रविवार, 20 जनवरी 2019

रहिमन चुप हवे बैठिए….

20 जनवरी 2019
25 साल तक ब्यूरोक्रेसी की खूब चली। दिग्विजय सिंह के समय मध्यप्रदेश में और 2000 के बाद छत्तीसगढ़ में। दिग्गी राजा ने भी नौकरशाही का कम उपयोग थोड़े किया। छत्तीसगढ़ में शुक्ल बंधुओं को टाईट रखने के लिए चुन-चुनकर कलेक्टर भेजे। आखिरी-आखिरी में बिलासपुर के कई मंत्री जब बाउंड्री को लांघने लगे तो शैलेंद्र सिंह को कलेक्टर बनाकर भेज दिया था। शैलेंद्र सिंह ने सारे नेताओं की दुकान बंद करवा दी थी। जोगी शासन काल में भी नौकरशाहों का जलवा कम नहीं रहा। और, अब रमन सरकार पर नौकरशाही हॉवी होने के आरोप बीजेपी के लीडर ही लगा रहे हैं। अलबत्ता, स्थितियां अब बदल गई हैं। आधी रात को चीफ सिकरेट्री और डीजीपी की कुर्सी खिसक गई। आईएएस, आईपीएस के ऐसे ट्रांसफर हुए कि कोई इधर गिरा, कोई उधर….। मुकेश गुप्ता, नान, जीरम, चिप्स, संवाद के खिलाफ जांच बैठ गई। ऐसे में, अफसरशाही रहीम के इस दोहा को याद कर चुपचाप बैठने में अपनी भलाई समझ रही होगी…. रहिमन चुप हवे बैठिए, देखी दिनन के फेर, जब नीके समय आईहे, बनत न लगीहे देर। चलिये, लोकसभा चुनाव के बाद शायद ये, नीके समय… आ जाए। आखिर उम्मीद पर पूरी दुनिया टिकी है।

अध्यक्ष का टोटका

विधानसभा चुनाव में शर्मनाक पराजय के बाद बीजेपी एक बार फिर आदिवासी नेता विष्णुदेव साय को प्रदेश की कमान सौंपने जा रही है। बताते हैं, उनके नाम पर सहमति बन गई है….किसी भी दिन इसका ऐलान हो जाएगा। बता दें, छत्तीसगढ़ में भाजपा ने लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीते और तीनों में आदिवासी नेताओं की भूमिका अहम रही। पहली बार 2003 में डा0 रमन सिंह जरूर पार्टी के अध्यक्ष रहे लेकिन, सदन में पार्टी की बागडोर नंदकुमार साय के हाथ में रही। इसके बाद दोनों विस चुनावों में पार्टी की कमान आदिवासी लीडर के हाथ में रही। 2008 के विधानसभा चुनाव में रामसेवक पैकरा और 2013 में विष्णुदेव साय पार्टी के अध्यक्ष रहे। और, दोनों में भाजपा को फतह मिली। पिछले साल भी विष्णुदेव साय को अध्यक्ष बनाने के लिए पार्टी में चर्चा हुई थी। इसके पीछे आदिवासी वर्ग को साधने के साथ ही पार्टी का वह टोटका भी था कि आदिवासी अध्यक्ष रहते चुनाव में बीजेपी को जीत मिलती है। लेकिन, राज्य सभा की टिकिट के लिए सरोज पाण्डेय से शिकस्त मिलने के बाद धरमलाल कौशिक को अध्यक्ष के रूप में कंटिन्यू कर दिया गया। अब देखना दिलचस्प होगा, विष्णुदेव साय को अध्यक्ष बनाने से लोकसभा चुनाव में भाजपा का यह टोटका कितना काम आ पाता है।

गुरू गुड़ और चेला….

जूनियर अफसरों से काम कराने का जो ट्रेंड रमन सरकार में शुरू हुआ, भूपेश सरकार भी उससे बच नहीं पा रही। एसपी की पोस्टिंग में यह साफ तौर पर परिलक्षित हुई। रायपुर, बिलासपुर के बाद बड़े जिलों में रायगढ़ की गिनती होती है। किसी भी आईपीएस का वह दूसरा या तीसरा जिला होता था। एसपी के तौर पर दीपक झा का भी रायगढ़ तीसरा जिला था। उन्हें हटाकर सरकार ने राजेश अग्रवाल को एसपी बनाया है। राजेश को अचार संहिता लगने के दिन आईपीएस अवार्ड हुआ। उन्हें अभी बैच भी नहीं मिला है। बावजूद इसके, पहली बार में उन्हें रायगढ़ की कप्तानी सौंप दी गई। जबकि, 2006 बैच के आरएन दास जांजगीर और प्रशांत अग्रवाल बलौदाबाजार के एसपी है। हिट तो यह भी है कि प्रशांत पिछले साल जब राजनांदगांव के एसपी थे तो राजेश उनके एडिशनल एसपी। लेकिन, गुरू गुड़ रह गया और चेला शक्कर। सबसे बड़ी दिक्कत विजय अग्रवाल को होने वाली। राजेश के साथ ही आईपीएस बनें विजय बिलासपुर में अभी एडिशनल एसपी हैं। आईजी कभी कप्तानों की मीटिंग बुलाएंगे तो राजेश ठसके से आईजी के सामने बैठेंगे और विजय उनके लिए चाय-पानी का इंतजाम करते नजर आएंगे। वाह भाई! गजब की पोस्टिंग है।

नो कमेंट्स

आईपीएस पारुल माथुर छोटे से जिले मुंगेली की एसपी हैं। उनके पिता राजीव माथुर भी पहले मध्यप्रदेश, बाद में छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस रहे। राजीव रायपुर के आईजी रहे। पुराने लोगों को याद होगा, आईजी रहने के समय वे वेश बदलकर थानों का निरीक्षण करने पहुंच जाते थे। कांग्रेस नेताओं से कथित संबंधों को लेकर पुरानी सरकार में उन्हें वेटेज नहीं मिला। सरकार के रुख को भांप कर ही वे डेपुटेशन पर भारत सरकार चले गए थे। और, वहीं से रिटायर हो गए। जाहिर है, उनकी बेटी पारुल को भी अच्छी पोस्टिंग नहीं मिली। चार साल से उपर तक रेलवे एसपी रहीं। पिछले साल वे उस मुंगेली जिले में भेजी गई, जहां फ्रेश आईपीएस भी नहीं जाना चाहते। कांग्रेस की नई सरकार से उन्हें जरूर उम्मीद रही होगी, लेकिन, इसमें भी वैसा ही हुआ। उन्हीं की 2008 बैच की नीतू कमल जांजगीर के बाद राजधानी की एसपी बन गई और पारुल मुंगेली में ही छुट गईं। इसी तरह दास और प्रशांत से चार बैच जूनियर 2010 बैच के अभिषेक मीणा बिलासपुर जैसे बड़े जिले के एसपी हैं।

बालोद को भूली सरकार

बलोद भले ही छोटा जिला है मगर नक्सली और दल्ली राजहरा माइंस के कारण सेंसेटिव केटेगरी में आता है। लेकिन, 25 दिसंबर से वहां कप्तान की कुर्सी खाली है। आईके ऐलेसेला को हटाकर सरकार ने नारायणपुर भेजा था, उसके बाद वहां कोई पोस्टिंग नहीं हुई है। हालांकि, ऐलेसेला को सरकार ने दस दिन के भीतर ही नारायणपुर से बुलाकर ईओडब्लू में पोस्ट कर दिया। मगर बालोद को लगता है, वह भूल ही गई है। जबकि, सीएम भूपेश बघेल के दुर्ग जिला से बालोद बिल्कुल सटा है। इसके बाद भी पुलिस महकमा संज्ञान नहीं ले रहा तो यह गंभीर बात है।

