शनिवार, 18 जनवरी 2014

तरकश, 19 जनवरी

नो चांस

केंद्रीय कर्मियों का रिटायरमेंट दो साल बढ़ाने के प्रपोजल को प्रधानमंत्री कार्यालय ने दोबारा लौटा दिया है। खजाने के संकट का हवाला देते हुए केंद्रीय वित विभाग ने पीएमओ को रिटायरमेंट बढ़ाने के लिए प्रस्ताव भेजा था। मगर जिस तरह आम आदमी पार्टी का आगाज हुआ, मामला गड़बड़ा गया। यूथ कहीं नाराज न हो जाए, इसको देखते भारत सरकार ने फिलहाल इसे खारिज करना ही मुनासिब समझा। सो, अब नो चांस। दरअसल, 80 हजार स्केल वाले सूबे के तीनों टाप के अफसर, चीफ सिकरेट्री, डीजीपी और पीसीसीएफ दो महीने के भीतर रिटायर होने वाले हैं। इसलिए, स्वाभाविक रूप से यहां काफी उत्सुकता थी। लेकिन डीजीपी और पीसीसीएफ की 31 जनवरी को बिदाई तय मानिये। इसके बाद 28 फरवरी को सीएस का नम्बर आ जाएगा। वैसे, सीएस को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। उन्होंने अभी से दिल्ली लौटने की तैयारी शुरू कर दी है।

एस्सार-2

नक्सलियों के लिए फंड जुटाने के आरोप में पकड़े गए कांकेर के व्यापारियों का मामला एस्सार-2 सरीखा हो सकता है। दो साल पहले दंतेवाड़ा पुलिस ने जिस तरह एस्सार का 15 लाख रुपए नक्सलियों को पहुंचाने के आरोप में वहां के ठेकेदार बीके लाला को पकड़ा था। उसी तरह का केस कांकेर का भी है। एक बड़े ग्रुप का कांकेर के नक्सल इलाके में काम चल रहा है। और, पुलिस के आला अफसरों की मानें तो नीरज और धर्मेंद्र उनके और माओवादियों के बीच मध्यस्थ का रोल निभा रहे थे। इस मामले में चार और रसूखदार कारोबारियों के नाम आ रहे हैं। इनमें दो तो सत्ताधारी पार्टी के एक नेता के खास हैं। तो एक सत्ताधारी पार्टी का मंडल अध्यक्ष रह चुका है। पुलिस अगर कड़ाई से जांच कर दे, तो कांकेर से लेकर रायपुर तक के कई सफेदपोश लोग सलाखों के अंदर होंगे।

नई इंट्री

सेंट्रल डेपुटेशन बीच में छोड़कर एडीजी एमडब्लू अंसारी दिल्ली से छत्तीसगढ़ लौट रहे हैं। उनकी वापसी को डीजीपी की दौड़ से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, डीजीपी कौन बनेगा, यह वक्त बताएगा या फिर डा0 रमन सिंह। मगर यह बात साफ है कि अंसारी के आने के बाद सरकार के सामने विकल्प का टोटा नहीं रहेगा। नायक के बाद सेकेंड नम्बर पर अंसारी हमेशा हाजिर रहेंगे। अलबत्ता, पुलिस मुख्यालय के समीकरण भी चेंज होंगे। एएन उपध्याय को अब डीजी बनने के लिए 2016 तक इंतजार करना होगा। तब, अंसारी के रिटायर होने के बाद पोस्ट खाली होगा। अंसारी अगर दिल्ली से नहीं आते तो रामनिवास के बाद रिक्त पद पर इस साल नहीं, तो अगले साल उपध्याय पक्का डीजी बन जाते। अंसारी के अलावा असम और बंगाल कैडर के दो और सीनियर आईपीएस भी डेपुटेशन पर छत्तीसगढ़ आ रहे हैं। इनमें से एक तो एडीजी होंगे। जाहिर है, पीएचक्यू में सीनियर अफिसरों की कमी नहीं रहेगी।

31 के बाद

चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची का पुनरीक्षण कार्य 31 जनवरी तक बढ़ा दिए जाने के कारण प्रशासनिक फेरबदल फिलहाल टल गया है। आयोग ने राज्य सरकारों से आग्रह किया था कि 15 जनवरी तक कलेक्टरों को चेंज न किया जाए। आयोग ने अब डेट बढ़ा दिया है। हालांकि, आचार संहिता अभी प्रभावशली नहीं है, इसलिए आयोग की बात मानने की बाध्यता नहीं है। मगर सामने लोकसभा चुनाव को देखते राज्य सरकार आयोग को नाराज नहीं करना चाहेगी। इसलिए, अब 31 जनवरी की शाम या इसके दो-एक दिन के भीतर कलेक्टरों का आर्डर निकल जाएगा। मार्च फस्र्ट वीक में लोकसभा चुनाव के लिए आचार संहिता लगने के संकेत हैं, सो सरकार की कोशिश होगी कि दो फरवरी से पहले ट्रांसफर को अंजाम दे दिया जाए।

एक्सचेंज

जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं, कलेक्टरों में रायपुर और बिलासपुर के बीच एक्सचेंज हो सकता है। ठाकुर राम सिंह बिलासपुर से रायपुर और सिद्धार्थ कोमल परदेशी रायपुर से बिलासपुर। वैसे, चेंज होने वाले कलेक्टरों में दर्जन भर से अधिक नाम हो जाएंगे। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, मंुगेली, बलौदाबाजार, जांजगीर भी। जांजगीर कलेक्टर पी अंबलगन को हालांकि, छै महीने ही हुए हैं, मगर उनकी पत्नी कांकेर कलेक्टर हैं। दूरी बहुत हो गई है। पहले वे अगल-बगल के जिलों में थे भी। अंबलगन जगदलपुर कलेक्टर थे। मगर जीरम नक्सली हमले के बाद यह जोड़ी बिछुड़ गई। अब, फिर उन्हें पास-पास लाने की कोशिश की जा रही है।

गूड न्यूज

छत्तीसगढ़ के लिए यह एक अच्छी खबर हो सकती है…..दंतेवाड़ा में लाइवलीहूड कालेज समेत एजुकेशन सेंटर डेवलप किया गया है, उसे देश के अन्य राज्यों में लागू करने के लिए भारत सरकार केस स्टडी तैयार करवा रही है। पिछले सप्ताह केंद्र का तीन सदस्यीय टीम ने दंतेवाड़ा का विजिट किया। इसके बाद रिव्यू करने के लिए केस स्टडी को हावर्ड यूनिवर्सिटी भेजा जाएगा केस स्टडी का थीम यह है कि अगर इच्छा शक्ति हो तो सुधार और विकास के काम करने के लिए यह मायने नहीं रखता कि वह एरिया और सिचुऐशन किस तरह का है। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जैसे रिमोट और हिंसाग्रस्त इलाके में शिक्षा के क्षेत्र में अनूठा काम हो गया। एक ही कैंपस में स्कूल, कालेज, कस्तूरबा विद्यालय, आदिवासी हास्टल, आईटीआई, पालीटेक्निक कालेज, महिला आईटीआई, आजीविका कालेज। वैसे, छत्तीसगढ़ सरकार ने सभी जिलों में लाइवलीहूड कालेज खोलने का ऐलान किया है। अगर पूरे देश में यह लागूू हो गया तो छत्तीसगढ़ के साथ दंतेवाड़ा के तत्कालीन कलेक्टर ओपी चैधरी भी हीरो हो जाएंगे। जिन्होंने दंतेवाड़़ा जैसे जिले में यह काम कर दिखाया।

अंत में दो सवाल आपसे

1. नक्सलियो को मदद करने के आरोप में पकड़े गए नीरज और धर्मेंद्र चोपड़ा जिन लोगों के नाम बताएंगे, पुलिस उन्हंे गिरफ्तार कर सकती है?
2. विधानसभा चुनाव के दौरान ऐसा क्या हुआ कि सरकार अधिकांश आईपीएस अफसरों से नाराज है?

