमंत्री की फोटो आती है तो फिर राज्य अपने पैसे से वैक्सीन लगवा रहा, इसमें मुख्यमंत्री की फोटो क्यों नहीं लगनी चाहिए। सबको यह बात जमी। वर्चुअल मीटिंग में आईटी के जानकार सिकरेट्री डॉ आलोक शुक्ला भी कनेक्ट थे। उन्होंने बताया, अलग से एप्प बनाने के लिए भारत सरकार से अनुमति लेनी होगी। इस पर उन्हें कहा गया, वे देखें इसमें क्या किया जा सकता है। इसलिए, कोई आश्चर्य नहीं, छत्तीसगढ़ का अपना कोविन एप्प भी जल्द बन जाए।
उंट के मुंह में जीरा
18 प्लस में अंत्योदय को वैक्सीन लगाने सरकार के फैसले पर भले ही सवाल उठाए जा रहे मगर वास्तविकता यह है कि अभी जितना वैक्सीन आया है, उसमें अंत्योदय को भी लंबा वेट करना होगा। अभी डेढ लाख डोज आए हैं। सूबे मेें 14 लाख अंत्योदय परिवार हैं। एक घर से तीन सदस्य भी जोड़ें तो 42 लाख होते हैं। और वैक्सीन है मात्र डेढ लाख। फिर भी अंत्योदय को खोजने मे कलेक्टरों को पसीना आ गया। कल देर शाम सरकार ने अंत्योदय का फैसला लिया और कलेक्टरों के पास कुछ घंटे का वक्त था। कुछ जिलोें मेें दो-चार से महज बोहनी हो सकी। रायपुर मेें जरूर बीपीएल के साथ ही बैंक कर्मियों को भी टीके लग गए। पता चला है, आंध्र से संबंधित एक बैंक कर्मियों को स्वास्थ्य विभाग ने चुपके से टीका लगा दिया। विधायक शकुंतला साहू ने जिस तरह सोशल मीडिया में वैक्सीन लेते फोटो पोस्ट की थी, बैंक कर्मियों ने भी वही चूक की। और भंडाफोड़ हो गया।


कलेक्टर बोले तो…

सरकार पाॅलिसी बनाती है और कलेक्टरों पर उसके क्रियान्वयन का जिम्मा होता है। कोविड की दौर में कलेक्टरों की यह भूमिका दिखाई नहीं पड़ रही। कई कलेक्टरों की प्रायवेट अस्पताल वाले सुन नहीं रहे। जबकि, कलेक्टर जिले के दंडाधिकारी भी होते हैं। आपदा के समय उन्हेें और पावर मिल जाता है। हालांकि, दुर्ग कलेक्टर ने बीएसपी के सेक्टर-9 अस्पताल को बता दिया कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट क्या होता है। अस्पताल प्रबंधन 50 बेड से अधिक बढाने के लिए तैयार नहीं था। लेकिन, कलेक्टर सर्वेश भूरे ने बंद कमरे में बुलाया और अस्पताल प्रबंधन ने 50 से बढ़ाकर 600 बेड कर दिया।

तीसरी पारी…

राजस्थान समेत कई राज्य सरकारों ने एमबीबीएस करने के बाद आईएएस बने अफसरों को कोरोना को कंट्रोल करने में झोंक दिया है। छत्तीसगढ़ सरकार ने भी डॉ. आलोक शुक्ला को हेल्थ सिकरेट्री का अतिरिक्त जिम्मा सौंपा है। आलोक देश के पहले अफसर होंगे, जिन्हें तीसरी बार हेल्थ सिकरेट्री बनने का अवसर मिला है। इससे पहले रमन सिंह की पहली और तीसरी पारी में हेल्थ सिकरेट्री रहे थे। आलोक काबिल और रिजल्ट देने वाले अफसर माने जाते हैं। फूड सिकरेट्री रहने के दौरान उनका पीडीएस देश का मॉडल बन गया। इसके लिए उन्हें पीएम अवार्ड मिला। कायदे से कुछ और डाक्टर आईएएस को हेल्थ मेें लेना चाहिए।
लॉकडाउन में मछली
मनेन्द्रगढ़ के विधायक डॉ. विनय जायसवाल के गले में मछली का कांटा फंस गया। वहां के डॉक्टरों ने काफी कोशिश की। मगर बात बनी नहीं। उल्टे विनय को सांस लेने में तकलीफ होने लगी। उनकी हालत ऐसी बिगड़ने लगी कि सरकारी हेलीकॉप्टर भेजने फोन लगाया गया। राजधानी के पुलिस लाइन हैंगर से हेलीकॉप्टर टेकऑफ करने वाला था कि खबर आई डॉक्टरों ने कांटा निकाल दिया है। यह खबर जब वायरल हुई तो विडंबना देखिये, विनय से सहानुभूति व्यक्त करने की बजाय राजधानी में कांग्रेस के लोगों का पहला सवाल था, लॉकडाउन में विनय को मछली मिली कहाँ से? सवाल गलत भी नहीं था। लॉकडाउन में सब लॉक हो गया है…। ऐसे में, विनय मछली उड़ाएं…मन ललचाएगा ही।

अंत में दो सवाल आपसे

1. रैमडेसिविर जब जरूरी नहीं है तो फिर इसके लिए मारामारी क्यों हो रही?
2. कोविड केे समय किस कलेक्टर के पारफारमेंस से सरकार खुश नहीं है?