पिंगुआ को पावर

आईएएस मनोज पिंगुआ डेपुटेशन से लौटने वाले है। हो सकता है, 15 फरवरी तक वे यहां ज्वाईन कर लें। हालांकि, उनका डेपुटेशन एक साल पहले पूरा हो गया था। लेकिन, बच्चों की पढ़ाई के चलते उन्होंने उसे एक साल बढ़वा लिया था। बहरहाल, रायपुर लौटने पर जाहिर है, उन्हें अच्छी पोस्टिंग मिलेगी। वैसे भी कई अफसरों के पास विभागों का ओवरलोड है। 94 बैच के आईएएस पिंगुआ प्रिंसिपल सिकरेट्री लेवल के अफसर हैं। पिछले साल ही उन्हें प्रोफार्मा प्रमोशन मिला था। दिल्ली जाने के पहिले उनके पास ट्राईबल और जीएडी था। ट्राईबल में आदिवासी बच्चों की छात्रवृत्ति हड़पने वाले शिक्षा संस्थानों के खिलाफ मुहिम छेड़ी थी।

ओवरलोडेड सिकरेट्री

मंत्रालय में तीन आईएएस अफसर इतने ओवरलोडेड हो गए हैं कि उनकी घरवाली दुखी हो गई होंगी। खासकर सिकरेट्री टू सीएम गौरव द्विवेदी के पास पुराना स्कूल शिक्षा तो बरकरार है ही, उपर से माईनिंग, पब्लिक रिलेशंस, आईटी जैसे कई और विभाग जुड़ गए हैं। जबकि, सिकरेट्री टू सीएम होना ही एक बड़ा टास्क होता है। सारे विभागों की फाइलें सिकरेट्री से होकर ही सीएम तक जाती है। सिकरेट्री को सुबह-शाम सीएम हाउस भी जाना होता है। हाउस में भी विभिन्न मीटिंगे होती है। सीएस से कोआर्डिनेशन का दायित्व सिकरेट्री टू सीएम के पास होता है। उनके बाद नम्बर आता है 87 बैच के आरपी मंडल और 89 बैच के अमिताभ जैन का। मंडल के पास पंचायत पहले से था, अब गृह, जेल और परिवहन मिल गया है। पंचायत और गृह बड़े विभाग हैं। राज्य बनने के बाद गृह में हमेशा अलग सिकरेट्री रहा है। बड़े राज्यों में तो जेल और परिवहन के भी सिकरेट्री होते हैं। अमिताभ के पास फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण फायनेंस तो है ही। इसके साथ वाणिज्य और उद्योग एवं पीडब्लूडी भी है। हालांकि, वे फायनेंस और पीडब्लूडी में पहले भी रह चुके हैं, इसलिए इनमें उन्हें दिक्कत नहीं जाएगी। वाणिज्य और उद्योग जरूर उनके लिए नया होगा। बहरहाल, पता चला है, इनमें से एक का रोज पत्नी से विवाद हो जा रहा…क्योंकि शाम को वे समय पर घर नहीं लौट पा रहे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. धुर विरोधी कहे जाने वाले रमन सरकार के कुछ मंत्री क्यों हाथ मिला रहे हैं?
2. टीएस सिंहदेव क्यों बोल गए कि अमरजीत भगत मंत्री बन सकते हैं?

पोस्टिंग का वर्ल्ड रिकार्ड

सूबे के सबसे सीनियर आईपीएस गिरधारी नायक ने जेल विभाग में पोस्टिंग का वर्ल्ड रिकार्ड बना डाला है। जेल डीजी बने उन्हें 6 साल सात महीने हो चुके हैं। इतने लंबे समय तक जेल विभाग का प्रमुख भारत में ही नहीं, वर्ल्ड में भी कोई नहीं रहा है। चलिये, नायक डीजीपी नहीं बन पाए अलबत्ता, लंबी पोस्टिंग का रिकार्ड जरूर बनाने में कामयाब हो गए। हालांकि, प्रभारी डीजीपी रहने के दौरान जिस झीरम घाटी की फाइल तलब कर पिछली सरकार की नजरों में चढ़े थे, इसे भी उपर तक नहीं बता पाए। क्योंकि, झीरम इश्यू पर भूपेश सरकार बेहद संजीदा है। एसआईटी भी बन गई है। और, जो आईपीएस झीरम की फाइल के कारण ही बियाबान में धकेला गया, वह जेल में वर्ल्ड रिकार्ड बना रहा है। आखिर इसे दुर्भाग्य ही तो कहा जाएगा।

सीएस का फैसला

नई सरकार में सबसे अप्रत्याशित रहा चीफ सिकरेट्री अजय सिंह की छुट्टी। ऐसे समय में जब यह माना जाने लगा था कि लोकसभा चुनाव के बाद ही अब सीएस पर सरकार विचार करेगी, भूपेश सरकार ने बुधवार की देर रात बस्तर से लौटते ही उन्हें बदलने का आदेश दे दिया। बुधवार को कोंडागांव के रोड शो में सीएम को लेट हो गया। सूर्यास्त होने के कारण हेलिकाप्टर टेकऑफ नहीं कर पाता। इसलिए, वे कार से राजधानी के लिए रवाना हुए। बताते हैं, रास्ते में ही उन्होंने सीएस बदलने का फैसला किया। और, फोन से सीएम सचिवालय के अफसरों को नोटशीट तैयार करने के लिए ब्रीफ किया गया। सीएम रात करीब 11 बजे पहुना पहुंचे। इसके बाद उनके सामने नोटशीट प्रस्तुत की गई और उन्होंने उसे ओके कर दिया।

पारफारमेंस से दुखी

सीएस अजय सिंह ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए हालांकि कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। काउंटिंग के दिन कांग्रेस के पक्ष़्ा में रूझान मिलते ही उन्होंने कांग्रेस के घोषणा पत्र में शामिल किसानों के कर्जमाफी का प्रासेज शुरू करा दिया था। तब सुनील कूजूर एसीएस कृषि थे। अजय सिंह ने जब उन्हें कर्जमाफी का ब्यौरा जुटाने का निर्देश दिया था तो कुजूर का माथा भी घूम गया था….काउंटिंग अभी कंप्लीट भी नहीं हुई है और सीएस साब हरकत में आ गए हैं। लेकिन, इसके बाद अच्छा नहीं हुआ। अंदर की खबर यह है कि भूपेश उनके पारफारमेंस से संतुष्ट नहीं थे। इस स्तंभकार से बातचीत में सीएम ने सीएस के पारफारमेंस पर कुछ नहीं कहा, लेकिन यह जरूर बोले कि सीएस ने अपने से होकर किसी नई योजना पर कोई सुझाव दिया और न ही कोई अपडेट। जाहिर है, इससे सीएम खुश नहीं रहे होंगे।

गौरव का प्रमोशन

सिकरेट्री टू सीएम बनने के बाद आईएएस गौरव द्विवेदी को अब प्रमोशन के रूप में सरकार से न्यू ईयर गिफ््ट मिल सकता है। गौरव 95 बैच के आईएएस हैं। 94 बैच के आईएएस पिछले साल प्रिंसिपल सिकरेट्री बन चुके हैं। इस चलते जनवरी में 95 बैच का प्रमोशन ड्यू हो गया है। गणेश शंकर मिश्रा के पिछले साल रिटायर होने के कारण पीएस का पद भी खाली है। और फिर इस पोस्ट के लिए और कोई दावेदारी भी नहीं है। गौरव 95 बैच के छत्तीसगढ़ में अकेले आईएएस हैं। सीआर भी आउटस्टैंडिंग है। प्रिंसिपल सिकरेट्री बनाने के लिए डीपीसी में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया से भी कोई अफसर नहीं आता। यहां से सिर्फ अनुमति के लिए लेटर जाता है। वहां से ओके होते ही चीफ सिकरेट्री और एक सीनियर एसीएस की मौजूदगी में किसी भी दिन उनके प्रमोशन पर मुहर लगा दिया जाएगा।

आधी रात का सच!

