मंगलवार, 6 मई 2014

तरकश, 4 मई

तरकश

एक अनार सौ…..

छत्तीसगढ़ में हर साल जिस तदाद में नए आईएएस आ रहे हैं, कलेक्टरी के लिहाज से यह कैडर अब अच्छा नहीं रहेगा। चार-चार, पांच-पांच जिले में कलेक्टरी अब पुरानी बात होगी। मध्यप्रदेश की तरह दो-तीन जिले हो गए, तो बहुत है। दरअसल, जिले है सिर्फ 27। इनमें से 15 से अधिक डिस्ट्रिक्ट ऐेसे हैं, जहां अपनी इच्छा से कोई जाना नहीं चाहता। याने नक्सल प्रभावित या बेहद छोटे। इन जिलों में जाने का मतलब होता है, भागते भूत की लंगोटी काफी….। पहली कोशिश चुनिंदा 10-12 जिलों की होती है। इनमें भी, सबसे बड़े रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, कोरबा और रायगढ़ की रेटिंग सबसे ज्यादा है। फिलवक्त, इनमें से दुर्ग और कोरबा को छोड़कर किसी के चेंज होने के कोई आसार नहीं है। और, दावेदार हैं, पूरे 65। 99 बैच से लेकर 2008 तक के। 2009 वाले वार्मअप हो रहे हैं, वो अलग हैं। 2008 बैच के आईएएस दीगर राज्यों में कलेक्टर बन गए हैं। यहां इस बैच के भीम सिंह को झटके में धमतरी कलेक्टर बनने का मौका हाथ लग गया। चुनाव आयोग ने वहां से एनके मंडावी को हटा दिया था। अव्वल, 2007 बैच की शम्मी आबिदी अभी कलेक्टर नहीं बनी हैं। कुल मिलाकर आने वाला समय कलेक्टरों के लिए कठिन रहेगा। वही, एक अनार, सौ बीमार वाला हाल होगा।

माडल कैपीटल

नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर न्यू रायपुर की तारीफ की है। चुनावी व्यस्तता के बीच उन्होंने गुरूवार को ट्विट किया…..विकास देखना हो तो आप नया रायपुर जाइये, वहां डा0 रमन सिंह के नेतृत्व में किस तरह नई राजधानी आकार ले रही है। इससे पहले भी जब वे यहां आए थे, उन्होंने न केवल इसकी प्रशंसा की थी बल्कि अहमदाबाद जाकर अफसरों की टीम यहां देखने के लिए भेजा था, कि किस तरह नए रायपुर का प्लान बनाया गया है। जाहिर है, मोदी अगर पीएम बनें तो न्यू रायपुर देश के लिए माडल बनेगा। रमन सिंह को इसका क्रेडिट मिलेगा ही, एनआरडीए के चेयरमैन एन बैजेंद्र कुमार और पूर्व सीईओ एसएस बजाज की भी अहमियत बढ़ेगी।

ना बाबा

चुनाव आयोग के शिकार बनें कलेक्टर, एसपी को आचार संहिता खतम होने के बाद राज्य सरकारें आमतौर पर उसी जिले में पोस्ट कर देती है, जहां से वे हटाए गए होते हैं। अपने सूबे में भी 2003 का विस चुनाव छोड़ दें तो इसके बाद हमेशा ऐसा ही हुआ है। इसके पीछे मकसद होता है, चुनाव आयोग को बताना कि अब हम सिकंदर हैं। मगर कोरबा कलेक्टर के मामले में अबकी शायद यह न हो पाए। पता चला है, बिना किसी ठोस वजह के हटाए जाने से रजत नाखुश हैं। वैसे भी, उनका वहां डेढ़ साल हो गया है। इसलिए, अब वे कोरबा लौटना नहीं चाहते। ऐसे में, रजत को दुर्ग शिफ्थ किया जा सकता है। और, डायरेक्टर पब्लिक रिलेशंस ओपी चैधरी को कोरबा।

नेहा को रायपुर?

डेपुटेशन से लौटने वाले अफसरों को आजकल अच्छी पोस्टिंग मिल रही है। मैगनीज ओर इंडिया लिमिटेड से लौटे आईपीएस प्रदीप गुप्ता आते ही दुर्ग जैसे रेंज के आईजी बन गए, तो दिल्ली से लौटे अमरेश मिश्रा कोरबा के एसपी। ऐसे में, नारकोटिक्स से डेपुटेशन से लौटीं नेहा चंपावत की पोस्टिंग को लेकर पुलिस महकमे में अटकलें तेज हो गई हैं। सूत्रों का कहना है, नेहा को रायपुर एसपी पोस्ट किया जा सकता है।

आखिरकार रिलीव

94 बैच की आईएएस अफसर निधि छिब्बर को सरकार ने आखिरकार सेंट्रल डेपुटेशन के लिए रिलीव कर दिया है। निधि को डिफेंस मिनिस्ट्री मंे ज्वाइंट सिकरेट्री की पोस्टिंग मिली है। आईएएस बिरादरी में इसे प्रतिष्ठापूर्ण पदास्थापना मानी जाती है। हालांकि, भारत सरकार से फरवरी में ही इसका आर्डर निकल गया था। मगर, अफसरों की कमी का हवाला देते हुए यहां सामान्य प्रशासन विभाग ने उन्हें रिलीव करने से असमर्थता जता दी थी। मगर पिछले डेढ़ हफ्ते में उनकी फाइल तेजी से मूव हुई और उन्हें इजाजत मिल गई। अलबत्ता, उनके पति विकास शील की फाइल अभी भारत सरकार में प्रोसेज में है। वहां से ओके होने के बाद राज्य सरकार उन्हें भी दिल्ली के लिए रिलीव कर देगी। दोनों पांच साल वहां रहेंगे।

होटलों में होड़

चंद दिनों पहले खुले ताज और हयात ने राजधानी के होटल मालिको की नींद उड़ा दी है। ताज में 10 हजार रुपए के रुम पैकेज में 4 हजार में उपलब्ध हैं। हयात में भी कुछ इसी तरह की स्थिति है। ऐसे में हाईप्रोफाइल लोग शादी-ब्याह या अन्य बड़ी पार्टियों के लिए अब इन दोनों होटलों की ओर भाग रहे हैं। ग्राहकांे को खींचने के लिए बाकी बड़े होटलों को भी भारी डिस्काउंट के लिए सोचना पड़ रहा है। ये तब है, जब रेेडिशन, मेरियेट और पार्क इन सरीखे सितारा होटल रायपुर मेें और आने हैं।

अच्छी खबर

रोजगार की दृष्टि से यह अच्छी खबर हो सकती है……जानी-मानी टायर कंपनी सीएट रायपुर में फैक्ट्री लगाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए कंपनी ने सरकार से 40 एकड़ लैंड मांगा है। सीएसआईडीसी ने उसके लिए लैंड की तलाश शुरू कर दी है। सरकार के पास जो प्रपोजल आए हैं, उसके अनुसार टायर कारखाने में 2000 लोगों को रोजगार मिलेगा।

