रविवार, 3 फ़रवरी 2013

तरकश, 3 फरवर


विरोधाभास

दागी और खराब छबि वाले आईएएस अफसरों के रिकार्ड्स की समीक्षा करने वाली कमेटी में प्रशासन अकादमी के महानिदेशक नारायण सिंह भी शामिल हैं। नारायण सिंह का मतलब आप जानते हैं, मालिक मकबूजा कांड। इसके लिए सिंह को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। राज्य के वे पहले आईएएस हैं, जो भारत सरकार द्वारा डिमोेट किए गए। और अब देखिए, वे खराब छबि वाले अफसरों की सूची बना रहे हैं। आईएएस अफसर इसको सूपा और चलनी का मामला बताकर चुटकी ले रहे हैं, तो इसमें गलत क्या है?

डेसिंग

88 बैच के साफ और सौम्य छबि के आईपीएस संजय पिल्ले को जब ईओडब्लू और एसीबी की कमान सौंपी गई थी, तो लोगों को लगा था अब छापे और ट्रेप में कमी आ जाएगी। मगर पिल्ले, तो पूर्ववर्ती ईओडब्लू चीफ दुर्गेश माधव अवस्थी से भी एक कदम आगे निकल गए। महीने भर के भीतर ही बड़ा निशाना बनाया। 10 करोड़ी अफसर को पकड़ा, डिप्टी कमिश्नर कामर्सियल टैक्स शंकरलाल अग्रवाल को। भाजपा शासन काल में अग्रवाल अफसर के घर छापा, किसी अचरज से कम नहीं है।  

खतरा

जैजैपुर के विधायक महंत रामसुंदर दास की गद्दी खतरे में है। उनकी सीट पर कांग्रेस के एक दिग्गज नेता की नजर गड़ गई है। नेताजी अपनी अद्र्धांगिनी को इस सीट से चुनाव लड़ाना चाहते हैं। जैजैपुर सामान्य सीट है और इस समय कांग्रेस के लिए सबसे मुफीद समझी जा रही है। सो, नेताजी को और क्या चाहिए। महंतजी को, उनके लोगों के जरिये समझाने की कोशिश की जा रही है कि जैजैपुर की जगह चांपा या सक्ती में से जहां चाहे, उन्हें टिकिट दिलवा दी जाएगी। पर, महंतजी इसके खतरे से अनभिज्ञ नहीं हैं। फिर, वे जैजैपुर से दूसरी बार विधायक हैं। और तीसरी बार में भी कोई दिक्कत नहीं है। खुदा-न-खास्ते कांग्रेस कहीं आ गई, तो महंतजी मंत्री पद के प्रबल दावेदार होंगे। ऐसे में मना करने के अलावा उनके पास चारा क्या था। मगर नेताजी के लोग कहां मानने वाले। महंतजी के कार्यकर्ताओं को तोड़ने का काम चालू हो गया है। अब देखना है, महंतजी झुकते हैं या नेताजी।  

नम्बर बढ़ा

गर्भवती महिलाओं के लिए मुख्यमंत्री द्वारा महतारी एक्सप्रेस चलाने की योजना का ऐलान करने पर सयसे अधिक कोई खुश है, तो वे हैं आईएएस सोनमणि बोरा। यह कांसेप्ट मूलतः बोरा का था और इसके लिए उन्हें यूनिसेफ से जमकर सराहना मिली थी। 2010 में बोरा जब बिलासपुर के कलेक्टर थे, तब उन्होंने महतारी एक्सप्रेस चलाई थी। इसके लिए टोल फ्री नम्बर 102 रखा गया था। सरकारी वेबसाइट पर नजर डालें, तो इस योजना का सर्वाधिक लाभ दूरस्थ और आदिवासी इलाके की महिलाओं को मिला था। तब बिलासपुर का संस्थागत प्रसव 17 से बढ़कर 54 फीसदी पहुंच गया था। अब राज्य सरकार ने इसे एडाप्ट कर लिया है। जाहिर है, इससे बोरा का नम्बर बढ़ा है। बोरा अभी हाउसिंग बोर्ड के कमिश्नर के साथ ही डीपीआर हैं।

नया चेहरा

स्टेट पौल्यूशन बोर्ड में जल्द ही नया चेहरा दिख सकता। 87 बैच के आईएफएस अफसर नरसिंह राव पिछले चार साल से बोर्ड की कमान संभाल रहे थे। पता चला है, सरकार अब उन्हें रिप्लेस करने जा रही है। राव की जगह कोई आईएफएस ही लेगा। वह पीसी पाण्डेय हो सकते हैं या फिर आनंद बाबू। इनके अलावे कुछ और आईएएस, आईएफएस भी ट्राई मार रहे हैं। कुछ तो आवास पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव बैजेंद्र कुमार से बहाने ढूंढ-ढूंढकर मिल रहे हैं। शायद, साब सिफारिश कर दें।

अंत में दो सवाल आपसे

1. एक मंत्रीजी का नाम बताइये, जो आजकल अपने को सुपरटाईम स्केल वाले मंत्री बताते है?
2. आईएएस बिरादरी में किस आईएएस को छत्तीसगढ़ का दूसरा शैलेष पाठक कहा जा रहा है?

शनिवार, 19 जनवरी 2013

तरकश, 20 जनवरी




शिवानंद की जय


जब से छत्तीसगढ़ बना है, पुलिस के ग्रह-नक्षत्र खराब ही चल रहे हैं। 2002 में आईपीएस अफसर मूलचंद बजाज की डेथ हुई, इसके बाद एक-एक कर आठ आईपीएस गुजर गए। डीजीपी से लेकर एसपी, आईजी तक। 2012 तो और खराब रहा। बिलासपुर एसपी ने गोली मार ली। 20 दिन बाद वहां के आईजी भी हर्ट अटैक में नहीं रहे। ग्रह-दशा के चलते ही बिलासपुर आईजी जीपी सिंह को बे-आबरु होकर बिदा होना पड़ा, तो धमतरी एसपी को पनिशमेंट के तौर पर रायपुर वापिस बुला लिया गया। छत्तीसगढ़ जैसे छोटे कैडर में आठ आईपीएस के स्वर्गवास को दूसरे राज्य के आईपीएस भी विश्वास नहीं करते। यही नहीं, 10 साल में नक्सली हमले में 500 से अधिक जवान भी शहीद हुए। अब अपने नए डीजीपी रामनिवास साब अवधूत बाबा शिवानंदजी के शिष्य हैं और उनकी ताजपोशी के अवसर पर वे आर्शीवाद देने उनके घर और कार्यालय भी पधारे थे। बाबा के निर्देश पर डीजीपी ने हाल ही में, दुर्गा सप्तशती यज्ञ कराया है। सो, पुलिस महकमा उम्मीद कर रहा है, 2013 कम-से-कम ठीक जाएगा। आखिर, नक्सली हमले में एयरफोर्स का हेलीकाप्टर बाल-बाल बच गया। डेढ़ महीने में कोई बड़ी वारदात भी नहीं हुई है। फिर, इसे यज्ञ का असर मानने में क्या दिक्कत है। पुलिस वालों को अब, शिवानंद महाराज की जय बोलना चाहिए। बाबा भी प्रसन्न और बास भी। 