शनिवार, 11 जनवरी 2014

तरकश, 12 जनवरी

बदले-बदले से. सरकार….

सरकार के हैट्रिक बनने का असर सीएम के तेवर और कंफिडेंस से झलकने लगा है। राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने विपक्ष के सारे आरोपों को लच्छेदार भाषण से हवा में उड़ा दिया। सीएम को इससे पहले, इस तरह रौ में बोलते लोगों ने नहींे देखा होगा। वे बोलते गए और विपक्ष अनुशासित विद्यार्थी की तरह सुनता रहा। तो, शुक्रवार को अनुपूरक बजट पर बोलने के दौरान उनके मंत्रियों ने आपस में गुफ्तगू की तो उन्हें भी झिड़कने से नहीं चूके। असल में, सीएम बजट पर बोल रहे थे, बृजमोहन अग्रवाल, केदार कश्यप जैसे कुछ सीनियर मंत्री पीछे मुड़कर बातें करने में मशगूल थे। इस पर पहले तो सीएम ने घुरकर देखा। फिर, गुस्से में बोले, पहले आप लोग बात कर लो, फिर मैं बोलुंगा। इसके बाद सन्नाटा छा गया। विधानसभा परिसर में सीएम के बदले अंदाज की चर्चा भी खूब रही।

भाजपा और डीजीपी

राज्य बनने के बाद पांच आईपीएस ही ऐसे थे, जो छत्तीसगढ़ मांग कर आए थे। इनमें आरएलएस यादव, आरएल आम्रवंशी, राजीव माथुर, संतकुमार पासवान और गिरधारी नायक हैं। पांचों में अभी तक सिर्फ यादव किस्मती निकले, जो जोगी युग में डीजीपी बनने में कामयाब रहे। भाजपा शासनकाल में ऐसे अफसरों को डीजीपी बनने का मौका नहीं मिल सका। आम्रवंशी, माथुर और पासवान…..तीनों यूं ही बिदा हो गए। पांच में से आखिरी अब, गिरधारी नायक बच गए हैं। रामनिवास के इस महीने रिटायर होने के बाद नम्बर उन्हीं का आता है और उनके अलावा फिलहाल, कोई आईपीएस डीजीपी बनने का मापदंड पूरा नहीं करता। बावजूद इसके, यह देखना दिलचस्प होगा कि नायक भाजपा शासनकाल वाला मिथक तोड़ने में सफल होते हैं या……?

जैकेट प्रेम

ब्यूरोके्रट्स के ड्रेस की एक गरिमा होती है। खासकर सीएम या सीएस की मीटिंग हो तो हाफ शर्ट ना पहनना। कलरफुल कपड़ों से परहेज। पीएम या प्रेसिडेंट की विजिट में बंद गले का कोट। मगर अबकी विधानसभा के प्रथम सत्र में नौकरशाहों के जैकेट प्रेम से विधानसभा परिसर में नेताओं और उनमें फर्क करना मुश्किल हो गया। कुछ ब्यूरोक्रेट्स तो पांचों दिन सदन में बदल-बदलकर जैकेट पहनकर पहुंचे। राज्यपाल के अभिभाषण के दिन सीएम और नेता प्रतिपक्ष तक बंद गले का सूट पहनकर आए थे और अफसर रंगीन जैकेट में। कुछ अफसरों में तो होड़ मच गई थी। सदन की लाबी में तभी लोग चुटकी ले रहे थे, रमन सरकार के अफसर कहीं आम आदमी पार्टी ज्वाईन करने की तैयारी तो नहीं कर रहे हैं।

फंस गए राव

सरकार से रार ठानकर सीनियर आईएएस केडीपी राव अब बुरी तरह फंस गए हैं। पिछले साल 2 मई को बिलासपुर का कमिश्नर बनाए जाने के बाद सरकार के खिलाफ उन्होंने कानूनी लड़ाई छेड़ दी थी। मगर कैट के बाद अब, हाईकोर्ट में भी उनकी याचिका खारिज हो गई। राव के करीबी लोगों का कहना है, वे अब सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। मगर इसकी संभावना अब कम ही लग रही है। वहां साल-दो साल और निकल जाएगा। वैसे भी वे आठ महीना से घर में खाली बैठे हैं। स्टे्रज्डी के तहत सरकार ने उन्हें सस्पेंड भी नहीं किया। सस्पेंड होते तो उनकी आधी तनख्वाह मिलती रहती। संस्कृति विभाग ने उनकी गाड़ी भी वापिस ले ली। बच गया है सिर्फ बंगला। हालांकि, राव को सबने समझाया था, सरकार से पंगा लेना अक्लमंदी नहीं है। मगर कोई फर्क नहीं पड़ा। अब अगर वे ज्वाईन किए, तो यही कहा जाएगा, लौट कर बुद्धू घर…..। और सुप्रीम कोर्ट गए तो लंबे समय तक घर में बैठना पड़ जाएगा।

ट्रांसफर का सप्ताह

आमतौर पर सरकार बनने के बाद बडे़ स्तर पर ट्रांसफर-पोस्टिंग होते हैं। लेकिन चुनाव आयोग के चलते सरकार के हाथ बंधे थे। मतदाता सूची का पुनरीक्षण के कारण आयोग ने 15 जनवरी तक कलेक्टरों का ट्रांसफर न करने के लिए कहा था। सो, एक साथ करने के लिए मंत्रालय में भी कुछ नहीं हुआ। अब, बुधवार को चुनाव आयोग की मियाद खतम हो जाएगी। संकेत हैं, इसके दो-एक दिन बाद लिस्ट निकल सकती है। विधानसभा का सत्र भी खतम हो गया है। कल रविवार को सूची पर मंत्रणा होने की खबर आ रही है। इसमें दर्जन भर कलेक्टर प्रभावित होंगे। छोटे जिलों के कई कलेक्टरों के दो साल हो गए हैं। पारफारमेंस के आधार पर उन्हें बदला जाएगा। बड़े जिले में बिलासपुर कलेक्टर ठाकुर राम सिंह का नाम सबसे उपर है। राम सिंह इससे पहले रायगढ़ और दुर्ग जिला कर चुके हैं। सूबे के वे सबसे रसूखदार कलेक्टर माने जाते हैं, इसलिए बिलासपुर के बाद बेशक, उन्हें कोई बडा जिला ही मिलेगा। इसके अलावा मंत्रालय में भी आधा दर्जन विभागों के सिकरेट्री चंेज होंगे। इनमें फूड और होम सबसे उपर है। होम में एनके असवाल का छह साल से ज्यादा हो गया है।

सिर्फ रमन

लोकसभा चुनाव के पहले सरकार आक्रमक प्रचार अभियान में जुट गई है। जनसंपर्क विभाग द्वारा इसके लिए कई योजनाएं बनाई गई है। इसके तहत पूरे प्रदेश में लोक लुभावन योजनाओं के बड़े स्तर पर होर्डिंग्स लगाए जा रहे हैं। विधानसभा चुनाव में चूकि सिर्फ रमन सिंह का चेहरा चला है, उन्हीं के नाम पर वोट मिले हैं। सो, लोकसभा चुनाव में भी इसे कैश करने के लिए होर्डिंग्स में सिर्फ रमन सिंह की ही फोटो होंगी। मंत्रियों की नहीं। बताते हैं, गुजरात समेत कुछ राज्यों में होर्डिंग्स में सिर्फ सीएम की फोटो रहती हैं।