जंगल राज

जंगल विभाग में जंगल राज ही चल रहा है…..जंगल विभाग के मुखिया एके सिंह के पास पीसीसीएफ के साथ, लघु वनोपज संघ का भी प्रभार है। याने डबल पोेस्टिंग। और, एके भल्ला की स्थिति यह है कि उन्हें पीसीसीएफ बनने के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। जबकि, डीपीसी हो गई है। मगर पुरानी जांच का हवाला देकर उनकी फाइल अटकवा दी गई है। यही वजह है कि पिछले सप्ताह उनके इस्तीफे की चर्चा सुर्खियो में रही।

अंत में दो सवाल आपसे

1. आईएएस निधि छिब्बर को डेपुटेशन पर दिल्ली जाने के लिए पहले ना-ना और बाद में फिर अनुमति कैसे मिल गई?
2. एक कलेक्टर का नाम बताइये, जो आचार संहित लागू होने के बाद भी बिना इजाजत लिए एक ठेेकेदार की हाईप्रोफाइल पार्टी में शरीक होने रातोरात रायगढ़ पहंुच गए?

शनिवार, 26 अप्रैल 2014

तरकश, 27 अप्रैल

तरकश

चूक

पोलिंग पार्टियों को कई स्तर पर ट्रेनिंग देने के बाद भी कई जगह चूक हो गई। राजधानी के वीवीआईपी पोलिंग बूथ याने सिविल लाईन के 179 नम्बर बूथ पर बाये हाथ के बजाए दाये हाथ की उंगली पर स्याही लगती रही। दोपहर 2 बजे वोट डालने पहुंचे प्रींसिपल सिकरेट्री लेवल के एक आईएएस ने जब इस गड़बड़ी को पकड़ा, तब तक राज्यपाल शेखर दत्त समेत 400 से अधिक लोग वोट डाल चुके थे। आईएएस ने फौरन चीफ इलेक्शन आफिसर सुनिल कुजूर को एसएमएस किया। इसके बाद हड़कंप मचा। आला अफसर भागते-भागते बूथ पर पहुंचे और पीठासीन आफिसर को जमकर लताड़ा। इसके बाद फिर बाये हाथ की उंगली पर स्याही लगानी शुरू हुई।

प्राउड

वोट डालने की जागरुकता अब तक सिर्फ अपढ़ और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों में ही देखी जाती थी। पढ़ा-लिखा, उच्च तबका इसे फिजूल का काम मानता था। मगर इस चुनाव में बड़ा चेंज दिखा। विधानसभा चुनाव से भी ज्यादा। खास कर अपर क्लास में होड़ की स्थिति रही। वह भी अकेले नहीं, पूरे परिवार के साथ। क्या इंड्रस्ट्रीलिस्ट, क्या नौकरशाह, क्या सीनियर एक्जीक्यूटिव, सभी उंगली दिखाकर गर्व जाहिर करते रहे। फेसबुक पर भी खूब फोटो लोड की गई। चलिए, लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत हैं।

मोदी लहर या….

40 डिग्री टेम्परेचर में भी वोट डालने के लिए जिस अंदाज में लोग घरों से निकले, उससे सियासी प्रेक्षक हैरान हैं। पार्लियामेंट्री इलेक्शन में आमतौर पर इतनी वोटिंग होती नहीं। मध्यप्रदेश में इस बार भी नहीं हुई। सो, राजनीति को समझने वाले लोग भी अंडर करेंट से इंकार नहीं कर रहे हैं। अब करेंट मोदी का है या एंटी इंकाबेंसी, यह सवाल लोगों को मथ रहा है। वैसे लोकसभा चुनाव में राज्य सरकार के खिलाफ एंटी इंकांबेसी का मामला कम होता है। एंटी इंकांबेंसी आमतौर पर संबंधित सरकार के खिलाफ होती हंै। याने लोकसभा में केंद्र और विधानसभा चुनाव में राज्य सरकार के खिलाफ। ऐसे में, मोदी लहर की बात लोगों को ज्यादा समझ में आ रही है। बाकी तो, 16 मई तक का इंतजार करना होगा।

दुर्ग की चिंता

महासमुंद में भले ही अजीत जोगी जैसे दिग्गज नेता सामने हों मगर भाजपा खेमे में दुर्ग को लेकर काफी चिंता है। असल में, पोलिंग के हफ्ते भर पहले पूरी ताकत झोंक दिए जाने के बाद भी बीजेपी वहां का गड्ढा पाटने में नाकाम रही। हालांकि, विधानसभा चुनाव में दुर्ग लोकसभा सीट में एक लाख 68 हजार की सर्वाधिक लीड मिली थी। इसके बाद भी कुछ ऐसी निगेटिव चीजें रहीं, जिसके कारण भाजपा दावा कर पाने की स्थिति में नहीं है। पार्टी ने दिल्ली जो रिपोर्ट भेजी है, उसमें सर्वाधिक खतरे वाली सीट में दुर्ग का एकमात्र नाम है। और, एकमात्र भरोसा अब मोदी लहर पर है।

अच्छे दिन आने……

टीवी पर बीजेपी के एड, अच्छे दिन आने वाले हैं, को लेकर इन दिनों फेसबुक और व्हाट्अप पर दिलचस्प मैसेज चल रहे हैं। जरा देखिए, अब एक डालर में 60 रुपए नहीं, एक रुपए में 60 डालर मिलेंगे। 16 मई से गोभी हो या भिंडी, सभी 4 रुपए किलो होंगे। होटलों में वेज हो नान वेज, 10 रुपए प्लेट। पेट्रोल 20 रुपए लीटर। एक और देखिए, दिसंबर 2015…..सोच रहा हूं नया साल मनाने कहां जाउं। वाराणसी से जबलपुर तक गंगा और नर्मदा नदी लिंक हो गई है…..उसमें स्टार सुविधाओं वाला कू्रज चल रहा है…..रेट 500 रुपए, फूूड के साथ। प्लेन का किराया भी 750 रुपए…..एडवाइस दीजिए, मैं क्या करूं…..प्लेन से जाउ या कू्रज से….अब, अच्छे दिन आने वाले हैं…।

अच्छी कोशिश

चीफ सिकरेट्री विवेक ढांड ने अपनी पहली मीटिंग में ही संकेत दिए थे कि नक्सल प्रभावित बस्तर पर उनका खास फोकस रहेगा। और, इस पर उन्होेने अमल भी शुरू कर दिया है। हफ्ते भर के भीतर वे दो बार बस्तर जा चुके हैं। पहले दंतेवाड़ा और फिर मंगलवार को सुकमा गए। सीनियर सिकरेट्रीज भी उनके साथ थे। ताकि, मौके पर ही कुछ मामलों का निबटारा किया जा सकें। सीएस ने जमीनी अफसरों से मिलकर वहां की कठिनाइयों को भी जाना। हालांकि, तीन साल पहले सरकार ने सभी विभागों के सचिवों से बस्तर में महीने में एक रात बिताने कहा था, मगर इसका पालन नहीं हुआ। बस्तर को सिर्फ पुलिस के भरोसे छोड़ दिया गया था। सीएस के इस कदम से एक उम्मीद तो दिखती है।

महंगी हुई शराब कि…..

