रविवार, 15 जनवरी 2023

एसपी का रिपोर्ट कार्ड

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 15 जनवरी 2023

एसपी का रिपोर्ट कार्ड

भानुप्रतापपुर बाइ इलेक्शन के पहले से एसपी की लिस्ट निकलने की चर्चा चल रही है। अब चुनाव हो गया और विधानसभा सत्र समाप्त हुए भी 10 दिन निकल गए। अटकलों का दौर फिर चल पड़ा है...कप्तान साब लोगों की धड़कनें बढ़ी हुई है। फिर भी, कोई क्लियरिटी नहीं है कि लिस्ट कब निकलेगी। मगर ये जरूर है कि इस बार बड़े-बड़े विकेट चटकेंगे। कई बड़े जिलों के एसपी को इस बार सरकार उनकी कप्तानी वापिस लेगी। तो रिजल्ट देने वाले कुछ अच्छे कप्तानों को और बड़े जिलों में उतारेगी। पता चला है, डीजीपी अशोक जुनेजा और नए खुफिया चीफ अजय यादव इससे पहले सभी पुलिस अधीक्षकों के पारफारमेंस का एक डेटा तैयार करवा रहे हैं। इसमें इंटेलिजेंस से भी इनपुट्स लिए जा रहे हैं। इससे परखा जाएगा कि कौन कप्तान मैदान में रहने लायक है और कौन विश्राम देने लायक। परफारमेंस का आंकलन करने में लगता है, 26 जनवरी निकल जाएगा। याने जनवरी लास्ट या फरवरी फर्स्ट वीक तक लिस्ट की उम्मीदें की जा सकती है। तब तक एसपी साब लोग नाहक परेशां न हों।

पुलिस या...?

यूं तो पुलिस पर अपराधियों को संरक्षण देने के आरोप लगते हैं...मगर राजधानी से सटे एक ऐसा जिला है, जहां पुलिस की भूमिका क्या होती है, यहां लिखना मुनासिब नहीं होगा। और ये आज से नहीं, राज्य बनने के पहले से चल रहा है। कबिलाइ्र्र पोलिसिंग। दरअसल, ये ऐसा जिला है, जहां सूबे के अधिकांश आईपीएस अधिकारी एसपी या आईजी के तौर पर पोस्टेड रह चुके हैं। और, सबके दो-चार मुंहलगे सिपाही हैं। इसके अलावा बीजेपी के कई बड़े नेता हैं तो कांग्रेस तो सत्ताधारी पार्टी ही है। थानों के 100 से अधिक पुलिस वालों का सुबह का पहला काम होता है कांग्रेस और भाजपा नेताओं के घर जाकर उनका पैर छू आना और आईपीएस अफसरों को सैल्यूट मार पूछ लेना...साब कोई आदेश। ऐसे सिपाहियों का कौन है, जो बाल बांका कर ले। इसकी आड़ में फिर पुलिस वाले अपना खेला करते हैं। कई सिपाही अपने थानेदार और इलाके के सीएसपी की नही सुनते। ऐसे में भला क्या कर लेगा एसपी।

रेरा का पेड़ा-1

रेरा याने रियल इस्टेट रेगुलरटी अथॉरिटी के फर्स्ट चेयरमैन विवेक ढांड रिटायमेंट के दो दिन पहले रिटायर हो गए। असल में, 15 जनवरी को उनका पांच साल पूरा होता मगर इस दिन रविवार है और उससे पहले शनिवार। दोनों दिन अवकाश। लिहाजा, 13 जनवरी को उनकी विदाई हो गई। ढांड के जाने के साथ ही ब्यूरोक्रेसी के गलियारों में ये चर्चाएं शुरू हो गई कि रेरा का अगला चेयरमैन कौन होगा। इसमें पहला नाम पीसीसीएफ संजय शुक्ला का लिया जा रहा है। उनका पलड़ा भारी होने की एक बड़ी वजह यह है कि वे हाउसिंग सेक्टर में काम कर चुके हैं। छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड कमिश्नर के साथ ही लंबे समय तक आवास और पर्यावरण विभाग के सिकरेट्री रहे। यद्यपि उनके रिटायरमेंट में अभी चार महीने बाकी है। मई तक उनका कार्यकाल है। मगर तब तक खाली भी रखा जा सकता है। इससे पहले विवेक ढांड के लिए मुख्य सूचना आयुक्त का पद डेढ़ साल से अधिक समय तक खाली रखा गया। ये अलग बात है कि बाद में वे रेरा के चेयरमैन बन गए। वैसे, संजय के अलावा और किसी बड़े अफसर का रिटायरमेंट भी नहीं हो रहा। सो, ब्यूरोक्रेसी से कोई ऐसा नाम नहीं दिख रहा, जिसे रेरा चेयरमैन की कमान सौंपी जा सकें।

रेरा का पेड़ा-2

रेरा चेयरमैन का पद हाईकोर्ट के जस्टिस के बराबर है। हालांकि, ये रेरा के एक्ट में नहीं है। मगर पिछली सरकार ने चेयरमैन की पोस्टिंग से पहले इस पद को हाईकोर्ट के सीटिंग जज के समतुल्य कर दिया था। रेरा का ट्रिब्यूनल जब तक आब्जेक्शन नहीं करें तब तक यह व्यवस्था चलती रहेगी। ट्रिब्यूनल के चेयरमैन हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस हैं। ऐसे में, सीटिंग जज के बराबर आदमी रेरा का चेयरमैन कैसे होगा? खैर ये तकनीकी विषय है। लोगों की दिलचस्पी इसमें है कि सलेक्शन कमेटी किस नाम पर मुहर लगाती है। सलेक्शन कमेटी में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस या उनका कोई नामिनी जस्टिस अध्यक्ष होते हैं और चीफ सिकरेट्री तथा एक सीनियर सिकरेट्री मेम्बर। हालांकि, होता वही है, जिसे सरकार चाहती है। सरकार जिसे चाहेगी, उसे ही रेरा का पेड़ा मिलेगा।

राहत

रेरा चेयरमैन विवेक ढांड के रिटायरमेंट से रेरा ट्रिब्यूनल के मेम्बर धनंजय देवांगन का कांफर्टनेस लेवल बढ़ा होगा। वो ऐसे कि विवेक ढांड तेज आईएएस रहे हैं। पौने चार साल तक चीफ सिकरेट्री। जब वे सीएस थे, तब धनंजय सिकरेट्री भी प्रमोट नहीं हो पाए थे। सरकार ने पिछले महीने धनंजय को रेरा ट्रिब्यूनल का सदस्य नियुक्त कर दिया। इस पर ब्यूरोक्रेसी में चुटकी ली जा रही थी...ढांड साब के फैसले के खिलाफ अपील की धनंजय सुनवाई करेंगे। भले ही ये मजाक था मगर धनंजय के लिए ये सुनना थोड़ा मुश्किल तो होता होगा। जाहिर है, पुराने बॉस का खौफ जल्दी जाता कहां है।

सीएस का दस्तखत क्यों नहीं?

छत्तीसगढ़ देश का पहला स्टेट होगा, जहां आईएएस अधिकारियों का ट्रांसफर आदेश चीफ सिकरेट्री के दस्तखत से नहीं, जीएडी सिकरेट्री के दस्तखत से निकलता है। बाकी सभी राज्यों में आईएएस से संबंधित कोई भी आदेश चीफ सिकरेट्री के साइन से निकलता है। यहां भी अजय सिंह तक यही परिपाटी रही। उनके बाद पता नहीं कैसे मामला बदल गया। अब चीफ सिकरेट्री नोटशीट पर हस्ताक्षर करते हैं। उसके बाद आदेश निकालने के लिए फाइल जीएडी में भेज दी जाती है। हालांकि, वैधानिक और तकनीकी तौर पर इसमें कुछ गलत नहीं है। मगर मर्यादा और प्रोटोकॉल की दृष्टि से ठीक नहीं है। अब एसीएस और प्रिंसिपल सिकरेट्री का ट्रांसफर या सरकार उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करें तो उसका आदेश जीएडी सिकरेट्री निकाले तो ये प्रोटोकॉल के हिसाब से ठीक नहीं है। एक सीनियर अफसर को लूप लाईन में भेजा गया था, तो उसका यह दर्द छलक आया था। दरअसल, नोटषीट में आप राष्ट्रपति से साइन करवा कर रख लीजिए, उसे कौन देखता है। मार्केट में तो आदेश की कॉपी मूव होती है।

जनसंपर्क की उम्मीदें

राज्य सरकार ने दिन-रात एक कर बजट तैयार करने वाले वित्त विभाग के अधिकारियों, कर्मचारियों को एक महीने का वेतन दिया है। इससे जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों, कर्मचारियों की भी उम्मीदें बढ़ गई है। सरकार की छबि बनाने वाला जनसंपर्क ऐसा विभाग है, जो होली हो या दिवाली, शैटर्डे हो या संडे, गणतंत्र दिवस हो या स्वतंत्रता दिवस...पूरा देश जश्न मनाता रहता है...जनसंपर्क अधिकारी ड्यूटी बजा रहे होते हैं। कोविड में कंप्लीट लॉकडाउन था। तब भी जनसंपर्क अधिकारी मुस्तैदी से अपने काम में लगे हुए थे। दूसरी लहर में अपना कर्तव्य निभाते हुए एक अधिकारी और एक कर्मचारी कोविड के शिकार होकर जान गंवा बैठे। बावजूद इसके जनसंपर्क अधिकारियों का हौसला नहीं डिगा। ऐसे में, उनकी उम्मीदों को जायज कहा जा सकता।

उदार मंत्री

एक प्लॉट की तीन रजिस्ट्री करने वाले रायपुर के डिप्टी रजिस्ट्रार को निलंबित करने के डेढ़ महीने के भीतर ही उन्हें बहाल कर धमतरी जिले की जिम्मेदारी सौंप दी गई। पता चला है, इसके लिए मंत्री जय सिंह अग्रवाल की सहमति भी नहीं ली गई। जबकि, क्लास टू के अफसर का रिस्टेट बिना मंत्री के एप्रूवल के नहीं होना चाहिए। विभाग के लोग मानते हैं, मंत्रीजी का पूरा फोकस अपने गृह जिले पर होता है...वहां के लिए बेहद संजीदा माने जाते हैं। इससे उलट बाकी जगहों के लिए बेहद उदार। वरना, दूसरा मंत्री इसे कहां बर्दाश्त करेगा।

तीन केंद्रीय मंत्री?

