मंगलवार, 29 मार्च 2016

होइये सोई, जो….

FB_IMG_1441516484068विधानसभा का बजट सेशन जैसे-जैसे समापन की ओर बढ़ रहा है, कलेक्टरों की दिल की धड़कनें तेज होती जा रही है। सत्र 31 मार्च को खतम होगा। इसके बाद कलेक्टरों की बहुप्रतीक्षित सूची कभी भी…
जारी हो सकती है। दो दिन के भीतर भी। या फिर अप्रैल फस्र्ट वीक में तो पक्का समझिए। ऐसे में, टेंशन कैसे नहीं होगा। छोटे जिले वाले कलेक्टर अब सीनियर हो गए हैं। उन्हें बड़ा जिला चाहिए। बड़े वाले को और बड़ा। दो जिले वाले को तीसरा चाहिए। तो तीसरा वाले, चैथे की चिंता में दुबले हो रहे हंै। जिन्हें पारी खतम कर राजधानी लौटना है, वे माल-मसालेदार पोस्टिंग के जुगत में लगे हैं। 2009 बैच वाले सरकार से अलग मुंह फुलाए बैठा है। बहुत इंतजार करा दिया। चलिये, अब ज्यादा दिन नहीं बचे हंै। होइहे सोई जो र-अ-मन रचि राखै।

2003 बैच को विराम

कलेक्टरों की आने वाली लिस्ट में 2003 बैच को विराम लग सकता है। इस बैच की एकमात्र आईएएस रीतू सेन अंबिकापुर की कलेक्टर हैं। उनके बैच के सिद्धार्थ कोमल परदेशी और रीना बाबा कंगाले, राजधानी लौट चुके हैं। रीतू के बाद 2004 बैच के तीन कलेक्टर मैदान में बचेंगे। अंबलगन पी, अलरमेल ममगई डी एवं अमित कटारिया। इनमें से एक का विकेट तो गिरना तय माना जा रहा है। बचे दो। इनकी बैटिंग से सरकार संतुष्ट है, सो वे अभी टीम कलेक्टर बनें रहेंगे।

दिनेश की ताजपोशी

महिला बाल विकास विभाग सिकरेट्री दिनेश श्रीवास्तव 31 मार्च को रिटायर हो जाएंगे। प्रमोटी में श्रीवास्तव को हाई प्रोफाइल आईएएस में गिना जाता है। फील्डिंग अच्छी होने के चलते उन्हें पोस्टिंग भी अच्छी मिलती रही हैं। मगर आखिरी साल में इस तेज और चतुर आईएएस का मामला गड़बड़ा गया। सो, पोस्ट रिटायरमेंट उन्हें ठीक-ठाक जगह ताजपोशी मिल जाए, इसकी संभावना धूमिल है। फिर भी मानवाधिकार आयोग में पोस्टिंग की चर्चा तो चल रही है। वहां वे मेम्बर बन सकते हैं। वैसे बन जाएं, तो यह भी बुरा नहीं है। पांच साल का मामला है।

निहारिका लौटेंगी

97 बैच की आईएएस निहारिका बारिक अप्रैल फस्र्ट वीक में छत्तीसगढ़ लौट सकती हैं। पांच साल का उनका डेपुटेशन इसी साल जनवरी में खतम हुआ। इसके बाद वे दो महीने के अवकाश पर चली गई थीं। 31 मार्च को उनकी छुटटी पूरी हो जाएगी। हो सकता है, दिनेश श्रीवास्तव का महिला एवं बाल विकास विभाग निहारिका के हवाले कर दिया जाए। मगर यह तभी संभव हो पाएगा, जब वे यहां आ जाएं। क्योंकि, निहारिका की गिनती, छत्तीसगढ़ के चंद आईएएस में होती हैं, जिन्हें मूल कैडर रास नहीं आता। छत्तीसगढ़ बनने के बाद निहारिका कुछ ही समय यहां रहीं। भारत सरकार में पांच साल डेपुटेशन करके वे 2010 में छत्तीसगढ़ आई थी। वो भी पूछिए क्यों? कलेक्टर बनने के लिए। ताकि, प्रोफाइल में कलेक्टरी दर्ज हो जाए। याद होगा, सरकार ने उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए महासमंुद का कलेक्टर बनाया भी। लेकिन, साल भर कलेक्टरी कर वे फिर पांच साल के प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली चली गई थी। छत्तीसगढ़ में 97 बैच में तीन आईएएस हैं। सुबोध सिंह, एम गीता और निहारिका बारिक। इनमें सुबोध सिंह को छोड़कर दोनों देवियों को छत्तीसगढ़ रास नहीं आया। गीता भी राज्य बनने के बाद दो साल पहले ही छत्तीसगढ़ लौटी हैं।

जैसा विभाग, वैसा कानून

जंगल विभाग ने राज्य वनौषधि बोर्ड और राज्य वन अनुसंधान परिषद के पोस्ट को अपग्रेड करके पीसीसीएफ कर दिया। मगर बोर्ड के सीईओ एके द्विवेदी और परिषद के डायरेक्टर आरके डे को डायलेमा में छोड़ दिया। पहले वे जिस संस्थान के सुप्रीमो थे। पीसीसीएफ के आर्डर में विभाग ने उनकी स्थिति ही स्पष्ट नहीं की है। बेचारे वे बीच में  झूल रहे हैं। ऐसा ही, बीके सिनहा के केस में भी हुआ है। सिनहा पीसीसीएफ बन गए हैं। लेकिन, उन्हें भी पीसीसीएफ के अंदर में कैम्पा का इंचार्ज बनाकर रखा गया है। ये अलग बात है कि सिनहा काबिल अफसर हैं मगर उन्हें कैम्पा में ही रखना था, तो चार लाइन का आर्डर निकालकर कैम्पा के पोस्ट को पीसीसीएफ का कर देना था। जैसे, राधाकृष्णन के लिए सरकार ने वेयर हाउस के जूनियर आईएएस के पोस्ट को चीफ सिकरेट्री लेवल का कर दिया। ऐसे में, कम-से-कम पोस्ट का अपमान तो नहीं होता। किंतु विभाग का जैसा नाम, वैसा काम।

होली में दिवाली

पुलिस की होली तो इस बार जबर्दस्त रही। चार महीने में दूसरी दिवाली मन गई। अवसर मुहैया कराया हेलमेट ने। हिंग लगे ना, फिटकिरी वाला मामला था। इसलिए, थानों की सारी पुलिस सड़कों पर उतर आई। शायद ही किसी को बख्शा गया। पांच सौ की रसीद कटवाओ या तीन सौ देकर दो सौ बचा लो। जाहिर है, लोगों को दो सौ बचाने का आइडिया ज्यादा भाया। जाहिर है, पुलिस की लूट से आरटीओ वाले शरमा गए। राजधानी में एक वीवीआईपी हाउस से एकदम सटे चैक पर पुलिस वाले थैले में पैसे भरते रहे। एकदम डंके की चोट पर। विधानसभा में जितना हल्ला करना है, कर लो। वैसे, हेलमेट को लेकर पुलिस की कड़ाई की मंशा पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। रायपुर आईजी जीपी सिंह ने तो अच्छी पहल करते हुए अपने रेंज के पांचों कलेक्टरों को पत्र लिखकर बिना हेटमेट का पेट्रोल पंप पर तेल ना देने का आग्रह किया। मगर, अपनी पुलिस तो अनाचार का मुकदमा दर्ज करने के लिए पैसे ले लेती है। उसके लिए हेलमेट इश्यू वारदान साबित हो गया।