प्रभारी सचिवों का औचित्य?

 संजय के दीक्षित

तरकश, 25 अप्रैल 2021. बेकाबू हो रही कोरोना में जिलों के प्रभारी सचिवों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। छोटे-छोटे जिलों का हाल-बेहाल हो रहा…कलेक्टर संसाधनों के लिए मशक्कत कर रहे हैं मगर सचिवों का कोई पता नहीं है। शायद ही किसी सचिव ने किसी कलेक्टर को फोन लगाकर क्रायसिस के बारे में पूछा होगा। एक कलेक्टर ने बताया…उनके प्रभारी सचिव पिछले साल अक्टूबर में फोन लगाए थे, उसके बाद फिर कभी नहीं। जबकि, कोआर्डिनेशन के लिए सरकार ने सभी जिलों में प्रभारी सचिव बना रखे हैं। इसके तहत मंत्रालय के सचिवों को एक-एक, दो-दो जिलोें का प्रभार दिया गया है। पिछली सरकारें भी प्रभारी सचिवों को जिलों में महीने में एक बार विजिट करने के साथ ही हर तीन महीने में एक बार संबंधित जिलों में रात्रि विश्राम करने का आदेश कई बार दिया था। हुआ क्या…? एक भी सचिव अपने जिले में नहीं रुके। भूपेश बघेल सरकार में पिछले साल चीफ सिकरेट्री आरपी मंडल ने सचिवों को हर महीने जिलों का दौरा कर रिपोर्ट मांगी थी। सरकार को पूछना चाहिए कि कितने सचिवों ने जिलों का दौरा किया और कब-कब रिपोर्ट सौंपी…कोरोना काल में उन्होंने कलेक्टरों को किस तरह मार्गदर्शन दे रहे हैं। फिर प्रभारी सचिवों का औचित्य सामने आ जाएगा।


ऐसा रिस्पांस

रेमडेसिविर इंजेक्शन की आपूर्ति के लिए सरकार ने दो आईएएस और एक आईएफएस समेत तीन अधिकारियों की ड्यूटी लगाई है। इनमें से दो अधिकारी मुंबई में कैम्प कर रहे ताकि जिलों को आसानी से इंजेक्शन की सप्लाई हो सकें। लेकिन हो क्या रहा….राजनांदगांव के एनएचएम के एक अधिकारी ने एक अफसर को मुंबई फोन लगाया तो अफसर ने मदद की बजाए चार कंपनियों के नम्बर दे दिए…लो इनसे बात कर लो। अब जब कंपनी से सीधे बात कर इंजेक्शन मंगाना है तो फिर इन अधिकारियों की नियुक्ति क्यों?

एयर एंबुलेंस…ढाई गुना रेट

कोरोना महामारी में कोई भी दुखियों की जेब काटने का मौका नहीं छोड़ रहा। अस्पतालों की तो पूछिए मत! कोरोना से बिलबिलाते मरीजों में इतनी ताकत कहां होती है कि डिस्चार्ज होते समय अस्पताल वालों से हिसाब पूछ पाए। उसकी कोशिश होती है किसी तरह अपने घर पहुंच जाए। हमारा इशारा अनाप-शनाप बिलिंग की ओर है। उधर, सामान्य मरीजों का दिल्ली, मंुबई, चेन्नई के लिए एयर एंबुलेंस का रेट पांच से छह लाख है, वहीं कोरोना मरीजों से 14 से 15 लाख लिए जा रहे हैं। रायपुर, बिलासपुर से लगभग हर रोज एक मरीज एयर लिफ्ट हो रहे हैं। बिलासपुर से रायपुर के लिए एंबुलेंस का किराया 10 से 12 हजार देना पड़ रहा। राजधानी में एक गरीब आदमी आॅटो से एम्स गया। वहां कहा गया काली बाड़ी से कोरोना का टेस्ट कराकर लाओ। एम्स से काली बाड़ी आने और फिर वहां से एम्स जाने का आॅटो वाले ने दो हजार रुपए झटक लिया। याने उपर से नीचे वाले….सभी आपदा में अवसर ढूंढने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।