तेवर

हाल के कुछ मामलों में सरकार ने जो तीखे तेवर दिखाए हैं, उससे आईएएस, आईपीएस ही नहीं, बल्कि मंत्री लोग भी सहम गए हैं। चावल की क्वालिटी को लेकर एफसीआई के खिलाफ प्रदर्शन और उसमें जबरिया ताला लगा देने पर वरिष्ठ मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के भाई योगेश के खिलाफ पंडरी थाने में मुकदमा दर्ज हो गया। इससे पहले, आप कभी सोच सकते थे। यहीं नहीं, डाक्टर साब ने शिक्षाकर्मियों के मामले में दो टूक कह दिया, बर्खास्त लोगों को बहाल नहीं किया जाएगा। सरकार के तेवर देखकर ही लिपिक संघ ने, उल्टे धन्यवाद देकर आंदोलन खतम कर दिया। मुंगेली के जिला उत्सव में सीएम को जब पता चला कि बिल्हा में खराब सड़क बनाने वाला ठेकेदार उल्टे पीडब्लूडी के ईई को सस्पेंड कराने की धमकी दे रहा है, तो उन्होंने फौरन आदेश दिया, तीन दिन के अंदर जांच कर उन्हें इंफार्म करें। ब्यूरेके्रट्स भी मान रहे हैं, बदले-बदले नजर आ रहे हैं सरकार। कुछ गड़बड़ हो गया, तो बचना मुश्किल है। कैसे भी छह महीने निकाल लो। 

राहत

कांकेर पुलिस ने अतिउत्साह में झलियामारी दुष्कर्म कांड के सभी आरोपियों के खिलाफ आदिवासी प्रताड़ना की धारा भी लगा दी थी। जबकि, यह धारा सिर्फ गैर आदिवासियों पर ही लगाई जा सकती है। इस गलती को सराकर ने पकड़ा और राजधानी से निर्देश जारी होने पर कांकेर पुलिस ने यह धारा हटाई। ज्ञातव्य है, आरोपियों में शिक्षाकर्मी से लेकर चैकीदार, आश्रम अधीक्षिक, बीईओ, एबीईओ तक सभी आदिवासी हैं। शिक्षाकर्मी और चैकीदार में से एक भी गैर आदिवासी होता तो स्थिति कुछ और होती और सरकार के लिए उसे संभालना आसान नहीं होता। और, शायद यही वजह भी है कि सत्ताधारी पार्टी के रणनीतिकार इसमें राजनीतिक नुकसान नहीं देख रहे।

मेला के नाम पर 

मेला और महोत्सव के नाम पर पर्यटन और संस्कृति विभाग से लेकर कलेक्टर तक खजाने को चूना लगा रहे हैं। अभी तक, सिरपुर, राजिम, ताला जैसे आयोजन होते थे। अब तो जिसको देखो, वही लगा हुआ है। दंतेवाड़ा के कलेक्टर ने दो दिन पहले बारसूर महोत्सव कराए। इसके लिए 50 रुपए से भी अधिक के, महंगे कार्ड छपवाए गए। मुंबई के कलाकारों को बुलाकर नाच-गाना कराया गया। बारसूर की गणेश प्रतिमा को दूनिया का तीसरी बड़ी प्रतिमा बताई गई। मगर एक हकीकत यह भी है कि बारसूर में दिन में भी जाने से लोग घबराते हैं। वहां चाय की एक झोपड़ी तक नहीं है। रुकने के लिए ठौर-ठिकाने की तो बात ही अलग है। कुछ दिन पहले मैनपाट में महोत्सव के नाम पर ही सरगुजा के कलेक्टर ने रुसी बालाओं को बुलाकर अधनंगी नाच कराई गई। ऐसा नाच कि परिवार के साथ बैठे लोगों को आंखे फेरनी पड़ गई। अब, पड़ोसी जिला कोरिया के तातापानी में महोत्सव कराने खााितर बजट स्वीकृत करने के लिए सरकार के पास पत्र आया है।  

कुलपति चयन

बस्तर और सरगुजा विश्वविद्यालय के नए कुलपति का सलेक्शन करने के लिए 24 जनवरी को मंत्रालय में बैठक होने जा रही है। इसमें आवेदनों की छंटनी करके योग्यता के आधार पर तीन-तीन नाम के पैनल बनाए जाएंगे। और कुलपति चयन कमेटी इसी दिन बंद लिफाफा राज्यपाल को भेज देगी। राज्यपाल इनमें से किसी एक नाम पर टिक लगाकर वीसी अपाइंट कर देंगे। यद्यपि, दोनों विश्वविद्यालय दूरस्थ और आदिवासी इलाके में हैं, इसके बावजूद दावेदारांे में उत्साह की कमी नहीं है। हर स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। मगर जिस तरह कमेटी बनी है, लगता है, ठीक-ठाक ही होगा। चीफ सिकरेट्री सुनील कुमार कमेटी के चेयरमैन हैं और यूजीसी ने दोनों विवि के लिए अपना प्रतिनिधि नामित किया हैं, वे भी कम नहीं हैं। एक सीएसआईआर के एक्स चेयरमैन हैं और दूसरे, इलाहाबाद विवि के कुलपति रह चुके हैं। मुख्यमंत्री भी इस साल को गुणवता वर्ष के रूप में मनाने का ऐलान किया है। वैसे भी, डाक्टर साब आजकल छोटी-मोटी बातों में रुचि नहीं लेते। और ना ही प्रेशर में आते। सो, उम्मीद कीजिए दोनों विवि की कमान ठीक-ठाक लोगों के हाथ में ही सौंपी जाएगी। 

अंत में दो सवाल आपसे

1.            एक सीनियर आईएएस से पंगा लेने के कारण किस मंत्री को बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है?
2.            राईस मिलर एफसीआई के खिलाफ इसलिए मुहिम छेड़े हुए हैं कि दबाव में आकर सरकार नागरिक आपूर्ति निगम को चावल खरीदने का निर्देश दे दे?