केंद्रीय मंत्री के लिए वैसे नाम तो कई चल रहे हैं मगर जातीय समीकरणों की दृष्टि से गुहाराम अजगले का पलड़ा भारी दिख रहा है। दरअसल, बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि आदिवासी वर्ग से रेणुका सिंह केंद्र में पहले से मंत्री हैं। ओबीसी में कुर्मी और साहू सबसे प्रभावशाली हैं और इन दोनों से अरुण साव अध्यक्ष और नारायण चंदेल नेता प्रतिपक्ष हैं। झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस भी इसी वर्ग से हैं। दलित वर्ग से जरूर प्रतिनिघित्व नहीं है। पुन्नूराम मोहले के भरोसे पार्टी आखिर कब तक रहेगी। सो, इसके लिए गुहाराम अजगले का नाम आगे बढ़ाया गया है। इससे बीजेपी को सियासी लाभ दिखाई दे रहा है। हालांकि, सीएम भूपेश बघेल ने ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करके सियासी बढ़त ले ली है। इसको देखते बीजेपी इस पर भी विचार कर रही है कि क्यों न दो मंत्री बना दिया जाए। एक अनुसूचित जाति से और दूसरा ओबीसी से। पहले भी अटल जी की सरकार के समय केंद्र में तीन राज्य मंत्री रहे हैं। डॉ0 रमन सिंह, रमेश बैस और दिलीप सिंह जूदेव। भाजपा को इसका लाभ भी मिला था। ऐसे में, गुहराम का नाम लगभग फायनल बताया जा रहा है, उनके साथ ओबीसी से विजय बघेल का नाम जुड़ जाए, तो आश्चर्य नहीं।

वीसी शुक्ला लास्ट मिनिस्टर

छत्तीसगढ़ बनने के बाद केंद्र में बीजेपी की सरकार हो या कांग्रेस की, राज्य को कभी कैबिनेट मंत्री नही मिला। मनमोहन सिंह सरकार की दूसरी पारी में चरणदास महंत को मंत्री बनाया गया। और बीजेपी में अटल बिहारी सरकार हो या फिर नरेंद्र मोदी की, छत्तीसगढ़ को राज्यमंत्री से ही संतोष करना पड़ा। और राज्य मंत्री को कितना पावर रहता है, इससे आप समझ सकते हैं कि इनमें से कोई मंत्री अपना एक काम नहीं बता सकता। याने सिर्फ काउंटिंग के लिए। रेणुका सिंह अभी केंद्रीय राज्य मंत्री हैं, अचानक किसी से पूछ दिया जाए, तो आदमी हड़बड़ा जाएगा। केंद्र में या तो कैबिनेट हो या स्वतंत्र प्रभार, तभी जलवा-जलाल होगा। छत्तीसगढ़ से आखिरी कैबिनेट मंत्री मध्यप्रदेश के समय वीसी शुक्ला रहे। नरसिम्हाराव ने उन्हें जल संसाधन जैसा मंत्रालय दिया था।

अंत में दो सवाल आपसे

1. मंत्रियों के कार्यक्र्रम में कांग्रेस नेताओं को सम्मानपूर्वक बुलाने के लिए पत्र जारी हुआ है...तो सवाल उठते हैं...मंत्री अपने विस क्षेत्रों के अलावा किसी और जिले का दौरा कर रहे हैं क्या?

2. ऐसा क्यों कहा जा रहा कि बसपा की विधानसभा सीटें इस बार बढ़ सकती हैं?


शनिवार, 7 जनवरी 2023

छत्तीसगढ़ में आईपीएस आगे, आईएएस पीछे

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 8 जनवरी 2023

आईपीएस आगे, आईएएस पीछे

2008 के बाद यह पहला मौका होगा, जब प्रमोशन के मामले में आइ्र्रपीएस अधिकारी आईएएस से आगे निकल गए हैं। 2008 में रमन सरकार ने 31 दिसंबर की रात आईपीएस अधिकारियों को प्रमोशन देने के साथ ही नई पोस्टिंग आदेश निकाल दिया था। चूकि तब सोशल मीडिया का दौर नहीं था लिहाजा अफसरों को अगले दिन अखबारों से प्रमोशन और ट्रांसफर की जानकारी मिली। उसके बाद आईपीएस के प्रमोशन लगातार लेट होते गया। 2021 में तो कुछ ज्यादा ही हो गया....नवंबर में जाकर उनका प्रमोशन हो पाया था। सुंदरराज, रतन डांगी और ओपी पाल तब आईजी बने थे। पिछले साल भी डीपीसी फरवरी में हो गई थी मगर आदेश अप्रैल लास्ट में निकल पाया। इसमें दीपांशु काबरा एडीजी बने थे और 2004 बैच आईजी बना था। आश्चर्यजनक ढंग से इस बार सब तड़-फड़ हुआ। 2 जनवरी को डीपीसी हुई और पांच जनवरी को प्रमोशन का आदेश निकल गया। 98 बैच के आईपीएस अमित कुमार का एडीजी प्रमोशन और पहले हो गया था...दिसंबर में ही। अमित सीबीआई में ज्वाइंट डायरेक्टर हैं। आईएएस इस बार जरूर पिछड़ गए। 2007 बैच को सिकरेट्री बनना है। डीओपीटी से क्लियरेंस नहीं मिलने की वजह से उनका मामला लटका हुआ है। जीएडी के अधिकारी उसी का वेट कर रहे हैं। हालांकि, वहां से अनुमति आने के बाद किसी भी दिन डीपीसी के बाद आदेश निकल सकता है। फिर भी आईपीएस से पीछे होने का मलाल तो मन में होगा ही। दरअसल, कई बार आईएएस को टाईम से पहले प्रमोशन मिल जाता था। 87 बैच के सीके खेतान, आरपी मंडल और वीबीआर सुब्रमणियम ड्यू डेट से छह महीने पहले प्रमोशन पाकर प्रमुख सचिव बन गए थे। इस सरकार में भी सुब्रत साहू को ड्यू डेट से एक साल पहले एसीएस का प्रमोशन मिल गया था।

आईपीएस की कोई बॉडी नहीं

प्रमोशन के मामले में आईपीएस अबकी भले ही बाजी मार ले गए हो मगर कैडर की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। आपसी खींचतान में कैडर का बड़ा नुकसान हो रहा है। कई साल से आईपीएस का कांक्लेव नहीं हुआ है। आईएफएस वाले कंक्लेव कराके सीएम को बुला लेते हैं। आईएएस एसोसियेशन फिर इस महीने 13 और 14 जनवरी को कंक्लेव कराने जा रहा है। और, आईपीएस की स्थिति यह है कि उसकी बॉडी तक नहीं बन पाई है। आरके विज के बाद अशोक जुनेजा प्रेसिडेंट बने थे। लेकिन, वे 2021 में डीजीपी बन गए। उसके बाद से आईपीएस एसोसियेशन अपना प्रेसिडेंट चुन नहीं पाया है। एडीजी प्रदीप गुप्ता को प्रेसिडेंट बनाने की तैयारी भी हो गई थी मगर किसी बात को लेकर मामला अटक गया।

आईएफएस से आईएफएस का काम-1

विधानसभा सत्र के आखिरी दिन मुख्यमंत्री और मंत्रियों ने सदन में मिलेट लंच किया। रागी के पकोड़े, कोदो का वेज पुलाव, बाजरे की रोटी और रागी का हलवा खाकर सीएम से लेकर सभी मंत्री वाह-वाह कर उठे। मिलेट लंच का पूरा क्रेडिट पीसीसीएफ संजय शुक्ला को मिला। दरअसल, ये उन्हीं का आइडिया था और आयोजन भी उन्होंने ही कराया था। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में विपक्ष के नेताओं के साथ मिलेट लंच किया था। सीएम भूपेश बघेल जब पीएम मोदी से दिल्ली में मिले तो मिलेट पर भी बात हुई। प्रधानमंत्री को सीएम भूपेश बघेल से पता चला कि छत्तीसगढ़ में मिलेट पर काफी काम हो रहा है तो उन्होंने कहा, आप रायपुर में मिलेट कैफे चालू करवाइये...मैं देखने के लिए रायपुर आउंगा। इसी से संजय शुक्ला को आइडिया सूझा और विधानसभा में वीवीआईपीज को मिलेट लंच करवा दिया। लजीज लंच लेने के बाद सीएम ने सबके सामने संजय शुक्ला की जमकर तारीफ की...और पिछली सरकार पर तंज भी...हम आईएफएस से आईएफएस का काम करवा रहे हैं...इसलिए अब फॉरेस्ट का काम अच्छा हो रहा है।