शराब पीने में तीसरे नम्बर पर रहने वाले छत्तीसगढ़ के लिए एक अच्छी खबर है कि प्रदेश में शराब की खपत में आश्चर्यजनक तौर पर कमी आई है। 2012-13 वित्तीय वर्ष में जहां लोगों ने 3 करोड़ 40 लाख लीटर शराब गटकी थी, वहीं 2013-14 में 3 करोड़ 38 लाख 50 हजार लीटर। याने डेढ़ लाख लीटर कम। जबकि, इसे बढ़ना था। बीयर में भी मामूली वृद्धि हुई है। 2012-13 में प्रदेश में एक करोड़ 89 लाख 53 हजार लीटर की तुलना में अबकी एक करोड़ 89 लाख 82 हजार लीटर बीयर की खपत हुई। ये तब हुआ है, जब नवंबर में विधानसभा चुनाव हुआ। और, दोनों पार्टियों ने जमकर इसका वितरण किया। खतप कम होने के पीछे रेट बढ़ना भी एक कारण बताया जा रहा है। रेट बढ़ने का ही नतीजा हुआ कि खपत कम होने के बाद भी आबकारी विभाग का राजस्व बढ़ गया।

अंत में दो सवाल आपसे

1. अगले फेरबदल में प्रींसिपल सिकरेट्री अमिताभ जैन को कौन सा बड़ा विभाग मिलने वाला है?
2. लोकसभा के नतीजे आने के बाद प्रदेश कांग्रेस के समीकरण कुछ बदलेंगे?

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

तरकश, 6 अप्रैल

तरकश

डिनर डिप्लोमेसी

अभी तक राजनीति में डिनर डिप्लोमेसी की चर्चा सुनने में आती थी। मगर मलाईदार पोस्टिंग और पुनर्वास के लिए अब ब्यूरोक्रेसी में भी यह चालू हो गई है। पुलिस महकमे के हायर पोस्ट से रिटायर हुए एक आईपीएस ने पिछले हफ्ते सत्ता के शीर्षस्थ नेता को सपरिवार डिनर पर अपने घर बुलाया। इंवाइटी में सत्ता के सबसे ताकतवर अधिकारी भी शामिल थे। यही नहीं, बुधवार को राजधानी के एक खास भवन में भी आईपीएस के रिटायर होने पर भोज का आयोजन किया गया। इससे पहले, किसी आईएएस या आईपीएस के रिटायर होने पर भवन में कभी भोज नहीं हुआ। इसका मतलब यह हुआ कि फिल्डिंग में दम है। अब, यह देखना दिलचस्प होगा कि रिटायर आईपीएस डिनर डिप्लोमेसी में सफल हो पाते हैं या नहीं। क्योंकि, हवा का रुख उनके बेहद प्रतिकूल है।

टफ

कांग्रेस के करिश्माई नेता अजीत जोगी के लिए महासमंुद सीट जितना आसान समझा जा रहा था, उतना आसान अब लग नहीं रहा। पार्टी को पिछड़ी जातियों का अपेक्षित समर्थन नहीं मिल रहा। सराईपाली और बसना इलाके में अघरिया कुर्मी की बहुतायत हैं। नंदकुमार पटेल की मौत के बाद इस समाज के लोग कांग्रेस से खुश नहीं हैं। साहू समाज में गहरी पैठ रखने वाले मोतीलाल साहू ने भाजपा ज्वाईन कर लिया है। 11 चंदुओं का मामला भी मीडिया में इतना उछल गया कि उसका अब कोई लाभ नहीं मिलने वाला। 2008 के चुनाव में कुरुद में भी कांग्रेस के खिलाफ आधा दर्जन लेखराम खड़े हुए थे। इसके बावजूद, कांग्रेस के लेखराम चुनाव जीत गए थे। तीन महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को 87 हजार की लीड मिली थी। जोगी के सामने इस गड्ढे को पाटकर जीत दर्ज करने की चुनौती होगी। वीसी इस सीट से छह बार सांसद रहे और उनकी बेटी प्रतिभा का ऐन वक्त पर टिकिट कट गया। इसके असर से इंकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, जोगी का चुनाव प्रचार सबसे सिस्टमेटिक चल रहा है। गांव-गांव में उनके लोग पहुंच चुके हैं। खुद जोगी रात 10 से 11 बजे तक दौरा कर रहे हैं। बावजूद इसके, लड़ाई एकतरफा तो एकदम नहीं है।

9/2 की चर्चा

16 मई को ईवीएम से भले ही नतीजे कुछ और आए, मगर सियासी गलियारों में 9/2 की चर्चा तेज है। राजनीतिक समीक्षक इसके पक्ष में अपनी-अपनी दलीलें भी दे रहे हैं। हालांकि, 2004 और 09 में 10 भाजपा और एक सीट कांग्रेस को मिली थी। मगर इस बार महासमुंद में अजीत जोगी के उतर जाने और विधानसभा चुनाव में सरगुजा में वोटों का अंतर एक लाख से अधिक हो जाने के चलते सियासी प्रेक्षक भी 10/1 का दावा करने में जरा हिचकिचा रहे हैं। उपर से दुर्ग में भी सरोज पाण्डेय की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। हालांकि, यह मानने वालों की कमी नहीं है कि विधानसभा और लोकसभा के अलग मायने होते हैं। सो, जरूरी नहीं कि सरगुजा में विधानसभा का रिजल्ट रिपीट हो। ऐसे में, महासमंुद और दुर्ग में से एक सीट कांग्रेस को मिलने की चर्चा हो रही है। और, मोदी लहर जैसा कुछ है, तो कुछ भी हो सकता है। आखिर, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 85 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में पूरे 11 की 11 सीटें मिली थीं।

