सोमवार, 15 अक्टूबर 2018

भाजपाई ब्यूरोक्रेट्स?

23 सितंबर
चुनाव के दौरान नौकरशाहों पर सरकार के लिए काम करने के आरोप लगते रहे हैं। इस बार भी कुछ अफसरों के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायतें की गई हैं। अफसर अब सत्ताधारी पार्टी के लिए किस तरह काम कर रहे, ये जांच का विषय हो सकता है। लेकिन, फैक्ट है…..इंटरेस्टिंग भी कि छत्तीसगढ़ के 95 फीसदी से अधिक ब्यूरोक्रेट्स न कांग्रेस गवर्नमेंट को देखे हैं और न ही उनके कामकाज को। 2002 बैच के आईएएस भी जोगी सरकार के आखिरी दौर में एज ए प्रोबेशनर छत्तीसगढ़ आए थे। 2003 से लेकर 2016 तक के आईएएस अफसरों ने सिर्फ भाजपा सरकार को देखा है। छत्तीसगढ़ में इस समय पोस्टेड अफसरों में सिर्फ अजय सिंह, सुनील कुजूर, सीके खेतान, आरपी मंडल, अमिताभ जैन, रेणु पिल्ले, सुब्रत साहू, रीचा शर्मा, सुबोध सिंह, गौरव द्विवेदी, निहारिका बारिक, एम गीता और शहला निगार को ही कांग्रेस शासन काल में काम करने का मौका मिला है। बाकी ब्यूरोक्रेट्स अपने आईएएस कैरियर की शुरूआत बीजेपी सरकार से की और 15 साल से इसी को कंटीन्यू कर रहे हैं। ऐसे में, परिवेश का फर्क तो पड़ता ही है। फिर भी, अफसरों को दोष नहीं देना चाहिए। जिसका झंडा होता है, उसके अफसर होते हैं। अफसरों को पाला बदलने में कितना वक्त लगता है। 2003 में लोगों ने आखिर देखा ही।

ये संस्कृति नहीं!

बिलासपुर के एसपी आरिफ शेख कम्यूनिटी पोलिसिंग के जरिये पुलिस की इमेज बिल्डअप करने की कोशिश कर रहे थे। मगर लाठी चार्ज करके पुलिस ने उसे धो दिया। न्यायधानी की पुलिस ऐसी अराजक हो जाएगी, लोग हतप्रभ हैं। छत्तीसगढ़ पुलिस की कभी ऐसी संस्कृति रही भी नहीं। वो भी बिना किसी उपर के अफसर के आदेश के लाठी चला दें। ये वास्तव में राज्य के लिए गंभीर है। हालांकि, राजनीतिक पार्टियों को ये भी सोचना चाहिए नेताओं के घरों में कचरा और जूता फेंकना कितना जायज है। मंत्री अमर अग्रवाल का तो निजी घर है। अगर सरकारी भी होता तो भी घर का मतलब पूरा परिवार होता है। हो सकता है, उस समय उनके नाते-रिश्तेदार आए हों। सीडी कांड के समय बीजेपी ने भी हालांकि, कुछ ऐसा ही किया। पीसीसी चीफ भूपेश बघेल के घर के घेराव के दौरान उनके कैंपस में जूता फेंका…दीवारों पर अभद्र बातें लिख डाली, गालियां भी दी। छत्तीसगढ़ की ये संस्कृति नहीं है। राजनीति में यहां के लोगों ने कभी ऐसी कटुता नहीं देखी। कांग्रेस और बीजेपी के नेताओं को लोगों ने सुख-दुख में साथ खड़े होते देखा है। दोनों राजनीतिक पार्टियों को इस पर विचार करना चाहिए कि वे राजनीति़ को किस ओर ले जा रहे हैं।

कांग्रेस की टिकिट

कांग्रेस ने 15 सितंबर तक टिकिट तय करने का ऐलान जरूर किया था लेकिन, अब जैसे हालात दिख रहे हैं, आचार संहिता लगने के बाद ही कांग्र्रेस कुछ कर पाने की स्थिति में होगी। आखिर, सबसे पहिले के फायदे हैं तो खतरे भी हैं। कांग्रेस को सबसे अधिक डर सता रहा है, टिकिट न मिलने से नाराज दावेदार जोगी कांग्रेस की ओर न शिफ्थ कर जाए। दूसरा, जोगी काग्रेस और बसपा में गठबंधन होने के बाद अब नए समीकरण को देखते टिकिट वितरण करना पड़ेगा और तीसरा, चंदा वसूली। पार्टी के एक बड़े नेता ने बताया कि सिंगल नाम वाली सीटों का पार्टी घोषणा कर सकती है। मगर वसूली से घबरा रही है। जितना पहले टिकिट दिया जाएगा, उतना ही जेब भी ढीला करना होगा। चंदा-चकोरी से टिकिट के दावेदार वैसे ही परेशान हैं। टिकिट मिलने पर तो लोग टूट पड़ेंगे।

मोदी का मंच

मंत्री राजेश मूणत के हड़काने और भड़कने का भी जांजगीर के अफसरों पर कोई फर्क नहीं पड़ा। प्रधानमंत्री का मंच ऐसा बना डाला कि पीएम, सीएम, गडगरी समेत मंच पर बैठे सभी गेस्ट पूरे समय पसीना पोंछते रहे। दरअसल, मंच की प्लानिंग के समय किसी का ध्यान इस पर नहीं गया कि तीन बजे सूर्य की तीखी किरणें सीधे मंच पर आएंगी। अफसरों ने सूर्य की दिशा में मंच बनवा डाला। इससे वहां पहुंचते ही प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री को परेशानी होने लगी। सीएम कई बार चेहरे के उपर हाथ से सूर्य की किरणों से बचने की कोशिश करते नजर आए। तो पीएम को आधा दर्जन से अधिक बार रुमाल से चेहरा पोंछना पड़ा।

वक्त बलवान

रिटायर आईएएस डीएस मिश्रा ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उन्हें बिजली विनियामक आयोग का चेयरमैन बनने का मौका मिल जाएगा। विवेक ढांड के चीफ सिकरेट्री बनने के बाद डीएस को मंत्रालय से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। लोक आयोग में उन्हें उलझाने की कोशिश की गई। 9 साल सीएम के विभाग में काम करने के बाद भी रिटायरमेंट के बाद पोस्टिंग के लिए रिरियाना पड़ा। कुछ नहीं मिला तो आखिरकार उन्हें सहकारिता चुनाव प्रमुख के पद से संतोष करना पड़ा। लेकिन, उपर वाला देता है तो छप्पड़ फाड़ कर। उन्हें ऐसे आयोग की चेयरमैनशिप मिल गई है, जहां बिल्डरों से भी बड़ी-बड़ी बिजली कंपनियां उनके आगे-पीछे चक्कर लगाएंगी।

सीईओ या चना-मुर्रा

गरियाबंद जिला पंचायत सीईओ की नियुक्ति में सरकार कुछ ज्यादा ही प्रयोग कर रही है। चार साल में अब तक आधा दर्जन सीईओ की नियुक्ति हो चुकी है। 2014 में राजकुमार खूंटे को हटाकर रीतेश अग्रवाल को भेजा गया था। इसके बाद जगदीश सोनकर, फिर विनीत नंदनवार और पिछले हफ्ते नंदनवार को हटाकर फिर आरके खूंटे। याद होगा, इस साल लोक सुराज में सीएम गरियाबंद जिले के पुअर पारफरमेंस पर बेहद नाराज हुए थे। अब, सरकार यूं ही चना-मुर्रा की तरह सीईओ बदलते रहेगी तो उस जिले के विकास का तो भगवान ही मालिक हैं।