आईएफएस से आईएफएस का काम-2

दरअसल, मध्यप्रदेश के समय दिग्विजय सिंह ने आईएफएस अधिकारियों को जिला पंचायतों के सीईओ के साथ ही अन्य विभागों में पोस्टिंग देनी शुरू की थी। बाद में ये छत्तीसगढ़ में भी शुरू हो गया। बीजेपी सरकार में एक समय ऐसा भी था, जब दो दर्जन से अधिक आईएफएस वन विभाग छोड़कर सरकार के दूसरे विभागों में अहम पद संभाल रहे थे। मगर अब इनकी संख्या धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। हाल ही में रिजल्ट देने वाले अधिकारी अनिल राय को लघु वनोपज संघ में एडिशनल एमडी बनाया गया है। अनिल राय लंबे समय से वन विभाग से बाहर थे। उनकी सेवाएं अब वन विभाग को लौटा दी गई है। बहरहाल, अब चार-पांच आईएफएस अधिकारी ही बचे हैं, जो काफी समय से वन विभाग से बाहर हैं। इनमें पहला नाम आलोक कटियार का है। वे रमन सरकार के समय क्रेडा के सीईओ बनें और आज भी इसे संभाल रहे हैं। हाल ही में उन्हें 25 हजार करोड़ के बजट वाले जल जीवन मिशन का दायित्व सौंपा गया है। दूसरे हैं अनिल साहू। अनिल पिछले दस साल से लगभग वन विभाग से बाहर ही हैं। पिछली सरकार में वे लंबे समय तक स्पेशल सिकरेट्री हेल्थ रहे। उसके बाद संस्कृति, बीज विकास निगम, मंडी बोर्ड और फिलहाल पर्यटन बोर्ड के एमडी हैं। खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के एमडी अरुण प्रसाद भी पिछली सरकार में पौल्यूशन बोर्ड के मेम्बर सिकरेट्री बने थे, उसके बाद सीएसआईडीसी के एमडी और अभी खादी बोर्ड में हैं।

आईएफएस की लिस्ट

पीसीसीएफ के दो पदों के लिए भारत सरकार से क्लियरेंस मिल गया है। किसी भी दिन इसके लिए डीपीसी हो सकती है। सब कुछ ठीक रहा तो अगले हफ्ते पीसीसीएफ प्रमोशन के साथ पोस्टिंग की एक लिस्ट निकल सकती है। पीसीसीएफ बनने वालों में 89 बैच के तपेश झा का नाम सबसे उपर है, उनके बाद 90 बैच के अनिल राय का नम्बर है। तपेश वाईल्ड लाइफ में काम कर चुके हैं। वे अचानकमार टाईगर रिजर्व के डायरेक्टर रहे हैं...काम भी उनका अच्छा रहा। विभाग में चर्चा है, प्रमोशन के बाद उन्हें वाईल्डलाइफ की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। इसी तरह अनिल राय को सरकार लघु वनोपज संघ की कमान सौंप सकती है। समझा जाता है इसी मकसद से उन्हें संघ में एडिशनल एमडी बनाया गया है। संघ के एमडी का चार्ज अभी पीसीसीएफ संजय शुक्ला के पास है।

जुआ पर कानून मगर...

सरकार ने जुआ पर सख्ती के लिए विधानसभा में बिल पास कर दिया। अब ऑनलाइन जुआ खिलाने पर पांच साल तक सजा हो सकती है। मगर मिलियन डॉलर का प्रश्न यह है कि इस पर अमल कैसे होगा। असल में, सरकार की मंषा अच्छी है...इससे पहले हुक्का बार कानून भी बनाया गया...मगर रिजल्ट? आज भी सूबे के होटलों में बेरोकटोक हुक्का बार चल रहे हैं। उस पर ये भी....जब कई एसपी ही टेंट-तंबू लगवाकर सट्टा और जुआ खेलवा रहे हों तो फिर सरकार का कानून जुआ को कैसे रोक पाएगा। पिछले हफ्ते ही बेमेतरा के किसी गांव से एक युवक का फोन आया, सर...हमारे गांव में जुआ की वजह से चोरियां बढ़ गई है...जुआ खेलने वाले हारने के बाद धान के बोरे तक उठाकर ले जा रहे हैं। कमोवेश यही हालात लगभग सभी जिलों के हैं। सीएम साहब को एसपी साहब लोगों की एक क्लास और लेनी चाहिए। क्योंकि, पुलिस अगर चाह लें तो इलाके में चोरी, चाकूबाजी और मर्डर तो छोड़ दीजिए, पत्ता नहीं खड़क सकता।

डीजीपी की सख्ती

सुनने में आ रहा...अपराधों और अपराधियों को संरक्षण देने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ पुलिस महकमा अब सख्त कदम उठाने वाला है। सरकार की नोटिस में है और डीजीपी के पास इसके इनपुट्स भी हैं कि कई जिलों में कानून-व्यवस्था की स्थिति लड़खडा रही है...इसका असर चुनाव में पड़ सकता है। कहने के लिए बिलासपुर को न्यायधानी कहा जाता है। डीजीपी अशोक जुनेजा वहां एसपी रह चुके हैं और खुफिया चीफ अजय यादव भी। दोनों न्यायधानी की स्थिति से अनभिज्ञ नहीं हैं। सूबे के दूसरे बडे़ इस शहर में पोलिसिंग का आलम यह है कि वहां का हर दूसरा टीआई पोलिसिंग छोड़ जमीन के धंधा में इंवाल्व हो गया है। आए दिन वहां मर्डर हो रहे, गोलियां चल रही हैं....कानून-व्यवस्था शीर्षासन कर रहा है। जानकारी मिली है, सिस्टम इसको लेकर गंभीर है और जल्द ही आपको इसका प्रभाव दिखेगा।

टाईगर अभी...

भले ही बीजेपी के संगठन प्रभारी से लेकर अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष बदल गए मगर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह का रुतबा अभी बरकरार है। अभी भी उनके बगैर पार्टी का कोई कार्यक्रम नहीं होता। कल का दिन तो रमन सिंह के लिए और खास रहा। कोरबा दौरे में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह रमन की तारीफों के पुल बांध दिए। तो कोरबा जाने के लिए रमन ने राज्य सरकार से हेलीकॉप्टर मांगा तो सरकार ने तुरंत उन्हें मुहैया करा दिया। दरअसल, शाह को पहले रायपुर आना था। यहां से हेलीकॉप्टर से रमन भी उनके साथ कोरबा जाते। लेकिन, सुबह अचानक कार्यक्रम बदल गया। शाह दिल्ली से सीधे कोरबा आ गए। ऐसे में, रमन वहां नहीं पहुंच पाते। किराए के हेलीकॉप्टर के लिए टाइम नहीं था। सो, सरकार के यहां पैगाम भेजा गया। अफसरों ने सीएम भूपेश बघेल से बात की। सीएम ने फौरन सहमति दे दी। सरकारी हेलीकॉप्टर से रमन कोरबा गए और वहां से लौटे भी। 

अंत में दो सवाल आपसे

1. क्या छत्तीसगढ़ में बीजेपी इस उम्मीद में हाथ-पर-हाथ धरे बैठी है कि मोदी और अमित शाह हैं न...वे चुनाव जीतवाएंगे?

2. इस यक्ष प्रश्न का उत्तर लोगों को अभी तक क्यों नहीं मिल पाया है कि सबसे सीनियर आईपीएस डीएम अवस्थी को रिटायरमेंट के समय एसीबी चीफ क्यों बनाया गया?


सोमवार, 2 जनवरी 2023

नो हार्ड न्यूज...

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 1 जनवरी 2023

आज साल का पहला दिन है...1 जनवरी 2023। इतेफाक से संडे है और तरकश डे भी। 2022 में 52 संडे आया। और इनमें सिर्फ एक को छोड़ दें तो तरकश का कभी गैप नहीं हुआ...हर हफ्ते तीर चले। किन्तु, साल का पहला दिन है, लिहाजा आज कोई हार्ड न्यूज नहीं। न कोई तंज, न कोई तीर। अंत में दो सवाल भी नहीं। सिर्फ लाइट मूड और इंफारमेटिव....। साथ में, तरकश के सभी पाठकों को न्यू ईयर की शुभकामनाएं...आप सभी का नया साल खुशगवार रहे।

डबल न्यू ईयर गिफ्ट

ऐसे मौके बहुत कम आते हैं, जब पति-पत्नी को साथ-साथ प्रमोशन मिले। वो भी जब दोनों अलग-अलग सर्विस के हों। छत्तीसगढ़ में इस बार ऐसा होने जा रहा है। 2005 बैच के आईपीएस अधिकारी आरिफ शेख और 2007 बैच की आईएएस अधिकारी शम्मी आबिदी के घर सरकार की तरफ से न्यू ईयर का डबल गिफ्ट आने वाला है। जाहिर है, आरिफ को डीआईजी से आईजी बनाने डीपीसी ने हरी झंडी दे दी है। और उधर शम्मी को सिकरेट्री प्रमोशन देने फाइल सरकार के पास पहुंच गई है। याने आरिफ और शम्मी का साथ-साथ प्रमोशन। पति आईजी तो पत्नी सिकरेट्री। 2023 का इससे बढ़िया गिफ्ट और भला क्या हो सकता है।

छत्तीसगढ़ मॉडल

माइनर फॉरेस्ट के प्रोक्योरमेंट और वैल्यू एडिशन में छत्तीसगढ़ पूरे देश में प्रथम आया है। लघु वनोपजों में वैल्यू एडिशन के जो चमत्कारिक काम हुए, उससे पिछले दो साल में 75 हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला है। आदिवासी महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं। इसको देखते लाल लाल बहादुर शास्त्री एकेडमी मसूरी में पीसीसीएफ संजय शुक्ला को लेक्चर के लिए आमंत्रित किया गया था। 26 दिसंबर को संजय ने मसूरी में आईएएस अधिकारियों को संबोधित किया। इनमें 15 साल की सेवा वाले आईएएस शामिल थे। पीसीसीएफ ने आईएएस अफसरों को विस्तार से समझाया कि किस तरह छत्तीसगढ़ में माइनर फॉरेस्ट को वैल्यू एडिषन कर उसे रोजगारोन्मुखी बनाया गया। और उससे कितना मुनाफा हो रहा है।

पोस्टिंग के स्कोप

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्य सचिव सुनिल कुमार और पूर्व सिकरेट्री टू सीएम अमन सिंह एनडी टीवी बोर्ड में शामिल किए गए हैं। दोनों एडिशनल डायरेक्टर होंगे। सुनिल कुमार मध्यप्रदेश के डीपीआर रहे तो जोगी सरकार में सिकरेट्री पीआर। तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने सुनिल को रायपुर कलेक्टर से बुलाकर डीपीआर पद पर बिठाया था। इसी तरह अमन सिंह भी सिकरेट्री पीआर रह चुके हैं। मतलब यह कि जनसंपर्क में काम किए अधिकारियों के लिए अब मीडिया के फील्ड में पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग के रास्ते खुल रहे हैं। बता दें, जनसंपर्क में काम करने वाले अधिकारी मीडिया वालों के संपर्क में रहते-रहते आधा मीडिया वाले हो जाते हैं।