होली को वाट

भद्रा और पूर्णिमा का हवाला देकर पोथी-पतरा वाले अपने पंडितों ने अबकी होली को वाट लगा दिया। पहली बार दो दिन होली खेली गई। कंफ्यूजन ऐसा रहा कि 23 मार्च की सुबह तक लोग पशोपेश में रहे कि होली आज खेले या कल। दोपहर तक लोग फोन करके एक-दूसरे से पूछते रहे, आपके यहां होली कब हो रही है? रायपुर को छोड़ दें सूबे में दो दिन होली हो गई। ऐसे में, फर्क तो पडना ही था। लगा ही नहीं कि होली कब निकल गई। जाहिर है, होली से चूकि बड़ा व्यापार नहीं जुड़ा है, इसलिए सबके निशाने पर वही है। कोई तिलक होली का अभियान चलाता है, तो कहीं पानी बचाने के नाम पर होली की रंगत को फीकी करने की कोशिश। बहरहाल, नेशन और नेशनलिटी की बड़ी-बड़ी बात करने वाले लोग होली जैसे त्यौहार किस दिन मनाना है, इसे तय नहीं कर सकते, तो बाकी आप समझ सकते हैं।

शनिवार, 19 मार्च 2016

जय गंगाजल


तरकश, 20 मार्च


संजय दीक्षित
गुरूवार को कैबिनेट ने एक ऐसे विधेयक के ड्राफ्ट को हरी झंडी दे दी, जिसके विधानसभा में पारित होने के बाद 250 एकड़ तक की जमीनों को आपसी सहमति से सौदा किया जा सकेगा। याने जिस किसान के पास 250 एकड़ तक जमीन है, उसे लेने के लिए उद्योगपतियों को अब एसडीएम, कलेक्टर का चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा। ना ही जनसुनवाई होगी। ना ही एक सदस्य को नौकरी देने का झमेला। और ना ही इलाके के विकास का कोई जिम्मेदारी। 100 हेक्टेयर से अधिक जमीन होने पर ही पुनर्वास और व्यवस्थापन के रुल लागू होंगे। इस विधेयक के पास हो जाने पर उद्योगपति सीधे किसानों से चर्चा कर जमीन का सौदा करेंगे। प्रकाश झा के नया जय गंगाजल में आपने देखा ही कि किसानों को जमीन का सौदा करने के लिए झुकाने के लिए किन-किन तरह के हथकंडे अपनाए गए….बेटियों की अस्मत भी लूटी गई। हो सकता है, यहां भी ऐसा ही हो। जैसे भी किसान तैयार हो जाएं। और, इसे आपसी सहमति का नाम दिया जाएगा। कैबिनेट में राजस्व मंत्री प्रेमप्रकाश पाण्डेय ने इस बिल का विरोध कर अपना धर्म निभाया। लेकिन, बाकी? आखिर सबके अपने हित हैं। किसानों के लिए चिंता की बात यह है कि मंत्री, विधायक समर्थित माफियाओं को ठीक करने के लिए छत्तीसगढ़ में अजय देवगन या प्रियंका चोपड़ा टाईप के पुलिस आफिसर भी तो नहीं है। 27 में से कम-से-कम 25 एसपी तो प्रकाश झा के इंटरवल के पहले वाले रोल में हैं। ऐसे में, कौन बचाएगा किसानों को? पेड़ भी कटते जा रहे हैं। जय गंगाजल।

सहिष्णुता की मिसाल

इसे सहिष्णुता की मिसाल कह सकते हैं। आखिर, देशद्रोह के आरोपी कन्हैया के समर्थन में पोस्ट करने वाले बलरामपुर कलेक्टर अलेक्स पाल मेनन के खिलाफ कोई कार्रवाई कहां हुई। डंके की चोट पर वे कलेक्टरी कर रहे हैं। इससे, देश में इनटालरेंस की बात करने वालों को बड़ा मैसेज दिया है अपनी सरकार ने। देख लो, कन्हैया भले ही भारत सरकार को गालियां बके…..हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री का भद्दे ढंग से मजाक उड़ाए, संघवाद से आजादी मांगे, उसके समर्थकों के साथ भी हमारी पूरी सहानुभूति है। अलेक्स कलेक्टरी करता रहेगा। उसे तभी हटाएंगे, जब कलेक्टरों का फेरबदल हो। सिंगल आर्डर निकालकर अगर अलेक्स को हटाएंगे तो बेचारे पर क्या गुजरेगी। फेसबुक पर आखिर, छत्तीसगढ़ का कितना नाम रोशन कर रहा है।

असवाल भी चर्चा में

सरजियस मिंज के रिटायर होने के बाद मुख्य सूचना आयुक्त का पद 16 मार्च को खाली हो गया। अभी तक राजस्व बोर्ड के चेयरमैन डीएस मिश्रा को इस पोस्ट का प्रबल दावेदार समझा जा रहा था। मिश्रा 30 अप्रैल को रिटायर होंगे। याद होगा, पिछले साल उन्हें बड़ी बेरहमी के साथ मंत्रालय से बाहर कर दिया गया था। तब लोगों ने हैरानी जताई थी कि 12 साल तक सीएम के साथ काम करने वाले अफसर के साथ यह कैसे हो गया। और, यही प्वाइंट डीएस के लिए प्लस जा रहा था। मगर सरकार में फैसले के पीछे कई सारे फैक्टर काम करते हैं। सो, सीआईसी के लिए एक नया नाम एनके असवाल का भी इन दिनों चर्चा में है। असवाल 83 बैच के आईएएस है। अगले साल मई में उनका रिटायरमेंट है। सवाल यह है कि एक साल पहले वीआरएस लेने के लिए असवाल तैयार होंगे। हालांकि, ऐसे उदाहरण हैं कि अशोक विजयवर्गीय ने सीआईसी बनने के लिए चीफ सिकरेट्री की कुर्सी चार महीने पहिले छोड़ दी थी। असवाल तो एसीएस ही हैं। आखिर, पांच साल तक लाल बत्ती का मामला है। असवाल का नाम के पीछे एक वजह यह भी है कि सीआईसी और राज्य निर्वाचन आयोग, दोनों में रिजर्व वर्ग के अफसर पोस्ट थे या हैं। सीआईसी में मिंज एसटी और निर्वाचन में दलेई एससी। निर्वाचन में संभवतः ठाकुर राम सिंह की पोस्टिंग हो। ऐसे में, जातीय समीकरण के हिसाब से सीआईसी में रिजर्व वर्ग के ब्यूरोक्रेट्स को पोस्ट करना सरकार के लिए फायदेमंद होगा। असवाल का नाम के पीछे यह भी एक वजह बताई जा रही है। मगर अभी यह चर्चा ही है। 30 अप्रैल को डीएस के रिटायर होने के बाद ही तस्वीर साफ हो पाएगी।

एक भालू, 40 गोलियां

एक आदमखोर भालू को मारने के लिए महासमंुद पुलिस ने 40 गोलियां उतार दी। कुछ लोग तो 100 भी कहते हैं। भालू के मारने की जो वीडिया वायरल हुई है, उसे देखकर शर्म आती है कि यही अपनी पुलिस है। ऐसा लग रहा, जैसे किसी आतंकवादी का एनकाउंटर कर रहे हो। आधा दर्जन जवान 100 मीटर दूर से भालू को पोजिशन पर लेकर चिल्ला रहे हैं, अरे! पीछे हटो, आगे मत जाना, अभी मरा नहीं है, नहीं-नहीं गोली लग गई है, चलाओ, चलाओ गोली, फिर धाएं-धाएं। वाह रे, हमारे बहादुर जवान। घटना के दिन बलरामपुर के 15 साल के आदिवासी छात्र संतोष की याद ताजी हो गई। उसने टंगिया से भालू को मार डाला था। डीजीपी साब, ऐसे जवानों और उनके अफसरों को नक्सल मोर्चे पर मत भेजिएगा, वरना मुसीबत आपकी बढ़ेगी।

नहीं बच पाए जितेन

राज्य के लेबर कमिश्नर जितेन कुमार को बचाने के लिए सामान्य प्रशासन विभाग ने आखिर क्या-क्या नहीं किया। कितनी दिलचस्पी दिखाई। जीएडी सिकरेट्री खुद हाईकोर्ट पहुंची। लेकिन, जस्टिस संजय अग्रवाल ने सारे तर्काें को खारिज करते हुए जितेन कुमार की पोस्टिंग आर्डर को निरस्त करने का आदेश दे दिया। हाईकोर्ट ने 28 पन्नों के आर्डर में जीएडी की समूची दलीलों को रिजेक्ट कर दिया।

विधायकों का परिवार नियोजन

छत्तीसगढ़ विधानसभा में 34 विधायकों ने परिवार नियोजन का पूरा खयाल किया है। छह को एक और 28 को दो बच्चे हैं। वरना, 48 विधायकों के तीन से लेकर 12 तक बच्चे हैं। सबसे अधिक 12 बच्चे का रिकार्ड बिलासपुर जिले के एक मंत्री के नाम दर्ज है। वैसे, छह बच्चे वाले चार और नौ बच्चे वाले भी एक विधायक हैं। अधिक बच्चे वालों में बीजेपी के विधायक अधिक हैं। इसके पीछे वजह भी है। सरकार में कांग्रेस रही है। बीजेपी वाले 12 साल पहले तक तो आखिर, खाली ही थे।

शिफ्थ होगा पीएचक्यू?