मोदी के साथ रमन

लोकसभा चुनावों के पोस्टर एवं होर्डिग्स में पहले सिर्फ भाजपा के पीएम कंडिडेट नरेंद्र मोदी की तस्वीरें थी। यह लिखा हुआ…. अबकी बार, मोदी सरकार। मगर सरकार के रणनीतिकारों को यह फीडबैक मिला कि होर्डिग्स में मोदी के साथ अगर रमन की फोटो लगाई जाएं, तो वोटरों पर इम्पेक्ट और ज्यादा पड़ेगा। इसके बाद भाजपा नेता हरकत में आए और उपर में बात करके सोमवार शाम से होर्डिग्स चेंज होना शुरू हो गया। अब, मोदी के बगल में कलरफुल जैकेट में रमन का खिला हुआ चेहरा दिख रहा है। जाहिर है, 2008 और 13 का चुनाव भाजपा ने रमन के चेहरे को सामने रखकर लड़ा था और उसे इसमें कामयाबी भी मिली। पार्टी को लगता है, इस बार भी शायद यह तकनीक काम आ जाएं।

गई भैंस पानी में

2009 के लोकसभा चुनाव में कांकेर में फूलोदेवी नेताम महज 18 हजार वोट से हारी थीं। और, इस बार विधानसभा चुनाव में इलाके की आठ विस सीटों में से छह कांग्रेस के खाते में गई थी। सो, अबकी उम्मीद पूरी थी और इसी गणित से फूलोदेवी को मैदान में उतारा गया था। मगर बी फार्म मिलने के बाद अजीत जोगी से आर्शीवाद लेने सीधे सागौन बंगले जाना नेताम के लिए भारी पड़ गया। असल में, पिछले लोकसभा चुनाव में जोगी खेमा ने नेताम के पक्ष में खुलकर काम नहीं किया था। नेताम को लगा संगठन खेमा तो उनके साथ है ही, जोगीजी का भी आर्शीवाद मिल जाए, तो फिर उन्हें जीतने से भला कौन रोक सकता है। संगठन खेमा को यह नागवार गुजरा। नतीजा यह हुआ कि संगठन खेमा ने इस बार पल्ला झाड़ लिया है। नेताम के लिए पिछले चुनाव में सबसे अधिक मेहनत करने वाले राजेश तिवारी इस बार जगदलपुर चले गए हैं। यही वजह है कि अब कांकेर के कांग्र्रेसियों ने भी यह मान लिया है कि विक्रम उसेंडी की किस्मत बुलंद है। बेमन से चुनाव लड़ा और रास्ता अपने आप बनते जा रहा है।

वंचित

धमतरी के कलेक्टर एनके मंडावी कलेक्टर रहते जिले से रिटायर होने का रिकार्ड बनाते-बनाते चूक गए। चुनाव आयोग ने उनका विकेट उड़ा दिया। छत्तीसगढ़ बनने के बाद कोई आईएएस कलेक्टर रहते रिटायर नहीं हुआ है। एमएस परस्ते के लिए यह मौका था। कवर्धा में जब कलेक्टर पोस्ट हुए थे, तो चर्चा यही थी कि दोनों प्रमोटी आईएएस, परस्ते और मंडावी जिले से ही रिटायर होंगे। क्योंकि, दोनों का जुलाई मंे रिटायरमेंट था। मगर परस्ते हिट विकेट होकर राजधानी लौट गए थे। और, मंडावी चुनाव आयोग के शिकार हो गए। आयोग ने इस आधार पर उन्हें खिसका दिया कि उनके रिटायरमेंट में छह महीने से कम बचा है और आयोग के गाइडलाइन के अनुसार ऐसे जिला निर्वाचन अधिकारी चुनाव नहीं करा सकते।

भीम का लाटरी

चुनाव आयोग के चक्कर में एनके मंडावी हट गए मगर कांकेर जिला पंचायत के सीईओ भीम सिंह का कलेक्टरी का रास्ता खुल गया। हरियाणवी अफसर भीम 2008 बैच के आईएएस हैं। लोकसभा चुनाव के बाद कलेक्टर बनाने पर विचार होता। नम्बर लगता कि नहीं ये बाद की बात थी। मगर, इससे पहले ही उन्हें धमतरी मे मौका मिल गया। यह भी तय है कि चुनाव बाद भी वे कन्टीन्यू कर जाएंगे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. चुनाव आयोग में रिटायर आईएएस जब शीर्ष पदों पर रहकर पूरे देश में चुनाव का संचालन कर सकते हैं, तो छह महीने में रिटायरमेंट वाले कलेक्टर जिले में चुनाव क्यों नहीं करा सकते?
2. किस वजह से डीजीपी एएन उपध्याय के पास अभी भी प्रशासन का चार्ज है?

शनिवार, 29 मार्च 2014

तरकश, 30 मार्च

तरकश

 तलवार

चुनाव आयोग द्वारा यूपी में एकमुश्त 22 कलेक्टर, 19 एसपी और तीन डीआईजी के हटाए जाने के बाद सूबे के कुछ अफसरों को डरावने सपने आने लगे हैं। इनमें दो कलेक्टर भी शामिल हैं। एक कलेक्टर का सताधारी पार्टी के प्रत्याशी से मधुर संबंध छिपा नहीं है। कलेक्टर साब ने जिले में न केवल प्रत्याशी के बेटे का धंधा पानी जमवाया है, बल्कि, अपुष्ट खबर ये भी है कि टिकिट फायनल होने में कलेक्टर के रिकमांडेशन की भी भूमिका रही। इसकी आयोग में शिकायत हुई है। हालांकि, विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग द्वारा किसी को भी टच न करने पर अफसर कंफार्ट फील कर रहे थे। ब्यूरोक्रेसी में चर्चा यही थी कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर वीएस संपत काफी लिबरल हैं। मगर अब धारणा बदल गई है।

पहली बैठक

चीफ सिकरेट्री बनने के बाद विवेक ढांड ने शुक्रवार को मंत्रालय में सभी विभागों के सिकरेटीज की पहली बैठक ली। और, इसमें यह तय हो गया कि नए सीएस का फोकस बस्तर और वहां की नक्सल प्राब्लम पर रहेगा। तभी तो तीन घंटे से अधिक चली बैठक में घंटे भर से अधिक चर्चा सिर्फ बस्तर पर हुई। सीएस ने सभी सिकरेट्रीज से बस्तर समस्या के समाधान के लिए लिखित में अपनी राय मांगी है। ढांड, राज्य निर्माण के दौरान बस्तर के कमिश्नर रहे। जाहिर है, वहां के सिचुएशन से वे भली-भांति वाकिफ होंगे। फस्र्ट मीटिंग में ही उन्होंने इंटरेस्ट दिखाया है। सो, उम्मीद तो अच्छे की ही करनी चाहिए।