एम्स में एप्रोच नहीं

एम्स में पिछले साल कोरोना में वीआईपी से लेकर छुटभैये तक बेड का जुगाड़ कर लिया था। लेकिन, इस बार एम्स सख्त हो गया है। बताते हैं, पिछले साल एम्स में मची अफरातफरी को देखते वहां के डाक्टरों ने विरोध कर दिया था। दरअसल, पिछले साल मरीजों के क्राउड के चलते एम्स का सिस्टम ध्वस्त हो गया था। सबसे अधिक मौतें भी वहीं हुई थी। उसकी वजह यह थी कि वहां क्षमता से दस गुना मरीज हो गए थे। हर आदमी चाहता था कि किसी तरह एम्स में इंट्री मिल जाए। लेकिन, एम्स अबकी सतर्क है। वहां सिर्फ कोरोना के गंभीर मरीजों को ही भर्ती हो पा रही। वो भी रेफेरल केसेज। बीजेपी के नेताओं से जरूर एम्स वाले कुछ असहज महसूस कर रहे।

10 आईएएस, एक आईएफएस

कोरोना महामारी के मद्देनजर स्वास्थ्य विभाग फिहलाल सरकार के टाॅप प्रायरिटी पर है। तभी सरकार इस महकमे को लगातार मजबूत कर रही। हेल्थ में आईएएस अफसरों की संख्या अब तक 10 हो चुकी है। दो आईएएस और एक आईएफएस को सरकार ने इस विभाग की मदद करने में लगाया है। हेल्थ में इस समय रेणु पिल्ले एसीएस, शहला निगार सिकरेट्री, सीआर प्रसन्ना स्पेशल सिकरेट्री, नीरज बंसोड़ डायरेक्टर हेल्थ, डाॅ0 प्रियंका शुक्ला ज्वाइंट सिकरेट्री और एमडी एनएचएम, कार्तिकेय गोयल एमडी सीजीएमएससी, केडी कुंजाम कंट्रोलर ड्रग, डी. राहुल वेंकट ओएसडी हेल्थ के साथ आईएएस हिमशिखर गुप्ता, आईएएस भोस्कर विलास संदीपन और आईएफएस अरुण प्रसाद को रैमडेसिविर की सप्लाई का जिम्मा सौंपा गया है।

महामारी में पब्लिसिटी

कुछ अफसर इस विपदा के समय में भी पब्लिसिटी को ध्यान में रखते काम कर रहे हैं। ये उन सैकड़ों फ्रंटलाइन वारियर्स का अपमान होगा, जो सिर पर कफन बांध कर सुबह से लेकर देर रात तक ड्यूटी बजा रहे हैं। वास्तव में सैल्यूट के लायक अस्पताल के नर्स और छोटे स्टाफ हैं, जो मामूली वेतन में भी जान जोखिम में डालकर कोरोना वार्डों में सेवाएं दे रहे। कैमरे के लिए दो मिनट सड़क पर खड़े होकर वाहवाही बटोरने वाली महिला आफिसर कतई नहीं….फोटो में इंटरेस्ट रखने वाले कलेक्टर भी नहीं।

अंत में दो सवाल आपसे

इस खबर में कितनी सत्यता है कि कोरोना से संबंधित संसाधनों की आपूर्ति में प्रमोटी कलेक्टरों से भेदभाव किए जा रहे हैं?
दवाइयों की मारामारी को रोकने कुछ समय के लिए किसी दबंग सिकरेट्री या प्रिंसिपल सिकरेट्री को ड्रग कंट्रोलर का दायित्व नहीं सौंपा जा सकता?

प्रोफार्मा राजधानी का, दस्तखत…

 संजय दीक्षित

तरकश के तीर, 18 अप्रैल 2021

छत्तीसगढ़ में लाॅकडाउन लगाने के लिए कलेक्टरों को अधिकृत किया गया है। उसी हिसाब से कलेक्टर अपने-अपने जिलों को लाॅक करने का आदेश दिए। लाॅकडाउन के संदर्भ में कलेक्टरों द्वारा जो गाइडलाइंस तय किया जा रहा है, उसका प्रारुप रायपुर में तैयार किया गया। एसीएस होम सुब्रत साहू के निर्देशन में गाइडलाइंस के प्वाइंट्स तैयार किए गए। ये अलग बात है कि रायपुर से बना बुनाया आदेश मिलने के बाद भी कई कलेक्टरों ने उस पर चिड़िया बिठाने में विलंब कर दिया।


कोरोना और बड़ी शख्यिसतें…

कोरोना के सेकेंड वेब की चपेट में आम आदमी के साथ खास लोग भी आते जा रहे हैं। रायपुर में अविनाश गु्रप के अशोेक सिंघानिया की दो दिन पहले मौत हो गई। हेल्थ विभाग के इनसाइक्लोपीडिया कहे जाने वाले डाॅ0 सुभाष पाण्डेय की खबर ने तो पूरा महकमे को हिला दिया। राजधानी के पावरफुल लोगों की कालोनी देवेंद्र नगर में भी एक दर्जन से अधिक लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं। मुख्यमंत्री के सलाहकार, महिला सिकरेट्री, एक आईपीएस कोरोना से संक्रमित हो गए हैं। राजस्व विभाग के चेयरमैन सीके खेतान जीएडी सिकरेट्री कमलप्रीत सिंह, डीपीआई जीतेंद्र शुक्ला जाहिर रूप से कोरोना से पीड़ित हैं। इसके उलट आफिसर्स कालोनी में चार ब्यूरोक्रेट्स और हैं, जो खुलासा करने से फिलहाल हिचकिचा रहे हैं। उधर, बिलासपुर में पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल के बेटे को पहले कोरोना हुआ और उसके बाद अमर दंपति भी पाॅजिटिव हो गए। निहितार्थ यह है कि इस बार का कोरोना किसी को बख्श नहीं रहा। लिहाजा, अत्यधिक सतर्कता की जरूरत है।