नो वैकेंसी

बिजली विनियामक आयोग का चेयरमैन की नियुक्ति करके सरकार ने रिटायर होने वाले नौकरशाहों के लिए अब नो वैकेंसी कर दी है। रेरा, सूचना आयोग, बिजली विनियामक आयोग, राज्य निर्वाचन रिटायर नौकरशाहों का पसंदीदा ठौर रहा है। हालांकि, पीएससी में भी रिटायर ब्यूरोक्रेट्स को चेयरमैन बनाया जाता है। लेकिन, दो साल का कार्यकाल होने के कारण अफसरों की इसमें खास दिलचस्पी होती नहीं। लिहाजा, अगले दो-एक साल में सेवानिवृत्त होने वाले अफसरों के लिए ढंग की जगह नहीं मिलेगी। रेरा, मुख्य सूचना आयुक्त और बिजली विनियामक आयोग, तीनों जगहों पर इसी साल पोस्टिंग हुई है।

पहली बार

छत्तीसगढ़ के दो आईएफएस अफसरों को सरकार ने प्रिंसिपल सिकरेट्री बना दिया। देश में ऐसा कभी नहीं हुआ। आईएफएस को सिकरेट्री से उपर प्रमोट नहीं किया गया। लेकिन, मोबाइल योजना में रिजल्ट देने के एवज में संजय शुक्ला को सरकार ने प्रमोशन दे दिया। तो उनके सीनियर पीसी मिश्रा भी प्रमुख सचिव बन गए। अहम यह है कि संजय रिटायर चीफ सिकरेट्री विवेक ढांड के बेहद करीबी माने जाते हैं। लेकिन, ढांड के चार साल सीएस रहने के बाद भी संजय प्रमुख सचिव नहीं बन पाए। चलिये, आवास एवं पर्यावरण विभाग में अमन िंसंह के साथ काम करने का लाभ हुआ।

अंत में दो सवाल आपसे

1. टिकिट के लिए सौदा करते किस नेता की सीडी बाजार में आने की चर्चा है?
2. बीजेपी में जिस तरह अधिकारियों का प्रवेश हो रहा है, उनके लिए पार्टी क्या अधिकारिक प्रकोष्ठ बनाएगी??

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

एक सीट कांग्रेस को!

9 सितंबर
विधानसभा चुनावों में पहिले बीजेपी और कांग्रेस में तीन-चार सीटों का गिव एंड टेक होता था। याने तू मुझे जीता, मैं तूझे….। दरअसल, उन सीटों पर जानबूझकर कमजोर प्रत्याशी उतारे जाते थे। ताकि, डील न गड़बड़ाए। रायपुर की एक सीट पर एक बड़े नेता के खिलाफ विरोधी पार्टी पिछले कई चुनाव से डमी प्रत्याशी उतार रही है। मगर इस दफा चुनाव में मुकाबला इतना टफ और नजदीकी रहेगा कि कोई पार्टी रिस्क लेने की स्थिति में नहीं है। भले ही सामने वाले नेता कितना करीबी और उपयोगी क्यों न हो। हां, कोरबा में बीजेपी जरूर कांग्रेस को जीताने का प्रयास कर सकती है। इसके पीछे मिथक यह है कि वहां जिस पार्टी का विधायक चुना जाता है, राज्य में उसके विरोधी दल की सरकार बनती है। जय सिंह अग्रवाल दो बार से कोरबा से कांग्रेस के विधायक हैं। इससे पहिले 2003 में कटघोरा विस मे कोरबा आता था, तब कांग्रेस के बोधराम कंवर वहां से जीते थे। तब राज्य में बीजेपी की सरकार बनी थी। 1998 में बीजेपी के बनवारी लाल अग्रवाल जीते, तो अविभाजित मध्यप्रदेश में सरकार कांग्रेस की बन गई थी। ऐसे में, कोरबा से जय सिंह अग्रवाल खड़े हों या आरपीएस त्यागी, सत्ताधारी पार्टी कैसे नहीं चाहेगी कि कांग्रेस वहां से जीत जाए।

भूपेश का फेस

कांग्रेस में मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर भले ही अलग-अलग दावे और अटकलें लगाई जा रही हों मगर सर्वे के आधार पर बात करें तो पीसीसी चीफ भूपेश बघेल का पलड़ा भारी होता जा रहा है। अभी तक जितने सर्वे हुए हैं, सबमें पसंदीदा मुख्यमंत्रियों में डा0 रमन सिंह के बाद भूपेश का नाम प्रमुखता से आ रहा है। हालांकि, कांग्रेस में दावेदारों की कमी नहीं है। भूपेश के साथ टीएस सिंहदेव, चरणदास महंत, रविंद्र चौबे, धनेंद्र साहू, सत्यनारायण शर्मा अग्रिम पंक्ति के अनुभवी लीडर हैं। आदिवासियों में चार बार के विधायक रामदयाल उईके भी कम आशान्वित नहीं हैं। दिल्ली की राजनीति में सांसद ताम्रध्वज साहू अलग अपनी स्थिति मजबूत करते जा रहे हैं। कांग्रेस पार्टी के भीतर ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो मानते हैं कि पार्टी कहीं सत्ता में आई तो भूपेश की बजाए फलां को सीएम बनाया जाएगा….एक बड़े वर्ग का ये भी विश्वास है कि मुख्यमंत्री हमेशा दिल्ली से आता है। याने सांसद सीएम बनता है। जाहिर है, इशारा ताम्रध्वज की ओर है। लेकिन, सर्वे एकतरफा भूपेश की ओर जा रहा है। सियासी पंडितों का कहना है, इससे पार्टी के भीतर भूपेश की न केवल दावेदारी मजबूत हो रही है बल्कि कांग्रेस के अपने समकक्ष नेताओं में एक बड़े फेस के रूप में वे स्थापित हो रहे हैं।

कलेक्टर्स….हिट विकेट?

विधानसभा चुनाव में अबकी कलेक्टरों के हिट विकेट होने की आशंका से सरकार भी चिंतित है। चार दिन की सुबह से शाम तक की ट्रेनिंग और परीक्षा पास करने के बाद भी भारत निर्वाचन आयोग के फुल कमीशन के समक्ष कलेक्टर्स और एसपी का पारफारमेंस कैसा रहा आखिर सबने देखा ही। दो कलेक्टर्स और एक एसपी की कमीशन ने जमकर क्लास ले डाली। असल में, सूबे के 27 में से सिर्फ एक बिलासपुर को छोड़कर बाकी सभी नए हैं। जिला निर्वाचन अधिकारी के रूप में 26 कलेक्टरों का ये पहला विधानसभा चुनाव होगा। राजनांदगांवक कलेक्टर भीम सिंह लोकसभा चुनाव के दौरान नाइट वाचमैन के तौर पर जरूर धमतरी के कलेक्टर बनाए गए थे। लेकिन, लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बड़ा फर्क होता है। बहरहाल, बिलासपुर कलेक्टर दयानंद ऐसे डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन आफिसर होंगे, जिन्हें 2013 का विधानसभा और 2014 का लोकसभा चुनाव कराने का तजुर्बा है। 2013 में वे कवर्धा कलेक्टर थे। ये उनका दूसरा विधानसभा चुनाव होगा।

सिद्धार्थ और दयानंद

बात कलेक्टर और इलेक्शन की निकली तो सिद्धार्थ कोमल परदेशी का जिक्र स्वाभाविक है। 2003 बैच के आईएएस सिद्धार्थ ने लगातार चार जिलों की कलेक्टरी की ही है। इनमें वीवीआईपी डिस्ट्रिक्ट कवर्धा और राजनांदगांव के साथ ही रायपुर और बिलासपुर जैसे पहले और दूसरे नम्बर का सबसे बड़ा जिला शामिल हैं। यही नहीं, सिद्धार्थ छत्तीसगढ़ के पहले ऐसे कलेक्टर रहे, जिन्हें दो विधानसभा और दो लोकसभा इलेक्शन कराने का अवसर मिला। उन्होंने 2008 और 2013 के विधानसभा और 2009 और 2014 का लोकसभा चुनाव करवाया। अलबत्ता, बिलासपुर कलेक्टर दयानंद अपने तीन बरस सीनियर सिद्धार्थ का बड़ी तेजी से पीछा कर रहे हैं। उन्होंने परदेशी के लगातार चार जिलों में कलेक्टर रहने की बराबरी कर ली है, अगर लोकसभा चुनाव तक बिलासपुर में टिक गए तो सबसे अधिक चुनाव कराने वाले सिद्धार्थ की बराबरी कर लेंगे।