दो और आईजी

नए साल में छत्तीसगढ़ में आईजी की संख्या दो और बढ़ जाएंगी। 2004 बैच के आईपीएस अंकित गर्ग और 2005 बैच के आईपीएस राहुल भगत का अप्रैल में सेंट्रल डेपुटेशन का सात साल पूरा हो जाएगा। अंकित एनआईए में हैं तो राहुल डायरेक्टर सोशल सेक्टर है। राहुल के पास लेबर से जुड़े आधा दर्जन से अधिक प्रभार हैं। मगर सात साल के बाद रेयर केस में...यदि प्रधानमंत्री लेवल पर कुछ हुआ तभी डेपुटेशन बढ़ता है। वैसे, पता चला है दोनों आईपीएस अधिकारी मूल कैडर में लौटने के इच्छुक हैं। सो, दो आईजी और बढ़ेंगे छत्तीसगढ़ में। वैसे भी, 2004 बैच और 2005 बैच के प्रमोशन के बाद सूबे में पहले जैसी स्थिति नहीं है। 2015 से 2020 तक ऐसी स्थिति थी कि जितने पुलिस रेंज, उतने आईजी हो गए थे। याने कोई च्वाईस नहीं। सरकार के पास अब ठीक-ठाक च्वाइस होगा।

आईएएस की लिस्ट

राज्य प्रशासनिक सेवा से आईएएस बनें निरंजन दास इस महीने 31 जनवरी को रिटायर हो जाएंगे। उनके पास इस समय आबकारी आयुक्त, आबकारी सचिव, पंजीयन सचिव से लेकर नॉन डायरेक्टर जैसी अहम जिम्मेदारियां हैं। निरंजन के रिटायर होने पर राज्य सरकार को इनकी जगह पर नई पोस्टिंग करनी होगी। याने इस महीने के लास्ट में आईएएस की एक लिस्ट निकलेगी। इसमें हो सकता है, कुछ और आईएएस अधिकारियों का एक चेन बन जाए। वैसे भी 2007 बैच के छह आईएएस अधिकारी प्रमोट होकर सिकरेट्री बनने जा रहे हैं। इनमें से फिलवक्त चार अफसर छत्तीसगढ़ में हैं...शम्मी आबिदी, हिमशिखर गुप्ता, मोहम्मद कैसर हक और यशवंत कुमार शामिल हैं। सिकरेट्री प्रमोट होने के बाद इनमें से सरकार कुछ को नई पोस्टिंग दे सकती है।

पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग

निरंजन दास को रिटायर होने पर पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग मिल सकती है। इस समय राज्य निर्वाचन आयुक्त के साथ रेरा में मेम्बर का एक पद खाली है। रेरा में एनके असवाल के रिटायर होने के बाद उनके पद किसी की नियुक्ति अभी नहीं हुई हैं। वैसे, निरंजन के बारे में चल रहीं अटकलों को मानें तो राज्य निर्वाचन आयुक्त पद के लिए उनका पलड़ा भारी लग रहा है। कुल मिलाकर उन्हें ठीक-ठाक ही कोई पोस्टिंग मिलेगी।

नए सूचना आयुक्त

खबर है, राज्य सूचना आयुक्त में मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त के पदों पर जल्द ही नियुक्ति हो जाएगी। विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान नेता प्रतिपक्ष भी रायपुर में रहेंगे। परिस्थितियां अगर अनुकूल रही तो सत्र के समय किसी दिन चयन कमेटी की बैठक विधानसभा में हो जाएगी। और इसके बाद आदेश निकल जाएगा। आयोग में दो पद खाली हैं। एक सीआईसी और दूसरा आयुक्त का।



शनिवार, 24 दिसंबर 2022

छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और 2022

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 25 दिसंबर 2022

छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और 2022

छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी के लिए 2022 बहुत अच्छा नहीं रहा। बल्कि कह सकते हैं यह साल जाते-जाते बड़ा दर्द दे गया। सितंबर में प्रिंसिपल सिकरेट्री एम. गीता का निधन हो गया। गीता काफी अच्छी और रिजल्ट देने वाली अफसर थीं। गीता के जाने के दुख से कैडर उबर नहीं पाया था कि ईडी धमक आई। जाहिर है, कई आईएएस अधिकारी ईडी के निशाने पर हैं। आधा दर्जन से अधिक आईएएस को ईडी पूछताछ के लिए तलब भी कर चुकी है। 2009 बैच के आईएएस समीर विश्नोई जेल पहुंच चुके हैं। यही नहीं, पूरा कैडर पिछले दो महीने से खौफ के साये में गुजर रहा...पता नहीं किस दिन राहु की दशा बिगड़ जाए और ईडी वाले घर का कॉल बेल बजा दें। छत्तीसगढ़ जैसे छोटे कैडर में आईएएस अफसरों में की खौफ का ये आलम है तो साल 2022 खराब ही कहा जाएगा न।

2023 भी अच्छा नहीं!

ब्यूरोक्रेसी के लिए 2022 अच्छा नहीं रहा तो नया साल 2023 भी बहुत बढ़ियां नहीं रहने वाला। जाहिर है, अगले साल नवंबर में विधानसभा चुनाव है। चुनावी साल वैसे भी नौकरशाही के लिए परीक्षा की घड़ी होती है। एक तो सरकार को रिजल्ट देने का प्रेशर....उपर से किसकी सरकार बनेगी...कैसे दोनों पार्टियों को साधकर रखें....ताकि मौका आते ही गुलाटी मारी जाए....इसका अलग तनाव। उधर, पंडित कमलकिशोर की भविष्यवाणी है कि 2023 भी छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी के लिए बहुत अच्छा नहीं रहने वाला। कुंडली के हिसाब से देखें तो छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी के घर में शनि बैठा है। जनवरी में ये झटका दे सकता है...एकाध और आईएएस की स्थिति भी समीर विश्नोई जैसी हो सकती है।

कुछ पूजा-पाठ हो जाए

छत्तीसगढ़ का नारायणपुर ऐसा जिला है, जहां कलेक्टर-एसपी टिक नहीं पा रहे। तू चल, मैं आया...के अंदाज में कलेक्टर, एसपी पोस्टिंग में जाते हैं और फिर चंद दिनों में लौट आ रहे। बता दें, इस जिले में चार साल में पांच कलेक्टरों की पोस्टिंग हुई है तो एसपी सात बदल गए। एसपी की संख्या सात तब हैं, जब मोहित गर्ग का कार्यकाल करीब ढाई साल रहा है। याने बाकी छह की छुट्टी डेढ़ साल में हो गई। मतलब तीन महीने में एक एसपी। सात में जीतेंद्र शुक्ला, कल्याण ऐलेसेला, रजनेश सिंह, मोहित गर्ग, गिरिजाशंकर, उदय किरण और सदानंद शामिल हैं। जीतेंद्र शुक्ला की पोस्टिंग पिछली सरकार ने की थी। कांग्रेस सरकार बनते ही वे हटे। फिर ऐलेसेला आए। उनके बाद रजनेश, मोहित गर्ग, गिरिजाशंकर, उदय किरण और अब सदानंद। कलेक्टरों की स्थि्ित भी जुदा नहीं। 2019 की शुरूआत में टीपी वर्मा को दंतेवाड़ा भेजकर उनकी जगह पीएस एल्मा को कलेक्टर बनाया गया। फिर अभिजीत सिंह, धमेंद्र साहू, ऋतुराज रघुवंशी और अब अजीत बसंत। सीएस और डीजीपी साब को नारायणपुर के लिए कुछ पूजा-पाठ करवाना चाहिए। क्योंकि, इतना छोटा जिला...मात्र दो ब्लाक का। उसमें भी अबूझमाड़ में नक्सलियों का वर्चस्व। मतलब एक ही ब्लॉक। उसमें भी तू चल, मैं आया। अजीत बसंत की पोस्टिंग के साथ ही सवाल उठने लगा है, वे कितने दिन वहां टिकेंगे। अजीत जरा ईमानदार किस्म के हैं...वहां के विधायक के निशाने पर वे न आ जाएं। जाहिर है, अभिजीत की छुट्टी विधायक ने कराई थी।

इसलिए हटाए गए पाठक

सरकार ने रजिस्ट्रार कोआपरेटिव सोसाइटी जनकराम पाठक को ज्वाईन करते ही न केवल काम करने से रोक दिया बल्कि महीने भर में उन्हें रुखसत कर दिया। दरअसल, सरकार ने जब पाठक को तीसरी बार रजिस्ट्रार बनाया तो किसी का ध्यान नहीं था कि अपेक्स और सहकारी बैंकों के सेलरी घोटाले के दौरान पाठक ही रजिस्ट्रार थे। उन्हीं की कलम से बैंकों की सेलरी दुगुनी करने का आदेश हुआ था। बहरहाल, अक्टूबर लास्ट में जब आईएएस की लिस्ट जब जारी हुई तो कुछ अफसरों ने सरकार की नोटिस में ये बात लाई। यही वजह है कि एसीएस टू सीएम सुब्रत साहू ने तुरंत फोन करके पाठक को काम करने से रोका। सेलरी घोटाले में बैंक के खटराल अधिकारियों ने अपना वेतन दुगुना करने बोर्ड से प्रस्ताव पास करवा लिया...और रजिस्ट्रार से हरी झंडी भी। आलम यह हुआ कि छत्तीसगढ़ में चीफ सिकरेट्री के बराबर अपेक्स और सहकारी बैंकों के डीजीएम को वेतन मिलने लगा तो कलेक्टर के बराबर बैंकों के ड्राईवर को। रिव्यू मीटिंग में सीएम भूपेश बघेल को जब इसका पता चला तो वे बेहद नाराज हुए। सीएम के निर्देशा पर चार सदस्यीय जांच कमेटी ने जांच प्रारंभ कर दी है। कई अधिकारियों के लिए यह जांच गले का फांस बनने वाला है क्योंकि बैंकों की बेसिक सेलरी पांच साल में तीगुनी बढ़ गई तो डीए 200 परसेंट से अधिक दिया जाने लगा। अपेक्स बैंक के डीजीएम को मध्यप्रदेश के डीजीएम से एक लाख रुपए अधिक वेतन मिल रहा है। देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक के डीजीएम बेचारे सुबह से लेकर देर रात तक काम करते हैं, तो उनके डीजीएम को पौने दो लाख वेतन मिलता है। और अपेक्स बैंक के डीजीएम को 2.93 लाख रुपए। पराकाष्ठा यह है कि आईएएस एमडी को अपेक्स बैंक में 1.45 लाख वेतन मिलता है और बैंकिंग सर्विस के डीजीएम को उनसे दुगुना से भी अधिक। कभी-न-कभी इसका भंडा तो फूटना ही था।