शनिवार, 12 जनवरी 2013

तरकश, 13 जनवरी

मनहर के चलते
एसपी की सर्जरी अभी और आगे टल सकती थी। मगर बालोद में सीएम के रोड शो में काला झंडा की वजह से एसपी के लिस्ट पर विचार शुरू हो गया है। और खबर, तो यहां तक है, 14-15 को आदेश निकल सकते हैं या फिर 20-21 को लगभग तय मानिये। सिर्फ सीएम की अति व्यस्तता की वजह से इस पर अंतिम निर्णय नहीं हो पा रहा है। जाहिर है, सूची में बालोद एसपी डीएल मनहर का नाम, एक नम्बर पर रहेगा। उसके बाद, रायपुर, रायगढ़, जांजगीर जैसे दर्जन भर से अधिक जिले होंगे। दावा ऐसा भी है कि रमन सरकार के नौ साल में एसपी लेवल पर यह सबसे बड़ा फेरबदल होगा। 27 में से आधे से अधिक जिले के एसपी बदल जाएंगे। इसकी वजह यह है कि मुख्यमंत्री एसपी के पारफारमेंस से खुश नहीं हैं। दूसरा, इस साल चुनाव भी है। रही राजधानी रायपुर की बात, तो किसी मैच्योर परसन को यहां की कमान सौंपी जाएगी। या तो रायगढ़ के एसपी आनंद छाबड़ा प्रोन्नत होकर एसएसपी बनेंगे या फिर बिलासपुर के रतनलाल डांगी को मौका दिया जाएगा। एसपी के रूप में डांगी का बिलासपुर चैथा जिला है। इसके अलावा रायपुर के लायक कोई आईपीएस सरकार को नहीं दिख रहा। तमिलनाडू कैडर से डेपुटेशन पर आई सोनल मिश्रा का नाम जरूर उछला था, मगर सरकार को नया चेहरा हजम नहीं हो रहा है।   

 
तोड़ी की चक्कर
कांकेर के झलियामारी आश्रम में नाबालिग बच्चियों से दुष्कर्म का मामला ऐसे ही सामने नहीं आया। दरअसल, तोड़ी के चक्कर में यह सब हुआ। पता चला है, नरहरपुर के एक व्यक्ति को सबसे पहले घटना की जानकारी मिली थी और उसने कांकेर के एक युवक को खबर दी और तय हुआ था, जो मिलेगा, उसमें होगा आधा-आधा। प्लान के मुताबिक कांकेर का युवक झलियामारी आश्रम जाकर आरोपी शिक्षाकर्मी को चमकाया और 25 हजार रुपए ऐंठ भी लाया। किन्तु उसकी नीयत में खोट आ गई और बंटवारा करने में आनाकानी करने लगा। इस पर दोनों में विवाद हुआ और बात फैल गई। वरना, मासूम बच्चियों से अनाचार का मामला झलियामारी आश्रम में ही दफन हो गया होता। 


कलेक्टर की जिम्मेदारी?
झलियामारी आश्रम की आदिवासी बच्चियां जिस स्थिति को जी रही थी, उससे कांकेर कलेक्टर और आदिवासी विभाग के अफसरों को कैसे बरी किया जा सकता है। खपरे वाले कच्चे मकान के तीन कमरे में 42 बच्चियां। नहाने के लिए बाथरुम नहीं, टायलेट नहीं। दरवाजे की कुंडी टूटी हुई। रात में लड़कियां दरवाजा भिड़ा देती हंै। इसी का फायदा उठाया, आरोपियों ने। रात में किसी भी वक्त घुस जाते थे, कमरे में। नरहरपुर नक्सली इलाका भी नहीं है। विशुद्ध मैदानी क्षेत्र है। जिला मुख्यालय से महज 30 किलोमीटर दूर। कलेक्टर जिले का मुखिया होता है और सरकार की योजनाओं का क्रियान्वन हो रहा है या नहीं, देखना उसका प्रमुख काम है। आश्रमों की बेहतरी के लिए सरकार हर साल करोड़ों रुपए का फंड जारी करती है। काश! कलेक्टर एक बार झलियामारी आश्रम का विजिट की होती, तो कई बच्चियों का भविष्य खराब होने से बच जाता। लेकिन जब उनकी पोस्टिंग इसलिए हुई है कि बगल के जगदलपुर में उनके पति कलेक्टर हैं और फ्रिक्विेंटली उनका मिलना-जुलना हो सकेगा, तो फिर कोई उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। बहरहाल, झलियामारी आश्रम, तो एक बानगी है। अधिकांश जिलों में आदिवासी आश्रमों और कलेक्टरों की यही स्थिति है। कलेक्टरों की रुचि सिर्फ इस बात में होती है कि हमारे एनजीओ को काम मिला या नहीं और खरीदी और टेंडर होता है, उसका हिस्सा आ जाए। जिस तरह काले झंडे दिखाने पर या हंगामा करने पर एसपी के ट्रांसफर हो जाते हैं, उसी तरह बड़ी घटनाओं पर एकाध कलेक्टर-एसपी को उल्टा टांगिये डाक्टर साब, देखियेगा, फिर कलेक्टर-एसपी कैसे चार्ज होते हैं। 


आईएएस बुद्धि
छह महीने का मातृत्व अवकाश पूरे हो जाने के बाद भी एक महिला आईएएस मंत्रालय में ज्वाईन नहीं दे रही हैं। पता चला है, उन्होंने एक महीने का और अवकाश ले लिया है। महिला अफसर को आशंका है कि एक बार मंत्रालय में फंस गई, तो इस महीने के अंत या अगले महीने होने वाले कलेक्टरों के फेरबदल में उनका नम्बर नहीं लग पाएगा। चूकने का मतलब समझा जा सकता है, सुनील कुमार जैसे सीएस के साथ साल भर और काम करना। सुबह 10 बजे आफिस पहुंचना और रिजल्ट ओरियेंटेड वर्क। मगर नए आईएएस रिजल्ट-विजल्ट में विश्वास कहां करते हैं। ज्वाईन करते ही मनीराम के चक्कर में पड़ जा रहे हैं। और मनीराम से मिलने के लिए कलेक्ट्रेट से बढि़यां जगह और क्या हो सकती है। बहरहाल, महिला अफसर के आईएएस पति पावर सेंटर में पहुंच गए हैं, सो उनकी योजना परवान चढ़ जाए, तो अचरज नहीं। 


मीर जाफर
कैडर रिव्यू का प्रस्ताव सबसे पहले वन विभाग ने भारत सरकार को भेजा था। और आईएफएस अफसरों को उम्मीद थी कि जल्द ही वह ओके होकर आ जाएगा। मगर पता चला है, कैडर रिव्यू से प्रभावित होने वाले कुछ आईएफएस अफसरों ने ही दिल्ली में जुगाड़ लगाकर फाइल डंप करवा दिया है। कैडर रिव्यू हो जाने के बाद सर्किल में सीएफ की जगह सीसीएफ पोस्ट किए जाएंगे। प्रशासनिक सुधार इसलिए किया जा रहा है कि कमिश्नरी में कमिश्नर, रेंज में आईजी होते हैं, उसी तरह वन विभाग के सर्किल में सीसीएफ बैठे। ताकि, सीसीएफ का कमिश्नर और आईजी से समन्वय ठीक रहे। दरअसल, तीनों का रैंक सेम होता है। लेेकिन कैडर रिव्यू हो गया, तो वर्तमान सीएफ लोगों को कमाई वाली कुर्सी छोड़कर वन मुख्यालय की रवानगी डालनी पड़ जाएगी। वहां उन्हें बैठने के लिए कुर्सी-टेबल का भी खुद ही इंतजाम करना होगा। सो, सीएफ क्यों चाहेंगे, कैडर रिव्यू हो। बहरहाल, वन महकमे के लोगों ने मीर जाफरों की तलाश तेज कर दी हैं। 