भूपेश से मीडिया परेशान है। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद अधिकांश ट्रांसफर आधी रात के बाद हुए हैं। और, मीडिया का वर्किंग कल्चर आजकल बदल गया है। इलेक्ट्रानिक चैनल में रात दस के बुलेटिन के बाद काम लगभग खतम हो जाता है। इसके बाद वैसे खबरों की टीआरपी भी नहीं होती। और प्रिंट और वेब में भी रात 11 बजे तक काम समेटा जाता है। भूपेश जब से सीएम बनें हैं, सिर्फ रिपोर्टरों को ही नहीं बल्कि संपादकों को भी रतजगी करनी पड़ रही है, पता नहीं कौन सी लिस्ट आ जाए। हालांकि, एक शोक मिलन में पहुंचे सीएम से कुछ लोगों ने इस आधी रात की सच के बारे में पूछ ही लिया। भूपेश बोले, सरकार दिन भर काम में व्यस्त रहती है। लिहाजा, सेटअप और ट्रांसफर के लिए दिन में सोचने का वक्त नहीं बचता। सो रात में….। अलबत्ता, उन्होंने खुद भी चुटकी ली, कई पत्रकार रात में सोने से पहिले फोन करते हैं….कोई लिस्ट तो नहीं आ रही।

छप्पड़ फाड़कर

ठीक ही कहा गया है, उपर वाला देता है तो छप्पड़ फाड़कर। आईएएस सुनील कुजूर से बढ़ियां इसे कौन समझ सकता है। कहां दो साल पहले तक वे एसीएस बनने के लिए धक्के खा रहे थे। मगर डीपीसी नहीं हो पा रही थी। वो तो थैंक्स कहें आईपीएस राजीव श्रीवास्तव को, जिनके डीजी बनने के बाद आईएएस एसोसियेशन के चेयरमैन बैजेंद्र कुमार ने कुजूर के लिए हल्ला किया। तब जाकर कुजूर को प्रमोशन मिल सका। इसी साल अक्टूबर में उनका रिटायरमेंट है। इसलिए, वे मान कर चल रहे थे कि एसीएस से ही उन्हें रिटायर हो जाना है। वैसे भी, वे कोई महत्वकांक्षी अफसर नहीं है। बिल्कुल पूर्व डीजीपी एएन उपध्याय की तरह। वे भी कभी नहीं सोचे थे कि डीजीपी बनेंगे। क्योंकि, तीन-तिकड़म उपध्याय का स्वभाव नहीं है। लेकिन, उपर वाले ने ऐसा छप्प़ड़ फाड़कर दिया कि पौने पांच साल पुलिस प्रमुख रहकर देश के दूसरे लंबे कार्यकाल वाले डीजी बन गए। हालांकि, कुजूर के पास समय बहुत कम है। फिर भी, चीफ सिकरेट्री कितने आईएएस बन पाते हैं।

रमन की जीत

डा0 रमन सिंह भले ही पार्टी को चौथी बार सत्ता में लाने में कामयाब नहीं हो सकें लेकिन, धरमलाल कौशिक को नेता प्रतिपक्ष बनवाकर यह संदेश देने में कामयाब रहे हैं कि दिल्ली में उनकी पकड़ बरकरार है। वरना, तो नेता प्रतिपक्ष के लिए पांच-पांच विधायकों ने दावेदारी करके उनकी नींद ही उड़ा दी होगी। जाहिर है, उनके पसंद का कोई विधायक इस पद पर नहीं बैठता तो आगे चलकर उन्हें सियासी नुकसान होता। इसलिए, वे पहले से ही धरमलाल के नाम को आगे कर दिए थे। और, तमाम विरोधों के बाद भी दिल्ली से एक लाइन का मैसेज आ गया, धरम को ओके किया जाए।

सेम बैच

छत्तीसगढ़ बनने के बाद यह पहला मौका होगा, जब चीफ सिकरेट्री और डीजीपी सेम बैच के होंगे। सीएस सुनील कुजूर 86 बैच के आईएएस और डीजीपी डीएम अवस्थी 86 बैच के आईपीएस हैं। इससे पहले एक बार को छोड़कर सीएस हमेशा बैच में डीजीपी से सीनियर रहता था। सिर्फ विश्वरंजन के समय ऐसा हुआ था कि चीफ सिकरेट्री से डीजीपी बैच में सीनियर हो गया है। विश्वरंजन जब डीजीपी थे, तब सीएस पी जाय उम्मेन उनसे पांच बैच जूनियर थे।

पोस्टिंग के मायने

आईपीएस की लिस्ट में सरकार ने तीन रेंज के आईजी समेत पांच आईपीएस अफसरों को बदल दिया। इनमें एडीजी अरुणदेव गौतम दूसरी बार सिकरेट्री होम बनाकर पीएचक्यू से मंत्रालय भेज दिए गए। रमन सरकार में भी वे एक बार सिकरेट्री होम रह चुके हैं। पिछले साल ही वे मंत्रालय से पीएचक्यू लौटे थे। आईपीएस की लिस्ट की सबसे अहम रहा, आईजी एसआरपी कल्लूरी को मेन स्ट्रीम में लाकर आईजी एसीबी-ईओडब्लू बनाना। वैसे, समझदार लोग इस पोस्टिंग के निहितार्थ समझ गए हैं।

अंत में दो सवाल आपसे

1. मंत्री कवासी लकमा को आबकारी, वाणिज्य और उद्योग जैसे विभाग देने के क्या मायने हैं?
2. नए डीजीपी डीएम अवस्थी अगर क्रीज पर जम गए तो कितने अफसरों की उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा?

कांग्रेस के गढ़ में कमल!

यह सर्वविदित है कि छत्तीसगढ़ कांग्र्रेस का गढ़ रहा है। जनता पार्टी की लहर में मध्यप्रदेश के समय सबसे अधिक छत्तीसगढ़ से कांग्रेस को सीटें मिली थी। तो अभी भी देश में कांग्रेस कहीं मजबूत है तो वह है, छत्तीसगढ़। इसके बाद भी बीजेपी पिछले 15 साल से राज कर रही है तो उसे इसका गुमान नहीं होना चाहिए। याद होगा, एक विधायक ने पिछले साल अमित शाह के रायपुर विजिट में जब सरकार की शिकायत की तो शाह ने उस विधायक को लगभग झिड़की देते हुए कहा था कि यह मत भूलिये.....कांग्रेस के गढ़ में यहां तीन बार सरकार बनी है। बीजेपी नेता भी मानते हैं, 2003 में अगर जोगी सरकार की एंटी इंकाम्बेंसी और दूसरा, एनसीपी नहीं होती तो कांग्रेस की सरकार रिपीट हो गई होती। 2008 में सस्ता चावल की वजह से सरकार जरूर बन गई। मगर याद कीजिए....इतनी बड़ी सौगात देने के बाद भी सीटों की संख्या में कोई फर्क नहीं पड़ा। वास्तव में चावल योजना के बाद तो बीजेपी की सीटें 60 से उपर चली जानी चाहिए थी। 2013 में भी बीजेपी ने सतनामी समाज की मदद लेकर सरकार बनाने में कामयाब रही। 10 में से नौ अजा सीटें बीजेपी की झोली में चली गई। जबकि, आरक्षण की वजह से कांग्रेस इस कंफीडेंस में रही कि अजा सीटों पर बीजेपी का सूपड़ा साफ हो जाएगा। 10 में से पांच सीटें भी अगर कांग्रेस लेने में सफल हो गई होती तो प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होती। इस बार भी भाजपा की उम्मीद की वजह सिर्फ थर्ड फ्रंट है।
47 और 52
भाजपा नेताओं को पूर्ण विश्वास है कि वह सरकार बनाने के जादुई आंकड़े जुटा लेगी। उसे लगता है, कम-से-कम 47 सीटें उसे मिल जाएगी। याने बहुमत से एक अधिक। इसमें एकाध कम भी हुआ तो बीजेपी के पास बहुत सारे तवे हैं, उस पर वह रोटी सेंक लेगी। वहीं, कांग्रेस स्पष्ट तौर पर यह मानकर चल रही है कि उसे गिरे हालत में भी 52 सीटें मिल रही है। टीएस सिंहदेव को यकीन है.....हम 52 मानकर चल रहे हैं। उससे अधिक भी आ जाए तो आश्चर्य नहीं। वहीं, भूपेश बघेल को इससे भी अधिक की उम्मीद है। भूपेश की मानें तो बदलाव की हवा में थर्ड फ्रंट की कोई भूमिका नहीं रह जाती।