बंद कमरे में परीक्षा

चुनाव आयोग की परीक्षा में फेल तीन कलेक्टरों के नामों का खुलासा न हो सकें, इसके लिए आयोग के अफसरों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। नीचे से लेकर उपर तक फारमान जारी किया गया, किसी भी सूरत में नाम बाहर नहीं जाना चाहिए। वरना, आईएएस बिरादरी की बदनामी होगी। हाल ही में फेल कलेक्टरों के लिए आयोग ने दोबारा परीक्षा आरगेनाइज की। निमोरा स्थित प्रशासन अकादमी में ऐसी व्यवस्था की गई कि फेल्योर कलेक्टर पीछे के दरवाजे से आए और बंद कमरे में एग्जाम देकर निकल लिए। इसे कहते हैं, यूनिटी। ये आईएएस में ही संभव है।

उल्टा-पुलटा

सरकार ने शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर जीतेंद्र शुक्ला को पंचायत में आरपी मंडल के पास भेज कर गुरू-शिष्य को फिर से एक साथ कर दिया। लेकिन, सरकार ने ऐसा करके जितेंद्र के साथ अन्याय कर दिया। नगरीय प्रशासन के अनुभवी इस ब्राम्हण अफसर को कलेक्टर बनाने की बजाए सरकार शराब बिकवाती रही और, चुनाव का समय आया तो पंचायत में भेज दिया। जबकि, जीतेंद्र को नगरीय प्रशासन का खासा अनुभव है। पंचायत में वे कभी रहे नहीं। बिलासपुर, रायपुर और कोरबा के वे नगर निगम कमिश्नर रहे। मंत्रालय में भी इसी विभाग के डिप्टी कमिश्नर रहे। उधर, तारण सिनहा, जिन्हें पंचायत का तजुर्बा है, उन्हें शराब और संस्कृति में भेज दिया। याने पूरे ही उल्टा-पुलटा।

मौके का फायदा

सरकार चुनावी कसरत में जुटी है तो कुछ अफसर मौके का फायदा उठाने में नहीं चूक रहे। आदिवासी संभाग के एक एसपी ने तो उगाही का संगठित कारोबार चालू कर दिया है। हाल ही में उसने एक कोयला व्यापारी की नस पकड़ी तो पूरे पेटी खोखा वसूल लिया। काले कोटधारी एक विचौलिये को उन्होंने इसी काम के लिए लगा दिया है। हालांकि, एसपी से तब रांग नम्बर डायल हो गया, जब उन्होंने एक दूसरे कोयला व्यापारी की गर्दन पकड़़ते हुए 50 पेटी की डिमांड कर डाली। उन्हें पता नहीं था कि जिस व्यापारी से वे अपने बिकने का रेट बताएं हैं, वह भाजपा ज्वाईन कर चुका है। अब एसपी को काटो तो खून नहीं। फिर, लगे माफी पर माफी मांगने।

पतली गली से….

इसे ही कहते हैं, पतली गली से निकलना। आईपीएस अभिषेक शांडिल्य का डेपुटेशन पर सीबीआई में हुआ था। लेकिन, राजभवन में एडीसी से वे रिलीव नहीं हो पा रहे थे। राज्यपाल बलरामदास टंडन का इस बीच देहावसान हो गया। और, अभिषेक चुपके से सीबीआई के लिए रिलीव होकर निकल लिए दिल्ली।

अंत में दो सवाल आपसे

1. चुनाव आयोग के हिट लिस्ट में किस कलेक्टर का नाम सबसे उपर है?
2. उम्र के आधार पर कहीं टिकिट न कट जाए, इस खौफ से कांग्रेस के किस वयोवृद्ध नेता ने अपना 82वां जन्मदिन नहीं मनाया?

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

वो सात घंटे!

2 सितंबर 2018
इलेक्शन कमीशन ने चुनावी तैयारी के लिए कलेक्टर, एसपी, आईजी, कमिश्नरों की लंबी बैठक ली। सवा दो बजे से रात नौ बजे तक। याने पूरे सात घंटे। एक जगह पर बिना हिले-डुले बैठना…..आप समझ सकते हैं। आयोग के अफसरों ने बैठक प्रारंभ होते ही ऐसा हड़का दिया कि लोगों को कंपा देने वाले कलेक्टर, एसपी भीतर से कांप गए! कहीं राडार पर आ गए तो निबटने में देर नहीं लगेगी। यही वजह है कि जब तक मीटिंग चलती रही, किसी अफसर ने जबर्दस्त जरूरत पड़ने के बाद भी वाशरुम जाने की हिमाकत नहीं की। दरअसल, दिल्ली से आए निर्वाचन आयोग के अफसरों ने मीटिंग प्रारंभ होते ही कलेक्टर, एसपी पर ऐसा खौफ जमा दिया कि पूछिए मत! सबसे पहिले एक कमिश्नर ने यह बोलकर कि यहां बैठे कई सीनियर अफसर उंघ रहे हैं, अधिकारियों की नींद भगा डाली। इसके बाद बारी आई एसपी की। सरगुजा संभाग के एक एसपी उतरे सलामी बल्लेबाजी के लिए। मगर वे पहली बॉल पर आउट हो गए। आयोग ने उनसे पूछा अगस्त में वे कितनी वारंट तामिल कराए। वे लगे साल का बताने। उनके पास मंथली डेटा नहीं था। इससे झल्लाकर इलेक्शन कमिश्नर ने उन्हें यह कहते हुए बाहर भेज दिया कि आप पता करके आईये। सरगुजा संभाग के ही दूसरे एसपी खड़े हुए, वे भी आंकडों मे ंउलझ गए। बताते हैं, अधिकांश एसपी साल का फिगर लेकर आए थे। उनके पास मंथली फिगर नहीं थे। लेकिन, सरगुजा संभाग के दो ओपनर बैट्समैन को देखकर बाकी एसपी सतर्क हो गए। और, लगे मातहतों को व्हाट्सएप भेजने। मोबाइल का कमाल था कि बाकी के पास तुरंत महीने का डेटा आ गया। और, लगा जान बची, लाखों पाए। बहरहाल, वो सात घंटे के बाद अफसर जब बाहर निकले तो उनका चेहरा देखने लायक था।

धोखे में कलेक्टरी?