कमलप्रीत का प्रेशर…

आईएएस डाॅ0 कमलप्रीत सिंह कई महत्वपूर्ण विभागों वाले सिकरेट्री हैं। उनके पास फूड, ट्रांसपोर्ट और जीएडी है। कोरोना के समय तीनों विभागों की भूमिका बेहद अहम होती है। पिछले लाॅकडाउन में कमलप्रीत बड़े एक्टिव रहे। लेबर समेत गरीबों को राशन पहुंचाना, रोड ट्रांसपोर्ट पर नजर रखना, जीएडी सिकरेट्री के रूप में आए दिन आदेश निकालना। इस बार वे कोरोना संक्रमित हो चुके हैं। कमलप्रीत के पाॅजिटिव आने से उनका प्रेशर अब एसीएस टू सीएम सुब्रत साहू और सिकरेट्री टू सीएम सिद्धार्थ परदेशी पर आ गया है। डिप्टी सिकरेट्री टू सीएम तारन सिनहा के ट्रेनिंग में मसूरी जाने से सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का दायित्व भी सिद्धार्थ पर है। बहरहाल, ये तो हुई जिम्मेदारी वाली बात। सेकेंड…जो ब्यूरोक्रेसी के बीच मैटर कर रहा है या यों कहें कि उन्हें सहमा रहा कि कमलप्रीत जैसे मजबूत कद-काठी और ढाई किलो के हाथ वाले आईएएस जब कोरोना से नहीं बच सकते तो फिर…।

आईएएस एसोसियेशन आगे….

पिछली बार कोरोना में सीएम रिलीफ फंड में एक दिन का वेतन देने में आईएफएस एसोसियेशन आगे रहा था। आईएएस एसोसियेशन ने बाद मेें फैसला किया। इस बार कोविड पाॅजिटिव होने के बाद भी प्रेसिडेंट सीके खेतान ने इसमें देर नहीं लगाई। आईएएस ग्रुप में मैसेज सुबह पोस्ट किया और शाम तक फायनल हो गया। आईएएस एसोसियेशन के अलावा दूसरे किसी सर्विस से अभी सीएम रिलीफ फंड में वेतन देने का ऐलान नहीं किया है।

60 मौतें या…

कोरोना का रोज जारी होने वाला सरकारी डेटा रायपुर के लोगों को डरा रहा है। यहां हर दिन 60 के करीब मौतें हो रही हैं। अलबत्ता, लोगों को यह फिगर समझ में नहीं आ रहा… वो इसलिए क्योंकि तहसील आफिस से उपर के अफसरों को रायपुर के श्मशान में अंत्येष्टि की डेली रिपोर्ट भेजी जा रही, वह तो काफी ज्यादा है। फिर भी, 60 मौतें कम नहीं होतीं। दरअसल, रायपुर में रायपुर के अलावा भिलाई, दुर्ग, राजनांगांव, बेमेतरा, बालोद, बलौदा बाजार, धमतरी, कांकेर, महासमुंद जिलों से भी केसेज पहुंच रहे हैं। जाहिर है, केस बिगड़ने के बाद ही लोग पेशेंट को रायपुर लेकर आते हैं। डाक्टरों का कहना है, रायपुर का फिगर इसलिए भी ज्यादा दिख रहा है।

बिलासपुर भी फुल…

रायपुर का बाद दूसरा बड़ा शहर बिलासपुर है। बिलासपुर में अपोलो अस्पताल के साथ ही मंझोले केटेगरी के करीब दर्जन भर अस्पताल हैं। हफ्ते भर पहिले तक इन अस्पतालों में 25 से 30 परसेंट बेड खाली थे। अब वहां भी स्थिति चरमरा गई है। दरअसल, रायपुर के आसपास के जिलों का जिक्र उपर किया गया है, उन्हें रायपुर में जगह नहीं मिलने पर वे बिलासपुर का रुख कर लिए। यही कारण है कि बिलासपुर में भी बेड फुल है। गनीमत है, वहां अभी केजुअल्टी कम है।

विद्युत शवदाह गृह…

कोरोना से हो रही मौतों में शवों के लग रहे अंबार को देखते सरकार अब हर जिले में विद्युुत शवदाह गृह बनाने पर विचार कर रही है। इस संबंध में कलेक्टरों को भी निर्देशित किया जा चुका है। विधायकों की बैठक में भी इस ओर इशारा किया गया था। बिजली शव दाह गृह का मतलब है कि कोरोना का सेकेंड वेब तगड़ा रहेगा और लंबा चलेगा।

10 पीढ़ी ठाठ से….

रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर में ऐसे लोग लाॅकडाउन का विरोध कर रहे हैं, जिन्होंने इतना धन अर्जित कर लिया है कि आने वाली उनकी 10 पीढ़ियां मौज से जीवन यापन कर सकती है। उसके बाद भी वही व्यापार ठप होने का रोना। संकट के इस समय में व्यापारिक संगठनों के लोग राजनीति भी शुरू कर दिए हैं। हैरत है कि चेम्बर का एक गुट कलेक्टर को ज्ञापन सौंपने पहंुच गया।

फ्रंट वारियर्स क्यों नहीं?…

कसडोल की 32 वर्ष की महिला विधायक शकुंतला साहू के कोरोना वैक्सीन लेने की खबर इस हफ्ते सुर्खियों में रही। शकुंतला के वैक्सीन लगाने के सवाल पर विधायकों की नाराजगी इस बात को लेकर है कि कोरोना के समय जनप्रतिनिधि लगातार लोगों को अस्पताल में भरती के साथ ही उनके उपचार की व्यवस्था में जुटे हैं। इसके बाद भी उन्हें फ्रंट वारियर्स नहीं माना गया। जबकि, जनपद सीईओ आफिस तक के लोगों को वैक्सीन लगा दिया गया।

अंत में दो सवाल आपसे….
1. कांग्रेस के किस नेता के यहां विशेष अनुष्ठान कराया जा रहा है?
2. जनप्रतिनिधियों को कोरोना किस तरह हलाकान कर रहा है?

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

कलेक्टरों की जिद

 संजय के दीक्षित

तरकश, 11 अप्रैल 2021
कोविड से सबसे खराब स्थिति राजधानी रायपुर, दुर्ग और राजनांदगांव की है। रायपुर में कोविड से रोज 30 से अधिक मौतें हो रही हैं। ये स्थिति एक दिन में नहीं आई। कोई 15 मार्च से रायपुर में कोरोना का ग्राफ खतरनाक ढंग से उपर आने लगा था। 25 मार्च से केजुअल्टी की संख्या भी बढ़ती जा रही थी। बहरहाल, रायपुर, दुर्ग समेत नौ जिलों ने लाॅकडाउन का ऐलान कर दिया है। मगर कुछ कलेक्टर केसेज बढ़ने के बाद भी निर्णय नहीं कर पा रहे, तो कुछ अपने जिद पर हैं…लाॅकडाउन न करने से शायद उनका नम्बर बढ़ जाए। आखिर ऐसा क्यों? रायपुर जैसी स्थिति निर्मित होने का इंतजार क्यों? ये ठीक है…लाॅकडाउन से काफी नुकसान होता है। ये समस्या का स्थायी समाधान भी नहीं है। लेकिन, चेन को ब्रेक करने का इससे फास्ट कोई तरीका भी तो नहीं है। आखिर, जान के आगे सब कुछ है। जो लोग अपने प्रिय जनों को खो रहे हैं, उनसे पूछिए….। चेम्बर आफ कामर्स और व्यापारिक संगठनों से राय लेकर प्रशासन नहीं चलता। दुर्भाग्य है कलेक्टर यही कर रहे हैं। उन्हें मध्यप्रदेश को देखना चाहिए। जबलपुर में 300 केस आने पर लाॅकडाउन की घोषणा हो गई है। यहां पांच, छह सौ केस छोटे-छोेटे जिलों में आ रहे हैं।

छोटे जिले, बड़ी मुश्किलें


बड़े और वीआईपी जिलों में कुछ होता है, तो वो जल्दी नोटिस में आ जाता है। लेकिन, छोटे जिले? कोरोना से कोई सबसे अधिक परेशान हैं तो वो हैं छत्तीसगढ़ के छोटे जिले। छोटे जिलों में स्वास्थ्य सुविधाएं वैसे भी नहीं के बराबर होती है। कस्बाई जिलों में एक तो प्रायवेट अस्पताल कम होते हैं। उसमें भी आक्सीजन और वेंटीलेटर की सुविधाएं नहीं होतीं। बेमेतरा, बालोद, बलौदा बाजार, जशपुर, महासमुंद में रोज तीन सौ, चार सौ केस आएंगे तो स्वाभाविक सा सवाल है कि उन्हें वे रखेंगे कहां। बड़े जिलों पर मीडिया का फोकस रहता है। लेकिन, जशपुर का नाम किसी मीडिया में आप नहीं देख रहे होंगे। जो लोग जशपुर गए होंगे, वे समझ सकते हैं कि प्रति दिन दो सौ, तीन सौ केस को कैसे हैंडिल किया जा रहा होगा। ऐसे में, छोटे जिलों की परेशानी समझी जा सकती है।