नए चेहरे

गौरीशंकर अग्रवाल के स्पीकर बनने के बाद सोमवार को अपनी शुभेच्छा देते हुए बद्रीधर दीवान ने गलत नहीं कहा कि सदन में नए चेहरों को देखकर लग रहा है, मैं कहां आ गया हूं। वास्तव में, इस बार सदन का नजारा बदला हुआ है। बड़े चेहरे गायब हैं। सत्ता पक्ष की पहली पंक्ति तो कुछ बची हुई है। विपक्ष की अगली दो पंक्ति पूरी तरह साफ हो गई है। स्पीकर के बायी ओर पहली पंक्ति में नेता प्रतिपक्ष रविंद्र चैबे बैठते थे। उसके बाद बोधराव कंवर, प्रेमसाय सिंह, हरिदास भारद्वाज, शक्राजीत नायक, परेश बागबहरा। दूसरी लाइन में ताम्रध्वज साहू, मोहम्मद अकबर, धर्मजीत सिंह, अमितेश शुक्ल, प्रतिमा चंद्राकर। सभी चुनाव हार गए। वहीं, भाजपा के अग्रिम पंक्ति से रामविचार नेताम और चंद्रशेखर साहू इस बार सदन में नहीं हैं। उनकी जगह पर प्रेमप्रकाश पाण्डेय और पुन्नूराम मोहले आ गए हैं।

सलामी जोड़ी

सत्यनारायण शर्मा और भूपेश बघेल में से भले ही कोई नेता प्रतिपक्ष नहीं बन पाया। मगर प्रथम सत्र के ट्रेलर से यह तय हो गया है कि कांग्रेस के ओपनिंग बैट्समैन शर्मा और बघेल ही होंगे। राज्यपाल का अभिभाषण हो या अनुपूरक बजट, दोनों ने आक्रमक बैटिंग की। राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान शर्मा के प्रहार से सरकार का बचाव करने के लिए एक-एक कर अजय चंद्राकर, राजेश मूणत, केदार कश्यप और शिवरतन शर्मा सामने आए। मगर चुटिले और नुकीले तीरों से शर्मा ने सबको धराशायी कर दिया।

अंत में दो सवाल आपसे

1. रिटायर्ड ब्यूरोके्रट्स शरदचंद्र बेहार के आम आदमी पार्टी के सलाहकार बनने पर लोग अक्षय कुमार की खट्टा-मिठ्ठा फिल्म को क्यों याद कर रहे हैं?
2. एक आईएएस का नाम बताएं, जिनके बारे में चर्चा है कि वे चीफ सिकरेट्री बनने के लिए यज्ञ करा रहे हैं?

शनिवार, 4 जनवरी 2014

तरकश, 5 जनवरी

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28 की टिकिट

चीफ सिकरेट्री सुनिल कुमार ने जिस तरह दमदार पारी खेली, उसी दमदारी के साथ वे यहां से बिदा भी होना चाहते हैं। 28 फरवरी को उनका रिटायरमेंट है। इसके बाद वे यहां एक दिन भी नहीं रुकेंगे। उसी दिन शाम को वे छत्तीसगढ़ को बाय-बाय कर देंगे। पता चला है, शम की फ्लाइट की उनकी और टिकिट भी हो गई है। हालांकि, परंपरा फेयरवेल की रही है। मंत्रालय के साथ, आईएएस एसोसियेशन द्वारा बिदाई दी जाती है। मगर उनका फेयरवेल वगैरह नहीं होगा। वजह, सुनिल कुमार इस तरह की चीजें पसंद नहीं करते। दिल्ली में उनके पास सरकारी मकान है। मगर वे उसमें वे नियमानुसार चार महीने ही रह सकते हैं। फरीदाबाद में उनका मकान बन रहा है। तब तक उन्होंने दिल्ली में किराये के मकान में रहना तय किया है। उनके करीबी लोगों का कहना है, कहीं पोस्टिंग के बजाए अब, वे अपना समय लिखने-पढ़ने और समाज सेवा में व्यतीत करना चाहते हैं।

हाट इश्यू

ब्यूरोक्रेसी में इन दिनों भावी चीफ सिकरेट्री और डीजीपी हाट इश्यू बना हुआ है। मंत्रालय के हर कमरे में यही सवाल चल रहा है….नेक्स सीएस कौन होगा…..डीजीपी यहीं से बनंेगे या आयातित होंगे। सीएस के लिए दो नाम प्रमुखता से चल रहे हैं। वो हैं, विवेक ढांड और डीएस मिश्र। ढांड 81 बैच के हैं और मिश्रा 92 बैच का। सो, सीनियरिटी में ढांड हैं। मगर यह भी अहम है कि सीनियरिटी के आधार पर सीएस बनने वाले रामप्रकाश बगाई आखिरी थे। सो, इस बार क्या होगा, उत्सुकता लाजिमी है। उधर, डीजीपी रामनिवास इस महीने 31 को रिटायर हो जाएंगे। उसके बाद गिरधारी नायक के अलावा और कोई नाम नहीं है। पीएचक्यू में पहली बार इस तरह वैक्यूम आया है। वरना, हमेशा डीजीपी के दो-एक दावेदार रहे हैं। असल में, एमडब्लू अंसारी अभी डीजी नहीं बने हैं और एएन उपध्याय की 30 साल की सर्विस पूरी नहीं हुई है। ऐसे में, मध्यप्रदेश से किसी आईपीएस को बुलाने की बात भी उड़ रही है। मगर सारे समीकरणों का देखते लगता है, नायक का नाम फायनल हो जाएगा।

स्वागत विहार-2

रायपुर में स्वागत विहार-2 का शिकार होने से रायपुर के लोेग बाल-बाल बच गए। दरअसल, कचना इलाके में एक नामी बिल्डर ने हाउसिंग बोर्ड की साढ़े सात एकड़ जमीन न केवल अपने पजेशन में ले लिया था, बल्कि उसने टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से एप्रूवल कराने के साथ ही नगर निगम से नक्शा भी पास करा लिया था। उसी दौरान स्वागत विहार एपीसोड हो गया। और संजय बाजपेयी को जेल जाना पड़ गया। इससे घबराकर बिल्डर ने हाउसिंह बोर्ड के अफसरों के पास यह कहते हुए जमीन सरेंडर कर दिया कि कोई कब्जा न कर लें, इसलिए उसने अपने घेरे में ले लिया था। सूत्रों का कहना है, रायपुर में कई बिल्डरों ने ऐसा खेल किया है। इसकी अगर जांच हो जाए, तो कम-से-कम दर्जन भर जेल में होंगे।

अब लोकसभा

विधानसभा चुनाव तो निबट गया मगर अब राजनीति पार्टियों को लोकसभा के लिए कंडिडेट ढूंढने में, ठंड में भी पसीना आ रहा है। दोनों ही प्रमुख पार्टियों के लिए 2014 का चुनाव चैलेंजिंग है। मगर, कांग्रेस का मामला और पेचीदा है। ऐसे में, उसे विधानसभा चुनाव में हारे हुए चेहरों पर भी दांव लगाना पड़ सकता है। बिलासपुर में धर्मजीत सिंह का नाम सामने आ ही रहा है। इसी तरह दुर्ग में रविंद्र चैबे और घनराराम साहू के बाद कांग्रेस को कोई नाम नहीं सूझ रहा है। राजनांदगांव में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। एक नाम है, देवव्रत सिंह। इसमें भी कहीं मुख्यमंत्री के बेटे अभिशेक खड़े हो गए तो चुनाव और टफ हो जाएगा। उधर, अजीत जोगी को रायगढ़ से उतारने के संकेत मिल रहे हैं। रायपुर की स्थिति भी अलग नहीं है। कांग्रेस के सूत्रों पर अगर यकीन करें तो सिचुएशन को समझते हुए पार्टी रायपुर से सत्यनारायण शर्मा को खड़ा करने के लिए विचार कर रही है। पार्टी के सभी नेताओं का मानना है कि शर्मा रायपुर से मजबूत दावेदार हो सकते हैं। और, कहना तो ऐसा भी है कि इस भूमिका के लिए ही नेता प्रतिपक्ष के लिए उनका नाम उस ढंग से नहीं चला, जैसा कि होना चाहिए था।