अंत में दो सवाल आपसे
1.    दुष्कर्म के मामले में कड़े कानून बनाने पर पुलिस को ज्यादा लाभ होगा या महिलाओं को?
2.    एक आईएएस अफसर का नाम बताइये, जिन्होंने मोटे कमीशन के फेर में एक कंपनी से 75 लाख रुपए के मोबाइल खरीदकर मातहतों को टिका दिया?

शनिवार, 5 जनवरी 2013

तरकश, 6 जनवरी

शर्मनाक
 
छेड़छाड़ और रेप के मामले में कार्रवार्इ करने में छत्तीसगढ़ पुलिस का रवैया भी आहत करने वाला रहा है। रायपुर के उरला इलाके में 16 दिसंबर की रात हुए पांच साल की बच्ची से रेप हो या इसके एक हफते बाद पेंड्रा इलाके में आटो चालक द्वारा महिला की अस्मत लूटने के मामले में। पुलिस का व्यवहार शर्मनाम रहा। उरला घटना में दुष्कर्म की रिपोर्ट तब लिखी गर्इ, जब इलाज के लिए बच्ची को आंबेडकर अस्पताल में भरती किया गया। पुलिस को डर था कि दिल्ली की तरह रायपुर में भी बवाल न हो जाए। ऐसा तब हुआ, जब उरला में महिला थानेदार हैं। शुरू में, तो थानेदार ने घटना से ही अनभिज्ञता जता दी थी। बाद में, मीडिया को यह कहकर गुमराह किया गया कि बच्ची स्वास्थ्य होकर घर जा चुकी है। जबकि, वह अस्पताल में बिस्तर पर थी। महिला अफसर ने यह साबित किया कि पुलिस में आने के बाद महिला, महिला नहीं बलिक पुलिस सिस्टम का हिस्सा बन जाती है। और थानों में भले ही महिला इंस्पेक्टरों की पोसिटंग कर दो, होना-जाना कुछ नहीं है। बहरहाल, यह सब हुआ, सरकार की नाक के नीचे। जहां, राज्यपाल से लेकर चीफ मिनिस्टर, गृह मंत्री, चीफ सिकरेट्री, डीजीपी सरीखे अफसर बैठते हैं। आरोपी गया था, विधवा महिला की इज्जत लूटने, वह नहीं मिली तो मासूम बच्ची को हवश का शिकार बना डाला। और पुलिस हीलाहवाला करती रही। ऐसे अफसरों पर अब तक कार्रवार्इ कुछ भी नहीं। पेंड्रा इलाके में, तो थानेदार आरोपियों के साथ समझौता कराने लगा। ऐसे में पुलिस से क्या उम्मीद की जा सकती है। 


पटनायक स्टाइल
उड़ीसा में चुनाव के पहले नवीन पटनायक सरकार गड़बड़ कर्मचारियों और अधिकारियों पर डंडा चलाकर या जेल भेजकर चुनाव जीत जाती है। पटनायक इस थ्योरी पर काम करते हैं कि सरकारी लोगों पर कड़ार्इ से आम आदमी खुश होता है। आदमी आखिर, उन्हीं से, तो सबसे अधिक त्रस्त रहता है। सो, छत्तीसगढ़ में भी कुछ ऐसा ही हो जाए, तो हैरान मत होइयेगा। इसकी शुरूआत शिक्षाकर्मियों और लिपिकों के साथ हो सकती है। सरकार किस तरह सख्त है, आप समझ सकते हैं, शिक्षाकर्मियों ने शुक्रवार को जेल भरो आंदोलन को सांकेतिक गिरफतारी में क्यों तब्दील कर दिया। सरकार ने दो टूक कह दिया है, फिलहाल न छठा वेतनमान मिलेगा और संविलयन, तो नामुमकिन है। वेतन कुछ बढ़ाए जाएंगे, मगर वो भी अभी नहीं। दो-एक महीने बाद ही कुछ होगा। अंदर की खबर है, सरकार को आशंका है, एक बार झुकने पर आंदोलनों की बाढ़ आ जाएगी। काम-धाम छोड़कर सितंबर तक इसी से दो-चार होना पड़ेगा। शिक्षाकर्मियों को छठा वेतनमान देने से पहले साल करीब 800 करोड़ रुपए खर्च आएगा। और दो साल बाद यह 1800 करोड़ रुपए पहुंच जाएगा। उधर, 42 लाख गरीब परिवारों को चावल-दाल देने में 1200 करोड़ खर्च बैठ रहा है। अब, सरकार या तो गरीबों को चावल दें या शिक्षाकर्मियों को छठा वेतनमान। सरकार के रणनीतिकारों का मानना है, चुनावी समीकरण में 42 लाख परिवार ज्यादा महत्वपूर्ण है, न कि डेढ़ लाख। वैसे भी, 50 फीसदी से अधिक शिक्षाकर्मी काम पर लौट चुके हैं। व्यापम से चयनित 40 हजार शिक्षाकर्मियों को तुरंत अपाइंटमेंट आर्डर देने पर भी विचार कर रही है।  


दलित कार्ड
पुलिस हाउसिंग कारपोरेशन का चेयरमैन बनने के लिए निवर्तमान डीजीपी अनिल नवानी ट्रार्इ कर रहे हैं, मगर यकीन मानिये, उनकी ताजपोशी नहीं होने वाली। मार्च में डीजी होमगार्ड से रिटायर होने वाले संतकुमार पासवान के लिए यह कुर्सी सुरक्षित रखी गर्इ है। समझने की बात है, नवानी को अगर चेयरमैन बनाना होता, तो रामनिवास को डीजी बनाते समय ही कारपोरेशन का आदेश भी हो गया होता। रामनिवास को आखिर अकारण कारपोरेशन का चार्ज थोड़े ही दिया गया। जाहिर है, समय काम होने की वजह से पासवान डीजीपी न बन सकें। सो, सरकार चाहती है, कारपोरेशन में चेयरमैन बनाकर पुलिस महकमे से मार्च में उनकी सम्मानजनक बिदार्इ हो। इसका लाभ आखिर सरकार को भी तो मिलेगा। अनुसूचित जाति की उपेक्षा के आरोप का जवाब देने के लिए सरकार के तरकश में एक पासवान का भी वाण होगा। 