बड़ी सर्जरी

जनवरी में विधानसभा सत्र के बाद कलेक्टर, एसपी की एक बड़ी लिस्ट निकलने की चर्चा है। एसपी की लिस्ट तो पहले से ही अपेक्षित है। भानुप्रतापपुर विधानसभा उपचुनाव की वजह से एसपी की लिस्ट रुक गई थी। अब सुनने में आ रहा...चुनावी साल को देखते सरकार नए सिरे से कलेक्टर्स, एसपी की जमावट करना चाहती है। ताकि, और बेहतर रिजल्ट मिल सकें। विधानसभा का शीत सत्र जनवरी के पहले सप्ताह में क्लोज हो जाएगा। उसके बाद लिस्ट कभी भी आ सकती है। क्योंकि, जनवरी में नहीं आई तो फिर फरवरी में बजट सत्र आ जाएगा। जिन जिलों में अपराध तेजी से पांव पसार रहे हैं, वहां के पुलिस अधीक्षकों को हटाया जाएगा। ऐसे अफसरों की सूची तैयार कराई जा रही है।

सबसे बड़ी पोस्टिंग

राज्य सरकार ने सीनियर आईएफएस आलोक कटियार पर भरोसा करते हुए २५ हजार करोड़ के जल जीवन मिशन की कमान सौंप दी है। उनके पास क्रेडा का चार्ज यथावत रहेगा। याने सौर बिजली-पानी अब उनके जिम्मे। जल जीवन मिशन भारत सरकार का प्रोजेक्ट है, जिसके लिए 25 हजार करोड़ रुपए सिर्फ छत्तीसगढ़ के लिए स्वीकृत है। इसमें से पिछले साल 1800 करोड़ के काम हुए और उससे पहले 2021 में करीब सात सौ करोड़ के। अभी 22500 करोड़ के काम बचे हैं। इससे पहले किसी आईएफएस अफसर को इतने बड़े बजट वाले काम की जिम्मेदारी नहीं मिली। बहरहाल, कटियार के लिए यह चुनौती भरा काम होगा। क्योंकि, मार्च 2024 तक इसे कंप्लीट करना है। 22 हजार 500 करोड़ रुपए खर्च करना आसान नहीं होगा। कई जिलों में अभी नल कनेक्शन का 25 फीसदी काम पूरा नहीं हुआ है। सबसे अधिक खराब स्थिति बलरामपुर, सूरजपुर, कोरिया, अंबिकापुर और कोरबा की है। ये जिले नीचे से टॉप 5 हैं। दूसरी दिक्कत यह है कि टंकी बनाने का काम यहां के मजदूर नहीं करते। उसके लिए झारखंड, बिहार के श्रमिक बुलाए जाते हैं। बिहार, झारखंड में इस वक्त तेजी से जल जीवन मिशन के काम चल रहा, सो मजदूर इधर आ नहीं रहे। मिशन के पास पीएचई का सेटअप है, जिसे इतना बड़ा काम करने का तजुर्बा नहीं। पहले सूबे में साल भर में तीन से चार सौ करोड़ का काम होता था। अब इतना एक जिले में हो रहा है। फिर कटियार आईएफएस अफसर हैं। जिलों में कलेक्टरों से रिजल्ट लेने में उन्हें स्मार्टनेस दिखानी होगी।

शनिवार की छुट्टी केंसिल

सरकार ने अधिकारियों, कर्मचारियों की सुविधा के लिए फाइव डे वर्किंग डे वीक किया तो कर्मचारियों ने इसमें आधा दिन अपने तरफ से डंडी मार ली है। याने साढे़ चार दिन कर दिया है। वो इस तरह कि पहले शनिवार जब वर्किंग रहता था तो शनिवार दोपहर से आफिस खाली होने लगता था और अब शुक्रवार दोपहर के बाद आफिसें बियाबान दिखाई देने लगता है। उपर से फाइव डे वीक के फार्मेट में आधा घंटे पहले आना और आधा घंटे बाद जाने का नियम बना था। याने सुबह दस बजे आफिस पहुंचने का टाईम था। मगर अभी भी वही हाल है...11 बजे के पहले कोई दिखेगा नहीं। लिहाजा, दफ्तरों में फाइलें डंप होने लगी हैं। एनआरडीए ने कुछ अधिकारियों, कर्मचारियों को फाइलों के निबटारे के लिए बुलाना चाहा तो नेतागिरी शुरू हो गई। ऐसे में, एनआरडीए ने आदेश निकालकर शनिवार की छुट्टी रद्द कर दी है। हालांकि, कहने वाले कहेंगे कि ये सरकार के आदेश के खिलाफ हुआ...सरकार ने फाइव डे वीक लागू किया हुआ है। मगर कर्मचारी, अधिकारी काम नहीं करेंगे तो और चारा क्या है?

अंत में दो सवाल आपसे

1. चार साल मलाईदार पोस्टिंग करने के बाद स्मार्ट अफसर चुनावी साल में किनारे हो जाना क्यों पसंद करते हैं?

2. सीनियर मंत्री टीएस सिंहदेव चुनाव से पहले भविष्य के लिए फैसला लेने का बयान दिए हैं। वे क्या फैसला लेंगे?



सोमवार, 19 दिसंबर 2022

77 लाख, 77 पैसे के बराबर

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 18 दिसंबर 2022

77 लाख, 77 पैसे के बराबर

प्रेमचंद के जमाने में मास्टर साब लोग दीन-हीन होते थे। लाचार। बेचारे। मगर अब वो दौर नहीं रहा। अब इतने सक्षम और गुणी कि सरकारी खजाने को भी चूना लगा दे रहे हैं। हम बात कर रहे हैं बिलासपुर जिले के बेलतरा स्कूल के व्याख्याता की। ट्रेजरी के बाबू से मिलकर फर्जी बिलों के आधार पर मास्टर साब ने 77 लाख रुपए अपने एकाउंट में ट्रांसफर करवा लिया। मतलब सरकारी खजाने में खुली डकैती। आश्चर्य यह कि बिना रिश्वत दिए ट्रेजरी से सौ रुपए पास नहीं होता, वही ट्रेजरी ने मास्टर साब के खाते में बिना वजह 77 लाख ट्रांसफर कर दिया। इस मामले में स्कूल शिक्षा और ट्रेजरी का रोल चोर-चोर मौसेरा भाई जैसा प्रतीत हो रहा है। डीईओ के पत्र लिखने के बाद भी डीपीआई ने रिकवरी तो दूर की बात एफआईआर तक कराने की जहमत नहीं उठाई, तो ट्रेजरी का भगवान मालिक हैं...अपना पैसा होता तो अधिकारी थाने दौड़ गए होते या फिर एसपी, कलेक्टर को बोलकर मास्टर साब का ऐसी-तैसी करा दिए होते मगर सरकारी पैसा है...। दिक्कत यह है कि सिस्टम वर्क नहीं कर रहा। अब चीफ सिकरेट्री बोलेंगे तो ट्रेजरी वाले कार्रवाई करेंगे वरना सुनकर भी अनसूना। बात वही...सरकारी पईसा है...77 लाख उनके लिए 77 पैसे के बराबर।

ढाई साल...कोई प्रभाव नहीं

छत्तीसगढ़ की सियासत में ढाई साल ऐसा वर्ड है जिसको लेकर नेता हो या मीडिया या फिर आम आदमी...हर किसी की जिज्ञासा बढ़ जाती है। सरकार के चार साल पूरे होने पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के राजधानी के प्रमुख पत्रकारों से मुलाकात में यह सवाल आया कि क्या ढाई साल का इश्यू नहीं होता तो कामकाज का रिजल्ट और बेहतर होता? ढाई साल की वजह से सरकार डिफेंसिव हो गई? मुख्यमंत्री ने सधे अंदाज में जवाब दिया। बोले, ये कोई नई बात नहीं है...सियासत में ये सब चलता रहता है...जो सत्ता में होते हैं, उन्हें हटाने की कोशिशें होती हैं। मगर इससे सरकार के कामकाज और आउटपुट पर कोई असर नहीं पड़ा। हमारी सरकार ने आम आदमी का विश्वास जीतने का काम किया।

नए जिले...अब बिल्कुल नहीं

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने स्पष्ट कर दिया है कि छत्तीसगढ़ में अब नए जिले नहीं बनेंगे। उन्होंने खास इंटरव्यू में कहा कि जिलों के सेटअप बनाने में टाईम लगता है, सो फिलहाल और जिला बनाना अब संभव नहीं है। जाहिर है, भूपेश बघेल सरकार ने चार साल में पांच नए जिले बनाएं हैं। सबसे पहले 2020 में गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। फिर इस साल मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई, सारंगढ़-बिलाईगढ़, सक्ती और मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-सोनहत। इसके बाद चर्चा थी कि अगले साल विधानसभा चुनाव से पहिले जिलों की संख्या बढ़कर 36 हो जाएंगी। विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत ने एक बार बयान भी दिया था कि जिलों की संख्या बढ़कर 36 होगी। संभावित नए जिलों में पत्थलगांव, भानुप्रतापपुर, सराईपाली और अंतागढ़ की दावेदारी प्रबल है। मगर जिला बनने के लिए उन्हें कुछ और इंतजार करना पड़ेगा। हालांकि, ये सही है कि सियासत में कई बार अचानक चौंकाने वाला कुछ हो जाता है...अगर ऐसा हुआ तो ठीक वरना, इस सरकार में जिलों की संख्या अब 33 ही रहेगी।