आम आदमी का डंडा

हमारे मंत्रियों को भी टीम केजरीवाल से कुछ नसीहत लेनी चाहिए। और कुछ ना सही, कम-से-कम सादगी ही सही। टीम केजरीवाल मेट्रो में शपथ लेने पहुंची। ना फैब का कुर्ता और ना ही चकाचक जैकेट। कार केट कौन कहंे, लाल बत्ती भी नहीं। प्रायवेट कार से मंत्रालय गए। एक अपने मंत्रीजी लोग हैं। पूरी ताकत शन-शौकत के जुगाड़ में लगा देते हैं। पसंद का पीए, पसंद का गनमैन और पसंद की गाड़ी। वाहन के आगे सायरन बजाते हुए जब तक पुलिस की गाड़ी नहीं चले, तब तक उन्हें यकीन नहीं होता कि वे मंत्री हैं। आगे तो आगे, पीछे भी पुलिस की गाड़ी होनी चाहिए। साथ में, विभाग की कुछ खाली गाडि़यां भी। ताकि, काफिले से लगे के फलां मंत्रीजी जा रहे हैं। काफिला बड़ा है मतलब जलवेदार हैं। जोगी सरकार में लाल बत्ती तो थी ही नहीं, 2003 में रमन सरकार ने सुरक्षा के लिहाज से केवल गृह मंत्री को पायलेटिंग और फालो गाड़ी की सुविधाएं दी थी। मगर बाद में सरकार पर प्रेशर बनाकर कई मंत्रियों ने यह सुविधाएं हथिया ली। अब, मंत्रीजी का काफिला निकलता है, तो पायलट गाड़ी का पुलिस वाला हाथ में डंडा लेकर आम आदमी को ऐसे हकालता है, जैसे किसी जानवर को सड़क से भगा रहा हो। मगर सवाल यह है कि अगले चुनाव में कहीं आम आदमी का डंडा चल गया तो हमारे मंत्रीजी लोगों का क्या होगा।

15 के बाद

अशोक जुनेजा के प्रमोशन के कारण आईपीएस की एक छोटी लिस्ट तो निकल गई मगर आईएएस में चुनाव आयोग का पेंच आ गया है। मतदाता सूची का पुनरीक्षण के चलते आयोग ने 15 जनवरी तक कलेक्टरों को चेंज नहीं करने कहा है। सो, कलेक्टरों के चक्कर में आईएएस की लिस्ट अटक गई है। हालांकि, पहले यह खबर आ रही थी कि आयोग से परमिशन लेकर कुछ कलेक्टरों को बदला जाए। साथ में सिकरेट्रीज को भी। मगर अंदर से जैसी खबरें आ रही हैं, सरकार चाह रही है कि 15 के बाद एक साथ ही सिकरेट्रीज और कलेक्टरों की लिस्ट निकाली जाए। इसलिए, मामला आगे बढ़ सकता है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. मंत्रियों के प्रायवेट होर्डिंग्स का भुगतान मंत्री अपने जेब से करते हैं या उसे सरकारी बिल में एडजस्ट किया जाता है?
2. इस चर्चा में कितना दम है कि दिल्ली में लोकसभा का चुनाव लड़ने के लिए आम आदमी पार्टी सूबे के एक नौकरशाह से संपर्क करने की कोशिश कर रही है?

शनिवार, 28 दिसंबर 2013

तरकश, 29 दिसंबर

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अरबिंद और अमन

दिल्ली के सीएम अरबिंद केजरीवाल और छत्तीसगढ़ में प्रींसिपल सिकरेट्री टू सीएम अमन सिंह। दोनों के नाम सिर्फ अ से शुरू नहीं होते बल्कि और कई समानताएं हैं। दोनों भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी हैं। और बैच भी एक ही, 1995। दोनों के लिए 2013 कसौटी भरा रहा। आप नहीं जीतती तो कल्पना कीजिए, अरबिंद आजकहां होते और पालीटिशियन और ब्यूरोक्रेट्स उनके बारे में क्या बोल रहे होते। अमन के लिए भी स्थिति जुदा नहीं थी। एक ने भारतीय राजनीति में नया इतिहास लिखते हुए दिल्ली के सीएम बनें। तो दूसरे ने रमन सिंह की हैट्रिक बनवाने में कोई कसर नहीं उठा रखा। भाजपा अगर नहीं आती तो रमन सिंह नेता प्रतिपक्ष बन जाते। मगर जरा सोचिए, अमन सिंह कहां होते। बहरहाल, अमन ने अपना पूरा बेस्ट झोंक दिया। झलियामरी और जीरम घाटी कांड में जब सरकार डगमगाने लगी थी तब आक्रमक प्रचार अभियान के जरिये सरकार को फिर से पटरी पर लाने में कामयाब रहे। विकास यात्रा का दूसरा चरण जब चालू हुआ तो लगा ही नहीं कि जीरम घाटी जैसा भयानक हादसा हुआ है। मई के बाद अमन ने कभी छुट्टियां नहीं ली। दिन-रात लगे रहे। रात तीन बजे के पहले कभी सोए नहीं। सिर्फ व्यूह तैयार करते रहे। यही वजह थी कि एससी के 10 में से 9 सीटें भाजपा की झोली में आने जैसा अजूबा हो गया। और 2013 में जिस तरह अरबिंद पावरफुल शख्सियत बनें, उसी तरह अमन सूबे के पावरफुल ब्यूरोक्रेट्स। रमन सिंह ने हैट्रिक बनाने के बाद पहला आर्डर अमन का निकाला पीएस का। सिंगल आर्डर। मंत्रियों के षपथ से कुछ घंटे पहले। इससे अंदाजा लगा सकते हैं रमन केे लिए अमन की अहमियत का। और उनके पावर का।

आम आदमी का 2013

2013 में आम आदमी ने सिर्फ दिल्ली में अपनी ताकत नहीं दिखाई। बल्कि, छत्तीसगढ़ की जनता ने भी राजनेताओं को अपने पावर का अहसास कराया। खास कर उन्हें जो जनता का सेवक के बजाए खुद को उस इलाके का माई-बाप समझ बैठे थे। आम आदमी ने पांच दिग्गज मंत्रियों को कुर्सी से उतार दिया। तो स्पीकर और डिप्टी स्पीकर तक अपनी सीट नहीं बचा पाए। यहीं नहीं, कांग्रेस पार्टी का उपर का पूरा नेतृत्व ही साफ हो गया। मैनेजमेंट के जरिये कुछ मठ्ठाधीश जरूर अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे। मगर, ऐसे नेताओं की आखों में भी 2018 का खौफ साफ दिखने लगा है। केजरीवाल ने उम्मीदों का जो दीपक जलाया है, यकीनन उसकी रोशनी यहां भी आएगी। और तब राजनेताओं का क्या होगा?