बलौदा बाजार से कलेक्टरी से हटने के बाद बसव राजू ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वे राजधानी रायपुर के कलेक्टर बन सकते हैं। वे तो कहां इंटर स्टेट डेपुटेशन पर अपने होम स्टेट जाने के लिए लगेज तैयार कर रहे थे। दिल्ली से भी उन्हें एप्रूवल मिल चुका था। बस, आखिरी चरण की कुछ प्रक्रियाएं चल रही थी। याने किसी भी दिन डीओपीटी से उनका आर्डर आ जाता। लेकिन, ओपी चौधरी के इस्तीफे के बाद घटनाक्रम कुछ यूं घूमा कि उनके प्रोफाइल में रायपुर जैसे जिले की कलेक्टरी जुड़ गई। दरअसल, पहली बार जीएडी ने अंकित आनंद का नाम आयोग को भेजा था। लेकिन, आयोग ने कुछ और नाम मांग लिए। दूसरी बार बताते हैं, अंकित के साथ ही दंतेवाड़ा कलेक्टर सौरभ कुमार और बसव राजू का नाम था। जीएडी को लगा कि सौरभ ऑलरेडी कलेक्टर हैं और बसव का डेपुटेशन क्लियर हो गया है, लिहाजा अंकित का हो जाएगा। लेकिन, आयोग ने दोनों का नाम छोड़कर बसव के नाम पर मुहर लगा दी।

सजा अंकित को

जीएडी की चूक की सजा आखिरकार आईएएस अंकित आनंद को भुगतनी पड़ी। जीएडी ने सरकार को बिना इंफार्म कए अंकित का नाम डेपुटेशन के लिए भारत सरकार को भेज दिया। इसी चलते चुनाव आयोग ने उन्हें रायपुर कलेक्टर बनाने पर राजी नहीं हुआ। आयोग का कहना था, जिस अफसर को भारत सरकार ने ले लिया है, उसे कलेक्टर नहीं बनाया जा सकता। अंकित जशपुर और जगदलपुर के कलेक्टर रह चुके थे। रायपुर उनका तीसरा जिला होता। लेकिन, वे कलेक्टर बनते-बनते रह गए।

आयोग सख्त

चीफ इलेक्शन कमिश्नर ओपी रावत सौम्य और शालीन नौकरशाह माने जाते हैं। मध्यप्रदेश कैडर के आईएएस होने के कारण छत्तीसगढ़ से उनका स्वाभाविक जुड़ाव माना जा रहा था। लेकिन, शुरूआती झटके से सूबे के अफसर हतप्रभ हैं। अंकित आनंद को उन्होंने रायपुर कलेक्टर बनाने के लिए तैयार नहीं हुए वहीं, रायपुर आईजी प्रदीप गुप्ता और अंबिकापुपर कलेक्टर किरण कौशल के मामले में उन्होंने कोई राहत नहीं दी। प्रदीप का रायपुर होम डिस्ट्रिक्ट था। सरकार ने कई बार आग्रह किया कि राज्य में आईजी की कमी है। सिर्फ एक आईजी पीएचक्यू में हैं। लेकिन, आयोग टस-से-मस नहीं हुआ। आखिरकार, प्रदीप गुप्ता को बिलासपुर शिफ्थ करना पड़ा।

नो कमेंट्स

जी चुरेंद्र को सरकार ने रायपुर संभाग का कमिश्नर बना दिया है। चुरेंद्र वहीं हैं, जिन्हें पिछले साल लोक सुराज के दौरान सरकार ने गंदे ढंग से हटा दिया था। बीजेपी गवर्नमेंट के 15 साल में पहला मौका था, जब सीएम ने किसी कलेक्टर को हटाने का ऐलान हेलीपैड पर मीडिया के सामने किया होगा। बताते हैं, सरकार चुरेंद्र के पारफारमेंस से खुश नहीं थी। उन्हीं चुरेंद्र को सरकार ने रायपुर का कमिश्नर बना दिया है। खैर, ये भी एक संयोग ही है कि पहली बार पांचों कमिश्नर प्रमोटी आईएएस हैं। उस पर भी, सब एक से बढ़कर एक। अंबिकापुर कमिश्नर के खिलाफ तो डीई चल रही है। चुरेंद्र के खिलाफ भी गंभीर मामले थे। पांचों में बस्तर के धनंजय देवांगन को छोड़ दे ंतो बाकी सभी कमिश्नर प्रातः स्मरणीय हैं।

तलवार की धार

कलेक्टरों और एसपी के लिए चुनाव में काम करना वास्तव में तलवार की धार पर चलने जैसे होता है। इलेक्शन कमिश्नर घुड़की दे गए हैं कि किसी राजनीतिक पार्टी से प्रेरित होकर काम किये तो खैर नहीं। और, ज्यादा नियम-कायदे दिखाए और सरकार कहीं बैक हो गई तो क्या होगा, इसे सोच कर ही अफसर सिहर जा रहे हैं। इनमें भी लंबे समय से जो कलेक्टरी और कप्तानी कर रहे हैं, वे तो पर्याप्त पर्याप्त सुख-सुविधा भोग चुके हैं। नए कलेक्टरों का भला क्या कसूर… बेचारों को चुनाव के दौरान सरकार ने कलेक्टर बना दिया।

सीधे सुप्रीम कोर्ट

2003 के विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग ने पहले फेज में जांजगीर के कलेक्टर एमआर सारथी और जशपुर कलेक्टर अनंत की छुट्टी कर दी थी। आयोग के फैसले के खिलाफ दोनों हाईकोर्ट से स्टे ले आए थे। लेकिन, इलेक्शन कमीशन पीछे नहीं हटा। अगले दिन सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया और उसी दिन शाम को हाईकोर्ट के स्टे पर स्टे ले आया था। इसके बाद तो फिर किसी नौकरशाह ने आयोग के फैसले के खिलाफ कोर्ट जाने की हिमाकत नहीं की। अनंत और सारथी के बाद आयोग ने पिछले तीनों चुनाव में आधा दर्जन कलेक्टर्स और एसपी को हटाया लेकिन, किसी ने भी उसे चैलेंज नहीं किया।

कहा सो किया

कांग्रेस इस महीने की 15 तारीख तक कुछ टिकिटों का ऐलान कर सकती है। खासकर, जिन सीटों पर सिंगल नाम हैं। मसलन, रायपुर ग्रामीण, दुर्ग शहर, कवर्धा, अंबिकापुर, अभनपुर, साजा, राजिम, आरंग, कोंटा। हालांकि, पीसीसी से तो अनेक सीटों पर सिंगल नाम तय कर दिए हैं। लेकिन, आलाकमान से अभी उस पर मुहर नही लगा है। जाहिर है, जिन सीटों के दावेदारों का नाम दिल्ली से ओके नहीं हुआ है, उसमें अभी टाईम लगेगा। बाकी, दस से बारह सीटों पर दावेदारों के नाम की घोषणा 15 सितंबर तक कर दी जाएगी। इससे कांग्रेस नेताओं को ये कहने के लिए हो जाएगा कि जो कहा, सो किया। जाहिर है, कांग्रेस ने अगस्त तक प्रत्याशियों के नाम फाइनल करने का दावा किया था।

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस पार्टी के दावेदार ने 20 करोड़ में अपना टिकिट पक्का किया है?
2. ओपी चौधरी की तोड़ निकालने के लिए कांग्रेस ने आरपीएस त्यागी को पार्टी में लाया है, इसमें वो कितना सफल होगी?

ओपी आखिरी नहीं

26 अगस्त
बीजेपी ज्वाईन कर विधानसभा चुनाव लड़ने वाले ओपी चौधरी अकेले आईएएस नहीं होंगे। कम-से-कम दो और आईएएस सरकार के रणनीतिकारों के संपर्क में हैं। बस्तर संभाग के एक कलेक्टर की बात तो फाईनल राउंड में पहुंच गई है। यदि बात बन गई तो बीजेपी उन्हें बस्तर के किसी सीट पर उतार सकती है। यही नहीं, एक एडिशनल एसपी को जांजगीर की सीट से चुनाव मैदान में उतारा जा सकता है। तानाखार से पूर्व आईजी भारत सिंह भी खम ठोंक रहे हैं। इनके अलावा भी टिकिट की दौड़ में कई और रिटायर आईएएस, आईपीएस बताए जा रहे हैं। रिटायर डीजी राजीव श्रीवास्तव भी संघ में सक्रिय हैं। टिकिट के लिए वे भी बीजेपी के संपर्क में हैं। दरअसल, 15 साल से सत्ता में जमी बीजेपी एंटी इंकाम्बेंसी का असर कम करने फ्रेश चेहरों को ढूंढ रही है। इस कड़ी में कुछ और लोगों को पार्टी में शामिल किया जा सकता है।