सडन डेथ


90 में से करीब दस सीटें ऐसी हैं, जहां बीजेपी और कांग्रेस में कांटे का मुकाबला है। इसमें सडन डेथ से फैसला होगा। 2013 के विस चुनाव में भी दो-एक सीटों पर दो सौ से छह सौ मतों से जीत-हार तय हुई थी। सडन डेट वाली सीटों में इस बार दो-एक मंत्रियों का मामला भी हो सकता है। वे भी पांच सौ-हजार वोट से अपनी सीट निकालेंगे या फिर सब कुछ गवांएंगे। सियासी प्रेक्ष़्ाक भी मानते हैं, सडन डेथ वाली सीटें निर्णायक होंगी।   

नो चेंज या बड़ी उठापटक


यह बात स्पष्ट है कि सरकार अगर रिपीट हुई तो प्रशासनिक हल्को में बड़ा बदलाव नहीं होगा। कांग्रेस की सरकार बनने की आस में दो-चार अफसरों ने गुलाटी मारने की कोशिश की है, सिर्फ उन्हें ही बियाबान में भेजा जाएगा। 2011 बैच के आईएएस को कलेक्टर बनाया जाएगा। इसके अलावा बाकी चेंजेस लोकसभा चुनाव के बाद ही होंगे। लेकिन, सरकर कांग्रेस की बनी तो फिर पूछिए मत! पूरा उलटफेर हो जाएगा। 27 में से 15 से अधिक जिलों के कलेक्टर-एसपी बदल दिए जाएंगे। मंत्रालय में भी मेजर सर्जरी होगी। उस पर अगर भूपेश बघेल सीएम बनें तो सीएस, डीजीपी समेत मंत्रालय से लेकर तहसीलों तक के अफसर चेंज हो जाएंगे। टीएस, महंत या ताम्रध्वज को मौका मिलने पर उतना बड़ा चेंज नहीं होगा। हो सकता है, डीजीपी न बदलें। नौकरशाही फिलहाल तेल की धार समझने में लगी है। कुछ आईएएस, आईपीएस दोनों ओर सीटों की फीडबैक दे रहे हैं। याने डबल नावों की सवारी। हालांकि, पहले थर्ड फ्रंट और अब एग्जिट पोल ने ब्यूरोक्रेसी को कंफ्यूज कर दिया है। आखिर वे किधर हाथ बढ़ाएं?

भूपेश का गेटअप


कांग्रेस में सीएम के चार सक्रिय दावेदार हैं। भूपेश बघेल, चरणदास महंत, टीएस सिंहदेेव और ताम्रध्वज साहू। ऐसा कहा जा रहा है कि चारों ने अपने मंत्रिमंडल का प्रारुप तैयार कर लिया है। लेकिन, बॉडी लैग्वेज, कंफीडेंस और गेटअप तो भूपेश का दिख रहा है। जबर्दस्त जोश में दिख रहे हैं। एग्जिट पोल के दौरान टीवी पर उनका गेटअप और आत्मविश्वास कुछ अलग दिखा। तो क्या ऐसा मान लें कि दिल्ली से उन्हें कोई इशारा मिल गया है। हालांकि, ये तो उनके विरोधी भी मानते हैं कि कांग्रेस की जमीन तो भूपेश ने ही तैयार की। लेकिन, बचे तीनों भी कोई कसर नहीं उठा रखेंगे। 

सिकरेट्री टू सीएम


हालांकि, 11 दिसंबर को दोपहर तक ही स्पष्ट हो पाएगा कि सरकार किसकी बन रही है। मगर, सरकार बदलने की स्थिति में नौकरशाहों की सबसे अधिक नजर सिकरेट्री टू सीएम पद पर गड़ी हुई है। सरकार में मुख्यमंत्री के बाद अघोषित तौर पर सबसे कोई ताकतवार पद होता है तो वह है सिकरेट्री टू सीएम। मध्यप्रदेश के समय दिग्विजय सिंह सरकार में भी लोगों ने इसे देखा तो रमन सिंह गवर्नमेंट में पिछले 15 साल से लोग देख ही रहे हैं। रमन सरकार में अमन सिंह ने इसे और क्रेजी बना दिया है। दरअसल, मुख्यमंत्री अपने सबसे भरोसेमंद अफसर को सिकरेट्री अपाइंट करते हैं। सीएम सचिवालय के जरिये ही फाइलें मुख्यमंत्री तक पहुंचती है। इसे ऐसा कह सकते हैं, सीएम का सबसे अधिक राजदार उनका सिकरेट्री होता है। उसका कंपीटटेंट होना सबसे पहली शर्त होती है। सीएम सचिवालय के अफसरों के लिए सीएम हाउस का दरवाजा हमेशा खुला होता है। अभी अमन सिंह के साथ सुबोध सिंह और रजत कुमार सचिवालय में हैं। सरकार अगर बदली तो मानकर चलें, कम-से-कम नए सचिवालय में तीन आईएएस अपाइंट होंगे। और नहीं तो....फिर बदलने का सवाल ही पैदा नहीं होगा। बल्कि, सबका रुतबा और बढ़ जाएगा।

पुनिया  भी मौजूद


11 को काउंटिंग को लेकर कांग्रेस इतना उत्साहित है कि जश्न मनाने की तैयारी भी शुरू हो गई है। प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया भी 11 को सुबह रायपुर पहुंच रहे हैं। पुनिया को कांग्रेस नेताओं ने बुलाया है। मतगणना के दौरान वे राजीव भवन में मौजूद रहेंगे।   

अंत में दो सवाल आपसे


1. ब्यूरोक्रेसी के लिए सबसे उपयुक्त मुख्यमंत्री कौन रहेगा?
2. जोगी कांग्रेस-बसपा को आप कितनी सीटें मिलने की उम्मीद कर रहे हैं?

सोमवार, 3 दिसंबर 2018

फोटी-फोटी

2 दिसंबर 2018
बदलाव की चर्चा और कांग्रेस नेताओं के सीटों के दावे भले ही बढ़-चढ़कर किए जा रहे हों। मगर वास्तविकता यह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां इस उधेड़बून में लगी है कि सीटों की संख्या अगर 40 के आसपास आकर ठहर गई तो ऐसे में कौन सा फार्मूला सही रहेगा। बीजेपी के अंदरखाने में सारे विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। तो उधर बताते हैं, दिल्ली में राहुल गांधी ने कांग्रेस नेताओं की मीटिंग में यही टिप्स दिया….गोवा और मणिपुर जैसा नहीं होना चाहिए। वहां कम सीटें पाकर भी बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब हो गई थीं। राहुल ने कहा कि एकदम मुस्तैद रहना है। सरकार बनाने का दावा करने में देर नहीं करना। बैठक में इस पर भी गंभीरता से चर्चा हुई कि अगर सरकार बनाने के जादुई संख्या तक सीटें नहीं मिली तो पार्टी की रणनीति क्या होगी। कांग्रेस में इस पर भी मंथन हो रहा कि अगर बहुमत मिल गई तो दिक्कत नहीं, लेकिन 40 के आसपास रुक गया तो फिर जोगी की बजाए बसपा को साधा जाए। क्योंकि, बसपा के विधायक अगर पाला बदल लें तो एकाध निर्दलीय को मिलाकर गवर्नमेंट फर्म कर लिया जाए। क्योंकि, कांग्रेस अगर जोगी को मिलाकर सरकार बनाएगी तो उसे बहुत बड़ी कीमत अदा करनी पड़ेगी। राजनीति के जादूगर जोगी यूं ही कांग्रेस का साथ नहीं दे देंगे। जाहिर है, सीएम भी लगभग वे ही तय करेंगे। और, पुनिया, भूपेश और टीएस ऐसा कतई नहीं चाहेंगे। लेकिन, ये स्थिति तभी बनेगी, जब जोगी की झोली में कम-से-कम पांच सीटें आ जाएं। फिर, जोगी के लिए कंफर्ट कौन रहेगा….बीजेपी या कांग्रेस, ये सबसे बड़ा सवाल है।