पुराना पुलिस मुख्यालय फिर से गुलजार हो गया है। खुफिया चीफ अशोक जुनेजा के बाद अब स्पेशल डीजी डीएम अवस्थी भी पुराने पीएचक्यू में बैठने लगे हैं। इसकी देखादेखी नया रायपुर स्थित नए पीएचक्यू के आईपीएस भी अब लामबंद होने लगे हैं। पिछले दिनों एक एडीजी की अगुवाई में अफसरों की बैठक हुई। इसमें नए पीएचक्यू को शिफ्थ कराने का जिम्मा एक रसूखदार आईजी को देने का फैसला हुआ। असल में, महीने भर के भीतर अपना ट्रांसफर चेंज कराने के बाद आईजी को रसूखदार अफसरों में गिना जाने लगा है। अब, देखना दिलचस्प होगा कि पीएचक्यू शिफ्थ हो पाता है या नहीं।

हफ्ते का एसएमएस

कांग्रेस अब सीबीआई जांच की मांग करने वाली है कि जीरम नक्सल हमले की सीबीआई जांच का ऐलान के पीछे वजह क्या है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. एक एडीजी का नाम बताइये, जिनकी एक सरकारी कंपनी में चीफ विजिलेंस आफिसर बनने की चर्चा है?
2. रायपुर के एक मंत्रीजी अबकी होली कहां और किसके साथ खेलेंगे?
(नोट-होली के शुरूर में अगर एकाध तीर इधर-से-उधर चले गए हों तो बुरा न मानो……होली है।)
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शनिवार, 5 मार्च 2016

ट्रेनिंग की दरकार


तरकश, 6 मार्च
संजय दीक्षित
दुर्ग संभाग के एक यंग कलेक्टर ने तो कमाल कर दिया। कांग्रेस विधायकों के आचरण के खिलाफ सीधे नेता प्रतिपक्ष़्ा टीएस सिंहदेव से गुहार लगा डाली। उन्होंने सिंहदेव को लेटर लिखा है कि वे विधायकों को निर्देशित करें कि प्रशासनिक कामों में वे दखलअंदाजी ना करें और अपना आचरण ठीक ठाक रखें। बताते हैं, कलेक्टर की गुस्ताखी से नेता प्रतिपक्ष काफी गुस्से में हैं। मंगलवार को वे विशेषाधिकार हनन की नोटिस देंगे। जाहिर है, मंगलवार को सत्र प्रारंभ होने पर इसको लेकर हंगामा होगा। इससे पहले, बस्तर इलाके के एक कलेक्टर ने एक केस में जमानत न देने के लिए सीजेएम को सीधे फोन लगा डाला था। बस्तर संभाग के ही एक कलेक्टर पर इन दिनों लेखक बनने का धुन सवार हो गया है। वह भी नक्सल और सोनी सोढ़ी जैसे संवेदनशील इश्यू पर। लगता है, इन कलेक्टरों की ट्रेनिंग ठीक नहीं हुई है। सरकार को पता लगाना चाहिए कि ये अफसर किनके प्रोबेशनर रहे हैं।

मानिटरिंग नहीं

वैसे, सूबे में डिफेक्टेड कलेक्टरों की तादात थोड़े ही है। बल्कि, कह सकते हैं कि कंपीटेंट कलेक्टरों की संख्या पहले से कहीं ज्यादा है। खासकर, बिलासपुर इस मामले में सबसे आगे हैं। बिलासपुर संभाग के 90 फीसदी कलेक्टरों की गिनती अच्छे अफसरों में होती है। वहां के कमिश्नर भी तो डायरेक्ट आईएएस हैं। रायपुर, दुर्ग संभाग में भी कुछ कलेक्टर्स काफी अच्छे हैं। सरगुजा और बस्तर में भी। बावजूद इसके रिजल्ट नहीं आ रहे हैं, तो इसके लिए सिस्टम जिम्मेदार हो सकता है। रिजल्ट के लिए मैटर करता है कि उनकी मानिटरिंग किस तरह से हो रही है। किस तरह उनसे काम लिया जा रहा है। अब, राजधानी में आईएएस, आईपीएस, आईएफएस आपस में लड़ने में बिजी रहेंगे तो मानिटरिंग कैसे होगी?

पहली बार

बजट सत्र में शुक्रवार को राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा इसलिए शुरू नहीं हो सकी क्योंकि, कांग्रेस सदन में नहीं थी। आसंदी ने इसके कारण चर्चा मंगलवार तक के लिए स्थगित कर दी। राज्य बनने के बाद यह पहला मौका होगा, जब राज्यपाल के अभिभाषण के समय विपक्ष नदारत रहा। अब, इसमें कांग्रेस का भी क्या कसूर। आपस में ही लड़-भिड़कर बेचारे थक जा रहे हैं। उपर से कोई इश्यू उठाने की कोशिश करते भी हैं तो प्रेमप्रकाश पाण्डेय, अजय चंद्राकर और राजेश मूणत अमित जोगी का राग छेड़कर दुखती रग पर हाथ रख देते हैं। जाहिर है, ऐसे में विधानसभा की परंपराओं का भी कहां ध्यान रह पाएगा।

धमाकेदार वापसी

आईजी दिपांशु काबरा महीने भर में सरगुजा से रायपुर लौटने में कामयाब हो गए। पुलिस मुख्यालय के इंटरनल पालिटिक्स में उनका सरगुजा ट्रांसफर हो गया था। वे यहां से जाने के लिए तैयार नहीं थे। मगर मन मारकर उन्हें वहां ज्वाईन करना पड़ा था। लेकिन, मान गए दिपांशु को। ट्रांसफर के बाद महीने भर में वापसी करने वाले वे पहले आईपीएस बन गए। वो भी आरके विज के साथ ही। जब वे यहां से गए थे, विज के साथ एसआईबी में आईजी थे। और, लौटे तो विज के साथ ही योजना एवं प्रबंध में आईजी बनकर। कौन कहता है, आसमां मे सुराख नहीं हो सकता…। आईएएस केडीपी राव ने तबियत से पत्थर नहीं उछाली। उनके लिए किसने सिफारिश नहीं की। कैट से लेकर हाईकोर्ट तक गए। मगर सरकार यही है। आर्डर टस-से-मस नहीं हुआ। और, अब?

लाइन से रिटायरमेंट

राज्य बनने के बाद इस बरस सबसे ज्यादा आईएएस रिटायर होंगे। पूरे सात। इस महीने से लाइन लग जाएगी। 31 मार्च को दिनेश श्रीवास्तव। 30 अप्रैल को डीएस मिश्रा। 31 मई को ठाकुर राम सिंह। फिर बीएल तिवारी, बीएस अनंत, एसएल रात्रे, राधाकृष्णन। इनमें से डीएस मिश्रा और ठाकुर राम सिंह की पोस्ट रिटारयमेंट पोस्टिंग तय समझिए। दिनेश श्रीवास्तव भी मानवाधिकार आयोग में मेम्बर बन सकते हैं। बट, उन्हें थोड़ा परिश्रम करना होगा।

राम-राम….