रिलेक्स

दो साल में पहला मौका था, जब शुक्रवार को मंत्रालय में सीएस मीटिंग में सारे सिकरेट्रीज रिलेक्स होकर बैठे थे। बिल्कुल, नो टेंशन…….न डांट खाने का डर। पहले की मीटिंगों में गड़बड़ टाईप के अफसर मुंह सिले रखना ही मुनासिब समझते थे…..आ बैल मुझे मार, क्यों करें? मगर शुक्रवार की बैठक में सबके चेहरे खिले हुए थे। और, सभी खुलकर बोले भी। खासकर, वो भी जो पिछले दो साल में एक लाइन नहीं बोले थे। कुछ तो बेहद एक्साइटेड थे……आखिर, अरसे बाद यह मौका आया है। बस्तर के नक्सल समस्या पर एक्सपर्ट की मानिंद ढेरों सलाह दे डाली। एक आईएएस ने तो यहां तक कह डाला, सर, टाटा का प्लांट लग जाता तो नक्सल समस्या खतम हो जाती। मेरे रहते, टाटा की पूरी तैयारी हो गई थी। मगर मेरे हटने के बाद वहां टाटा का आना असंभव है। इस पर सीएस को टोकना पड़ा कि ऐसा नहीं है, टाटा अभी भी आ सकता है।

खुलकर

भले ही संघ प्रमुख ने कहा हो कि नमो-नमो करना संघ का काम नहीं है। मगर वास्तविकता यह है कि मोदी को सता की शीर्ष पर बिठाने के लिए संघ भी इस बार खुलकर मैदान में आ गया है। पिछले हफ्ते स्टेशन रोड स्थित एक होटल में मुस्लिम वोटों को लेकर संघ की बैठक हुई। संघ के बैनर में लोगोें ने पहली बार मुस्लिम नेताओं का इस तरह जमावड़ा देखा। मंच पर बैनर पर मुस्लिम नेताओं और धार्मिक नेताओं की फोटुएं लगी थीं। मुस्लिम नेताओं ने कहा भी कि मोदी को पीएम बनाना है, इसलिए हमलोग उनके लिए काम कर रहे हैं।

सिर्फ त्यागी

मार्च से लेकर जुलाई तक पांच आईएएस अफसर रिटायर होंगे। 31 मार्च को दुर्गेश मिश्रा, 30 अप्रैल को एमके त्यागी और एमएस परस्ते एवं 31 जुलाई को आरपीएस त्यागी और एनके मंडावी। याने पांच। इनमें से सिर्फ एमके त्यागी को संविदा में पोस्टिंग मिल सकती है। वे फिलहाल सिकरेट्री सीएम के साथ माईनिंग देख रहे हैं। त्यागी साफ-सुथरी छबि के आईएएस में शुमार होते हैं। इसीलिए, कोरबा कलेक्टरी से हटने के बाद सीएम ने अपने साथ रखा था। सूत्रों की मानें तो उनकी संविदा नियुक्ति भी सीएम सचिवालय में ही होगी।

नो टेंशन

भाजपा में किस्मत वालों की कमी नहीं है। एक भैया तो लगभग इसी के सहारे लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं। अबकी तो मैदान और साफ नजर आ रहा है। उपर से नगद नारायण से लेकर मैन पावर की कोई कमी नहीं। सबको पता है, एनडीए की गवर्नमेंट बनने पर भैया को अबकी कैबिनेट मंत्री बनने से कोई रोक नहीं पाएगा। लिहाजा, भैया के घर पर हर तरह के मददगारों की लाईन लग रही है। सार यह है कि भैया के घर से अबकी कुछ नहीं लगने वाला।

अंत में दो सवाल आपसे

1. दुर्ग लोकसभा सीट पर कांटे की लड़ाई की चर्चा क्यों है?
2. आईएएस एलएस केन को कोर्ट द्वारा दो साल की सजा होने पर पूर्व गृह मंत्री ननकीराम कंवर को क्यों खुश होना चाहिए?

शनिवार, 22 मार्च 2014

तरकश, 23 मार्च

तरकश



आईएएस का कुत्ता

राजधानी में मकान के लिए भले ही आईजी, डीआईजी जैसे अफसर चिरौरी कर रहे हों मगर एक डीओजी का रुतबा देखिए कि वह देवेंद्र नगर के आफिसर्स कालोनी के एक ई टाईप बंगले में ठाठ से रह रहा है। उसके खिदमत के लिए दो चपरासी भी तैनात हैं। एक दिन में, तो दूसरा रात के लिए। डीओजी को गरमी बर्दाश्त नहीं होती, इसलिए, एक कमरे में एसी लगाया गया है। दरअसल, बंगला एक आईएएस के नाम से अलाट है। ढाई साल पहले उनकी पोस्टिंग राजधानी से बाहर हुई, मगर उन्होंने बंगले का मोह नहीं छोड़ा। कब्जा बना रहे, इसके लिए उन्होंने विदेशी नस्ल के अपने प्रिय कुत्ते को रख छोड़ा है। अब, आईएएस का कुत्ता है तो उसके लिए उसी के अनुरुप इंतजाम तो करने पड़ेंगे न। इससे लोगों को तकलीफ नहीं होनी चाहिए।

दिया तले अंधेरा

राजधानी में मकानों की कमी से जूझ रहे नौकरशाह रिटायर आईएएस आरपी बगाई की याद कर रहे हैं। होम में रहने के समय बगाई ने रिटायरमेंट या ट्रांसफर के बाद देवेंद्र नगर का बंगला नहीं छोड़ने वाले नौकरशाहों पर एक से डेढ़ लाख रुपए तक जुर्माना ठोक दिया था। इसमें एक सीनियर एसीएस का भी डेढ़ लाख जुर्माना था। इसके कारण तब फजीहत होने के डर से कई अफसरों ने फटाफट घर खाली कर दिया था। मगर अभी का हाल सुनिये। कई अफसर रहते हैं भिलाई में और देवेंद्र नगर में बंगला कब्जिआएं हुए हैं। कुछ तो अरसे से राजधानी से बाहर हैं मगर बंगला नहीं छोड़ा है। सरकारी बंगले का मोह के मामलेे मंे राजनीतिज्ञ भी पीछे नहीं हैं। लता उसेंडी और रेणूका सिंह चुनाव हार गईं मगर दोनों ने अभी तक बंगला खाली नहीं किया है।

मेष राशि

सूबे की 11 लोकसभा सीटों में से दो सीट को तो लोग अभी से क्लियर मान कर चल रहे हैं। एक महासमुंद और दूसरा, राजनांदगांव। एक पर अजीत जोगी चुनाव लड़ रहे हैं और दूसरे पर मुख्यमंत्री के बेटे अभिषेक। दोनों मेष राशि वाले हैं। ज्यातिषियों की मानें तो मेष राशि के लिए अभी समय भी अच्छा चल रहा है। तभी तो ना…ना….करते हुए जोगी टिकिट लेने में कामयाब हो गए, तो अभिषेक की लांचिंग राइट टाईम पर हो गई। उनके लिए इससे बढि़यां समय नहीं होता। छत्तीसगढ़ में अपनी सरकार है और दिल्ली में भी लगभग आ ही जाएगी। जाहिर है, राज्य के लोगों की सबसे अधिक उत्सुकता इन दोनों सीटों को लेकर होगी। अब, यह देखना दिलचस्प होगा कि लीड के मामले में अजीत जोगी आगे रहते हैं या अभिषेक।