श्मशान में लाईन

रायपुर के अस्पतालों में बेड नहीं मिल रहा। लोग एडवांस पैसा धरे दो-दो, तीन-तीन दिन से गिड़गिड़ा रहे हैं। उधर, श्मशान गृहों में लाईन जैसे सिचुएशन बनने लगे हैं। आंबेडकर अस्पताल की मरचुरी की क्या स्थिति है, यहां उसे ना लिखना ही बेहतर होगा। मगर अगर समय रहते युद्धस्तर पर इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो स्थिति और बिगड़ेगी। लिहाजा, अब समय आ गया है, सरकार को अपने सारे सिकरेट्री को सड़क पर उतार दें। सिकरेट्री को जिले का प्रभार देकर उनसे दिन में दो टाईम अपडेट लिया जाए।

मंत्रियों का दायित्व

महामारी के समय ये तो नहीं होना चाहिए कि मंत्री अपने घरों में बैठ जाएं। खासकर जिन जिलों में लाॅकडाउन नहीं लगा है, वहां तो वे सड़क पर उतर कर लोगों को, अपने कार्यकर्ताओं को कोविड के लिए अवेयर कर सकते थे। लेकिन, दुर्भाग्य से पिछले साल भी, और इस बार भी, किसी भी मंत्री में ऐसा नहीं दिखा। आखिर कोविड के प्रति उनका भी कुछ दायित्व बनता है। रायपुर, कोरबा, रायगढ़ जैसे कई जिलों में प्रशासनिक अफसर सड़क पर उतरे। इस तरह अगर नेता, मंत्री भी लोगों के बीच जाते तो निश्चित तौर पर उनकी अपील से फर्क पड़ता। यही हाल बीजेपी नेताओं का है। भाजपा नेता अपने घरों में बैठे-बैठे सरकार के खिलाफ बयान जारी कर विपक्षी नेता का धर्म निभा दे रहे हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ की हालत तो बिगड़नी ही थी।

ट्रांसफर पर ब्रेक

कोविड ने कलेक्टरों, पुलिस अधीक्षकों के बहुप्रतीक्षित ट्रांसफर पर ब्रेक मार दिया है। हालांकि, पिछले साल कोरोना के बावजूद सरकार ने 27 मई को 22 जिलों के कलेक्टरों समेत 29 आईएएस को इधर-से-उधर कर दिया था। लेकिन, इस बार चूकि कोरोना दूसरी तरह का है। पिछली बार पिक टाईम में 3800 केस आ रहे थे। इस समय 14 हजार से अधिक है। केजुअल्टी की तो कोई तुलना ही नहीं है। ऐसे में, नहीं लगता कि सरकार संकट की इस घड़ी में अफसरों को अभी बदलेगी। जिले में जाने के लिए सूटकेस तैयार कर बैठे आईएएस, आईपीएस अफसरों को लगता है, और वेट करना होगा।

कलेक्टरों पर प्रेशर

लाॅकडाउन में कलेक्टरों पर सबसे अधिक प्रेशर है। सरकार ने सिचुएशन को देखते उन्हें फ्री हैंड दे दिया है। लेकिन, जितना बीजेपी के समय व्यापारी वर्ग कलेक्टरों पर प्रेशर नहीं बना पाता था, उससे अधिक अभी हाॅवी हो गया है। रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग, सूबे के तीन बड़े शहर और व्यवसायिक केंद्र हैं। और, तीनों कलेक्टरों पर व्यवसायिक संगठनों का भारी दबाव है कि कंप्लीट लाॅकडाउन न हो। रायपुर में तो कल शाम से लाॅकडाउन प्रभावशील हुआ और दूसरे दिन भाजपा से जुड़े चेम्बर के नेता कलेक्टर को ज्ञापन सौंपने चले गए। रायपुर में लाॅकडाउन की घोषणा होते समय भी चेम्बर ने काफी विरोध किया। चेम्बर के लोग अड़ गए थे कि पहले तीन दिन का लाॅकडाउन किया जाए। भारतीदासन सीनियर कलेक्टर हैं, इसलिए वे 10 दिन का लाॅकडाउन लगा दिए। वरना, जूनियर कोई अफसर होता तो तीन दिन पर मुहर लगा दिया होता। वैसे इस 10 दिन मेें पांच दिन सरकारी छुट्टी है। दो शनिवार, दो रविवार और एक आंबेडकर जयंती। इसलिए, व्यापारी मन मसोसकर मान गए। चेम्बर का अब जोर है कि लाॅकडाउन 19 अप्रैल से आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा।

अंत में दो सवाल आपसे

1. भाजपा के किस नेता को इन दिनों राज्य सरकार का चैदहवां मंत्री कहा जा रहा है?
2. पांच राज्यों के चुनाव के बाद बीजेपी के एक नेता को राज्यपाल बनाए जाने की खबर में कितनी सच्चाई है? ?