राजभवन की भूमिका

चौथे विधानसभा चुनाव में अगर दोनों ही पार्टियां सरकार बनाने के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पाईं तो राजभवन की भूमिका अहम हो जाएगी। क्योंकि, फिर तोड़-फोड़ समर्थन देने-लेने का दौर चलेगा। ऐसे में, गेंद राज्यपाल आनंदी बेन पटेल के पाले में जाएगा। हाल ही में, जम्मू-कश्मीर का राजभवन चर्चा में रहा, जब महबूबा ने सरकार बनाने का दावा किया तो राजभवन का फैक्स मशीन खराब हो गई थी।

15 निर्णायक सीटें

जोगी के बसपा गठबंधन को कितनी सीटें मिलेगी….सियासी प्रेक्षकों की नजर में इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो गया है कि जोगी का बैल और हाथी किस करवट बैठेगा….किसको डैमेज करेगा। सूबे में करीब 15 सीटों पर जोगी कांग्रेस और बसपा ने मजबूत प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। इनमें 15 हजार से 40 हजार तक वोट खींचने की क्षमता वाले चेहरे भी हैं। अजीत जोगी खुद मरवाही से हैं। खैरागढ़, भाटापारा, चंद्रपुर, अकलतरा, चांपा, मस्तूरी, कोटा, तखतपुर, बेलतरा, बिल्हा, कसडोल जैसे 15 सीटों पर ट्रेंगुलर फाइट हैं। इनमें से कितनों के भाग्य में विधानसभा पहुंचना लिखा है, ये तो 11 दिसंबर को पता चलेगा। मगर भाजपा और कांग्रेस के लिए उम्मीद और आशंका की वजह जरूर बन गए हैं। आप समझ सकते हैं, जब कुछ सौ वोटों में जीत-हार के फैसले होते हों, वहां 15 से 40 हजार वोट पाने वाले प्रत्याशी किसी भी पार्टी को डूबोने या वैतरणी पार कराने में अहम भूमिका तो निभा ही सकते हैं। इन्हीं 15 सीटों से बीजेपी को सबसे अधिक उम्मीद तो कांग्रेस को सबसे अधिक आशंका।

किंग मेकर जोगी

जोगी परिवार को खबरों में रहने की कला में निपुणता हासिल है। अब देखिए, जोगीजी का परिवार चुनावी थकान मिटाने गोवा की सैर पर है। लेकिन, अपने ट्वीट से राजनीतिज्ञों का बीपी ही नहीं बढ़ा रहा बल्कि आउट ऑफ स्टेट होने के बाद भी खबरों के केंद्र में भी बना हुआ है। छोटे जोगी कभी भावी सीएम के साथ गोवा ट्रिप तो कभी मां रेणु और अपनी पत्नी ऋचा को भावी विधायक बताते हुए ट्वीट कर रहे हैं। गोवा के समुद्र तट से फोटो भी ऐसे पोस्ट हो रहे हैं, जिसमें जोगीजी के परिवार का बॉडी लैग्वेज और कांफिडेंस देखकर लग रहा….किंग मेकर बनने से उन्हें कोई रोक नहीं पाएगा।

किस-किसको साधें

बदलाव की चर्चा से सर्वाधिक कोई उलझन में है तो वे हैं सूबे के नौकरशाह। आखिर वे किस-किसको साधे। कांग्रेस में एक-दो नहीं, मुख्यमंत्री के आधा दर्जन दावेदार हैं। भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव, चरणदास महंत, रविंद्र चौबे और ताम्रध्वज साहू। ये पांच नाम तो ओपन हैं। कुछ चेहरे ऐसे हैं, जिन्हें लगता है कहीं बिल्ली के भाग्य से सिकहर टूट जाए तो उन्हें भी मौका मिल सकता है। इनमें कांग्रेस के अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के कुछ नेता बेहद उत्साहित हैं। ऐसे में बेचारे नौकरशाहों की मानसिक यंत्रणा समझी जा सकती है। कहां-कहां हाजिरी लगाएं। ठीक है, वे पाला बदलने में माहिर माने जाते हैं। 2003 के चुनाव के बाद अफसरों के इस कौशल को लोगों ने देखा ही है। लेकिन, इस बार स्थिति जुदा है। पांचों के चौखट पर वे जा नहीं सकते। पहले सबसे अधिक टीएस से उम्मीद थी। लेकिन, राहुल ने ताम्रध्वज को भी मैदान में उतार दिया। अब, शिगूफा चल रहा, जमीन तैयार भूपेश ने की है तो उन्हें राहुल नजरअंदाज नहीं करेंगे। उधर, महंत भी दावेदारी में पीछे नहीं हैं। अफसरों के लिए ये उलझन ही तो हैं।

पहली बार आईएएस

आईएफएस राकेश चतुर्वेदी को लघु वनोपज संघ का प्रमुख बनाने के बाद जीएडी ने आईएएस जीतेन्द्र शुक्ल को प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क का सीईओ अपाइंट कर दिया। रुरल एरिया में सड़क बनाने वाली इस एजेंसी का कभी आईएएस सीईओ नहीं बना। सालों से इस पोस्ट पर आईएफएस का कब्जा रहा। चुतुर्वेदी से पहिले आलोक कटियार, सुधीर अग्रवाल, पीसी पाण्डेय सभी आईएफएस थे। हालांकि, राकेश के प्रमोशन के बाद यह पद खाली था, इसलिए मंत्रालय के गलियारों में इसे टेम्पोरेरी पोस्टिंग मानी जाती है….लोग मान रहे हैं कि 11 दिसंबर के बाद लिस्ट निकलेगी, उसमें फायनल होगा। लेकिन, जानने वाले को पता है कि जब तक आरपी मंडल पंचायत विभाग के एसीएस रहेंगे, जीतेंद्र को कोई हिला नहीं पाएगा। पंचायत विभाग की कमान संभालते ही जीतेंद्र को मंडल डायरेक्टर पंचायत बनाकर लाए थे। अब, सीईओ भी बनवा लिए हैं। दरअसल, मंडल और जीतेंद्र में बड़ी अच्छी केमेस्ट्री है। दोनों सालों से एक साथ काम कर रहे हैं। मंडल पिछले दस साल में जिस भी विभाग में रहे, जीतेंद्र उनके साथ रहे। अरबन, पीडब्लूडी, पंचायत सभी में। जोड़ी तभी ब्रेक होगी, जब जीतेंद्र कलेक्टर बन जाएं।

कांग्रेस के 90 विधायक!