आम आदमी का डंडा-1

दिल्ली में आम आदमी की सरकार बनने के बाद छत्तीसगढ़ में खासकर सत्ताधारी पार्टी के लिए चुनौती खड़ी हो गई है। कांग्रेस को ज्यादा फिकर इसलिए नहीं होगा कि उसके पास खोने के लिए अब कुछ बचा नहीं है। मगर भाजपा के पास तो है। अगले साल नगरीय निकाय चुनाव में भी इसका ट्रेलर दिख सकता है। जिस तरह आप की तैयारियां चल रही है, और जिस तरह के लोग उससे जुड़ रहे हैं, कुछ नगर निगमों पर उसका कब्जा हो जाए तो ताज्जुब नहीं। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि विकल्प की आवश्यकता आम आदमी महसूस कर रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो नोटा में इतने वोट नहीं पड़ते। ऐसे में, सियासी पार्टियों को अपनी स्टेज्डी बदलनी पड़ेगी। ठेकेदार, सप्लयार, खटराल नेताओं के बदले आम आदमी के बीच से पढ़े-लिखे, साफ-सुथरे चेहरों को पार्टी में लाना पड़ेगा। क्योंकि, अब वोटों के ठेकेदार नहीं चलने वाले। अब, चेहरा और काम बोलेगा। राजनीतिक पार्टियां अगर स्टाईल नहीं बदली तो 2018 का चुनाव बुरा हो सकता है। वजह यह कि शहरों के चैक-चैराहों से लेकर गांव के चैपालों तक, मंत्रालय के गलियारों से लेकर ट्रेन और बसों में, सिर्फ एक ही चर्चा है, टीम केजरीवाल की तरह अच्छे लोगों को राजनीति में आना चाहिए। और ईमानदारी से काम करेंगे, तो जनता हाथोंहाथ लेगी। सो, सावधान।

आम आदमी का डंडा-2

हमारे मंत्रियों को भी टीम केजरीवाल से कुछ नसीहत लेनी चाहिए। और कुछ ना सही, कम-से-कम सादगी ही सही। टीम केजरीवाल मेट्रो में शपथ लेने पहुंची। ना फैब का कुर्ता और ना ही चकाचक जैकेट। कार केट कौन कहंे, लाल बत्ती भी नहीं। प्रायवेट कार से मंत्रालय गए। एक अपने मंत्रीजी लोग हैं। पूरी ताकत शन-शौकत के जुगाड़ में लगा देते हैं। पसंद का पीए, पसंद का गनमैन और पसंद की गाड़ी। वाहन के आगे सायरन बजाते हुए जब तक पुलिस की गाड़ी नहीं चले, तब तक उन्हें यकीन नहीं होता कि वे मंत्री हैं। आगे तो आगे, पीछे भी पुलिस की गाड़ी होनी चाहिए। साथ में, विभाग की कुछ खाली गाडि़यां भी। ताकि, काफिले से लगे के फलां मंत्रीजी जा रहे हैं। काफिला बड़ा है मतलब जलवेदार हैं। जोगी सरकार में लाल बत्ती तो थी ही नहीं, 2003 में रमन सरकार ने सुरक्षा के लिहाज से केवल गृह मंत्री को पायलेटिंग और फालो गाड़ी की सुविधाएं दी थी। मगर बाद में सरकार पर प्रेशर बनाकर कई मंत्रियों ने यह सुविधाएं हथिया ली। अब, मंत्रीजी का काफिला निकलता है, तो पायलट गाड़ी का पुलिस वाला हाथ में डंडा लेकर आम आदमी को ऐसे हकालता है, जैसे किसी जानवर को सड़क से भगा रहा हो। मगर सवाल यह है कि अगले चुनाव में कहीं आम आदमी का डंडा चल गया तो हमारे मंत्रीजी लोगों का क्या होगा।

बड़ा प्लेयर

अशोक जुनेेजा के रूप में एक बड़े प्लेयर की इंट्री से पीएचक्यू में एक नए समीकरण की शुरूआत हो सकती है। आईपीएस में जुनेजा का सबसे हाई सर्विस रिकार्ड रहा है। बिलासपुर और रायगढ़ का एसपी, रायपुर, दुर्ग का एसएसपी, बिलासपुर और दुर्ग का आईजी। होम सिकरेट्री, ट्रांसपोर्ट कमिश्नर। सेंट्रल डेपुटेशन करके उन्होंने अपनी लकीर और लंबी कर ली है। यही वजह है कि 5 दिसंबर को आर्डर पर सीएम का हस्ताक्षर हो जाने के बाद भी उनका आदेश 28 तारीख तक अटका रहा। बड़ा कश्मकश रहा….जुनेजा को क्या विभाग दिया जाए। फाइल योजना एवं वित्तीय प्रबंध के लिए चली मगर आखिर में उन्हें प्रशासन देने का फैसला किया गया। जुनेजा के बाद एक फरवरी को गिरधारी नायक भी पीएचक्यू पहुंच जाएंगे। उनके साथ अमरनाथ उपध्याय और संजय पिल्ले भी। उम्मीद कीजिए, अरसे बाद पीएचक्यू की साख लौटेगी।

जीपी हुए ताकतवर

आईपीएस के फेरबदल में जीपी सिंह और पावरफुल हो गए हैं। अभी तक वे रायपुर के आईजी के साथ ही पुलिस महकमे का सबसे अहम डिपार्टमेंट योजना और वित्तीय प्रबंध की कमान भी संभाल रहे थे। तब रायपुर रेंज में सिर्फ रायपुर और नया जिला बलौदाबाजार था। मगर सरकार ने रेंज का पुनर्गठन करके रायपुर में धमतरी, महासमंद और गरियाबंद जिले को भी शमिल कर दिया है। याने रायपुर अब, पांच जिलों का रेंज बन गया। और जीपी उसके आईजी।

15 के बाद

अशोक जुनेजा के प्रमोशन के कारण आईपीएस की एक छोटी लिस्ट तो निकल गई मगर आईएएस में चुनाव आयोग का पेंच आ गया है। मतदाता सूची का पुनरीक्षण के चलते आयोग ने 15 जनवरी तक कलेक्टरों को चेंज नहीं करने कहा है। सो, कलेक्टरों के चक्कर में आईएएस की लिस्ट अटक गई है। हालांकि, पहले यह खबर आ रही थी कि आयोग से परमिशन लेकर कुछ कलेक्टरों को बदला जाए। साथ में सिकरेट्रीज को भी। मगर अंदर से जैसी खबरें आ रही हैं, सरकार चाह रही है कि 15 के बाद एक साथ ही सिकरेट्रीज और कलेक्टरों की लिस्ट निकाली जाए। इसलिए, मामला आगे बढ़ सकता है।

अंत में दो सवाल आपसे

1 बस्तर में तैनात जिला पंचायत के एक सीईओ का नाम बताएं, जिनके कारनामों से पब्लिक हलाकान हो गई है?
2. किस सीनियर आईएएस को राजस्व बोर्ड का अगला चेयरमैन बनाने की तैयारी की जा रही है?

शनिवार, 21 दिसंबर 2013

तरकश, 22 दिसंबर

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पुनर्गठन की तलवार

मंत्रिमंडल में तीन पोस्ट बचाकर सीएम ने विधायकों को सिर्फ लालीपाप नहीं दिखाया बल्कि, मंत्रियों पर भी तलवार लटका दिया है। जाहिर है, लोकसभा चुनाव के बाद जब मंत्रिमंडल का पुनर्गठन होगा तो ऐसा नहीं है कि केवल तीन नए मंत्री ही शामिल होंगे। पुराने के कुछ विभाग खिसक सकते हैं तो कुछ का कद भी बढ़ सकता है। आखिर, नगरीय प्रशासन विभाग सीएम ने अपने पास रखा है, उसे किसी नए मंत्री को तो वे देंगे नहीं। बहरहाल, लोकसभा चुनाव में, जिस मंत्री के इलाके में पार्टी का ग्राफ गिरा, तो वहां कुछ भी हो सकता है। इस खतरे से मंत्रीगण अनजान नहीं हैं। तभी तो, दस का दम दिखाते हुए मुख्यमंत्री ने कई मंत्रियों का कद बौना किया तो किसी ने उह, आह भी नहीं किया। दबंग मगर गंभीर मिजाज के एक मंत्रीजी शपथ ग्रहण के एक दिन पहले शाम को सीएम हाउस पहुंचे थे। विभाग का संदर्भ आया तो बड़ी विनम्रता से उन्होंने कहा, आप मुख्यमंत्री हैं, आप जो विभाग दे दीजिए, मुझे कोई दिक्कत नहीं है। शुक्रवार को मंत्रालय में कार्यभार संभालने के बाद मंत्रीगण मुख्यमंत्री से उनके कक्ष में बुके भेंट कर धन्यवाद देना नहीं भूले।