सूबे के सबसे हाईप्रोफाइल कलेक्टर ठाकुर राम सिंह के साथ भी अजीब विडंबना है। ओहदा है, सिकरेट्री का और दो महीने बाद रिटायर होंगे कलेक्टर से। रिटायरमेंट के बाद लिखना पड़ेगा सेवानिव्त कलेक्टर। या फिर सिकरेट्री के समकक्ष रिटायर कलेक्टर। ये जरा अटपटा लगेगा। सो, बजट सत्र के बाद अप्रैल फस्र्ट वीक में होने वाले फेरबदल में सरकार का इस ओर कहीं ध्यान चला जाए, तो हो सकता है कि डेढ़-दो महीने के लिए उन्हें कमिश्नर या सिकरेट्री पोस्ट कर दे। कमिशनर के लिए कोई दिक्कत भी नहीं है। अशोक अग्रवाल के पास दो-दो कमिश्नरी है। रायपुर और दुर्ग। सरकार चाहे तो इनमें से काई एक राम सिंह को दे सकती है। इससे सरकार को भी फायदा होगा। अप्रैल में इकठ्ठे सभी कलेक्टरों का आर्डर निकल जाएगा। रायपुर के लिए मई का लफड़ा नहीं रहेगा।

एक थे विश्वरंजन, अब सुब्रमण्यिम

आपको याद होगा, विश्वरंजन जब डीजीपी बनकर आए थे तो उन्होंने माओवादियों को ललकारा था, हम उनके घरों में घुस कर मारेंगे। तब वे नक्सलियों का कुछ बिगाड़ नहीं पाए। उल्टे, लाल लड़ाकों ने खूनी खेल से दंतेवाड़ा की धरती को लाल कर दिया। देश की अब तक की सबसे बड़ी नक्सली वारदात उनके समय ही हुई। ताड़मेटला में सीआरपीएफ के 76 जवान मारे गए। तब, बढ़-चढ़ कर की गई बातों के लिए विश्वरंजन की आलोचना हुई थी। और अब देखिए। पीएस होम सुब्रमण्यिम ने 3 मार्च को आनन-फानन में प्रेस कांफ्रेंस बुलाई। बस्तर में उपलब्ध्यिां गिनाने में एक घंटा निकाल दिए। दावा किया, अबूझमाड़ को छोड़कर पूरे बस्तर में पुलिस का नियंत्रण स्थापित हो रहा है। यही नहीं, उन्होंने यह भी ठोक दिया, आधं्र्रप्रदेश के ग्रेहाउंड ने हमारे घर में घुसकर आठ नक्सलियों को ऐसे ही थोड़े मार दिया। उन्हें इनपुट्स तो हमने ही उपलब्ध कराए थे। जिस समय पीएस होम की पीसी चल रही थी, उस समय किस्टाराम में मुठभेड़ चल रही थी। पीसी के बाद नक्सलियों ने एक के बाद एक छह एंबुश लगाकर फोर्स को चारों ओर से घेर लिया। तीन जवान शहीद हो गए। विश्वरंजन दिल्ली से आए थे। अब तक के सबसे शक्तिशाली डीजीपी रहे। सुब्रमण्यिम भी दिल्ली से आए हैं। अब तक के सबसे पावरफुल होम सिकरेट्री हैं। अब, बड़े-बड़े लोग, तो बड़ी-बड़ी बातें होंगी ना। इसके आगे नो कमेंट्स।

गुड न्यूज

इंवेस्टमेंट के मामले में छत्तीसगढ़ देश का दूसरे नम्बर का स्टेट बन गया है। अपने से सिर्फ गुजरात उपर है। महाराष्ट्र और कर्नाटक भी पीछे छूट गए हैं। इंडस्ट्रीज डिपार्टमेंट ने पांच सूत्रीय एजेंडा बनाया है। पारदर्शिता के लिए सिस्टम आनलाइन हो गया है। लागत कास्ट कम किया गया है। जिलों तक में कैम्प लगाकर पूछा जा रहा है, आप क्या हेल्प चाहते हैं। सरकार खुद इंडस्ट्रीलीज के पास जा रही है। लगता है, यह उसका असर है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. मार्च के किस एजेंडे के तहत आईएफएस जेएससी राव को कांकेर के साथ ही जगदलपुर सीएफ का चार्ज दिया गया है?
2. किन दो आईएफएस अफसरों के यहां छापे की एसीबी को हरी झंडी नहीं मिल रही है?

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

40 मिनट बोल गए पीएम

तरकश, 28 फरवरी

संजय दीक्षित
सत्य साई अस्पताल के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम करीब आधा घंटा डिले हो गया था। एक तो सबका स्पीच लंबा, उपर से हाउसिंग बोर्ड के माडल इस तरह आकर्षक बन गए थे कि मोदी को उन्हें देखने में टाईम लग गए। प्रधानमंत्री को इसके बाद डोंगरगढ़, उड़ीसा, कोलकाता और वहां से यूपी जाना था। जाहिर है, समय के वे बड़े पाबंद हैं। टाईम गड़बड़ाने से उनका मूड कुछ गड़बड़ा गया था। इसकी जानकारी मिलने पर पीएमओ तत्काल हरकत में आया। पीएमओ से ताबड़तोड़ फोन आने लगे कि डोंगरगढ़ के कार्यक्रम को शार्ट किया जाए। लेकिन, ऐसा हो नहीं पाया। डोंगरगढ़ में उमड़े जनसमूह को देखकर मोदी गद्गद हो गए। शिड्यूल में उनका भाषण 20 मिनट का था। बोले 40 मिनट। कुंवर बाई से नसीहत लेने का देश के लोगों से आव्हान कर डाला, सो अलग। दरअसल, डोंगरगढ़ के प्र्रोग्राम को सफल बनाने के लिए सरकार ने पूरी ताकत झोंक दी थी। लिहाजा, डोंगरगढ़ की सभा छत्तीसगढ़ बनने के बाद किसी प्रधानमंत्री की पहली सभा के रूप में दर्ज हो गई, जिसमें डेढ़ लाख से अधिक भीड उमड़ी हो। जिस ग्राउंड में सभा थी, उसकी कैपिसिटी 80 हजार की थी। ग्राउंड सुबह नौ बजे ही फुल हो गया था। चलिये, पीएम की शाबासी से सरकार को कम-स-कम साल भर के लिए उर्जा भी मिल गई।

2005 बैच भी प्रसन्न

प्रधानमंत्री के सफल दौरे के बाद 2005 बैच के आईएएस अफसरों की खुशी तो पूछिए मत! इस बैच में छह आईएएस हैं। इनमें से पांच की भूमिका पीएम विजिट में किसी-न-किसी रुप में अहम रही। मुकेश बंसल राजनांदगांव कलेक्टर हैं ही। राजेश टोप्पो डायरेक्टर, पब्लिक रिलेशंस हैं। जाहिर है, पीएम विजिट के प्रचार-प्रसार में उन्हीं का रोल रहा। जांजगीर कलेक्टर ओपी चैधरी को राजनांदगांव में पब्लिक रिलेशंस के लिए सरकार ने तैनात किया था। दुर्ग कलेक्टर आर संगीता ने पीएम की सभा में भीड़ जुटाने में मदद की। ज्वाइंट सिकरेट्री टू सीएम होने के नाते रजत कुमार भी पीएम विजिट की तैयारियों में जुटे रहे। ऐसे में, इस बैच को खुश होना लाजिमी है। दिलचस्प यह भी है कि यह छत्तीसगढ़ का पहला बैच होगा, जिनमें स्वाभाविक इष्र्या नहीं, बल्कि अद्भूत तालमेल देखने को मिलेगा। एक-दूसरे की पोस्टिंग के लिए फील्डिंग भी करते हैं मिलजुल कर। लिहाजा, सभी मजबूत जगहों पर बैठे हैं। एक सीएम के साथ। एक डीपीआर। और, चार कलेक्टर। अब, पीएम विजिट की पार्टी भी सभी साथ करने वाले हैं।