सीएम के सिकरेट्री

सरकार बदलने के बाद आमतौर पर सिकरेट्री टू सीएम बदल जाते हैं। मगर हिमाचल प्रदेश के नए सीएम सुखविंदर सिंह ने शुभाशीष पंडा को ही कंटीन्यू करने का फैसला किया है। शुभाशीष 97 बैच के आईएएस हैं। समान्यतया ऐसा देखा जाता है कि सीएस, डीजीपी भले ही नहीं बदलते मगर मुख्यमंत्री सचिवालय के अफसर जरूर बदल जाते हैं। जाहिर है, कोई भी मुख्यमंत्री अपनी पसंद से सिकरेट्री अपाइंट करते हैं। दरअसल, माना ये जाता है कि सीएम सचिवालय के सिकरेट्री अगर लंबे समय तक पोस्टेड रह गए तो उनकी समानांतर सत्ता चलने लगती है। मगर अपवाद भी होते हैं। उनके शुभाशीष भी है.. छबि अच्छी है लिहाजा, सरकार बदलने के बाद भी नए सीएम ने उन्हें कंटीन्यू करना मुनासिब समझा।

आनन-फानन में पोस्टिंग

छत्तीसगढ़िया आईएएस धनंजय देवांगन को सरकार ने आनन-फानन में रेरा अपीलीय प्राधिकारण का सदस्य प्रशासकीय और तकनीकी अपाइंट कर दिया। लास्ट संडे उनके वीआरएस के लिए अप्लाई करने की खबर मीडिया में आई और पांचवे दिन दोपहर वीआरएस मंजूर करने के साथ शाम को प्राधिकरण में पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग का आर्डर निकल गया। बता दें, 2018 में रेरा का गठन हुआ था। मगर अपीलीय प्राधिकरण काफी दिनों तक लटका रहा। इस साल रिटायर जस्टिस शरद गुप्ता को रेरा अपीलीय अथॉरिटी का चेयरमैन बनाया गया किन्तु कोई मेम्बर नहीं था। पता चला है, अथॉरिटी का अफसरों पर प्रेशर बढ़ा तो तलाश शुरू हुई...जल्दी में कौन रिटायर हो रहा है। धनंजय देवांगन फरवरी में सेवानिवृत्त होने वाले थे। वे फौरन रिटायरमेंट लेने के लिए तैयार हो गए। बहरहाल, उनके साथ अरविंद कुमार चीमा को सदस्य विधिक बनाया गया है। चीमा का नाम अवश्य लोगों को चौंकाया। सबका यही सवाल था, चीमा कौन? बाद में पता चला कि चीमा रायपुर लोवर कोर्ट में वकालत कर चुके हैं तथा कांग्रेस पार्टी से जुड़े रहे हैं।

नए निर्वाचन आयुक्त-1

रिटायरमेंट के सात महीने बाद भी ठाकुर राम सिंह की राज्य निर्वाचन आयुक्त की कुर्सी बरकरार है तो इसकी वजह यह है कि सरकार ने रिटायरमेंट के बाद नए निर्वाचन आयुक्त की पोस्टिंग तक पद पर बने रहने की मियाद छह महीने से बढ़ाकर एक साल कर दिया है। पुराने नियमों के तहत रिटायरमेंट के बाद निर्वाचन आयुक्त अधिकतम छह महीने तक कुर्सी पर बने रह सकते थे। इस हिसाब से राम सिंह को नवंबर में कुर्सी छोड़ देनी थी। क्योंकि, मई 2022 में वे रिटायर हुए थे। मगर इस नियम में सरकार ने संशोधन कर एक साल कर दिया है। याने राम सिंह अब अगले साल मई तक राज्य निर्वाचन आयुक्त के पद पर रह सकते हैं। इस दौरान उन्हें वेतन से लेकर सारी सुविधाएं मिलती रहेंगी। राज्य निर्वाचन आयुक्त संवैधानिक पद है इसलिए इसे खाली नहीं रखा जा सकता। प्रोटोकॉल और वेतन, सुविधाओं के मामले में यह हाईकोर्ट के जस्टिस के समकक्ष पद है। वैसे भी, राम सिंह पोस्टिंग के मामले में किस्मती अधिकारी माने जाते हैं। कलेक्टरी में रेगुलर रिक्रूट्ड आईएएस उनके आसपास नहीं फटकते। रायगढ़, दुर्ग, बिलासपुर और रायपुर के वे लगातार 11 साल कलेक्टर रहे। इतने लंबे समय तक छत्तीसगढ़ में किसी आईएएस ने कलेक्टरी नहीं की है।

नए निर्वाचन आयुक्त-2

ठाकुर राम सिंह जब इस साल मई में राज्य निर्वाचन आयुक्त से रिटायर होने वाले थे, तब चर्चा थी कि डीडी सिंह को इस पद पर पोस्ट रिटायरमेंट पोस्टिंग दी जाएगी। मगर छह महीने निकल गया...डीडी सिंह की अटकलें आदेश में परिवर्तित नहीं हो पाई। इसके पीछे वजह यह बताई जा रही कि डीडी सिंह सरकार के भरोसेमंद अधिकारी हैं। सरकार ने सीएम सचिवालय के साथ ही सिकरेट्री टाईबल और जीएडी की जिम्मेदारियां दे रखी हैं। सीएम सचिवालय में उनके होने के सियासी मायने भी हैं। ऐसे में, नहीं लगता कि डीडी सिंह को सरकार वहां से हटाकर निर्वाचन में भेजना चाहेगी। और भेजना ही होता तो अभी तक वेट नहीं करती। सरकार ने ठाकुर राम सिंह को अघोषित एक्सटेंशन दिया तो इसके कोई निहितार्थ होंगे। बहरहाल, नए राज्य निर्वाचन आयुक्त के लिए अब आबकारी सचिव निरंजन दास की चर्चा शुरू हो गई है। निरंजन अगले महीने 31 जनवरी को रिटायर होंगे। याने करीब डेढ़ महीने बाद। अब देखना है, सरकार निरंजन के नाम पर मुहर लगाती है या किसी और को निर्वाचन आयुक्त की कमान सौंपेगी।

सूचना आयोग का वेट

राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त के साथ ही सूचना आयुक्त का एक पद खाली है। दोनों पदों के लिए विज्ञापन की प्रक्रिया पूरी हो गई है। सौ के करीब लोगों ने इन पदो ंके लिए अप्लाई किया है। अटकलों के मुताबिक सीआईसी का पद किसी रिटायर नौकरशाह को दिया जा सकता है तो आयुक्त का पद किसी पत्रकार को। हालांकि, अप्लाई करने वालों में रिटायर अधिकारियों, वकीलों, पत्रकारों और समाज सेवियों ने आवेदन किया है। मुख्य सूचना आयुक्त एमके राउत और आयुक्त अशोक अग्रवाल के पिछले महीने रिटायर होने के बाद से ये पद खाली हैं। जैसे संकेत मिल रहे हैं, दोनों पदो ंके लिए कोई जल्दीबाजी नहीं है। हो सकता है, 2 जनवरी से विधानसभा का शीतकालीन सत्र प्रारंभ हो रहा है। उस दौरान नेता प्रतिपक्ष भी रायपुर में मौजूद रहेंगे। हो सकता है, उसी समय इस पर मुहर लगाया जाए। हालांकि, नेता प्रतिपक्ष कमेटी के मेम्बर होते हैं मगर होता वही है, जो सरकार चाहती है। नेता प्रतिपक्ष की सिर्फ औपचारिकता होती है।

मंदिरों में रौनक

वैसे तो हिन्दू धर्म में महादेव को देवों का देव माना जाता है...ब्रम्हा, विष्णु से उपर। शिवपुराण कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा ने भगवान शिव के प्रति आस्था और तेज कर दिया है। उनके रायपुर के कार्यक्रम के बाद छत्तीसगढ़ के शिव मंदिरों में गजब की रौनक बढ़ी है। आमतौर पर पहले सोमवार को शिव मंदिरों में चहल-पहल रहती थी। बाकी दिन पूजा-अर्चना करने वालों की संख्या नगण्य रहती रहती थीं। अब सातों दिन। पंडित प्रदीप मिश्रा ने लोगों से कहा...एक लोटा जल, सारी समस्याओं का हल, उसके बाद शिव मंदिरों में जल चढ़ाने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. आरक्षण संशोधन विधेयक को राज्यपाल विधानसभा को लौटाएगी या फिर राष्ट्रपति को भेजेंगी?

2. शंटेड अफसर और पुराने अखबार एक समान क्यों कहे जाते हैं?