इगो की लड़ाई

विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरी बार पटखनी खाने के बाद भी कांग्रेस नेताओं ने सबक नहीं ली। इगो की लड़ाई में पार्टी की फजीहत करा दी। चुनावी इतिहास में शायद ही कहीं ऐसा हुआ होगा, जब किसी सीट पर तीन बार प्रत्याशी बदला गया होगा। वो भी कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी द्वारा। रायपुर में पार्टी नेताओं ने ऐसा ही किया। अब, चैथी बार प्रत्याशी बदलने पर विचार चल रहा है। इसीलिए, छाया वर्मा को अभी बी फार्म नहीं मिला है। जबकि, रायपुर राजधानी है और यहां से पूरे प्रदेश में मैसेज जाता है। इसके बावजूद, कांग्रेस नेताओं ने पार्टी को तमाशा बनाने में कोई कमी नहीं की। कांग्रेस कार्यकर्ता भी महसूस कर रहे हैं कि बड़े नेताओं ने, तुम्हारी क्यों? मेरी चलेगी के चक्कर में पार्टी का बडा नुकसान कर दिया। ऐसे में, भाजपाई अगर 2004 और 2009 का रिजल्ट दोहराने का दावा कर रहे हैं तो विस्मय नहीं होना चाहिए।

बड़ा दांव

लोकसभा चुनाव में अजीत जोगी ने चतुराई के साथ पत्ते फेंके और पार्टी में अपना जलवा बरकरार रखने में कामयाब रहे। कांकेर से फूलोदेवी नेताम को टिकिट दिलवा दिया तो महासमुंद से प्रतिभा पाण्डेय की दावेदारी कमजोर करने के लिए करुणा शुक्ला को बिलासपुर से खड़ा करा दिया। अब, दो कान्य कुब्ज महिला को कांग्रेस टिकिट दे नहीं सकती। इससे, उनके लिए महासमुंद में गुंजाइश बन गई। बिलासपुर में करुणा को आगे करने के लिए पीछे राजनीति यह भी थी कि दूसरे किसी को टिकिट दिलाएं और अगर जीत गया तो आगे चलकर कहीं भस्मासुर न बन जाए। करुणा बिलासपुर के लिए बाहरी हैं इसलिए जीते या हारे, जोगी खेमे की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।

दुर्भाग्य

बिलासपुर के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य नहीं हो सकता। 2009 में इस सीट के सामान्य होने के पहले पुन्नूराम मोहले चार बार यहां से प्रतिनिधित्व किए। और, केंद्र में एनडीए की सरकार रहने के बाद भी इस दौरान विकास के एक काम नहीं हुए। 29 साल बाद लोकसभा सीट सामान्य हुई तो अजीत जोगी की पत्नी को हराना है, इस चक्कर में लोगों ने दिलीप सिंह जूदेव को जीतवा दिया। जूदेव जो जीत कर गए, दोबारा फिर झांके नहीं। इस बार उम्मीद थी कि कोई दमदार कंडिडेट खड़ा होगा। मगर दोनों ही पार्टियों ने निराश किया। अजीत जोगी मजबूत प्रत्याशी थे मगर हार के डर से वहां से किनारा करना ही मुनासिब समझा। कांग्रेस ने आठ दिन पहले पार्टी में आई करुणा शुक्ला को मैदान में उतार दिया। इससे, पार्टी की गंभीरता समझी जा सकती है। और, भाजपा में धरमलाल कौशिक से लेकर मूलचंद खंडेलवाल, अरुण साव जैसे नेताओं के नाम चलें मगर पार्टी ने एक ऐसे चेहरे को खड़ा कर दिया, जिसका अधिकांश लोगों ने नाम ही नहीं सुना था।

राजधानी पुलिस

होली में अबकी राजधानी पुलिस ने पहली बार अपने होने का अहसास कराया। ऐसी टाईट पोलिसिंग हुई कि गुंडे-मवालियों की अपने रंग मंे होली मनाने की तैयारी धरी-की-धरी रह गई। पुलिस ने दो दिन पहले से मुहिम चलाकर डेढ़ हजार से अधिक लड़कों-लफंगों की बाइक जब्त कर ली। हर चैक पर दर्जन भर से अधिक जवान तैनात रहे। जहां तीन सवारी देखा, बाइक जब्त करने में देर नहीं लगाई। उपर से निर्देश भी थे किसी को छोड़ना नहीं है। यही कारण है कि कुछ भइया लोगों के फोन भी आए, तो बड़े अफसरों ने उनसे दो दिन के लिए माफी मांग ली। े

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस मसले को लेकर राजधानी में गुरूवार को देर रात तक तीन मंत्रियों की बैठक चली?
2. कांग्रेस के तीन और कौन बड़े नेता भाजपा से जुड़ने के लिए संभावनाएं तलाश रहे हैं?

शनिवार, 8 मार्च 2014

तरकश, 9 मार्च

तरकश



सस्ते में

कोरबा एसपी रतनलाल डांगी ने सोचा भी न होगा कि वे इस कदर सस्ते में आउट हो जाएंगे। विधानसभा चुनाव के ऐन पहले बिलासपुर से जब उनका कोरबा ट्रांसफर हुआ था, वे वहां जाना नहीं चाहते थे। और अब, जब वे मान लिए थे कि दिसंबर-जनवरी से पहले कुछ नहीं होने वाला। तब आचार संहिता लागू होने के दो दिन पहले उनका ट्रांसफर हो गया। वह भी बटालियन में कमांडेंट। आजकल नान आईपीएस भी कमांडेंट बन जा रहे हैं। डांगी तो दंतेवाड़ा, कोरबा और बिलासपुर जैसा जिला कर चुके हैं। ऐसे में, उनकी नई पोस्टिंग को लेकर लोगों का चैंकना स्वाभाविक था। आखिर, उनकी फिल्डिंग कमजोर कैसे पड़ गई।

सीनियरिटी का सम्मान

सीनियर होने के बाद गिरधारी नायक भले ही डीजीपी न बन सकें, मगर 3 मार्च को मंत्रालय में चुनावी तैयारियों की बैठक हुई तो वहां डीजीपी एएन उपध्याय ने उनके सम्मान का पूरा खयाल किया। चीफ सिकरेट्री विवेक ढांड के एक ओर पीएस होम एनके असवाल के लिए कुर्सी लगी थी और दूसरी ओर डीजीपी के लिए। और उसके बाद वाली कुर्सी पर नायक बैठे थे। उपध्याय कुछ विलंब से पहुंचे। उन्होंने डीजीपी की कुर्सी पर बैठने के बजाए असवाल के बगल में बैठ गए। लोगों ने पूछा तो उन्होंने कहा, होम सिकरेट्री रहते हमेशा वे असवाल के बगल में बैठते रहे हैं। मगर ये कारण कतइ्र्र नहीं था। उपध्याय को शायद लगा कि डीजीपी ना बनने से नायक दुखी होंगे, उपर से पहली मीटिंग में ही उनसे पहले बैठकर उनका दिल और क्यों दुखाया जाए। सीनियर का सम्मान करके उपध्याय ने अपना बड़प्पन दिखाया।