कलपेगी आत्मा

रमन कैबिनेट ने अटलजी के नाम पर नया रायपुर के साथ ही कई संस्थानों का नामकरण कर दिया। इसमें बाकी तो ठीक है, पर माड़वा ताप बिजली घर का नामकरण लोगों को खटक रहा है। दरअसल, कोरबा में बना माड़वा बिजली प्लांट के माथे पर देश का सबसे महंगा पावर प्लांट का दाग लगा है। 3000 करोड़ इसके बनने में फूंक गया। एक मेगावॉट पर 9.2 करोड़ रुपए लागत आई है। यह सब हुआ प्लांट निर्माण में लेट लतीफी पर। ऐसे प्लांट का नाम अगर अटलजी के नाम पर रखा जाएगा तो जाहिर है, उनकी आत्मा कलपेगी ही।

फिल्डिंग में कमजोर

अंबिकापुर जैसे बड़े जिले का कलेक्टर रह चुकीं किरण कौशल को सरकार ने बालोद जैसे छोटे जिले की कमान सौंप दी, तो लोगों का चौंकना स्वाभाविक था। दरअसल, मुंगेली के बाद अंबिकापुर भेजी गई किरण का नाम किसी बड़े जिले के लिए चल रहा था। लेकिन, बताते हैं आखिरी मौके पर जिस जिले में उन्हें भेजना था, वहां के कलेक्टर ने कुछ ज्यादा जोर लगा दिया। लिहाजा, सरकार के पास और कोई चारा नहीं बचा था। पता चला है, चुनाव आयोग भी किरण को एक बड़े जिले के लिए तैयार हो गया था। दिल्ली से पूछने पर यहां के अफसरों ने फीडबैक दिया था कि किरण के खिलाफ चुनाव आयोग के क्रायटेरिया के अलावा और कोई एडवर्स नहीं है। लेकिन, ऐन पोस्टिंग के वक्त मामला गड़बड़ा गया।

ये तो हद है!

इलेक्शन हमेशा अर्जेंट होता है। लेकिन, छत्तीसगढ़ में आलम यह है कि कलेक्टर निर्वाचन कार्यालय का ही नहीं बल्कि मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी का फोन रिसीव नहीं कर रहे। सीईओ सुब्रत साहू ने कलेक्टरों को कड़ा पत्र भेजकर चेताया है कि वे आयोग को हल्के में न लें। उन्होंने लिखा है कि मेरा फोन हो या उनके दफ्तर का, हर हाल में वे पिक करें। यदि व्यस्त हों तो कॉल बैक करें। ये तो वाकई पराकाष्ठा है। सीईओ को लेटर लिखना पड़ रहा है। दरअसल, अधिकांश कलेक्टर नए जमाने के हैं। जरूरत है चीफ सिकरेट्री मंत्रालय में एक रिफ्रेशर कोर्स आयोजित कर सभी का ज्ञानवर्द्धन करवाएं। वरना, आचार संहिता लगने पर कई कलेक्टर हिट विकेट होंगे।

दस का दम

सामान्य प्रशासन विभाग ने सेंट्रल डेपुटेशन के लिए नाम भेजकर आईएएस अंकित आनंद को भले ही उलझन में डाल दिया। लेकिन, राज्य सरकार ने दम दिखाया। सरकार ने भारत सरकार से न केवल आर्डर चेंज करने के लिए लिखा है बल्कि रायपुर कलेक्टर बनाने के लिए चुनाव आयोग के पास अंकित आनंद का नाम प्रपोज कर दिया है। अंकित अगर रायपुर कलेक्टर बन गए तो फिर जनगणना में जाने का सवाल ही नहीं उठता।

नॉन आईएएस की ताजपोशी?

बिजली विनियामक आयोग के चेयरमैन के लिए चार रिटायर नौकरशाहों ने भी आवेदन किया है। राधाकृष्णन, डीएस मिश्रा, एनके असवाल और आरएस विश्वकर्मा। लेकिन, नॉन आईएएस एसके शुक्ला के नाम को लेकर खुसुर-फुसुर कुछ ज्यादा हो रही है। शुक्ला यहां क्र्रेडा में लंबे समय तक पोस्टेड रहे हैं। पिछले साल यहां उनका समीकरण गड़बड़ाया तो सौर उर्जा अभिकरण का चेयरमैन बनकर हरियाणा चले गए। हरियाणा सरकार ने उन्हें राज्य मंत्री का दर्जा दिया है। राज्य मंत्री का ओहदा छोड़ अगर वे यहां चेयरमैन के लिए अप्लाई किए हैं, तो इसके अपने मायने होंगे। जाहिर है, नारायण सिंह के रिटायर होने के बाद विनियामक आयोग चेयरमैन का पोस्ट महीने भर से खाली है। नारायण भी रिटायर आईएएस थे। शुक्ला अगर चेयरमैन बनते हैं तो वे दूसरे नॉन आईएएस चेयरमैन होंगे। इसके पहिले बिजली बोर्ड के सचिव मनोज डे को सरकार ने एक मौका दिया था।

करप्शन पर लगाम?

किसानों के बिजली बिल का 100 रुपए लिमिट तय करने बिजली कंपनियों के कर्मचारियों को सरकार ने बड़ा झटका दिया है। क्योंकि, मीटर रीडिंग नियमित होती नहीं। एवरेज बिल के नाम पर हजारों रुपए का बिल किसानों को थमा दिया जाता था। फिर शुरू होता था उसे कम करने का खेल। जाहिर है, बिना नगद नारायण के बिल कम होता नहीं। अब लिमिट तय होने के बाद चलिये किसानों को राहत मिलेगी। और, चुनाव के समय किसान खुश हैं तो नेता भी। तभी तो कैबिनेट में जब यह प्रस्ताव आया तो सारे मंत्रियों ने एक सूर में कहा, इससे बढ़ियां बात और क्या हो सकती है।

हफ्ते का व्हाट्सएप

वो ईद पर भी खुश होते हैं, वो नानक जयंती पर भी खुश होता है, वो दीवाली पर भी खुश होता है, वो क्रिसमस पर भी खुश होता है, सरकारी कर्मचारियों का कोई मजहब नही होता, साहब वो हर छुट्टी पर खुश होता है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. नेताओं के जोगी कांग्रेस छोड़कर जाने के पीछे असली वजह क्या है?
2. किस जिले के एसपी चुनावी माहौल में भी थाईलैंड, पटाया का सैर कर आए?

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

तरकश के दस बरस

19 अगस्त
तरकश कॉलम के इस हफ्ते ठीक दस बरस हो गए। 2008 अगस्त के तीसरे हफ्ते से हरिभूमि में यह स्तंभ प्रकाशित होना प्रारंभ हुआ था। हालांकि, कुछ अखबारों में तरकश के तीर नाम से यह स्तंभ जरूर छपता था। लेकिन, संस्थान बदलने के क्रम में इसमें ब्रेक आ गया था। उन्हीं दिनों….तारीख तो याद नहीं है….पुराने मंत्रालय में एक सीनियर सिकरेट्री के कमरे में हरिभूमि के प्रधान संपादक हिमांशुजी से मुलाकात हो गई। मुलाकात पुरानी थी मगर उस रोज बरबस बात तरकश की निकली। और, उदार दृष्टि के हिमांशुजी ने तरकश शुरू करने के लिए न केवल हामी भरी बल्कि इसके लिए रविवार का दिन भी तय कर दिया। अब, मेरे समक्ष संकट यह था कि मैं दिल्ली के एक नेशनल डेली से जुड़ा था। इसलिए नाम से कॉलम लिखने पर खतरा था। लिहाजा, प्रारंभ में एस दीक्षित के नाम से यह स्तंभ शुरू हुआ। इसके बाद विषम परिस्थितियों में ही तरकश ब्रेक हुआ। अब तो किसी रविवार को तरकश न आने पर जिस तरह से पाठकों के फोन आते हैं, उसे देखते कॉलम को ब्रेक करने से पहले सोचना पड़ता है। हालांकि, दस बरस की अवधि बहुत लंबी नहीं होती, पर इसे एकदम छोटी भी नहीं कही जा सकती। वो भी अनवरत। यह अवसर मुहैया कराने के लिए हिमांशुजी को आभार। लाखों पाठकों को भी शुक्रिया, जिनके हौसला अफजाई से तरकश ने एक दशक पूरा किया। कुछ सालों से तरकश हरिभूमि के साथ ही अब प्रदेश के सबसे विश्वसनीय न्यूज वेबसाइट न्यूपावरगेमडॉटकॉम पर भी उपलब्ध है। वेबसाइट पर भी इसे उम्मीद से कहीं ज्यादा प्रतिसाद मिल रहा है।

रमन के पीछे अटल!