शनिवार, 10 दिसंबर 2022

एक अफसर, दो कलेक्टर

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 11 दिसंबर 2022

एक अफसर, दो कलेक्टर

हेडिंग से आप चौंकिये मत! ये बिल्कुल सही है। छत्तीसगढ़ में नए गठित पांच जिलों में कमोवेश यही स्थिति है...जिला दो, कलेक्टर दो और आफिस एवं अफसर एक। दरअसल, सितंबर में नए जिले तो बन गए मगर अभी तक आफिसों का बंटवारा नहीं हुआ और न अफसरों की पोस्टिंग। ऐसे में, हो ये रहा कि एक अफसर से दोनों कलेक्टरों को काम चलाना पड़ रहा है। मसलन, पीडब्लूडी के ईई पुराने जिले में हुकुम बजा रहे तो नए जिले में भी। कलेक्ट्रेट में हफ्ते में एक दिन टाईम लिमिट याने टीएल मीटिंग होती है। सूबे के सरकारी दफ्तरों में एक तो पांच दिन का वीक हो गया है, उपर से अफसरों का दो दिन दो जिले की टीएल मीटिंग में निकल जा रहा। अधिकारियों को कभी पुराने जिले के कलेक्टर बुलाते हैं तो कभी नए जिले के...अफसरों का पूरा दिन दोनों जिला मुख्यालयों के दौड़ भाग में निकल जा रहा है। ज्ञात है, सूबे में पांच नए जिले बने हैं, उनमें मोहला-मानपुर, खैरागढ़-छुईखदान-गुंडरदेही, सारंगढ़-बिलाईगढ़, सक्ती और मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर शामिल है। राजस्व और जीएडी विभाग को इसे संज्ञान में लेते हुए आफिसों का बंटवारा कर देना चाहिए।

तीन कलेक्टर, कलेक्ट्रेट तय नहीं

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिला अस्तित्व में आए लगभग तीन बरस हो गए। इस दरम्यान तीन कलेक्टर आए और चले गए। शिखा राजपुत पहली कलेक्टर रहीं। फिर, डोमन सिंह। उनके बाद नम्रता गांधी। और अब ऋचा प्रकाश चौधरी चौथी कलेक्टर। मगर अभी तक यह तय नहीं हो सका कि कलेक्ट्रेट किधर बनेगा। असल में तीन ब्लॉकों को मिलाकर जीपीएम जिला बना है। सो, जिला मुख्यालय बनाने को लेकर खींचतान मची हुई है। गौरेला में हालांकि, पहले से कुछ ठीक-ठाक सुविधाएं हैं। गुरूकुल में जिला मुख्यालय बनाने की तैयारी हो रही है। मगर अधिकारिक तौर पर अभी कुछ नहीं। गौरेला से मरवाही की दूरी करीब 35 किलोमीटर है। जाहिर है, गौरेला में कलेक्ट्रेट बनने से मरवाही वाले खुश नहीं होंगे। मरवाही महंत दंपति का संसदीय इलाका है। सो, प्रेशर दाउ पर भी है। अब देखना है, कलेक्ट्रेट आखिरकार कहां फायनल होता है।

24 कैरेट के कलेक्टर

छत्तीसगढ़ के कलेक्टरों की प्रतिष्ठा कितनी रह गई है और क्या अपनी स्थिति को लेकर वे खुद जिम्मेदार नहीं है...इस पर बाद में कभी। मगर अभी आपको राज्य बनने से जस्ट पहले हम मध्यप्रदेश के समय का वाकया बता रहे हैं। तब बिलासपुर सियासी द्ष्टि से काफी संजीदा और वजनदार इलाका माना जाता था। संभाग से छह से सात कबीना मंत्री होते थे। खुद बिलासपुर से ही तीन-चार। सबसे अपने-अपने गुट। जब इन मंत्रियों, नेताओं के वर्चस्व की लड़ाई में अराजकता बढ़ने लगी तो सीएम दिग्विजय सिंह ने 1998 में शैलेंद्र सिंह को कलेक्टर और विजय यादव को एसपी बनाकर भेजा। शैलेंद्र और विजय ने मिलकर दो साल में सब ठीक कर दिया। कांग्रेस नेताओं को भी जेल भेजने में दोनों ने गुरेज नहीं किया। मगर वे इसलिए ऐसा कर पाए कि खुद 24 कैरेट के थे। 20 कैरेट, 22 कैरेट के अफसर होंगे, तो नेता हॉवी होंगे ही। बिलासपुर जिले में एक पानी वाले कलेक्टर की और सुनिये। नाम था उदय वर्मा। बात पुरानी है...तत्कालीन सीएम अर्जुन सिंह तब बिलासपुर के चकरभाटा हवाई पट्टी पर आने वाले थे। सीनियर मंत्री चित्रकांत जायसवाल ने किसी बात पर उदय वर्मा को झिड़क दिया। उदय वर्मा सीएम को रिसीव करना छोड़ हवाई पट्टी से वापिस आ गए। बाद में अर्जुन सिंह ने उदय वर्मा को बुलाकर बात की। वर्मा बाद में भारत सरकार में कई साल तक अहम विभागों के सिकरेट्री रहे।

आईपीएस अवार्ड

राज्य प्रशासनिक सेवा के 2008 बैच के अधिकारियों को आईएएस अवार्ड करने डीपीसी का प्रासेज शुरू गय है। मगर प्रमोशन के मामले में राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों की स्थिति ठीक नहीं है। रापुसे में अभी तक 98 बैच के सभी अधिकारियों को आईपीएस अवार्ड नहीं हो पाया है। इस बैच के सिर्फ विजय अग्रवाल, राजेश अग्रवाल और रामकृष्ण साहू को आईपीएस मिल पाया है। अभी आठ अफसर बचे हुए हैं। याने राप्रसे की तुलना में रापुसे प्रमोशन में एक दशक पीछे चल रहा है। बहरहाल, रापुसे अधिकारियों की नजर अब कैडर रिव्यू पर टिकी है। छत्तीसगढ़ में पांच नए जिले बन गए हैं। लिहाजा, अब कैडर बढ़ाने एमएचए तैयार हो जाएगा।

परमानेंट होम सिकरेट्री!

92 बैच के आईपीएस अरुणदेव गौतम ने गृह सचिव के तौर पर पूर्व डीजीपी अमरनाथ उपध्याय का रिकार्ड ब्रेक कर दिया है। उपध्याय छह साल तक गृह सचिव रहे। गौतम का गृह सचिव के रूप में सात साल हो गया है। पिछले सरकार से वे मंत्रालय में मोर्चा संभाले हुए हैं। बीच में कुछ दिन के लिए पीएचक्यू गए मगर फिर उन्हे मंत्रालय भेज दिया गया। अब तो उनके मित्र भी चुटकी लेने लगे हैं...गौतम को परमानेंट होम सिकरेट्री घोषित कर देना चाहिए। हालांकि, इसमें एक ट्वीस्ट यह भी है कि उपध्याय सिकरेट्री होम से डीजी पुलिस बनकर पुलिस मंत्रालय से पुलिस मुख्यालय लौटे थे। मगर इस संयोग को दोहराने में अभी टाईम है। अशोक जुनेजा अगस्त 2024 तक पुलिस प्रमुख रहेंगे। जुनेजा के बाद 90 बैच के राजेश मिश्रा जनवरी 2024 में रिटायर हो गए होंगे। 91 बैच के लांग कुमेर भी नागालैंड में रिटायर होकर एक्सटेंशन पर डीजीपी हैं। याने जुनेजा के बाद 92 बैच को डीजीपी बनने का मौका मिलेगा। इस बैच में पवनदेव भी हैं। पवनदेव और गौतम में से कोई एक जुनेजा के बाद डीजीपी बनेगा। दोनों का टाईम भी लंबा है। पवनदेव का रिटायरमेंट जुलाई 2028 है तो गौतम का जुलाई 2027।

सीएस-डीजीपी की जोड़ी

चीफ सिकरेट्री अमिताभ जैन और डीजीपी अशोक जुनेजा लंबे समय बाद एक साथ बस्तर के नारायणपुर में एक साथ दिखे। मौका था नक्सलियों के गढ़ में सड़क निर्माण के निरीक्षण का। सीएस कमीज की आस्तिन चढ़ाए हुए थे तो डीजीपी फुल वर्दी में। फोटो और वीडियो में दोनों के बॉडी लैंग्वेज...मुख मुद्रा से प्रतीत हो रहा था...ललकारने के अंदाज में...मसलन नक्सलियों के खिलाफ बड़ा कुछ होने वाला है। बता दें, अमिताभ और अशोक दोनों न केवल एक ही बैच के आईएएस, आईपीएस हैं, बल्कि मध्यप्रदेश में राजगढ़ जिले में एक साथ कलेक्टर-एसपी रह चुके हैं। और अब छत्तीसगढ़ में सीएस और डीजीपी हैं।

कर्मचारियों के लिए गुड न्यूज

फरवरी में पेश होने वाले राज्य के बजट में अनियमित कर्मचारियों के लिए गुड न्यूज हो सकता है। करीब डेढ़ लाख अनियमित कर्मियों को रेगुलर करने इस बजट में ऐलान हो सकता है। जाहिर है, बजट की तैयारी प्रारंभ हो चुकी है। इसमें अनियमित कर्मचारियों के रेगुलर करने कितनी धनराशि की जरूरत प़ड़ेगी, इस पर विचार किया जा रहा है। मुख्यमत्री भूपेश बघेल ने पिछले दोनों बजट में शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए बड़ी घोषणा की थी। 2021 के बजट में शिक्षाकर्मियों का संपूर्ण संविलियन और 2022 के बजट में ओल्ड पेंशन शुरू करने का। अनियमित कर्मचारियो को भी इस बजट से काफी उम्मीदें हैं। इससे पहले रमन सिंह की सरकार ने 2013 के विधानसभा चुनाव से पहले अनियमित कर्मचारियों का नियमितिकरण किया था। 2018 में भी अनियमित कर्मचारी बाट जोहते रह गए मगर रेगुलर नहीं हो पाए।

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस नए जिले में 35 फीसदी के कमीशन पर फर्नीचर परचेज किया जा रहा?

2. कलेक्टर, एसपी की लिस्ट अब विधानसभा के शीत्र सत्र के बाद निकलेगी या उससे पहले?