ग्रेट

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के दौरान शराब वितरण पर जिस तरह कंट्रोल किया गया, चुनाव आयोग ने न केवल इसकी जमकर तारीफ की है। बल्कि, लोकसभा चुनाव में पूरे देश में इसे एक माडल की तरह एडाप्ट करने का संकेत दिया है। जाहिर है, टूरिज्म बोर्ड के एमडी संतोष मिश्रा को विस चुनाव के लिए लीकर आब्जर्बर बनाया गया था। और, उन्होंने इतना टाईट इंतजाम कर दिया था कि राजनीतिक दलों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। आचार संहिता लागू होने से पहले जिनने डंप कर लिया था, वही काम आया। बाकी चुनाव के दौरान तो फैक्ट्रियों से शराब निकल ही नहीं पाई। गेट पर कैमरा लगा दिए गए थे, अफसर भी तैनात थे। आयोग ने पिछले हफ्ते मिश्रा को दिल्ली बुलाया था। वहां, मुख्य चुनाव आयुक्त समेत भारत सरकार के कई सिकरेट्रीज के समक्ष मिश्रा ने अपना प्रेजेंटेशन दिया। ग्रेट……।

बेचारे

गौरव द्विवेदी और उनकी पत्नी मनिंदर कौर द्विवेदी के चक्कर में निधि छिब्बर और उनके पति विकास शील का डेपुटेशन रुक गया। निधि का डिफेंस जैसी मिनिस्ट्री में ज्वाइंट सिकरेट्री की पोस्टिंग मिल गई थी। लेकिन द्विवेदी दंपति ऐन-केन-प्रकारेण दो साल का डेपुुटेशन बढ़ाने में कामयाब रहे। जबकि, निवर्तमान चीफ सिकरेट्री सुनिल कुमार ने द्विवेदी को एक्सटेशन की सहमति देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया था कि सबको अवसर मिलना चहिए। सरकार का फंडा साफ था कि दो आएंगे, तो दो जाएंगे। वैसे भी, द्विवेदी दंपति को दिल्ली गए पांच साल हो गए हैं। और आगे के लिए उन्हें स्टेट गवर्नमेंट को परमिशन चाहिए। मगर किन्हीं अदृश्य ताकत के दबाव में सरकार ने निधि और विकास का डेपुटेशन रोकते हुए द्विवेदी दंपति को एक्सटेंशन दे दिया। अब, निधि के सामने भारत सरकार द्वारा डिबार कर दिए जाने का खतरा पैदा हो गया है।

बल्ले-बल्ले

सिकरेट्री और प्रींसिपल सिकरेट्री लेवल पर अफसरों का टोटा होने का लाभ आईएफएस अफसरों को मिल रहा है। मंत्रालय में, इस समय आधा दर्जन आईएफएस विभिन्न विभागों के सिकरेट्री हैं। इनमें संजय शुक्ला आवास एवं पर्यावरण, पीसी पाण्डेय कृषि, जतीन कुमार श्रम, मुरूगन ट्राईबल, देवाशीष दास पंचायत और अनिल साहू फारेस्ट शामिल हैं। हाल में, मनोज पिंगुआ भी डेपुटेशन पर चले गए। उधर, पंचायत सिकरेट्री विवेक ढांड चीफ सिकरेट्री हो गए। इसके कारण आईएएस पर वर्क लोड काफी बढ़ गया है। आलम यह है कि पुअर परफारमेंस वाली सूची के आईएएस अफसरों के पास भी दो-दो विभाग हो गए हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. कितने आईएएस अफसरों ने अभी तक देवेेंद्र नगर का बंगला खाली नहीं किया है और गृह विभाग उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की है? 
2. कितने ऐसे आईएएस और आईपीएस होंगे, जो भिलाई में बीएसपी का बंगला ले रखे हैं और राजधानी में सरकारी बंगला भी?

शनिवार, 1 मार्च 2014

तरकश, 2 मार्च

तरकश

अभिषेक का अभिषेक

मुख्यमंत्री के बेटे अभिषेक सिंह का अबकि राजनांदगांव लोकसभा सीट से उतारकर सक्रिय राजनीति में अभिषेक किया जा सकता है. जाहिर है, पिछले दो विधानसभा चुनावों से उनकी पालिटिकल ट्रेनिंग चल रही है. 2008 और 2013, दोनों विधानसभा चुनावों में अपने पिता के निर्वाचन क्षेत्र राजनांदगांव की कमान उन्होंने संभाली, बल्कि इस बार तो कवर्धा में पार्टी को जीत दिलाने में उनकी अहम भूमिका रही. हालांकि विधानसभा चुनाव के समय ही उन्हें टिकट देने की खूब चर्चा रही, मगर रमन सिंह ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि अभी समय नहीं आया है. लेकिन इससे बढ़िया समय अब हो भी नहीं सकता. केंद्र में एनडीए की सरकार फ र्म होने की संभावना बढ़ती जा रही है. फि र, सांसद के रूप में कैरियर शुरू करने के अपने मायने होते हैं. केंद्र सरकार में तीन युवा मंत्री ऐसे हैं, जो पहली बार सांसद चुन कर गए हैं. सो, दिस इज राइट टाइम.

अब पीएचडी

चीफ सिकरेट्री पद से रिटायर होकर कल दिल्ली लौटे सुनिल कुमार अब पीएचडी पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे. 2010 में जामिया मिलिया यूनिर्वसिटी में पीएचडी के लिए वे सलेक्ट हुए थे, मगर छत्तीसगढ़ आ जाने के चलते रिसर्च में ब्रेेक आ गया था. पीएचडी का उनका टापिक मीडिया से रिलेटेड है. सोमवार से इस पर वे काम शुरू कर देंगे. महीनेभर में रिसर्च का उनका काम कंप्लीट हो जाएगा. इस बीच उन्हें कोई अहम जिम्मेदारी मिल जाए, तो अचरज नहीं. मंत्रालय के गलियारों में जैसी चर्चा है, छत्तीसगढ़ सरकार दिल्ली में उन्हें कोई पोस्ट दे सकती है.