26 के बाद
ट्रांसफर से घबराए सूबे के कुछ कलेक्टर और एसपी को इस खबर से कुछ राहत मिल सकती है कि सरकार ने सर्जरी को फिलहाल टाल दिया है। और अब 26 जनवरी के बाद ही कुछ होगा। सरकार अपना पूरा ध्यान अभी 9 नए जिले में होने वाले रोड शो और उसके उत्सव पर केंदि्रत करने जा रही है। शीतकालीन सत्र के बाद से ही आर्इएएस, आर्इपीएस की बड़ी लिस्ट निकलने की चर्चा थी। आखिरी साल में चुनावी हिसाब से सरकार बड़े स्तर पर फेरबदल करने की तैयारी भी कर रही थी। मगर अपरिहार्य कारणों से इसे स्थगित करना ही मुनासिब समझा है। 


बेहाल
जीएडी बोले तो समान्य प्रशासन विभाग। मंत्रालय का महत्वपूर्ण महकमा। इसलिए तीन-तीन सिकरेट्री हैं। मगर काम देखिए कि गृह मंत्री और चीफ सिकरेट्री के मार्क किए गए पत्रों पर भी कार्रवार्इ नहीं हो रही है। नए मंत्रालय में गलत जगह राष्ट्रध्वज लगाने को लेकर गृह मंत्री ननकीराम कंवर ने आपतित करते हुए 4 दिसंबर को चीफ सिकरेट्री सुनील कुमार को पत्र लिखा था। कार्रवार्इ के लिए कुमार ने इसे जीएडी को भेज दिया। कुछ नहीं हुआ तो कंवर ने जीएडी को फिर रिमाइंडर भेजा। 4 जनवरी को जीएडी के डिप्टी सिकरेट्री ने राष्ट्रध्वज ठीक करने के लिए एनआरडीए को पत्र लिख पल्ला झाड़ लिया। मंत्रालय में राष्ट्रध्वज ठीक जगह पर लगे, यह काम जीएडी का है न कि एनआरडीए का। राष्ट्रध्वज के साथ ऐसा मजाक, लिंटर के छड़ में राष्ट्रध्वज को लटका दिया है, वह भी कोने में। और गृह मंत्री और चीफ सिकरेट्री के पत्र के बाद भी हीलाहवाला। समझ सकते हैं, कैसा चल रहा है जीएडी।   


 अंत में दो सवाल आपसे
1.    शिक्षाकर्मियों और लिपिकों के आंदोलन को आम आदमी की सहानुभूति क्यों नहीं मिल रही है?
2.    कितने परसेंट मां-बाप अपने बेटियों को शालीन कपड़े पहनने की सीख देते हैं और बेटों को यह संस्कार कि बहन-बेटियों के साथ बदतमीजी कर हमारी नाक मत कटवाना?

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

तरकश, 30 दिसंबर

36 जिले

सियासी गलियारों में यह चर्चा गरम है कि 26 जनवरी को सरकार कुछ और जिलों का ऐलान कर सकती है। अभी 27 जिले हैं। राज्य जब बनें थे, तब 16 थे। रमन सरकार ने पहली पारी में बीजापुर और नारायणपुर को बनाकर 18 किया था। और पिछले साल जनवरी में 9 और बनाए। प्रशासन को आम आदमी के और नजदीक ले जाने के लिए सत्ता के भीतर, छत्तीसगढ़ में 36 जिले की भी बातें हो रही हंै। फिलहाल, सारंगढ़ और पत्थलगांव की चर्चा ज्यादा है। सियासी पे्रक्षकों का मानना है, ऐसा करके सरकार कांग्रेस बहुल इलाके में सेंध लगाने की कोशिश करेगी। वजह, 2013 का चुनाव कुछ अलग होगा। एक-एक सीट की लड़ाई होगी। सरकार कहीं कोई कोर कसर नहीं रखना चाह रही। बहरहाल, कुछ और नए जिले बनाए गए, तो एसपी और कलेक्टरों के चेंज 26 जनवरी के बाद ही मानकर चलिये। वरना, 10 जनवरी के पहले ट्रांसफर हो जाएंगे।

माटी पुत्र

बस्तर और सरगुजा के कुलपति चयन के लिए राजभवन ने चीफ सिकरेट्री सुनील कुमार की अध्यक्षता में सर्च कमेटी बना दी है। और समझा जाता है, अगले महीने इस पर निर्णय हो जाएगा। हर बार की तरह, माटी पुत्रों को मौका देने के लिए फिर प्रेशर बनाने की मुहिम शुरू हो गई है। मगर सर्च कमेटी और राजभवन को यह ध्यान रखना होगा, जिन विश्वविद्यालयों को माटी पुत्र संभाल रहे हैं, वहां का हाल क्या है। राज्य के 80 फीसदी से अधिक विवि को वही लोग संभाल रहे हैं। वहां क्वालिटी तो भूल जाइये, एक भी ऐसा काम नहीं हुआ है, जिससे लगे कि वह विश्वविद्यालय है। इनमें से अधिकांश विवि सिर्फ डिग्री बांटने के केंद्र बनकर रह गए हैं। राजनीतिज्ञों को दबाव इस बात के लिए बनाना चाहिए कि विवि में योग्य आदमी की पोस्टिंग हो, जिससे अपना ह्यूमन रिसोर्स स्ट्रोंग हो सकें। आखिर, अमेरिका में ऐसी बातें क्यों नही होती। वहां के आधा दर्जन विश्वविद्यालयों में भारतीय कुलपति हैं। और, इसी सूबे में बिलासपुर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के वीसी लक्ष्मण चतुर्वेदी ने कैसे टाईट करके रख दिया है। सेंट्रल यूनिवर्सिटी क्वालिटी में ही नहीं, बल्कि डिसिप्लीन में, एक नजीर बन सकता है। स्कूल से भी अधिक अनुशासन....पूरा विवि कांपता है। टीचर अगर 10 बजे की जगह 10.05 पर पहुंच गए, तो खैर नहीं। और कोई छात्र वीसी को एक एसएमएस कर दें, तो फटाक एक्शन। छेड़खानी हो जाए, तो निलंबन तय मानिये। सवाल योग्यता का है। माटी पुत्र ही सही, क्वालिटी तो होनी चाहिए।