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

अफसर और खिलौना

 संजय के दीक्षित

तरकश, 5 अप्रैल 2021

महिला बाल विकास विभाग की एक महिला अधिकारी को हटा दिया गया। बताते हैं, उन्होंने विभाग की सप्लाई लाइन पर नजरें टेढ़ी कर दी थी। आंगनबाड़ी केंद्रों के लिए 10 करोड़ रुपए से अधिक का खिलौना कांड में उन्होंने महकमे के एक रंगा को सस्पेंड करने लिख दिया था। बताते हैं, पाॅलीटेक्नीक काॅलेज के विशेषज्ञों ने खिलौने का टेस्ट कर गंभीर रिपोर्ट दी थी। बच्चों के लिए खरीदे गए खिलौने तय मानक के हिसाब से सही नहीं थे बल्कि किसी लेब का प्रमाण भी नहीं था कि खिलौने में टाॅक्सिन नहीं हैं। महिला अधिकारी ने इसके बाद न केवल रंगा को सस्पेंड करने लिखा बल्कि नए खरीदी की फाइल को रोक दी थी। इसके बाद मामला टर्न हो गया। अधिकारी ने सस्पेंड करने की नोटशीट भेजी और उसके दो दिन बाद 30 मार्च को उनका विभाग बदल गया। और, इसमें हाइट देखिए...30 को उनका ट्रांसफर हुआ और 31 मार्च को विभागीय अधिकारियों ने दोबारा खिलौने खरीदने का आर्डर दे दिया। बुलेट की रफ्तार से ये काम इसलिए किया गया क्योंकि 31 मार्च के बाद बजट लेप्स हो जाता।  

आईपीएस से तकरार

एक मंत्री की सीनियर आईपीएस से तकरार इन दिनों खूब चर्चा में है। बताते हैं, मंत्री ने वाहन के मामले पर आईपीएस से सवाल-जवाब किया। आईपीएस ने दो टूक जवाब दे दिया। इस पर मंत्री भड़क गए...बोले, ये बात करने का तरीका नहीं है, सस्पेंड हो जाओगे। आईपीएस ने भी कह दिया, ठीक है सर...सस्पेंड कर दीजिए। हालांकि, आॅल इंडिया के अफसर को सस्पेंड करने का अधिकार मंत्री को नहीं होता। सिर्फ मुख्यमंत्री के पास ये पावर है। मंत्री ने शायइ इसीलिए इसे इश्यू नहीं बनाया।

मंत्री का गुस्सा 

लगता है, मंत्री लोगों पर अब सत्ता का नशा हावी होने लगा है। तभी तो बलौदा बाजार रोड पर एक मंत्री ने कार वाले पर हाथ उठाते-उठाते रुके। बताते हैं, मंत्रीजी के सायरन के बाद भी भीड़-भाड़ की वजह से एक कार वाले ने जल्दी साइड नहीं दी। उनकी पायलट गाड़ी ने जब जोर-जोर से सायरन बजाने लगी तो कार वाले ने साइड तो दिया लेकिन, मंत्रीजी को लगा कि उसने गाली देने जैसा कुछ कहा है। उन्होंने तुरंत गाड़ी रुकवाई और नीचे उतर पड़े। उन्होंने पूछा, तूने गाली क्यों दिया। गुस्साते हुए मंत्रीजी ने हाथ उठा लिया था, तब तक पता चला कार वाला आरंग के पास उनके मामा गांव का रहने वाला है। इसके बाद समझाइस देते हुए मंत्री अपने काफिले में निकल गए। 

व्हाट एन आइडिया!

सूबे के एक मंत्री ने सेफगेम का अजब तरीका निकाला है। ट्रांसफर का काम बिलासपुर के एक अ-सरदार को सौंप दिया है तो विभागीय खरीदी-बिक्री का काम डौंडी लोहारा के एक व्यापारी संभाल रहे हैं। रायपुर में मंत्री के बंगले में व्यापारी के लिए बकायदा चेम्बर बन गया है। दरअसल, मंत्रीजी को किसी ने सलाह दी कि मंत्री बंगले से अगर जिले के अधिकारियों को फोन जाता है तो उसकी सुनवाई ज्यादा होेती है। मंत्रीजी को सलाह जमी और उन्होंने व्यापारी के लिए बंगले में चेम्बर बनवा दिया। इसके बाद जमकर काम भी हो रहा और मंत्रीजी सुरक्षित भी हैं। है न आइडिया! 

ऐसे कलेक्टर

छत्तीसगढ़ में दुर्ग कलेक्टर सर्वेश भूरे के नाम से एक वीडियो वायरल हुआ। वीडियो में कलेक्टर हाथ में लाठी लेकर बिना मास्क लगाए तफरी कर रहे लोगों की ठुकाई करते दिख रहे हैं। वीडियो देखकर यकबयक भरोसा नहीं हुआ...छत्तीसगढ़ में लाठी लेकर सड़क पर उतरने वाले ऐसे दमदार कलेक्टर कहां से आ गए। भरोसा सही निकला। वीडियो दुर्ग कलेक्टर का नहीं, मध्यप्रदेश के नागदा जिले का था। चूकि अफसर की शक्ल दुर्ग कलेक्टर से मिलती-जुलती थी, इसलिए किसी ने शरारत करते हुए भूरे के नाम से वायरल कर दिया। हालांकि,  ऐसे कलेक्टर पहले छत्तीसगढ़ के लोगों ने भी देखे हैं। उग्र प्रदर्शन होने पर कलेक्टर खुद लाठी लेकर निकल जाते थे। लेकिन, कैमरे वाला मोबाइल आने के बाद कलेक्टरों ने अब हाथ की सफाई दिखाना बंद कर दिया है।   

दमदार कलेक्टर?