रायपुर के राजीव भवन में कांग्रेस नेताओं ने सभी 90 प्रत्याशियों को बुलाकर पूछा कि कौन-कौन जीत रहा है तो एक-एक कर सभी 90 खड़े हो गए। इस पर जमकर ठहाके लगे। हालांकि, बाद में चरणदास महंत ने चुटकी ली….पहली और आखिरी बार आप सभी 90 भावी विधायकों को एक साथ बुलाया गया है। उनका इशारा इस ओर था कि सभी 90 तो जीत कर आएंगे नहीं। इसलिए पहली और आखिरी बार ही हुआ न।

अंत में दो सवाल आपसे

1. रमन सरकार के कितने मंत्री अपनी सीट बचा पाएंगे?
2. कांग्रेस के सीएम पद के किस दावेदार की सीट फंस गई है?

शनिवार, 10 नवंबर 2018

जातिवादी राजनीति

11 नवंबर
छत्तीसगढ़ में जातिवादी राजनीति के लिए कभी कोई स्पेस नहीं रहा। मध्यप्रदेश के समय भी यहां दो ही पार्टियों का वर्चस्व रहा। कांग्रेस और भाजपा। दोनों पार्टियां अपने मेनिफेस्टो पर वोट मांगती थी। 2003 में कांग्रेस ने जरूर जातिवादी कार्ड को चलने की कोशिश की लेकिन, यहां की जनता ने उसे सिरे से खारिज कर दिया। लेकिन, चौथे विधानसभा चुनाव में कुछ राजनीतिक पार्टियां जातिवाद को उभारकर चुनावी वैतरणी पार करने का प्रयास कर रही हैं, वह छत्तीसगढ के लिए शुभ संकेत नहीं है। आखिर, यूपी, बिहार के पिछड़ने की मूल वजह जातिवादी राजनीति ही रही है। हालांकि, ये अच्छी बात है कि छत्तीसगढ़ के लोग जाति और धर्म का चश्मा पहनकर वोट डालने नहीं जाते। वरना, स्वाभिमान मंच का शटर नहीं गिरता। दरअसल, जब राजनीतिक प्रत्याशियों के पास जब मुद्दों का टोटा हो जाता है, तो फिर इस तरह की बांटने वाली राजनीति शुरू हो जाती है। विस्मय यह कि जातिवाद के तवे पर रोटी सेंकने में कोई भी पार्टी पीछे नहीं रहती।

सीटों का गुणाभाग

चुनाव के समय नौकरशाहों के पास कोई काम नहीं होता। चुनाव में ड्यूटी लगती नहीं। उपर से आफिस में बैठने की मजबूरी। मुख्यालय जो नहीं छोड़ना है। ऐसे में, करें क्या? नोटपैड पर सीटों के गुणाभाग में समय व्यतीत कर रहे हैं। जिन अफसरों की बीजेपी से कंफर्टनेस है, वे इसी सरकार को रिपीट करने के हिसाब से उसे सीट दे रहे हैं और जो अनकंफर्टनेस महसूस करते हैं, वे संख्याबल में कांग्रेस को उपर कर दे रहे हैं। हालांकि, कुछ दिन पहले तक हंड्रेड परसेंट नौकरशाह इसी सरकार को रिपीट होते देखना चाह रहे थे। लेकिन, सीडी कांड के बाद एक कांग्रेस नेता का खौफ अफसरों पर से हट गया है। लिहाजा, स्थितियां कुछ बदली है।

कोरबा और तानाखार

कोरबा और तानाखार ऐसी सीट हैं, जहां जिस पार्टी के विधायक बनते हैं, उस पार्टी की सरकार नहीं बनती। तानाखार में 15 साल से कांग्रेस के विधायक थे और सरकार रही बीजेपी की। उससे पहिले गोंडवाना पार्टी से हीरा सिंह मरकाम एमएलए रहे और सरकार रही कांग्रेस की। कोरबा का मामला भी कुछ इसी तरह का है। 2008 में कटघोरा से अलग होकर कोरबा विधानसभा बना था। तब से कांग्रेस के जय सिंह विधायक हैं। उससे पहिले कटघोरा में बोधराम कंवर विधायक थे तो बीजेपी की सरकार रही। कंवर से पहले बनवारी लाल अग्रवाल कटघोरा से विधायक चुने गए और सरकार बनी कांग्रेस की। हालांकि, कई बार मिथक टूटते भी हैं। मसलन, कोरबा जिले का ही रामपुर सीट के बारे में कहा जाता था कि जो वहां का विधायक बनता है, राज्य में उस पार्टी की सरकार बनती है। हालांकि, पिछले बार इसमें ब्रेक लग गया। ननकीराम कंवर वहां से चुनाव हार गए।

भाईचारा!

निर्वाचन आयोग ने कलेक्टरों का चुनावी ज्ञान परखने के लिए परीक्षा आयोजित की तो उसमें सारे डायरेक्ट आईएएस बनें कलेक्टरों को ऐन-केन-प्रकारेण पास कर दिया गया। फेल हुए सिर्फ तीन प्रमोटी कलेक्टर। इसी तरह कौवा मारकर लटकाने की बारी आई तो चुनाव आयोग ने आबकारी विभाग के सिकरेट्री डीडी सिंह की छुट्टी कर दी। छत्तीसगढ़ बनने के बाद तीन विधानसभा और तीन लोकसभा चुनाव हुए हैं, लेकिन, कभी किसी सचिव पर कार्रवाई नहीं हुई। हर चुनाव में दो-एक कलेक्टर, एसपी नपे। ये पहला मौका है कि आयोग ने सचिव को हटाया। वो भी प्रमोटी। कहीं भाईचारा तो नहीं निभाई जा रही।

गजब की वसूली

कहते हैं, पैसा कमाने वाले समुद्र की लहरें गिनकर भी पैसा कमा लेते हैं। छत्तीसगढ़ के नौकरशाहों का भी इस मामले में जवाब नहीं है। चुनाव आयोग ने तीन साल से जमे अधिकारियों को हटाने का आदेश दिया तो मंत्रालय के अफसरों की लाटरी लग गई। मलाईदार पदों पर तीन साल से अधिक समय से बैठे अफसरों से ट्रांसफर के नाम पर जमकर खेल किया गया। जिनने गुलाबी नोट पहुंचा दिया वे बच गए, बाकी नप गए। कुछ विभागों ने अपनों को बचाने के लिए जीएडी को लिखकर भेज दिया कि हमारे अफसरों की निर्वाचन में ड्यूटी नहीं लगती। जीएडी का तो भगवान ही मालिक है। उसने चेक भी नहीं किया और ओके कर दिया। जीएडी या सीईओ सुब्रत साहू एक बार चेक करवा लें कि पंजीयन विभाग में कितने तीन साल वालों के ट्रांसफर हुए हैं और उसने जीएडी को क्या लिखकर भेजा था। सारा माजरा सामने आ जाएगा।

सरकार में गोल?

भाजपा की सरकार है, और सरकार के ही अफसर। फिर भी सबसे अधिक सामान बीजेपी प्रत्याशियों के ही जब्त किए जा रहे हैं। नेता भी चकित हैं तो प्रत्याशी भी पार्टी आफिस में दुखड़ा रो रहे हैं। दरअसल, चुनाव आयोग के कुछ आब्जर्बर काफी टफ आ गए हैं। एक वीआईपी डिस्ट्रिक्ट के कलेक्टर को तो प्रेक्षक ने भरी मीटिंग में निगेटिव कमेंट कर दिया। हालांकि, कुछ कलेक्टर, एसपी भी चतुराई भरा रोल अदा कर रहे हैं। पता चला है, ऐसे अफसरों को सरकार चुपचाप वॉच कर रही है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. पीएल पुनिया, भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव जगदलपुर से एक ही गाड़ी से रायपुर लौटे, क्या तीनों में सुलह हो गई है क्या?
2. किस मंत्री को निबटाने के लिए बीजेपी की एक महिला नेत्री ने कांग्रेस के एक नेता से हाथ मिला लिया हैं?

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

सीएम-सीएम का खेल!