चंेज

छत्तीसगढ़ के डीजीपी का चेम्बर देश में संभवतः अकेला होगा, जहां रिटायर एवं दिवंगत डीजीपी की बड़ी-बड़ी फोटुओं की लाइन लग गईं थीं। मोहन शुक्ला से लेकर अनिल नवानी तक। परंपरा बन गई थी, जो भी डीजीपी की कुसी पर आसीन होता, सबसे पहले फोटुओं की लाइन में अपनी एक फोटू टांग देता था। स्थिति यह हो गई थी, एक तरफ का पूरा दीवार भर गया था। शुक्र है, रामनिवास फोटू के मोह में नहीं पड़े। बल्कि, भूतपूर्व, अभूतपूर्व सबकी फोटुओं को निकलवा दिया। उन्होंने कार केट भी नहीं लिया है। उनकी सिंगल गाड़ी चलती है। विश्वरंजन के समय से पायलेटिंग और फालोगार्ड वाहन की व्यवस्था चालू हुई थी। डीजीपी अगर राजधानी से बाहर जाएं, तो समझ में आता है, लोकल में प्याव-प्याव का क्या मतलब। चलिये, रामनिवास ने आफिस और कार केट में तो चेंज कर लिया है, अब उम्मीद करनी चाहिए, पोलिसिंग भी कुछ चेंज आए। 

गर्व

न्यू रायपुर की समस्याओं को लेकर भले ही उंगलियां उठाई जा रही हो, मगर सरकार को संतोष होगा कि उसके डिजाइन को देश में सराहना हो रही है। याद होगा, राज्योत्सव के मौके पर गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी ने नए मंत्रालय और न्यू रायपुर की ड्राइंग की खूब प्रशंसा की थी और उन्होंने कहा था कि इसे देखने के लिए गुजरात से अफसरों की टीम भेजेंगे। चुनाव के व्यस्त समय में भी वे इसे भूले नहीं। उनके प्रींसिपल सिकरेट्री यहां के अफसरों के संपर्क में रहे। और बुधवार को आधा दर्जन से अधिक अफसरों और आर्किटेक्ट की टीम न्यू रायपुर पहंुची और तीन दिन यहां रुककर बारिकी से एक-एक चीज को देखा। मोदी का नया सचिवालय अप्रैल तक तैयार हो जाएगा। अफसरों ने बताया, मंत्रालय के डिजाइन को मोदी के आफिस के कुछ हिस्सों में इस्तेमाल किया जाएगा।

कठिनाई

नौकरशाह से मुख्य सूचना आयुक्त बनें सरजियस मिंज की कठिनाई बढ़ सकती है। उनके खिलाफ मिली दो दर्जन से अधिक शिकायतों को राजभवन ने जांच के लिए सामान्य प्रशासन विभाग को भेज दिया है। जीएडी अब शिकायतकर्ताओं को प़त्र भेजकर शिकायत के सिलसिले में विस्तृत जानकारी मांग रहा है। मिंज के खिलाफ ताजा शिकायत हुई है, उनसे 14 लाख रुपए रिकवरी करने की। आरटीआई एसोसियेशन ने बकायदा साक्ष्य के साथ राज्यपाल से शिकायत की है कि फलां-फलां मामलों में मुख्य सूचना आयुक्त ने 25 हजार की जगह हजार-डेढ़ हजार रुपए जुर्माना लगाकर केस खतम कर दिया। और, इससे खजाने को 14 लाख से अधिक का नुकसान हुआ है। 

अंत में दो सवाल आपसे
1. रमन सरकार के किस मंत्री के दिल्ली के एक मंदिर में शादी की चर्चा है?
2. चरणदास महंत केंद्रीय मंत्री बन गए है, ऐसा न कांग्रेस को लग रहा और न जनता को, ऐसा क्यों?

रविवार, 23 दिसंबर 2012

तरकश, 23 दिसंबर

ब्रम्हास्त्र

खाददान्न सुरक्षा विधेयक कानून बनाकर डा0 रमन सिंह ने एक तरह से कहें, तो ब्रम्हास्त्र चला ही दिया। 32 लाख से बढ़कर अब 42 लाख बीपीएल और अतिगरीब इसके दायरे में आ गए हैं। उन्हें अब सस्ते चावल के साथ ही मुफत में नमक, 10 रुपए में दाल और आदिवासी इलाके में पांच रुपए में चना मिलेगा। सरकार ने वोट पौकेट बढ़ाने के लिए बड़ी चतुरार्इ से नार्इ, मोची, राजमिस्त्री जैसे सारे असंगठित क्षेत्रों को शामिल कर लिया है। 42 लाख परिवार मुफत का नमक खाएगा, तो उसका भी कुछ फर्ज बनेगा ही। सत्ताधारी पार्टी को और चाहिए क्या। और, एक अहम बात यह भी, रमन सिंह का कद और बढ़ गया। पता नहीं, लोकल मीडिया ने इसे कैसे अंडरस्टीमेेट कर लिया। नेशनल और अंग्रेजी मीडिया में शनिवार को यह खबर सुर्खियो में रही......खाध सुरक्षा कानून बनाकर छत्तीसगढ़ ने बाजी मारी.....केंद्र को भी पीछे छोड़ दिया। केंद्र पिछले पांच साल से इसके लिए कवायद कर रहा है। हालांकि, रमन इसे ब्रम्हास्त्र नहीं मानते। विधानसभा की लाबी में मीडिया ने जब उनसे पूछा कि क्या यही उनका ब्रम्हास्त्र है, उन्होेंने मुस्कराते हुए इंकार में सिर हिला दिया। लेकिन सियासी प्रेक्षकों की मानें, तो इससे बड़ा ब्रम्हास्त्र नहीं हो सकता। सदन में विपक्ष के चेहरे पर इसका असर पढ़ा जा सकता था।

गिव एंड टेक

कांग्रेस में भले ही महाभारत छिड़ा हो, एक-दूसरे पर भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य का आरोप लगाए जा रहे हों, इसके उलट सत्ताधारी पार्टी हंड्रेड परसेंट चुनावी मोड में आ गर्इ है। सरकार के रणनीतिकारों ने चुनाव तक के कार्यक्रमों का ब्लूपिं्रट तैयार कर लिया है। खाध सुरक्षा कानून बनाने के बाद सरकार अगले महीने नौ नए जिले में जिला उत्सव करने जा रही है। बिल्कुल राज्योत्सव की तरह। 10 जनवरी से इसका आगाज होगा। इसमें रमन का रोड शो होगा और लोगों को बताया जाएगा कि सरकार ने किस तरह आम लोगों का खयाल करके प्रशासन को उनके नजदीक पहुंचाया। इसके निहितार्थ यही हैं, नौ महीने बाद, बटन दबाते समय इसे याद रखना। राजनीति में गिव एंड टेक ही तो चलता है।   