कत्ल की रात

16 दिसंबर की रात मंत्रिपद के दावेदारों के लिए कत्ल की रात से कम नहीं थी। सीएम दिल्ली से लिफाफा लेकर लौट चुके थे। और मार्केट में तरह-तरह की अफवाहें चल रही थी….. कोई सीनियर मंत्रियों को लोकसभा चुनाव लड़ाने की बात कर रहा था……कुछ को किनारे करने की अटकलें लगाई जा रही थी। सीएम हाउस से कोई खबर नहीं आ रही थी। सभी अपना मोबाइल आन रखे थे। खासकर व्यक्तिगत मोबाइल की घंटी बजने पर तत्काल लपकते ……शायद सीएम हाउस से बुलौवा होगा। मगर रात में कोई संदेश नहीं आया। मंत्रियों की जान में जान तब आई, जब 17 दिसंबर को सीएम हाउस से फोन आना प्रारंभ हुआ। हालांकि, कुछ को डर उसमें भी लग रहा था कि, डाक्टर साब तसल्ली देने के लिए कहीं न बुलाए हों। आखिर, विक्रम उसेंडी और दयालदास बघेल के साथ ऐसा ही हुआ। सीएम ने जाते ही जिन्हें बधाई दी, उनकी गले में अटकी सांस भीतर गई। असल में, इस बार सिर्फ कहो दिल से……चला था, इसलिए मंत्री सहमे हुए थे कि डाक्टर साब का जो दिल कहेगा, वही करेंगे।

देर आए, दुरुस्त आए

आईपीएस को जीएडी में लाने से आईपीएस लाबी भले ही खुश नहीं है मगर आईएफएस अफसरों को मुंहमांगी मुराद मिल गई है। आईएफएस भले ही डेपुटेशन में अच्छी पोस्टिंग पा जाते हैं मगर पोस्टिंग और प्रमोशन के मामले में उनका बुरा अनुभव रहा है। आईएएस में 97 बैच तक के अफसर सिकरेट्री बन गए हैं। आईएफएस में 90 बैच वाले सीसीएफ नहीं बन पाए हैं। भारत सरकार ने सीसीएफ को सर्किल में पोस्ट करने की अनुमति दे दी है। मगर छत्तीसगढ़ में सीसीएफ धक्के खा रहे हैं और प्रभारी सीएफ मलाई छान रहे हैं। आईपीएस तो बर्दी का रौब दिखाकर ब्यूरोक्रेसी से अपना काम निकाल लेते हैं। उनका काम कभी नहीं रुकता। किन्तु आईएफएस की कोई सुनवाई नहीं होती। बैजेंद्र कुूमार थोड़े दिन के लिए सिकरेट्री रहे तो कुछ आईएफएस का प्रमोशन हो गया वरना, मंत्री और मंत्री के पीए के आगे फाइल बढ़ नहीं पाती थी। अब तो आईएफएस डाक्टर साब की जय-जयकार कर रहे हैं।

इसी हफ्ते

मंत्रिमंडल के गठन के बाद अब, सबकी नजर प्रशासनिक फेरबदल पर टिक गई है। हालांकि, परिवर्तन बहुत बड़ा नहीं होगा। एक तो विकल्प सीमित है। दूसरा, सामने लोकसभा चुनाव है। काम करने के लिए मात्र दो महीना ही बचा है। जनवरी और फरवरी। ऐसे में बडी सर्जरी संभव प्र्रतीत नहीं होता। मतदाता सूची का पुनरीक्षण के चलते चुनाव आयोग ने 15 जनवरी तक कलेक्टरों के ट्रांसफर पर वैसे भी रोक लगा दी है। सो, लिस्ट छोटी ही होगी। यद्यपि, सरकार में अभी इस पर कोई चर्चा नहीं हुई है। लेकिन, इस हफ्ते के अंत तक होने के संकेत मिल रहे हैं।

उसेंडी पर विचार

बस्तर और सरगुजा में आदिवासियों के समर्थन के बाद भी कांग्रेस ने ओबीसी के भूपेश बघेल को पीसीसी चीफ अपाइंट कर दिया मगर दूरगामी सोच के तहत भाजपा फिर ट्राईबल कार्ड ही आजमाने पर विचार कर रही है। खबर है, मंत्री बनने से वंचित हुए विक्रम उसेंडी रामसेवक पैकरा की जगह ले सकते हंै। उसेंडी गोंड आदिवासी हैं। और छत्तीसगढ़ में इसी तबके के आदिवासियों की तदाद ज्यादा है। सो, भाजपा इसका लाभ उठाने की कोशिश कर सकती है। हालांकि, ट्राई पूर्व स्पीकर धरमलाल कौशिक के लिए भी चल रहा है। कौशिक चुनाव हार चुके हैं, इसलिए सरकार के लिए चुनौती भी नहीं बन सकेंगे। मगर पलड़ा उसेंडी का भारी दिखता है। वैैसे भी भाजपा जिस तरह का अध्यक्ष नियुक्त करती है, उसमें उसेंडी ही फीट बैठते हैं।

दूसरी बार

चरणदास महंत के लिए अध्यक्ष पद का ताज दोनों बार कांटो भरा ही साबित हुआ। पहली बार 2005 में उन्हें पीसीसी चीफ बनाया गया था। मगर मई 2008 में अपमानजनक ढंग से उन्हें डिमोट करते हुए कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया। तब सेकेंड लाइन के धनेंद्र साहू को कमान सौंपी गई थी। जीरम नक्सली हमले में नंदकुमार पटेल की मौत के बाद पार्टी ने एक बार फिर भरोसा करते हुए महंत को पीसीसी चीफ बनाया। मगर उनकी दूसरी पारी साढ़े छह महीने में ही खतम हो गई। विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी ने उन्हें हटाकर भूपेश बघेल को अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।

काश! ऐसा ही होता

गुरूवार को नया मंत्रालय पहली बार गुलजार दिखा। मौका था, नए मंत्रियों के कार्यभार ग्रहण का। सीएम मंत्रालय में थे। नौ में से आठ मंत्री भी थे। साथ में बड़ी संख्या में उनके समर्थक भी। वीरान रहने वाले गलियारे लोगों से भरे थे। 7 नवंबर 2012 को मंत्रालय का उद्घाटन हुआ था और इसके बाद कभी भी मंत्रालय में ऐसा दृश्य नहीं दिखा। 2013 पूरा बीत गया, कैबिनेट की बैठक को छोड़कर शायद ही कोई मंत्री अपने कक्ष में बैठा हो। रायपुर में रहने पर सीएम जरूर हफ्ते में दो-तीन बार मंत्रालय चले जाते थे। लेकिन मंत्रियों को इससे कोई मतलब नहीं था। मंत्रालय की अगर रौनक बनानी हो तो सीएम को कम-से-कम मंत्रियों को मंत्रालय आने ताकीद करनी चाहिए।

अंत में दो सवाल आपसे

1. रायपुर में किस मंत्री के पास सबसे अधिक जमीन होगी?
2. युद्धवीर सिंह जूदेव किस वजह से मंत्री बनने से वंचित हो गए?