आईएम आईएएस

सुनिल कुमार की विदाई के बाद शुक्रवार को मंत्रालय के आईएएस अफ सरों ने खुली हवा में सांसें लीं. चीफ सिकरेट्री चैंबर का दरवाजा खुल गया और उसमें गुलदस्ते का ढेर लग गया. सुनिल कुमार के समय में डीजीपी अनिल नवानी का गुलदस्ता भी बाहर रखवा लिया गया था. मगर शुक्रवार को बदला-बदला नजारा था. मंत्रालय के सिकरेट्रीज दो साल तक भारी प्रेशर में रहे. 10 से 5 बजे तक आफि स पहुंचने की विवशता. हर दिन दो-तीन मीटिंगें. मीटिंग में सीएस क्या पूछ दें और उसी पर सार्वजनिक रूप से क्लास लें लें, इसका खौफ हमेशा मंडराता रहता था. दिल्ली, मुंबई और गोवा जाओ तो उसका कारण बताओ. पिछले दो साल से आईएएस अफ सरों ने तफ रीह के लिए बाहर जाना बंद कर दिया था. चापलूसी करने किसी को सीएस चैंबर में आने की इजाजत नहीं थी. मिलना है, तो पहले एसएमएस कर या पीए से बात कर काम बताओ, फि र अपाइंट मिलेगा. भ्रष्ट अफ सर भी कागजों पर बेहद सावधानियां बरत रहे थे कि पकड़ लिया, तो छोड़ेगा नहीं, लेकिन अब ये फ ालतू के लफ ड़े बंद हो गए हैं. और, मंत्रालय के आईएएस अब महसूस कर रहे हैं कि वे सचमुच आईएएस हैं.

पावर गेम

85 बैच के आईपीएस एएन उपध्याय के डीजीपी बन जाने के बाद इसी बैच के एन. बैजेंद्र कुमार के अब एडिशनल चीफ सिकरेट्री बनने का रास्ता खुल गया है. इसी आधार पर डीएस मिर्शा भी समय से पहले एसीएस बन गए थे. मिर्शा 82 बैच के हैं. और, इसी बैच के रामनिवास तब डीजीपी बने थे. हालांकि, सुनिल कुमार के रिटायर होने के बाद एसीएस का एक पोस्ट वैकेंट हो गया है. इस पर 84 बैच के एमके राउत एसीएस बन जाएंगे. चूंकि, अगले हफ ्ते आचार संहिता लग जाएगी, इसलिए, फि लहाल तो डीपीसी की संभावना नहीं दिख रही है. मगर पावर गेम के तहत सरकार की कोशिश होगी कि जितना जल्द हो सके, राउत और बैजेंद्र एसीएस बन जाएं.
भाग्य
एएन उपध्याय ने देश में सबसे कम उम्र का डीजीपी बनने का रिकार्ड बनाया है. वे 85 बैच के हैं और उनके बैच के संजय कुमार हिमाचल प्रदेश में डीजीपी हैं, मगर वे भी उपध्याय से आठ महीने बड़े हैं. 15 अगस्त 1959 को जन्मे उपध्याय अभी 54 साल छह महीने के हैं. सब कुछ अच्छा रहा, तो वे साढ़े पांच साल डीजीपी रहेंगे. इतनी कम उम्र का देश में किसी दूसरे आईपीएस को डीजीपी बनने का मौका नहीं मिला है. दूसरे कई राज्यों में तो 30 साल की सर्विस वाले अभी डीजी नहीं बने हैं. और, उपध्याय 29 साल में डीजीपी. इसे ही कहते हैं भाग्य. सब कुछ होने के बाद भी आखिर आनंद कुमार की ताजपोशी नहीं हो पाई.

डोंट वरी
कांग्रेस की डूबती कश्ती पर करुणा शुक्ला की सवारी को दोतरफा मजबूरी से जोड़कर देखा जा रहा है. करुणा के लिये भाजपा में कोई जगह नहीं बच गई थी. राजनांदगांव में रमन के खिलाफ प्रचार कर और राजनाथ सिंह को निशाने पर लेकर भाजपा का रास्ता उन्होंने खुद ही बंद कर लिया था. और,कांग्रेस को बिलासपुर में कोई ढ़ंग का उम्मीदवार नहीं मिल रहा था. साथ में, बोनस में अटल बिहारी का नाम मिल रहा था. सो,कांग्रेस प्रवेश हो गया. मगर बड़ा सवाल यह है कि करूणा को अगर बिलासपुर से टिकट मिल भी गया, तो कांग्रेस के गुटीय पालिटिक्स में वे कितना सफल हो पायेंगी. बिलासपुर में प्रभावी गुट क्यों चाहेगा कि उनके क्षेत्र में एक नेत्री स्थापित हो जाये. ऐसे में, भाजपा तनिक भी चिंतित नहीं है.

नये चेहरे

लेकसभा चुनाव के लिये अबकी भाजपा के लिस्ट में आधा दर्जन नये चेहरे होंगे. बिलासपुर सांसद दिलीप सिंह जूदेव और सरगुजा सांसद मुरारी सिंह के निधन के कारणदोनों सीटों पर पार्टी नये चेहरे उतारेगी. इसके अलावा, चार वर्तमान सांसदों के टिकट काटने की तैयारी है. जिन सांसदों पर सबसे अधिक खतरा मंडरा रहा है, उनमें जांजगीर, कांकेर, बस्तर और महासमुंद शामिल हैं. राजनांदगांव के सांसद मधुसूदन यादव की सीट बदलकर अबिक महासमुंद से महासुंद से उतारने की चर्चा तेज है.

पकड़

प्रदेश कांग्रेस में बरसों से जमे प्रभारी महामंत्री सुभाष शर्मा को हटाकर भूपेश बघेल ने पार्टी पर अपनी पकड़ और बढ़ा ली है. मोतीलाल वोरा के कट्टर समर्थक सुभाष पिछले 10 वर्षो से इस अहम पद पर थे. इस दौरान छ: अध्यक्ष बदल गये, मगर उन्हें कोई हिला नहीं पाया. नंदकुमार पटेल ने कोशिश की थी, लेकिन बाद में पीछे हट गये. भूपेश ने पहले अपने दो समर्थकों को महामंत्री बनाया, फिर शनिवार को शर्मा को हटाकर अपने सबसे खास गिरीश देवांगन को महामंत्री पद पर बैठा दिया. यध्दपि, कांग्रेस में यह मानने वालों की कमी नहीं कि भूपेश ने वोराजी से हरी झंडी लिये बगैर यह कदम नहीं उठाया होगा. मगर, दम तो दिखाया.

अंत में दो सवाल आपसे

1) 28 फरवरी को मंत्रालय के किन दो वरिष्ठो को सुलह के लिये एक साथ बैठाया गया ?
2) रमन सरकार ने आखिर क्या करतब दिखाया कि जिस गृहमंत्रालय ने आनंद कुमार को नो आब्जेक्शन नहीं दिया, उसने एएन उपाध्याय को 10 महिने पहले डीजी बनने की अनुमति दे दी ?