मंत्रालय का बाबू


बाबू और उस पर मंत्रालय का, अच्छे-अच्छे लोग घबराते हैं। अगर इसमें कोर्इ  शक हो तो आप सीआर्इडी के आर्इजी पीएन तिवारी से कंफार्म कर लीजिए। मंत्रालय के गृह विभाग के बाबू ने अंड-बंड नोट लिखकर उनकी फाइल ही अटका दी। तिवारीजी का इसी महीने रिटायरमेंट है और संविदा नियुकित के लिए फाइल चल रही है। बाबू ने नोटिंग कर दी, आर्इजी सीआर्इडी कैडर पोस्ट है, इसलिए इस पर संविदा नियुकित नहीं दी जा सकती। फाइल देखकर पुलिस अफसर सन्न रह गए। वास्तविकता यह है कि आर्इजी सीआर्इडी, कैडर पोस्ट नहीं है। मगर बाबू को फाइल लटकानी थी, सो होशियारी दिखा दी। अब नोटशीट फिर से लिखी जा रही है। मगर इसमें टार्इम लग जाएगा। और पुलिस महकमे की दिक्कत यह है कि आर्इजी का टोटा है। अब बड़ा सवाल है, पंडितजी की फाइल किलयर नहीं हुर्इ, तो 31 दिसंबर के बाद सीआर्इडी कौन देखेगा। 


चुनावी टीम


विधानसभा सत्र खतम होने के साथ ही आर्इएएस, आर्इपीएस की एक बड़ी लिस्ट निकालने की तैयारी शुरू हो गर्इ है। सीएम के करीबी सूत्रों की मानें, तो आधा दर्जन से अधिक जिले के एसपी इसके लपेटे में आएंगे। कर्नाटक कैडर से डेपुटेशन पर छत्तीसगढ़ आइर्ं सोनल मिश्रा को रायपुर में मौका मिल सकता है। उनके आर्इएएस पति संतोष मिश्रा रायपुर में ही पर्यटन मंडल के एमडी हैं। वहीं, रायपुर के एसएसपी दिपांशु काबरा अब पीएचक्यू में फुलफलैश एसआर्इबी संभालेंगे। इसी तरह रायगढ़ के एसपी आनंद छाबड़ा जनवरी में डीआर्इजी बन रहे हैं। उन्हें पुलिस मुख्यालय में लाने की खबर है। कांकेर के एसपी राहुल भगत और नारायणपुर के मयंक श्रीवास्तव में से कोर्इ एक रायगढ़ जाएगा। एसपी बनने वालों में अंकित गर्ग, अजय यादव और शेख आरिफ का भी नाम शामिल है। यादव रायगढ़ जा सकते थे मगर बिलासपुर के एसपी रहते उन्होेंने दिलीप सिंह जूदेव को नाराज कर दिया था। सो, जशपुर के पड़ोस में उन्हें भेजना मुनासिब नहीं समझा जा रहा। अक्टूबर तक जिनका तीन साल पूरा हो जाएगा, उनका हटना या जिला चेंज होना, तो एकदम तय है। लिस्ट जल्द ही निकलेगी। एक बार याद होगा, 31 दिसंबर को निकल गर्इ थी। इसी तरह सरकार चौंका सकती है। बस, कलेक्टर और एसपी की लिस्ट में एकाध दिन का अंतर रहेगा। 


देर आए.....


न्यू रायपुर की चमचमाती सड़कों को देखकर हर आदमी के मन में यह सवाल कौंधता था कि राज्य की सड़कें ऐसी क्यों नहीं बनार्इ जा सकती। चीफ सिकरेट्री सुनील कुमार भी कर्इ मीटिंग में इस बात को उठा चुके हैं। और सीएम ने भी इसको लेकर झिड़का था। चलिये, देर आए, दुरुस्त आए....पीडब्लूडी ने विधानसभा रोड को माडल रोड के रूप में पेश किया है। बिल्कुल न्यू रायपुर के टक्कर का। बलिक उससे अधिक झम-झाएं। और प्लान है, बरसात के पहले शहरों की सड़कों को चकाचक कर दिया जाए, लंबी दूरी की सड़कों का पेच वर्क भी। बिलासपुर रोड का काम पहले से ही तेजी से चल रहा है। रायपुर और बिलासपुर, दोनों छोर पर 20-20 किलोमीटर फोर लेन होगा। प्लान रोमांचित करने वाला है। मगर साकार हो पाएगा, यह वक्त बताएगा। 


धक्का



शत्रुंजय की आकसिमक मौत ने भाजपा के मास लीडर दिलीप सिंह जूदेव को हिला दिया है। शत्रुंजय को उन्हाेंने न केवल अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, बलिक यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है कि बिलासपुर से उन्हें अगला लोकसभा चुनाव में उतारने की भी तैयारी कर रहे थे। शत्रुंजय के लिए बिलासपुर अनजान नहीं था। चुनाव के समय वे साये की तरह अपने पिता के साथ रहे, अलबत्ता, उनके सारथी भी रहे। उनकी प्रचार अभियान वाली सफारी गाड़ी को डेढ़ महीने तक शत्रुंजय ने ही ड्राइव किया था।
अंत में दो सवाल आपसे
1.    बालको मामले में विपक्ष से सवाल पूछवाने को लेकर किस आर्इएएस अफसर की भूमिका कटघरे में है?
2.    क्या अनिल नवानी को इसलिए पुलिस हाउसिंग बोर्ड में पुनर्वास नहीं दिया गया, क्योंकि मार्च में रिटायरमेंट के बाद डीजी होमगार्ड संतकुमार पासवान को वहां बिठाया जाएगा?

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

तरकश, 16 दिसंबर


जय हो

गर इरादे नेक हो और कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश हो, तो सिस्टम को ठीक किया जा सकता है। भिलाई के आरटीआई कार्यकर्ता इंदरचंद सोनी ने युवा आईएएस और दुर्ग जिला पंचायत के सीईओ सेनापति को गाड़ी से बत्ती निकालने पर बाध्य कर दिया। इंदर ने लिखा-पढ़ी करके सितंबर में उनकी पीली बत्ती उतरवाई थी। मगर अन्य आईएएस-आईपीएस की तरह बत्ती सिंड्रोम के शिकार सेनापति ने इसके बाद एडीएम, एसडीएम के लिए निर्धारित लाल-नीली बत्ती लगा ली। सोनी ने फिर कलेक्टर से शिकायत की। बात नहीं बनी तो उन्होंने सोमवार को जनदर्शन में जाकर कलेक्टर को चेतावनी दे आई, आप बत्ती उतरवा दें वरना, मैं उसे पत्थर मारकर फोड़ दूंगा। भले ही इसके बाद मुझे जेल जाना पड़े, परवाह नहीं। कलेक्टर चमक गए। खामोख्वाह लफड़ा होगा। मंगलवार को उन्होंने सेनापति को निर्देश दिया और गुरूवार को उन्होंने बत्ती निकाल दी। इंदर ने अवैध बत्तीधारियों के खिलाफ अरसे से अभियान छेड़ा हुआ है। इससे पहले भी भिलाई, दुर्ग के अफसरों की गाड़ी से बत्ती निकलवा चुके हैं। काश, रायपुर में भी कोई इंदर सोनी होते। मंत्रालय से लेकर पीएचक्यू तक के अपात्र अफसर बेशर्मी के साथ पीली बत्ती लगाकर घूम रहे हैं। पीएचक्यू में तो एआईजी तक। जबकि, एडीजी को भी पीली बत्ती लगाने की पात्रता नहीं है। सिवाय रेंज आईजी के। मंत्रालय के सिकरेट्री को कौन कहें, विभागों के डायरेक्टर तक बत्ती का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। इंडस्ट्री डायरेक्टर की भी गाड़ी में आप बड़ी-सी पीली बत्ती पाएंगे। ऐसे में इंदर की याद कैसे नहीं आएगी।