21 अक्टूबर
बसपा के साथ गठबंधन करने से चूकी कांग्रेस पार्टी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी से भी तालमेल करने में नाकाम हो गई। गोंगपा ने समाजवादी पार्टी से समझौता कर लिया। इससे कम-से-कम चार सीटों पर कांग्रेस के समीकरण गड़बड़ाएंगे। उधर, सीपीआई ने भी बस्तर खास कर कोंटा में प्रत्याशी का ऐलान कर वहां के कांग्रेस के विनिंग कंडिडेट कवासी लखमा की मुश्किलें बढ़ा दी है। कांग्रेस के एक और विनिंग कंडिडेट रामदयाल उईके को पार्टी पहले ही गंवा चुकी है। सूबे के सियासी प्रेक्षक भी मानते हैं, कांग्रेस डे-टू-डे राजनीतिक चूक कर रही है। बसपा को लेकर पार्टी कोई भी तर्क या आरोप लगा लें, ये तो सभी को मालूम है कि पार्टी नेता उसे पांच से अधिक सीटें देने सहमत नहीं थे। आखिर, कांग्रेस 90 की 90 सीट तो जीतेगी नहीं। बसपा को अगर 10 सीट दे दी होती तो कांग्रेस की आज स्थिति कुछ और होती। आज से एक महीने पहिले याने 19 सितंबर तक बीजेपी और कांग्रेस में नेक-टू-नेक फाइट की स्थिति थी। दोनों पार्टियों के सर्वे में 19-20 का फर्क था। लेकिन, 20 सितंबर को जोगी कांग्रेस से बसपा का गठबंधन होने के बाद से कांग्रेस के सामने चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। इसकी मुख्य वजह सीएम की कुर्सी मानी जा रही। सीएम-सीएम के खेल में कांग्रेस के बड़े लीडर इतने लीन हो गए हैं कि बसपा, गोंगपा कब उनके हाथ से निकल गई, पता ही नहीं चला। चुनाव की बेला में पीसीसी चीफ भूपेश बघेल और नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव पिछले एक महीने से साथ नजर नहीं आए हैं। जनघोषणा पत्र को लेकर सिंहदेव राजधानी के एक होटल में प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे तो बघेल भाजपा कार्यालय में अटलजी की अस्थि कलश को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। इसी हफ्ते कांग्रेस के सिंहदेव समेत कई नेता जब राजनांदगांव में थे तो भूपेश रायपुर में पत्रकार से नेता बने रुचिर गर्ग को प्रेस से इंट्रोड्यूज करा रहे थे। चरणदास महंत ताम्रध्वज साहू को रमन सिंह के खिलाफ राजनांदगांव से लड़ाने के लिए अलग प्रेशर बनाने में जुटे हैं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं में इसके अच्छे संदेश नहीं जा रहे। कांग्रेस नेताओं को इसे समझना चाहिए….छोटी-छोटी चूक उन्हें कहीं भारी न पड़ जाए।

इंटेलिजेंस फेल्योरनेस

विधानसभा चुनाव के दौरान खुफिया पुलिस की भूमिका अहम हो जाती है। लेकिन, पीसीसी चीफ भूपेश बघेल और महिला नेत्री करुणा शुक्ला के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ता जिस तरह बीजेपी मुख्यालय के गेट तक पहुंच गए, उससे राज्य की इस खुफिया एजेंसी की पोल खुल गई। खुफिया पुलिस को पता ही नहीं चला कि कांग्रेस इस तरह प्रदर्शन की कोई योजना बना रही है। जबकि, एनएसजी सुरक्षा प्राप्त मुख्यमंत्री डा0 रमन सिंह और उनके मंत्रिमंडल के कई सदस्य मुख्यालय में मौजूद थें। चीफ मिनिस्टर आफिस ने इसे बेहद गंभीरता से लिया है। चुनाव के दौरान सीएम को राज्य भर में दौरे करने होते हैं। इंटेलिजेंस के इस पारफारमेंस को देखते सीएमओ की चिंता लाजिमी है। ये तो कांग्र्रेस नेता थे, कहीं नक्सली या आतंकवादी पहुंच जाएं तो….? इंटेलिजेंस का ये हाल तब है, जब मुख्यमंत्री ने खुफिया तंत्र को मजबूत करने के लिए सिक्रेट मनी को 45 लाख से बढ़ाकर नौ करोड़ रुपए कर दिया है। वास्तव में स्थिति चिंताजनक है।

ब्यूरोक्रेसी का खाता

कांग्रेस ने आखिरकार पूर्व आईएएस एसएस सोरी को कांकेर से मैदान में उतार दिया। सोरी ने 2013 के विधानसभा चुनाव से पहिले टिकिट की आस में आईएएस से इस्तीफा दे दिया था। लेकिन, तब उन्हें मौका नहीं मिल पाया। लेकिन, इस बार कांग्र्रेस ने सोरी के साथ दरियादिली दिखाकर राजनीति में आए रिटायर नौकरशाहों की उम्मीदें जवां कर दी है। जाहिर है, अबकी बड़ी संख्या में रिटायर ब्यूरोक्रेट्स ने भाजपा और कांग्रेस ज्वाईन किया है। लेकिन, पहला खाता सोरी का खुला है। हालांकि, बीजेपी ने भी देर रात ओपी चौधरी की टिकिट दे दिया। लेकिन पहला खाता खुलने का क्रेडिट तो सोरी को मिलेगा ही।

एक परिवार, तीन पार्टी

एक घर में तीन पार्टी….तीनों की अलग-अलग दलों से चुनाव लड़ने की तैयारी…..ऐसा आपने पहले नहीं सुना होगा। ग्वालियर में विजय राजे सिंधिया जरूर बीजेपी से चुनाव लड़ती थीं और उनके बेटे माधव राव सिंधिया कांग्रेस से। दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह भी कुछ साल तक बीजेपी में रहे। साउथ में भी कुछ वाकये ऐसे मिलते हैं। लेकिन, देश के किसी राजनीतिक परिवार में तीन अलग-अलग पार्टियों से चुनाव लड़ने का दृष्टांत नहीं मिलता। लेकिन, छत्तीसगढ़ में अबकी ऐसा होने जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की बहू ़ऋचा जोगी बसपा से प्रत्याशी घोषित हो गई हैं। अमित जोगी अपनी पार्टी से किस्मत आजमाएंगे तो उनकी मां रेणु जोगी कोटा से कांग्रेस टिकिट की प्रबल दावेदार हैं। हालांकि, ये सर्वविदित है, इसके पीछे कोई पारिवारिक विवाद नहीं है। विशुद्ध तौर पर सियासी नफा-नुकसान वाला यह मामला है।

बसपा में विलय?

अजीत जोगी की बहू ऋचा जोगी और जोगी कांग्रेस की गीतांजलि पटेल को बसपा से चुनाव लड़ाने की सियासी कलाबाजी के बीच सूबे में ये अटकलें तेज हो गई है कि विधानसभा चुनाव के बाद जोगी कांग्रेस का बसपा में विलय हो जाएगा। इसके पीछे तर्क यह दिए जा रहे कि जोगी कांग्रेस को अभी सियासी वजूद बनाने में वक्त लगेगा। इस पार्टी का फिलवक्त जो भी वजन है, वह सिर्फ और सिर्फ अजीत जोगी के कारण है। आपने देखा ही, जोगीजी की तबियत बिगड़ने पर किस तरह उनके लोग लगे थे छोड़-छोड़कर भागने। जबकि, बसपा सालों पहले से अपनी सियासी जमीन बना चुकी है। उसके सिम्बॉल पर वोट मिलते हैं। बिना किसी मशक्कत के उसके हमेशा दो-एक विधायक जीतते आए हैं। अब, जोगीजी का साथ मिल जाएगा तो जाहिर है, उसकी स्थिति और सुदृढ़ होगी। ऐसे में, इन अटकलों को एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता। जोगीजी और मायावती की राहें भी जुदा हैं। लिहाजा, टकराव की आशंका भी नहीं होगी। मायावती को यूपी की राजनीति करनी है या फिर केंद्र की। छत्तीसगढ़ से उन्हें क्या मतलब?