अटलजी अब नहीं रहे। मगर छत्तीसगढ़ से जुड़े कई वाकये लोगों के अब भी जेहन में हैं। डा0 रमन सिंह को मुख्यमंत्री बनाने में भी उनका अहम रोल रहा। याद होगा, पार्टी को बहुमत मिलने के बाद वेंकैया नायडू को संसदीय बोर्ड ने सीएम चुनाव का पर्यवेक्षक बनाया था। वेंकैया को हाईकमान से दो नाम मिले थे। एक रमन सिंह और दूसरा रमेश बैस का। सांसद और मंत्री के रूप में सीनियर होने के नाते बैस का दिल्ली की राजनीति में पैठ ज्यादा थी। इसलिए, रमन के लीडरशिप में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भी बैस का नाम सामने आ गया। जबकि, रमन सिंह को केंद्रीय मंत्री से इस्तीफा दिलाकर छत्तीसगढ़ भेजा गया था। लोग कहते यह भी हैं कि प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए पहले बैस को ऑफर दिया गया था। लेकिन, वे केंद्रीय मंत्री का पद छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए। लेकिन, पार्टी के जीतते ही सीएम के दावेदार के रूप में बैस का नाम उछाल दिया गया। दरअसल, केंद्र का एक ताकतवर धड़ा बैस को सीएम बनाने के पक्ष में था। लेकिन, वेंकैया की रिपोर्ट के बाद तत्कालीन पीएम वाजपेयी ने रमन सिंह के नाम पर मुहर लगाने में देर नहीं लगाई।

तीन मंत्री

अटलजी छत्तीसगढ़ को बहुत वेटेज देते थे। कह सकते हैं, मध्यप्रदेश से भी अधिक। उनके प्रधानमंत्री रहने के दौरान केंद्र में छत्तीसगढ़ से तीन मंत्री रहे। डा0 रमन सिंह, दिलीप सिंह जूदेव और रमेश बैस। इससे पहिले कभी भी एक साथ तीन मंत्री नहीं रहे। राज्य निर्माण के पहिले श्रीमती इंदिरा गांधी, चंद्रशेखर और पीवी नरसिम्हाराव सरकार में विद्याचरण शुक्ल छत्तीसगढ़ की नुमाइंदगी करते रहे। जनता पार्टी सरकार में भी पुरुषोतम कौशिक मंत्री रहे। वीपी सिंह, इंद्रकुमार गुजराल और एचडी देवेगौड़ा ने तो किसी को भी मंत्री नहीं बनाया। मनमोहन िंसंह की दूसरी पारी में भी कुछ समय के लिए कांग्रेस के चरणदास महंत को राज्य मंत्री बनाया गया। अलबत्ता, मोदी सरकार में भी छत्तीसगढ़ से सिर्फ विष्णुदेव साय को केंद्रीय मंत्री बनने का अवसर मिला है।

ट्रांसफर पर लगाम

चुनाव आयोग ने छह अगस्त तक प्रशासनिक अफसरों को बदलने का मौका दिया था। इसके बाद मतदाता सूची के पुनरीक्षण का काम प्रारंभ हो जाने के कारण आयोग ने अब 27 सितंबर तक चुनाव कार्य से जुड़े किसी भी अफसर को हटाने पर रोक लगा दी है। याने कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर अब 27 सितंबर तक आयोग के नियंत्रण में रहेंगे। इसके करीब हफ्ते भर बाद आचार संहिता प्रभावशील हो जाएगी। याने अब जो भी करना होगा, 27 सितंबर के दो-तीन दिन के भीतर ही। क्योंकि, फिर पूरा सिस्टम चुनाव आायोग के नियंत्रण में आ जाएगा। हालांकि, पता चला है सरकार आयोग की विशेष अनुमति से कुछ कलेक्टरों को बदलना चाहती है।

बड़े जिले प्रभावित

आयोग से अनुमति मिलते ही बड़े जिले के तीन-से-चार कलेक्टर बदले जा सकते हैं। इनमें पहला नाम अंबिकापुर कलेक्टर किरण कौशल का है। सरकार के आग्रह के बाद भी चुनाव आयोग उन्हें रिलीफ देने तैयार नहीं हुआ। किरण पिछले विस चुनाव के दौरान अंबिकापुर में सीईओ थी। और, आयोग के क्रायटेरिया के अनुसार पिछले चुनाव के दौरान पोस्टेड अफसर उसी जिले में इस चुनाव में उस पोस्ट या प्रमोशन के पोस्ट पर नहीं रह सकता। लिहाजा, किरण का बदला जाना तय है। सरकार चूकि किरण को राहत दिलाने आयोग तक में दरख्वास्त की थी….अमित शाह के कार्यक्रम के बाद उनका नम्बर काफी बढ़ा हुआ है। जाहिर है, उन्हें अंबिकापुर से चेंज करने पर सरकार उन्हें छोटा-मोटा जिला तो देगी नहीं। उन्हें एक बड़ा जिला मिलने जा रहा है। किरण के अलावे तीन और बड़े जिलों के कलेक्टरों को बदलने की अटकलें हैं। इनमें से एक को मंत्रालय भेजा जाएगा और दूसरे को अपग्रेड करके बड़े जिले में शिफ्थ किया जाएगा। इनमें कुछ नाम ऐसे होंगे, जो आपको चकित करेंगे।

डीएस का पलड़ा भारी

बिजली विनियामक आयोग के चेयरमैन और मेम्बर के लिए आधा दर्जन आवेदन आएं हैं। लेकिन, इनमें दो का ही पलड़ा सबसे भारी है। रिटायर ब्यूरोक्रेट्स डीएस मिश्रा और जीएस मिश्रा। डीएस एसीएस से रिटायर हुए और जीएस प्रिंसिपल सिकरेट्री से। जीएस माटी पुत्र हैं और सत्ता के गलियारों में उनकी पैठ भी अच्छी है। लेकिन, डीएस के लिए आईएएस लॉबी जुटी है। असल में, आईएएस लॉबी में हमेशा से डायरेक्ट आईएएस का प्रभाव रहा है। वो नहीं चाहती कि राज्य निर्वाचन के बाद बिजली विनियामक आयोग का पोस्ट भी प्रमोटी आईएएस के पास चला जाए। निर्वाचन में ठाकुर राम सिंह कमिश्नर हैं। लिहाजा, दोनों मिश्र बंधुओं में डीएस का पलड़ा अभी तक भारी दिख रहा है। ऐन वक्त पर अगर उपर से कोई नाम आ गया तो फिर बात अलग है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. चुनाव आयोग की परीक्षा में फेल एक कलेक्टर को सरकार ने प्रमोशन कैसे दे दिया?
2. अमित शाह के छत्तीसगढ़ विजिट में किस अफसर के बीजेपी प्रवेश की जबर्दस्त चर्चा है?

रविवार, 12 अगस्त 2018

धोखे में या इरादतन?