मियां-बीवी

सोशल मीडिया में 21 फरवरी को पीएम विजिट, कुंवर बाई, छत्तीसगढ़ हाउसिंग प्रोजेक्ट के साथ ही राज्य की जिन 10 खबरों को सबसे अधिक ट्रेंड मिला, उनमें सोनी सोढ़ी पर केमिकल हमला भी शामिल रहा। यही वजह है कि सरकार की ओर से मियां-बीवी ने मोर्चा संभाला। मियां बोले तो बीबीआर सुब्रमण्यिम। सूबे के पिं्रसिपल सिकरेट्री होम। और बीवी उनके पत्नी उमा देवी। दिल्ली में छत्तीसगढ़ की रेसिडेंट कमिश्नर। सुब्रमण्यिम सोनी के परिजनों से मिलने दंतेवाड़ा पहुंच गए तो उमादेवी दिल्ली अस्पताल में जाकर सोनी का हालचाल पूछा।

बजट सत्र और बेफिकर सरकार

एक मार्च से प्रारंभ हो रहे विधानसभा का बजट सत्र रमन सिंह की तीसरी पारी का पहला सेशन होगा, जिसमें विपक्ष के पास कोई बड़ा इश्यू नहीं होगा। न नान घोटाला टाईप का कोई मामला है और ना ही कोई नक्सल वारदात, जिस पर सदन ठप्प किया जा सकें। उपर से गृह मंत्री के रुप में सरकार ने अजय चंद्राकर को बिठा दिया है। विपक्ष के लिए वास्तव में यह चिंताजनक स्थिति होगी। एक तो सरकार पर हमला करने वाला यों कहें कि घेरने वाला विपक्ष के पास कोई ढंग का वक्ता नहीं है। दूसरा, गंभीर इश्यू का भी टोटा। उधर, छत्तीसगढ़ विजिट में प्रधानमंत्री के पीठ थपथपाने से सरकार फुल जोश में है ही। सो, नाट फिकर।

कैबिनेट बड़ा या एमआईसी?

सीएम कैबिनेट बोले तो प्रदेश की सर्वोच्च बाडी। सरकार से भी बड़ी। हर नीतिगत फैसले कैबिनेट में ही होते हैं। मगर रायपुर नगर निगम ने कैबिनेट की हैसियत बता दी। उसके फैसले को सिरे से खारिज कर दिया। पूरा माजरा हम आपको बताते हैं। कुछ दिन पहले कैबिनेट ने फैसला किया था कि शहरी निकायों के सभी स्कूलों का संचालन स्कूल शिक्षा विभाग करेगा। प्रदेश के सारे नगरीय निकायों के कमिश्नरों ने आर्डर निकालकर तत्काल उसे लागू भी कर दिया। सिवाय रायपुर के। रायपुर नगर निगम ने डेढ़ होशियारी दिखाते हुए प्रस्ताव को एमआईसी में रख दिया। एमआईसी में पास तो होना नहीं था। प्रस्ताव रिजेक्ट हो गया। सरकार को जब इसकी जानकारी मिली तो हड़कंप मच गया। आला अफसरों ने निगम के एक अफसर को पल्स पोलियो की दो बूंद खुराक दी। तब निगम का अमला हरकत में आया। बड़ी मशक्कत के बाद संकट का समाधान निकाला गया। निगम से राजधानी एक्सप्रेस की रफ्तार से नोटशीट मंगाई गई। सरकार में बुलेट ट्रेन की तरह फाइल दौड़ी और घंटे भर में आर्डर जारी हो गया। इससे सरकार को यह पता चल गया कि रायपुर स्मार्ट क्यों नहीं बन पाया। जिस निगम को कैबिनेट के पावर के बारे में नहीं पता, भला वह शहर को स्मार्ट कैसे बना सकता है।

आईपीएस की गायें

वैसे तो रायपुर एवं रायपुर के आसपास कई नौकरशाहों के फार्म हाउसेज हैं। मगर धमतरी रोड पर एक आईपीएस का फार्म हाउस इन दिनों राजधानी में चर्चा का विषय बना हुआ है। फार्म हाउस में उन्नत एवं विदेशी नस्ल की 150 से अधिक गायें पाली गई हैं। इनकी देखभाल के लिए पुलिस लाइन से जवानों की ड्यूटी लगाई जाती है। खैर, पुलिस के प्रभावशाली अफसर हैं तो इतना तो बनता ही हैं।

मास्टर माइंड

एसीबी और आईएफएस को आमने-सामने लाने वाले मास्टर माइंड का खुलासा हो गया है। बताते हैं, नान घोटाले के मास्टर माइंड आईएफएस ने अपनी गर्दन बचाने के लिए दांव खेला। और, इसमें फंस गए आईएफएस और उनके युवा मंत्री। मास्टर माइंड को पता है कि कभी भी एसीबी उन्हें नाप सकती है। इसलिए, उस पर प्रेशर बनाने के लिए उन्होंने अपने मंत्री को सीएम के यहां चलने की पट्टी पढ़ाई। मंत्री नए हैं, सीधे भी। सो, घनचक्कर में फंस गए। जबकि, कई आईएफएस अफसरों ने नान घोटाले के मास्टर माइंड को सजेस्ट किया था कि एसीबी से इस तरह पंगा लेने का कोई मतलब नहीं है। अगर मंत्रीजी को इस संदर्भ में सीएम से बात करनी हो तो वन-टू-वन भी बात कर सकते हैं। लेकिन, मास्टर माइंड माने नहीं, आईएफएस अफसरों की एसीबी के साथ वैमनस्या तो कराई ही मंत्री की भी फजीहत हो डाली।

दाल-भात केंद्र

प्रदेश के आईएएस, नान आईएएस बाहर में भले ही काजू-बादाम, छप्पन भोग, नोट-पानी खाते होंगे, मगर विधानसभा के समय उनकी शामत आ जाती है। कई बार उन्हें बिस्कुट से काम चलाना पड़ता है तो कभी पेट दबाकर। ऐसा इसलिए होता है कि उनके लिए हाउस में न बैठने की व्यवस्था है और ना ही खाने की। टिफिन लेकर आएं भी तो खाएं कहां पर। मंत्रियों के कमरे भी छोटे हैं। वहां उनके चम्पू बैठे रहते हैं। नौकरशाहों का गुस्सा सातवें आसमान पर तब पहंुच जाता है, जब एनाउंस किया जाता है विधायकों के लिए फलां जगह खाने की व्यवस्था है और पत्रकारों के लिए फलां जगह। आईएएस अफसरों ने अबकी सरकार से गुहार लगाई है कि विस परिसर में उनके लिए कम-से-कम पांच रुपए वाला दाल-भात केंद्र का ही इंतजाम कर दिया जाए। इसका वे भुगतान कर देंगे। इतने के बाद तो उम्मीद तो बनती ही है कि उनके लिए कैंटीन का इंतजाम हो जाए।

अंत में दो सवाल आपसे

1. डेपुटेशन पूरा होने के बाद छुट्टी पर चल रही आईएएस निहारिक बारिक छत्तीसगढ़ लौटेंगी या दिल्ली में रेजिडेंट कमिश्नर बनेंगी?
2. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रायपुर दौरे में होम सिकरेट्री बीबीआर सुब्रमण्यिम से नक्सल मामले में गंभीर चर्चा की या हाल-चाल पूछा?

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

परमानेंट गृह मंत्री?


tarkash photo

21 फरवरी


संजय दीक्षित
सड़क हादसे में गंभीर रूप से जख्मी रामसेवक पैकरा को पूरी तरह स्वस्थ्य होने में दो से ढाई महीने लगेंगे। इससे अधिक भी हो सकता है। सरकार ने तब तक गृह विभाग की कमान अजय चंद्राकर को सौंप दी है। हालांकि, इसके पीछे पीएम विजिट और बजट सत्र बताया जा रहा है मगर सत्ता के गलियारों से जिस तरह के संकेत मिल रहे हंै, चंद्रकार को होम में कंटीन्यू भी किया जा सकता है। जाहिर है, होम के बाद चंद्राकर के पास तीन बड़े विभाग हो गए हैं। पंचायत, स्वास्थ्य और होम। सरकार इनमें से एक कम कर देगी। मसलन, पंचायत को पैकरा के हवाले। जब वे स्वस्थ्य हो जाएंगे। वैसे भी, माओवाद ग्रस्त राज्य होने के चलते ठीक-ठाक गृह मंत्री बनाए जाने की बातें बहुत पहले से चल रही हैं। तीसरी बार जब सरकार बनीं, तब भी अजय चंद्राकर को होम मिनिस्टर बनाने की चर्चाएं हुई थीं। लेकिन, तब नरेंद्र मोदी पीएम नहीं थे। अब, केंद्र भी चाहेगा कि देश के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित स्टेट में तेज-तर्रार गृह मंत्री हो। और, चंद्राकर इसमें फिट बैठते हैं।

जोगी को गुस्सा क्यों?