शनिवार, 3 दिसंबर 2022

7 बैच के 7 सिकरेट्री

 संजय के. दीक्षित

तरकश, 4 दिसंबर 2022

7 बैच के 7 सिकरेट्री

छत्तीसगढ़ में अगले महीने सात और आईएएस अफसर सिकरेट्री बन जाएंगे। दरअसल, 2007 बैच के छत्तीसगढ़ कैडर के सातों आईएएस अधिकारियों का जनवरी में सिकरेट्री पद पर प्रमोशन ड्यू हो जाएगा। सामान्य प्रशासन विभाग में इन अधिकारियों के प्रमोशन की फाइल आगे बढ़ गई है। मुख्यमंत्री के अनुमोदन के बाद प्रमोशन का प्रॉसेज कंप्लीट हो जाएगा। जीएडी के सूत्रों की मानें तो सब कुछ ठीक रहा तो जनवरी के पहले हफ्ते में इन अफसरों को न्यू ईयर गिफ्ट मिल सकता है। 2007 बैच में शम्मी आबिदी, केसी देव सेनापति, बसवराजू एस, हिमशिखर गुप्ता, मोहम्मद कैसर हक, यशवंत कुमार और जनकराम पाठक षामिल हैं। इनमें बसवराजू डेपुटेशन पर कर्नाटक में पोस्टेड हैं। बाकी सभी छत्तीसगढ़ में हैं। कुछ मिलाकर सचिवों की संख्या अब 43 हो जाएगी। इनमें से दस सिकरेट्री डेपुटेशन पर हैं। तब भी छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य के लिए ये बड़ी संख्या है। बता दें, डेपुटेशन पर पोस्टेड सिकरेट्र्री में सोनमणि बोरा, डॉ0 रोहित यादव, ऋतु सेन, अविनाश चंपावत, अमित कटारिया, संगीता पी, मुकेश बंसल, रजत कुमार, अलेक्स पाल मेनन और श्रुति सिंह शामिल हैं।

भुवनेश पर भरोसा

2006 बैच के आईएएस अधिकारी भुवनेश यादव के पास पहले से महिला बाल विकास, समाज कल्याण और उच्च शिक्षा विभाग था। सरकार ने अब उद्योग विभाग की कमान सौंप दी है। अब वे चार विभागों के सिकरेट्री हो गए हैं। चारों विभाग शिक्षा, सोशल और इंडस्ट्री सेक्टर से जुड़े हुए हैं। इंडस्ट्री अपने आप में बड़ा एक्सपोजर वाला विभाग माना जाता है। आने वाले समय में सूबे में इंवेस्टर मीट होने वाला है, इसका आयोजन भी उनके लिए चुनौती होगी।

ब्रम्हानंद की मुश्किलें

भानुप्रतापपुर विधानसभा उपचुनाव के लिए पांच दिसंबर को वोट पड़ेंगे। वोटिंग पूरे होने के साथ ही बीजेपी प्रत्याशी ब्रम्हानंद नेताम की मुश्किलें बढ़ सकती है। मानकर चलिए, झारखंड पुलिस भी वोटिंग से पहले कार्रवाई की संजीदगी को समझती है। मतदान के बाद वो भी फ्री होगी तो वहीं छत्तीसगढ़ पुलिस भी वोटिंग की बाट जोह रही है। ब्रम्हानंद ने नामंकन फार्म के साथ भरे शपथ पत्र में अपराध दर्ज होने की जानकारी छिपाई है। इस मामले में पुलिस उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर सकती है। कुल मिलाकर उपचुनाव का रिजल्ट कुछ भी आए, ब्रम्हानंद को कुछ दिन कठिनाइयों का सामना करना होगा।

निरंजन और धनंजय

सिकरेट्री लेवल के दो आईएएस अधिकारी अगले जनवरी और फरवरी में रिटायर हो जाएंगे। इनमें निरंजन दास आबकारी आयुक्त और आबकारी सचिव, पंजीयन तथा नान जैसे अहम महकमा संभाल रहे हैं। निरंजन का रिटायरमेंट जनवरी में है तो धनंजय देवांगन उसके एक महीने बाद फरवरी में रिटायर होंगे। निरंजन के बारे में ब्यूरोक्रेसी में चर्चा है कि उन्हें इसी विभाग में संविदा नियुक्ति मिल सकती है। मगर लाख टके का सवाल है कि वर्तमान समय में क्या वे संविदा नियुक्ति चाहेंगे। हमारे खयाल से तो बिल्कुल नहीं। इसके उलट वे भगवान से रोज प्रार्थना कर रहे होंगे, हे ईश्वर! किसी तरह जनवरी निकाल दें। निरंजन दास की तुलना में धनंजय देवांगन को कोई खास पोस्टिंग नहीं मिल पाई। जबकि, वे कांग्रेस नेता के दामाद हैं और अच्छे अधिकारी भी। मगर किस्मत अपनी-अपनी।

रामगोपाल की पोस्टिंग

राज्य सरकार ने रामगोपाल गर्ग को सरगुजा पुलिस रेंज का प्रभारी आईजी अपाइंट किया है। 2007 बैच के आईपीएस अधिकारी रामगोपाल कुछ महीने पहले सीबीआई से डेपुटेशन से लौटे हैं। कह सकते हैं, उन्हें बड़ा जंप मिला है। अभी 2005 बैच आईजी प्रमोट होने वाला है। 2006 बैच को पीछे छोड़ते हुए 2007 बैच के रामगोपाल को रेंज मिल गया। उन्हीं के बैच के दीपक झा बलौदा बाजार जैसे छोटे जिले में एसएसपी हैं, तो जीतेंद्र मीणा जगदलपुर के कप्तान। हालांकि, रामगोपाल की अच्छे अधिकारियों में गिनती होती है।

कवासी अध्यक्ष?

पीसीसी अध्यक्ष मोहन मरकाम का कार्यकाल खतम हो गया है। इस समय वे एक्सटेंशन पर चल रहे हैं। मरकाम के बाद कौन...? यह सवाल कांग्रेस नेताओं के मन-मतिष्क में कौंध रहा है। वैसे, भीतर की खबर यह है कि कांग्रेस किसी आदिवासी चेहरे को ही फिर पार्टी की कमान सौंपेगी। और यह चेहरा मंत्री कवासी लखमा का हो सकता है। हालांकि, बीजेपी ने ओबीसी कार्ड खेलते हुए अरुण साव को प्रदेश अध्यक्ष और नारायण चंदेल को नेता प्रतिपक्ष बनाया है। मगर कांग्रेस के साथ ओबीसी को साधने जैसी अब कोई विवशता नहीं है। सीएम भूपेश बघेल खुद ओबीसी वर्ग से हैं तो ओबीसी का आरक्षण 27 फीसदी बढ़ाने का प्रस्ताव विधानसभा से पारित कर सरकार ने ट्रंप कार्ड चल दिया है। बात कवासी की तो बीजेपी की तरह कांग्रेस पार्टी के पास भी कोई बड़ा आदिवासी चेहरा नहीं है। कवासी मंत्री रहने के साथ ही पीसीसी की कमान भी संभाल सकते हैं। वैसे भी अगला चुनाव भूपेश बघेल के नाम पर ही होना है।

बारनवापारा में सावधानी...

बारनवापारा सेंचुरी अगर आप जा रहे हैं तो बेहद सावधानी के साथ जाइये। पिछले कुछ महीनों में हाथियों के अचानक गाड़ियों के सामने आ जाने की कई घटनाएं हुई हैं। लास्ट संडे को रायपुर की दो फेमिली दो गाड़ियों में देर बारनवापारा गई थी। देर शाम बड़ी घटना होते-होते बची, जब रोड पर गाड़ी के आगे-पीछे हाथियों का झुंड आकर खड़ा हो गया। फॉरेस्ट के अधिकारी भी मानते हैं कि डेढ़ से दो दर्जन हाथियों का समूह अब बारनवापारा को स्थायी ठिकाना बना लिया है। इसलिए, रात में तफरी तो बिल्कुल नहीं।

तहसील सिस्टम पर सवाल

राजधानी में एक ही जमीन तीन लोगो को बेचने के मामले में तरकश में खबर छपने पर रजिस्ट्री अधिकारी को सस्पेंड कर दिया गया। पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर लिया है। मगर इस प्रकरण ने तहसीलदारों के बेलगाम स्वेच्छाचारिता पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। जाहिर है, मनमोहन सिंह गाबा की रजिस्ट्री मार्च में हुई थी। लेकिन तहसीलदार ने इसका नामांतरण नही किया। वही जमीन मई में रूपेश चौबे के नाम से दूसरी बार रजिस्ट्री हो गई। दूसरे रजिस्ट्री का तहसीलदार ने तुरंत नामांतरण कर दिया। जबकि, दूसरे रजिस्ट्री में न सहकारी सोसायटी का एनओसी था, न टीडीएस काटा गया। हास्यपद यह कि दूसरी रजिस्ट्री पार्किंग में हुई। स्टांप शुल्क की चोरी और बी1 में कैफियत में कामर्सियल लैंड को मिटाया भी गया है। रजिस्ट्री के साथ लगे पार्टनरशिप में दो पार्टनर का नाम है जबकि, विक्रेता कोई और। फिर भी तहसीलदार के न्यायालय ने लंबा चौड़ा कई पेज का आदेश पारित कर दूसरी रजिस्ट्री को सही ठहरा दिया। आदेश का सार ये था कि दूसरे रजिस्ट्री के साथ लगे कंपनी के बोर्ड रेजोल्यूशन में सारे डायरेक्टर के दस्तखत है जबकि, पहले रजिस्ट्री में एक ही डायरेक्टर ने बोर्ड रेसोल्शन का सर्टिफाइड जारी किया है। तहसीलदार कई दिनों के एक्सरसाइज के बाद भी ये भूल गया कि ये तो कंपनी ही नही है। दो पार्टनर का पार्टनरशिप है। पार्टनरशिप में ना तो बोर्ड होता है और ना कोई डायरेक्टर होते हैं। ना बोर्ड रेजोल्यूशन होता है। अगर ये कंपनी होती तो भी रजिस्ट्री को सही गलत ठहराने का पावर केवल सिविल कोर्ट को है। अगर यही काम कोई ज्यूडिशियरी का न्यायाधीश कर देता तो हाईकोर्ट अब तक उसको नौकरी से बेदखल कर चुकी होती। पर तहसीलदार को सफाई से इस मामले में बचा लिया गया।

अंत में दो सवाल आपसे

1. भोजराम पटेल महासमुंद एसपी से हट गए तो उन्हें खुश होना चाहिए या दुखी?

2. क्या एसपी की लिस्ट भानुप्रतापपुर उपचुनाव के बाद अगले हफ्ते निकल जाएगी?