12 अगस्त
आईएएस अंकित आनंद के भारत सरकार में डेपुटेशन से ब्यूरोक्रेसी स्तब्ध है। हर कोई जानना चाह रहा है कि सरकार के इस पसंदीदा अफसर का नाम धोखे में भारत सरकार को चला गया या इरादतन। आखिर, अंकित साढ़े तीन साल से बिजली वितरण कंपनी संभाल रहे हैं। सरकार को उनका कोई विकल्प नहीं मिल रहा था। जिन आईएएस को अच्छे कामों की वजह से सरकार ने कलेक्टर नहीं बनाया, उनमें राजेश टोप्पो के अलावा अंकित भी हैं। जाहिर है, सरकार अगर लौटी तो उन्हें कम-से-कम एक बड़े जिले का कलेक्टर बनना तय था। लेकिन, जीएडी ने सब गु़ड़ गोबर कर दिया। बताते हैं, भारत सरकार ने जनगणना डायरेक्टर के लिए भारत सरकार से तीन नाम मांगे थे। जीएडी ने अंकित आनंद, यशवंत कुमार समेत एक महिला आईएएस का नाम प्रपोज कर दिया। आमतौर पर भारत सरकार उपर के दो नामों पर विचार करती है। यशवंत का चूकि विजिलेंस क्लियरेंस नहीं था। इसलिए, उनका नाम कट गया। अंकित आईआईटीयन हैं। कंप्यूटर साइंस में उन्होंने बीटेक किया है। इसलिए, उनका नाम ओके हो गया। राज्य सरकार के पास जब इसका आदेश पहुंचा तो आफिसर्स आवाक रह गए। अब सरकार केंद्र को लेटर भेज रही है कि अंकित को एडिशनल चार्ज के रूप में स्टेट में भी काम करने की छूट दी जाए। भारत सरकार ने अगर यह प्रस्ताव मान भी लिया तो भी अंकित का इसमें नुकसान ही हैं। न तो वे एडिशनल चार्ज में कलेक्टर बन पाएंगे और ना ही राज्य सरकार उन्हें महत्वपूर्ण पोस्टिंग दे पाएगी। बहरहाल, सवाल िंफर वही है कि यह सब घोखे में हुआ या इस बिहारी अफसर को ठिकाने लगाया गया?

कप्तानी ब्रेक

राजनांदगांव से हटाए गए एसपी प्रशांत अग्रवाल हफ्ते भर में जबर्दस्त वापसी करते हुए बलौदा बाजार का पुलिस कप्तान बनने में कामयाब रहे। लेकिन, कप्तानी ब्रेक होने से जाहिर तौर पर उन्हें झटका लगा होगा। 2008 बैच के इस आईपीएस का राजनांदगांव तीसरा जिला था। सरकार ने पहली लिस्ट में उन्हें पीएचक्यू में एआईजी बनाया गया। और, चार दिन बाद दूसरी सूची में बलौदा बाजार रवाना कर दिया। वैसे भी वीवीआईपी जिले के अफसरों को कम-से-कम एक पोस्टिंग अच्छी मिलती है। राजनांदगांव सीएम का निर्वाचन जिला है। लिहाजा, प्रशांत को अपेक्षाकृत बड़ा जिला मिलने की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन, उनके साथ उल्टा हो गया। पीएचक्यू अगर उन्हें नहीं भेजा गया होता तो बलौदा बाजार उनका चौथा जिला होता। आखिर, लगातार कप्तानी के अपने मतलब होते हैं। छत्तीसगढ़ में बद्री मीणा लगातार सात जिले के एसपी रहे हैं। जो अब तक का रिकार्ड है। हालांकि, संजीव शुक्ला पांचवा जिला कर रहे हैं। जशपुर, राजनांदगांव, रायगढ़, रायपुर और अब दुर्ग। लेकिन, अब वे डीआईजी बन जाएंगे। इसलिए, दुर्ग उनका आखिरी जिला होगा। प्रशांत के डीआईजी बनने में अभी करीब चार साल बचे है। इसलिए, बद्री के रिकार्ड का उनसे खतरा हो सकता था। लेकिन, अब लगता है बद्री का रिकार्ड टूटना मुश्किल होगा।

कलेक्टर की उलझन

सरकार के आग्रह के बाद भी अंबिकापुर कलेक्टर किरण कौशल के मामले में चुनाव आयोग ने अभी तक कोई फैसला नहीं किया है। आयोग से न ना हो रहा है और न हां ही। जाहिर है, ऐसे में किसी भी अफसर के लिए असमंजस की स्थिति होगी। हालांकि, उपर से किरण को अश्वस्त किया गया है, आयोग को उन्हें कंटीन्यू करने के लिए तैयार कर लिया जाएगा। मगर जब तक वहां से कोई आदेश नहीं आएगा, तब तक तो पेंडूलम जैसी ही उनकी स्थिति रहेगी। स्वाभाविक तौर पर काम पर भी इसका असर पड़ेगा। दरअसल, पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान किरण अंबिकापुर जिपं की सीईओ थीं। चुनाव आयोग के नियमानुसार कोई अफसर अगर पिछले चुनाव के समय वहां पोस्टिंग रहा हो तो अब प्रमोशन पर वहां पोस्ट नहीं हो सकता। सरकार ने अफसरों की कमी का हवाला देते हुए इस क्लॉज से रियायत देने के लिए आयोग को सीईसी क जरिये लेटर लिखा है।

फर्स्ट टाईम-1

मंत्रालय में ज्वाइंट सिकरेट्री यशवंत कुमार को सरकार ने ऐसी पोस्टिंग दी कि लोग बोल रहे हैं….भूतो न भविष्यति। उन्हें वाणिज्य, उद्योग और उर्जा से हटाकर डायरेक्टर लोकल फंड आडिट बनाया गया है। यह पोस्ट या तो एडिशनल तौर पर रहा है या फिर किसी प्रमोटी आईएएस के पास। रेगुलर रिकू्रट्ड आईएएस के पास सिंगल विभाग के रूप में कभी नहीं रहा। 2007 बैच के आईएएस यशवंत की कलेक्टरी की गाड़ी बीजापुर से जो उतरी, अब वे ट्रेक पर आने का नाम नहीं ले रही। एक तो जवानी के तीन साल उन्हें मंत्रालय में बितानी पड़ गई और अब तो उन्हें वहां से भी बाहर का रास्ता दिखा गया है।

फर्स्ट टाईम-2

अरबन एडमिनिस्ट्रेशन में विवेक ढांड, अजय सिंह, एमके राउत, सीके खेतान, आरपी मंडल सरीखे आईएएस सिकरेट्री रहे हैं। उस विभाग को जीएडी ने स्पेशल सिकरेट्री निरंजन दास के हवाले कर दिया है। निरंजन राप्रसे से आईएएस में आए हैं। इससे पहिले इस विभाग में इतना जूनियर अफसर कभी भी पोस्ट नहीं रहा। रोहित यादव स्पेशल सिकरेट्री थे। लेकिन, वे डायरेक्ट आईएएस थे। यद्यपि, विभाग की कमान मिलने के बाद निरंजन ने गजब का उत्साह दिखाया है। हफ्ते भर में बिलासपुर और बस्तर का दौरा कर आए। अब देखना है, सरकार के इस नए प्रयोग में वे कितना खरा उतरते हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. एक अफसर को बेहद सफाई से क्यों किनारे लगा दिया गया?
2. पैराशूट नेताओं को कांग्रेस टिकिट नहीं देगी तो आरसी पटेल, विभोर जैसे अफसरों का क्या होगा?