अजीत जोगी बोले तो सियासत के माहिर खिलाड़ी। जीवट नेता। ऐसा योद्धा जो विपरीत परिस्थितयों में भी हार नहीं मानता। लेकिन, जोगीजी में अब कुछ चेंजेस दिखने लगे है। उन्हें अब गुस्सा आने लगा है। मंगलवार को उन्होंने कुछ मीडिया वालों को बंगले में बुलवाया था। लेकिन, कुछ सवालों पर वे बुरी तरह उखड़ गए। रिपोर्टर्स भी स्तब्ध रह गए। ऐसा तो उनके सीएम रहने के दौरान भी गुस्साते नहीं देखा गया। जोगीजी राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे हैं। अच्छी तरह याद है, दिल्ली में मीडिया के तीखे सवालों को चैके-छक्के की तरह हवा में उछाल देते थे। लगता है, बुरे समय में उनके अपने जिस तरह घोखा दे रहे हैं, वे हिल गए हैं। संगठन खेमा उनके अधिकांश विधायकों को साधने में कामयाब हो गया है। आखिर, सियाराम कौशिक को जीताने के लिए जोगीजी ने क्या नहीं किया। मगर कौशिक के जन्मदिन में संगठन खेमा हावी रहा। अभी तो आरके राय ही उनके साथ खड़े दिख रहे हैं। अपनी ताकत दिखाने अमित जोग पेंड्रा गए तो विधायकों में सिर्फ राय ही मौजूद थे। ऐसे में, जोगीजी का गुस्सा लाजिमी है।

14 वें मंत्री

रमन सरकार का चैदहवां मंत्री बनने का खौफ नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव पर भी सिर चढ़कर बोल रहा है। ये हम नहीं कह रहे हैं। टीएस ने खुद ही इस आशंका को बयां किया। मौका था, क्षत्री समाज का सम्मेलन का। राजधानी में हुए इस कार्यक्रम में ठाकुर नेताओं का जमघट था। सीएम के साथ नेता प्रतिपक्ष भी मंच पर थे। टीएस ने अपने भाषण में चुटकी ली, वे व्यक्तिगत तौर पर भी सीएम से कई बार अनुरोध कर चुके हैं कि वे उन्हें मित्र ना कहें। वरना, लोग उन्हें सरकार का 14वां मंत्री कहने लगेंगे। इस पर जमकर ठहाके लगे।

जब जाम में फंस गए डीजीपी

पीएम विजिट की तैयारी का जायजा लेने के बाद घर लौट रहे सूबेे के डीजीपी अमरनाथ उपध्याय शनिवार को शंकर नगर में जाम में बुरी तरह फंस गए। असल में हुआ ऐसा कि प्रेमप्रकाश पाण्डेय के बंगले के पास वाले चैक पर दोपहर दो बजे के करीब एक कार ने स्कूटी को ठोकर मार दी। स्कूटी के ठीक पीछे डीजीपी की गाड़ी थी। हादसे के बाद उनकी गाड़ी के ठीक सामने कार और स्कूटर वाले तू-तू-मैं-मैं करने लगे। इससे चैक पर जाम लग गया। डीजीपी को गाड़ी में बैठा देखकर ट्रैफिक पुलिस वाले दौड़े। गनमैन भी गाड़ी से उतरकर लोगों को समझाने की कोशिश की। मगर कोई सुनने के लिए तैयार नहीं था। करीब 10 मिनट बाद पुलिस किसी तरह डीजीपी की गाड़ी निकलवाने में कामयाब हो पाई।

धमतरी से शुरूआत

ब्रेन हेम्बे्रज के बाद धमतरी कलेक्टर भीम सिंह मुंबई के अस्पताल में भरती है। उनकी सेहत में तेजी से सुधार हो रहा है। लेकिन, उन्हें कलेक्टरी संभालने में वक्त लगेगा। तब तक एडिशनल कलेक्टर के भरोसे जिला नहीं चलाया जा सकता। ऐसे में, धमतरी में नए कलेक्टर की पोस्टिंग हो जाए, तो अचरज नहीं। वैसे भी, भीम सिंह का धमतरी से ट्रांसफर होना ही था। उनका दो साल पूरा हो गया है। अगले फेरबदल में उन्हें कोई बड़ा जिला मिलता। मार्च तक अगर वे सेहतमंद हो गए, तो बड़े जिले की उनकी दावेदारी वैसे भी रहेगी। बहरहाल, धमतरी में जो कलेक्टर जाएगा, वह 2009 बैच का होगा। याने इस बैच की शुरूआत धमतरी से होगी।

तीन आईपीएस जाएंगे दिल्ली

अंकित गर्ग, धु्रव गुप्ता के बाद एडीजी प्रशासन राजेश मिश्रा ने भी डेपुटेशन के लिए अप्लाई कर दिया है। इनमें से दो का दिल्ली जाना लगभग तय लग रहा है। गर्ग और गुप्ता का। वजह भी है। दंतेवाड़ा में एसपी रहने के दौरान एस्सार और नक्सली रिलेशंस कांड के बाद से गर्ग हांसिये पर चल रहे हैं। सरकार उन्हें सशस्त्र बल बटालियन में पोस्ट करके भूल गई है। सो, भारत सरकार से अगर ओके हुआ, तो गर्ग दिल्ली की ट्रेन पकड़ने में देर नहीं लगाएंगे। उधर, धु्रव गुप्ता आईपीएस में जरूर सलेक्ट हो गए, मगर उनके तेवर ऐसे हैं कि पुलिस के वर्तमान सिस्टम में फिट नहीं बैठते। ऐसे, अफसरों को अपना समाज, अपना सिस्टम बर्दाश्त नहीं करता। इसीलिए, वे पीएचडी करने कानपुर चले गए थे। और, अब दिल्ली जाने की तैयारी कर रहे हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. सूबे के किन फेसबुकिया कलेक्टरों से सरकार इन दिनों परेशान है?
2. अजीत जोगी ने जब कहा, वे 30 साल और जीएंगे तथा प्रदेश की सेवा करेंगे, यह सुनकर भूपेश बघेल को कैसा लगा होगा?

ग्रह-नक्षत्र खराब?


tarkash photo14 फरवरी



संजय दीक्षित
छत्तीसगढ़ बोले तो सबसे शांत, सुघड़ प्रदेश। मगर कुछ दिनों से सूबे में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। गर आप ज्योतिष पर यकीन करते हैं तो छत्तीसगढ़ की कंुडली में मंगल, बुध और शनि का पोजिशन कुछ इस तरह बन गया है कि अपर लेवल में झगड़ा-फसाद खूब होंगे। देख ही रहे हैं। नेता, मंत्री, अफसर सब लड़ रहे हैं। कांग्रेस में अपनों में ही तलवारें खींची हुई है। ऐसा, कि सामने पड़ जाएं, तो गर्दन उड़ा दें। कैबिनेट में मंत्री लड़ रहे हैं। तो सड़क पर आईएएस, आईपीएस और आईएफएस तलवारें भांज रहे हैं। बिल्कुल अराजकता के हालात। हालांकि, सबसे पहले तलवार लेकर सड़क पर उतरे आईएएस ही। मगर इसमें उनका कोई कसूर नहीं। छत्तीसगढ़ का ग्रह-नक्षत्र ही….। आपको याद होगा, कुछ दिन पहले आईएएस ट्रेड यूनियन के अंदाज में आईपीएस से रहम के लिए पहुंच गए थे सीएम के पास। तो हाल में, आईएएस, आईपीएस, दोनों से भिड़ गए आईएफएस। वन मंत्री महेश गागड़ा तो और एक कदम आगे निकल आए। एसीबी के छापे के खिलाफ आईएफएस को लेकर पहंुच गए सीएम के पास। उन पर मंगल का प्रभाव नहीं होता तो मंत्री होने की सुविधा के नाते वे सीएम से वन-टू-वन भी बात कर सकते थे। वो ज्यादा प्रभावशाली भी होता। मीडिया में खबर भी नहीं बनती। किन्तु….। और देखिए, अगले दिन एसीबी ने संपति का खुलासा करके गागड़ा पर ही जवाबी गोला दाग दिया। अब, इसे क्या कहेंगे? ग्रह-नक्षत्र का असर! तो सरकार को इसके लिए कुछ करना चाहिए। ठोस कदम। पुख्ता इंतजाम। वरना, प्रदेश के लिए यह स्थिति ठीक नहीं है।