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

तरकश, 15 दिसंबर

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रमन एक्सप्रेस

सत्ताधारी पार्टी के लिए यह राहत की बात होगी…….सूबे में अब न आदिवासी एक्सप्रेस दौड़ पाएगी और ना ही ओबीसी की कोई लामबंदी होगी। दौड़ेगी तो सिर्फ रमन एक्सप्रेस। दरअसल, धरमलाल कौशिक, चंद्रशेखर साहू, हेमचंद यादव और नारायण चंदेल जैसे सत्ताधारी पार्टी के ओबीसी चेहरे चुनाव हार गए। तो शीर्ष आदिवासी मंत्री रामविचार नेताम और ननकीराम कंवर भी अपनी सीट नहीं बचा सकें। यही नहीं, जिस बस्तर की बदौलत दोनों बार भाजपाकी सरकार बनी थी, वहां पार्टी 11 से चार सीट पर सिमट गई। आदिवासी एक्सप्रेस के डिरेल होने का एक नजारा बुधवार को सीएम हाउस में दिखा। 10 साल तक मंत्रीगिरी किए एक आदिवासी विधायक सीएम के सामने सहमे हुए खड़े थे। तो आदिवासी एक्सप्रेस का शिगुफा छोड़ने वाले नेता रमन से कह रहे थे, डाक्टर साब, केवल आपके चलते पार्टी जीती है। वरना, लुटिया डूब गई होती। अब क्या करें……मजबूरी है…….।

मंत्रियों पर अंकुश

रमन सिंह के चेहरे पर भरोसा करके जनता ने भाजपा को भले ही सिंहासन पर बिठा दिया हो मगर जनता की उम्मीदों पर सरकार खरी नहीं उतरी और मंत्रियों ने अपना काम नहीं सुधारा तो इस बार आधे मंत्री ही हारे हैं, 2018 मेंऔर मुश्किलें बढ़ जाएंगी। दिल्ली जैसे हालत के खतरे भी होंगे। 15 साल तक सत्ता में रही कांग्रेस वहां एक अंक में आ गई। बहरहाल, मंत्री बनने से पहले ही नेताओं ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए हैं। राजधानी के एक बड़े हाउस में कुछ अफसरों से चर्चा करते हुए एक नेता खम ठोक रहे थे, अब फिर जीत कर आ गया हूं, और फलां अफसर को छोड़ूंगा नहीं। भाजपा की जीत से मंत्री बौराए मत, इसके लिए सरकार और संगठन दोनों को नजर रखना होगा। खासकर रमन की चुनौती बढ़ गई है। उन्हें लोगो के मन को समझना होगा। लोग चाहते हैं कि मंत्रियों की निरंकुशता पर लगाम लगाई जानी चाहिए। कई मंत्री मैनेजमेट और पैसे के जोर पर भले ही चुनाव निकाल लिए हो, मगर इसे भी ध्यान रखना होगा कि उनके भ्रष्ट कारनामों की वजह से सत्ताधारी पार्टी बदनाम हुई और दूसरी सीटों पर इसका असर भी दिखा। हालांकि, अफसरों की पहली मीटिंग मे सीएम ने भ्रष्टचार के खिलाफ बातें करके अपरोक्ष तौर पर भावी मंत्रियों को कड़ा संदेश देने का काम किया कि अब ऐसा नहीं चलेगा।

बल्ले-बल्ले

डा0 रमन सिंह की हैट्रिक बनने से ब्यूरोक्रेसी में भी जश्न का माहौल है। होगा भी क्यों नहीं, जो मंत्री और विधायक सरकार में अफसरशाही हावी होने का आरोप लगाते रहे, वे सभी निबट गए या मैनेजमेंट करके जीत पाए। पांच मंत्री समेत आठ दिग्गज नेता निबट गए। काम आया रमन का चेहरा और अफसरों द्वारा किए गए विकास के काम।

मैनेजमेंट

पहले चरण की 18 सीटों पर पार्टी के पिछड़ने की रिपोट्र्स रमन सिंह को मिल गई थी। सरगुजा में भी हालात अच्छे नहीं थे। इसलिए, उन्होंने मैदानी इलाके की सीटों पर पूरा फोकस किया। और उनकी रणनीति कामयाब रही। एक-एक सीट को खुद हैंडिल किया। मंत्रियों में अमर अग्रवाल की स्थिति कुछ थी। बाकी सभी अपना किला बचाने में लगे थे। बृजमोहन अग्रवाल जैसे मंत्री रायपुर दक्षिण से बाहर नहीं निकल सकें। इसलिए, मंत्रियों से कोई सहयोग नहीं मिला। ऐसे में, रायगढ़ में बिहार भाजपा के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री गिरिराज किशोर को, तो दुर्ग, कवर्धा में नागेन्द्र सिंह को बिठाया गया। अमर की जीत में कोई शंका नहीं थी, इसलिए सीएम ने पोलिंग के 24 घंटे पहले अमर को फोन करके बेलतरा और तखतपुर में मदद करने कहा। जाहिर है, इन दोनों सीटों का बड़ा हिस्सा बिलासपुर शहर से लगा है। बेलतरा के 55 हजार वोट बिलासपुर के शहरी इलाके में हैं। दोनों सीटों की स्थिति बुरी थी। और भाजपा की हारने वाली सूची में ये दोनों सीटें सबसे उपर थी। मगर मैनेजमेंट का कमाल कि दोनों ही सीटें भाजपा के खाते में चली गई।

पुराने चेहरे

चूकि सरकार रिपीट हो गई है, इसलिए लोकसभा चुनाव तक नौकरशाही में बड़ा फेरबदल नहीं होने वाला। बहुत हुआ तो एकदम खराब परफारमेंस वाले दो-तीन कलेक्टर, एसपी चेंज हो जाएं। सीएम सचिवालय के चेहरे भी वही होंगे। उधर, भारत सरकार ने रिटायरमेंट दो साल नहीं भी बढ़ाया तो सरकार चीफ सिकरेट्री सुनिल कुमार को फरवरी में रिटायर नहीं करने वाली। रमन चाहते हैं कि कम-से-कम लोकसभा चुनाव तक यहां रहें। पता चला है, उन्हें छह महीने का एक्सटेंशन दिया जाएगा।

गड्ढा खोदा

ठीक ही कहते हैं, दूसरों के लिए गड्ढा नहीं खोदना चाहिए, आदमी उसमें कभी खुद भी गिर सकता है। सरगुजा के एक भाजपा नेता ने पास-पड़ोस की सीटों पर पार्टी की लुटिया डूबाने में कोई कमी नहीं की। कई साथियों को हराने के लिए उन्होंने सुपारी दे दी थी। मगर विरोध की आंधी में खुद भी निबट गए। नेताजी के चलते सामरी जैसी सीट भाजपा लूज कर गई, जहां से कांग्र्रेस आज तक सिर्फ एक बार जीती है। पिछले छह चुनाव से वहां भाजपा जीतते आ रही थी। नेताजी ने रेणुका सिंह को भी हरवा दिया। आलम यह रहा कि भैयालाल रजवाड़े जब रमन सिंह से मिलने सीएम हाउस पहुुंचे तो कहा, मैं जीरम घाटी से बचकर आ रहा हूं, वरना, मुझे मारने के लिए पूरी घेरेबंदी थी।

भावुक हुए रमन

काउंटिंग के दूसरे दिन दुर्ग ग्रामीण की विधायक रमशीला साहू जब सीएम हाउस पहुंची तो उन्हें देखकर रमन सिंह भावुक हो गए। आगंतुक कक्ष में जब सामने रमशीला पड़ी तो उन्होंने कहा, अदृभूत…..रमशीला तुमने तो गजब कर डाला……तुमने तो असंभव को संभव बना डाला। असंभव वाली बात को उन्होंने तीन बार रिपीट किया। जाहिर है, रमशीला को रमन ने ही मैदान मंे उतारा था और लोग छूटते ही कहते थे, रमशीला तीसरे नम्बर पर आएंगी।

 अंत में दो सवाल आपसे

1. बृजमोहन अग्रवाल से 35 हजार वोट से किरणमयी नायक के हारने के पीछे क्या चक्कर था?
2. रमन सिंह के पुराने मंत्रिमंडल के किन दो मंत्रियों को ड्राप करने की चर्चा है?