रविवार, 5 अगस्त 2018

वनवास खतम

5 अगस्त
सरकार ने आईएएस अविनाश चंपावत का वनवास खतम कर दिया है। उन्हें सरगुजा से बुलाकर अब सिंचाई विभाग की कमान सौंप दी है। जाहिर है, उन्हें अच्छी पोस्टिंग मिली है। चंपावत को पिछले साल लेबर विभाग में चल रहे विवादों के बाद सरगुजा भेज दिया था। हालांकि, बाद में उनकी आईपीएस पत्नी नेहा चंपावत के लिए सशस्त्र बल में डीआईजी का नया पोस्ट क्रियेट कर वहां भेज राहत दी थी। अब, चूकि अविनाश रायपुर लौट रहे हैं। इसलिए, नेहा का आर्डर भी समझिए जल्दी ही निकलेगा।

टेंशनलेस लिस्ट!

सरकार ने 21 आईएएस अफसरों प्रभार में फेरबदल किया। इतनी बड़ी संख्या के बाद भी सरकार ने गजब की जादुगरी दिखाते हुए सबको संतुष्ट किया। कोई भी मायूस नहीं हुआ। भुवनेश यादव और यशवंत कुमार को भी कुछ-न-कुछ दिया। भुवनेश को तो एमडी नॉन का चार्ज मिल गया। बस्तर कलेक्टर धनंजय देवांगन को भी सरकार ने हटाया तो वहीं पर प्रमोट करते हुए उन्हें वहां का कमिश्नर बना दिया। बस्तर कमिश्नर दिलीप वासनीकर हटे तो वो भी रायपुर और दुर्ग का कमिश्नर बनकर। प्रसन्ना आर को फिर से कमिश्नर हेल्थ का चार्ज। कांकेर कलेक्टर को भी प्रमोट करके कमिश्नर सरगुजा। डॉ0 कमलप्रीत को जीएडी का अतिरिक्त प्रभार देकर उनका वजन बढ़ा दिया। अलरमेल मंगई डी, संगीता पी, निरंजन दास का दायित्व भी सरकार ने बढ़ाया है। संगीता पी को जीएसटी में आउटस्टैंडिंग काम करने का सरकार ने इनाम दिया।

उम्मीदें टूटी

फोर्सली रिटायर डीआईजी केसी अग्रवाल को हाईकोर्ट से आखिरकार राहत नहीं मिल सकी। कोर्ट ने कैट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें अग्रवाल के रिटायरमेंट के खिलाफ फैसला दिया था। इससे अग्रवाल को झटका लगा ही, कई और नौकरशाहों की उम्मीदें टूट गईं। भारत सरकार ने पिछले साल आईजी राजकुमार देवांगन, डीआईजी केसी अग्रवाल, एएम जुरी, प्रिंसिपल सिकरेट्री अजय पाल सिंह और बीएल अग्रवाल को सेवा से रिटायर कर दिया था। इनमें से केसी अग्रवाल और बीएल अग्रवाल के पक्ष में कैट का निर्णय आया था। इससे बाकी अफसरों की भी नौकरी में लौटने की उम्मीदें बढ़ी थीं। लेकिन, केसी के मामले में भारत सरकार बिलासपुर हाईकोर्ट में अपील करके अफसरों की उम्मीदों को तोड़ दिया।

तीन नाम

एडिशनल इलेक्शन आफिसर अपाइंट करने के लिए सामान्य प्रशासन विभाग ने तीन आईएएस अफसरों के नामों का पेनल भारत निर्वाचन आयोग को भेजा था। इनमें एस भारतीदासन, यशवंत कुमार और शिखा राजपूत शामिल थी। निर्वाचन आयोग ने इनमें से 2006 बैच के आईएएस भारतीदासन के नाम को हरी झंडी दे दी। पता चला है, चीफ इलेक्शन आफिसर सुब्रत साहू भी भारतीदासन को चाह रहे थे। वैसे भी, निर्वाचन आयोग सीईओ की सलाह से ही आयोग में नियुक्तियां करता है ताकि कामकाज में समन्वय बना रहे। लिहाजा, जीएडी ने ऐसा पेनल बनाया कि भारतीदासन को अपाइंट करने में कोई दिक्कत नहीं हुई।

ऐसा भी होता है

निर्वाचन आयोग ने कलेक्टरों का चुनावी ज्ञान परखने के लिए परीक्षा ली। इसके लिए तीन सेंटर बनाए गए थे। रायपुर, बिलासपुर और बस्तर। परीक्षा सुचारु रुप से हो, इसके लिए दिल्ली से दो पर्यवेक्षक आए थे। लेकिन, उन्हें बिलासपुर और बस्तर भेज दिया गया। रायपुर सेंटर पर बिना पर्यवेक्षक का इंतजाम हुआ। लोकल अफसर एग्जाम कंडक्ट कराए। और, सबसे बढ़ियां रिजल्ट रायपुर सेंटर का रहा। सबसे अधिक कलेक्टर और एआरओ बिलासपुर और बस्तर केंद्र से फेल हुए। बताते हैं, रायपुर केंद्र में परीक्षार्थियों में समन्वय का अद्भूत नजारा दिख रहा था। सभी ने मिलजुल कर परीक्षा दी। जाहिर है, रिजल्ट तो बढ़ियां आएगा ही।

शराब और युवा कल्याण

नए फेरबदल में आबकारी आयुक्त एवं सचिव डीडी सिंह को शराब के साथ-साथ खेल एवं युवा कल्याण विभाग सिकरेट्री का अतिरिक्त प्रभार देकर इस सीधे-साधे अफसर को सरकार ने उलझन में डाल दिया है। डीडी अब सरकारी दुकानों में शराब बिकवाएंगे और दूसरी ओर खेल और युवाओं के कल्याण पर काम करेंगे। ये तो उलटबांसी हो गई। बहरहाल, उनकी परेशानी इस बात को लेकर है कि युवाआें के बीच वे नशाबंदी की बात कैसे करेंगे। कोई उल्टे सवाल दाग दिया तो?

पति-पत्नी कलेक्टर

सरकार ने 2010 बैच की आईएएस रानू साहू को कांकेर कलेक्टर बनाया है। वे पिछले साल से कलेक्टर की वेटिंग में थीं। इस बैच में चार आईएएस हैं। इनमें से तीन कलेक्टर बन चुके हैं। उनके हसबैंड जेपी मौर्य भी इसी बैच के हैं और वे सुकमा कलेक्टर हैं। कलेक्टर बनने से छूटी थीं सिर्फ रानू। ऐसे में, उनके मन की पीड़ा समझी जा सकती थी। लेकिन, सरकार ने कांकेर जैसे जिले का कलेक्टर बनाकर इसकी भरपाई कर दी। आमतौर पर किसी आईएएस का कांकेर दूसरा जिला होता है। लेकिन, रानू को पहली बार में कांकेर मिल गया। उन्हें कलेक्टर बनाकर सरकार ने 2010 बैच को भी क्लोज कर दिया है। चलिये, अब 2011 बैच की उम्मीदें बढ़ेगी।

तीसरे कलेक्टर दंपति

राज्य बनने के बाद जेपी मौर्या और रानू साहू तीसरे कलेक्टर दंपति होंगे। इससे पहिले विकास शील बिलासपुर और निधि छिब्बर जांजगीर में एक समय में कलेक्टर थे। इसके बाद अंबलगन पी और अलरमेल मंगई डी भी कलेक्टर रहे। और अब जेपी मौर्य और रानू साहू को ये मौका मिला है। मौर्य दंपति पर एक पुराने अफसर इतने मेहरबान थे कि जेपी को सुकमा और रानू को सरगुजा भेज दिया गया था। लेकिन, वक्त बदला। सरकार ने अब दोनों को न केवल कलेक्टर बना दिया बल्कि नजदीक भी।

अंत में दो सवाल आपसे

1. फेरबदल में वे कौन से दो कलेक्टर बच गए, जिनका विकास यात्रा फेज-2 के बाद ट्रांसफर किया जाएगा?
2. क्या विभागीय जांच की वजह से सरकार ने कांकेर कलेक्टर को हटाकर सरगुजा भेज दिया?