अमित के लौटने के बाद

आईजी लेवल पर फेरबदल अब अमित कुमार के दिल्ली से लौटने के बाद ही संभव होगा। अमित फिलहाल, सीबीआई में डेपुटेशन पर हैं। अगस्त में उनका वहां पांच साल पूरा हो जाएगा। सरकार ने उन्हें आईजी का प्रोफार्मा प्रमोशन दे दिया है। जाहिर है, अमित सरकार के गुडबुक में रहे हैं। जब यहां से दिल्ली गए थे, दुर्ग एसपी थे। सो, वहां से लौटने पर उन्हें आईजी के रूप में ठीक-ठाक ही रेंज मिलेगा। तब तक रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग के आईजी की कुर्सी पर कोई खतरा नहीं दिख रहा है। अब, कोई हिट विकेट होकर अपनी कुर्सी गवां बैठे या सरकार को सर्जरी करने के लिए विवश कर दें, तो बात अलग है।

ऐसे भी आईएएस

एक सीनियर आईएएस लोन के लिए हलाकान हैं। कई बैंकों में उनके कागज जमा हुए, मगर सभी ने हाथ खड़ा कर दिया। दरअसल, आईएएस ने पहले से कुछ बैंकों से लोन ले चुके हैं। मगर चुकाया एक का भी नहीं। एक को कह दिया कि मैंने लोन लिया ही नहीं है। हस्ताक्षर मेरा नहीं है। इसलिए, बैंकर हड़के हुए हैं। चलाचली की बेला में लोन दे दिया तो वसूल तो होने वाला नहीं।

दो लाल बत्ती का असर?

बिलासपुर जिले में आने वाला तखतपुर प्रदेश का पहला ब्लाक या विधानसभा क्षेत्र होगा, जहां सरकार ने दो लाल बत्ती दी है। राजू क्षत्री को संसदीय सचिव और हर्षिता पाण्डेय को राज्य महिला आयोग की कमान। मगर बुधवार को कांग्रेस का वहां कार्यक्रम हुआ, वह प्रदेश का अब तक का सबसे जोशीला और भीड़-भाड़ वाला कार्यक्रम में दर्ज हो गया। राजू क्षत्री ने वैसे भी पिछला चुनाव कांग्रेस के आशीष सिंह से महज 600 वोटों से जीता था। वहां पावर के डबल पोल बनने से अगले चुनाव की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

स्वागत विहार

स्वागत विहार पर सरकार का शिकंजा फिर कसता जा रहा है। ताजा अपडेट यह है कि स्वागत विहार में जिस सरकारी जमीन की प्लाटिंग की गई थी, राजस्व विभाग ने उसे फिर से सरकारी रिकार्ड में दर्ज कर लिया है। और यह भी, जिन प्लाटों को सरकारी रिकार्ड में दर्ज किया गया है, उनमें बड़े-बड़ों के नाम है। सो, जो लोग संजय बाजपेयी के देहावसान के बाद राहत महसूस कर रहे होंगे, उनके लिए यह बैड न्यूज है।

सब पाण्डेयजी

सरकार ने जिन ब्राम्हण नेताओं को लाल बत्ती से नवाजा है, उनमें अधिकांश पाण्डेयजी हैं। पीएससी मेम्बर पाण्डेय। राज्य महिला आयोग में पाण्डेय और माटी कला बोर्ड में भी पाण्डेय। मंत्री प्रेमप्रकाश भी पाण्डेय तो संगठन में सरोज पाण्डेय भी पाण्डेय। रायपुर जिलाध्यक्ष भी पाण्डेय। अपवाद के तौर पर शिवरतन शर्मा और बद्रीधर दीवान। लेकिन, उनकी हालत भी देख लीजिए। भारत सरकार ने जिस तरह माईनिंग रुल बदलें है और दूसरा, सुबोध सिंह के माईनिंग सिकरेट्री बनने के बाद जिस तरह सिस्टम को आनलाईन किया गया है, चेयरमैन के लिए कुछ बच नहीं गया है। उधर, सरकार ने दीवानजी को दूसरी बार विस उपाध्यक्ष बनाया है। इस पोस्ट की कितनी अहमियत है, आप समझ सकते हैं। ऐसे में, बीजेपी में ही लोग भी चुटकी ले रहे हैं कि एक वीरेंद्र पाण्डेय के लिए सरकार ने इतने पाण्डेय को मैदान में उतार दिया है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. एक कलेक्टर का नाम बताइये, जिसकी पत्नी कलेक्टरी चलाती है?

रविवार, 7 फ़रवरी 2016

डीएस लेंगे रिटायरमेंट?


tarkash photo

7 फरवरी


संजय दीक्षित
82 बैच के आईएएस एवं रेवन्यू बोर्ड के चेयरमैन डीएस मिश्रा 16 मार्च के पहले रिटायरमेंट ले सकते हैं। रिटायरमेंट लेेने का मतलब आप यह मत निकालियेगा कि सरकार से वे नराज-वराज हो गए होंगे। रिटायरमेंट लेंगे वे सूचना आयोग में ताजपोशी के लिए। असल में, मुख्य सूचना आयुक्त सरजियस मिंज 16 मार्च को रिटायर होंगे। जाहिर है, मुख्य सूचना आयुक्त का पोस्ट चीफ सिकरेट्री के समकक्ष है। सो, वे मिंज की जगह ले सकते हैं। इससे पहले, आपको याद होगा मुख्य सूचना आयुक्त बनने के लिए अशोक विजयवर्गीय ने चीफ सिकरेट्री के पद से चार महीने पहिले रिटायरमेंट ले लिया था। पीसी दलेई भी रिटायरमेंट से कुछ महीने पहले नौकरी छोड़कर राज्य निर्वाचन आयुक्त बन गए थे। इन केस, बजट सत्र में सरकार के व्यस्त रहने के कारण उनका आर्डर नहीं हो पाया तो फिर वे रुटीन में अप्रैल में रिटायर होंगे। तब तक सूचना आयोग का पोस्ट उनके लिए खाली रखा जाएगा।

जोगी अस्वस्थ्य

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की सेहत ठीक नहीं बताई जा रही। 20 दिन से अधिक हो गए। ना तो वे किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में दिखे हैं और ना ही मीडिया से मिल रहे हैं। हालांकि, वे सागौन बंगले में ही हैं। लेकिन, मिलने की मनाही है। बताते हैं, अमित के निष्कासान के दौरान जोगीजी का आपरेशन हुआ था। तब भूपेश को ललकारने के लिए वे डाक्टर की सलाह को नजरअंदाज कर रणभूमि में उतर आए थे। पामगढ़ और अहिरवारा जैसे कई सामाजिक सम्मेलनों ने जोगी ने दहाड़ा था, मोर से बड़ कोन नेता हवे छत्तीसगढ़ में। लगातार दौरे से जोगीजी के आपरेशन के कुछ टांके टूट गए। इसलिए, डाक्टरों ने उन्हें कंप्लीट बेडरेस्ट की सलाह दी थी। यद्यपि, उनकी तबीयत में सुधार है। अब, वे चेयर पर बैठने लगे हैं। लेकिन, पहले जैसे सक्रिय होने में अभी कुछ वक्त लगेगा।

तलवारें खींचेंगी!