तरकश, 15 दिसंबर

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रमन एक्सप्रेस

सत्ताधारी पार्टी के लिए यह राहत की बात होगी…….सूबे में अब न आदिवासी एक्सप्रेस दौड़ पाएगी और ना ही ओबीसी की कोई लामबंदी होगी। दौड़ेगी तो सिर्फ रमन एक्सप्रेस। दरअसल, धरमलाल कौशिक, चंद्रशेखर साहू, हेमचंद यादव और नारायण चंदेल जैसे सत्ताधारी पार्टी के ओबीसी चेहरे चुनाव हार गए। तो शीर्ष आदिवासी मंत्री रामविचार नेताम और ननकीराम कंवर भी अपनी सीट नहीं बचा सकें। यही नहीं, जिस बस्तर की बदौलत दोनों बार भाजपाकी सरकार बनी थी, वहां पार्टी 11 से चार सीट पर सिमट गई। आदिवासी एक्सप्रेस के डिरेल होने का एक नजारा बुधवार को सीएम हाउस में दिखा। 10 साल तक मंत्रीगिरी किए एक आदिवासी विधायक सीएम के सामने सहमे हुए खड़े थे। तो आदिवासी एक्सप्रेस का शिगुफा छोड़ने वाले नेता रमन से कह रहे थे, डाक्टर साब, केवल आपके चलते पार्टी जीती है। वरना, लुटिया डूब गई होती। अब क्या करें……मजबूरी है…….।

मंत्रियों पर अंकुश

रमन सिंह के चेहरे पर भरोसा करके जनता ने भाजपा को भले ही सिंहासन पर बिठा दिया हो मगर जनता की उम्मीदों पर सरकार खरी नहीं उतरी और मंत्रियों ने अपना काम नहीं सुधारा तो इस बार आधे मंत्री ही हारे हैं, 2018 मेंऔर मुश्किलें बढ़ जाएंगी। दिल्ली जैसे हालत के खतरे भी होंगे। 15 साल तक सत्ता में रही कांग्रेस वहां एक अंक में आ गई। बहरहाल, मंत्री बनने से पहले ही नेताओं ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए हैं। राजधानी के एक बड़े हाउस में कुछ अफसरों से चर्चा करते हुए एक नेता खम ठोक रहे थे, अब फिर जीत कर आ गया हूं, और फलां अफसर को छोड़ूंगा नहीं। भाजपा की जीत से मंत्री बौराए मत, इसके लिए सरकार और संगठन दोनों को नजर रखना होगा। खासकर रमन की चुनौती बढ़ गई है। उन्हें लोगो के मन को समझना होगा। लोग चाहते हैं कि मंत्रियों की निरंकुशता पर लगाम लगाई जानी चाहिए। कई मंत्री मैनेजमेट और पैसे के जोर पर भले ही चुनाव निकाल लिए हो, मगर इसे भी ध्यान रखना होगा कि उनके भ्रष्ट कारनामों की वजह से सत्ताधारी पार्टी बदनाम हुई और दूसरी सीटों पर इसका असर भी दिखा। हालांकि, अफसरों की पहली मीटिंग मे सीएम ने भ्रष्टचार के खिलाफ बातें करके अपरोक्ष तौर पर भावी मंत्रियों को कड़ा संदेश देने का काम किया कि अब ऐसा नहीं चलेगा।

बल्ले-बल्ले

डा0 रमन सिंह की हैट्रिक बनने से ब्यूरोक्रेसी में भी जश्न का माहौल है। होगा भी क्यों नहीं, जो मंत्री और विधायक सरकार में अफसरशाही हावी होने का आरोप लगाते रहे, वे सभी निबट गए या मैनेजमेंट करके जीत पाए। पांच मंत्री समेत आठ दिग्गज नेता निबट गए। काम आया रमन का चेहरा और अफसरों द्वारा किए गए विकास के काम।

मैनेजमेंट

पहले चरण की 18 सीटों पर पार्टी के पिछड़ने की रिपोट्र्स रमन सिंह को मिल गई थी। सरगुजा में भी हालात अच्छे नहीं थे। इसलिए, उन्होंने मैदानी इलाके की सीटों पर पूरा फोकस किया। और उनकी रणनीति कामयाब रही। एक-एक सीट को खुद हैंडिल किया। मंत्रियों में अमर अग्रवाल की स्थिति कुछ थी। बाकी सभी अपना किला बचाने में लगे थे। बृजमोहन अग्रवाल जैसे मंत्री रायपुर दक्षिण से बाहर नहीं निकल सकें। इसलिए, मंत्रियों से कोई सहयोग नहीं मिला। ऐसे में, रायगढ़ में बिहार भाजपा के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री गिरिराज किशोर को, तो दुर्ग, कवर्धा में नागेन्द्र सिंह को बिठाया गया। अमर की जीत में कोई शंका नहीं थी, इसलिए सीएम ने पोलिंग के 24 घंटे पहले अमर को फोन करके बेलतरा और तखतपुर में मदद करने कहा। जाहिर है, इन दोनों सीटों का बड़ा हिस्सा बिलासपुर शहर से लगा है। बेलतरा के 55 हजार वोट बिलासपुर के शहरी इलाके में हैं। दोनों सीटों की स्थिति बुरी थी। और भाजपा की हारने वाली सूची में ये दोनों सीटें सबसे उपर थी। मगर मैनेजमेंट का कमाल कि दोनों ही सीटें भाजपा के खाते में चली गई।

पुराने चेहरे

चूकि सरकार रिपीट हो गई है, इसलिए लोकसभा चुनाव तक नौकरशाही में बड़ा फेरबदल नहीं होने वाला। बहुत हुआ तो एकदम खराब परफारमेंस वाले दो-तीन कलेक्टर, एसपी चेंज हो जाएं। सीएम सचिवालय के चेहरे भी वही होंगे। उधर, भारत सरकार ने रिटायरमेंट दो साल नहीं भी बढ़ाया तो सरकार चीफ सिकरेट्री सुनिल कुमार को फरवरी में रिटायर नहीं करने वाली। रमन चाहते हैं कि कम-से-कम लोकसभा चुनाव तक यहां रहें। पता चला है, उन्हें छह महीने का एक्सटेंशन दिया जाएगा।

गड्ढा खोदा

ठीक ही कहते हैं, दूसरों के लिए गड्ढा नहीं खोदना चाहिए, आदमी उसमें कभी खुद भी गिर सकता है। सरगुजा के एक भाजपा नेता ने पास-पड़ोस की सीटों पर पार्टी की लुटिया डूबाने में कोई कमी नहीं की। कई साथियों को हराने के लिए उन्होंने सुपारी दे दी थी। मगर विरोध की आंधी में खुद भी निबट गए। नेताजी के चलते सामरी जैसी सीट भाजपा लूज कर गई, जहां से कांग्र्रेस आज तक सिर्फ एक बार जीती है। पिछले छह चुनाव से वहां भाजपा जीतते आ रही थी। नेताजी ने रेणुका सिंह को भी हरवा दिया। आलम यह रहा कि भैयालाल रजवाड़े जब रमन सिंह से मिलने सीएम हाउस पहुुंचे तो कहा, मैं जीरम घाटी से बचकर आ रहा हूं, वरना, मुझे मारने के लिए पूरी घेरेबंदी थी।

भावुक हुए रमन

काउंटिंग के दूसरे दिन दुर्ग ग्रामीण की विधायक रमशीला साहू जब सीएम हाउस पहुंची तो उन्हें देखकर रमन सिंह भावुक हो गए। आगंतुक कक्ष में जब सामने रमशीला पड़ी तो उन्होंने कहा, अदृभूत…..रमशीला तुमने तो गजब कर डाला……तुमने तो असंभव को संभव बना डाला। असंभव वाली बात को उन्होंने तीन बार रिपीट किया। जाहिर है, रमशीला को रमन ने ही मैदान मंे उतारा था और लोग छूटते ही कहते थे, रमशीला तीसरे नम्बर पर आएंगी।

 अंत में दो सवाल आपसे

1. बृजमोहन अग्रवाल से 35 हजार वोट से किरणमयी नायक के हारने के पीछे क्या चक्कर था?
2. रमन सिंह के पुराने मंत्रिमंडल के किन दो मंत्रियों को ड्राप करने की चर्चा है?