डीएम-एसपी

आईजी की लिस्ट निकलने के बाद अब कलेक्टर और एसपी के नम्बर हैं। इनमें पहला नम्बर तो उन अफसरों का लगेगा, जिनका अगले साल नवंबर में तीन साल या उससे अधिक हो जाएगा। आखिर, चुनाव आयोग उन्हें हटा ही देगा, सो, खुद ही उन्हें ठीक जगहों पर शिफ्थ करने की तैयारी की जा रही है। इसके बाद आएगा, पारफारमेंस का नम्बर। इसके लपेटे में तो दर्जन भर कलेक्टर और लगभग इतने ही एसपी आ रहे हैं। सरकार के पास ऐसी रिपोर्ट है, जिसमें 27 में से 15 जिलों में सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और पोलिसिंग की स्थिति बेहद खराब है। प्रशासन की छबि बदलने के लिए उन्हें हटाना अनिवार्य हो गया है। जिलों में कहें तो रायपुर, रायगढ़, राजनांदगांव और कवर्धा और कुछ हद तक दंतेवाड़ा की स्थिति कुछ ठीक है। बाकी के भगवान ही मालिक हैं। ब्र्रजेश मिश्र दुर्ग जैसे जिले के कलेक्टर कैसे बन गए, लोग आज तक नहीं समझ पाए हैं। और तीसरा, जिन कलेक्टर और एसपी के विभिन्न जिलों में लगातार पांच साल हो गए हैं, फेरबदल में उनका भी नम्बर लग सकता है। ऐसे में अधिकांश कलेक्टरों और एसपी का ज्यादा समय अपने आकाओं को खुशामद करने में जा रहा है। ताकि, कोई ठीक-ठाक जिला मिल जाए।    

नहले पे....

छत्तीसगढ़ में पंचायत मंत्री चुनाव नहीं जीतते......कांग्रेस सरकार में अमितेष शुक्ल को चुनाव हारना पड़ा, तो रमन सिंह की पहली पारी में पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर को करारी शिकस्त मिली। 12 दिसंबर को शीतकालीन सत्र में पंचायत के तहत आने वाले शिक्षाकर्मियों के सवाल पर कांग्रेस के धर्मजीत सिंह ने पंचायत मंत्री हेमचंद यादव को निशाने पर लेते हुए कहा कि उन्हें ऐसा काम नहीं करना चाहिए कि पंचायत मंत्री के हारने की एक परंपरा बन जाए। इस पर पंचायत मंत्री कहां चूकने वाले थे। उन्होंने तपाक से कहा, नेता प्रतिपक्ष भी चुनाव नहीं जीतते। और आप ऐसा कहकर अपने नेता को क्यों डरा रहे हैं। जाहिर है, राज्य में जो भी नेता प्रतिपक्ष बना है, वह अपनी सीट नहीं बचा पाया है। भाजपा के नंदकुमार साय से लेकर कांग्रेस के महेंद्र कर्मा तक।

जोगी स्टाइल

विधानसभा में, मंत्रियों में अरबन एंड हेल्थ मिनिस्टर अमर अग्रवाल का पारफारमेंस बढि़यां रहता है। सबसे उम्दा भी कह सकते हैं। उनकी हाजिरजवाबी को विपक्ष भी मानता है। बुधवार को जब उन्होंने अजीत जोगी को उन्हीं के स्टाईल में पलटवार किया, तो सदन ठहाकों से गूंज गया। हुआ ऐसा, स्वास्थ्य विभाग के प्रश्न के दिन जोगीजी ने केंद्र की राशि से चल रही योजनाओं में राज्य के नेताओं की फोटो का मामला उठाया था। इस पर जरा अमर का जवाब सुनिये, अध्यक्ष महोदय, जब हमलोग विपक्ष में थे और जोगीजी हमारी ओर, उस समय के, उनके भाषण का एक अंश सुनाता हूं......एजेंसी हमारी तो फोटो किसकी छपेगी.....? अंदाज हू-ब-हू जोगीजी का, कांपते हुए....दांत पिसकर और दोनों हाथ से छाती ठोकते हुए। इस पर जोगीजी भी अपनी हंसी नहीं रोक पाए। बाहर निकलने पर, लाबी में पक्ष-विपक्ष के विधायक जोगी स्टाईल के लिए अमर को बधाई देते नजर आए। 

प्रथम एसपी

बिलासपुर के एसपी रतनलाल डांगी देश के संभवतः पहले एसपी होंगे, जिन्हें शहर में रहना नहीं भाता। उन्होंने जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर दूर कोनी ग्राम पंचायत के आमतौर पर सूनसान रहने वाले इलाके में अपना ठिकाना बनाया है। जाहिर है, एसपी का बंगला अपने-आप में कंट्रोल रुम से कम नहीं होता, और उस इलाके के दो-तीन किलोमीटर के सराउंडिंग के लोग अपने को सुरक्षित समझते हैं। अब, एसपी ही शहर से बाहर रहेगा, तो पोलिसिंग का अंदाजा आप लगा सकते हैं। लेकिन कप्तान को बोले कौन। आईजी अशोक जूनेजा ने उनको इशारा किया था। नए आईजी राजेश मिश्रा को पता चला तो वे भी आवाक रह गए। अब, ऐसे में लोगबाग चुटकी क्यों न लें। कह रहे हैं.....डांगी साब, लंबे समय तक कोरबा में एसपी रहे हैं और अब कोरबा नही ंतो कोरबा रोड ही सही। मगर इससे पोलिसिंग का तो बाजा बज रहा है। न्यायधानी, अपराधधानी में तब्दील होती जा रही है। 

अंत में दो सवाल आपसे

1. शिक्षाकर्मियों की भरती में क्या समान काम, समान वेतन के साथ संविलयन की शर्त थी और कांग्रेस अगर सत्ता में आएगी तो क्या इन मांगों को पूरा कर देगी?
2. प्रदेश के किस आईजी द्वारा नोट गिनने वाली मशीन लेने की चर्चा है?