सिके्रट सर्विस मनी को लेकर पुलिस महकमे में तलवारें खींच सकती है। एसएस मनी अभी आठ करोड़ रुपए है। इनमें से करीब आधा हिस्सा नक्सल आपरेशन को जाता है और आधा खुफिया पुलिस को। पुलिस महकमा नक्सल आपरेशन के हिस्से में से डंडी मारने के चक्कर में था। इसके लिए नोटशीट भी चल गई है। तर्क दिया गया है कि नक्सल इंटेलिजेंस कोई खुफिया इनपुट तो देता नहीं तो उसे इतनी राशि क्यों दी जाए। मगर, गड़बड़ यह हो गया कि एंटी नक्सल में डीएम अवस्थी आ गए हैं। वो भी स्पेशल डीजी बनकर। सो, वे राशि कम तो होने नहीं देंगे। आरके विज के समय एक बार चल भी जाता। मगर अब इसको लेकर बात बिगड़ सकती है। हम आपको बता दें, कि इंटेलिजेंस में पोस्टिंग का सबसे अधिक क्रेज रहता है, वह है बेहिसाब पावर, एक्सपोजर और आठ करोड़ रुपिया। इस रुपिये का कोई आडिट नहीं होता। कोई पूछ भी नहीं सकता कि इन रुपयों का आपने क्या किया। मुखबिरों को बांटा या अपने पास रखा। न विधानसभा में सवाल का लफड़ा और ना ही ईओडब्लू में शिकायत का खतरा। बिल्कुल सेफ। ऐसे में तलवारें तो निकलेगी ही।

2009 बैच की कसमसाहट

यह पहली दफा होगा, जब किसी एक बैच के सारे आईएएस राजधानी में डंप हो गए हैं। हम बात कर रहे हैं 2009 बैच की। इस बैच में छह आईएएस हैं। इनमें से अवनीश शरण जिला पंचायत रायपुर में सीईओ हैं। बाकी पांच विभिन्न डायरेक्ट्रेट में। सौरव कुमार चिप्स, प्रियंका शुक्ला कौशल उन्नयन, समीर विश्नोई बीज विकास निगम, फैयाज तंबोली नेशनल हेल्थ मिशन, किरण कौशल महिला बाल विकास। सभी कलेक्टर बनने के लिए कसमसा रहे हैं। वार्मअप हो-होकर थक गए। सही भी है। दूसरे राज्यों में 2010 बैच को कलेक्टर बनने का मौका मिल गया है। मगर भारतीय रेलवे की तरह उनका बैच भी लेट होता जा रहा है। सरकार ने अब भरोसा दिया है, बजट स़त्र के जस्ट बाद लिस्ट निकल जाएगी। याने मार्च एंड या अप्रैल फस्र्ट वीक। लेकिन, संख्या अधिक है। सो, अधिकतम चार को ही मौका मिल पाएगा। दो को अक्टूबर, नवंबर तक इंतजार करना होगा। बहरहाल, अधिकांश को अपने कैरियर से अधिक अपनी पत्नी और बच्चों की चिंता सताने लगी है। दरअसल, राजधानी की चकाचैंध में पत्नी-बच्चों का मन रमने लगा है। सरकार ने कहीं दूर पटक दिया तो क्या होगा। लेकिन, उन्हें चिंता नहीं करनी चाहिए। जिले में लक्ष्मीजी बरसने लगेंगी तो घर की लक्ष्मीजी का मन वहीं रमने लगेगा।

सवा साल की कलेक्टरी

अभी जो कलेक्टर बनेंगे, वे मानकर चल रहे हैं कि उस जिले में उनकी कलेक्टरी सवा से डेढ़ साल तक ही रहेगी। उसकी वजह यह है कि विधानसभा चुनाव में करीब पौने तीन साल बचा है। अभी जो कलेक्टर पोस्ट होंगे, जाहिर है, वे चुनाव तक नहीं रह पाएंगे। चुनाव आयोग की तलवार उन पर लटक जाएगी। सो, आचार संहिता लगने से एक, सवा साल पहले सरकार अपने हिसाब से जिलों में कलेक्टरों को बिठाएगी। याने अगले साल जून, जुलाई में निश्चित तौर पर एक बड़ी लिस्ट निकलेगी।

प्रेशर टेक्नीक

आईएफएस अफसरों की प्रेशर टेक्नीक काम कर गई। नवंबर से अटका पीसीसीएफ का आर्डर शनिवार को जारी हो गया। वो भी तीनों का। जबकि, पोस्ट दो ही थी। नवंबर में पीसीसीएफ की डीपीसी हुई थी। लेकिन, किसी की जिद में आदेश नहीं निकल रहा था। आईएफएस इससे खासे नाराज थे। अफसरों ने इसको लेकर कुछ दिन पहले मीटिंग की। उसमें कुछ आईएएस के व्यवहार पर गंभीर सवाल उठे थे। उमेश अग्रवाल और संजय अलंग का नाम प्रमुखता से था। लेकिन, सब जानते हैं, निशाना कहीं और था। आईएफएस ने नेतागिरी के लिए रणनीति के तहत कौशलेंद्र सिंह को आगे किया। मालूम है, कौशलेंद्र का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। और, यह टेक्नीक काम कर गई। एसीबी से रहम दिलाने के लिए आईएएस अफसरों को कमरेड स्टाईल में सीएम से मिलना पड़ा था। लेकिन, आईएएस का दम देखिए, मीडिया में खबर छपवाई कि वे सीएम से मिलकर अपनी बात रखेंगे और उनका काम हो गया।

250 करोड़ का खजाना

बीके सिनहा के पीसीसीएफ स्टेट फारेस्ट रिसर्च बनने के बाद वन विभाग का अहम विभाग कैम्पा खाली हो गया है। कैम्पा का बजट 250 करोड़ का है। नेताओं और अफसरों के अधिकांश बेगारी इसी फंड से होते हैं। सो, इस पोस्ट पर किसी विश्वस्त को ही उपर वाले बिठाना चाहेंगे। चर्चा है, लेबर सिकरेट्री जीतेन कुमार को कैम्पा का प्रमुख बनाया जाएगा। मगर आर्डर निकलने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा। वजह, बीके सिनहा को वाईल्डलाइफ के साथ कैम्पा का चार्ज देने के कवायद की गई, लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं होने दिया।

यंग्रीमैन मेयर, यंग्रीमैन सीएसपी

गुरूवार को रायपुर के मेयर प्रमोद दुबे और सीएसपी कोतवाली अंशुमन सिसोदिया के बीच जमकर तू-तूू, मैं-मैं हो गई। मेयर गुस्से में थे कि बीजेपी पार्षद उनके चेम्बर में कैसे घुस गए। इस बात को लेकर वे स्टूडेंट लीडर वाले अपने पुराने अंदाज में सीएसपी से भिड़ गए। बोले, वक्त आने दो, देख लूंगा। तो सिसोदिया का भी ठाकुर खून ठहरा। जवाब भी उसी अंदाज में दिया। लेकिन, गलती दोनों की थी। सिसोदिया को मेयर के बारे में पता होना चाहिए कि वे स्टूडेेंट पालिटिक्स से आए हैं। यूनिवर्सिटी प्रेसिडेेंट रहे हैं। वो भी ब्राम्हणपारा ब्रांड। सिसोदिया को घोखा हो गया, मेयर शहर के प्रथम व्यक्ति होते हैं। गरिमा-वरिमा का ध्यान तो रखबे करेंगे। उधर, जब यह एपीसोड हुआ, सिसोदिया के बगल में महिला सीएसपी अर्चना झा खड़ी थीं। मेयर को भी इसका ध्यान रखना था। बगल में महिला खड़ी हो और कोई डपट दें तो जिसको गुस्सा ना आता हो वो भी भड़क जाएगा। सीएसपी के भड़कने का कारण भी वाजिब ही माना जाएगा।

अंत में दो सवाल आपसे

1. किस नेता ने अपनी मस्तानी को लाल बत्ती दिलवा दी?
2. छत्तीसगढ़ राजस्व बोर्ड का अगला चेयरमैन कौन हो सकता है?