शराब लॉबी एक

शराब ठेके का सरकारीकरण करके शराब ठेकेदारों को बेरोजगार कर देने वाले आबकारी मंत्री अमर अग्र्रवाल की मुश्किलें इस बार बढ़ सकती है। पता चला है, बिलासपुर से उन्हें पराजित करने के लिए शराब ठेकेदारों ने हाथ मिला लिया है। अमर बिलासपुर से लगातार चार बार विधायक हैं। पांचवी बार वे मैदान में होंगे। शराब ठेकेदारों ने उन्हें निबटाने के लिए पिटारा खोल दिया है।

राजनांदगांव पेंडिंग

कांग्रेस ने पहले चरण की 18 में से बस्तर की 12 सीटों के प्रत्याशियों का ऐलान कर दिया। लेकिन, राजनांदगांव की छह सीटों को पेंडिंग कर दिया। राजनांदगांव की छह में से चार सीटें अभी कांग्रेस के पास है। इन चार में से दो सीटों पर वह चेहरा बदलने वाली है। जिन दो विधायकों की टिकिट कटेगी उस पर जाहिर है, विरोधी पार्टियां डोरे डालेंगी। इसी वजह से कांग्रेस ने राजनांदगांव की सूची को पेंडिंग रखने में ही भलाई समझी।

अंत में दो सवाल आपसे

1. बस्तर के विधायक दीपक बैज को फिर टिकिट देकर कांग्रेस अपने को धन्य क्यों समझ रही है?
2. चुनाव से पहिले किस जिले के कलेक्टर को बदलने पर आयोग विचार कर रहा है?

सोमवार, 15 अक्टूबर 2018

ब्यूरोक्रेट्स के सीएम

14 अक्टूबर
नौकरशाही के लिए वैसे तो डा0 रमन सिंह से बेहतर कोई सीएम नहीं हो सकता। डाक्टर साब से 15 साल में अफसरों को कोई दिक्कत नहीं हुई। उन्होंने किसी का कोई नुकसान नहीं किया। वरना, अजीत जोगी का कार्यकाल अफसरों को अभी भी याद है। वे मीटिंग से अफसरों को उठा देते थे। बहरहाल, चुनाव के बाद इन केस स्थिति बदली तो स्वाभाविक सा प्रश्न है, नौकरशाह सीएम के रूप में किसे देखना पसंद करेंगे? रमन सिंह के विकल्प के रूप में अफसर टीएस सिंहदेव को देख रहे हैं। टीएस रमन सिंह से विनम्रता और सौम्यता में इक्कीस नहीं है तो उन्नीस भी नहीं बोल सकते। ब्यूरोक्रेट्स को सबसे अधिक भय भूपेश बघेल से था। भूपेश के नाम से ही अफसरों में बेचैनी थी। लेकिन, सीडी कांड के बाद अफसर बेहद राहत महसूस कर रहे हैं।

आचार संहिता के मजे

आचार संहिता प्रभावशील होने के बाद सबसे अधिक कोई पावरफुल हुआ है तो वह हैं सीईओ सुब्रत साहू। सूबे का सारा सिस्टम सूब्रत साहू के ईर्द-गिर्द घूम रहा है। मामूली सा आदेश या टेंडर निकालना है तो सुब्रत के दरबार में दौड़ लगानी पड़ेगी। और, आचार संहिता से मजे में कोई है, तो वह है अफसरशाही। निर्वाचन से जुड़े अफसरों के पावर बेहिसाब बढ़ जाते हैं। मंत्री, मिनिस्टर, सरकार सब गौण। जो इलेक्शन से नहीं जुड़े हैं, वे भी फुली आराम के मोड में हैं। कुछ भी काम लेकर जाइये, जवाब मिलेगा मालूम नहीं….आचार संहिता लगी है। मंत्रालय के अधिकांश अफसरों की आजकल अघोषित छुट्टियां चल रही हैं। नहीं भी गए तो कौन पूछने वाला है।

वार्म अप-1

आचार संहिता लगने के बाद चुनाव आयोग दो-एक कलेक्टर, एसपी को जरूर नापता है। आयोग इन अफसरांं की छुट्टी इसलिए भी करता है कि चुनाव को लेकर बाकी अफसर गंभीर हो जाएं। छत्तीसगढ़ बनने के बाद हुए तीनों चुनावों में कलेक्टर, एसपी को आयोग ने हटाया है। इस बार आचार संहिता लगने के बाद सात दिन गुजर गए हैं। लेकिन, किसी भी कलेक्टर, एसपी का नम्बर नहीं लगा है। लिहाजा, सताईसां जिले के कलेक्टर, एसपी यह सोचकर सहमे हुए हैं…अबकी आखिर किसका नम्बर लगता है। चुनाव आयोग ने इस बार चार एक्सट्रा प्लेयर भी रखा है। वे भी वार्मअप हो रहे हैं। कलेक्टर, एसपी के हिट विकेट होने पर ही एक्सट्रा प्लेयर को मौका मिलेगा। अब देखते हैं, बेचारों को कब तक अवसर मिलता है।

वार्म अप-2

वार्म अप तो बीजेपी-कांग्रेस ज्वाईन करने वाले अफसर भी हो रहे हैं। जाहिर है, इस बार थोक में रिटायर अफसरों ने दोनों पार्टियों को ज्वाईन किया है। लेकिन, चुनाव में कितनों के नम्बर लगेंगे, उनके राजनीतिक आका भी ठीक से बता पाने की स्थिति में नहीं हैं। यह सोचकर रिटायर अफसरों का मन तड़प रहा है। दोनों ही पार्टियों में अब तक जितने भी अफसर ज्वाईन किए हैं, उनमें टिकिट का फायनल इशारा सिर्फ ओपी चौधरी को हुआ है। बाकी अभी टकटकी लगाए बैठे हैं।

बस्तर से भी एक

रामदयाल उईके के बीजेपी प्रवेश के बाद बस्तर से भी एक कांग्रेस विधायक के भाजपा में शामिल होने की काफी चर्चा है। हालांकि, बस्तर के आदिवासी विधायक के कांग्रेस छोड़ने की बातें उईके से पहले शुरू हुई थी। लेकिन, उईके के पास कार्यकारी अध्यक्ष जैसा अहम पद था। इसलिए, पहले आपरेशन उईको को अंजाम दिया गया। सूत्रों की मानें तो अब बस्तर विधायक का नम्बर लगेगा।

तीन सीटों की चुनौती

कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रामदयादल उईके के बीजेपी में शामिल होने से सत्ताधारी पार्टी की एक सीट सुनिश्चित हो गई। पाली तानाखार सीट से उन्हें कोई हरा नहीं सकता। लेकिन, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के कारण बीजेपी की अब तीन सीटों पर चुनौती बढ़ गई है। कांग्रेस अब गोंगपा से हाथ मिलाने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस-गोंगपा का तालमेल होने पर कोटा, कटघोरा और मरवाही में बीजेपी की चुनौती और बढ़ जाएगी। इन तीनों सीटों पर गोंगपा का खासा प्रभाव है। 15 से 20 हजार वोट गोंगपा को मिलते हैं। हालांकि, तीन में दो सीटें अभी कांग्रेस के पास है। कोटा से रेणु जोगी, कटघोरा से बीजेपी से लखनलाल देवांगन और मरवाही से अमित जोगी भी कांग्रेस की टिकिट पर चुनाव जीते थे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. रामदयाल उईके की घर वापसी में सरकार के किस मंत्री ने मध्यस्थता अहम रही?
2 अबकी विधानसभा चुनाव में बीजेपी के कितने मंत्रियों की टिकिट कटने वाली है?