ठीक है, दुर्ग कलेक्टर ने लाठी से लोगों की पिटाई नहीं की। लेकिन, उन्होंने लाॅकडाउन का सबसे पहले फैसला लेकर दमदारी तो दिखाई। मुख्यमंत्री ने ट्वीट कर कलेक्टरों को जरूरत के हिसाब से लाॅकडाउन लगाने का फ्रीडम दिया। इसके अगले दिन दुर्ग कलेक्टर ने लाॅकडाउन का आदेश जारी कर दिया। हालांकि, दुर्ग कलेक्टर के आदेश के बाद आईएएस के व्हाट्सएप ग्रुप में कोहराम मच गया। सवाल उठाया गया कि कलेक्टर ने बिना रायपुर के सीनियर अफसरों को बताए कैसे लाॅकडाउन का फैसला ले लिया...बिना सूचना कलेक्टर ऐसे फैसला कैसे ले सकता है। मगर ये समझना चाहिए कि  मुख्यमंत्री के जिले का कलेक्टर बिना उपर में इत्तला किए, ऐसा निर्णय ले सकता है....ये कतई संभव नहीं है। 

कभी भी सर्जरी

असम चुनाव प्रचार से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल 4 अप्रैल को रायपुर लौट रहे हैं। ब्यूरोक्रेसी में अटकलें है, मुख्यमंत्री के आने के बाद कभी भी कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों की लिस्ट निकल सकती है। दोनों कैडर के अधिकारियों के ट्रांसफर विधानसभा सत्र के पहिले से प्रतीक्षित है। इस बार कलेक्टरों में एक जिले की कलेक्टरी करने वाले अफसरों को दूसरा मौका मिल सकता है। इनमें डाॅ0 प्रियंका शुक्ला का भी नाम है। रायपुर नगर निगम कमिश्नर सौरभ कुमार को सरकार कोई और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे सकती है। हेल्थ में डायरेक्टर नीरज बंसोड़ से लेकर स्पेशल सिकरेट्री सी प्रसन्ना तक के चेंज होने की अटकलें हैं। चूकि शहला निगार हेल्थ में सिकरेट्री बन गई हैं। लिहाजा, अब वहां स्पेशल सिकरेट्री होने का कोई अर्थ नहीं निकल रहा। प्रियंका शुक्ला अगर कलेक्टर बनीं तो कार्तिकेय गोयल को एनआरएचएम का प्रभार दिया जा सकता है।    

कार्यकारी अध्यक्ष?

विधानसभा चुनाव में पार्टी की शर्मनाक पराजय के ढाई साल पूरा होने पर बीजेपी आलाकमान ने एक सर्वे कराया है। इसमें रिपोर्ट ये मिली है कि छत्तीसगढ़ में आज अगर चुनाव हो जाए, तो पार्टी को बमुश्किल ढाई दर्जन सीटें मिल पाएंगी। सर्वे के नतीजे से बीजेपी परेशान हो गई है। ढाई साल के एंटी इंकाबेसी के बाद भी पिछले चुनाव की तुलना में दसेक सीटें बढ़ पा रही है। इसको दृष्टिगत रखते पार्टी ने छत्तीसगढ़ के सांगठनिक ढांचे में बदलाव पर गंभीरता से सोचना शुरू कर दिया है। बंगाल चुनाव के बाद क्षेत्रीय सह संगठन मंत्री शिवप्रकाश छत्तीसगढ़ आएंगे। प्रदेश प्रभारी डी पुरंदेश्वरी भी इस महीने के अंत में छत्तीसगढ़ आ रही हैं। पता चला है, प्रदेश अध्यक्ष के साथ सूबे में एक कार्यकारी अध्यक्ष अपाइंट करने पर विचार किया जा रहा है। वो भी कुर्मी समुदाय से। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता का दायित्व प्रेमप्रकाश पाण्डेय को सौंपा जा सकता है। आने वाले समय में पार्टी और भी कई फैसले ले सकती है।    

अंत में दो सवाल आपस

1- असम चुनाव के बाद लाल बत्ती की दूसरी लिस्ट निकल जाएगी या फिर संगठन चुनाव के बाद?

2. चीफ सिकरेट्री की वीसी में आबादी की तुलना में टीकाकरण का टारगेट ज्यादा मिलने पर किस कलेक्टर ने असंतुष्टि जाहिर ही?